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सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ किसान मेले में जुटे देशभर के किसान

सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय परिसर में 5 से 7 अक्तूबर 2016 तक 3 दिवसीय किसान मेला एवं कृषि उद्योग प्रदर्शनी का आयोजन बड़े जोरशोर से किया गया. इस मेले के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि डा. एके सिंह, उपमहानिदेशक कृषि प्रसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली, विशिष्ट अतिथि डा. यूएस गौतम, निदेशक अटारी, कानपुर, मुख्य अतिथि चौधरी शीशपाल सिंह, निदेशक इफको, नई दिल्ली थे. उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गया प्रसाद द्वारा की गई. मंच का संचलान डा. संचान ने किया.

निदेशक प्रसार डा. रघुवीर सिंह ने बताया कि इस सफल मेले के आयोजन के लिए 42 समितियों का गठन किया गया. दूरदराज के जिलों से आए किसानों के लिए गोष्ठी के कार्यक्रम के साथसाथ खेती की नवीनतम तकनीक, अन्न भंडारण, जैविक खेती, संरक्षित खेती, पशुओं के संतुलित आहार, पशुपालन, खादबीज की जानकारी, नईनई मशीनों की जानकारी के लिए लगभग 250 स्टाल लगाए गए थे. मेले में सार्वजनिक एवं निजी संस्थाओं द्वारा अच्छी क्वालिटी के बीज, उर्वरक व कृषि रसायन सही दामों पर किसानों को मुहैया कराए गए थे. अनेक प्रगतिशील किसानों व पशुपालकों को पुरस्कृत भी किया गया.

कृषि वैज्ञानिक डा. अशोक कुमार जो शोध कार्य देखते हैं, ने बताया, ‘हमारे यहां 36 योजनाएं चल रही हैं. धान की सर्वाधिक 18 प्रजातियां विकसित की गई हैं. पपीता के विकास के लिए भी काम हो रहा है. टिश्यूकल्चर और मशरूम पर भी शोध चल रहा है. ऐसी अनेक चीजे हैं, जिन पर हमारे केंद्र पर शोध कार्य चल रहा है, जिन्हें पूरा करने के बाद हम किसानों तक पहुंचा रहे हैं. ‘खाद में बायोफर्जिलाइजर एक ऐसा अंग?है, जिस से खाद की गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं. अच्छा बीज उत्पादन भी हम कर रहे हैं. ऐसे अनेक काम हैं, जिन पर हमारे वैज्ञानिक काम कर रहे हैं.’

डा. एके सिंह, उपमहानिदेशक कृषि प्रसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली ने भी किसानों को संबोधित किया. वे बोले, ‘‘मैं भी किसानों व पशुपालकों को बधाई देना चाहता हूं कि वे किस तरह से अपने बच्चों की तरह पशुओं की देखभाल करते हैं. वे उन के लिए अनमोल हैं. अनेक देशी नस्लें, जो खत्म होने की कगार पर हैं, उन को भी वे जीवित रखे हुए हैं. ‘युवराज’ भैंसे की तरीफ तो हमारे प्रधानमंत्री मोदी भी दिल्ली के पूसा मेले में कर चुके?हैं. दूध के लिए हम पशु तो बाहर से ले आए, लेकिन हमें अपने पशुओं की नस्ल में भी सुधार करना होगा.’ एके सिंह ने प्रधानमंत्री की कई कृषि योजनाओं का भी जिक्र किया और औनलाइन मंडियों की बात की. उन्होंने बताया कि 590 मंडियों में से अभी 90 मंडियों को औनलाइन किया गया है. इस दिशा में और भी काम चल रहा है.

डा. एके सिंह ने आगे कहा कि किसानों को स्वयं सहायता समूह बना कर काम करना होगा, जिस से उन्हें ज्यादा मुनाफा मिलेगा. फूड प्रोसेसिंग के जरीए वे फलों की प्रोसेसिंग कर सकते हैं. यह काम सोसाइटियों द्वारा ही संभव है. बिचौलियों को खत्म कर के यह काम किसानों को खुद करना होगा. मधुमक्खीपालन व पौलीहाउस तकनीक की दिशा में भी काम करना होगा. इस तरह किसान खुद भी काम कर सकेंगे और दूसरों को भी रोजगार दे सकेंगे. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गया प्रसाद ने कहा, ‘मेरे मन में एक विचार था कि एक ऐसे मेले का आयोजन हो जो बहुआयामी हो. जिस में कृषि से संबंधित बात हो, पशुपालन की बात हो, बीज की बात हो, फूड प्रोसेसिंग की बात हो, किसानों की अनेक समस्याओं के लिए 3 दिवसीय गोष्ठी का आयोजन हो, जिस में किसान अपनी बात वैज्ञानिकों के सामने रख सकें. ‘कृषि विज्ञान केंद्र के सभी वैज्ञानिक नई तकनीक, नए तौरतरीके किसानों तक पहुंचाते?हैं. आज 650 से ज्यादा कृषि विज्ञान केंद्र भारत में हैं, जिन को स्थापित करने में डा. एके सिंह का बहुत बड़ा योगदान है.

‘देश में बगैर खेती के खुशहाली नहीं आ सकती. अगर किसान दुखी रहेगा तो देश दुखी रहेगा. खास योजनाएं किसानों के लिए लानी होगी नहीं तो देश संकट में होगा. अनेक कंपनियों पर करोड़ों का कर्ज होता है, लेकिन किसान कुछ लाख के लिए ही परेशान रहते हैं. ‘हमारे देश की जलवायु का परिवर्तन भी बड़ी समस्या है. कब क्या होगा पता नहीं चलता, जिस से किसानों को बहुत नुकसान होता?है, क्योंकि बीज, फसल को उगाने के लिए अनुकूल माहौल चाहिए. इस होने वाले बदलाव के लिए सरकार को समाधान खोजना होगा, जिस से किसानों को नुकसान न हो.

‘जो सामान कारखाने में बनता?है, उस पर सारे टैक्स लगा कर कंपनी उस सामान की कीमत डाल देती है. लेकिन किसान अपने उत्पाद की कीमत भी तय नहीं कर सकता. आज किसानों को एकजुट होना होगा. किसानों को इस के लिए आवाज उठानी होगी. जिस दिन किसान यह कर लेगा, उस दिन उस की समस्या का समाधान हो जाएगा.’ मुख्य अतिथि चौधरी शीशपाल सिंह ने कहा, ‘यहां पर सब किसान हैं और भारत भी किसानों से बसता है. मेले में बहुत अच्छे पशु आए हैं, ये हमारे लिए मौडल हैं. लेकिन मेरे मेरठ हापुड़ से कोई पशु नहीं आया. मैं हरियाणा के लोगों को धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने इतनी अच्छी नस्ल के पशु तैयार किए और मेले में ले कर आए. ‘इफको ने इफको एमसी के नाम से संस्था बनाई है, जो बाजार मूल्य से कम कीमत पर दवाएं मुहैया कराती है. हमारी 35 दवाएं हैं. जिस तरीके से आप इफको खाद पर भरोसा करते?हैं, उसी तरह से हमारी दवाओं पर भी भरोसा कर सकते हैं.’

पशुपालन विशेषज्ञ डा. नाजिम अली ने भी पशुपालकों को कुछ खास जानकारी दी. उन्होंने बताया कि दुधारू पशु से अच्छा दूध उत्पादन उचित आहार से ही संभव है. पशुपालक का 70 से 72 फीसदी खर्च पशु के आहार पर ही होता है. पशु आहार के लिए 5 चीजें जरूर ध्यान में रखें. पहले नंबर पर हरा चारा 1 भाग, दूसरा सूखा चारा ढाई गुना, तीसरा 3 लीटर दूध पर 1 किलोग्राम दाना, चौथा मिनरल मिक्सचर (खनिज लवण) 50 से 100 ग्राम और पांचवां सादा नमक 50 ग्राम. इन चीजों का ध्यान रखें तो पशुपालक अपने दुधारू पशु से अच्छा दूध ले सकते हैं. जब ‘फार्म एन फूड’ की टीम ने मेला प्रांगण में प्रवेश किया, तो विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गया प्रसाद अपने सहयोगी कृषि वैज्ञानिकों के साथ वहां सुबह से ही मौजूद थे, जो अपनी देखरेख में मेले की तैयारी करा रहे थे. हम ने जब उन्हें ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका दी तो उन्होंने पत्रिका के हर पन्ने को बड़े ध्यान से देखा और सराहा. साथ ही पत्रिका की टीम के वहां पहुंचने पर उन्होंने खुशी जाहिर की.

मेले को सफल बनाने के लिए वहां मौजूद निदेशक प्रसार डा. रघुवीर सिंह के साथ डा. पीके सिंह, डा. केजी यादव, डा. आरएस सेंगर, डा. प्रवीन कुमार सिंह, डा. ऋषिपाल, डा. सर्वेश कुमार लौधी, डा. हरिओम कटियार, डा. मुकेश कुमार, ?डा. डीवी सिंह, डा. सत्यप्रकाश, डा. एसके त्रिपाठी, डा. हेम सिंह और कृषि विज्ञान केंद्र मुरादनगर के कृषि वैज्ञानिक डा. हंसराज सिंह, डा. विपिन कुमार, डा. अनंत कुमार सहित अनेक कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे.

मेले के मुख्य आकर्षण

पशु प्रदर्शनी : मेले में पशु प्रदर्शनी पर खासा जोर था. दुनियाभर में नाम कमा चुका मुर्रा नस्ल का भैंसा ‘युवराज’ भी वहां मौजूद था. उस के साथ उस से पैदा हुए अनेक युवा कटड़े और कटिया भी थे. ‘युवराज’ के मालिक कर्मवीर ने बताया कि इस समय इस की कीमत सवा 9 करोड़ रुपए है और इस के सीमन के 1 डोज की कीमत 300 रुपए है. ‘युवराज’ पर

1 महीने में होने वाला खर्च तकरीबन डेढ़ लाख रुपए है. एक बार फिर ‘युवराज’ ने अपनी बादशाहत कायम रखते हुए चैंपियन का खिताब जीता. गांव बुड्ढा खेड़ा, जिला कैथल, हरियाणा के नरेश बेनीवाल भी अपना भैंसा ले कर आए थे, जिस का नाम ‘सुलतान’ था, जो उन के लिए अनमोल है. वे सालभर में उस की देखरेख पर लगभग 5 लाख रुपए खर्च करते?हैं. नरेश बेनीवाल का कहना है कि उन के इस मुर्रा भैंसे की ऊंचाई और लंबाई पूरे भारत में सब से ज्यादा है. नरेश बेनीवाल को भी ‘सुलतान’ के लिए सम्मानित किया गया. इस के अलावा अनेक पशुपालक अपने बैल, सांड़, घोड़ा, भैंस और देशीविदेशी नस्ल के अनेक पशुओं को प्रदर्शनी में लाए थे. कई लोग तो पशुओं के हज्जाम भी साथ लाए थे, जो उन की वहीं पर हजामत और तेल मालिश भी कर रहे थे.

लोकसंगीत कार्यक्रम का जलवा

मेहमानों का स्वागत करने के लिए लोक कलाकार भी वहां मौजूद थे, जो अपने वाद्य यंत्रों से उन का स्वागत कर रहे थे और मेले की रौनक बढ़ा रहे थे. मेले में किसानों के मनोरंजन के लिए कवि सम्मेलन के अलावा रागिनी का भी आयोजन किया गया था. लोकसंगीत कार्यक्रम (रागिनी) आकाशवाणी दिल्ली के कलाकारों द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में नई दिल्ली की रागिनी कलाकार मंजू शर्मा मौजूद थीं. उन के साथ ही ब्रह्मपाल नागर और उन के साथी भी थे.

खाद्य एवं पोषण विभाग द्वारा भी स्टाल

इस मेले में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत खाद्य एवं पोषण विभाग द्वारा भी स्टाल लगाया गया, जिस में बाजरे से बने स्वादिष्ठ खाद पदार्थ बिसकुट, केक, लड्डू आदि का प्रदर्शन किया गया. स्टाल पर मौजूद डा. वीनू सागवान लोगों को बाजरे के प्रति जागरूक कर रही थीं. वे बता रही थीं कि खून बढ़ाने से ले कर स्वास्थ्य की दृष्टि से बाजरा बहुत ही फायदेमंद अनाज?है. आज हमारे किसान पारंपरिक अनाज की खेती को छोड़ कर दूसरी दिशा की ओर रुख कर रहे हैं. उन्हें फिर से इस दिशा की ओर काम करना होगा. उन्होंने आगे बताया कि हमारे अनेक पारंपरिक खाद्यान ऐसे?हैं, जिन से अनेक प्रकार की पौष्टिक चीजें बनाई जा सकती हैं और उन्हें बेच कर अच्छा मुनाफा भी कमाया जा सकता है. हमारा केंद्र इस दिशा में समयसमय पर ट्रेनिंग का आयोजन भी करता है, जो कुछ दिनों की होती है.

नीबू वर्गीय फलों की प्रोसेसिंग से करें कमाई

अपने देश में फल उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है. नीबू का सब से ज्यादा उत्पादन भारत में होता?है. इस के अलावा नारंगी, माल्टा, मौसमी, चकोतरे, किन्नू व संतरे आदि रसदार खट्टेमीठे फलों का भी खूब उत्पादन होता है. पूरी दुनिया में नीबू वर्गीय फलों के उत्पादन में अमेरिका व ब्राजील सब से आगे हैं. भारत के 9 लाख, 89 हजार हेक्टेयर रकबे में हर साल करीब 96 लाख 39 हजार टन नीबू वर्गीय फलों की पैदावार होती है, लेकिन उस से भरपूर मुनाफा कारोबारी ही कमाते?हैं.

यह सच है कि फल उगाने वालों को उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती. इस का एक बड़ा कारण यह है कि खेती में बढ़त के बाद भी ज्यादातर किसान आज भी तालीम, हुनर व जानकारी से दूर हैं. वे फलों की तोड़ाई के बाद की तकनीक से वाकिफ नहीं?हैं. इसीलिए अपने देश में कुल फल उपज के बहुत कम हिस्से की प्रोसेसिंग होती?है, जबकि अमीर देशों में उगाओ, प्रोसेस करो व अमीर बनो पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा हमारे देश में पेड़ लगाने से ले कर फलों की तोड़ाई तक में आज?भी पुराने तौरतरीके इस्तेमाल होते हैं. इस से फलों की ग्रेडिंग, पैकिंग, ढुलाई, उतराई, भंडारण व रखरखाव आदि में समय, पैसा व मेहनत ज्यादा लगती है. कमियों की वजह से उगाने से खाने तक की चेन में काफी फल सड़ कर खराब हो जाते?हैं. इसलिए पैसे का बहुत नुकसान होता है व गंदगी बढ़ती है.

तकनीक से उठाएं फायदा

किसान तकनीक सीख कर यदि इन फलों की प्रोसेसिंग इकाइयां लगा लें व बागों के पास ही जूस आदि पैक करने लगें तो नुकसान को घटा कर खेती से?ज्यादा कमा सकते?हैं. तकनीकी जानकारी देने के लिए किसान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने लुधियाना, पंजाब में एक रिसर्च स्टेशन चला रखा?है. इस का नाम?है कटाई उपरांत तकनीक का केंद्रीय अनुसंधान संस्थान. इस में फलों व सब्जियों की प्रोसेसिंग, नुकसान घटाने व कीमत बढ़ाने का सैक्शन है. इस के अलावा अबोहर, पंजाब में इस का एक फल सेंटर अलग है. खानेपीने की चीजें बनाने की तकनीक मुहैया कराने के लिए वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद, सीएसआईआर का एक रिसर्च सेंटर मैसूर में चल रहा है. इस का नाम?है केंद्रीय खाद्य प्रोद्यौगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई). फलों का जूस निकालने की नई, सही व पूरी तकनीकी जानकारी यहां से भी ली जा सकती?है.

गौरतलब है कि देश भर में नीबू, मौसमी व संतरे आदि का इस्तेमाल ताजा जूस निकाल कर पीने में ज्यादा व डब्बाबंदी में बहुत कम होता है. इसलिए प्रोसेसिंग के काम में काफी गुंजाइश बाकी?है. आमतौर पर नीबू वर्गीय फलों का जूस ज्यादा निकाला जाता है, लेकिन अब कंसंट्रेट, पल्प, प्यूरी, नैक्टर, ठंडा पेय, स्प्रेड बेकरी व कन्फेक्शनरी में काम आने वाले सीरप और खुशबूदार तेल आदि उत्पाद बनाने की तकनीकें भी मौजूद हैं.

लिहाजा किसान फलों से कई तरह के उत्पाद बना कर व उन्हें बेच कर फायदा उठा सकते?हैं, बशर्ते सावधानी यह बरती जाए कि मशीनें आधुनिक व इंतजाम बेहतर हों ताकि फलों से जूस ज्यादा से ज्यादा निकले, उस में कोई रिसाव न हो. साथ ही इस बात का भी खयाल रखें कि प्रोसेसिंग के बाद बचा फलों का कचरा बेकार न जाए व उस का भी इस्तेमाल हो जाए.

सहायक रोजगार का मौका

नई तकनीक से जूस निकालने के बाद बचा फलों का कचरा परफ्यूमरी उद्योग, एथनाल बनाने व ईंधन के तौर पर जलाने आदि में काम आ जाता?है. इसलिए गंदगी बढ़ने या निबटान में दिक्कत होने का खतरा नहीं रहता. कचरे की भी कीमत मिलने से उत्पादन लागत घटती है. इसलिए किसानों को इस मोरचे पर आगे आना चाहिए और अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर इस काम में लगाना चाहिए. फलों का जूस निकालने में देशीविदेशी बड़ी कंपनियां ज्यादा हैं. इसलिए गांवों व कसबों में ही जूस आदि की बेतलबंदी या केनिंग करने की छोटी व मंझोली इकाइयां लगाई जा सकती?हैं. ज्यादातर फल उत्पादक फसल पकने से पहले ही बाग बेच देते?हैं, इसलिए उन्हें कीमत जल्दी, लेकिन कम मिलती है. जो किसान फसल पकने पर खुद मंडी ले जाते?हैं, उन्हें कीमत ज्यादा मिलती है, लेकिन खुद उपज की प्रोसेसिंग करने वाले सब से ज्यादा कीमत पाते?हैं.

ऐसा करें किसान

फल उत्पादकों के लिए प्रोसेसिंग करना मुश्किल नहीं है. सब से पहला व जरूरी कदम?है यह काम सीखने का, इसलिए पूरी ट्रेनिंग लें. राज्य सरकारों के उद्यान एवं फल संरक्षण महकमों ने अपने ट्रेनिंग सेंटर खोल रखे हैं. इस के अलावा किसी जूस फैक्ट्री में भी काम सीख सकते हैं. फलों का जूस आदि निकालने की अपनी इकाई लगाने से पहले कच्चे माल, पूंजी, मशीन, उत्पादन, पैकेजिंग, बिक्री वगैरह पहलुओं के बारे में पूरी जानकारी हासिल करना जरूरी है. इसलिए जिले के उद्योग या ग्रामोद्योग महकमे के मुलाजिमों से मिलें. अपनी कूवत के मुताबिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाएं, जिस में इकाई लगाने व चलाने का अंदाजा लगाया जाता है. प्रोजेक्ट रिपोर्ट, ट्रेनिंग, मशीनों व लाइसेंस वगैरह की कागजी खानापूरी के लिए मशहूर अर्धसरकारी संगठन उद्यमिता विकास संस्थान, सेडमैप,?भोपाल, मध्य प्रदेश से भी संपर्क किया जा सकता है.

छूट न जाएं जरूरी बातें

जूस आदि की बोतलबंदी करने के लिए फूड प्रिजर्वेशन और्डर (एफपीओ) के तहत केंद्र सरकार की एजेंसी एफएसएसएआई से जरूरी लाइसेंस के लिए अर्जी दे कर मंजूरी लेनी होती?है. इस के अलावा बाजार में जमे दूसरे उत्पादकों से टक्कर लेने के लिए अपने ब्रांड का नाम तय करें. पहचान बनाने के लिए मोनोग्राम बनवाएं व उपभोक्ताओं तक पैठ बनाने के लिए इश्तेहार का सटीक मैटर खुद बनाएं या माहिरों से तैयार कराएं.

फिर नंबर आता है पूंजी के इंतजाम का. ग्रामोद्योग बोर्ड, खादी आयोग या लघु कृषक व्यापार संगठन सफाक नई दिल्ली की मदद से छूट व रिआयती ब्याज दरों पर कर्ज मिल जाता?है. खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही स्कीमों का भी फायदा उठाया जा सकता?है. किसान अकेले, मिल कर, स्वयं सहायता समूह, साझेदारी फर्म, सहकारी संस्था या फिर कंपनी बना इकाई लगा सकते?हैं. इफको, कृभको, कैंपको व अमूल आदि की तरह किसान जूस बौटलिंग के बड़े सहकारी कारखाने भी लगा सकते हैं.

इस काम में पैकिंग की अहमियत सब से ज्यादा होती है. साइज, मांग, कूवत व सहूलियत के मुताबिक छोटेबड़े साइज में?टेट्रा पैक, अल्यूमिनियम केन, पाउच व बोतल आदि में पैकिंग की जा सकती है. अब ऐसी आटोमैटिक मशीनें बाजार में आ गई हैं, जिन में एक बार फल अंदर डाल देने के बाद उन की धुलाई, पुंछाई, छिलाई, पेराई, छनाई, पकाई के बाद पैकेजिंग तक का सारा काम हो जाता?है. इस बारे में भारतीय पैकेजिंग तकनीक संस्थान, मुंबई के माहिरों से मशविरा किया जा सकता है. फलों के जूस निकालने में काम आने वाली मशीनों के बारे में जानकारी के लिए किसान मै. सन टैक इंजीनियरिंग, प्लाट 149, बीएन रेड्डी नगर, चेरलापैल्ली, हैदराबाद 500055, फोन 914027260958 या मै. न्यू?टैक इंजीनियरिंग प्रा. लि. 34 एचएसआई  आईडीसी, फूड पार्क, साहा, अंबाला 134003, फोन 911712622700 से संपर्क कर सकते हैं.

नीबू वर्गीय फलों के जूस की बिक्री के लिए बाजार की कमी नहीं?है. बस क्वालिटी उम्दा, कीमत वाजिब व पैकिंग बेहतर हो तो माल भारत के अलावा दूसरे देशों को?भी भेजा जा सकता है. फलों से बने उत्पादों का निर्यात करने के लिए कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण नई दिल्ली (एपीडा) में रजिस्ट्रेशन कराना होता?है. यदि उत्पाद आरगैनिक हो, बगैर प्रिजर्वेटिव व बनावटी रंग से तैयार किया गया हो, तो सोने में सुहागा साबित हो सकता?है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नीबू वर्गीय फलों के सभी अहम पहलुओं पर खोजबीन कर रही?है. साल 1986 से नागपुर में इस के लिए एक अलग रिसर्च स्टेशन है. वहां के माहिरों ने कम वक्त में, कम लागत से बेहतर क्वालिटी के फलों का भरपूर उत्पादन लेने, सुधरे तरीकों से हैंडलिंग,?भंडारण, ब्रीडिंग, टिश्यू कल्चर व पोस्ट हार्वेस्ट तकनीक आदि पर बहुत काम किया है. उन्नत किस्मों के बीज, पौध, नर्सरी व बोआई तकनीक आदि की ज्यादा जानकारी करने के इच्छुक किसान इस संस्थान से निम्न पते पर संपर्क कर के लाभ उठा सकते?हैं:

निदेशक

केंद्रीय नीबू वर्गीय फल अनुसंधान संस्थान, अमरावती रोड, नागपुर 440033, फोन : 0712-25008130712.

लकड़ीकंडा जलाने पर भी आंखें रहेंगी महफूज

इंडक्शन कुकर और गैस के चूल्हे इस्तेमाल करने वाले लोग और किसी ईंधन के बारे में सोच भी नहीं पाते, मगर आज भी गांवों में लकड़ीकंडे वगैरह का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है. जलावन जलाने वालों के लिए पेश है ऐसा चूल्हा, जो उन की आंखें सही रखेगा. हालांकि आजकल ज्यादातर घरों में गैस से जलने वाले चूल्हों पर ही खाना पकाया जाता है, बल्कि इंडक्शन कुकर पर खाना पकाने का रिवाज भी लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इस के बावजूद हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी आज भी खाना पकाने के लिए लकड़ी, कंडे, कोयले वगैरह का ही इस्तेमाल करती है. गांवों व छोटे कसबों में मिट्टी के तेल यानी केरोसीन से जलने वाले स्टोव भी बाकायदा इस्तेमाल किए जाते?हैं.

यकीनन लकड़ी, कंडे, कोयले या बुरादे का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर पुराने जमाने से होता आ रहा है. नए जमाने के आधुनिक बच्चों के दादादादी वगैरह भी अपने वक्त में लकड़ी, कंडे या कोयले आदि का इस्तेमाल कर चुके?हैं, बल्कि तमाम बुजुर्ग तो आजकल भी सर्दियों में कच्चे या पक्के कोयले की अंगीठियां जलवा कर आग तापना पसंद करते हैं. लकड़ी, कंडे व कोयले वगैरह को मोटे तौर पर जलावन कहा जाता है और इस जलावन का पहले तो हर घर में इस्तेमाल होता था और आजकल भी भारत के तमाम घरों में होता है. इस जलावन से खाना पकाने वाली महिलाएं इस के धुएं से बहुत दुखी रहती?हैं. जलावन का धुंआ आंखों में जलन व कड़वाहट पैदा कर देता?है. चूंकि महिलाएं ही अमूमन खाना पकाती हैं, इसलिए उन के दर्द की बात कही गई?है, वैसे जलावन इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति इस के धुएं व तकलीफ से बच नहीं पाता.

मगर अब इस तकलीफ के दिन लद चुके?हैं. अब जलावन का इस्तेमाल कर के खाना बनाने वाली औरतों की आंखों को धुंए के कहर को नहीं झेलना पड़ेगा. धुंए की वजह से उन की आंखों में जलन व कड़वाहट नहीं पैदा होगी. कार्बन उत्सर्जन में कमी होने से खाना पकाने वाली महिलाओं की सेहत के साथसाथ पर्यावरण की हालत भी दुरुस्त रहेगी.

उन्नत चूल्हा

जलावन जलाने वाली महिलाओं और पर्यावरण की सहायता के लिए ‘नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय’ (एमएनआरई) की मदद से एक बेहद उन्नत चूल्हा बनाया गया है. इस उन्नत चूल्हे की खासीयत यह?है कि लकड़ी, कंडे व कोयले वगैरह का इस्तेमाल करने पर भी इस से धुंआ नहीं निकलता है. गांवों की औरतें जंगलों से बीनी गई लकडि़यों और गोबर से बनाए गए कंडों यानी उपलों से ही ज्यादातर ईंधन का काम चलाती?हैं. ऐसे में यह चूल्हा उन्हें बहुत राहत देगा. मिट्टी के साधारण चूल्हे या ईंटों से बनाए गए अस्थायी चूल्हे में जब लकड़ीकंडे जलाए जाते हैं तो भरपूर मात्रा में काला व खतरनाक सा धुंआ निकलता है, मगर उन्नत चूल्हे में ऐसा नहीं होता है. उन्नत चूल्हे का इस्तेमाल गांवों की शादियों जैसे मौकों पर भी किया जा सकता?है, जहां लकड़ीकंडे व कोयले वगैरह का इस्तेमाल कर के सैकड़ों लोगों का खाना पकाया जाता है. गांवों के होटलों, ढाबों व सामुदायिक भवनों में भी इस चूल्हे को इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि इन जगहों पर भी जलावन का इस्तेमाल कर के काफी लोगों का खाना पकाया जाता है.

उन्नत चूल्हे की खासीयत

उन्नत चूल्हे की स्कीम से जुड़े एमएनआरई में काम करने वाले एक अफसर के मुताबिक सामान्य चूल्हे में आक्सीजन की मात्रा जरूरत लायक नहीं होती, लिहाजा लकड़ी पूरी तरह से नहीं जल पाती?है, नतीजतन धुआं ज्यादा पैदा होता है. एमएनआरई के अफसर ने बताया कि उन्नत चूल्हे को इस तरह से बनाया गया?है कि उस में आक्सीजन पूरी मिलने से लकड़ी सही तरीके से जलती?है, लिहाजा साधारण चूल्हे के मुकाबले इस चूल्हे से कार्बन का उत्सर्जन 50 फीसदी कम होता है. चूंकि उन्नत चूल्हे से धुआं बेहद कम निकलता है, लिहाजा नुकसान करने वाले तत्त्व भी बहुत कम हो जाते?हैं. इसी वजह से उन्नत चूल्हा इस्तेमाल करने वाली औरतों को आंखों में किसी किस्म की तकलीफ महसूस नहीं होती. एमएनआरई के अफसर ने बताया कि उन्नत चूल्हे 2 किस्म के होते?हैं. पहली प्रकार के चूल्हों में कार्बन का उत्सर्जन पुराने चूल्हों के मुकाबले 50 फीसदी ही कम होता है, जबकि दूसरी प्रकार के चूल्हे और दमदार होते?हैं. दूसरी किस्म के चूल्हे के चेंबर में छोटा पंखा लगा होता है. इस चूल्हे से पुराने चूल्हों की तुलना में 80-90 फीसदी तक कम कार्बन निकलता है.

एमएनआरई के अफसर ने बताया कि उन्नत चूल्हे की कीमत उस के साइज व कूवत के हिसाब से 1000 से 3000 रुपए के बीच है. इस की खरीदारी के लिए मंत्रालय माइक्रो फाइनेंसिंग करने पर विचार कर रहा?है. मंत्रालय ने यह बात साफ कर दी?है कि इस कारगर चूल्हे को मुफ्त में बांटे जाने की फिलहाल कोई योजना नहीं?है. मंत्रालय भी इस हकीकत को मानता है कि खाना पकाने के दौरान मामूली चूल्हे के धुएं से महिलाओं की आंखें खराब हो जाती हैं और उन्हें तमाम बीमारियां भी हो जाती हैं. अब उन्नत चूल्हे के इस्तेमाल से महिलाओं की सेहत दुरुस्त रहेगी. इस के अलावा कार्बन कम निकलने से यह उन्नत चूल्हा पर्यावरण के लिए भी मुफीद रहेगा. काबिलेगौर है कि गांवों के 84 फीसदी घरों में खाना पकाने के लिए जलावन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. अब इस उन्नत चूल्हे की वजह से गांवों की नाजुक गोरियों को अपनी खूबसूरत आंखों से आंसू नहीं बहाने पडेंगे.

गन्ना उपज में कमी की वजहें व ज्यादा उपज लेने के सुझाव

इन दिनों कई जगहों पर गन्ने की उपज में गिरावट दर्ज की जा रही?है. इस की कई वजहें?हैं, जिन का यहां जिक्र किया जा रहा?है:

गेहूं काट कर देर से गन्ने की बोआई करना : गेहूं काटने के बाद गन्ना बोने में होने वाली देरी से नजात पाने के लिए किसान लाइन छोड़ कर पौधे लगाने के तरीके से गन्ने की बोआई कर के गन्न्ना फसल से पूरा फायदा ले सकते हैं. इस तरीके का इस्तेमाल करने के लिए किसान गेहूं की बोआई लाइन में सीडड्रिल से करें और गेहूं की 4 लाइनों के बाद 2 लाइनों की बोआई न करें. इस के लिए सीडड्रिल में इस तरह का इंतजाम करें कि 4 लाइनों के बाद 2 लाइनों में बीज न गिरें और इस तरह 2 लाइनों की खाली पड़ी जगह में मौसम के तापमान के अनुसार जनवरी के आखिर से 15 फरवरी तक फावड़े से गन्ने की बोआई करें. ध्यान रहे कि गेहूं की फसल को नुकसान न पहुंचे. छोटे व सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक बहुत कारगर है, क्योंकि इस तकनीक से गन्ने की बोआई समय से की जा सकती है.

बीज उपचार किए बिना गन्ने की बोआई करना : गन्ने में लगने वाली ज्यादातर बीमारियों को बीज उपचार से आसानी से दूर किया जा सकता है, जबकि खड़ी फसल में इन का नियंत्रण करना मुश्किल होता है, इसलिए बीज से होने वाली बीमारियों व कीटों की रोकथाम के लिए बीज उपचार जरूर करें.

इस के लिए किसान फफूंदीनाशक कार्बंडाजिम 200 ग्राम और कीटनाशक इमिडाक्लोरप्रिड 50 मिलीलीटर को 100 लीटर पानी में घोल कर टुकड़ों को 10-15 मिनट तक डुबो कर उपचारित करें और जरूरत के हिसाब से इसी अनुपात में घोल बना कर उपचारित करते रहें. यदि बोआई के दिन काम ज्यादा हो तो यह काम 1 दिन पहले शाम को कर सकते हैं. आजकल कुछ चीनी मिलें मुफ्त में गरमनम तापमान द्वारा गन्ने के बीज उपचारित कर के किसानों को देती हैं. यह बीज उपचार के लिए अच्छी तकनीक है.

बोआई के समय खेत में नमी की कमी होना : जब बोआई कर रहे हों तो नाली में टुकड़ों को ज्यादा देर तक खुला न छोड़ें. बोआई के तुरंत बाद फावड़े से मिट्टी की हलकी परत से ढक दें. ज्यादा देर तक टुकड़ों को तेज धूप में खुला छोड़ने से टुकड़ों में पानी की मात्रा कम हो जाती है, जिस से जमाव प्रभावित होता है.

ट्रैंच विधि से बोआई करने पर मिट्टी में नमी की कमी होने पर बोआई का काम पूरा होने के तुरंत बाद नालियों में हलकी सिंचाई कर देने से यह समस्या दूर हो जाती है.

पाटा लगा कर गहराई में गन्ने के बीजों को दबा देने से जमाव में कमी आना : खेत में बोए गए बीजों के ऊपर कभी भी मिट्टी की ज्यादा मोटी परत नहीं डालनी चाहिए न ही पाटा लगा कर मिट्टी को दबाना चाहिए. ऐसा करने पर नए कोमल कल्लों को बाहर निकलने में ज्यादा ताकत खर्च करनी पड़ती है.

जमाव में कमी के कारण प्रति इकाई रकबे पौधों का कम संख्या में बनना : जिस खेत से बीज लेना हो उस खेत की बोआई से 8-10 दिनों पहले सिंचाई कर दें और साथ ही 5-8 किलोग्राम जमावर्धक यूरिया प्रति बीघा की दर से खेत में छिड़क दें ताकि गन्ने में मिठास कम हो जाए और पानी की मात्रा बढ़ जाए यानी सुक्रोज का ग्लूकोज में परिवर्तन हो जाए, क्योंकि ग्लूकोज जमाव फीसदी  को बढ़ाता है, जबकि सुक्रोज जमाव को कम करता है. यदि ऐसा नहीं कर पाए हों तो बीज के टुकड़ों को यूरिया के 2 फीसदी घोल से उपचारित जरूर कर लें. 2 आंख वाले टुकड़ों का बोआई में इस्तेमाल करें और टुकड़ों को कूंड़ में इस तरह रखें कि गन्ने की आंख नीचे की तरफ न रहे. इन बातों का ध्यान रखने पर जमाव अच्छा होगा और पौधों की संख्या बढ़ेगी.

देर से बोआई करने पर कम समय मिलने के कारण प्रति इकाई रकबे कम संख्या में मिल लायक गन्नों का बनना :देर से बोआई की स्थिति में किसान पहले से नर्सरी तैयार कर के खेत में सीधी रोपाई कर के जमाव में लगने वाले समय को बचा कर प्रति इकाई रकबे में कल्लों की संख्या बढ़ा सकते हैं या लाइन छोड़ कर पेड़ लगाने के तरीके से गन्ने की बोआई गेहूं की खड़ी फसल में कर के कल्लों की संख्या बढ़ा सकते हैं.

गन्ने के खेत की गहरी जुताई न करना : आजकल रोटावेटर का ज्यादा इस्तेमाल होने की वजह से किसान गन्ने के खेत की गहरी जुताई नहीं कर पाते हैं, जबकि गन्ने की अच्छी उपज लेने के लिए एक जुताई 9-10 इंच गहराई तक करना जरूरी होता है.

प्रति गन्ना कम वजन का होना : खेत में सही मात्रा में पोषक तत्त्वों की आपूर्ति और सही सिंचाई का इंतजाम करें. साथ ही ध्यान रखें कि 2 लाइनों के बीच की दूरी कम से कम 90 सेंटीमीटर जरूर हो, जिस से खेत को हवा व रोशनी सही तरीके से मिल सके.

हवा व रोशनी मिलने से पौधों में संश्लेषण की क्रिया सही तरीके से होती है, जिस से फसल की बढ़वार अच्छी होती है और गन्ने का वजन बढ़ता है.

गन्ना बोते समय जल्दीबाजी करना : गन्ना बोते समय मजदूरों की कमी या प्लानिंग में कमी के कारण किसान बोआई की सही तकनीक नहीं अपनाते जैसे अधिक लंबे बीज टुकड़ों का बोआई में इस्तेमाल करना, तेज धूप में टुकड़ों को बिना मिट्टी ढके देर तक खुला छोड़ देना, कुंद धार वाले गंड़ासे से बीज काटना वगैरह या यों कहें कि किसान इस बात का ध्यान नहीं रख पाते कि जिस खेत में वे गन्ना बो रहे हैं वह खेत कम से कम 2 सालों के लिए बोया जा रहा है, इस के लिए किसान गन्ना बोते समय सावधानी बरतें.

बोआई के लिए इन बातों का खयाल रखें कि उन के पास कितने मजदूर हैं, कितने रकबे में गन्ना बोना है, बोआई के लिए बीज कितनी दूर से लाने हैं, बीज काटने के लिए गंड़ासे पर धार है या नहीं.

जो किसान देर से गन्ना बोते हैं उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि देर से गन्ना बोने पर प्रति इकाई रकबा उपज बहुत कम मिलती है. 1 हेक्टेयर से औसतन 450 क्विंटल गन्ना उपज मुश्किल से मिल पाती है, जबकि 1 हेक्टेयर की औसत उत्पादन लागत लगभग 1,00,000 रुपए है और 450 क्विंटल गन्ने की कीमत करीब 1,21,500 रुपए होती है, जिस में से उत्पादन लागत घटाने पर 1 साल में मात्र 21,500 रुपए फायदा मिलता है.

ऐसे में किसानों को सलाह दी जाती है कि वे गेहूं वाले खेत में गन्ना फसल न ले कर किसी दूसरी फसल का चुनाव करें.

उदाहरण के तौर पर आप गेहूं के बाद अपने खेत में ढैंचा की बोआई करें. उस के बाद धान की फसल लें. धान के बाद सरसों या आलू की फसल लें. उस के बाद कम समय वाली सरसों या आलू काट कर गन्ने की बोआई करें.

ढैंचा लेने से आप के खेत की उर्वरता बढ़ेगी, मिट्टी की भौतिक व रासायनिक दशाओं में सुधार होगा. धान की फसल यदि 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिल गई तो आप को मोटे तौर पर 67500 रुपए मिलेंगे. उत्पादन लागत 40,000 रुपए प्रति हेक्टेयर काट कर शुद्ध लाभ 27,500 रुपए होग. सरसों यदि 10 क्विंटल भी मिल गई तो मोटे तौर पर 40,000 रुपए की आमदनी होगी. यदि लागत 15,000 रुपए आई तो शुद्ध लाभ 25,000 रुपए होगा. इस के अलावा फसलचक्र का लाभ अलग से होगा. किसान चाहे तो स्किप रो प्लांटिंग मैथड से गन्ने की बोआई करें या जिस खेत में गन्ना बोना है, उस में रबी की फसल काटने के बाद ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर के खेत का सौरीकरण करें और उस में ढैंचे की हरी खाद लें. उस के बाद हरी खाद को खेत में पलट कर अच्छी तरह मिलाएं. सितंबर के पहले हफ्ते में तापमान का खयाल रखते हुए गन्ने की बोआई करें. इस समय बोए गए गन्ने का जमाव अच्छा होता है और बढ़वार तेज गति से होती है. अच्छी तरह से देखभाल कर के बोए गए गन्ने से अगले साल फरवरी महीने में औसतन 1000-1200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से उपज ली जा सकती है.

अपने खेतों तक ऐसे पहुंचाएं नहरों का पानी

अकसर किसान इस बात को ले कर परेशान रहते हैं कि नहरों का पानी सही तरीके से और पूरी मात्रा में उन के खेतों तक नहीं पहुंच पाता है. इस के लिए सरकार पर आरोप लगा कर किसान खुद हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं. वे अपनी मेहनत और पूंजी को बरबाद होता देखते रहते हैं. किसानों के लिए जरूरी है कि वे नहरों के पानी का सही इस्तेमाल करने के तरीके से खुद वाकिफ हों. नहर जल प्रबंधन सीख कर किसान अपने खेतों तक भरपूर पानी पहुंचा सकते हैं.

कृषि वैज्ञानिक वेद नारायण बताते हैं कि नहरों में छोड़े गए पानी का कुछ हिस्सा जमीन सोख लेती है और कुछ नहरों की दोनों तरफ की जमीन पर फैल जाता है. जब पानी नहर से सहायक नहर या आउटलेट वगैरह से गुजरता हुआ खेत तक पहुंचता है, तब तक उस का एकतिहाई हिस्सा ही बचता है. यही पानी खेतों को मिलता है और बाकी बरबाद हो जाता है. किसान अगर नहर के पानी का प्रबंधन सीख लें, तो वे अपनी मेहनत और पूंजी से कई गुना ज्यादा फसल उपजा सकते हैं.

क्यों होता है ऐसा

नहर या आउटलेट में पानी का बहाव इसलिए कम हो जाता है, क्योंकि उस के मुहाने पर खरपतवार उग आते हैं, जिस से वहां काफी सिल्ट जमा हो जाती है. अकसर यह देखा गया है कि उपवितरणी पर लगे फाटक को हटा देने से पानी बेकाबू हो जाता है. साथ ही आउटलेट पर पानी को काबू करने का कोई तरीका नहीं होता है. किसान बालू से भरे बोरों, मिट्टी व घास आदि से आउटलेट को बंद करने की कोशिश करते हैं, पर पानी का रिसाव नहीं रुकता है. टूटे हुए आउटलेटों की मरम्मत करने का काम हमेशा नहीं किया जाता है.

कई किसान नहर में रुकावट लगा कर पानी के लेवल को ऊंचा कर लेते हैं, ताकि पानी उन के खेतों तक आसानी से पहुंच सके. खेतों की सिंचाई होने के बाद भी किसान रुकावट को हटाते नहीं हैं, जिस से निचले भाग के खेतों को पानी नहीं मिल पाता है. इस वजह से अकसर किसानों के बीच झगड़े होते रहते हैं.

ऐसे दूर करें परेशानी

नहर क्षेत्र में पड़ने वाले सभी गांवों के किसानों को चाहिए कि वे एक समिति बना लें और उस के कुछ सदस्यों का आउटलेट और वितरणी प्रबंधन समूह बना लें, जो नहर से जुड़ी समस्याओं को दूर करे और पानी के गलत इस्तेमाल पर नजर रखे. इस से हर खेत को पानी मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी. सभी सदस्य इस बात का खयाल रखें कि नहर के आउटलेट की सफाई होती रहे. किसानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने खेतों की सिंचाई करने के बाद वितरणी से रुकावट हटा दें, ताकि निचले हिस्से के खेतों को पानी मिलने में कोई परेशानी न हो. आमतौर पर यह देखा जाता है कि किसान खेत से खेत सिंचाई करते हैं. इस के बजाय नाली बना कर खेतों तक पानी पहुंचाने की कोशिश करें, इस से पानी और समय दोनों की बचत होगी और दूसरे किसानों को भी पूरा पानी मिल सकेगा. किसानों को ऊपरी, मध्य और निचले भाग में रोपनी 1-1 हफ्ते के अंतर पर करनी चाहिए. ऐसा करने से नहर का पानी और मजदूर सभी खेतों को उपलब्ध हो सकते हैं.

वितरणी समूह के सदस्यों को चाहिए कि वे अपनेअपने इलाकों में पानी की जरूरतों का अनुमान लगा कर नहर अफसरों को बताएं और उन से यह जानकारी लेते रहें कि नहर से कब और कितना पानी मिल सकेगा.              ठ्

नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस रोग

नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस रोग अकसर हो जाता है. गमोसिस पौधों में कई तरह की वजहों से हो सकता है, जिन में तत्त्वों की कमी, फफूंदी, शाकाणुओं विषाणुओं का प्रकोप मुख्य हैं. फाइटोफ्थोरा नाम के फफूंद से नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस (गोंदाति रोग) होता है, इसे भूरा सड़न, गमोसिस पद सड़न, कौलर रोट, जड़ सड़न, फल सड़न जैसे कई नामों से जाना जाता है. यह रोग महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मैसूर, असम, पंजाब राजस्थान के कई भागों में पाया जाता है. यदि समय पर रोग की रोकथाम की जाए तो पौधा मर जाता है.

 रोग के लक्षण : गमोसिस खासतौर से तने शाखाओं पर लगने वाली बीमारी है. रोग लगे पौधे के हिस्सों से गोंद का निकलना ही इस का मुख्य लक्षण है. सब से पहले रोग का असर पौधे के तने के निचले भाग पर जमीन से लगने वाले हिस्से के पास होता है, फिर चारों तरफ फैल कर नीचे जड़ तने की तरफ बढ़ता है, जिस से छाल लकड़ी दोनों ग्रसित होते हैं. बारिश के मौसम में गोंद पानी से धुल कर नीचे गिर जाता है और जमीन से मिल जाता है, इसलिए लक्षण साफ नहीं दिखाई पड़ते हैं. गरमी में रोग लगे हिस्से पर गोंद का इकट्ठा होना रोग के लक्षण को साफ दर्शाता है. रोग लगे तने शाखाओं पर छिलका फट जाता है और सूख जाता है. इन फटी हुई धारियों में से गोंद निकलता है. यदि रोग का असर जमीन के अंदर जड़ पर होता है, तो रोग के लक्षण शुरू में दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन जड़ गलने से जड़ों का काफी हिस्सा बेकार हो जाता है. मुख्य तने जड़ों पर इस रोग के असर से पेड़ सूखने लगता है. पेड़ों के मरने से पहले उन के ऊपर काफी फूल आते हैं, लेकिन फल छोटे बनते हैं और पकने से पहले गिर जाते हैं. रोग लगे पेड़ों की पत्तियों पर तत्त्वों की कमी के लक्षण दिखाई पड़ते हैं. पत्तियों की नसें पीली पड़ जाती हैं और वे पकने से पहले गिर जाती हैं. रोग का असर बिना पके, पकने वाले पके फलों पर भी पहुंच जाता है. फलों पर पानी के धब्बे से दिखाई पड़ते हैं. ऐसे रोग लगे फल मुलायम होते हैं उन के ऊपर फफूंद लगी हुई दिखाई पड़ती है. कुछ दिनों बाद फल गिर जाते हैं उन फलों पर भी फफूंद उगती रहती है.

रोग कैसे लगता फैलता है

यह रोग जमीन से पैदा होता है. पेड़ों के पास जमीन में फाइटोफ्थोरा नामक कवक की मौजूदगी में सही नमी, खुराक तापमान मिलने पर रोग के बीजाणु संक्रमण करते हैं. यह कवक गिरे हुए फलों पर, शाखाओं पर, पत्तियों पर या फटे हुए पेड़ के हिस्सों पर भी ठिकाना पाता है. कवक के बीजाणु हवा द्वारा, बारिश की बूंदों द्वारा, सिंचाई के पानी द्वारा और कीटों द्वारा रोगी पेड़ों से स्वस्थ पेड़ों तक जाते हैं. भारी मिट्टी में ज्यादा नमी, भूमि का पीएच 5.4-7.4 और तापमान 24 डिगरी सेंटीग्रेड रोग पैदा होने के खास कारण हैं. ग्राफ्टिंग ज्यादा नीचे करने या जमीन के अधिक पास बड लगाने से भी रोग लग जाता है.

गमोसिस रोग की रोकथाम

* नीबू वर्गीय पेड़ों का बाग लगाने के लिए जमीन का चुनाव ऐसी जगह पर करना चाहिए, जहां पानी इकट्ठा रहता हो, जिस से जमीन में ज्यादा नमी रह सके जोकि रोग का खास कारण है.

* रोगरोधी रूट स्टौक खट्टी का इस्तेमाल करना चाहिए.

* बड 30 से 40 सेंटीमीटर ऊंची लगानी चाहिए.

* सिंचाई करने की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि एक पेड़ के नीचे से पानी दूसरे में जाए. बूंदबूंद सिंचाई फायदेमंद होती है.

* हर साल पेड़ का मुख्य तना बोर्डो पेस्ट से करीब 70 सेंटीमीटर ऊंचाई तक पोतना चाहिए.

* बाग की सफाई बहुत जरूरी है.

* सभी रोग लगे फलों पत्तियां (जोकि जमीन पर गिर जाते हैं) को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए.

* गरमी बरसात के समय बाग में पेड़ों पर कापर फफूंदनाशी जैसे बोर्डो मिक्सचर 4:4:50 या कापर आक्सीक्लोराइड या ब्लाइटोक्स 50 (0.3 फीसदी) या रिडोमिल (0.2 फीसदी) का छिड़काव करते रहना चाहिए.

* खड़े पेड़ों से रोग को हटाना केवल तभी मुमकिन है, जबकि रोग की शुरुआत में ही पहचान हो जाए. यदि रोग पहली शाखाओं पर है, तो उन्हें काट कर नष्ट कर देना चाहिए. रोग की शुरुआती अवस्था में रोगी जड़ों को हटा दें जमीन में जाइनेब 0.2 फीसदी या केप्टान या रिडोमिल 0.2 फीसदी घोल जड़ों के पास डालें.

* मोटी शाखाओं मुख्य तने पर रोग लगे भाग को तेज धार वाले चाकू से हटा दें घाव को पोटेशियम परमैगनेट (लाल दवा) के घोल से साफ करें, फिर बोर्डो पेस्ट या रिडोमिल एम जेड 0.2 फीसदी घाव पर लगाएं.नीबू वर्गीय पौधों में गमोसिस रोग

 

कुछ कहती हैं तसवीरें

मेहनत का फल : गुड़ की डली जैसे मीठे और रसीले जायके वाले फल खजूर खाने में जरा भी मेहनत नहीं लगती, मगर ऊंचेऊंचे पेड़ों से इन्हें सहीसलामत तोड़ कर लाना खासा जहमत भरा काम है. बुरके वाली खातूनें भी इस काम में पूरा हाथ बंटाती हैं.

क्रिकेटर को कहा आतंकवादी, लगा 3 साल का प्रतिबंध

ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेले जा रहे दूसरे टेस्ट मैच के दौरान एक दर्शक ने द. अफ्रीकी क्रिकेटर हाशिम अमला पर छींटकशी की और उन्हें आतंकवादी कह दिया. दरअसल इस युवक के हाथ में एक बैनर था जिस पर अमला के खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखी थीं. इसके बाद पुलिस ने उस युवक की पहचान कर उसे मैदान से बाहर कर दिया.

अब क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) ने कड़ा रुख अपनाते हुए उस युवक पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया है. अब वो युवक मैदान में तीन वर्ष तक किसी भी मैदान में प्रवेश नहीं कर पाएगा. सीए की तरफ से कहा गया कि किसी भी दर्शक द्वारा इस तरह की हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

इस युवक पर मैदान में प्रवेश को लेकर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया गया है. अब वह ऑस्ट्रेलिया में होने वाले किसी भी क्रिकेट मैच को स्टेडियम में नहीं देख पाएगा. अगर वह ऐसा करता है तो पुलिस उसके खिलाफ कार्रवाई करेगी.

वहीं इस विवाद पर दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड ने कहा कि हमें घटना के बारे में पता चला, साथ ही यह भी जानकारी मिली की मैच देखने आए युवक पर तीन साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है. हमारा मानना है कि यह व्यवहार बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. हम क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को धन्यवाद देना चाहेंगे कि उन्होंने इस मुद्दे पर तुरंत कार्रवाई की.

व्हाट्सएप पर भेजा मैसेज करना है कैंसिल?

व्हाट्सएप का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले लोगों को हर बार एक परेशानी का सामना करना पड़ता है. कई बार एक वक्त पर कई लोगों से चैट करते वक्त हम किसी को गलत मैसेज भेज देते हैं.

ऐसा भी होता है कि मैसेज भेजने के बाद हमे लगता है कि ये मैसेज गलत है लेकिन एक बार सेंड होने पर हम कुछ नहीं कर पाते.

यूं तो व्हाट्सएप अपने यूजर्स को नए अपडेटेड फीचर देता रहता है लेकिन अब तक कोई भी ऐसा फीचर एप की ओर से नहीं लाया गया जिसकी मदद से आप भेजे जा चुके मैसेज को 'अनसेंड' कर सकें. हम आपको आज ऐसी ही ट्रिक बता रहे हैं जिसकी मदद से आप सेंड मैसेज को अनसेंड कर सकते हैं.

अगर आप किसी को मैसेज भेज रहे हैं जो आप नहीं भेजना चाहते तो ऐसे में आप मैसेज के सेंड होते ही तुरंत अपना वाई-फाई या डेटा कनेक्शन बंद कर दीजिए. इस बात का खास ख्याल रखिए की आप इस काम को तेजी से करें.

जबतक मैसेज सेंड होने पर सिंगल टिक ना आया हो तब तक उसे डेटा ऑफ करके आप गलत मैसेज भजेने से बच सकते हैं.

अगर आपको लगता है कि आप डेटा ऑफ करते वक्त चूक सकते हैं तो ऐसे में मैसेज सेंड होते वक्त मैसेज के कोने में बने क्लॉक साइन बने रहते ही इसे डिलीट कर करके मैसेज को अनसेंड कर सकते हैं.

इसके अलावा गलत मैसेज सेंड होते ही आप अपने कॉन्टेक्ट को ब्लॉक कर सकते हैं जिससे आपका गलत मैसेज सेंड होने से बच जाएगा.

ब्लॉक करने के बाद कुछ दिन तक अन ब्लॉक ही रखिए क्योंकि व्हाट्सएप 30 दिनों तक मैसेज रिस्टोर कर सकते है.

पद्मिनी की राष्ट्रीय शतरंज चैंपियनशिप में खिताबी हैट्रिक

अंतरराष्ट्रीय मास्टर पद्मिनी राउत ने राष्ट्रीय महिला प्रीमियर शतरंज चैंपियनशिप में लगातार तीसरा खिताब जीत कर खिताबी हैट्रिक अपने नाम कर लिया है. आखिरी दौर में पीएसपीबी की ईशा कारवडे के साथ संघर्षपूर्ण मुकाबले में ड्रॉ खेलकर पद्मिनी ने लगातार तीसरा खिताब जीता.

पद्मिनी ने 11 बाजियों में आठ अंक हासिल करके खिताबी हैट्रिक पूरी की. ओड़िशा की यह खिलाड़ी पिछले कुछ समय से अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पा रही थीं, जिससे उनकी रेटिंग में 70 अंक का नुकसान हुआ था.

ईशा के खिलाफ उन्हें केवल ड्रॉ की जरूरत थी और उन्होंने शुरू से ही अच्छा खेल दिखाकर स्वर्ण पदक हासिल किया. विजयलक्ष्मी ने रजत और ईशा ने कांस्य पर जमाया कब्जा.

एयर इंडिया की एस विजयलक्ष्मी ने आखिरी बाजी में पीएसपीबी की आर वैशाली को हराकर रजत पदक जीता. उनके 7.5 अंक रहें जबकि ईशा को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.

सौम्या स्वामीनाथन आखिरी दौर में मेरी एन गोम्स से हारने के कारण वह ईशा के साथ संयुक्त तीसरे स्थान पर रहीं. इन दोनों के समान सात-सात अंक रहे.

टूर्नामेंट के शुरू से ही पद्मिनी, विजयलक्ष्मी, ईशा और सौम्या खिताब की दौड़ में बनी हुईं थी. मेरी एन गोम्स ने भले ही आखिरी बाजी में जीत दर्ज की लेकिन वह 5.5 अंक के साथ पांचवें स्थान पर रहीं.

पद्मिनी ने इस जीत से अगली विश्व टीम शतरंज चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में भी अपनी जगह सुनिश्चित की. भारतीय महिला टीम ने पिछले शतरंज ओलंपियाड में अच्छे प्रदर्शन के दम पर इस चैंपियनशिप में जगह बनायी थी.

टीम में जिन दो अन्य सदस्यों की जगह पक्की है, उनमें ग्रैंडमास्टर कोनेरू हंपी और डी हरिका शामिल हैं. बाकी दो स्थानों का फैसला फरवरी की रेटिंग सूची से तय किया जाएगा.

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