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भीड़ से घबराना कैसा

अकेलेपन से दूर भीड़ सभी को अच्छी लगती है. हर कोई भीड़ से घिरा रहना चाहता है क्योंकि भीड़ जीवन का हिस्सा है और भीड़ हम से आप से ही बनती है. लेकिन भीड़ के अनेक चेहरे होते हैं. जीवन में भीड़ के चेहरे को पहचान कर कैसे करें उस का सामना, बता रही हैं अंजली गुप्ता.

भीड़ की परेशानियों से हम सभी वाकिफ हैं. यहां तक कि स्कूल में पढ़ने वाले छोटेछोटे बच्चे भी भीड़ की पीड़ा को महसूस करते हैं जब उन्हें बस में धक्के खाने पड़ते हैं. मातापिता के लिए यह भीड़ तब और कष्टदायक हो जाती है जब उन्हें अपने बच्चे के लिए स्कूलकालेजों में दाखिला दिलाना होता है.

परिवार नियोजन के नारे ‘हम दो हमारा एक’ के बाद भी हर जगह भीड़ बढ़ती ही जा रही है. आवास के लिए, राशन के लिए, नौकरी के लिए, दाखिले के लिए, रेलवे आरक्षण के लिए, डाकघर में, बैंक में, दफ्तर में, सड़क पर, बस में, पार्क में जहां देखिए हर जगह भीड़ से परेशान लोग हैं और भीड़ में रहने को मजबूर भी हैं. वैसे अब तो यह भीड़ एक तरह से हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है.

यहां हम बात करेंगे उस भीड़ की जिस का सामना हमें अचानक करना पड़ता है या जो भीड़ अवसर विशेष पर जमा होती है और फिर बरसाती बादल की तरह छंट जाती है, जैसे मेले, खेलतमाशे की भीड़, आक्रामक भीड़, उग्र भीड़, पिक्चर हौल की भीड़, रेलवे प्लेटफौर्म की भीड़ आदि.

डरें नहीं मुकाबला करें

उग्र भीड़ के पास सोचनेसमझने की शक्ति नहीं रहती. वह ‘करो या मरो’ वाली स्थिति में रहती है. चूंकि इस भीड़ का अपना आक्रोश जाहिर करने का तरीका आक्रामक होता है इसलिए निशाना कोई भी हो सकता है. भीड़ का यह रूप ज्यादातर पहले से नियोजित होता है कि आज फलांफलां जगह जमा होना है. फिर उस विचार से सहमत लोग उस जगह जमा हो जाते हैं. इस में प्रवेश के लिए कोई प्रतिबंध नहीं होता.

भीड़ का एक और रूप आक्रामकता भी है. इस भीड़ का शिकार निश्चित होता है वह चाहे व्यक्ति हो, चाहे समूह विशेष.

यह भीड़ किसी भी तरह अपने शिकार को अधिक से अधिक शारीरिक, आर्थिक नुकसान पहुंचाना चाहती है, भले ही उस भीड़ की अपने शिकार से कोई जानपहचान या दुश्मनी न हो. जैसे, आप गाड़ी चला रहे हैं और आप की गाड़ी से कोई दुर्घटना हो जाती है या कोई साइकिल, स्कूटर चालक अपनी गलती से आप की गाड़ी से टकरा जाता है. यहां आप की कोई गलती नहीं है पर चूंकि चोट साइकिल या स्कूटर चालक को लगती है इसलिए दुर्घटना के आसपास के लोगों की सहानुभूति उस के साथ होती है और गलती न होते हुए भी उन्हें आप की गलती नजर आने लगती है. फलस्वरूप, देखते ही देखते आप के आसपास भीड़ जमा हो जाती है, जो आप को शारीरिक चोट पहुंचा सकती है. यह भी हो सकता है कि आर्थिक हानि पहुंचाने के लिए भीड़ गाड़ी की तोड़फोड़ कर दे.इस भीड़ का एक रूप सांप्रदायिक दंगों के समय भी देखने को मिलता है जब भीड़ के रूप में जमा एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों की हत्या, मारपीट और आगजनी आदि करना चाहते हैं.

रेलवे स्टेशन की भीड़ से भी सभी वाकिफ होंगे. रेलगाड़ी रुकते ही उतरने वाले तो जल्दी से उतरना चाहते हैं, चढ़ने वाले भी चढ़ने में जल्दबाजी करते हैं. इस ‘पहले हम पहले हम’ वाली भीड़ से मुकाबला करना बहुत कठिन है.

आज के हालात को देखते हुए यह कहना बहुत मुश्किल है कि कब घर का कोई सदस्य भीड़ में कहां फंस जाए क्योंकि लोग स्वभाव से काफी उग्र हो गए हैं और उन की प्रवृत्ति भी आक्रामक हो गई है. यहां किसी भी तरह की भीड़ में फंसने पर सब से जरूरी बात है उस में से सुरक्षित निकलना. इस के लिए आप को भीड़ से मुकाबला करना पड़ेगा. आजकल व्यक्ति के उग्र होने के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारण है, अपने अधिकारों के प्रति सजगता. इसलिए पता नहीं चलता कि कब व्यक्तियों का कोई हुजूम उग्र भीड़ का रूप ले ले.

यह भीड़ एक तरह से पागल भीड़ होती है. इस के पास सोचनेसमझने की शक्ति नहीं होती. यह सोचती है कि जो उस के विचार हैं वे सही हैं और जो भी वह कर रही है वह ठीक है. इस में सब एकमत होते हैं. उग्र भीड़ को सांप्रदायिक सद्भावना या अहिंसा और शांति के विचारों से प्रभावित नहीं किया जा सकता यानी कि एकसाथ पूरी भीड़ की सोच को फौरन बदल पाना असंभव है.

आक्रामक भीड़ में शामिल सभी लोग इस सच को जानते हैं कि वे आपस में एकदूसरे को नहीं मारेंगे. उन्हें सिर्फ अपने निशाने को ही नुकसान पहुंचाना है इसलिए अपनी सुरक्षा के प्रति वे निश्ंिचत होते हैं. चिंता तो उस व्यक्ति को होती है जो भीड़ में घिरा होता है क्योंकि घिरा हुआ वह खुद है, इसलिए मुकाबला भी उसी को करना है. इसलिए चौकन्ना भी उसी को रहना पड़ेगा.

सावधानी की जरूरत

अपने जीवन में हमें एक और तरह की भीड़ का भी सामना करना पड़ता है और वह है मेले, खेलतमाशे या नुमाइश की भ्ीड़. ऐसी भीड़ में जब हम फंसते हैं तो हमें पता होता है कि हम भीड़ में फंसने वाले हैं. अब अगर ऐसे में किसी के साथ कोई हादसा हो जाए तो उस के ?लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, भीड़ को या खुद को?

खेलतमाशों की भीड़ से मुकाबले की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यहां अधिकतर लोग मनोरंजन के लिए आते हैं. हां, ऐसी जगहों पर गिरहकटों से जरूर सावधान रहना चाहिए अन्यथा वे चुपचाप अपना काम कर जाएंगे और आप का सारा उत्साह ठंडा पड़ जाएगा. औरतें मेले जैसी भीड़ वाली जगहों पर गहनों के प्रदर्शन का मोह त्याग दें तो घूमने का अधिक लुत्फ उठा सकेंगी. खुद ही नहीं बल्कि साथ के लोग भी निश्ंिचत हो कर मेले का भ्रमण कर सकेंगे.

छोटे बच्चों को भीड़ में कभी भी अकेले न छोड़ें. सदा गोद में ही रखें और थोड़े समझदार बच्चों को वह स्थान अच्छी तरह समझा दें, साथ ही घर का पता, फोन नंबर वगैरह लिख कर उस की जेब में डाल दें. बेहतर है कि भीड़ वाली जगहों पर अपना समूह बना कर ही जाएं. मनोरंजन के लिए निकले हैं तो भीड़ से क्या घबराना. पर मुकाबले को तैयार रहें.

एक थी काबुलवाले की बंगाली बीवी

मुल्क कोई भी हो, धर्म के ठेकेदारों का हैवानियत भरा नंगा नाच एक ही शक्ल का होता है. देश में डा. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के तौर पर दिखा तो अफगानिस्तान में मजहबी जनूनियों ने सुष्मिता बनर्जी को भून डाला. पढि़ए साधना शाह का लेख.

अंधविश्वासियों ने भारत में मानवता के हितैषी डा. दाभोलकर को मौत के घाट उतार दिया तो अफगानिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथियों ने तालिबानी सोच से लोहा ले रही सुष्मिता को गोलियों से छलनी कर दिया. ‘एस्केप फ्रौम तालिबान’ फिल्म से पूरे देश में ख्यातिप्राप्त करने वाली एक काबुलीवाले की बंगाली बीवी सुष्मिता बनर्जी उर्फ साहिब कमाल बनर्जी (अफगानी नाम) को पिछले दिनों तालिबानियों ने घर से बाहर निकाल कर गोलियों से छलनी कर दिया.

इसी साल मार्च में वे अपने ससुराल अफगानिस्तान वापस लौट गई थीं और काबुल में स्वास्थ्यकर्मी के रूप में काम कर रही थीं. साथ ही, तालिबानियों के खिलाफ एक बार फिर से अपनी आवाज बुलंद करने की तैयारी में भी लगी हुई थीं. इस बीच 4 सितंबर की रात उन की हत्या कर दी गई.

रहस्य की गुत्थी

परिजनों को इस हत्या में रहस्य का अंदेशा है, क्योंकि सुष्मिता की हत्या के बाद भी उस के ससुराल वालों ने यहां एक बार फोन तक नहीं किया. हादसे के 2 दिन बाद जांबाज खान (सुष्मिता के पति) से बात हुई, पर उस ने वही सब बयां किया, जिस की खबर विदेशी मीडिया से कोलकाता में परिवार को मिल चुकी थी. जांबाज ने यह भी बताया कि मदरसे के पास जहां सुष्मिता की लाश पड़ी थी, वहां से लाश को घर ला कर फिर उसे कब्रिस्तान ले जा कर दफन कर दिया गया.

इधर, परिवार को कोलकाता में सुष्मिता की फेसबुक मित्र से पता चला कि 5 सितंबर को चैटिंग करते हुए उस ने कोलकाता के लिए रवाना होने की बात की थी. सारा सामान वह पैक कर चुकी थी. फिर 4 सितंबर को रात डेढ़ बजे हत्या की बात कैसे की जा रही है. सुष्मिता के भाई गोपाल बनर्जी प्रशासनिक कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि स्थानीय पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम भी नहीं करवाया और उसी दिन 4 सितंबर को लाश दफन कैसे कर दी गई? सो, सुष्मिता का परिवार मामले की जांच की मांग कर रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने परिवार को मदद देने का आश्वासन दिया है.

तालिबानी निशाने पर

सुष्मिता ने हालांकि धर्मपरिवर्तन कर अपना नाम साहिब कमाल रख लिया था लेकिन बुरका और परदा प्रथा से समझौता करने को वे तैयार नहीं हुईं. यह वह समय था जब अफगानिस्तान में एक तरफ सोवियत सेना की कार्यवाही चल रही थी तो दूसरी तरफ मुजाहिदीन के लड़ाके अपनी लड़ाई लड़ रहे थे. इस के बाद 1993 में तालिबानी ताकत ने सिर उठाया. हर महिला को बुरका पहनने का फरमान जारी किया गया. सुष्मिता ने इस फरमान को बारबार अंगूठा दिखाया और ‘बेपरदा’ घर से बाहर निकलती रही. तालिबानी धमकी की यहीं से शुरुआत हुई और फिर जांबाज खान के रूढि़वादी परिवार ने भी सुष्मिता पर बहुत सारी बंदिशें लगा दीं.

ऐसे में सुष्मिता ने अफगानिस्तान से निकल जाने का पूरी तरह से मन बना लिया. चोरीछिपे वे पाकिस्तान पहुंच गईं. पर पासपोर्ट और वीजा न होने के कारण उन्हें अफगानिस्तान वापस भेज दिया गया. उस के बाद उन्हें ससुराल में नजरबंद कर दिया गया. पर जिद्दी सुष्मिता ने हार नहीं मानी और काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 1995 में वे स्वदेश लौट आई थीं.

काबुली प्रेम की बलि

वर्ष 1988 में सुष्मिता बनर्जी एक अफगानी युवक जांबाज खान के प्रेम में गिरफ्तार हुईं और 1989 में जांबाज खान के साथ निकाह कर के कोलकाता से काबुल के लिए रवाना हुईं. काबुल से लगभग 200 किलोमीटर दूर पाकतिका प्रदेश के सरायकाला नामक गांव में दोनों ने अपनी गृहस्थी की शुरुआत की. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया ‘एस्केप फ्रौम तालिबान’ की बदौलत जान चुकी है.

गौरतलब है कि यह किताब सर्वाधिक बिक्री की फेहरिस्त में अपनी पुख्ता जगह बना चुकी है और देशीविदेशी कई भाषाओं में अनूदित भी हो चुकी है. बहरहाल, सुष्मिता के बहुचर्चित मूल उपन्यास ‘काबुलीवालार बंगाली बऊ’ के प्रकाशक स्वप्न विश्वास कहते हैं कि इस किताब ने 7 लाख प्रतियों की बिक्री का रिकौर्ड बनाया है. स्वप्न विश्वास बताते हैं कि इन दिनों सुष्मिता की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. इस के कारण कुछ महीने पहले मध्य कोलकाता के अपने फ्लैट को उन्हें बेच देना पड़ा था.

सुष्मिता के भाई गोपाल बनर्जी, जो कोलकाता के उपनगर बागुईहाटी में बिल्डर हैं, का कहना है कि खुद परिवार के पास भी खबरें छनछन कर आ रही हैं. अफगान पुलिस के हवाले से किसी विदेशी मीडिया के जरिए पता चला कि जांबाज खान समेत पूरे परिवार को बांध कर तालिबानी सुष्मिता को घसीटते हुए घर से बाहर ले गए और फिर गोलियों से भून डाला. लगभग 20 गोलियां मारने के बाद वे करीब के एक मदरसे में सुष्मिता को फेंक कर चले गए. सुनने में यह भी आया है कि तालिबानियों ने बड़ी कू्ररता के साथ सुष्मिता के सिर के बालों को भी कई जगह से नोच दिया था.

गोपाल बताते हैं कि परिवार में कोई नहीं चाहता था कि वे फिर से वहां जाएं, पर वे नहीं मानीं. लेकिन सुष्मिता की किताबों के प्रकाशक स्वप्न विश्वास का कहना है कि दरअसल, सुष्मिता एक नए उपन्यास की तैयारी में थी और इस के लिए तथ्य जुटाने के मकसद से ही वह महज 6 महीने के लिए अफगानिस्तान गई थी.

वह तालिबानी शासन में अफगानी महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक बदहाली से बखूबी परिचित हो चुकी थी. काफीकुछ उस ने खुद भोगा भी था. लेकिन अफगानिस्तान में करजई सरकार के शासन में महिलाओं की स्थिति में कितना कुछ बदलाव आया है, यह जानना ही उस के वहां जाने का मकसद था.

सुष्मिता के एक चचेरे भाई रंजन बनर्जी कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफैसर हैं. वे कहते हैं, ‘‘सुष्मिता ने डाक्टरी की पढ़ाई बेशक नहीं की थी लेकिन अफगानिस्तान में रहते हुए उस ने डाक्टरी की बहुत सारी किताबों को पढ़ा और वहां आसपड़ोस की महिलाओं की छोटीमोटी बीमारियों का वह छिटपुट इलाज भी किया करती थी. उस के योगदान को देखते हुए कुछ साल पहले वहां स्वास्थ्यकर्मी की नौकरी के लिए उस के पास बाकायदा प्रस्ताव भी आया था लेकिन उस प्रस्ताव को सुष्मिता ने खारिज कर दिया था.

‘‘अब चूंकि उसे अपने नए उपन्यास पर काम करना था और करजई शासन में, वहां की नई स्थितियों का जायजा लेना था इसीलिए उस ने एक पंथ दो काज का रास्ता अपनाया और स्वास्थ्यकर्मी की नौकरी ले कर वहां के लिए रवाना हुई. काम के दौरान एक मूवी कैमरा वह हमेशा अपने साथ रखती थी और वहां की महिलाओं की स्थिति को कैमरे में कैद करती जा रही थी.’’

अफगानिस्तान प्रेम में बगावत

सुष्मिता के परिजन बताते हैं कि जब 1988 में सुष्मिता घर वालों से बगावत कर के पहली बार अपने ससुराल अफगानिस्तान गई थी, तब उस के भीतर उस देश के प्रति बहुत सारी जिज्ञासाएं थीं. परिजनों का यह मानना है कि सुष्मिता में साहस, संकल्प, जिज्ञासा और जिद कूटकूट कर भरी हुई थी और यही उस के जीवन की थाती थी. अफगानी से प्रेम के लिए मातापिता से बगावत के कारण बाकायदा उस की मारकुटाई हुई. पर जांबाज के साथ दांपत्य का संकल्प उस ने नहीं छोड़ा. बंगाल के प्रगतिशील समाज से निकल कर वहां के रूढि़वादी समाज में पहुंच कर उसे बड़ा झटका लगा.

काबुलीवालों का अपराधबोध

सुष्मिता बनर्जी तालिबान शासन में अफगानी महिलाओं की दुर्दशा पर एक वृत्तचित्र बना रही थी और यही बात तालिबानियों को नागवार गुजरी. कुछ महीने पहले मध्य कोलकाता के काबुलीवाले महल्ले में रह रहे सुष्मिता के देवर जहांगीर खान की हत्या कर दी गई थी. लेकिन इस हत्या की गुत्थी पुलिस आज तक नहीं सुलझा सकी है. बताया जाता है कि इस हत्या में तालिबानियों का ही हाथ था. इस के बाद सुष्मिता को भी फोन पर लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं. पर उसे इन बातों की कहां परवा थी. घरपरिवार के बारबार मना करने के बाद भी इसी साल मार्च में वह अपने पति के साथ काबुल चली गई थी.

बंगाल की लड़कियों का काबुलीवाले से प्रेमलगाव बहुत पुराना है. रवींद्रनाथ ठाकुर का उपन्यास ‘काबुलीवाला’ को जरा याद कीजिए. मीना को काबुलीवाले और काबुलीवाले को मीना से कितना लगाव था. पर अफगानिस्तान में सुष्मिता की हत्या के बाद काबुलीवाला महल्ला शर्मसार है. अफगानिस्तान के जलालाबाद का शेरखान, जो कोलकाता की इलियटी रोड इलाके में रहता है, भी सुष्मिता के अंजाम से शर्मसार है. वहीं पख्तून प्रदेश का निवासी आमिर खान एक बंगाली लड़की से ब्याह कर यहीं बस चुका है. आमिर अपनी बीवी को ले कर कभी अफगानिस्तान नहीं लौटने का फैसला कर चुका है.

अफगानिस्तान के पाकतिका राज्य के गवर्नर मोखलस अफगान ने अपने बयान में सुष्मिता के जज्बे को सलाम करते हुए कहा है कि धर्म बदल कर सुष्मिता ने अफगानिस्तानी युवक से निकाह किया और उस प्रेम का ही तकाजा था कि वह स्वदेश छोड़ कर यहां की हो गई. उस की हत्या से अफगानिस्तान का सिर हमेशा के लिए झुक गया है.

अफगानी गवर्नर का बयान वास्तव में मानवता का ही परिचायक है. दरअसल, तालिबानी हैवानियत की गिरफ्त में वहां इंसानियत की सांस, बस, आजा रही है.

पाठकों की समस्याएं

मैं 25 साल का युवक हूं और एक लड़की से 3 साल से प्यार करता हूं. वह भी मुझे बहुत प्यार करती है. हम दोनों एक ही जाति के हैं और शादी करना चाहते हैं. समस्या यह है कि मैं लड़की के मातापिता से इस बारे में बात करने से डरता हूं क्योंकि सुना है कि वे गुस्से वाले हैं. हालांकि लड़की की मां अच्छी हैं पर डरता हूं कि कहीं वे हमारे प्यार की बात अपने पति से करें और वे नाराज हो कर हमारे रिश्ते की बात से इनकार कर दें. क्या करूं? उचित सलाह दें.

जब आप ने प्यार किया है तो इस बारे में लड़की के मातापिता से खुल कर बात करें और आप अगर अपने पैरों पर खड़े हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं तो इस बात के लिए भी दिमागी रूप से तैयार रहें कि अगर लड़की के मातापिता रिश्ते से इनकार कर देते हैं तो आप परिवार वालों की इच्छा के खिलाफ भी उस लड़की से शादी कर के उस के साथ अलग रह लेंगे. तभी इस रिश्ते को आगे बढ़ाएं वरना इस रिश्ते के बारे में सोचना बंद कर दें.

 

मैं रेलवे में गार्ड की नौकरी करता हूं. मेरे औफिस में कार्यरत एक लड़की ने पहले स्वयं को बेसहारा बता कर मुझ से दोस्ती की और बाद में शादी का प्रस्ताव रखा. पहले मैं ने इनकार कर दिया लेकिन जब वह अपनी मजबूरियां बता कर रोने लगी तो भावुक हो कर मैं ने हां कर दी. शहर में अकेला होने के कारण वह लड़की मेरे साथ मेरे फ्लैट में रहने लगी. इस दौरान पता चला कि लड़की का किसी अधिक उम्र के विवाहित पुरुष के साथ पिछले 10 वर्षों से नाजायज संबंध है और उस के गलत चालचलन के कारण ही उस के परिवार वालों ने उस से रिश्ता तोड़ा था. अब मैं उस लड़की से हरगिज शादी नहीं करना चाहता और मैं ने वकील से एक एफिडेविट भी बनवा लिया है जिस में उस लड़की ने खुद लिखा है कि उस का किसी और के साथ संबंध है और वह मुझ से शादी करने से इनकार करती है. इस के बावजूद वह लगातार मुझ पर शादी के लिए दबाव डाल रही है. मैं क्या करूं, उचित सलाह दें?

पहली गलती तो आप ने यह की कि भावुकता में आ कर उस को अपने साथ रहने की स्वीकृति दे दी. अब जब आप को उस के अवैध संबंधों का पता चला है तो आप कानूनी दांवपेंच खेल रहे हैं. ऐसे मामलों में एफिडेविट का कोई मतलब नहीं होता. अब अगर आप उस लड़की से शादी कर सकते हैं तो कर लें. जहां तक किसी अन्य पुरुष के साथ संबंधों की बात है तो आप से विवाह के बाद वे संबंध अपनेआप समाप्त हो जाएंगे. आप से शादी का दबाव भी शायद वह इसलिए डाल रही हो कि उस को आप से लगाव हो गया हो, वह आप के साथ अपनी जिंदगी गुजारना चाहती हो.

 

मैं कालेज का छात्र हूं. जब भी मैं पढ़ने बैठता हूं, पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता. सुबह सोचता हूं रात को पढ़ूंगा, रात को सोचता हूं, सुबह होते ही पढ़ूंगा. पढ़ाई बिलकुल नहीं हो पा रही, मेरी परीक्षाएं भी नजदीक आ रही हैं. समझ नहीं आ रहा, क्या करूं?

पढ़ाई में आप का मन न लगने का कारण शायद आप के द्वारा गलत विषय का चुनाव करना है. हो सकता है जो विषय आप ने चुना है वह आप की रुचि का न हो और आप को उस को पढ़ने में मजा न आता हो. इसलिए समय रहते अपनी पसंद का विषय चुनें और मन लगा कर पढ़ाई करें. विषय जब आप की रुचि और पसंद का होगा तो आप का खुदबखुद पढ़ाई में मन लगने लगेगा.

 

मैं 32 वर्षीय युवक हूं. भाई के विवाह को 2 वर्ष हो चुके हैं लेकिन मेरा विवाह अभी तक नहीं हुआ है. विवाह न होने के कारण मैं घर में अकेलापन महसूस करता हूं, एक साथी की जरूरत महसूस होती है और साथी के अभाव में मन पागल सा रहता है, मन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा. घर वालों से इस बारे में बात करता हूं तो वे कहते हैं कोई अच्छी लड़की मिलेगी तो विवाह कर देंगे.

आप की विवाह की चाहत या साथी की जरूरत स्वाभाविक है, लेकिन विवाह न होने का अर्थ यह नहीं कि आप खुद पर नियंत्रण खो दें. आत्मनिर्भर हैं, अपने विवाह के लिए अपने परिवार वालों पर निर्भर रहने के बजाय आप अपने फ्रैंड सर्कल, औफिस में अपनी पसंद का जीवनसाथी खुद ढूंढ़ें. अपने पहनावे, व्यवहार, बातचीत के तरीके में बदलाव लाएं, हो सकता है आप के विवाह में देरी का कारण इन में से कोई हो.

 

मैं 25 वर्षीया विवाहिता हूं. पति की दूसरी शादी है जबकि मेरी पहली. शादी को 3 साल हो चुके हैं. पति का 15 साल का एक बेटा भी है. पति की आयु 41 वर्ष है. मेरी समस्या यह है कि पति कभी भी सैक्स के लिए खुद पहल नहीं करते. क्या हमारे बीच आयु का अंतर तो इस का कारण नहीं? मुझे पति का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगता.

आप व्यर्थ ही इस बात को ले कर परेशान हो रही हैं. पति सैक्स के लिए पहल नहीं करते तो उन में थोड़ा सा अपराध भाव हो सकता है. अगर आप के पहल करने के बाद वे सैक्स में रुचि दिखाते हैं तो परेशानी की कोई बात नहीं है. उन के इस व्यवहार के पीछे हो सकता है उन की मंशा आप की इच्छाओं का सम्मान करना हो और वे आप के साथ आप की इच्छा के विरुद्ध सैक्स न करना चाहते हों. पति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए आप उन के साथ कुछ समय दिन में भी अकेले में बिताएं. जिस दिन आप उन से सैक्स चाहती हों, उस दिन सुबह या शाम से ही उन से थोड़ी सैक्सी फ्लर्टिंग कर के देखें ताकि वे आप से खुल जाएं.

 

ऐसा भी होता है

मैं अपनी पड़ोसिन की आदत से परेशान थी क्योंकि वह बहुत झूठ बोलती थी. अगर दूध 40 रुपए लिटर होता तो वह कहती, 45 रुपए लिटर, यानी हरेक चीज का दाम बढ़ा कर बताती. कभी कहती, हम तो सबकुछ फ्रैश खाते हैं.  
एक दिन मैं और मेरी पड़ोसिन एकसाथ मछली लेने के लिए गए. एक जगह मछली 80 रुपए प्रति किलो मिल रही थी और दूसरी जगह 120 रुपए प्रति किलो. मैं ने 80 रुपए प्रति किलो वाली मछली ली पर उस ने 120 रुपए वाली.
उस ने मुझ से पूछा, ‘‘आप ने कितने रुपए वाली मछली ली?’’
मैं ने कहा, ‘‘80 रुपए.’’
‘‘आप ने मुझे 80 रुपए वाली मछली क्यों नहीं बताई?’’
तब मैं ने कहा, ‘‘आप तो सब फ्रैश ही खाती हो.’’
इस घटना के बाद से मेरी पड़ोसिन ने मुझ से झूठ बोलना कम कर दिया.
मृदुला कुमारी, सिकंदराबाद (आंध्र प्रदेश)

*
देशविदेश के कई सितारा होटलों के औपचारिक स्वागत के अभ्यस्त मन पर, अमृतसर के एक होटल में हुए आत्मीयता से ओतप्रोत स्वागतसत्कार ने, एक अमिट छाप छोड़ दी. हाल ही में भ्रमण के दौरान हम अमृतसर में एक होटल में ठहरे. अगले दिन जब चैकआउट कर रहे थे, शाम के 7 बज चुके थे. हम औपचारिकताओं को पूरा करने में व्यस्त थे कि तभी होटल की ओर से चायनाश्ता आ गया.
समय कम होने के कारण यह तय किया कि रात का खाना स्टेशन पर ही खाएंगे. जब होटल मालिक को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने टे्रन की पैंट्रीकार के भोजन की खराब क्वालिटी के बारे में बताते हुए होटल में ही खाना खाने की सलाह दी.
समयाभाव के कारण हम वहां खाना खाने के पक्ष में नहीं थे. यह जान कर होटल मालिक ने तत्काल हम 5 व्यक्तियों के लिए खाना पैक करा दिया. हमारे बहुत कहने के बावजूद उन्होंने नाश्ते व खाने के पैसे लेने से इनकार कर दिया. इतना ही नहीं, मेवावाला अमृतसरी गुड़, जो हम ने उन से कह कर मंगवाया था, ला कर दिया और उस के भी पैसे लेने से इनकार कर दिया. जब हम ने बिना पैसे गुड़ लेना स्वीकार नहीं किया तब कहीं उन्होंने पैसे लिए. होटल के गेट तक आ कर हमें विदा किया. ऐसा लगा मानो हम होटल से नहीं बल्कि किसी अपने के घर से विदा हो रहे हैं, एक सुखद याद लिए.
सतीश चंद्र रस्तौगी, साहिबाबाद, (उ.प्र.)

इन्हें भी आजमाइए

  1. अपने परिचितों को दफ्तर में आमंत्रित न करें. दफ्तर आप का कार्यस्थल है इसलिए दफ्तर के समय अपने परिचितों और मित्रों को वहां बुलाना, चाय आदि पिलाना कार्यालय की मर्यादा के अनुकूल नहीं है. आप का यह व्यवहार गलत ही होगा. दोएक बार तो अधिकारी व सहयोगी इसे अनदेखा कर देंगे पर हमेशा नहीं.
  2. जब आप अस्पताल में रोगी का हाल पूछने जाएं तो उतनी ही देर रुकें जितना कि आवश्यक हो. कई बार मरीज के संबंधी अस्पताल में भी खानेपीने जैसी स्वागतसत्कार की औपचारिकता में फंस जाते हैं, यह उचित नहीं है. इस तरह का अवसर घर वालों के विवश करने पर भी टाला जाए.
  3. आप चाहें तो रसोई की शोभा दीवार पर खूबसूरत पेंटिंग लगा कर व ताजे फूलों का गुलदस्ता सजा कर बढ़ा सकती हैं. खिड़की और दरवाजे पर जालीदार परदे लगा दें तो चारचांद लग जाएंगे परंतु ध्यान रखें कि परदे ऐसे बांधें कि वे हवा से उड़ें नहीं.
  4. आप जब मेहमान के तौर पर जा रहे हैं तो मेजबान के बच्चों के लिए कुछ उपहार या मिठाई इत्यादि ले जाना न भूलें. उपहार चाहे कीमती न हो परंतु ऐसा अवश्य हो जो बच्चों के काम आने वाला और पसंद आने वाला हो. इस से मेजबान और उन के बच्चे आप को याद रखेंगे.

सफर अनजाना

मैं और मेरी पत्नी अपने एक करीबी रिश्तेदार की बेटी की शादी से अपने घर के लिए वापस लौट रहे थे. रात का सफर था और हमें टाटानगर रेलवे स्टेशन से पटना जंक्शन के लिए ट्रेन पकड़नी थी. हमारे पास 2 ट्रौली बैग में कीमती सामान व 75 हजार के आसपास नकद रुपए थे. हमें काफी चिंता हो रही थी. खैर, हम लोग ट्रेन में चढ़े और सारा सामान बर्थ के पास ही चैन से बांध कर रख दिया ताकि सामान चोरी न हो सके और हम आराम से सो सकें. देर रात तक सामने के यात्रियों से बातें करतेकरते हमें नींद आने लगी.
रात्रि 3.30 बजे मेरी नजर जब सामान पर पड़ी तो सामान चोरी हो चुका था. होहल्ला मचाने पर एक व्यक्ति, जो कोच के पास ही था, ने बताया कि 2-3 व्यक्तियों के पास 2 ट्रौलियों वाले बैग थे जो पिछले स्टेशन पर उतर गए थे. किसी को भी यह आभास नहीं हुआ कि वह चोरों का गिरोह था. अब तक ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी और कुछ भी कर पाना संभव नहीं था. ट्रेन के कोच में सुरक्षा बल या कोच अटेंडैंट नहीं थे.
इस घटना को शातिर चोरों द्वारा अंजाम दिया गया था. पटना जीआरपी से पता चला कि इस रूट पर अटैची चोरों का गिरोह सक्रिय है, जिन्हें अभी तक कंट्रोल नहीं किया जा सका है. उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि कोई भी सूचना मिलने पर जीआरपी उन्हें सूचित करेगी. पर आज तक हमें कोई सूचना नहीं मिली है और न ही मिलने की उम्मीद है. इस तरह हमें हजारों का चूना लग गया.
विनय कुमार श्रीवास्तव, पटना (बिहार)


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अक्तूबर का महीना था. मैं और मेरी पत्नी स्वारघाट बस स्टौप के पास खड़े थे. चंडीगढ़ से मनाली जाने वाली 2-3 बसें वहां से गुजरीं परंतु किसी भी ड्राइवर ने बस नहीं रोकी. हमें बिलासपुर पहुंचना था और शाम के 7 बज चुके थे.
तभी एक ट्रक वाला हमारी परेशानी समझ कर हम से कहने लगा, ‘उसे मंडी जाना है,’ हम उस ट्रक में बैठ गए. ट्रक ड्राइवर सरदार था, उसे देख कर हमें थोड़ा डर लगा. पूरे रास्ते में उस ड्राइवर ने हमें बताया कि किस प्रकार धर्म ने आम आदमी को बरगला कर जेहादी बना दिया है.  मानव का मानवता से रिश्ता खत्म हो रहा है. अब कोई किसी पर विश्वास नहीं करता है.
उस ड्राइवर ने हमें सहीसलामत सही स्थान पर पहुंचा दिया. हम ने उसे बतौर किराया कुछ रुपए देने चाहे तो वह कहने लगा, ‘‘भाईसाहब, आप घर पहुंच गए, यही मेरा किराया है.’’ यह घटना जब याद आती है तो दिल खुश हो जाता है कि संसार में ऐसे भी नेकदिल लोग हैं.
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर, (हि.प्र.)

मौसम रुलाएगा हमें

किसी की आंख से आंसू
नहीं निकले तो क्या निकले
समंदर से मोती
नहीं निकले तो क्या निकले

किसी को दे दिया कुछ तो
इसे एहसान मत मानो
जबां से बोल दो मीठे
नहीं निकले तो क्या निकले

भले ही मंजिलों तक तुम
किसी के साथ मत जाओ
तुम साथ हमदम के
नहीं निकले तो क्या निकले

बहुत खुश हो बहारों में
खिजाएं भी रुलाएंगी
हवा के साथ बागों में
नहीं निकले तो क्या निकले

बहुत कुछ ढूंढ़ते हो
कहीं आंखें नहीं टिकतीं
निगाहों से किसी की गर
नहीं फिसले तो क्या फिसले

अकेले हो सफर में
दूर तक रुलाएगा मौसम
‘भ्रमर’ के साथ राहों में
नहीं निकले तो क्या निकले.
– राकेश भ्रमर
 

मर्सिडीज ई 200 सीजीआई

अगर आप नई लग्जरी कार खरीदने का मन बना रहे हैं तो पेश है मर्सिडीज बेन्ज का नया अवतार ई 200 सीजीआई. आइए, नजदीक से जानें इस लुभावनी कार को.

भारतीय बाजार में एक से बढ़ कर एक शानदार कारों को पेश करने वाली जरमनी की प्रमुख कार निर्माता कंपनी मर्सिडीज बेन्ज ने सीडान कार ई क्लास के नए अवतार को उतारा है. आकर्षक लुक और दमदार इंजन क्षमता से लैस मर्सिडीज की यह कार कई माने में शानदार है. 4 सिलैंडर, टर्बोचार्ज के फीचर्स से सजी यह कार भीड़भाड़ वाले इलाके व हाइवे पर आसानी से हवा से बात करने में सक्षम है.

अगर आप एक अच्छी शोफर ड्रिवन कार में बैठने का अनुभव लेना चाहते हैं तो इस कार को अपनी कार बना सकते हैं. 10.4 किलोमीटर प्रति लिटर की फ्यूल इकोनौमी वाली इस कार के पीछे की सीट में हर वेस्ट साइज के लिए पूरा स्पेस है.

ब्लूटूथ कनैक्टिविटी, संचालित सीटें, पार्किंग सैंसर, इलैक्ट्रिक स्टीयरिंग, मल्टीलिंक सस्पैंशन और 5.65 मीटर का टर्निंग रेडियस इस लग्जरी कार की खूबियां हैं. कार का नया इंजन बेहतर माइलेज देता है. इस के साथ ही, नई इंटैलीजैंस असिस्टैड प्रणाली और नई डिजाइन शैली के माध्यम से ई क्लास की इस श्रेणी को स्पोर्टी लुक दिया गया है. पैट्रोल वैरिएंट में ई 200 का सीजीआई का इंजन इस कार को स्पैशल बनाता है. हालांकि यह कार वैकल्पिक एमएमजी किट के साथ नहीं आती जिस में 18 इंच के बड़े व्हील होते हैं फिर भी इस की टैस्ट ड्राइव स्मूथ है.

इस कार के पैट्रोल वैरिएंट में 2 लिटर का इंजन लगा है जो कार को 184 बीएचपी की जबरदस्त पावर देता है. मर्सिडीज की इस लग्जरी कार में रिवर्स कैमरा, ईको स्टार्ट सिस्टम के साथ 8 एयर बैग दिए गए हैं. अगर आप बाजार में 50 लाख तक की लग्जरी कार खरीदने निकले हैं तो आकर्षक फीचर्स वाली पेनौरेमिक वैरायटी के बजाय रेगुलर साइज के सनरूफ वाली यह कार आप को अवश्य लुभाएगी.

-दिल्ली प्रैस की अंगरेजी पत्रिका बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग से

बाल बाल बचे

बात मेरी शादी के 4 दिन बाद की है. हम लोग घूमने गए थे. एक जगह एक सर्किल पर, जहां गांधीजी की मूर्ति बनी हुई थी, उस की मुंडेर पर बैठ गए. उस समय रात के 8 बजे थे. सड़क पर लोग आजा रहे थे. मैं सैंडिल उतार कर मुंडेर पर पैर लटका कर बैठ गई. थोड़ी देर बाद मेरे पति बोले, ‘‘चलो उठो, घर चलें.’’
मैं सैंडिल पहनने लगी, तभी मैं ने देखा कि एक लंबाचौड़ा आदमी कुरता व तहमत पहने हमारी तरफ आ रहा था. वह हम से बोला, ‘‘तुम लोग यहां क्यों बैठे हो?’’ और हमारे ऊपर जोरजोर से चिल्लाने लगा.
मेरे पति ने उस से कहा कि हम अभी फौरन यहां से जा रहे हैं. मगर उस ने चाकू निकाल लिया और मेरे गले पर हाथ मारा. मैं ने सोने का सैट पहन रखा था. इस पर मेरे पति व उस में कहासुनी होने लगी. मेरे पति ने मुझ से कहा, ‘‘तुम भाग जाओ,’’ मैं भागने लगी.
तब वह आदमी चिल्लाया, ‘‘कहां भागेगी. वहां मेरे 2 आदमी और खड़े हैं.’’ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किस दिशा में भागूं. भागतेभागते घबराहट में गिर भी पड़ी. इतने में मेरे पति भी मौका देख कर भाग आए और मुझे उठा कर सही दिशा में ले भागे क्योंकि उन्होंने भी उन 2 आदमियों को देख लिया था. वे तीनों आदमी ट्रक से एकसाथ उतरे थे. उस दिन पति की सूझबूझ से हम बालबाल बचे.
आशा गुप्ता, जयपुर (राजस्थान)

मेरे भांजे की शादी थी. हम 20 लोग शादी में सम्मिलित होने नागपुर गए थे. शादी अच्छी तरह से संपन्न हुई. नागपुर से हम लोग सभी टे्रन से वापस हावड़ा के लिए रवाना हुए. दूसरे दिन सुबह 6 बजे के आसपास ट्रेन में बहुत जोरदार आवाज हुई. लगभग सभी सो रहे लोग हड़बड़ा कर उठे. देखा कि ट्रेन की 3-4 बोगियां पटरी से उतर कर टेढ़ी हो गई हैं.
हम लोग जिस डब्बे में थे वह भी टेढ़ा हो गया था. चारों ओर अफरातफरी मच गई. टे्रन जहां रुकी थी, वह जंगल का इलाका था. धीरेधीरे सभी यात्री उतरे.
गनीमत यह थी कि कोई भी गंभीर रूप से जख्मी नहीं हुआ था. थोड़ी देर में राहत सामग्री ले कर एक वैन पहुंच गई. अपनेअपने सामान के ऊपर बैठे सब लोग अंत्याक्षरी खेलने लगे. हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई थी. जंगल में मंगल हो रहा था. करीब 3 घंटे बाद एक दूसरी टे्रन आई. उस में सब यात्री चढ़े. जमशेदपुर में रेलवे की तरफ से सब को गरमागरम खाना दिया गया. जब हम हावड़ा पहुंचे, सब के परिजन स्टेशन पर खड़े थे. सब को सकुशल देख कर रिश्तेदारों ने राहत की सांस ली.
सुमंत मोहंता, कोलकाता (प. बंगाल)

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