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जब जाएं बच्चों के साथ रहने

विष्णु प्रकाश अवकाशप्राप्ति के बाद अपनी पत्नी के साथ छोटे से शहर में अपने बनाए हुए घर में एक तरह से आराम से ही रह रहे थे. अकेलेपन और बच्चों से दूरी अवश्य खलती थी पर उन्हें, खासकर उन की पत्नी को, यह तसल्ली रहती थी कि वे किसी पर आश्रित नहीं हैं. साल में एकाध बार सपत्नी 2-4 दिनों के लिए वे दोनों बेटों के यहां घूम आते और इसी तरह बेटे भी सपरिवार इन के पास चक्कर लगा जाते.

वे दोनों जब बेटों के यहां से घूम कर आते तो महीनों उन की जीवनशैली, छोटे घर और खानपान पर चर्चाएं करते और सुकून के घूंट भरते कि उन्हें बेटे के घर में रहने की जरूरत नहीं है. बेटों के बच्चे और काम की जिम्मेदारियां समय के साथ बढ़ते जा रहे थे. सो, वे आग्रह करते कि मातापिता ही आएं और अधिक दिन साथ रहें. पर विष्णु प्रकाश को एक तरह से अपनी आत्मनिर्भरता पर अहंकार सा था. उन्हें महसूस होता कि जो उन की जीवनशैली है वही श्रेष्ठ है, बच्चों की जीवनशैली भी वैसे ही होनी चाहिए. इसी तरह उन की पत्नी सुलेखा को लगता कि जो उन की रसोई में पकता आया है वही सही और संतुलित है, बहुओं की कार्यशैली पर उन की हजार शिकायतें रहतीं.

यों अहंकार और आत्मसंतुष्टि में जीवन ठीक ही कट रहा था पर मुश्किल तब आई जब विष्णु प्रकाश को एक दिन हार्टअटैक आया. उन के छोटे से शहर में सही इलाज संभव न था और बेटे कितनी छुट्टियां लेते. सो, एक बेटा, जो दिल्ली में रहता था, उस ने अपने पास ही बुला लिया. ओपन हार्ट सर्जरी के बाद जब तक अस्पताल में रहे तब तक लगभग सब ठीक ही चला. सुलेखा सुबह बहू द्वारा दिया गया टिफिन ले कर अस्पताल चली जातीं और शाम को आतीं. रात को बेटा अस्पताल में रहता. परंतु जैसे ही विष्णुजी अस्पताल से डिस्चार्ज हो घर लौटे, उन दोनों की परेशानियां शुरू हो गईं. उन्हें लगता कि वे जल्द से जल्द अपने घर लौट जाएं. परंतु पूर्ण स्वस्थ होने तक तो उन्हें रुकना ही था.

2 दिनों तक पहले अच्छेभले दिखने वाले बेटेबहू में उन को हजार खोट नजर आने लगीं. हर आतेजाते मिलने वाले, रिश्तेदारों से 2 बैडरूम फ्लैट में हो रही तकलीफों का जिक्र करते. सुबहशाम खाने में नुक्स निकालते. यानी दोनों कुछ यों व्यवहार करते जिस से कि बेटे के घर में हो रही उन की असंतुष्टि और असहजता जाहिर हो जाती. धीरेधीरे बेटेबहू को लगने लगा कि कितना भी करो, इन्हें खुश नहीं रखा जा सकता है. रिश्तों में धीरेधीरे कड़वाहट आने लगी. बाद के वर्षों में जब बुढ़ापा अधिक हावी होने लगा तो उन्होंने बेचारगी का चोला ओढ़ लिया और समाज में अपने ही बच्चों की बुराई करते फिरने लगे.

यह सच्ची घटना एक बानगी है जब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मातापिता को बच्चों के घर जा कर रहना पड़ता है. अपनी संपन्नता से ऐंठेऐंठे से ये बुजुर्ग उस वक्त बेहद आहत होते हैं जब इन्हें बच्चों के साथ उन की गृहस्थी में रहना पड़ता है. उन्हें अपनी निजता और अधिकार छिनता सा महसूस होता है. ऐसा नहीं है कि हर समृद्ध बुजुर्ग दंपती विष्णुजी की ही तरह व्यवहार करते हैं.

प्रकाशजी के ही मित्र हैं राजेश्वर, जो अपने तीनों बच्चों के यहां आतेजाते रहते हैं. विष्णुजी की तरह सिर्फ हाजिरी लगाने जैसे दोचार दिनों के लिए नहीं, बल्कि लंबेलंबे प्रवास हेतु. जिस में कभी किसी बच्चे का जन्मदिन या वर्षगांठ होता या कोई त्योहार साथसाथ मन जाता. ऐसी बात नहीं है कि उन्हें हर चीज सर्वश्रेष्ठ ही वहां मिलती है पर उन का मिलनसार रवैया उन के बच्चों को यह एहसास करा देता कि उन के मातापिता उन से प्रसन्न हैं. श्रीमती राजेश्वर अपनी मित्रमंडली में कहतीं भी कि अरे, अपने घर के तकिए की आदत हो जाती है. पर जब बेटाबेटी के हंसतेमुसकराते चेहरों को देखती हूं तो मनपसंद तकिया बहुत छोटी चीज लगती है. इस तरह सुख के इतने पल साथसाथ बिता चुके होते हैं कि दुख या जरूरत के वक्त बच्चों के घर पर रहने में कोई परेशानी नहीं होती है.

सच पूछा जाए तो बच्चों के बड़े होने पर और घर से बाहर चले जाने के बाद कई लोगों को अपना एकांत पसंद आने लगता है. अपनी निजता अक्षुण रहे, इस के लिए वे अपने बच्चों से कटुता पाल लेते हैं. बहुत सारे बुजुर्ग वक्त के साथ अपने स्वभाव का लचीलापन खो देते हैं. उस पर जो आत्मनिर्भर और समृद्ध होते हैं, उन का अहं उन्हें बच्चों के साथ रहने पर सामंजस्य स्थापित करने में आड़े आता है. एक और परेशानी है, अपेक्षा की. कई बार मातापिता अपनी संतान को अपनी अपेक्षाओं के बोझ तले कुचल सा देते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि हम अपने बच्चों से बिलकुल अपेक्षा ही न रखें, अवश्य रखें पर बच्चों की स्थितिपरिस्थितियों को ध्यान रखते हुए.

कोलकाता में रहने वाले घोष बाबू ने अपने इकलौते बेटे अनिकेत को इंजीनियर क्या बनाया, उन्हें तो मानो जादू की छड़ी हाथ लग गई. अनिकेत को भलीभांति एहसास था कि उस के पिता ने काफी मशक्कत कर उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है. नौकरी लगते ही वह घोष मोशाय की छोटीबड़ी जिम्मेदारियों को उठाने लगा था. पर जबजब मांबाप उस के  पास रहने मुंबई जाते, तो उस के एक बैडरूम फ्लैट में हो रही परेशानियों की खूब शिकायतें करते और अनिकेत से कहते रहते कि जाने क्या कमाते हो? बेचारा अनिकेत उन के आने के नाम से संभावित अशांति को सोच घबरा जाता.

कितनी बार मां, बच्चों के घर में भी वही नियमकानून लागू करना चाहती है जो वह सदा से करती आई है. जबरदस्ती संस्कार और परंपराओं के नाम पर बहू को एक तरह से प्रताडि़त कर जाती है. ठीक उसी स्वाद के खाने की अपेक्षा करती जो वह पकाती आई है. या तो बहू लिहाज करती घुटती हुई सहन करती जाती है या फिर गृहकलह होता है. दोनों ही परिस्थितियों में बेटेबहू मां के आने के नाम से ही घबराने लगते हैं.

रिश्तों में कड़वाहट

जैसे सुधाजी की बेटी या बहू, उन के आने के नाम से ही घबरा जाती हैं क्योंकि सुधाजी उन के घर जाते ही पूरी कमान संभाल लेतीं और उन्हें अपने हिसाब से कार्य करने का निर्देशन देने लगतीं. मसलन, सुबह दफ्तर जाने के पहले ही सारा खाना बने. रात को पका भोजन तो बासी हो गया जिसे वे नहीं खाएंगी. दफ्तर जाने की सुबह की हड़बडि़यों से बचने हेतु उन की बेटी बहुत सारा काम रात को ही निबटा लेती थी. अब जब वे बेटी के घर जातीं, उसे बहुत सुबह उठने को मजबूर करतीं, जिस से वह दिनभर थकावट महसूस करती.

एक और भी तरह की मानसिकता होती है मातापिता की. अपने नातेरिश्तेदारों या मित्रों से अपने बच्चों की शिकायतें करना और सब की निगाहों में बेचारा बन जाना. ऐसे में बच्चे रिश्तेदारों से मिलने में कन्नी काटने लगते हैं. क्योंकि मिलते ही वे कैफियात मांगने लगेंगे कि वे अपने मातापिता की देखभाल क्यों नहीं करते हैं.

वहीं, कुछ मातापिता खुशी के अतिरेक में बच्चों के यहां अपने प्रवास की बातें खूब बढ़ाचढ़ा कर बताते हैं. शायद उन का मंतव्य सकारात्मक ही होता है पर जब बच्चे इन बातों को सुनते हैं तो उन्हें यह महसूस होता है कि उन्होंने शायद अपने मातापिता की यह इच्छा नहीं पूरी की. जैसे केशुभाई पटेल जब अपनी पत्नी के साथ पहली बार विदेश (सिडनी) अपने बेटे जितेश के पास गए तो बेहद खुश हुए. खुशी के अतिरेक में बेटे के सामने ही अपने भाई से फोन पर बातें करते हुए केशुभाई अपने बेटे का गुणगान करते हुए कह गए कि मेरा बेटा तो हर दिन कहीं न कहीं हमें ले कर घुमाने जाता है. जबकि सचाई यह थी कि सिर्फ सप्ताहांत की छुट्टियों में ही वह उन्हें कहीं घुमाने ले जा रहा था. जितेश को अंदर ही अंदर ग्लानि हुई कि शायद पिताजी की यह इच्छा है कि मैं हर दिन उन्हें कहीं घुमाने ले जाऊं.

पश्चिमी देशों के विपरीत भारत में मातापिता बच्चों का काफी बड़ी उम्र तक पालनपोषण करते हैं. सो, अपेक्षा न हो, ऐसी बात नामुमकिन सी है. परंतु सचाई तो यही है कि मातापिता बीते हुए कल हैं और उन के बच्चे वर्तमान. वर्तमान का यह फर्ज है कि वह अपने अतीत की देखभाल करे और बीता कल वर्तमान पर भरोसा करे. अपने द्वारा रोपित संस्कारों के बीज पर भरोसा करें. परंतु जब उन के साथ रहें तो उन के जीवन का भी लुत्फ उठाएं. सुखी और बेजरूरत भी साथ रहना या मिलतेजुलते रहना भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, तभी एकदूसरे की आदत पड़ेगी. अन्यथा बीमारी के दौरान या अति वृद्धावस्था में अचानक साथ रहने में दोनों को परेशानियां होंगी क्योंकि तब तक दोनों एकदूसरे की आदतों से अनभिज्ञ हो चुके होंगे. बच्चे आप के ही हैं पर साथहीसाथ वे सर्वथा एक भिन्न स्वतंत्र व्यक्तित्व भी हैं जिस का मान रखना भी मातापिता का कर्तव्य है.

बच्चों के साथ तालमेल जरूरी

–       आप अपने जीवन की चरम उपलब्धियों तक पहुंच चुके हैं जबकि बच्चों के जीवन की यह शुरुआत है. सो, उन की कमियों को नजरअंदाज करना सीखें.

–       जरा सोचिए उन के बारे में जिन के बच्चे नहीं होते. आप खुश रहें कि आप को बच्चों का साथ मिल रहा है.

–       अपने धनसमृद्धि का अहंकार बच्चों से कदापि न करें. अहं की पोटली छोड़ कर जाएं.

–       अपना जीवन तो आप सदा अपने हिसाब से जीते ही आए हैं, जरा अब नए जमाने के हिसाब से जी कर देखें.

–       प्रसन्नचित रहें और माहौल को खुशनुमा बनाए रखने की कोशिश करें.

–       दूसरों के बच्चों की कहानियां ज्यादा न सुनाएं क्योंकि अब वे बच्चे नहीं हैं.

–       ज्यादा टोकाटोकी और नुक्ताचीनी करने से बचें.

–       जो काम कर सकते हैं उसे कर उन्हें सहयोग करें.

–       खुद को मेहमान समझ खातिरदारी की अपेक्षा न करें.

–       बच्चों के खानपान को आत्मसात करें, कम से कम कोशिश तो करें.

–       बच्चों के रूटीन में आप एडजस्ट करना सीखें.

–       बदलाव की अपेक्षा की जगह खुद बदलाव की पहल करें.

–       अपनी ही संतान से किसी भी तरह के पूर्वाग्रह या दुराग्रह से बचें.

–       ‘हमारे जमाने में तो…’ का गीत कम ही गाएं तो बेहतर.

–       रीतिरिवाज के नाम पर ज्यादा बंदिशें न लगाएं

सर्जिकल स्ट्राइक

भारतीय सेना के कमांडोज ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर क्षेत्र में सर्जिकल स्ट्राइक क्या की, पूरे भारत का वातावरण ही बदल गया. हर किसी की जबान पर आंग्ल भाषा के इन 2 शब्दों का मुलम्मा ऐसा चढ़ा जैसे किसी ने इन शब्दों को उठा कर जबान पर पेस्ट कर दिया हो. पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों के धड़ काटे, उन्हें सिरविहीन कर दिया, कितने ही मासूम नागरिकों को आतंकवादियों के हाथों मरवा दिया और हम एक सर्जिकल स्ट्राइक कर के मूंछों को ऐसे ताव दे रहे हैं जैसे बिल्ली ने नहीं, बल्कि चूहे ने बिल्ली को मार दिया हो. पाकिस्तान आज भी वैसे का वैसा ही है और लगातार आतंकवादियों की घुसपैठ करा रहा है. घाटी को आग लगाने के लिए अलगाववादी और कट्टरपंथी तत्त्वों को निरंतर भड़का रहा है.

हम ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम तो दिया लेकिन पाकिस्तान से डर भी गए और ऐसे डरे कि पंजाब में सीमा से लगा 10 किलोमीटर का क्षेत्र ही नागरिकों से खाली करवा लिया. उन नागरिकों को सलाम  जिन्होंने क्षेत्र खाली करने और पाकिस्तान से डरने से मना कर दिया. अब सुना है कि आतंकवादियों और पाकिस्तान से डर कर भारत सीमा पर ऊंची दीवार का निर्माण करने जा रहा है. पाकिस्तान ने तो कभी ऐसा ऐलान नहीं किया, यानी उसे भारत से डर नहीं लगता? भारत से आखिर कोई क्यों डरे? इतिहास गवाह है कि भारत ने जमीनी रास्ते से अपनी सेना के घोड़े कभी विदेशी भूमि पर नहीं दौड़ाए. न प्राचीन, न मध्य और न आधुनिक इतिहास में. महाराजा रणजीत सिंह की सेनाएं जरूरअफगानिस्तान तक गईं लेकिन अफगानिस्तान बहुत समय तक भारत के ही भौगोलिक क्षेत्र का हिस्सा माना जाता रहा. ऐसे में अब एक सर्जिकल स्ट्राइक कर के हम फूल कर कुप्पा न हो जाएं तो फिर क्या हो.

हम तो शांति के पोषक हैं, भाई. लड़ाईझगड़ों और युद्धों से हमारा क्या वास्ता. हमारी धरती ने तो पैदा ही किए हैं शांति के सूरमा. महात्माओं की एक असीमित शृंखला-महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी और महात्मा गांधी. अब कोई बताए भला हम अपने महापुरुषों के खिलाफ कैसे जा सकते हैं. विदेशी हमलावरों ने 7वीं-8वीं सदी में जब भारत के सीमांत क्षेत्र अफगानिस्तान पर हमला किया तो वहां के बौद्धों ने, तलवारों के सामने बिना किसी संघर्ष, अपने सिर झुका दिए. आखिर वे सब शांति के उपासक ही तो थे. वे सिर कटवाना जानते थे, सिर काटना नहीं. महावीर स्वामी के शांति उपासकों ने तो हिंसा के डर से खेती तक करनी छोड़ दी.

महात्मा गांधी की शांति और अहिंसा की नीति पर तो कोई उंगली उठाना भी गवारा नहीं समझता. देश बंटना मंजूर, किंतु अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ना. चाहे उस बंटवारे में 10 लाख लोग मौत के मुंह में चले जाएं, करोड़ों बेघर हो जाएं. अगर ऐसे महात्मा किसी और देश में पैदा हुए हों तो जानें. धन्य हो गई भारत भूमि ऐसे महात्माओं की जननी बन कर.

हम पाकिस्तान से उस आतंकवादी को मांग रहे हैं जिसे कभी भारत सरकार के कैबिनेट का दरजा प्राप्त मंत्री मेहमान बना कर हवाई जहाज में बैठा कर कंधार छोड़ कर आए थे. अब अगर हम पर दुनिया हंसे न, तो क्या रोए?

यदि सर्जिकल स्ट्राइक करनी है तो ऐसे मूर्खतापूर्ण निर्णयों की सर्जिकल स्ट्राइक करें जिन से हमारी जगहंसाई न हो. सर्जिकल स्ट्राइक करनी है तो नेताओं की बदजबानी और बड़बोलेपन की सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए जो बिना सोचेसमझे विवादित बयानों की झालरें लटकाए रहते हैं. उन की जबानें ऐसी तीखी जैसे दुधारी तलवारें हों.

सर्जिकल स्ट्राइक के तो ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहां त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए. लेकिन मुश्किल यह है कि हमारे नेता सेना से तो सर्जिकल स्ट्राइक कराना चाहते हैं किंतु खुद उन के जैसा हौसला नहीं रखते. कई बार तो हमारे नेता खुद उस समस्या का अभिन्न अंग होते हैं जिस की सर्जिकल स्ट्राइक करने का जिम्मा उन के कंधों पर ही होता है.

आज कौन सा विभाग ऐसा है जिस में भ्रष्टाचार व्याप्त नहीं है? क्या भारत के लोग जानते नहीं कि इस भ्रष्टाचार को पनपाए रखने के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? दरअसल, भ्रष्टाचार के विरुद्ध नेता इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करते क्योंकि इस सड़ी व्यवस्था का वे अभिन्न अंग होते हैं.

पंजाब में नशीली दवाओं के कारोबार में कौन लोग संलिप्त हैं? वे ही लोग न, जिन्हें नशाखोरी के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करनी थी.

अरे भाई, यदि सर्जिकल स्ट्राइक करनी ही है तो बढ़ती हुई आबादी की सर्जिकल स्ट्राइक करिए. कुछ ऐसे उपाय करिए कि भुखमरी और अशिक्षा का नामोनिशान न रहे. विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का सर्जिकल स्ट्राइक हो.

सर्जिकल स्ट्राइक हो भारत में व्याप्त बुराइयों व कमजोरियों का कि कोई भी भूखे पेट न सोए. हर बच्चा स्वस्थ हो. हर अधिकारी ईमानदार हो. हर नेता मृदुभाषी, सशक्त और चरित्रवान हो. स्वच्छ भारत, सशक्त भारत और स्वस्थ भारत हो. हर भारतवासी बुराई के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करने की हिम्मत करता नजर आए. चलो, तो करें ऐसे सर्जिकल स्ट्राइक…       

सपा में कोई नहीं है ‘मुलायम’

समाजवादी पार्टी के अंदर मचे घमासान से उत्तर प्रदेश में दूसरे राजनीतिक दलों की बांछें खिल गई हैं. अपने पार्टी के नेताओं के पलायन से परेशान बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती सब से अधिक खुश हैं. राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में सपा व बसपा के मध्य मुख्य टक्कर मानी जाती है. अब तक मुख्यमंत्री के रूप में लोग मायावती के मुकाबले अखिलेश यादव को बेहतर मान रहे थे. अखिलेश यादव नाम लेने की जगह मायावती को बूआजी कह कर संबोधित करते थे. जो मायावती को पसंद नहीं आता था. अब सपा में चल रहे घमासान से मायावती को राहत है.

सर्वे के अनुसार, सपा अब तीसरे पायदान पर चली गई है. भाजपा के साथ संभावित टक्कर से बसपा को थोड़ा सुकून है. उसे लग रहा है कि भाजपा का गांवों में ज्यादा असर नहीं है, ऐसे में उसे लाभ होगा. सपा में मची रार से भाजपा में भी खुशी की लहर है. अखिलेश यादव भाजपा को चालाकों की पार्टी कहते थे. वे बारबार दावा करते थे कि भाजपा अगर उन से मुकाबला करना चाहती है तो अपने मुख्यमंत्री का चेहरा सामने लाए. भाजपा अखिलेश के इस दांव के सामने खुद को विवश पा रही थी. सपा में रार से भाजपा अब फीलगुड मूड में है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य कहते हैं, ‘‘भाजपा को सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता. विपक्ष एकजुट होगा तो भी भाजपा सरकार बना लेगी.’’ हां, सपा में रार से कांग्रेस को परेशानी है. वह सपा के खिलाफ खड़ी नहीं होना चाहती. सपा में अखिलेश गुट को कांग्रेस नेता राहुल गांधी का समर्थन बताया जा रहा है. ऐसे में कांग्रेस सपा का साथ देने को तैयार है. सपा में शिवपाल यादव गुट लोकदल और जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंधन कर बिहार की तर्ज पर बड़ा गठबंधन बनाने की तैयारी में हैं. ये मुलायम को नेता बना कर विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव लड़ सकते हैं. प्रधानमंत्री के नाम पर अखिलेश यादव भी मुलायम सिंह का विरोध नहीं कर पाएंगे.

सपा में घमासान का प्रभाव पार्टी के अंदर काफी पड़ रहा है. पार्टी के ज्यादातर नेता व कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे कि वे किस का साथ दें, किस के  विरोध में रहें. विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण तक यह लड़ाई और गहरी हो सकती है.

यह बात अपनी जगह सच है कि अखिलेश के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर है. उत्तर प्रदेश के लोग यह सोच रहे हैं कि अखिलेश बेहतर शासन दे सकते थे, मुलायम और पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं ने उन को सही तरह से काम करने नहीं दिया. जिस तरह से अखिलेश ने विरोध किया उस से उन की दब्बूपने वाली छवि बदली है. आने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश का कद बढ़ रहा है. अपने इस कदम से वे उत्तर प्रदेश में मजबूत नेता की छवि बनाने में सफल तो हुए हैं लेकिन यह भी सच है कि सपा के प्रति लोगों का रुझान कमजोर हुआ है. ऐसे में बिना पार्टी की जीत के अखिलेश कैसे सफल होंगे, यह देखने वाली बात होगी.

अखिलेश का भविष्य आने वाले दिनों में उन के फैसलों पर निर्भर करेगा. फिलहाल सपा के घमासान से उन को लाभ होता दिख रहा है. वे अपनी छवि बनाने में तो सफल हैं पर संगठन की नजर से वे कमजोर हैं. अखिलेश की एक नकारात्मक छवि भी जनता के बीच है कि वे अपने खास लोगों का ही साथ देते हैं. इसी वजह से वे संगठन में दूसरे लोगों को जोड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

घरेलू विवाद से पार्टी पर असर

समाजवादी पार्टी का जनाधार उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं है. इस के बाद भी सपा में छिडे़ घरेलू विवाद पर पूरे देश की नजर लगी है. सपा में परिवार और पार्टी दोनों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. जिस से यह साफ है कि परिवार में छिडे़ विवाद का असर पार्टी पर पडे़गा.

सपा में आरपार की इस लड़ाई में जीत किसी की भी हो पर हार समाजवादी पार्टी की होगी. जिस का असर केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति पर भी पड़ेगा.

पिछले 2 दशकों से भी लंबे समय से सपा देश में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मजबूती से खड़ी नजर आती रही. उत्तर प्रदेश देश का सब से ज्यादा जनसंख्या वाला प्रदेश है और सपा प्रदेश की सब से बड़ी जनाधार वाली पार्टी है. ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में सपा के असर को नकारा नहीं जा सकता. जिस समय देश में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया हो उस समय सपा की जिम्मेदारी और उपयोगिता और भी जरूरी हो जाती है.

सपा का बिखराव सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करेगा. और यह राजनीति के लिए सुखद संदेश नहीं है. एक पक्षीय राजनीति कभी भी किसी भी देश और समाज के हित में नहीं रही है. इसी लिए राजनीति के प्रमुख जानकार मजबूत विपक्ष को देश के विकास का अहम हिस्सा मानते हैं. समाजवादी पार्टी की तरह महाराष्ट्र में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दक्षिण में एम करुणानिधि की पार्टी, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी और जम्मू में नैशनल कौन्फ्रैंस में भी बिखराव हुए हैं. ये पार्टियां छोटी थीं. इन का असर क्षेत्रीय स्तर पर था. जिस की वजह से इन का प्रभाव देश की राजनीति पर कम महसूस किया गया. सपा बड़े प्रदेश की बड़ी पार्टी है. इस का बिखराव देश की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेगा.

सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव को इस बात का अंदेशा था कि एक दिन पार्टी में बिखराव के हालात आ सकते हैं. इस कारण ही मुलायम ने हमेशा अपने

बेटे अखिलेश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपने का काम किया. 1999 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने संभल और कन्नौज दोनों ही सीटों से चुनाव लड़ा. एक सीट खाली कर उपचुनाव का समय आया तो मुलायम ने कन्नौज सीट अपने इंजीनियर बेटे अखिलेश के लिए छोड़ दी. जहां से अखिलेश यादव पहली बार संसद में पहुंचे.

इस घटना से तय हो गया था कि आने वाले दिनों में अखिलेश ही मुलायम के राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे. अखिलेश उस समय राजनीति में सक्रिय नहीं थे. वे पर्यावरण इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के विदेश से लौटे थे. अखिलेश के मुकाबले मुलायम के

भाई शिवपाल राजनीति में थे पर उन को मुलायम ने अपना उत्तराधिकार नहीं दिया.

अखिलेश की डिंपल से शादी होने के बाद मुलायम अपनी बहू को भी राजनीति में लाए और वह संसद सदस्य बनी. मुलायम अपने बेटे और बहू को ही राजनीति में नहीं लाए बल्कि पूरे परिवार को एकएक कर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद और जिला पंचायत तक में प्रभावी पदों पर ले आए. आज देश का सब से बड़ा मुलायम परिवार है जिस के एकसाथ इतने सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं. भाई शिवपाल को मुलायम अपना सब से प्रिय मानते हैं. इस के बाद भी वे असल उत्तराधिकारी नहीं बन सके. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के संगठन में शिवपाल का प्रभावी असर है. जब 2012 में विधानसभा के चुनाव में सपा ने पूरे बहुमत से सरकार बनाई तो मुलायम ने एक बार फिर बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बना कर अपने उत्तराधिकार पर मजबूत मुहर लगा दी.

घर में ही गुटबाजी

मुलायम को लग रहा था कि जिस तरह से परिवार के लोगों ने उन का सहयोग दिया उस तरह से ही वे सभी अखिलेश का भी साथ देंगे. यादव परिवार मुलायम के उत्तराधिकारी के रूप में अखिलेश यादव को स्वीकार कर चुका था. परिवार में कोई बड़ा मतभेद नहीं था. अखिलेश के उत्तराधिकार से सब से बड़ी चुनौती मुलायम की दूसरी पत्नी साधना के गुट से मिलने लगी. साधना के बेटे प्रतीक को राजनीति में लाने की योजना बनी. इस के लिए पार्टीके कुछ नेताओं ने लामबंदी भी शुरू की पर मुलायम ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. पार्टी स्तर पर यह मसला भले ही टल गया पर परिवार में यह बात बनी रही. ऐसे में मुलायम ने प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव को लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट से 2017 में विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दे दिया.

अब सपा में अंदरखाने नेताओं के 2 गुट उभरने लगे. अपर्णा यादव के चुनाव प्रचार का काम तेजी से आगे बढ़ने लगा. अपर्णा की मदद का दिखावा कर कई नेताओं, ब्यूरोक्रेटस और बिजनैसमेन मुलायम के करीब आने लगे. मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक ने अपने बिजनैस में खुद को व्यस्त करना शुरू कर दिया. वे पत्नी अपर्णा के हर कदम पर उस का साथ देने लगे. घर में 2 गुटों का लाभ लेने के लिए अवसरवादी नेताओं ने मुलायम परिवार के बीच की खाई को चौड़ा करना शुरू कर दिया. ऐसे में घोषिततौर पर अखिलेश को घर के अंदर से चुनौती मिलने की शुरुआत हो गई. अखिलेश के संबंध साधना और उन के परिवार से मधुर नहीं रहे. अखिलेश पिता मुलायम की हर बात को मानते हुए सरकार चला रहे थे. जैसेजैसे 2017 का विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है, मुलायम परिवार में खेमेबंदी तेज होती जा रही है.

अखिलेश का पलटवार

अब तक अखिलेश भी यह समझ चुके कि उन के खिलाफ राजनीतिक साजिश रची जा रही है. अखिलेश को चाचा शिवपाल से भी खतरा महसूस होने लगा. असल में अखिलेश ने एकसाथ 2 मोरचों पर मुकाबला करना शुरू कर दिया. परिवार के अंदर चल रही खींचतान तब सामने आई जब कैबिनैट मंत्री गायत्री प्रजापति को अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल से बाहर किया और चाचा शिवपाल के कुछ विभागों में कटौती की.  अखिलेश के पलटवार से हालात बिगड़ गए. परिवार के अंदर चल रहा विवाद सड़कों पर आ गया. एक खेमे ने दूसरे खेमे को आईना दिखाना शुरू कर दिया. अखिलेश के पलटवार पर केवल चाचा शिवपाल ही नाराज नहीं हुए, पिता मुलायम भी असहज महसूस करने लगे. बदले में मुलायम ने अखिलेश को समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.

यह कदम अखिलेश को पसंद नहीं आया और वे बगावत पर उतर आए. अब तक उन को यादव परिवार के प्रमुख सदस्य और सपा महासचिव प्रोफैसर रामगोपाल यादव का साथ मिल चुका था. रामगोपाल यादव को सपा में थिंकटैंक माना जाता है. वे अखिलेश को यह समझाने में सफल रहे कि इस सारे फसाद की जड़ में अमर सिंह का हाथ है. यादव परिवार पूरे मसले में मुलायम की दूसरी पत्नी साधना को सामने लाने से बच रहा था. ऐसे में रामगोपाल और अखिलेश ने अमर सिंह पर तीर चलाने शुरू कर दिए. यह बताया गया कि अमर सिंह से मिल कर शिवपाल सपा में बगावत को हवा दे रहे हैं. यहां से खुलेतौर पर परिवार के अंदर ही एकदूसरे पर हमले शुरू हो गए. यहां यह बता दें कि प्रोफैसर रामगोपाल यादव को पार्टी की मौजूदा जंग का निशाना होना पड़ा है, उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया है.

देखने में भले ही मुलायम सिंह यादव छोटे कद के हों पर शारीरिक और बौद्धिक ताकत में वे विरोधियों पर हमेशा भारी पड़ते रहे हैं. हमेशा धोतीकुरता, सदरी और पैरों में चमडे़ के जूते पहनने वाले मुलायम का राजनीतिक सफर 50 साल से ऊपर का है. उन की समाजवादी पार्टी अब 25 साल पूरे कर रही है. प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश में उन की पार्टी से अधिक प्रभावशाली उन का अपना व्यक्तित्व है. यह बात सच है कि सपा में पार्टी और परिवार में कोई फर्क नहीं है. इस के बाद भी उम्र के इस पड़ाव पर मुलायम के लिए इन चुनौतियों से निबटना सरल नहीं है. राजनीति में जो लोग मुलायम को लंबे समय से देखते रहे हैं उन को यकीन है कि पहलवान से नेता बने मुलायम परिवार और पार्टी को बचाने के लिए कोई भी ‘चरखा दांव’ चल सकते हैं. जिस का पता विरोधियों के चित्त होने पर ही चलेगा.    

1990 के दशक में जब देश में मंडल कमीशन लागू हुआ तो मुलायम सिंह यादव पिछड़े वर्ग के प्रमुख नेता के रूप में उभरे. इस के साथ ही साथ, वे भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में खडे़ हुए. भाजपा ने अयोध्या में राममंदिर बनाने को ले कर आंदोलन शुरू किया तो मुलायम सिंह यादव ने सब से पहले उस का विरोध किया. इस के चलते कट्टरवादी ताकतों ने मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक की उपाधि दे दी. इस के बाद भी मुलायम डरे नहीं और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खडे़ नजर आए.

मुलायम सिंह यादव ने 1991 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की. 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई. इस के बाद हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम ने बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम के साथ गठजोड़ कर के सरकार बनाई. सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करते हुए जनता ने उस समय नारा दिया ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्रीराम’

मुलायम और कांशीराम का दलितपिछड़ा गठजोड़ लंबे समय तक आगे नहीं चल पाया. यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा किए बिना ही गिर गई. जिस के बाद बसपाभाजपा के गठजोड़ से मायावती मुख्यमंत्री बनीं.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘मनुवादी ताकतें नहीं चाहती थीं कि प्रदेश में दलितपिछड़ा गठजोड़ बने. इस के लिए बसपा नेता मायावती की महत्त्वाकांक्षा को जगाया गया और यह गठजोड़ टूट गया.’’

मनुवादियों की साजिश से सपा-बसपा गठजोड़ ऐसा टूटा कि इस के एक होने की संभावना ही खत्म हो गई. 20 साल के बाद अब जब समाजवादी पार्टी बिखराव की राह पर है तो एक बार फिर से आरोप भाजपा पर है कि वह सपा को तोड़ना चाहती है.              

सोच बदलने की जरूरत

अमेरिका के चुनावी माहौल में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन की खबरें कुछ कम हो गईं पर असलियत यही है कि लिंग, रंग, जाति, रेस के मिश्रण से बना महान अमेरिका न केवल आज अपनी गलतियों को उजागर करने में लगा हुआ है, लगातार उन में सुधार भी करना चाह रहा है. भारत में भी आज यही स्थिति है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से दक्षिणी अमेरिका से विधिवत या गैरकानूनी आए लोगों का भय दिखा कर वोट लिए हैं वैसा ही भारत में होता रहा है. यहां कभी बंगलादेशियों को तो कभी पाकिस्तानियों को ले कर देशभक्ति का गुणगान कर वोटरों को अपने पक्ष में वोट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. डोनाल्ड ट्रंप की काली जनता के खिलाफ बोलने की खुल्लमखुल्ला हिम्मत तो नहीं हुई पर जब वे औरतों और लैटिनों के खिलाफ बोलते थे तो उस के पीछे अश्वेतों के प्रति जहर भी छिपा रहता था. यह जहर बहुत से गोरों के मन में सदियों से भरा है, वे अश्वेतों को आज भी गुलाम समझते हैं.

यही भारत में हो रहा है. यहां ‘दलित लाइव्स मैटर’ जैसे आंदोलन की जरूरत है क्योंकि यहां आज भी गलीगली, गांवगांव में, 1932 के अंबेडकर-गांधी पैक्ट के बावजूद, दलित गरीब, बीमार, अंधविश्वासी, बेसहारा, भूखे और शोषित हैं.

आरक्षण का लाभ भारत की जनसंख्या के बहुत छोटे से हिस्से को मिला. वह अपनी पहचान व आत्मविश्वास को नहीं बना पाया और इसी कारण उस का अर्थव्यवस्था में वह योगदान नहीं हो रहा जो उस की मेहनत, योग्यता, उपयोगिता आदि से संभव है. दलितों, पिछड़ों, शक की निगाहों से देखे जाने वाले अल्पसंख्यक मुसलिमों, सभी अन्य वंचित आदिवासी जातियों व धर्मों की औरतों को यदि अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में नहीं लाया गया तो देश कभी वांछित तरक्की नहीं कर पाएगा. यह तभी संभव है जब धर्म के अंधविश्वास, जो इन जातियों, वर्गों व ऊंचे शक्तिशाली संपन्न वर्गों के बीच दीवारें खड़ी करते हैं, तोड़े जाएं. भारत में दलित व मुसलिम रंग या शारीरिक बनावट में अलग नहीं हैं, यह एक सुखद बात है. पर इस के बावजूद उन के साथ भेदभाव होता है तो धार्मिक कारणों से. दलितों और पिछड़ों को धर्मजनित वर्णव्यवस्था अलग करती है और मुसलमानों को इसलाम व उस पर बने पाकिस्तान व बंगलादेश.

चीन और अमेरिका यदि सफल हुए तो इसलिए कि उन्होंने सभी रंगों, जातियों, औरतों को दुनिया के अन्य समाजों के मुकाबले बराबरी का ज्यादा हक दिया. भारत को उन्नति की सीढ़ी पर अगला कदम रखना है तो समाज की सोच बदलनी होगी. देश को अलगाववादी सोच पर हमला करना होगा और अलगाववाद केवल कश्मीर में ही नहीं है, हमारे दिलों में भी बैठा है, यह हमें पैदाइशी गुणों के रूप में मिल रहा है.

 

यह भी खूब रही

मैं 8वीं की कक्षा ले रही थी. पता नहीं कैसे, एक गिलहरी कक्षा में घुस आई और बच्चों की डैस्क और कुरसियों के बीच मंडराने लगी. गिलहरी जिधर भी जाती, बच्चे शोर मचाते और अपनी कुरसियों के ऊपर खड़े हो जाते. मैं भरसक उन्हें चुप रहने और गिलहरी को रास्ता देने के लिए निर्देश दे रही थी. अचानक कक्षा में शांति छा गई. तभी मुझे लगा कि मेरे पैर के पास कुछ हलचल हो रही है. देखा तो गिलहरी डर कर मेरी साड़ी के फौल पर चिपक गई थी. फिर तो मैं इतनी जोर से कूदी व चिल्लाई कि सारे बच्चे हंसी के मारे लोटपोट हो गए.

मनोरमा दयाल, नोएडा (उ.प्र.)

*

मैं अपनी बहन अनीता के साथ अपनी सहेली रेखा के यहां गई थी. दोनों की ही घर पर गिफ्ट आइटम की दुकानें हैं. जब मैं अपनी बहन के साथ सहेली के घर पहुंची तो उस ने खूब अच्छे से हमारा स्वागत किया. उस ने अपनी कामवाली को आवाज लगा कर कहा, ‘‘अनीता, 2 गिलास पानी ला दे.’’ वह पानी दे गई. कुछ देर बाद, ‘‘अनीता, चाय बना दे.’’

मेरी बहन ने मेरी तरफ देखा तो रेखा बोली, ‘‘भाभीजी, बुरा मत मानना, मेरी कामवाली का नाम भी अनीता है. मैं उसे बुला रही हूं.’’ कुछ दिनों बाद वह सहेली मुझ से बोली, ‘‘चलो, आप की बहन की दुकान देख कर आते हैं.’’ मैं ने कहा, ‘चलो’, मैं और उस की बेटी उन के यहां पहुंचे. उन्होंने स्वागत किया. अपनी कामवाली को आवाज लगाई, ‘‘रेखा, जरा पानी तो दे जा. अरे शिखा, जरा चाय बना लेना.’’ सहेली ने मेरी ओर देखा तो बहन बोली, ‘‘भाभीजी, बुरा मत मानना, हमारी कामवाली मांबेटी का नाम रेखा और शिखा है. उस बेचारी को बहुत झेंप लगी पर मैं ने मुसकरा कर कहा, ‘‘यह भी खूब रही’’ कि दोनों के नाम की कामवाली एकदूसरे के घर काम कर रही हैं.’’

रश्मि अग्रवाल, बरेली (उ.प्र.)

*

एक शनिवार की शाम हम अपने दोनों बच्चों के साथ बाजार गए और कार पार्क कर हम लोग खरीदारी करने चले गए. लौटने पर देखा तो कार के एकदम पीछे एक आटोरिकशा खड़ा था. पर आटोरिकशे का चालक वहां मौजूद नहीं था. तो मेरे पति ने खुद ही आटो को थोड़ा आगे सरकाने की कोशिश की. जैसे ही पति आटो को आगे हटाने लगे, 4-5 छात्रों का ग्रुप आया और पति को रिकशावाला समझ, मराठी में पूछा, ‘डीजीपी नगर चलणार का?’ (डीजीपी नगर चलोगे क्या). उन के इस व्यवहार से मुझे बहुत बुरा लगा, परंतु सरल हृदय पति मुसकरा दिए. माजरा समझ कर छात्रों ने माफी मांगी.

निर्मला राजेंद्र मिश्रा, नासिक (महा.)

हमारी बेडि़यां

साहित्य के एक सम्मान समारोह में नाथद्वारा जाना हुआ. कई शहरों से साहित्यकार इस सम्मान समारोह में हिस्सा लेने आए थे. उन में कुछ महिलाएं भी थीं जो वहां पहले भी आ चुकी थीं. रात को सोने से पहले सब ने श्रीनाथजी के मंदिर दर्शन की बात की. मैं ने भी उन के साथ जाने की हामी भर दी. जैसे ही मंदिर के पास की गली में पहुंचे, एक पंडे ने कहा, ‘‘मैडम, मंदिर एक किलोमीटर दूर है, और आगे बहुत भीड़, यदि आप प्रति आदमी 200 रुपए दें तो मैं आप को सीधे दर्शन करवा दूं, आप को भीड़ में धक्के नहीं खाने पड़ेंगे.’’ हम तीनों महिलाओं ने एकदूसरे की तरफ देखा और इशारों में ही निश्चय कर लिया कि नहीं, हम अपनेआप ही दर्शन को जाएंगे.

गली में जैसेजैसे बढ़ते गए, अपंग लोग भीख मांगते दिखाई दिए. छोटेछोटे बच्चे और महिलाएं बड़े पेशेवर तरीके से भीख मांग रहे थे. दूध व फूल वाले भी किसी न किसी तरह से पीछे पड़ कर चढ़ावे के लिए अपना माल बेचने में लगे हुए थे. गली के किनारे कचरे के ढेर लगे थे और बीच में जगहजगह गायों का गोबर पड़ा था. मैं उन से बच कर चल रही थी. आगे देखा एक खुला बरामदा था, जिस में बहुत सारी महिलाओं की भीड़ जमा थी. अधिकतर महिलाएं गांवों या छोटे कसबों से आई थीं. मैं भी अपनी महिला साथियों के साथ वहां जा कर बैठ गई. उस चौक के 2 हिस्से किए गए थे. बीच में ऊंची रेलिंग थी और बड़ा सा गेट था, जिसे ताले से बंद किया गया था.

दूसरी तरफ से पहले तो वीआईपी लोग दर्शन करने पहुंचे. उन की भीड़ समाप्त हुई तो कुछ पंडों के साथ विशेष पुरुषों व महिलाओं की आवाजाही शुरू हुई. मुझे समझते देर न लगी कि वे सब 200 रुपए दे कर पहले दर्शन करने वाले लोग हैं. खैर, जब हमारी लाइन खुली तो भगदड़ मच गई. जैसेतैसे धक्केमुक्कों के बीच मैं दर्शन कर पाई. मैं ने कहा, ‘जल्दी निकलो यहां से, भूख लगी है, कुछ खाएंगे. श्रीनाथजी के दर्शन ऐसे होंगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. जहां मैं मंदिर की सुंदरता और प्रसिद्धि को देखना चाहती थी, वहां धक्के, लूट और गंदगी के दर्शन होंगे, सोचा भी न था.’ मेरी साथी महिला बोली, ‘अगली बार 200 रुपए दे कर आराम से दर्शन करना, भीड़ के धक्के भी नहीं मिलेंगे.’ मैं ने कहा, ‘ये कैसे दर्शन? ईश्वर को भी घूस चाहिए? मैं ने तौबा कर ली कि आगे से ऐसे स्थानों पर नहीं जाऊंगी जहां धार्मिक स्थलों को कमाई का साधन बना लिया गया हो और व्यवस्था कुछ नहीं हो.’

रोचिका शर्मा, चेन्नई (तमिलनाडु)

ये पति

जब मेरी शादी हुई थी तब मैं थोड़ी मोटी थी. इतनी भी मोटी नहीं थी, फिर भी ससुराल में और लोगों की तुलना में, खास कर पति और छोटी ननद की तुलना में, मोटी तो थी. ये लोग अकसर मुझे डाइटिंग करने को कहा करते थे. मेरा मायका छोटे से शहर में था. एक बार जब मैं मायके में थी, मेरे पति और छोटी ननद मुझे लेने आए थे. हम लोग एक दिन सिनेमा का नाइट शो देखने गए थे. रात में लौटते समय कोई रिकशा या आटो नहीं मिला था. दोचार रिकशे थे जो सवारी ले कर निकल गए थे. हमारा घर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था. एक रिकशेवाले ने कहा था कि अगर हम आधा घंटा इंतजार करें तो वह सवारी छोड़ कर वापस आ कर हमें घर पहुंचा देगा. रात के साढ़े 11 बज चुके थे.

मैं ने सोचा कि उतना इंतजार करने से अच्छा है कि हम टहलते हुए 15 मिनट में घर पहुंच जाएंगे. सड़क सुनसान थी. हम लोग थोड़ी दूर निकले ही थे कि एक लड़के ने पीछे से मेरी ननद का हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो वह जोर से चिल्लाई, ‘‘भैया.’’ मेरे पति ने उसे रोकना चाहा, पर उस ने धक्का दे कर उन्हें गिरा दिया. मुझ में न जाने इतनी स्फूर्ति और शक्ति कहां से आ गई कि मैं उस पर टूट पड़ी थी और वह धराशायी हो गया. इस के पहले कि वह उठता, मेरी हाई हील सैंडल की ताबड़तोड़ मार से वह कराह उठा था. तब तक मेरे पति भी संभल चुके थे. दोचार हाथ उन्होंने भी जमाए. फिर हम लोग वहां से चल पड़े. पर मेरे पति इस पर भी मुझे चिढ़ाने से बाज नहीं आए और कहा, ‘‘जिस की बीवी मोटी उस का भी बड़ा काम है.’’

निधि अग्रवाल, फिरोजाबाद (उ.प्र.)

*

मेरे लिए एकाकी परिवार से संयुक्त परिवार में आ कर सामंजस्य बैठाना काफी कठिन था. और मैं परेशान हो कर रोने लगती थी. मेरी इस आदत पर घर में सभी कुछ न कुछ कहते रहते थे. mएक दिन पति को खाना देते समय मैं किसी बात पर रोने लगी. इस बात को ले कर वे बहुत नाराज हुए. कुछ देर बाद अपने गुस्से को शांत कर समझाते हुए प्यार से बोले, ‘‘आज के बाद मैं तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं देखना चाहता. कारण, रोना किसी व्यक्ति की कमजोरी का एहसास दिलाता है. तुम जैसी हो, बहुत अच्छी हो. अपनेआप को बदलने की कोशिश करो. कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हारा अनुसरण करें, तुम किसी का नहीं.’’ पति की यह बात मेरे जीवन का सिद्धांत बन गई और उन के सहयोग से मैं ने परिवार में एक अलग जगह बनाई.

शकुंतला सिन्हा, बोकारो (झारखंड)

मैं 19 वर्षीय युवती हूं. मैंने एक युवक से शारीरिक संबंध बना लिए. अब मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 19 वर्षीय युवती हूं. एक युवक से बहुत प्यार करती हूं. वह भी मुझ से प्यार करता है पर समस्या यह है कि वह मुझ पर बहुत शक करता है, जिस कारण मैं ने एक गलत कदम उठा लिया था. मैं ने एक अन्य युवक से बात की और उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. अब वह युवक भी मुझ से बात नहीं करता. मैं क्या करूं?

जवाब

प्रेम की धुरी है विश्वास. अगर आपस में एकदूसरे पर विश्वास ही नहीं है तो प्रेम कहां रहा? आप ने यह भी नहीं लिखा कि आप ने जिस अन्य युवक से संबंध बनाए उस से रिश्ता कैसे बना. जिस से पहले प्रेम करती थी वह आप पर शक करता था तो शक की वजह जान कर उस का निवारण करना चाहिए था न कि अन्य से संबंध बना कर उसे चिढ़ाने की कोशिश. अब दूसरा युवक भी आप का फायदा उठा कर आप को अंगूठा दिखा रहा है तो गलती किस की है? आप अब इस बात से परेशान हैं कि दूसरा युवक भी आप से संबंध बनाने के बावजूद बात नहीं करता या इस बात से जिस से प्रेम करती हैं उस का शक दूर नहीं हुआ.

बहरहाल, दो नावों पर पैर रखेंगी तो डूबना तय है. एक तरफ हो जाएं जिस से प्यार करती हैं उसे विश्वास दिलाएं कि वाकई आप उसी की हैं. जिस युवक ने आप से संबंध बनाए और बात नहीं करता उस से तो वैसे भी किनारा कर लेना चाहिए. सच्चे प्यार को पहचानिए और अपनाइए, आप की समस्या अपनेआप सुलझ जाएगी.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

इशात हुसैन बने टीसीएस के चेयरमैन

टाटा सन्‍स ने इशात हुसैन को टीसीएस का नया चेयरमैन नि‍युक्‍त कर दि‍या है. इशात हुसैन को तत्‍काल प्रभाव के साथ चेयरमैन का पदभार सौंप दि‍या गया है. इशात हुसैन को टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सायरस मि‍स्‍त्री की जगह नि‍युक्‍त कि‍या गया है. टाटा संस ने पि‍छले माह सायरस मि‍स्‍त्री को चेयरमैन पद से हटा दि‍या था. इसके बाद रतन टाटा को ग्रुप का अंतरि‍म चेयरमैन घोषि‍त कि‍या गया.

इशात हुसैन का टाटा से रि‍श्‍ता

– इशात हुसैन को जुलाई 2000 में टाटा सन्‍स का फाइनेंस डायरेक्‍टर बनाया गया था.

– इससे पहले जुलाई 1999 में उन्‍होंने टाटा सन्‍स के बोर्ड में एक्‍जीक्‍यूटि‍व डायरेक्‍टर के तौर पर ज्‍वाइन कि‍या था.

– हुसैन टाटा की कई कंपनि‍यों जैसे टाटा इंडस्‍ट्रीज, टाटा स्‍टील और वॉल्‍टास के डायरेक्‍ट हैं.

– इसके अलावा, वह टाटा स्‍काई और वॉल्‍टास के चेयरमैन हैं.   

– टाटा सन्‍स में आने से पहले हुसैन करीब 10 साल के लि‍ए टाटा स्‍टील में एक्‍जीक्‍यूटि‍व डायरेक्‍टर ऑफ फाइनेंस थे.

– 1981 में उन्‍होंने इंडि‍यन टयूब कंपनी (टाटा स्‍टील की एसोसि‍एट कंपनी) के बोर्ड में ज्‍वाइन कि‍या था.

– 1983 में टाटा स्‍टील और इंडि‍यन ट्यूब में मर्जर के बाद वह टाटा स्‍टील में चले गए थे.   

टाटा सन्‍स में बड़े बदलाव

टाटा सन्‍स में बड़े बदलाव किए गए हैं. डॉ. मुकुंद राजन को अमेरिका, सिंगापुर, दुबई और चीन के विदेशी कारोबार की एडिशनल जिम्मेदारी दी गई है. टाटा संस में अब एस पद्मनाभन ग्रुप ह्यूमन रिसोर्सेज (एचआरडी) के हेड होंगे.

 साइरस मिस्त्री को हटाने के बाद होने थे बड़े बदलाव

– साइरस मिस्त्री को टाटा ग्रुप के चेयरमैन पोस्ट से 24 अक्टूबर को अचानक हटा दिया गया था.

– मिस्त्री को हटाए जाने के बाद डॉ निर्मल्या कुमार, डॉ एनएस राजन और मधु खन्ना टाटा ने ग्रुप से रिजाइन कर दिया था. इसके बाद से माना जा रहा

था कि टाटा ग्रुप में ऑर्गनाइजेशनल चेंज होने हैं.

मिस्त्री पद छोड़ने का नहीं हैं तैयार

– साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद टाटा ग्रुप यह उम्मीद कर रहा था कि मिस्त्री टाटा ग्रुप की कारोबारी कंपनियों से भी अपने पद से इस्तीफा दे देंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है.

– टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से हटाए गए साइरस मिस्त्री का फिलहाल टाटा ग्रुप की कारोबारी कंपनियों के चेयरमैन पद से हटने का कोई इरादा नहीं है. इन  कंपनियों में टाटा स्टील, टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज और टाटा मोटर्स जैसे कई नाम शामिल हैं, जहां पर वह प्रमुख पोस्ट पर हैं.

हेडफोन लगाते ही खुल जाएगा म्यूजिक एप

सोचिए अगर आपके फोन में हेडफोन लगाते ही म्यूजिक एप अपने आप खुल जाए तो कैसा रहेगा. याहू एविएट एप लॉन्चर के जरिए न सिर्फ फोन की डिस्प्ले को आकर्षक बनाया जा सकता है बल्कि एप्लीकेशन भी यूजर की जरूरत के हिसाब से अपने आप ऊपर आ जाते हैं.

फोन यह एप डाउनलोड होने के बाद यूजर से पूछता है कि कौन से एप वे सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. उनकी पसंद के हिसाब से यह फोन की एप्लीकेशन को होम स्क्रीन यानि डिस्प्ले पर दिखाता है.

सुबह के समय कैलेंडर, मौसम की जानकारी और ट्रैफिक का हाल बताने वाले एप डिस्प्ले पर दिखते हैं और जैसे ही दफ्तर या स्कूल जाने का समय होता है तो ईमेल, ड्रॉपबॉक्स और एमएस वर्ड जैसी सेवाएं ऊपर आ जाती हैं.

इसके अलावा जैसे ही यूजर हेडफोन लगाएंगे तो म्यूजिक और फिल्म से संबंधित एप अपने आप होम स्क्रीन पर जगह बना लेंगे. याहू ओविएट को गूगल प्ले स्टोर से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है.

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