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क्या रितिक का करियर बर्बाद कर देंगे राकेश रोशन..?

बौलीवुड का खेल बहुत निराला है. इस खेल को समझकर भी कई कलाकार जानबूझकर या अनजाने या नादानी में गलतियां करते रहे हैं. बौलीवुड का इतिहास गवाह है कि जब भी कलाकारों के निजी जिंदगी के विवाद सुर्खियों में छाते हैं, तो उसका खामियाजा उसी कलाकार को भुगतना पड़ता है. यह एक कटु सत्य है. इस सच से आंखें फेर लेने या आंखे बंद कर लेने से सच नहीं बदल जाएगा. हर कलाकार इस बात से वाकिफ है कि कलाकार की जो छवि समाज या आम जनता या उनके प्रशंसकों के बीच बनती है, उस छवि का असर उनकी प्रदर्शित होने वाली फिल्मों पर पड़ता है.

जब फिल्म ‘‘मोहनजो दाड़ो’’ के प्रदर्शन से कुछ समय पहले रितिक रोशन और कंगना रानौत के बीच विवाद पैदा हुआ था और रितिक रोशन ने अपने किसी शुभचिंतक या अपने पीआरओ यानी कि प्रचारक की सलाह पर अंग्रेजी के अखबार (इस अखबार को लेकर बौलीवुड में आम धारणा यही है कि इसमें बिना पैसा दिए एक शब्द नहीं छपता) में पूरे पृष्ठ पर कंगना रानौत से जुड़े अपने कुछ ईमेल सार्वजनिक किए थे, उसी वक्त ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने इसी जगह लिखा था कि इसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ेगा. हर कलाकार को इतना समझदार होना चाहिए कि उन्हे अपनी निजी जिंदगी के विवादों को चुपचाप आपस में बैठकर सुलझा लेना चाहिए, न कि मीडिया में तमाशा बनाकर अपने प्रशंसकों व दर्शकों बीच अपनी छवि धूमिल करनी चाहिए.

उन्हीं दिनों ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने जब रितिक रोशन व कंगना के विवाद पर मशहूर व सफल फिल्म निर्देशक आनंद एल राय से बात की थी, तो आनंद एल राय ने बहुत साफ तौर पर कहा था-‘‘मुझे लगता है दोनों समझदार लोग हैं. इन दोनों को सुलझे हुए तरीके से व्यवहार करना चाहिए. मैं किसी की निजी जिंदगी को लेकर कोई बात नहीं करना चाहता. पर हर इंसान की जिंदगी में कुछ चीजें अनवांछित नहीं होनी चाहिए. आप दोनों लोकप्रिय लोग हैं, तो आपकी जिंदगी की हर बात बहुत जल्द आम लोगों तक पहुंच जाती है. ऐसे में अनचाहे दबाव जिंदगी में बनते हैं. जरूरी होता है कि अनचाहे दबाव से बचकर रचनात्मक चीजों पर ध्यान लगाएं. इस तरह की घटनाएं देखकर दुःख होता है. हर कलाकार की अपनी निजी जिंदगी होती है, जिसका लाभ हानि उसे ही भोगना पड़ता है.’’

पर रितिक रोशन और कंगना ने यह समझदारी तब भी नहीं दिखायी थी. ध्यान देने वाली बात यह है कि उस वक्त भी कंगना के साथ विवाद की शुरुआत रितिक रोशन के ही बयान के साथ हुई थी. जिसका खामियाजा रितिक रोशन को फिल्म ‘‘मोहनजो दाड़ो’’ की असफलता से मिल चुका है. भले ही वह आज भी सच को स्वीकार करने का साहस न दिखा पा रहे हों.

मगर फिल्म ‘मोहनजो दाड़ो’ के प्रदर्शन के साथ ही कंगना और रितिक रोशन का विवाद मीडिया से गायब हो गया था. (यूं तो इस विवाद के अदालत पहुंचने की बात हुई थी, पर मामला अदालत पहुंचा या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई.)

लेकिन अब जबकि रितिक रोशन की उनके पिता राकेश रोशन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘‘काबिल’’ के प्रदर्शन का समय नजदीक आ रहा है, तो एक बार फिर रितिक रोशन व कंगना का विवाद उभर गया है. इस बार इस विवाद को गहराने व सुर्खियों में लाने का काम किया है रितिक रोशन के पिता राकेश रोशन ने.

राकेश रोशन को तो बौलीवुड में काम करने का करीबन चालीस साल का अनुभव है. वह बौलीवुड में बतौर अभिनेता काम करने के बाद अब निर्माता व निर्देशक के रूप में कार्यरत हैं. इसलिए यह माना जाना चाहिए कि वह एक समझदार इंसान हैं.

मगर कुछ दिन पहले राकेश रोशन ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कंगना व रितिक के विवाद पर कहा-‘‘रितिक रोशन बहुत अलग हैं. जब कोई (कंगना रानौत) उसके बारे में गलत बाते फैला रहा था, तब भी उसने शांत रहने व एक सम्मान जनक रास्ता अख्तियार किया था. यदि उसने सच को बाहर लाने का रास्ता चुना, तो उससे बहुत लोगों को धक्का लगेगा.’’

अंग्रेजी अखबार में राकेश रोशन के इस बयान ने पुराने दबे हुए विवाद को फिर से आग दिखा दी. इस बार किसे कितना खमियाजा भुगतना पड़ेगा, यह तो वक्त बताएगा. लेकिन राकेश रोशन के इस बयान के बाद कंगना रानौत का गुस्सा उबल पड़ा. और कंगना ने मीडिया के सामने आकर कहा-‘‘लोग खुद अपने लिए क्यों नहीं खड़े हो पाते. वह (रितिक रोशन) 43 वर्षीय पुरुष हैं. मेरी समझ मे नही आता कि उनके पिता को हर छोटे मोटे विवाद में उनका बचाव करने के लिए आगे क्यों आना पड़ता है.’’

बहरहाल,अब कंगना के इस बयान के बाद राकेष रोशन ने कहा है-‘‘मैं रितिक रोशन व कंगना विवाद पर सही समय आने पर बोलूंगा.’’ राकेष रोशन के इस बयान के बाद बौलीवुड में चर्चाएं हैं कि काश राकेश रोशन ने पहले ही अपने इंटरव्यू में कुछ कहने की बनिस्बत रितिक रोशन व कंगना के विवाद को सुलझाने की दिशा में कदम उठाया होता, तो हर किसी के लिए बेहतर होता. बौलीवुड का एक तबका यह मानकर चल रहा है कि गलती चाहे कंगना की हो या रितिक की, मगर इस विवाद का खामियाजा इन दोनों के साथ बौलीवुड को भी अपरोक्ष रूप से भुगतना पड़ रहा है.

बौलीवुड के अतीत के घटनाक्रम में जाएंगे, तो पाएंगे कि शाहरुख खान हों या आमिर खान या कोई अन्य अभिनेता, किसी को भी निजी जिंदगी से जुड़े विवादों से फायदा नहीं नुकसान हुआ. हां! फिल्मों को लेकर पैदा होने वाले विवाद का फायदा फिल्म को जरूर मिल जाता है.

‘रामलीला’ की आड में ‘राजलीला’

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने घोषित तौर पर भले ही मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा न की हो, पर जिस तरह से लखनऊ के मेयर डाक्टर दिनेश शर्मा की पहल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लखनऊ के ऐशबाग की रामलीला देखने आ रहे हैं, उससे यह साफ हो गया है कि डाक्टर दिनेश शर्मा की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर मुहर लग गई है. मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर डाक्टर दिनेश शर्मा का नाम पहले भी चल रहा था. अब यह बात पक्की हो गई है कि रामलीला के खेल से राजलीला का एजेंडा तय हो गया है. इस रामलीला के बहाने भाजपा लखनऊ को केन्द्र मानकर उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी लीला दिखायेगी. आमतौर पर देश के प्रधानमंत्री दिल्ली में रामलीला में ही रावण दहन करते हैं. वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में रामनगर की रामलीला भी विश्व प्रसिद्व है.

अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की रामलीला के बजाय किसी और शहर की रामलीला देखनी थी तो सबसे पहले रामनगर वाराणसी का ख्याल आना चाहिये था. वहां की रामलीला के मुकाबले लखनऊ की रामलीला कोई बहुत खास नहीं होती है. ऐशबाग रामलीला संमिति के सरंक्षक डाक्टर दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर हैं. वह कहते हैं ‘श्रीरामलीला समिति ऐशबाग का निमंत्रण प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वीकार हो गया है. मोदी जी पहले प्रधानमंत्री होंगे, जो इसमें शामिल होंगे.’ प्रधानमंत्री के दौरे की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं.

राजनीति के जानकार मानते है कि भाजपा एक बार फिर राम के नाम को आगे कर अपनी धर्म की सियासत को आगे बढायेगी. रामलीला में थीम बदल जायेगा. आतंकवाद को रावण का नाम देकर राष्ट्रवाद से जोड़ा जायेगा. रामलीला के मंच का प्रयोग राजलीला के लिये होगा. प्रधानमंत्री के इस कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद के बाद से पूरा दृश्य बदल रहा है. ऐशबाग रामलीला समिति के हरीशचन्द्र अग्रवाल कहते हैं रामलीला की थीम 9 अक्टूबर को तय होगी. इस बार रामलीला को भव्य स्वरूप देने का काम तेज कर दिया गया है. इसका स्वरूप वह होगा, जो प्रधानमंत्री के कद को सूट करे. रामलीला में 121 फुट का ऊंचा रावण बनेगा. जिसका दहन प्रधानमंत्री कर सकते हैं.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को देखते हुये भाजपा के इस कदम को चुनावी जंग की शुरुआत माना जा रहा है. प्रधानमंत्री के मौजूद रहने से भाजपा का पूरा संगठन सक्रिय हो जायेगा. इसके साथ ही साथ गृहमंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह भी यहा रहेंगे. ऐसे में भाजपा अपनी चुनावी तैयारी की योजना पर काम करेगी. लखनऊ की रामलीला के बहाने प्रधानमंत्री नरेनद्र मोदी और भाजपा अपना चुनावी एजेंडा तय कर रही है. राममंदिर का नाम लिये बिना राम के नाम पर वोट मांगने का काम होगा.

गूगल का ये नया फोन बस 15 मिनट में होगा चार्ज

गूगल ऐसा फोन लाया है जो बाकी के स्मार्टफोन्स से बहुत अच्छा साबित हो सकता है. गूगल ने नई पीढ़ी के पिक्सल स्मार्टफोन लॉन्च किया है.

इस फोन की बुकिंग भारत में 13 अक्टूबर से शुरू होगी. इस फोन की बिक्री फ्लिपकार्ट, क्रोमा और रिलायंस डिजिटल पर होगी.

पिक्सल स्मार्टफोन सिल्वर, काले और नीले रंग में मिलेगा. भारत में इसकी कीमत 57,000 रुपए से शुरू होगी. बढ़ेगी प्रतियोगिता संभावना जताई जा रही है कि इस फोन के लॉन्च होने के साथ ही एप्पल और सैमसंग सरीखी अन्य फोन कंपनियों के साथ प्रतियोगिता बढ़ सकती है.

गूगल के इस पिक्सल स्मार्टफोन की खासियत है कि वो मात्र 15 मिनट की चार्जिंग से 7 घंटे तक चलेगी. साथ ही इसमें यूजर का वीडियो एक्सपिरिएंस भी बेहतर बनाए जाने के लिए वीडियो स्टेबलाइजेशन की सुविधा भी दी गई है.

इस स्मार्टफोन को लेकर गूगल ने दावा किया है कि इसके कैमरे से कम समय में तस्वीर क्लिक की जा सकेगी. ये है इस फोन की खासियत दावा किया जा रहा है कि इस स्मार्टफोन के कैमरे में HDR+ के जरिए तस्वीरों की क्वालिटी अच्छी होगी. बताया गया कि इस फोन में गूगल असिस्टेंट की सुविधा भी होगी, इसका इस्तेमाल मैसेज,वाट्सएप और अन्य कामों के लिए कम कर सकते हैं.

इस स्मार्टफोन की बैटरी 2,770 या 3,450 एमएएच की होगी साथ ही इसकी स्टोरेड क्षमता 32 जीबी तक है. इसमें 4 जीबी का रैम होगा. साथ ही इसका क्वाड प्रोसेसर 2×2.15Ghz या 2×1.6Ghz का है. इस स्मार्टफोन की बॉडी अल्मयूनियम की होगी. बताया गया कि इसमें 12 मेगापिक्सल का सेंसर लगा है जिसकी मदद से कम समय में तस्वीर खींची जा सकेगी.

खत्म होगी कॉल ड्रॉप की टेंशन, बढ़ेगी डेटा स्पीड

स्पेक्ट्रम ऑक्शन से कन्जयूमर्स को हर हाल में फायदा होगा. कंपनियों के और स्पेक्ट्रम खरीदने से उनकी डेटा स्पीड बढ़ेगी और कॉल ड्रॉप की प्रॉब्लम भी कम होगी. टेलिकॉम कंपनियों ने 2300 Mhz और 1800 Mhz के 4G बैंड में सबसे अधिक दिलचस्पी दिखाई है. इसके बाद 2100 Mhz के 3G बैंड में उनका इंट्रेस्ट दिख रहा है.

ऐनालिस्टों और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे कम स्पेक्ट्रम की समस्या खत्म हो जाएगी. ऑक्शन के बाद कंपनियों के पास पर्याप्त एयरवेव्स होंगे, जिससे वॉयस और डेटा सर्विसेज की क्वॉलिटी बेहतर होगी.

कंपनियों का ध्यान अभी डेटा स्पेक्ट्रम हासिल करने पर है. जानकारों का कहना है कि हायर स्पीड डेटा टेक्नॉलजी को अपनाने की वजह से आगे चलकर काफी वॉयस कपैसिटी फ्री होगी, जिससे कॉलड्रॉप की समस्या पर काबू पाने में मदद मिलेगी.

ईवाई में ग्लोबल टेलिकम्युनिकेशंस लीडर प्रशांत सिंघल ने बताया कि फ्रेश स्पेक्ट्रम से ओवरऑल डेटा नेटवर्क्स में काफी सुधार होगा. उनके मुताबिक, इससे मोबाइल ई-कॉमर्स को बढ़ावा मिलेगा. सिंघल ने बताया कि कन्ज्यूमर्स की तरफ से इन्फोटेनमेंट और डिजिटल सर्विसेज की मांग बढ़ सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि 2100 Mhz में नीलाम किए जा रहे 3G एयरवेव्स और 1800 Mhz बैंड के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल शुरू होने के बाद कॉल ड्रॉप्स काफी कम होंगे. सिंघल के मुताबिक, कन्ज्यूमर्स को इसका फायदा तभी मिलेगा, जब कंपनियां अधिक टेलिकॉम टावर लगाएंगी. उन्होंने बताया कि मार्च 2017 से पहले नए स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल शुरू नहीं हो पाएगा.

एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी के सीनियर एग्जिक्युटिव ने बताया कि अधिक डेटा स्पेक्ट्रम मिलने से डेटा स्पीड में कम-से-कम 40 पर्सेंट की बढ़ोतरी होगी. इससे कन्ज्यूमर को हाई स्पीड डेटा सर्विस मिलेगी.

उन्होंने कहा कि ऐसा होने पर 4G यूजर्स तेजी के साथ मूवी या गाना डाउनलोड कर पाएंगे. उन्होंने बताया कि ब्राउजिंग और विडियो देने का एक्सपीरियंस भी पूरी तरह बदल जाएगा.

टेलिकॉम कंपनियों की बिडिंग से वाकिफ एक अन्य सूत्र ने बताया कि विडियो स्ट्रीमिंग में आसानी से कंपनियों को अधिक यूजर्स को ब्रॉडबैंड में शिफ्ट करने में मदद मिलेगी. उन्होंने बताया कि बिना बफरिंग के विडियो स्ट्रीमिंग के लिए कंपनियों को स्पेक्ट्रम कपैसिटी बढ़ानी होगी.

सरकार इस ऑक्शन में रिकॉर्ड 2300 Mhz स्पेक्ट्रम बेच रही है. अभी देश की टेलिकॉम कंपनियों के पास इससे कम स्पेक्ट्रम है. केंद्र ने साफ कर दिया है कि इसके बाद खराब सर्विस के लिए स्पेक्ट्रम की कमी का बहाना नहीं चलेगा.

टेलिकॉम सेक्रटरी जे एस दीपक ने हाल ही में कहा था कि ऑक्शन के बाद देश में स्पेक्ट्रम की कमी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी. इससे क्वॉलिटी बेहतर होने की उम्मीद है.

सोशल साइट्स का टूटता तिलिस्म

कहते हैं जो जितनी जल्दी चढ़ता है उसी तेजी से गिरता भी है. ठीक यही स्थिति सोशल मीडिया की भी हुई है. कई कारणों से यह अपने महत्त्व को खोता जा रहा है. कुल मिला कर लोगों को अब फेसबुक पर ऐक्टिव रहना समय की बरबादी नजर आ रहा है.

पिछले 1-2 साल में जिस तेजी से सोशल साइट्स का क्रेज बढ़ा और युवाओं को फेसबुक का चसका लगा, अब उस की सचाई भी सामने आने लगी है. युवाओं को नई नौलेज देने वाली सोशल साइट्स कई कारणों से अपना महत्त्व खोती जा रही हैं, जिन में एक है समय की बरबादी.

इस विषय पर एक बुद्धिजीवी प्रोफैसर से चर्चा की, तो उन की अभिव्यक्ति हतप्रभ करने वाली थी. हरिद्वार के एक कालेज में वे युवा लेक्चरर हैं और अविवाहित भी. मेरी फेसबुक पर ही उन से मित्रता हुई.

जब मैं ने फेसबुक के बारे में उन के विचार जानने चाहे, तो उन की सब से पहली प्रतिक्रिया यही थी कि इस साइट पर एक संवेदनशील व्यक्ति की कोई अहमियत नहीं होती. तमाम तरह के  झूठ और दिखावे की बातें यहां होती हैं. 

एक शिक्षाविद् होने के नाते उन की अपने विश्वविद्यालय के प्रांगण में अपने स्टूडैंट्स पर भी नजर रहती है. अत: एक शिक्षक के रूप में उन की यही प्रतिक्रिया थी कि ज्यादातर युवकयुवतियां वक्त की बरबादी करते हैं तथा उन्हें न तो समय का खयाल होता है और न ही सामने वाले के ओहदे का.

मसलन, वे खुद व्याख्याता हैं, किंतु सोशल साइट पर यदि वे किसी सुंदर छात्रा पर कमैंट करते हैं, तो उन का स्तर किसी छात्र का सा हो जाता है.

सोशल साइट पर आप हैं, इस का मतलब यह नहीं कि आप वहां हैं, तो आप को बड़ा सम्मान मिलेगा. फेसबुक पर यदि एक लड़की के छात्र तथा टीचर फ्रैंड हैं तो वे एक ही ग्रेड के हो जाएंगे. उस लड़की पर एक स्टूडैंट व टीचर का कमैंट एकसाथ होगा, इस में टीचर को बड़प्पन की आशा कतई नहीं करनी चाहिए.

दरअसल, मेरे परिचित प्रोफैसर मित्र को यह बेहद नागवार गुजर रहा था कि वे एक सम्मानजनक पद पर हैं, किंतु जब वे कहीं कमैंट कर रहे हैं, तो उन का स्तर किसी स्टूडैंट से जरा भी ऊंचा नहीं होता. यह बात उन्हें भीतर तक आहत करती है.

सोशल साइट का दायरा जितना विस्तृत होता है, किसी के भी सम्मान की संभावना उतनी ही कम हो जाती है. यह ऐसा ही होता है, जैसे पानठेले पर गुरुचेले सब साथ में पान खा रहे हों या पब में गुरुशिष्य साथ खापी रहे हों.

इस के चलते सोशल साइट पर उम्र की सीमा खत्म हो गई है. सब अपने मन मुताबिक व्यवहार कर रहे हैं. समाज में जो एक व्यवस्था है वह जैसे भरभरा कर गिर गई है.

प्रोफैसर ने यह भी बताया कि वहां सबकुछ स्तरहीन हो गया है. यदि आप कोई गंभीर बात कहें तो कोई बिलकुल भी प्रतिक्रिया नहीं देता. इस से विचारशील व्यक्ति को  झटका लगता है.

वे युवा शिक्षक बेहद निराश से लगे, यह कहते हुए कि अब उन्हें फेसबुक में कोई आकर्षण महसूस नहीं होता. यहां मित्रता तो एक छलावा भर है. लोग फ्रैंडशिप कर तो लेते हैं, पर उसे निभाते नहीं.

वे शिक्षक मित्र अति संवेदनशील और भावुक हृदय के युवा हैं, यहां तक कि जब मेरे पुत्र की तबीयत खराब थी, तो वे लगातार मेरे बेटे के बारे में पूछते रहते थे. इस से मैं उन की टीस का सहज अनुमान लगा सकती हूं कि वे चाहते हैं कि उन्हें भी फेसबुक के फ्रैंड्स से वैसा ही प्रतिदान मिले. किंतु सचाई कुछ और ही है.

उन की बातों से यही लगता है कि वे सोशल साइट्स पर चल रही निरर्थक बातों और गपबाजी से पूरी तरह ऊब चुके हैं. उन्हें फेसबुक अब पूर्णतया बकवास नजर आ रहा है.

जानकार ये भी मान रहे हैं कि फेसबुक एक ऐसी बाढ़ है, जिस में युवावर्ग ही नहीं उम्रदराज भी अपनी दीनदुनिया भुला कर पूर्णतया डूब चुके हैं. उन्हें न तो अपनी हैसियत का पता है, न ही उम्र का खयाल.

अब छात्रछात्राएं रातरात भर औनलाइन रहते हैं या यों कहें कि उन्हें चैटिंग के बाद ही नींद आती है. कुछ की तो इस चसके से नींद भी पूरी नहीं होती. दफ्तरों में भी पूरे दिन फेसबुक पर अपडेट व कमैंटबाजी चलती रहती है. मेरी एक मित्र का अब फेसबुक से मन भर गया है वह अपनी स्टडी में लगी है, उस का मानना है कि फेसबुक पर ऐक्टिवेट रहना समय की बरबादी है. 

सर्जिकल स्ट्राइक: सबूत पर सियासत क्यों

हमारा देश आस्थावानों का देश है, जिसमें तर्क करने और सवाल पूछने की मुमानियत है, भगवान है यह लोगों ने मान लिया है, मस्तिष्क रेखा गुरु पर्वत की तरफ जाये तो जातक भाग्यवान होता है, जन्मकुंडली के सप्तम भाव मे मंगल हो तो कन्या के विवाह में अडचने आती हैं, यह और ऐसी हजारों बेसरपैर की बातें हमारी रोजमरराई ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं, जिन पर तर्क या सवाल करो तो पंडे तिलमिला उठते हैं, क्योंकि उनकी दुकानदारी खतरे में पड़ने लगती है. सीधे सीधे पूछने वाला नहीं मानता, तो उसे प्रताड़ित किया जाने लगता है और इस पर भी उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न न हो तो उसे नर्क पहुंचाने का भी इंतजाम कभी कभी कर दिया जाता है.

भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक सवालों के दायरे में है. परसों तक प्रधानमंत्री को इस बाबत सेल्यूट ठोकने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एकाएक ही पलटी मारते हुये सर्जिकल स्ट्राइक की सच्चाई पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह, रणजीत सुरजेवाला और संजय निरूपम भी इसी बात को दूसरे तरीके से कह रहे हैं कि हमारी सरकार को पाकिस्तान के दुष्प्रचार का जबाब देना चाहिए कि वाकई सर्जिकल स्ट्राइक नाम की कोई क्रिया सम्पन्न हुई भी थी या नहीं.

साध्वी उमा भारती ने बहुत सटीक जबाब केजरीवाल को दे दिया है कि उन्हे पाकिस्तान चले जाना चाहिए, लेकिन भगवान है या नहीं, जैसे बेहूदे सवाल नहीं पूछने चाहिए. कायदे से तो बात या फसाद इसी जवाब के साथ खत्म हो जाना चाहिए, लेकिन उमा या दूसरे महाराजा जैसे लोग यह भूल रहे हैं कि यह त्रेतायुग नहीं कलयुग है और हाल फिलहाल आर्यावर्त मे लोकतन्त्र है. लोग पहले अरविंद केजरीबाल को पानी पी कर कोसेंगे, पर चार दिन बाद खुद ही  सरकार से कहेंगे कि अगर सबूत हों तो दे दो हर्ज क्या है. तब सरकार क्या करेगी, पता नहीं, लेकिन महज एक सवाल पूछ लेने से कोई राष्ट्रद्रोही करार नहीं दिया जा सकता.

पाकिस्तान चले जाओ वाला जवाब लोकतान्त्रिक पैमानों पर कतई खरा नहीं उतरता. अगर कोई नीतिगत अड़चन है या सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर सरकार हाल फिलहाल सर्जिकल स्ट्राइक के बाबत जानकारी देना मुनासिब या जरूरी नहीं समझती तो भी उसे यह सच जनता के सामने रखना चाहिए, जिससे लोगों के मन में किसी तरह का संदेह न पनपे.  बिलाशक देश नाजुक दौर से गुजर रहा है, ऐसे में उमा भारती का बौखलाहट भरा हिंदुवादी जबाब सरकार के पूर्वाग्रह और अदूरदर्शिता को ही दर्शाता है. किसी केजरीबाल से सवाल पूछने का अधिकार छीनने का यह तरीका पौराणिक सा है कि जो हमारी बात न माने, हमारी विचारधारा को नकारे, वह इस देश में रहने काबिल ही नहीं, उसे तिरस्कृत कर दो या फिर नास्तिक करार दे दो. यह न तो सवाल का जवाब है और न ही समस्या का समाधान है, जो बहुत बड़े रूप मे भी सरकार के सामने आ सकती है. 

 

LPG सब्सिडी के लिए जरूरी हुआ आधार कार्ड

सरकार ने एलपीजी गैस सब्सिडी के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया है. एलपीजी सिलेंडरों की खरीद पर सब्सिडी पाने के लिए सरकार ने 30 नवंबर तक आधार कार्ड बनवाने का मौका दिया है. इसके बाद आधार कार्ड न रखने वाले लोगों को एलपीजी सब्सिडी नहीं मिलेगी.

फिलहाल केंद्र सरकार एक साल में एक परिवार को 12 सब्सिडी युक्त सिलेंडर देती है. हर सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी ग्राहक के खाते में सीधे ट्रांसफर कर दी जाती है, जबकि उनको बाजार दर पर मूल्य चुकाकर सिलेंडर खरीदना होता है.

पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, 'एलपीजी सब्सिडी लेने वाले ग्राहकों के लिए आधार कार्ड जरूरी होगा या फिर उन्हें आधार वेरिफिकेशन करवाना होगा.' बयान में कहा गया कि जिन लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है, उन्हें इसके लिए 30 नवंबर तक का वक्त दिया जा रहा है. इसके बाद आधार कार्ड के बिना एलपीजी की सब्सिडी जारी नहीं की जाएगी.

मंत्रालय के मुताबिक जब तक लोगों को आधार कार्ड उपलब्ध नहीं होता है, तब तक फोटोयुक्त बैंक पासबुक, वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड या फिर आधार कार्ड की आवेदन पर्ची के आधार पर यह सब्सिडी जारी की जाएगी.

पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक यह नोटिफिकेशन असम, मेघालय और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में एक साथ लागू कर दी गई है.

बिना चाइनीज माल के कहीं सूनी न रह जाए दिवाली!

बाजार संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से इस दिवाली चाइनीज सामान के बहिष्कार की लगातार उठती मांग ने थोक व्यापारियों को मुश्किल में डाल दिया है. दिवाली की चाइनीज सप्लाई लगभग पूरी हो चुकी है और अब बिक्री में किसी भी तरह की बाधा से सिर्फ स्थानीय व्यापारियों का नुकसान होगा. हालांकि मेक इन इंडिया और दूसरी स्कीमों से स्थानीय उत्पादनकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि दिवाली की भारी डिमांड अभी घरेलू सप्लाइ से पूरी नहीं हो सकती.

हरियाणा सरकार के कुछ मंत्रियों के आह्वान के बाद मंगलवार को रेवाड़ी, सोनीपत और फरीदाबाद से कई ट्रेड असोसिएशंस की ओर से चाइनीज सामान की खरीद-बिक्री नहीं करने की अपील और कुछ जगहों पर चाइनीज सामान जलाने की खबरें भी आईं. पुरानी दिल्ली के कुछ बाजारों की ट्रेड असोसिएशंस भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर चाइना के खिलाफ समर्थन जुटाती दिखीं. लेकिन सीधे तौर पर चाइनीज इम्पोर्ट और होलसेल ट्रेडिंग से जुड़े कारोबारियों में इसे लेकर टेंशन देखी जा रही है.

फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेड असोसिएशंस के वाइस चेयरमैन और इम्पोर्टर पवन कुमार ने बताया, 'दिवाली का 90 पर्सेंट चाइनीज माल डिलिवर हो चुका है. पेमेंट भी हो चुका है और कस्टम ड्यूटी भी जा चुकी है. अब किसी भी तरह की रोक से चीन का कुछ नहीं बिगड़ने वाला, जो नुकसान होगा वह भारतीय ट्रेडर्स का होगा.'

उन्होंने बताया कि देश में दिवाली गुड्स की डिमांड साल दर साल 10-15 पर्सेंट की दर से बढ़ रही है. घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इसे पूरा नहीं कर सकती. सरकार को चाहिए कि चीन चाइनीज चीजों से घरेलू इंडस्ट्री प्रभावित हो रही है, पहले उन पर बैन लगाए और घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दे.

हालांकि होलसेलर्स का मानना है कि बीते कुछ सालों में दिवाली के कुछ चाइनीज उत्पादों की आवक घटती जा रही है. दिल्ली इलेक्ट्रिकल ट्रेडर्स असोसिएशन के मेंबर और चाइनीज लड़ियों के इम्पोर्टर आशीष दीवान कहते हैं, 'इस साल पटाखे और फायर प्रॉडक्ट बिल्कुल नहीं आ रहे. एलईडी लड़ियों और दीयों में सस्ते चाइनीज उत्पादों की मांग बनी हुई है. हालांकि कुछ घरेलू कंपनियां सप्लाई बढ़ा रही हैं, लेकिन वे भी कच्चा माल चाइना से ही मंगा रही हैं.'

कारोबारी मानते हैं कि चाइनीज उत्पादों के खिलाफ मुहिम भावनात्मक और महज इत्तेफाक है. उनका कहना है कि यही तनाव अगर जून-जुलाई में होता तो बहुत से इम्पोर्टर ने माल बुक नहीं कराया होता. कारोबारी कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने भी हालिया संदेशों में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल की बात तो कही, लेकिन चाइनीज उत्पादों का नाम तक नहीं लिया. सरकार अगर इस बारे में स्पष्ट रुख जाहिर कर दे तो घरेलू ट्रेडर भी उसी के मुताबिक अपनी तैयारी करेंगे.

जल्द ही टेनिस कोर्ट पर वापसी करेंगी शारापोवा

टेनिस स्टार मारिया शारापोवा के लिए राहत की खबर है कि 'द कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ऑफ स्पोर्ट' (CAS) ने शारापोवा पर लगे प्रतिबंध की समयसीमा को कम कर दिया है. शारापोवा के डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने के बाद उन दो साल का बैन लगाया गया था.

CAS ने इस बैन की अवधि को कम कर 15 महीने कर दिया है. रूस ने रसियन टेनिस फेडरेशन के अध्यक्ष शमिल तार्पीशेव के हवाले से इसकी जानकारी दी है.

अब अपने 15 महीने के बैन को पूरा करने के बाद शारापोवा अप्रैल 2017 से टेनिस के कोर्ट पर फिर से दिखाई दे सकेंगी. 29 वर्षीय शारापोवा पर इसी साल जनवरी में डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने के बाद दो साल का बैन लगाया गया था.

उल्लेखनीय है कि शारापोवा को डोप टेस्ट से पहले पांच बार प्रतिबंधित दवा के प्रयोग को लेकर चेतावनी दी गई थी. इसके बावजूद वह डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाई गईं. जून में शारापोवा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बाद की जानकारी दी थी कि वह डोप टेस्ट में फेल हो गईं हैं.

स्मार्टफोन से शक को करें डिलीट

अमन के वाशरूम में घुसते ही रुचि ने उस का फोन उठा लिया और न जाने क्या खंगालने लगी. कुछ देर बाद अमन वाशरूम से निकला, तो उसने रुचि को अपने फोन के साथ छेड़छाड़ करते पकड़ लिया.

अमन: जासूसी कर रही हो मेरी.

रुचि: नहीं, यह पता लगा रही हूं कि आखिर पूरे दिन तुम किस से बात करते रहते हो.

अमन: औफिस का काम करता हूं. कहो तो छोड़ दूं नौकरी?

रुचि: नौकरी क्यों छोड़ोगे, छोड़ना है तो उस लड़की को छोड़ो.

अमन: तुम्हारे बेबुनियाद इलजामों से मैं थक चुका हूं. जब देखो तब शक करती रहती हो.

अमन रुचि का झगड़ा यहीं समाप्त नहीं हुआ. बातों से बातें निकलती गईं और रिश्ता उलझता गया. नौबत तलाक तक पहुंच गई. अमन और रुचि का किस्सा अनोखा नहीं है. ऐसे लोगों की कमी नहीं जो स्मार्टफोन पर अपने पार्टन के इनवौल्वमैंट से चिढ़ते हैं और उन की चिढ़ नफरत और शक में तबदील हो जाती है. वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके ईगो को बहुत ठेस पहुंचती है जब उन का पार्टनर उन के मैसेजेस या चैट पढ़ लेता है. हैरानी की बात तो यह है कि ऐसे लोग आत्मसम्मन के नाम पर अपने पार्टनर को चोट तक पहुंचाने से नहीं चूकते.

पढ़े लिखे हैं ज्यादा बेवकूफ  

कुछ दिन पहले ऐसा ही बंगलूरू की सुनीता सिंह के साथ हुआ. पेशे से इंजीनियर सुनीता ने अपने पति पर चाकू से केवल इसलिए अटैक कर दिया क्योंकि वे उस के मोबाइल पर आए मैसेज को चोरी से पढ़ रहा था.

लखनऊ हाईकोर्ट में एडवोकेट राकेश त्रिपाठी इस मसले पर कहते हैं, “ बहुत आश्चर्यचकित बात है कि आज की पीढ़ी, जो ज्यादा पढ़ी लिखी और समझदार है, मात्र एक छोटे से स्मार्टफोन के चलते रिश्तों की गंभीरता और सम्मान को दरकिनार कर बेवकूफी की सारी सीमाएं पार कर रही है. जब कि स्मार्टफोन का इस्तेमाल हर तबके के लोग कर रहे हैं. मगर स्मार्टफोन ने सब से अधिक प्रभाव पढ़े लिखे वर्ग के लोगों की जिंदगी पर डाला है. सब से अधिक शक के चलते तलाक, मारपीट, मर्डर के केस इसी वर्ग के लोगों में हो रहे हैं. क्योंकि यह वर्ग अब वर्चुअल वर्ल्ड को ही एक्चुअल वर्ल्ड समझने लगा है. जब कि वास्तविक जीवन की हर जरूरत को स्मार्टफोन के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता है. खासतौर से पतिपत्नी के रिश्ते में स्मार्टफोन का दखल गलत परिणामों को दर्शा रहा है.”

शक कर देता है  रिश्ते को खोखला 

स्मार्टफोन की उपयोगिता को नजरअंदाज  नहीं किया जा सकता. इसने मनुष्य के कई काम आसान बना दिए हैं, लेकिन दूसरी तरफ मनुष्य के सोचने के दायरे को छोटा कर दिया है. उदाहरण के तौर पर यदि कोई महिला पति के आगे अपने स्मार्टफोन में व्यस्त है तो पति को यह बात नहीं पचती. उस के मन ही मन 100 विचार कौंध जाते हैं. अतिसंवेदनशील स्थिति में पति अपनी पत्नी के चरित्र पर भी शक करने लगता है. मगर उसे यह विचार नहीं आता कि पत्नी की अपनी नीजता है. यही स्थिति महिलाओं के साथ भी है. पति का स्मार्टफोन उन्हें अपनी सौतन से के समान लगता है.

इस बाबत क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट प्रतिष्ठा त्रिवेदी कहती हैं, “ हर पति पत्नी के संबंधों में पारदर्शिता जरूरी है लेकिन अपनी प्राइवेसी खोने के मूल्य पर नहीं. यहां समझने वाली बात यह है कि यदि पार्टनर की किसी बात से परेशानी है तो उस पर खुल कर बात की जाए ना कि उस की जासूसी कर के अपने शक को गहरा किया जाए. शक का क्या है, इस की कोई सीमा नहीं होती. यह रिश्ते को खोखला बना देता है.” इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यदि पार्टनर कहे कि वो 10 मिनट अकेले बैठना चाहता है तो इस का मतलब यह नहीं कि उस 10 मिनट अकेले बैठ कर वो आप से कुछ छुपा रहा है. यहां उस की निजता को सम्मान देने वाली बात आती है. प्रतिष्ठा कहती हैं, “ प्राइवेसी की अलगअलग लोगों की अलगअलग परिभाषाएं हो सकती हैं. इसे शक की नजर से देखना अकलमंदी नहीं है.”

पासवर्ड शेयरिंग से नहीं बनेगी बात

मैरिटल थैरेपिस्ट एंव माई हसबैंड डजेंट लव मी एंड ही टैक्सटिंग समबडी एल्स के लेखक एंड्रियू जी मार्शल की माने तो, “स्मार्टफोन ने रिश्तों को उलझा दिया है और लोग यह भूल चुके हैं कि किसी की प्राइवेसी में किस हद तक दखल स्वीकार किया जा सकता है.”  यह बात मियां बीवी के रिश्ते में सब से अधिक लागू होती है. पुरानी मानसिकताओं के अनुसार शादी एक ऐसा बंधन है जिस में पति पत्नी को एक दूसरे से सब कुछ शेयर करना चाहिए. इस मानसिकता को अब मौर्डन कपल्स स्मार्टफोन पर भी थोपने लगे हैं. उन का मानना है कि शादी की है तो पार्टनर की हर वस्तु पर हक जताया जा सकता है.

साइकोलौजिस्ट प्रतिष्ठा कहती हैं, “हक जताने तक ठीक है मगर शक करना गलत हैं. पार्टनर की हर बात आप जान सकें यह मुमकिन नहीं क्योंकि हर घटना, जो पूरे दिन में उस के साथ घटी उस का लाइव टैलीकास्ट तो आपका पार्टनर नहीं कर सकता. मगर उस के हाइलाइट्स जरूर आप को पता चल सकते हैं. ऐसे में कुछ छूट जाए तो यह समझना की जानबूझ कर नहीं बताया और उस पर जंग छेड़ देना अकलमंदी नहीं. हो सकता है कुछ बातें आप का पार्टनर आपको समय आने पर ही बताना चाहे, ऐसे में थोड़ा समझदारी से काम लें और पार्टनर को पूरा वक्त दें. बात कैसे भी पता चल जाए इस के पीछे न पड़े. यह पार्टनर को चिड़चिड़ा बना देता है और फिर इस चिड़चिड़ाहट से बचने के लिए पार्टनर बाते छुपाने लगता है.” 

कई बार कुछ लोग अपने बेटरहाफ को इस बात के लिए मजबूर करते हैं कि वो अपने फोन का पासर्वड बता दे. कुछ स्थितियों में तो पार्टनर्स एक दूसरे को  इस डर से अपना पासवर्ड बता भी देते हैं कि शक की कोई गुंजाइश न रहे. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या गायरेंटी है कि फोन में मौजूद सामग्री से कोई छेड़छाड़ न की गई हो. इस बाबत प्रतिष्ठा कहती हैं, “स्मार्टफोन रखने वाला हर व्यक्ति स्मार्ट होता है. उसे पता होता है कि फोन में कौन सी सामग्री रखी जाए और कौन सी डिलीट कर दी जाए. इतना ही नहीं नई तकनीक के मोबाइल में हिडेन फीचर्स भी होते हैं, जिनकी मदद से सामग्री को फोन में ही छुपाया जा सकता है. ऐसे में पासवर्ड शेयर करने से क्या फायदा.” 

कई बार ऐसा भी होता है कि पार्टनर के फोन पर कुछ ऐसी सामग्री हाथ लग है कि मन में शक पनपने लगता है. इस स्थिती को कैसे संभाला जाए? एक आम दंपति पोरस चड्ढा और उनकी पत्नी स्मिता इस सवाल का जवाब कुछ इस प्रकार देते हैं: पोरस: शक तो एक बीमारी होती है. किसी सही सामग्री को भी शक की नजर से देखा जाए तो उस में भी खामिया निकाली जा सकती हैं. इस लिए अपने साथी पर शक न करें इससे रिश्ते में दरार पड़ जाती है. यदि कोई बात परेशान कर रही हो तो हलके अंदाज में पार्टनर से पूछ लें.  स्मिता: स्मार्टफोन पर ही क्यों पार्टनर यदि चीट करना चाहे तो जरिए और भी हैं. इस लिए पार्टनर के फोन को बारबार चैक करना समय बरबाद  करने जैसा है. इससे अच्छा है कि अपना समय रिश्ते को बहतर बनाने में लगाया जाए.

तीसरे को न करें शामिल

एक  सर्वे से पता चलता है कि लोग अपने पार्टनर के फोन में विपरीत सैक्स द्वारा आए मैसेज को पढ़ने में काफी रुचि लेते हैं, जिस में महिलाओं का अनुपात पुरुषों की अपेक्षा अधिक है. इस बाबत एडवोकेट राकेश त्रिपाठी कहते हैं, “मेरे पास ज्यादातर जो केस आते हैं उनमें महिलाओं को पतियों द्वारा दूसरी औरतों से चैट करने या औरतों द्वारा भेजे गए मैसेजेस से परेशानी होती है वहीं पुरुषों को ज्यादा परेशानी पत्नी के मायके पक्ष के लोगों से अधिक बात करने में होती है. महिलाओं को डर होता है कि पति उन्हें धोखा न दें और पुरुषों को चिंता होती है कि कहीं मायके पक्ष के लोग पत्नी को बहका न दे. दरअसल पति का फोन चैक करने के बाद जब शक करने वाली सामग्री मिल जाती है तो पत्नी का दूसरा कदम मायके पक्ष को इस मसले से जोड़ना होता है. बस यहीं बात बिगड़ जाती है.”

प्रतिष्ठा कहती हैं, रिश्ते में किसी तीसरे को शामिल करना मतलब रिश्ते को बिगाड़ना है. पतिपत्नी जितना आपस में एक दूसरे को समझा सकते हैं, तीसरा व्यक्ति उसका 1 प्रतिशत भी उन्हें नहीं समझा सकता. इसलिए किसी तीसरे व्यक्ति की दखल रिश्ते को उलझा सकती है सिर्फ. अत: निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि स्मार्टफोन के इस दौर में न सिर्फ स्मार्ट बनिए बल्कि अपने पार्टनर को रिश्ते में थोड़ी स्पेस दे कर अपने अहंकार से ऊपर उठ कर अपने रिश्ते में ताउम्र गर्माहट बनाए रखें. फिर देखिये किस तरह शक की गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी.

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