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भावेष जोशी राजनीतिक फिल्म है या सुपर हीरो की..?

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर यदि गौर किया जाए, तो देश में केंद्र की सरकार बदलते ही फिल्मकारों की सोच बदल जाती है. सभी केंद्र की सरकार को ध्यान में रखते हए अपनी फिल्म के लिए कहानी चुनने लगते हैं. हम इसके लिए अतीत की कब्र खोदने की जरुरत महसूस नहीं करते. मगर जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी है, तब से जिस तरह का सिनेमा भारत में बन रहा है, उस पर बारीकी से गौर किया जाए, तो यही सच सामने आता है कि सरकार बदलने के साथ ही भारतीय फिल्मकारों की सोच बदल जाती है. फिलहाल तमाम फिल्मकार अपनी फिल्मों में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभियानों को ही किसी न किसी बहाने प्रचारित कर रहे हैं.

इस चर्चा के पीछे हमारा  मसकद ‘‘सरिता’’ पत्रिका के पाठकों के सामने हर्षवर्धन कपूर की विक्रमादित्य मोटावणे के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ की विषय वस्तु के सच को रखना है. बौलीवुड और मीडिया में चर्चाएं गर्म हैं कि ‘‘भावेष जोशी’’ की कहानी एक गुजराती युवक की कहानी है, जिसके पास कुछ सुपर पावर हैं. यानी कि यह फिल्म एक सुपर हीरो की कहानी है. मगर खुद हर्षवर्धन कपूर पूरी तरह से इस बात से सहमत नहीं है. वह फिल्म ‘भावेष जोशी’ की कहानी पर खुलकर बात नहीं करना चाहते. मगर हर्षवर्धन कहते हैं-‘‘फिल्म ‘भावेष जोशी’ में मेरा किरदार आम सुपरहीरो वाला नहीं है. इस फिल्म को या मेरे किरदार को कृष न समझें. भावेष एक सजग हीरो है. यह बड़े बजट वाली फिल्म नहीं है. इसे आप कामिक की किताब की तरह पढ़ सकते हैं. यह एक हीरो के जन्म की कहानी है. यह विक्रमादित्य मोटावणे की एक्शन प्रधान कमर्शियल फिल्म है.’’

यूं तो हर्षवर्धन कपूर की पहली फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ सात अक्टूबर को प्रदर्शित होने वाली है, जिसका निर्देशन राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने किया है. ‘‘मिर्जिया’’ पूर्णरूपेण एक प्रेम कहानी वाली फिल्म है, जिसे अति भव्य स्तर पर बनाया गया है. मगर फिल्म ‘भावेष जोशी’ की कहानी का पूरी तरह से साफ नजर नहीं आ रही है.

लेकिन जब हमने हर्षवर्धन कपूर से बात की, तो हर्षवर्धन कपूर ने हमे जो कुछ बताया, उससे तो फिल्म ‘भावेष जोशी’ एक राजनीतिक फिल्म लगती है. ‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बातचीत करते हुए हर्षवर्धन कपूर ने कहा-‘‘मैं अमरीका फिल्म पटकथा लेखन व अभिनय का प्रषिक्षण लेने गया था. जब मैं वापस आया, तो मेरी पहली बातचीत विक्रमादित्य मोटावणे के साथ फिल्म ‘भावेष जोशी’ के लिए बात हुई थी. उस वक्त इस फिल्म की पटकथा कांग्रेस की सरकार की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी. क्योंकि उस वक्त केंद्र और महाराट्र में कांग्रेस की सरकार थी. उस वक्त मैं 21 साल का था और कहानी 26 से 28 साल की उम्र के युवक की थी. तो मुझे लगा कि मैं बहुत युवा हूं. इसलिए नहीं किया था.’’

पर जब हमने उनसे कहा कि अब तो वह फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ की शूटिंग कर रहे हैं? तो हर्षवर्धन ने कहा-‘‘लगभग साढ़े तीन वर्ष ‘मिर्जिया’ को देने के बाद मैं 26 साल का हो गया हूं. और भावेष जोशी भी इसी उम्र का है. इसलिए कर रहा हं. फिल्म ‘भावेष जोशी’, ‘मिर्जिया’ से बहुत अलग है. फिल्म ‘भावेष जोशी’ मुंबई के बारे में है. इसकी पटकथा मुझे बहुत पसंद आयी. मेरा दावा है कि अब तक आपने इस तरह की फिल्म देखी नहीं होगी. यह बहुत समसामायिक है. पहले फिल्म की पटकथा में कांग्रेस के शासन की पृष्ठभूमि थी. अब भारतीय जनता पार्टी है.’’

जब हमने कहा कि अब जब आप चार वर्ष बाद फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ कर रहे हैं, तो फिल्म की पटकथा में बदलाव किया गया है और यह फिल्म एक राजनीतिक फिल्म है? इस पर हर्षवर्धन कपूर ने कहा-‘‘पटकथा में  कुछ बदलाव किया गया है. पर समस्याएं तो होनी है, कांग्रेस के शासन में अलग समस्याएं थी, अब भाजपा के शासन में अलग समस्याएं हैं. फिल्म में जो कुछ है, उस पर मैं अभी विस्तार से बात नहीं कर सकता हूं. इसलिए यह फिल्म राजनीतिक है या नहीं, यह भी नही पता. पर यह फिल्म एक युवक और उसके यकीन की कहानी है. वह समाज में बदलाव के लिए एक लड़ाई लड़ता है. ‘भावेष जोशी’ इस बारे में भी है कि शहरी युवा पीढ़ी किस तरह की एक बंदिश वाली जिंदगी जीती है. उसके आउटडोर गतिविधियों के लिए साधन नहीं है.’’

‘मिर्जिया’ और ‘भावेष जोशी’ के बीच झूल रहे हर्षवर्धन

सात अक्टूबर को राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ प्रदर्शित होने वाली है, जिसमें हर्षवर्धन कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई है. तो वहीं वह अब विक्रमादित्य मोटावणे की फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ की भी शूटिंग शुरू कर चुके हैं. जबकि हकीकत यह है कि हर्षवर्धन कपूर ‘‘मिर्जिया’’ और ‘‘भावेष जोशी’’ दोनों फिल्में एक एक बार करने से इंकार कर चुके थे.

हाल ही में हर्षवर्धन कपूर से जब हमने फिल्म‘‘मिर्जिया’’ को लेकर लंबी बातचीत की, उस वक्त उनसे जो बाते हुई, उससे ‘‘मिर्जिया’’ और ‘‘भावेष जोशी’’ के बीच वह किस तरह झूलते रहे, उसकी कहानी जो खुलकर सामने आयी है, वह इस प्रकार हैः

राकेश ओमप्रकाश निर्देशित फिल्म ‘‘दिल्ली 6’’ की दिल्ली में शूटिंग चल रही थी. जिस दिन इस फिल्म की नायिका और हर्षवर्धन कपूर की बहन सोनम कपूर इस फिल्म के लिए रामलीला वाले सीन की शूटिंग कर रही थीं, उसी दिन हर्षवर्धन कपूर अपनी बहन से मिलने सेट पर पहुंच गए थे. उन्हे देखते ही राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने उनके सामने अपनी फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ का प्रस्ताव रखा था, जिसे उस वक्त हर्षवर्धन ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि वह अभी तैयार नहीं है. वैसे उस वक्त तक फिल्म की पटकथा पूरी नहीं हुई थी और गुलजार फिल्म की पटकथा लिखने में व्यस्त थे. उसके बाद हर्षवर्धन अमेरिका चले गए. वहां पर उन्होंने चार वर्ष फिल्म पटकथा लेखन व एक साल अभिनय का प्रशिक्षण हासिल किया. उसके बाद जब हर्षवर्धन वापस मुंबई आए, तो वह 22 वर्ष के हो चुके थे. तब उन्हे सबसे पहले विक्रमादित्य मोटावणे ने फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ का आफर दिया था. हर्षवर्धन को फिल्म की पटकथा पसंद आयी थी, मगर उन्हे लगा कि वह किरदार में फिट नही बैठते हैं. इसलिए इंकार कर दिया था.

खुद हर्षवर्धन कहते हैं-‘‘मुझसे ‘दिल्ली 6’ के समय चर्चा हुई थी, तो मैने कहा था कि मैं तैयार नहीं हूं. क्योंकि उस वक्त मैं पढ़ाई कर रहा था. मैंने राकेश सर से कहा था कि मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी अभी निभा नहीं पाउंगा. राकेश सर अपने स्टिंक्ट पर भरोसा करते हैं. अगर उन्हे अंदर से अच्छा लगता है, तो वह उस पर कायम रहते हैं. उस दिन मुझे देखकर उनके दिल की आवाज ने कहा था कि यही लड़का मिर्जा के किरदार को निभा सकता है. जिसकी सोच से उनकी सोच मिलती है, उससे वह हटते नहीं है.’’

इस बीच राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘दिल्ली 6’ के बाद फिल्म ‘‘भाग मिल्खा भाग’’ पूरी कर चुके थे. इस फिल्म के शो के दौरान राकेश ओम प्रकाश मेहरा और हषवर्धन कपूर जब आमने सामने हुए, तो एक बार फिर राकेश ओम प्रकाशस मेहरा ने उनके सामने ‘मिर्जिया’ का प्रस्ताव रख दिया. इस बार हर्षवर्धन कपूर ने इसे स्वीकार कर लिया.

हर्षवर्धन कपूर कहते हैं-‘‘जब अमरीका से वापस आया, तो मेरे अंदर पटकथा की समझ विकसित हो चुकी थी. मुझे लगा कि अब मैं देख सकता हूं कि राकेश सर ने मुझे इसके लिए क्यों चुना और मुझे लगा कि मैं इस किरदार को निभा सकता हूं. मुझमें और आदिल में थोड़ी बहुत समानता है. आदिल ज्यादा बोलता नहीं है. बहुत संजीदा इंसान है. मेरा जो लुक है, वह भी इस फिल्म के काफी करीब है.’’

हर्षवर्धन कपूर को ‘मिर्जिया’ के लिए निर्देशक राकेष ओमप्रकाश मेहरा के निर्देश पर पूरे 18 माह तक खास तरह का प्रशिक्षण हासिल करना पड़ा. उसके बाद फिल्म की शूटिंग में वक्त लगा. इस बीच साढ़े तीन वर्ष का वक्त गुजर गया. ‘मिर्जिया’ की शूटिंग पूरी होने के बाद जब पुनः हर्षवर्धन को फिल्म ‘‘भावेष जोशी’’ का आफर मिला, तो उन्होंने इससे जुड़ने का फैसला कर लिया. इस बीच फिल्म की पटकथा बदल चुकी थी. हषवर्धन कपूर फिल्म ‘भावेष जोषीशी’ के लिए भी कुछ दिन शूटिंग कर चुके हैं. फिलहाल वह अपनी पहली फिल्म ‘मिर्जिया’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं.

मेहनत और लगन ही आपको आगे बढ़ाती है: आशा भोंसले

कहते है कि धीरज और मेहनत अगर आप के पास हो तो आप किसी भी मुश्किल घड़ी को पार जाते है, यह सही है की हर कामयाब इंसान के रास्ते कठिन होते हैं, कुछ ऐसा ही था अदभुत सुरों की मल्लिका आशा भोंसले की जिंदगी में. जिनका प्रारम्भिक जीवन बहुत संघर्ष के साथ गुजरा. उन्होंने 10 वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था. लता मंगेशकर की छोटी बहन और दीनानाथ मंगेशकर की इस बेटी ने अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से यह सिद्ध कर दिया कि वह सबसे अलग है. 9 साल छोटी उम्र में उनके पिता के निधन के बाद पूरा परिवार सांगली से कोल्हापुर और फिर कोल्हापुर से मुंबई आ गया. आशा भोंसले, उनके भाई-बहन उनके तीन बच्चे होने के बावजूद भी काफी संघर्ष के बाद आज वह यहां पहुची है.

आशा भोंसले की यात्रा में बहुत संघर्ष था. 50 के इस दशक में गीता दत्त, शमशाद बेगम जैसी बड़ी-बड़ी गायिकाओं का बोलबाला था. लता मंगेशकर का नाम थोड़ा हो रहा था. लेकिन आशा को अच्छे अवसर नहीं मिल रहे थे. पहले जब वह इस क्षेत्र में आई तो ‘बी’ और ‘सी’ ग्रेड फिल्मों में गाने का भी मौका उन्हें नहीं मिलता था, ’कोरस’ में वे गाती थी. सोलो गाने तब मिलते थे जब कोई बड़ी गायिका उस गीत को गाने से मना करती थी. आशा ने हिम्मत नहीं हारी और जो भी गाना मिलता था उसे दिल से गाकर उसे निखार देती थी. धीरे-धीरे यही मेहनत रंग लाने लगी.

बी.आर.चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ के गाने इतने हिट हुए कि संगीत की दुनिया में वह छा गईं. ‘तीसरी कसम’ फिल्म में उन्होंने एक मजेदार गाना ‘पान खाए सैयां हमारो…… गाया. इस गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी की गई थी और शैलेन्द्र को गीत के बोल समझ में नहीं आ रहे थे. उसी समय सचिन देव बर्मन कुर्ता पहन कर आये. कुछ पान के छींटे उनपर पड़े हुए थे. बस इसे देखकर ही यह गाना ‘पान खायों’ बन गया. आशा भोंसले की खूबी यह है कि उन्होंने गज़ल, पॉप संगीत, शास्त्रीय संगीत आदि सभी तरह के गाने गए हैं. गाना चाहे कोई भी हो आशा भोंसले उसमें एक अलग इमेज तैयार करती हैं. यही वजह है कि हर बार उनके हिट गाने से उनके प्रसंशकों की संख्या बढ़ती गई.

तीसरी मंजिल, उमराव जान, रंगीला और न जाने कितने ही फिल्मों के गाने उन्होंने गाये. उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, मलयालम, भोजपुरी, रुसी और अंग्रेजी सभी भाषाओं में गाने गाएं हैं. आज करीब 16 हजार गाने वह गा चुकी हैं. अपनी 72 साल की इस जर्नी में आज भी कोई निर्माता और संगीत निर्देशक अपनी फिल्मों में एक गाना आशा भोंसले का रखकर या उनसे गंवाकर अपने आप को खुशनसीब मानता है.

संगीत की दुनिया के अलावा उनके  निजी जीवन में भी बहुत संघर्ष था. 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने निजी सचिव और प्रेमी गणपत राव भोंसले के साथ घर वालों की मर्जी के बिना शादी की. पति और उनके परिवार वालों के बुरे बर्ताव की वजह से उन्होंने साल 1960 में उन्हें तलाक देकर मां के पास रहने चली आई. इस समय वह दो बच्चों की माँ और गर्भवती थी. संगीत की दुनिया में अभी भी पहचान बनाना आसान नहीं था. गाने तो मिलने लगे थे पर उसके पैसे कभी मिलते थे तो कभी नहीं. एक तरफ काम पाने का संघर्ष तो एक तरफ निजी जिंदगी में जरूरतों को पूरा करने का संघर्ष चल रहा था. बच्चों की जिम्मेदारियां भी थी उस समय वह जल्दी उठकर घर की काम-काज निपटाकर 7 बजे बोरीवली से निकल कर मुंबई शहर की ओर जाती थी.

एक स्टूडियो से दूसरे और दूसरे से तीसरे इस तरह दिन रात गाना गाकर देर रात घर पहुँचती थी. एक ओर छोटे-छोटे बच्चों की चिंता तो दूसरी ओर काम मिलने की चिंता. एक माँ के लिए इससे बड़ा संघर्ष कुछ भी नहीं था. एक बार तो ऐसा हुआ कि गाने की रिकॉर्डिंग के बाद पैसे मिलने की उम्मीद में 5 घंटों तक बैठी रहीं. उस समय वह 8 महीने की गर्भवती थी फिर अंत में उन्हें पता चला कि निर्माता बिना पैसे दिए कब का चला गया. इन तकलीफों की छाया उन्होंने अपने संगीत पर कभी पड़ने नहीं दी. साल 1980 में उन्होंने संगीतकार राहुल देव वर्मन के साथ शादी की. यह विवाह सफल रहा.

अभी उन्होंने अपने जीवन के 83 वर्ष पूरे किये हैं. हाल ही में उनके जन्मदिन के अवसर पर ‘जी क्लासिक’ ने ‘टाइमलेस आशा’ के नाम से भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर उन्हें सम्मान दिया. वहां उन फिल्मों के सभी लिजेंड्री कलाकारों संगीतकारों ने शामिल होकर उन्हें बधाईयाँ दी, क्योंकि वे सभी आज उनकी वजह से सफल हैं. इसमें हेलेन, तब्बू, जयाप्रदा, जीनत अमान, डिंपल कपाड़िया आदि सभी ने भाग लिया.

अपने जन्मदिन के अवसर पर आशा ने कहा जो इंसान कभी अधिक बातें करता है, वह कभी चुप हो जाता है. उसको समझना मुश्किल होता है कि क्या बातें करें. मेरा भी यही हाल हो रहा है. मैं आज बहुत खुश हूँ. मेरी जो हीरोइनें यहां हैं, जिनको देखकर में गाती थी और सोचती थी कि मैं ये गाना किसके लिए गा रही हूं. मुझे उनका चेहरा सामने लाना पड़ता था. मैं कई बार शर्मा जाती थी कि क्या मुझे इतनी सुंदर एक्ट्रेस के लिए गाना पड़ेगा.

‘सागर’ फिल्म का पास आओ न….’ जब ये गाना गा रही थी, तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि आर. डी.बर्मन ने बताया था कि ये एक सुंदर अकेली लड़की का पानी में छलांग लगाने के बाद के दृश्य को बताना है. बर्मन भी सोचते थे कि खुबसूरत लड़की के लिए संगीत कैसा होना चाहिए. किसी भी गाने को गाने से पहले अभिनेत्री का नाम बताया जाता था, मुझे याद आता है जब मुझे हेलेन के लिए गीत गाना पड़ा वह बहुत खुबसूरत थी कि मैंने एक बार कहा था कि अगर मैं लड़का होती तो कबका आपको उठाकर ले जाती. जब मैंने जीनत अमान के लिए फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का गीत ‘दम मारो दम’ गाया, तो देवानंद ने कहा था कि आपको एक छोटी बच्ची के लिए बच्ची बनकर गीत गाना है. मैंने कहा मैं उतनी छोटी तो नहीं हूँ पर कोशिश करती हूँ.

आशा भोंसले अपनी यात्रा को खास मानती हैं, क्योंकि संघर्ष के बिना कामयाबी नहीं मिलती, वह अपने बारें में बताती हैं कि एक छोटी, मोटी और कम अक्ल की जीवन रूपी नदी को लेकर मैं चल पड़ी, जाते-जाते उसे पता नहीं था कि उसे कितने पहाड़ो से टकराना है, एक पहाड़ से टकराई जोर से उछली, गिरी, फिर उठी और आगे बढ़ी. ऐसा करते-करते कभी पहाड़ तो कभी अच्छी नदियां उसका साथ दे रही थी. चलना उसने नहीं छोड़ा था. पहले उन बच्चों  को बड़ा करना था जो उनके साथ बह रहे थे, उन तीन बच्चों के हाथ पकड़ कर चलते हुए देखकर लोग हंस रहे थे. कुछ ने गालियां तक दी. कुछ लोगों ने काम का पैसा दिया कुछ ने नहीं. लेकिन मैं काम करती रही, कभी किसी ने मेरे आंसू नहीं देखें. लेकिन हंसी मुझे हमेशा आसपास दिखी. आंसू बहाने का जब समय आया तो मैं शावर के नीचे गई. ऐसा करते-करते आज यहां पहुंची हूँ.

अपने जन्मदिन के बारें में वह कहती है कि जन्मदिन हर व्यक्ति का रोज होता है, रोज सुबह जब वह अपनी आँखें खोलता है, वही उसका जन्मदिन है, मेरा हर दिन जन्मदिन होता है. सुबह उठकर काम करना और गीत गाना यही मेरा काम है, जिस दिन मैं बैठ गई उस दिन मैं खत्म हो जाउंगी. मेरी तुलना घोड़े से दी जा सकती है, जो जीवन खत्म होने के बाद ही बैठता है. इसलिए बैठती नहीं, आज भी भागती हूँ. मैंने बहुत धक्के खाए पर हंसती रही. मेरा सहारा मेरे दर्शक हैं, जिन्होंने प्यार दिया. आज भी मुझे गाना और लोगो के बीच में रहना पसंद है, लेकिन जब गाड़ी में अकेली होती हूँ, तो एक ही गाना मुझे याद आता है. वह है ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है……’ ऐसा गाते-गाते उनकी आँखे भर आई.

पहली बार ऐसे होगा क्रिकेट सिलेक्टर्स का सेलेक्शन

बीसीसीआई ने सिलेक्टर्स को चुनने की जोनल प्रोसेस खत्म कर दी है. बीसीसीआई के 88 साल के इतिहास में पहली बार अब इंटरव्यू के जरिए सिलेक्टर्स को चुनने का फैसला किया है. पुरुष, महिला और जूनियर सिलेक्शन कमेटी तीनों के लिए इंटरव्यू की प्रोसेस अपनाई जाएगी.

10 सितंबर को इस बारे में एड जारी करने वाले बीसीसीआई ने एप्लीकेशन की आखिरी तारीख 14 सितंबर तय की है.

नहीं मानी लोढ़ा समिति की सारी सिफारिशों…

जस्टिस लोढ़ा कमेटी ने जोनल सिस्टम को खत्म करने की सिफारिश की थी. बीसीसीआई ने ऐसा तो कर दिया है लेकिन समिति की कई सिफारिशों को नजरअंदाज भी किया है.

लोढ़ा कमेटी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, केवल पूर्व भारतीय टेस्ट खिलाड़ी ही पुरुष और महिला सिलेक्शन कमेटी के लिए योग्य होंगे, बशर्ते उन्होंने कम से कम पांच साल पहले खेल से संन्यास ले लिया हो.

दूसरी तरफ बीसीसीआई का मापदंड कहता है, “एप्लीकेशन देने वाला भारतीय, टीम का टेस्ट या वनडे इंटरनेशनल मैच में कप्तान रहा हो, या भारत में 50 से अधिक फर्स्ट क्लास मैच खेले हों.’

जूनियर पैनल के लिए बीसीसीआई का कहना है कि काबिल उम्मीदवारों ने भारत में 50 से ज्यादा फर्स्ट क्लास मैच खेले हों. लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों में कम से कम 25 फर्स्ट क्लास मैचों की बात कही गई है.

60 पार क्रिकेटर नहीं बन पाएंगे सिलेक्टर्स

बीसीसीआई ने काबिल उम्मीदवारों के लिए 60 साल की उम्र तय की है. इसके अलावा उम्मीदवार पूर्व सिलेक्टर्स नहीं होना चाहिए और साथ ही आईपीएल की किसी भी फ्रेंचाइजी से जुड़ा नहीं होना चाहिए. न ही वह क्रिकेट अकादमी चलाता हो और न ही उसका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड हो.

बीसीसीआई ने यह स्पष्ट नहीं किया कि लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक वह सिलेक्शन कमेटियों को पांच मेंबर्स के बजाय तीन मेंबर्स तक करेगी या नहीं. लोढ़ा कमेटी की रिपोर्ट का कहना था कि कमेटी के मेंबर्स में से सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने वाले को कमेटी का प्रेसिडेंट बनाया जाए.

मोबाइल के कमजोर सिग्नल को कहें बाय-बाय

कई बार ऐसा होता है कि कोई जरूरी कॉल करनी होती है मगर सिग्नल नहीं आ रहा होता. कई बार सिग्नल कमजोर होने की वजह से कॉल बार-बार कट जाती है. इन समस्याओं के अलावा कई बार घर या ऑफिस पर मोबाइल सिग्नल से जुड़ी परेशानी झेलनी पड़ती है.

8 ऐसे तरीके, जिन्हें आजमाकर आप कमजोर नेटवर्क की समस्या हल कर सकते हैं….

1. ऑफ करके फिर ऑन करें

कई बार फोन को ऑफ करके ऑन करने से भी समस्या सुलझ जाती है. ऐसा इसलिए, क्योंकि फोन ऑन होने पर नए सिरे से नेटवर्क तलाश करके उसी टावर से कनेक्ट होता है, जिसका सिग्नल स्ट्रॉन्ग होता है. आप अपने फोन एयरप्लेन मोड में डालकर एक बार फिर उससे निकालेंगे, तो भी ऐसा ही होगा.

2. अपने फोन को चार्ज करें

अगर आपके फोन की बैटरी लो है तो भी सिग्नल की समस्या हो सकती है. बैटरी लो होने पर बहुत से फोन पावर सेविंग मोड में चले जाते हैं. इसलिए यह आपके सेल सिग्नल को ट्रांसमिट करने में कम पावर इस्तेमाल करता है. इसलिए बैटरी कम है तो चार्ज कीजिए और अगर चार्ज नहीं कर पा रहे तो पावर सेविंग फीचर्स को बंद कर दीजिए. मगर ध्यान रहे कि इसके बाद आपकी बैटरी और तेजी से खर्च होगी.

3. जगह बदलें

आप अपना फोन जिस तरीके से पकड़ते हैं, उसका भी असर पड़ता है. अगर आप फोन का ऐंटेना कवर कर रहे हैं तो सिग्नल कमजोर हो जाएगा. इसलिए अपना ग्रिप बदलिए. आपको यह पता होना चाहिए कि आपके फोन का ऐंटेना है कहां. कई बार जगह का भी फर्क पड़ता है. अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज भी सिग्नल को बाधित करते हैं. अगर आप कहीं इमारत के अंदर हैं तो बाहर आएं. छत और दीवारों की वजह से सिग्नल कमजोर हो जाता है. कई बार तो खिड़की खोलने से भी आपका काम बन सकता है. इसके अलावा जगह बदलकर भी देखी जा सकती है.

4. आबादी वाली जगह पर जाएं

अगर आप ट्रैवल करते हुए किसी ऐसी जगह पर हैं, जहां सिग्नल नहीं है तो वहां से ऐसी जगह पर जाइए, जहां आबादी हो. ऐसा इसलिए, क्योंकि ज्यादातर सेल्युलर ट्रांसमिटर एक ही दिशा में सिग्नल छोड़ते हैं. इन्हें उस तरफ पॉइंट किया जाता है, जहां आबादी होती है. इसी वजह से कई बार टावर के सामने खड़े होने पर भी सिग्नल कमजोर होता है.

5. अच्छा फोन लीजिए

अगर आपको हर जगह कमजोर सिग्नल मिलता है तो संभव है कि समस्या फोन की है. हो सकता है कि यह खराब हो गया हो या फिर इसका ऐंटेना कमजोर हो गया हो. जिन जगहों पर बाकी लोगों को सिग्नल की समस्या न हो, वहां आपका फोन नेटवर्क ढूंढता फिर रहा हो तो इसका मतलब है कि फोन बदलने का वक्त आ गया है.

6. बेहतर कैरियर इस्तेमाल कीजिए

हमेशा समस्या फोन की नहीं होती. कई बार कैरियर भी समस्या करते हैं. जहां आप रहते हैं या काम करते हैं, वहीं पर नेटवर्क अच्छा न आए तो आपको समझना चाहिए कि नेटवर्क में भी समस्या हो सकती है. अगर उसी नेटवर्क वाले अन्य किसी व्यक्ति को भी यही समस्या हो रही है तो आपको किसी और नेटवर्क प्रोवाइडर को अपनाने की जरूरत है. ऐसी कंपनी का सिमकार्ड लें, जिसका नेटवर्क मजबूत हो.

7. वाई-फाई से करें कॉलिंग

यह तरीका आप हमेशा तो नहीं अपना सकते, मगर फिर भी काम का साबित हो सकता है. आईफोन और ऐंड्रॉयड स्मार्टफोन्स में भी यह ऑप्शन आजमाया जा सकता है. आप सेल्युलर सिग्नल के बजाय वाई-फाई सिग्नल इस्तेमाल कर सकते हैं, मगर आपको पहले चेक करना पड़ेगा कि आपका सेल्युलर और वाई-फाई प्रोवाइडर ऐसी सुविधा देते हैं या नहीं. जैसे कि एक ऐप के जरिए जियो यूजर्स जियोफाई के जरिए वॉइस कॉलिंग कर सकते हैं.

8. मोबाइल सिग्नल बूस्टर आजमाएं

अगर घर पर अक्सर कमजोर सिग्नल रहता है तो आप सिग्नल रिपीटर ट्राई कर सकते हैं. बहुत सारे मोबाइल सिग्नल बूस्टर ऑनलाइन उपलब्ध हैं.

अगर औरतें एकजुट हो जाएं

अगर औरतें एकजुट हो जाएं, तो वे बदलाव की बड़ी ताकत बन सकती हैं. पाकिस्तान जैसे मुल्कों में उनके बीच का बंटवारा सिर्फ उन्हीं लोगों को फायदा पहुंचाता है, जो पितृसत्तात्मक यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं. वुमेन्स पार्लियामेंटरी कॉकस की संस्थापिका और इस संगठन की मौजूदा प्रमुख के बीच पिछले बुधवार को जैसी कटुता दिखी, उसने महिला सांसदों के इस फोरम के भविष्य को लेकर कई चिंताएं पैदा कर दीं.

नेशनल असेबंली की अपनी जोशीली तकरीर में पीपीपी सांसद और वुमेन्स पार्लियामेंटरी कॉकस की सरपरस्त डॉक्टर फहमीदा मिर्जा ने हाल के महीनों में इस संगठन की अनदेखी पर गहरी बेचैनी जाहिर की. उन्होंने अपनी बातों से यह भी संकेत किया कि कॉकस की इस हालत के लिए इसके मेंबरान के निजी मुकाबले जिम्मेदार हैं.

वुमेन्स पार्लियामेंटरी कॉकस की सेक्रेटरी और पीएमएल-नवाज की सांसद शाइस्ता परवेज ने कॉकस की कामयाबी की दुहाई देते हुए मुखालिफ जमातों की सांसदों पर तंज कसा कि वे इस संगठन की मदद नहीं कर रही हैं. पिछले कई बरसों से वुमेन्स पार्लियामेंटरी कॉकस के बैनर तले महिला सांसद जैसी एकजुटता दिखाती आ रही हैं, वह अब एक अफसोसनाक और आत्मघाती मोड़ लेती दिख रही है, जिससे इस संगठन की साबित ताकत के खत्म होने का अंदेशा पैदा हो गया है.

पाकिस्तानी संसद के इतिहास की जो कुछ मिसाल देने लायक चीजें हैं, उनमें से एक साल 2008 में डॉक्टर मिर्जा के नेशनल असेंबली की स्पीकर चुने जाने के बाद गठित यह संगठन भी है. साल 2008 के बाद कुछ वर्षों में अभूतपूर्व तरीके से औरतों की खैरख्वाही वाले जो कई आईन बने, उनके पीछे इस संगठन का अहम रोल रहा है. इनमें साल 2010 का छेड़छाड़-विरोधी कानून शामिल है. इसी तरह, तेजाबी हमले से मुतल्लिक पाकिस्तान पिनल कोड में बदलाव का बिल था, और पुरानी दकियानूस रवायतों पर रोक से जुड़े कानून थे. मौजूदा वुमेन्स पार्लियामेंटरी कॉकस को इसे तंग सियासी मोहरा बनाने की बजाय आगे ले जाना चाहिए. उन्हें सत्ता के गलियारे में औरतों की आवाज बुलंद करनी चाहिए.

फ्लिपकार्ट में जॉब चाहिए?

ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट त्योहारी सीजन से पहले अपनी डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाओं को चुस्त दुरूस्त बनाने के लिए 10,000 से अधिक अस्थायी कर्मचारी रखेगी. ऑनलाइन रिटेल या ई-कॉमर्स कंपनियां आगामी त्योहारी सीजन में अपनी ब्रिकी बढ़ाने के लिए विभिन्न तरह की पेशकश शुरू करने की तैयारी में हैं.

फ्लिपकार्ट के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नितिन सेठ ने कहा, त्योहारी सीजन आने के साथ ही हमें उम्मीद है कि सेल अच्छी और बेहतर होगी. उन्होंने कहा कि आपूर्ति के वैकल्पिक मॉडल की नई क्षमताओं के साथ-साथ हम देश भर में डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाओं को चुस्त दुरूस्त बनाने के लिए 10,000 से अधिक अस्थायी भर्तियां करने की सोच रहे हैं. उन्होंने कहा कि ये भर्तियां त्योहारी सीजन में भारी मांग की अपेक्षा को ध्यान में रखते हुए की जाएंगी.

उल्लेखनीय है कि प्रतिद्वंद्वी स्नैपडील ने भी 15 सितंबर से 15 नवंबर के बीच 10,000 अस्थायी नौकरियां देने की उम्मीद जताई है. सेठ ने फ्लिपकार्ट से 800 लोगों की छंटनी संबंधी खबरों को खारिज कर दिया और कहा कि ये सब गलत और आधारहीन है.

भाजपा के लिए बुरा संकेत

गुजरात में मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का त्यागपत्र यह साफ करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा अब चल नहीं रहा. पहले पाटीदार विद्रोह हुआ जिस कारण बिना वजह नेता हार्दिक पटेल पर देशद्रोह का आरोप लगा कर जेल में रखा गया और अब ऊना में गाय का चमड़ा उतारने के नाम पर दलितों की बेरहमी से की गई पिटाई से दलित आक्रोश का फैलना भारतीय जनता पार्टी के लिए बुरे संकेत हैं.

यह बात गुजरात कांग्रेस के लिए कोई सुखद संदेश लगे, ऐसा भी नहीं है. गुजरात की भाजपा और कांग्रेस में कोई मूलभूत अंतर नहीं है. दोनों पार्टियां संतोंमहंतों के इशारों पर चलती हैं और दोनों का मुख्य आधार वे पिछड़े पटेल–जिन की बीसियों उपजातियां हैं–हैं, जो अब पैसे वाले हो गए हैं, पर अब संतोंमहंतों का आदेश आंख मूंद कर मानने को तैयार नहीं हैं.

2002 में कांग्रेस का समर्थन करने वाले मुसलिमों को खलनायक बना कर नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीते थे, पर धीरेधीरे नायक कौन है, समझ आने लगा है और नायकों के सेवक पिछड़े व दलित विद्रोह पर उतर आए हैं. उन्होंने सरकार के खिलाफ मोरचा खोल कर भाजपा की दशकों की मेहनत पर पानी फेर दिया है और पिछले पंचायत व नगरपालिका चुनावों में यह बात साफ हो गई थी कि आनंदीबेन पटेल नरेंद्र मोदी की चमक का लाभ नहीं उठा पा रहीं.

गुजरात में इस तरह के बदलाव पहले भी होते रहे हैं, क्योंकि चाहे जो कहा जाए गुजरात कोई विशिष्ट राज्य नहीं है. वहां की सरकारें और समाज वैसे ही हैं, जैसे और जगह हैं और गुजराती व्यापारी थोड़े ही ज्यादा जाने जाते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्होंने देश के व्यापार पर एकाधिकार जमा रखा हो.

गुजरात की जो भी आभा थी, वह पाटीदार व दलित आंदोलनों से और बिगड़ गई. मुसलिम दंगों पर तो कट्टर हिंदुओं को एतराज न था, पर पाटीदार व दलित दंगे सहन नहीं हो सकते और आनंदीबेन को जाना पड़ा.

देश के अधिकांश राज्यों में बड़ी पार्टियों के मुख्यमंत्री खिलौना मात्र हैं और अपने दमखम पर राज नहीं कर रहे हैं. उन्हें हर समय दिल्ली का डर रहता है. यह राज्यों की असुरक्षा का कारण है. इन राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु के नेता अपने फैसले ले सकते हैं और उन्हें अपनी गद्दी बचाए रखने की चिंता नहीं रहती. गुजरात में आनंदीबेन की जगह जो मुख्यमंत्री बनेगा, वह नरेंद्र मोदी की कृपा पर बनेगा और नरेंद्र मोदी इसे कितना संभाल सकेंगे, यह बड़ा सवाल है.             

अगले महीने से यात्रा करिए ‘हमसफर’ के साथ

राजधानी, शताब्दी और दुरंतो ट्रेनों में सर्ज प्राइसिंग शुरू करने के बाद भारतीय रेलवे अगले महीने से 'हमसफर' ट्रेनों को चलाने जा रहा है. इन ट्रेनों का किराया सामान्य मेल या ऐक्सप्रेस सेवाओं से तकरीबन 20 फीसदी ज्यादा होगा.

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने 2016-17 के रेल बजट में 'हमसफर' ट्रेनों का ऐलान किया था. ये ट्रेनें एक खास श्रेणी की सेवा ही उपलब्ध कराएंगी यानी इनमें केवल एसी 3 कोच ही रहेंगे. शुरुआत में इस ट्रेन सेवा के नई दिल्ली से गोरखपुर के बीच शुरू होने की संभावना है.

रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि हमसफर ट्रेन रातभर के सफर के लिए विशेष सेवाओं वाली इंटरसिटी ट्रेन है. इसमें मौजूद सेवाएं दूसरे एसी 3 कोचों में नहीं मिलेंगी. हमसफर ट्रेनों में सीसीटीवी, जीपीएस आधारित पैसेंजर इन्फर्मेशन सिस्टम, आग और धुएं को पकड़ने और रोकने वाला सिस्टम और हर बर्थ पर मोबाइल, लैपटॉप के चार्जिंग पॉइंट होंगे. इसमें इंटीग्रेटेड ब्रेल डिस्प्ले भी होगा.

इसके अलावा हमसफर की खूबसूरती भी दूसरी ट्रेनों से बेहतर होगी. ट्रेन के अंदर और बाहर का डिजाइन भी बदला जाएगा और महाराजा एक्सप्रेस की तरह विनाइल शीट्स यूज होगी.

एक रेलवे अधिकारी ने बताया, 'इस विशेष सेवा वाली ट्रेन कई आधुनिक सुविधाएं हैं, जिससे रेलवे पर ज्यादा भार आया है. इसलिए इसका किराया भी ज्यादा रहेगा.' हालांकि उन्होंने किराये के बारे में जानकारी नहीं दी और कहा कि अभी यह तय नहीं हुआ है, पर यह 20 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों से फीसदी से ज्यादा नहीं होगा. उन्होंने कहा कि जिन रूट पर इंटरसिटी की ज्यादा मांग होगी, वहीं हमसफर ट्रेनों को चलाया जाएगा.

ब्लैक मनी को वाइट में बदलने का आखिरी मौका

आयकर विभाग ने देश में अघोषित संपत्ति (कालाधन) रखने वालों से कहा है कि वह ऐसी संपत्ति की घोषणा जल्द करें. घरेलू स्तर पर कालेधन की जानकारी देने के लिए शुरू की गई आयकर खुलासा योजना (आईडीएस) बंद होने में सिर्फ 20 दिन ही बचे हैं. विभाग ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर कहा है, आयकर खुलासा योजना 30 सितंबर 2016 को बंद हो रही है. जल्दी करें, केवल 20 दिन बचे हैं, अभी घोषणा करें.

विभाग ने कहा कि आयकर विभाग के इंटरनेट आधारित ई-फाइलिंग पोर्टल के जरिए ऐसी परिसंपत्ति का खुलासे करने की भी व्यवस्था सक्रिय की गई है जिससे जानकारी देने वाली की गोपनीयता बनी रहेगी. सीबीडीटी ने आईडीएस पर छठा स्पष्टीकरण जारी करते हुये कहा था कि 30 सितंबर को समाप्त हो रही चार महीने की योजना को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. आयकर विभाग की नीति निर्माता संस्था केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने आय खुलासा योजना के बारे में विभिन्न प्रकार के सवालों के जवाब जारी किये हैं. ये जवाब कई किस्तों में जारी किये गये ताकि लोगों की शंका का समाधान किया जा सके.

सरकार ने हालांकि, इस योजना के तहत अघोषित संपत्तियों की घोषणा करने वालों की सुविधा के लिये कर और जुर्माने के भुगतान की अवधि को बढ़ा दिया है. घोषित संपत्ति पर कर और जुर्माने का भुगतान तीन किस्तों में किया जा सकेगा. घोषित संपत्ति पर जो भी कर और जुर्माना बनेगा उसका 25% नवंबर 2016 में, अगली 25% राशि का भुगतान 31 मार्च 2017 तक और शेष बची राशि का भुगतान 30 सितंबर 2017 तक किया जा सकता है. इससे पहले पूरी राशि का भुगतान 30 नवंबर 2016 तक किया जाना था.

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