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True Love Story : महान कवि जौन कीट्स का अनमोल लव लेटर

रोमांटिसिज्म एरा में जौन कीट्स का ब्रोन के लिए  प्यार गहरा था, जैसा कि कीट्स के फैनी को लिखे गए पत्रों में दिखाई भी देता है. ये पत्र अंगरेजी भाषा के सब से भावुक माने जाते हैं.

क्या ग़ालिब के पास शब्दों की कमी थी? मीर के पास? कैफ़ी आज़मी या गुलजार के पास? नहीं, ये शब्दों के जादूगर थे, हैं. कोई बात कहनी हो तो झट से दिमाग के पिटारे को खंगाला और पटक दिया सामने. भारत का कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्यार भरी बात कहता है तो ग़ालिब की शायरी आधीअधूरी तुतला के कह देता है. क्यों? क्योंकि हमें प्यार भरे शब्द सिखाए ही नहीं जाते. भाव क्या है बताए ही नहीं जाते. धर्म के लिए यह भलीच जैसी बातें जो हैं.

आखिर क्यों दिल टूटने के बाद जौन एलिया साहब याद आते हैं और ‘मुझे चैन क्यूं नहीं पड़ता, एक ही शख्स था जहान में क्या’ बुनबुनाते हैं. प्यार मार्मिक है. दिल को जोड़ता है. धोखा मिलता है तो दिल टूटता है. क्या इसे रील्स की दुनिया में समझा जा सकता है, जहां वीडियो का स्खलन 16-30 सैकेंड में हो जाता है.

मगर दिक्कत और बड़ी है कि सोशल मीडिया ने युवाओं को इन शब्दों से और दूर कर दिया है. गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड बना लेना प्यार नहीं होता, इस में कोई बड़ी बात नहीं. ओपोजिट सैक्स एकदूसरे के करीब आते ही हैं, पहले भी आते थे या आने की इच्छा रखते थे. प्यार एकदूसरे को अपनी फीलिंग शेयर करना, सपोर्ट करना, केयर करना, सुधारना और बदलना होता है. प्रेम के शब्द गढ़े जाते हैं उन में स्पष्टता होती है, यहां सस्पेक्ट का सुस, डेफिनेटली का हाइली, करिज्मा का रिज, सैक्सी या स्टाइलिश का ड्रिप नहीं चलता, बल्कि चलती है, घुमावफिराव, लफ्फेलफ्फाजी चलता है.

कोई अपनी गर्लफ्रैंड को चांद या फूल कहता है, तो इसलिए नहीं कि वह ये सब है. इस का मतलब यह है कि चूंकि चांद और फूल सुंदर और खुशबूदार होते हैं तो गर्लफ्रैंड को उन का रूपक दिया जाता है.

इसे जौन कीट्स और फैनी ब्रोन के प्यार से समझा जा सकता है. इन की प्रेम कहानी साहित्य के इतिहास की सब से मार्मिक कहानियों में से एक है. इंग्लिश रोमांटिसिज्म के एक बड़े कवि कीट्स ने 1818 में 23 साल की उम्र में लंदन के हैम्पस्टेड में रहते हुए फैनी ब्रोन से मुलाकात की थी. इंग्लिश रोमांटिसिज्म 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं के शुरुआत तक चला. इस दौरान बड़ेबड़े कवि पैदा हुए जो इंडस्ट्रियल रेवोलुशन के रिएक्शन से उपजे थे.

जौन का प्रेम जल्दी ही परवान चढ़ा, लेकिन यह कई चुनौतियों से भरा हुआ था, जिन में मुख्य चुनौती बिगड़ती सेहत और आर्थिक तंगी थी.

कीट्स और ब्रोन का प्यार गहरा था, जैसा कि कीट्स के फैनी को लिखे गए पत्रों में दिखाई भी देता है. ये पत्र अंगरेजी भाषा के सब से भावुक माने जाते हैं. कीट्स ने अपने पत्रों में अपने प्यार का जिक्र किया. लेकिन साथ ही अपने डर भी व्यक्त किए. वह अपनी प्रेमिका से अपनी समस्याएं साझा करते थे. उन का टीबी तेजी से बढ़ रहा था, और उन्हें इस बात का डर था कि उन के पास समय बहुत कम है.

1820 में कीट्स अपनी बीमारी से उबरने की उम्मीद में इटली चले गए, फैनी लंदन में रह गई. दुखद यह था कि वे फिर कभी एकदूसरे से मिल नहीं पाए क्योंकि फरवरी 1821 में रोम में कीट्स का 25 साल की उम्र में निधन हो गया. 1814 और 1819 के बीच जौन कीट्स ने 64 सानेट लिखे. सोनेट 14 लाइनों की लम्बी कविता होती है, जो 13वीं शताब्दी में इटली से शुरू हुई. इसे छोटा गाना भी कहा जा सकता है. जब कीट्स अपना पहला सोनेट लिखा था, तब उन की उम्र 18 साल थी, और जब उन्होंने अपना अंतिम सोनेट पूरा किया, तब उन की उम्र 24 साल थी. इंग्लैंड में नए बदलावों के का असर कीट्स पर पड़ा, जो उन की कविताओं में दिखती है.

कीट्स की मृत्यु के बाद, फैनी ब्रोन ने कई वर्षों तक शोक वस्त्र पहने और सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं. उन्होंने बाद में शादी की और परिवार बसाया, पर कीट्स से उन का संबंध उन प्रेम पत्रों के माध्यम से हमेशा जीवित रहा, जो कीट्स ने उन्हें लिखे थे. उन्हीं में से एक पत्र यहां साझा किया जा रहा है.

(पत्र)

माय लव,

इस पल मैं ने कुछ पंक्तियां साफसुथरी तरीके से लिखने की ठानी थी, लेकिन मैं इसे जारी नहीं रख पा रहा हूं. मुझे तुम्हें कुछ लाइनें लिखनी होंगी ताकि शायद तुम्हें थोड़े समय के लिए अपने मन से हटा सकूं. लेकिन सच कहूं तो मेरे मन में बस तुम्हारा ही ख्याल आता है.

मेरा प्यार मुझे स्वार्थी बना चुका है. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता, तुम्हारे सिवाय मुझे कुछ याद नहीं रहता, बस फिर से तुम्हें देखना चाहता हूं. वहीं पर मेरे जीवन की गति रुक जाती है. मुझे कोई और दिशा नहीं दिखती. तुम ने मुझे पूरी तरह अपने में समा लिया है.

इस वक्त ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं पिघल रहा हूं. तुम्हें जल्दी देखने की आशा न हो तो मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा. मैं तुम से दूर जाने से डरता हूं. मेरी प्यारी फेनी, क्या तुम्हारा दिल कभी बदलेगा? मेरी जान, क्या ऐसा होगा? अब मेरे प्रेम की कोई सीमा नहीं रही.

तुम्हारा संदेश अभी आया और वह मुझे दूर रह कर भी सुकून नहीं दे सकता. यह किसी बहुमूल्य रत्नों से भरी हुई गाड़ी से भी अधिक अनमोल है. मजाक में भी मुझे डरा मत देना. मुझे यह सोच कर आश्चर्य होता था कि लोग धर्म के लिए कैसे शहीद हो जाते हैं, मैं इसे देख डर जाता था, अब नहीं. मैं भी अपने धर्म के लिए शहीद हो सकता हूं – प्यार ही मेरा धर्म है और तुम्हारे लिए मैं मर सकता हूं.

मेरा विश्वास प्रेम है और तुम उस में मेरी एकमात्र आस्था हो. तुम ने मुझे अपने वश में कर लिया है, एक ऐसी शक्ति से जिस का मैं विरोध नहीं कर सकता. तुम्हें देखने के बाद भी मैं ने अकसर “अपने प्रेम के तर्क के खिलाफ तर्क” करने का प्रयास किया. अब मैं यह नहीं कर सकता. दर्द बहुत बड़ा होगा. मेरा प्यार स्वार्थी है. मैं तुम्हारे बिना सांस भी नहीं ले सकता.

तुम्हारा,

जौन कीट्स

Best Hindi Story : 2 दूल्हे 2 दुलहनियां

लेखक : युगेश शर्मा 

नंदिता ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस छोटे भाई को पढ़ालिखा कर उस ने अफसर की कुरसी तक पहुंचाया है, एक अच्छे परिवार में शादी करवा कर जिस की गृहस्थी बसाई है वही भाई उस के साथ ऐसा बरताव करेगा. उस ने नया फ्लैट खरीदने के लिए डेढ़ लाख रुपए देने से इनकार ही तो किया था. उस ने तब उस को समझाया भी था कि हमारा यह पुश्तैनी मकान है. अच्छे इलाके में है. 2 परिवार आराम से रह सकें, इतनी जगह इस में है.

तब नवीन ने बड़ी बहन के प्रति आदरभाव को तारतार करते हुए कह डाला, ‘‘दीदी, मां और बाबूजी के साथ ही इस पुराने मकान की रौनक भी चली गई है. अब यह पलस्तर उखड़ा मकान हमें काटने को दौड़ता है. मोनिका तो यहां एक दिन भी रहना नहीं चाहती. मायके में वह शानदार मकान में रहती थी. कहती है कि इस खंडहर में रहना पड़ेगा, उस को यह शादी के पहले मालूम होता तो वह मुझ से शादी भी नहीं करती. वह सोतेजागते नया फ्लैट खरीदने की रट लगाए रहती है. आखिर, मैं उस के तकाजे को कब तक अनसुना करूं.’’

नंदिता ने बहुतेरा समझाया था कि छोटी बहन नमिता की शादी महीने दो महीने में करनी है. अगर जमापूंजी फ्लैट खरीदने में निकल गई तो उस की शादी के लिए पैसे कहां से आएंगे. उस का तो जीपीएफ अकाउंट भी खाली हो चुका है.

नवीन उस दिन बहुत उखड़ा हुआ था. आव देखा न ताव, बोल पड़ा, ‘‘यह आप की चिंता है, दीदी. मैं इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता. नमिता की शादी करना आप की जिम्मेदारी है. उस को आप कैसे निभाएंगी, आप जानें.’’

नंदिता आश्चर्य से छोटे भाई का मुंह देखने लगी. नवीन इस तरह की बातें कहेगा, उस ने तो सपने में भी नहीं सोचा था. वह भी बिफर उठी थी, ‘‘तुम नमिता के बड़े भाई हो, इस परिवार के एकमात्र पुरुष. इस तरह अपनी जिम्मेदारी से पिंड कैसे छुड़ा सकते हो तुम.’’

‘‘देखो, दीदी, अब मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. सच बात तो यह है कि जिम्मेदारी जिस को सौंपी जाती है वही उस को निभाने के लिए पाबंद होता है. आप परिवार में सब से बड़ी हैं,’’ नवीन ने आज अपने मन की सारी भड़ास निकालने का फैसला ही कर लिया था. बोला, ‘बाबूजी ने अंतिम समय हम लोगों की सारसंभाल की जिम्मेदारी आप को सौंपी थी और आप ने तब भी उन से वादा किया था कि आप अपनी इस जिम्मेदारी को निभाएंगी.’’

यह कह कर तो नवीन ने नंदिता के मुंह पर ताला ही लगा दिया था. कुछ कहने, समझने की उस ने गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी. वह चुपचाप ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में जा कर बिस्तर पर पड़ गई. उस का दिमाग पुरानी स्मृतियों के झंझावातों से भर उठा. बीती घटनाएं फिल्म के दृश्यों की तरह एक के बाद एक उस के स्मृतिपटल पर उभरने लगीं :

जब थोड़ी सी बीमारी के बाद मां की मृत्यु हुई वह बीए फाइनल में थी. मेरिट में आने का मनसूबा बांधे बैठी थी वह. परिवार की सब से बड़ी संतान और लड़की होने से घर की देखभाल का जिम्मा न जाने कब उस के कमजोर कंधों पर आ पड़ा, वह समझ ही नहीं पाई. घर की गाड़ी के पहिए उस को धुरी मान कर घूमने लगे.

‘मेरी समझदार बेटी नंदिता सब संभाल लेगी,’ बाहरभीतर सब तरफ यह घोषणा कर के पिताजी ने तो घर की सारी जिम्मेदारियों से खुद को जैसे बरी कर लिया था.

 

नंदिता 3 भाईबहन हैं. नंदिता से छोटा नवीन है और नवीन से छोटी नमिता. नवीन को पढ़ने, दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने और बाकी समय में क्रिकेट खेलने से फुरसत ही नहीं मिलती थी. नमिता तो परिवार की लाड़ली होने का पूरापूरा फायदा उठाती रही. कभी मूड होता तो घर के काम में नंदिता का हाथ बंटाती वरना सहेलियों और कालेज की पढ़ाई में ही अपने को व्यस्त रखती.

नंदिता जानती थी कि नमिता को आखिर एक दिन पराए घर जाना है. घर के रोजमर्रा के काम में भी वह रुचि ले, ऐसी कोशिश नंदिता करती रहती थी पर नमिता यह कह कर उस पर पानी फेर देती कि अभी तो मुझे आप अपने राज में आजाद पंछी की जिंदगी जी लेने दो, जब ससुराल पहुंचूंगी तो सब सीख लूंगी. समय अपनेआप सब सिखा देता है. आप आज घर को जिस कुशलता से संभाल रही हैं वह भी तो समय की जरूरत ने ही आप को सिखाया है, दीदी.

नंदिता ने इस के बाद तो किसी से शिकवाशिकायत करना छोड़ ही दिया था. प्रथम श्रेणी में बीए करने के बाद वह समाजशास्त्र में एमए कर के पीएचडी करना चाहती थी पर सोचा हुआ सब कहां हो पाता है. पिताजी ने घर की जिम्मेदारियों का वास्ता दे कर बीए करने के बाद उस को घर बैठा लिया था. बेचारी मन मसोस कर रह गई थी.

एक दिन भयानक हादसा हुआ. दौरे से लौटते समय एक सड़क दुर्घटना में उस के पिता इन तीनों भाईबहनों को अनाथ कर के संसार से विदा हो गए. नंदिता पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. तब कुल 25 वर्ष की उम्र थी उस की. पिता के दफ्तर वालों ने बड़ी मदद की. उस को पिता के दफ्तर में ही क्लर्क की नौकरी दे दी.

 

जैसेतैसे परिवार की गाड़ी चलने लगी. कई बार पैसे की तंगी उस का रास्ता रोक कर खड़ी हुई पर नंदिता ने नवीन और नमिता को यह एहसास नहीं होने दिया कि वे अनाथ हैं. उन की पढ़ाई बदस्तूर चलती रही.

नवीन पढ़ने में होशियार था. उस ने प्रथम श्रेणी में बीए की परीक्षा पास की और खंड विकास अधिकारी के पद पर नौकरी पाने में सफल रहा.

एक दिन नंदिता के मन में आया कि अब नवीन की शादी कर दे. बहू के आने पर घर के काम में दिनरात खटने से उस को भी कुछ राहत मिल जाएगी. उस ने लड़की तलाशनी शुरू की. छोटे मामाजी की मदद से नवीन की शादी बड़े अफसर की बेटी मोनिका के साथ हो गई.

नंदिता ने मोनिका को ले कर जो आशाएं मन में पाल रखी थीं वे कुछ महीने बीततेबीतते मिट्टी में मिल गईं. बड़े बाप की बेटी ने ससुराल में ऐसे रंग दिखाए कि नंदिता को घर के काम में उस की तरफ से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद छोड़नी पड़ी.

नंदिता को हालांकि सकारात्मक उत्तर की जरा भी आस नहीं थी, फिर भी हिम्मत बटोर कर एक दिन उस ने मोनिका से कह डाला, ‘मोनिका, मुझे भी 10 बजे दफ्तर जाना पड़ता है. मैं चाहती हूं कि रोटियां तुम सेंक लिया करो. किचन का बाकी काम तो मैं निबटा ही लूंगी. तुम से इतनी मदद मिलने पर दफ्तर जाने के लिए मैं अपनी तैयारी भी सहूलियत से कर सकूंगी.’

‘नहीं, दीदी,’ मोनिका ने रूखा सा जवाब दिया, ‘यह मुझ से नहीं होगा. मैं तो सो कर ही सुबह 9 बजे उठती हूं. नवीन के भी बहुत सारे काम मुझे करने पड़ते हैं. रोज रोटियां सेंकने का जिम्मा मैं नहीं ले सकती. वैसे भी किचन के गोरखधंधे में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. हमारे यहां तो नौकर ही यह सब करते थे. मुझे तो आप बख्श ही दीजिए.’

इस के बाद तो नंदिता ने घर के कामकाज को ले कर चुप्पी ही साध ली. खुद ही गृहस्थी की गाड़ी को एक मशीन की तरह ढोती चली गई. परिवार के बाकी सदस्य तो सब देख कर भी अनजान बन बैठे. इस बीच मौसाजी की एक बात को ले कर घर में भूचाल ही आ गया और कई दिन उस का कंपन थमा ही नहीं. उस दिन मौसाजी ने सहज भाव से इतना ही तो कहा था कि उन्होंने भी नंदिता के लिए एक अच्छा सा लड़का देखा है. लड़का क्लास टू औफिसर है. परिवार भी खानदानी है, आदर्श विचारों के लोग हैं. दहेज की मांग भी नहीं है. नंदिता वहां बहुत सुखी रहेगी.

 

मौसाजी की बात सुन कर एक मिनट के लिए तो जैसे सन्नाटा ही छा गया. नवीन और मोनिका एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. दोनों के चेहरों पर हैरानी और परेशानी की गहरी रेखाएं खिंचती चली गईं.

‘यह क्या बात ले बैठे आप भी, मौसाजी,’ नवीन ने सकुचाते हुए अपनी बात रखी, ‘दीदी तो इस घर की सबकुछ हैं. वह तो आत्मा हैं हमारे परिवार की. बाबूजी उन्हीं को तो घर की सारी जिम्मेदारियां सौंप गए थे. अभी नमिता की शादी होनी है. हम पतिपत्नी भी अभी ठीक से सैटल नहीं हो पाए हैं. दुनियादारी की हम लोगों को समझ ही कहां है. दीदी दूसरे घर चली गईं तो इस घर का क्या होगा. हम तो कहीं के नहीं रहेंगे.’

मौसाजी हक्केबक्के थे. मोनिका के शब्दों ने तो उन्हें आहत ही कर डाला था. वह तैश में आ कर बोली थी, ‘दीदी यों ही सब संभालती रहेंगी, यह विश्वास कर के ही तो मैं नवीन के साथ शादी करने के लिए राजी हुई थी. वह हमें अधबीच में छोड़ कर इस घर से नहीं जाएंगी, यह आप साफसाफ सुन लीजिए, मौसाजी.’

नंदिता को लगा जैसे कई बिच्छुओं ने एकसाथ उस के शरीर में अपने जहरीले पैने डंक घुसेड़ दिए हैं और वह चीख भी नहीं पा रही है.

मोनिका की बात ने बुजुर्ग मौसाजी के दिल को छलनी कर डाला. एक लंबी जिंदगी देखी है उन्होंने, समझ गए कि माटी के पक्के बरतनों पर कोई रंग नहीं चढ़ता. बिना कुछ कहेसुने वह तुरंत घर से बाहर हो गए. वह जानते थे कि जिन की आंखों की शरम मर जाती है, उन के मन में मानवीय रिश्तों की कोई कीमत नहीं रहती, ऐसे लोगों को अच्छी नसीहतें देना रेत का घरौंदा बनाने जैसा है. नंदिता भी वहां ज्यादा देर बैठी न रह सकी.

 

उस दिन के बाद घर में रोज की जिंदगी तो पिछली रफ्तार से ही चलती रही पर जैसे उस में जगहजगह स्पीड ब्रेकर खडे़ हो गए थे. इन स्थितियों ने नंदिता को काफी दुखी कर दिया. वह चुपचुप रहने लगी. सिर्फ नमिता के साथ ही वह खुल कर बात करती थी, नवीन और मोनिका के साथ उस के संवाद का दायरा काफी सिकुड़ता चला गया था. ज्यादातर वह अपने कमरे में कैदी सी पड़ी रहने लगी थी. कोई कुछ पूछता तो ‘हां’ या ‘न’ में जवाब दे कर चुप हो जाती थी. जब अकेली होती तो खुद से पूछने लगती कि उस के स्नेह, परिश्रम और त्याग का उस को क्या यही प्रतिफल मिलना चाहिए था?

नवीन और मोनिका की निष्ठुरता से जूझते हुए भी नंदिता छोटी बहन के लिए अपनी जिम्मेदारी के बारे में बराबर सचेत रही. वह चुपचाप उस के लिए लड़के की तलाश में लगी रहती. एक अच्छा लड़का उस को पसंद आया. प्राइवेट कंपनी में एग्जीक्यूटिव था. अच्छी तनख्वाह थी. देखने में भी ठीक ही था. परिवार में पढ़ालिखा और उदार विचारों वाला था. उम्र में 7 साल का अंतर नंदिता की नजर में ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं था. अमूमन लड़के और लड़की की उम्र में 5-6 साल का अंतर तो आजकल आम बात है.

 

लड़के का नाम था, कपिल. एक दिन रविवार को नंदिता ने कपिल को अपने घर चाय पर बुला लिया. उद्देश्य था वह नमिता को ठीक से देख ले, आपस में जो भी पूछताछ करनी हो, कर ले. बाकी बातें तो कपिल के मातापिता से मिल कर उस को स्वयं ही तय करनी हैं. मौसाजी और मामाजी को भी अपने साथ ले लेगी. नवीन और मोनिका को इस बात की भनक लग चुकी थी पर नंदिता ने इस काम में उन की कोई भूमिका तय नहीं की थी इसलिए दोनों चुप थे.

कपिल वक्त का पाबंद निकला. शाम के 5 बजतेबजते पहुंच गया. एक सलोना सा युवक भी उस के साथ था.

‘‘कपिलजी, एक बात पूछूं?’’ नंदिता ने शुरुआत की, ‘‘आप पिछले कुछ दिनों से मेरे दफ्तर में खूब आजा रहे हैं. कोई काम तो वहां नहीं अटका है आप का?’’

‘‘जी नहीं, कोई काम नहीं अटका. यों ही आया होऊंगा.’’

‘‘आप सरीखा समझदार आदमी किसी सरकारी दफ्तर में यों ही चक्कर काटेगा, यह बात मेरे गले नहीं उतर रही.’’

‘‘समझ आने पर बात आप के गले उतर जाएगी. आप बिलकुल चिंता न करें. अभी तो बस, इतना ही बताइए कि मेरे लिए क्या आज्ञा है?’’

नंदिता ने जांच लिया कि लड़का सचमुच तेज है. उस को बातों में भरमाया नहीं जा सकता. सो बिना भूमिका के उस ने काम की बात शुरू कर दी, ‘‘आजकल शादीब्याह के मामले में आगे बढ़ने के लिए पहली और सब से जरूरी औपचारिकता है लड़केलड़की के बीच सीधा संवाद. मैं चाहती हूं कि आप कमरे में जा कर नमिता से बात करें. जो पूछना हो पूछ लें और जो बताना हो वह बताएं.’’

‘‘मैं भला क्यों करूं यह सब पूछताछ नमिता से,’’ कपिल ने शरारती लहजे  में कहा.

 

‘‘आप को नमिता को अपने लिए चुनना है. इसलिए नमिता से पूछताछ आप नहीं करेंगे तो भला कौन करेगा,’’ नंदिता पसोपेश में पड़ गई. सच बात तो यह थी कि कपिल की पहेली को वह समझ ही नहीं पा रही थी.

‘‘आप से यह किस ने कह दिया कि नमिता को मुझे अपने लिए चुनना है?’’

‘‘कपिलजी, आप को आज यह हो क्या गया है. कैसी उलटीपुलटी बातें कर रहे हैं आप.’’

‘‘मेरी बात तो एकदम सीधीसीधी है, नंदिताजी.’’

‘‘सीधी किस तरह है. मैं ने नमिता के बारे में ही तो आज आप को यहां बुलाया है. आप यह बेकार का कन्फ्यूजन क्यों पैदा कर रहे हैं?’’

‘‘कन्फ्यूजन वाली कोई बात नहीं है, मैं तो बस, आप से बात करने आया हूं.’’

‘‘मतलब.’’

‘‘यही कि मुझे तो जिंदगी में एक का चुनाव करना था, सो मैं ने कर लिया है.’’

‘‘किस का?’’

‘‘नंदिताजी का, नमिताजी की बड़ी बहन का.’’

नंदिता को लगा जैसे वह आसमान से गिर पड़ी है. एक बार तो उसे महसूस हुआ कि कपिल उस के साथ ठिठोली कर रहा है पर उस के हावभाव से तो ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा था.

वह बोली, ‘‘यह क्या गजब कर रहे हैं आप. मैं इतनी स्वार्थी नहीं हूं कि अपनी लाड़ली बहन के सौभाग्य का सिंदूर झपट कर अपनी मांग में सजा लूं. नमिता मेरी छोटी बहन ही नहीं मेरी प्यारी बेटी भी है. मां के देहांत के बाद मैं ने प्यारदुलार दे कर उसे बड़े जतन से पाला है. मैं उस के साथ ऐसा अनर्थ तो सपने में भी नहीं कर सकती.’’ नंदिता की आंखों में आंसू छलछला आए. सारा वातावरण संजीदगी से भर गया.

 

कपिल ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘नंदिताजी, आप सच मानिए, पिछले एक महीने से मैं आप के बारे में ही सारी जानकारी इकट्ठी करने में लगा था. उसी की खातिर आप के दफ्तर भी जाया करता था. आप के साथ घोर अन्याय हुआ है, फिर चाहे वह हालात ने किया हो, आप के पिता ने या फिर आप के भाई ने. आप ने अपने परिवार के लिए जो तपस्या की है उस के एवज में तो आप को वरदान मिलना चाहिए था पर सब जानते हैं कि अब तक अभिशाप ही आप के पल्ले पड़ा है. क्या अपनी गृहस्थी बसाने का आप का कोई सपना नहीं है? सचसच बताइए?’’

नंदिता ने संयत होते हुए कहा, ‘‘वह सब तो ठीक है पर नमिता के सौभाग्य को अपने सपने पर कुर्बान करने के लिए मैं न तो कल तैयार थी और न आज तैयार हूं. उसे मैं जिंदगीभर कुछ न कुछ देती ही रहना चाहती हूं. उस के अधिकार की कोई वस्तु छीनना मुझे कतई गवारा नहीं है. यह मुझ से कभी नहीं होगा. आप जा सकते हैं. आप का प्रस्ताव मुझे कतई मंजूर नहीं है.’’

 

‘‘आप को मेरा प्रस्ताव मंजूर हो या न हो पर हम तो इस घर से जल्दी ही दुलहनियां ले कर जाएंगे,’’ कपिल ने वातावरण को हलका बनाने की गरज से कहा.

‘‘मेरे जीतेजी तो यह कभी नहीं होगा.’’

‘‘जरूर होगा. इस घर से एक दिन 2 दूल्हे 2 दुलहनियां ले कर ही विदा होंगे.’’

नंदिता जैसे सोते से जाग उठी. पूछा, ‘‘और वह दूसरा लड़का?’’

‘‘यह रहा,’’ साथ में बैठे सलोने युवक की ओर इशारा करते हुए कपिल ने जवाब दिया, ‘‘और इन दोनों को किसी कमरे में जा कर आपस में पूछपरख करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि ये दोनों कालेज के सहपाठी हैं. एकदूसरे को खूब जानते हैं. साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा चुके हैं, बहुत पहले.’’

‘‘पर ये हैं कौन? परिचय तो दीजिए इन का.’’

अचानक नमिता ड्राइंगरूम में आई. वह पास के कमरे में नंदिता और कपिल की बातें कान लगाए सुन रही थी.

‘‘मैं देती हूं इन का परिचय,’ नमिता बोली, ‘दीदी, इन का नाम विकास है और यह कपिलजी के चचेरे भाई हैं. डिगरी कालेज में 3 साल हम क्लासमेट रहे हैं. मेलजोल अब भी है. हम दोनों ने साथसाथ जीवन का सफर

तय करने का फैसला बहुत पहले कर लिया था.’’

‘‘लेकिन पगली, इस बारे में मुझे तो बताती. मैं तेरी दुश्मन थोड़े ही हूं,’’ नंदिता ने नमिता को अपने पास सोफे पर बिठाते हुए कहा.

‘‘आप वैसे भी इन दिनों काफी परेशान रहती हैं, दीदी. मैं विकास और अपने बारे में आप को बता कर आप की परेशानियों को बढ़ाना नहीं चाहती थी. मैंने आप से यह बात छिपाने की गलती की है. मुझे माफ करदो, दीदी.’’

 

‘‘इस में माफी जैसी कोई बात नहीं है मेरी प्यारी बहना. तू ने जो भी किया अपनी समझ से अच्छा ही किया है. विकासजी, इस बारे में आप को कुछ कहना है या फिर फैसला सुना दिया जाए?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं कहना. जो कहना था वह नमिता कह चुकी है. नंदिताजी, आप तो बस, फैसला सुना दीजिए,’’ विकास बोला.

‘‘कपिलजी ने ठीक ही कहा है, इस घर से जल्दी ही 2 दूल्हे, 2 दुलहनियां ले कर विदा होंगे,’’ इतना कह कर नंदिता ने नमिता को गले लगा लिया.

आज बरसों बाद नंदिता की सूखी आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. उसे लगा आज पहली बार कुदरत ने उस के साथ इंसाफ किया है. इस तरह अचानक मिले इंसाफ से कितनी खुशी होती है, इस का एहसास भी उसे पहली बार हुआ.

Movie : ‘पुष्पा 2 द रुल’ देखने में मजा आएगा जब दिमाग घर छोड़ कर आएंगे

3 स्टार
किसी सीक्वअल फिल्म के लिए पहली मूल फिल्म के बेंच मार्क को मात देना बहुत मुश्किल होता है लेकिन इस कसौटी पर निर्देशक सुकुमार सफल रहे हैं. वह 2021 की सफल फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ का सीक्वअल ‘पुष्पा द रूल’ ले कर आए हैं. यह 3 घंटे 20 मिनट लंबी फिल्म मनोरंजन परोसने के साथ ही पुरुषप्रधान समाज पर कुठाराघात करने के साथ ही पारिवारिक मूल्यों की बात करती है. फिल्म में सिर्फ अच्छाइयां हों, ऐसा भी नहीं है.
फिल्म में गानों के अंदर नृत्य की जो कामुक भाव मुद्राएं हैं, उन्हें देख कर समाज का एक वर्ग परेशान है और आरोप लगा रहा है कि अजंता एलोरा की गुफाओं में मौजूद वल्गर मुर्तिकला को इस फिल्म में नृत्य में तब्दील किया गया है. इस तरह निर्देशक ने आम इंसान की सैक्स के प्रति जो ललक होती है, उसे भुनाने का प्रयास किया है. वहीं समाज का एक वर्ग इन नृत्य दृश्यों को देख कर आनंदित है. इतना ही नहीं पर्यावरण के मुद्दे पर फिल्म चुप रहती है. इस के अलावा समाज का एक वर्ग इस बात से नाराज है कि फिल्म सर्जक ने फिल्म में स्मगलर का महिमा मंडन किया है.

फिल्म की शुरूआत जापान में चंदन की लकड़ी के कंटेनर पहुंचने से मचे हंगामे और पुष्पा के एक्शन व जापानी भाषा में बात करने से होती है. जापानी सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान पुष्पा के दिल में गोली लगती है और वह पानी में गिर जाता है और यह दृश्य अचानक खत्म हो जाता है. पता चलता है कि यह दृश्य पुष्पा के सपने का हिस्सा है.

इस के बाद कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पहले भाग की कहानी खत्म हुई थी. पुराने प्रतिद्वंदी श्रीनु (सुनील) और उस की गुस्सैल पत्नी दक्षा (अनसूया भारद्वाज) उस तस्करी सिंडिकेट पर फिर से नियंत्रण हासिल करना चाहते हैं जिसे पुष्पा अब नियंत्रित करता है. पुलिस इंस्पैक्टर से एसपी बन चुके भंवर सिंह शेखावत (फहद फाजिल) पुष्पाराज से बदला लेना चाहता है.

इस के लिए पुष्पा को नैतिक और पेशेवर रूप से हराने के लिए शेखावत, पुष्पा को उसी के अपने तस्करी के सिंडिकेट से बाहर करने की योजना पर काम कर रहा है लेकिन पुष्पाराज काम में प्रतिभाशाली है और वह हर बार शेखावत को पराजित और निशब्द कर देता है. उन की पत्नी श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) और केशव (जगदीश प्रताप भंडारी) के नेतृत्व में उन के वफादार अनुयायी उन की पूजा करते हैं.

पुष्पा का अपने गले पर हाथ फिराने का इशारा अब एक नृत्य मुद्रा है. जब कहानी आगे बढ़ी है तो स्वाभाविक तौर पर पुष्पाराज का चरित्र विकसित होता है. अब उस के शरीर पर सोने के जेवर ही नजर आते हैं. उस के पास शक्ति है तो वह किसी की कहां सुनने वाला? उस की अहंकारी इच्छाएं और आत्मसम्मान की जिद उस के दुश्मनों के लिए बहुत परेशानी का कारण बनती है.

अब पुष्पा वह मजदूर नहीं रहा, वह तो बड़ा आदमी बन गया है. लेकिन आज भी श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) उसे अपनी उंगलियों पर नचाती है. तभी तो एक तरफ पुष्पाराज अपनी पत्नी श्रीवल्ली की मुख्यमंत्री संग फोटो के लिए राज्य के मुख्यमंत्री को ही बदलवा देता है. तो वहीं श्रीवल्ली, पुष्पा की प्रतिष्ठा व मान सम्मान को बचाने के लिए पूरी दुनिया और यहां तक कि रिश्तेदारों से लड़ने के लिए तैयार है. भंवर सिंह शेखावत खुद ही अपनेआप को खत्म करने पर मजबूर हो जाता है तो दूसरी तरफ पुष्पाराज का सौतेला भाई मोहन (अजय) उस से माफी मांग कर उसे अपने परिवार, खानदान व गौत्र का हिस्सा स्वीकार कर लेता है.
माना कि यह कहानी एक तरफ पुष्पाराज व भंवर सिंह शेखावत के बीच बदले की है तो दूसरी तरफ पुष्पाराज द्वारा अपना हक व मान सम्मान पाने की लड़ाई है. मगर फिल्म की पटकथा इतनी कमाल की है, आप को इस बात का अहसास ही नहीं होगा कि इस में कहानी नहीं है. माना कि फिल्म में कई दृश्य एपीसोडिक हैं, मगर इन्हें जिस तरह से कहानी का हिस्सा बनाया गया है, वह कमाल का है.

लेखक व निर्देशक सुकुमार ने साबित कर दिया कि उन्हें भौगोलिक सीमाओं से परे अच्छे कंटैंट और दर्शकों की नब्ज की बेहतरीन समझ है. और वह लंबी फिल्म में भी दर्शक को बोर न होने देने की कूवत रखते हैं. फिल्म में पतिपत्नी के बीच प्यार व रिश्तों का गहराई से चित्रण है.
पुष्पाराज की अपनी असंगतियों व अंतर्विरोधों के साथ फिल्म आगे बढ़ती रहती है. पुष्पा के जीवन की समस्याओं में सब से बड़ी समस्या यही है कि वह वैधता चाहता है. वह अपने पिता का नाम, गौत्र व खानदान का नाम चाहता है. वह अपना हक, पहचान चाहता है. वह रिश्तों की भावुकता को भी समझता है इसीलिए वह हिंसक हो जाता है.

निर्देशक की सब से बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने धन को रिश्तों के बीच नहीं आने दिया. अति महत्वाकांक्षी पुष्पाराज पत्नी से प्रेम, भतीजी से स्नेह, सैातेले भाई से रिश्ते सुधरने की उम्मीद, इन सभी चक्रव्यूहों में फंसा हुआ है. पहले भाग में ही पता चल गया था कि पुष्पाराज अपने पिता की नाजायज औलाद है, सौतेला भाई उसे अपने परिवार, गौत्र या खनदान का नहीं मानता तो पहचान ही उस का बहुत बड़ा संघर्ष है. अपनी मां को वह प्रतिष्ठा दिलाना चाहता है. वह पैसे से किसी को भी खरीदने की क्षमता रखता है. मगर वह रिश्तों को पैसे के बल पर खरीदने में यकीन नहीं रखता.

बौलीवुड के किसी अभिनेता में इतना दम नहीं है कि वह इस तरह की परफौर्मेंस दे सके या किसी निर्देशक में इतना दम नहीं है कि किसी कलाकार से इस तरह की उच्च गुणवत्ता वाली परफौर्मेंस निकलवा सके. फिल्म के सारे सीन डिजाइन किए गए हैं. भाषा व संवाद पर काफी मेहनत की गई है, तभी तो फिल्म देखते समय यह अहसास नहीं होता कि यह फिल्म डब है.
फिल्म की एडिटिंग अच्छी है. एपीसोडिक एक्शन सीन को एडिटर ने कहानी के मध्य गूंथा है. जात्रा वाला दृश्य शानदार है और दर्शकों के मन में कुछ अजीब सी बेचैनी भी पैदा करता है.

फिल्म की लंबी अवधि को कम कर यह एक क्लासिक फिल्म बन सकती थी. कुछ गाने तो बेवजह ठूंसे हुए नजर आते हैं. तो वहीं कुछ घरेलू दृश्य, खासकर श्रीवल्ली और पुष्पाराज के बीच छेड़खानी और अंतरंग क्षण अनावश्यक हैं. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. और इन संवादों को सुन कर दर्शक ताली बजाने से बाज नहीं आ सकता. नदी के माध्यम से पुलिस का चंदन के लिए पीछा करना और पुष्पा और शेखावत के बीच मूक इशारा संचार जैसे क्षण प्रभावशाली हैं.

‘फ्लावर समझे क्या? फायर है मैं’ जैसे संवाद में अल्लू अर्जुन का स्वैग दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर करता है. बौलीवुड तो आम इंसान को पसंद आने वाला सिनेमा बनाना भूल ही चुका है. फिल्म में एक्शन व सैक्स दोनों हैं. मगर ‘एनिमल’ से लाख गुना बेहतर है. और हर सीन जायज नजर आता है.
दक्षिण की फिल्मों से शिकायत रहती है कि इन फिल्मों में महिलाओं का सम्मान नहीं किया जाता, लेकिन अल्लू अर्जुन और सुकुमार ने इस बार सरप्राइज किया है. इन दोनों ने इस फिल्म में कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसे करना आसान नहीं होता. बौलीवुड का सुपर स्टार फिल्म में अपने किरदार की पत्नी के पैर छूते हुए या उस के पेर में मलहम लगाते नजर नहीं आ सकता. फिल्म में नारी सशक्तिकरण के साथ ही नारी सम्मान का बहुत बड़ा मुद्दा प्रभावशाली ढंग से उठाया गया है, मगर बिना किसी भाषणबाजी के.

20 मिनट का जात्रा वाला दृश्य भावनाओं और एक्शन से भरपूर, सावधानीपूर्वक कोरियोग्राफ किया गया है. फिल्म में एक सीन है, जहां पुष्पा के 200 से ज्यादा साथियों को शेखावत पकड़ लेता है. दर्शक सोचते हैं कि अब पुष्पाराज आएगा और पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ व मारधाड़ कर अपने साथियों को छुड़ा ले जाएगा. पुष्पाराज अपने सभी साथियों को इज्जत से अपने साथ ले जाता है, मगर बिना मारधाड़ किए. यहां पर पुष्पाराज पुलिस स्टेशन में मौजूद सभी पुलिसकर्मियों को उन के जीवनभर की तनख्वाह का नगद भुगतान कर सभी से त्यागपत्र लिखवा लेता है और अपने साथियों को ले कर चला जाता है.
कई लोग इस दृश्य पर आपत्ति जता रहे हैं. दक्षिण की फिल्मों की चिरपरिचत शैली में इस फिल्म में भी धर्म है. पूजापाठ है, मगर फिल्म सर्जक ने इन्हें सांस्कृति धरातल पर फिल्माया है, न कि धर्म को बेचा है.
निर्देशक ने चाहे जो मुद्दे उठाए हों, पर उस ने इस बात पर जोर दिया कि वह क्लासी नहीं बल्कि मासी फिल्म यानी कि आम दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर फिल्म बनाई है.

फिल्म के कुछ दृश्यों पर यकीन करना भले मुश्किल हो, मगर फिल्मकारों के लिए यह सिनेमायी स्वतंत्रता है. मसलन-फिल्म के शुरूआती दृश्य में कंटेनर में 40 दिन बिना कुछ खाएपिए जापान पहुंचना कैसे संभव है? कंटेनर के अंधेरे में किसी किताब को पढ़ कर जापानी भाषा सीखना कैसे संभव है. जब आप के हाथ व पैर दोनों बंधे हों, तब आप कैसे उछल कर दांतों से किसी को काट या यूं कहें कि घायल कर सकते हैं?
फिल्म में जत्रा वाले दृश्य में जब पुष्पाराज को पता चलता है कि उस की पत्नी श्रीवल्ली गर्भवती है तो वह कामना करता है कि बेटी पैदा हो. इस के पीछे उस की सोच यह हे कि बेटी को शादी के बाद अपने आप गौत्र व खानदान मिल जाएगा. इस तरह यहां पर निर्देशक ने कहीं न कहीं पुरुष प्रधान समाज व पितृसत्तात्मक सोच पर चोट की है.

जहां तक तकनीकी पक्ष का सवाल है तो फिल्म के कैमरामैन पोलैंड के मूल निवासी सिनेमैटोग्राफर कुबा ब्रोजेक मिरोस्लोव बधाई के पात्र हैं. फिल्म का वीएफएक्स भी प्रभावशाली है. फिल्म का सर्वाधिक कमजोर पक्ष इस का संगीत है.
हक, मान सम्मान, पहचान हासिल करने के साथ ही सौतेले भाई के साथ बचपन से ही एक अजीब तरह की लड़ाई लड़ रहे पुष्पा राज के किरदार में अल्लू अर्जुन ने जानदार अभिनय किया है. श्रीवल्ली के किरदार में रश्मिका मंदाना ने भी ठीक काम किया है लेकिन अधिक नाटकीय उदाहरणों में कार्टून जैसा महसूस कराती है. यह उन की कमजोरी है.

मलयालम फिल्मों के सुपर स्टार हीरो फहाद फाजिल ने इस फिल्म में विलेन भंवर सिंह शेखावत के किरदार में कमाल का अभिनय किया है. फहाद फाजिल ने साबित कर दिखाया कि उन के अंदर हर तरह के किरदार को निभाने की क्षमता है.

Tears : क्‍यों बहते हैं आंखों से झर झर आंसू

लेखक :  श्री प्रकाश

हम सभी की आंखों से कभी न कभी पानीनुमा एक तरल निकलता है जिसे हम आंसू कहते हैं. आंसू हमारी आंखों से कभी दुख में तो कभी ख़ुशी से भी निकलते हैं. कभी आंखों में कुछ बाहरी धूलकण पड़ने से या कभी किसी इन्फैक्शन के चलते भी आंसू निकलते हैं.

आंसू क्या हैं

आंसू में 98 फीसदी पानी होता है और बाकी 2 फीसदी में नमक और अन्य तत्त्व. कभी आंखों से ज्यादा आंसू निकल कर होंठों तक पहुंच जाते हैं और हमें इस के नमकीन स्वाद का एहसास भी होता है. पानी के अतिरिक्त बाकी 2 फीसदी में नमक, तेल, कुछ विटामिन और करीब 200 प्रोटीन होते हैं . ये तत्त्व आंखों के सैल्स का पोषण करते हैं.

हमारे आंसुओं में एलेक्ट्रोलीट भी होता है. उन में मौजूद सोडियम के कारण वे सौल्टी (नमकीन) होते हैं. एलेक्ट्रोलीट में मुख्यतया सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड और बाईकार्बोनेट होते हैं. इस के अतिरिक्त आंसू में अल्प मात्रा में मैग्नीशियम और कैल्शियम भी होते हैं. ये सारे तत्त्व आंसू के लेयर्स बनाते हैं.

आंसू कहां से आते हैं

आंखों में आंसू टियर ग्लांड्स (लैक्रिमल ग्लांड्स) बनाते हैं. ये ग्लांड्स आंखों की पुतलियों के ऊपर होते हैं और कार्निया की सतह तक फैले रहते हैं. ऊपरी और निचली पलक के कोने में स्थित सूक्ष्म छिद्र से हो कर आंसू बाहर निकलते हैं और टियरडक्ट से होते हुए नाक व गले तक आते हैं. ज्यादा रोने से ज्यादा आंसू निकल कर नाक में जा कर म्यूकस से मिलते हैं. यही कारण है कि अकसर रोते समय नाक से पानी आने लगता है और रोने के बाद खुद बंद हो जाता है. औसतन एक आदमी में प्रतिवर्ष 15 से 30 गैलन आंसू बनता है.

आंसू का काम

ऐसा नहीं है कि आंसू सिर्फ दुख या अत्यंत ख़ुशी में आते/निकलते हैं. आंसू आंखों की रक्षा और पोषण के लिए हैं. ये वातावरण में मौजूद बाह्य धूलकण, वायरस और बैक्टीरिया से हमें बचाते हैं. जितनी बार हम पलक झपकते हैं, यह आंखों को लुब्रिकेट करता है और उन्हें साफ़ भी करते रहता है.

आंसू का पानी आंखों को हाइड्रेटेड रखता है. इस के अलावा इस में मौजूद मिनरल और प्रोटीन आंखों के सैल्स का पोषण कर आंखों को हैल्दी बनाए रखते हैं.

आंसू के लेयर
आंसू की 3 लेयर होती हैं.

म्यूकस लेयर: यह लेयर आंसुओं को आंखों मेंबांध कर रखती है. बिना इस के आंखों की सतह पर ड्राई स्पौट्स हो जाते हैं. आंख जितना ड्राई होगी, इन्फैक्शन का खतरा उतना ज्यादा रहेगा.

एक्वस लेयर: यह आंखों को हाइड्रेटेड रखती है, कार्निया को बचाती है और बैक्टीरिया से रक्षा करती है. यह सब से ज्यादा मोटी और नमकीन लेयर होती है.

तैलीय लेयर: यह बाकी दोनों लेयरों को वाष्प बनने से रोकती है और आंसू को पारदर्शी बनाती है.

आंसू के प्रकार

आंसू 3 प्रकार के होते हैं और उन का नमकीन होना उस के प्रकार पर निर्भर करता है.

रिफ्लेक्स टीयर: यह सब से ज्यादा नमकीन होता है और आंखों में इरिटैंट को वौश करता है, जैसे प्याज से निकली गैस और ज्यादा दुर्गंध में (कैमिकल, उलटी). इस के अलावा किसी अन्य इरिटेशन, जैसे धूल, तेज रोशनी आदि से भी आंसू आते हैं. दरअसल, किसी भी इरिटेशन के चलते टियर ग्लांड्स ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं.

बासल टीयर: यह आंखों की बाहरी सतह पर रहता है. यह हमेशा रहता है और आंखों को ड्राईनैस से बचाता है,. साथ ही, वातावरण में मौजूद अन्य खतरों से भी रक्षा करता है.

इमोशनल टीयर: यह मन की भावनात्मक स्थिति पर निर्भर करता है. ये हमारे दुख या कभी अत्यंत ख़ुशी की हालत में आंखों में आते हैं. इमोशनल टीयर से हमें आराम मिलता है. इन में कुछ हार्मोन और प्रोटीन होते हैं जो अन्य दोनों प्रकार के आंसुओं में नहीं होते. आंसू देख कर लोग सहानुभूति प्रकट करते हैं या सहायता के लिए आ सकते हैं जिस से हमें एक मोरल सपोर्ट मिलता है. इमोशनल टियर्स बायोलौजिकल, सामाजिक और शारीरिक तीनों कारणों से हो सकते हैं.

निद्रा और टीयर

इंसान के सोने के बाद आंसू का स्वरूप बदल जाता है. इस दौरान आंसू में प्रोटीन कम होता है पर एंटीबौडीज ज्यादा होता है. इस के चलते इन्फैक्शन से बचाव करने वाले सैल्स आंखों में चले आते हैं. इस के अलावा निद्रा के दौरान आंसू में औयल, म्यूकस और स्किन सैल्स मिक्स होते हैं व आंखों के कोनों में पपड़ी जमा होती है क्योंकि इस दौरान हम पलक नहीं झपकते हैं.

आंसू की कमी से क्या हो सकता है

आंसू की कमी से ड्राई आई सिंड्रोम होता है. इस के चलते आंखों में जलन और खुजलाहट हो सकती है. इस के अलावा आई इन्फैक्शन, कार्निया में अल्सर और दृष्टिदोष होने की संभावना रहती है. हालांकि सुनने में यह हास्यास्पद लगता है पर ड्राई आई से आंखों में ज्यादा पानी आता है (वाटरी आईज). ड्राईनैस एजिंग और दवाओं के असर से भी हो सकता है.

नवजात शिशु की आंखों में आंसू नहीं आते

शिशु के टियर ग्लैंड विकसित नहीं होते, इसलिए उन के रोने पर आंखों से आंसू नहीं निकलते हैं.कुल मिलाकर आंसू आंखों की हैल्थ का एक संकेत भी होता है. आंसू हमेशा हमारी आंखों की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं. ये इरिटेशन पैदा करने वाले तत्त्वों की सफाई करते हैं, इमोशन को शांत करते हैं और दूसरों को आप की पीड़ा का मैसेज देते हैं.
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Satire : मच्‍छर तू महान है

ऐ मच्छर, तू महान है. तेरी महिमा का क्या वर्णन करूं? तू मनुष्यों के लिए प्रेरणास्रोत भी है तो मनुष्यों का पालक भी है. तू ने साबित कर दिया है कि कदकाठी और आकार के आधार पर किसी को हीन नहीं समझना चाहिए. कोई न कोई कवि कह डालेगा, ‘मच्छर कबहुं न निंदिए, जो होय सूक्ष्म आकार. इन की ही कृपा से, कितनों के सपने होय साकार.’ तुझ से सौ गुणे, हजार गुणे, लाख गुणे, करोड़ गुणे लंबेचौड़े प्राणी परिवर्तन के दंश से लुप्त हो गए पर तू है कि सदियों से, सहस्त्राब्दियों, लक्षाब्दियों से डटा हुआ है, अड़ा हुआ है, अडिग रह कर खड़ा हुआ है.

किसी भी परिवर्तन ने तेरे अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं डाला. और भविष्य में ऐसी कोई संभावना नजर भी नहीं आती. तुझ से वैसे तो हर जीव को प्रेरणा लेनी चाहिए पर मनुष्यों के लिए तेरा विशेष महत्त्व है. शायद, भारतवासियों ने तुझ से ही प्रेरणा ले कर हर परिवर्तन को सहना सीखा है. महंगाई कितनी भी बढ़ जाए, भ्रष्टाचार कितना भी बढ़ जाए, कानून व्यवस्था की जो भी हालत हो उस में भारतवासी खुशीखुशी जीना सीख चुके हैं.

तेरी खून चूसने की आदत ने भारतवासियों को खून चुसवाने का अभ्यस्त बना दिया है. तू तो फिर भी कितना खून चूस पाएगा-एक मिलीलिटर न डेढ़ मिलीलिटर. हम तो अब इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि कोई हमारे शरीर का सारे का सारा खून भी चूस ले तो भी कोई फर्क न पड़े, शायद. शिक्षण संस्थान, अस्पताल, व्यवसायी, सरकार सभी खून चूसते हैं आम जनता का और लोग बगैर किसी गिलाशिकवा के अपना खून प्रस्तुत करते हैं सभी को, चुसवाने के लिए. इस प्रकार, हम देशवासियों को अनुकूलन की प्रक्रिया अपनाने में तू काफी मददगार रहा है.

मनुष्यों के लिए तू रोजगार का साधन है. तू ने मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और न जाने कितनी बीमारियां मनुष्यों को दान में दी हैं. और अब तो ‘बाय वन गेट वन’ की तर्ज पर किसी को डेंगू के साथ मलेरिया तो किसी को मलेरिया के साथ चिकनगुनिया दे रहा है.

सुना है, अब तू कौंबो पैक में तीनों बीमारियां साथसाथ भी परोसने वाला है.तेरे द्वारा दिए गए मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया को लोग मनुष्यों के लिए हानिकर मानते हैं, विनाशकारक मानते हैं. लेकिन तेरी इन्हीं भेंटों के चलते न जाने कितनी पैथोलौजी लैब, कितने डाक्टर, कंपाउंडर, नर्स, अस्पताल, दवा दुकान आदि चल रहे हैं.

सुनने में आया है कि कई डाक्टरों की तो सैटिंग है पैथोलौजी लैब से. जांच की फीस में उन का हिस्सा तो होता ही है, कई बार मौसमी बुखार में भी वे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया की जांच के लिए सलाह दे देते हैं. यदि उन की पसंद की लैब के अलावा अन्य लैब से जांच करवाई जाए तो उसे वे मान्यता नहीं देते. उन की पसंद की लैब से हुई जांच रिपोर्ट को ही उन के द्वारा मान्यता दी जाती है.

सुनने में यह भी आया है कि कई बार नियोजित तरीके से नैगेटिव रिपोर्ट को भी पौजिटिव दिखाया जाता है ताकि प्लेटलेट्स की गणना के लिए बीचबीच में जांच करवाई जाए और पैथोलौजी लैब तथा डाक्टर व उन के सहयोगियों की दालरोटी चलती रहे और उस में घी भी डलता रहे.

इतना ही नहीं, तू ने कितनों को भांतिभांति की अगरबत्तियां, कार्ड और क्रीम बनाने को प्रेरित किया. इन वस्तुओं के निर्माण में लगे पूंजीपतियों, श्रमिकों, परिवहन संचालकों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं की आजीविका में तेरा अप्रतिम योगदान है. और तो और, तुझ से बचाव के लिए भांतिभांति के विज्ञापन बनते हैं, उन के द्वारा भी कई कलाकार, विज्ञापन एजेंसियां आदि रोजगार पाते हैं. कई कलाकारों को तेरे कारण रजत पटल पर आने का मौका मिलता है. तेरी मेहरबानी से सरकार ने मलेरिया विभाग बना कर कई लोगों को रोजगार दिया है. आगे चल कर डेंगू विभाग, चिकनगुनिया विभाग बनने की भी संभावना है. इस से भी कई लोग रोजगार पाएंगे. वहीं, फौगिंग के नाम पर, गड्ढे भरने के नाम पर, दवा छिड़काव के नाम पर न जाने कितने सरकारी कर्मचारियों, ठेकेदारों को तू सुखीसंपन्न बनाता है.

पर यार, तू थोड़ा सा नैगेटिव भी है वरना अभी तक तो तेरी पूजा शुरू हो चुकी होती. मनुष्य जिन चीजों से डरता है उस की पूजा करने लगता है. विनाशक नदियों को मां और भगवान का दरजा दिया जाता है. मनुष्य जिन व्यक्तियों से डरता है उन्हें माननीय, आदरणीय, परमादरणीय आदि कहने लगता है. यदि तेरा प्रकोप और बढ़ जाए तो शायद तेरी भी पूजा होने लगे. तेरे नाम के साथ भी माननीय, पूज्यनीय, आदरणीय. परमादरणीय जैसे शब्द प्रयुक्त होने लगें. तेरे नाम का भी चालीसा, सहस्त्रानाम, पुराण आदि का निर्माण हो. औल द बैस्ट, यार. 

पर यार, मेरी एक सलाह मानना- आरक्षण की मांग मत करना. अभी देश में स्थिति यह है कि जो दबंग है, अमीर है वह भी दबंगई से आरक्षण की मांग करने लगता है. विनाशलीला कर कहता है कि मैं कमजोर हूं, मुझे आरक्षण चाहिए. तू मसला जाता है, कुचला जाता है, लोग तुझ से नफरत करते हैं, तुझे अनेक रोगों का कारण मानते हैं.

इन आधारों पर तू आरक्षण का हकदार तो है पर यह भी सोच, तेरे से कितने घर चल रहे हैं, कितने लोग प्रेरणा पा रहे हैं. इसलिए आरक्षण मत मांगना, भले ही दोचार बीमारियां और बढ़ा देना.

emotional story : कसाई जैसा बेटा

वैसे तो रवि आएदिन मां को मारता रहता है लेकिन उस रात पता नहीं उसे क्या हो गया कि इतनी जोर का घूंसा मारा कि दांत तक टूट गया. बीच में आई पत्नी को भी खूब मारा. पड़ोसी लोग घबरा गए, उन्हें लगा कि कहीं विस्फोट हुआ और उस की किरचें जमीन को भेद रही हैं. खिड़कियां खोल कर वे बाहर झांकने लगे. लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि रवि के घर का दरवाजा खटखटा कर शोर मचने का कारण पूछ ले. मार तो क्या एक थप्पड़ तक कुसुम के पति ने उस की रेशमी देह पर नहीं मारा था, बेटा तो एकदम कसाई हो गया है. हर वक्त सजीधजी रहने वाली, हीरोइन सी लगने वाली कुसुम अब तो अर्धविक्षिप्त सी हो गई है. फटेगंदे कपड़े, सूखामुरझाया चेहरा, गहरी, हजारों अनसुलझे प्रश्नों की भीड़ वाली आंखें, कुछ कहने को लालायित सूखे होंठ, सबकुछ उस की दयनीय जिंदगी को व्यक्त करने लगे.

उस रात कुसुम बरामदे में ही पड़ी एक कंबल में ठिठुरती रही. टांगों में इतनी शक्ति भी नहीं बची कि वह अपने छोटे से कमरे में, जो पहले स्टोर था, चली जाए. केवल एक ही वाक्य कहा था कुसुम ने अपनी बहू से : ‘पल्लवी, तुम ने यह साड़ी मुझ से बिना पूछे क्यों पहन ली, यह तो मेरी शादी की सिल्वर जुबली की थी.’

बस, बेटा मां को रुई की तरह धुनने लगा और बकने लगा, ‘‘तेरी यह हिम्मत कि मेरी बीवी से साड़ी के लिए पूछती है.’’

कुसुम बेचारी चुप हो गई, जैसे उसे सांप सूंघ गया, फिर भी बेटे ने मारा. पहले थप्पड़ों से, फिर घूंसों से.

ठंडी हवा का तेज झोंका उस की घायल देह से छू रहा था. उस का अंगअंग दर्द करने लगा था. वह कराह उठी थी. आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. चलचित्र की तरह घटनाएं, बीते दिन सूनी आंखों के आगे घूमने लगे.

‘इस साड़ी में कुसुम तू बहुत सुंदर लगती है और आज तो गजब ही ढा रही है. आज रात को…’ पति पराग ने कहा था.

‘धत्’ कह कर कुसुम शरमा गई थी नई दुलहन सी, फिर रात को उस के साथ उस के पति एक स्वर एक ताल एक लय हुए थे. खिड़की से झांकता हुआ चांद भी उन दोनों को देख कर शरमा गया था. वह पल याद कर के उस का दिल पानी से बाहर निकली मछली सा तड़पने लगा. जब भी खाने की किसी चीज की कुसुम फरमाइश करती थी तुरंत उस के पति ला कर दे देते थे. बातबात पर कुसुम से कहते थे, ‘तू चिंता मत कर. मैं ने तो यह घर तेरे नाम ही लिया है और बैंक में 5 लाख रुपए फिक्स्ड डिपौजिट भी तेरे नाम से कर दिया है. अगर मुझे कुछ हो भी जाएगा तब भी तू ठाट से रहेगी.’

हंस देती थी कुसुम. बहुत खुश थी कि उसे इतना अच्छा पति और लायक बेटी, बेटा दिए हैं. अपने इसी बेटे को उस ने बेटी से सौ गुना ज्यादा प्यार दिया, लेकिन यह क्या हो गया…एकदम से उस की चलती नाव में कैसे छेद हो गया. पानी भरने लगा और नाव डूबने लगी. सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी कगार पर पड़ी चट्टान सी हो जाएगी कि पता नहीं कब उस चट्टान को समुद्र निगल ले.

वह बीते पलों को याद कर पिंजड़े में कैद पंछी सी फड़फड़ाने लगी. उस रात वह सो नहीं पाई.

सुबह उठते ही धीरेधीरे मरियल चूहे सी चल कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो कर, अपने लिए एक कप चाय बना कर, अपनी कोठरी में ले आई और पड़ोसिन के दिए हुए बिस्कुट के पैकेट में से बिस्कुट ले कर खाने लगी. बिस्कुट खाते हुए दिमाग में विचार आकाश में उड़ती पतंग से उड़ने लगे.

‘इस कू्रर, निर्दयी बेटेबहू से तो पड़ोसिनें ही अच्छी हैं जो गाहेबगाहे खानेपीने की चीजें चोरी से दे जाती हैं. तो क्यों न उन की सहायता ले कर अपनी इस मुसीबत से छुटकारा पा लूं.’ एक बार एक और विचार बिजली सा कौंधा.

‘क्यों न अपनी बेटी को सबकुछ बता दूं और वह मेरी मदद करे, लेकिन वह लालची दामाद कभी भी बेटी को मेरी मदद नहीं करने देगा. बेटी को तो फोन भी नहीं कर सकती, हमेशा लौक रहता है. घर से भाग भी नहीं सकती, दोनों पतिपत्नी ताला लगा कर नौकरी पर जाते हैं.’

बस, इन्हीं सब विचारों की पगडंडी पर चलते हुए ही कुसुम ने कराहते हुए स्नान कर लिया और दर्द से तड़पते हुए हाथों से ही उलटीसीधी चोटी गूंथ ली. बेटेबहू की हंसीमजाक, ठिठोली की आवाजें गरम पिघलते शीशे सी कानों में पड़ रही थीं. कहां वह सजेसजाए, साफसुथरे, कालीन बिछे बैडरूम में सोती थी और कहां अब बदबूदार स्टोर में फोल्ंिडग चारपाई पर? छि:छि: इतना सफेद हो जाएगा रवि का खून, उस ने कभी सोचा न था. महंगे से महंगा कपड़ा पहनाया उसे, बढि़या से बढि़या खाने की चीजें खिलाईं. हर जिद, हर चाहत रवि की कुसुम और पराग ने पूरी की. शहर के महंगे इंगलिश कौन्वेंट स्कूल से, फिर विश्वविद्यालय से रवि ने शिक्षा ग्रहण की.

कितनी मेहनत से, कितनी लगन से पराग ने इसे बैंक की नौकरी की परीक्षाएं दिलवाईं. जब यह पास हो गया तो दोनों खुशी के मारे फूले नहीं समाए, खोजबीन कर के जानपहचान निकाली तब जा कर इस की नौकरी लगी.

और पराग के मरने के बाद यह सबकुछ भूल गया. काश, यह जन्म ही न लेता. मैं निपूती ही सुखी थी. इस के जन्म लेने के बाद मेरे मना करने पर भी 150 लोगों की पार्टी पराग ने खूब धूमधाम से की थी. बड़ा शरीफ, सीधासादा और संस्कारों वाला लड़का था यह. लेकिन पता नहीं इस ने क्या खा लिया, इस की बुद्धि भ्रष्ट हो गई, जो राक्षसों जैसा बरताव करता है. अब तो इस के पंख निकल आए हैं. प्यार, त्याग, दया, मान, सम्मान की भावनाएं तो इस के दिल से गायब ही हो गई हैं, जैसे अंधेरे में से परछाईं.

रसोई से आ रही मीठीमीठी सुगंध से कुसुम बच्ची सी मनचली हो गई. हिम्मत की सीढ़ी चढ़ कर धीरेधीरे बहू के पास आई, ‘‘बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है, बेटी क्या बनाया है?’’ पता नहीं कैसे दुनिया का नया आश्चर्य लगा कुसुम को बहू के उत्तर देने के ढंग से, ‘‘मांजी, गाजर का हलवा बनाया है. खाएंगी? आइए, बैठिए.’’

हक्कीबक्की बावली सी कुसुम डायनिंग चेयर पर बैठ गई. एक प्लेट में हलवा रखा था, दूसरी प्लेट में गोभी के गरम परांठे. नाश्ता देते समय शहद सी मीठी बोली में बहू बोली, ‘‘पहले इन कागजों पर साइन कर दीजिए. फिर नाश्ता कर लीजिएगा.’’

‘‘न…न, मैं नहीं करूंगी साइन.’’

‘अच्छा, तो यह आदर, यह प्यार इस लालच में किया जा रहा था. छि:छि:, तुम दोनों ने तो रिश्तों को नीलाम कर दिया है. मैं चाहे मर जाऊं, चाहे मुझे कुछ भी हो जाए, मैं साइन नहीं करूंगी,’ कुसुम बड़बड़ाती रही.

‘‘जाइएजाइए, लीजिए सूखी ब्रैड और चाय, मत करिए साइन. और जब ये आ जाएं तब खाइएगा इन की मार.’’

बहू के शब्द तीरों से भी ज्यादा घायल कर गए कुसुम को. वह बाहर से अंदर तक लहूलुहान हो गई.

मरती क्या न करती. भूखी थी सूखी ब्रैड चाय में डुबो कर खाई, रोती रही. सोचती रही, ‘लानत है ऐसी जिंदगी पर. गाजर का हलवा, भरवां परांठे खा कर क्या मैं तेरी गुलाम बन जाऊं. न…न, मैं अपाहिज नहीं बनना चाहती. मैं अपना सबकुछ तुझे दे दूं और मैं अपाहिज बन जाऊं, यह नहीं हो सकता,’ बुदबुदाती हुई कुसुम, ब्रैड और चाय से ही संतुष्ट हो गई. मन ने कहा, ‘जाए भाड़ में तेरा हलवा और परांठे. मैं अपने जमाने में बचा हुआ हलवा, परांठेऔर पूरी मेहरी तक को खाने के लिए देती थी.’

कुसुम बहू की क्रियाएं आंखें फाड़फाड़ कर देख रही थी. सास की पीड़ा, दुख, व्यथा से बहू अनजान सी अपने कामों में व्यस्त थी. चायनाश्ता कर के उस ने अपना लंच बौक्स तैयार किया, फिर गुनगुनाती हुई पिं्रटैड सिल्क की साड़ी और उसी रंग की मैच करती माला पहन कर कालेज चली गई. बाहर से घर में ताला लगा दिया.

बाहर ताला बंद कर वह हर रोज ही कालेज जाती रही. और तो और टैलीफोन भी लौक कर दिया जाता था. लेकिन उस दिन वह टैलीफोन लौक करना भूल गई. कुसुम ने हर रोज की तरह पूरा घर देखा. हर चीज लौक थी. यहां तक कि फ्रिज में भी ताला लगा हुआ था.

हां, बहू कुसुम के लिए डायनिंग टेबल पर 4 सूखी रोटी और अरहर की दाल बना कर रख गई थी. अनलौक टैलीफोन देख कर कुसुम के दिल में खुशी का खेत लहराने लगा. अब तो पड़ोसिन को फोन कर दूंगी. वह मुझे बाहर भागने में सहायता कर देगी.

उस समय कुसुम में हजार हाथियों की ताकत ने जन्म ले लिया. देह का दर्द भी कपूर सा उड़ गया. आंखों में हीरे सी चमक उत्पन्न हो गई. सब से पहले तो उस ने पड़ोसिन को फोन किया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहा है?’’

‘‘मैं बोल रही हूं आंटी, रीता, लेकिन आप फोन कैसे कर रही हैं? क्या आज आप का फोन लौक नहीं है?’’

मुक्ति की खुशी में झूमती हुई कुसुम बोली, ‘‘हांहां बेटी, लौक नहीं है. सुनो, तुम इस समय बाहर का ताला तोड़ कर आ जाओ. तब तक मैं तैयारी करती हूं.’’

‘‘कैसी तैयारी, आंटी?’’ सुन कर रीता को आश्चर्य हुआ.

‘‘बेटी, तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था कि आप यहां से भाग जाओ आंटी, किसी और शहर या बेटी के पास.’’

‘‘हांहां, कहा तो था. लेकिन आंटी, आप कहां जाएंगी?’’

‘‘मैं कानपुर अपने भाई के पास जाऊंगी. वह बस स्टेशन पर लेने आ जाएगा, फिर सब ठीक हो जाएगा. बेटी, अगर मैं नहीं गई तो यह मुझ से जबरदस्ती मारपीट कर, नशा पिला कर साइन करवा लेगा और…और…’’ कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘और क्या आंटी… बताओ न…’’

‘‘और फिर मुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक देगा,’’ बोलते हुए कुसुम की आवाज कांप रही थी. पूरी की पूरी देह ही कंपकंपाने लगी थी. उस की देह जवाब दे रही थी. लेकिन फोन रख कर उस की हिम्मत सांस लेने लगी. आशा जीवित होने लगी.

जल्दीजल्दी अलमारी खोल कर अपने कपड़े, रुपए और वसीयत के कागज निकाले, पर्स लिया. ढंग से सिल्क की साड़ी पहन कर दरवाजे के पास अटैची ले कर खड़ी हो गई.

पत्थर से ताला नहीं टूटा तो रीता ने हथौड़ी से ताला तोड़ा. कुसुम दरवाजे के पास ही खड़ी थी.

एक ओर जेल से छूटे कैदी सी खुशी कुसुम के दिल में थी तो दूसरी ओर अपना घर, अपना घोंसला छोड़ने का दुख उसे खाए जा रहा था. वह घर, जिस में उस ने रानी सा जीवन व्यतीत किया, जहां उस ने सोने से दिन और चांदी सी रातें काटीं, जहां उस के आंगन में किलकारियां गूंजती थीं, प्यार का सूरज सदा उगता था, जहां उस के पति ने उसे संपूर्ण ब्रह्मांड का सुख दिया था, जहां वह घंटों पति के साथ प्रेम क्रीड़ाएं करती थी, जो घर खुशियों के फूलों से महकता था, वक्त ने ऐसी करवट बदली कि कुसुम आज उसे छोड़ कर जाने पर विवश हो गई. क्या करती वह? कोई अन्य उपाय नहीं था.

रीता ने अपनी कार में कुसुम को बिठा लिया, उस का सूटकेस उठाते समय रीता भी रोने लगी आंटी के बिछोह पर. रोंआसी रीता ने आंटी से उन के भाई का फोन नंबर ले लिया. और बस पर चढ़ाते समय यह वादा कर लिया कि वह हफ्ते में 2 बार फोन पर उन का हालचाल पता लगाती रहेगी.

जितना दुख कुसुम को अपना घर छोड़ने का था उस से कुछ ही कम दुख रीता से बिछुड़ने का था. ज्यादा देर वह रीता को बस के पास रोकना नहीं चाह रही थी. वह सरहद पर तैनात सिपाही सी सतर्क थी, सावधान थी कि कहीं खोजते हुए उस की बहू या बेटा न आ जाएं. वह उस घर में वापस जाना नहीं चाहती थी, जहां तालाब में मगरमच्छ सा उस का बेटा रहता था, जहां उस की जिंदगी मुहताज हो गई थी.

बस चल पड़ी. वह खिड़की से बाहर आंसूभरी आंखों से रीता को तब तक देखती रही जब तक उस की आकृति ने बिंदु का रूप नहीं ले लिया.

ज्योंज्यों बस आगे बढ़ रही थी उस का अपना शहर दूर होता जा रहा था, वह शहर जहां वह सोलहशृंगार कर के अपने सुहाग के साथ आई थी. उसे लगा उस की जिंदगी एक नदी है जिस ने अपना रास्ता बदल लिया है और वह एक गांव है जो पीछे छूट गया है. बस जितना आगे बढ़ रही थी उस का दिल उतनी ही जोरों से धड़क रहा था. काफी देर बाद उस ने स्वयं को सामान्य स्थिति में पाया.

अब वह आंखें बंद कर के सोचने लगी, ‘काश, मेरी बहू रीता जैसी होती, कितनी अच्छी है, कितना खयाल रखती है अपनी सासू मां का, जितनी बार भी इस की सास मुझ से मिली हैं, हमेशा अपनी बहू की तारीफों के पुल ही बांधती रही हैं, लेकिन मुझे दुष्ट बहू मिली. अरे बहू का क्या दोष है, नालायक तो अपना बेटा है. यदि बेटा ठीक होता तो बहू की क्या मजाल कि गलत काम करे?’

ज्योंज्यों कानपुर नजदीक आ रहा था, कुसुम घबरा रही थी कि भैयाभाभी पता नहीं क्या सोचेंगे. सोचें तो सोचें, उस के पास उस रास्ते के सिवा कोई रास्ता नहीं था. वह बोझ नहीं बनेगी भैयाभाभी पर, कुछ ही दिनों में अलग छोटा सा मकान ले कर रहेगी, एक नौकरानी रखेगी. एक विचार की लहर बारबार उठ रही थी कि घर छोड़ कर मैं ने गलत काम तो नहीं किया.

फिर दिमाग ने कहा, तो फिर क्या करती, हर रोज मार खाती. और वह मारता रहता जब तक जायदाद पूरी अपने नाम न लिखवा लेता. एक बार, दो बार, तीन बार…उस ने अपनी दोबारा बनाई वसीयत पढ़ी, जिस की एक प्रति उसे अपनी बेटी के पास भी भेजनी पड़ेगी, वकील के पास तो एक कौपी रख आई थी.

कुसुम अब सोचने लगी, ‘आज मैं ने जो कुछ भी किया वह पहले ही कर लेना चाहिए था. छि:छि:, मां बेटे से मार खाए, इस से अच्छा मर न जाए. मैं अकेली पड़ गई थी, वे दोनों पतिपत्नी एक हो गए थे. शुक्र है कि रीता जैसी पड़ोसिन मिल गई, जिस ने मेरी मृतप्राय जिंदगी को सांसें दे दीं. रीता न होती तो मैं वसीयत भी न बदल पाती और घर से भाग भी नहीं पाती.’

इन्हीं विचारों का तानाबाना बुनते हुए कानपुर आ गया. हड़बड़ाते हुए कुसुम ने अटैची और पर्स पकड़ा, फिर स्वरूपनगर के लिए रिकशा कर के चल दी.

कुसुम निश्चय कर के अपने भाई देवेंद्र के घर पहुंच गई. दरवाजे पर लगी कौल बैल बजाई. थोड़ी देर में एक भोलीभाली, सुंदर सी बालिका ने दरवाजा खोला.

‘‘आप कौन, किस से मिलना है?’’ मीठी आवाज में बच्ची ने पूछा.

‘‘बेटी, मैं लखनऊ से आई हूं. तुम्हारे पापाजी की बहन हूं. मेरा नाम कुसुम है.’’

‘‘अंदर आइए, दादीजी, अंदर आइए.’’

बच्ची के पीछेपीछे कुसुम अपना पर्स और अटैची संभालती हुई चल दी. बरामदे के साथ जुड़ा हुआ ही ड्राइंगरूम था. उस घर में कुसुम 5 वर्षों बाद आई थी. पिछली बार अपने पति के साथ कुसुम कार से आई थी. घरपरिवार वालों ने खूब इज्जत, मानसम्मान दिया था. भैयाभाभी ने तो आंखों पर ही बिठा लिया था.

कुसुम के भाई के घर का वातावरण उस समय भी शांत था और अब भी लगता है सुखमय और शांत है. कुसुम की विचारतंद्रा उस के भाई ने ही तोड़ी, ‘‘अरे कुसुम, तू इस समय अकेली कैसे? कु़छ फोन वगैरह तो कर देती?’’

‘‘वह भैया, बस आना पड़ा,’’ सूखा चेहरा, मरियल आवाज में दिए उत्तर से भाई सशंकित हो गया.

‘‘आना पड़ा, मैं समझा नहीं. खैर, चल पहले चाय पी ले, कुछ खा ले फिर बताना.’’

कुसुम की आवाज सुन कर बरामदे में ही सब्जी काटती हुई भाभी दौड़ कर आईं, पांव छुए फिर बैठ गईं. थोड़ी देर बाद चायनाश्ता भी आ गया.

‘‘दीदी, आप तो बहुत दुबली हो गई हैं. 5 साल में चेहरा ही बदल गया. क्या हो गया है आप को?’’ कुसुम के पास आ कर भाभी ने आलिंगन किया और आश्चर्यचकित नजरों से उस की ओर देखती रहीं.

कुसुम बारबार बांहों पर, गरदन पर पड़े जख्मों के निशान छिपा रही थी. लेकिन मेज पर रखी हुई चाय की प्याली उठाते समय गरदन से शाल हट गई और बांह का स्वेटर ऊपर को हो गया, देखते ही भैया दौड़ कर पास आए, घबरा कर पूछा, ‘‘यह सब क्या है, कुसुम? तुम्हारे शरीर पर ये जख्म कैसे हैं?’’

‘‘वह…वह भैया, रवि मारता था. पीटता था. एक बार तो उस ने इतनी जोर से मारा कि दांत तक टूट गया. बस, ये सब उसी के निशान हैं.’’

‘‘इतना सब होता रहा और तुम ने बताया तक नहीं. अरे हम कोई गैर हैं क्या? कभी फोन ही कर देतीं या कोई खत ही डाल देती. पता नहीं तुम ने कितने दुख झेले हैं जीजाजी की मृत्यु के बाद. छि:छि:, इतना कू्रर, बिगड़ा रवि बेटा हो जाएगा. सपने में भी नहीं सोचा था. खैर, कुसुम, तुम ने अच्छा किया जो आ गईं.’’

‘‘वह तो मुझे भूखा तक रखता था. बाहर दरवाजे पर ताला, टैलीफोन पर ताला, फ्रिज और सभी अलमारियों में ताला लगा रहता था. भैया, ऐसी दुर्दशा तो किसी कैदी की भी नहीं होगी जो उस ने मेरी की थी,’’ कहते ही कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

भैयाभाभी घबरा गए. आंसू पोंछे भाभी ने फिर कुसुम से वसीयत की योजना पूछी. थोड़ी देर बाद स्वयं पर काबू पा कर कुसुम ने अपनी नई वसीयत उन दोनों को दिखा दी. भैयाभाभी खुश हुए. बहन को भाई ने खूब प्यार कर के कहा, ‘‘बहन, घबराओ मत. जैसा तुम चाहती हो वैसे ही होगा. वैसे तो अलग रहने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो स्वरूपनगर में ही तुम्हें अच्छा मकान मिल जाएगा. अभी तुम आराम करो, चिंता मत करो.’’

‘‘अच्छा भैया,’’ कह कर कुसुम सोफे पर ही लेट गई.

उधर, शाम को जब रवि औफिस से लौटा, पल्लवी ने रोनी सी सूरत ले कर दरवाजा खोला और वह वृक्ष से टूटी हुई डाली सी धम्म से सोफे पर बैठ गई. रवि ने उसे झकझोर कर पूछा, ‘‘क्यों, क्या बात है? सब ठीक तो है.’’

पल्लवी चीख पड़ी, ‘‘कुछ ठीक नहीं है, तुम्हारी मां धोखा दे कर भाग गईं और…’’

‘‘और क्या?’’

‘‘यह देखो, अपने पलंग पर यह चिट्ठी रख गई हैं. लिखा है : ‘मैं जा रही हूं. कुछ भी नहीं मिलेगा तुम्हें जायदाद में से. मैं ने वसीयत बदल दी है. आधी जायदाद बेटी मोनिका और आधी विकलांगों की संस्था के नाम कर दी है. मैं कपूत बेटे से विद्रोह करती हूं. जिस बेटे को पालपोस कर बड़ा किया वह मां पर हाथ उठाता है, वह भी जायदाद के लिए. मेरा सबकुछ तेरा ही तो था. लेकिन तू ने मांबेटे के रिश्ते का कोई लिहाज नहीं किया. तुझ से रिश्ता तोड़ने का मुझे कोई गम नहीं.’’’

कागज का टुकड़ा पढ़ कर रवि पागलों की तरह चिल्लाने लगा. कभी इधर कभी उधर चक्कर लगाने लगा. उधर पत्नी पल्लवी क्रोध में बड़बड़ाने लगी, ‘मैं ने पहले ही कहा था कि मांजी को मत सताओ, मत मारोपीटो, प्यार से उन्हें अपने वश में करो लेकिन तुम ने मेरी एक न सुनी. अब भुगतो. यह घर भी खाली करना पड़ेगा.’

Satire : सरकारी बाबू

जब से बाबू लोगन की नकेल कसने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लगी है, हर बाबू के कान खड़े हो गए हैं. हालांकि घबराने की बात नहीं है क्योंकि इन्होंने समय का पाबंद होने के बजाय इस मशीन से निबटने का बेहतरीन आइडिया निकाल लिया है. क्या है वह आइडिया, जरा आप भी दिमागी घोड़े  दौड़ाइए.

हमारे सरकारी दफ्तर में सभी कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए उन के फिंगर इंप्रैशन और फोटो रिकौर्ड में लेने के बाद इलैक्ट्रौनिक ‘बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली’ की नई व्यवस्था चालू कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद अब यदि हमारे दफ्तर के कर्मचारियों को ‘सरकारी पिंजरे में बंद पशुपक्षी’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.

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पशु इसलिए क्योंकि हाथी, घोड़ों, कुत्तों, यहां तक कि गधे जैसा स्वभाव व व्यवहार करने वाले लोग भी यहां पाए जाते हैं, जो अपने अहंकार के आगे इंसान को इंसान नहीं समझते. पक्षी इसलिए कि यहां पर कोयल की सुरीली आवाज वाली और मोर जैसी सुंदर, आकर्षक, शृंगारयुक्त व सुडौल महिलाएं भी होती हैं और बगुला भगत तो एक नहीं कई होते हैं. विशेषकर जिन्हें अपने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानांतरण व शीघ्र ही पदोन्नति पाने की चिंता होती है, उन्हें आला अधिकारियों का बगुला भगत बनते देर नहीं लगती.

कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए लगी बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली मशीन लगने के बाद एक कर्मचारी ने अपने साथियों से कहा, ‘‘साथियो, सुबह साढ़े 9 बजे बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर सभी लोग दफ्तर के गार्डन में पीछे की तरफ आ जाया करो. अब तो एकएक ताश की बाजी सुबहसुबह 10 से 11 के बीच में भी हो जाया करेगी और लंच टाइम में तो हमें कोई रोक ही नहीं सकता.’’

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दूसरे कर्मचारी ने भी चुसकी ली और बोला, ‘‘साथियो, बायोमीट्रिक मशीन में सुबहशाम अपनी हाजिरी के लिए उंगली (फिंगर इंप्रैशन) लगाना ठीक है, परंतु यदि गलती से भी कहीं और लगा दी तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए इसे रास्ते चलते अपनी आदत मत बना लेना. गलती से भी यदि आप की उंगली भीड़भाड़ में किसी महिला के शरीर से टच हो गई तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. पता होना चाहिए कि महिलाओं के संबंध में कानून व्यवस्था अब बहुत सख्त हो गई है.’’

लेखानुभाग में उपस्थित एक क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘साथियो, सुबहसवेरे बायोमीट्रिक मशीन में उंगली लगा कर सीधे ही सभी लोग सभागार में पहुंच जाया करो. थोड़ी गपशप और चायशाय हो जाया करेगी. काम तो 11 बजे से पहले नहीं शुरू हो पाएगा. जब तक सफाई कर्मचारी कक्ष का अच्छी तरह से झाड़ूपोंछा नहीं कर लेते तब तक हम तो अपने कक्ष में बिलकुल भी नहीं बैठ सकते.’’

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दूसरा क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘अरे यार, क्या बात करते हो, केवल गपशप और चायशाय से क्या होगा. मेरी राय में तो समय बिताने के लिए अब करना है कुछ नया काम, सुबहसुबह ही किसी कोने में इंटरनैट खोल कर बैठिए और देखिए तमाम ब्लू फिल्में.’’

उस के इतना कहते ही सभी ने जोरदार ठहाका लगाते हुए एक स्वर में कहा, ‘‘हां, आप ठीक कह रहे हैं, यही ठीक रहेगा.’’

दफ्तर में बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लग जाने के कारण संभ्रांत महिलाओं की चिंता थी कि सुबह साढ़े 9 बजे तक दफ्तर आने और शाम को 7 बजे से पहले न जाने पर उन के घर के कई काम अधूरे रह जाते हैं.

उन की समस्या सुन कर एक समझदार साथी ने अपनी महिला साथी की समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार किया और बोला, ‘‘मैडम, आप तो एक इलैक्ट्रिक कुकिंग प्लेट, कुछ बरतन व जरूरी मसाले आदि ला कर यहीं अपनी अलमारी में रख लीजिए और सुबहसुबह साढ़े 9 बजे आ कर बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर तुरंत दफ्तर के पास वाली मार्केट चली जाया कीजिए और वहां से ताजी सब्जियां खरीद कर ले आया कीजिए. शाम तक उसे धो कर व काटकूट कर सायं 5 बजे के बाद उसे अपने दफ्तर के कक्ष में ही तैयार कर, यहीं से सब्जी पका कर ही 6 बजे के बाद घर ले जाया करें और पहुंचते ही चपातियां सेंक कर अपने परिवार के सदस्यों को सर्व कर दिया करें.’’

वे बोलीं, ‘‘कैसी बातें करते हैं, किसी अधिकारी ने देख लिया तो?’’

समझदार साथी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, इस में डरने वाली कोई बात नहीं है. जब अधिकारी अपने कक्ष में इलैक्ट्रिक कैटल और नाश्ते का सामान रख सकते हैं तो आप भला क्यों नहीं रख सकतीं. आप तो खांमखां डर रही हैं.’’

एक कर्मचारी ने बताया, ‘‘दफ्तर में जब से बायोमीट्रिक मशीन लगी है मैं ने तो अपने सुबह के टहलने के समय में परिवर्तन कर लिया है और यहां साढ़े

9 क्या, 9 बजे ही आ जाता हूं और हाजिरी मशीन में अपनी उंगली का इंप्रैशन लगा कर सीधे ही पास वाले गार्डन में जा कर 11 बजे तक चक्कर लगाता हूं और फिर दफ्तर लौट कर कैंटीन में चाय पीता हूं तब जा कर सीट पर बैठ कर 2-4 फाइलें निबटा देता हूं. तब तक लंच टाइम हो जाता है. इसी प्रकार शाम को पहले 5 बजे घर भाग जाया करता था. अब 4 बजे निकलता हूं और पास वाले सुपर मार्केट से शाम के 6 बजे तक सामान गाड़ी में डाल कर ले आता हूं और यहां आ कर मशीन में दफ्तर छोड़ने के लिए उंगली का इंप्रैशन लगाता हूं और वापस घर चला जाता हूं.’’

साथी बोला, ‘‘यार, तुम्हारे कमरे की लाइट व कंप्यूटर वगैरह कौन स्विच औफ करता है?’’

वह बोला, ‘‘मुझे उस की बिलकुल भी परवा नहीं है. प्रत्येक तल पर सुरक्षा संतरी किस लिए है. वह खुली देखता होगा तो खुद ही बंद कर देता होगा. आखिर उसे भी तो कुछ काम करना चाहिए…वह भी तो तनख्वाह लेता है.’’

सच कहूं तो मुझे तो अपने दफ्तर में बायोमीट्रिक मशीन द्वारा हाजिरी लगने से केवल एक लाभ ही दिखाई दे रहा है कि जिन सरकारी कर्मचारियों को अपने दफ्तर के कार्यदिवसों में खुलने का समय व बंद होने का समय मालूम ही नहीं था, इस बहाने उन्हें पता चल गया वरना पूरी 60 वर्ष की नौकरी हो जाती और वे रिटायर भी हो जाते, उन्हें सरकारी दफ्तर के प्रत्येक दिन का सही कार्यसमय ही न मालूम हो पाता.

बंदा तो पहले घर से ही देरी से दफ्तर आता था और जल्दी चला जाता था, इसलिए अपनी सीट पर नहीं मिलता था और अब अपने कार्यदिवसों में आता तो जल्दी है और प्रत्येक दिन जाता भी दफ्तर के समाप्त होने के निर्धारित समय के बाद है मगर फिर भी वह दिनभर सीट पर कम ही दिखता है. कहां जाता है और क्याक्या करता है, किसी को पता ही नहीं रहता.

जिस किसी से पूछो कि फलां कर्मचारी कहां है तो यही कहते मिलता है कि आए तो हैं लेकिन कहां हैं, पता नहीं. देखिए, उन का चश्मा और पैन तो उन की सीट पर रखा है और कंप्यूटर भी औन है न. बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन के कंप्यूटरीकृत सौफ्टवेयर में ताकझांक करने पर वह वहां सुबह साढ़े 9 बजे तक रोजाना ही दफ्तर आता है और शाम को भी सायं 6 बजे के बाद ही दफ्तर छोड़ता है. वहां लगे हुए उस के फिंगर इंप्रैशन व फोटो तो यही सत्यापित करते हैं. इसलिए दफ्तर के आला अधिकारियों द्वारा कभी भी उस की एक क्या, आधे दिन तक की भी, न तो छुट्टी काटी जा सकती है और न ही वेतन.

sad stroy : वो आखिरी पत्र

लेखकसंतोष सचदेव

जीवन के आखिरी पलों में न जाने क्यों आज मेरा मन खुद से बातें करने को हो गया. सोचा अपनी  जिंदगी की कथा या व्यथा मेज पर पड़े कोरे कागजों पर अक्षरों के रूप में अंकित कर दूं.

यह मैं हूं. मेरा नाम अनिता है. कहां पैदा हुई, यह तो पता नहीं, पर इतना जरूर याद है कि मेरे पिता कनाडा में भारतीय दूतावास में एक अच्छे पद पर तैनात थे. उन का औफिस राजधानी ओटावा में था. मां भी उन्हीं के साथ रहती थीं. मैं और मेरा भाई मांट्रियल में मौसी के यहां रहते थे. मेरी पढ़ाई की शुरुआत वहीं से हुई. मेरा भाई रोहन मुझ से 5 साल बड़ा था.

स्कूल घर के पास ही था, मुश्किल से 3-4 मिनट का रास्ता था. तमाम बच्चे पैदल ही स्कूल आतेजाते थे. लेकिन हमारे घर और स्कूल के बीच एक बड़ी सड़क थी, जिस पर तेज रफ्तार से कारें आतीजाती थीं. इसलिए वहां के कानून के हिसाब से स्कूल बस हमें लेने और छोड़ने आती थी.

घर में हम हिंदी बोलते थे, जबकि स्कूल में फ्रेंच और अंग्रेजी पढ़नी और बोलनी पड़ती थी. वहां की भाषा फ्रेंच थी. वहां सभी फ्रेंच में बातें करते थे. दुकानों के साइन बोर्ड, सड़कों के नाम, सब कुछ फ्रेंच में थे. जबकि मुझे फ्रेंच से बड़ी चिढ़ थी. स्कूल की कोई यूनीफार्म नहीं थी, फीस भी नहीं, किताबकापियां सब फ्री में मिलती थीं.

सर्दी में भी सभी लड़कियां छोटेछोटे कपड़े पहनती थीं. हम भारतीयों को यह सब बड़ा अजीब लगता था. बचपन के लगभग 10 साल वहीं बीते. मांट्रियल के बारे में सुना था कि वहां बहुत बड़ा पहाड़ था, जिसे माउंट रायल कहते थे. बोलतेबोलते वह माउंट रायल मांट्रियल बन गया. ऊंचे पहाड़ से बहते झरने की तरह मेरी जीवनधारा भी कभी कलकल करती, कभी हिलोरें भरती, कभी गहरी झील की गहराई सी समेटे आगे बढ़ रही थी. वह मधुरिम समय आज भी मेरे जीवन की जमापूंजी है.

मैं थोड़ा बड़ी हो गई. भारतीय परंपराओं के बंधनों से मेरा परिचय कराया जाने लगा. लड़कियां मित्र हो सकती हैं, लड़के नहीं. स्कूल सीमा के बाहर किसी लड़के के साथ न बोलना, न घूमना. पिता नए जमाने के साथ चलने के पक्षधर थे, पर मौसी ने जो बचपन में सिखाया था, उसे तब तक भूली नहीं थीं. वह उस परंपरा को आगे भी जारी रखने के लिए दृढ़ संकल्प थीं. मैं स्कर्ट नहीं पहन सकती थी. कमीज भी पूरी बाहों की, जिसे गले तक बंद करना पड़ता था. भले ही स्कूल में दूसरे बच्चों के बीच हंसी का पात्र बनूं, लेकिन मौसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी.

मैं दसवीं में पढ़ रही थी, तभी अचानक पिताजी का तबादला हो गया. हम अपने देश भारत आ गए. रहने को दिल्ली के आरकेपुरम में सरकारी मकान मिला. वह काफी खुला इलाका था, मां बहुत खुश थीं. क्योंकि उन्हें चांदनी चौक के पुराने कटरों की तंग गलियों वाले अपने पुश्तैनी मकान में नहीं जाना पड़ा था.

दिल्ली के स्कूलों में दाखिला कोई आसान काम नहीं था. पर पिताजी की सरकारी नौकरी और तबादले का मामला था, इसलिए घर के पास ही सर्वोदय स्कूल में दाखिला मिल गया. बारहवीं की परीक्षा मैं ने अच्छे नंबरों से पास की, जिस से दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए में एडमिशन में कोई परेशानी नहीं हुई. इंगलिश औनर्स से बीए कर के मैं युवावस्था की दहलीज तक पहुंच गई.

मां बीमार रहने लगी थीं, भाई रोहन डाक्टरी की ऊंची शिक्षा के लिए लंदन चले गए. जैसा कि भारतीय हिंदू परिवारों में होता है, उसी तरह घर में मेरी शादी की चिंता होने लगी. मेरे पिताजी के एक बड़े पुराने मित्र थे सुंदरदास अरोड़ा. वह ग्रेटर कैलाश में एक बड़ी कोठी में रहते थे.

कनाडा से आने के बाद हम अकसर उन के यहां आयाजाया करते थे. एक दिन उन्होंने मेरे पिताजी से कहा, ‘‘हम दोनों अच्छे मित्र हैं, हमारे परिवार एकदूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं. क्यों न हम इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दें. मैं चाहता हूं कि डा. वरुण की शादी अनिता से कर दी जाए.’’

वरुण उन दिनों अमेरिका में रह रहा था. वह वहीं अपनी क्लिनिक चलाता था. उन्होंने डा. वरुण को बुला लिया. उस ने मुझे पसंद कर लिया. मेरी पसंद, नापसंद के कोई मायने नहीं थे. बात आगे बढ़ी और मैं मिस अनिता मेहरा से मिसेज अनिता अरोड़ा हो गई.

शादी के बाद मैं वरुण के साथ अमेरिका के कैलीफोर्निया में रहने लगी. एक साल में ही मैं एक बेटे की मां बन गई. बेटे का नाम रखा गया रोहित. वक्त के साथ रोहित 3 साल का हो गया और स्कूल जाने लगा. पति ने उस की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी. इसी बीच दिल्ली में मेरी सास सुमित्राजी के गंभीर रूप से बीमार होने की सूचना मिली. वरुण ने कहा कि रोहित को आया संभाल लेगी, इसलिए मैं सास की देखभाल के लिए दिल्ली चली जाऊं.

दिल्ली आ कर पता चला कि सास को कैंसर था. ससुर और मैं उन्हें ले कर अस्पतालों के चक्कर काटने लगे. उन की देखभाल के लिए घर पर नर्स रख ली गई थी. लेकिन मेरा मौजूद रहना जरूरी था.

6 महीने से ज्यादा बीत गए. सास की हालत में काफी सुधार आ गया तो मैं ने कैलीफोर्निया जाने की तैयारी शुरू कर दी. शुरूशुरू में वरुण लगभग रोज ही फोन कर के मां का हालचाल पूछता रहा. मैं भी अकसर फोन कर के रोहित के बारे में जानकारी लेती रहती थी. लेकिन अचानक वरुण के फोन आने बंद हो गए. मैं फोन करती तो उधर से फोन नहीं उठता. मुझे चिंता होने लगी.

वरुण से बात किए बगैर वहां कैसे जा सकती थी. जब वरुण से बात नहीं हो सकी तो मेरे ससुर ने अपने दूर के किसी रिश्तेदार से वरुण के बारे में पता करने को कहा. उन्होंने पता कर के बताया कि वरुण किसी डा. मारिया से शादी कर के नाइजीरिया चला गया है. उस के बाद वरुण का कुछ पता नहीं चला.

हम सभी हैरान रह गए. रोहित के बारे में पता करने मैं कैलीफोर्निया गई. पर उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. न परिचितों को न आसपड़ोस वालों को. मैं अकेली होटलों में कितने दिन रुक सकती थी. थकहार कर लौट आई.

मेरे ससुर और पिता की तमाम कोशिशों के बाद भी न वरुण का पता चला, न रोहित का. एक गहरा घाव भीतर ही भीतर रिसता रहा. कुछ दिन बीते थे कि मेरे मातापिता की एक सड़क हादसे में मौत हो गई. भाई रोहन एक अंग्रेज महिला से शादी कर के लंदन में बस गया था. मातापिता की मौत पर दोनों दिल्ली आए थे. वे लोग चांदनी चौक का पुश्तैनी मकान बेच कर वापस चले गए. मुझे सांत्वना देने के सिवाय और वे कर भी क्या सकते थे.

ग्रेटर कैलाश की उस विशाल कोठी में मेरे दिन गुजरने लगे. समय बिताने और मानसिक तनाव से बचने के लिए मैं एक स्कूल में पढ़ाने लगी थी. स्कूल से घर लौटती तो मेरे सासससुर दरवाजे पर मेरी बाट जोहते मिलते. उन्होंने मुझे मांबाप से कम प्यारदुलार नहीं दिया. मेरे ससुर की उदास आंखें सदा मेरे चेहरे पर कुछ खोजती रहतीं. वह अकसर कहते, ‘‘मैं तुम्हारे पिता और तुम्हारा अपराधी हूं. मेरे बेटे ने मेरे हाथों न जाने किस जन्म का पाप करवाया है.’’

सास भी अकसर अपनी कोख को कोसती रहतीं, ‘‘मेरे बेटे ने जघन्य पाप किया है. इतनी सुंदर पत्नी के रहते उस ने बिना बताए दूसरी शादी कर ली. मेरे पोते को भी ले गया. जिंदा भी हो तो मैं कभी उस का मुंह न देखूं.’’

पोते का ध्यान आते ही उन की आंखों में एक चमक सी आ जाती, पर वह मेरी तरह पत्थर के दिल वाली नहीं थीं. कुछ ही दिनों में चल बसीं. मेरे ससुर ने भी चारपाई पकड़ ली.

6-7 महीने बीते होंगे कि एक दिन उन्होंने पास बैठा कर कहा, ‘‘बेटा, तुम से एक खास बात करनी है. मैं ने अपने छोटे बेटे अरुण से बात कर ली है. मैं तुम्हारे नाम मकान की वसीयत करना चाहता था. उसे इस में कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन उस का कहना है कि वसीयत में कभीकभी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं, खास कर ऐसे मामलों में, जब दूसरे वारिस कहीं दूर दूसरे देश में रह रहे हों. उस की राय है कि वसीयत के बजाय यह संपत्ति अभी तुम्हारे नाम कर दूं.’

अरुण मेरे पति का छोटा भाई था, जो जर्मनी में रहता था. उस का कहना था कि यह संपत्ति मेरे नाम हो जाएगी तो मेरे मन में एक आर्थिक सुरक्षा की भावना बनी रहेगी. ससुर ने कोठी मेरे नाम पर कर दी. कुछ दिनों बाद ससुर भी अपने मन का बोझ कुछ हल्का कर के स्वर्ग सिधार गए. इस के बाद मैं अकेली रह गई. कहने को नौकर राजू था, लेकिन वह इतना छोटा था कि उस की सिर्फ गिनती ही की जा सकती थी.

जब वह 5 साल का था, तब उस की मां उसे साथ ले कर हमारे यहां काम करने आई थी. उस की मां की मौत हो गई तो राजू मेरे यहां ही रहने लगा था. कुछ दिनों तक वह स्कूल भी गया था, लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगा तो उस ने स्कूल जाना बंद कर दिया. इस के बाद मैं ने ही उसे हिंदी पढ़नालिखना सिखा दिया था.

जिंदगी का एकएक दिन बीतने लगा. लेकिन अकेलेपन से डर जरूर लगता था. ससुरजी की मौत पर देवर अरुण जर्मनी से आया था. मेरे अकेले हो जाने की चिंता उसे भी थी. इसी वजह से कुछ दिनों बाद उस ने फोन कर के कहा था कि उस के एक मित्र के पिता सरदार नानक सिंह अपनी पत्नी के साथ दिल्ली रहने आ रहे हैं. अगर मुझे आपत्ति न हो तो मकान का निचला हिस्सा उन्हें किराए पर दे दूं. वह सज्जन पुरुष हैं. उन के रहने से हमें सुरक्षा भी मिलती रहेगी और कुछ आमदनी भी हो जाएगी.

मुझे क्या आपत्ति होती. मैं मकान के ऊपर वाले हिस्से में रहती थी, नीचे का हिस्सा खाली पड़ा था, इसलिए मैं ने नीचे वाला हिस्सा किराए पर दे दिया. सचमुच वह बहुत सज्जन पुरुष थे. अब मैं नानक सिंह की छत्रछाया में रहने लगी.

जितना स्नेह और अपनापन मुझे नानक सिंहजी से मिला, शायद इतना पिताजी से भी नहीं मिला था. पतिपत्नी अपने लंबे जीवनकाल के अनुभवों से मेरा परिचय कराते रहते थे. मैं मंत्रमुग्ध उन्हें निहारती रहती और अपनी टीस भरी स्मृतियों को उन के स्नेहभरे आवरण के नीचे ढांप कर रख लेती.

समय बीतता रहा. हमेशा की तरह उस रविवार की छुट्टी को भी वे मेरे पास आ बैठे. इधरउधर की थोड़ी बातें करने के बाद नानक सिंहजी ने कहा, ‘‘आज तुम से एक खास बात करना चाहता हूं. मेरा बेटा जर्मनी से यहां आ कर रहने के लिए कह रहा है. वैसे भी अब हम पके आम हैं, पता नहीं कब टपक जाएं. बस एक ही बात दिमाग में घूमती रहती है. तुम्हें बेटी माना है, इसलिए अब तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता, इतने बड़े मकान में अकेली और वह भी यहां की लचर कानूनव्यवस्था के बीच. इसी उधेड़बुन में मैं कई दिनों से जूझ रहा हूं.

पलभर रुक कर वह आगे बोले, ‘‘अपने काम से मैं अकसर स्टेट बैंक जाया करता हूं. वहां के मैनेजर प्रेम कुमार से मेरी गहरी दोस्ती हो गई है. एक दिन बातोंबातों में पता चला कि उन की पत्नी का स्वर्गवास हो गया है. उस के बाद से उन्हें अकेलापन बहुत खल रहा है. कहने को उन के 3 बच्चे हैं, लेकिन सब अपनेअपने में मस्त हैं. बड़ी बेटी अपने पति के साथ जापान में रहती है. बेटा बैंक में नौकरी करता है. उस की शादी हो चुकी है. तीसरी बेटी संध्या थोड़ाबहुत खयाल रखती थी, लेकिन उस की भी शादी हो गई है. उस के जाने के बाद से वह अकेले पड़ गए हैं. एक दिन मैं ने कहा कि वह शादी क्यों नहीं कर लेते? लेकिन 3 जवान हो चुके बच्चों के बाप प्रेम कुमार को मेरा यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगा.

मैं सुनती रही, नानक सिंहजी कहते रहे, ‘‘मैं विदेशों में रहा हूं. मेरे लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पर भारतीय संस्कारों में पलेबढ़े प्रेमकुमार को मेरा यह प्रस्ताव अजीब लगा. मैं ने मन टटोला तो लगा कि अगर कोई हमउम्र मिल जाए तो शेष जीवन के लिए वह उसे संगिनी बनाने को तैयार हो जाएंगे. मैं ने उन से यह सब बातें तुम्हें ध्यान में रख कर कही थीं. क्योंकि मेरा सोचना था कि तुम बाकी का जीवन उन के साथ उन की पत्नी के रूप में गुजार लोगी. क्योंकि औरत का अकेली रह कर जीवन काटना कष्टकर तो है ही, डराने वाला भी है.’’

इस के बाद एक दिन नानक सिंहजी प्रेम कुमार को मुझ से मिलवाने के लिए घर ले आए. बातचीत में वह मुझे अच्छे आदमी लगे, इसलिए 2 बार मैं उन के साथ बाहर भी गई. काफी सोचने और देवर से सलाह कर के मैं ने नानक सिंहजी के प्रस्ताव को मौन स्वीकृति दे दी.

इस के बाद प्रेमकुमारजी ने अपने विवाह की बात बच्चों को बताई तो एकबारगी सभी सन्न रह गए. बड़ी बेटी रचना विदेशी सभ्यता संस्कृति से प्रभावित थी, इसलिए उसे कोई आपत्ति नहीं थी. संध्या अपने पिता की मन:स्थिति और घर के माहौल से परिचित थी, इसलिए उस ने भी सहमति दे दी. पर बेटा नवीन और बहू शालिनी बौखला उठे. लेकिन उन के विरोध के बावजूद हमारी शादी हो गई.

शादी के 3-4 दिनों बाद नवीन अपना सामान ले कर शालिनी के साथ किराए के मकान में रहने चला गया. मुझे यह अच्छा नहीं लगा. मैं सोच में पड़ गई, अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मैं ने एक बेटे को उस के पिता से अलग कर दिया. मुझे अपराधबोध सा सताने लगा. लगता, बहुत बड़ी गलती हो गई. इस बारे में मैं ने पहले क्यों नहीं सोचा? अपने स्वार्थ में दूसरे का अहित करने की बात सोच कर मैं मन मसोस कर रह जाती. भीतर एक टीस सी बनी रहती.

पर मैं ने आशा का दामन कभी नहीं छोड़ा था, फिर अब क्यों चैन से बैठ जाती. मैं ने एक नियम सा बना लिया. स्कूल से छुट्टी होने के बाद मैं शालिनी से मिलने उस के घर जाती. एक गाना है ना ‘हम यूं ही अगर रोज मिलते रहे तो देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा…’ शालिनी एक सहज और समझदार लड़की थी. कुछ ही दिनों में उस ने मुझे अपनी सास के रूप में स्वीकार कर लिया.

मुझे ले कर उन पत्नी पति के बीच संवाद चलता रहा, नतीजतन धीरेधीरे नवीन ने भी मुझे अपनी मां का दर्जा दे दिया. एक भरेपूरे परिवार का मेरा सपना साकार हो गया. मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. प्रेमकुमारजी के रिश्तेदारों की कानाफूसी से मुझे पता चला कि इतना अपनापन तो प्रेमकुमारजी की पहली पत्नी भी नहीं निभा पाई, जितना मैं ने निभाया है. मैं आत्मविभोर हो उठती.

अपनी हृदय चेतना से निकली आकांक्षाओं को मूर्तरूप में देख कर भला कौन आनंदित नहीं होता. जो कभी परिवार में नहीं रहे, वे इस पारिवारिक सुख आह्लाद की कल्पना भी नहीं कर सकते. हर दिन खुशियों की सतरंगी चुनरी ओढ़े मैं पूरे आकाश का चक्कर लगा लेती. दिनों को जैसे पंख लग गए, 3 साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला.

नवीन का ट्रांसफर देहरादून हुआ तो उस के घर को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से 15-20 दिन के लिए मैं उस के साथ देहरादून चली गई. लौट कर आई तो सीढि़यों पर लगे लैटर बौक्स से अपने पत्र, पानी, बिजली और टेलीफोन के बिल निकाल कर लेती आई. उसी में एक लिफाफा था, जिस पर मेरा नामपता लिखा था. उस में डाक टिकट नहीं लगा था, इस का मतलब वह डाक से नहीं आया था. उस में उसी बीच की तारीख पड़ी थी, जिन दिनों मैं देहरादून में थी.

मैं ने लिफाफा खोला, तो उस में से एक पत्र निकला. उस में लिखा था, ‘मां, मैं न्यूयार्क से सिर्फ आप से मिलने आया था. मेरा नाम रोहित है. मिसेज एंटनी ने बताया था कि मेरा यह नाम आप ने ही रखा था. वैसे मुझे सब रौबर्ट कहते हैं. स्कूल में मेरा यही नाम है. मुझे पता नहीं, मैं कब पैदा हुआ, पर स्कूल रिकौर्ड के अनुसार मैं अब 16 साल का हो गया हूं. मैं मिसेज एंटनी को ही अपनी मां समझता रहा. मैं ने उन से कभी उन के पति (अपने पिता) के बारे में नहीं पूछा. सोचता था कि कहीं उन का दिल न दुखे. पर अचानक एक महीने पहले मृत्यु शैय्या पर पड़ी मिसेज एंटनी ने मुझे बताया कि वह मेरी मां नहीं हैं.

‘उन्होंने तो शादी ही नहीं की थी. उन का कहना था कि वह कई सालों पहले कैलीफोर्निया में मेरे पिता वरुण अरोड़ा के साथ नर्स के रूप में काम करती थीं. स्वास्थ्य खराब होने की वजह से वह नौकरी छोड़ कर अपने भाई के पास न्यूयार्क आ कर रहने लगी थीं. अपने एक मित्र से उन्हें पता चला कि डा. वरुण अरोड़ा ने भारत की एक महिला से शादी की थी और उन का एक बेटा है. उन की पत्नी ने अपने पति की इच्छा के विरुद्ध अपने बेटे का नाम रोहित रखा था. कभी साल में एकाध बार डा. साहब से उन की बात हो जाती थी. वह कैलीफोर्निया से वाशिंगटन चले गए थे.

‘एक दिन अचानक डा. वरुण मुझे ले कर उन के घर आ पहुंचे और कहा कि रोहित की मां उसे छोड़ कर भारत चली गई है. इस की देखभाल के लिए कोई नहीं है, इसलिए मैं चाहता हूं कि इस की गवर्नेस बन कर वह इसे संभालें. डा. वरुण मेरे पालनपोषण का खर्च भेजते रहे, लेकिन कुछ महीनों बाद खर्च आना बंद हो गया. मिसेज एंटनी ने कैलीफोर्निया में अपने पुराने मित्रों से डा. वरुण के बारे में पता किया तो पता चला कि उन्होंने डा. मारिया नाम की एक अमेरिकी महिला से शादी कर ली है और उस के साथ नाइजीरिया चले गए हैं.

‘डा. वरुण और मेरी भारतीय मां का पता लगाने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला. थकहार कर वह मुझे अपना बेटा मान कर मेरा पालनपोषण करने लगी. पर मरने से पहले उन का यह रहस्योद्घाटन मेरे लिए एक बड़ी पहेली बन गया. मेरे पिता हैं तो कहां हैं? मेरी मां भारत में हैं तो कहां हैं?

‘दिनरात मैं इसी उधेड़बुन में पड़ा रहता. मेरी पढ़ाई छूट रही थी. मैं मिसेज एंटनी के पुराने सामान को खंगालता रहता. अचानक उन के भाई डेविड के साथ उन के पत्राचार में एक जगह लिखा मिला कि जर्मनी में कोई सरदार नानक सिंह हैं, जो मेरी भारतीय मां के बारे में जानते हैं. बस मैं ने उन्हें खोज निकाला और आप का पता पा लिया.

‘अब समस्या थी कि भारत में आप से कैसे संपर्क करूं? तभी मेरे एक मित्र स्टीफन के बड़े भाई की शादी दिल्ली में तय हो गई. वे लोग एक सप्ताह के लिए दिल्ली आ रहे थे. मेरे अनुरोध पर वे एक सप्ताह के लिए मुझे अपने साथ दिल्ली ले आए. मैं पहले ही दिन से आप के घर के चक्कर लगाने लगा, पर वहां ताला लगा था. पड़ोसियों से पता चला कि आप किसी दूसरे शहर देहरादून गई हैं, 15-20 दिनों में लौटेंगी.

‘मैं इतने दिनों तक नहीं रुक सकता था. मेरे लिए दिल्ली और यहां के लोग बिलकुल अजनबी थे. मुझे कल अपने मित्र के परिवार के साथ न्यूयार्क जाना है, अपने भीतर एक गहरी पीड़ा लिए मैं वापस जा रहा हूं, लेकिन आशा की डोर थामे हुए. नीचे मेरा पता और फोन नंबर लिखा है. मेरे मित्र का फोन नंबर और पता भी लिखा है. आप मेरा यह पत्र पढ़ते ही मुझे फोन करना. अब दुनिया में सिवाय आप के मेरा कोई नहीं है. आशा है, आप से जल्दी ही मिल पाऊंगा.

आप का रोहित.’

पत्र पढ़ते ही मेरा चेहरा बदरंग हो गया. सहमी और अधमरी सी हो गई मैं. मेरे भीतर का गहरा घाव फिर हरा हो गया. मैं कैसी मां हूं, अपने ही बेटे को भूल गई. बेटा तड़प रहा है और मैं? मेरे पति प्रेमकुमारजी ने मेरा अवाक चेहरा देखा तो मेरे हाथ से पत्र ले कर एक सांस में पढ़ गए. उन्होंने कहा, ‘‘इतनी बड़ी खुशी, चलो अभी फोन करो.’’

मोबाइल, इंटरनेट का जमाना नहीं था. एसटीडी पर फोन बुक किया. कई घंटे बाद फोन मिला. घंटी बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया. समय काटे नहीं कट रहा था. हम ने रोहित के मित्र स्टीफन को फोन बुक किया. फोन मिला, पर जो सुनने को मिला, लगा जैसे किसी ने कोई विषैला तीर सीधा मेरे सीने में उतार दिया है. उस ने बताया, ‘‘रोहित ने एक सप्ताह पहले आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने अपनी स्कूल की कौपी के आखिरी पन्ने पर लिखा था, ‘मेरा इस दुनिया में कोई नहीं. काश, मिसेज एंटनी मरने से पहले मुझे यह न बतातीं कि वह मेरी मां नहीं थी. मैं अन्य अनाथ बच्चों की तरह मनमसोस कर रह जाता. पर मांबाप के होते हुए भी मैं अनाथ हूं. पिता का तो पता नहीं, उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी पर मेरी भारतीय मां, वह भी मुझे भूल गई. दोनों ने मुझे बस पैदा किया और छोड़ दिया. कितने उत्साह और कितनी कोशिशों के बाद मैं ने अपनी भारतीय मां को ढूंढ़ निकाला था.

पिछले 15 दिनों से मेरे फोन की हर घंटी मुझे मां के फोन की लगती थी. सुना था कि मां में अपने बच्चे के लिए बड़ी तड़प होती है, लेकिन मेरी मां तो अपने में ही मस्त है. क्या मां ऐसी ही होती हैं? जब मेरा कोई नहीं तो मैं किस के लिए जिऊं. हर एक का कोई बाप, मां, भाई बहन है, मेरा कोई नहीं तो मैं क्यों हूं? बस, अब और नहीं… बस.’’

फोन पर जो सुनाई दिया, मैं जड़वत सुनती रही. फिर क्या हुआ पता नहीं. मैं ने बिस्तर पकड़ लिया. 3-4 महीने तक मैं बिस्तर पर मरणासन्न पड़ी रही. प्रेमकुमार मेरी सेवा में लगे रहे. मैं अभागी मां, सिर्फ अपने को कोसती छत की कडि़यों में 3 साल के अपने बच्चे के बड़े हुए रूप के काल्पनिक चित्र को निहारती रहती. सुना था, वक्त वह मरहम है, जो हर घाव को भर देता है. घाव यदि गहरा हो तो निशान छोड़ जाता है, पर मेरा घाव तो फिर से हरा हो गया था. मन करता, मैं भी आत्महत्या कर लूं. पर आत्महत्या के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए, यह कायरों का काम नहीं है.

कहते हैं, कि जब मनुष्य जन्म लेता है तो उस की मौत तभी तय हो जाती है. पैदा होते ही मरने वालों की लाइन में लग जाती है. कब बुलावा आ जाए, पता नहीं. मैं तो नहीं मरी, पर प्रेमकुमारजी चले गए. मैं फिर अकेली रह गई. अब क्या करूं, किस का आश्रय ढूंढू? जानती थी, पर आश्रित होने से तो अच्छा है मृत्यु की आश्रित हो जाऊं.

बुढ़ापे में परआश्रित होने पर तो असहनीय पीड़ा, घुटन भरा जीवन, अपमानित होने का डर, रहीसही जीवन की आकांक्षाओं को डस लेता है. मैं सुबहशाम एक वृद्धाश्रम में अपना समय बिताने लगी.

जीवन का 85वां सोपान चढ़ चुकी हूं. जब इतना कुछ सहने पर भी मैं पाषाण की तरह अडिग हूं तो आने वाला कल मेरा क्या बिगाड़ लेगा? कहीं पढ़ा था, ‘‘चलते रहो, चलते रहो.’’ और मैं चल रही हूं. अंतिम क्षण तक चलती रहूंगी.

Abhishek Bachchan, Ajay Devgan की फिल्में चाय पीने के पैसे भी न कर सकीं इकट्ठा

30 साल बाद दोबारा रिलीज हुई फिल्म नाम बौक्स औफिस पर बुरी तरह ढेर हो गई वहीं अभिषेक बच्चन की फिल्म कुछ खास कमाल नहीं कर पाई.

नवंबर माह के चौथे सप्ताह 22 नवंबर में राकेश रोशन ने अपनी फिल्म ‘करण अर्जुन’ को 30 साल बाद रीरिलीज किया, तो वहीं दिसंबर 2021 में प्रदर्शित फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ को भी रीरिलीज किया गया. यह दोनों रीरिलीज फिल्में बौक्स औफिस पर कोई कमाल दिखाने में बुरी तरह से असफल रहीं. मगर दूसरी नई रिलीज हुई फिल्मों को जरूर नुकसान पहुंचाया. इस सप्ताह रिलीज हुई नई फिल्मों का बंटाधार हो गया.

शूजीत सरकार निर्देशित व रितेश शाह लिखित फिल्म ‘‘आई वांट टू टोक 2’’ में अभिषेक बच्चन मुख्य भूमिका में हैं. फिल्म की कहानी कैंसर पीड़ित अर्जुन सेन की सच्ची कहानी पर आधारित है, जो जीवन बदलने वाली सर्जरी का सामना कर रहा है और साथ ही बचपन से ही अपनी बेटी के साथ एक जटिल रिश्ते से गुजर रहा है. लेकिन अमेरिका के कैलिफोर्निया में फिल्माई गई इस फिल्म के दृश्यों व कहानी से भारतीय दर्शक रिलेट नहीं कर पाया. दर्शकों ने अभिषेक बच्चन के अभिनय की भी काफी आलोचन की. अभिषेक बच्चन को कब तक लोग अमिताभ बच्चन के कारण अपनी फिल्म में काम देते रहेंगे, पता नहीं.

यह फिल्म पूरे 7 दिन के अंदर महज 80 लाख रुपए ही कमा सकी. इस में से निर्माता की जेब में कुछ नहीं आएगा. सरल शब्दों में कहें तो फिल्म ‘आई वांट टू टोक’ बौक्स औफिस पर चाय पीने के पैसे भी निर्माता को न दिला सकी. फिल्म निर्माता अब इस फिल्म के निर्माण में खर्च की गई रकम तक बताने को तैयार नहीं है.

‘सिंघम अगेन’ और ‘भूल भुलैया 3’ के टकराव के बीच अजय देवगन ने अपनी 2002 में बनी फिल्म ‘‘बेनाम’ का नाम बदल कर ‘नाम’ के नाम से 22 नवंबर को रिलीज करने की घोसहणा कर दर्शकों को दिग्भ्रमित करने का असफल प्रयास किया. फिल्म ‘बेनाम’ यानी कि नाम को 2002 में खुद अजय देवगन ने ही रिलीज नहीं होने दिया था. अब नवंबर माह के चौथे सप्ताह 22 नवंबर को रिलीज होने पर ‘नाम’ 7 दिन में 25 लाख रूपए ही एकत्र कर सकी. निर्माता की जेब से सारा पैसा चला गया.

फ्रांस के कान्स फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत पायल कपाड़िया की फिल्म ‘‘औल वी इमेजिन एज लाइट’’ भी 22 नवंबर को रिलीज की गई. अफसोस अंगरेजी भाषा की यह फिल्म दर्शकों को आकर्षित न कर सकी. यही वजह है कि इस के निर्माता और निर्देशक इस फिल्म के बौक्स औफिस कलेक्शन को ले कर खामोश हैं.
22 नवंबर को ही निर्माता रघुनाथ राव मोहिते पाटिल और निर्देशक तुषार विजयराव शेलार की मराठी व हिंदी द्विभाषी फिल्म ‘‘धर्म रक्षक महावीर संभाजी महाराज’’ का भाग रिलीज होगी. यह नई फिल्म है. फिल्म की कहानी के केंद्र मे संभाजी का जीवन वृत्तांत व उन की देशभक्ति का गुणगान है. फिल्म में ठाकुर अनुप सिंह, अमृता खानविलकर, किशोरी शहाणे, प्रदीप रावत की अहम भूमिकाएं हैं. हिंदी में इस के पीआरओ ने कुछ काम नहीं किया है. इस वजह से हिंदी भाषी दर्शक इस फिल्म के नाम से परिचित नहीं है. दूसरी बात अब दर्शकों का देशभक्ति व राष्ट्रवाद वाली फिल्मों से मोहभंग हो गया है, जिस के चलते यह फिल्म पूरे 7 दिन में महज 3 करोड़ रुपए ही बौक्स औफिस पर जुटा पाई, इस में से निर्माता की जेब में एक करोड़ रुपए ही आए.

वैसे निर्माता को भी पता था कि उन की यह फिल्म गुणवत्तावाली नहीं है, इसलिए उन्होंने इस का प्रेस शो भी नहीं किया था. 22 नवंबर को ही जयपुर की पृष्ठभूमि पर 3 महिलाओं की मित्रता, स्वतंत्रता व यात्रा की बात करने वाली मराठी भाषा की फिल्म ‘‘गुलाबी’ भी रिलीज हुई. अभ्यंग कुलवेकर निर्देशित इस फिल्म में श्रुति मराठे, अश्विनी भावे व मृणाल कुलकर्णी की अहम भूमिकाएं हैं. पर इस फिल्म की बौक्स औफिस पर बड़ी दुर्गति हुई. यह फिल्म 7 दिन में केवल 35 लाख रुपए ही एकत्र कर सकी.

22 नवंबर को ही मृणाल कुलकर्णी की मराठी फिल्म ‘गुलाबी’ के ही साथ हिंदी भाषा की फिल्म ‘‘ढाई आखर’ रिलीज हुई. मशहूर लेखक अजगर वजाहत लिखित प्रवीण अरोड़ा निर्देशित फिल्म ‘ढाई आखर’ में मृणाल कुलकर्णी के साथ हरीश खन्ना व रोहित कोकाटे भी हैं. इस फिल्म में एब्यूज मैरिज की संवेदनशील कहानी है. मगर इस फिल्म का प्रचार सही ढंग से नहीं किया गया. खराब प्रचार के चलते इस फिल्म का मात खाना तय माना जा रहा था. मगर किसी ने यह नहीं सोचा था कि यह फिल्म मृणाल कुलकर्णी के कैरियर पर ही सवालिया निशान लगा देगी.

यह फिल्म 7 दिन में बौक्स औफिस पर 5 लाख रूपए भी नहीं कमा सकी. इस फिल्म से निर्माता का सारा धन डूब गया. इस के लिए कुछ हद तक मृणाल कुलकर्णी भी दोषी हैं. वह खुद को स्टार मानती हैं और उन्हें पत्रकारों से बात करने में यकीन नहीं है.

Bride : चेहरे की किताब

ज़रीना बेग़म ख़ामोशी से आनेजाने वाले मेहमानों का जायज़ा ले रही थीं. वे वलीमे की दावत में शामिल होते हुए भी शामिल नहीं थीं. उन को लग रहा था कि उन को नीचा दिखाने के लिए देवरानी ने आननफानन बेटे की शादी कर दी है. उन का दानिश 4 साल बड़ा था माहिर से.

वे सोच रही थीं कि माहिर की उम्र ही क्या है, 26 का ही तो हुआ है, क्या हर्ज था एकाध साल रुक जाती तो. ख़ानदान भर में मेरा और दानिश का मज़ाक बना कर रख दिया, लोग तरहतरह की बातें कर रहे होंगे. हालांकि उन्होंने किसी को बातें करते सुना तो नहीं था पर जो भी उन की तरफ़ देख कर कुछ कहता या हंसता, उन्हें लगता, उन्हीं पर कटाक्ष किया जा रहा है.

‘दानिश मेरा बच्चा. मेरी रूह की ठंडक, मेरी आंखों का नूर. इकलौता होने के नाते कितना ज़िद्दी, नख़रीला सा था, जब लाड़ उठाने वाले, मुंह से निकलने के पहले हर ख़्वाहिश पूरी कर देने वाले वालिदैन हों तो होना ही था न,’ ज़रीना के दिमाग में कशमकश जारी थी.

पर 12 साल की उम्र में ही अब्बू को खो देने के बाद वह जैसे एकदम बड़ा हो गया था. बिलकुल ख़ामोश, संजीदा, मां का हद से ज़्यादा ख़याल रखने वाला, पढ़ाई जितना ही अब्बू के बिज़नैस को भी सीरियसली लेने लगा था. अम्मी की कभी नाफ़रमानी न हो, यही कोशिश रहती थी.

उस ने अपनी ज़िंदगी के फैसले लेने का हक अपनी मां को दे दिया था. बस, उस की एक ही शर्त थी, जब उन की तरफ से रिश्ता फाइनल हो जाए, उन का दिल लड़की को बहू मान ले, तभी लड़की देखनेदिखाने का सिलसिला शुरू हो. वह कभी किसी लड़की को रिजैक्ट कर के उस को एहसासे कमतरी में मुब्तिला कर के अपने ज़मीर पर बोझ नहीं ले सकता.

उस की बात से पहले तो ज़रीना बेग़म मानो निहाल हो गईं, पर वक़्त गुज़रने के साथ उन पर जेहनी दबाव बढ़ता जा रहा था. उन को लगने लगा था कि अदब व तहज़ीब में ढली, नफ़ासत और क़ाबिलीयत से लबरेज़ इंसान पैदा होना बंद ही हो गए हैं जैसे ज़मीन पर. फूहड़, बेढंगी लड़कियां एक आंख नहीं सुहाती थीं उन को. ऊपर से ग़ज़ब यह कि कुलसूम, उन की देवरानी, अपने बेटे माहिर के रिश्ते के सिलसिले में सलाह लेने आ गईं.

‘अरे माहिर की उम्र ही क्या है, अभी और सुघड़ सलीकेमंद लड़कियां…’ वे बात पूरी करतीं, उस से पहले कुलसूम बोल पड़ीं, ‘भाभी साहिबा, हम भी अल्हड़, चंचल थे जब ब्याह कर आए थे इस घर में. हमारी सास ने सब्र से, प्यार से हमें इस घर के सांचे में ढाल ही लिया न. 26 का हो गया है माहिर. तालीम मुकम्मल हो गई. 2 साल से अपने अब्बू के साथ हाथ बंटा रहा है बिज़नैस में. इफ़रा, उस की दुल्हन, 22 की है. ग्रेजुएशन कर चुकी है. सही उम्र है दोनों की. एडजस्ट करने में दिक़्क़त नहीं आएगी. सब से बड़ी बात, उन दोनों की यही मरजी है.’

‘ए हे बीबी, ये कहो न आंख लड़ गई है दोनों की, चक्कर चल रहा है, तो अब कोई रास्ता तो है नहीं तुम्हारे पास. फिर यह सलाह का ढोंग क्यों?’ ज़रीना बेग़म तुनक कर बोलीं.

कुलसूम ने उन्हें अफ़सोस से देखा और कहा, ‘पसंद की शादी इतनी बुरी बात तो नहीं. जब हर लिहाज़ से जोड़ी क़ाबिलेक़ुबूल है तो इस बात पर एतराज़ कि लड़के ने पसंद कर ली लड़की, फुज़ूल है.’

‘हां, जब उड़ा कर ले जाएगी वह चंट बला लड़के को अपने साथ, तब रोते बैठी रहना,’ ज़रीना बेगम कब हथियार डालने वालों में से थीं.

‘अच्छा न कहें तो बुरा भी न कहें. मैं किसी की फूल सी बच्ची के लिए ऐसी सोच नहीं रख सकती. आख़िर, मेरी भी एक बच्ची है जो कल को किसी के घर की रौनक बनेगी. मैं रिश्ता पक्का करने जा रही हूं. आप का दिल गवारा करे, तो आ जाइएगा. कुदरत दानिश पर रहम करे.’

उन का आख़िरी जुमला ज़रीना बेग़म को सिर से पांव तक सुलगा गया था. वे सोचने लगी थीं, ‘क्या होगा जब दानिश को माहिर की शादी पक्की होने की ख़बर मिलेगी. क्या सोचेगा वह कि अम्मी मेरे लिए एक अदद हमसफ़र न तलाश सकीं. कहीं वह ख़ुद ही किसी को ले आया तो’

उन की तबीयत बिगड़ गई थी. अपनी मां को अच्छे से समझने वाला दानिश इस बार भी सब समझ गया था. ढेरों तसल्लियों के साथ उस ने मां को मना लिया था कि ख़ुशी से शादी में चलें और किसी को कुछ कहने का मौका न दें.

ओह मेरा सब्र वाला बच्चा, कैसे आगे बढ़बढ़ कर हर काम संभाले हुए है. क्या मैं सचमुच नकारी मां हूं?

इन्हीं सब ख़यालों से घबरा कर वे शोरशराबे से दूर गार्डन के पिछले हिस्से में आ बैठी थीं.

उन के ख़यालों के सिलसिले को तोड़ती एक मीठी आवाज़ कानों से टकराई, “माफ़ कीजिएगा आपी, क्या मैं इस चेयर पर बैठ सकती हूं?”

उन्हें बेवक़्त का यह ख़लल पसंद नहीं आया. बड़ी मुश्किल से तो यह कोना नसीब हुआ था शोरगुल से दूर, चिड़चिड़े अंदाज़ में जवाब दिया, “कुरसी मेरे अब्बू की तो है नहीं, बैठ जाओ जहां बैठना हो.”

“ओह, दोबारा माफ़ी चाहती हूं, शायद आप को डिस्टर्ब कर दिया, मैं चलती हूं.”

ज़रीना बेग़म के होश बहाल हुए तो देखा, 20-22 साल की ताज़ा गुलाब की तरह खिली हुई परी चेहरा लड़की उन से मुख़ातिब है.
अपनी बदएख़लाकी पर अफ़सोस करते हुए उन्होंने कहा, “अरे नहीं, मैं पता नहीं किस धुन में थी माफ़ी चाहती हूं. बैठ जाओ यहीं, प्लीज़.”

“कोई बात नहीं, आप बड़ी हैं, माफ़ी न मांगें,” कह कर वह लड़की मुसकरा कर बैठ गई.

अब ज़रीन बेग़म का पूरा ध्यान उसी पर था. उन्होंने जब उस का जायज़ा लिया तो चौंक पड़ीं. बेबी पिंक और स्काई ब्लू कौम्बिनेशन की वे दीवानी थीं कालेज टाइम में.

हालांकि एक बार पति ने टोक दिया था- ‘बेगम, मेरी आंखें कालीसफ़ेद के बजाय गुलाबीफिरोज़ी होने को हैं इस रंग को देखदेख कर.’

तब चिढ़ और कुढ़न में उन्होंने कुछ जोड़े हाउसहैल्प को और कुछ छोटी बहन को दे दिए थे. बाद में लाख मनाने पर भी दोबारा वह रंग नहीं पहना, पति की मौत के बाद तो बिलकुल नहीं, 16 साल से.

उसी कौम्बिनेशन में मोतियों के वर्क वाला दुपट्टा, मोतियों के ही छोटेछोटे इयरिंग्स और मोती की नोज़पिन. किसी सीप से निकल कर आई हुई लग रही थी वह. एकदम लाइट मेकअप और पिंक लिपस्टिक. उस के फैशन सैंस की वे कायल हो गईं.

दूसरी हैरत उन्हें तब हुई जब उन्होंने देखा कि उस की प्लेट में एक बाउल में रसगुल्ला रखा है, एक में दाल. एकएक चम्मच दाल ले कर वह चावल में मिक्स कर के खाती जा रही थी. यही उन का तरीक़ा था. चावल में एकसाथ ख़ूब सारी दाल डाल कर भकोस लेने वाले जाहिल लगते थे उन्हें.

फिर उन्होंने ग़ौर किया कि उस ने ‘एक्सक्यूज़ मी, आंटी’ जैसे नक़ली लगने वाले शब्द नहीं कहे थे, अपनाइयत से ‘आपी’ कहा था. रस्मी जुमलों से कोफ़्त थी उन्हें.

एकबारगी उन को लगा, उन की जवानी की हूबहू रेप्लिका थी वह लड़की. वे चौंक गईं, क्या यह लड़की मुझे इंप्रैस करने के चक्कर में होमवर्क कर के आई है?

पर कैसे? उन के घर में ये सब बातें कोई नहीं जानता. दानिश अपने काम के सिलसिले में ज़्यादातर वक़्त बाहर ही होता है और नौकरों की नज़रें कब से इतनी पैनी होने लगीं. अपनी सोचों से बाहर निकल कर उन्होंने सवाल किया, “क्या नाम है बेटा, आप का? किस के साथ आई हो? कहां रहती हो? पढ़ाई कर रही हो?” एकसाथ इतने सवाल दागने के बाद भी और सवाल उन की ज़बान पर मचल रहे थे, जिसे बमुश्किल काबू में किया उन्होंने.

“जी, मैं ज़ुनैरा इक़बाल. हैदराबाद से आई हूं. दुलहन इफ़रा मेरी कज़िन लगती है. एमबीए कर रही हूं. डीजे का कानफोड़ू शोर चुभ रहा था कानों में तो यहां आ गई.”

ज़रीना बेग़म को तसल्ली हुई कि कहां एमपी का भोपाल और कहां साउथ का हैदराबाद, तेलंगाना में है शायद अब तो. जानपहचान का सवाल नहीं, तो कोई प्लानिंग या साज़िश नहीं है.

“बेटा, आप लोग रोटीसब्ज़ी नहीं खाते, चावल ही खाते हो न?”

“ऐसी बात नहीं है, आपी. हम लोग बेसिकली लखनऊ के हैं. पापा की जौब की वजह से 5 साल से हैदराबाद में हैं. हम रोटीसब्ज़ी, दालचावल सब खाते हैं. साउथ वाले भी हर तरह की शोरबे बिन शोरबे वाली, सूखी, भुनी हुई सब्ज़ी खाते हैं. बस, रोटी के बजाय चावल से. पर शादियों में मैं लाइट खाना ही प्रिफ़र करती हूं, बहुत हैवी और ऑयली होता है न. माल ए मुफ़्त, दिल ए बेरहम होने से क्या फ़ायदा, पेट तो अपना ही है. देखिए, प्लेट्स कितनी चिकनी हो रही हैं बटर चिकन की ग्रेवी में, हमारा पेट कितना चिकना हो जाएगा इसे खा कर,” वह बड़ा ठहरठहर कर शांत लहजे में बोल रही थी.

“अच्छा, आप तो मुझ से इतनी छोटी हैं, फ़िर आपी क्यों कह रही हैं, बेटा?” आख़िर उन्होंने टोक ही दिया, हालांकि आंटी के बजाय बड़ी दीदी कहा जाना अच्छा ही लग रहा था उन्हें.

“ओह, आप को बुरा लगा, माफ़ कीजिए. दरअसल, मेरी आपी भी मुझ से 10 साल बड़ी हैं. आप भी 30-35 की हैं और उन्हीं की तरह ख़ूबसूरत व ग्रेसफुल. सौरी,” वह शर्मिंदा सी होते हुए बोली.

“आप माफ़ी बहुत मांगती हैं, बुरा क्यों लगेगा. मुझे आंटीवांटी सुनना, इतराइतरा कर एक्सक्यूज़ मी बोलना बिलकुल पसंद नहीं. वैसे, मैं 48 की हूं, तो ख़ाला या फुफ्फो ज़्यादा सूट करेगा.” इस बार वे खुल कर मुसकराईं.

अब ज़रीना बेग़म से सब्र नहीं हो रहा था कि कैसे उस के बारे में सारी जानकारी निकलवाएं, कैसे उसे परखें, क्या करें. ज़ुनैरा तो चली गई थी पर उन के मन में खलबली मचा गई थी. वे अपनी देवरानी को इतना कुछ सुना चुकी थीं कि उस से नज़रें मिलाने में कतरा रही थीं. यह तो उस का बड़प्पन था कि भाभी साहिबा, भाभी साहिबा कहते मुंह नहीं सूख रहा था उस का. हर काम में आगेआगे किए हुए थी उन्हें.

वे दोबारा उठ कर फंक्शन में शामिल हो गईं. अचानक सबकुछ अच्छाअच्छा सा लग रहा था उन्हें.

कल दुलहन चली जाएगी मायके वालों के साथ, आज ही की रात है, हैदराबाद तो बहुत दूर है, कैसे जाऊंगी वहां? दानिश से कह नहीं सकती, वह एक ही बार जाएगा और हां कर आएगा. क्या पता लड़की वैसी न हुई, भला फिरोज़ीगुलाबी कपड़े, मोती का सैट और चावल खाने के अंदाज़ से जिंदगी के फैसले हुआ करते हैं? वे बेचैनी से पहलू बदल रही थीं.

अब उन के दिमाग में यह विचार आया कि दुनिया उन्हें साहिर लुधियानवी की मां की तरह न समझ ले, वे तो सच में बेटे का घर आबाद देखना चाहती हैं.

तभी दानिश आ गया और उन को घर ले गया यह कहकर कि ज़्यादा देर बैठना उन की सेहत के लिए ठीक नहीं. वे बिलकुल जाना नहीं चाहती थीं पर मजबूर थीं. क्या बतातीं उसे अभी से.

2-3 दिनों में शादी के हंगामे निबट गए. लेकिन ज़रीना बेग़म को किसी पल चैन न था.
इतनी प्यारी लड़की है, इतनी खूबसूरत है. कहीं इंगेज हुई तो? किसी को पसंद करती हुई तो.

इसी उधेड़बुन में एक हफ्ता हो गया. वे मौर्निंग वाक पर भी नहीं जा रही थीं. आख़िर को दिल को सुकून देने के लिये पार्क में टहलने निकल गईं. पास की कालोनी में रहने वाली सौम्या से उन की अच्छी बनती थी. वह भी उसी पार्क में आया करती थी. वह वीमन होस्टल में रह कर जौब कर रही थी. वह उन्हें डाइट व एक्सरसाइज़ के टिप्स दे दिया करती थी और वे उसे घर के मज़ेदार पकवान.

आख़िर को वही सब से भरोसेमंद लगी उन्हें. सारी बातें दिल खोल कर बता दीं.

उन की बातें सुन कर सौम्या खिलखिलाई, “मौसी, आप भी न, छोटे बच्चों की तरह हैं. एक कहानी सुनिए, एक आदमी बाग़ीचे का सब से सुंदर फूल लेने के लिए गया. अंदर जाते ही उसे बेहद सुंदर, खुशबूदार फूल नज़र आया. उस ने सोचा कि शुरुआत में ही इतने प्यारे फूल लगे हैं तो आगे तो न जाने कितने अच्छेअच्छे होंगे. इसी सोच में वह आगे बढ़ता गया, बढ़ता गया. एक से बढ़ कर एक फूल देखे, पर पहला वाला उस के मन में बस गया था. उसे कोई पसंद न आया. आख़िर में उस ने सोचा कि वही फूल ले लेना चाहिए, सो वह वापस लौट गया. पर उस ने देखा, इतनी देर में वह फूल कोई और ले गया है. अब वह दुखी हो गया और वहीं बैठ गया. थोड़ी देर बाद उस ने मन को समझाया और सोचा, चलो कोई बात नहीं, दूसरे फूल भी कम सुंदर नहीं. वह आगे बढ़ा तो देखा, दूसरी बार जो समय गंवाया था उस ने, उस दौरान सारे फूल कोई ले जा चुका था.”

इतना कह कर सौम्या चुप हो गई.

“आय हाय बीबी, मेरा हार्ट फेल करा कर मानोगी क्या? अभी उड़ कर चली जाऊं?” ज़रीना बेग़म घबरा कर बोलीं.

“अरे नहीं मौसी, कल चलते हैं न, फ्राइडे ईव है. मेरा सैटरडे-सन्डे औफ है,” सौम्या ने कहा.

“अरे क्या सचमुच? कैसे? तुम मेरे साथ चलोगी? तुम कितनी प्यारी बच्ची हो, ख़ुश रहो हमेशा,” ज़रीना बेगम बच्चों जैसे उत्साहित हो रही थीं.

“इतने पैसे हैं आप के पास, तो क्या फ़्लाइट की टिकट नहीं बुक करा सकतीं?”
सौम्य की इस बात पर दोनों हंसने लगीं.

“मुझे इक़बाल साहब की डिटेल दीजिए, सर्च करती हूं ऐड्रेस,” और सौम्या ने जल्दी से फोन निकाला.

ज़रीना बेग़म बहुत एक्साइटेड थीं, जैसे सिंदबाद जहाज़ी किसी एडवैंचर को करने जा रहा हो. मिन्नतें भी करती जा रही थीं अपने मिशन की क़ामयाबी की.

प्लान के मुताबिक़ सौम्या घर आई और दानिश को बताया कि फ्रैंड्स के साथ आउटिंग का प्रोग्राम है, 2 दिनों के लिए उस की मम्मी उधार चाहिए. दानिश चौंक गया, इस से पहले कभी उस ने अम्मी को अकेला नहीं छोड़ा था. पर जब उन्होंने मासूमियत से रिक्वैस्ट की, तो उस से इनकार करते न बना. वीडियो कौल से टच में रहेंगी, इस वादे के साथ उस से हां करते ही बनी.

वह भी सोच रहा था अम्मी का दिल बहल जाएगा. उसे सौम्या की समझदारी पर भी पूरा भरोसा था.

दोनों ने चुपके से हैदराबाद की तरफ़ कूच कर दिया.

“पर मौसी, यह ख़राब नहीं लगेगा किसी को बिन बताए धमक जाओ उस के घर,” सौम्या को संकोच हो रहा था.

“अरे बेटा, लड़कियों का सुघड़ापा यों ही देखा जाता है अचानक जा कर, बिन लीपापोती और तैयारियों का वक़्त दिए,” ज़रीना बेगम अनुभवी थीं.

इक़बाल मेंशन के दरवाज़े के बाहर खड़ी दोनों ही हिचकिचा रही थीं.

संयोग था कि कौलबेल पर हाथ रखने से पहले ही दरवाज़ा खुल गया. एक हाथ में रूमी की मसनवी और दूसरे हाथ में बेगम अख़्तर की ग़ज़ल लगा कर फ़ोन पकड़े हुए क्रीम और मैरून कौम्बिनेशन का सूट पहने ज़ुनैरा सामने खड़ी थी. कुछ पल को दोनों अपनीअपनी जगह जम सी गईं.

ज़रीना बेग़म को यक़ीन नहीं आ रहा था. शेख सादी, मीर और रूमी को पढ़ने की वजह से सब सहेलियां उन्हें बूढ़ी रूह कह कर चिढ़ाती थीं और बेग़म अख़्तर की आवाज़ में तो जान बसती थी उन की. कालेज फेयरवैल के वक़्त इसी कौम्बिनेशन की साड़ी पहनी थी उन्होंने.

“अस्सलामो अलैकुम. जी, आइए,” ज़ुनैरा कुछ समझ और कुछ नासमझी में बोली.

“अम्मी से मिलना है?”

“आप ने पहचाना नहीं, बेटा? हम भोपाल में मिले थे,” ज़रीना बेगम आगे बढ़ीं.

“हां, ओह, अरे हां, माफ़ कीजिए आपी, अरे फिर से सौरी, ख़ालाजान तशरीफ़ लाएं,” वह एकदम ही ख़ुश हो गई.

मेहमानों को अंदर बैठा कर वह अम्मी को बुलाने चली गई.

जैसे ही मिसेज़ इक़बाल अंदर आईं, अपना परिचय करा कर बिन लागलपेट ज़रीना बेग़म ने कहना शुरू किया- “आप यक़ीन नहीं करेंगी, पर अगर मेरी बेटी होती तो हूबहू ज़ुनैरा जैसी होती.
सूरत और सीरत में मेरा अक़्स है वह. अब गोद तो ले नहीं सकती, तो उसे आप ही मुझे बेटी के तौर पर सौंप दें. मेरा एक ही बेटा है, दानिश. उस की बहुत सी फोटोज और बायोडेटा लाई हूं. ऐड्रेस, फ़ोन नंबर भी. आप अपने हिसाब से जांचपड़ताल व तसल्ली करा लें और प्लीज़, एक बार मेरे प्रपोज़ल पर ग़ौर ज़रूर करें.”

एक ही सांस में सब बोल कर जब ज़रीना बेग़म चुप हुईं, तो मिसेज़ इक़बाल ग्रेसफुली मुसकरा दीं.

“हम तो यह मानते हैं, जोड़ियां ऊपर बनती हैं, नीचे मिल ही जाती हैं ख़ुद ही. जब भी कुदरत का हुक्म हुआ, फ़ौरन निकाह कर देंगे. रिश्ते तो बेतहाशा आ रहे हैं, पर हम लोग इस की पढ़ाई पूरी होने के इंतज़ार में हैं. इस के पापा से मैं डिस्कस कर के आप को ख़बर कर दूंगी. आप लोग बड़ी दूर से आई हैं, फ्रैश हो लें. मैं खाना लगवाती हूं.”

डाइनिंग टेबल पर मलाई कोफ़्ता और बटर-पनीर देख कर सौम्या बोली, “हमें तो उम्मीद थी, नरगिसी कोफ़्ते और बटर-चिकन मिलेगा, यहां तो सब वेज है.”

“वह, दरअसल, पता नहीं था न कि आप…” ज़ुनैरा की बात अधूरी ही रह गई.
“अरे, सारे मुसलिम्स नौन वैजिटेरियन होते हैं जैसे यह सच नहीं है, वैसे ही माथे पर बिंदी लगाए हर लड़की वीगन हो, यह भी ज़रूरी नहीं,” सौम्या हंस दी.

“जी, पर वैज डिश सेफ़ रहती है, डाउट की कंडीशन में,” ज़ुनैरा भी मुसकराई.

“यह बात तो एकदम ठीक है,” ज़रीना बेगम उस की क़ायल हो गईं.

“बहन नाउम्मीद मत करना, बड़ी आस ले कर आई हूं,” जाते वक़्त उन्होंने मिसेज़ इक़बाल से कहा तो उन्होंने गर्मजोशी से जवाब दिया, “तमाम उम्मीदें कुदरत से रखें. फिर मिलेंगे.”

उस के बाद बिजली की फ़ुरती से सारे मामले तय हो गए. दानिश की तफ़्तीश के बाद उधर से ओके सिग्नल पास होते ही ज़रीना बेग़म दानिश को बताने को बेक़रार हो गईं.

दानिश ने कहा, “मैं तो आप की रज़ा में हमेशा से राज़ी हूं. पर आप तो ख़ुश हैं न? तसल्ली कर ली न? ऐसा न हो वक़्ती तौर की पसंदीदगी, किसी मनमुटाव के बाद नपसंदीदगी में बदल जाए और आप के पैमाने पर वह खरी न उतर पाए और आप के रवैयों में बदलाव आ जाए.”

“मेरा कोई पैमाना, कोई शर्त नहीं अब, मेरे बच्चे. बस, तुम दोनों मेरे पास रहो और कुछ नहीं चाहिए. परफैक्ट तो कुछ नहीं होता. बस, मोहब्बत मोटी हो तो हर ऐब पतला नज़र आता है. कुदरत तुम्हें शाद ओ आबाद रखे,” मां ने मोहब्बत से उस के सिर पर हाथ फेरा.

“क्या मैं उस से एक बार फ़ोन पर बात कर सकता हूं. एक बार तसल्ली हो जाए कि वह दिल से राज़ी है,” दानिश ने थोड़े संकोच से कहा.

“अरे ज़रूर. सौ बार इत्मीनान कर ले. यह ले उस का नंबर. मैं तो अब तक हैरान हूं, वह मुझे अपना ही एक हिस्सा लगती है, मुझ से अलग हो कर चलताफिरता. ऐसा कैसे मुमकिन है?”

“चेहरे की किताब से सबकुछ मुमकिन है, अम्मी,” वह बड़बड़ाया.

“क्या मतलब?” ज़रीना बेगम सुन नहीं पाईं ठीक से.

“अरे, मतलब आप का चेहरा खुली किताब है. आप हैं ही इतनी अच्छी. इतनी सादा, इतने आला ज़ौक़ वाली, कोई आप सा कहां है. बस, बनने की कोशिश ही कर सकता है.”

वह प्यार से माँ को देख रहा था.

“चल, बटर पौलिश बंद कर और फोन मिला. बहुत से काम पूरे करने हैं फिर.”

दानिश ने नंबर लिया और घर के बाहर आ गया. पार्क में खुली हवा में उस ने नंबर डायल किया और वीडियो कौल लगा ली.

“सो मिसेज़ दानिश. शादीखानाआबादी मुबारक आप को.”

“मैं ज़ुनैरा इक़बाल हूं और रहूंगी. बाय द वे, ख़ैर, मुबारक.”

“मैं तो सोच रहा था, बच्ची पासिंग मार्क्स कैसे लाएगी. पर यह तो टौप कर गई. इतनी शिद्दत से मेहनत की हमारे लिए.”

“ज़्यादा उड़ो मत. ज़ुनैरा जो करती है, परफैक्शन से करती है. वैसे, हर अजीबोग़रीब शौक तुम्हारी अम्मी को ही होना था? बेगम अख़्तर की ग़ज़लें, रूमी, गुलिस्तां, बोस्तां, एकएक चम्मच दाल टपका कर चावल खाना, आई मीन रियली…”

“ओ हेल्लो, मुझे कितना होमवर्क करना पड़ा, यह मत भूलो. अम्मी के बारे में कितना कम जानता था मैं. न जानने की कोशिश की, न ज़रूरत पड़ी. उन की जिंदगी का मक़सद अब्बू के बाद मैं ही तो था. बस, मेरी पसंदनापसंद माने रखती थी. वह तो इंदौर जा कर नानीमां से मिला, उन के बचपन और जवानी के क़िस्से, हौबीज़, रंग, खाने सब मालूम किए. उन के कालेज की सहेलियों से मिला. तुम्हें तो सारा सिलेबस पकापकाया मिल गया.”

“अच्छा, सिलेबस याद कर के थ्योरी और वाइवा तो मुझे ही देना था न. उस दिन को कोस रही हूं जब एक म्यूचुअल फ्रैंड की फेसबुक पोस्ट पर कमैंट वार चला था अपना.”

“अरे, वह तो मेरी ज़िंदगी का सब से ख़ुशगवार दिन था. इतनी छोटी सी बच्ची इतनी ज़हीन है, यह बात तभी तो पता चली थी.”

“इतनी बार बताया, वह मेरी भतीजी की डीपी थी. बाय द वे, तुम्हारी फ्रैंड रिक्वैस्ट इसीलिए ऐक्सेप्ट की थी कि तुम मेरी बातों से इंप्रैस थे, न कि डीपी से.”

“तुम तो इंप्रैस थीं न मेरी डीपी से,” दानिश ने उसे चिढ़ाया.

“बिल्ली, खरगोश पाल ले इंसान, मुग़ालते पालने से बेहतर है वह,” ज़ुनैरा ने पलटवार किया.

“यह फेसबुक, यह ‘चेहरे की किताब’ जिस ने इस हसीन किताबी चेहरे से मिलवाया, हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगा उस का,” दानिश ने दिल के जज़्बात को ज़बान दी.

“और मेरा भी, कितनी मुश्किल से बातचीत से इंग्लिश अल्फ़ाज़ निकाल कर कामचलाऊ उर्दू सीखी, ठहरठहर कर बोलना, चलना, खाना सीखा, मुश्किल शेर रटे,” ज़ुनैरा ने फ़र्ज़ी कौलर उचकाए.

“मैडम, मेरे एफर्ट कम मत आंकिए. जो कभी बौलीवुड मूवीज़ नहीं देखता था, सलमान और अभिषेक बच्चन को झेलने लगा, हालांकि मेरी टौलरैंस बढ़ी इस से. ज़ीरा राइस के साथ ग्वारफली की सब्ज़ी कोई गंवार ही खा सकता है और गुलाबजामुन रोटी से कौन खाता है? एकदो बजे रात को लौंग ड्राइव सिर्फ चुड़ैलें जाती हैं या भूत. ऐसे सारे पागलपन ‘मुझे पसंद हैं’ कहना पड़े मुझे अम्मी के सामने, ताकि आदत हो जाए उन्हें. एकदम सदमा न लगे उन्हें, न तुम्हें अपने शौक बदलना पड़ें. जानती हो, तुम दोनों मुझे जान से ज़्यादा अज़ीज़ हो. मैं तुम में से किसी को दुखी नहीं देख सकता कभी भी.”

“जानती हूं. जो अपनों का नहीं हो सकता वह किसी का नहीं हो सकता. अम्मी के लिए तुम्हारे प्यार और इज़्ज़त की वजह से ही मैं यह सब करने को तैयार हुई वरना कभी किसी के लिए नहीं बदलती मैं.”

“तुम्हें बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है. बस, मैं यह चाहता था कि अम्मी का आत्मविश्वास क़ायम रहे. उन्हें तसल्ली रहे कि उन की बहू उन का चुनाव है तो फुज़ूल के डर, वहम और अंदेशे उन के दिल में जगह न बना पाएं, तुम्हें ले कर कोई इनसिक्योरिटी न हो और मेरा घर जंग का मैदान न बने.”

“करनी का दारोमदार नीयत पर होता है. हमारी नीयत उन्हें धोखा देने की नहीं, बल्कि उन का मान रखने की ही थी, इसलिए हर मुश्किल आसान होती चली गई. मानना पड़ेगा यह फेसबुक हमेशा फेकबुक नहीं होती. इसी से हर ऐक्टिविटी की जानकारी मिलती रही मुझे. ख़ासकर उस दिन जब तुम ने अम्मी के आने की इत्तला दी, जल्दीजल्दी तैयारी की. जब वे डोरबेल बजाने में हिचक रही थीं, मुझे डर लगा कि वापस ही न लौट जाएं, इसलिए ख़ुद ही दरवाज़े पर आ गई.”

“ओहो, सासुमां से मिलने की इतनी बेताबी थी.”

“अब फ़ोन रखो, शौपिंग करनी है, सब तुम्हारी अम्मी की पसंद की करूंगी.”

“न, अपनी पसंद की करो. अम्मी यहां कर ही रही हैं तुम्हारे लिए. उन को यक़ीन है कि तुम दोनों की पसंद एकदम मिलती है.”

“मेरी पसंद के लिए जिंदगी पड़ी है. मुझे तुम्हारी, मतलब, हमारी अम्मी की पसंद पर पूरा भरोसा है जिन्होंने अपने ठीकठाक से बेटे के लिए दुनिया की सब से नायाब लड़की का चुनाव किया. उन की पसंद पर कौन शक कर सकता है, भला.”

विंड चाइम्स जैसी खनकती हंसी के साथ फोन कट गया था.

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