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इश्क जुनून-द हीट इज ऑन: सेक्स ही सेक्स

पाश्चात्य के प्रभुत्व में जी रही युवा पीढ़ी को बहुत नजदीक से समझने के दावे के साथ फिल्मकार संजय शर्मा थ्रीसम पर आधारित एक अति बोल्ड और अति सेक्सी फिल्म ‘‘इश्क जुनूनःहीट इज ऑन’’ लेकर आए हैं, इस फिल्म को पार्न फिल्मों की तरफ बढ़ता हुआ कदम ही माना जा सकता है. जिसमें बेसिर पैर की कहानी व घटिया पटकथा के साथ साथ ही घटिया निर्देशन है.

फिल्म ‘‘इश्क जुनून-द हीट इज ऑन’’ की कहानी के केंद्र में दो गहरे दोस्त वीर (राजवीर) और राज (अक्षय रंगशाही) हैं, जो कि बचपन से ही एक दूसरे की हर छोटी बड़ी बात के राजदार हैं. दोनों अपनी जिंदगी की हर बात एक दूसरे को न सिर्फ बताते हैं, बल्कि खुशी और दुःख के मौके पर भी एक ही रहते हैं. इनकी दोस्ती को कोई तोड़ नहीं पाता. जबकि उत्तर भारत के एक छोटे शहर की मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की पाखी (दिव्या सिंह) अपने आसमानी सपनों को पूरा करने और एकदम स्वतंत्र जिंदगी जीने की चाह के साथ मुंबई शहर में पहुंचती है. वह अपने मंगेतर रंजीत (राज आर्यन) को भी महत्व नही देती. उसे लोडेड यानी कि करोड़पति प्रेमी की तलाश है.

एक पार्टी में पाखी एक एमएलए के बेटे को फंसाने के चक्कर में खुद ही फंस जाती है, मगर ऐन वक्त पर राज उसकी मदद कर उसे उसके हास्टल तक छोड़ देता है. हास्टल की सहेलियों से पाखी को पता चलता है कि राज कई हजार करोड़ का मालिक है. बस फिर पाखी, राज को रिझाने में लग जाती है. एक दिन राज, पाखी को लेकर अपने फार्म हाउस पहुंचता है और उनका पीछा कर रहे रंजीत को राज अपने बाडीगार्ड दिलावर के हाथों पिटवाकर पेड़ पर लटकवा देता है. फार्म हाउस के बंगले के अंदर प्यार के नाम पर राज व पाखी के बीच गंदे सेक्स का खेल चलता है. दूसरे दिन सुबह वहां वीर भी पहुंच जाता है. पाखी को राज बताता है कि सारी जायदाद उसके मित्र वीर की वजह से है. फिर राज गायब हो जाता है.

वीर, पाखी को घोड़े पर बैठाकर पूरा फार्म हाउस घूमाते हुए बताता है कि वह इस पांच हजार करोड़ की जायदाद का मालिक है. अब पाखी, वीर के साथ प्यार करना शुरू कर देती है और वीर व पाखी के बीच सेक्स का खेल चलता है. जब पाखी की नींद खुलती है, तो पता चलता है कि सामने राज बैठा हुआ है. राज उसके सामने खुद व अपने दोस्त वीर के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखता है.

उसके बाद राज बताता है कि उस पार्टी में एलएलए के बेटे के चक्कर में पाखी ने वीर को अनदेखा किया था, इसी कारण राज ने उसकी मदद की थी और यहां तक उसे लेकर आया. यहीं पर पता चलता है कि राज व वीर एक अनाथालय में साथ में रहते थे. पर इस जायदाद के मालिक व उस वक्त के राजा ने अपनी कम उम्र की रानी के इशारे पर इन्हें गोद लिया था. रानी इनके साथ अपनी सेक्स की हवस की भूख मिटाती थी. पर हालातों के चलते राजा व रानी  को राज ने मार दिया था. तब से वह दोनो इस जायदाद के मालिक हैं.

मगर पाखी राज व वीर दोनों के साथ शादी करने की बजाय वहां से भागने का प्रयास करती है. कुछ प्रयास विफल हो जाते हैं. अंत में रंजीत के हाथों राज मारा जाता है, फिर वीर खुद को गोली मार लेता है.

इंटरवल से पहले फिल्म में अति बोल्ड व पार्न  की याद दिलाने वाले सेक्स दृश्य है, पर यह भाग रहस्य का अहसास दिलाकर कुछ उत्सुकता जगाता है. मगर इंटरवल के बाद फिल्म पर से निर्देशक व पटकथा लेखक की पकड़ खत्म हो जाती है. फिल्म देखकर दर्शक यही सोचता है कि उसने क्यों अपनी गाढ़ी कमाई इतनी घटिया फिल्म के लिए बर्बाद कर दी. यदि निर्देशक व लेखक संजय शर्मा की सोच यह हैं कि आज की युवा पीढ़ी सिर्फ सेक्स के पीछे भाग रही है, तो इस फिल्म का परिणाम बता देगा कि यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी. शायद वह भूल गए कि अभी भी भारत में पार्न फिल्मों का बाजार नहीं बना है. फिल्म का गीत व संगीत भी प्रभावित नहीं करता. फिल्म को अच्छी लोकेशन पर फिल्माया गया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो राजवीर और अक्षय रंगशाही दोनो ही निराश करते हैं. सेक्स से इतर कुछ दृश्यों में दिव्या सिंह उम्मीद जगाती हैं. राज आर्यन के हिस्से करने को कुछ है ही नहीं.

‘शांतकेतन इंटरटेनमेंट’’ और ‘‘विन्र फिल्मस’’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘‘इश्क जुनून-द हीट इज ऑन’’ के निर्माता अनुज शर्मा व विनय गुप्ता, निर्देशक संजय शर्मा, संगीतकार संजीव दर्शन, अंकित तिवारी, जीत गांगुली, वरदान सिंह और अंजान भट्टाचार्य, गीतकार संजीव चतुर्वेदी और शिराज निजामी हैं.

ग्राहक का चोरी हुआ पैसा बैंक को ही भरना पड़ेगा

बैंकों से क्रैडिट कार्ड सूची चोरी होने की खबर पर पूरे देश में बवाल मचा है. प्रत्येक घरपरिवार में चिंता की लहर है. बैंकों में घोटाले पहले भी हुए हैं लेकिन इस घटना को ले कर जनमानस की चिंता पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा है. इस की बड़ी वजह यह है कि आज बैंक खाते चिंता करने वाले सभी लोगों के पास हैं और खाताधारक एटीएम कार्ड भी लिए हैं. एटीएम कार्ड या क्रैडिट कार्ड के पासवर्ड बैंकों से चोरी हुए हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि खूनपसीने की कमाई के बैंक में सुरक्षित होने की निश्चिंतता में बैठे ग्राहक अब चिंतित हैं.

चिंताग्रस्त ग्राहकों को अभी पता ही नहीं है कि किस के खाते से कितना पैसा गायब हुआ है. गायब हुए पैसे का विस्तृत विवरण बैंकों ने सार्वजनिक नहीं किया है और न ही किसी खाताधारक को इस की सूचना दी है.

बैंक कितने असुरक्षित हो गए हैं, इस की यह घटना बड़ा उदाहरण बन कर सामने आई है. एटीएम में कार्ड में हेराफेरी और सीधेसाधे लोगों के खातों से ठगों द्वारा पैसा निकालने की घटनाएं आम हो गई हैं.

निश्चितरूप से यह बैंकों की लापरवाही का परिणाम है. इसलिए ग्राहकों का पैसा बैंकों द्वारा ही भरा जाना चाहिए. रिजर्व बैंक भी इसे बैंकों के स्तर पर हुई गलती मान रहा है और उस ने बैंकों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए कहा है. ऐसा नहीं हो सकता कि कोई हमारी अमानत हम से सुरक्षित रखने के नाम पर अपने पास रखे और बाद में कह दे कि वह गायब हो गई है, इसलिए लौटा नहीं सकते. हो सकता है कि बैंक ग्राहकों का पैसा डकारने के लिए सूची चोरी होने की बात कह रहे हों. ग्राहक को तो खाते में पैसा चाहिए, उसे आप के फ्रौड से लेनादेना नहीं है. 

विदेशी कोचों का चयन करेगी सरकारः गोयल

टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों की तैयार जल्द से जल्द शुरू करने की बात पर जोर देते हुए खेल मंत्री विजय गोयल ने कहा है कि सरकार तमाम खेलों के लिए विदेशी कोच नियुक्त करने पर फैसला लेगी. गोयल ने हालांकि कहा है कि सरकार इस संबंध में राष्ट्रीय महासंघों से चर्चा करेगी.

निशानेबाज गगन नारंग, पूर्व हॉकी खिलाड़ी विरेन रसकिन्हा, जगबीर सिंह और भारतीय खेल प्रधिकरण (साई) के महानिदेशक के साथ बैठक करने के बाद गोयल ने कहा कि राष्ट्रीय खेल महासंघ को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाएगा और अंतिम फैसला लेने से पहले उनसे बात की जाएगी.

टोक्यो ओलंपिक की तैयारियां अभी से

गोयल ने कहा, 'तैयारियां अभी से शुरू की जानी चाहिए इसलिए हमने यह बैठक बुलाई है. हमें कई सुझाव मिले हैं. अब एक रिपोर्ट तैयार की जाएगी जिसमें देश में मौजूद संरचना का भी जिक्र होगा.' खेल मंत्री ने कहा, 'भारतीय कोचों को 50,000 से दो लाख रुपये तक दिए जाएंगे. महासंघ विदेशी कोच नियुक्त कर सकेंगे लेकिन इसके लिए उन्हें जरूरत पड़ने पर इश्तिहार देना होगा.'

विदेशी कोचों की नियुक्ति के लिए इश्तिहार दिया जाएगा

गोयल ने कहा, 'सरकार ने पहले ही विदेशी कोचों की नियुक्ति पर इश्तिहार देने का फैसला किया था. साथ ही यह बात भी सुनिश्चित की जाए कि विदेशी कोच भारतीय कोचों को भी प्रशीक्षित करें. साई के साथ-साथ भारत में मौजूद सभी खेल सुविधाओं का सदुपयोग भी किया जाए.' गोयल ने बताया कि उन्होंने वित्त मंत्रालय से दुगने खेल बजट की मांग की है.

खेल विज्ञान को बढ़ाने के लिए मजबूत कदम उठाए जाएंगे

उन्होंने कहा, 'हम एनएसएफ द्वारा कराई जा रहे टूर्नामेंट का समर्थन करेंगे. हमने एनएसएफ को पत्र लिखकर उनकी चयन प्रक्रिया और टूर्नामेंट के आयोजन कराने की जानकारी मांगी है.' गोयल ने कहा, 'देश में खेल विज्ञान को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए जाएंगे. जिसमें खेल विज्ञान केंद्र और साई में नए खेल विज्ञान उपकरण खरीदना भी शामिल है. देश के कुछ विश्वविद्यालयों का चुनाव किया जाएगा जहां खेल विज्ञान विभाग खोला जा सके.'

लघु उद्योगों के विकास में सरकारी बैंक बड़ी बाधा

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की योजना लघु, सूक्ष्म और मध्यम (एमएसएमई) उद्यमिता को बढ़ा कर देश में रोजगार के बेशुमार अवसर उपलब्ध कराने की है. चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 करोड़ लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने की घोषणा की थी. शायद उन के इन वादों की बुनियाद में इसी उद्योग को प्रोत्साहित कर के बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने की सोच थी.

सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में तेज कदम बढ़ाए और सब से पहले बैंकों को इस तरह के उद्योग शुरू करने में मदद देने के वास्ते प्रोत्साहित किया. गैरनिष्पादित राशि यानी एनपीए के बोझ तले दबे बैंक इस उत्साह से भागीदार बनने में ज्यादा उत्सुक नजर नहीं आए तो सरकार ने उन के लिए ऋण उपलब्ध कराने का एक लक्ष्य तय किया.

आश्चर्य की बात यह है कि इस वर्ष जून तक सरकारी क्षेत्र के 27 बैंकों में इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक औफ महाराष्ट्र, विजय बैंक, स्टेट बैंक औफ इंडिया, त्रावणकोर तथा हैदराबाद, बैंक औफ बड़ौदा, पंजाब नैशनल बैंक तथा महिंद्रा बैंक ही सरकार के इस लक्ष्य को हासिल कर सके हैं. मतलब यह है कि 75 फीसदी सरकारी बैंक सरकार के इस लक्ष्य को हासिल करने में चूके हैं.

सरकार मानती है कि एमएसएमई 10 करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध करा कर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 37 फीसदी और निर्यात में 40 फीसदी की हिस्सेदार है. इस स्थिति में सरकारी बैंकों की यह निराशाजनक भूमिका चौंकाने वाली है. सही बात यह है कि बैंक ऋण देने के मामले में मनमानी करते हैं.

हर जिले में अनुसूचित बैंकों की शाखाएं खुल रही हैं. इस के बावजूद ये बैंक आम आदमी को फायदा पहुंचाने वाले ऋण के बजाय बैंक का फायदा करने वाले ऋण पर ज्यादा केंद्रित रहते हैं. यह मनमानी स्थानीय प्रबंधन की होती है जबकि इन्हीं बैंकों से 9 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर विजय माल्या फरार हो जाता है.

बैंकों की दोहरी नीति जनसामान्य के लिए परेशानी देने वाली है. इस नीति पर सख्ती होनी चाहिए और सख्ती तब ही होगी जब सामान्य लोग शिकायत करेंगे और उन पर ध्यान दिया जाएगा. एमएसएमई के जरिए देश में सचमुच रोजगार के प्रचुर अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं.

क्या होगा डोनाल्ड का ‘ट्रंप’ कार्ड

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद अमेरिका ही नहीं, दुनियाभर में तरह-तरह से इसके विश्लेषण हो रहे हैं. कहीं अलग-अलग कोणों से मतदाताओं के आंकड़ों की परतें खोली जा रही हैं, तो कहीं प्रचार के दौरान कही गयी बातों और घोषणापत्र में दर्ज बातों को नये राष्ट्रपति द्वारा अमलीजामा पहनाने के संबंध में चिंताएं हैं.

अमेरिका के कई शहरों में ट्रंप के विरुद्ध युवाओं के प्रदर्शन हो रहे हैं. इन सबके बीच, ट्रंप की जीत की तुलना कुछ महीने पहले ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह से भी की जा रही है, जिसमें 52 फीसदी लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला लिया था. ब्रेक्जिट और ट्रंप के अभियानों के बरक्स यूरोप की कुछ अन्य हालिया राजनीतिक गतिविधियों को भी रखा जा सकता है, जो आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के रूप में ठोस नीतिगत पहल की जगह नस्लभेदी, अप्रवासी विरोधी और राष्ट्रीयता के मुद्दे पर जनता को लामबंद करते हैं. इन प्रवृत्तियों का नेतृत्व ज्यादातर ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है, जो विवादास्पद और अपमानजनक बयान देने तथा अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं.

अमेरिका और यूरोप जैसे समृद्ध, शिक्षित और लोकतांत्रिक समाजों में ऐसे लोगों की स्वीकार्यता बढ़ने से उभरे कुछ संकेत स्पष्ट हैं. यह एक इशारा है कि उन समाजों का संकट इस हद तक सघन हो गया है कि आम लोगों के बड़े हिस्से के पास प्रस्तावित समाधानों की समुचित पड़ताल करने का धैर्य  नहीं बचा है और वे किसी ऐसे नेता के पीछे भी चलने के लिए तुरंत तैयार हो जा रहे हैं, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहा हो. इसका दूसरा संकेत यह भी है कि समावेशी विकास के वादे पर आधारित उदारवादी लोकतांत्रिक राजनीति जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में विफल रही है.

स्थापित राजनीतिक वातावरण के प्रति अमेरिकी जनता की उदासीनता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में 46.9 फीसदी मतदाताओं ने वोट ही नहीं दिया. ब्रेक्जिट जैसे अहम मसले पर जनमत संग्रह में भी करीब 30 फीसदी लोग मतदान के लिए नहीं गये थे. ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय समस्याओं और संघर्षों को संतुलित रूप से समझने-समझाने का प्रयास हो, अन्यथा मौजूदा नकारात्मक राजनीतिक परिघटनाएं वैश्विक स्तर पर राजनीतिक एवं आर्थिक संकट के नये दौर का सूत्रपात कर सकती हैं. अनेक विद्वान इन ताजा रुझानों की तुलना 1920 और 1930 के दशकों से कर रहे हैं, जब यूरोप में अंध-राष्ट्रवाद, नस्लभेद और औपनिवेशिक होड़ ने युद्धोन्माद का भयानक माहौल बनाया था, जिसकी परिणति महामंदी और द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में दुनिया को भुगतनी पड़ी थी. उस दौर के अंधेरे साये शीत युद्ध के रूप में करीब आधी सदी तक दुनिया पर मंडराते रहे थे.

ध्यान रखा जाना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियां अमेरिकी जनजीवन और अर्थव्यवस्था को तो सीधे तौर पर प्रभावित करती ही हैं, बाकी दुनिया को भी उनका नफा-नुकसान उठाना पड़ता है. ट्रंप प्रशासन को निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरह कांग्रेस और सीनेट में अल्पमत में होने की चुनौती नहीं होगी, क्योंकि इन दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का वर्चस्व है. इस स्थिति में ट्रंप को अपनी नीतियों को लागू करा पाने में सहूलियत होगी. हालांकि उनके सामने विभाजित जनमत और स्थापित राजनीतिक तंत्र से निपटने की चुनौती होगी. ऐसे कारकों की वजह से ट्रंप की जीत को लेकर कई अन्य देशों की तरह ही भारत में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

अब भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों का भविष्य ट्रंप के रवैये पर निर्भर करेगा. अमेरिकी कंपनियों के लिए करों में छूट से भारत में कार्यरत कंपनियां वापस जा सकती हैं. अप्रवासन नियमों को कठोर करने से वहां काम या पढ़ाई कर रहे भारतीय प्रभावित हो सकते हैं और उनके लिए अवसरों की कमी हो सकती है. सूचना तकनीक और दवाइयों से जुड़े भारतीय कारोबार पर भी ट्रंप की नीतियां प्रतिकूल असर डाल सकती हैं. हालांकि, यदि ट्रंप ने मैन्युफैक्चरिंग पर अपने वादे के मुताबिक जोर दिया, तो भारतीय निवेशकों को अच्छा मौका मिल सकता है, लेकिन तब ऐसे भारतीय उद्योगपति देश के भीतर धन निवेश करने से परहेज कर सकते हैं. आतंकवाद और पाकिस्तान में मसले पर भारत और अमेरिका की नजदीकी बढ़ सकती है, लेकिन इस संबंध में बहुत कुछ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी निर्भर करेगा.

जीत के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने सभी अमेरिकियों के लिए काम करने और दुनिया के अन्य देशों के साथ सहयोग का रुख अख्तियार करने की घोषणा की है. लेकिन, यह समय के गर्भ में है कि डेढ़ साल से विभिन्न मुद्दों पर कड़ा रवैया अपनाने की बात कहते रहनेवाले ट्रंप राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के बाद कितना बदलेंगे. उनकी पार्टी के भीतर की और डेमोक्रेटिक खेमे की प्रतिक्रियाएं भी इसमें खासा महत्वपूर्ण होंगी. फिलहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि बतौर राष्ट्रपति उनके हाव-भाव और विचारों का सकारात्मक पक्ष ही उनकी नीतियों की दशा और दिशा तय करेगा.

क्या हौकी के दिन फिरेंगे

हौकी के लिए अच्छी खबर यह है कि भारतीय हौकी ने मलयेशिया में खेले गए चैंपियंस ट्रौफी में पाकिस्तान को 3-2 से हरा कर एशियाई चैंपियंस ट्रौफी अपने नाम कर ली.

भारत के लिए रुपिंदर पाल सिंह, अफ्फान यूसुफ और निकिन थिमैया ने गोल दागे जबकि पाकिस्तान की ओर से मोहम्मद अलीम बिलाल और अली शान ने गोल दागे.

इस से पहले दक्षिण कोरिया के इंचियोन में वर्ष 2014 में एशियाई खेलों के बाद पहली बार दोनों टीमें किसी महाद्वीपीय टूर्नामैंट के फाइनल मुकाबले में आमनेसामने थीं. वर्ष 2011 में भारत ने पहले संस्करण का खिताब जीता था. वहीं वर्ष 2012 और 2013 में इस टूर्नामैंट का विजेता पाकिस्तान रहा था.

इस जीत के बाद भारतीय हौकी टीम के कप्तान व गोलकीपर श्रीजेश ने कहा कि टीम अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए पैशन के साथ खेली और खिताब पर कब्जा जमाया. हालांकि वे चोट की वजह से फाइनल मैच खेल नहीं पाए, उन की जगह आकाश छिकते भारत के गोलकीपर रहे.

एक जमाना था जब हौकी हमारे लिए जनून की तरह होती थी पर पिछले कुछ वर्षों से हौकी के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं. खिलाडि़यों को अभ्यास करने के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहा, पैसों की कमी के चलते खिलाडि़यों में मायूसी छाई रही. हौकी के प्रति नए खिलाडि़यों का रुझान खास नहीं रहा. पर अब युवा खिलाडि़यों में जोश व जज्बा दिख रहा है और इसी जोश व जज्बे के कारण भारतीय हौकी टीम ने पाकिस्तान को मात दे कर खिताब जीता है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में हौकी के भी दिन फिर जाएं.

पेटीएम का स्टार्टअप धमाका

देश में औनलाइन भुगतान सेवा उपलब्ध कराने की सुविधा देने वाली सब से बड़ी सेवाप्रदाता फर्म पेटीएम अपनी सेवाओं में सुधार के लिए 1,000 स्टार्टअप कंपनियों को मदद प्रदान करेगी. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय शंकर शर्मा का कहना है कि अपने स्तर पर कंपनी जितनी बेहतर सुविधा दे सकती है उसे स्थापित कर चुकी है. लेकिन उन्हें लगता है कि भुगतान प्रणाली को और बेहतर बनाने व इस के विस्तार के लिए उन्हें बाहरी मदद की जरूरत है.

इस के लिए कंपनी सिलिकौन वैली की कंपनी आईबीएम, फेसबुक तथा माइक्रोसौफ्ट की तर्ज पर दूसरी कंपनियों से तकनीकी सहयोग हासिल करेगी. कंपनी ने इस काम के लिए एक स्टार्ट हब की शुरुआत की जिस के जरिए एक हजार स्टार्टअप्स की मदद लेने का ऐलान किया गया है.

उस के कारोबार को आसान बनाने में सहयोग करने वाले स्टार्टअप कारोबारियों से ट्रांजैक्शन तथा रखरखाव का शुल्क नहीं लिया जाएगा. स्टार्टअप से जुड़ने वाले कारोबारी कंपनी के लिए भुगतान के नए क्षेत्रों के वास्ते तकनीकी मदद पहुंचाएंगे. कंपनी का कहना है कि कंपनी अभी तक बस, सिनेमा तथा विमान टिकट सेवा में भुगतान की सुविधा दे रही है और अब वह योजना भवन, किराए के मकान तथा ट्रैफिक चालान जैसे क्षेत्रों में भी सेवा प्रदान करना चाहती है.

इस के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी कंपनी काम आरंभ करेगी और यह हब उस विस्तार में उस के लिए महत्त्वपूर्ण साबित होगा. ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने का सड़क से वीडियो बना कर कंपनी को भेजा जा सकता है, जनसामान्य की इस शिकायत के आधार पर भी चालान काटा जा सकेगा.

स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया के विस्तार की सरकार की योजना में इस तरह के प्रयास को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है. इस से नकदी ले कर चलने के प्रचलन पर कमी आएगी और डिजिटल सेवाओं के द्वारा लोग छोटेमोटे भुगतान भी कर सकेंगे.

जीएसटी परिषद की बैठक का बाजार पर असर

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई उतारचढ़ाव के माहौल के बीच 28 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को फिर पार कर गया. सूचकांक 19 अक्तूबर को 144 अंक गिरा. यह 8 जुलाई के बाद की सब से बड़ी गिरावट है. सप्ताह की शुरुआत की इस गिरावट के बाद बाजार में वैश्विक बाजारों का सकारात्मक असर देखने को मिला और शेयर बाजार ने फिर उड़ान भरी और सूचकांक 28 हजार अंक के पार चला गया.

21 अक्तूबर तक सूचकांक 404 अंक की बढ़त के साथ इस मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंचा है. इस दौरान नैशनल स्टौक एक्सचेंज यानी निफ्टी 110 अंक की तेजी के साथ 8,500 अंक के पार पहुंच गया.

बाजार के जानकारों का मानना है कि देश में समान कर व्यवस्था लागू करने के लिए वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी परिषद की 3 दिवसीय बैठक का बाजार पर सकारात्मक असर देखने को मिला. हालांकि इस दौरान देश के विदेशी मुद्रा बाजार में निराशा का माहौल रहा और यह 9 सप्ताह के निचले स्तर पर था. इस से पहले 7 अक्तूबर को विदेशी मुद्रा भंडार 3 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया था.

सरकार की उदासीनता

विश्वकप पुरुष वर्ग कबड्डी के खिताबी मैच में 2 बार के चैंपियन भारत ने ईरानी हमले को 38-29 की जीत में बदल कर विश्व विजेता का दरजा हासिल किया तो सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री से ले कर देश की तमाम बड़ी हस्तियों ने बढ़चढ़ कर बधाई दी. लेकिन यही खिलाड़ी जब नई दिल्ली हवाईअड्डे पर अहमदाबाद से लौटे तो उन्हें स्वागत करने और प्रोत्साहित करने के लिए एक भी सरकारी नुमांइदा वहां नहीं पहुंचा. जाहिर है पारंपरिक खेलों के प्रति सरकार का नजरिया अब भी जस की तस है.

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए बड़ीबड़ी बातें करती हैं मगर खेलों को कितना बढ़ावा मिल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है. यही यदि क्रिकेट होता तो मंत्री से ले कर अफसर तक एयरपोर्ट पर खिलाडि़यों के स्वागत के लिए खड़े रहते.

खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता कोई नई बात नहीं है. हौकी जैसे राष्ट्रीय खेल का जो हश्र हुआ है उस के लिए पूरी तरह से सरकारी तंत्र ही जिम्मेदार है. हौकी का स्तर गिरता गया और सरकारी तंत्र सोता रहा. सरकार ने सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया. विश्वकप जीतने वाली महिला कबड्डी खिलाडि़यों को होटल तक पहुंचने के लिए आटोरिकशा तलाशने पड़े तो समझा जा सकता है अव्यावसायिक खेलों के खिलाडि़यों से किस तरह का व्यवहार किया जाता है या फिर उन्हें किस तरह की सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं. रियो ओलिंपिक में भारत की लाज 2 महिला खिलाडि़यों ने बचाई. ये उन की अपनी उपलब्धि कही जा सकती है न कि सरकार की.

अधिकांश खेलों की लगाम अब औद्योगिक घरानों के हाथों में आती जा रही है, खिलाड़ियों की बोली लग रही है, खिलाड़ी अपने मालिक के प्रति वफादार हो रहे हैं, न कि देश के प्रति. खेलों का बेड़ा गर्क हो रहा है. विश्व में खेलों को ले कर भारत की किरकिरी हो रही है. लेकिन सरकारी नुमांइदों के चेहरों में शिकन तक नहीं.

बेशर्मी की हद तब हो जाती है जब रियो जैसे बड़े आयोजनों में सरकारी पैसे से मंत्री और मंत्री के चमचे अपने मजे के लिए भ्रमण पर जाते हैं और करोड़ों रुपए का हिसाब सरकारी खाते में डाल देते हैं. खेल के नाम पर पैसों की लूट मची हुई है. हर कोई अपनी जेबें भरने में लगा हुआ है लेकिन उन खिलाडि़यों की सुध लेने वाला कोई नहीं जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई मैडल जीते हैं. आज वे दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.

जितनी धनराशि ओलिंपिक विजेताओं को दी जाती है, यहां यह मतलब नहीं है कि उन्हें देना नहीं चाहिए, उतनी धनराशि यदि सरकार स्कूलों व विश्वविद्यालयों की खेल संबंधी गतिविधियों और प्रतिभाशाली खिलाडि़यों के प्रशिक्षण पर खर्च करती तो बात कुछ और ही होती.

खेल एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत दुनिया के सब से गरीब देशों से भी पिछड़ा हुआ है. ओलिंपिक में छोटेछोटे गरीब देशों के खिलाड़ी मैडल जीत कर ले जाते हैं.

खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता के चलते न तो प्रतिभावान खिलाडि़यों को तलाशा जाता है और यदि तलाश भी लिया जाता है तो उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं.

खतरनाक, मुफ्त का वाईफाई

अनोखा परिदृश्य है. एक तरफ देश के हर कोने को वाईफाई से लैस करने की सरकारी मुहिम चालू है तो दूसरी तरफ कई विकसित देशों में इस बात को ले कर घमासान मचा हुआ है कि बच्चों के स्कूल और अस्पतालों को पूरी तरह से वाईफाई मुक्त किया जाए.

यही नहीं, वाईफाई के आसन्न और भयानक खतरों पर वहां दर्जनों गहन शोध रिपोर्टें भी आ चुकी हैं. पर कुल मिला कर माहौल शहर के समूचे परिक्षेत्र को वाईफाई करने के खिलाफ ही है. अधिकांश लोग नहीं चाहते कि वे चौबीसों घंटे सातों दिन लगातार वाईफाई की जद में रहें, तब भी जब वे उस का इस्तेमाल नहीं कर रहे हों.

बच्चों को ले कर तो कई देशों के अभिभावकों ने अभियान ही छेड़ रखा है. वहीं अपने देश में लोग या तो समूचे देश को वाईफाई करने के समर्थक हैं या फिर इस मसले के प्रति उदासीन. आशंकाओं के प्रति जागरूकता और उस का कोई तार्किक विरोध फिलहाल शुरू नहीं हुआ है. वैज्ञानिकों, चिकित्सकों,शोधार्थियों के बड़े समूह और उन के निष्कर्षों को मानें तो यह चौबीसों घंटे मुफ्त मिलने वाला सरकारी वाईफाई लंबे समय में बेहद खतरनाक और महंगा पड़ने वाला है.

यह हैरान कर देने वाली बात है कि जहां विदेशी मीडिया ऐसी खबरों और रिपोर्टों से पटा पड़ा है कि बेलगाम और हर जगह वाईफाई की उपस्थिति बहुत घातक है वहीं भारतीय मीडिया में शोध तो क्या, इस संदर्भ के समाचार भी नहीं हैं, बल्कि पूरे परिक्षेत्र को वाईफाई करने को विकास की शानदार उपलब्धि के बतौर प्रशंसनीय नजरों से देखा व प्रचारित किया जा रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की आशंका और 34 बड़ी शोधपरक ताजी रिपोर्टों के अलावा भी ढेरों वैज्ञानिक जिस ओर गंभीरता से इशारा कर रहे हैं उस ओर देख कर लगता है कि भविष्य में इस मुफ्त के वाईफाई की सत्ता और जनता दोनों को भारी कीमत चुकानी होगी. सार्वजनिक स्थलों पर मुफ्त के वाईफाई नैटवर्क के असावधानी से इस्तेमाल के चलते उपभोक्ता का डाटा चोरी हो जाना, उस के फोटो, व्यक्तिगत जानकारियां और यहां तक कि वित्तीय कामकाज, बैंक खाते में सेंध लगना या फिर डिवाइस पर वायरस का अटैक कोई बड़ी बात नहीं है. यही नहीं, इस से ज्यादा से ज्यादा डिवाइसें खराब होंगी या फिर धन का नुकसान होगा.

चिंता गेहूं और गुलाब की नहीं, गूगल की है अगर हम हर समय, चौबीसों घंटे वाईफाई के रेडियो तरंगों की जद में रहेंगे तो यह जानलेवा भी हो सकता है और सेहत के इस नुकसान की भरपाई असंभव है. समूचे संसार के चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने इस बारे में चेताया है कि बेतार की रेडियो फ्रीक्वैंसी या माइक्रोवेव के बेवजह संपर्क में आने से जहां तक हो, बचें. यह कैंसर का कारक बनता है, दिल, दिमाग, गुर्दे की समस्याएं खड़ी करता है, याददाश्त को कम कर सकता है, अनिद्रा को बढ़ा सकता है. दूरगामी तौर पर यह बहुत खतरनाक है.

इन सारे खतरों को धता बताते हुए सरकारें हर आदमी को वाईफाई की सुविधा देने को आमादा हैं. पिछले साल समूचे प्रदेश में वाईफाई की मुफ्त सुविधा देने का वादा दिल्ली की जनता को इतना भाया कि उस ने70 में से 67 सीटें वादा करने वाली पार्टी को सौंप दीं.

दिल्ली में सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त वाईफाई की सुविधा के लिए शुरुआत में 1,000 वाईफाई स्पौट स्थापित करने की बात कही. वादा किया गया कि मैट्रो में साल के आखिर तक वाईफाई मिलने लगेगा.

कहा जा रहा है इसी दौरान दिल्ली परिवहन निगम की 5,000 बसों में भी वाईफाई लग जाएगा. उधर, डिजिटल इंडिया का दम भरने वाली केंद्र सरकार भी सार्वजनिक स्थलों पर निशुल्क वाईफाई को बढ़ावा देने में किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

प्रधानमंत्री की अगुआई में डिजिटल इंडिया की बैठक में यह तय पाया गया है कि सार्वजनिक स्थलों पर मुफ्त वाली वाईफाई सेवाएं देने के लिए कंपनियों को अभी कई एजेंसियों से जो मंजूरी लेनी पड़ती थी, उसे खत्म किया जाएगा. साथ ही, सरकार से किसी प्रकार का लाइसैंस भी नहीं लेना होगा और न सेवा का शुल्क चुकाना होगा. इस से कंपनियां कम लागत और बिना झमेले में फंसे वाईफाई जोन स्थापित कर सकेंगी. आज गेहूं और गुलाब से ज्यादा चिंता गूगल की है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अनाज तो पैसे दे कर मिलता है पर समूचे शहर और संपूर्ण देश को इंटरनैट मुफ्त उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है.

राज्य सरकारें अपने सघन शहरों को वाईफाई से युक्त करना चाह रही हैं तो केंद्र सरकार का लक्ष्य समूचे देश के डिजिटलीकरण के लक्ष्य के साथ हर उस जगह पर मुफ्त वाईफाई देने का है जहां लोग जुटते हों भले वह धार्मिक स्थल हो या पर्यटन स्थल अथवा कोई और जगह. सरकारें इस के लिए इतनी बुरी तरह उतारू क्यों हैं जबकि न तो यह उन के चुनावी घोषणापत्र का सब से अहम बिंदु था और न महज इसी बात के लिए उन्हें जनादेश मिला था? 

वास्तव में सरकारी कमाई और बाजार इस की बड़ी वजह है. स्पैक्ट्रम और बैंडविथ बेच कर सरकार अरबों कमाएगी, तो वाईफाई प्रदाता उस से कई गुना ज्यादा कमाएंगे. हर जगह सिर्फ पहले10-15 मिनट ही मुफ्त मिलेगा फ्री का वाईफाई, उस के बाद उस का पैसा ग्राहकों को भरना पड़ेगा, तेज गति के लिए ज्यादा पैसा. लेकिन लोग इस पर इतने निर्भर हैं कि पैसे भरेंगे.

गुजरात के सूरत में मुफ्त वाईफाई दिया गया तो महज 15 जगहों पर ही और 21 दिनों में 8,199 जीबी डाटा डाउनलोड हुआ. अगर अधिकांश लोगों के हाथों में मोबाइल फोन, स्मार्टफोन, लैपटौप, टैबलैट और इसी तरह के इंटरनैट सुग्राह्याता वाले उपकरण मौजूद हैं तो बिन वाईफाई के वे, टीवी बिना कनैक्शन जैसे हैं. और अगर वाईफाई न होगा तो फिर बजार तो उन से कट ही जाएगा. ऐसे में कोई उन्नाव से पिपरसंड के बीच सफर करते हुए फ्लिपकार्ट या स्नैपडील से अपनी चप्पल कैसे खरीद पाएगा.

फायदा भी, नुकसान भी

सरकारें और वाईफाई प्रदाता दोनों फायदे में हैं. सरकारों को तो संसाधन बेच कर धन और जनसुविधा में बढ़ोतरी कर विशाल युवावर्ग के जनसमर्थन का दोहरा लाभ मिल रहा है तो वाईफाई प्रदाता को विशाल ग्राहकवर्ग और भारी मुनाफा. बाजार जो इन दोनों का पोषक है, उस का व्यापक लाभ तो पहले ही सुनिश्चित है. रही बात उपभोक्ता की और खासकर आमजन की, तो उस के लिए भी यह सुविधा बेहद अहम है. इस के जरिए तमाम काम आसान हो जाते हैं, जीवन प्रवाह बना रहता है.

घर से बाहर कार्यालय, और स्कूलकालेज महत्त्वपूर्ण व ज्यादा जुटान वाले सार्वजनिक स्थल, रेलवेस्टेशन,हवाईअड्डे ही नहीं, रेल के भीतर व उड़ान के दौरान, सभी यही चाहते हैं कि वे अपनी डिवाइस को हर जगह इंटरनैट से जोड़े रखें. जाहिर है कि कहीं गए सैल्फी खींची और उसे तुरंत सोशल मीडिया पर शेयर न किया तो कहीं आनाजाना, किसी से मिलनाजुलना सब अकारथ व निरर्थक ही रह जाएगा.

यह शोध का विषय है कि जब इंटरनैट नहीं था तो आम शहरी इस के बिना कैसे रहते थे या अगर भविष्य में कभी इंटरनैट नहीं होगा तो लोग कैसे रहेंगे?

एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण बताता है कि विदेशी तो क्या, भारतीय पर्यटकों की भी प्राथमिकता सूची में मुफ्त वाईफाई सुविधा वाला होटल सर्वोपरि है. संस्थानों या फिर आम जनता को भी सुविधा भाती है क्योंकि एक ही स्थान से इंटरनैट की सेवा समूचे घर परिसर में कई लोगों को अपनेअपने डिवाइस पर तार के जंजाल से मुक्त रहते हुए मिल जाती है. घर हो या दफ्तर, दुकान हो या बाग, सफर में हों या आराम कर रहे हों स्मार्ट फोन या मोबाइल पर इंटरनैट के जुड़ाव के बाद तो हर वक्त जुड़े रहना एक आदत से बढ़ कर लत में तबदील हो गया है. वाईफाई की सुविधा के बाद यह लत बीमारी बन गई है और इस इंटरनैटी लत की बीमारी से नजात दिलाने के लिए अस्पताल खुल गया है. फिर भी अपने देश में मुफ्त वाईफाई का स्वागत चारों तरफ हो रहा है.            

बीमारी बन सकती है यह सुविधा

1997 से शुरू वाईफाई या बेतार के इंटरनैट के एक दशक बाद हुए शोध के बाद वैज्ञानिकों ने कहा, इस के माइक्रोवेव के खतरे बहुत हैं. बाद में इस के खतरे को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कैटेगरी या क्लास 2बी का कैंसर कारक माना. मतलब आश्वस्त तो नहीं पर यह आशंकित कारक अवश्य है. इस के बीच लगातार रहने से तमाम दूसरी घातक गड़बडि़यों का भय है.

अर्जेंटीना स्थित नेसेंटिस सैंटर फौर रीप्रोडक्टिव मैडिसिन और ईस्टर्न वर्जीनिया मैडिकल स्कूल के नेतृत्व में किए गए अध्ययन के अनुसार, लैपटौप पर वाईफाई के जरिए इंटरनैट का इस्तेमाल करने पर 25 फीसदी शुक्राणु चंद घंटों बाद ही निष्क्रिय हो जाते हैं और उन की संख्या घट सकती है. चिकित्सकों के अनुसार, भले ही इंटरनैट के लिए प्रयोग की जाने वाली सूक्ष्म रेडियो तरंगें बेहद कम तीक्ष्णता वाली होती हैं पर इस के प्रभाव क्षेत्र में लगातार बने रहना घातक है. पूरा शहर वाईफाई की चपेट में होगा तो अस्पताल, बच्चों के स्कूल और कई ऐसे केंद्र या लोग भी इस का दुष्प्रभाव झेल रहे होंगे जो इस का इस्तेमाल नहीं भी कर रहे होंगे.

वैज्ञानिकों ने ताजा शोध में कहा है कि लगातार वाईफाई के संपर्क में रहने से बच्चों में ऊतकों का विकास रुक सकता है, कोशिकाओं में बदलाव हो सकते हैं. प्रोटीन के संश्लेषण पर असर पड़ सकता है जिस के चलते गुर्दे प्रभावित हो सकते हैं और बच्चों का समग्र विकास बाधित हो सकता है. यह एकाग्रता, याददाश्त पर भी असर डालती है.

पुरुषों और महिलाओं पर अध्ययन कर के देखा गया तो 4जी और वाईफाई की तरंगें महिलाओं के दिमाग पर ज्यादा ही दुष्प्रभाव डालती हैं. 2009 में आस्ट्रेलियाई और उस के बाद हौलैंड के वैज्ञानिक यह दावा पहले ही कर चुके हैं. महिलाओं के बारे में स्वीडन सरकार ने यह साफ कह दिया है कि गर्भवती महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में जाने से बचें.

पुरुषों में शुक्राणुओं और उन की सक्रियता में कमी के अलावा यह महिलाओं के अंडोत्सर्ग को भी प्रभावित करता है. कुला मिला कर यह पुरुषत्व और मातृत्व सब के लिए ही नुकसानदायक है. ये विद्युत चुंबकीय तरंगें दिल पर भी बुरा असर डालती हैं. ये दिल की धड़कन बढ़ा देती हैं और दिल पर दबाव बढ़ जाता है. इन बड़े खतरों के साथ कई रोगों की जड़ अनिद्रा रोग का बढ़ना भी एक ऐसी समस्या है जिसे कम कर के नहीं आंका जा सकता है. जिन अपार्टमैंट्स या घरों में वाईफाई चौबीसों घंटे औन रहता है वहां यह समस्या आम होती जा रही है. बहुत से लोग रातभर अपना वाईफाई चालू रखते हैं या फिर अपना स्मार्टफोन सिरहाने रख कर सोते हैं, यह घातक है.

जरूरी है कि ज्यादातर कंप्यूटरों में तार द्वारा इंटरनैट दिए जाएं, किसी खास सीमित परिक्षेत्र को वाईफाई जोन बना दिया जाए. बाकी को उस से मुक्त रखा जाए. अगर जरूरी ही है तो वाईफाई को सीमित समय के लिए सक्रिय किया जाए और आवश्यकता न होने पर इसे बंद रखा जाए.

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