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सैक्स बनाम शोहरत बौलीवुड की यूएसपी

जब से कैटरीना कैफ को स्मिता पाटिल अवार्ड दिया गया है, सोशल मीडिया और फिल्म बिरादरी में इस को ले कर मजाक भी बनाया जा रहा है. उन की अभिनय प्रतिभा पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा जा रहा है कि स्मिता पाटिल जैसा अवार्ड कैटरीना को मिलना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है. हालांकि कई लोग ऐसे भी हैं जो उन के समर्थन में हैं और उन की लोकप्रियता के लिहाज से उन्हें इस पुरस्कार का हकदार मान रहे हैं. सोशल मीडिया में उन पर जोक्स भी बन रहे हैं और दूसरा तबका जो उन को सपोर्ट कर रहा है, उन की लोकप्रिय छवि को देखते हुए यह मान कर चल रहा है कि सैक्स हमेशा से ही फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी की गारंटी माना जाता रहा है.

इस बात में कोई शक नहीं है कि कैटरीना कैफ, सनी लियोनी, मल्लिका शेरावत, शर्लिन चोपड़ा, जरीन खान, जैक्लीन फर्नांडिस, पोली दाम जैसी कई अभिनेत्रियां बौलीवुड में अगर टिकी हैं तो अपने अभिनय की बदौलत नहीं बल्कि अपनी सैक्सी फिगर, बोल्ड इमेज और लटकेझटकों की वजह से. किसी को सैक्स सायरन कहा जाता है तो कोई सैक्स बम के खिताब से नवाजी जाती है. क्षेत्र कोई भी हो, खूबसूरती और आकर्षक व्यक्तित्व ही तरजीह पाता है. चूंकि फिल्म बिजनैस है ही शोबिज का अड्डा, यहां जो ज्यादा दिखता है वही ज्यादा बिकता भी है.

बीते कुछ सालों से बौलीवुड में जमी ज्यादातर शीर्ष अभिनेत्रियां अपनी सैक्सी इमेज और बोल्ड किरदारों व दृश्यों के चलते सुर्खियों में रही हैं. अभिनय के लिए तो आप पैरेलल या फिर जिसे फैस्टिवल सिनेमा कहा जाता है, का रुख करते हैं. मेनस्ट्रीम फिल्मों में तो ‘डर्टी पिक्चर’ वाला सिनेमा चलता है. जहां हीरोइन के 2 बिकिनी सीन, एक बैडरूम सीन और दोचार समुद्र के किनारे ग्लैमरस सौंग पिक्चराइज कर काम चला लिया जाता है. इस से ज्यादा न तो अभिनेत्रियां कुछ करती हैं और न ही कुछ करने की जरूरत पड़ती है, क्योंकि दर्शकों को इतने में ही मनोरंजन मिल जाता है. इसलिए आज की सफलतम हीरोइनें शोहरत की बुलंदियों पर सवार हैं तो इस के पीछे सैक्स एलिमैंट्स का रोल कम नहीं है.

सैक्स की तूती

आज की सुपरस्टार अभिनेत्रियों को देख कर यह बात साबित होती है कि फिल्म जगत में अभिनय से ज्यादा सैक्स की तूती बोलती है. जिस तरह अभिनय और प्रतिभा सिर्फ कलात्मक फिल्मों और अवार्ड तक सीमित है उसी तरह सैक्सी इमेज के सहारे कैटरीना से ले कर दीपिका और प्रियंका चोपड़ा हौलीवुड तक घुसपैठ कर रही हैं. यह कोई आज की बात नहीं है बल्कि यह ट्रैंड हमेशा से ही वजूद में रहा है. जब स्मिता पाटिल अपनी प्रतिभा की बदौलत ‘मिर्चमसाला’, ‘अर्थ’, ‘मंथन’ व ‘चक्र’ जैसी सामाजिक सरोकार की फिल्में कर रही थीं तब उस समय मसाला फिल्मों में जीनत अमान, परवीन बौबी जैसी कमतर और सैक्स सिंबल के नाम से मशहूर अभिनेत्रियां उन से दस गुना ज्यादा फीस ले कर बिग बी से ले कर धर्मेंद्र और जीतेंद्र जैसे बड़े और कामयाब कलाकारों के साथ बौलीवुड में रूल कर रही थीं.

कैरियर के ढलान तक आतेआते शायद स्मिता पाटिल इस सच से वाकिफ हो गई थीं कि सैक्स सिंबल बने बिना काम नहीं चलने वाला. लिहाजा, उन्होंने भी अमिताभ बच्चन के साथ ‘नमक हलाल’ में अपना सैक्सी अवतार दिखाया. आज भी बारिश में पारदर्शी साड़ी में उन पर फिल्माया गया उत्तेजक गीत ‘आज रपट जाएं तो हमें न उठाइयो…’ पौपुलैरिटी के मामले में उन की तमाम कलात्मक फिल्मों पर पानी फेरता नजर आता है. यही काम उस दौर की लगभग सभी ऐक्टिंग ओरिएंटेड ऐक्ट्रैस को करना पडा. मसलन, शबाना आजमी, दीप्ति नवल और सिमी ग्रेवाल जो कभी सिर्फ कला प्रधान फिल्मों में काम करती थीं, चालू सिनेमा में आ कर सैक्सी अवतार में नजर आने लगीं.

डर्टी पिक्चर का बोलबाला

पुराने दौर का फलसफा आज वैसे ही लागू हो रहा है यानी आज भी कामयाबी के लिए फिल्मजगत में सैक्स की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है. महेश भट्ट सालों से अपनी बनाई फिल्मों में सैक्स बेच कर कामयाबी से विशेष फिल्में चला रहे हैं. सनी लियोनी गूगल पर सब से ज्यादा सर्च होने वाली ऐक्ट्रैस हैं और फिल्मों की रिलीज से पहले सैक्स सीन्स लीक किए जा रहे हैं. दीपिका विन डीजल के साथ हौलीवुड फिल्म ‘×××’ में बोल्ड सीन दे रही हैं तो प्रियंका चोपड़ा अमेरिकन टीवी सीरीज में हौट सीन को ले कर सुर्खियां बटोर रही हैं. हर जगह सिर्फ सैक्स ही बिक रहा है. हालिया रिलीज फिल्म ‘पार्च्ड’ भी कई महीने पहले लीक हुए राधिका आप्टे और आदिल हुसैन के सैक्स सीन्स को ले कर मुफ्त का प्रचार पाती रहीं. कुल मिला कर विषय आधारित सिनेमा करने वाला कलाकार कामयाबी तो दूर ढंग से पैसे भी नहीं कमा पाता और गरीबी में ही जिंदगी गुजार देता है. कुछ साल पहले जब अभिनेत्री नेहा धूपिया ने कहा था कि बौलीवुड में 2 ही चीजें बिकती हैं, एक शाहरुख और दूसरा सैक्स. तब उन की काफी आलोचना हुई थी लेकिन आज उन के कमैंट के मुताबिक ही हो रहा है. दरअसल, उन के उस बयान का मतलब था कि फिल्म इंडस्ट्री में या तो पुरुष नायक यानी शाहरुख जैसे सुपरस्टार कामयाब होते हैं या फिर सैक्स और ग्लैमर की चाशनी में डूबी ऐक्ट्रैस.

गौर कीजिए जब तक विद्या बालन साफसुथरी यानी ‘परिणीता’, ‘भूल भुलैया’ जैसी फिल्में करती रहीं तब तक उन्हें कोई भाव नहीं मिला. उलटा बदन धापू कपड़ों की वजह से उन के फैशन सीन्स को ले कर उन की फजीहत अलग हुई. जैसे ही विद्या ने सिल्क स्मिता की बायोपिक डर्टी पिक्चर में बदन की नुमाइश करते हुए सैक्स को जम कर परोसा तो रातोंरात सुपरस्टार बन गईं. यहां भी उन की शोहरत में सैक्स की अहम भूमिका रही वरना ऐक्टिंग तो वे कई सालों से कर रही थीं, बस बोल्ड ऐक्ट्रैस का तमगा बाद में हासिल किया.

सैक्सी इमेज से बनते कैरियर

बौलीवुड में सैक्स सिंबल का तमगा ज्यादातर सफल और अपने दौर की बहुचर्चित अभिनेत्रियों को दिया जाता है. मसलन, जब शर्मीला टैगोर ने ‘एन ईवनिंग इन पेरिस’ में बिकिनी पहनी तो उन की सैक्सी छवि के चलते वे एकदम से ए ग्रेड कलाकार हो गईं. राज कपूर तो अपनी हर फिल्म ‘बौबी’, ‘संगम’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘प्रेम ग्रंथ’, ‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ में अभिनेत्रियों को सैक्सी अवतार में पेश करने के लिए जाने जाते थे. वैजयंती माला, डिंपल कपाडि़या, जीनत अमान और मंदाकिनी का कैरियर आगे बढ़ने में उन की सैक्स सिंबल इमेज का बड़ा योगदान रहा.

आज भी कैटरीना कैफ के अभिनय और कमजोर हिंदी का मजाक बनाया जाता है, लेकिन जैसे ही उन के लिपलौक या बिकिनी पहनने की खबर से लैस कोई फिल्म रिलीज होती है सिनेमाघरों में दर्शक टूट पड़ते हैं. नरगिस फाकरी का पूरा कैरियर ही उन के सैक्सी लुक और बिकिनी सीन पर टिका है. अभिनय में जीरो होने के बावजूद अगर वे बौलीवुड में टिकी हैं तो सिर्फ इसलिए कि फिल्म नगरी में केवल सैक्स ही बिकता है. अभिनेत्री बिपाशा बासु का कैरियर भी फिल्म ‘जिस्म’ से शुरू हुआ और तब तक चलता रहा जब तक वे जिस्म दिखाती रहीं. यही कहानी मल्लिका शेरावत से ले कर शर्लिन चोपड़ा, राखी सावंत और सनी लियोनी की है. सैक्सी इमेज से न सिर्फ जल्दी कामयाब हो सकते हैं बल्कि काम की भी कोई कमी नहीं रहती. अब सनी लियोनी को ही लीजिए. उन की आज तक कोई भी फिल्म सब्जैक्ट या कमाई के लैवल पर उल्लेखनीय नहीं रही, लेकिन साल में 3-4 फिल्में करने के अलावा वे कई टीवी शोज कर रही हैं, काम की कोई कमी नहीं है जबकि अपेक्षाकृत बेहतर अभिनेत्रियां मसलन, नंदिता दास, कोंकणा सेन, चित्रांगदा व स्वरा भास्कर के पास कोई काम नहीं है.

सैक्स और शोहरत की रैसिपी

बौलीवुड हो या हौलीवुड, जब भी किसी अभिनेत्री का कैरियर लड़खड़ाने लगता है तो वे फिल्मों में न न करतेकरते बोल्ड सीन देने लगती हैं. इतना ही नहीं कई बार पब्लिसिटी के लिए प्रायोजित सैक्स भी परोसा जाता है. जैसे कई अभिनेत्रियों के फिल्म ‘एक खिलाड़ी एक हसीना’, ‘भिंडी बाजार’, ‘पार्च्ड’ से हौट सीन का लीक हो जाना, निजी व अंतरंग पलों का एमएमएस करीनाशाहिद, अशिमितरिया सेन वगैरा लीक होना और विवादास्पद मेल लीक होना जैसा कि कंगना राणावत और ऋतिक रोशन के मामले में हुआ. इन सब से अचानक अखबारों व फिल्मी पत्रिकाओं में उन अभिनेत्रियों के चर्चे होने लगे हैं जिन की कोई खबर नहीं ले रहा था. इस तरह शोहरत के मैदान पर फिर से इन की वापसी हो जाती है. आजकल सोशल मीडिया के जरिए सैक्स संबंधी मसलों के आधार पर पब्लिसिटी बटोरी जा रही है. ट्विटर पर शर्लिन चोपड़ा पैसों के बदले सैक्स की बात करती है तो अपनी वर्जिनिटी कब खोई थी या उस का कब शारीरिक शोषण या कार्स्टिंग हुआ जैसी घटनाओं के बहाने मीडिया का ध्यान अपनी और खींचती हैं. 

बच्चों के लिए आ गया ‘यूट्यूब फॉर किड्स’

यूट्यूब ने भारत में खासतौर पर बच्चों के लिए स्पेशल विडियो प्लैटफॉर्म लॉन्च किया है. YouTube Kids नाम का यह चाइल्ड-फ्रेंडली ऐप भारत में गूगल प्ले और ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. इस ऐप्स के फीचर्स और कॉन्टेंट को खासतौर पर बच्चों के लिए कस्टमाइज किया गया है.

इस ऐप के लिए विडियो बनाने के लिए कंपनी ने भारत में टॉप कॉन्टेंट क्रिएटर्स से हाथ मिलाया है. ऐंड्रॉयड और iOS ऐप का इंटरफेस ऐसा है कि बच्चे आराम से यूज कर सकें. तस्वीरें बड़ी हैं और आइकॉन बोल्ड हैं. यूट्यूब का कहना है कि इससे बच्चों को नैविगेट करने में सुविधा होती है. नया ऐप वॉइस सर्च सपॉर्ट भी देता है, जिससे वे बच्चे भी इसे इस्तेमाल कर पाएंगे, जिन्हें अभी स्पेलिंग्स वगैरह का ज्ञान नहीं है.

यह ऐप शो, म्यूजिक और लर्निंग प्रोग्राम दिखाएगा. इसमें बच्चों के लिए खासतौर पर कई पॉप्युलर किड्स प्रोग्राम उपलब्ध होंगे. इसमें कई पैरंटल कंट्रोल फीचर्स भी होंगे, जिससे पैरंट्स यह तय कर पाएंगे कि बच्चा क्या देख सकता है. इन फीचर्स में सर्च सेटिंग्स, पासकोड का प्रावधान और बैकग्राउंड म्यूजिक या साउंड इफेक्ट्स को ऑफ करना शामिल है.

इस ऐप को क्रोमकास्ट, ऐपल टीवी और गेमिंग कंसोल्स की मदद से टीवी पर भी स्ट्रीम किया जा सकता है. यह स्मार्ट टीवी के साथ भी काम करता है. गूगल खुद भी विडियोज़ पर नजर रखेगा और पैरंट्स भी कुछ आपत्तिजनक मिलने पर फ्लैग कर सकेंगे. इस ऐप को फरवरी 2015 में लॉन्च किया गया था और करीब 20 देशों में यह उपलब्ध है.

पहले तो औरतों की इज्जत करना सीखो

डौनल्ड ट्रंप का एक वीडियो, जो 2005 में लिया गया था, आजकल धड़ल्ले से चल रहा है. इस वीडियो में ट्रंप बड़े फक्र से कहता है कि उस ने कितनी ही विवाहित औरतों से सैक्स संबंध बनाए हैं. उस की भाषा में जननांगों तक का जिक्र है. वह बड़े फक्र से कहता है कि अगर आप के पास पैसा व नाम है तो औरतें आसानी से ऐसा करने देती हैं. 2005 में यह हिस्सा टैलीविजन कार्यक्रम में नहीं दिखाया गया था. अब इस ने हंगामा मचा दिया है. हालांकि डौनल्ड ट्रंप इस पर सफाई दिए बिना राष्ट्रपति पद के लिए रेस में बने रहने पर अड़ा हुआ है. उस ने अपने गलत बयान पर माफी तो मांगी थी पर साथ ही यह भी जोड़ कर राष्ट्रपति चुनाव की गरिमा को और खराब कर दिया कि हिलेरी क्लिंटन के पति बिल क्लिंटन तो इस से भी बुरा काम कर चुके हैं.

जनता इसे गलती या माफी मानेगी, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अमेरिकी समाज में आजकल ऐसे सिरफिरों की कमी नहीं है, जो दुनिया भर में फैल रहे आतंक और चीन व रूस की धमकियों का मुकाबला करने के लिए एक मर्द को राष्ट्रपति पद देना चाहते हैं. वे भूल रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने 1971 बांग्लादेश मामले में पाकिस्तान पर और मार्गरेट थैचर ने 1982 में फाकलैंड युद्ध में अर्जेंटाइना पर बिना मर्द हुए विजय पाई थी. लड़ाई में सही फैसले काम आते हैं, सर्वोच्च नेता का बड़बोलापन या उस की औरतों के प्रति मर्दानगी नहीं. चुनाव में उसी व्यक्ति को उतरना चाहिए, जो देश के हर वर्ग को बराबर का आदर दे और अपनी जबान पर नियंत्रण कर सके. अमेरिकी समाज में ढीले राष्ट्रपतियों की कमी नहीं रही है, चाहे बाद में उन के चरित्र के ढीलेपन को उन के उल्लेखनीय कामों के बीच छिपा दिया गया हो.

यह अफसोस की बात है कि नेता बनने की इच्छा रखने वाले मर्द भी औरतों को हेय दृष्टि से देखने से बाज नहीं आते. औरतों के प्रति लगभग हर समाज में इस प्रकार की भावना मौजूद है कि वे न केवल कमजोर हैं, पैर की जूती हैं, ऊंचे पदों के लायक नहीं हैं और साथ ही जो चाहे जब चाहे उन्हें लिटा कर अपनी मनमानी कर सकता है. यह भावना अगर कूटकूट कर पुरुषों में भरी है तो इस का बड़ा कारण धर्म है, जो अपने भगवानों व देवताओं के खिलाफ अपने ही ग्रंथों में लिखे सही शब्दों तक को दोहराने पर घबरा कर कहने वाले का मुंह बंद कर देता है पर आधी आबादी को उस धर्म को मानने में कोई एतराज नहीं है. भारत में ही या पश्चिमी एशिया में औरतों को कहीं भी धर्म से आदरसम्मान नहीं मिलता. उन्हें हर धर्म की लड़ाई में कुरबान कर दिया जाता है. धर्म ही उन पर उन दोषों के लिए जिम्मेदारी थोपता है जो मर्दों के कारण हुई हों. पति से बाहर सैक्स, बलात्कार, छेड़छाड़, देह व्यापार आदि में दोषी कभी भी पुरुष नहीं होते, हमेशा औरतें ही होती हैं. डौनल्ड ट्रंप भी इसी विश्वास पर लड़ रहा है कि न केवल अमेरिका के मर्द, उन मर्दों की गुलाम सी उन की पत्नियां, बहनें, बेटियां, मांएं एक उस व्यक्ति को वोट दिलवा देंगे जो औरतों का आदर करना नहीं जानता और उन्हें केवल अपने सैक्स सुख का गुलाम मानता है.

पेन ड्राइव के कमाल के उपयोग

पेनड्राइव एक ऐसा डिवाइस है जो कि हर घर में आपको मिल जाएगा. आपके पास कंप्यूटर हो या न पेनड्राइव जरुर होगी. आप पेनड्राइव को डाटा सेव या फिर ट्रान्सफर करने के लिए इस्तेमाल करते होंगे. लेकिन आपको बाता दें कि आपके बैग में पड़े और आपकी कपबोर्ड में रखे इस छोटे से डिवाइस के फायदे बड़े हैं.

पेनड्राइव को 5 अलग तरीकों से यूज किया सकता है. यह बूटेबल डिवाइस से लेकर सेफ्टी की तक के रूप में प्रयोग कर सकते हैं.

'सेफ्टी की'

पब्लिक प्लेस में अपना पीसी इस्तेमाल करना हमेशा ही रिस्की होता है. ऐसे में आप अपनी पेनड्राइव को एक 'सेफ्टी की' की तरह यूज कर सकते हैं. इसके लिए आपको ऑनलाइन प्रिडेटर नाम का एक सॉफ्टवेर डाउनलोड करना, इसके बाद पेनड्राइव को बिना कंप्यूटर में इंसर्ट किए और पासवर्ड इंटर किए कोई आपके कंप्यूटर को एक्सेस नहीं कर सकता है.

एप्स को रन कराने के लिए

एक मोबाइल और यूएसबी से ज्यादा यूएसबी पेनड्राइव एप्स को रन कराने में मदद करती है. इसके लिए आपको लैपटॉप या मोबाइल में पोर्टेबल एप्स नाम का सॉफ्टवेर इंस्टॉल करना होगा. इसके बाद आप जरुरी एप्स पेनड्राइव में रख सकते हैं. जैसे क्रोम, मोज़िला आदि.

एंटी वायरस डिवाइस भी बन सकती है आपकी पेनड्राइव

क्या आप जानते हैं आपकी पेनड्राइव एक एंटी वायरस डिवाइस के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है. इसके लिए एवीजीडॉटकॉम में जाकर आपको पेनड्राइव में एंटीवायरस इंस्टॉल करना होगा. इसके बाद आप किसी भी डिवाइस जिसमें वायरस हो, से पेनड्राइव को कनेक्ट कर स्कैन कर सकते हैं.

एन्क्रिप्ट फॉर्म में करें डाटा सेव

पेनड्राइव को डाटा सेव करने के लिए तो लगभग हर कोई इस्तेमाल करता है, लेकिन यदि आप अपने डाटा की सिक्योरिटी चाहते हैं तो आप इसे एन्क्रिप्ट फॉर्म में भी सेव कर सकते हैं. ट्रूक्रिप्ट नाम के सॉफ्टवेयर को इंस्टॉल करने के बाद आप ऐसा कर पाएंगे.

बूटेबल डिवाइस

आप इसे बूटेबल डिवाइस के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं. यदि आपके ऑपरेटिंग सिस्टम में दिक्कत आ रही है तो आप पेनड्राइव से उसे दूर कर सकते हैं. ज्यादातर डिवाइस में यह ऑप्शन दिया होता है.

विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसों के बाद

विवाह को ले कर युवाओं की धारणा अब बदल रही है. पहले जहां सैक्स संबंध कायम होने के बाद शादी करने की मांग जोर पकड़ लेती थी वहीं अब सैक्स के बाद भी ऐसी मांग नहीं उठती. कई बार तो लिव इन रिलेशनशिप लंबी चलती रहती है. फिल्मों में ही नहीं सामान्यतौर पर भी कई दोस्त आपस में एकसाथ रहते हैं. अब सैक्स कोई मुद्दा नहीं रह गया है. जब कभी शादी की बात चलती है तो युवकयुवती दोनों की एक ही सोच होती है कि पहले आत्मनिर्भर हो जाएं व अच्छा कमाने लगें, जिस से जिंदगी अच्छी कटे, फिर शादी की सोचें.

केवल युवा ही नहीं, उन के पेरैंट्स भी शादी की जल्दी नहीं करते. वे भी सोचते हैं कि पहले बच्चे कुछ कमाने लगें उस के बाद ही विवाह की सोचें. जो बच्चे कमाने लगते हैं वे बाकी फैसलों की तरह शादी के फैसले भी खुद लेने लगे हैं.

सैक्स अब पहले की तरह समाज में टैबू नहीं रह गया है. युवा इस को ले कर सजग और जागरूक हो गए हैं, उन्हें घरपरिवार से दूर अकेले रहने के अवसर ज्यादा मिलने लगे हैं. जहां वे अपनी सैक्स जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. सैक्स को ले कर वे इतने सजग हो गए हैं कि अब उन को अनचाहे गर्भ या गर्भपात जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता. आज उन्हें गर्भ से बचने के उपाय पता हैं. पहले सैक्स एक ऐसा विषय था जिस पर लोग चर्चा करने से बचते थे. युवा जब इस विषय पर चर्चा करनी शुरू करते थे तब परिवार के लोग उन की शादी के बारे में सोचना शुरू कर देते थे. अब केवल युवक ही नहीं युवतियां तक अपने घर से दूर पढ़ाई, कंपीटिशन और जौब को ले कर शहरों में होस्टल या पीजी में अकेली रहने लगी हैं. ऐसे में सैक्स उन के लिए कोई मुद्दा नहीं रह गया है. अब युवाओं की प्राथमिकता है कि शादी की बात तब सोचो जब पैसे कमाने लगो.

फैशन और जरूरतें बनीं वजह

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ इस बदलती सोच के पीछे सब से बड़ी वजह आज के समय में बढ़ती महंगाई है. पहले विवाह के बाद जहां 20 से 40 हजार में हनीमून ट्रिप पूरा हो जाता था वहीं अब यह खर्च बढ़ कर 90 हजार से 1 लाख रुपए के ऊपर पहुंच गया है. शादी के बाद पतिपत्नी के बीच इतना सामंजस्य नहीं होता कि बिना कहे वे इस आर्थिक परेशानी को समझ सकें. एक नए शादीशुदा जोड़े की हनीमून कल्पना पूरी तरह से फिल्मी होती है. जहां पत्नी किसी राजकुमारी सा अनुभव करना चाहती है. अब इस अनुभव और फीलिंग्स के लिए पैसों की जरूरत होती है. ज्यादातर युवा प्राइवेट जौब में होते हैं, जहां पैसा भले होता है पर समय नहीं होता. ऐसे में युवाओं को ऐसी नौकरी की प्रतीक्षा रहती है जिस में पैसा हो, जिस के सहारे वे शादी के बाद सभी सुखों का आनंद ले सकें.

शादी के समय ही नहीं उस के बाद भी अब नई स्टाइलिश ड्रैस रेंज बाजार में आने लगी हैं. अब तो शौपिंग के लिए बाजार जाने की जरूरत भी नहीं होती. औनलाइन शौपिंग का दौर है, जहां आप को बिना बाजार गए ही सबकुछ मिल सकता है. जरूरत होती है पैसों की. इसलिए अब युवा शादी तब करना चाहते हैं जब शादी के मजे लेने के लिए उन के पास पैसे हों. फेसबुक, व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के इस दौर में जीवन के किसी पल को दोस्तों व नातेरिश्तेदारों से छिपाया नहीं जा सकता. ऐसे में अपनी खुशियों को पूरा करने के लिए पैसों की अहमियत अब सभी को समझ आने लगी है.

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ यह सोच अब दिनोदिन और मजबूत होती जा रही है. पहले की तरह यह नहीं होता कि शादी हुई उस के बाद सबकुछ घरपरिवार की जिम्मेदारी पर होता था. अब अपना बोझ खुद उठाना पड़ता है. ऐसे में ‘पहले कमाई फिर शादी’ की सोच बढ़ रही है.

बच्चों की प्लानिंग

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ की धारणा में कई बार आलोचक कहते हैं कि जब शादी से पहले ही सैक्स हो गया तो शादी के बाद क्या बचता है? इस सवाल के जवाब में युवा कहते हैं कि शादी के पहले वाले और शादी के बाद वाले सैक्स में फर्क होता है. शादी के बाद हमारी प्राथमिकता परिवार की होती है. हम अपने हिसाब से बच्चे का जन्म प्लान करते हैं. आज के समय में बच्चे के जन्म से ले कर स्कूल जाने तक बहुत सारे खर्चे होने लगे हैं. इन को सही तरह से संभालने के लिए अच्छे बजट की जरूरत होती है. एक बच्चे की प्राइवेट अस्पताल में डिलीवरी का खर्च ही लाख से ऊपर पहुंच जाता है. उस के बाद तमाम तरह के खर्च और फिर बच्चे के प्ले स्कूल जाने का खर्च महंगा पड़ने लगा है. अस्पताल हो या प्ले स्कूल उस में किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया जा सकता.

3 साल की उम्र में ही बच्चे का स्कूल जाना शुरू हो जाता है. इस में अच्छे स्कूल में प्रवेश से ले कर पढ़ाई के खर्च तक बड़े बजट की जरूरत होती है, जो यह सिखाता है कि शादी के लिए सैक्स की नहीं पैसे की ज्यादा जरूरत है. बच्चा जैसेजैसे एक के बाद एक क्लास आगे बढ़ता है उस का खर्च भी बढ़ता है, जिसे वहन करना सरल नहीं होता. कई बार युवा ऐसे लोगों को देखते हैं जो इस तरह के हालात से गुजर रहे होते हैं. ऐसे में वे अपना हौसला नहीं बना पाते.

शादी के लिए पहले मातापिता व घरपरिवार का हस्तक्षेप ज्यादा होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब ज्यादातर फैसले या तो युवा खुद लेते हैं या फिर फैसला लेते समय उस की सहमति ली जाती है. शादी की उम्र बढ़ गई है, जिस में सैक्स से ज्यादा पैसे का फैसला प्रमुख हो गया है.

सैक्स का सरल होना

सैक्स अब ऐंजौयमैंट का साधन बन गया है. युवकयुवतियां भी खुद को अलगअलग तरह की सैक्स क्रियाओं के साथ जोड़ना चाहते हैं. इंटरनैट के जरिए सैक्स की फैंटेसीज अब चुपचाप बैडरूम तक पहुंच गई हैं, जहां केवल युवकयुवतियां आपस में तमाम तरह की सैक्स फैंटेसीज करने का प्रयास करते हैं. इंटरनैट के जरिए सैक्स की हसरतें चुपचाप पूरी होती रहती हैं. सोशल मीडिया ग्रुप फेसबुक और व्हाट्सऐप इस में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. फेसबुक पर युवकयुवतियां दोनों ही अपने निकनेम से फेसबुक अकाउंट खोलते हैं और मनचाही चैटिंग करते हैं. इस में कई बार युवतियां अपना नाम युवकों की तरह रखती हैं, जिस से उन की पहचान न हो सके. चैटिंग करते समय वे इस बात का खास खयाल रखती हैं कि उन की सचाई किसी को पता न चले. यह बातचीत चैटिंग तक ही सीमित रहती है. बोर होने पर फ्रैंड को अनफ्रैंड कर नए फ्रैंड को जोड़ने का विकल्प हमेशा खुला रहता है.

इस तरह की सैक्स चैटिंग बिना किसी दबाव के होती है. ऐसी ही एक सैक्स चैटिंग से जुड़ी महिला ने बातचीत में बताया कि वह दिन में खाली रहती है. पहले बोर होती रहती थी, जब से फेसबुक के जरिए सैक्स की बातचीत शुरू की तब से वह बहुत अच्छा महसूस करने लगी है. कई बार वह इस बातचीत के बाद खुद को सैक्स के लिए बहुत सहज पाती है. पत्रिकाओं में आने वाली सैक्स समस्याओं में इस तरह के बहुत सारे सवाल आते हैं, जिन को देख कर लगता है कि सैक्स की फैंटेसी अब फैंटेसी नहीं रह गई है. इस को लोग अब अपने जीवन का अंग बनाने लगे हैं.

शादी के पहले सैक्स का अनुभव जहां पहले बहुत कम लोगों को होता था, अब यह अनुपात बढ़ गया है. अब ऐसे कम ही लोग होंगे, जिन को सैक्स का अनुभव शादी के बाद होता है. ऐसे में सैक्स के लिए शादी की जरूरत खत्म हो गई है. शादी के बाद जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए पैसों की जरूरत बढ़ गई है. यही वजह है कि शादी सैक्स के बाद नहीं शादी पैसों के बाद का चलन बढ़ गया है.

आज इन विषयों को ले कर कई पुस्तकें, सिनेमा और टीवी सीरियल्स भी बनने लगे हैं, जो इस बात का समर्थन करने लगे हैं कि शादी से पहले सैक्स की नहीं पैसों की जरूरत होती है.                                        

‘रॉक ऑन 2’ उत्तरपूर्वी भारत के लोगों को समर्पित: शुजात सौदागर

आठ वर्ष बाद संगीत प्रधान फिल्म ‘‘रॉक ऑन’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ का निर्देशन कर पहली बार स्वतंत्र रूप से फिल्म निर्देशित करने वाले शुजात सौदागर मूलतः कश्मीर के पूंछ क्षेत्र में पले बढ़े हैं. वह लंबे समय से विज्ञापन फिल्में बनाते आ रहे हैं. सोनी टीवी खासकर सोनी मैक्स के ब्रैंड को स्थापित करने में उनका काफी योगदान रहा है. उन्होंने 2005 में साठ मिनट की एक लघु फिल्म ‘‘बाली’’ का निर्देशन कर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘आईटीए’ अवार्ड भी जीता था. वह फिल्म ‘‘डॉन 2’’ के सेकंड यूनिट निर्देशक के रूप में काम कर चुके हैं. पर वह फिल्म ‘‘रॉक ऑन’’ का निर्देशन कर काफी उत्साहित हैं.

हाल ही में जब शुजात सौदागर से हमारी बात हुई, तो हमने उनसे फिल्मों के प्रति उनकी रुचि को लेकर सवाल किया. इस पर उन्होंने कहा- ‘‘मैं कश्मीर के पूंछ में पला बढ़ा हूं. संगीत का मुझ पर बचपन से ही प्रभाव रहा है. स्कूल के दिनों से ही मैं नाटकों से जुड़ गया था. अपने दोस्तों के साथ गाना भी गाता था. उसके बाद उच्च शिक्षा पाने के लिए मैं पुणे के एक कालेज में आ गया. एक दिन हमारे कालेज में कंवोकेशन के अवसर पर विज्ञापन जगत की मशहूर हस्ती प्रह्लाद कक्कड़ आए थे. उन्होंने भाषण दिया था. उसके बाद मैं उनसे जाकर मिला. मैंने उनसे उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. मैंने उनकी कंपनी जिनेसिस में काम करना शुरू किया. इस तरह विज्ञापन जगत से मेरी यात्रा शुरू हुई. सच कहूं तो उनके साथ जुड़ने के बाद ही मेरी पढ़ाई शुरू हुई. मैं प्रह्लाद कक्कड़ को अपना गुरू मानता हूं. आज मैं जो कुछ भी हूं, उसका सारा श्रेय उनको जाता है. मुझे आगे बढ़ाने करने में उनका बहुत बड़ा योगदान है.’’

पर फीचर फिल्म के निर्देशन में इतना बिलंब क्यों हुआ? इस सवाल पर शुजात ने कहा-‘‘फरहान अख्तर और रितेश सिद्धवानी के संग हमारा पुराना संबंध है. मैं विज्ञापन फिल्मों के अलावा लघु फिल्में बना ही रहा था. फरहान अख्तर के साथ फिल्म ‘डॉन 2’ में सेकंड यूनिट निर्देशक के रूप में काम किया था. पर फरहान अख्तर व रितेश से मैंने हमेशा ही कहा कि जब एक अच्छी कहानी मिलेगी, तभी हम उस पर फिल्म बनाएंगे. और वह मौका हमें ‘रॉक ऑन 2’ में मिला.’’

फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ के  नएपन का जिक्र करते हुए शुजात सौदागर ने आगे कहा-‘‘इस बार भी यह संगीत प्रधान फिल्म है. ‘रॉक ऑन’ का सिक्वअल है. वह कहानी जिस जगह खत्म हुई थी, उसी का विस्तार है. मगर कहानी नयी है. इस बार कहानी के केंद्र में उन तीन लड़कों यानी कि फरहान अख्तर, पूरब कोहली व अर्जुन रामपाल के साथ जुडकर श्रृद्धा कपूर का पात्र अहम भूमिका निभाता है. वह पूरे बैंड को बाइंड करती हैं. पहले भाग में सिर्फ ‘मैजिक बैंड’ और उसका संगीत था. इस फिल्म में कई तरह का साउंड और संगीत है. अब यह इस फिल्म में वह बैंड भी पूरा जागो बन गया है. अब ‘मैजिक बैंड’ से जुड़े किरदारों की उम्र चालीस साल से उपर है. अब इस बैंड का संगीत भी परिपक्व हो गया है. इस बार कहानी भी काफी मैच्योर है. संगीत के स्तर पर फिल्म काफी नयी है. श्रद्धा कपूर की साउंड बहुत अलग है. वह युवा और मार्डन संगीत गाती हैं. शशांक सरोद वादक है. वह बनारस से मुंबई नई संभावना की तलाश में आए हैं.’’

आठ वर्ष में संगीत में जो बदलाव आया है, क्या वह इस फिल्म का हिस्सा है? इस सवाल पर शुजात ने कहा-‘‘जी हां! संगीत में आए बदलाव को इस फिल्म का हिस्सा बनाया गया है. इसके अलावा हमने इस फिल्म को उत्तर पूर्वी भारत यानी कि शिलांग व मेघालय में फिल्माया है. इस फिल्म में वहां के संगीत व सुरों को भी जोड़ा है. हमने इस फिल्म के साथ वहां के म्यूजीशियनों को भी जोड़ा है. उनके भी गाने हैं. इस फिल्म में समरसाल्ट बैंड का भी एक गाना है. तो इस फिल्म में कहानी के साथ संगीत में विविधता भी मिलेगी.’’

जब हमने शुजात से पूछा कि स्थापित बैनर की फिल्म और एक सिक्वअल को निर्देशित करते हुए खुद को किस हद तक सुरक्षित महसूस कर रहे थे? तो शुजात ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा-‘‘देखिए, मैं नर्वस नहीं था. असुरक्षित नहीं था. आप जानते हैं कि मैं निर्देशन में नया नही हूं. मुझे कभी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि मैं अपनी पहली फीचर फिल्म निर्देशित कर रहा हूं. उत्साहित था. फरहान अख्तर के साथ ‘डॉन 2’ में सेकंड यूनिट निर्देशक के रूप में काम किया था. तो उनके साथ रैपो था. पूरब कोहली के साथ कई विज्ञापन फिल्म की हैं. श्रद्धा कपूर के साथ यह मेरी पहली फिल्म है. मैंने उनके साथ भी इंज्वाय किया. वह बहुत मेहनती हैं. इस फिल्म में श्रद्धा कपूर ने खुद अपने गाने गाए हैं. उन्होंने हमारी फिल्म को एक साल दिया. जब हम शूटिंग की लोकेशन तलाश करने शिलांग जा रहे थे, तो वह भी हमारे साथ थीं.’’

उत्तर पूर्वी भारत को बालीवुड सिनेमा के मेनस्ट्रीम से जोड़ने की सोच के साथ फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ का फिल्मांकन उत्तरपूर्वी राज्य मेघालय व शिलांग में किया गया है. शुजात सौदागर वहां के लोगों के प्यार के कायल हो चुके हैं. शिलांग की खूबसूरती के संदर्भ में वह कहते हैं-‘‘शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता. बहुत खूबसूरत जगह है. मेरी नजर में किसी भी जगह को खूबसूरत वहां रहने वाले लोग बनाते हैं. पहाड़, पेड़ पौधे, बादल तो आपको कई जगह मिल जाएंगे. पर इस प्राकृतिक सौंदर्य को शिलांग व मेघालय के लोगों ने अपन प्यार, हमारी आवभगत से कई गुना ज्यादा बढ़ा दिया. हमें वहां ज्यादा खूबसूरती नजर आयी. मेरे लिए तो शिलांग बहुत खास हो गया है. किसी नयी जगह पर इतनी गर्मजोशी से स्वागत हमारा कहीं नहीं हुआ. हमने यह फिल्म शिलांगग व मेघालय ही नहीं बल्कि पूरे उत्तरपूर्वी भारत के लोगों को समर्पित की है.’’

तो खुद को हारा हुआ माने भारतः PCB

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को साफ करने के लिए कहा है कि वो किसी द्विपक्षीय सीरीज या इंटरनेशनल प्रतियोगिता में पाकिस्तान से खेलने को तैयार है या नहीं. भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय सीरीज को लेकर काफी लंबे समय से हां-ना का खेल चल रहा है.

सेठी ने कहा, 'मैं केपटाउन में आईसीसी बैठक के इतर बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर से मिला था और उनसे पूछा कि भारत पाकिस्तान से खेलना चाहता है या नहीं.' उन्होंने कहा, 'उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया और कुछ नए विचार सामने रखे जिन पर यहां चर्चा करना सही नहीं होगा.'

पीसीबी अधिकारी ने साथ ही कहा कि उन्होंने आईसीसी बैठक में साफ कर दिया कि या तो भारत पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय सीरीज खेले या फिर मुआवजा भरे. 2007 से भारत के पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय सीरीज में नहीं खेलने के मुआवजे के तौर पर वह कोई रिण या अनुदान स्वीकार नहीं करेंगे.

सेठी ने कहा कि आईसीसी ने भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूद द्विपक्षीय क्रिकेट संबंधों की समीक्षा के लिए बोर्ड के सदस्यों की समिति के गठन की पेशकश की है.

सेठी ने कहा, 'लेकिन हमने कहा कि ऐसी समिति से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा और बीसीसीआई को द्विपक्षीय सीरीज या आईसीसी प्रतियोगिता में हमारे साथ खेलने की नीति को लेकर स्पष्ट बयान देना होगा.' पीसीबी अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान ने आईसीसी को स्पष्ट कर दिया है कि अगर भारत अगले साल होने वाली चैम्पियन्स ट्रॉफी सहित आईसीसी प्रतियोगिताओं में उनके साथ नहीं खेलना चाहता तो उसे इस बारे में स्पष्ट होना होगा.

उन्होंने कहा, 'हमने आईसीसी से कहा है कि अगर भारत आईसीसी प्रतियोगिताओं में हमारे साथ नहीं खेलना चाहता तो कोई दिक्कत नहीं, बस मैच अंक हमें मिले और माना जाए कि भारत ने यह मैच गंवा दिया है.'

बाल मजदूर बदतर जिंदगी जीने को मजबूर

इन बच्चों की उम्र 14 साल से कम  है, लेकिन रोजाना इन्हें अकसर 14 घंटे से ज्यादा हाड़तोड़ मशक्कत करनी पड़ती है. कहने को तो ये बाल मजदूर हैं, लेकिन अपनी उम्र और कूवत से बढ़चढ़ कर बालिगों से कहीं ज्यादा मेहनत करते हैं. सुबहसवेरे जब आमतौर पर लोग सो कर उठते हैं, तब तक ये बच्चे रूखीसूखी रोटी का पुलिंदा बगल में दबाए अपनी काम की जगह पर मौजूद हो चुके होते हैं, फिर 15-16 घंटे की मेहनत के बाद थकान से चूर रात को घर लौट कर बिस्तर पर लेटते हैं, तो दूसरे दिन ही नींद खुलती है. यही जिंदगी है इन नन्हे कामगारों की. इतनी मेहनत के बावजूद ये मजदूर महीने के आखिर में पाते हैं महज कुछ सौ रुपए, पर इस से ज्यादा इन्हें मालिकों से मिलता है जोरजुल्म. अपनी बुनियादी जरूरतों से दूर ये बच्चे नाजुक उम्र में ही भयानक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीड़ी उद्योग के बाल मजदूर नाक की बीमारी, उनींदापन, निकोटिन के जहर से पैदा होने वाली बीमारी, सिरदर्द, अंधेपन वगैरह के शिकार हो जाते हैं, वहीं कालीन उद्योग के बच्चे लगातार धूल और रेशों में रह कर फेफड़ों की बीमारी से घिर जाते हैं.

पटाका और माचिस उद्योग के बाल मजदूर सांस की परेशानी, दम घुटना, थकावट, मांसपेशियां बेकार हो जाने जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसी तरह ताला उद्योग में तेजाब से जलना, दमा, सांस का रुक जाना, टीबी, भयंकर सिरदर्द होना आम बात है. खदानों में काम करने वाले बच्चों की आंखों, फेफड़ों व चमड़ी की बीमारियों का तोहफा मिलता है, तो कांच उद्योग में काम कर रहे बाल मजदूर आग उगलती भट्ठियों के नजदीक हर समय कईकई घंटे तीनों ओर से गरम कांच से घिरे रह कर कैंसर, टीबी और मानसिक विकलांगता जैसी बीमारियां पाल लेते हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश के मंदसौर इलाके के स्लेट उद्योग में काम करने वाले बच्चे वहां स्लेट, पैंसिल बनाने के लिए खान से स्लेटी रंग की लगातार उड़ती धूल में रह कर फेफड़ों और सांस की तरहतरह की गंभीर बीमारियों से घिर जाते हैं. गुब्बारा उद्योग में काम करने वाले बच्चों की हालत तो और भी ज्यादा खतरनाक है. वे नन्ही उम्र में ही दिल की बीमारी, निमोनिया और सांस की बीमारी की जकड़ में आ जाते हैं.

इतना ही नहीं, ढाबों में काम कर रहे या घरेलू बाल मजदूर नशीली चीजों के सेवन के आदी तो हो ही जाते हैं, शारीरिक और यौन शोषण, ज्यादा काम और दूसरी तरह से भी वे खूब सताए जाते हैं. गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खेतखलिहानों, अलगअलग लघु व कुटीर उद्योगों, पत्थर खदानों, ढाबों और घरेलू कामों में तकरीबन 10 करोड़ बच्चे मजदूर बने हुए हैं. यह आलम तो तब है, जब कई लैवलों पर कई सालों से बाल मजदूर उन्मूलन के लिए कायदेकानूनों की झड़ी लगा दी गई है. आज भी नए कानून बनाने व बाल मजदूरी लगाने की कोशिश जारी है. फिर आखिर क्या वजह है कि बाल मजदूरी में कमी आने के बजाय लगातार इजाफा ही हो रहा है?

मिसाल के तौर पर, ‘बाल दिवस’ यानी बच्चों के प्रिय चाचा नेहरू के जन्मदिन के मौके पर जगहजगह सैमिनार, भाषणबाजी और न जाने क्याक्या होता है, पर इन सब से अनजान चाचा नेहरू के 10 करोड़ लाड़ले उस समय रोटी की जुगाड़ में न जाने क्याक्या, सह रह होते हैं. कुछ लोग बच्चों को मजदूर बनाने में उन से काम कराने वालों का भी बहुत बड़ा हाथ मानते हैं. ऐसे लोगों का लालच यही होता है कि बाल मजदूरी सस्ती पड़ती है. छोटेछोटे कुटीर उद्योग जहां जगह की कमी होती है, इसीलिए बच्चों को काम पर रखा जाता है, क्योंकि वे जगह कम घेरते हैं, जिस से ज्यादा से ज्यादा बच्चे वहां ज्यादा से ज्यादा काम कर सकते हैं. ये बच्चे पूरी तरह से असंगठित होते हैं, जिस से अपने शोषण के खिलाफ मालिक के सामने आवाज नहीं उठा सकते. दूसरी ओर, मालिकों को इन्हें रखने की मजबूरी यह होती है कि कुछ काम ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल बच्चे ही पूरी सफाई से कर सकते हैं.

मसलन, कालीन उद्योग में कालीन बनाते समय जगहजगह गांठ लगाने की जरूरत पड़ती है. सफाई से गांठ लगाने के लिए उंगलियों का पतला होना जरूरी है, इसीलिए इस उद्योग में बच्चों को अहमियत दी जाती है. इसी तरह माचिस उद्योग में बाल मजदूर लगे होने से माचिसों की बनाने की लागत कम आती है. कम लागत के चलते विदेशी माचिसों से होड़ लेने में दिक्कत नहीं आ रही है. फिर भी बाल मजदूरी कराने वाले मालिकों और बाल मजदूरी के पक्ष में चाहे जो भी दलीलें पेश की जाएं, सचाई तो यही है कि बाल मजदूरी से कई और तरह की सामाजिक दिक्कतें बढ़ी हैं. यह सच है कि गरीबी के चलते बच्चे मजदूरी के लिए मजबूर हैं, पर इस से पैदा होने वाली समस्याएं कहीं ज्यादा गंभीर हैं. चूंकि कुछ इलाको में केवल बच्चों को ही काम पर रखा जाता है, इसलिए उन के मांबाप अकसर बेरोजगार ही होेते हैं.

दूसरी ओर, 15 साल से बड़ा होते ही इन बच्चों को काम से हटा दिया जाता है, इसलिए मांबाप यह मान कर चलते हैं कि ज्यादा बच्चे होने से आमदनी बराबर बनी रहेगी, क्योंकि बड़े बच्चे के काम से हटते ही छोटा संभाल लेगा, फिर उस के बाद उस से छोटा और फिर उस से छोटा. इस सिलसिले को जारी रखने के लिए बच्चों की तादाद ज्यादा रखना मजबूरी बन जाती है. यह सोच आबादी की समस्या को गंभीर बना रही है. पर इन सब में सब से ज्यादा चिंताजनक पहलू तो सेहत ही है, क्योंकि पैसे की कमी में ये बाल मजदूर न तो ठीक से इलाज करा पाते हैं और न ही ठीक से खानेपीने का बैलैंस बनाए रख पाते हैं, इसलिए ये बच्चे जवानी आतेआते गंभीर बीमारियों के शिकार हो कर कदमकदम पर कतराकतरा मौत का इंतजार करते हैं. यकीनन, आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं, लेकिन जहां के एकतिहाई बच्चे बचपन की बुनियादी सुविधाओं से अलग हो कर मेहनतमजदूरी में रातदिन एक कर रहे हैं व कम उम्र में ही भयानक बीमारियों से घिर जाते हैं, भविष्य में उन की जगह कहां होगी? क्या बीमार बच्चों के नाजुक कंधों पर तैयार की जा रही भविष्य के विकास की बुनियाद मजबूत हो पाएगी? कब इन्हें इन का हक मिल पाएगा? इन सवालों के जवाब भारत के नीति बनाने वालों के पास भी नहीं है. 

भाईदूज

‘‘मेरे सामने तो तुम उसे राधा बहन मत बोलो. मुझे तो यह गाली की तरह लगता है,’’ मालती भड़क उठी.

‘‘अगर उस ने बिना कुछ पूछे अचानक आ कर मुझे राखी बांध दी, तो इस में मेरा क्या कुसूर? मैं ने तो उसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा था,’’ मोहन बाबू तकरीबन गिड़गिड़ाते हुए बोले.

‘‘हांहां, इस में तुम्हारा क्या कुसूर? उस नीच जाति की राधा से तुम ने नहीं, तो क्या मैं ने ‘राधा बहन, राधा बहन’ कह कर नाता जोड़ा था. रिश्ता जोड़ा है, तो राखी तो वह बांधेगी ही.’’

‘‘उस का मन रखने के लिए मैं ने उस से राखी बंधवा भी ली, तो ऐसा कौन सा भूचाल आ गया, जो तुम इतना बिगड़ रही हो?’’

‘‘उंगली पकड़तेपकड़ते ही हाथ पकड़ते हैं ये लोग. आज राखी बांधी है, तो कल को भाईदूज पर खाना खाने भी बुलाएगी. तुम को तो जाना भी पड़ेगा. आखिर रिश्ता जो जोड़ा है. मगर, मैं तो ऐसे रिश्तों को निभा नहीं पाऊंगी,’’ मालती ने अपने मन का सारा जहर उगल दिया. राधा अभी राखी बांध कर गई ही थी कि उसे याद आया कि वह मोहन बाबू को मिठाई खिलाना भूल गई थी. अपने घर से मिठाई ला कर वे खुशीखुशी मोहन बाबू के घर आ रही थी, मगर मोहन बाबू और उन की बीवी मालती की आपस में हो रही बहस सुन कर उस के पैर ठिठक कर आंगन में ही रुक गए. जब राधा ने उन की पूरी बात सुनी, तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसे लगा जैसे उस ने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. वह चुपचाप उलटे पैर लौट गई. उस की आंखों में आंसू छलक आए थे.

मोहन बाबू सरकारी स्कूल में टीचर थे. तकरीबन 6 महीने पहले ही वे इस गांव में तबादला हो कर आए थे. यह गांव शहर से काफी दूर था, इसलिए मजबूरन उन्होंने यहीं पर मकान किराए पर ले लिया. मोहन बाबू बहुत ही मिलनसार और अच्छे इनसान थे. वे बहुत जल्द ही गांव वालों से घुलमिल गए. गांव का हर आदमी उन की इज्जत करता था, क्योंकि वे छुआछूत, जातपांत वगैरह दकियानूसी बातों को नहीं मानते थे. मोहन बाबू के मकान से कुछ ही दूरी पर राधा एक झोंपड़ीनुमा मकान में रहती थी. उस का लड़का मोहन बाबू के स्कूल में पढ़ता था. राधा थी तो विधवा, मगर मजदूरी कर के वह अपने बेटे को पढ़ाना चाहती थी. उसी पर उस की जिंदगी की सारी उम्मीदें टिकी हुई थीं, इसलिए वह समयसमय पर स्कूल आ कर उस की पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछती रहती. उस के बेटे के चलते ही मोहन बाबू की उस से जानपहचान थी.

मोहन बाबू भी राधा के बेटे को चाहते थे, क्योंकि वह पढ़नेलिखने में तेज था, इसलिए वे खुद उस के बेटे पर ज्यादा ध्यान देते थे. राधा जब भी स्कूल आती, उन से ही मिलती और अपने बेटे के बारे में ढेर बातें करती. मोहन बाबू राधा को राधा बहन कह कर ही बात करते थे. उन के लिए तो यह केवल संबोधन ही था, मगर राधा तो सचमुच ही उन्हें अपना भाई समझने लगी थी. तभी तो रक्षाबंधन के दिन बिना कुछ सोचेसमझे उस ने उन्हें राखी बांध दी थी. राधा को अपनी गलती का एहसास तब हुआ, जब उस ने उन की और मालती की आपस में हो रही बातें सुनीं. उस के बाद उस ने मोहन बाबू के घर जाना ही बंद कर दिया. एक बार 2-3 दिन तक मोहन बाबू स्कूल नहीं आए, तो राधा को चिंता होने लगी. मोहन बाबू ने चाहे उसे ऊपरी तौर पर बहन माना था, मगर उस के लिए तो वह रिश्ता दिल की गहराइयों तक पैठ बना चुका था. लगातार 2-3 दिनों तक उन का स्कूल न आना राधा के लिए चिंता की बात बन गया.

आखिरकार दिल के आगे मजबूर हो कर राधा मोहन बाबू के घर जा पहुंची. घर का दरवाजा खुला हुआ था. उस ने बाहर से ही दोचार बार आवाज लगाई, मगर जब काफी देर तक अंदर से कोई जवाब न आया, तो वह किसी डर से सिहर उठी.

मोहन बाबू पलंग पर चुपचाप लेटे थे. राधा ने पलंग के पास जा कर आवाज लगाई, ‘‘भैया… भैया…’’ मगर उन्होंने कोई जवाब न दिया. वह घबरा गई और उस ने उन्हें झकझोर दिया. मगर उन्होंने तब भी कोई जवाब नहीं दिया.

उस ने मालती को ढूंढ़ा, मगर वह वहां नहीं थी. अस्पताल वहां से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर शहर में था, इसलिए आननफानन उस ने किसी तरह एक ट्रैक्टर वाले को और कुछ गांव वालों को तैयार किया, फिर वह उन्हें अस्पताल ले गई.

डाक्टर ने मोहन बाबू को चैक कर तुरंत भरती करते हुए कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप लोग इन्हें समय पर ले आए, वरना हम कुछ नहीं कर पाते. यह बुखार बहुत जल्दी कंट्रोल से बाहर हो जाता है.’’

‘‘अब तो मोहन भैया ठीक हो जाएंगे न?’’ राधा ने आंखों में आंसू लाते हुए डाक्टर से पूछा.

‘‘जब तक इन्हें होश नहीं आ जाता, हम कुछ नहीं कह सकते. मगर मेरा मन इतना जरूर कहता है कि आप जैसी बहन के होते हुए इन्हें कुछ नहीं हो सकता,’’ डाक्टर ने मुसकराते हुए कहा. मोहन बाबू पलंग पर चुपचाप लेटे थे. उन की दवादारू लगातार चल रही थी, मगर अभी तक उन्हें होश नहीं आया था. राधा उन के पलंग के पास चुपचाप बैठी थी. रहरह कर न जाने क्यों उस की आंखों से आंसू छलक जाते थे. तकरीबन 12 घंटे बाद मोहन बाबू को होश आया और उन्होंने आंखें खोलीं. मोहन बाबू को होश में आया देख राधा की आंखें खुशी से चमक उठीं. बाकी सभी गांव वाले तो उन्हें भरती करवा कर चले गए थे. बस, राधा ही अकेली उन के पास देखरेख के लिए थी. हां, कुछ लोग उन का हालचाल पूछने के लिए जरूर आतेजाते थे, मगर काफी कम, क्योंकि लोगों को राधा का वहां होना खलता था. दवाएं देने व मोहन बाबू की देखरेख की जिम्मेदारी राधा बखूबी निभा रही थी. समय पर दवाएं देना वह कभी नहीं चूकती थी.

मोहन बाबू के मैले पसीने से सने कपड़े धोने में राधा को जरा भी संकोच न होता. उसे खुद के भोजन का तो ध्यान न रहता, मगर उन्हें डाक्टर की सलाह के मुताबिक भोजन ला कर जरूर खिलाती. मालती मायके गई हुई थी. उसे टैलीग्राम तो कर दिया था, लेकिन उसे आने में 3 दिन लग गए. तीसरे दिन वह घर आ पहुंची. जब मालती अस्पताल आई, तो राधा मोहन बाबू के पलंग के पास बैठी थी. मोहन बाबू खाना खा रहे थे. उसे देखते ही उन के हाथ मानो थम से गए.

मालती को देखते ही राधा उठ खड़ी हुई और उस के पास आ कर बोली, ‘‘भाभी, अब आप अपनी जिम्मेदारी निभाइए.’’

राधा जाने के लिए पलटी, मगर फिर वह एक पल के लिए रुक कर बोली, ‘‘और हां, मैं ने इन्हें अपने घर का खाना नहीं खिलाया है. होटल से ला कर खिलाना तो मेरी मजबूरी थी. हो सके, तो इस के लिए मुझे माफ कर देना.’’

मालती बस हैरान सी खड़ी हो कर उसे जाते हुए देखती रह गई, मगर कुछ बोल नहीं पाई. राधा के इन शब्दों को सुन कर मालती समझ चुकी थी कि शायद राधा रक्षाबंधन पर उस के और मोहन बाबू के बीच हुए झगड़े को सुन चुकी है. कुछ ही दिनों में मोहन बाबू ठीक हो गए और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई. मगर राधा उन के घर नहीं आई. बस, वह लोगों से ही उन का हालचाल मालूम कर लिया करती थी. एक दिन अचानक मालती राधा के घर जा पहुंची. राधा कुछ चौंक सी गई.

‘‘बैठने के लिए नहीं कहोगी राधा बहन?’’ मालती ने ही चुप्पी तोड़ी.

‘‘हांहां, बैठो भाभी,’’ राधा ने हिचकिचाते हुए कहा और चारपाई बिछा दी.

‘‘कल भाईदूज है. हमारे यहां तो बहनें इस दिन अपने घर भैयाभाभी को भोजन के लिए बुलाती हैं, क्या तुम्हारे यहां ऐसा रिवाज नहीं है?’’

‘‘है तो, मगर…?’’

‘‘अगरमगर कुछ नहीं. हमें और शर्मिंदा मत करो. हम दोनों कल तुम्हारे यहां खाना खाने आएंगे,’’ मालती ने कुछ शर्मिंदा हो कर कहा.

राधा की आंखें खुशी से नम हो गईं. उसे आज लग रहा था कि मोहन बाबू को भाई बना कर उस ने कोई गलती नहीं की.                      

अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर

अमेरिकी सियासत के गलियारों में बाहर से आए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी प्रतिद्वंदी डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन पर शानदार जीत हासिल की है और अमेरिका में अबकी बार ट्रंप सरकार बनने जा रही है. याद होगा कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते लोकसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश की थी, तब उनके नाम से सरकार बनाने का यह नारा सामने आया था और कामयाबी मिली थी. प्रधानमंत्री मोदी के तौर तरीकों और शख्सियत से खासे प्रभावित ट्रंप के लिए वाकई यह नारा ट्रंपकार्ड ही साबित हुआ और अमेरिकी राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर गैर-राजनीतिक 70 वर्षीय बुजुर्ग ट्रंप सारे विवादों के जाल को तोड़ते हुए 45वें अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में जनवरी में व्हाइट हाउस में विराजमान हो जाएंगे.

सालभर पहले राष्ट्रपति चुनाव का अभियान शुरू करने से लेकर बुधवार को जीत के साथ अमेरिकी इतिहास बदलने तक ट्रंप ने वास्तव में हर बार उम्मीदों और संभावनाओं को गलत साबित किया है. गौरतलब है कि कम ही लोग मान रहे थे कि वे इस दौड़ में शामिल हो पाएंगे, लेकिन वे हुए. कम लोग ही मान रहे थे कि वे प्राइमरी जीतेंगे, लेकिन वे जीते. अंतत: उम्मीदवार बने और चुनाव में बाजी मार ली.

ट्रंप की जीत को हालिया अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर माना जा रहा है.बताया गया है कि ग्रामीण मतदाताओं ने बड़ी संख्या में ट्रंप के लिए वोट डाले हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अमेरिकी प्रशासन उनकी उपेक्षा कर रहा है. जाहिर है कि अब जीत-हार की अपने ढंग से मीमांसा की ही जाएगी, जैसी कि हर जगह हर चुनाव के बाद होती है, लेकिन यह सच है कि भारतीय अमेरिकियों का बड़ा समर्थन हासिल करने में ट्रंप को खासी कामयाबी मिली है. इसीलिए यह भी कहा जा रहा है कि डोनल्ड ट्रंप के दौर में भारत और अमेरिका के रिश्ते सही मायने में नई ऊंचाई छू सकते हैं. फिर भी यह मानना होगा कि दो देशों के रिश्ते ठोस कार्ययोजनाओं और अपने-अपने हितों के मद्देनजर तय होते हैं और इनकी बुनियाद भावनाओं की रेत पर नहीं पड़ती. ट्रंप भी अमेरिकी हितों को प्राथमिकता में रखेंगे, रिश्ते हमेशा इसके बाद ही जगह पाएंगे. वैसे भी राष्ट्रपति के बदलने से अमेरिकी विदेश नीति में कोई खास बदलाव अबतक नहीं देखा गया है.

दरअसल, विदेशी नीति में एक निरंतरता होती है और अमूमन पिछली सरकार की नीतियों को आगे बढ़ाया जाता है. वैसे यह भी सच है कि डोनाल्ड ट्रंप चीन और पाकिस्तान को एक समस्या की तरह से देखते हैं, जबकि भारत को एक समाधान की तरह, इसलिए कह सकते हैं कि भारत ट्रंप के लिए एक अहम देश साबित हो सकता है. ट्रंप अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान कह चुके हैं कि मैं भारत का भी बहुत बड़ा फैन हूं और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूं. अब अगर चुनाव प्रचार के दौरान कही गई इन बातों को व्हाइट हाउस में बैठने के बाद भी ट्रंप याद रखते हैं तो हम भारतीयों के लिए अच्छी बात है. लेकिन यह भी सच है कि अक्सर चुनावी कथनी और पद पर बैठ जाने के बाद करनी में बहुत फर्क आ जाता है.

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