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बिग बैश लीगः बल्ले पर लगा प्रतिबंध

वेस्टइंडीज के ऑलराउंडर आंद्रे रसेल इन दिन ऑस्ट्रेलिया में बिग बैश लीग खेल रहे हैं. लेकिन वे यहां अपने खेल की वजह से नहीं बल्कि अपने बैट की वजह से चर्चा में हैं. वे टूर्नामेंट में काले और गुलाबी रंग में रंगे बैट से खेल रहे थे. हालांकि वे अपने इस कलरफुल बैट से कोई कमाल तो नहीं कर पाए, विवादों में जरूर आ गए.

क्रिक्रेट ऑस्ट्रेलिया ने लगाया बैन

सिडनी थंडर्स की ओर से खेलने वाले रसेल के इस काले बैट पर क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) ने बैन लगा दिया है. हालांकि रसेल का ये काले रंग का बैट बिग बैश लीग की प्लेइंग कंडीशन के अनुसार ही था. इसके बाद भी उस पर बैन इसलिए लगाया गया क्योंकि इस बैट का रंग सफेद कुकाबुरा गेंद पर लग रहा था. जिसके बाद सिडनी सिक्सर्स के विकेटकीपर ब्रैड हैडिन ने बॉल पर लग रहे काले रंग की तरफ ध्यान दिलाते हुए ऑब्जेक्शन उठाया.

बिश बैश के प्रमुख एंथोनी एवेरार्ड ने बताया कि मैच अधिकारियों ने सीए को जानकारी दी कि रसेल के बैट का काला रंग सफेद बॉल पर लग रहा था. इसके चलते उन्होंने आंद्रे रसेल को इस बैट के इस्तेमाल के लिए दी गई परमिशन वापस ले ली.

कैसी रही रसेल की परफॉर्मेंस

सिडनी सिक्सर्स ने इस मैच में रसेल की सिडनी थंडर्स को 9 विकेट से हराया. रसेल ने पांचवें नंबर पर बैटिंग करते हुए 7 बॉल पर 9 रन बनाए. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के प्रवक्ता ने कहा, 'सीए की अनुमति से खिलाड़ी किसी भी रंग का बैट यूज कर सकता है. लेकिन सीए के पास इस मंजूरी को वापस लेने का अधिकार है. यदि अंपायर को लगता है कि इसकी वजह से मैच पर फर्क पड़ेगा तो अनुमति वापस ली जाएगी.'

पिछले सीजन में सुनहरे बैट से खेले थे क्रिस गेल

मेलबोर्न रेनेगेड्स के कैरेबियाई खिलाड़ी क्रिस गेल, बीबीएल के पिछले सीजन में सुनहरे बैट से खेले थे. उन्होंने टूर्नामेंट के उद्घाटन मैच में इस बल्ले से खेला था. इस बैट का वजन ज्यादा होने के कारण कुछ खिलाड़ियों ने इसकी आलोचना भी की थी.

पैसे की कमी में डूबे पिता की सहायता करें

कक्षा 10 में पढ़ने वाले शुभम के घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था और अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आता था. ऐसे में स्कूल का हर अध्यापक उस को बहुत मानसम्मान देता था. शुभम को एक कंपीटिशन में हिस्सा लेने के लिए शहर से बाहर जाना था. प्रौब्लम यह थी कि वहां आनेजाने और रहनेखाने का खर्च, जो कुल मिला कर 20 हजार रुपए के करीब था, उस के परिवार को ही उठाना था. ऐसे में शुभम परेशान था, क्योंकि उसे पता था कि उस के पिता इतने पैसों का इंतजाम कभी नहीं कर पाएंगे. ऐसे में वह निराश था.

शुभम की परेशानी जब स्कूल टीचर महेश प्रसाद को पता चली तो वह शुभम से बोले, ‘‘बेटा, अभी वहां जाने में 6 माह का समय लगेगा. तुम अगर अपने साथियों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दो तो इस खर्च का इंतजाम तुम खुद कर सकोगे और फिर भी अगर कुछ पैसों की कमी हुई तो हम लोग साथ हैं.’’

टीचर की कही बात शुभम को समझ आ गई. अब वह स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा,जिस से उसे हर माह 3 हजार रुपए मिलने लगे. ऐसे में शुभम के लिए खर्च का पूरा इंतजाम हो गया. यही नहीं, शुभम कंपीटिशन से जो पैसे जीत कर लाया उन से उस ने अपनी फीस के पैसे भिजवा दिए.

यह बात जब उस के पिता को पता चली तो वे बहुत खुश हुए और बोले, ‘‘बेटा, तुम ने तो मेरी मदद कर दी. मैं सोच ही रहा था कि इस बार तुम्हारे स्कूल की फीस कैसे जमा कर पाऊंगा.’’ इस के बाद शुभम ने बहुत मेहनत से अपनी पढ़ाई की, जिस से उसे स्कूल से स्कौलरशिप मिलने लगी. वह तेजी से आगे बढ़ने लगा. जल्द ही उस ने नौकरी कर के अपने पिता की पैसे की कमी को पूरा कर दिया.

जिद और दिखावा न करें

टीनऐज में बच्चों के अंदर दिखावे की भावना ज्यादा रहती है. वे अपने दोस्तों को देखते हैं और फिर उन की ही तरह महंगे ब्रैंड के कपड़े, मोबाइल और बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं. किशोरों को इस तरह के दिखावे से खुद को बचाना चाहिए. उन को ऐसे फैसले से पहले अपने मातापिता की हालत को समझना चाहिए. हर बच्चे के पिता की आर्थिक स्थिति एकजैसी नहीं होती है. ऐसे में जब बच्चे महंगे सामान की जिद करते हैं तो मातापिता उस को पूरा करने की कोशिश करते हैं. कोई भी मातापिता अपने बच्चों का दिल नहीं तोड़ना चाहते. ऐसे में वे अपनी हैसियत से आगे बढ़ कर बच्चों की खुशी को पूरा करने के लिए कई तरह के प्रयास करते हैं, जिस से वे बच्चों की इच्छा पूरी कर सकें.

ऐसे में बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अपने मातापिता की आर्थिक हालत को देख कर ही अपनी इच्छा को उन पर थोपें. कई बार दोस्तों को देख कर बच्चों के मन में यह खयाल आता है कि वे भी उस की तरह ऐश से रहें. आज महंगाई का दौर है, जिस में बच्चों के मातापिता को तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है. अब यह बच्चों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह से समझदारी भरे फैसले ले कर किस तरह से पैसे की कमी में डूबे अपने मातापिता की मदद कर सकते हैं. वैसे आजकल के बच्चे काफी स्मार्ट और समझदार हो गए हैं.

मेहनत से करें अपना काम

किशोर उम्र के बच्चों का काम पढ़ाई करना होता है. उन के लिए जरूरी है कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें,जिस से वे जल्द से जल्द अच्छी नौकरी पा सकें. किसी भी मातापिता के लिए यह सब से बड़ी गर्व की बात होती है कि उन के बच्चे नौकरी कर के अपने पैसों से उन की मदद करें. अमन उजाला संस्था की प्रमुख प्रिया सक्सेना बच्चों के मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझती हैं. वे कहती हैं, ‘‘किशोर उम्र के बच्चे अपने मांबाप की सब से बड़ी आस होते हैं. वे जब सफलता की तरफ बढ़ते हैं तो मांबाप को बहुत अच्छा लगता है. 22 साल की उम्र में मेरा बेटा जब मुझ से पूछता है कि मां कितना पैसा भेजना है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. मुझे खुद पर और बच्चों पर गर्व होता है. ऐसे में किशोर उम्र के बच्चों के लिए जरूरी है कि वे अपना काम करें, जिस से कम से कम समय में अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अपने घरपरिवार की मदद कर सकें.

कई बार कम उम्र में ही किशोर अपने मातापिता की मदद के लिए पार्टटाइम जौब करने लगते हैं. ऐसे में उन की पढ़ाई प्रभावित होती है. बच्चों के लिए जरूरी है कि पहले वे अपनी पढ़ाई को पूरी करें, जिस से उन का भविष्य सुरक्षित हो सके. इस से मातापिता की ज्यादा मदद हो सकती है. पार्टटाइम वर्क तभी करें जब आप को पैसे की बेहद जरूरत हो और कोई दूसरा रास्ता दिखाई न देता हो. कई बार पार्टटाइम काम करने का प्रभाव बच्चों के कैरियर पर पड़ता है, जिस से वे अच्छी जौब नहीं कर पाते. ऐसे में अपना लक्ष्य बनाएं और मेहनत से आगे बढ़ें.

पार्टटाइम जौब सहारा बन सकती है

किशोर उम्र के बच्चे कई तरह की पार्टटाइम जौब्स कर सकते हैं. इस में अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना,डांस सिखाना, मोमबत्ती बनाना, पेपर बैग बनाना सबकुछ शामिल है. ये काम ऐसे हैं जिन को बच्चे अपने स्कूल के साथ कर अपने मातापिता की मदद कर सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को ऐसे पार्टटाइम जौब से पहले इस की शिक्षा दी जाए कि किस तरह से इन कामों को किया जा सकता है. कई तरह के हुनर बच्चों में होते हैं, वे अपने हुनर से मातापिता की मदद कर सकते हैं. ऐसे बच्चोें को अपने हुनर का कमाल दिखाना चाहिए.

बच्चों के मामलों की जानकार विनीता गुरुनानी कहती हैं कि पार्टटाइम जौब कर बच्चे केवल अपने मातापिता की ही मदद नहीं कर सकते बल्कि वे अपना आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं. ऐसे में बच्चों को पार्टटाइम जौब करनी चाहिए. पार्टटाइम जौब करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि इस से उन की पढ़ाई खराब न हो. कई बार बच्चे पैसे कमाने लगते हैं तो पढ़ाई की तरफ उन का ध्यान नहीं रहता है. इस से बचना चाहिए. पार्टटाइम जौब का मतलब पार्टटाइम जौब होता है. यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कई बार ऐसे बच्चे अपने मातापिता की मदद कर के खुद में जिम्मेदारी का भाव जगाते हैं, जो उन के भविष्य के लिए बहुत अच्छा है.                       

कलाकारी और दोस्ती अपनी जगह है : अनूप जलोटा

बहुमुखी प्रतिभा के धनी अनूप जलोटा महज भजन गायक नहीं हैं. वह भजन के अलावा गजल व कविताएं भी गाते हैं. वह संगीत की धुन भी बनाते हैं. वह नई नई प्रतिभाओं को संगीत की शिक्षा भी देते हैं. वह अभिनेता व फिल्म निर्माता भी हैं. अब तो वह प्रसार भारती के बोर्ड के सदस्य भी हैं. अनूप जलोटा ऐसी शख्सियत हैं, जिनकी फोटो की कभी लोग पूजा किया करते थे. पेश है उनसे हुई खास बातचीत…

आपकी पहचान भजन सम्राट की है, पर अब आप अभिनय भी करने लगे हैं?

– मैं अभिनय भी 42 साल से करता आ रहा हूं. 1975 में फिल्मों में मुझसे सबसे पहले बी के आदर्श ने अभिनय करवाया था. उन्हे मेरा गाना पसंद था. वह अपने बंगले पर ले गए. संपूर्ण संतदर्शनम फिल्म का नाम था. इसमें संत ज्ञानेश्वर का किरदार निभाने का मौका दिया था. उससे पहले मैंने लखनऊ में काफी थिएटर किया था. स्कूल कालेज में कई नाटक किए थे. ‘संपूर्ण संतदर्शन’ के बाद मैंने आकृति व दीपशिखा की मां श्रद्धा पंचोटिया की गुजराती फिल्म की. इस फिल्म में उन्होंने मुझे संगीत देने का भी अवसर दिया था. फिर कई फिल्मों में मैंने अभिनय किया. उसके बाद किरण मिश्रा ने मुझे फिल्म ‘‘प्यार का सावन’’ में हीरो बना दिया. इसमें मेरे साथ अरूण गोविल भी हीरो थे. मैं इसमें क्लासिकल सिंगर था. अरूण गोविल फोकसिंगर थे. मेरी हीरोईन देवश्रीराय थी. जबकि अरूण गोविल की हीरोइन साधना सिंह थी. फिर फिल्म ‘‘चिंतामणि सूरदास’’ इसमें मैने तानसेन का किरदार निभाया. सूरदास पर बनी बंगाली फिल्म में हीरो था.

बंगला फिल्म ‘‘कलंकिनी नायिका’’ में भी अभिनय किया. उसके बाद देवेन वर्मा की फिल्म ‘दाना पानी’ सहित कई फिल्मों में मुझ पर गीत फिल्माए गए. संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के निर्देशन में कुछ गीत गाए, तो उन गीतों को उनके कहने पर मुझ पर ही फिल्माया गया. ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’ में अभिनय किया. फिल्म ‘‘तोहफा मोहब्बत का’’ में हेमा मालिनी व मुझ पर एक गाना फिल्माया गया. एक फिल्म ‘‘पत्तों की बाजी’’ में भी मुझ पर गाना फिल्माया गया था. अब तो भोजपुरी व पंजाबी फिल्मों का हीरो गायक होता है. तो मुझे कई फिल्मे मिली.

जब आप फिल्मों में हीरो बनने लगे थे, तो फिर आपने बीच में अभिनय से दूरी क्यों बना ली थी?

– मेरा पहला प्यार हमेशा संगीत रहा है. संगीत बार बार खींच लेता है कि कहीं मत जाओ. इधर रहो. संगीत में समय ज्यादा देना पड़ता है. मैंने संगीत जगत में ही सबसे ज्यादा काम किया है.    

इन दिनों धार्मिक चैनल काफी लोकप्रिय हो रहे हैं?

– देश की सत्तर प्रतिशत जनता गांवों में रहती है, जो आज भी काफी धार्मिक है. मुझे याद है 1983 में मैं भजन गायक के तौर पर काफी लोकप्रिय हो गया था. तब सिर्फ अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी लोगों ने मेरी फोटो की पूजा करनी शुरू कर दी थी. एक बार कलकत्ता से बीस लोगों का समूह आया, जिसने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि वह मुझे ‘गाड मैन’ बनाना चाहते हैं. मैंने उन्हे किसी तरह समझाकर वापस किया.

पर गजल का कोई चैनल नही है?

– इसकी मूल वजह यह है कि गजल गायकी को जो मुकाम मिलना चाहिए, वह नही मिला. अब तो गजल गायकी खत्म हो गयी है. गजल गायकी के कमजोर होने की मुख्य वजह यह है कि आज की जो पीढ़ी है, उसे सही व ठीक से हिंदी नहीं आती, तो उसे उर्दू कहां से आएगी. वह तो जगजीत सिंह की आवाज है, जो कि लोगों को भाती है. उनके कलाम लोग कितना समझ पाते हैं, यह एक अलग मसला है. पर लोग उनकी आवाज के दीवाने हैं. वह सबके दिल में छाए हुए हैं. वह केवल आलाप लेते हैं, तो भी लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. जगजीत सिंह की कमी बौलीवुड में कभी पूरी नही हो सकती.

उर्दू के साथ हिंदी गजल..?

– मैंने भी दुष्यंत कुमार की हिंदी गजलें गायी हैं. पर वह बात नहीं बनती. दुष्यंत की गजल है-‘‘मैं एक पुल की तरह थरथराता हूं.’’ यह बात उतनी असरदार नहीं है. पर हम गाते हैं, जबकि यह बहुत ज्यादा साहित्यिक हो जाता है. यह रोमांटिक नही रह जाता.

यानी कि गजल का रोमांटिक होना जरुरी है?

– जी हां! रोमांस चाहे दुःखद हो या खुशी का हो. रोमांस होना चाहिए.

हिंदी गजल, उर्दू गजल से क्या नहीं ले पायी?

– हमने दुष्यंत कुमार को गाया है. मुझे वह बहुत पसंद हैं. क्योंकि हम साहित्यिक ढंग से चीजों को पढ़ते हैं. पर आम जनता नही समझती. ‘‘मैं रेल की तरह गुजरती हूं, मैं एक पुल की तरह थरथराता हूं.’ ’इसे वही समझ पाएगा, जिसे साहित्य की समझ है. बाकी इसे नहीं समझ सकते. मेरी राय में हिंदी में कविताएं लिखनी चाहिए. कविताएं कम ताकतवर नहीं होती.

रवींद जैन लिखते हैं -‘‘दुःख तेरा हो या मेरा हो. दुःख की परिभाषा एक है, आंसू तेरे हों या मेरे हों.’’ यह कविता जिसे सुना दो, उसे अच्छा लगेगा. इसे गजल का रूप देंगे, तो बात नहीं बनेगी.

नया क्या हो रहा है?

– हमें प्रसार भारती का बोर्ड मेंबर बनाया गया है. दूरदर्शन को चमकाने की दिशा में काम कर रहा हूं.

संगीतकार, गायक, निर्माता, अभिनय, प्रसार भारती की जिम्मेदारी सबके लिए किस तरह समय निकालते हैं?

– समय मैनेजमेंट भी एक कला है.

प्रसार भारती के अंदर नया क्या होने जा रहा है?

– हम एक नया चैनल ‘‘म्यूजिक एंड डॉस’ शुरू करने वाले हैं. इसे मैं ही डिजाइन कर रहा हूं. यह चैनल सुबह छह बजे शुरू होगा. शुरुआत श्लोक से होगी. एक दिन हिंदू संस्कृत के श्लोक, एक दिन जैनी, एक दिन गुरू नानक के शब्दों से शुरू होगा. धीरे धीरे उसे गुलाबी करते जाएंगे. फिर दोपहर में फिल्मी गाने शुरू हो जाएंगे. पर उसमें शास्त्रीय संगीत ज्यादा होगा. पं.रविशंकर गा रहे हैं. शाम को गजलें और रात में कव्वाली. इसके अलावा रमेश सिप्पी निर्देशित ‘‘बुनियाद 2’’ आएगा. जिसमें आजकल के जमाने की कहानी होगी. पूरी नई कहानी होगी.

दूरदर्शन के कई चैनल हैं. पर बच्चों के लिए कोई चैनल नहीं है. चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी बच्चों के कार्यक्रम व फिल्म बनाती है, पर वह दर्शकों तक पहुंचते ही नहीं?

– देखिए, बच्चों के लिए पूरा चैनल नहीं दे सकते. क्योंकि बच्चे पूरा दिन घर पर नहीं रहते. बच्चे स्कूल जाते हैं. खेलने के लिए पार्क में या घर से बाहर जाते हैं. पर उनके लिए कुछ समय मुकर्रर करना पड़ेगा. जिस पर हम लोग काम कर रहे हैं.

पाकिस्तानी कलाकारों की पाबंदी पर आप क्या सोचते हैं?

– कलाकारों का स्वागत किया जाना चाहिए. हम आपका गाना सुनना चाहते हैं, आप हमारे देश में आइए, यहां खूब पैसा कमाइए. लेकिन अपनी यानी कि पाकिस्तानी सरकार से कह कर आइए कि आप भारत में पैसा कमाने जा रहे हैं, हमें भारत में बहुत ईनाम मिलता है, तो भारत में आतंकवादी भेजना बंद कर दो. यदि वह ऐसा कह कर आएंगे, तो हम उनका स्वागत माला पहनाकर करेंगे.

पाकिस्तानी गायक गुलाम अली से आपके काफी अच्छे संबंध रहे हैं?

– बिलकुल..गुलाम अली हमारे यहां ठहरते थे. उन्होंने हमारे घर पर कितनी महफिलें की हैं. पर अब वह पाकिस्तान में कह कर फिर  आएं. कलाकारी व दोस्ती अपनी जगह है. पर अब यदि वह यहां आना चाहते हैं, तो अपनी सरकार से कह कर आएं कि उनकी सरकार भारत में आतंकवादी न भेजे.

आप कभी पाकिस्तान नहीं गए?

– मैंने तो कसम खा रखी है कि मैं पाकिस्तान नहीं जाउंगा. मेरा एक बार वीजा भी बना था, पर मैं नहीं गया. मैं पाकिस्तान में नही गाउंगा. पर पाकिस्तानी मुझे सुनने के लिए यहां आते हैं. अभी कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान से तीन सौ लोगों का दल मुझे सुनने के लिए आया था. उनके लिए नागपुर में हमारा कार्यक्रम था. मेरा कार्यक्रम सुनकर वह वापस चले गए. ऐसा एक नहीं कई बार हो चुका है. दुबई, लंदन से भी लोग मुझे सुनने आते हैं. मुझे लगता है कि वह हमें इतना सताते हैं, तो हम उन्हें गाना सुनाने क्यों जाएं. कभी नहीं जाउंगा.

फ्लाप रही केजरीवाल की रैली

दिल्ली के बाहर सियासी जमीन और वजूद तलाश रहे आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल की भोपाल में आयोजित परिवर्तन रैली लगभग फ्लाप रही. पुराने भोपाल के छोला दशहरा मैदान में आयोजित इस रैली में केजरीवाल की उम्मीद कद काठी और नाम के मुताबिक भीड़ इकट्ठा नहीं हुईए तो साफ हो गया कि आप की प्रदेश इकाई को अभी और मेहनत की जरूरत है और उसे कुछ जाने पहचाने चेहरे व नाम भी पार्टी से जोड़ना होंगे.

शिवराज सिंह चौहान के गढ़ में उन्हे घेरने में नाकाम रहे केजरीवाल कोई हाहाकारी भाषण भी नहीं दे पाये. केजरीवाल अपने पूरे संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन मुद्दों पर कोसते रहे जिनसे जनता पहले से ही वाकिफ है. मसलन यह कि नोट बंदी के जरिये मोदी अपने दोस्तों (अंबानी और अदानी) का आठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने देश की आम जनता की जमा पूंजी बैंकों में जमा करा ली है और उनका मकसद न तो कालाधन लाने का था और न ही भ्रष्टाचार खत्म करने का है.

इस तरह की बातें महत्व खो रही हैं और नोटबन्दी के बाद से केजरीवाल इतनी दफा कह चुके हैं कि लगता है कि कोई कर्मकांडी पंडित बिना  पोथी खोले रट्टू तोते की तरह सत्य नारायण की कथा बांच रहा है. अपने भाषण को मसालेदार बनाने के चक्कर में गच्चा खा गए केजरीवाल दरअसल में आप को एक बेहतर विकल्प के रूप में पेश नहीं कर पाये और न ही नोट बंदी की तकनीकी खामियां गिना पाये. भोपाल में वे असहनीय दांत दर्द से पीड़ित थे, जिसके चलते किसी से मिले नहीं.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस कुछ ब्रांडेड चेहरों की वजह से वजूद में है नहीं, तो उसकी हालत भी पतली है, ऐसे में केजरीवाल और आप से उम्मीदें पाले बैठे आम लोगों को इस रैली से निराशा ही हाथ लगी है, जो एक मजबूत विपक्ष आप में देख रहे थे. आप के प्रदेश मुखिया आलोक अग्रवाल भीड़ जुटाने में असफल रहे, तो इसकी वजह आत्म मुग्धता और यह मुगालता पाले रखना है कि चूंकि लोगों का मन भाजपा से उचट रहा है और कांग्रेस भरोसा खो चुकी है, इसलिए लोग मजबूरी में आप को वोट देंगे, काफी महंगा साबित हुआ. वजह दिल्ली और भोपाल में जमीन आसमान का फर्क है, जिसे आप की नवोदित टीम समझ नहीं पा रही और शो बाजी में उलझी है.   

मोदी की गंगा जैसी पवित्रता के मायने

पुराने जमाने की हिन्दी फिल्मों और गुलशन नन्दा छाप सामाजिक उपन्यासों में जब भी नायिका की पवित्रता पर उंगली उठती, तो वह झट से सुबकते हुये कानों को हथेली से ढकते चिर परिचित डायलोग बोल देती थी कि भगवान के लिए ऐसा झूठा इल्जाम मत लगाइए, मैं गंगा की तरह पवित्र हूं, यानि गंगा पवित्रता का पैमाना हुआ करती थी और आज भी पवित्रता के मानक विकल्प के अभाव में है.

राज भाजपा का हो और गंगा शंकर राम वगैरह की दुहाई ना दी जाए तो देश में लोकतन्त्र के होने की गलतफहमी हर किसी को होना स्वभाविक है. हुआ यूं कि गुजरात की मेहसाना रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कुछ ऐसे आरोप मढ़ डाले, जो राजनैतिक चरित्रहीनता की श्रेणी में आते हैं. लिहाजा केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मोदी की तरफ से सफाई दी कि वे गंगा की तरह पाक साफ और पवित्र हैं, उन पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए.

धरम करम की राजनैतिक शैली में मुद्दे की बात आई गई हो गई, जिसके तहत राहुल गांधी के पास एक रहस्यमय डायरी है जिसके खुलासे से भूकम्प आना तय है. ऐसी डायरियां भी पुराने जमाने की ही हिन्दी फिल्मों और जासूसी उपन्यासों की पवित्रता के प्रसंग सरीखी अनिवार्यता हुआ करती थीं, जिनमे कई अहम राज दर्ज रहते थे. अब इस सियासी गैंगवार का सस्पेंस किसी को समझ नहीं आ रहा कि अगर ऐसी कोई डायरी वाकई वजूद में है तो राहुल गांधी उसे गायब होने के पहले सार्वजनिक क्यों नहीं कर देते और नहीं है तो भाजपा गंगा को क्यों बीच में घसीट रही है, जिसके बाबत कांग्रेस प्रवक्ता रंजीत सिंह सुरजेबाला को घिसा घिसाया डायलोग बोलना पड़ा कि गंगा तो कब की यानि राजकपूर के जमाने में ही मैली हो चुकी है.

बकौल रविशंकर प्रसाद चूंकि राहुल के परिवारजनों का नाम अगस्टा घोटाले में आ रहा है, इसलिए वे उलूल जुलूल आरोप मढ़ रहे हैं. कुल मिलाकर गुमराह जनता को करते उसे उल्लू भी बनाया जा रहा है, जो पूरा लुत्फ इस ड्रामे का उठा रही है और मोदी की पवित्रता के दावे को उनके अतीत से जोड़ते चटखारे भी ले रही है. 

दंगल : रिव्यू से पहले पढ़ें सान्या-फातिमा का ये खास इंटरव्यू

फिल्म ‘दंगल’ में फ्री स्टाइल रेसलर और कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडलिस्ट गीता फोगट और उसकी रेसलर बहन बबीता कुमारी की भूमिका निभाने वाली फातिमा शेख और सान्या मल्होत्रा अपने चरित्र को लेकर खास चिंतित हैं. उन्होंने इस किरदार को जीवंत करने के लिए बहुत मेहनत की है. रियल लाइफ के कोच के संरक्षण में उन्होंने 8 महीने तक प्रशिक्षण लिया. यह फिल्म उन दोनों के लिए चुनौती है और आगे दर्शकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रही हैं. उनसे मिलकर बात करना अच्छा था. आइये जाने कैसे उन्होंने इस भूमिका को निभाया है.

प्र. आप दोनों अपने बारें में बतायें.

सान्या मल्होत्रा – मैं दिल्ली की हूं और बचपन से ही अभिनय का शौक था. पर दिल्ली में ऐसा कुछ खास नहीं है. फिर मैंने कंटेम्पर्री, बैले, हिप-हॉप सब तरह का डांस सीख लिया. पिता की आज्ञा लेकर केवल 15 दिनों के लिए मुंबई अपने दोस्तों के साथ रहने आई. फिर वापस दिल्ली गई और कहा कि मुझे एक्टिंग करनी है. मुझे मुंबई में रहना पड़ेगा. मेरे पिता एक पल के लिए रुके और बोले कि मुझे पता है कि तुम अच्छा करोगी, इसलिए जाओ. मेरे माता पिता ने मेरे काम के लिए बहुत सहयोग दिया. मैं मुंबई आई, 4-5 महीने तक तो पता नहीं चला कि मैं क्या करूं, कहां जाऊं, किसको कॉल करूं, आदि चलता रहा. लेकिन धीरे-धीरे ऐड में काम मिलने लगा, काफी संघर्ष था. फिर मुझे दंगल फिल्म के गीता की भूमिका की ऑडिशन के लिए कॉल आया. मैंने ऑडिशन दिया और काफी अच्छा ऑडिशन हुआ था. फिर भी एक महीने तक कोई उत्तर नहीं मिला. लेकिन आशा थी कि यह भूमिका शायद मुझे ही मिलेगी.

इस दौरान मैं मेरी मां की बर्थडे के लिए दिल्ली जा रही थी कि मुझे कॉल आया कि आप शॉर्टलिस्ट हो चुके हो. आपसे आमिर खान मिलना चाहते हैं. मैं एयरपोर्ट में थी, इसलिए वहां से लौटकर आने की बात कही. यहां आकर देखा कि 15 लड़कियां अब भी मेरे सामने थी. यह एक और बाधा थी. उसमें कुछ लड़कियां गीता तो कुछ बबीता के लिए ऑडिशन दे रही  थी. लेकिन अंत में मुझे बबीता की भूमिका मिली और यहीं से मेरी जर्नी शुरू हो गई.

फातिमा शेख – मेरे माता-पिता जम्मू कश्मीर के हैं. पर यहां रहते हैं. मैं मुंबई में पैदा हुई और छोटी उम्र से ही कुछ फिल्में की है. चाची 420, वन टू का फॉर, जमानत आदि फिल्मों में काम किया था. फिर मैंने एक्टिंग बंद कर पढाई पर ध्यान दिया. पढाई के दौरान एक्टिंग को ‘मिस’ करने की वजह से फिर से एक्टिंग में आ गई और छोटी-छोटी भूमिका निभाने लगी. 12वीं के बाद मैंने पढाई छोड़ दी और एक्टिंग में आ गई.

प्र. आप दोनों इतनी कॉंफिडेंट कैसे थी कि ये फिल्म आप दोनों को ही मिलेगी, ऑडिशन में आपको क्या पूछा गया था?

सान्या मल्होत्रा – मुझे फिल्म के ही तीन दृश्य करने के लिए दिए गए थे. जो गीता फोगट के थे. मैंने अच्छे से कर लिया था. लेकिन बाद में मुझे बबीता की भूमिका मिली. उससे मुझे कोई समस्या नहीं थी. मैं आमिर खान से मिलकर इतनी खुश थी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्योंकि मुझे एक बड़ी फिल्म मिल रही थी.

फातिमा शेख – ये ऑडिशन साधारण नहीं था, करीब 4-5 स्तर तक हमें निरीक्षण किया गया. इसमें पूरी शारीरिक स्वस्थता पर अधिक ध्यान  दिया गया. जिसमें मैं दौडू या व्यायाम करती हूं तो कैसी दिखती हूं. सारी बारीकियों को देखा गया. इसके अलावा हमारी एक्टिंग आमिर खान के साथ भी ली गई. सभी कलाकार के कॉम्बिनेशन को अच्छी तरह से परखा गया था. फिर हमें बुलाया गया, मुझे लगा कि अब फाइनल सुनने को मिलेगा. वहां रेसलिंग के ट्रेनर कृपा शंकर सिंह उपस्थित थे, मैं दुबली हूं, तो उन्होंने कहा कि मैं रेसलर नहीं बन सकती. वापस बुलाया फिर रेसलिंग का टेस्ट हुआ, जहां हम दो हफ्ते सिर्फ रेसलिंग ही करते रहे. ये मेरे लिए पहली बार था. कभी हमने इतना वर्कआउट जिंदगी में नहीं किया. मैं सुबह हाथ पैर न उठा पाने की वजह से रोती थी. लेकिन शुरू किया और टेस्ट में पास हुई. जब इसे आमिर खान ने बताया तो मेरे लिए इससे ख़ुशी की बात कुछ भी नहीं थी. फिल्म मिली है ये बात तो मैंने सुनी थी इसके बाद उन्होंने जो भी कहा था, मुझे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा. एक पल के लिए मैं सुन्न हो गई थी.

प्र. सान्या, आपको फिल्मों में आने की प्रेरणा कहां से मिली, क्या आपके परिवार का कोई कनेक्शन फिल्मों से था?

मुझे बचपन से फिल्म देखने का और डांस करने का शौक था. गाने चलते थे तो मैं खूब डांस करती थी. मैं कभी भी किसी समय डांस कर सकती थी. मुझे अवार्ड फंक्शन देखना बहुत पसंद था. मैं शीशे के आगे जाकर अवार्ड लेने की प्रैक्टिस करती थी. कहां से एक्टिंग का कीड़ा आया पता नहीं. मेरी मां को पेंटिंग अच्छा बनाना आता है. शायद यहीं से मेरे अन्दर क्रिएटिविटी आई. मेरे माता-पिता दोनों जॉब करते है.

प्र. आप दोनों अपने चरित्र के बारें में कितना जानती थी? कितनी तैयारियां की?

फातिमा शेख – मुझे गीता के बारें में बहुत अधिक पता नहीं था. ट्रेनिंग शुरू होने के बाद रोज मैं उनकी वीडियो देखती थी. ट्रेनर ने हमें प्रैक्टिस वीडियो भी दिया था. वीडियो ने चरित्र में घुसने में काफी मदद की. हरियाणवी भाषा में थोड़ी मुश्किल आई. मैं मुंबई की होने की वजह से हरियाणवी का ट्यूशन लिया.

सान्या मल्होत्रा – वीडियो देखकर पता चलता था कि रेसलर प्रैक्टिस कैसे करते है. अगर खड़े होते हैं तो कैसे पोज़ बनाते हैं आदि सारे हाव-भाव देखा प्रैक्टिस की, तब जाकर शूटिंग शुरू हुई. मुझे हरियाणवी आती है, क्योंकि मैं दिल्ली की हूं.

प्र. आप दोनों को स्पोर्ट्स का कितना शौक है?

सान्या मल्होत्रा – मुझे स्पोर्ट्स का ज़रा भी शौक नहीं. मुझे डांस पसंद है.

फातिमा शेख – मैं स्कूल में थोड़ी बहुत खेलती थी.

प्र. आमिर खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा था?

सान्या मल्होत्रा – वे अपने काम को लेकर बहुत पैशनेट रहते हैं, लेकिन किसी को उसका प्रेशर नहीं देते. उन्हें देखकर मुझे बहुत प्रेरणा मिली.

फातिमा शेख – मुझे बहुत अच्छा लगा, वे अभिनय को आसान कर देते हैं. वे बहुत ही हंसमुख हैं.

प्र. कितना प्रेशर महसूस कर रही हैं? आप दोनों का खेल और खिलाड़ियों के प्रति भाव कैसा है?

सान्या मल्होत्रा – दंगल फिल्म ने मेरी लाइफ बदल दी. इन दो सालों के दौरान मैं एक रेस्पोंसिबल इंसान बन चुकी हूं. मेरे अन्दर बहुत बदलाव आ गया है. आत्माविश्वास बहुत बढ़ा है. मैं पहले बहुत इंट्रोवर्ट थी, किसी के साथ बात कर नहीं पाती थी. पहले मुझे रेसलिंग आसान लगा था. लेकिन ऐसा नहीं था. सात से आठ महीने मैंने रेसलिंग की प्रैक्टिस की है. अभी मैं कुछ भी कर सकती हूं.

फातिमा शेख – मेरे अन्दर खिलाड़ियों के लिए बहुत सम्मान बढ़ा है. वे कितना मेहनत करते हैं, फिर भी जब वे मेडल नहीं ला पाते, तो हम उसे ‘रिजेक्ट’ कर देते हैं, जो गलत है. अगर हम एक एथलीट की तरह जी पाते हैं, तो हम अपने प्रोफेशन में बहुत आगे बढ़ पाएंगे. इसके अलावा जिम्मेदारी मेरे अन्दर अवश्य बढ़ी है. मैं चाहती हूं कि मेरा काम सबको पसंद आये.

प्र. रियल गीता, बबीता से क्या आप दोनों मिली है?

सान्या मल्होत्रा – हम दोनों एक बार फिल्म की मुहूर्त पर गीता फोगट और बबीता कुमारी से मिले है.

प्र. शूटिंग के दौरान आप दोनों को कोई मुश्किलें आई?

फातिमा शेख – हम दोनों ने काफी तैयारियां फिल्म के पहले की थी इसलिए शूटिंग करना कठिन नहीं था. सारे संवाद पूरी तरह याद थे. निर्देशक नितीश तिवारी ने बहुत मदद की. सारी शूट लुधियाना, पूना और दिल्ली में हुई.

प्र. फिल्मों में अन्तरंग दृश्य करने में आप दोनों कितनी सहज है?

सान्या मल्होत्रा – मैं कलाकार हूं और हर तरह के अभिनय करना चाहती हूं. मैं अपने आप को किसी भी परिस्थिती में रोकना नहीं चाहती, अगर चरित्र मुझे अच्छा लगे.

फातिमा शेख – मेरे हिसाब से अभिनय मेरा प्रोफेशन है, रियल नहीं, इसलिए जो भी काम मिलेगा उसे करना चाहूंगी.

प्र. आप दोनों कितनी फैशनेबल है?

सान्या मल्होत्रा – मैं अधिक फैशनेबल नहीं, लेकिन अब थोड़ा सोचना पड़ता है. मैं बहुत फूडी हूं, कुछ भी अच्छा मिले, खा लेती हूं. मां के हाथ का बना दाल चावल मुझे बहुत पसंद है.

फातिमा शेख – मैं कुछ भी पहन लेती हूं कई बार भाई के कपड़े भी मैं पहन लेती हूं. मलाई और घी पसंद है. मेरे पापा अच्छा खाना बनाते हैं. उनके हाथ का बना राजमा चावल और यखनी, कश्मीरी डिश पसंद है.

मैरी-विकास आइबा अवार्ड से सम्मानित

इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन (आइबा) की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतीय महिला मुक्केबाज मैरी कॉम और एशियन गेम में गोल्ड मेडल विजेता विकास कृष्ण्न को आइबा अवार्ड से सम्मानित किया गया.

पांच बार की विश्व चैंपियन और ओलंपिक कांस्य पदक विजेता मैरी कॉम को लीजेंड्स अवार्ड से सम्मानित किया गया. मैरी कॉम को यह अवार्ड उनके शानदार करियर के लिए मिला. जबकि विकास को एपीबी (आइबा प्रो मुक्केबाज) सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार की ट्रॉफी दी गई.

ट्रॉफी प्राप्त करने के बाद विकास ने कहा, “मैं आइबा अध्यक्ष डॉ. वू के साथ एपीबी निदेशक मिर्को वुल्फ का मुझे इस पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए धन्यवाद करता हूं. हमारा पिछले चार साल से कोई महासंघ नहीं था, लेकिन अब है और वे सभी कड़ी मेहनत कर रहे हैं. मुझे आशा है कि हम भविष्य में अच्छा करेंगे.” विकास ने इस साल दो एपीबी मैच खेले हैं.

मैरी कॉम ने अपने शानदार करियर में एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण और पांच बार विश्व चैंपियन का खिताब अपने नाम किया है. 2008 में चौथी बार विश्व चैंपियन बनने पर मैरी कॉम को आइबा ने मैग्निफिशेंट मैरी का नाम दिया गया था. गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ ने अपनी 70वीं वर्षगांठ पर भारतीय मुक्केबाजी संघ को स्थाई सदस्य बनाया है.

भारत पदकों से दूर क्यों

रियो ओलिंपिक में सिल्वर पदक विजेता पी वी सिंधु और कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक पर सरकारी एजेंसियां और सरकारें मेहरबान हैं. करोड़ों रुपए उन्हें मिल चुके हैं. सिंधु को 13 करोड़ रुपए व साक्षी को 5.6 करोड़ रुपए मिले. उन के साथसाथ दीपा कर्माकर और ललिता बाबर को भी 20-20 लाख रुपए मिले. वैसे तो ओलिंपिक की पदक तालिका में भारत नगण्य है. 2 मैडल अगर इन दोनों खिलाडि़यों को नहीं मिलते तो खिलाड़ी इस बार शायद पदक के बिना खाली हाथ ही घर लौटते. गनीमत रही कि इन 2 लड़कियों ने देश की लाज रख ली.

यहां यह समझना भी जरूरी है कि इतनी बड़ी आबादी में खिलाडि़यों के ऐसे परफौर्मैंस के लिए जिम्मेदार आखिर कौन है? आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में खिलाडि़यों पर ट्रेनिंग के लिए विदेशों की तुलना में कम पैसे खर्च किए जाते हैं. ओलिंपिक से पहले भारत द्वारा ‘टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम’ के अंतर्गत 44 लाख रुपए सिंधु को, 12 लाख रुपए साक्षी को और महज 2 लाख रुपए दीपा को मिले, जबकि पदक के बाद मिलने वाली राशि उन की ट्रेनिंग के दौरान मिलने वाले खर्च से कई गुना अधिक है.

सरकार खेलों की जिम्मेदारी ले

इस बारे में मुंबई के स्पोर्ट्स डायरैक्टर और नैशनल ऐथलीट कोच हरीश बी सुवर्ना जो पिछले 20 वर्ष से इस क्षेत्र में हैं, कहते हैं कि सरकार पूरी तरह से खेलों की जिम्मेदारी नहीं लेती. विकसित देशों ने काफी फंड उस में डाला है. अगर हम चीन को देखें तो टेबल टैनिस के सलैक्शन में 4 हजार के लिए 50 हजार बच्चे आते हैं, उन का ट्रायल लेने के बाद 5 हजार चुने जाते हैं, जिन में से अंत तक केवल 2 हजार ही ट्रेनिंग के लिए रखे जाते हैं. ये बच्चे अधिकतर 5 वर्ष की उम्र के होते हैं. ऐसे में उन की शिक्षा, नौकरी और पूरी जिंदगी की गारंटी सरकार की होती है. हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. यहां तो मैडल पाने के बाद पैसा फेंकते हैं. कोच गोपीचंद ने अपना घर गिरवी रख कर बैडमिंटन प्लेयर्स तैयार किए.

खेलों में अच्छी प्रतिभा के चयन के लिए निम्न बातों पर ध्यान देने की जरूरत है:

-देश में प्रतिभा की कमी नहीं है. शहर से अधिक गांवों में प्रतिभाएं देखने को मिलती हैं. वजह वहां के लोगों में पैशन और मेहनत कर आगे बढ़ने का जज्बा है, फिर चाहे वह दीपा कर्माकर हो, साक्षी मलिक हो या दत्तु भोकानल, सभी छोटे शहरों या गांव से ही हैं.

-किसी भी खेल में पैसे की जरूरत होती है. कोई भी परफौर्मर खुद पैसा खर्च कर आगे नहीं बढ़ सकता.

-हमारे देश में खेल पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन खेलों में हमें मैडल चाहिए होते हैं. हम हर 4 साल बाद जागते हैं, फिर दोष एकदूसरे को देते हैं.

-एक खिलाड़ी तैयार करने में 10 से 12 साल लगते हैं. इस के बाद वे एक लैवल तक पहुंचते हैं. अमेरिकी धावक उसैन बोल्ट ने 14 साल की उम्र में दौड़ना शुरू किया और करीब 10 साल बाद उसे पदक मिलने शुरू हुए.

प्रतिभावान बच्चों को मौका मिले

प्रतिभावान बच्चों का चुनाव कर उन के रहनेखाने और भविष्य को निश्चित करने की सुविधा सरकार को देनी होगी, तब आप को परिणाम मिलेगा. हालांकि हम ने काफी खर्च कर खिलाडि़यों को रियो भेजा पर उस का प्रतिशत बहुत कम है, जबकि विदेशों में यह 49% है. खेलों की तरफ सरकार का जुड़ाव न के बराबर है. उसे लगता है कि यह ‘डैड इन्वैस्टमैंट’ है. ऐसे में ओलिंपिक मैडल की कल्पना नहीं की जा सकती. आज किसी भी क्षेत्र में लोग तभी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, जब उन्हें वहां अपना भविष्य सुरक्षित नजर आता है. इस के अलावा बच्चों को सरकार की तरफ से स्कौलरशिप मिले, तभी अधिक से अधिक बच्चे इस तरफ आ सकते हैं.

आज मातापिता की इस तरफ रुचि है, लेकिन उन्हें आश्वस्त किया जाए कि उन के बच्चे का भविष्य यहां सुरक्षित है. 10वीं और 12वीं के बाद अधिकतर बच्चे खेल छोड़ देते हैं, क्योंकि इस में उन को उज्ज्वल भविष्य नहीं दिखता. 16 साल तक ही उन की प्रतियोगिता है. मैडल मिलने के बाद पैसों की बौछार होती है. इन खिलाडि़यों को टैलीविजन पर हर विज्ञापन में देखा जाता है. उन पर फिल्में बनती हैं, जिस से उन का ध्यान खेल से हट कर कहीं और चला जाता है. यही वजह है कि कई नामीगिरामी प्लेयर अब कहीं भी नहीं दिखते.

अच्छा कोच व तकनीक

इस के अलावा हरीश कहते हैं कि खेल में शोध की अधिक आवश्यकता है, जैसा कि विदेशों में होता है. हमारे यहां तो 20-30 साल पुरानी तकनीक चल रही है. इतना ही नहीं हमारे यहां खेलने के लिए अच्छे ग्राउंड नहीं हैं, जहां ग्राउंड के लिए जगह होती है, वहां पर बिल्डिंग्स बन जाती हैं. यहां रिसोर्स और मोटिवेशन की भी काफी कमी है.

दीपा का परफौर्मैंस अच्छा होने के बावजूद उसे मैडल न मिल पाना दुखदाई रहा. लेकिन यहां जिमनास्टिक को कोई इस लैवल तक कर सकेगा, इस की जानकारी नहीं थी. दीपा भी तब पहचानी गई जब उस ने ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई किया. इस खेल में बच्चे को छोटी उम्र से ट्रेनिंग लेनी पड़ती है. कोच उसे सही तकनीक द्वारा ट्रेनिंग देता है. यहां जिमनास्टिक सैंटर तो है लेकिन विश्वस्तर की सुविधाएं नहीं हैं. समर साल्ट करने पर यदि हाथपैर टूट जाएं, तो उस का दायित्व कोई नहीं लेता. इस के अलावा ‘सेफ्टी गार्ड’ नहीं है. इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है.

हमारे यहां कुशल लोगों की भी कमी है. मातापिता को भी इस बारे में पता नहीं होता. यदि बच्चे को ठीक समय पर सही खेल की जानकारी नहीं मिलेगी तो उस की क्षमता बेकार हो जाएगी और वह ठीक से परफौर्म नहीं कर पाएगा. जानकार कोच ही बता सकते हैं कि सही उम्र में, सही स्पर्धा में भाग लेना जरूरी है. खेल आयोजक करुणाकर शेट्टी कहते हैं कि मैं जिमखाना की तरफ से खेल का आयोजन करता हूं, जिस में मुंबई क्रीड़ा महोत्सव खास है. इस में पूरे महाराष्ट्र के करीब 5 हजार स्कूली बच्चे भाग लेते हैं. इंटर स्कूल प्रतियोगिता होती है जिस में बच्चे अपनी प्रतिभा को समझते हैं. ऐसे खेल और टूरनामैंट आयोजित होने चाहिए ताकि हर क्षेत्र में अच्छे खिलाड़ी मिलें.

खिलाडि़यों का खानपान

खिलाडि़यों के खानेपीने की व्यवस्था सही हो इस के लिए स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया स्कीम चला रही है. यहां बच्चों को एक साल के लिए अडौप्ट किया जाता है और उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है. अगर वे रैगुलर नहीं हैं या अच्छी परफौर्मैंस नहीं दे पा रहे हैं तो उन्हें वापस भेज दिया जाता है. उन्हें डाइट भी न्यूट्रीशन के अनुसार दी जाती है. लौंग रन के लिए अधिक कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है.

विदेशों में एक खिलाड़ी के साथ डाइटीशियन, मनोवैज्ञानिक, फिजियोथेरैपिस्ट आदि की टीम होती है. तब उस का रिजल्ट सब को दिखता है. हमारे देश में सब गोल्ड मैडल चाहते हैं, लेकिन शुरू से ही इस पर ध्यान नहीं दिया जाता. बैडमिंटन कोच गोपीचंद ने अपने पैसे लगा कर खिलाडि़यों को तैयार किया है.

खेलों में राजनीति

राजनीति खेलों में सब से अधिक हावी है, जिस से खिलाडि़यों का मनोबल टूटता है. हरीश कहते हैं कि हमारी मानसिकता में राजनीति घुसी हुई है. देश में सब से अधिक साधुसंत इसलिए आते हैं, क्योंकि हम उन्हें सुनते हैं, जिस दिन हम उन्हें सुनना बंद कर देंगे एक भी संत यहां नहीं दिखाई देगा. एसोसिएशन की भी मानसिकता है. जब तक हम एकजुट हो कर काम नहीं करेंगे तब तक हमें उचित परिणाम नहीं मिलेंगे.

खेल आयोजक करुणाकर कहते हैं कि खेल में राजनीति ग्राउंड लैवल से है जिसे खत्म करना चाहिए, जिस की अच्छी अप्रोच है, वही अपने खिलाड़ी को बिना प्रतिभा के आगे खेलने भेजते हैं. ऐसे में ठीक रिजल्ट नहीं मिलता. नैशनल कबड्डी प्लेयर सुबर्ना बारटक्के कहती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में खिलाडि़यों को अधिक ट्रेनिंग नहीं मिलती. यहां ओलिंपिक की तैयारी एक साल पहले की जाती है, जबकि विदेशों में अभी से लोग 2020 ओलिंपिक के लिए तैयार हैं. इस के अलावा खिलाडि़यों को इन्सैंटिव हर लैवल पर देना चाहिए. मुझे अच्छा लगा जब महाराष्ट्र सरकार ने मुझे नौकरी मेरी शिक्षा के हिसाब से औफिस लैवल की दी. ऐसी व्यवस्था हर स्टेट में प्लेयर के लिए होनी चाहिए.

खेलों में नशा

खेलों में ड्रग्स काफी हावी हो गया है. ट्रेनिंग के दौरान कई बार खिलाड़ी ड्रग्स लेते हैं. विदेशी प्लेयर्स मास्किंग करते हैं, जिस में वे ड्रग्स को छिपाने के लिए दूसरी दवा ले लेते हैं. ऐसा देखा गया है कि हमारे प्लेयर्स अधिकतर एडवांस ट्रेनिंग के लिए रूस जाते हैं, वहां ड्रग्स अधिक चलता है. अभी रूस में मास्किंग की सुविधा नहीं है. अपने स्तर से अधिक परफौर्मैंस के लिए खिलाड़ी ड्रग्स लेते हैं. कई बार सप्लिमैंट कह कर कुछ लोग जूनियर ग्रुप को ड्रग्स खिला देते हैं. मैं अपने प्लेयर्स को हमेशा प्रौपर डाइट की सलाह देता हूं.

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रियो में मैडल की गिरती साख को देख कर आननफानन में एक टास्क फोर्स का गठन अगले 3 ओलिंपिक खेलों 2020, 2024, 2028 के लिए कर दिया है, जहां खिलाडि़यों को अच्छी ट्रेनिंग, खेल से जुड़े संसाधन, खिलाडि़यों का चुनाव और तकनीक से जुड़े विषयों पर ध्यान दिया जाएगा. लेकिन देखना यह है कि यह कदम खिलाडि़यों के लिए कितना कारगर साबित होगा. उन्हें आगे बढ़ने के लिए कितना सहयोग मिलेगा. राजनीति से हट कर इस काम में सारे अधिकारी कितना काम कर पाएंगे, वह भी परखना पड़ेगा. क्या वाकई अगले ओलिंपिक में पदकों की संख्या बढ़ेगी? इस के लिए तो साल 2020 का इंतजार रहेगा.

शराब करे खराब

शराब किस तरह दिमाग खराब कर देती है, उस का एक नमूना दिल्ली में मिला, जहां एक आदमी ने मायके गई पत्नी के यहां पहुंच कर लोहे की छड़ से पहले सास को मारा, फिर वहीं रह रहे अपने 2 बच्चों को मारा और उस के बाद बीचबचाव करने आए ससुर को मार डाला और साले को घायल कर दिया. शराब की जरूरत इस कदर पागल कर देती है कि उस आदमी ने अपने पत्नी के मातापिता व अपने ही बच्चों की हत्या कर अपने लिए जीवनभर जेल में जगह का पक्का इंतजाम कर दिया.

ऐसी शराब को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यदि बंद करना चाह रहे हैं, तो गलत क्या है? यह शराब का नशा ही है, जो देश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में हजारों को मरवाता है. शराब पी कर होने वाले झगड़ों की गिनती ही नहीं की जा सकती. शराबी पति से मार खाई बीवियों की गिनती तो करोड़ों में होगी. शराब पर रोक लगाना आसान नहीं है, पर हमेशा से राजा, ठाकुर, सरकारें जानती हैं कि शराब पिला कर मोटा कर भी वसूला जा सकता है और बिगड़ैल लोगों को दुश्मन से भिड़ने के लिए भेजा जा सकता है. हर देश की सेना में गोलीबारूद के साथसाथ शराब भी होती थी, ताकि सामने से आती गोलियों से डर न लगे और शराब के नशे में अपनी जान दे डाली जाए. हमारे देश के राजपूत जब लड़ने जाते थे, तो अपने साथ शराब जैसी ही नशीली अफीम ले जाते थे, ताकि शत्रु के वार का दर्द न हो. पर इस से उन में सोचने की ताकत कम हो जाती थी और लड़ाई कैसे जीतनी है, वे भूल जाते थे और अपनों पर ही वार करने लगते थे, जैसे दिल्ली के इस शराबी पति ने अपनी पत्नी के घर वालों और अपने बच्चों पर किया.

अफसोस यह है कि सरकारों ने पहले युद्धों में नशे का इस्तेमाल किया और अब पैसा कमाने के लिए कर रही हैं. देश की सब राज्य सरकारें शराब की नदियां बहा रही हैं, क्योंकि जो टैक्स की खेती शराब से होती है, वह किसी और से नहीं. अरविंद केजरीवाल की हिम्मत भी नहीं हो रही कि वे शराबबंदी कर सकें, ताकि दिल्ली शहर में सड़क दुर्घटनाएं कम हों, बीमारियां कम हों, बीवियों की पिटाई कम हो. उन्हें टैक्स खोने और शराबबंदी से लगने वाले पलीते का डर है. बिहार के अखबारों के पन्ने शराबबंदी के होने वाले नुकसानों से भरे होते हैं, उन के फायदे की बात नहीं होती, क्योंकि शराब बनाने वालों और बेचने वालों के हाथ लंबे हैं और वे हरेक को खरीद लेते हैं.

आजकल शराब निर्माता औरतों को शराब पीना सिखा रहे हैं और लगभग हर फिल्म में शराब के जाम टकराते दिखते हैं और इन में औरतें भी बराबर होती हैं. पहले सिर्फ वैंप पीती थीं, अब हीरोइनें और उन की मां का रोल कर रही कलाकार भी. ऐसे में दिल्ली जैसे कांड तो होते रहेंगे ही.

ताला मरांडी फंसे बाल विवाह केस में

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और बोरियो इलाके के विधायक ताला मरांडी अपने बेटे मुन्ना मरांडी की शादी कर के विवादों में घिर गए हैं. 11 साल की नाबालिग लड़की को बहू बना कर कानूनी पचड़े में वे ऐसे फंसे हैं कि उन के खिलाफ गोड्डा के बोआरीजार थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है. ताला मरांडी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पास्को ऐक्ट लगाया गया है. लड़की को प्रेमजाल में फंसाने और उसी से शादी करने का झांसा दे कर उस का यौन शोषण करने के मामले में उन का बेटा मुन्ना मरांडी भी बुरी तरह से फंस गया है.

खिजुरकया गांव की रहने वाली सीमा मुर्मू ने मुन्ना मरांडी के खिलाफ 22 जून, 2016 को प्रथम न्यायिक दंडाधिकारी के. आनंदा सिंह की अदालत में केस दाखिल कर यौन शोषण का आरोप लगाया था. कोर्ट के आदेश पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया और अब झारखंड रा य बाल संरक्षण आयोग ने नाबालिग के साथ मुन्ना मरांडी द्वारा शादी रचाने के मामले में स्वत: संज्ञान लिया. आयोग के सदस्य डाक्टर मनोज कुमार ने समूचे मामले पर गोड्डा के डीसी से रिपोर्ट मांगी है. आयोग ने दूल्हा और दुलहन के अलावा शादी समारोह में शामिल बरातियों और दूसरे लोगों के नामों की भी पूरी लिस्ट मांगी है. इस के बाद इस बाल विवाह में शामिल सभी लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी.

बाल विवाह करने के आरोप में फंसे ताला मरांडी सफाई देते हैं कि वे लोग गांव के रहने वाले हैं और गांवों में जन्म सर्टिफिकेट देख कर शादी नहीं होती है. रितु के मांबाप ने उन्हें बताया था कि उन की बेटी की उम्र 18 साल से ज्यादा है. उस के बाद ही वे अपने बेटे से रितु की शादी के लिए तैयार हुए. 11 साल की नाबालिग लड़की से शादी के मामले की जांच महागामा के एसडीओ ने की है. लड़की एसडीएन स्कूल में पढ़ती है और स्कूल के रजिस्टर में उस का जन्मदिन 25 जुलाई, 2005 दर्ज है. ताला मरांडी के बेटे मुन्ना मरांडी की उम्र 24 साल है और उस ने ग्रेजुएशन की डिगरी ले रखी है. उस ने 27, जून 2016 को रितु के साथ शादी की थी. मुन्ना मरांडी ने एक लड़की के साथ प्यार किया और दूसरी लड़की को विवाह का प्रस्ताव दे दिया. उस के बाद वह यही नहीं रुका, तीसरी लड़की के साथ सात फेरे ले लिए.

जिस लड़की के साथ उस ने मुहब्बत का खेल खेला था, अब वही उस के सामने मुसीबत बन कर खड़ी हो गई है और मुन्ना मरांडी पर यौन शोषण का मुकदमा दायर कर दिया है. मुन्ना मरांडी की रंगीनमिजाजी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. गोड्डा जिले के खिजुरकया गांव की रहने वाली 19 साल की मैट्रिक पास लड़की सीमा मुर्मू का कहना है कि साल 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान उस की मुलाकात मुन्ना से हुई थी. उस के बाद उन दोनों के बीच मुलाकातों का लंबा सिलसिला चल पड़ा. वे एकदूसरे को पसंद करने लगे. मुन्ना ने उसे मोबाइल फोन खरीद कर दिया, जिस पर दोनों कईकई घंटे तक प्यार की बातें किया करते थे. उस के बाद दोनों कई बार अकेले में मिले और मुन्ना ने शादी का झांसा दे कर कई दफा उस का यौन शोषण किया. उस के बाद अचानक वह शादी करने से मुकर गया. कई लड़कियों से रासलीला रचाने के बीच उस के घर वालों ने उस की शादी ममता हांदसा नाम की लड़की से पक्की कर दी. मुन्ना उस से शादी रचाने को तैयार भी हो गया, लेकिन मुन्ना की कारगुजारियों का पता ममता को लग गया और उस ने मुन्ना के साथ शादी करने से इनकार कर दिया.

21 साल की ममता हांसदा बीकौम की पढ़ाई कर रही है. वह कहती?है कि जिस लड़के से उस की शादी होने वाली थी, उस पर कोई दूसरी लड़की यौन शोषण का आरोप लगा रही है. ऐसे लड़के के साथ सात फेरे ले कर वह अपनी शादी को तमाशा नहीं बनाना चाहती थी. शादी की सारी तैयारियों के बीच जब ममता ने मना कर दिया, तो ताला मरांडी ने समाज की छीछालेदर से बचने के लिए तय तारीख को मुन्ना की शादी किसी और लड़की से कराने का मन बना लिया. उन्होंने शादी के अगुआ रहे भगन बास्की पर दबाव डाला कि वह अपनी बेटी रितु की शादी मुन्ना के साथ करा दे. रितु की उम्र 11 साल है और वह 7वीं जमात में पढ़ती है. भगन बास्की इस के लिए तैयार हो गया और 27 जून, 2016 को मुन्ना की शादी रितु से करा दी गई. इस मुद्दे पर पारिवारिक मामलों के वकील अनिल सिंह बताते?हैं कि मुन्ना और रितु की शादी के विवाद के मामले में कानून से राहत मिलना मुश्किल है.

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