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श्रीजेश घायल, रघुनाथ बनें हॉकी टीम के कप्तान

चोट के चलते टीम से बाहर हुए गोलकीपर पीआर श्रीजेश की जगह ड्रैग फ्लिकर वीआर रघुनाथ ऑस्ट्रेलिया में चार देशों के टूर्नामेंट में भारतीय पुरुष हॉकी टीम की कप्तानी करेंगे. 23 नवंबर से शुरू हो रहे इस टूर्नामेंट में भारत और मेजबान ऑस्ट्रेलिया के अलावा मलेशिया और न्यूजीलैंड की टीमें भी शामिल होंगी.

श्रीजेश को मलेशिया के कुआंतन में एशियाई चैंपियनशिप ट्रॉफी (एसीटी) टूर्नामेंट में कोरिया के खिलाफ सेमीफाइनल के दौरान घुटने में चोट लगी थी. रघुनाथ को इस टूर्नामेंट में आराम दिया गया था. एसीटी में शीर्ष स्कोरर रहे ड्रैग फ्लिकर रुपिंदर पाल सिंह 18 सदस्यीय टीम के उपकप्तान होंगे.

श्रीजेश की गैरमौजदूगी में आकाश चिकते गोलकीपिंग की जिम्मेदारी संभालेंगे. उत्तर प्रदेश के अभिनव कुमार पांडे टीम के दूसरे गोलकीपर रहेंगे. चिकते ने एसीटी टूर्नामेंट के फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ बेहतरीन प्रदर्शन कर टीम को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. टीम के मुख्य कोच रोलेंट ओल्टमेंस ने कहा, 'अभिनव प्रशिक्षण शिविरों में आता-जाता रहा है. उसके घुटने में चोट थी, लेकिन उसने जोरदार वापसी की और हम उसकी वापसी से खुश हैं.'

श्रीजेश के अलावा वरिष्ठ स्ट्राइकर एसवी सुनील और रमनदीप सिंह भी चोटों के चलते दौरे से बाहर रहेंगे. सुनील रियो ओलंपिक के दौरान लगी कलाई की चोट से अभी भी पूरी तरह उबर नहीं सके हैं, जबकि रमनदीप को खराब स्वास्थ्य के चलते बाहर किया गया है. एसीटी टूर्नामेंट से टीम से बाहर रहने वाले मिडफील्डर मनदीप सिंह और फारवर्ड आकाशदीप ने टीम में वापसी की है.

कप्तान रघुनाथ दौरे में भारत की संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं. उन्होंने कहा, 'एशियाई चैंपियनशिप ट्रॉफी में जीत ने खिलाडि़यों का मनोबल बढ़ाया और टीम का आत्मविश्वास शिखर पर है. हालांकि ऑस्ट्रेलिया में अलग तरह की चुनौती होगी, लेकिन हम उसके लिए तैयार हैं. हमने 2014 में टेस्ट सरीज में ऑस्ट्रेलिया को उसके घर में हराया था और उम्मीद है कि हम इस बार भी बेहतर प्रदर्शन करेंगे.'

टीम

गोलकीपर: आकश चिकते, अभिनव कुमार पांडे.

डिफेंडर: रुपिंदर पाल सिंह (उप कप्तान), प्रदीप मोर, वीआर रघुनाथ (कप्तान), बीरेंद्र लकड़ा, कोथाजीत सिंह, सुरेंद्र कुमार.

मिडफील्डर: चिंगलसेना सिंह कांगुजम, मनप्रीत सिंह, सरदार सिंह, एसके उथप्पा.

फारव‌र्ड्स: तलविंदर सिंह, निकिन थिमैया, अफ्फान यूसुफ, मुहम्मद आमिर खान, सतबीर सिंह, आकाशदीप सिंह.

नहीं बदले जायेंगे आपके नोट

अगर आपने अभी तक अपने 500 और 1000 रुपये के नोट को बदला या जमा नहीं किया है तो जल्द करवा लीजिए. अगर आप इस उम्मीद में हैं कि सोमवार तक भीड़ कम हो जाएगी तो आपको बड़ा झटका लगने वाला है. आरबीआई की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 14 नवंबर, 2016 सोमवार को गुरुपरब होने के कारण बैंकों की छुट्टी है. अब तक इस छुट्टी को कैंसल करने के लिए आरबीआई की ओर से कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है. ऐसे में बैंक बंद रहेंगे.

500 और 1,000 रुपये के नोट बंद होने के बाद आम लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि 11 नवंबर से एटीएम ने काम करना शुरू कर दिया है लेकिन आम आदमी को अभी कुछ दिनों तक परेशानी उठानी पड़ेगी.

लोगों की परेशानी को देखते हुए शनिवार और रविवार को बैंकों को खुला रखने का फैसला लिया गया है. भीड़ को कम करने के लिए बैंककर्मी अगले तीन दिनों तक रात के 9.00 बजे तक काम करेंगे.

आरबीआई की वेबसाइट के मुताबिक बेलापुर, भोपाल, चंडीगढ़, देहरादून, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, कानपुर, कोलकाता, लखनऊ, मुंबई, नागपुर, नई दिल्ली, रायपुर, रांची में बैंक सोमवार को बंद रहेंगे. 

द्रविड़ बनें दृष्टिहीन टी-20 वर्ल्ड कप के ब्रैंड एम्बेसडर

भारत के महान बल्लबाज राहुल द्रविड़ को अगले साल होने वाले दूसरे दृष्टिहीन टी-20 वर्ल्ड कप का ब्रैंड एम्बेसडर बनाया गया है. यह टूर्नामेंट 28 जनवरी से 12 फरवरी तक खेला जाएगा. भारतीय दृष्टिहीन क्रिकेट संघ (सीएबीआई) ने एक बयान जारी कर इस बात की घोषणा की है.

यह टूर्नामेंट लीग-कम-नॉकआउट आधार पर भारत में अलग-अलग शहरों में खेला जाएगा. इसका पहला मैच नई दिल्ली और फाइनल बेंगलुरू में होगा. भारत के अलावा इस वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, इंग्लैंड, नेपाल, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और वेस्टइंडीज हिस्सा ले रहे हैं.

ब्रैंड एम्बसेडर बनाए जाने पर द्रविड़ ने कहा कि दृष्टिहीन क्रिकेट जैसे कार्य का समर्थन करते हुए मुझे खुशी हो रही है. इन खिलाड़ियों में काफी प्रतिभा है. यह खिलाड़ी दूसरों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं जो हमें बताते हैं कि असली आंखें हमारे अंदर हैं और वर्ल्ड में कोई उसे छीन नहीं सकता.

पूर्व भारतीय कप्तान ने कहा कि दृष्टिहीन क्रिकेट को भारत और दुनिया में बढ़ावा मिलना लोगों को अपने भीतर छुपी योग्यताओं में विश्वास करने के लिए प्रेरित करेगा.

द्रविड़ का शुक्रिया करते हुए सीएबीआई के अध्यक्ष माहनतेश जी के ने कहा कि हम इस बात की घोषणा करके खुश हैं कि महान बल्लेबाज राहुल द्रविड़ ने हमारे साथ हाथ मिलाया है और वह दृष्टिहीन क्रिकेट को बढ़ावा देने के हमारे उद्देश्य में हमारे साथ हैं.

सोमवार तक न जायें एटीएम

सरकार की तरफ से 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बैन करने की घोषणा के बाद से ही एटीएम और बैंकों पर भारी भीड़ लगी है. यह भीड़ आने वाले दिनों में भी दिखेगी क्योंकि लोगों को नए नोट निकालने हैं. कई जगहों तो एटीएम में नए नोट खत्म हो जाने से लोगों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा.

फिल्हाल ऐसी कुछ परिस्थितियां हैं जिनसे सोमवार ही नहीं आने वाले 7 से 8 दिनों तक एटीएम से पैसे निकालने में आपको परेशानी हो सकती है. ऐसे में अगर आप सोमवार तक कैश मैनेज कर सकें तो सलाह यही है कि एटीएम का रुख न ही करें. दरअसल बैंकों के लिए भी एटीएम को रीफिल करना अभी मुश्किल का काम है. इसकी वजह एटीएम का अंदरूनी ढांचा है. एक एटीएम में कैश रखने के लिए केवल 3-4 कसेट्स होते हैं. इन्हें कसेट्स को खास नोटों के डिस्पेंस के हिसाब से तैयार किया जाता है.

अबतक ये कसेट्स 100, 500 और 1000 रुपये के नोट देने के हिसाब से कन्फिगर किए गए थे. अब 500, 1000 रुपये के नोट बैन हो जाने के बाद इन्हें 50, 100, 500 और 2000 रुपये की करंसी देने के हिसाब से तैयार करना है. अभी 50 और 2000 रुपये के नोटों के हिसाब से सभी एटीएम को कन्फिगर नहीं किया जा सका है.

अभी लोगों की सोच यह है कि अगर उन्हें 2000 रुपये की भी जरूरत है, तो वह 10,000 रुपये तक निकालेंगे. ऐसी स्थिति में एटीएम जल्द खाली होंगे. बैंकों पर यह एक अतिरिक्त प्रेशर के तौर पर है. इसके अलावा बैंकों को बैड कंरसी और गुड करंसी का लेखाजोखा भी रखना है. इस वजह से चुनौती और बड़ी है. 

ISL: एफसी गोवा पर लगा 4.4 लाख का जुर्माना

अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (AIFF) ने इंडियन सुपर लीग (ISL) की फ्रेंचाइजी एफसी गोवा और उसके दो खिलाड़ियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए 4 लाख 40 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. गोवा के लुसियानो साब्रोसा और राफेल डुमास को जुर्माने के अलावा बुरे व्यवहार के लिए दो मैचों से निलंबित कर दिया है.

फ्रेंचाइजी और उसके दोनों खिलाड़ियों को 8 नवंबर को केरला ब्लास्टर्स के खिलाफ हुए मैच में बुरे व्यवहार का दोषी पाया गया था. केरला ने इस मैच में अंतिम समय पर गोल करते हुए 2-1 से मैच जीत लिया था. गोवा इस मैच में दूसरे हाफ में सिर्फ नौ खिलाड़ियों के साथ ही खेली थी. गोवा ने इस मैच में उसके खिलाफ लिए गए कई फैसलों का विरोध किया था.

आईएसएल द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, 'अनुशासन समिति ने एफसी गोवा पर 2.4 लाख रुपये और दोनों खिलाड़ियों पर 2-2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. हमने दो अलग-अलग प्रकरणों के चलते यह किया है. हमने एआईएफएफ की आचार संहिता के अनुच्छेद 53 ए और 53 बी के तहत सजा दी है.' गोवा की टीम इस समय 8 टीमों की अंक तालिका में 9 मैचों में 7 अंकों के साथ सबसे नीचे हैं.

रॉक ऑन 2 : कमजोर कहानी ने किया बंटाधार

2008 की सफलतम फिल्म ‘‘रॉक ऑन’ के सिक्वअल ‘‘रॉक ऑन 2’’ से काफी उम्मीदे थी. फरहान अख्तर ने इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी एक प्रतिभाशाली निर्देशक शुजात सौदागर को सौंपी. उन्होंने 2005 में साठ मिनट की एक लघु फिल्म “बाली’’ का निर्देशन कर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘आईटीए’ अवार्ड भी जीता था. मगर कमजोर कहानी व पटकथा के चलते फिल्म का बंटाधार हो गया.

फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ की कहानी पिछली आठ वर्ष पहले आयी फिल्म ‘रॉक ऑन’ से आगे बढ़ती है. इस बीच पांच वर्ष पहले मशहूर संगीतज्ञ पं.विभूति (कुमुद मिश्रा) के बेटे राहुल शर्मा की आत्महत्या का बोझ लेकर आदित्य श्राफ (फरहान अख्तर) मुंबई छोड़कर शिलांग के एक गांव में जाकर बस गया है. उसकी पत्नी साक्षी (प्राची देसाई) व बेटा मुंबई में ही रह रहे हैं. शिलांग के गांव में आदित्य गांव के किसानों के साथ मिलकर कोआपारेटिव मूममेंट के अलावा पंचायत स्कूल से जुड़ चुका है. पर उसे हर दिन यह बात सताती रहती है कि उसकी वजह से गायक राहुल शर्मा ने आत्महत्या की थी. वास्तव में आदित्य का बैंड मैजिक लोकप्रिय था, तो राहुल ने आदित्य को अपने गानों की सीडी दी थी. कई बार याद दिलाने के बावजूद आदित्य ने वह सीडी नहीं देखी. और जब एक म्यूजिकल कंसर्ट में आदित्य ने ‘जागो’ गीत गाया, तो इस गीत के संगीत की आलोचना करने के साथ साथ आदित्य से राहुल ने बहस की थी. अंत में राहुल यह कह कर चला गया था कि कल से वह उसकी आवाज नहीं सुनेंगे और फिर उसी रात राहुल ने आत्महत्या कर ली थी.

मैजिक बैंड से जुड़े जोसेफ उर्फ जो मास्र्कंहस (अर्जुन रामपाल) अब टीवी के रियालिटी शो के जज के अलावा अपना एक पब चला रहे हैं. जबकि केदार झावेरी उर्फ के डी (पूरब कोहली) अभी भी संगीत से जुड़ा हुआ है. यह तीनों अलग होते हुए भी दोस्त हैं. आदित्य के जन्मदिन पर सभी उससे मिलने शिलांग जाते हैं. तथा आदित्य के मन में संगीत को जगाने का प्रयास कर वापस आ जाते हैं.

उधर किसानों की वेलफेअर बोर्ड के अध्यक्ष महेंद्र से आदित्य की अनबन हो जाती है. एक दिन पूरे गांव में आग लग जाती है. सब कुछ खत्म हो जाता है. वह आत्महत्या करने जाता है, तो चेरापूंजी में उसकी मुलाकात उभरती म्यूजीशियन व गायिका जिया शर्मा (श्रद्धा कपूर) से होती है. जो कि पं.विभूति की बेटी और राहुल शर्मा की बहन है. अब केडी, आदित्य को लेकर मुंबई आ जाता है. उधर जिया के साथ एक सरोद वादक उदय (शशांक अरोड़ा) जुड़ चुका है. उदय के प्रयासों से ही के डी, जिया व उदय का गाना सुनने के लिए अपने स्टूडियो में बुलाता है. तभी जिया की पहचान सामने आती है. अपने पिता के नाराज हो जाने के डर से जिया स्टेज पर नही गाती है. पं.विभूति शर्मा ठहरे शास्त्रीय संगीतकार, तो उन्हे राक कल्चर समझ में नहीं आता. वह फ्यूजन संगीत के खिलाफ हैं.

पर इसी बीच आदित्य को पता चलता है कि शिलांग के गांव में जो आग लगी थी, उसकी वजह से वहां के लोग भूखे मर रहे हैं. तो वह उनकी मदद के लिए वहां जाता है. इससे नाराज होकर आदित्य की पत्नी साक्षी उससे अलग हो जाती है. फिर आदित्य, केडी, जो, उदय, जिया मिलकर उसी गांव में एक बड़ा म्यूजिकल कंसर्ट कर पैसा जमाकर गांव वालों की मदद करना चाहते हैं. सारी तैयारी हो जाती है. महेंद्र इस कंसर्ट को रोकने का असफल प्रयास करता है. फिर गांव वालों की जिंदगी पुरानी पटरी पर आ जाती है. अब अब आदित्य व जिया मिलकर संगीत तैयार करने लगे हैं. आदित्य का बेटा भी संगीत में रूचि लेने लगा है.

फरहान अख्तर और फिल्म के निर्देशक शुजात सौदागर ने हमसे बातचीत करते हुए दावा किया था कि यह पूरी तरह से संगीत प्रधान फिल्म है. पर फिल्म देखकर यह दावे खोखले साबित होते हैं. फरहान ने दावा किया था कि इस फिल्म में बदली हुई सामाजिक या राजनीतिक स्थितियों का जिक्र नहीं है. मगर किसानों का मसला, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को बहुत ही शुष्क तरीके से पिरोकर फिल्म का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

फिल्म देखते समय यदि दर्शकों को साक्षी व आदित्य के रिश्ते का टूटना देखकर फरहान अख्तर की निजी जिंदगी की कहानी याद आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. वैसे इस फिल्म में यदि प्राची देसाई का किरदार न होता, तो भी कोई फर्क न पड़ता. वैसे भी प्राची देसाई के हिस्से करने को कुछ है ही नहीं. पर प्राची ने इस फिल्म में अभिनय किया, यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है.

इंटरवल से पहले फिल्म बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है. और कहानी इस तरह से आगे बढ़ती है कि दर्शक बुरी तरह से बोरीयत के चलते झल्ला उठता है. इंटरवल के बाद कहानी का ऐसा घालमेल है, कि दर्शक पूछ बैठता है कि संगीत कहां गया? बाप-बेटी, भाई-बहन और दोस्ती इन सभी रिश्तों को कहानी के एक सूत्र में बांधने में कहानीकार व पटकथा लेखक पूरी तरह से असफल है. कथानक के स्तर पर जबरदस्त विरोधाभास है. रिश्तों व दोस्ती की बात करने वाली फिल्म ‘रॉक ऑन’ में आदित्य को अपने वैवाहिक रिश्ते, अपनी पत्नी साक्षी से रिश्ते की बजाय बल्कि जिया के करियर की चिंता ज्यादा सताती है. फिल्म के कुछ भावुक दृश्य अच्छे बन पड़े हैं, कुछ संवाद भी अच्छे हैं, मगर इससे फिल्म नहीं संभलती है. पुरानी फिल्म ‘‘रॉक ऑन’’ के मुकाबले कहानी के स्तर पर उसका सिक्वल ‘‘रॉक ऑन 2’’ कहीं नहीं ठहरता. संगीत का स्तर पहली फिल्म के मुकाबले काफी कमजोर है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो शशांक अरोड़ा ने काफी अच्छी परफॅामेंस दी है. अर्जुन रामपाल या पूरब कोहली बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करते हैं. श्रद्धा कपूर का अभिनय देखकर लगता है कि अब वह अभिनय की बजाय सिर्फ संगीत व गायन में करियर बनाना चाहती हैं.

फिल्म में मेघालय व शिलांग की लोकेशन जरुर लोगों को पसंद आएगी. फरहान अख्तर व रितेशसिद्धवानी निर्मित दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म के निर्देशक शुजात सौदागर, संगीतकारशंकर एहसान लाय हैं.

बात ऐसे बनी

मेरे पति के अभिन्न मित्र की एक बहुत बुरी आदत थी. वे बातबात में मेरे पति से कहते, ‘‘तुम राजा भोज और मैं गंगू तेली.’’ मेरे पति उन्हें बारबार समझाते, कहते, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है.’’ पर वे तुरंत कहते, ‘‘बात तो ऐसी ही है. तुम अपनी कक्षा में प्रथम आते रहे हो और मैं घिसटघिसट कर पास होता रहा. तुम बड़े संपन्न व्यक्ति के पुत्र और बड़े अधिकारी और मैं एक क्लर्क, तो मैं सही कहता हूं न.’’

जब वे किसी तरह नहीं समझे तब मेरे पति ने एक उपाय सोचा. अगली बार जब वे हमारे घर आए तो उन्हें देखते ही मेरे पति ने कहा, ‘‘आओआओ गंगू तेली.’’ इतना सुनते ही वे सकपका गए. उन्हें बहुत बुरा लगा पर जब बात उन की समझ में आई तो ठहाका लगा कर हंसे और उस के बाद उन्होंने अपनी आदत भी बदल डाली.

शशि श्रीवास्तव, खड़गपुर (प.बं.)

*

लोकल कंपनी का डिटर्जैंट पाउडर बेचने वाला एक सेल्समैन आएदिन हमारे घर आ धमकता. डोरबैल बजा कर परेशान करता. उसे तमाम बार समझाया किंतु उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगती थी. मना करने पर भी वह लगातार आग्रह करता कि मैडमजी, ले लो बहुत अच्छा पाउडर है. एक बार उपयोग कर के तो देख लो. मैं उसे यह कह कर टालती रहती कि घर में पति नहीं हैं. वे होते तो ले लेती. वह उस वक्त तो चला जाता लेकिन एकदो दिन बाद फिर आ धमकता.

शाम को मेरे पति जब घर लौटे तो मैं ने उस सेल्समैन की करतूत से उन्हें अवगत कराया. वे भी परेशान हो गए. अंत में आपसी विचारविमर्श के बाद हम दोनों ने एक योजना बनाई. एकदो दिन बाद जैसे ही वह सेल्समैन आया तो उसे हम ने सादर घर के अंदर बुला लिया. पानी वगैरा पिला कर उस से कहा कि आज आप के डिटर्जैंट पाउडर के सारे पाउच ले लेंगे. मेरे पतिदेव ने बोला है. अभी वे घर में नहीं हैं, आते ही होंगे.

मेरी बात सुन कर उस सेल्समैन के चेहरे पर रौनक आ गई. 10-15 मिनट के बाद सेल्समैन बोला, ‘‘बाबूजी कहां हैं? कब आएंगे?’’

‘‘आते ही होंगे. दरअसल, कल आप की तरह एक और सेल्समैन आया था. मेरे पति ने उस का सारा सामान छीन कर पिटाई कर दी थी. आज पुलिस ने उन्हें थाने बुलाया था. उन से मेरी अभी बात हुई है. उन्होंने कहा है कि सेल्समैन को रोक कर रखना, मैं थोड़ी देर में पहुंच रहा हूं.’’

मेरी बात सुनते ही उक्त सेल्समैन रफूचक्कर हो गया. फिर वह कभी नहीं आया.

प्रभा वर्मा, नोएडा (उ.प्र.)

यूएसबी केबल से स्मार्टफोन को बनाएं कंप्यूटर

स्मार्टफोन से संबंधित कई ट्रिक्स है जो रोजमर्रा की लाइफ मे काफी अहम साबित होती हैं. लेकिन आज हम आपको USB OTG से संबंधित एक ऐसी ट्रिक बताएंगे जो आपको एक बेहतर अनुभव देने में मदद करेगी. इस छोटी सी USB OTG के जरिए आप अपने स्मार्टफोन से फोटोज, वीडियोज और गाने समेत सभी डाटा को आसानी से ट्रांसफर कर सकते हैं.

इनके अलावा इसके जरिए और भी कई काम किए जा सकते हैं जैसे स्मार्टफोन में कीबोर्ड, म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट या स्टोरेज कनेक्ट करना. अगर आपके पास USB OTG नहीं है तो आप कहीं से भी इसे खरीद सकते हैं. इनकी शुरुआती कीमत 60 रुपये है. तो चलिए आपको बता दें कि USB OTG को प्रोफेशनल की तरह कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है.

मोबाइल से कीबोर्ड और माउस को कर सकते हैं कनेक्ट

USB OTG के जरिए आप माउस और कीबोर्ड को स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं. हैंडसेट में OTG केबल लगाएं और केबल में दिए गए पोर्ट में माउस या कीबोर्ड को लगाएं. जैसे ही आप इसे प्लग इन कर देंगे आपको स्मार्टफोन पर एक कर्सर दिखाई देगा. जिसे माउस के माध्यम से कंट्रोल किया जा सकता है.

एक्सटर्नल हार्ड डिस्क को स्मार्टफोन से करें कनेक्ट

आप एक्सटर्नल हार्ड डिस्क को अपने स्मार्टफोन से कनेक्ट कर मोबाइल डाटा ट्रांसफर कर सकते हैं. ये आपके लिए एक अलग एक्सपीरियंस होगा.

स्मार्टफोन से कनेक्ट करें गेम कंट्रोलर

आपको बता दें कि आप गेमपैड को भी स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं. गेमपैड को USB OTG के जरिए कनेक्ट करके आप गेम भी खेल सकते हैं. जैसा आप प्ले स्टेशन या फिर कंप्यूटर मे खेलते हैं.

कैसे पता लगाएं की आपका फोन USB OTG सपोर्ट करता है या नहीं?

वर्तमान में जो भी स्मार्टफोन बनाए जा रहे हैं वो सभी USB OTG का सपोर्ट करते हैं. डिवाइस के पैकेजिंग पर भी इसके बारे में लिखा होता है. अगर पैकेजिंग में भी नहीं दिया गया है तो आप ऑनलाइन जाकर अपने फोन की स्पेसिफिकेशन्स देख सकते हैं. अगर कनेक्टिविटी में USB OTG सपोर्ट लिखा है तो आपका फोन इसे सपोर्ट करता है.

बैक्टीरिया बनाम मैडिकल साइंस: आरपार की जंग

नए एंटीबायोटिक की खोज और मौजूदा एंटीबायोटिक दवाओं से नष्ट न होने वाले यानी दवाप्रतिरोधी बैक्टीरिया के खिलाफ संघर्ष तेज हो गया है. वैज्ञानिक जीजान लगाए हुए हैं. वे समुद्र की अतल गहराइयों, जमीन के भीतर, पर्वतों, रेगिस्तानों और हर ऐसी जगह जहां सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवन होने की संभावना हो, ढूंढ़ रहे हैं. हमें शायद उस भयानक समस्या का बहुत कम एहसास है जिस की आगत की आशंका से चिकित्सा वैज्ञानिक आतंकित और हड़बड़ाए हुए हैं.

प्रयोगशालाओं में तो नए एंटीबायोटिक को तलाशा ही जा रहा है, उस के बाहर भी जोरों से तलाश जारी है. कारगर एंटीबायोटिक नहीं खोजी गई तो आशंका इस बात की है कि वर्ष 2050 तक मरने वालों की संख्या बढ़ कर सालाना 1 करोड़ हो सकती है. इस से जन की तो हानि होगी ही, धन के मामले में जो नुकसान आंका गया है, वह 100 ट्रिलियन डौलर से ज्यादा का है. इसे ऐसे समझें कि समूचे संसार के देशों की अर्थव्यवस्था में दर्शाई गई सकल घरेलू उत्पाद यानी उन के जीडीपी को एक कर दिया जाए तब भी इस की भरपाई नहीं होने वाली.

सब से बड़ी बात यह कि यदि कोई नया बैक्टीरिया प्रतिरोधक या दवा ईजाद न हुई तो हम अगले 2 दशकों में ही एक सदी पीछे की हालत में पहुंच जाएंगे. इस से एक बार फिर सामान्य सा संक्रमण भी जानलेवा बन सकता है. सच तो यह है कि सामान्य दस्त या उल्टी की समस्या यदि बिगड़ जाएगी तो कोई एंटीबायोटिक कारगर साबित नहीं होगा, स्थिति जानलेवा हो जाएगी. एंटीबायोटिक दवाओं पर निर्भर सर्जरी और कैंसर का उपचार खतरे में पड़ जाएगा.

चिंता पर चिंता

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक के इस भयावह मुद्दे पर ध्यान दिया है. उस ने ‘एंटीबायोटिक : हैंडल विद केयर’ नाम का अभियान शुरू किया है. अमेरिका ने इस क्षेत्र में नया शोध संस्थान दिया. ब्रिटेन ने इस पर काम करने वाले कुछ संस्थान दिए हैं. कुछ देशों ने इस मामले में शोधकर्मी और अपना अंशदान दिया है. हमारे प्रधानमंत्री ने इस मामले को प्रमुखता से लिए जाने का बयान दिया है. तकरीबन 40 देश इस क्षेत्र में काम में लगे हैं. 80 विख्यात दवा कंपनियां नई पीढ़ी की जीवनरक्षक दवा और नया समर्थ बैक्टीरिया रोधी या एंटीबायोटिक विकसित करने में लगी हैं.

एक भारतीय वैज्ञानिक ने दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया से लड़ने के लिए नैनोथेरैपी की वकालत की है. यह गोली, कैप्सूल या इंजैक्शन अथवा पीने की दवा नहीं है, बल्कि नैनोपार्टिकल्स यानी हमारे बालों की मोटाई से 20 हजार गुना छोटे डौट्स हैं. प्रकाश-प्रेरित, चिकित्सकीय नैनोपार्टिकल्स को क्वांटम डौट्स भी कहा जाता है. ये प्रयोगशाला के वातावरण में 92 प्रतिशत दवा प्रतिरोधी जीवाणु कोशिकाओं को नष्ट करने में सक्षम होते हैं.

इस अध्ययन के सहलेखक भारतीय मूल के प्रशांत नागपाल हैं जो अमेरिका की कोलरैडो बाउल्डर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफैसर हैं. उन के अनुसार, अर्धचालक नैनोपार्टिकल्स केवल संक्रमित स्थानों  को ही निशाना बनाएंगे. हलकी सक्रियता के गुणों की वजह से ये क्वांटम डौट्स खास तरह के घातक और दवारोधी बैक्टीरिया के संक्रमणों की चिकित्सा में प्रयोग किए जा सकते हैं.

भारत और एंटीबायोटिक

वर्ष 2010 में भारत ने समूचे संसार में सब से ज्यादा एंटीबायोटिक खाने वाले देश का तमगा हासिल किया था. तब विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, हर भारतीय साल में औसतन पहले नंबर पर 11 एंटीबायोटिक दवा खा रहा था. हम एंटीबायोटिक दवाओं का 1,300 करोड़ स्टैंडर्ड यूनिट (डोज) इस्तेमाल कर जाते थे जबकि 2 और महाशक्तियां चीन 1,000 करोड़ स्टैंडर्ड यूनिट का प्रयोग कर दूसरे और अमेरिका 700 करोड़ स्टैंडर्ड यूनिट एंटीबायोटिक दवाओं की खपत कर तीसरे नंबर पर थीं. सरकारी कोशिशों के नाकाफी व नाकामी के चलते देश ने यह तमगा आज तक बरकरार रखा है. हम ने इतनी एंटीबायोटिक गटक ली हैं कि अब कईर् तरह के बैक्टीरिया इन के इतने आदी हो चुके हैं कि उन पर ताकतवर से ताकतवर एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर होती जा रही हैं.

इस बात पर पहली चिंता भी तभी हुई थी जब वर्ष 2010 में टीबी के 4 लाख 40 हजार ऐसे नए रोगी सामने आए जिन पर एंटीबायोटिक दवा बेअसर थी. इन में से तकरीबन 2 लाख लोगों की मौत हो गई.

नई दिल्ली स्थित गंगाराम अस्पताल में किए गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई थी कि 70 फीसदी मरीजों पर एंटीबायोटिक दवाओं ने असर नहीं किया. जाहिर है सर्दीजुकाम से ले कर फोड़ेफुंसी तक में एंटीबायोटिक का बेवजह, धुआंधार इस्तेमाल रंग ला रहा है. देश में एंटीबायोटिक दवाओं की ज्यादा खपत होने के कई मूलभूत कारण हैं.

भारत में किसी को भी संक्रमित होने की आशंका कुछ ज्यादा ही होती है क्योंकि यहां हवा, पानी, जमीन हर ओर बैक्टीरिया के पनपने, पोषण देने के लिए गंदगी मौजूद है. किसी भी व्यक्ति को संक्रमण यहां बारबार होता है क्योंकि ज्यादातर लोगों का इम्यून सिस्टम या कहें प्रतिरक्षा प्रणाली उचित पोषण व स्वस्थ जीवनशैली के न होने के चलते बेहतर नहीं है. देश में यदि स्वच्छता अभियान पूरी तरह सफल हो जाए तो सिर्फ इसी से एंटीबायोटिक के लिए चलने वाली जंग आधी से ज्यादा जीती जा सकती है.

देश में एंटीबायोटिक दवाएं अभी भी बिना पर्चे के कैमिस्ट से खरीदी जा सकती हैं. बहुत बार चिकित्सक की फीस दोबारा न देनी पड़े, इस से लोग पुराना पर्चा दिखा कर एंटीबायोटिक ले लेते हैं. कुछ लोग डाक्टर की सलाह के बजाय दूसरों की सलाह पर भी दवा खरीद कर खा लेते हैं. वैसे भी, देश में चिकित्सक बड़ी आसानी से एंटीबायोटिक दवाएं लिख भी देते हैं. बिना डाक्टरी सलाह के बारबार एंटीबायोटिक खाना और डोज पूरी किए बिना तबीयत थोड़े ठीक होती है. एंटीबायोटिक का सेवन बंद कर देना ऐसे बैक्टीरिया के तैयार होने में सहायता कर रहा है जिन पर दवाएं बेअसर रहें. एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में एंटीबायोटिक की 76 फीसदी खपत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका में है. पर मसला इन्हीं देशों तक सीमित नहीं है. यह विश्वव्यापी है.

खतरा नजदीक है

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने से दुनिया में प्रतिवर्ष 7 लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं. इस के व्यापक और दीर्घकालिक दुष्परिणाम की कल्पना भी नामुमकिन है. ऐसा हुआ तो संक्रमित मरीजों और मौडर्न मैडिकल सिस्टम यानी एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली का क्या होगा?

अगर प्र्भावी एंटीबायोटिक न ढूंढ़ा गया तो तकरीबन 15 तरह के अलगअलग जीवाणु प्रतिरोधक विकसित करने होंगे जो बेहद महंगा सौदा है और जो इलाज को भी खासा महंगा बना देगा. इस के अभाव में हर दिन कम से कम 200 अरब डौलर रोज खर्चने होंगे. सो, जनधन की भयानक हानि वाला यह खतरा काल्पनिक नहीं है, बल्कि वास्तविक है और बेहद नजदीक भी. अगर जल्द कुछ नहीं किया गया तो अगली पीढ़ी को दुर्दिन देखने होंगे.

बैक्टीरिया की प्रोटोज

बैक्टीरिया एक कोशिकीय जीव है. इस का आकार एक मिलीमीटर से ले कर कुछ मिलीमीटर तक का होता है. यह गोल या चक्राकार अथवा छड़ के आकार का हो सकता है. बैक्टीरिया पृथ्वी में तकरीबन हर जगह पाए जाते हैं. मिट्टी में, अम्लीय जलधाराओं में, नाभिकीय पदार्थों में, पानी में, यहां तक कि कार्बनिक पदार्थों में और पौधों व जानवरों के शरीर में भी पाए जाते हैं. बैक्टीरिया का आकार बहुत छोटा होता है और इन के विकास की संख्या बहुत तीव्र होती है. एक ग्राम मिट्टी में 4 करोड़ तक बैक्टीरिया हो सकते हैं. जबकि एक मिलीलिटर पानी में 10 लाख से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं.

बैक्टीरिया धरती में बायोमास का एक बहुत बड़ा भाग हैं. ये कई तत्त्वों के चक्र में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, जैसे कि वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थरीकरण में. हालांकि अभी तक बहुत सारे वंश के जीवाणुओं  का श्रेणी विभाजन संभव नहीं हुआ है, फिर भी दुनिया की तकरीबन आधी प्रजातियां ऐसी हैं जिन्हें किसी न किसी प्रयोगशाला में पैदा किया जा चुका है. मानव शरीर में जितनी भी मानव कोशिकाएं हैं, उन की लगभग 10 गुना बैक्टीरिया हैं. इन में से अधिकांश बैक्टीरिया त्वचा तथा आहार नाल में पाए जाते हैं.

हानिकारक बैक्टीरिया इम्यून तंत्र के रक्षक प्र्रभाव के कारण शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते वरना तो एक दिन में ही आक्रामक बैक्टीरिया हमारे शरीर को चट कर जाएं. दुनिया में हर साल अकेले टीबी के रोग से 20 लाख से ज्यादा लोग मर जाते हैं. टीबी का रोग खतरनाक बैक्टीरिया का ही

नतीजा होता है. सारे बैक्टीरिया नुकसानदायक नहीं होते. कई बैक्टीरिया फायदेमंद भी होते हैं. कुछ बैक्टीरिया सिर्फ प्रति जैविक विकसित कर के इंसान के स्वास्थ्य की रक्षा के काम ही नहीं आते बल्कि औद्योगिक उत्पादन में भी इन का बड़ा हाथ होता है. आज की तारीख में न जाने कितने उत्पाद बैक्टीरिया की देन हैं. बैक्टीरिया के किंडवन क्रिया द्वारा न सिर्फ दही से ले कर पनीर तक बल्कि तमाम औद्योगिक क्रियाएं भी इन के जरिए संभव होती हैं. बैक्टीरिया को सब से पहले एक डच वैज्ञानिक एंटनी वौन ल्यूवोनहुक ने 1676 में सूक्ष्मदर्शी के जरिए देखा था. यह सूक्ष्मदर्शी उन्होंने खुद ही बनाई थी. इस के बाद 1864 में फ्रैंच वैज्ञानिक लुई पास्चर ने दुनिया को बताया कि इन बैक्टीरिया से ही रोग फैलते हैं. लुई पास्चर ने ही 1889 में अपने प्रयोग द्वारा यह दिखाया था कि किंडवन की रासायनिक क्रिया सूक्ष्मजीवों द्वारा होती है. ये सूक्ष्म जीव बैक्टीरिया ही हैं. लुई पास्चर को बैक्टीरिया संबंधी अध्ययन का पितामह समझा जाता है.

रोग और प्रमुख कारक बैक्टीरिया

रोग                            बैक्टीरिया का नाम

टिटनैस                        क्लैस्ट्रडियम टेटनी

काली खांसी                  हैमोफिलस परटूसिस

डिप्थीरिया                    कोरिनोबैक्टीरियम डिप्थीरी

कोढ़ या कुष्ठ रोग             माइकोबैक्टीरियम लेप्री

तपेदिक                       माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस

टाइफाइड                    टाइफि साल्मोनेला/साल्मोनेला टाइफि

गोनोरिया/सुजाक             गोनोकौकस गोनोराही

प्लेग                           बैसिलस पैस्टिस

सिफलिस                     ट्रेपोनेमा पैलीडम

न्यूमोनिया                     डिप्लोकौकस न्यूमोनी

हैजा                           विब्रियो कौलरी

मेनिनजाइटिस                निशेरिया मैनिनजाइटिडिस

मियादी बुखार                 सालमोनेला टाइफी

क्षय रोग                       माइकोबैक्टीरियम टयूबरकुलोसिस

स्वाइन फ्लू                    एच1 एन1 फ्लू विषाणु (अर्थोमिक्सोवायरस)

एबोला                        एबोला विषाणु (फाइलोंविषाणु)

फूड पौइजन                  क्लोस्ट्रीडियम बौट्यूलिनम

रिकेट्स संक्रमण             रिकेट्सी

लाइम रोग                    बोरिलिया बर्गडोरफेरी

धुनस्तंभ                       क्लोस्ट्रीडियम टिटैनी

क्लैमाइडिया                  क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस

लाल बुखार                    स्ट्रैप्टोकाकस

रोग और प्रमुख कारक प्रोटोजोआ (परजीवी)

रोग                            परजीवी का नाम

पायरिया                       एंटअमीबा जिंजीवैलिस

दस्त                           एंटअमीबा हिस्टोलिटिका

अतिसार या पेचिस           जिआरडिया लैंबलिया

सुजाक तथा स्वेत प्रदर       ट्राइकोमोनस वेजाइनेलिस

दस्त                          आइसोस्पेरा होमिनिस

काला-जार                   लीशमनिया

निद्रा                          ट्रिपैनोसोमा ग्रैंबियंस

मलेरिया                      प्लाज्मोडियम

60 के बाद रोमांस

भोपाल महिला थाने की इंचार्ज इंस्पैक्टर संध्या मिश्रा इन दिनों हैरान भी हैं और परेशान भी क्योंकि दांपत्य विवादों के ऐसे मामले आना आम बात हो चली है जिन में अधिकांश पति सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और शिकायतकर्ता यानी पीडि़ताओं के बाल सफेद हो चुके हैं. मांबाप या फिर दादादादी, नानानानी की उम्र के पतिपत्नियों के ये विवाद बड़े दिलचस्प हैं जिन के बारे में पुलिस वालों को समझ नहीं आ रहा कि वे आखिर करें भी तो क्या करें.

अरेरा कालोनी, भोपाल का पौश इलाका है जहां संपन्न और प्रतिष्ठित लोग रहते हैं. यहां की एक 62 वर्षीया वृद्ध महिला ने थाने आ कर यह शिकायत की थी कि उन के पति को रिटायर हुए 1 साल होने को है पर उन्होंने अभी तक घर में एक रुपया भी पैंशन का नहीं दिया है. इन दोनों के एक बेटा और एक बेटी है जिन की शादियां हो चुकी हैं और वे अलग रहते हैं.

इस बुजुर्ग महिला ने अपनी शिकायत में यह भी रोना रोया था कि उन्होंने अपने स्तर पर खोजबीन की तो पता चला कि पति के किसी दूसरी महिला से संबंध हो गए हैं और वे उस पर ही सारा पैसा उड़ा रहे हैं. इस बाबत पूछने पर वे दोटूक व रूखा सा जवाब यह देते हैं, ‘मेरा पैसा है जैसे चाहूं खर्च करूं मेरी मरजी.’

एक और मामले में भोपाल के ही कोलार निवासी 62 वर्षीया महिला ने शिकायत की है कि उन के पति को रिटायर हुए 3 साल हो गए हैं. पिछले एक साल से उन्होंने घर में पैसा देना बंद कर दिया है जबकि रिटायरमैंट के पहले वे पूरी पगार उन के हाथ में देते थे. पुलिस में जाने से पहले इस महिला ने अपने जेठ और अलग रह रहे बेटे से इस आशय की शिकायत की थी पर उन्होंने कुछ करने में असमर्थता जता दी थी. इस महिला को शक है कि पति किसी और के चक्कर में पड़ पैंशन का पैसा उड़ा रहे हैं.

ऐसी शिकायतों पर काउंसलिंग भी की जाती है. एक मामले में काउंसलर रीता तुली ने बताया कि पत्नी की इस शिकायत पर कि पति दूसरी महिलाओं पर पैसा खर्च कर रहे हैं, पूछने पर पति भड़क उठा और पूरी अकड़ से बोला कि उस ने पूरी जिंदगी अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाई हैं और घर चलाने लायक पैसे पत्नी को दे रहा है. ऐसे में उसे शिकायत क्यों है. उस का पैसा है, वह जैसे चाहे खर्च करे.

गौरतलब बात यह है कि ऐसी शिकायतें सेवानिवृत्त कर्मचारियों की ही मिल रही हैं, व्यापारी या किसी दूसरे वर्ग की नहीं. एक अन्य मामले के पति की बातों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह एक मध्यवर्गीय पुरुष है जिस के व्यवहार में रोमांस कम, उस की भड़ास ज्यादा है.

रोमांस कम, भड़ास ज्यादा

परस्त्री गमन को भड़ास कहना इसलिए बेहतर है क्योंकि वाकई एक मध्यवर्गीय पुरुष नौकरी के दौरान घर और बाहर की जिम्मेदारियां उठातेउठाते एक अलग तरह की कुंठा व तनाव का शिकार हो जाता है. ‘मैं ने सब के लिए किया, अब रिटायर होने के बाद खुद अपनी जिंदगी जी लूं तो हर्ज क्या है’ यह सोच तेजी से वृद्धों में पनप रही है. एक पत्नी ही है जो इस आजादखयाली की राह में आडे़ आती है जिसे वे हर स्तर पर नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं.

60 के पार की पीढ़ी की अपनी परेशानियां हैं जो संस्कारों और वर्जनाओं में पलीबढ़ी है. लेकिन एकाएक ही 2 दशकों में परिवार व समाज में आश्चर्यजनक बदलाव आए हैं, मसलन अधिकांश लोगों के बच्चे उन के साथ नहीं रहते, दूसरे शहर में नौकरी करते हैं. पुराने दोस्तयारों के कहीं अतेपते नहीं हैं, टीवी, सिनेमा, मोबाइल और कंप्यूटर में इन का मन नहीं लगता.

सब से बड़ी दिक्कत वह अर्धांगिनी है जो फुरसत में पति को अकेला और असहाय पा कर उस के कान खाती रहती है कि मैं जिंदगीभर तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए खटती रही, एवज में मुझे क्या मिला. तुम ने मुझे परेशान किया पर मैं चुपचाप ज्यादती झेलती रही और अब जब थोड़ी फुरसत मिली तो भी तुम मुझ पर ध्यान नहीं देते, अपने मन की चलाते रहते हो.

ऐसे में झल्लाया पति भी यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि उसे क्या मिला और अब आराम के दिनों में पत्नी क्यों रिश्तेदारी और परिवार के लिए किए गए का लेखाजोखा खोल कर बैठ गई है. जिन बच्चों को पैदा कर बड़ी उम्मीदों से पालापोसा, वे बेरहमी दिखाते अलग हो गए हैं. हालत यह है कि नातीपोतों को खिलाने तक को तरसना पड़ता है यानी पूरी दुनिया ही जब बेरहम हो चली है तो मैं ही क्यों घुटघुट कर जिऊं, अपने मन की क्यों न करूं.

मन की करूं यानी बाहर कहीं सुकून ढूंढ़ू क्योंकि घर में घुटन और कलह है और मन में उदासी और अवसाद है. दुनिया में ऐसा कोई मिल जाए जिस से दिल की बात की जा सके और इस बाबत उस पर कुछ पैसा खर्च भी करना पड़े तो सौदा घाटे का नहीं. आखिरकार, पैसा सिर पर रख कर तो ले जा नहीं सकते. यह भड़ास 60 पार पुरुषों को बाहर भागने को उकसाती है और बाहर कोई न कोई चाहनेसुनने वाली भी मिल जाती है. ऐसे में इन की जिंदगी गुलजार हो उठती है. लगता है किशोरावस्था और यौवन के बीच के दिन वापस आ गए हैं. दिल फिर से किसी के लिए यह सोचते हुए धड़कने लगा है कि जब दुनिया को हमारी परवा नहीं, तो हम उस का लिहाज क्यों करें.

आसानी से मिलती है पार्टनर

60 पार के वृद्ध कोई ऐयाशी नहीं करते. उन की कथित प्रेमिकाएं कोई नवयौवनाएं नहीं होतीं, न ही बाजारू तितलियां होती हैं बल्कि 40 वसंत देख चुकी, तनहा रह रही महिलाएं होती हैं, जिन से इन की पटरी अच्छी बैठती है. कभीकभी तो पटरी इतनी अच्छी बैठती है कि उन्हें देख लगता है कि वे कहीं आपस में शादी ही न कर बैठें.

हाल ही में एक हाईस्कूल से रिटायर हुए प्रिंसिपल गोपाल सक्सेना कहते हैं कि रिटायर लोगों की व्यक्तिगत व पारिवारिक परेशानियां कोई नहीं समझता. उलटे, कहीं दोस्ती या प्यार हो जाने पर उन पर तोहमत लगाने वाले और हंसने वाले थोक में मिल जाते हैं. और अब वे भी कम हो चले तो पत्नियां थाने में जा कर शिकायतें कर रही हैं और वह भी सिर्फ पैसों के लिए. पति के लिए तो इन के दिल में जगह ही नहीं हैं, अगर होती तो यह नौबत ही क्यों आती.

गोपाल बताते हैं कि उन के एक सहकर्मी इसी हालत से गुजरते हुए एक शिक्षिका के यहां आनेजाने लगे जिन्होंने शादी नहीं की थी और अकेले रहती थीं. दोनों नए प्रेमियों जैसे घंटों बतियाते रहते, साथ खातेपीते, घूमतेफिरते और गजलें व कविताएं सुननेसुनाने का अपना शौक पूरा करते थे. इस सहकर्मी ने कोई गुनाह नहीं किया था बल्कि एक सुकून भर ढूंढ़ा था जो उसे अपनी पत्नी के साथ नहीं मिल पा रहा था.

इस मामले में भी बात बढ़ी और पत्नी ने बच्चों व देवर से शिकायत की तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए कि हम कुछ नहीं कर सकते. आप दोनों जानो, बड़े हो, समझदार हो, आप ने ज्यादा दुनिया देखी है और हमारे कहने से तो कुछ होने से रहा. अब मुमकिन है यह पत्नी भी यों ही फरियाद करती हुई कभी महिला थाने जा पहुंचे कि मैं 64 साल की हूं और पति से परेशान हूं जो पैसा किसी दूसरी औरत पर उड़ा रहे हैं. कोई कानून हो तो उस का इस्तेमाल करते हुए उन्हें रोकिए.

उधर, वह अधेड़ शिक्षिका भी किसी की चिंता नहीं करती जिस ने अब तक की जिंदगी अकेले गुजार दी. अपने परिपक्व प्रेमी का इंतजार करते हुए वह गजलों की सीडी लगाती है और फिर दोनों दुनियाजहान की बातों में खो जाते हैं.

दरअसल, बढ़ते शहरीकरण ने कई महिलाओं के हिस्से में भी तनहाई लिख दी है. उन महिलाओं ने, वजह कुछ भी हो, शादी नहीं की या फिर तलाकशुदा या विधवा हैं. उन्हें भी एक ऐसे पुरुष की जरूरत पड़ने लगती है जिस से कोई खतरा न हो और जिस की जेब में खर्च करने को पैसे हों. इस रिश्ते में लेनदेन नहीं होता, यह कहना ज्यादती होगी.

नए भोपाल के एक महिला मार्केट में सिलाई की दुकान चलाने वाली एक महिला के पास एक रिटायर्ड इंजीनियर का आनाजाना आम है. लोग उन्हें आतेजाते देख फुसफुसाते हैं पर हाथ में समोसे का पैकेट लिए ये रिटायर्ड इंजीनियर साहब किसी की तरफ आंख उठा कर नहीं देखते. उन्होंने सिलाईकढ़ाई की दुकान वाली को व्यवसाय बढ़ाने के लिए खासी रकम दे रखी है. बदले में,  उन्हें जो मिलता है, वह सुकून है जिसे वे रिटायरमैंट के बाद से तलाश रहे थे.

जाहिर है बदलती परिवार व्यवस्था का असर रिटायर्ड लोगों पर अलग तरह से पड़ रहा है जो पतिपत्नी के रिश्ते को ढोते रहे और जिम्मेदारियां पूरी होने के बाद अब अपनी मरजी से जी रहे हैं.

गलती उन पत्नियों की भी कम नहीं है जिन्हें यह अंदाजा या एहसास नहीं कि सेवानिवृत्ति के बाद पति को जो भावनात्मक सहारा चाहिए था वह उसे वे नहीं दे पाईं. उलटे, अतीत का बहीखाता खोल अपने किए का हिसाबकिताब करने बैठ गईं और जिंदगीभर मुट्ठी में रहा पति जब हाथ से फिसल गया तो थानों के चक्कर लगा रही हैं. जहां से उन्हें सिवा आश्वासनों और समझाइश के कुछ और यानी न्याय नहीं मिलना क्योंकि पति कोई अपराध, ज्यादती या हिंसा नहीं कर रहा. जाहिर है पति परिवार के दबाव से मुक्त है, इसलिए उस पर कानूनी और सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश में बुजुर्ग महिलाएं गच्चा खा रही हैं.

अगर यह समस्या है, तो इस का और बढ़ना तय दिख रहा है क्योंकि पत्नी यह मान कर चलती है कि रिटायरमैंट के बाद पति के कोई माने नहीं और अब पैसा ही अहम है. भोपाल में सामने आए सभी मामलों में किसी के पास पैसों की कमी नहीं थी, सब के बच्चे खासा कमा रहे हैं और मां अगर मांगे तो इतने क्रूर भी नहीं हैं कि 5-10 हजार रुपए महीने उसे न दें.

पर असल फसाद दांपत्य का खाई में तबदील होना और ऊबे पुरुषों का खुद से यह कहना है कि कोल्हू के बैल की तरह काम बहुत कर लिया, बच्चों की जिंदगी बना दी, किसी को कोई कमी नहीं होने दी और शादी के 35-40 साल बाद भी पत्नी उन्हें समझने में नाकाम रही है तो वे खुद से ही कह रहे हैं कि इस तरह के वृद्धों को समाज और भविष्य की चिंता नहीं. उन के पास वक्त कम है. अब तक दुनिया देख वे समझ चुके हैं कि लोगों का काम है कहना, जो वे बदस्तूर करते रहेंगे. दरअसल, इसे वे पत्नी के साथ ज्यादती भी नहीं मानते. उलटे, यह मानते हैं कि पत्नी उन के साथ ज्यादती कर रही है, इसलिए क्यों उसे पैसा दिया जाए.     

परेशानी की इंतहा

जरूरी नहीं कि 60 पार के सभी पति दूसरी महिलाओं पर पैसा उड़ाएं या जिंदगीभर की भड़ास रोमांस कर निकालें, कई मामलों में पत्नियों से परेशान पति ऐसी अजीबोगरीब हरकतें करने को मजबूर हो जाते हैं कि वाकेआ सुन हंसी आती है और तरस भी आता है, खासतौर से उन के बच्चों पर जो उम्र के समीकरणों की चक्की में बेवजह पिसते हैं. 11 सितंबर को भोपाल के कोलार इलाके के 63 वर्षीय रिटायर्ड सरकारी अधिकारी कामता प्रसाद गुप्ता अपनी पत्नी आशा को ले कर जबलपुर जाने को कह कर निकले थे पर जा पहुंचे हमीदिया रोड स्थित एक होटल गोपी में. वहां उन्होंने कमरे में पत्नी को बंद कर उस से तलाक मांगा. आशा के मना करने पर उन्होंने उसे कमरे में बंधक बना लिया. जैसेतैसे इस मामले की जानकारी होटल कर्मचारियों को लगी तो उन्होंने उन के बेटे आलोक को खबर की. इस दौरान होटल कर्मचारियों ने किसी अनहोनी के डर से नजदीकी हनुमानगंज थाने में रिपोर्ट भी लिखा दी. जाहिर है यह धुआं बगैर आग का नहीं था. कामता प्रसाद अपनी पत्नी से परेशान थे. वे उस के साथ लंबा अरसा गुजारने के बाद छुटकारा चाहते थे. इस बाबत उन्होंने अव्यावहारिक तरीका चुना और अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए.

ऐसे मामलों से यह उजागर होता है कि 60 पार के ज्यादातर दंपतियों के बीच सबकुछ ठीकठाक नहीं है. पतिपत्नी के दिलों में एकदूसरे के प्रति भड़ास भरी है. पति चूंकि इस दौर में भी आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भारी पड़ता है इसलिए वह, वह सबकुछ करता है जिस से पत्नी परेशान हो. मुमकिन है यह पूर्व में पत्नी द्वारा की गई ज्यादतियों का बदला हो. पर समाज के लिहाज से बात चिंता की है. सामाजिक बंधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों तले दबे पतिपत्नी एकदूसरे को अरसे तक ढोते रहते हैं और बुढ़ापे में आक्रामक हो कर अलगाव की हद तक आ जाते हैं, यह सब के लिए चिंता का विषय है.

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