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जबरन सैक्स जबरदस्त भयंकर

अगले साल मार्च में सेवानिवृत्त होने जा रहीं भोपाल के एक थाने में पदस्थ एक इंस्पैक्टर ने जबरदस्ती और बलात्कार के कई मामलों में अहम भूमिका निभाई है. ऐसा ही 6 महीने पहले का एक किस्सा वे बड़ी गंभीरता से सुनाती हैं. 22 वर्षीय मेघा (बदला हुआ नाम) को 24 वर्षीय सोमेश (बदला हुआ नाम) से प्यार हो गया. दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. इस दौरान इन दोनों को एकदूसरे के सिवा कुछ नहीं सूझता था. बीई करने के बाद सोमेश नौकरी की तलाश में जुट गया और मेघा ने एमसीए करने के दौरान ही एक प्राइवेट कंपनी में पार्टटाइम नौकरी कर ली. एकदूसरे के प्रेम में दोनों ऐसे डूबे रहते कि इन्हें गौर से देख लेने वाला भी शायर हो जाए. चाइनीज खाने की शौकीन मेघा अकसर रैस्टोरैंट में मिलने को प्राथमिकता देती पर सोमेश पार्क में मिलना पसंद करता, क्योंकि यहां उसे किसी घने पेड़ के नीचे या झुरमुट के पीछे बैठ कर अपनी प्रेमिका से प्यार भरी बातें करने का मौका मिल जाता, जिस में उसे मजा आता था. चूमने और अंगों से छेड़छाड़ पर मेघा एतराज नहीं जताती थी. लेकिन शुरुआत में ही एक बार उस ने सोमेश को आगाह कर दिया था कि बस, इस हद से आगे नहीं बढ़ना. सोमेश उस के जज्बातों को समझता था और कहता था कि मुझे भी कोई जल्दी नहीं. जो काम शादी के बाद होना ही है उसे अभी करना मैं भी ठीक नहीं समझता. बस इधर नौकरी लगी और उधर शादी हुई. फिर बताना मुझे कि मेरी हदें कहां तक हैं.

लेकिन एक दिन…

मेघा बदहवास हालत में महिला थाने जा पहुंची और मौजूद महिला कौंस्टेबल से बलात्कार की कोशिश की रिपोर्ट लिखाने की प्रक्रिया पूछी तो कौंस्टेबल ने उसे उक्त इंस्पैक्टर के पास भेज दिया. अपने तजरबे के आधार पर इस इंस्पैक्टर ने सब्र से मेघा की पूरी बात सुनी.

‘‘आज सुबह सोमेश ने फोन कर मुझे घर बुलाया और कहा कि मम्मीपापा दोनों इंदौर शादी में गए हैं, 2 दिन बाद आएंगे इसलिए लंच मेरे साथ करो. मुझे इस में कोई हर्ज नहीं लगा और मैं औटो से सोमेश के घर चली गई. मुझे देखते ही सोमेश मारे खुशी के झूम उठा और मैं अंदर आई तो एहतियातन दरवाजा बंद कर लिया  ‘‘फिर उस ने मुझे बांहों में भर कर किस किया और फिर पूरा घर दिखाया. इस दौरान उस ने मुझे स्नैक्स भी औफर किए और मुझे किचन में जा कर कौफी बनाने के लिए कहा.

‘‘मैं कौफी बना कर लाई. फिर हम दोनों ने बैडरूम में बैठ कर कौफी पी और प्यार की अपनी दुनिया में खो गए. ‘‘बस, गड़बड़ यहीं से शुरू हुई. सोमेश मेरे बदन की तपिश में पिघलते हुए अपना किया वादा भूलने लगा और ‘थोड़ा और, हर्ज क्या है’ की जिद करने लगा. अपने प्रेमी की जिद के कारण मैं ने टौप उतारने दिया लेकिन इस के बाद सोमेश मुझे भेडि़ए की तरह नोचने  लगा. मेरी जींस उतारने की नाकाम कोशिश करने लगा. इधर मेरा विरोध बढ़ता जा रहा था, लेकिन सोमेश ने मुझे दबोच रखा था और पागलों की तरह चूमे जा रहा था और सैक्स क्रियाएं करने को उत्सुक था जो बजाय मुझे उत्तेजित करने के मेरी परेशानी और डर बढ़ा रही थीं. सोमेश सोच रहा था कि मैं भी जल्द ही उत्तेजित हो जाऊंगी और उसे मनमानी करने दूंगी. पर मैं ने ऐसा होने न दिया और भाग कर यहां आ गई.’’

समझाने से बनी बात

सारी कहानी सुन कर इंस्पैक्टर ने मेघा को समझाया कि रिपोर्ट लिखने और दोषी को गिरफ्तार करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं लेकिन तुम्हारी मां जैसी होने की हैसियत से मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहूंगी. मुझे लगता है कि वह लड़का तुम से वाकई सच्चा प्यार करता है लेकिन आज एकांत पा कर अपने सैक्स के जज्बे पर काबू नहीं रख पाया जो एक तरह से स्वाभाविक सी बात है. हर लड़के या प्रेमी की मनशा बुरी नहीं होती पर तुम ने समझदारी और हिम्मत दिखाई कि जैसेतैसे सलामत भाग कर थाने आ गई. उस की मनशा बलात्कार की नहीं रही होगी बल्कि शारीरिक संबंध बनाने की रही होगी पर इस में उस ने तुम्हारे प्यार और विश्वास पर गौर नहीं किया जो उस की गलती है. मुमकिन है वह अपनी गलती महसूस करे और तुम से माफी भी मांगने आए इसलिए रिपोर्ट दर्ज कराने के पहले उसे भी सोचने का मौका दो कि वह कितनी बड़ी गलती करने जा रहा था. मैं वादा करती हूं कि अगर उस की मनशा वाकई बलात्कार की थी तो उसे गिरफ्तार कर जेल की हवा जरूर खिलाऊंगी.

उन्होंने मेघा को कानूनी ऊंचनीच भी विस्तार से समझाई कि रिपोर्ट लिखाना जितना आसान है, अदालत में ऐसे आरोप साबित कर पाना उतना ही मुश्किल है. लड़का गिरफ्तार हुआ तो पछताएगा नहीं बल्कि अपने बचाव के लिए तुम पर ही बदचलनी का इलजाम लगा देगा. दूसरे, ऐसे मामले में भले हम पुलिस वाले लड़की का नाम और पहचान छिपा लें पर उसे बदनामी से नहीं बचा पाते. आज रिपोर्ट लिखेंगे तो कल अखबारों में खबर भी छपेगी, तुम्हारे घर वालों को भी आना पड़ेगा, जो तुम्हें भी एकदम पाकसाफ नहीं मानेंगे. प्यार करना गुनाह नहीं, लेकिन ऐसे नाजुक मामलों में सोचसमझ कर काम लेना चाहिए. मेघा ने बात समझी और इस आश्वासन पर वापस होस्टल जाने को तैयार हुई कि अगर वाकई सोमेश की मनशा में खोट था तो उसे माफ नहीं किया जाएगा. 2 दिन बाद वाकई सोमेश का व्हाट्सऐप पर मैसेज आया, ‘मैं अपने किए पर शर्मिंदा हूं और तुम से दिल से माफी मांगता हूं. मैं बहक गया था लेकिन मेरी मनशा तुम्हारी जिंदगी खराब करने की नहीं थी. मेरा प्यार सच्चा है और रहेगा. मैं तुम्हारे अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता. हो सके तो मुझे माफ कर देना.’

लेकिन सोमेश द्वारा माफी मांगने और दोबारा संपर्क न करने का उस पर वाजिब असर भी हुआ. उस ने पुराने मैसेज देखे और यादें ताजा हुईं, तो उसे यह भी लगा कि जो भी हुआ वह वक्ती तौर पर हालात की वजह से हुआ. साथ ही यह सोच कर भी वह कांप उठती थी कि अगर वाकई सोमेश अपने मकसद में कामयाब हो जाता तो उस की हालत क्या होती? आखिरकार उस ने सोमेश को माफ कर दिया, अब जल्द ही दोनों शादी कर लेंगे. मेघा के साथ जो हुआ था वह प्यार में पड़ी युवतियों के साथ होना आम है. ऐसे हादसे युवतियों के लिए किसी सदमे से कम नहीं होते. प्रेमी जब सैक्स चाहे तब युवतियां दुविधा में पड़ जाती हैं कि क्या करें? अगर न करती हैं तो बे्रकअप भी हो सकता है. लेकिन सैक्स ही करने की शर्त पर उन्हें प्यार करते रहना गंवारा नहीं होता और जोखिम वाला काम भी भविष्य के लिहाज से गलत नहीं लगता. असल दिक्कत उस वक्त खड़ी हो जाती है जब एकांत पा कर प्रेमी जबरन सैक्स पर उतारु हो जाता है और मनमानी कर के ही छोड़ता है. इस दैहिक आकर्षण या जरूरत से अपवादस्वरूप ही प्रेमी मुक्त होंगे, क्योंकि प्यार के माने बदल रहे हैं. यह पहले की तरह आदर्श या पवित्र नहीं रह गया है बल्कि शारीरिक संबंध इस की प्राथमिकता हो गई है. प्रेमिका को कोशिश करनी चाहिए कि वह अपने बौयफ्रैंड से एकांत में न मिले, क्योंकि कभी भी न चाह कर भी मन पर कंट्रोल खत्म हो जाता है और प्रेमी सैक्स कर बैठता है. बाद में भले उसे पछतावा हो पर आप तो सैक्स का शिकार हो गईं न.

जबरन सैक्स के परिणाम

ऊहापोह में फंसी कुछ लड़कियां जबरन सैक्स का विरोध नहीं कर पातीं इसलिए उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. चूंकि वे सहमति से सैक्स नहीं करतीं इसलिए बजाय सुख या मजा देने के उन्हें यह हादसा लगने लगता है. अधिकांश प्रेमी एकांत पाते ही प्रेमिकाओं पर भेडि़यों की तरह टूट पड़ते हैं. यह बलात्कार वाली स्थिति ही है, जिस का सारा खमियाजा लड़की को जिंदगी भर भुगतना पड़ सकता है. सैक्स का पहला अनुभव जिंदगी भर कोई नहीं भूलता. खासतौर से युवतियां, जो सैक्स अगर चाहती भी हैं तो इस तरह कि उन्हें कोई शारीरिक व मानसिक यंत्रणा न सहनी पड़े. अधिकांश युवक युवतियों की इस मानसिकता को नहीं समझते कि प्यार की तरह सैक्स भी नजाकत की बात है, जिसे जबरन करने में उन्हें भी वह सुख नहीं मिलता जो सहमति के सैक्स में मिलता है. जबरन किया गया सैक्स मर्दानगी नहीं कहा जा सकता. इस में युवक एक तरह से युवती की मजबूरी का फायदा ही उठाता है.

इन दिनों इंटरनैट और स्मार्टफोन हर किसी के पास है जिस में पोर्न फिल्मों का भंडार है, इन्हें युवक देखते हैं तो समझ नहीं पाते कि जो वीडियो क्लिपिंग या ब्लू फिल्मों में दिखाया जा रहा है वह बेहद घटिया, अज्ञानता भरा और पैसा कमाने के लिए है. यह प्यार का नहीं बल्कि सैक्स का विकृत रूप है, जिसे वे सच समझ बैठते हैं. इस में सैक्स ऐजुकेशन या सलीके जैसी कोई बात होती ही नहीं.

फिर क्या करें

जबरन सैक्स का अधिकतर खमियाजा युवतियों को भुगतना पड़ता है जिन्हें जल्दबाजी में प्राकृतिक रूप से कोई मजा सैक्स में नहीं आता, चूंकि प्रेमी को भी जल्दी रहती है इसलिए उसे भी प्रेमिका एक डिश की तरह लगती है जिसे एक झटके में वह निगल जाना चाहता है. बाद के नतीजों पर गौर करें तो युवतियां अकसर घबराती नजर आती हैं और सैक्स से डरने लगती हैं. सैक्स, जिसे वे आनंद का जरिया समझती हैं सदमे की तरह उन के दिलोदिमाग में बैठ जाता है. नतीजा यह होता है कि वे जिंदगी भर इस से डरती रहती हैं और मशीन की तरह पार्टनर का साथ निभाती रहती हैं. जबरन सैक्स में दोनों यह भी भूल जाते हैं कि सावधानी न बरती जाए तो प्रैग्नैंसी भी हो सकती है. असुरक्षित सैक्स के नतीजे पहले से युवतियों के जेहन में रहते हैं पर वे कुछ कर नहीं पातीं. जब दूसरे महीने पीरियड नहीं आता तो उन की हालत खस्ता हो जाती है. इस पर भी अगर प्रेमी साथ न दे, तो वे खुदकुशी तक की भी बात सोचने लगती हैं.

भोपाल की एक नामी लेडी डाक्टर का कहना है कि हर हफ्ते एक ऐसी युवती क्लिनिक में ऐबौर्शन के लिए आती है जो जबरन या असुरक्षित सैक्स का शिकार हुई होती है. वक्त पर आ जाए तो आराम से गर्भपात हो जाता है लेकिन यह ग्लानि उसे जिंदगी भर सालती रहती है और वह शादी के बाद भी सैक्स लाइफ ऐंजौय नहीं कर पाती. कई बार लड़कियां प्रैग्नैंसी हो जाने पर प्रेमियों को बख्शती नहीं और उन्हें कानून या सामाजिक तौर पर उन के किए की सजा दिलाती हैं. पर यह प्रक्रिया जबरन सैक्स की तरह झेलनी पड़ती है जिस से उन्हें कोई फायदा नहीं होता. सुरक्षित यौन संबंध सावधानियां और इस से भी ज्यादा अहम सहमति से सैक्स है जो न हो तो बात बिगड़ना तय है इसलिए भी इस दौर का प्यार बदनाम हो रहा है. भयंकर और अप्रिय सैक्स जो हालात के मुताबिक अनिवार्य हो जाता है से बचना कोई खास मुश्किल काम नहीं है. इस से बचने हेतु निम्न टिप्स पर अमल करना चाहिए :

–       एकांत में मिलें तो कागज पर लिख कर  रखें और बारबार देखें कि सबकुछ करना है पर सैक्स नहीं.

–       कंडोम हमेशा साथ रखें, क्योंकि खुद को जबरदस्ती करने से बचाए रखने की गारंटी कोई युवक नहीं ले सकता.

–       युवतियों को भी यह बात रट लेनी चाहिए और मन में दोहराते रहना चाहिए कि इस में मजा तो आने से रहा, बाद में तमाम दुशवारियां उन के ही हिस्से में आना तय है. जरूरी नहीं कि हरेक कहानी का मेघा और सोमेश की कहानी के जैसा सुखांत हो. इसलिए युवा प्रेमियों को चाहिए कि एकांत मिलने पर संभले रहें और जवानी के जोश में होश न खोएं. जरा सी जबरन की गई चूक जिंदगी भर का नासूर बन जाएगी.  

गोली और कल्चर का एक्सचेंज एक साथ नहीं हो सकता: अजय देवगन

‘फूल और कांटे’ फिल्म से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता, निर्माता, निर्देशक अजय देवगन ने हर तरह की भूमिका निभाई. वे अपने गंभीर अभिनय के लिए जाने जाते हैं. पर उन्होंने कॉमेडी से लेकर रोमांटिक हर तरह की फिल्में की. ‘हम दिल दे चुके सनम’ उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट थी, जहां से उन्हें पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा. इसके बाद जो भी फिल्में उन्होंने की सभी हिट रहीं.

‘द लिजेंड ऑफ़ भगत सिंह’, ‘कंपनी’, ‘गंगाजल’, ‘राजनीति’, ‘सिंघम’ आदि सभी फिल्में सफल रही. जैसा वे अभिनय करते हैं वैसे ही वे दैनिक जीवन में भी हैं. हर काम को वह चुनौती समझते हैं, हर अभिनय उनके लिए नया होता है. काम के दौरान ही वह काजोल से मिले और एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि काजोल से अच्छी कोई जीवन साथी नहीं बन सकती. वह दो बच्चों के पिता हैं. अजय ‘कैमरा शाय’ हैं और केवल फिल्मों के प्रमोशन पर बात करते हैं. फिल्म ‘शिवाय’ के प्रमोशन पर उनसे बात हुई, पेश है अंश.

प्र. इस फिल्म की प्रोमो काफी अलग दिख रही है, इसकी वजह क्या है?

यह मैंने जान बूझकर किया है ताकि आप को फिल्म देखने की इच्छा हो, एक उत्सुकता बनी रहे. यह एक इमोशनल कहानी है, जो पिता और बेटी की है. जो आप फिल्म देखने के बाद ही पता कर सकते है.

प्र. आप ने कॉमेडी, सीरियस और इमोशनल फिल्में की है, कितना मुश्किल होता है सबको बैलेंस करना?

इसमें कॉमेडी, इमोशनल ड्रामा और एक्शन है. लोग जो फील करते हैं, उसे लेकर कहानी बनाई गई है. ‘दृश्यम’ मैंने नहीं बनायीं, उसमें एक्टिंग की थी, उसकी स्क्रिप्ट अच्छी थी. इसलिए मुझे अच्छी लगी थी. इस फिल्म में आज के ज़माने की बाप-बेटी की रियल इमोशन को इसमें दिखाने की कोशिश की है.

प्र. शिवाय नाम रखने की वजह क्या है?

यह कोई धार्मिक फिल्म नहीं, इसमें चरित्र का नाम शिवाय है. जो मजबूत है और आम इंसान की तरह है. जो अच्छा और बुरा कोई भी काम कर सकता है. यह एक साधारण इंसान का चरित्र है.

प्र. फिल्म में एक्शन दृश्यों को करना कितना ‘रिस्की’ होता है?

मैं हर दृश्य को सावधानी से समझकर करता हूं, ट्रेनर हमारे साथ होते हैं. इस फिल्म में मुझे कई बार चोट लगी है. इसमें कई ऐसे सीन्स भी हैं, जिसे पहले सबने करने से मना किया और कहा कि हमारे पास टेक्निशियन की कमी है. ये केवल हॉलीवुड में ही हो सकता है. लेकिन मैंने देखा कि यहां भी दिमाग है. आपको कम्फर्ट जोन से निकल कर पैशन के साथ इसे करना है. ऐसा ही हुआ, सारे दृश्य यहीं सही तरह से फिल्माये गये. मैंने कई बार एक्शन डिजाईन भी किया है पर हर फिल्म का एक एक्शन डायरेक्टर होता है.

प्र. इस फिल्म को विश्व में दिखाने के लिए कोई अलग रणनीति बनायीं है?

ये फिल्म पूरे विश्व में एक साथ रिलीज होगी. लेकिन इस बार कुछ नए देश भी इसे लेकर गए हैं जिसमें जर्मनी, बुल्गारिया,चाइना आदि सभी देश इसे देखना चाहते हैं कि भारत में ऐसी फिल्म कैसे बनी है.

प्र. रियल कहानी बहुत कम देखने को मिलती है, हर फिल्म किसी विदेशी फिल्म की कॉपी होती है, ऐसे में आपकी फिल्म कितनी अलग है?

कहानी का आईडिया सौ फिल्मों से होता है, स्क्रीनप्ले और इमोशन की बात होती है जो आप बनाते हैं. उसके लिए भी अनुभव जरुरी है कि किस तरह आप नए आईडिया को कहानी में बदलकर फिल्म बनाते हैं. इतना जरुर है इस फिल्म की कहानी आप किसी अंग्रेजी फिल्म में नहीं पा सकते.

प्र. फिल्म में इतने सारे विदेशी एक्टर लेने की वजह क्या थी?

यह स्क्रिप्ट की डिमांड थी और ये आपको फिल्म देखने के बाद पता चलेगी. यह परफोर्मेंस ओरिएंटेड फिल्म है. मुझे कोई शौक नहीं था कि विदेशी एक्टर जरुरत न पड़ने पर भी लूं. इसकी कास्टिंग में मुझे एक से डेढ़ साल लगा था.

प्र. आप प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एक्टर और अब लेखक सब बन चुके हैं, कौन सा काम आपको मुश्किल लगता है?

सबसे अधिक मुश्किल निर्माता बनना लगता है, डायरेक्शन और एक्टर का काम मेरे लिए आसान है.

प्र. आप अपनी सफलता को कैसे देखते हैं?

मुझे लगता है कि अभी रास्ता बहुत लम्बा है. जिस दिन आपको लगा कि आप सफल हो गए हैं, उस दिन काम करने की भूख खत्म हो जाती है और आप अच्छा काम नहीं कर पाते.

प्र. आप के हिसाब से फिल्म के सफल होने में आलोचक की भूमिका कितनी बड़ी होती है?

आज हजारों में क्रिटिक है. हर कोई अपने आप को आलोचक कहने लगा है. बिना फिल्म को समझे कोई भी कुछ भी लिख देता है. ऐसे आलोचकों से परेशानी होती है. पत्रकारिता में ऐसा नहीं है कि आपने किसी बच्चे के हाथ में माइक दे दिया और उसकी जो मर्ज़ी वह कहे. आलोचक बनने के लिए समझ और अनुभव की आवश्यकता होती है. अगर कोई संस्था इस क्षेत्र में ट्रेनिंग के लिए हो तो बेहतर होगी. आज लोगो को बात करने का तरीका तक पता नहीं है, आधे से अधिक अपने आप को बड़ा सिद्द करने के लिए क्रिटिक बोल देते है. ऐसे में जो रियल क्रिटिक है उनका नाम ख़राब हो रहा है.

प्र. पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर जो ये विवाद है इसमें क्या कहना चाहेंगे ?

मैंने कई पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम किया है. राहत फ़तेह अली खान ने मेरी कई फिल्मों के गाने भी गाएं हैं. लेकिन कई बार हालात ऐसे होती हैं, जहां कलाकार और कला की नहीं, बल्कि बात देश की होती है. देश की बात करें तो इतने सारे जवान मर रहे हैं, उनके परिवार क्या महसूस कर रहे हैं. ऐसे में उनकी संवेदना को समझना जरुरी है. आखिर वे देश की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, अपनी जान गवां रहे है. मैं चाहता हूं कि ये जल्दी खत्म हो जाये ताकि आप फिर से काम कर सकें, लेकिन उस समय के लिए हमें देश के लिए खड़ा रहना चाहिए. गोलियों का  एक्सचेंज और कल्चरल एक्सचेंज एक साथ नहीं हो सकता.

बाजरे के लजीज स्वाद फ्री में ट्रेनिंग देता होमसाइंस कालेज

बाजरे की रोटी का स्वाद जितना अच्छा होता है, उस से कई गुना ज्यादा उस में गुण भी होते हैं. बाजरे की रोटी खाने वालों को हड्डियों के रोग नहीं होते. खून की कमी से होने वाला रोग एनिमिया भी नहीं होता. साथ ही लिवर से जुड़े रोगों से भी छुटकारा मिलता है. गेहूंचावल के मुकाबले बाजरा कई गुना ज्यादा ताकत देता?है. मोटापा, मधुमेह व दिल के रोगियों के लिए भी यह अच्छा होता?है. आज कोई भी कामधंधा शुरू करने के लिए किसी खास ट्रेनिंग और जमापूंजी के साथसाथ जगह की भी जरूरत होती है. सब कुछ होने के बाद भी जरूरी नहीं कि कामयाबी मिल ही जाए. लेकिन बाजरे से बनाई गई खाद्य सामग्री का रोजगार बहुत ही कम समय में आसान सी ट्रेनिंग ले कर शुरू किया जा सकता?है. इस के लिए किसी खास पढ़ाईलिखाई की जरूरत भी नहीं होती?है. बाजरा अपनेआप में सस्ता और पौष्टिक अनाज है, जिस से आप कम लागत में अनेक अच्छे उत्पाद बना सकते हैं.

चौधरी चरण सिंह, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के होमसाइंस कालेज द्वारा बाजरे से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है, जो केवल 1 से 2 दिनों की ही होती है. इस ट्रेनिंग में बाजरे से बने लड्डू, ढोकला, बिसकुट, सेव (नमकीन), केक, इडली जैसी चीजें बनानी सिखाई जाती?हैं, जो स्वादिष्ठ और पौष्टिक होने के साथसाथ बनाने में आसान और कम खर्चीली भी हैं.

बीते दिनों हिसार कृषि विज्ञान मेले में भी उन्होंने अपना स्टाल लगाया, जहां इस केंद्र की बनाई हुई खाद्य सामग्री को प्रदर्शित किया गया. जिस सामग्री को चख कर किसानों ने लुत्फ भी उठाया.

होमसाइंस कालेज की डीन डा. प्रवीण पुनिया के नेतृत्व में उन के विशेषज्ञों द्वारा ट्रेनिंग दी जाती?है, मेले में लगे स्टाल पर अपनी छात्राओं के साथ डा. वीनू सांगवान व डा. आशा क्वात्रा मौजूद थीं. उन्होंने बताया कि यह ट्रेनिंग एकदम मुफ्त दी जाती है, जो 1 से 2 दिनों की होती?है. ट्रेनिंग करने के बाद आप अपना छोटा रोजगार भी शुरू कर सकते?हैं. खासकर घरेलू महिलाओं के लिए तो यह बहुत ही फायदे का सौदा है. वैसे भी आजकल तो हाथ से बनी चीजों की खासी मांग भी है और लोग विश्वास से खरीदते?भी हैं.

प्रशिक्षण विशेषज्ञों द्वारा सीखने वालों को बाजरे की पौष्टिकता, प्रोसेसिंग का तरीका व उस में काम आने वाले उपकरणों के बारे में भी बताया जाता है.

जो लोग ट्रेनिंग लेना चाहते?हैं, वे चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के होमसाइंस कालेज के फूड एवं न्यूट्रीशियन विभाग से संपर्क कर सकते हैं. साथ ही उन के टौल फ्री नंबर 18001803001 पर बात कर सकते हैं.

कुछ कहती हैं तसवीरें

गजब की कलाबाजियां : सेना के सिपाही बार्डर पर तो देश की हिफाजत करते ही हैं, पर अकसर अनोखे करतब भी दिखाने से नहीं चूकते. ट्यूबलाइटों की दीवार तोड़ कर मोटरसाइकिल निकालना या आग के गोले के बीच से घोड़े पर सवार हो कर निकलना ऐसे ही अनोखे करतब हैं.

मधुमक्खीपालन मिठास भरा रोजगार

जरूरी सामान : सब से पहले हमें मधुमक्खीपालन के लिए लकड़ी के बने बक्से लेने होते हैं, जिन्हें हम मौनग्रह भी कहते हैं. इस के अलावा मधुमक्खीपालन के लिए निम्न चीजों की जरूरत होती है: मधुमक्खियों से बचाव के लिए जाली, हाथों पर पहनने के दस्ताने, मधुमक्खियों को काबू करने के लिए धुंआ करने वाला यानी स्मोकर, शहद निकालने का यंत्र, शहद छानने की छलनी, कमेरी मधुमक्खियों को रोकने का यंत्र, कपड़े का बना एप्रैन वगैरह. मधुमक्खीपालन कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाला रोजगार है. इस रोजगार में?ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती और न किसी खास पढ़ाईलिखाई की जरूरत होती है. इस काम को खेती के साथसाथ सहरोजगार के रूप में किया जा सकता?है. घरेलू औरतें भी इस काम को बखूबी कर सकती हैं. यही वजह है कि आज मधुमक्खीपालन का काम बहुत सी औरतें लघु रोजगार के रूप में कर रही?हैं.

जरूरी बातें

कोई भी काम शुरू करने से पहले उस के बारे में जानकारी जरूर लेनी चाहिए, इसलिए मधुमक्खीपालन करने से पहले उस की ट्रेनिंग जरूर लें. इस से सही मधुमक्खी व सही जगह का चुनाव करना आसान हो जाता है. सही समय पर काम शुरू करें. अक्तूबरनवंबर मधुमक्खीपालन करने के लिए बहुत ही अच्छा समय है, क्योंकि तब अरहर की फसल बढ़ रह होती है और तोरिया यानी सरसों की फसल भी आने वाली होती है, जिन के फूलों से अच्छा पराग मिलता है. यह पूरा सीजन अप्रैलमई तक चलता?है. ध्यान रखें कि मधुमक्खी किसी अच्छे संस्थान के प्रजनन केंद्र से लें. मधुमक्खीपालन के लिए राज्य सरकारों की तमाम योजनाएं भी होती हैं. इस के लिए जिला उद्यान केंद्र, नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड, खादी ग्रामोद्योग जैसी कई संस्थाएं हैं, जहां से काम शुरू करने के लिए अनुदान भी मिलता है.

कुछ और बातें जिन का ध्यान रखना जरूरी?है:

* मधुमक्खीपालन के लिए आधुनिक उपकरण ही खरीदें, खासकर बक्से सही नाप के हों. कैल व देवदार की लकड़ी के बक्से अच्छे माने जाते हैं, ये मौसम के हिसाब से घटतेबढ़ते नहीं?हैं. बक्सों पर फ्रेम सही फिट आने चाहिए.

* मधुमक्खीपालन के लिए ऐसी जगह का चुनाव करें, जहां आसपास पराग व मकरंद भरपूर मात्रा में हो.

* चुनी गई जगह पर जंगली जानवर और पशुपक्षियों का खतरा नहीं होना चाहिए.

मधुमक्खीपालन के अलगअलग मौसम में अलगअलग तौरतरीके होते हैं, जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान पूरी तरह से सीखा जा सकता?है.

यहां से लें ट्रेनिंग:

कृषि विज्ञान केंद्र उजवा, नई दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में बना है. इस केंद्र पर हमारी बात आरके यादव से हुई, जिन्होंने बताया कि उन के कृषि संस्थान से भी किसान मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग ले सकते?हैं. यह ट्रेनिंग मुफ्त में दी जाती है, जो 1 हफ्ते की होती?है. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद संस्थान से सर्टिफिकेट भी दिया जाता?है. कम पढ़ेलिखे लोग भी इस ट्रेनिंग को ले कर अपना रोजगार शुरू कर सकते?हैं. संस्थान के फोन नंबर 011-65638199 पर आप अधिक जानकारी ले सकते हैं.

इस के अलावा किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से भी इस बारे में संपर्क कर सकते?हैं. मधुमक्खीपालन के संदर्भ में हमारी प्रताप सिंह से बात हुई, जो रावता गांव, नजफगढ़, दिल्ली में ‘सुनीता मधुमक्खीपालन’ के नाम से बड़े स्तर पर मधुमक्खीपालन का काम करते?हैं, साथ ही मधुमक्खीपालन से जुड़े सामान भी बेचते हैं. प्रताप सिंह ने बताया कि जो लोग उन के यहां से ट्रेनिंग लेना चाहते?हैं, तो वे उन के पास जा कर साल में कभी भी ट्रेनिंग ले सकते हैं. टे्रनिंग में बेसिक जानकारी के साथसाथ प्रैक्टिकल के रूप में भी शिक्षा दी जाती है, जिस का कोई पैसा नहीं लिया जाता. वे ट्रेनिंग लेने वाले को सामान बेचने वालों के पते भी देते हैं, जहां से वह सामान खरीद कर मधुमक्खीपालन का काम शुरू कर सकता?है.

प्रताप सिंह ने बताया कि उन का देशभर में जगहजगह मधुमक्खीपालन का काम चलता रहता है, जहां वे अपने लोगों के साथ सीखने वालों को भेजते हैं व उन्हें काम सिखाते?हैं. नवंबर से जनवरी तक सरसों की फसल का मौसम चल रहा होता है. इस दौरान देश के अनेक भागों में मधुमक्खीपालन से अच्छा पराग इकट्ठा होता है. जब देहरादून में फूलों की खेती होती है, तब उन की टीम वहां पहुंच जाती?है. इसी तरह से कभी आगरा, कभी अलीगढ़ कभी बुलंदशहर वगैरह में जा कर वे मधुमक्खीपालन का काम करते हैं. वे सालभर में तकरीबन 250 क्विंटल शहद की पैदावार करते?हैं.

प्रताप सिंह से जब पूछा गया कि आप किसानों के बागों में या कृषि फार्मों में जा कर मधुमक्खीपालन करने के लिए अपने बक्से लगाते हो, तो बदले में उन्हें क्या फायदा होता?है? इस के जवाब में उन्होंने बताया कि वे इस के बदले उन्हें पैसे देते?हैं. कई लोग ऐसे भी होते?हैं कि उन्हें घर बैठे ट्रेनिंग भी मिल जाती?है. कई दफा ऐसे इलाकों में, जहां फसल का उत्पादन कम होता?है, वहां के लोग उन्हें खुद ही मधुमक्खीपालन के लिए बुलाते?हैं और सहयोग करते?हैं.

कई दफा वे लोग पैसे भी देते हैं, क्योंकि मधुमक्खीपालन में नर और मादा के संपर्क में आने से मक्खियां जब जगहजगह फूलों पर बैठती?हैं तो फसल की पैदावार में 10 से 30 फीसदी का इजाफा भी होता?है. प्रताप सिंह ने बताया कि उन्होंने मधुमक्खीपालन 1996 में शुरू किया था और दिल्ली विकास प्राधिकरण की सरकारी नौकरी छोड़ दी थी. वे अपने 20 सालों के इस अनुभव को लोगों में बांटना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि लोग उन के पास आएं और पूरा प्रशिक्षण ले कर अपना काम शुरू करें. अगर मधुमक्खीपालन का काम लगन और मेहनत से किया जाए, तो न सिर्फ इस से आमदनी बढ़ेगी, बल्कि गांव के लोगों की आर्थिक दशा भी सुधरेगी और बेरोजगारी दूर होगी. मधुमक्खीपालन से जुड़ी ट्रेनिंग और दूसरी जानकारी के लिए किसान प्रताप सिंह के मोबाइल नंबरों 09210829294, 09811303023, 07838690008 पर बात कर सकते?हैं.

भारत में मधुमक्खियों की ये खास प्रजातियां पाई जाती?हैं:

सारंग मौन : इस प्रजाति की मधुमक्खियां मकानों, चट्टानों, ऊंचे पेड़ों पर बड़े आकार के छत्ते बनाती हैं. इस प्रजाति को मौन ग्रहों में नहीं पाला जाता. भारत में 60 फीसदी शहद इसी प्रजाति से मिलता?है.

भारतीय मौन : ये मधुमक्खियां पेड़ों के खोखले तनों, पहाड़ों की दीवारों की दरारों, खाली पेटियों वगैरह में अनेक छत्ते बनाती?हैं. इस प्रजाति को मौनग्रहों में भी पाला जा सकता है. इस प्रजाति को घर छोड़ने की आदत भी होती?है. ये अपने भोजन व बच्चों को छोड़ कर भी चली जाती हैं.

छोटी मौन : इस प्रजाति की मधुमक्खियों में भी घर छोड़ने की आदत होती है. इन्हें भी बक्सों में नहीं पाला जा सकता. छत्ता छोड़ते समय ये पराग व शहद ढो कर ले जाती हैं. इन के शहद में खास सुगंध होती?है, जिस से शहद महंगा बिकता है.

मधुमक्खी के हर परिवार में 3 तरह की मक्खियां होती हैं, रानी मक्खी, कमेरिया मक्खी व नर मक्खी. परिवार में रानी मक्खी 1 ही होती है, जो आकार में सब से बड़ी होती है. रानी अपने जीवन में 1 ही बार संभोग करती है. तीनों प्रकार की मक्खियां एकजुट हो कर काम करती हैं. रानी मक्खी का मुख्य काम अंडे देना, नर मक्खी का काम रानी मक्खी को गर्भित करना और कमेरियों का काम पराग इकट्ठा करना है.

यूरोपियन मौन : यह प्रजाति यूरोप, अमेरिका व आस्ट्रेलिया में पाई जाती है. इसे बक्सों में पाला जा सकता है. इस की इटेलियन उपप्रजाति मधुमक्खीपालन और शहद उत्पादन के लिए सर्वोत्तम मानी गई है. इस नस्ल की शहद उत्पादन कूवत औसतन 30 से 40 किलोग्राम और अधिकतम 200 किलोग्राम प्रति वंश होती है.

अब SMS से मिलेगी TDS कटने की जानकारी

नौकरीपेशा लोगों को केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने एक नई सुविधा दी है. उनकी सैलरी से एंप्‍लॉयर ने कितनी टीडीएस काटी है, इसकी जानकारी अब एसएमएस से मिलेगी. सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सीबीडीटी कार्यालय पर इस सुविधा की शुरुआत की.

अब मिलेंगी ये सुविधाएं

– कर्मचारियों को एसएमएस से मिलेगी टैक्‍स डिडक्‍शन की सूचना.

– यह सूचना प्रत्‍येक तिमाही सीबीडीटी की तरफ से दी जाएगी.

– कई बार एंप्‍लॉयर कर्मचारियों की टैक्‍स देनदारी से ज्‍यादा पैसे काट लेती हैं.

– इसका पता कर्मचारी को तब चलता है जब अपना इनकम टैक्‍स रिटर्न फाइल करने जाता है.

टीडीएस काट कर जमा न करवाने वाली कंपनियों पर लगेगा लगाम

– कुछ ऐसे मामले भी सामने आए कि कंपनी ने टीडीएस तो काटा लेकिन उसे जमा नहीं कराया.

– ऐसे ही एक मामले में किंगफिशर के कर्मचारियों को डिफॉल्‍टर घोषित कर दिया गया था.

– उनके टीडीएस जमा नहीं करवाए गए थे जबकि कंपनी ने सैलरी से कटौती की थी.

– अब कर्मचारियों को इस बात की जानकारी हर तिमाही मिलती रहेगी कि उनका टीडीएस कितना कटा. 

कोलकाता में ‘आमी’ की शूटिंग शुरू

अभिनेत्री विद्या बालन का कोलकता से बहुत ही करीबी संबंध रहा  है, विद्या ने अपने करियर की पहली फिल्म परिणीता  की शूटिंग कोलकाता में ही की थी, इतना ही नहीं उनकी अब तक की हिट फिल्मों का कनेक्शन कहीं न कहीं से कोलकाता से जुड़ा हुआ है.

‘कहानी’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की शूटिंग  कोलकाता में ही की गयी थी. हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘तीन’ की शूटिंग कोलकाता के चन्दन नगर में की गयी थी. और अब ‘कहानी 2’ की शूटिंग कालिंपोंग में की गयी, और उनकी आगामी फिल्म ‘बेगम जान’ के कुछ  भाग की शूटिंग वेस्ट बैंगोल के बोडर  पतजोर पर की गयी.

विद्या बालन अब मलयाली कवयित्री कमला दास की  बायोपिक फिल्म ‘आमी’ में नज़र आएंगी और इस मलयालम बायोपिक फिल्म के लिए विद्या अब एक बार फिर कोलकाता लौटेंगी, जहां पर इस बायोपिक फिल्म का ज्यादातर हिस्सा शूट किया जायेगा. कोलकाता हमेशा से ही विद्या के लिए लकी रहा है.

इस बारे में विद्या बालन का कहना है कि मुझे लगता है की मैं अपने पिछले जन्म में ज़रूर बंगाली ही रहूंगी. भले मैंने इस शहर में जन्म नहीं लिया है, पर मैं इस शहर को बखूबी जानती हूं.

फिल्म  ‘डर्टी  पिक्चर’  में  अपने  उत्कृष्ट अभिनय  के  लिए  राष्ट्रीय  पुरस्कार  जीतने  के  बाद  विद्या  बालन  एक  बार  फिर कॉन्ट्रोवर्शियल  लेखिका कमला  दास की बाइलिंगुअल  फिल्म  में बोल्ड  अवतार  में  नज़र  आएंगी.

कमला एक पुरस्कार विजेता विवादस्पद लेखिका थीं, जिनका 2009 में 75 साल की उम्र में निधन हो गया. 1999 में इस्लाम धर्म को अपनाने के फैसले के लिए उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.

पपीते के कीड़ों व रोगों की रोकथाम

भारत दुनिया में सब से ज्यादा पपीता उगाने वाला देश है. देश में पपीते की खेती करीब 73.7 हेक्टेयर रकबे में होती है और उत्पादन 25.90 लाख टन है. पपीते के पेड़ों में कई प्रकार की बीमारियां हो जाती हैं. एक बार पेड़ पर कीटों का आक्रमण होने पर बीमारियां होने लगती हैं. मौसम में नमी के ज्यादा व कम होने से कई बीमारियों का असर बढ़ जाता है. पपीते के पेड़ को ज्यादा नमी नुकसान पहुंचाती है व मिट्टी या मौसम में नमी बढ़ने से पेड़ रोगों का शिकार होने लगता है. 

आक का टिड्डा

ये कीड़े पीले रंग के होते हैं. इन के सिर व वक्ष पर नीलेहरे रंग की और पेट पर नीचे काले रंग की चौड़ाई में धारियां पाई जाती हैं. टिड्डे की 2 पीढि़यां होती हैं, जिन में एक कम समय की और दूसरी ज्यादा समय वाली पाई जाती  हैं. कम समय वाली पीढ़ी जून से अगस्त तक पाई जाती है. इस में अंडे 1 महीने बाद ही फूट जाते हैं और बच्चे 2 महीने में ही पूरी तरह बड़े हो जाते हैं. ज्यादा समय वाली पीढ़ी में मादा सितंबर महीने में अंडे देती है, जो निष्क्रिय अवस्था में मार्च तक पड़े रहते हैं. ये मार्च के आखिर तक या अप्रैल के शुरू में फूटते हैं. इन से जो बच्चे निकलते हैं, वे ढाई महीने में पूरी तरह बड़े हो जाते हैं और संगम शुरू कर देते हैं. इन का मैथुन लगभग 5 से 7 घंटे तक चलता है. मैथुन के 25 से 30 दिनों बाद मादा अंडे देती है. ये अंडे जमीन के नीचे 18 से 20 सेंटीमीटर की गहराई पर 145 से 170 तक के समूहों में देते हैं. ये समूह चक्र के रूप में होते हैं और आपस में चिपकने वाले स्राव से जुड़े रहते हैं.

इस कीट के बच्चे व बड़े दोनों ही पपीते की पत्तियों को अपने काटने व चुभाने वाले अंगों से काट कर नुकसान पहुंचाते हैं. ये एक पेड़ पर काफी संख्या में इकट्ठा रहते हैं और पत्तियों को कुतर कर खाते हैं. ये कीट कभीकभी छोटे पेड़ों की पत्तियों को पूरी तरह नुकसान पहुंचाते हैं. इन के प्रकोप की वजह से पौधों की बढ़वार रुक जाती है. कभीकभी वे मर भी जाते हैं.

रोकथाम

* चूंकि मादा खेतों की डोलों व बंजर जमीन में अंडे देती है, लिहाजा  इन को मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर खत्म कर देना चाहिए.

* निम्फ अंडों से निकलने के बाद डोलों पर उगी हुई घास खाते हैं. इसलिए डोलों पर 5 फीसदी या 10 बीएचसी की धूल का बुरकाव करना चाहिए.

* अगर पेड़ों पर इस टिड्डे का प्रकोप हो गया हो तो क्लोरडेन 0.05 या मैलाथियान 0.1 फीसदी का छिड़काव करना चाहिए.

फलवेधक मक्खियां

इस की दोनों जातियां सारे भारत में पाई जाती हैं. इन में से डैकस डाडवर्सस पपीते के फूलों पर बड़ी संख्या में पाई जाती हैं. हालांकि फलवेधक मक्खियों में इतने लंबे अंग नहीं होते, जो पपीते के फल के छिलके के नीचे अंडे दे सकें लेकिन डैकस कुकररबिटी की इल्लियां इस के पके हुए फलों में पाई गई हैं. यह पपीते का एक मामूली कीट है. कच्चे व अधपके फलों में इस का प्रकोप नहीं होता. केवल पके हुए फलों को ही इस से नुकसान पहुंचता है.

इस कीड़े के मैगट ही नुकसान पहुंचाते हैं. मादा पके हुए फलों के अंदर उन के छिलके के नीचे अंडे देती है. ये अंडे 2 से 3 दिनों में फूट जाते हैं. उन से निकले मैगट फलों के गूदे को खा कर उन्हें बेकार कर देते हैं.

रोकथाम

* सर्दियों में मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर के मिट्टी पलट देनी चाहिए. इस से मक्खी की कोकुन अवस्था खत्म हो जाती है.

* प्रौढ़ मक्खी को चारा प्रलोभन (कार्बोरिल 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में  0.1 फीसदी प्रोटीन हाइड्रोजाइलेट या शीरे के घोल का छिड़काव) से आकर्षित कर के मारा जा सकता है.

* मिथाइल यूजिनोल 0.1 फीसदी, मैलाथियान 0.1 फीसदी, व एल्कोहल से बने ट्रैप को बागों में पेड़ पर लटकाएं, ताकि नर मक्खी ट्रैप में आकर्षित हो कर मर जाए.

चैंपा

चैंपा पत्तियों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है. इस के निम्फ व वयस्क दोनों ही नुकसानदायक हैं. रस चूसने के साथसाथ ये कीड़े पपीते में विषाणु जनित रोगों को फैलाने में मदद करते हैं. इन रोगों के प्रकोप से पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है और फूल व फल आने बंद हो जाते हैं. ये कीट हवा से भी बहुत दूर तक फैल जाते हैं.

रोकथाम

*  इस का प्रकोप होने पर चिपचिपे जाल का इस्तेमाल करें, जिस से कीट ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं.

* परभक्षी काक्सीनेलिड्स , सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर 50,000- 1,00,000 अंडे या सूंडि़यां प्रति हेक्टेयर की दर से छोड़ें.

* नीम का अर्क 5 फीसदी या 1.25 लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें.

* बीटी का 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* जरूरत  होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या डाइमेथोएट 30 ईसी या मिथाइल डेमीटान 25 ईसी 1 लीटर का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सफेद मक्खी

यह मक्खी पपीते के अलावा बहुत सी दूसरी फसलों पर भी पाई जाती हैं. यह कपास को  सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. कपास के अलावा सोयाबीन, उड़द, मूंग, कहवा, तंबाकू व आलू को भी यह कीट नुकसान पहुंचाता है. ये कीड़े सर्दियों में ज्यादा तादाद में दिखाई देते हैं. मादा पत्तियों की निचली सतह पर 100 से 150 अंडे देती है. इन से छोटेछोटे निम्फ निकलते हैं. ये निम्फ पत्तियों में अपने मुखांग चुभा कर रस चूसने लगते हैं और 3 बार निर्मोचन कर के कोकुन में बदल जाते हैं. कोकुन मौसम के अनुसार 9 दिनों से 2 महीने तक होती है. गरमियों में इस का जीवनचक्र करीब 2 महीने में पूरा हो जाता है.

इस कीड़े के निम्फ व वयस्क दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं. इस के निम्फ शल्क

कीट की तरह लगते हैं. ये पत्तियों से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं. वयस्क कीड़े रस चूसने के अलावा पपीते के पेड़ में विषाणु रोग फैलाते हैं, जिस से पत्तियां मुड़ जाती हैं. पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है. उन में फूल व फल बहुत कम आते हैं. छोटे पेड़ों में प्रकोप होने पर उन में फल बिलकुल नहीं आते हैं.

रोकथाम

* पीले चिपचिपे 12 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* क्राइसोपरला कार्निया के 50,000 से 1,00,000 अंडे प्रति हेक्टेयर की दर से छोड़ें.

* कीट लगे पौधों पर नीम का तेल 5 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी या मछली रोसिन सोप 25 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कें

* इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी 1 मिलीलीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

माइट

कीट लगे पेड़ों की पत्तियों पर पीलेपीले धब्बे दिखाई देते हैं. पत्तियां सिकुड़ जाती हैं. पत्तियों की निचली सतह पर जाला पाया जाता है और उस जाले के नीचे माइट के छोटेछोटे निम्फ व वयस्क हजारों की संख्या में रहते हैं. ये पपीते की पत्तियों से रस चूसते रहते हैं. निम्फ 0.2 मिलीमीटर लंबे होते हैं. इन के 3 जोड़ी टांगें पाई जाती हैं. वयस्क अंडाकार लालिमा लिए हुए हरे रंग के होते हैं. नर 0.3 से 0.4 मिलीमीटर लंबे होते हैं और मादा 0.4 से 0.5 मिलीमीटर लंबी होती है.

निम्फ व वयस्क दोनों ही पपीते को नुकसान पहुंचाते हैं. ये छोटे पेड़ों को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन बड़े पेड़ों पर भी इन का प्रकोप होता है. निम्फ व वयस्क पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. पेड़ बीमार से दिखाई पड़ते हैं. उन की बढ़वार रुक जाती है. छोटे पेड़ों पर प्रकोप होने पर वे मर जाते हैं. बड़े पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है. इस वजह से फलों की संख्या कम हो जाती है और फल आकार में छोटे लगते हैं.

रोकथाम

* कीट लगी पत्तियों को तोड़ कर फौरन जला देना चाहिए.

* ज्यादा प्रकोप होने पर गंधक की धूल का बुरकाव करना चाहिए या नियंबनशील गंधक के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

* क्लोरफेनामिडीन डाइकोफोल या राथेन के 0.05 घोल का छिड़काव करना चाहिए.

* आक्सीडिमेटान थायोमिटान पैराथियान फास्फेमिडान या डाइक्लोरोवोस 0.035 के घोल का छिड़काव भी फायदेमंद होता है.

सूत्रकृमि

वयस्क मादा नाशपाती की शक्ल की गोलाकार होती है. इस का अगला भाग पतला और अलग सा मालूम  होता है. 1 मादा लगभग 250 से 300 अंडे देती है. ये अंडे एक चिपचिपे पदार्थ से निकलते हैं. अंडों के अंदर ही सूंडि़यां पहली निर्मोचन की अवस्था पार करती हैं. इन से दूसरी अवस्था की सूंडि़यां बनती हैं, जो मिट्टी के कणों के बीच रेंगती रहती हैं और सही परपोषी जड़ों से चिपट जाती हैं. ये जड़ों की बाहरी त्वचा को पार कर के ऊतकों में पहुंच जाती हैं. इन का लक्ष्य फ्लोएम ऊतक होते हैं. नेमाटोड की शोषण क्रिया से पेड़ के नए ऊतकों में तेजी से विभाजन होता है. उन की कोशिकाओं का आकार बढ़ जाता है और इस प्रकार ग्रंथिंयों का जन्म होता है. इन्हीं ग्रंथियों के अंदर नेमाटोड एक फसल से दूसरी फसल तक जिंदा रह कर शुरुआती हमला करते हैं.

नेमाटोड के असर से जड़गांठ रोग उत्पन्न होता है. इस के लगने से पेड़ मरते नहीं,

बल्कि गांठ पर अनेक रोगजनक और मृतजीवी कवकों व जीवाणुओं के हमले से जड़़ नष्ट होनी शुरू हो जाती है, जिस से पेड़ की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां छोटी व पीली पड़ जाती हैं. फल बहुत कम लगते हैं और कभीकभी पेड़ सूख जाते हैं.

रोकथाम

* परपोषी फसलों को लगातार एक ही खेत में लेने से इस नेमाटोड की संख्या बढ़ती है. इसलिए सही फसलचक्र अपना कर इस का प्रकोप कम किया जा सकता है

* गरमियों में खेत की 2-3 बार गहरी जुताई कर के मिट्टी को अच्छी तरह सुखाने से ये नष्ट हो जाते हैं.

* नेमाटोड का अधिक प्रकोप होने पर नेमाटोडनाशी का प्रयोग करना चाहिए. इस के लिए फ्यूराडान 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल रोपने से 3 हफ्ते पहले जमीन में इस्तेमाल करना चाहिए.

* मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को मिलाने से भी इस नेमाटोड की रोकथाम में काफी मदद मिलती है. लकड़ी का बुरादा, नीम या अरंडी की खली 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से फसल लगाने से 3 हफ्ते पहले खेत में मिलाने पर मूल ग्रंथियों की संख्या में काफी कमी हो जाती है.

तना सड़न

रोगी तने के निचले भाग की छाल जलीय हो जाती है. अनुकूल मौसम में जलीय चकत्ते आकार में बढ़ कर तने के चारों ओर फैल जाते हैं. पेड़ के ऊपर की पत्तियां मुरझा जाती हैं और उन का रंग पीला पड़ जाता है. पत्तियां समय से पहले ही गिर जाती हैं. तने के आधार के ऊतकों का विघटन हो जाने के कारण पूरा पेड़ आधार से टूट कर गिर जाता है.

रोकथाम

* पपीते के बगीचों में जल निकासी का सही इंतजाम होना जरूरी है. जिन  पेड़ों पर रोग का असर ज्यादा हो, उन्हें तुरंत ही जड़ से उखाड़ कर जला देना चाहिए.

* आधार से 60 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक तनों पर बोर्डो पेस्ट लगा कर तने के चारों तरफ मिट्टी में 6:6:50 सांद्रता वाले बोर्डो मिश्रण को 5 लीटर प्रति पेड़ डालने से रोग को रोका जा सकता है. ऐसा 3 बार जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में करना चाहिए.

फल गलन

रोग के लक्षण अधपके फलों पर छोटे गोल जलीय धब्बों के रूप में नजर आते हैं. समय के साथ ये धब्बे बढ़ने लगते हैं और आपस में मिल जाते हैं. ऊतकों के विघटन के कारण फल गलने लग जाते हैं.

रोकथाम

* 0.16 फीसदी ब्लाइटाक्स 50 के छिड़काव से रोग को काबू किया जा सकता है.

पत्ती सिकुड़ना

इस रोग से पत्तियां छोटी व झुर्रीदार हो जाती हैं. पत्तियों का बेडौल होना व उन की शिराओं का रंग पीला पड़ जाना रोग के सामान्य लक्षण हैं. रोगग्रस्त पत्तियां नीचे की तरफ मुड़ जाती हैं, जिस से वे उलटे प्याले की तरह दिखाई पड़ती हैं. विषाणु का प्रसार रस चूसने वाले कीटों जैसे चैंपा, सफेद मक्खी व थ्रिप्स तेला कीट के कारण होता है. ये कीड़े अपने चूसने वाले मुखांगों से पत्तियों का रस चूसते हैं.

रोकथाम

* इस से बचाव का सही तरीका सफेद मक्खियों की रोकथाम है.

* ग्रसित पेड़ों पर नीम का तेल

5 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी या मछली

रोसिन सोप 25 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी

की दर से छिड़कें.

* कीटों की तादाद बढ़ते ही मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमेथोएट 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी 1 मिलीमीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

चूर्णिल आसिता

यह रोग एक तरह के कवक से होता है. मंजरियों और नई पत्तियों पर सफेद या धूसर चूर्णिल वृद्धि दिखाई पड़ती है. रोग का संक्रमण मंजरियों से शुरू हो कर नीचे की ओर फूलों, नई पत्तियों व शाखाओं तक फैल जाता है. इस से प्रभावित भागों की बढ़वार रुक जाती है. फूल और पत्तियां गिर जाती हैं. अगर संक्रमण के पहले फल लग गए हों तो वे बिना पके ही गिर जाते हैं. फलों की तादाद में भारी कमी आ जाती है.

रोकथाम

* रोकथाम के लिए 0.05 से 0.1 फीसदी कैराथेन/0.1 फीसदी बाविस्टिन/0.1 फीसदी बेनोमिल/0.1 फीसदी कैलेक्जीन का छिड़काव करना फायदेमंद होता है.

* घुलनशील गंधक (0.2 फीसदी) नामक कवकनाशक दवाओं का घोल बना कर पहला छिड़काव जनवरी, दूसरा फरवरी के शुरू और तीसरा फरवरी के आखिर में करना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज

यह रोग कोलेटोट्राइकम कवक से होता है. पेड़ों की कोमल टहनियों, फलों और फूलों पर इस रोग को देखा जा सकता है. पत्तियों पर भूरे या काले, गोल या दूसरे आकार के धब्बे पाए जाते हैं. रोग से पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे सिकुड़ जाती हैं. कभीकभी रोगग्रस्त ऊतक सूख कर गिर जाते हैं, जिस से पत्तियों में छेद दिखाई पड़ते हैं. संक्रमण से रोगी पत्तियां गिर जाती हैं. कच्चे फलों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं. धब्बों के नीचे का गूदा सख्त हो कर फट जाता है और आखिर में फल गिर जाते हैं. यह रोग मंजरी अंगमारी व फल सड़न के रूप में भी प्रकट होता है.

रोकथाम

* रोगी टहनियों की छंटाई कर के उन्हें गिरी हुई पत्तियों के साथ जला देना चाहिए.

* पेड़ों पर कवकनाशी रसायनों जैसे कापर आक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी का छिड़काव कर देना चाहिए.

* रोगी पेड़ों पर 0.2 फीसदी ब्लाइटाक्स 50, फाइटलोन या बोर्डो मिश्रण (0.8 फीसदी) नामक दवाओं के घोल का फरवरी से मई के बीच 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए. बाविस्टीन (0.1 फीसदी) रोग को कम करने में कारगर साबित हुआ है.

जड़ सड़न

यह रोग नर्सरी में बीजांकुरों में होता है. यह भूमिगत जीवों पाइथियम फाइटोफथेरा फ्यूजेरियम व राइजोक्टोनिया वगैरह की वजह से होता है. इन का आक्रमण बीजों के अंकुरण के समय होता है. जैसे ही बीजांकुर बीज के बाहर आता है, इन के आक्रमण के कारण सड़ जाता है. यदि इन से  बच कर बीजांकुर जमीन के ऊपर आ जाता है, तो तने के जमीन के पास वाले भाग पर गीले भाग दिखाई पड़ते हैं, जिन में सड़न होने लगती है और बीजांकुर गिर जाते हैं. यह रोग काफी घातक होता है.

रोकथाम

* बीजों को एग्रोसान जीएन या केप्टान नामक दवा की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए.

* नर्सरी की मिट्टी को भी ऊपर बताई दवाओं के 0.2 फीसदी घोल से उपचारित करना चाहिए.

* अंकुरण के 5 से 7 दिनों बाद कापर आक्सीक्लोराइड या मैंकोजेब या मेटालेक्जिल की 2 ग्राम मात्रा का पानी में घोल बना कर जड़ों में डालें.

WTA रैंकिंग से हटाई गईं शारापोवा

रूस की महिला टेनिस स्टार मारिया शारापोवा को महिला टेनिस संघ (डब्ल्यूटीए) ने अपनी विश्व रैंकिंग से हटा दिया है. डब्ल्यूटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर इसकी घोषणा की गई. डोपिंग की दोषी पाए जाने के बाद प्रतिबंधित चल रहीं शारापोवा पिछले सप्ताह जारी विश्व रैंकिंग में 93वें पायदान पर थीं.

रैंकिंग से हटाई गईं शारापोवा

शारापोवा पर शुरू में दो साल का प्रतिबंध लगाया गया था. लेकिन विश्व की सबसे बड़ी खेल अदालत 'खेल पंचाट न्यायालय' (सीएएस) ने चार अक्टूबर को उन पर लगा प्रतिबंध घटाकर 15 महीने का कर दिया. अब शारापोवा अगले साल 26 अप्रैल को प्रतिबंध पूरा कर कोर्ट पर वापसी कर सकेंगी.

लंदन ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं शारापोवा

प्रतिबंध के कारण लंदन ओलंपिक 2012 में रजत पदक विजेता रहीं शारापोवा इसी वर्ष अगस्त में हुए रियो ओलंपिक 2016 में हिस्सा नहीं ले सकीं. शारापोवा दिसंबर में फ्रेंच ओपन विजेता स्पेन की गारबाइन मुगुरुजा के खिलाफ मेड्रिड में एक प्रदर्शनी मैच खेलने वाली हैं.

शारापोवा को कई मेजर टूर्नामेंटों से दूर रहना होगा

इस दौरान शारापोवा को कई मेजर टूर्नामेंटों से दूर रहना पड़ेगा और जब वह वापसी करेंगी उसके बाद फ्रेंच ओपन पहला ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट पड़ेगा. अगले साल फ्रेंच ओपन 28 मई से 11 जून के बीच होना है. हालांकि शारापोवा के पास इतना समय नहीं होगा कि वह फ्रेंच ओपन में हिस्सा लेने के लिए जरूरी रेटिंग अंक हासिल कर सकें. ऐसे में हो सकता है कि उन्हें वाइल्ड कार्ड के जरिए फ्रेंच ओपन-2017 में प्रवेश दिया जाए.

सोलर पावर फैंसिंग से करें फसल सुरक्षा

फसल बोने से ले कर पैदावार लेने तक किसानों को तमाम परेशानियों से जूझना पड़ता है. चाहे बिजलीपानी की समस्या हो या फसल में कीटबीमारी लगने या फिर मौसम की मार, तो कभी सूखा या कभी बाढ़. जंगली जानवरों से भी फसल को बचाना पड़ता है. ऐसे कई इलाके हैं, जहां जंगली जानवर फसल को रौंद कर खराब कर देते हैं. ये जंगली जानवर झुंड में आते हैं और खड़ी फसल को बरबाद कर जाते हैं. कुछ खाते हैं, तो कुछ बिगाड़ जाते हैं. इन में नीलगाय, जंगली सूअर, बंदर, हाथी जैसे अनेक जंगली जानवर हैं, जिन से फसल बचाव के लिए किसानों को अनेक तरीके अपनाने पड़ते हैं. ऐसे तरीकों में खेत के चारों तरफ कंटीले तार लगाना, झाडि़यां लगाना, गड्ढे खोदना या दीवार बनाना खास हैं. इन तरीकों से कुछ राहत तो मिलती है, लेकिन ये पूरी तरह से कारगर नहीं हैं. ऐसे में खेतों के चारों तरफ सोलर पावर फैंसिंग लगाना अच्छा उपाय है. यह किफायती और सुरक्षित भी है, क्योंकि पावर फैंसिंग से जानवरों को केवल तेज झटका लगता है. इस में जानवरों के मरने का कोई खतरा नहीं है. सोलर फैंसिंग के लिए खेतों के चारों ओर खंभे लगाए जाते हैं, इन पर तारों की बाड़ लगाई जाती है, जो अनेक लाइनों में हो सकती है. जानवरों की ऊंचाई के हिसाब से भी बाड़ लगाई जाती है. जैसे नीलगाय व सूअर के लिए 5 तार लगाए जाते हैं. सोलर पावर फैंसिंग में सोलर प्लेट लगाई जाती है, जिस से बैटरी चार्ज होती है. बैटरी को पावर फेज कंट्रोलर से जोड़ा जाता है. फिर उस के द्वारा तारों में डीसी करेंट छोड़ा जाता है, जो कि बहुत ही कम समय के लिए आताजाता रहता है. तार के संपर्क में आने पर जानवरों को तेज झटका लगता है और वे डर कर वहां से भाग जाते हैं. जानवर इस करंट से मरते नहीं हैं.

एक बार बैटरी चार्ज होने पर 48 घंटे तक मशीन चालू रहती है. इसलिए कभीकभार मौसम खराब होने पर सूरज की रोशनी सौर पैनल पर नहीं पहुंच पाती है, तो भी कोई समस्या नहीं है. दिन में ज्यादातर किसान खेतों की खुद ही देखरेख कर सकते हैं और रात के समय सोलर पावर मशीन को चालू कर सकते हैं.

चूंकि मशीन 1 बार चार्ज होने पर 48 घंटे तक चलती है, तो उसे आप 4 रातों तक इस्तेमाल कर सकते हैं. बैटरी लगभग 2 साल तक चलती है, जो 12 वोल्ट की होती है. अगर किफायत से चलाई जाए, तो ज्यादा भी चल सकेगी. उस के बाद बैटरी बदलने का खर्च भी महज 700-800 रुपए ही आता है.

सोलर यूनिक सोल्यूशन

सोलर पावर फैंसिंग के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए सोलर यूनिकसोल्यूशन, वर्धा, महाराष्ट्र के आशीष कुमार से बात की. उन्होंने बताया कि वे 1 फुट से 6 फुट की ऊंचाई तक के जानवरों से फसल सुरक्षा के लिए फैंसिंग करते?हैं. जिस इलाके में जैसे जानवरों का खतरा होता है, उसी ऊंचाई के हिसाब से सोलर फैंसिंग की जाती है. बाड़ लगाते समय वे सिल्वर के मजबूत तारों का इस्तेमाल करते हैं, जो जल्दी से टूटते नहीं और 10-15 सालों तक आसानी से चलते हैं. वे 12 वोल्ट की टाटा कंपनी की बैटरी और 20 वाट से 100 वाट तक का सोलर पैनल इस्तेमाल करते हैं. इन्हें फैंसिंग के अनुसार लगाया जाता है. वे ज्यादातर ऐनरगाइजर ई 100 का इस्तेमाल करते हैं. फैंसिंग करने के लिए लकड़ी या सीमेंट के खंभे लगाए जाते हैं. खंभे 1 से 2 फुट की गहराई में खोद कर लगाए जाते हैं. इन खंभों के सहारे ही तारों को बाड़ के रूप में लगाया जाता है.

आशीष कुमार ने बताया कि उन की कंपनी द्वारा लगाई गई सोलर पावर फैंसिंग का खर्चा 1 एकड़ खेत का तकरीबन 1 लाख रुपए, 5 एकड़ खेत का 2 लाख रुपए और 10 एकड़ खेत का 3 लाख रुपए आता है. सोलर का 1 यूनिट 20 से 25 एकड़ तक का एरिया कवर कर सकता है. सोलर फैंसिंग लगाना बहुत ही आसान है और यह लंबे समय तक चलने वाला सिस्टम है. किसान खुद भी फैंसिंग तार लगा सकते हैं. इस बारे में कंपनी के लोग किसानों को जानकारी दे कर अच्छी तरह समझा देते हैं. सोलर पावर सिस्टम लगवाने या अधिक जानकारी के लिए आशीष कुमार के मोबाइल नंबर 08055159047 पर बात कर सकते है. 

 

 

 

 

खास बातें

* अगर कोई चोर या जानवर खेत में बारबार घुसने की कोशिश करेगा, तो उस में लगा अलार्म भी बजेगा. इसे सुन कर किसान तुरंत चौकन्ना हो जाएगा. * लगाई गई फैंसिंग के नीचे उगे पेड़पौधों को काटते रहें, नहीं तो उन के छूने से भी बारबार अलार्म बजेगा और बैटरी जल्दी डिस्चार्ज हो जाएगी.

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