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नोटबंदी से औनेपौने बिक रहा धान और गुड

कालेधन के खात्मे के लिये नोटबंदी के बाद सबसे अधिक किसान परेशान है. जिसे देखकर यह लगता है जैसे सबसे अधिक कालाधन इन गरीब किसानों के पास ही है. किसानों पर नोटबंदी का ऐसा असर हुआ की उनकी धान की फसल औनेपौने दामों में बिक रही है और रबी की फसल के लिये उनको मंहगी कीमत में खाद, बीज और कीटनाशक खरीदना पड़ रहा है. यह हाल केवल एक जिले का नहीं है उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार तक  के किसान इस मुसीबत में फंसे नजर आये यह संकट केवल किसानों की परेशानी का ही सबब नहीं है खेती के काम में लगे मजदूर तक इससे परेशान है. उनकी रोजी संकट में है. मंडियों में आनाज बेचने का काम करने वाले आढतियें, मजदूरी करने वाले पल्लेदार परेशानी में डूबे नजर आये. सबसे अधिक परेशानी में धान और गुड की मंडी है. मंडियों से मिली जानकारियों के अनुसार नोटबंदी के बाद सबसे अधिक प्रभाव मंडियों पर पडा है. यहां का 80 फीसदी कारोबार घट गया है.

मंडियों में धान और गुड को बेचने खरीदने का काम बंद हो गया है. मंडी में सुबह भीड़ जुटती है पर धीरे धीरे यह दोपहर तक खत्म हो जाती है. किसान, आढतियां और पल्लेदार इस बात का समर्थक है कि नोटबंदी सही है पर उसे इस का दुख है कि यह पाबंदी लगाते समय पूरी तैयारी नहीं की गई. अगर मुद्रा बाजार में छोटे नोट पहले से ही चलन में लाये गये होते तो यह परेशानी नहीं होती. इस परेशानी से बचने के लिये किसान आढतियों को सब्जी जैसी खराब होने वाली पैदावार दे देते है. आढतिये उनको पहले पुराने नोट देने का काम करते है, जब किसान पुराने नोट नहीं लेता तो उसे चेक दिया जाता है. कई आढत वाले किसान का नाम अपने रजिस्टर में लिख लेते है और पैसा बाद में देने को कहते है.

किसान के पास पैसा नहीं है तो वह दुकानदारों से उधार में बीज, खाद और कीटनाशक लेकर अपना काम चला रहा है. नकद न मिलने से किसान परेशान है, वह मंडी में अपनी फसल बेचने से बच रहा है. आढतिये किसानों को पुराने नोट देने की कोशिश करते हैं. किसान यह नोट नहीं लेना पंसद करता. जिस मंडी में धान के सीजन में प्रतिदिन औसतन 7 हजार कुंतल धान बिकने आता था, नोटबंदी के बाद 15 सौ कुतंल धान की बिकने आ रहा है.

धान के साथ गुड मंडी में भी यही हाल है. किसान की मजबूरी का लाभ उठाकर कई बार धान और गुड लेकर मंडी में आये किसान से आढती कम पैसे में खरीददारी करना चाहता है. ऐसे में किसान कम पैसे में बेचने की जगह पर उसे वापस ले जाने की कोशिश करता है. ज्यादातर किसान गुड और धान औनेपौने दामों में बेचने को मजबूर हो रहे हैं.

नोटबंदी से किसान पूरी तरह से फसल की बोआई नहीं कर पाये. किसानों के पास बीज खरीदने के पैसे नहीं है, ऐसे में कई किसान अपने खेत में बोआई नहीं कर पाये. रबी की फसल में गेहूं की बोआई के समय यूरिया खाद की कमी हो गई. दुकानदार बताते हैं जहां पहले रोज 10 बोरी यूरिया बिकती थी, अब एक से दो बोरी ही बिक रही है. बैकों ने किसानों को नोट बदल कर 2 हजार का नोट दिया, जिसके फुटकर पैसे दुकानदार के पास नहीं थे, ऐसे में नोट होते हुये भी किसानों को बीज और खाद नहीं मिल सका. रबी की फसल में गेहूं के साथ तरबूज, पालक, सरसों और सब्जी की खेती होती है, यह सभी प्रभावित हुई.

किसान कहते हैं कि एक तो बैंक से नोट नहीं मिले. बहुत मेहनत के बाद जब नये नोट मिले तो वह 2 हजार के थे. 2 हजार के नोट का फुटकर मिलना मुश्किल हो गया है. सबसे बड़ी परेशानी फुटकर नोट की है. जिसकी वजह से बाजार में बिक्री घट गई. इसके अलावा बैंक में लाइन लगने में किसानों का समय खराब हुआ. गांव में बैंक दूर दूर हैं. हर गांव में एटीएम नहीं है.

गांव में ज्यादातर किसानों के पास खेत की जोताई के लिये अपने टैक्टर नहीं हैं. हल और बैल से खेती बंद हो चुकी है, ऐसे में किराये के टैक्टर से खेत की जोताई करनी पड़ती है, टैक्टर के मालिक किसानों से पुराने नोट नहीं ले रहे हैं, जो किसान दूसरे के पंप सेट से सिचाई करते हैं, वह भी ऐसे ही कर रहे हैं. इससे किसानों की फसल की बोआई नहीं हो पा रही है, खाद बीज की प्राइवेट दुकानों में भी पुराने नोट नहीं लिये जा रहे हैं. बैकों से किसानों को पूरी मदद नहीं मिल पा रही, फुटकर नोट वहां से भी नहीं मिल रहे है.

जल्द ही मैदान में वापसी करेंगे गंभीर और इशांत

भारत के अनुभवी बल्लेबाज गौतम गंभीर का नाम डीडीसीए की चयन समिति ने दिल्ली की रणजी टीम में शामिल कर लिया है. इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में खराब फॉर्म के चलते अब भारतीय टीम गंभीर को रणजी के लिए जल्द ही रिलीज कर देगी. वहीं, तेज गेंदबाज इशांत शर्मा को दिल्ली की टीम के 16वें खिलाड़ी के रूप में शामिल किया गया है.

दिल्ली की टीम को वायनाड (केरल) में 21 नवंबर से राजस्थान के खिलाफ रणजी ट्रॉफी का मैच खेलना है. इस मैच में गंभीर के अलावा भारतीय टीम के दिग्गज बल्लेबाज शिखर धवन भी नजर आएंगे जो अंगूठे में लगी चोट के बाद मैदान से अब तक दूर थे.

दिल्ली क्रिकेट की चयन समिति के एक सदस्य ने कहा, 'चयनकर्ताओं ने गौतम से बात की है और गौतम ने भी रणजी मैच में खेलने की इच्छा जाहिर की है क्योंकि उन्हें मैच अभ्यास का अच्छा मौका मिल जाएगा. अगर गंभीर अंतिम समय में टीम का हिस्सा नहीं बन पाए तो हमने कवर के तौर पर हिम्मत सिंह को तैयार रखा है.'

चयन समिति द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कप्तान का जिक्र नहीं किया गया है. बताया जा रहा है कि कप्तान उनमुक्त चंद ने कहा है कि अगर गंभीर खेले तो वहीं कप्तान होंगे.

टीम

गौतम गंभीर, उन्मुक्त चंद, शिखर धवन, ध्रुव शोरे, मिलिंद कुमार, नीतिश राणा, रिषभ पंत, मनन शर्मा, प्रदीप सांगवान, नवदीप सैनी, सुमित नरवाल, विकास टोकस, सार्थक रंजन, पुलकित नारंग, वरुण सूद, इशांत शर्मा

स्टैंडबाई: हिम्मत सिंह

हर कोई लेना चाहेगा ‘शाओमी Mi 5c’

चीन की मशहूर टेक कंपनी ‘शाओमी’ यूं तो अपनी तकनीकी पहल से बहुत से स्मार्टफोन यूजर्स को अपना दिवाना बना चुकी है. शाओमी स्मार्टफोन की दिवानगी अब यूजर्स के सर चढ़ कर बोल रही हैं. अपने तकनीक और स्मार्टफोन की रेंज में लगातार काम करने वाली कंपनी ‘शाओमी’ इन दिनों अपने नए स्मार्टफोन ‘शाओमी मेरी’ पर काम कर रही है, जिसे ‘Mi 5c’ का नाम दिया जाएगा. ऐसा बताया जा रहा है कि ‘शाओमी’ कंपनी इस स्मार्टफोन को 12 दिसंबर तक चीन के बाजार में लॉन्च कर सकती है.

खबरों की मानें तो हुवावो और सैमसंग के स्मार्टफोन की तरह ‘शाओमी मेरी’ स्मार्टफोन में भी खुद की कंपनी की तरफ से ईजाद किए गए ‘Pine Cone’ प्रोसेसर लगाए जाएंगे. ये स्मार्टफोन रोज गोल्ड, गोल्ड और ब्लैक वेरिएंट में मुहैया कराया जाएगा. गीकबेंच के सूत्रों से लीक खबरों के मुताबिक इस स्मार्टफोन में 1.4GHz के प्रोसेसर को 3 जीबी रैम के साथ कम्पैटिबल किया जाएगा. शाओमी के यूजर इंटरफेस के साथ ये स्मार्टफोन एंड्रॉइड 6.0 मार्शमैलो ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलेगा.

‘शाओमी मेरी’ स्मार्टफोन में 5.5 इंट की फुल एचडी स्क्रीन हो सकती है जिसका रिजोलूशन 1080×1920 पिक्सल का होगा. इस स्मार्टफोन की पिक्सल डेनसिटी 403 पीपीई की हो सकती है. भारतीय बाजारों में ‘शाओमी मेरी’ की कीमत तकरीबन 14,800 रुपए आंकी जा सकती है.

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया में खलबली, मुख्य चयनकर्ता का इस्तीफा

ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के मुख्य चयनकर्ता रॉड मार्श ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. मार्श ने ये कदम ऑस्ट्रेलिया के खराब प्रदर्शन के बाद उठाया. हाल में ही ऑस्ट्रेलिया को अपने ही घर में पहली बार साउथ अफ्रीका के हाथों टेस्ट सीरीज गवानी पड़ी. पद छोड़न के बाद मार्श ने कहा कि टीम को अब नई सोच की जरूरत है. मार्श का कार्यकाल 2017 में खत्म होना था.

रोड मार्श के इस्तीफे के बाद ट्रेवर होंस को ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट चयन समिति का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है. होंस अभी तक चयन समिति के चार सदस्यीय पैनल में शामिल थे. पैनल में उनकी जगह ग्रेग चैपल को शामिल किया गया है.

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) के चेयरमैन डेविड पीवर ने बताया कि होंस अगला पूर्णकालिक चेयरमैन नियुक्त होने तक चयन समिति के प्रमुख की जिम्मेदारी निभाने को तैयार हो गए हैं. हालांकि, पूर्व तेज गेंदबाज जेसन गिलेस्पी और पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग का नाम रोड मार्श के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर लिया जा रहा है.

अनुभवी होंस इससे पहले टीम के मुख्य चयनकर्ता की जिम्मेदारी निभा चुके हैं. उन्होंने सिर्फ सात टेस्ट मैच खेले हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में ऑस्ट्रेलिया ने लगातार 16 टेस्ट मैचों में जीत का रिकॉर्ड बनाया था.

1999 और 2003 में ऑस्ट्रेलिया के विश्व कप जीतने के दौरान भी होंस चयन समिति के प्रमुख थे. चयन पैनल में उनके अलावा मार्क वॉ, कोच डेरेन लीमैन और ग्रेग चैपल रहेंगे. पूर्व टेस्ट कप्तान चैपल अस्थायी तौर पर इस भूमिका में रहेंगे.

वह एडीलेड टेस्ट से पहले खिलाड़ियों के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. दक्षिण अफ्रीका के साथ एडीलेड में तीसरे और अंतिम टेस्ट के लिए ऑस्ट्रेलिया की टीम की घोषणा रविवार तक टाल दी गई है.

इतिहास गवाह है, हमेशा फेल रही है नोटबंदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह अचानक 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को बंद करने का ऐलान कर दिया. ब्लैक मनी पर शिकंजा कसने का दावा करते हुए उठाए गए कदम के बाद देशभर में बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगी हैं. लोग छुट्टे पैसों के लिए परेशान हैं. कुछ लाइन में लगे-लगे ही जिंदगी गवा बैठे तो कुछ ने पैसों की चिंता में खुदखुशी कर ली. ऐसा नहीं है कि करेंसी रिफॉर्म की वजह से किसी देश में आपाधापी मची हो. कई प्रगतिशील देशों में यह प्रयास सफल नहीं रहा.

सोवियत यूनियन

काले धन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से मिखाइल गोरबाचोव ने जनवरी 1991 में 100 और 50 रूबल नोट को बंद कर दिया. यह रिफॉर्म महंगाई को रोकने में असफल रहा और सरकार ने जनता के बीच विश्वास खो दिया. राजनीति के साथ अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को मिखाइल संभाल नहीं सके. इसके बाद सोवियत संघ का विघटन हो गया.

नॉर्थ कोरिया

2010 में तत्कालीन तानाशाह किम जोंग-द्वितीय ने कालाबाजारी को खत्म करने और अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए पुराने करेंसी के फेस वैल्यू से दो जीरो कम कर दिए, उस वक्त वहां खाद्य संकत का दौर था. लेकिन यह फैसला देश पर भारी पड़ा. देश में अन्न की भारी कमी हो गई. कीमतों में वृद्धि की वजह से देश में अव्यवस्था फैल गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक सत्ताधारी पार्टी के वित्त मंत्री को इसके लिए फांसी की सजा दी गई थी

जायर

तानाशाह मबुटो सेसे सेको ने 1990 के दौर में बैंक नोट रिफॉर्म की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी अर्थव्यवस्था में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा. महंगाई बहुत तेजी से बढ़ी और डॉलर के मुकाबले एक्सचेंज रेट ध्वस्त हो गया. 1997 में गृहयुद्ध के बाद सीसी सीको को कुर्सी छोड़नी पड़ी.

म्यांमार

1987 में म्यांमार की सैन्य सरकार ने सर्कुलेशन में मौजूद करीब 80 फीसदी करेंसी को अमान्य करार दे दिया. यह काला धन को नियंत्रित करने के लिए किया गया था. इसके बाद देश में पहले छात्र सड़कों पर उतरे और फिर देश में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए. इन्हें नियंत्रित करने के लिए सरकारी दमन में हजारों लोग मारे गए.

घाना

1982 में इस देश ने भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी को रोकने के लिए 50 सेडी के नोट को रद्द कर दिया. लेकिन इससे बैंकिंग सिस्टम से लोगों का विश्वास उठ गया. लोग इसे विदेशी मुद्रा या फिर भौतिक संपत्ति में बदलने लगे. काला धन का दायरा और बढ़ा था. गांवों में रहने वाले लोगों को बैंक तक पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ा. डेडलाइन बीतने के बाद बड़ी संख्या में नोट बर्बाद हो गए.

नाइजीरिया

1984 में मुहम्मादू बुहारी की नेतृत्व वाली सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधी प्रयासों के तहत अलग रंग में नए नोट जारी किए. निर्धारित समय के भीतर पुराने नोटों को बदलने के लिए कहा गया, लेकिन महंगाई नियंत्रण से बाहर हो गई. बुहारी सत्ता से बाहर हो गए थे.

जानें वॉट्सऐप वीडियो कॉलिंग की खासियत

वॉट्सऐप  की वीडियो कॉलिंग इस समय सबसे अधिक चर्चाओं में है. साथ ही इसे पसंद भी किया जा रहा है. कुछ ही समय पहले लॉन्च हुई इस सेवा को अब सभी के लिए उपलब्ध कर दिया गया है. हालांकि अभी यह देखना बाकी है कि यह कैसे फेसबुक मैसेंजर एप, एपल के फेस टाइम, गूगल के डुओ, स्काइप और वाईबर के मुकाबले कैसे काम करता है.

यदि वॉट्सऐप के यूजर्स को ध्यान में रख कर बात करें तो यह अन्य के मुकाबले कई गुना ज्यादा है. जिससे एक अनुमान लगाया जा सकता है कि यह वीडियो कॉलिंग एप्स को अच्छी खासी टक्कर दे सकती है. फिलहाल तो इसे पसंद किया जा रहा है और जब से यूजर्स को यह फीचर मिला सभी काफी खुश भी हैं. जिसका एक ही कारण है कि एक एप में सभी जरुरी फीचर्स आपको मिल जाते हैं.

एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड

मैसेज की ही तरह वॉट्सऐप  की वीडियो कॉल्स भी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड है. जिसका मतलब है कि आप और आपक जिसे कॉल कर रहे हैं उसके अलावा कोई भी इन कॉल का एक्सेस नहीं पा सकते हैं. वॉट्सऐप भी नहीं.

कोई दखलंदाजी नहीं

वॉट्सऐप पर आपसे कोई तभी कनेक्ट हो सकता है जब वो आपके कांटेक्ट में हो. यह अन्य से अधिक प्राइवेट है, जहां आपको कई लोग बिना जाने कॉल रिक्वेस्ट भेजते हैं.

स्लो नेटवर्क के लीए भी बढ़िया

भारत में सबसे बड़ा विषय है लो बैंडविड्थ इंटरनेट कनेक्टिविटी. इस समस्या को कम करने के लिए वॉट्सऐप ने स्लो नेटवर्क पर भी वीडियो कॉल को ऑप्टिमाईज किया है. यानी कि आपको स्लो इंटरनेट स्पीड पर दिक्कत नहीं होगी.

किसी अन्य एप की जरुरत नहीं है

भारत में व्हाटएप के 160 मिलियन एक्टिव यूजर्स हैं. जिसका मतलब है काफी अधिक संख्या में इसक इस्तेमाल चैटिंग, और वॉयस कॉल के लिए हो रहा था. अब वीडियो कॉल के लिए आपको अलग से कोई एप यूज करने की जरुरत नहीं है. एंड्रायड और आईफोन दोनों के लिए है

वॉट्सऐप दोनों ही प्लेटफॉर्म पर काम करता है. जबकि फेस टाइम जैसी एप्स केवल एक ही प्लेटफॉर्म पर है. अब सभी इसका आनंद ले सकते हैं.

संसद के शीत सत्र में नोट की गरमी

लोगों की जेब में नोट की गरमी हो-न हो, मगर संसद का शीत सत्र पूरा गरम है. देशभर में लोगों की लंबी-लंबी कतारों के आगे पैसे उगलने वाली एटीएम मशीनों की सांसें फूल रही हैं, तो बैंकों के प्रवेश द्वार भी भारी भीड़ के आगे लाचार नजर आ रहे हैं. बहरहाल यह तो एक सामान्य परिदृश्य है, मगर असली सवाल यही है कि नोटबंदी अथवा विमुद्रीकरण के बाद से पैदा हुई समस्याएं कैसे सुलझें और आम नागरिकों को राहत मिले. इसमें तो कोई शक नहीं कि पूरी तरह स्थिति के सामान्य होने में अभी कुछ वक्त लगेगा, लेकिन जैसे-जैसे और जिन-जिन रूपों में लोगों को हो रही परेशानियां सामने आ रही हैं, उनके निदान में सरकार और उसकी मशीनरी पूरी तत्परता से लगी हुई है.

यही वजह है कि रबी की खेती और शादी-विवाह के मामले में सामने आई मुश्किलों और शिकायतों के मद्देनजर गुरुवार को सरकार के निर्देश पर बैंकों ने नगदी की निकासी सीमा को बढ़ा दिया है. अब जहां शादी-ब्याह के लिए लोग ढाई लाख रुपए तक बैंकों से निकाल पाएंगे, वहीं खेती के खाद-बीज आदि के लिए किसान अपने खाते से 50 हजार तक एक मुश्त नगदी हासिल कर सकते हैं. सांसत के बीच यह राहत भी कम नहीं है. आखिर कुछ तो सहूलियत मिलेगी.

दूसरी ओर वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक देशभर में अबतक करीब 22 हजार एटीएम मशीनों को सरकार द्वारा जारी दो हजार और पांच सौ के नए नोटों के अनुरूप सुधार लिया गया है यानी इनके जरिए अब नए नोट पाए जा सकेंगे और ये एटीएम मशीनें ज्यादा लोगों को संभाल पाएंगी.

गौरतलब है कि देशभर में दो लाख 20 हजार से ज्यादा एटीएम मशीनें लगी हुई हैं और अगर इस रफ्तार से ही इन्हें नए नोटों के लायक बनाया जा सके, तब भी सभी एटीएम के दुरुस्त होने में हफ्ता-दस दिन और लगेंगे. कहने की जरूरत नहीं कि हालात के जल्दी से जल्दी सामान्य बनाने की सबसे ज्यादा चिंता सरकार को ही है, क्योंकि सांसत में फंसे आम लोगों के उलाहने का सामना उसे ही करना पड़ रहा है. यही नहीं, संसद के ठिठके हुए शीत सत्र को चलाने के लिए भी जरूरी है कि सांसत भरे ये दिन जल्दी से जल्दी समाप्त हों और लोगों को सामान्य सहूलियत मिल सके.

अभी तो पिछले नौ दिनों से आम जनता को हो रही परेशानी का हवाला देते हुए विपक्षी दलों ने संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से न चलने देने के लिए कमर कसी हुई है. यही वजह है कि गुरुवार को लोकसभा में केवल प्रश्नकाल हो सका, जबकि राज्यसभा में कोई कामकाज नहीं हो पाया. लोकसभा में हंगामे के बीच प्रश्नकाल संपन्न होने के बाद सदन की कार्यवाही शुक्रवार के लिए स्थगित करनी पड़ी और ऐसा ही राज्यसभा में भी हुआ, जब पांच बार स्थगन के बाद आखिरकार कार्यवाही अगले दिन के लिए स्थगित कर दी गई. राज्यसभा में कांग्रेस की अगुवाई में सभी विपक्षी दलों ने एक सुर में यह मांग की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में आकर नोटबंदी पर बयान देंगे, तभी बात बनेगी.

बहरहाल, अभी तो दोनों ओर से तलवारें खिची हुई हैं. देखना है कि ये अपने-अपने म्यान में कबतक लौटती हैं.

गजल को नई पहचान देती मालविका हरिओम

बेटी के जीवन पर पिता का बहुत प्रभाव पडता है. शादी के बाद अगर पति के साथ सामंजस्य बन जाये तो कोई भी पीछे नहीं रहता. दिल्ली की पलीबढी मालविका हरिओम के पिता सत्यपाल मांगिया को कवितायें लिखने का शौक था. उनकी बेटी मालविका को भी कविता और गजल लिखने का शौक हो गया. जेएनयू में पढ़ाई के दौरान मालविका की लिखी कविताओं की प्रशंसा सभी ने की. मालविका की शादी डाक्टर हरिओम से हुई तो वह भी बहुत अच्छा गाते थे. शादी के बाद पति हरिओम ने पत्नी को आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया. इस प्रोत्साहन के बाद मालविका ने कवितायें और गजल लिखना शुरू किया.

अपनी मेहनत से कुछ ही समय में मालविका आकाशवाणी लखनऊ में ग्रेड आर्टिस्ट हो गई. आकाशवाणी और दूरदर्शन में उनकी गजल और कविताओं का प्रसारण होने लगा. उनकी आवाज में एक नया सुर था. जिसे सुनने और देखने वालों ने बेहद पंसद किया. आमतौर पर गजल के लाइव शो कम होते हैं. मालविका ने जिस सरलता और सहजता के साथ गजल को सुनने वालों के बीच पेश किया, लोग उसके दीवाने होने लगे. उत्तर प्रदेश के अलग अलग शहरों में लगने वाले महोत्सव में मालविका के गजल शो रखने की मांग होने लगी. लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘बोले यूपी’ में मालविका के सुर के साथ उनके गजल पेश करने के अंदाज को भी लोगों ने बेहद पंसद किया.

मालविका दूसरे लेखकों की गजलों के साथ ही साथ अपनी लिखी गजलें भी पेश करने लगी हैं. इसके साथ ही साथ मुशायरों में अपनी पेशकश देने लगी हैं. अपने इस हुनर के साथ मालविका अपनी दोनो बेटियों और परिवार का पूरा ख्याल रखते हुये काम कर रही हैं. वह कहती है ‘मैं कभी गजल की रियाज करना नहीं भूलती. दिन में 1 से 2 घंटे रियाज करती हूं. इसके साथ मैं अपने गुरू से गजल गायिकी की पूरी शिक्षा ले रही हूं. मेरा मानना है कि इस तरह की विधाओं में आप तभी सफल हो सकती हैं जब आप को अच्छा गुरू मिला हो.’

मालविका अब हारमोनियम बजाते हुये गजल पेश करने लगी हैं. वह कहती है गजल के साथ हारमोनियम पर सुर लगाना मुझे अच्छा लगता है. इससे लाइव शो में बहुत अच्छा अंदाज बनता है. इसके अलावा मैंने अपनी गजलों की एक किताब भी तैयार की है. जिसे जल्द प्रिंट कराना चाहती हूं. अब मैं उस दिशा में आगे बढ रही हूं. इसके साथ ही साथ मेरी कोशिश है कि गजल को आमलोगों तक पहुंचाया जाये. जिससे यह और लोकप्रिय हो सकेगी. मैं घर परिवार के साथ अपने इस शौक को परवान चढ़ते देखना चाहती हूं. जहां मुझे आम श्रोता सुन सके और पंसद करें. मैं लोकगीत भी गाती हूं पर मेरी पसंद गजल ही है.            

फोर्स 2: चूं चूं का मुरब्बा

देशभक्ति व एक्शन के नाम पर बेसिरपैर की कहानी परोसकर दर्शकों को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता, यह बात फिल्म ‘‘फोर्स 2’’ के बाक्स आफिस आंकड़े साबित कर देंगे. कई भारतीय व विदेशी फिल्मों का मिश्रण कर बनाया गया चूं चूं का मुरब्बा है- ‘‘फोर्स 2’’. देशभक्ति के नाम पर यह बदले की भावना से ग्रसित इंसान की कहानी है.

फिल्म की कहानी मुंबई पुलिस के जांबाज एसीपी यश (जान अब्राहम) और भारतीय रॉ एजेंसी में कार्यरत एजेंट कमलजीत कौर उर्फ के के (सोनाक्षी सिन्हा) के इर्द गिर्द घूमती है. चीन में भारत के बीस रॉ एजेंट कार्यरत हैं. पर अचानक तीन रॉ एजेंटों की हत्या से सनसनी फैल जाती है. इन तीन में से एक रॉ एजेंट यश का दोस्त है. वह एक किताब को कूरियर कर यशवंत के पास बहुत गुप्त जानकारी भेजता है. जिसके चलते रॉ प्रमुख (नरेंद्र झा), यश को के के साथ चीन भेजते हैं कि वह उस इंसान को पकड़कर लाए, जो भारतीय रॉ एजेंटों की पहचान चीन के सरकारी लोगों को दे रहा है.

यश की जानकारी के अनुसार वह देशद्रोही बुडापेस्ट में है. इसलिए यश और के के बुडापेस्ट पहुंचते हैं. वहां भारतीय दूतावास में कार्यरत लोगों की जांच पड़ताल करने पर के के को तीन लोगों पर शक होता है. पर यश को शिव शर्मा (ताहिर राज भसीन) पर शक होता है. अंततः यश का यह सच सही निकलता है. फिर शुरू होता हैं, के के व यश तथा शिव शर्मा के बीच चूहे बिल्ली का खेल.

अंत में पता चलता है कि शिव शर्मा का असली नाम रूद्र प्रताप सिंह है, जो कि करण सिंह (बोमन ईरानी) का बेटा है. करण सिंह कभी रॉ एजेंट के रूप में चीन में कार्यरत थे. पर एक दिन भारत सरकार ने उनसे अपना पल्ला झाड़ते हुए उन्हे देशद्रोही कह दिया था. जिस कैबिनेट सेक्रेटरी ने बयान दिया था कि करण सिंह देशद्रोही है, वह कैबिनेट सेक्रेटरी ब्रिजेश वर्मा (आदिल हुसेन) अब एचआरडी मंत्री हैं. और रूद्र प्रताप सिंह एचआरडी मंत्री ब्रिजेश वर्मा को मारना चाहता है. एक समारोह में हिस्सा लेने ब्रिजेश वर्मा बुडापेस्ट पहुंचते हैं, वहीं शिव शर्मा उर्फ रूद्र उन्हे मारने का असफल प्रयास करता है, पर यश के हाथों मारा जाता है. उसके बाद मंत्री महोदय सभी मृत रॉ एजेंटों को सम्मान देने की घोषणा कर देते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इस फिल्म में जान अब्राहम ने अपने आपको दोहराया ही है. उनके अभिनय में ‘मद्रास कैफे’ व ‘रॉकी हैंडसम’ का दोहराव ही नजर आता है. यहां तक कि एक्शन के नाम पर जान अब्राहम अपना नंगा बदन दिखाते नजर आए. सोनाक्षी सिन्हा भी कहीं से प्रभावित नहीं करती. यहां तक की ताहिर राज भसीन के कुछ चुटीले संवादों के वक्त भी वह अपने चेहरे पर सही प्रतिक्रियात्मक भाव नहीं ला पाती. ‘रॉ एजेंट’ के किरदार में सोनाक्षी सिन्हा कहीं से भी फिट नहीं बैठती हैं. पूरी फिल्म में ताहिर राज भसीन छाए रहते हैं. उनके अंदर अभिनय की असीम संभावनाएं छिपी नजर आती हैं. दर्शक ताहीर राज भसीन का अभिनय, उनकी कुटिल मुस्कान व उनकी संवाद अदायगी के लिए फिल्म देख सकते हैं. एसीपी यश की पत्नी माया के किरदार में जिनेलिया डिसूजा कोई प्रभाव नहीं छोड़ती.

इंटरवल से पहले कहानी के स्तर पर फिल्म आगे बढ़ती ही नहीं है. ‘रॉकी हैंडसम’ वाली गलती इस फिल्म में भी दोहरायी गयी है. यश द्वारा शिव शर्मा का पीछा करने का सीन बोर करता है. इंटरवल के बाद जब कहानी आगे बढ़ती है, तो फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष फिल्म की कहानी, पटकथा और निर्देशन उभर कर आता है. वैसे इंटरवल के बाद शिव शर्मा उर्फ रूद्र के पिता की कहानी दिखाते हुए कुछ भावनाप्रधान सीन रखे गए हैं. यानी कि मुंबईया मसाला फिल्म का तड़का. मुंबईया मसाला का तड़का देने के लिए ही एक गाना भी डाल दिया गया, जबकि यह गाना कहानी को बाधित ही करता है.

फिल्म देखते समय कई देशी व विदेशी फिल्में याद आती हैं. पटकथा में काफी गड़बड़ी है. कहानी में माया के किरदार की कोई जरुरत नहीं थी. बेवजह इसे कहानी का हिस्सा बनाया गया. फिल्म में शिव शर्मा को चीन स्थित भारतीय दूतावास का कर्मचारी बताया गया है, पर उसके पास अति आधुनिक हथियार, लैपटॉप, चिप, कार, हेलीकोप्टर आदि के साथ सैकड़ों लोगों की फौज है. जो कि उसे सुरक्षित रखने के काम में लगे रहते हैं. सबसे अहम सवाल यह है कि चीन व बुडापेस्ट में शिव शर्मा ने इतना बड़ा नेटवर्क व सुविधाएं इकट्ठा की हैं, उसका राज क्या है? इस पर फिल्म की कहानी मौन है.

फिल्म देखते समय ऐसा लगता है कि निर्देशक का विजन सिर्फ हौलीवुड स्टाइल के एक्शन दृश्यों को फिल्माने पर ही रहा. ऐसा करते समय वह कहानी को नजरंदाज कर गए. यह फिल्म उन भारतीय रॉ एजेंटों की कथा को बयां करने वाली एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी, जिनके जांबाजी के किस्से अनकहे रह जाते हैं. मगर अफसोस कमजोर पटकथा के चलते ऐसा हो नहीं पाया. फिल्म के कुछ संवाद अच्छे हैं.

फिल्म के एक्शन सीन लोगों को भा सकते हैं. यहां याद रखना होगा कि इस फिल्म के एक्शन निर्देशक हौलीवुड फिल्म के लिए आस्कर अवार्ड जीत चुके  फ्रांज  स्पिलहौज हैं. कैमरामैन मोहन कृष्णा व इमरे जुहास्ज की जितनी तारीफ की जाए, वह कम है.

दो घंटे छह मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘फोर्स 2’’ का निर्माण विपुल अमृतलाल शाह और जॉनन अब्राहम ने ‘वायकाम 18’ के साथ मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अभिनय देव, कहानी कार परवीज शेख व जसमीत के रीन, गीतकार रश्मि विराग व कुमार तथा कलाकार हैं – जान अब्राहम, सोनाक्षी सिन्हा, ताहिर राज भसीन, जिनेलिया डिसूजा, पारस  अरोड़ा, नरेंद्र झा, आदिल हुसेन..

क्या मौका परस्त और खुदगर्ज हैं तारेक फतह

जब आप पहली दफा तारेक फतह से रूबरू हों, तो आप को खुद के सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस मार्कन्डेय काटजू के सामने होने की गलतफहमी हो सकती है. वजह महज यह नहीं कि एक हैयर स्टाइल को छोड़ फतह और काटजू की शक्ल सूरत नैन नक्श और चश्मा तक भी मिलते जुलते हैं, बल्कि इन दोनों मे एक अदभुद समानता मुंहफट होने की भी है. फर्क इतना है कि काटजू बिना सोचे समझे कहीं भी कुछ भी बोल सकते हैं, जबकि फतह की न केवल जुबान से बल्कि जिस्म के रोएं रोएं से पाकिस्तान के खिलाफ जहर रिस्ता रहता है.

पाकिस्तान में पैदा हुये और कनाडा में रह रहे तारिक फतह भोपाल में थे. मौका था राज्य सरकार द्वारा आयोजित जलसे लोक मंथन का, जो आम सरकारी आयोजनों की तरह तकरीबन बेमकसद और एक हद तक हिन्दू राष्ट्रवाद की अवधारणा को पुख्ता करने की मुहिम का हिस्सा था. देश के कई सरकारी और गैर सरकारी बुद्धिजीवियों ने इसमें शिरकत की पर आकर्षण का केंद्र तारेक फतह रहे, वह भी उस सूरत में जब अधिकांश को यह भी नहीं मालूम था कि उन्होंने क्या और कितना लिखा है. लोग इतना भर उनके बारे में जानते हैं कि यह पाकिस्तानी लेखक दिल खोलकर पाकिस्तानी हुक्मरानों को गाली देता है और इन दिनों मोदी भक्तों की भीड़ का हिस्सा है.

भोपाल में भी फतह ने अपना पुराना कहा नए लफ्जों में दौहराकर हाट लूटी, तो उनकी बातें और खयालात सुन हर किसी के जेहन में एक सवाल जरूर कौंधा कि खुद को लेखक कहने बाला यह शख्स जब खुद के वतन और मिट्टी का नहीं हुआ, तो हमारा या किसी और का क्या खाकर होगा. भोपाल में उन्होंने ढेर बातें कीं, जिनका सार पिछली बातों से जुदा नहीं था, लेकिन मौका देखकर चौका उन्होंने यह कहते मारा कि हिंदुस्तान में कांग्रेस की जमीन निचले लेबल पर है और राहुल गांधी के लिए खासतौर से नरेंद्र मोदी को सशक्त नेतृत्व के मामले में चुनौती देना नामुमकिन काम है.

साधारण पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय राजनीति में आए मोदी को दूसरे नेताओं के मुकाबले जमीनी समझ ज्यादा गहरी है. पाकिस्तान पर बोलते उनकी बेबाकी कायम थी कि यह मुल्क के नाम पर बड़े झूठ नफरत की बुनियाद पर खड़ा धोखा है, जो दुनिया भर में आतंक की फेक्ट्री बन चुका है, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, अब बस मोदी ही उसका इलाज कर सकते हैं.

अव्वल तो हिंदुस्तानियों का दिलो दिमाग जीतने और उनसे तालियां पिटवाने इतना ही काफी था, लेकिन फतह पूरे रंग में थे, लगे हाथ उन्होंने यह सनसनीखेज सा एतिहासिक रहस्योद्घाटन यह भी कर डाला कि भारतीय मुसलमानों के पूर्वज पहले से यहीं थे और वे मुसलमान नहीं, बल्कि हिन्दू जैन और बौद्ध थे और जिस हजार साल की मुगल हुकूमत पर वे इतराते हैं, वह हमलावर थे, जिनके पुरखों ने सनातनी संस्कृति (धर्म नहीं) अपनाई थी. अगर भारत की रूह से जुड़ना है तो यहां के मुसलमानों को यह एतिहासिक भूल सुधारनी होगी.

कश्मीरियों के लिए भी उनके पास एक नेक मशवरा यह था कि वे याद रखें कि भारत ही उनका भूत था वर्तमान है और भविष्य रहेगा, वह बौद्ध और हिन्दू परम्पराओं (धर्म नहीं) का गढ़ रहा है. बेहद गंभीर समस्या और मसले पर तो इस देश के कट्टर हिंदुवादी भी नहीं बोल पाते, जितना खुलकर तारेक फतह बोले और बोले तो क्यों बोले उनकी मंशा पर गौर करें तो वह बेहद साफ है कि वे तसलीमा नसरीन की तरह भारत में बसना चाहते हैं, यहां कि नागरिकता चाहते हैं, क्योंकि जो इज्जत और हिफाजत यहां है, वह कनाडा या किसी दूसरे देश में नहीं, इसलिए वे जामवंत की तरह ह्रदय को भाने वाले वचन बोल रहे हैं.

कट्टरपंथ की आलोचना हर्ज की बात नहीं पर फतह जैसे लेखकों के साथ दिक्कत यह है कि वे इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं और इसका सटीक इलाज नहीं बता पाते. साहित्यिक नीम हकीमी से किसी को कुछ नहीं मिलता, लेकिन मुमकिन है फतह जो केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी से चाहते हैं, वह उन्हें मिल जाए, क्योंकि यह एक कूटनीति के तहत हर दौर में होता आया है कि दुश्मन के बुद्धिजीवी और अहिंसक दुश्मन को पनाह देना हर्ज की बात नहीं, वह भी उस सूरत में जब वह अपने धर्म संस्कृति और देश तक को आपके निजाम और हुकूमत की सामने बौना साबित कर रहा हो. अगर किसी इनाम नहीं तो बख्शीश का हकदार तो वह होता ही है, और नागरिकता का क्या है वह तो राजा के गले में पड़े हार की तरह है, जिसे उतारकर उसकी तरफ फेकने में दस सेकेंड भी नहीं लगना.

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