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दमदार वाई-फाई कनेक्शन से खुद जुड़ जाएगा फोन

सार्वजनिक स्थलों पर एक नहीं, कई वाई-फाई कनेक्शन मौजूद होते हैं. इनमें से कुछ कनेक्शन के सिग्नल एक जगह पर बेहद दमदार तो दूसरे स्थान पर काफी कमजोर हो सकते हैं. सबसे दमदार सिग्नल पर इंटरनेट सर्फिंग का लुत्फ उठाने के लिए यूजर को फोन की सेटिंग में जाकर बार-बार वाई-फाई नेटवर्क बदलना पड़ता है. गूगल प्लेस्टोर पर उपलब्ध कुछ एप इस झंझट से छुटकारा दिला सकते हैं. ये फोन को खुद ब-खुद क्षेत्र में मौजूद सबसे दमदार वाई-फाई नेटवर्क से जोड़ देते हैं.

वाई-फाई स्विचर

यह एप किसी इलाके में मौजूद सबसे दमदार वाई-फाई सिग्नल की पहचान में सक्षम है. यूजर जब एक जगह से दूसरी जगह पर जाता है तो उसके फोन में नए स्थान पर उपलब्ध सबसे दमदार वाई-फाई नेटवर्क अपने आप काम करने लगता है. हालांकि इसके लिए जरूरी है कि यूजर ने संबंधित वाईफाई कनेक्शन का पासवर्ड फोन में सेव कर रखा हो. Wifi Switcher खोलते ही स्क्रीन पर वाईफाई नेटवर्क और उनके नाम दिखाई देते हैं. इनमें से उन नेटवर्क का चयन कर लें जिनके पासवर्ड आपको मालूम हैं. फिर पासवर्ड डालते ही ये ऑटो-कनेक्ट होने के लिए सेट हो जाएंगे. ‘वाई-फाई स्विचर’ में इंटरनेट कनेक्शन की रेंज तय करने का विकल्प भी मौजूद है. तय रेंज से कम क्षमता वाले वाई-फाई कनेक्शन खुद ब-खुद फोन से डिसकनेक्ट हो जाते हैं.

स्विफी : ऑटो स्विच बेस्ट

‘वाईफाई स्विचर’ की तर्ज पर काम करने वाला रहकाके SWIFI | Auto Switch Best WiFi भी इलाके में मौजूद सबसे मजबूत वाई-फाई नेटवर्क से जुड़ने की सुविधा देता है, वो भी सेटिंग में कोई बदलाव किए बगैर. एप में सिग्नल को लेकर अपनी प्राथमिकताएं तय करने का विकल्प भी उपलब्ध है. मिसाल के तौर पर अगर यूजर को 4 गीगाहर्ट्ज की स्पीड पर इंटरनेट सर्फिंग बेहतर लगती है तो वे एप को कुछ इस तरह से सेट कर सकेंगे कि फोन इलाके में मौजूद 4 गीगाहट्र्ज या उससे अधिक क्षमता वाले सिग्नल से ही जुड़े. ‘स्विफी-ऑटो स्विच बेस्ट वाईफाई’ में वाई-फाई सिग्नल का आईपी एड्रेस भी देखा जा सकता है. यह तेजी से एक वाईफाई सिग्नल को छोड़ दूसरे वाईफाई सिग्नल से जुड़ जाता है.

योगेश्वर की लंदन ओलंपिक में सिल्वर की उम्मीद टूटी

भारतीय पहलवान योगेश्वर दत्त के लंदन ओलंपिक में जीते गये ब्रॉन्ज मेडल के सिल्वर में बदलने की संभावना लगभग समाप्त हो गयी है. दूसरी तरफ भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) ने दावा किया कि उसे इस बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 2012 खेलों में पुरूष फ्रीस्टाइल में 60 किग्रा भार वर्ग में सिल्वर मेडल जीतने वाले रूस के स्वर्गीय पहलवान बेसिक कुदुकोव के खिलाफ जांच समाप्त करने का फैसला किया है जिससे ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले योगेश्वर की सिल्वर हासिल करने की उम्मीदें भी समाप्त हो गयी.

कुदुकोव की 2013 में कार दुर्घटना में मौत हो गयी थी. उनके पुराने नमूने का वाडा ने कुछ दिन पहले फिर से टेस्ट किया था जो प्रतिबंधित स्टेरायड के सेवन के लिये पॉजीटिव पाया गया था.

रूसी कुश्ती महासंघ ने अपने बयान में दावा किया कि 2012 खेलों के उनके नमूने का इस साल फिर से टेस्ट किया गया और वह स्टेरॉयड टुरिनबोल के लिये पॉजीटिव पाया गया. उनका मामला तीन सदस्यीय आईओसी अनुशासन आयोग को सौंपा गया लेकिन समिति ने कुदुकोव के खिलाफ जांच खत्म करने का फैसला किया.

विश्व कुश्ती संघ के उपाध्यक्ष जियोग्री ब्रयुसोव ने कहा, ‘‘अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति बेसिक कुदुकोव को 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों में जीत गये रजत पदक से वंचित नहीं करेगी.’’

उन्होंने कहा, ‘‘रियो ओलंपिक से पहले हमें बताया गया था कि कुदुकोव का टेस्ट प्रतिबंधित दवा के लिये पॉजीटिव पाया गया है और योगेश्वर का ब्रॉन्ज मेडल सिल्वर में बदलने से पहले उनके 2012 लंदन ओलंपिक के नमूने का टेस्ट किया जाएगा. लेकिन इसके बाद हमें अब तक इस बारे में कोई सूचना नहीं मिली है.’’

आईओसी ने 2008 बीजिंग ओलंपिक और 2012 लंदन ओलंपिक के अलावा कई अन्य अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में लिये गये नमूनों का बेहतर तकनीक से फिर से टेस्ट करवाया ताकि उनमें प्रतिबंधित पदार्थों का पता लगाया जा सके.

जब यह खबर आयी थी कि कुदुकोव का टेस्ट पॉजीटिव पाया गया है और उनका सिल्वर योगेश्वर को मिलेगा तो भारतीय पहलवान ने यह पदक स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था और कहा था कि पदक इस स्वर्गीय पहलवान के परिजनों के पास ही रहना चाहिए. योगेश्वर ने ट्वीट किया था, ‘‘यदि संभव हो तो उन्हें पदक रखने की अनुमति मिलनी चाहिए. मेरे लिये मानवता सर्वोपरि है.’’

सेटिंग्स बदल कर बढ़ाएं बैटरी की लाइफ

स्मार्टफोन आज के समय की जरुरत बन चुकी है. जब भी हम फोन लेने जाते हैं तो कई फीचर्स को परखते हैं. कई लोग सबसे पहले फोन की बैटरी देखते हैं. जिस फोन की बैटरी अच्छी होती है वो खरीद लेते हैं. अच्छी बैटरी का फोन लेने के बाद भी फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है. ऐसे में हम आपको कुछ सेटिंग्स बताने जा रहे हैं जिससे आप अपने फोन की बैटरी को जल्दी खत्म होने से बचा सकते हैं. तो चलिए आपको इन सेटिंग्स के बारे में बता दें.

स्क्रीन टाइमआउट

सेट करने का मतलब ये है कि आप जब मोबाइल का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो खुद-ब-खुद स्क्रीन लॉक हो जाएगी. अगर आप इस सेटिंग को फोन में कर लेते हैं तो आपके फोन की बैटरी जल्दी खत्म नहीं होगी. आप इसमें खुद से सेलेक्ट कर सकते हैं कि कितनी सेकेंड/मिनट बाद स्क्रीन ऑफ हो जानी चाहिए.

जीपीएस:

आजकल जीपीएस का प्रयोग ज्यादा किया जाने लगा है. इससे लोकेशन का पता लगाया जा सकता है. अगर आप जीपीएस का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो आप इसे ऑफर कर दें. इसके लगातार ऑन रहने से ये फोन की बैटरी को ज्यादा खर्च करता है.

पॉवर सेविंग मोड्स:

ज्यादातर स्मार्टफोन्स में पावर सेविंग मोड्स ऑप्शन डिफॉल्ट आने लगा है अगर आपके फोन में ऑप्शन नहीं है देर न करें इसे जल्द गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लें और इसे हमेशा ऑन रखें.

वर्ल्ड बैंक की ताजा रैंकिंग पर भारत ने जताई निराशा

विश्व बैंक की व्यापार सुगमता रैकिंग में भारत की स्थिति में कोई सुधार नहीं किए जाने पर निराशा जताते हुए भारत सरकार ने कहा कि इस रपट में सरकार द्वारा उठाए गए 12 प्रमुख सुधारों पर कोई विचार नहीं किया गया है. विश्वबैंक की व्यापार सुगमता सूची में भारत 130वें पायदान पर है.

विश्वबैंक की ताजा ‘डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में भारत की स्थिति में पिछले साल के मुकाबले कोई सुधार नहीं हुआ है. विभिन्न मानदंडों के आधार पर भारत 190 देशों में 130वें पायदान पर था. हालांकि पिछले साल की रैंकिंग को संशोधित कर 131वां कर दिया गया है. इस लिहाज से देश ने एक पायदान का सुधार किया है.

औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के सचिव रमेश अभिषेक ने कहा कि दर्जन भर महत्वपूर्ण सुधार सरकार ने किए हैं जिनमें दिवाला संहिता, जीएसटी, इमारत योजना की मंजूरी के लिए एकल खिड़की प्रणाली, ऑनलाइन कर्मचारी राज्य बीमा आयोग और भविष्य निधि पंजीकरण जैसे सुधार शामिल हैं. इन सभी पर विश्वबैंक ने इस साल विचार नहीं किया है.

विभाग ने कहा कि वह सुधारों पर आगे काम जारी रखेगा. इसके लिए बाहरी एजेंसियों की नियुक्ति, हितधारकों से बातचीत इत्यादि शामिल है. उन्होंने कहा कि हम विश्वबैंक के साथ मुलाकात जारी रखेंगे और उन्हें इस बात के लिए राजी करेंगे कि हमारे द्वारा किए गए इन 12 प्रमुख सुधारों को अपनी रपट में शामिल करें. सरकार व्यापार सुगमता के लिये प्रयास कर रही है और उसका लक्ष्य देश को शीर्ष 50 में लाना है.

एकजुट हो मोदी को जगाएं किसान: राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश सूबे के तमाम किसानों को जागरूक करने के इरादे से मुहिम पर निकले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आजकल पूरे जोश में नजर आ रहे हैं. राहुल अपनी ‘27 साल यूपी बेहाल’ यात्रा के तहत करीब 225 किलोमीटर की दूरी तय कर के पिछले दिनों खीरी से बरेली पहुंचे. खीरी के रोड शो और नुक्कड़ सभा के बाद मितौली, मोहम्मदी, पुवांया, निगाही और बीसलपुर की सभाओं में राहुल गांधी ने किसानों को आगाह किया कि गाय को मुद्दा बना कर उन्हें धर्मों और जातियों के नाम पर बांट रहे लोगों से वे सावधान रहें. ऐसे लोग बहुत घातक होते हैं.

राहुल गांधी ने जोर देते हुए कहा कि अपने हकों के मुद्दों को ले कर किसानों को एकजुट होने की जरूरत है, ताकि प्रधानमंत्री मोदी और उन की सरकार को जगाया जा सके.

उन्होंने कहा कि आपस में मिल कर एकजुट हुए बगैर किसानों का भला होने से रहा. जब किसान मिलजुल कर सरकार को जगाने की कोशिश करेंगे तभी कुछ हासिल हो सकेगा. किसानों द्वारा मिलजुल कर कोशिश करने का नतीजा जरूर अच्छा निकलेगा. राहुल गांधी ने गन्ना मूल्य के बकाया भुगतान के लिए बारबार आंदोलन कर रहे खीरी और रुहेलखंड के किसानों के दर्द को महसूस करते हुए कहा कि जब आप लोग एकजुट होंगे तो आप को बकाया भी मिलेगा और आने वाले वक्त में वाजिब दाम भी आप को सरकार की तरफ से मिलेंगे और आपसी समस्याएं दूर होंगी.

पुवांया की खाट सभा में राहुल ने कहा कि गाय और धर्म की बात करने वाले सत्ता के दलाल हैं. ये इन मुद्दों का इस्तेमाल चुनाव के लिए करते हैं. ऐसे लोग किसानों का क्या भला कर सकते हैं.

राहुल की तमाम सभाओं में उन का खास निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे. मसला खासतौर पर किसानों का ही था, लिहाजा उन्होंने मोदी सरकार?द्वारा जमीन अधिग्रहण अध्यादेश 3 बार सदन में लाए जाने और कांग्रेस द्वारा उस की खिलाफत का खासतौर पर जिक्र किया. राहुल ने किसानों के हुजूम को संबोधित करते हुए कहा कि अगर वे लोग इस कांग्रेस यात्रा के साथ हो जाएं तो मोदी और अखिलेश को किसानों की कर्जमाफी और गलत बिजली के बिलों की वापसी पर हस्ताक्षर करने की पड़ेंगे.

किसान बजट भी पेश किया जाए : राहुल गांधी

सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी जबतब अपने नएनए विचार जनता के सामने पेश करते रहते हैं. हाल ही में उन्होंने कहा कि आम बजट की तरह किसान बजट भी पेश किया जाना चाहिए.

राहुल ने कहा कि भारत किसानों का देश है, इस के बावजूद किसानों की हालत अच्छी नहीं है. लिहाजा जरूरी है कि किसानों का भी एक सालाना बजट हो. किसानों के लिए योजनाएं अलग से बननी चाहिए ताकि वे पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकें. ये तमाम बातें राहुल ने पिछले दिनों घाटमपुर में हुई खाटसभा के दौरान कहीं. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने रेल बजट को आम बजट में मर्ज (मिला दिया) कर दिया है, लेकिन इस बार से किसान बजट शुरू किया जाना चाहिए. किसान बजट से हर किसान को पता रहेगा कि केंद्र और सूबे की सरकारें उस के लिए क्या कर रही हैं. तेज चिलचिलाती घूप और गरमी से बेपरवाह राहुल गांधी ने कहा कि वे गांवगांव घूम कर किसानों के हालात की जानकारी ले रहे हैं.

राहुल ने कहा कि अभी तक की यात्रा से उन्हें यह पता चला है कि किसान कर्ज के भार से दबे हुए हैं और केंद्र की जुमलेबाजी में माहिर मोदी सरकार उद्योगपतियों के कर्ज माफ करने में ही जुटी हुई है.राहुल ने कहा कि अगर कांग्रेस को मौका मिला तो वह ऐसा हरगिज नहीं होने देगी. उन्होंने कहा कि वे किसानों की बदहाली की बात लोकसभा में भी उठाएंगे और सारी बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी रखेंगे.रहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री को किसानों की बातें सुननी ही पड़ेंगी और उन का समाधान भी निकालना होगा. अगर केंद्र सरकार उन की बात नहीं मानती है, तो मजबूरन उन्हें तसल्ली से अच्छा वक्त आने का इंतजार करना पड़ेगा.

राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस की सत्ता आते ही 10 दिनों के अंदर किसानों और मजदूरों के कर्ज माफ किए जाएंगे. ये उन की पार्टी का सब से पहला फर्ज होगा. राहुल ने कहा कि बसपा का हाथी तो सभी योजनाओं का बजट खा जाता है, लिहाजा बसपा किसानों का क्या भला करेगी. जहां तक सपा की बात है, तो वह सरकार भ्रष्टाचार के पैसे के बगैर चल ही नहीं पाती. उसे किसानों की भलाई से क्या सरोकार. अब किसानों और मजदूरों को सोचना होगा कि उन्हें उत्तर प्रदेश और केंद्र में कौन सी सरकार चाहिए.                  
 

खुद को कमजोर न महसूस करें

आज युवतियों के लिए घर से बाहर निकलना सुरक्षित नहीं रह गया है, क्योंकि कहीं उन के कपड़ों को ले कर कमैंट्स मारे जाते हैं तो कहीं उन की चालढाल को ले कर. यहां तक कि युवक उन के लिए भद्दी बातें करने से भी नहीं कतराते. ऐसे में युवतियां खुद को कमजोर महसूस करने के बजाय उन का सामना करें ताकि किसी की भी हिम्मत उन पर फबतियां कसने या उन के साथ छेड़छाड़ करने की न हो.

कैसे करें सामना

फेस पर न लाएं डर वाले ऐक्सप्रैशन

कई बार युवतियां युवकों द्वारा कमैंट्स मारने पर डर जाती हैं और यही डर उन के फेस से साफ झलकने लगता है. ऐसे में युवकों का हौसला और बढ़ता है. भले ही आप उन्हें जवाब न दें लेकिन इस सिचुऐशन को बोल्डली हैंडिल करें ताकि उन की दोबारा ऐसा करने की हिम्मत न रहे.

छेड़छाड़ का सामना कैसे करें

न डरें धमकियों से

एक बार अगर आप उन की धमकी से डर कर उन की कोई भी शर्त मानने को तैयार हो गईं फिर तो वे आप को ब्लैकमेल करना शुरू कर देंगे. इसलिए कभी भी धमकियों से डरें नहीं.

न जाएं सुनसान जगहों से

अकसर छेड़छाड़ सुनसान जगहों की आड़ में ही होती है क्योंकि वहां अगर युवतियां छेड़छाड़ होने पर शोर भी मचाती हैं तो उन की आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में सेफ्टी पौइंट के लिए आप ऐसी जगहों से न गुजरें.

बैग में रखें सेफ्टी टूल्स

अगर आप का जौब टाइम ऐसा है कि आप को वहां से घर लौटने में काफी रात हो जाती है तो अपनी सेफ्टी के लिए आप अपने बैग में औल पिन, मिर्च पाउडर स्प्रे आदि रखें. अगर आप को लगे कि स्थिति कंट्रोल से बाहर है तो तुरंत उस की आंखों में मिर्च पाउडर स्प्रे कर के वहां से भाग निकलें.

न छिपाएं घर में

अगर कोई आप को तंग कर रहा है तो इस बात की पूरी जानकारी अपने घर में दें ताकि वे भी पूरी नजर रख पाएं.           

औनलाइन ऐजुकेशन: आप की सुविधा, आप की डिग्री

अब वह समय बीत गया जब लोगों के पास उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाना ही एकमात्र विकल्प था. इंटरनैट के इस युग में उच्च शिक्षा प्राप्त करना बहुत सरल और सहज है. बिना किसी भागदौड़ और परेशानी के सिर्फ कुछ घंटे की पढ़ाई रोज कर के आप अपनी पसंद की डिग्री हासिल कर सकते हैं, वह भी विश्व के किसी भी कोने में बैठ कर औनलाइन ऐजुकेशन के माध्यम से. औनलाइन ऐजुकेशन सब के लिए फायदेमंद है. लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, तो आइए, देखते हैं औनलाइन ऐजुकेशन के दोनों पहलुओं को :

औनलाइन शिक्षा परंपरागत शिक्षा से सस्ती

औनलाइन ऐजुकेशन में बचत ही बचत है, क्योंकि न तो रोज कालेज जाने का खर्च होता है और न ही तरहतरह की फीस देनी पड़ती है. साथ ही पढ़ाई के साथ होने वाले घूमनेफिरने, खानेपीने के अनावश्यक खर्च से भी राहत मिलती है.

सुविधा और सहजता

अगर आप फुलटाइम जौब कर रहे हैं या फिर आप को घर के कामों से ही फुरसत नहीं मिलती है तो औनलाइन ऐजुकेशन आप के लिए ही है, क्योंकि इस में मुश्किल से एक सप्ताह में 10-12 घंटे का समय देना पड़ता है जो कामकाजी लोगों के लिए निकालना असंभव नहीं होगा.

समय अनुसार परिवर्तन

औनलाइन शिक्षा में लकीर के फकीर की तरह पुराने और रटेरटाए विषय नहीं पढ़ने पड़ते बल्कि उन में समय की मांग को देखते हुए परिवर्तन किया जाता है.

वर्तमान में भविष्य की तैयारी

औनलाइन ऐजुकेशन उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ाती है, आप सबकुछ एक डिजिटल तकनीक से समझते हैं. किसी भी प्रश्न के उत्तर के लिए आप को अगले दिन का इंतजार नहीं करना पड़ता. इंटरनैट सब को एकसाथ जोड़ कर रखता है यानी वर्चुअल तकनीक ने जमीनी दूरियां मिटा दी हैं.

अपनी स्किल रखें अपटूडेट

परंपरागत शिक्षा में बहुत तेजी से बदलाव हो रहे हैं. ऐसे में एक बार डिग्री मिल जाने के बाद भी अपने ज्ञान को निरंतर आगे बढ़ाना एक मुश्किल काम है और यहीं पर औनलाइन ऐजुकेशन आप की मदद करती है आप को अपटूडेट रखने में. लेकिन इन विशेषताओं के बावजूद औनलाइन ऐजुकेशन की कुछ सीमाएं हैं जो इस प्रकार हैं :

अनुभव की कमी

जब आप कालेज जाते हैं तो वहां सब के साथ मिल कर पढ़ाई करते हैं, चीजें शेयर करते हैं. रिलेशन मैंटेन करते हैं जो पढ़ाई के साथसाथ बहुत जरूरी है, लेकिन औनलाइन ऐजुकेशन में यह संभव नहीं है.

नैटवर्क का न होना

जब आप रोजाना कालेज जाते हैं, तो आप का वहां लोगों से एक अलग रिलेशन मैंटेन होता है, जिस में कालेज के प्रोफैसर्स से ले कर स्टूडैंट्स तक होते हैं जो कालेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद भी आप के लिंक में रहते हैं और आप के काम भी आते हैं, लेकिन औनलाइन ऐजुकेशन में ऐसा संभव नहीं है.

हर पढ़ाई के लिए उपयुक्त नहीं

जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, दंत चिकित्सा, नर्सिंग जैसे क्षेत्रों में अनुभव हासिल करने के लिए आप को कुछ सुविधाओं और उपकरणों की आवश्यकता होगी, जो औनलाइन ऐजुकेशन के साथ संभव नहीं है.

नौकरी में मुश्किल

औनलाइन ऐजुकेशन ज्यादा चलन में न होने के कारण डिग्री मिलने के बाद भी शायद आप को नौकरी आसानी से और अच्छी न मिले, अभी भी बहुत से नियोक्ताओं के लिए ऐसी डिग्री की कोई अहमियत नहीं है और वे ऐसे डिग्रीधारियों को नौकरी देने में भी कोई रुचि नहीं दिखाते.

शारीरिक और मानसिक तनाव

लगातार कई घंटे तक कंप्यूटर पर काम करने का असर बुरा ही होता है और वह तनाव और शारीरिक कमजोरी के रूप में सामने आता है, लोगों में बेचैनी, चिड़चिड़ापन और झुंझलाहट के कारण परेशानियां बढ़ जाती हैं जो पढ़ाई में भी बाधा डालती हैं.

अंधविश्वास का वाहक बनता सोशल मीडिया

देश के विकास में सूचना और संचार क्रांति के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. अब लोगों ने फेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स के माध्यम से अपने महत्त्वपूर्ण विचारों व डौक्यूमैंट्स को आदानप्रदान का जरिया बना लिया है. ऐसे में अंधविश्वास, पोंगापंथ, झाड़फूंक व धर्म की दुकान चलाने वाले लोगों ने भी अपना ट्रैंड बदलना शुरू कर दिया है. धूर्त किस्म के बाबा सोशल साइट्स पर मौजूद करोड़ों लोगों को अपना निशाना बना कर ठगी का काम कर रहे हैं. इंटरनैट के माध्यम से ये बाबा बिना मेहनत के लोगों को गुमराह कर अपनी ठगी के जाल में फंसा रहे हैं.

पाखंडी बाबा दूर बैठ कर इंटरनैट के जरिए अपनी चमत्कारी शक्तियों से लोगों की समस्याओं के समाधान का दावा करने का वादा करते हैं और औनलाइन माध्यमों से अपने खाते में पैसा ट्रांसफर करवाते हैं.

लोगों को जब तक यह पता चलता है कि वे ठगी का शिकार हो चुके हैं तब तक वे काफी धन गंवा चुके होते हैं. ऐसे में बाबाओं द्वारा ठगी का शिकार व्यक्ति चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता.

फेसबुक, व्हाट्सऐप पर ठगी

पहले जहां लोग परचे छाप कर बंटवाते थे. उस में लिखा होता था कि अमुक मात्रा में परचे बांटने से अमुक का बिगड़ा काम बन गया और जिस ने नहीं बांटे उस का भारी नुकसान हो गया. कुछ इसी तरह का ट्रैंड आजकल फेसबुक और व्हाट्सऐप पर भी देखने को मिल रहा है.

कुछ लोग तमाम देवीदेवताओं के फोटो अपलोड कर उन्हें अधिक से अधिक शेयर व लाइक करने की सलाह देते हैं. साथ ही ऐसा न करने पर पोस्ट पढ़ने वाले का भारी नुकसान होगा, ऐसी बातें भी लिखी होती हैं.

इस तरह के फोटो अपलोड करने के पीछे ठगी करने वालों का हाथ होता है. जब लोगों द्वारा फोटो शेयर करने पर उन की समस्याओं का समाधान नहीं होता तो लोग कमैंट में अपनी प्रतिक्रियाएं देना शुरू करते हैं और पोस्ट पर घात लगाए बैठे धूर्त बाबा उन की समस्याओं का हल चमत्कारी शक्तियों व वस्तुओं से करने का दावा करते हैं. इन चमत्कारी बाबाओं के चंगुल में फंसने के बाद व्यक्ति लुटता रहता है और जब उसे ठगे जाने का एहसास होता है तो वह शर्म और बेइज्जती के मारे किसी से कह भी नहीं पाता.

मेरे एक मित्र जिन की शादी को 10 साल हुए थे, ने एक दिन अपनी समस्या फेसबुक पर लिखी. जिस के कुछ घंटे बाद बाबा भूसा बंगाली के नाम से एक कमैंट मिला, जिस में लिखा था कि बाबा की कृपा से मात्र एक माह में आप की बीवी की गोद भर जाएगी. फिर उन्होंने उन के इनबौक्स में जा कर उपाय पूछा तो बाबा ने पूजाअनुष्ठान के नाम पर 21 हजार रुपए की मांग की.

उस के लिए उन्होंने बाकायदा एक पता दिया जिस पर मनीऔर्डर भेजा जाना था. मित्र ने विश्वास कर 21 हजार रुपए का मनीऔर्डर भेज दिया. फिर 2 माह इंतजार किया, लेकिन उन की पत्नी को गर्भ नहीं ठहरा. उन्होंने उस बाबा से फेसबुक से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. बाबा द्वारा दिए गए पते पर पत्र भेजा, लेकिन वहां से वह पत्र भी वापस आ गया. लिखा था कि बाबा 2 माह पहले ही इस किराए के मकान को छोड़ चुके हैं.

जब उन्हें अपने ठगे जाने का एहसास हुआ तो वह हाथ मलते रह गए, लेकिन यह बात उन्होंने किसी को नहीं बताई. एक दिन मुझे किसी से इस घटना का पता चला तो मैं ने मित्र से पूछा. पहले तो वे टालमटोल करते रहे, बाद में उन्होंने सारी घटना बताई. मैं ने जब इन बाबाओं की वास्तविकता बताई तो वे पछताने लगे.

सोशल मीडिया पर चूंकि सब से ज्यादा युवा ही सक्रिय हैं. इन की तमाम तरह की समस्याएं भी होती हैं, जिन में पढ़ाई में फेल होने से ले कर भारीभरकम डिग्री होने के बावजूद नौकरी न मिलना, प्यार में धोखा, बच्चे पैदा न होना जैसी तमाम समस्याएं होती हैं.

पढ़ेलिखे युवा भी निराशा की दशा में फेसबुक व व्हाट्सऐप वाले बाबाओं के चंगुल में फंस जाते हैं. ये बाबा भी इसी पढे़लिखे युवावर्ग से होते हैं. चूंकि फेक आईडी के पीछे कौन बैठा है यह पता नहीं चल पाता, ऐसे में इन की चिकनीचुपड़ी बातों में फंस कर सीधेसादे युवक अपना धन गंवा बैठते हैं.

कभीकभी फेसबुक पर मौजूद युवतियां इन बाबाओं की हवस का शिकार भी हो जाती हैं. एक ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में प्रकाश में आया था, जिस में एक युवती का फेसबुक पर बाबा से संपर्क हुआ. उस बाबा ने उस युवती को बीएससी में अच्छे मार्क्स लाने का वादा कर गोरखपुर बुलाया. जहां उस ने उस की इज्जत लूटने की कोशिश की, लेकिन वह युवती समझदार निकली और बाबा को थप्पड़ मार कर उस ने पुलिस थाने में शिकायत करने की धमकी दी. बाबा 32 साल का नौजवान था. उस ने उस युवती से भविष्य में ऐसा न करने का वादा भी किया.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप जैसी सोशल साइट्स पर किस तरह की सावधानी बरती जाए, जिस से इन बाबाओं से लोगों को बचाया जा सके. इस मसले पर सोशल साइट्स के जानकार नितेश शर्मा का कहना है कि जब आप के फेसबुक या व्हाट्सऐप पर फ्रैंड रिक्वैस्ट आए तो उस की प्रोफाइल जरूर चैक करें. अगर वह आप का जानकार नहीं है तो उस की फ्रैंड रिक्वैस्ट डिलीट व ब्लौक कर दें.

अफवाह फैलाने का माध्यम

फेसबुक व व्हाट्सऐप के जरिए अंधविश्वास फैलाने वाले अफवाहें भी तेजी से फैलाते हैं जो कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती हैं. ये अफवाहें धर्म की दुकान चलाने वाले लोगों द्वारा फैलाई जाती हैं. बस्ती जिले में फेसबुक के जरिए यह अफवाह फैली कि शहर के विष्णुपुरवा महल्ले में हनुमान मंदिर का घंटा अपनेआप बज रहा है. देखते ही देखते यह अफवाह फेसबुक, व्हाट्सऐप के जरिए पूरे जिले में फैल गई. फिर क्या था मंदिर में लोगों का तांता लग गया. जब तक लोग सच जान पाते, तब तक लाखों का चढ़ावा अफवाह फैलाने वाले बटोर चुके थे.

कुछ इसी तरह की अफवाह फेसबुक, व्हाट्सऐप पर नेपाल में आए भूकंप के दौरान फैली थी कि चंद्रमा उलटा हो गया है और जमीन का पानी जहरीला हो गया है. ऐसे में लोगों द्वारा दानदक्षिणा देने पर यह संकट टलेगा. लोगों ने यह अफवाह सुनते ही दानदक्षिणा देनी शुरू कर दी, लेकिन किसी ने वास्तविकता जांचने की कोशिश नहीं की. लोगों को जब तक वास्तविकता का पता चलता, अफवाह फैलाने वाले अच्छीखासी रकम इकट्ठी कर चुके थे.

सोशल मीडिया पर अफवाह फैलने के मसले पर सोशल मीडिया के जानकार भृगुनाथ त्रिपाठी पंकज का कहना है कि अकसर ढोंगीपाखंडियों द्वारा उन के पाखंड का धंधा मंदा पड़ने पर अफवाहों का सहारा लिया जाता है. ऐसे में सोशल मीडिया से अफवाहें फैलाना बेहद आसान होता है, क्योंकि इस पर करोड़ों लोग सक्रिय हैं.

शिक्षक आलोक शुक्ल का कहना है कि आज का प्रत्येक युवा सोशल मीडिया का किसी न किसी रूप में उपयोग कर रहा है. इसलिए युवाओं को चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर अंधविश्वास को फैलने से रोकने में अपनी भूमिका निभाएं और बाबाओं की आईडी व अफवाहें फैलाने वाले लोगों के खिलाफ सोशल मीडिया कंपनियों को शिकायत करें. इस से इन के अकाउंट को इन कंपनियों द्वारा ब्लौक कर रोक लगा दी जाती है.               

चुनावी चक्कर

उत्तर प्रदेश के अगले चुनावों में मजेदार लड़ाई होगी, क्योंकि लगभग चारों पार्टियों लंगड़ाती सी चुनाव में उतर रही हैं. 2014 में लोकसभा में 543 सीटों में से 282 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी की शान अब वह रह नहीं गई है, जो मई, 2014 में थी. इस से पहले 2012 के विधानसभा चुनावों में जीती समाजवादी पार्टी घरेलू झगड़ों में फंस गई है. कांग्रेस को तो सत्ता का स्वाद चखे अरसा हो गया है और सोनिया गांधी व राहुल गांधी पिछले चुनावों में लोकसभा में जीत गए तो वही काफी था. बहुजन समाज पार्टी में सेंध लगी है, पर इतनी ज्यादा नहीं. मायावती का पलड़ा भारी दिख रहा है. पर मायावती अगर जीत गईं तो क्या करेंगी, इस का कुछ पता नहीं. वे चुनावी सभाएं कर रही हैं, पर कहती कम ही हैं. कांग्रेस के राहुल गांधी एक लंबी बस, पैदल, कार यात्रा पर निकले हैं और खाट सभाएं कर रहे हैं यह दिखाने के लिए कि कांग्रेस किसानों से जुड़ी है. पर कांग्रेस की खाटों की रस्सियां तो कब की टूट चुकी हैं और उस से कोई खास उम्मीद नहीं है.

पैतरेबाजी इस तरह की हो गई है कि अब बिहार की तरह का समझौता नहीं हो सकता, जिस में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार व कांग्रेस ने मिल कर भारतीय जनता पार्टी को भारी शिकस्त दे दी थी. भारतीय जनता पार्टी का भी किसी से समझौता नहीं हो पा रहा है. समाजवादी पार्टी से कोई फैसला तो तब करे, जब तय हो कि वहां चलती मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की है, उन के पिता मुलायम सिंह यादव की या चाचा शिवपाल यादव की. उत्तर प्रदेश को चुनावों से कभी कुछ खास मिला हो, ऐसा नजर नहीं आया. राज्य वैसा का वैसा उलटा प्रदेश ही रहा है. आम जनता जो भी करती है, सरकार के सहारे नहीं सरकार के बावजूद करती है. जनता को इन चारों पार्टियों से कोई उम्मीद नहीं है, न लगानी चाहिए.

असल में 2014 के कड़वे अनुभव के बाद अब यह तय हो गया है कि पार्टियां चाहे कुछ भी कहती रहें, शरीफ हों या बेईमान, आधुनिक हों या पौराणिकवादी, असल में उन का जनता पर कोई असर नहीं पड़ता. सरकार जनता के लिए जरूरी है, पर पार्टियां बेमतलब सी हो गई हैं और चूंकि संविधान में उन की बड़ी जगह है, इसलिए चुनाव होंगे, मुख्यमंत्री बनेंगे, मंत्री होंगे, विधानसभा होगी, पर भइया सरकार तो यों ही चलेगी. चारों में से कोई आए या चुनावों के बाद कैसा भी गठबंधन बने, फर्क कुछ नहीं पड़ेगा. भारतीय जनता पार्टी अब शायद किसी से कोई समझौता न कर पाए, पर कांग्रेस मायावती व समाजवादी पार्टी किसी से भी चुनाव बाद आपस में समझौता कर सकती हैं. इन चुनावों में इस बार मुद्दा दलित और मुसलिम हैं जो थोड़ा अफसोस का मामला है. सरकारी नीतियों की तो बात तक नहीं हो रही है. सहीगलत का सवाल नहीं उठ पा रहा है. दलितों और मुसलिमों का इशू तो हम पहले कहीं पीछे छोड़ चुके थे, पर भारतीय जनता पार्टी ने फिर से इसे अगली लाइन में खड़ा कर दिया और जो भी जीतेगा, उसे इसी मसले को सब से आगे रखना पड़ेगा.

सरकारी नीतियों में बदलाव, जनता को सही राह दिखाना, प्रदेशभर में फैली गंदगी, बेकारी, गरीबी, बरबादी, दकियानूसीपन, निकम्मापन तो नेताओं के लिए अब कोई चुनावी मु्द्दा ही नहीं रह गए हैं. चुनाव पहले के हिंदू राजाओं की तरह बेमतलब की लड़ाइयां बन कर रह गए हैं, जिस में कोई भी जीते हारती जनता ही है.

भारतीय राजनीति की अहम कड़ी हैं किसान

इस बात में शक की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है कि प्रधानमंत्री का ओहदा संभालने के बाद से नरेंद्र मोदी लगातार खेती किसानी पर दखल और निगाहें रखे हुए हैं. उन्हें भी मालूम है कि किसान भारतीय राजनीति की अहम कड़ी हैं, लिहाजा वे इस कड़ी को कस कर थामे हुए हैं. भारतीय किसान भी इस हकीकत को मानते हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री उन का ठीकठाक खयाल तो रख ही रहे हैं. किसानों के खुश रहने से राजनीति का सफर काफी सहज हो जाता है, यह बात भी ज्यादातर राजनीतिबाज जानते ही हैं. बहरहाल, इसी कड़ी में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों कम होती खेती की जमीन और घटते पानी के जरीयों को मद्देनजर रखते हुए फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों से खेती में वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करने को कहा. प्रधानमंत्री ने ‘वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ (सीएसआईआर) की प्लेटिनम जुबली के मौके पर कहा कि उन्होंने हमेशा किसानों को यही सलाह दी है कि पानी की हर एक बूंद के साथ ज्यादा से ज्यादा फसल पैदा होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हमें इस तरह सोचना होगा कि जमीन के हर इंच के साथ फसल में ज्यादा से ज्यादा बालियां पैदा हों.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि 21वीं सदी तकनीक का इस्तेमाल करने की सदी है और भारत की जरूरतों को सिर्फ वैज्ञानिक तरकीबों के जरीए ही पूरा किया जा सकता है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस सदी में विज्ञान को आम लोगों के साथ जोड़ा जाना जरूरी है. दरअसल, मौजूदा सदी तकनीक से ही चलने वाली है. बगैर तकनीक के तरक्की मुमकिन नहीं है. मोदी ने वैज्ञानिकों से भी सब्जियों की पैदावार में इजाफा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा जोश से काम करने के लिए कहा, ताकि भरपूर उत्पादन से न केवल घरेलू जरूरतें पूरी हों, बल्कि सब्जियों को दूसरे देशों को निर्यात भी किया जा सके. प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, असम और जम्मू कश्मीर के किसानों से खासतौर पर मुलाकात कर के उन का हालचाल पूछा.

नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिकों से डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया जैसे खतरनाक रोगों की जांच के लिए सस्ते मेडिकल किट तैयार करने को कहा, ताकि किसान अपनी जांच कर के महफूज रह सकें. बीमारी का पता वक्त पर चल जाने से किसान अपना माकूल इलाज करा सकते हैं. बंदरों द्वारा पैदा की जाने वाली दिक्कतों से सिर्फ किसान ही परेशान नहीं है, बल्कि मोदी भी फिक्रमंद हैं. सीएसआईआर के 75वें स्थापना दिवस के मौके पर दिल्ली से नरेंद्र मोदी ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरीए हिमाचल प्रदेश के प्रगतिशील किसानों से सीधी बात की. आईएचबीटी पालमपुर में जुटे सूबे के तमाम किसानों में से एक शिशु पटियाल से मोदी ने पूछा कि आप के इलाके में बंदरों की दिक्कत तो नहीं है. इस पर शिशु पटियाल ने कहा कि वे तो फूलों की खेती करते?हैं. उस के लिए उन्होंने पालीहाउस बनाए हैं. वैसे अब यहां बंदरों की दिक्कत नहीं?है. वैसे भी बंदर फूलों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

पटियाल ने मोदी को आगे बताया कि उन की फूलों की खेती में बीमारियों की दिक्कत तो है, पर इस के इलाज के लिए वे दवा का छिड़काव करते?हैं. इसी तरह से मोदी ने अन्य किसानों से भी बातचीत की और उन से मोदी ने खेती में वैज्ञानिक तरीके अपनाने की बात जोर दे कर कही.

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