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करीब लाती है देहगंध

वैज्ञानिकों का मानना है कि प्यार की बढ़ती पींगों में दिल कहीं नहीं आता, यह तो सिर्फ शरीर से निकलते खास कैमिकल्स का खेल है जो प्यार के बीजों को सींचते हैं और एक दिन ये बीज प्यार रूपी पौधे में विकसित हो जाते हैं.

अमेरिका के पश्चिमी भाग में चूहों की ‘प्रेयरी बोल’ नामक एक प्रजाति पाई जाती है. यह अलग किस्म का चूहा है. घरेलू चूहों से यह न केवल रंगरूप और आकार में अलग है बल्कि इस की आदतें भी अलग हैं. वैज्ञानिकों ने इस को ले कर की गई रिसर्च में पाया कि चूहा प्यार में जल्दी पड़ जाता है. इन प्रयोगों के लिए उन्हें 5 साल का लंबा समय लगा. वैज्ञानिकों ने चूहों को आधार बनाते हुए बताया कि मानवीय प्रेम में भावनात्मक लगाव जैसी कोई बात नहीं है. असल में तो यह सिर्फ कैमिकल्स का खेल है.

चूहों पर इन कैमिकल्स के टैस्ट के दौरान पाया गया कि जब इस प्रजाति के नर और मादा चूहे कम से कम 12 घंटे धूप में साथ नहीं रह लेते, वे शारीरिक मिलन नहीं करते हैं. यही कारण है कि प्यार की यह बौछार वसंत ऋतु में ही हो पाती है, जब कुनकुनी धूप उन्हें सेंकती है, उन की चुहलबाजियों को बढ़ाती है और एकदूसरे के शरीर की छुअन शरीर में कैमिकल्स का स्राव करती है तब उन की प्रेम की कहानी का आगाज होता है.

इस दौरान वैज्ञानिकों ने चूहों के मस्तिष्क में ऐसे कैमिकल्स का पता लगाया जो शारीरिक मिलन के खास तत्त्व हैं. वसंत बीतते ही ‘प्रेयरी बोल’ प्रजाति के नर चूहों में ‘फिरोमन’ नामक एक तेज गंध वाला कैमिकल निकलता है जो मादा चूहे को अपनी ओर आकर्षित करता है. जब वे एकदूसरे के साथ रहने लगते हैं तो कुछ समय बाद ही नर चूहों के शरीर में ‘टेस्टेरोन’ हार्मोन में बढ़ोतरी हो जाती है जो उन के शुक्राणुओं को भी बढ़ा देती है.

वसंत ऊर्जा की ऋतु है. ठंड का ठहराव न केवल शारीरिक क्रियाओं को बल्कि सामान्य गति को भी कम कर देता है. वसंत मन को इस हद तक प्रफुल्लित कर देता है कि शादीशुदा जोड़े भी अपने रोमांस में कमनीयता ले आते हैं. सब से ज्यादा गर्भ भी इस ऋतु में ही धारण किए जाते हैं. वसंत ऋतु में स्पर्श शरीर के जर्म्स यानी कीटाणुओं को मौत थमाता है.

मजे की बात यह है कि वैज्ञानिकों ने जब लैबोरेटरी में ही वसंत का कृत्रिम माहौल पैदा किया तो मादा चूहा खुद ही नर चूहों की ओर लपकने लगा. इस से यह पता चला कि वसंत ऋतु मादकता पैदा करती है.

नर की उत्तेजना को नियंत्रित करने में ‘नाइट्रिक औक्साइड’ बहुत प्रभावी है. ये कैमिकल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को उत्तेजित करने और नियंत्रित करने में न्यूरो ट्रांसमीटर की तरह काम करता है. चूहों पर किए गए प्रयोग में वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे ही ‘नाइट्रिक औक्साइड’ बनाने वाले एंजाइम यानी ‘एनओएस’ बेकार होते हैं, बेताबी से लिपटे नरमादा चूहे अलग हो जाते हैं. बस यही महत्त्वपूर्ण बात थी जिस ने सिर्फ कैमिकल्स से उपजे प्रेम की बात साबित की.

अब सिर्फ एक के पीछे की दीवानगी को समझना जरूरी है. असल में एक के पीछे की दीवानगी भी कैमिकल का ही खेल है. वैज्ञानिकों ने पाया कि नर चूहों में ‘वेसोप्रोसिन’ और मादा चूहों में ‘औक्सीटोसिन हार्मोन’ ज्यादा असरकारी होते हैं, जो एक ही के प्रति दीवानगी को जन्म देते हैं.

वेसोप्रोसिन इतना प्रभावी नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि ‘वेसोप्रोसिन’ की ज्यादा मात्रा मादा के प्रति लगाव पैदा कर देती है. वह भी इस हद तक कि अगर उसे कोई और छुए तो भी बात मरनेमारने पर आ जाती है. यही है प्रेम की चरम सीमा. यही हाल मादा में ‘औक्सीटोसिन हार्मोन’ की ज्यादा मात्रा पैदा करती है. काश ये कैमिकल्स वहां निकल पाते जहां नफरत हिलोरे लेती है.

आज फाइव स्टार होटलों की संस्कृति कुछ भी हो, मगर बदले रूप में ही सही यहां वसंतोत्सव मनाया जाता है. गरमियोंसर्दियों में इंटरनैट पर इतनी चैटिंग नहीं होती जितनी कि वसंत में होती है. असल में शरीर में ‘टेस्टोस्टेरोन हार्मोन’ सारे फसाद की जड़ है. जब करीबी ज्यादा होती है तब मस्तिष्क से ‘फास’ नामक प्रोटीन निकलने लगता है जो यह संकेत देता है कि स्नायु कोशिकाएं पूरी तरह सक्रिय हैं और प्यार की आग धधक रही है. इसलिए अगर लंबी उम्र पानी है तो किसी से दीवानेपन की हद तक प्यार कीजिए.

प्यार न केवल आप के अंदर स्फूर्ति पैदा करता है बल्कि आप की आंतरिक क्रियाओं को भी बदल देता है. जिसे आप शुरू में नहीं चाहते मगर बाद में बेहद चाहने लगते हैं, इस के पीछे भी प्रेम कैमिकल्स का ही स्राव है. हर किसी के तन में अलगअलग देहगंध बसी होती है. देहगंध पर वैज्ञानिकों ने रिसर्च भी की है.

देहगंध पसीने से अलग है

पसीने से जहां दुर्गंध आएगी वहीं देहगंध जरा हट के होगी. यह गंध पुरुष और स्त्री दोनों में  होती है. मगर स्त्री की गंध का खास महत्त्व है. यह गंध जवानी में विपरीत सैक्स के आकर्षण का केंद्र बनती है जो शादी के बाद पतिपत्नी के बीच कड़ी को मजबूत करने में सीमेंट का काम करती है. मां बनने पर यही गंध बच्चे को ममता का पहला पाठ पढ़ाती है.

कुछ समय पहले देहगंध को ले कर कुछ टैस्ट किए गए थे. इस के लिए महिलाओं के ऐसे वर्ग को चुना गया जिन का प्रसव कुछ दिन पहले ही हुआ था. इस में महिलाओं को पहले नवजात शिशुओं के कपड़े सुंघाए गए. इन कपड़ों में उन के अपने बच्चे का भी कपड़ा था.

एकएक कर कपड़ों को सूंघती महिलाएं अपने बच्चे के कपड़े पर आ कर रुक जाती थीं. हर महिला ने इसे दुनिया की सब से बेहतरीन गंध बताया. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस गंध के नथुने में पहुंचते ही महिलाओं को अजब अनुभूति होती है.

कई महिलाओं में रोमांच यहां तक हो गया कि उन के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए. कुछ का शरीर ही कंपन में आ गया और उन की बांहें अपने बच्चे को लेने के लिए मचल उठीं. 

उपरोक्त टैस्ट के उलट एक और टैस्ट किया गया. इस में गोदी के बच्चों को माताओं के कपड़े सुंघाए गए. वैज्ञानिक हैरान थे कि 6 महीने के बच्चे ने भी अपनी ही मां के कपड़ों पर प्रतिक्रिया जाहिर की. कुछ रोते हुए बच्चे तो अपनी मां का कपड़ा सूंघते ही चुप हो गए. जवानी की देहगंध काफी असरदार पाई गई है जो हर किसी को गुमराह कर देती है. किसी युवती के साथ खड़े भर हो लेना, बड़े खजाने के मिल जाने के बराबर होता है.

वैज्ञानिकों के अनुसार, जवानी में जीवधारियों के शरीर में से ऐसे कैमिकल्स का स्राव होता है जो बाद में बनते ही नहीं. यह शरीर में समाई अतिरिक्त ऊर्जा, उत्साह और कई नई शारीरिक क्रियाओं की देन होती है. मनुष्य के अलावा अन्य जीवों में तो यह गंध विपरीत लिंग को आकर्षित करने के लिए खासतौर से निकलती है.

शादी के बाद पतिपत्नी के बीच आकर्षण की कड़ी में देहगंध खास भूमिका निभाती है. शादी के समय कई खुशबूदार पदार्थों जैसे चंदन, चिरौंजी, हल्दी आदि के उबटन का इस्तेमाल देहगंध को और मनभावन करने के लिए किया जाता है ताकि ‘पिया मन भाए’. आजकल ‘बौडी स्प्रे’ यानी परफ्यूम ने यह जगह ले ली है.

सुहागरात की सजावट खुशबूदार फूलों से करना भी माहौल में गंध को फैलाना ही है. फिर भी देहगंध अपना अलग ही असर छोड़ती है.

मानवजीवन से जुड़े इस अनोखे अध्याय पर ज्यादा रिसर्च नहीं हुई है. मगर इस में दोराय नहीं है कि भविष्य में यह देहगंध किसी बड़ी महत्त्वपूर्ण रिसर्च का रास्ता खोलेगी जो एकदूसरे को बांधे रखने में सहायक होगी. तब गंध मिलान की नई शाखा पनपेगी और शादी के लिए शायद यह देहगंध मिलान जरूरी हो जाएगा. 

इन्हें भी आजमाइए

  1. यदि आप की घड़ी के अलार्म की आवाज बहुत धीमी है तो आप घड़ी को चीनीमिट्टी की प्लेट में रख दें, अलार्म की आवाज बढ़ जाएगी. और यदि आवाज अधिक तेज है तो उसे किसी रबर के टुकड़े पर रख दीजिए, आवाज मंद पड़ जाएगी.
  2. पुराने ऊनी मोजे का बेबी की दूध की बोतल का कवर बना लीजिए. इस से बेबी बोतल को अच्छी तरह पकड़ सकता है और गिरने पर बोतल के टूटने का डर भी कम रहता है, साथ ही, दूध जल्दी ठंडा नहीं होगा.
  3. पुराने रोएंदार तौलिए के बिना उंगली वाले दस्ताने बना लीजिए. नहाते समय साबुन लगाने के बाद उन्हें पहन कर बदन रगडि़ए, खूब झाग उठेगा और शरीर अच्छा साफ होगा.
  4. दरी या गलीचे को कीड़ों से बचाए रखने के लिए उसे 10-15 दिन में कम से कम एक बार अलसी का तेल मिले हुए गरम पानी में भीगी झाड़ू से साफ कीजिए.
  5. दांत साफ करने के ब्रश को कीटाणुओं से बचाने और ज्यादा दिन तक चलाने के लिए नमक मिले पानी में धो कर, केस में बंद कर के रखें.
  6. छोटे बच्चों को नहलाते समय फर्श पर तौलिया बिछा दें. इस से उन के फिसलने का खतरा नहीं रहेगा और वे निश्चिंत हो कर नहा सकेंगे.

त्वचा मानसून में कैसे चमके

मानसून की ठंडी फुहार में त्वचा को तरोताजा व चमकदार बनाए रखना आमतौर पर मुश्किल होता है लेकिन थोड़ी सी सूझबूझ रख सकती है त्वचा की चमक बरकरार. कैसे, बता रही हैं ललिता गोयल.

गरमी की चिलचिलाती धूप के बाद बारिश की बौछारें वैसे तो तनमन को खुशी से सराबोर कर देती हैं पर साथ ही त्वचा के लिए कई प्रकार की समस्याएं भी ले कर आती हैं. वातावरण में बढ़ी आद्रता के बावजूद त्वचा डिहाइड्रेट हो जाती है व अपनी नमी खोने लगती है. मानसून में त्वचा के प्रति आप की थोड़ी सी लापरवाही आप के सौंदर्य को प्रभावित कर सकती है, आइए जानें मानसून में कैसे रखें त्वचा को चमकदार और खूबसूरत :

  1. त्वचा को अधिक समय तक गीला न रहने दें क्योंकि इस से फंगल इन्फैक्शन हो सकता है.
  2. त्वचा पर कठोर साबुन का प्रयोग न करें.
  3. त्वचा की नियमित क्लींजिंग व टोनिंग करें, ताकि त्वचा सौफ्ट हो.
  4. त्वचा के रोमछिद्रों को साफ रखें. टोनर अल्कोहल फ्री ही चुनें.
  5. ब्लैक हैड्स से बचाव के लिए इस मौसम में नैचुरल स्क्रबिंग करना न भूलें.
  6. लाइट लोशन बेस्ड मौइश्चराइजर या सीरम का प्रयोग करें जिस से त्वचा की नमी व चमक बरकरार रहे.
  7. बादलों के बीच से झांकती सूरज की किरणें भी त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं इसलिए घर से बाहर निकलने के 20-25 मिनट पूर्व सनस्क्रीन लगाना न भूलें. सनस्क्रीन लोशन एलर्जी व अल्ट्रावायलेट किरणों से आप की त्वचा की सुरक्षा करेगा.
  8.  मानसून में चिपचिपी त्वचा में मेकअप जरा संभल कर करें. मेकअप करने से पूर्व हाथों को अवश्य साफ करें. वाटरप्रूफ, मसकारा, आईलाइनर व काजल का प्रयोग करें. हलके रंग की लिपस्टिक का चुनाव करें. 

ऐसा भी होता है

कुछ दिन पहले एक अजीब सी घटना घटी. उसे भूलना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है. दीवाली की खरीदारी के लिए मैं बाजार में थी, एकाएक चूडि़यों का ठेला मेरे पास से गुजरा. उस ठेले पर जो नवयुवक रंगबिरंगी चूडि़यां बेच रहा था वह करोड़पति बाप का पुत्र था. मेरा माथा ठनका. मैं उसे व उस के परिवार को जानती थी. मुझ से रहा नहीं गया अत: उस से सारा माजरा पूछा. उस ने ठेला एक तरफ कर के बड़ी शांति से बताया कि मातापिता उस के प्रेमविवाह से खुश नहीं थे. गरीब लड़की से शादी करना उन के गले न उतरा. मेरी पत्नी को एक कामवाली बाई जैसा व्यवहार सहन करना पड़ रहा था, बदले में धमकी भी हजारों बार मिलतीं कि अरबों की संपत्ति हड़पने के लिए हमारा बेटा ही मिला था?

‘‘मैं ने वह संपत्ति ही ठुकरा दी. किराए का कमरा ले कर अलग रहता हूं व अपनी मेहनत की खाता हूं.’’ उस की बातें सुन कर मैं गद्गद हो गई.

मुग्धा पांडे, अजमेर (राज.)

 

घटना मेरे गांव की है. वहां ग्राम पंचायत चुनाव होने जा रहा था. मतदाताओं को लुभाने के लिए उम्मीदवार तरहतरह के हथकंडे अपना रहे थे. महिला मतदाताओं के लिए मिठाइयां व फल और पुरुषों के लिए उन का प्रिय पेय शराब बांटी जा रही थी.

हमारा पड़ोसी सभी उम्मीदवारों से माल खापी रहा था. एक दिन एक उम्मीदवार के आदमी उसे शराब के 4 टैट्रा पैक दे गए. शाम को अंधेरा था और बिजली भी नहीं थी. उस ने सोचा कि और दिन तो प्लास्टिक थैली में शराब देते थे, आज तो फ्रूटी दे गए. उस ने अंदर से अपने 2 पौत्रों को बुलाया और उन्हें पैक दे कर कहा, ‘‘जाओ, तुम भी पी लो और एकएक अपनी मम्मी और दादी को दे देना.’’

बच्चे खुशीखुशी चारों पैक अंदर ले गए. और सभी ठंडीठंडी फू्रटी समझ कर पीने लगे. दादी बोलीं, ‘‘फू्रटी कुछ कड़वी लग रही है.’’

बच्चा पीता हुआ बोला, ‘‘दादीमां, कोकाकोला मिलाया होगा, बहुत टेस्टी लग रही है.’’ और बिना पानी मिलाए चारों गटक गए. जब पड़ोसी का बेटा घर आया तो वहां का नजारा देख कर भौचक्का रह गया. कोई किसी ओर झूम रहा था, कोई नाच रहा था, कोई बड़बड़ा रहा था. उस ने अपनी पत्नी से पूछा कि क्या हुआ तुम सब को? पत्नी ने बताया कि हम ने फू्रटी पी है, तब से चक्कर से आ रहे हैं. उस ने पैक को देखते ही अंदाजा लगा लिया कि इन्होंने आज शराब पी है. तब उस ने अपने पिताजी को बुलाया और घर का नजारा दिखाया. चुनावों में शराब बंटवाने का नतीजा साफ था जिसे पूरा घर झेल रहा था.

पूनम शर्मा, सहारनपुर (उ.प्र.)

सन्नाटा

कुछ हारी हुई जिंदगी और हारे हुए हम

कुछ आंसू, कुछ तनहाई और थोड़े गम

साए में लिपटी हुई

एक चुप सी मुसकान

होंठों पर फैलने को बेचैन

 

सांसों में घुला हुआ गीत

कोशिश में अधरों पर फैलाने को संगीत

आंखों के कोने पे सूखे से आंसू

सूखे से आंसू में एक सूखी सी चाहत

 

पैरों से रौंदे हुए सूखे से सपने भी

और एक परिहा सा दिल

दबेदबे से अरमान

और कत्ल किए हुए जज्बात

घुटाघुटा मरामरा सा सब

एक सन्नाटे में छिपा हुआ सब.

-दीपशिखा टेलटिया

 

घुटघुट के जीना सीखा है

रिश्तों की मर्यादा में

घुटघुट के जीना सीखा है

कुछ पल खुशियां पाने को

आंसू को पीना सीखा है

 

तानेउलाहने सुन कर हम

बने रहे हर बार अनजान

वो हमें सताते रहे

हमें न समझा कभी इनसान

 

सब के पनघट का पानी

अभी तलक न रीता है

रिश्तों की मर्यादा में

घुटघुट के जीना सीखा है

 

मन की गहराई में जो उतरे

उलझन की लहरों ने घेरा

रात बीती रुसवाई में

बेबस निकला सुबहसवेरा

 

मौसम की सही अगन

घावों को नित सीना सीखा है

रिश्तों की मर्यादा में

घुटघुट के जीना सीखा है

 

ठोकर खा कर इतना जाना

स्वार्थ की पसरी है धुंध

सबकुछ सहा खामोशी में

हम ने अपनी ली आंखें मूंद

 

वो सितम पे सितम रहे ढहाते

हम ही जानते जो हम पे बीता है

रिश्तों की मर्यादा में

घुटघुट के जीना सीखा है.

-राखी पुरोहित

ऋतुविहीन हो गया फिल्म उद्योग

ऋतुपर्णो घोष ने अपनी बेहतरीन फिल्मों के जरिए संवेदना और संबंधों को ऐसा उकेरा जिस से भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय मंच तक ख्याति मिली. रिलेशन से ले कर इमोशन तक को परखनेसमझने वाले ऋतुपर्णो की जिंदगी के पन्नों को उलट रही हैं साधना शाह.

महज 21 साल के फिल्मी कैरियर में 50 वर्षीय ऋतुपर्णो घोष भारतीय सिनेमा को एक विरासत दे गए. उन के कैरियर की शुरुआत बंगला फिल्म से हुई. यह भी सच है कि बंगाल की मिट्टी में एक से बढ़ कर एक निर्देशक पैदा होते रहे हैं. ऋत्विक घटक, सत्यजित रे, मृणाल सेन से ले कर गौतम घोष और संदीप राय तक…बहुत लंबी फेहरिस्त है. लेकिन 90 के दशक से पहले यहां के फिल्म उद्योग में एक शून्य सा व्याप्त हो गया था. उस शून्य को युवा ऋतुपर्णो घोष ने भरा था. रिलेशन से ले कर इमोशन तक को परखनेसमझने का जो नजरिया ऋतुपर्णो के पास था वह तब के बहुत कम निर्देशकों में था. मानव स्वभाव की बारीकियों को बड़े ही सहजसरल अंदाज में सैलूलाइड के परदे पर उतारने का हुनर ऋतुपर्णो के पास था. यह अपने काम के प्रति समर्पण ही है कि लंबी नींद सोने से एक दिन पहले उन्होंने ‘सत्यान्वेषी’ फिल्म को पूरा किया.

1992 में ‘हीरेर आंगटी’ और फिर 1994 में ‘19 शे एप्रिल’ से ले कर 2013 में ‘सत्यान्वेशी’ तक बंगला, अंगरेजी और हिंदी में उन के द्वारा बनाई गई कुल 23 फिल्में भारतीय फिल्म उद्योग की थाती हैं. अपने 21 साल के कैरियर में ऋतुपर्णो की लगभग हरेक फिल्म को किसी न किसी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. अभी उन की 3 फिल्में रिलीज होनी बाकी हैं.

पहले ही कदम में छा गए

विज्ञापन की दुनिया से होते हुए ऋतुपर्णो ने फिल्म उद्योग में कदम रखा. उन का फिल्मों में पदार्पण कम रोचक नहीं है. उन के आवास ‘तासेर घर’ में श्रद्धांजलि देने आए बंगला फिल्म उद्योग के जानेमाने वरिष्ठ अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने ऋतुपर्णो से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए बताया कि 1990-91 में चिल्डे्रन फिल्म सोसाइटी औफ इंडिया की ओर से एक पटकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. प्रतियोगिता के लिए बहुत सारी एंट्री आईं. इन्हीं में एक एंट्री ऋतुपर्णो की थी. पटकथा का नाम था: ‘हीरेर आंगटी’ यानी हीरे की अंगूठी. बंगला की इस पटकथा को सर्वश्रेष्ठ पाया गया.

1992 में ‘हीरेर आंगटी’ बनी और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इस के बाद एकएक कर के वे फिल्में बनाते चले गए और हरेक फिल्म को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कोई न कोई पुरस्कार मिलता चला गया. ‘19 शे एप्रिल’, ‘बाड़ीवाली’, ‘रेनकोट’, ‘चोखेरबाली’, ‘द लास्ट लियर’, ‘सब चरित्र काल्पनिक’, ‘सनग्लास’, ‘चित्रांगदा’ सहित 19 फिल्मों को कोई न कोई राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. कह सकते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर के चोखेरबाली को पूर्णता ऋतुपर्णो ने ही दी.

उन की अगर हिंदी फिल्मों की बात की जाए तो हिंदी फिल्मों के कद्रदानों को ‘रेनकोट’ बेशक याद होगी. इस फिल्म में मानवीय संवेदना, मानवीय स्वभाव और संबंधों को बड़ी बारीकी से दिखाया गया है. ऐश्वर्या राय और अजय देवगन की एक प्रेम कहानी थी ‘रेनकोट’.

एक और उल्लेखनीय फिल्म है ‘दा लास्ट लियर.’ यह फिल्म शेक्सपियर के नाटकों के प्रति सनकी एक अभिनेता हरीश (अमिताभ बच्चन) की है.

ऋतुपर्णो बनाम ऋतु पर्नो

एक निर्देशक के रूप में भी विज्ञापन से जुड़ी मानसिकता हमेशा उन के भीतर काम किया करती थी. विज्ञापन तैयार करने के पेशे से जुड़ा व्यक्ति अपने टारगेट को बखूबी पहचानता है. ऋतुपर्णो का फिल्मी दुनिया में आगमन विज्ञापन जगत से ही हुआ था. जाहिर है वे आम दर्शक के लिए फिल्म नहीं बनाते थे. हरेक फिल्म में उन की ‘टारगेट औडिशंस’ अलग रही है. लेकिन आमतौर पर वे ज्यादातर फिल्में समाज के संभ्रांत और परिपक्व तबके के लिए बनाते थे. दरअसल, समाज के इस वर्ग की समस्या और संकट से ऋतु अच्छी तरह वाकिफ थे.

जहां तक परिपक्वता का सवाल है तो एक समय ऐसा भी आया जब उन का नाम ऋतु पर्नो (पोर्नोग्राफी से जोड़ कर) पड़ गया. मजेदार बात यह है कि खास वर्ग के लिए फिल्म बनाने के बावजूद उन की फिल्मों की साहसी विषयवस्तु हर किसी को सिनेमाघर तक खींच कर ले आती थी.

ऋतुपर्णो बनाम नारी व्यक्तित्व

न केवल बतौर निर्देशक, बल्कि अभिनेता के रूप में भी ऋतुपर्णो की फिल्में भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर रही हैं. हालांकि ऋतुपर्णो ने महज 3 फिल्मों में ही अभिनय किया. ये 3 फिल्में हैं, ‘आर एकटी प्रेमेर गोल्प’, ‘मेमोरीज इन मार्च’ और ‘चित्रांगदा’. इस के अलावा उन्होंने कुछ उडि़या फिल्मों में भी अभिनय किया.

‘मेमोरीज इन मार्च’ में गे चरित्र की भूमिका हो या ‘चित्रांगदा’ में महिला का चरित्र, उन के अभिनय को देख कर कोई भी बड़ी सहजता से कह सकता है कि नारी और पुरुष दोनों का व्यक्तित्व ऋतुपर्णो में विद्यमान था. इसीलिए महिला चरित्र सोच व स्वभाव की समझ उन में कूटकूट कर भरी थी.

पर जहां तक उन के भीतर मौजूद नारीव्यक्तित्व का सवाल है तो कहा जा रहा है कि इसी के लिए उन्होंने अपना जीवन कुरबान कर दिया. परिवार में निपट अकेलापन, भयंकर डायबिटीज और पैनक्रियाटिक बीमारी, जटिल हार्मोन थेरैपी, कठिन डाइटिंग और एबडौमिनल सर्जरी के साथ अनिद्रा ने उन्हें भीतर से तोड़ कर रख दिया था.

अंतत: एक सुबह जगाने के बाद भी जब वे नहीं जगे, तो डाक्टर को बुलाया गया. 9 बज रहे थे. डाक्टर ने नींद में दिल के दौरे से मौत की घोषणा के साथ बताया कि उन की मौत हुए कम से कम 6 घंटे हो चुके हैं.

भीड़ में भी अकेलापन

उन के करीबी लोगों का मानना है कि वे अपने मातापिता के साथ मानसिक रूप से बहुत गहरे जुड़े हुए थे. मां की मृत्यु के बाद पिता से. लेकिन दोनों की मृत्यु के बाद वे एकदम अकेले हो गए. इस एकाकीपन में उन के साथ अगर कोई होता तो वे किताबें थीं. लेकिन अपने मातापिता के साथ के यादगार पलों से अपनेआप को ऋतुपर्णो कभी अलग नहीं कर पाए. अपने घर पर एकांत वातावरण में व्याप्त एकाकीपन को उन्होंने खुद ही चुना था.

ऋतुपर्णो घोष के इस एकाकीपन के बारे में प्रख्यात फिल्म निर्देशक अपर्णा सेन बताती हैं कि दीवाली के दिन ऋतुपर्णो ने उन्हें एक मेल कर के लिखा कि रीनादी (अपर्णा सेन के करीबी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं), चारों तरफ दीवाली की जगमगाहट है, और मैं यहां अंधेरे में बैठा हूं. बहुत अकेलापन महसूस कर रहा हूं.

ऋतुपर्णो के करीबी यह भी मानते हैं कि इसी एकाकीपन की ही देन हैं उन की फिल्में, जो भारतीय सिनेमा के लिए किसी बहुमूल्य विरासत से कम नहीं. ऋतुपर्णो के चले जाने से भारतीय फिल्म उद्योग ऋतुविहीन सा हो गया है.

लाइलाज नहीं जैंडर डिस्फोरिया

17 वर्ष का मोहसिन मुंबई में अपनी मां और बहन के साथ अपने मामा के घर में रहता है. जब घर पर कोई नहीं होता तो वह बहन के कपड़े और अंडरगारमैंट्स चुपके से ले कर पहनता और घर में ठुमके लगाया करता था. वह मां की हाईहील सैंडल पहन कर भी घूमता था. उस की इस आदत को पड़ोसी देख कर उस की मां से शिकायत किया करते थे. मां को गुस्सा आ जाता था और वे उसे पीटती थीं, पर उस में सुधार नहीं आया.

ऐसा कई सालों तक चलता रहा. मां को पता था कि उन का बेटा ऐसा है. लेकिन करें तो क्या करें? परेशान हो कर वे मुंबई के सायन अस्पताल में असिस्टैंट प्रोफैसर व मनोरोग चिकित्सक, डा. गुरविंदर कालरा से मिलीं. वे डाक्टर से कहती रहीं कि यह बिगड़ चुका है, इसे सुधारने की आवश्यकता है.

दरअसल, मां को लगता था कि उन के बेटे का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है जिस की वजह से वह लड़का होते हुए भी लड़कियों के कपड़े पहन कर नाचता है.

डा. कालरा का कहना था कि यह लड़का किसी भी रूप में बीमार नहीं है. उस के अंदर ‘जैंडर डिसऔर्डर’ है जिसे चाहें तो आप ठीक कर सकते हैं या फिर उसे वैसे ही रहने दे सकते हैं.

डा. कालरा आगे कहते हैं कि मोहसिन को ‘जैंडर डिस्फोरिया’ या ‘जैंडर डिसऔर्डर’ काफी समय से है. इस में व्यक्ति को खुद की शारीरिक बनावट और मानसिक बनावट में अंतर दिखाई पड़ता है. व्यक्ति लड़की या लड़का पूरी तरह से बनना नहीं चाहता, उसे अपनी शारीरिक संरचना पसंद है पर उस का मानसिक स्तर लड़की जैसा है. अधिकतर किन्नर इसी के शिकार होते हैं जो शारीरिक रूप से लड़के होते हैं पर वे मानसिक रूप से लड़कियों जैसा व्यवहार करते हैं.

एक अध्ययन में पाया गया कि अगर कोई व्यक्ति ‘जैंडर आइडैंटिटी डिसऔर्डर’ का शिकार हो तो वह किन्नर ही बने, यह सोचना ठीक नहीं.

सायन अस्पताल के मनोरोग प्रमुख डा. निलेश शाह कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति अपना सैक्स बदलने के लिए सर्जरी करवा सकता है. तकरीबन 50 किन्नरों से बात करने पर पता चला कि 84 प्रतिशत किन्नर ‘जैंडर आईडैंटिटी डिसऔर्डर के शिकार हैं. उन की इस मनोदशा को शुरुआती अवस्था में ही इलाज द्वारा सुधारा जा सकता है. असल में किन्नर ‘थर्ड जैंडर’ में आते हैं जबकि ‘जैंडर डिस्फोरिया’ में व्यक्ति सिंगल जैंडर का होता है.

यूएस के अटलांटा में पिछले वर्ष वर्ल्ड प्रोफैशनल एसोसिएशन फौर ट्रांसजैंडर हैल्थ द्वारा विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया था जिस में डा. गुरविंदर कालरा ने इस विषय पर अपनी स्टडी प्रस्तुत की. इसे सभी ने सराहा और अधिक से अधिक लोगों ने इस विषय की जानकारी प्राप्त की. इस पर बातचीत भी हुई. इस तरह के अध्ययन पश्चिमी देशों में अधिक हुए हैं.

न करें मारपीट

डा. कालरा कहते हैं कि इस तरह की अव्यवस्था या गड़बड़ी बच्चे को ढाई या 3 साल की अवस्था से शुरू हो जाती है. जब बच्चा अपने लिंग की पहचान कर पाता है. ऐसे बच्चे समलैंगिक नहीं होते. ये अधिकतर लड़कियों के बीच में खेलते या फिर लड़कियां लड़कों के बीच में खेलना, उन की जैसी हरकतें करना वगैरा करते हैं. ऐसे में समाज उन की हंसी उड़ाया करता है. परेशान हो कर मातापिता उस से मारपीट करते हैं जो ठीक नहीं.

यह अव्यवस्था बच्चे को जन्म से ही होती है. लेकिन कई बार कुछ विडंबना या घटना भी इसे जन्म दे सकती है, जैसे कि पिता का घर से दूर रहना, पिता का मर जाना आदि. इस तरह के बच्चे बहुत कम डाक्टर तक पहुंच पाते हैं.

मुंबई के फोर्टिस अस्पताल की मनोरोग चिकित्सक डा. पारुल टांक कहती हैं कि बचपन से ही बच्चे की आदत को सुधारना जरूरी है. कई बार मातापिता लड़की को लड़कों के कपड़े पहना देते हैं क्योंकि घर में लड़का नहीं है. ऐसे में बच्चे के कुछ हावभाव लड़कों जैसे हो जाते हैं, जैसा कि उन के पास आई एक लड़की का हुआ जो अपने पिता की मौत के बाद अपनेआप को लड़का समझने लगी और बाद में अपना ‘सैक्स’ भी चैंज करवा डाला.

यह सर्जरी हमारे देश में काफी लंबी है और उम्रभर हार्माेन देना पड़ता है क्योंकि उन में स्वाभाविक तौर पर हार्मोन नहीं होता.

मजाक न उड़ाएं

जब लड़की या लड़का अपनेआप को विपरीत लिंग के समझने लगते हैं तो सब से पहले पड़ोसी, दोस्त वगैरा उस का मजाक उड़ाते हैं जिस से बच्चे को तनाव, उदासीनता, घबराहट आदि होने लगती है इसलिए बड़े हो कर वे बच्चे ‘सैक्स चैंज’ की लंबी प्रक्रिया को भी अपनाने के लिए तैयार हो जाते हैं.  समय रहते अगर मातापिता मनोरोग चिकित्सक के पास जाएं तो बच्चे को इस समस्या से निकालने का प्रयास किया जा सकता है.

इस में यह भी देखना होता है कि कहीं यह अव्यवस्था उस में पागलपन की वजह से तो नहीं है. अगर ऐसा नहीं है तो यह बीमारी नहीं है. इस का इलाज किया जा सकता है. मातापिता समाज या परिवार से डरें नहीं बल्कि आगे आ कर बच्चे को इस समस्या से नजात दिलाने का प्रयास करें.

अब मेल पिल्स

मेल कौंट्रासैप्टिव पिल्स के अनुसंधान की शुरुआत हालांकि 7वें दशक के प्रारंभ में हो गई थी किंतु सफलता नहीं मिल पाने के पीछे वैज्ञानिकों की अपनी मजबूरी थी. इस की राह में पुरुषों के प्रजनन अंगों की रचना और फिजियोलौजी की जटिलताएं बारबार आड़े आती रहीं. महिलाओं में ओव्यूलेशन से ले कर फर्टिलाइजेशन और भू्रण को गर्भाशय के अंदर इंप्लांटेशन को रोक कर गर्भधारण को बाधित करना अपेक्षाकृत आसान है. पुरुषों के साथ ऐसी बात नहीं है. महिला की एक ओवरी से पूरे महीने में मात्र एक ही अंडा निकलता है जिस को नियंत्रित करने में वैज्ञानिकों को विशेष परेशानी नहीं हुई. ओव्यूलेशन के लिए जिम्मेदार हार्मोंस की मात्रा को बाधित कर देने पर न तो अंडे का निर्माण संभव है और न ही ओव्यूलेशन. इसलिए फीमेल पिल्स की ईजाद में चिकित्सा वैज्ञानिकों को विशेष परेशानी नहीं हुई, लेकिन पुरुषों में न तो कभी वीर्य का निर्माण और न ही स्खलन बाधित होता है.

इतना ही नहीं, प्रत्येक स्खलन के दौरान वीर्य के प्रति मिलीलिटर में लगभग 100 मिलियन से भी अधिक शुक्राणु होते हैं. जहां तक प्रैग्नैंसी की बात है, इस के लिए मात्र एक ही शुक्राणु काफी होता है और वह शुक्राणु कोई भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में, एकसाथ इतने शुक्राणुओं को नियंत्रित करना वैज्ञानिकों के लिए आसान बात नहीं थी, फिर भी इसी को आधार बना कर शुरुआती दिनों में गोसिपोल नामक गोली के निर्माण में वैज्ञानिकों को आंशिक सफलता मिली. लेकिन ऐसा देखा गया कि इस से शुक्राणुओं की संख्या में तेजी से कमी आती है और 10 फीसदी पुरुष स्थायी रूप से संतानोत्पत्ति में असमर्थ पाए गए. सो, इस के प्रयोग को तुरंत बंद कर दिया गया.

शुरुआती दौर में गोसिपोल का प्रयोग असफल साबित हुआ, किंतु इतना तो स्पष्ट हो गया कि मेल पिल्स के निर्माण में सैक्स हार्मोंस द्वारा ही सफलता मिल सकती है. अर्थात इस की विभिन्न मात्रा का प्रयोग कर ऐसी गोलियां बनाई जा सकती हैं जो शुक्राणुओं के निर्माण को न तो स्थायी रूप से बाधित करें और न ही प्रैग्नैंसी की संभावनाओं को स्थायी रूप से खत्म करें. इस के साथसाथ, वैज्ञानिकों ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्लैंड नामक विशेष ग्रंथि को भी नियंत्रण में रखा जाए तो शुक्राणुओं के निर्माण को नियंत्रण में रखा जा सकता है.

वैज्ञानिक इस बात पर ध्यान केंद्रित करने लगे कि शुक्राणुओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क में स्थित पिट्यूटरी ग्लैंड द्वारा स्राव को बाधित कर दिया जाए तो बिना किसी साइड इफैक्ट या सैक्स की क्रियाशीलता को बाधित किए शुक्राणुओं की संख्या में कमी ला कर प्रैग्नैंसी को नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन अनुसंधान के क्रम में शीघ्र ही एक नए सैक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का पता चला जो अंडकोष से स्रावित होता है.

शोध से यह भी पता चला कि टेस्टोस्टेरोन नामक यह हार्मोन शुक्राणुओं के निर्माण से ले कर मैच्योर होने के लिए जिम्मेदार है. इतना ही नहीं, वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि यह पुरुषार्थ के साथसाथ मांसपेशियों के विकास तथा दाढ़ीमूंछ के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाता है.

अब वैज्ञानिकों का सारा ध्यान इसी हार्मोन पर था. वे अपने अनुसंधान से यह पता लगाने में लग गए कि किस तरह इस हार्माेन के स्राव को नियंत्रित किया जाए. जैसेजैसे अनुसंधान आगे बढ़ता गया, इस रहस्य से परदा उठने लगा और शीघ्र ही पता चल गया कि शुक्राणुओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार अंडकोष से स्रावित होने वाले टेस्टोस्टेरोन का तार पिट्यूटरी ग्लैंड से जुड़ा है.

इस दौरान यह भी पता चला कि जब इस की मात्रा रक्त में सामान्य से ज्यादा हो जाती है या फिर बाहर से इस का समावेश किया जाता है तो शुक्राणु का निर्माण पूरी तरह बाधित हो जाता है. लेकिन इस से कई दूसरे अवांछित साइड इफैक्ट भी देखने को मिलने लगे. चेहरे पर कीलमुंहासे, वजन में बढ़ोत्तरी के साथसाथ पौरुषग्रंथि में वृद्धि होने की शिकायतें आने लगीं.

इस के बाद वैज्ञानिकों ने एक दूसरा रास्ता निकाला. टेस्टोस्टेरोन के साथ एक दूसरा सैक्स हार्मोन प्रोजेस्टेरोन की एक निश्चित मात्रा मिला कर प्रयोग करने पर विचार किया गया. इस के पीछे वैज्ञानिकों का तर्क था कि यह हार्मोन पुरुष और महिला दोनों में रिप्रौडक्टिव हार्मोन सिस्टम के स्राव को कम कर देता है. ऐसा करने में वैज्ञानिकों को आशातीत सफलता मिली.

लंबे अनुसंधान के बाद यह तय हो गया है कि मेल पिल्स में प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोस्टेरोन दोनों तरह के हार्मोन का मिश्रण जरूरी है. इस के साथ यह समस्या आने लगी कि प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन से निर्मित पिल्स के खाने के बाद आंत में जा कर पाचक रस और विभिन्न एंजाइम्स के प्रभाव से विच्छेदित हो जाता है, जिस से इस की क्रियाशीलता तथा प्रभाव दोनों कम हो जाते हैं. इसलिए शोधकर्ता अब इन दोनों हार्मोंस के मिश्रण को त्वचा में इंप्लांट करने के लिए इस के माइक्रो कैप्सूल तथा इंजैक्शन विकसित कर रहे हैं, ताकि टेस्टोस्टेरोन की क्रियाशीलता प्रभावित न हो. दुनिया के कई देशों में माइक्रो पिल्स, इंजैक्शन क्रीम, जैल आदि का निर्माण करने पर विचार किया गया.

परीक्षण अब अंतिम चरण में

पिल्स का परीक्षण दुनिया के कई देशों में अब अंतिम दौर में है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं जब महिलाओं की तरह पुरुष भी मैडिकल शौप से बर्थ कंट्रोल की गोलियां, क्रीम, जैल की शीशियां खरीदते, अस्पतालों में इस का इंजैक्शन लेते और परिवार नियोजन केंद्रों पर इस के सेवन के तरीकों पर चर्चा करते नजर आएंगे.

हाल ही में लगभग 1 हजार पुरुषों पर इस के इंजैक्शन का परीक्षण किया जा चुका है और 99 फीसदी कारगर भी साबित हुआ है. यह अस्थायी तौर पर रिप्रौडक्टिव हार्माेनल सिस्टम को या तो कम कर देता है या उसे पूरी तरह से रोक देता है. खास बात यह है कि यह पूरी तरह रिवर्सिबल है और इस का सेवन छोड़ देने पर 67 फीसदी पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या 6 माह के भीतर सामान्य हो जाती है. शतप्रतिशत सामान्य होने में लगभग 1 साल का समय लगता है. इस में किसी तरह के साइड इफैक्ट देखने को नहीं मिले.

यूनाइटेड नैशन वर्ल्ड और्गेनाइजेशन यूनिवर्सिटीज औफ कैलिफोर्निया, लौस एंजेल्स तथा यूनिवर्सिटीज औफ सिडनी में भी इस का परीक्षण पूरा किया जा चुका है. पौरुष को मैंटेन रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस हार्मोन के सेवन से बिना किसी परेशानी के स्पर्म काउंट में कमी तो आई लेकिन बांझपन, उत्तेजना या इच्छा में कमी जैसे विकार देखने को नहीं मिले. यूनिवर्सिटीज औफ वाशिंगटन के पौपुलेशन सैंटर फौर रिसर्च इन रिप्रौडक्शन के विशेषज्ञ डा. एंड्रियू कोवियेलो के शब्दों में, ‘‘पुरुष कौंट्रोसैप्टिव के लिए यदि टेस्टोस्टेरोन का प्रयोग किया जाता है तो 3 महीने के बाद तक इस का स्राव होता रहता है. यानी इस का प्रयोग 3 महीने बाद तक सुरक्षित माना जा सकता है. फलस्वरूप इस के माइक्रो कैप्सूल विकसित करने की कोशिश की जा रही है जिस में गाढ़े तरल पदार्थ के रूप में हार्मोन होगा और जिसे हथेली तथा बांह की त्वचा के नीचे इंप्लांट करने की सुविधा होगी.’’

आस्टे्रलिया के शोधकर्ताओं ने पुरुषों के लिए जैब नामक नौन बैरियर कौंट्रासैप्टिव मैथड के अंतर्गत इंजैक्शन के निर्माण में सफलता पा ली है. इसे प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोस्टेरोन के मिश्रण से बनाया गया है और इसे 2 से 3 माह के अंतराल में लगाने की जरूरत होती है.

यह वीर्य का निर्माण नहीं होने देता और इस का प्रभाव स्थायी भी नहीं होता है. एनजेक रिसर्च इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी औफ सिडनी तथा कोनकार्ड हौस्पिटल ने 18 से 51 वर्ष के लगभग 1756 पुरुषों के बीच इस का परीक्षण करने के बाद पाया कि यह इंजैक्शन काफी तेज और प्रभावी है.

इस परीक्षण में शामिल एसोसिएट प्रोफैसर पीटर लिउ के अनुसार, ‘‘आज इस की काफी जरूरत है क्योंकि कई महिलाएं पिल्स का सेवन करना नहीं चाहतीं या फिर इसे किसी कारणवश टौलरेट नहीं कर पातीं. उसी तरह कई पुरुष ऐसे होते हैं जो अपने बंध्याकरण को देर से कराना चाहते हैं या फिर कराना नहीं चाहते.’’

परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार जैब इंजैक्शन बंध्याकरण की तरह उतना ही इफैक्टिव है जितना महिलाओं के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली पिल्स. इस के सेवन के बाद न तो सर्जरी और न ही दूसरी वजह से स्पर्म के निर्माण को पूरी तरह बंद करने की जरूरत होगी.

अभी मेल पिल्स मार्केट में आई भी नहीं, पर इस को ले कर तरहतरह के सवाल उठ रहे हैं. सवाल तब भी उठे थे जब फीमेल पिल्स पहली बार मार्केट में आई थी. तब यह बात उठी थी कि इस से मां के नैसर्गिक अधिकार का अतिक्रमण होगा. समाज में विकृतियां आएंगी. नैतिक, सामाजिक, वैचारिक मूल्यों में गिरावट आएगी. यौनशोषण को बढ़ावा मिलेगा. अब, लगभग 60 वर्षों के बाद जब मेल पिल्स मार्केट में आने वाली है तब भी कुछ इसी तरह के सवाल उठने लगे हैं. कहा जाने लगा है कि इस से सामाजिक तानाबाना छिन्नभिन्न हो जाएगा. पतिपत्नी और दांपत्य में दरार आएगी, तलाक में इजाफा होगा. सामाजिक कटुता और वैमनस्य बढ़ेंगे आदि.

दुनिया के मशहूर जर्नल फैमिली प्लानिंग ऐंड रिप्रौडक्टिव हैल्थकेयर में यूएसए के यूनिवर्सिटीज औफ सोशल फ्यूचर इंस्टिट्यूट के प्रो. जुडिथ इबरहार्डथ ने लगभग 140 पुरुषों और 240 महिलाओं के बीच बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि आम लोग इस के सेवन के प्रति कितना सहज, सतर्क तथा ईमानदार होंगे.

स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि मल्टी सैक्सुअल पार्टनर तथा लिव इन रिलेशनशिप पर विश्वास करने वाले पुरुषों के बीच यदि कंडोम का प्रयोग कम हुआ तो एड्स तथा गुप्त रोग फैलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी.

एक बात और, ऐसी महिलाएं जो प्रैग्नैंसी के बाद पुरुष को जबरदस्ती शादी करने के लिए बाध्य करती हैं, वैसे पुरुषों के लिए यह पिल्स वरदान साबित हो सकती है. साथ ही वे पुरुष जो कंडोम का इस्तेमाल करते हैं, इस पिल्स को इस्तेमाल जरूर करेंगे.

उधार के शुक्राणु

यह सुन कर चौंकिएगा नहीं कि गुजरात के शैलेश अपने ही पोते के जैविक पिता हैं. यह इस तरह संभव हुआ कि शैलेश के पुत्र राहुल पटेल, जोकि अमेरिका में सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं, को अजूस्पर्किया नामक बीमारी हो गई. इस की वजह से राहुल में स्पर्म बनना बंद हो गया. ऐसी स्थिति में परिवार की कड़ी आगे किस तरह बढ़े, यह विचारणीय प्रश्न बन गया. परिवार ने मिल कर तय किया कि अन्य के स्पर्म लेने के बजाय राहुल के पिता शैलेश के ही स्पर्म ले लिए जाएं ताकि बच्चा जैनेटिकली अंतर्परिवारीय हो. ऐसा ही किया गया और आयु के 60वें दशक में प्रवेश कर चुके शैलेश इस तरह अपने पोते के जैविक पिता बन गए.
 
‘विकी डोनर’ फिल्म की तर्ज पर एक ब्रिटिश पुरुष ने स्पर्म डोनेशन करना शुरू कर दिया. जब उस की पत्नी को इस बात का ज्ञान हुआ तो वह कुपित हो गई. उस ने ह्यूमन फर्टिलाइजेशन ऐंड एंब्रयोलौजी अथौरिटी यानी एचएफइए से पति द्वारा किए जा रहे स्पर्म डोनेशन को गैर कानूनी बताते हुए मांग की कि पति के स्पर्म को पत्नी की ‘वैवाहिक संपत्ति’ माना जाए.
 
ब्रिटिश अखबार ‘डेली मेल’ के अनुसार, इस महिला ने शंका व्यक्त की है कि इन स्पर्म से उत्पन्न बच्चे से मेरे पति का नैसर्गिक रूप से इमोशनल अटैचमैंट बनेगा. परिणाम- स्वरूप भविष्य में वह मेरे बेटे के सौतेले भाईबहन के रूप में जुड़ कर परेशानियों का सबब बन सकता है क्योंकि बालिग होने पर उस बच्चे को जैविक पिता के बारे में जानने का कानूनी अधिकार है. महिला ने एचएफईए से इस संबंध में आवश्यक गाइडलाइन बनाने की भी मांग की है.
 
गौरतलब है कि वर्ष 2005 में ब्रिटेन के एक कोर्ट ने आदेश दिया था कि एक स्पर्म डोनर सिर्फ 10 परिवारों को ही स्पर्म डोनेट कर सकता है. इतना ही नहीं, यदि स्पर्म डोनेशन से उत्पन्न बच्चा बालिग होने पर बायलौजिकल पिता के बारे में जानना चाहे तो उसे उस के बारे में जानकारी देनी होगी. बच्चा चाहे तो क्लिनिकल प्रमाण के साथ जैविक पिता से मिल व जुड़ भी सकता है किंतु जैविक पिता को अपनी ओर से उस से मिलने व जुड़ने का अधिकार नहीं होगा. क्योंकि डोनेशन से पूर्व स्पर्म डोनर से इस आशय का शपथपत्र लिया जाता है कि उसे यह जानने का अधिकार नहीं होगा कि स्पर्म का प्रयोग कहां किया गया है और न ही वह भविष्य में बच्चे पर अपना अधिकार जताएगा.
 
जहां तक हमारे देश की बात है, संसद में वर्ष 2008 में एक विधेयक लाया गया था. कृत्रिम रूप से बच्चे पैदा करने की तकनीक से जुड़ा यह विधेयक आज तक संसद में पारित नहीं हो पाया. इस विधेयक में इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून सुझाए गए थे. प्रजनन केंद्रों के डाक्टर भी इस के लिए देश में नियंत्रक कानून बनाए जाने की मांग कर रहे हैं जिस से स्पर्म डोनेशन के साथ आईवीएफ तकनीक पर ध्यान रखा जा सके. उन की मांग थी कि स्पर्म डोनेट करने वाले लोगों की सूची रखे जाने के लिए एक केंद्रीय संस्थान का गठन किया जाए ताकि भारत सरकार के कानून के अंतर्गत सांविधिक रूप से इस पर नियंत्रण रखा जा सके.
 
बावजूद इस के, हमारे देश में भी यह कारोबार अपने पांव पसार रहा है. स्पर्म लेनदेन के विशिष्ट नियमकायदे तो नहीं हैं पर स्वयं निर्मित संहिता का पालन अवश्य किया जाता है. वात्सल्य प्रजनन केंद्र के क्लिनिकल रिसर्च विभाग की डा. वसुधा भट्ट कहती हैं, ‘‘ब्लड डोनेशन की भांति स्पर्म डोनेशन भी समाज हित का कार्य है, इसलिए इस के बदले पैसा दिए जाने का प्रावधान नहीं है. मगर स्पर्म डोनेशन की बात कुछ और ही है. यहां स्पर्म लेने वाले की चाह के अनुसार विशिष्ट, योग्य व्यक्ति का चयन और निश्चित मानदंडों के अनुसार उस का क्लिनिकली स्वस्थ होना अहम चुनौती है. ऐसे दुर्लभ चयन व गोपनीयता की शर्त के कारण केंद्र को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मनचाहे धन का प्रलोभन देना पड़ता है ताकि डोनर स्वेच्छा व उमंग से स्पर्म डोनेट कर सके. तत्पश्चात डोनर से प्राप्त स्पर्म को ‘-196 डिगरी सेल्सियस’ पर लिक्विड नाइट्रोजन में स्टोर कर संरक्षित रखना होता है.’’
 
मगर मौडर्न आईवीएफ सैंटर की डा. कंचन जाघव बताती हैं कि भारत में स्पर्म देने और लेने वालों का आज भी टोटा है. हमारे देश में स्पर्म डोनेशन के लिए स्वस्थ, सुयोग्य व्यक्ति के चुनाव हेतु कोई मानदंड तय नहीं है. सामान्यतया प्रजनन केंद्र यही ध्यान रखते हैं कि प्राप्त किया जाने वाला स्पर्म रोगदोष मुक्त हो. जैविक रूप से स्पर्म डोनर कितना युवा, सुयोग्य और प्रतिभाशाली है, इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता.
 
हालांकि फिर भी तमाम वर्जनाओं व नकारात्मकताओं के बावजूद युवावर्ग में स्पर्म देने व लेने के प्रति रु?ान बनने लगा है. चूंकि अब संयुक्त परिवार तो रहे नहीं और न ही उन का पहले जैसा भावनात्मक दबदबा रहा है, ऐसी हालत में एकल परिवार अंत:परिवारीय घालमेल में पड़ कर, खामखां विचित्र स्थितियों से रूबरू होना नहीं चाहते, क्योंकि अंत:परिवारीय स्पर्म लेनदेन के कारण संभव है कि पारिवारिक संबंध नष्टभ्रष्ट व विकृत हो जाएं. कोई बड़ी बात नहीं कि इन के कारण ब्लैकमेलिंग का ऐसा तानाबाना बुना जाए कि परिवार अनैतिक संबंधों की दलदल बन कर रह जाएं. कौन जाने, इस तरह उत्पन्न संतान को शैलेश व राहुल के उदाहरण की भांति जीवनपर्यंत कलंकित, विषम संबोधनों व आरोपों से मुखातिब होना पड़े और नतीजतन पारिवारिक संबंधों का तानाबाना बिखर जाए. इसलिए ऐसी विषम परिस्थितियों से बचने के उद्देश्य से एकल परिवार गोपनीयता बरतते हुए स्पर्मबैंक से ही स्पर्म प्राप्त करने का सुरक्षित मार्ग अपनाने लगे हैं.
 
इस के बावजूद स्पर्म डोनेशन के कारण उत्पन्न होने वाली कतिपय पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं से इनकार नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए स्पर्म डोनेशन से उत्पन्न बच्चों में स्वाभाविक रूप से नैसर्गिक पैतृक गुणावगुण का अभाव दृष्टिगत होगा और संभव है उन के कारण मातापिता के अपनत्व भाव में नीरसता आ जाए. अति तो उस समय हो जाएगी, जब मातापिता व बच्चे के संबंधों में तनिक मात्र का विचलन आ जाने पर विभिन्न आक्षेपों का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा. असंभव नहीं कि इस कारण परिवार के अन्य सदस्य भी ऐसे बच्चों को बाहरी अंश मान कर अलगाव भाव बरतने लगें.
 
श्रीमती दुर्गादेवी मैमोरियल हौस्पिटल की डा. ललिता खंडेलवाल इस की पुष्टि तो नहीं करतीं मगर कहती हैं कि सच तो यह है कि हमारे यहां स्पर्म डोनेशन आज भी अनजाना सा नाम है और जो जानते हैं उन के लिए तो यह वर्जनापूर्ण विषय है. फिर भी इस पर हो रही चर्चाओं से, चाहे वे फिल्म के कारण शुरू हुई हों या मीडिया के माध्यम से, लोगों की जिज्ञासाएं अवश्य बढ़ी हैं किंतु स्पर्म डोनेट करने या डोनेटेड स्पर्म ग्रहण करने के मामले में लोगों की दकियानूसी ?ि?ाक आज भी देखने को मिलती है. जहां अन्य के शुक्राणु ले कर संतानोत्पत्ति की बात है, वहां भारतीय पारंपरिक समाज में परपुरुष के शुक्राणु से उत्पन्न संतान को वर्णसंकर मान कर हेय दृष्टि से देखा जाता है. इस बात का सबूत प्रथम उदाहरण है, जो होने को तो पढ़ेलिखे, खुले विचारों वाले भारतीय परिवार से संबंधित है पर उन्होंने शुक्राणु लेने के मामले में दकियानूसी सोच दिखाई और बाहरी स्वस्थ युवा व्यक्ति के स्पर्म लेने के बजाय स्वयं के परिवार के प्रौढ़ायु व्यक्ति के स्पर्म लेना उचित माना.
 
ऐसी संभावनाएं भी बनती हैं जब मातापिता बच्चों में उच्च या विशेषीकृत जैनेटिक गुणों की चाह में, बच्चा पैदा करने के योग्य होने के बावजूद, व्यक्ति विशेष के स्पर्म की मांग करने लगें. सुनने में आया है कि ‘विकी डोनर’ फिल्म के बाद जौन अब्राहम के स्पर्म की मांग होने लगी थी तब अब्राहम को उपहास में कहना पड़ा कि यदि ऐसा हो गया तो मैं ‘फादर औफ नैशन’ बन जाऊंगा. कल को कोई क्रिकेटर की चाह में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धौनी या अन्य की या विशिष्ट पारंगतता प्राप्त विभूतियों के स्पर्म की चाह रखने लगे तो हैरानी नहीं.
 
कल्पना कीजिए, ऐसा हुआ तो एक व्यक्ति के अनेक क्लोन नजर आने लगेंगे जिस से उस व्यक्ति की विशिष्टता ही समाप्त हो जाएगी. सोचने वाली बात है, यदि क्रिकेट टीम में एक सचिन की जगह सभी सचिन हों, तो फिर सचिन की महत्ता कहां रह जाएगी?
 
जो कुछ भी हो, इन्हें नियंत्रित करने के लिए भारत सरकार को वर्ष 2008 में प्रस्तुत विधेयक को अद्यतन कर, अविलंब प्रभावी दिशानिर्देश पारित करने होंगे. कानून में स्वस्थ व सक्रिय स्पर्म की सुनिश्चितता के साथ यह व्यवस्था भी करनी होगी कि जैविक पिता और उत्पन्न संतान के संबंधों की गोपनीयता पूरी तरह से बनाई रखी जाए, अन्यथा मां व बच्चे के अतिरिक्त दोनों परिवार (शुक्राणु प्रदाता व गृहीत्वा) प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे. दूसरी ओर गोपनीयता भंग हो जाने की स्थिति में ‘नारायण दत्त तिवारी प्रकरण’ की भांति कोई बच्चा व उस की मां डीएनए टैस्ट के आधार पर पितृत्व की नई समस्याओं को जन्म दे सकती है. अत: उभयपरीक्षा सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने के लिए एक परिपूर्ण निरापद कानून की सख्त आवश्यकता है.
 
समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब स्पर्म डोनेशन के प्रचलन में आते ही ब्रिटेन और अरब अमीरात की भांति भारत में भी विभिन्न समस्याएं जन्म लेने लगेंगी. देश में ‘मैडिकल टूरिज्म’ की बढ़ती संभावनाओं के कारण विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रस्तुत होने की भी प्रचुर संभावनाएं हैं. इसलिए एक समग्र कानून बनाए जाने की जरूरत है ताकि ब्लड डोनेशन की भांति स्पर्म डोनेशन भी सकारात्मक रूप से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके.
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