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एयरटेल ने खोला पैमेंट बैंक

एयरटेल ने देश का पहला पेमेंट्स बैंक लॉन्च किया है. कंपनी ने इसकी शुरुआत राजस्थान में अपना पहला पेमेंट बैंक खोलकर पायटल प्रोजेक्ट के तौर पर की है. एयरटेल का यह बैंक बचत खातों पर 7.25 फीसदी की दर से ब्याज देगा, जबकि ज्यादातर बैंक बचत खातों पर सिर्फ चार फीसदी ब्याज ही देते हैं.

एयरटेल की तरफ से बुधवार को जारी एक बयान में बताया गया कि एयरटेल पेमेंट्स बैंक भारती एयरटेल की सहायक कंपनी है. कंपनी ने बताया कि अब राजस्थान के गांवों, कस्बों और शहरों के उपभोक्ता एयरटेल के रिटेल आउटलेट्स पर जाकर अपना बैंक खाता खुलवा सकते हैं. यहां बुनियादी बैंकिंग सेवाएं भी मिलेंगी.

बयान में बताया गया, ‘इसके साथ ही एयरटेल देश का पहला भुगतान बैंक बन गया है, जो चालू हो चुका है. एयरटेल राजस्थान में अपने 10,000 रिटेल आउटलेट्स के माध्यम से बैंकिंग सेवाएं देगी. एयरटेल बैंक की योजना राजस्थान में अपने मर्चेंट नेटवर्क को बढ़ाकर साल के अंत तक एक लाख करने की है, जो डिजिटल पेमेंट सिस्टम को को बढ़ावा देगा.’

खाताधारकों को नहीं मिलेगा एटीएम कार्ड

एक अंग्रेजी अखबार के खबर के मुताबिक, पेमेंट बैंक के खाताधारकों को एटीएम या डेबिट कार्ड जारी नहीं किया जाएगा लेकिन उनको निर्धारित एयरटेल रिटेल आउटलेट्स पर कैश निकालने की सुविधा मिलेगी. बैंक सभी बचत खातों के साथ 1 लाख रुपये का मुफ्त निजी दुर्घटना बीमा भी कराएगा.

आसान हुआ स्टार्टअप में निवेश करना

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने स्टार्टअप कंपनियों में निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में एंजल निवेशकों के लिए नियमों में ढील दी है. इसके तहत नए व्यावसायिक विचारों को सहारा देने वाले ऐसे निवेशक अब 5 साल तक पुरानी इकाइयों में पूंजी लगा सकेंगे.

न्यूनतम निवेश की सीमा भी 50 लाख रुपये से घटा कर 25 लाख कर दी गई. स्टार्टअप क्षेत्र के ऐसे निवेशकों को अपनी निवेश योग्य निधि के एक चौथाई हिस्से को विदेशी उद्यमों में निवेश करने की छूट होगी. यह इस बारे में अन्य क्षेत्र के एंजल निवेशकों के लिए लागू नियम के ही अनुरूप है. सेबी ने एक योजना में एंजल निवेशकों की अधिकतम संख्या 49 से बढ़ाकर 200 कर दी है.

स्टार्टअप क्षेत्र में निवेश कोष के लिए तय न्यूनमत सीमा 50 से घटा कर 25 लाख कर दी है. इसके पीछे सोच यह है कि विचार के स्तर पर कुछ इकाइयों को ज्यादा धन की जरूरत नहीं होती. भारत में स्टार्टअप क्षेत्र के लिए वैकल्पिक निवेश कोष उद्योग के विकास और स्टार्टअप इकाइयों के लिए अनुकूल नियामकीय वातावारण उपलब्ध कराने के बारे में सिफारिश करने के लिए मार्च 2015 में इन्फोसिस टेक. के पूर्व प्रमुख एनआर नारायणमूर्ति की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी.

सेबी ने एफपीआई को असूचीबद्ध कॉर्पोरेट बांड में निवेश की अनुमति दी

सेबी ने पूंजी बाजार को व्यापक बनाने के मकसद से एफपीआई (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) को असूचीबद्ध कॉर्पोरेट ऋण प्रतिभूतियों और बिना गारंटीशुदा ऋण पत्रों में निवेश की मंजूरी देने का फैसला किया है. इसमें 35,000 करोड़ रुपये की सीमा लगाई गई है. सेबी के निदेशक मंडल की बैठक में इस आशय का फैसला किया गया.  

9 महीने के निचले स्तर पर पहुंचा रुपया

वैश्विक बाजार में डॉलर में तेजी लौटने और स्थानीय शेयर बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी का सिलसिला बने रहने के कारण अमेरिकी मुद्रा के आगे रुपये में लगातार गिरावट दर्ज की गई. भारत में बड़े आकार के नोटों पर पाबंदी की पृष्ठभूमि में विदेशी निवेशकों के सौदे घटाने के साथ-साथ अमेरिका में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में वृद्धि किए जाने की ताजा संभावनाओं के बीच रुपए पर दबाव बढा है. बाजार सूत्रों ने कहा कि तेल कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ने से रुपए पर दबाव और बढ़ गया था.

आयातकों ने भविष्य के बचाव के लिए आक्रामक हेजिंग भी शुरू कर रखी थी. अन्तरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 68.36 पर कमजोर खुला. मंगलवार को यह 68.25 पर बंद हुआ था. दिन में 68.56 रुपये प्रति डॉलर के निम्न स्तर को छूने के बाद रुपया अंत में 31 पैसे या 0.45 प्रतिशत की गिरावट के साथ 68.56 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

यह स्तर 26 फरवरी के बाद का न्यूनतम स्तर है. बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 91.03 अंक की तेजी के साथ 26,051.81 अंक पर बंद हुआ. इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने आज के कारोबार के लिए संदर्भ दर 68.4772 रुपये प्रति डॉलर और 72.7844 रुपये प्रति यूरो निर्धारित की थी. अन्तरमुद्रा कारोबार में पौंड के मुकाबले रुपये में तेजी आई, जबकि यूरो और जापानी येन के मुकाबले रपये में गिरावट आई.

कालाधन बन रहा पार्टी धन

देश को कालाधन से मुक्त कराने की राह में सबसे बड़ी बाधा खुद राजनीतिक पार्टियां बन रही हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों के पास चंदे के रूप में बंद हो चुकी 500 और 1000 के नोट खाते में जमा हो रहे हैं. यह रकम अलग अलग कार्यकर्ताओं के द्वारा जमा कराई जा रही है.

लखनऊ में राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी के अध्यक्ष प्रताप चन्द्रा कहते हैं, कालाधन सबसे बड़ी मात्रा में नेताओं, अफसरों और बड़े बिजनेस मैन के पास है. यह लोग राजनीतिक दलों को चंदा देते रहे हैं. अब पुराने नोट बंद होने के बाद यह लोग बैकों में पुराने नोट जमा करा रहे हैं. यह लोग इस जमा पैसे के एवज में पार्टी से चुनावी खर्च के रूप में कुछ पैसा वापस भी पा जायेंगे. ऐसे में कालाधन पार्टियों में जमा होकर सफेद हो रहा है.

प्रताप चन्द्रा कहते हैं, नोट बंद होने के बाद केवल आमजनता ही परेशान दिख रही है बड़े लोग परेशान नहीं हैं. किसी बैंक की लाइन में नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ऐसे लोग राजनीतिक दलों के खातों में पैसा जमा करा रहे हैं. नोट बंद होने के बाद सभी दल एक दूसरे पर कालेधन को छिपाने और बचाने का आरोप लगा रहे हैं. माया, मुलायम, ममता और कांग्रेस पर आरोप लगाने वाली भाजपा भी इससे अलग नहीं है. यह बात सभी कर रहे है कि चुनाव में कालेधन का खर्च होता है. तब ऐसे इंतजाम क्यो नहीं किये गये कि राजनीतिक दल भी नोट बंद होने के बाद अपने खाते में जमा होने वाले चंदे का हिसाब दे. बात राजनीतिक दलों की है इसलिये हर दल चुप है.

प्रताप चन्द्रा कहते हैं, राजनीतिक दल आयकर की सीमा से बाहर है. क्योंकि आयकर की सीमा में वह लोग आते हैं जो आय करते है. राजनीतिक दलों की कोई आय नहीं है इसलिये आयकर सीमा में नहीं आते. राजनीतिक दलों पर जनसूचना अधिकार कानून लागू नहीं है. ऐसे में वह यह बताने के लिये बाध्य नहीं है कि उनको कितना पैसा मिला है. राजनीतिक दल केवल चुनाव आयोग को अपनी सालाना बैलेंस शीट देते है जिसमें यह लिखा होता है कि कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ. ऐसे में यह पता ही नहीं चल पायेगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हो. यही वजह है कि कालाधान को पार्टी फंड में डाल कर सफेद धन बनाने का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है.

अगर कालाधन रोकना है, चुनाव में कालाधन के प्रभाव को खत्म करना है तो राजनीतिक दलों को आयकर कानून और जनसूचना अधिकार कानून के तहत लाना होगा. जब तक यह सुधार नहीं होंगे तब तक कालाधन को खपाने में पार्टी फंड सबसे कारगर उपाय की तरह प्रयोग होता रहेगा. नेता ही नहीं अफसर भी अपने कालेधन को खपाने के लिये पार्टियों की शरण में जाते रहेंगे.

राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी इस मुददे को लेकर आंदोलन करने की तैयारी में है. इसके साथ ही साथ वह भ्रष्टाचार की लड़ाई की अगुवाई करने वाले अन्ना हजारे से मिलकर आवाज को बुलंद करने जा रही है. प्रताप चन्द्रा कहते हैं कि जब तक चुनाव सुधार नहीं होगे समाज में बदलाव संभव नहीं है. राजनीतिक दल किसी पवित्र नदी की तरह गंदगी को साफ करने का जरीया बनते रहेगे.

टल गई शक्ति अरोड़ा और नेहा की शादी

नोट बंदी के चलते वह लोग ज्यादा परेशान हैं, जिनके परिवार में या जिनकी अपनी शादी नवंबर या दिसंबर में होनी है. इससे टीवी कलाकार भी परेशान है. टीवी कलाकार शक्ति अरोड़ा और नेहा सक्सेना की शादी 15 नवंबर को होनी थी, लेकिन नोटबंदी के चलते यह दोनों कैटरर व अन्य लोगों को समय पर पैसा नहीं दे पाए, जिसके चलते 15 नवंबर को इनकी शादी नहीं हो पायी. अब इनकी शादी कब होगी, यह इन्हें भी नहीं पता.

खुद शक्ति अरोड़ा कहते हैं, ‘विवाह के रस्मों रिवाज व विवाह से जुड़े दूसरे मदों मसलन हाल व कैटरर को समय पर पैसा देना था. हम इन्हें एडवांस तो दे चुके थे, पर बाकी का पैसा नहीं दे पाए. नोटबंदी के चलते हम एटीएम या बैंक से उतना पैसा नहीं निकाल पाए. कैटरर वगैरह चेक लेने को तैयार नहीं थे. अंततः मजबूरन हमें अपनी शादी टालनी पड़ी. अब हमारी शादी कब होगी, यह आज हम बताने में असमर्थ हैं.’

काला धन खत्म करने की कवायद

नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रूप्ये का नोट बैन क्या किया, रातोंरात देश में साम्यवाद आ गया है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सारे धनी-गरीब, ईमानदार-बेईमान, मंत्री-संत्री सब लाइन में खड़े हो गए हैं.

प्रधानमंत्री की घोषणा के कम से कम अगले ही दिन सत्तापक्ष के समर्थकों ने कुछ इसी तरह का प्रचार किया. कहा भारतीय समाज में क्या अद्भुत समानता आ गयी है. अमीर-गरीब की खाई पट गयी. सब एक ही कतार में लग गए हैं.

लेकिन एक फर्क भी देखा गया. वह यह कि कुछ को जगराता कर कम से कम दो दिनों तक लगातार कतार में खड़ा होने के बाद कुछ ही पैसे हाथ लगे तो कोई रात-रात भर जग कर अपने लाखों-करोड़ों को ठिकाना लगाने की सोच में लगा रहा. हालांकि दोनों ही जीवन संग्राम के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. लेकिन एक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए जग रहा था तो दूसरा सहूलियत बरकरार रखने की जुगत में जगा था.

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद रोज कमाने-खानेवाले गाहेबगाहे यही पूछते रहे कि अच्छा, मोदीजी ने नोट रद्द करके वाकई अच्छा किया? क्या वाकई देश में साम्यवाद आ गया है? दलालतंत्र खत्म हो पाएगा? क्या इससे महंगाई कम होगी? देश से काला धन पूरी तरह खत्म हो जाएगा? यह और बात है कि इन सवालों का जवाब तो अभी तक धुरंधर राजनीतिज्ञों या अर्थशास्त्र के जानकारों के पास भी नहीं है.

बहरहाल, 15 दिन बीत चुके हैं और इसके बाद भी स्थिति कुछ खास नहीं बदली. हर रोज सुबह लोग पौकेट में हाथ डाल कर देख लेते हैं कि कितना पैसा जेब में है. जो बचा है, उससे कितने दिनों का गुजारा हो सकेगा! दो हजार का नोट लिये हुए बहुत सारे लोग बाजार में दर-दर की ठोकर खा रहे हैं. अभी जिस दिन नरेंद्र मोदी ने नोट बैन की घोषणा की, दूसरे दिन मुहल्ले के सब्जीवाले से लेकर किराना, लौंड्री, दूधवाले, मछली वाले ने अभयदान देते हुए कहा था, चिंता की कोई बात नहीं. पैसे कहां भागे जा रहे हैं. लेकिन दो-चार दिन जाते-न-जाते स्थिति इतनी भ्रामक बन कर सामने आयी कि इनलोगों ने भी एकदम से मुंह फेर लिया. उधार तो क्या, छुट्टे तक के लाले पड़ गए.

डेबिट, क्रेडिट, ई-वालेट, ई-पॉकेट, पेटीएम अभी तक हमारे देश में सबके बस की बात नहीं रही है. जाहिर है उथल-पुथल मचना ही था. लगभग युद्ध जैसे हालात बन गए – कभी सामना मुहल्ले का मोदी यानि किराना या परचूनवाला से होता तो कभी प्रधानमंत्री मोदी के चाटुकारों से छायायुद्ध में भिड़ना होता.

पुराने नोट खपाने की जुगत

प्रधानमंत्री के घोषणा के बाद पूरे देश में जो वस्तुस्थिति बनी वह कुछ इस तरह की थी. जिनके पास भी अतिरिक्त मात्रा में पुराने नोट थे वे सबके सब उन्हें खपाने या ठिकाने लगाने की जुगत में लग गए. इसी क्रम में कोलकाता के बड़ा बाजार से लेकर बहू बाजार ही नहीं; देश भर के झवेरी बाजार में कारोबार सारी रात चला. ज्वेलरी दूकानों में पुराने नोट के बदले सोने-हीरे जेवर, बिस्किट, बार की खरीद-फरोख्त होती रही. हालांकि भारत के हर छोटे-बड़े शहरों का हाल एक-सा ही रहा. काले पैसे के लेन-देन में सोना आसमान छू बैठा. यही नहीं, विदेशी मुद्रा का बाजार भी 'रुक्का' के जरिए गरमा गया. रुक्का यानि कागज के टुकड़े में सांकेतिक भाषा में एक नंबर लिख कर मोटे कमीशन के बल पर रुपए की तस्करी परवान चढ़ी. जानकार बताते हैं कि यह मामला दरअसल, सोये पड़े कंपनी के आयकर फाइल में रकम डाल कर उस रकम को दूसरे रास्ते से निकाल लेना है. कारोबारी दुनिया में यह तिकड़म पुराना है. अब इसका इस्तेमाल नोट बदलने के लिए हो रहा है.

और तो और, पुराने नोट में अग्रिम वेतन चुकाने के भी मामले सामने आए हैं. लोहे की आलमारी बनाने वाले एक निजी कारखाने का मालिक के यहां काम करनेवाला संजय पात्र का वेतन महीना खत्म होने से पहले ही हवा हो जाया करता था. लेकिन कारखाने के मालिक ने नौ तारीख को अपने सभी कर्मचारियों को अग्रिम वेतन देकर पुराना नोट खपाया. वह भी तीन-तीन महीने का अग्रिम वेतन भी दे दिया गया.

बड़ाबाजार में साड़ी की दूकान में कार्यरत विनय बिहारी गुप्ता के भी भाग खुल गए. लगभग 20 सालों से विनय बिहारी इस दूकान में काम कर रहे हैं. कभी ऐसा सौभाग्य नहीं हुआ. विनय बिहारी का एक बैंक एकाउंट तो है, लेकिन कभी-कभार ही बचत के पैसे एकाउंट में जमा होते. पगार नगदी मिलती रही है. महीने का अंत ज्यादातर पैसों की किल्लत से होता है. ऐसे में बचत किस चिडि़या का नाम है – विनय बिहारी को पता नहीं. लेकिन दूकान मालिक ने मार्च तक का पगार और साथ में 40 हजार का नकदी बोनस की घंटी गले में बांध दी. इतनी बड़ी रकम देख कर विनय बिहारी खुद को रोक न पाए. जहां नकदी का अकाल है वहां पैसों की बरसात को नजरअंदाज भला कैसे कर पाते. वे कहते हैं इतनी नकदी देख कर ख्याल यही आया कि अभी तो रख लेते हैं, बाद की बाद में देख लेंगे.

ऐसा नहीं है कि संजय पात्र या विनय बिहारी गुप्ता इस मेहरबानी के पीछे छिपी असलियत से वाकिफ नहीं हैं. वे जानते हैं कि पुराने नोटों की खपत इसी तरह की जा रही है. संजय पात्र के कारखाने के मालिक ने साफ लफ्जों में बता भी दिया कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो कारखाना ठप्प हो जाएगा. संजय को समझ है कि अगर वह मना कर देता है तो क्या पता आनेवाले दिनों में रोजगार का संकट पैदा हो जाए!

चाटर्ड एकाउंटेंट पिंकी दवे का कहना है कि अगर इस तरह से वेतन, बोनस या अन्य मद में अग्रिम के तौर पर पुराने नोट खपाए जा रहे हैं तो निसंदेह कारोबारियों ने अपनी तिजोरी में 500/ 1000 के नोटों की नकदी मौजूदगी को कम करने के मकसद से यह जुगत लगाया है. यह काला धन को सफेद करने की यह भी प्रक्रिया है. इन मदों में दिए गए पैसों का हिसाब आयकर विभाग की नाराजगी का कारण नहीं बनेगा. निजी दूकानदार या कारखाने की बात तो जाने दें. नकदी संकट के समय केंद्र सरकार ने भी ग्रुप सी और ग्रुप डी के कर्मचारियों को नवंबर महीने के वेतन से अग्रिम दस हजार नकदी ले लेने की छूट दे दी. खबर है कि अन्य कई राज्यों के सरकारी कर्मचारियों ने भी ऐसी ही सहूलिहत की मांग की. बहरहाल, काले धन को सफेद बनाने के इस तरीके को इन दिनों अपनाया जा रहा है.  

हां, इतना जरूर है कि आयकर सवाल कर ही सकता है कि पेशगी के तौर पर कर्मचारियों को पैसे आखिर क्यूं दिए गए? जवाब में बीमारी, पढ़ाई और ब्याह जैसे कर्मचारियों की निजी जरूरत का बहाना बनाया जा सकता है. लेकिन बहुत बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आड़ ली गयी तो इसे साबित करना कठिन हो सकता है. वैसे अपने हिसाब-किताब को साफ-सुथरा करने के लिए कारोबारियों के पास अभी मार्च 2017 तक का समय है.

वहीं इस पूरे प्रकरण के बारे में कोलकाता के एक छुटभइए नेता का कहना है कि जो पैसे बनाना जानते हैं, वे पैसे बचा लेना भी बखूबी जानते हैं. बेकार टेंशन पालने की जरूरत ही क्या है! जाहिर है बेटी बचाओ नारे के बीच कहना ही पड़ेगा कि बेटी बचे या न बचे, करोड़ों-अरबों बनाने की चाह आसानी से तो नहीं मरती.

धन: काला और सफेद

इस पूरे प्रकरण में बांग्ला कथाकार शीर्षेंदु मुखर्जी की सोच जरा हट कर है. इनका कहना है कि असल में, देखा जाए तो रुपए-पैसे का न तो कोई चरित्र होता है और न ही रंग. जिसके हाथों में है, वही उसका मालिक बन जाता है. इसी‍ तरह इसका कोई रंग भी नहीं होता. किसी के हाथ में हो तो काला तो किसीके हाथ में सफेद! एक रुपया को ही ले लें. यह एक रुपया दिन भर में  कितने हाथों में घूमता है. इस एक रुपया में क्या कुछ खरीदने और बेचने की क्षमता रखता है. देख लिया जाए. एक बच्चा दूकान में जाकर एक रुपया की टॉफी खरीदता है. दूकानदार इस एक रुपया से चाय पीता है. चायवाला इसी एक रुपया से बीड़ी खरीद कर पीता है. इस तरह यह एक रुपया पूरे दिन जाने कितनों के हाथों घूमता है और दिन भर में कम से कम 30-40 रुपए की खरीदारी-बिक्री कर लेता है. अगले दिन भी कम से कम और भी 30-40 रुपए की खरीदारी-बिक्री हो जाती होगी. लेकिन बावजूद इसके एक पूरा दिन खत्म हो जाने के बाद भी उसकी कीमत एक रुपया ही रहती है. यानि कह सकते हैं यह एक रुपया रमता जोगी है. किसी से, कहीं भी जुड़ता नहीं है. पर होता है बंधनमुक्त. घुमक्कड़ और यायावर ही बन रहता है. इस पर काई कभी नहीं जमती. यह रुपया सफेद होता है.

आगे वे कहते हैं कि कभी-कभार कुछ रुपया किसीके चक्कर में पड़ कर गायब भी हो जाता है. या किसी छोटी-बड़ी तिजोरी में धुनी रमा कर बैठ जाता है. जब निकलता है, तब चोरी-छिपे निकलता है. अंधेरे में, चोर दरवाजे से, नकाबपोश बनकर. कभी निवेश के लिए तो कभी खरीद-बिक्री के लिए. जाहिर है तब यह शक के दायरे में आ जाता है. यह काले पैसे के रूप में जाना जाता है. लेकिन 8 नवंबर की रात आठ बजे ऐसे धन के अज्ञातवास पर चोट पड़ी. वैसे इनका अज्ञातवास खत्म हुआ या नहीं – यह पुख्ता तौर पर अभी कहा नहीं जा सकता.

बहरहाल, साफ है अब तक इसी काले और सफेद – दोनों के अस्तित्व के बल पर ही बाजार का लेन-देन चल रहा था. कुछ का तो मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था में काले धन का अवदान कुछ कम नहीं. इसीलिए समानांतर रूप से एक को काला और दूसरे को सफेद करार देना बहुत कठिन है. माना तो यह भी जाता है कि जिनके पास काला धन है वे और कुछ नहीं तो उन्हें नष्ट कर दें; यह बात सरकार के हक में जाती है और ऐसा इसलिए कि सरकार को उस रकम का बोझ वहन नहीं करना पड़ेगा.

शीर्षेंदु कहते हैं कि मोदीजी ने अच्छा किया या बुरा – पता नहीं. हां, इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जरा तैयारी के साथ मोदीजी आते तो अच्छा होता. हालांकि इसे कोई बहुत बड़ी गलती तो नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन जनता को बड़ी तकलीफ हुई. उस जनता को जिसके एक बड़े हिस्से के पास झक्क सफेद पैसे हैं, इतने सफेद कि लगता है वे पैसे एनिमिया के शिकार हों. लेकिन जिनके पास काला धन है, उनके वे पैसे जाने कब छद्मवेश में जमीन, सोने के बिस्किट या शेयरों में निवेश किए जा चुके हैं. ऐसे में लगता है इस पूरे प्रकरण में आम जनता को नाहक परेशानी हुई.

पानी ही फिर गया

एक चालू किस्म की शायरी है, जरा उस पर गौर फरमाइएं –

मेरे जनाजे के पीछे सारा जमाना निकला,

पर वह न निकली जिसके लिए जनाजा निकला.

जी हां, इन दिनों देश में स्थिति कुछ ऐसी ही बनी हुई है. जुगत और दलालतंत्र ने देश से काला धन के नाश की मोदी की मंशा (!) पर पानी फेर दिया. देश में मौजूद कालाधन खत्म करने के लिए मोदीजी ने पुराने 500/1000 रु. के नोटों पर बैन लगाया था. लेकिन मजेदार बात यह है कि घोषणा के अगले ही दिन दलालतंत्र पूरे देश भर में सक्रिय हो गया. 8 नवंबर की रात को प्रधानमंत्री की घोषणा से घबराए लोग सड़क पर निकल आए. हरेक एटीएम के सामने भीड़ लग गयी. वहीं बाजार-मुहल्ले के अवसरवादी तत्व मोटा कमीशन की शर्त पर दलाल, मनी ऑपरेटर, मनी मैनेजर में तब्दील हो गए. फोन की घंटियां बजनी शुरू हो गयी – कितना है? इतना. काम हो जाएगा? हो जाएगा. पर कमीशन लगेगा. कितना कमीशन? 10-30 लाख की रकम पर 20-35 प्रतिशत कमीशन.

इन कुछ दिनों में कोलकाता में एशिया के बड़े थोक बाजार बड़ाबाजार में दूकानदार कहने को तो मक्खी मार रहे हैं, लेकिन पिछले दरवाजे से 'कट मनी' का कारोबार अच्छा चल रहा है. इस काम में कारोबारी से लेकर ठेकेदार, प्रमोटर, मजदूर ठेकेदार और बिल्डर लग गए. इनके रेट कार्ड तक रातोंरात तैयार हो गए. रेट कार्ड के हिसाब से दस लाख से कम की रकम पर 20 प्रतिशत, 10-19 लाख की रकम पर 25 प्रतिशत, 20-29 लाख पर 30 प्रतिशत और 30 लाख से अधिक की रकम पर 35 प्रतिशत का कट मनी यानि कमीशन. दलालतंत्र 30 लाख से अधिक रकम पर हाथ लगाने से पीछे हट रहा है. इतना ही नहीं, बताया जाता है तय टाइम फ्रेम के तहत काम निपटाया जा रहा है और उसी हिसाब से भी कमीशन लिया व दिया जा रहा है. साथ कुछ और शर्ते भी हैं.

दरअसल, ऊपरी तौर पर देखा जाए तो कारोबार में सब कुछ कानूनी नजर आता है, लेकिन पर्दे के पीछे दूसरों से लिया गया 500/ 1000 का नोटोंवाली रकम दबे पांव कारोबार में शामिल होता है. इस भरोसे के साथ कि पुराने नोट देनेवाले को अगले महीने वह रकम नए नोटों के रूप में वापस मिल जाएगी. लेकिन 25-30 प्रतिशत की 'कट मनी' के बाद. इस तरीके से 10-20 लाख आराम से बदले जा सकते हैं. पर 30 लाख की रकम में थोड़ी परेशानी पेश आएगी. लेकिन सक्रिय दलालतंत्र इतना भी 'मैनेज' कर ले सकता है. पर इससे ज्यादा के लिए दलालतंत्र बमुश्किल ही तैयार हो रहा है.

आइए देखे, तरीका क्या है. इन दिनों काले धन को सफेद करने में करंट एकाउंट का इस्तेमाल हो रहा है. यहां यह जान लें कि ऐसे मामले में चालू खाता कई मर्ज का इलाज हो सकता है. शर्त केवल एक है और वह यह कि चालू खाता चालू हो. यानि सक्रिय हो. चालू खाते के माध्यम से लेनदेन होता रहा हो. अब जो दस्तावेज तैयार करना होगा वह 'बैक डेट' में होने चाहिए. जाहिर है आजकल बैंकों में चालू खाता बहुत सक्रिय हो गया है.

कोलकाता के एक डेवलपर का कहना है कि 'बैक डेटेड' दस्तावेजों में दिखाया जा रहा है कि निर्माण का काम जल्द से जल्द पूरा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा मजदूर काम कर लगाए गए. इन मजदूरों को मेहनताना और पेशगी का भुगतान दिखा कर यह काम आसानी से हो रहा है. ज्यादातर मंझोले व बड़े कारोबारियों का लेनदेन चालू खाते से होता है. और लगभग हर रोज कुछ न कुछ लेनदेन होता ही है. इसी चालू खाते के जरिए दूसरों से लिये गए पुराने नोटों की बड़ी रकम बैंकिंग सिस्टम में पहुंच जाती है. लेकिन दस्तावेजों को 'बैक डेट' दिखाना होगा. इसके बाद नियमानुसार नोट बदल कर 'कट मनी' लेकर बाकी रकम असली मालिक के हाथों लेकर पहुंच जाती है.  

कोलकाता के एक कर-सलाहकार ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि उपरोक्त तरीके से 5-10 लाख रुपए का काला धन हंसते-खेलते सफेद किया जा सकता है. ऐसे और भी कई तरीके हैं. कारोबारी यह भी दिखा सकता है कि उसके किसी क्लाइंट ने उससे कर्ज ले रखा था और अब वह रकम उसने वापस लौटाया है. कर्ज चुकता किए जाने से वह रकम आयी है. या फिर उधार में लिये गए माल के भुगतान के रूप में दिखाया जा सकता है. लेकिन इन मामलों में भी बैकडेटेड' दस्तावेज दिखाने होंगे.

500 और 1000 रूप्ये के पुराने नोटों की एक तय रकम दलालों को 10-30 दिनों की मोहलत में सौंपा जा रहा है. ठीक समय पर समय या समय से पहले पुराना चोंगा बदल कर नए नोट की वापसी होगी. पर पूरी रकम नहीं. कमीशन की रकम 'कट' करने के बाद बाकी रकम लौटा दी जाएगी. यह सब जुबानी कौल पर हो रहा है. वैसे भी बड़ाबाजार का कारोबार जुबानी कौल कर ही चलता है. मोटी रकम अयकर में 'झोंकने' या दो सौ प्रतिशत जुर्माने का शॉक झेलने के बजाए बगैर भाग-दौड़ की परेशानी मोले, बगैर बैंक अधिकारियों की हुज्जत किए पुराने नोट के बदले नए नोट मिल जाते हैं तो 'कट मनी' को बर्दास्त करना 'नॉट ए बिग डील'!    

अब इसका पुख्ता हिसाब कैसे लगेगा कि कहां कितनों ने अपनी-अपनी छिटपुट जुगत और दलालतंत्र के जरिए काले पैसों को सफेद किया. ऐसे में लगता है कि जहां से चले थे, इतनी सारी हुज्जत के बाद फिर से देश वहीं आकर रुक गया.  एक वृत पूरा हुआ. हासिल कुछ खास नहीं हुआ.

अनिल कपूर को हॉलीवुड का सहारा

बॉलीवुड में अनिल कपूर का करियर घिसट घिसट कर ही आगे बढ़ रहा है. बॉलीवुड के अपने करियर को गति देने के लिए उन्हें अब बार बार हॉलीवुड व अमरीकन फिल्म या टीवी सीरीज का सहारा लेना पड़ रहा है. यह एक कटु सत्य है. भले ही अनिल कपूर इस सच को कबूल करने की बजाय पत्रकारों पर आरोप लगाएं कि पत्रकार उन पर निजी हमला करते हैं.

हॉलीवुड फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ ने अनिल कपूर के करियर को उस वक्त जीवनदान दिया था, जब उनका करियर समाप्त सा हो गया था. उसके बाद अनिल कपूर ने अमरीकन टीवी सीरीज ‘24’ में अभिनय किया, जिससे उन्हें अच्छी खासी शोहरत मिली.

इस शोहरत को भुनाने के लिए अनिल कपूर ने अमरीकन टीवी सीरीज ‘24’ के अधिकार खरीदकर उसका भारतीयकरण कर ‘स्टार प्लस’ के लिए सीरियल ‘24’ का निर्माण करने के साथ उसमें अभिनय किया. यह सीरियल किसी तरह से मामुली सफलता बटोर पाया था. इसके बाद अनिल कपूर गत वर्ष ‘दिल धड़कने दो’ और ‘वेलकम बैक’ जैसी असफल फिल्मों में नजर आए. तब अनिल कपूर ने बड़े उत्साह के साथ टीवी सीरियल ‘24’ का दूसरा सीजन बनाया, जिसमें एक बार फिर उन्होंने अभिनय किया. यह सीरियल फिलहाल ‘स्टार प्लस’ पर ही प्रसारित हो रहा है, मगर बुरी तरह से असफल है. इसे टीआरपी नहीं मिल रही है. ज्ञातब्य है कि इस सीरियल के निर्देशक अभिनय देव निर्देशित फिल्म ‘फोर्स 2’ भी बॉक्स आफिस पर रो रही है.

इतना ही नहीं अनिल कपूर पिछले चार वर्ष से भी अधिक समय से अनुजा के उपन्यास ‘बैटल फॉर बिठोरा’ पर अपनी बेटी सोनम कपूर को लेकर फिल्म बनाना चाहते हैं, मगर अब तक इस फिल्म की कोई प्रगति नहीं हुई. तो वहीं उनकी बेटी रिया कपूर ने ‘वीरे दी शादी’ फिल्म के निर्माण की घोषणा की है, इसमें सेानम कपूर, करीना कपूर व स्वरा भास्कर हैं, मगर यह फिल्म भी अधर में लटकी हुई है. ऐसे में एक बार फिर अनिल कपूर को विदेशी सीरीज का ही सहारा नजर आ रहा है.

जी हां. अब अनिल कपूर एक अमरीकन वैज्ञानिक वेब सीरीज ‘एमाजॉन ग्लोबल ओरीजनल’ में रोचक किरदार निभाने जा रहे हैं. यह सीरीज माइकल फेबर की किताब ‘द बुक ऑफ स्ट्रेंज न्यू थिंग्स’ पर आधारित होगी, जिसे केविन मैकडॉनाल्ड निर्देशित कर रहे हैं. केविन इससे पहले 2006 में ‘द लास्ट किंग आफ स्कॉटलेंड’ निर्देशित कर जबरदस्त शोहरत बटोर चुके हैं. इसमें एक पादरी की कहानी है, जो दूसरे ग्रह पर नई कॉलोनी की तलाश में जाता है. वहां नए परीक्षणों पर उसका भरोसा बढ़ने के साथ ही नए जीवन की तलाश भी पूरी होती है. अनिल कपूर इस वेब सीरीज के पायलट एपीसोड के लिए दक्षिण अफ्रीका जाकर शूटिंग कर चुके हैं. इसमें अनिल कपूर विक्रम दानिश के किरदार में नजर आएंगें.

इस वेब सीरीज की चर्चा करते हुए अनिल कपूर कहते हैं, ‘‘मैं हमेशा खुद को इस स्थिति में रखना पसंद करता हूं, जिसमें असफल होने की गुंजाइश ज्यादा हो. अंग्रेजी भाषा के सीरियल या फिल्मों में अभिनय करने से हमें डर लगता है. हम इस भाषा के लोगों के साथ सीधे तारतम्य नहीं बैठा पाते हैं. भाषा की वजह से हम जिनके साथ काम कर रहे होते हैं, उनसे भी नहीं जुड़ पाते हैं. ऐसे अपरिचित माहौल में असफल होने की संभावनाएं हमेशा बढ़ जाती है. पर मुझे उसी में मजा आता है. मैं हमेशा अपना दायरा विकसित करने में यकीन करता हूं.’’

अनिल कपूर आगे कहते हैं, ‘‘मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे इस वेब सीरीज के साथ जुड़ने का अवसर मिला. केविन काफी बुद्धिमान हैं. उन्हें निर्देशन करते देखते हुए मैंने अपनी आंखों के सामने अजूबे कंटेंट की परते खुलते हुए देखा. यदि मैं यह न करता तो बहुत बड़ा अवसर खो देता.’’

इस वेब सीरीज में अभिनय कर अनिल कपूर पहले बॉलीवुड कलाकार बन गए हैं, जो कि अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज में कदम रख रहे हों.

बिपासा बसु के करियर पर लगा ग्रहण

बिपासा बसु का करियर लंबे समय से कुछ ठीक नहीं चल रहा है. करण सिंह ग्रोवर के संग विवाह करने के बाद भी बिपासा बसु के करियर में कोई प्रगति नहीं हुई. बिपासा बसु को बड़ी मुश्किल से ‘इरोस’ निर्मित और रोहन सिप्पी निर्देशित 12 एपीसोडों की राजनीतिक वेब सीरीज ‘‘द क्लाइंट’’ में अभिनय करने का मौका मिला. बिपासा बसु ने इसके पायलट एपीसोड की शूटिंग की. उम्मीद थी कि इसका प्रसारण नवंबर माह के अंतिम सप्ताह में शुरू हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

सूत्रों के अनुसार रोहन सिप्पी ने इसका पायलट एपीसोड ‘इरोस’ के पास जमा करने के बाद ‘इरोस’ से कई बार इसके अगले एपीसोड फिल्माने के बारे में पूछा, लेकिन ईरोस उन्हे कोई जवाब नहीं दे रहा है. यानी कि ‘द क्लाइंट’ पर फिल्हाल के लिए बंद हो गई है. परिणामस्वरूप बिपासा बसु का करयिर नए सिरे से शुरू होने से पहले ही ग्रहण का शिकार हो गया.

नवाजुद्दीन को अपनी उंगलियों पर नचा रहे टाइगर

​इरॉस इंटरेनशनल और विक्की राजानी निर्मित फिल्म ​मुन्ना माइकल के लिए अभिनेता टाइगर श्रॉफ और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी पहली बार स्क्रीन शेयर करते हुए दिखेंगे.

फिल्म में नवाज के साथ टाइगर डांस करते हुए भी नजर आएंगे और इसकी तैयारी भी जारी है , टाइगर नवाज को डांस और कोरियोग्राफी में मदद कर रहे है.

नवाज़ुद्दीन कहते हैं " टाइगर बहुत ही बढ़िया डांसर है, मैं थोड़ा थोड़ा करके सीख रहा हूं. डांस के बारे में मेरे मन में हमेशा से एक ब्लॉक रहा है तो मेरे शरीर को इसकी आदत नहीं है, और डांस की मेरे शरीर को आदत भी नहीं है. टाइगर बहुत ही शांतदिमाग के हैं, काम के साथ हमारा बॉन्ड भी अच्छा है, और वह अपने  काम से काम रखता है. वे बहुत शांत हैं, वह सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक हैं जिन के साथ मैंने काम किया है . 

इरॉस इंटरनेशनल और विक्की रजानी निर्मित तथा टाइगर श्रॉफ, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और निधि अग्रवाल अभिनीत फिल्म मुन्ना माइकल 7 जुलाई 2017 को प्रदर्शित होगी.

आखिर करण-भूषण की फिल्म को मिल ही गए निर्माता

फिल्मकार भूषण पटेल निर्देशित रोमांचक फिल्म ‘अलोन’ में अभिनय करते हुए अभिनेता करण सिंह ग्रोवर और भूषण पटेल के बीच काफी गहरे संबंध बन गए थे. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद से भूषण पटेल व करण सिंह ग्रोवर एक अन्य रोमांचक फिल्म की कहानी को लेकर विचार विमर्श करते रहे हैं.

दोनों यह फिल्म एक साथ करना चाहते थे, पर इन्हें निर्माता की तलाश थी. यह तलाश अब जाकर पूरी हो गयी है. जी हां. करण सिंह ग्रोवर और भूषण पटेल की इस रोमांचक फिल्म को गजानन सुरेंद्र और शोभा कलबुर्गी ने बनाने का बीड़ा उठाया है.

‘लीजेंडरी मैन इंटरटेनमेंट प्रायवेट लिमिटेड’ के बैनर तले बनने वाली यह फिल्म जनवरी 2017 में शुरू होगी, इसे मुंबई के अलावा मलेशिया व बैंकाक में फिल्माया जाएगा. हरीश केवलानी फिल्म के एसोसिएट निर्माता होंगे.

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