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बिल भुगतान के लिए राष्ट्रीय निगम

सरकार नकदी के प्रचलन को कम कर के औनलाइन भुगतान को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है और उस के लिए उस ने भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) का गठन कर अपने मजबूत इरादों को भी जाहिर कर दिया है. इस निगम ने अपना काम परीक्षण के तौर पर आरंभ भी कर दिया है. एनपीसीआई का गठन सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक की पहल पर शुरू किया है. एनपीसीआई के जरिए बिजली, पानी, गैस, टैलीफोन, मोबाइल, डीटीएच जैसी सेवाओं के बिल का भुगतान होगा.

एनपीसीआई द्वारा यह भुगतान इलैक्ट्रौनिक तरीके से किया जाएगा. एनपीसीआई ने सेवा को प्रभावी बनाने के लिए सरकारी तथा निजी क्षेत्र के कई बैंकों के साथ समझौता किया है. बैंकों के अलावा कुछ वित्तीय संस्थाओं के साथ भी इस मामले में सहयोग लेने पर विचार किया जा रहा है और इस संदर्भ में परीक्षण भी किया जा रहा है. इस से साफ अनुमान लगाया जा सकता है कि एनपीसीआई देश में एक ही स्थान पर सभी बिलों के भुगतान का एक बड़ा केंद्र बनेगा. नकदी के बोझ तथा उस को ले कर जाने के जोखिमों को देखते हुए इस तरह की प्रणाली का सरकारी स्तर पर संचालन अच्छी पहल है, इस से ग्राहक में भुगतान को ले कर ज्यादा निश्ंिचतता रहेगी और वह झंझट से भी बच जाएगा. औनलाइन भुगतान की सुविधा आज भी मौजूद है लेकिन एनपीसीआई की सक्रियता से इस प्रणाली को विश्वसनीयता, मजबूती और एक ही केंद्र मिल जाएगा जहां ज्यादा लोग अपनी जरूरी उपयोग की सेवाओं के बिलों का आसानी से भुगतान कर सकेंगे.

अच्छी बात यह है कि एनपीसीआई देश के महानगरों से ले कर छोटेछोटे शहरों में पहुंच कर लोगों को यह सुविधा देगा. दूसरी लोकप्रियता के लिए जरूरी है कि लोगों की शिकायत का निस्तारण व्यवस्थित हो.

कार्लसन फिर बनें शतरंज चैंपियन

शतरंज जगत में अपने प्रभाव को बढ़ाते हुए नार्वे के मैगनस कार्लसन ने रूसी प्रतिद्वंद्वी सर्गेई कारयाकिन को टाईब्रेकर में हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीता.

इस जीत के साथ कार्लसन शतरंज के दिग्गज खिलाड़ी गैरी कास्पोरोव जैसा दर्जा पाने के और करीब पहुंच गए. कास्पोरोव ने 15 वर्षों तक अपना दबदबा कायम रखा था. हालांकि, कारयाकिन ने 12 नियमित दौर तक कार्लसन को जोरदार टक्कर दी.

26 साल के दोनों युवा खिलाड़ियों के बीच हुए 12 मुकाबलों में कोई विजेता नहीं बन सका था. अंतिम चरण की चार अतिरिक्त बाजियों में नार्वे के चैंपियन कार्लसन ने कारयाकिन को 3-1 से शिकस्त देकर खिताबी जीत हासिल की.

कार्लसन को पहली बाजी जीतने के बाद दूसरी में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने जबर्दस्त वापसी करते हुए तीसरी और चौथी बाजी में लगातार जीत दर्ज कर खिताब पर अपना कब्जा जमाया.

26 वर्षीय कार्लसन ने इससे पहले 2013 और 2014 में भारत के विश्वनाथन आनंद को हराकर यह खिताब जीता था.

इस साल विश्व शतरंज चैम्पियनशिप की ईनामी राशि 11 लाख डालर है जिसमें से 60 फीसदी अवॉर्ड के रूप में दी जाएगी. कार्लसन के समर्थकों ने उन्हें इस मौके पर बधाई दी.

भारत में आज लॉन्च होगा स्मार्टफोन वनप्लस 3टी

चीनी स्मार्टफोन कंपनी आज भारत में अपना नया फ्लैगशिप OnePlus 3T लॉन्च कर रही है. वनप्लस आज भारत में अपना नया फ्लैगशिप स्मार्टफोन OnePlus 3T लॉन्च करेगी. यह कंपनी का चौथा स्मार्टफोन होगा और यह फ्लैगशिप OnePlus 3 का ही अपग्रेडेड वर्जन है.

वनप्लस 3टी को पिछले महीने पहली बार लॉन्च किया था। और अब तक इस फोन को अमेरिका, यूरोप और ब्रिटेन में उपलब्ध कराया गया है। इन बाजारों में इस फोन को ओरिजिनल वनप्लस 3 (रिव्यू) से रिप्लेस कर दिया गया है। हालांकि, भारत में ऐसा नहीं होने की उम्मीद है। वनप्लस ने इससे पहले बातचीत में कहा था, ''वनप्लस 3 भारत में बिकता रहेगा।'' इसका मतलब है कि दोनों स्मार्टफोन भारत में उपलब्ध होंगे।

वनप्लस 3T बहुत हद तक देखने में वनप्लस 3 जैसा ही है। इसके अंदरूनी स्पेसिफिकेशंस अपग्रेड किए गए हैं। 

स्मार्टफोन में क्या है खास

नया प्रोसेसर और बड़ी बैटरी

इस स्मार्टफोन में नया प्रोसेसर है जिसकी स्पीड 2.35GHz की है और इसकी बैटरी भी बड़ी है. इसमें क्वॉल्कॉम स्नैपड्रैगन 821 चिपसेट के साथ 3,400mAh की बैटरी दी गई है. पिछले स्मार्टफोन में स्नैपड्रैगन 820 के साथ 3,000mAh की बैटरी दी गई थी.

इन दो चीजों के अलावा दूसरे स्पेसिफिकेशन कमोबेश OnePlus 3 जैसे ही हैं. यह दो कलर वैरिएंट में उपलब्ध होगा- गनमेटल और सॉफ्ट गोल्ड. इसकी शुरुआती कीमत 439 डॉलर (लगभग 29,782 रुपये) है जबकि 128GB वैरिएंट की कीमत 479 डॉलर (32,495 रुपये) है. उम्मीद की जा रही है की यह स्मार्टफोन आने के बाद OnePlus 3 को बंद कर दिया जाएगा.

स्पेसिफिकेशन्स

– इस स्मार्टफोन में 6GB रैम है और दो इंटरनल स्टोरेज वैरिएंट हैं. एक में 64GB मेमोरी होगी जबकि दूसरे में 128GB की इंटरनल मेमोरी होगी. इसमें आपको माइक्रो एसडी कार्ड का सपोर्ट नहीं मिलेगा.

– यह एंड्रॉयड मार्शमैलो पर चलता है और इसमें कंपनी की डैश चार्जिंग टेक्नॉलोजी लगाई गई है, यानी इसे फास्ट चार्ज किया जा सकता है. कंपनी का दावा है कि इसे सिर्फ 30 मिनट में 60 फीसदी तक चार्ज किया जा सकेगा.

– फुल मेटल बॉडी वाले इस स्मार्टफोन में फ्रंट फिंगरप्रिंट स्कैनर दिया गया है. इसमें 5.5 इंच की फुल एचडी एमोलेड डिस्प्ले लगी है और कनेक्टिविटी के लिए इसमें यूएसबी टाइप सी और डुअल सिम सपोर्ट दिया गया है.

– 16+16 मेगापिक्सल कैमरा: फोटोग्राफी के लिए इसके रियर में 16 मेगापिक्सल का सोनी कैमरा सेंसर दिया गया है . इसमें फेस डिटेक्शन ऑटोफोकस और ऑप्टिकल इमेज स्टेब्लाइजेशन का सपोर्ट है. इसके अलावा इससे टाइम लैप्स और 4K वीडियो रिकॉर्डिंग भी किया जा सकता है. सेल्फी के लिए भी इसमें 16 मेगापिक्सल कैमरा है जबकि पुराने वाले स्मार्टफोन मे 8 मेगापिक्सल का कैमरा सेंसर दिया गया था.

अब दीपिका भी करेंगी फिल्म निर्माण

यूं तो हर इंसान को किसी भी क्षेत्र में काम करने और अपने आपको विस्तार करने का पूरा हक है. मगर कई बार दो लोगों की कार्यशैली देखकर लगता है कि दोनों एक दूसरे के साथ चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे हैं. कम से कम बॉलीवुड में तो चूहे बिल्ली का खेल, एक दूसरे की नकल करने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा है. पिछले दो तीन वर्ष से यही खेल प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण के बीच भी नजर आ रहा है.

दीपिका पादुकोण और प्रियंका के बीच एक दूसरे को पछाड़ने व एक दूसरे के क्षेत्र में दखलंदाजी का सिलसिला फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के बाद ही शुरू हुआ. इस फिल्म से पहले दोनों अपने अपने हिसाब से करियर में आगे बढ़ रही थी. लेकिन ‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग के दौरान इन दोनों का अहम टकरा गया. सूत्र दावा करते हैं कि इस फिल्म के सेट पर ही दोनों के बीच टकराव हुआ था. तब दीपिका ने प्रियंका से कहा था कि वह अब उन्हें हर जगह टक्कर देंगी.

‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग खत्म होते ही दीपिका पादुकोण ने बॉलीवुड पर ध्यान देने की बनिस्पत प्रियंका चोपड़ा को हॉलीवुड में मिल रही शोहरत को चुनौती देने के लिए हॉलीवुड फिल्म ‘ट्रिपल एक्स-रिटर्न आफ द जेंडर केज’ अनुबंधित की, जिसमें उन्होंने कई बोल्ड व एक्शन दृश्य किए. फिलहाल यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई है. पर इसके बाद दीपिका पादुकोण को कोई अन्य हॉलीवुड फिल्म नहीं मिली. उसके बाद प्रियंका को मात देने के मकसद से दीपिका ने इंटरनेशनल स्तर पर रेड कारपेट का हिस्सा बनकर भी अपनी भद्द करा ली. अब दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा की ही भांति फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने जा रही हैं.

ज्ञातब्य है कि प्रियंका चोपड़ा ने बतौर निर्माता एक भोजपुरी और एक मराठी भाषा की फिल्म प्रदर्शित कर ली हैं. उनकी मराठी भाषा की फिल्म ‘वेंटीलेटर’ ने तो नोटबंदी के दौरान भी जबरदस्त कमाई कर एक रिकॉर्ड बना डाला. तो वहीं अब प्रियंका चोपड़ा निर्मित तीसरी व उनके बैनर की पहली पंजाबी फिल्म 17 जनवरी 2017 को रिलीज होने वाली है.

बहरहाल, दीपिका पादुकोण ने प्रियंका चोपड़ा की तरह फिल्म निर्माण में उतरने का इरादा बनाकर हॉलीवुड फिल्म का रीमेक बनाने जा रही हैं. दीपिका पादुकोण के नजदीकी सूत्रों की मानें तो दीपिका पादुकोण ने हॉलीवुड फिल्म ‘लारा क्रॉफ्ट’ का रीमेक बनाने का निर्णय लिया है. हॉलीवुड कलाकार एंजिलिना जॉली अभिनीत यह फिल्म हॉलीवुड की सर्वाधिक कमाई वाली फिल्म मानी जाती है.

अब यह वक्त ही बताएगा कि दीपिका पादुकोण फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कितनी सफलता पाती हैं.

खुद को अर्जुन कपूर से बड़ा मानती हैं कटरीना!

मोहित सूरी ने जब फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ पर काम शुरू किया था, तब उन्होंने अपनी इस फिल्म के लिए कटरीना कैफ से बात की थी. कटरीना कैफ को फिल्म की पटकथा बहुत पसंद आयी थी और वह इस फिल्म में अभिनय करना चाहती थीं.

लेकिन जब कटरीना कैफ को बताया गया कि इस फिल्म के हीरो अर्जुन कपूर हैं, तो कटरीना ने यह कह कर इस फिल्म से खुद को अलग कर लिया था कि वह अर्जुन कपूर के साथ यह फिल्म नहीं कर सकती क्योंकि अर्जुन कपूर उनसे काफी छोटे हैं. पर्दे पर वह अर्जुन कपूर के सामने काफी बड़ी नजर आएंगी.

मजेदार बात यह है कि यह बात कटरीना कैफ ने उस वक्त कही जब वह फिल्म ‘फितूर’ में आदित्य रॉय कपूर तथा फिल्म ‘बार बार देखो’ में सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ अभिनय कर चुकी हैं. तो क्या यह माना जाए कि ‘फितूर’ और ‘बार बार देखो’ को बॉक्स आफिस पर आपेक्षित सफलता न मिलने के लिए इन फिल्मों के मुकाबले अपने आपको बड़ी उम्र का होना ही वजह मान रही हैं.

सूत्र दावा करते हैं कि कटरीना कैफ की इस साफगोई से मोहित सूरी काफी प्रभावित हुए थे, और उन्होंने कटरीना से वादा किया था कि जब भी उनके पास कोई अच्छी पटकथा होगी, वह सबसे पहले उन्हीं के पास आएंगे. इसलिए उन्होंने ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ में अर्जुन कपूर के साथ श्रृद्धा कपूर को चुना.

एड्स के खिलाफ डटा एक डाक्टर

"डाक्टर साहब मेरे पास इलाज के लिए पैसे नहीं है. दवा कहां से खरीदेंगे? मर जाएंगे हम. हमारा परिवार बर्बाद हो जाएगा. कुछ कीजिए डाक्टर साहब. मेरी जान बचा लीजिए.’’ यह कहते कहते मरीज की आंखें भर आती हैं. आवाज भर्रा जाती है. एड्स का मरीज दिनेश(बदला हुआ नाम) डाक्टर से जान बचाने की गुहार लगाता है. उसके पास ही उसकी बीबी रजनी चुपचाप खड़ी है. उनके 3 छोटे-छोटे मासूम बच्चों को अपने पिता की बिमारी के बारे में पता नहीं है. वे टुकुर-टुकर अपने पिता और डाक्टर को देख रहे हैं. पहले तो डाक्टर उसे डांटते हैं कि जब पहली बार ही कमजोरी या वजन घटने की शिकायत शुरू हुई तो उसी समय डाक्टर के पास क्यों नहीं गए? उसके बाद वह अपने कम्पाउंडर को बुलाते हैं और मरीज का सारा टेस्ट करवाने और उसके पूरे इलाज और दवा का इंतजाम करने की हिदायत देते हैं.

पटना के मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी गरीब मरीजों का इलाज, जांच और दवा का पूरा इंतजाम खुद करते हैं. वह कहते हैं कि मेरे क्लीनिक से मरीज स्वस्थ और हंसते हुए घर जाना चाहिए और वह इसे पूरी तरह से निभाने में लगे रहते हैं. ‘बिल क्लिंटन एड्स फाउडेशन’ से जुड़े दिवाकर पिछले 15 सालों से एड्स और टीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और आम लोगों को जगारूक करने का काम कर रहे हैं.

23 सितंबर 2005 को उन्होंनें पहली बार पटना के भीड़ भरे एक्जीविशन रोड पर बीच सड़क पर मजमा लगाया और एड्स से पीड़ित महिला रामपति के हाथों से बिस्कुट खाकर उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि एड्स छुआछूत की बीमारी नहीं है. एड्स के मरीज को इलाज के साथ सहानूभूति की भी जरूरत होती है. बिहार के सारण जिला के चैनवा प्रखंड के चड़वा गांव की रहने वाली रामपति के पति मुख्तार की मौत एड्स की वजह से हो चुकी थी. वे ‘पब्लिक अवेयरनेस फॉर हेल्थफुल एप्रोच फॉर लीविंग’ के नाम से अपना संगठन भी चला रहे हैं. इसके साथ ही गांवों और दूर दराज के इलाकों में हेल्थ कैंप लगा कर आम आदमी को एड्स और हेल्थ के प्रति जागरूक करने की मुहिम चला रहे हैं. डाक्टर दिवाकर बताते हैं कि वह अब तक एक हजार से ज्यादा जागरूकता और फ्री हेल्थ चेकअप कैंप लगा चुके हैं.

18 अगस्त 1968 को पटना में जन्मे दिवाकर तेजस्वी एचआईवी एड्स के स्पेशलिस्ट और एड्स पर अपने रिसर्च को कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पेश कर चुके हैं. वह कहते हैं कि एड्स अब लाइलाज बीमारी नहीं रही. अगर सही समय पर इसका सही तरीके से इलाज शुरू कर दिया जाए तो इसका मरीज लंबी जिंदगी जी सकता है. जिस तरह से डायबिटीज, ब्लड प्रेशर आदि के मरीज नियमित रूप से दवा खाकर आम जिंदगी जी रहे हैं, उसी तरह एड्स के रोगी भी जी सकते हैं. इतना ही नहीं अगर पति और पत्नी दोनों एचआईवी पॉजिटीव हैं तो वे डाक्टरी देखरेख में स्वस्थ बच्चे पैदे कर सकते हैं.

साल 1992 में नालंदा मेडिकल कौलेज अस्पताल से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने वाले तेजस्वी बताते हैं कि संक्रमित महिला के गर्भ में पल रहे बच्चे को अगर ऑपरेशन करके निकाल लिया जाए और वह अपने बच्चे को अपना दूध न पिलाए तो बच्चे को मां से संक्रमण का खतरा एक फीसदी भी नहीं रहता है. उसी तरह मर्द के वीर्य को वॉश करके महिला के गर्भ में आर्टफिसियल इन्ट्रायूटेरिन इनमेसिनेशन तकनीक से डाला जाए और दवा से महिला का वायरल लोड 1000 कॉपी से कम रखा जाए तो स्वस्थ बच्चे पैदा हो सकते हैं. फिलहाल यह तकनीक काफी खर्चीला है पर आने वाले दिनों में इस खर्च में कमी आएगी.

वे कहते हैं कि एचआईवी एड्स ज्यादातर मजदूरों और ट्रक ड्राइवरों के जरिए फैलता है. असुरक्षित यौन संबंध एड्स के फैलने की सबसे बड़ी वजह है. करीब 70 फीसदी मरीजों को एचआईवी संक्रमित होने का पता ही नहीं चलता है, क्योंकि इस रोग के लक्षण 10 से 12 साल के बाद सामने आते हैं. लगातार बुखार आना, एक माह से ज्यादा समय तक दस्त होना, 10 फीसदी से ज्यादा वजन कम हो जाना, मुंह में छाले आना, बदन पर खुजली, 3-4 सप्ताह से ज्यादा समय तक खांसी और उल्टी होना इसके मुख्य लक्षण हैं. ऐसा होने पर तुरंत डाक्टर को दिखा कर एचआईवी पर जीत हासिल की जा सकती है.

मोदी सरकार की देन बार्टर सिस्टम

विकास का नारा देते-देते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को सभ्यता के शुरूआती लेन-देन व्यवस्था में ला पटका. हालांकि वे चाहते थे देश में आर्थिक क्रांति लाना, लेकिन हो गया उल्टा. कैशलेस लेन-देन के बजाए देश बार्टर सिस्टम में लौट गया. शहरों की बात तो जाने दें, कम से कम गांव-देहात की यही स्थिति है. आगे बढ़ने के बजाए हमारा गांव-देहात इतिहास की ओर लौटने को मजबूर है, वरना भूखों मर जाएगा.

प. बंगाल के वर्दवान जिले के एक गांव से शाहिदा बीवी कोलकाता आयी हैं. गांव में गुजर करना मुश्किल हो गया है. नकदी की तंगी से खाने के लाले हैं. बेटा परदेश में मजदूरी करता है. बेटी का ब्याह कोलकाता में हुआ है. घर पर अकेली शाहिदा किसी तरह लोकल ट्रेन के किराए के लिए कुछ पैसे का जुगाड़ करके यहां पहुंच गयी. बताती है उसके गांव मजीदा में एक किलो धान दस रु. होता है. बचत के पैसे से 4 किलो 400 ग्रा. धान उसने जमा किया था. अब उसी 4 किलो 400 ग्रा. के बदले दस रु. का मूढ़ी, 12 रु. का चीनी और और दस रु. का मसूर दाल ले आयी थी. इस हिसाब से शशहिदा  के नाम के खाते में 12 रु. जमा थे. अब घर पर खाने को कुछ था नहीं, इसीलिए दूकानदार से सात दिन झगड़ा करके अपने 12 रु. लेकर वह कोलकाता जंवाई के पास चली आयी.

जाहिर है नकदी की कमी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था डावांडोल है. बीरभूम के गांव शालजोड़ा में भी गांववालों ने अपने स्तर पर विनिमय व्यवस्था चालू कर लिया है. नोनीबाला, आारती मंडल, बिशु हालदार जैसे लोग इस व्यवस्था के तहत अन्न जुटा पा रहे हैं. लेकिन वह भी कितने दिनों तक हो सकता है – इन्हें खुद भी पता नहीं. हालांकि इस कवायद के पीछे शालजोड़ा के दो बुजुर्ग हैं. बताया जाता है एक लगभग 60 साल का मोदी (किरानावाला) अब्दुल गनी है और दूसरी उम्रदराज एक महिला तहसेना बीवी. ये दोनों गांव में किराना का दूकान चलाते हैं. शालजोड़ा गांव के लोगों के लिए ये बड़ा सहारा है. इसी किराना दूकान के बल पर बंगाल और झारखंड ‍की सीमा में बसे लोगों के लिए दिलासा है. ये दोनों दूकानदार विनिमय व्वयस्था के तहत तो कभी उधारी पर सामान दे देते हैं. इनसे हर परिवार को कुछ-न-कुछ जरूर मिल जाता है. पर जाने कब तक!

अब्दुल गनी कहते हैं कि गांव का छोटा दूकान है. इससे पहले बहुत ही कम मात्रा में लोग यहां खरीदारी करते थे. कुछ ही नियमित ग्राहक थे. लेकिन उनकी खरीदारी छिटपुट ही होती थी. और गांव कुछ लोग, जिनकी माली स्थिति अच्छी है वे अक्सर गांव से बाहर शहरों से अपना सामान ले आते थे. लेकिन अब नकदी की मार सब झेल रहे हैं. हर घर में संकट है. जो लोग नियमित ग्राहक हुआ करते थे, उन्हें उधारी पर समान दे देते हैं. बाकी लोगों से धान के बदले सामान देते हैं.

दस रु. किलो धान के बदले विकास परीदा ने 3 किलो 100 ग्राम धान के बदले 23 रु. का चाय, चीनी और बिस्कुट खरीदा. आठ रु. जमा हैं. बाद में वह इतने कीमत का कुछ और ले जाएगा. हालांकि उल्टा भी हो रहा है. कोई कम धान देकर ज्यादा सामान ले जा रहे हैं. उनकी बाकी रकम उधारी के तौर पर खाते में दर्ज कर लिया जा रहा है.

इसी तरह बंगाल के ज्यादतर गांव में धान कटाई का काम चल रहा है. मजदूर मजदूरी के बदले धान घर ले जा रहे हैं. हालांकि विनिमय में केवल धान का ही लेनदेन नहीं हो रहा है, बल्कि हंस, बत्तख या मुर्गी के अंडे का भी इस तरह विनिमय हो रहा है. और इसी तरह रोजमर्रा की जरूरत – कम से कम खाने का जुगाड़ लोग कर रहे हैं.

इस व्यवस्था से फिलहाल राहत भले ही मिल जा रही है, लेकिन यह भी ज्यादा दिनों तक नहीं चलनेवाला. ताहसेना का कहना है कि ऐसा पहले कभी हुआ नहीं, जैसा अब हो रहा है. जल्द ही वह स्थिति सामने आएगी जब दूकान से सिमित चीजें ही उपलब्ध होंगी. जिनके यहां से दूकान में माल आता है, उसने भी हाथ खड़ा कर दिया है. उसे भी नकदी चाहिए, तभी सामान देगा.

गांववालों का दिन भले ही ऐसे गुजर रहा है. लेकिन जल्द ही उन्हें लगेगा कि वि‍निमय वस्तु के लिए ज्यादा विकल्प नहीं हैं. हो सकता है एक पक्ष को सामान चाहिए, दूसरे को न हो. ऐसी ही कई तरह की दिक्कतों के चलते बार्टर सिस्टम ठप्प हुआ और फिर मुद्रा का प्रचलन शुरू हुआ. आज जब ग्लोबल विलेज की  बात की जाती है, मोदी सरकार ने देश की जनता को पीछे इतिहास में धकेल दिया है.

शालजोड़ा के किसलय समाजदार का कहना है कि गांव में लगभग 80 किसानी से जुड़े परिवार हैं. यह समय धान कटाई का है तो कम से कम धान लगभग हर घर में मौजूद है. इसीलिए हर घर में कुछ खाने का जुगाड़ हो रहा है. लेकिन ज्यादा दिनों ‍तक ऐसा नहीं चला जा सकता. और भी कई तरह की जरूरतें हैं. नकदी के बगैर जीवन नहीं चलता. 

वहीं चंदन मंडल का कहना है कि वैसे ही इस गांव में प्रवेश के लिए पहले झारखंड के दो गांवों को पार करना होता है. यहां एटीएम तो दूर, डाकघर भी गांव से 14 किमी दूर है. ग्रामीण बैंक आठ किमी. की दूरी पर है. राष्ट्रीकृत बैंक 16 किमी. की दूरी पर. इंजमाम हुसैन, शरद बाउरी जैसे कुछ किसान खेती-बारी का काम छोड़ कर बैंक व डाकघर में अपने पुराने नोट जमा करने में सफल रहे हैं, लेकिन नकदी की किल्लत बरकरार है. शोभन बाउरी, अताळल शेख का कहना है कि धान कटाई हो चुकी है. इनकी बिक्री करके रकम मिलता – लेकिन फिलहाल वह रास्ता भी बंद है.

तरुला बाउरी का कहना है कि गांव में किराना दूकान से मदद मिल जाती है तो चूल्हा जल रहा है. लेकिन फिर भी नकदी की जरूरत तो है. बीमारी-सिमारी में क्या करेंगे? गांव के लोगों का रोजगार धान बिक्री और खेत-मजदूरी ही है. धान की बिक्री उधारी पर हो रही है. चिंता इस बात की है एक समय के बाद न तो धान रहेगा और न नकदी. तब क्या होगा?

जवाब दे रहा धैर्य

यह तो हुई देश की एक तस्वीर. दूसरी तस्वीर शहर की है. अब जनता का धैर्य जवाब दे रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही आगाह किया था कि आनेवाले समय में गली-गली में दंगे होंगे. प. बंगाल से इसकी शुरूआत हो चुकी है. वह भी नवंबर महीने के आखिरी दिन हावड़ा के जगदीशपुर में एक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नाराज लोगों ने तोड़फोड़ की. बैंक का एटीएम पर भी हमला हुआ. दरअसल, सुबह से लोग कतार में खड़े थे. यह कतार हजार के करीब पहुंच गयी. पैसे किसीको नहीं मिले. अंत में दोपहर तीन बजे बैंक की अओर से घोषणा की गयी कि पैसे नहीं पहुंचे हैं.

दिसंबर शुरू हो गया है. इस महीने के पहले सप्ताह में जाने क्या होगा. 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री ने नोट बैन की घोषणा की थी, तब ज्यादातर लोगों ने महीने के खर्च के लिए एकमुश्त रकम निकाल लिया था. लेकिन दिसंबर महीने में असली दिक्कत पेश आनेवाली है.

काजल जाना गैरसरकारी कंपनी में 12 हजार रु. के पगार मिलते हैं. इसी रकम में पांच सदस्यों के परिवार का खर्च चलाना पड़ा है. बेटी की पढ़ाई का खर्च, पिता के लिए दवा, राशन, नौकरी में आनेजाने का खर्च. ड्यूटी छोड़ के हर रोज कतार में खड़ा नहीं हुआ जा सकता. ज्यादातर एटीएम में पैसे नहीं है.

प्रदीप कुमार पुरकास्यत निजी बीमा कंपनी में 80 हजार रु. के  वेतन पर काम करते हैं. बच्चों की पढ़ाई मां-पिता जी की दवाई, राशन, पेट्रोल का खर्च घर की ड्राइवर और कामवाली का पगार वगैरह हर महीने का खर्च कम से कम 50 हजार रु. है. इस महीने यह खर्च कहां से पूरा होगा – इसकी चिंता है. बताते हैं कि जीवन में पहली बार छह घंटा कतार में खड़ा होकर भी पैसे नहीं मिले.

श्यामल सेन निजी कंपनी में 25 हजार रु. पगार. सात सदस्यों का परिवार. राशन, बच्चों की पढ़ाई, पत्नी की दवा-डॉक्टर की फीस, कामवाली का पगार, दफ्तर जाने-आने का खर्च – हर महीने 22 हजार का खर्च. कहते हैं कि एक महीना होने को चला. स्थिति कमोवेश एक जैसी ही है. बल्कि खराब ही. महीने के शुरू में नकदी की जरूरत सबसे बड़ी जरूरत है. बच्चों के स्कूल में फीस के लिए नकदी चाहिए. काम वाली का पगार नकदी, आने-जाने का खर्च नकदी, साग-सब्जी के लिए नकदी चाहिए. दवा-डॉक्टर का खर्च नकदी चाहिए. कहां से, कैसे पूरा पड़ेगा. महीने के शुरू में ही पंद्रह हजार निकाल लेते हैं.

जाहिर है बंगाल ही नहीं, नकदी की कमी से पूरा देश जूझ रहा है. आनन-फानन में मोदी सरकार ने पुराने नोटों को गताल खाते में तो डाल दिया, लेकिन नए नोटों का इंतजाम हो नहीं पाया. हालांकि मोदी जी और आरबीआई ने बार-बार एलान किया कि नकदी की कोई कमी नहीं है. 9 नवंबर के बाद से 22 दिनों के बाद भी हर रोज बैंकों में नकदी की कमी का एहसास हो रहा है. गांव-देहात की स्थिति बद से बदतर है. कमोवेश 9 नवंबर जैसे ही हालत हैं.

कैशलेश का शिगूफा

बहरहाल, सरकार अच्छी तरह जानती थी कि नकदी की कमी पेश आनेवाली है और सरकार के इस कदम की आलोचना होनी ही है. इसीलिए सरकारी नारा दिया गया – गो कैशलेस. सरकार ने शहरी जनता का ही ध्यान रख कर गो-कैशलेस का प्रचार किया. भारत का गांव-देहात अभी तक इतना विकसित नहीं हुआ है कि इन कुछ दिनों में स्टार्मफोन और मोबाइल ऐप की दुनिया इनके लिए एकदम से आसान हो जाए. भारत का जन-जन अभी तक प्लास्टिक मनी या एटीएम का अभ्यस्त नहीं हुआ है. फिर ऐप तो इनके लिए टेढ़ी खीर ही है. शायद इसी कारण गांव-देहात ने फौरी राहत के लिए एक समानांतर व्वस्था वस्तु विनिमय के तौर पर कर ली है.  

कहानी 2: बाल यौन उत्पीड़न पर बेहतरीन फिल्म

सुजॉय घोष निर्देशित फिल्म ‘कहानी 2: दुर्गारानी सिंह’ से यह बात साफ हो जाती है कि बेहतरीन पटकथा, बेहतरीन निर्देशन और कलाकार की बेहतरीन परफॉर्मेंस के बल पर सामाजिक मुद्दों पर बेहतरीन फिल्म बन सकती है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है, कोलकाता के पास चंदन नगर में रह रही विद्या सिन्हा के घर से जो अपनी 14 वर्षीय अपाहिज बेटी मिनी के साथ रह रही है. मिनी का ईलाज भी चल रहा है. डॉक्टर की सलाह पर विद्या अपनी बेटी मिनी को इलाज के लिए अमरीका ले जाने की तैयारी में है. पासपोर्ट बन चुके हैं. विद्या सिन्हा सुबह नर्स का इंतजार करते करते ऑफिस चली जाती है. ऑफिस में ही विद्या सिन्हा को पता चलता है कि अमरीका के डॉक्टर से मिलने का दिन व तारीख तय हो चुकी है.

जब वह ऑफिस से घर लौटती है, तो मिनी घर पर नहीं मिलती है. विद्या सिन्हा के मोबाइल पर एक महिला का फोन आता है कि कोलकाता में आकर अपनी बेटी को ले जाओ. विद्या अपनी बेटी मिनी को लेने के लिए घर से निकलती है, मगर रास्ते में एक कार उसे टक्कर मार देती है. विद्या सिन्हा अस्पताल पहुंच जाती है, जहां वह कोमा में जा चुकी है. डॉक्टर का मानना है कि छह सात दिन में वह कोमा से बाहर आ जाएगी. इस दुर्घटना के केस की जांच करने के लिए पुलिस सब इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) पहुंचता है, जिसके मुंह से विद्या सिन्हा को देखते ही दुर्गा रानी सिंह (विद्या बालन) का नाम निकलता है. पर डॉक्टर कहता है कि यह विद्या सिन्हा है.

इंद्रजीत सिंह जांच शुरू करता है. वह विद्या सिन्हा के घर पहुंचता है, जहां उसे विद्या सिन्हा उर्फ दुर्गारानी सिंह की डायरी मिलती है. इस डायरी से ही पता चलता है कि कभी दुर्गारानी सिंह और इंद्रजीत सिंह पति पत्नी थे. दो वर्ष के बाद दोनों अलग हो गए थे. दुर्गारानी सिंह के अनुसार इंद्रजीत सिंह उससे नफरत करता है. जबकि अब इंद्रजीत सिंह अपनी पत्नी रश्मि (मानिनी चड्ढा) व बेटी सिमरन के साथ खुश है.

विद्या सिन्हा उर्फ दुगारानी सिंह की डायरी के अनुसार कोलकाता में रहने वाली दुर्गारानी सिंह (विद्या बालन) एक स्कूल में रिसेप्शनिस्ट हैं. जहां मशहूर व अति संपन्न दीवान परिवार की बेटी छह वर्षीय मिनी पढ़ती है. मिनी (नायशा खन्ना) को उसकी कक्षा की शिक्षक हर दिन मिनी की शिकायत के साथ प्रिंसिपल के ऑफिस ले जाती है. और डरी व सहमी मिनी को हमेशा दुर्गारानी सिंह ऑफिस के सामने ही बैठना पड़ता है. मिनी पर आरोप है कि मिनी पढ़ने में रूचि नहीं रखती और कक्षा में सोती रहती है. होमवर्क करके नहीं लाती.

दुर्गारानी सिंह के मन में उत्सुकता जागती है और वह एक दिन मिनी के नजदीक पहुंचकर उससे सच जानने का प्रयास करती है. मिनी कह देती है कि रात में उसे सोने को नहीं मिलता. पर तभी ड्राइवर उसे लेने आ जाता है. उसके बाद मिनी से सच जानने के लिए दुर्गारानी सिंह योजना बनाती है. वह झूठ बोलकर उसकी स्कूल शिक्षक बनकर मिनी को उसके घर पर ट्यूशन पढ़ाने जाने लगती है.

दुर्गारानी सिंह की जिंदगी में अरूण नामक युवक है. दुर्गारानी सिंह चाहती है कि इंदर तो कभी उसका हो नहीं सका, अब वह अरूण के साथ नई जिंदगी की शुरूआत कर सकती है. मिनी को ट्यूशन पढ़ाते पढ़ाते अंततः दुर्गारानी सिंह को पता चलता है कि मिनी के मोहित (जुगल हंसराज) चाचा उसका शारीरिक व यौन उत्पीड़न कर रहे हैं. दुर्गारानी सिंह, पुलिस में मोहित व मिनी की दादी (अम्बा सन्याल) के खिलाफ शिकायत दर्ज कराती है. पुलिस जांच करने आती है और मोहित से बात करने के बाद उन्हें छोड़ देती है. जबकि मोहित व मोहित की मां, दुर्गारानी सिंह पर चोरी का इल्जाम लगा देते हैं. दुर्गारानी सिंह की स्कूल की नौकरी चली जाती है. मोहित व मिनी की दादी, दुर्गारानी सिंह को मरवाने की सुपारी दे देते हैं.

उधर अरूण, दुर्गारानी सिंह का स्पष्ट जवाब न मिलने पर लंदन चला जाता है. मिनी की दादी और मोहित, मिनी को इतना प्रताड़ित करते हैं कि वह छत से कूद जाती है. और उसका पैर फ्रैक्चर हो जाता है. उपर से उसकी दादी अस्पताल में मिनी को एक इंजेक्शन लगाकर मौत की नींद सुलाना चाहती है, पर ऐन वक्त पर दुर्गारानी सिंह अस्पताल पहुंचकर दादी को मारकर मिनी के साथ कोलकाता से भागकर चंदन नगर पहुंच जाती है.

अस्पताल में कोमा से बाहर आते ही विद्या उर्फ दुर्गारानी सिंह बेटी मिनी को बचाने के लिए निकल पड़ती है. उधर पुलिस भी दुर्गारानी सिंह के पीछे पड़ी है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. पता चलता है कि मिनी का अपहरण मिनी के मोहित चाचा ने ही करवाया है जो कि अंततः मारे जाते हैं. दुर्गारानी सिंह, मिनी को लेकर अमरीका के अस्पताल पहुंचती है.

यूं तो यह फिल्म एक रोमांचक फिल्म है. मगर यह फिल्म वर्तमान समय के अति ज्वलंत मुद्दे बाल यौन उत्पीड़न पर आधारित है. छह सात वर्ष की बालिकाओं के साथ उनके घर या रिश्तेदार या अतिकरीबी इंसान जब उनका शारीरिक व यौन शोषण करता है, उस वक्त वह बात बालिका की समझ में कुछ नहीं आता है. मगर जब वह बड़ी होती है, तो शादी के बाद भी उसकी जिंदगी तबाह होती है. इस बात को रेखांकित करने वाली इस फिल्म में एक बहुत प्यारा दृश्य है. जहां पर दुर्गारानी सिंह, मिनी को एक बालिका के प्रति प्यार व बाल यौन उत्पीड़न में अंतर समझाती है. फिल्म के कुछ संवाद काफी अच्छे बन पड़े हैं.

निर्देशक सुजॉय घोष इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि जिन विषयों या मुद्दों को लोग अपने घर की दरी के नीचे दबा देना ही उचित समझते हैं, उस पर निर्देशक ने खुलकर बात की है. विद्या बालन की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने ऐसे विषय वाली फिल्म में अभिनय करने के लिए हामी भरी. फिल्म में कुछ अनुत्तरित सवाल भी हैं, कुछ कमियां भी हैं, जिन्हें सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर नजरंदाज किया जा सकता है. सुजॉय घोष बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने बाल यौन उत्पीड़न के मुद्दे को काफी परिपक्वता के साथ फिल्म में उठाया है. ऐसा इम्तियाज अली अपनी फिल्म ‘हाईवे’ में नहीं कर पाए थे.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो विद्या बालन ने काफी बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है. बेटी की सुरक्षा का डर, गुस्सा, बेटी के प्रति सुरक्षा कवच बनने के अहसास को अपने चेहरे के भावों से व्यक्त कर विद्या बालन ने अद्भुत अभिनय क्षमता का परिचय दिया है.

क्लायमेक्स से पहले के कुछ दृश्यों मे तो विद्या बालन अभिनय के बल पर दर्शकों को अपना बना लेती हैं. काफी लंबे समय बाद किसी फिल्म में अर्जुन रामपाल ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है. वह वास्तविक पुलिस सब इंस्पेक्टर के किरदार को परदे पर साकार करने में इतना सफल रहे हैं कि फिल्म खत्म होने के बाद भी वह दर्शकों के दिमाग में रह जाते हैं. विद्या बालन के साथ ही नायषा खन्ना ने भी कमाल का अभिनय किया है. जुगल हंसराज का अभिनय ठीक ठाक ही रहा. इंद्रजीत सिंह के बॉस के किरदार में खराज मुखर्जी ने भी अच्छा परफॉर्म किया है.

फिल्म में पश्चिम बंगाल के मध्यम वर्गीय परिवेश को उकेरने में निर्देशक सुजॉय घोष पूरी तरह से सफल रहे हैं. कैमरामैन भी बधाई के पात्र हैं. फिल्म का संगीत प्रभावित नहीं करता.

इंटरवल से पहले दर्दनाक अतीत के साथ जिंदगी जी रही औरत, एक छह वर्ष की लड़की के व्यवहार की वजह से एक जुड़ाव महसूस करती है. और फिर कहानी इस तरह आगे बढ़ती है कि दर्शक फिल्म का एक भी दृश्य आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहता. काफी लंबे समय बाद कोई फिल्म आयी है, जिसका पहला भाग लोगों को अपनी तरफ खींचता है. इंटरवल के पहले जो रोमांच पैदा होता है, उसे इंटरवल के बाद बरकरार रखने में निर्देशक असफल हो जाते हैं. इंटरवल के बाद फिल्म पर से कुछ समय के लिए निर्देशक की पकड़ कमजोर हो जाती है. कुछ घटनाक्रम का अंदाजा पहले से लगाया जा सकता है, पर इससे फिल्म की गति या फिल्म की रोचकता ज्यादा बाधित नहीं होती है.

तर्कशीलता और दया के साथ एक संवेदनशील विषय से निपटने वाली दुर्लभ फिल्मों में से एक गिनी जाएगी. यह एक ऐसी फिल्म है, हर माता पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चेा को अपने साथ ले जाकर दिखाए. यह फिल्म कहीं न कहीं बच्चों में बाल यौन उत्पीड़न के प्रति जागरूकता लाएगी.

दो घंटे दस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘कहानी 2’ का निर्माण ‘बाउंड स्क्रिप्ट मोशन पिक्चर्स’ के बैनर तले किया गया है. इसके निर्माता सुजॉय घोष और जयंतीलाल गड़ा हैं. निर्देशक सुजॉय घोष, पटकथा लेखक सुजॉय घोष, संवाद लेखक रितेश शाह, कहानीकार सुजॉय घोष व सुरेश नायर, संगीतकार क्लिंटन सेरेजो, कैमरामैन तपन बसु हैं.

अहान को मिल रहा है स्टार किड होने का फायदा या…

मशहूर अभिनेता, फिल्म निर्माता, व्यवसायी और अब इंटरनेट आधारित कास्टिंग एजंसी ‘‘एफ द काउच’’ की शुरूआत कर चुके सुनील शेट्टी के बेटे अहान किसी सोशल मीडिया से नहीं जुड़े हैं, मगर वह चर्चा के केंद्र में हैं.

बॉलीवुड में चर्चा गर्म है कि अहान को साजिद नाडियाडवाला ने अपनी फिल्म से बतौर अभिनेता लॉन्च करने का मन बनाया है. मजेदार बात यह है कि साजिद नाडियाडवाला ने अभी तक अहान के साथ बनायी जाने वाली फिल्म की आधिकारिक घोषणा नहीं की है.

वह इस फिल्म की आधिकारिक घोषणा सितंबर 2017 में करेंगे. मगर मीडिया में यह बात प्रचारित हो रही है कि साजिद नाडियाडवाला ने ही अहान को अभिनय की खास ट्रेनिंग लेने के लिए लंदन भेजा है.

सूत्र दावा कर रहे हैं कि फिल्म की घोषणा करने या कैमरे के सामने अहान को परफार्म करते हुए देखने से पहले ही साजिद नाडियाडवाला, अहान से इस कदर प्रभावित हो चुके हैं कि उन्होंने अहान को अपनी कंपनी की आगामी तीन फिल्मों में अभिनय करने के लिए अनुबंधित करने का मन बनाया है. एक सूत्र यहां तक दावा कर रहा है कि साजिद नाडियाडवाला ने अहान को तीन फिल्मों के लिए अनुबंधित कर लिया है. यानी कि स्टार पुत्र होने की वजह से अहान को अपनी प्रतिभा को साबित करने के लिए एक नहीं बल्कि तीन-तीन मौके मिलने वाले हैं.

फिलहाल, अहान लंदन में चार माह तक रहकर वहां ट्रेनिंग लेते हुए अपनी अभिनय व एक्शन प्रतिभा को निखारेंगे. उसके बाद वह भारत आकर कुछ ट्रेनिंग लेंगे. तब सितंबर 2017 में उनकी फिल्म की घोषणा की जाएगी. यदि सब कुछ ठीक रहा, तो इस फिल्म की शूटिंग अक्टूबर 2017 में शुरू होगी.यह एक्शन प्रधान रोमांटिक फिल्म होगी.

स्टार पुत्र होने की वजह से ही अहान को कई फायदे मिल रहे हैं. अहान की बहन आथिया शेट्टी को लेकर फिल्म ‘हीरो’ का निर्माण करने वाले अभिनेता सलमान खान भी अहान का हौसला बढ़ाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं.सलमान खान ने अपने ट्वीटर पर अहान की तस्वीर डालते हुए लिखा है-‘‘अहान तुम बहुत अच्छे लग रहे हो. बॉलीवुड में तुम्हारा स्वागत है.’’

डिप्रेशन में हैं तो करें फेसबुक, ट्विटर का इस्तेमाल

सोशल नेटवर्किंग साइटों पर समय बिताना अभी भी समय की बर्बादी समझी जाती है. इस पर अधिक समय गुजारना मानसिक स्वास्थ्य पर अमूमन नकारात्मक प्रभाव डालता है, ऐसा समझा जाता है. लेकिन एक नए अध्ययन ने इन सारी बातों को सिरे से नकार दिया है और एक अलग ही पक्ष सामने रखा है. इनके मुताबिक कुछ लोगों के लिए फेसबुक और ट्विटर अवसाद को नियंत्रित करने का एक साधन हो सकता है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं.

अध्ययन के मुताबिक, किसी व्यक्ति के स्वस्थ होने में सोशल नेटवर्किंग का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ता है. पत्रिका 'साइबरसाइकोलॉजी, बिहैवियर एंड सोशल नेटवर्किंग' में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों और अवसाद के बीच बेहद जटिल संबंध हैं और कुछ लोग वर्चुअल मीडिया से भी सामाजिक समर्थन का फायदा उठाते हैं.

ब्रिटेन के लैनकास्टर यूनिवर्सिटी के डेविड बेकर और गुईलेरमो पेरेज द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, इस जटिल संबंध पर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, व्यवहार तथा व्यक्तिगत कारणों का प्रभाव पड़ सकता है. निष्कर्ष के मुताबिक, चिकित्सकों को अपने मरीजों को यह सलाह देनी चाहिए कि वे दवा के अलावा, सोशल सपोर्ट सिस्टम का भी सहारा लें.

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