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कीड़ों को काबू कर के ज्यादा फल पाएं

तमाम कीड़े किसानों की मेहनत और पूंजी को मिनटों में चट कर जाते हैं.  कीड़ों से बचाव के लिए हर किसान को इन की रोकथाम के तरीके सीखने जरूरी हैं. कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर पेड़ों के पत्तों, तनों और जड़ों को कीड़ों से बचाने के उपाय करने चाहिए. कृषि वैज्ञानिक वेदनारायण सिंह बताते हैं कि कीड़ों से बचाव के थोड़े उपाय कर के किसान अपने फलों के पेड़ों और फलों को बड़ी बरबादी से बचा सकते हैं और अपनी मेहनत का बेहतर मुनाफा पा सकते हैं. आम के पेड़ों को मथुआ कीटों से बचाने के लिए फल तोड़ने के बाद उन की पुरानी शाखाओं को सितंबर से दिसंबर के बीच काट देना चाहिए. 60 ग्राम कार्बेरिल या 30 मिलीलीटर डाइमेथोएट या 45 मिलीलीटर इंडोसल्फान या 15 मिलीलीटर डाइक्लोरोफास को 30 लीटर पानी में मिला कर हर पेड़ पर फूल लगने से पहले छिड़काव करने से इन कीटों से नजात पाई जा सकती है. पहले छिड़काव के 15 दिनों बाद दूसरा और मटर के दाने के बराबर फल आने पर तीसरा छिड़काव करना चाहिए.

मईजून में बगीचे को जोत देने से मिट्टी के भीतर छिपे कीड़े व उन के अंडे धूप की गरमी और पक्षियों के खाने से खत्म हो जाते हैं. जोती गई जमीन में 250 ग्राम मिथाइल  पैराथियान या 1 किलोग्राम नीम की खली हर पेड़ की जड़ के पास की मिट्टी में मिला दें. कीड़ों को पेड़ों पर चढ़ने से रोकने के लिए जड़ से आधा मीटर ऊपर तने पर 10 सेंटीमीटर चौड़ी आस्टीको ग्रीस की पट्टी बना दें. इस से कीड़े चिकनी सतह पर नहीं चढ़ पाते हैं और पेड़ बचा रहता है. लीची के पेड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए बारिश शुरू होने से पहले हर पेड़ की जड़ों के पास 30 सेंटीमीटर चौड़े गड्ढे खोद कर हर गड्ढे में 4 किलोग्राम नीम की खली और 1 किलोग्राम अंडी की खली को मिला कर डाल दें. पत्तियों और टहनियों को कीटों से बचाने के लिए अप्रैल में 10 मिलीलीटर मैलाथियान या 15 मिलीलीटर इंडोसल्फान या 20 ग्राम कार्बेरिल को 10 लीटर पानी में घोल कर हर पेड़ और फलों पर छिड़काव करें. अंतिम छिड़काव के 10-15 दिनों के बाद ही फलों की तोड़ाई करें. लीची माइट कीट जिन पेड़ों के तनों या पत्तियों में लगें तो उन्हें काट कर जला दें. इस से कीड़ों का फैलना बंद हो जाता है.

केले के पेड़ों के तनों में कीड़े लगने पर उन्हें काट कर खेत से हटा दें. केले के पेड़ों के गाभा में कार्बोफ्यूरान नाम की दानेदार दवा के 10-12 दाने डालें. फूल आने पर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मैलाथियान का छिड़काव करने से केले के पेड़ों और फलों को कीड़ों के हमले से बचा सकते हैं.

पपीते के पेड़ों और फलों पर भी कई कीड़ों के हमले होते हैं. माहू इस में लगने वाला मुख्य कीड़ा है, जो पत्तियों के निचले भाग में छेद कर के उन का रस चूस लेता है. यह कई रोगों को फैलाने का भी काम करता है. इस से बचाव के लिए प्रति लीटर पानी में 2 मिलीलीटर डाईमिथोएट घोल कर छिड़काव करना कारगर होता है. चूर्णी फफूंद से बचाव के लिए प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम साल्फैक्स घोल कर छिड़काव किया जाना चाहिए.

खरबूजे की फसल को कुम्हड़ा लाल कीड़े काफी नुकसान पहुंचाते हैं. ये कीड़े पौधों के जमने के फौरन बाद ही लगने लगते हैं, जिस से पौधे सूख जाते हैं. मैलाथियान और कार्बोरिल के पाउडर को 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से राख में मिला कर सुबह के समय पौधों पर डालने से फायदा होता है. इस के अलावा 2 ग्राम कार्बोरिल और 1.5 मिलीलीटर मैलाथियान को 1 लीटर पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतर पर छिड़काव किया जाना चाहिए.

तरबूज की फसल को भी कुम्हड़ा लाल कीड़े ही सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. ये कीड़े जनवरी से ले कर मार्च तक काफी नुकसान पहुंचाते हैं. तरबूज को इन कीड़ों से बचाने के लिए मैलाथियान और कार्बोरिल के पाउडर को 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से राख में मिला कर सुबह के समय पौधों पर डालने से फायदा होता है. इस के अलावा 2 ग्राम कार्बोरिल और 1.5 मिलीलीटर मैलाथियान को 1 लीटर पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतर पर छिड़काव करना चाहिए. इस प्रकार पेड़ों और फलों को कीड़ों से बचा कर किसान अपनी मेहनत का उम्दा फल हासिल कर सकते हैं.

खानेपीने से जुड़ी कुछ खास जानकारियां

इनसान की जिंदगी यों तो तमाम झमेलों से भरी होती है, मगर सुबह से रात तक खाने की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता?है. इनसान की सारी गतिविधियों का मकसद कुछ कमाना और भर पेट खाना होता है. सजनासंवरना और मनोरंजन करना जैसी चीजें खाने के बाद ही आती हैं. भूखे इनसान को पढ़नालिखना, घूमनाफिरना या कुछ भी करना अच्छा नहीं लगता. जब पेट भरा हो तभी खेलकूद जैसी चीजें इनसान को रास आती हैं. इश्क और रोमांस जैसी गतिविधियां भी भरे पेट ही अच्छी लगती?हैं.

खानपान से जुड़ी बातें पत्रिकाओं व अखबारों में छपती ही रहती हैं, मगर यहां पेश?हैं खानपान से संबंधित कुछ खास खबरें :

मशीन सूंध कर बताएगी कि खाना ठीक है या नहीं?: अकसर यह अंदाजा लगाना ठिन होता?है कि कोई खाना खाने लायक है या नहीं. कुछ लोग सूंघ कर कहेंगे कि खाना तो सही लग रही?है, पर वही खाना किसी को खराब महसूस होता है.

अब यह काम मशीनों के जरीए होगा. ये मशीनें सूंघ कर बता देंगी कि खाना खाने लायक है या नहीं. ये मशीनें यह भी बताएंगी कि वातावरण में फैले प्रदूषण का स्तर इनसान के लिए कितना घातक?है.

भारतीय मूल के एक शोधकर्ता के साथ मिल कर कुछ वैज्ञानिकों ने लंदन (इंगलैंड) में एक ऐसा बायो सेंसर तैयार किया है, जो मशीनों को इनसानों की ही तरह अच्छी और खराब महक में फर्क करने की कूवत देता है.

भारतीय वैज्ञानिक के साथ इंगलैंड और इटली के वैज्ञानिकों ने इनसान की नाक को सूंघने की कूवत देने वाले प्रोटीनों से यह बायो सेंसर बनाया है. यह शोध ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में छपा है.

यानी आने वाले वक्त में किसी खाने की अच्छाई या खराबी का वारान्यारा मशीनों द्वारा किया जाएगा.

तलीभुनी चीजें खाने से अल्जाइमर का डर : तलीभुनी करारी व जायकेदार चीजें खाने का शौक ज्यादातर लोगों को होता?है, मगर यह कितना घातक हो सकता?है, इस का अंदाजा लोगों को नहीं होता. न्यूयार्क (अमेरिका) में किए गए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि ज्यादा तलीभुनी चीजें खाने से अल्जाइमर होने का खतरा रहता है.

शोध करने वालों के मुताबिक खाने को तेज आंच पर पकाने से उस में ऐसे तत्त्व आ जाते हैं, जिन के कारण अल्जाइमर के साथसाथ ज्यादा उम्र में होने वाली दूसरी बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है. तलनेभूनने के दौरान अमूमन चीजों को तेज आंच पर ही चढ़ाया जाता?है. तलीभुनी चीजें यकीनन खाने में तो लजीज लगती हैं, पर उन्हें खाने से धीरेधीरे भूलने की बीमारी यानी अल्जाइमर की चपेट में आने का डर बढ़ जाता है. लोगों को इस बात का खयाल रखना चाहिए वरना यादों की कूवत घटने का पूरापूरा खतरा हो सकता है. यह

शोध ‘जर्नल आफ अल्जाइमर डिजीज’ में छापा गया है.

गमलों में लगाएं सेब : खुद की मेहनत से घर के बगीचे या क्यारियों में उगाए गए फल सभी को भाते?हैं. इसी तरह घर की सब्जियां भी स्वादिष्ठ व सेहत के लिए उम्दा होती?हैं. लेकिन जमीन की कमी की वजह से घर के फल या सब्जियां खाना सभी के लिए मुमकिन नहीं हो पाता. ऐसे ही लोगों के लिए सेब की रूट स्टाक सुपर चीफ और शैलेट स्पर प्रजातियां बेहद फायदेमंद हो सकती है.

ये प्रजातियां थोड़ी सी जगह में ही जल्दी उत्पादन देने लगती हैं. इन प्रजातियों के पौधों को गमलों से आराम से लगाया जा सकता है. ऐसे एक पौधे से 30 किलोग्राम तक पैदावार ली जा सकती है.

बागबानी वैज्ञानिकों के मुताबिक जितनी जमीन पर सामान्य प्रजाति के सेब के 250 पौधे लगाए जा सकते?हैं, उतनी ही जगह पर स्पर प्रजाति के 4000 पौधे लगाए जा सकते?हैं. इन्हें 1 से डेढ़ मीटर के फासले पर लगाते?हैं. ये पौधे 3 सालों बाद ही फल देने लगते हैं.

देहरादून के चकराता, कालसी, मसूरी और दूसरे पहाड़ी इलाकों में इस प्रजाति के पौधों को किचन गार्डन के साथसाथ घरों में गमलों में भी लगाया जा सकता है. सेब की ये स्पर प्रजातियां हालैंड की हैं.

बागबानी मिशन के निदेशक बीएस नेगी के मुताबिक फिलहाल पहाड़ों में सेब की स्पर प्रजातियां काफी कम हैं, जबकि उन्हें गमलों में भी लगाया जा सकता है. नेगी के मुताबिक पहाड़ों में 60 फीसदी से?ज्यादा डेलिसियस सेब की प्रजातियां मौजूद हैं.

जापानी तकनीक वाले ठेलों से सुधरेगी चाट?: आमतौर पर चटकारे लेले कर चाट खाना ज्यादातर लोगों को भाता है. यह बात अलग है कि खटाई व मिर्चमसालों से भरपूर ठेलों की चाट सेहत की तो वाट लगा देती है. मगर अब चाटपकौड़ों के ठेलों को सुधारने की मुहिम चालू की गई है.

सरकार के सहयोग से जापानी तकनीक वाले ठेलों को तरजीह देने की योजना तैयार की जा रही?है. योजना की तैयारी फूड व सेफ्टी विभाग की सिफारिश पर की जा रही?है.

जापानी तकनीक वाली ठेली पर साफ पानी, गरम चाट व मच्छरमक्खी रहित माहौल मौजूद होगा. ठेलियों की छतों पर सौर ऊर्जा वाली प्लेटे लगाई जाएंगी. सौर ऊर्जा से मिलने वाली सप्लाई से ठेली का वाटर प्योरीफायर व फूड हीटर चलाए जाएंगे. ये ठेलियां सौर ऊर्जा की रोशनी से जगमगाती रहेंगी. इन ठेलियों की कीमत फिलहाल तय नहीं की गई है.

यकीनन ये जापानी नस्ल की ठेलियां आम ठेलियों के मुकाबले काफी महंगी होंगी, मगर इन का नतीजा भी बेहतरीन होगा. डीओ फूड सेफ्टी विनीत कुमार के मुताबिक इन ठेलियों पर बिकने वाले सामान की बराबर चेकिंग की जाएगी और खयाल रखा जाएगा की चीजें एकदम ताजी व उम्दा हों.

आमतौर पर चाट के शौकीन बहुत बड़ी तादाद में होते?हैं, लिहाजा जापानी तकनीक वाली नई ठेलियों को बढ़ावा दिया जाना जरूरी?है. बिजली की कमी से साधारण ठेली वाले सफाई व ताजगी का बंदोबस्त नहीं कर पाते. सौर ऊर्जा का बंदोबस्त होने से चाट की ठेलियां लाजवाब बन जाएंगी.

कैंसर को पछाड़ेगी चाय की पत्ती से तैयार दवा : कैंसर बीमारी का नाम सुनते ही लोगों की रुह तक कांप जाती हैं. कोई यह सोचना भी पसंद नहीं करता कि उसे कैंसर हो सकता है. मगर दुनिया भर में कैंसर के तमाम मामले सामने आते ही रहते हैं.

एक नई खोज के मुताबिक चाय की बेकार या बची हुई पत्तियों से तैयार की गई खास दवा का इस्तेमाल कर के कैंसर का मुकाबला किया जा सकता है. खराब याददाश्त वाले लोगों के लिए भी चाय की पत्तियां कारगर साबित होती?हैं.

चाय की पत्तियों में कैटेकिनस तत्त्व होता है, जिस में कैंसर व अन्य बीमारियों का मुकाबला करने की खूबी होती है. काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) संस्थान, पालमपुर ने लंबी खोज के बाद पहली दफा भारत में चाय की पत्तियों से कैटेकिनस तत्त्व का फार्मूला तैयार किया है. इस तत्त्व से बनाई जाने वाली दवाओं को मार्केट में लाने के लिए संस्थान ने अपने नायाब फार्मूले को कांगड़ा के पपरोला की एक एक प्राइवेट कंपनी को दिया है. उम्मीद है कि कंपनी जल्द ही इस से दवाएं तैयार कर के मार्केट में लाएगी.

गौरतलब है कि संसार भर में कैटेकिनस की मार्केट 8-9 फीसदी है. जापान व चीन कैटेकिनस के सब से बड़े सप्लायर हैं. करीब 75 फीसदी बाजार पर चीनजापान का कब्जा है. अभी तक दुनिया भर में हर्बल चाय की धूम थी, मगर अब कैटेकिनस की चाय की डिमांड लगातार बढ़ रही है.

काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च संस्थान का मानना है कि

इस से चाय कारोबार को भी बढ़ावा मिलेगा और साधारण चाय उत्पादक भी माली तौर पर पुख्ता होगा.

संस्थान के डायरेक्टर डा. दिनेश कुमार के मुताबिक संस्थान के वैज्ञानिकों ने चाय से कैटेकिनस का ऐसा फार्मूला बनाया है, जो कैंसर व घटिया याददाश्त को दुरुस्त करने में कारगर है.

यकीनन चाय की पत्तियों से कैंसर जैसी बीमारी का मुकाबला करने वाली खोज दुनिया भर के लोगों को फायदा पहुंचाएगी.

सब्जियों के लिए कारगर है शराब : शराब, मदिरा या दारू जैसे नामों से मशहूर

पी जाने वाली चीज देशी हो या विलायती,

सेहत के लिहाज से घातक ही होती है.

शराब के कायल लोग महंगी से महंगी शराब

शान से डकारते हैं, मगर इस से उन की

सेहत का सत्यानाश ही होता है.

मगर सब्जियों के मामले में शराब का किरदार अलग हो जाता?है. देशी दारू के इस्तेमाल से सब्जियों की खेती को बेहद फायदा पहुंचता है. देशी दारू के छिड़काव से सब्जियों के पौधे ताजे, हरेभरे व मजबूत हो जाते?हैं, नतीजतन पैदावार में भी इजाफा हो जाता है.

सब्जियों की खेती में शराब के फायदे की खोज मेरठ के माहिर किसानों द्वारा की गई है. इन किसानों का मानना?है कि शराब का सब्जियों के खेतों में इस्तेमाल, महंगी कीटनाशक दवाओं के मुकाबले काफी सस्ता और बेहद कारगर है.

कृषि वैज्ञानिक भी इस बात को मानते?हैं कि अल्कोहल यानी शराब सब्जियों को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को खत्म कर देती है. चूंकि इस मसले पर कोई शोध नहीं किया गया है, लिहाजा फिलहाल कृषि वैज्ञानिक फसलों पर शराब के छिड़काव की सिफारिश नहीं करते.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माहिर किसान फसलों के मामले में अकसर खोजबीन करते रहते?हैं. यह खोज उसी का नतीजा है. मेरठ के किसानों ने लौकी, तुरई, मिर्च व बैगन सहित तमाम हरी सब्जियों पर देशी शराब का छिड़काव सफलतापूर्वक शुरू कर दिया?है.

दिमाग के लिए कारगर हैं हरी सब्जियां : हरी सब्जियों की महिमा का बखान हमेशा ही किया जाता है. माना जाता है कि पालक जैसी हरी सब्जियां खाने से खून की मात्रा बढ़ती है और हीमोग्लोबिन की कमी भी ठीक हो जाती?है. मगर वाशिंगटन (अमेरिका) में पिछले दिनों की गई खोज के मुताबिक हरी सब्जियों के इस्तेमाल से दिमाग भी तेज हो जाता है.

हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक गोभी व पालक जैसी हरी सब्जियां खाने से दिमाग तंदुरुस्त और युवा हो जाता है. वैज्ञानिकों ने 950 बूढ़े लोगों पर खोजबीन कर के नतीजा निकाला है कि जो लोग सरसों का साग, पालक व गोभी जैसी हरी सब्जियां रोजाना 1 या 2 बार खाते?हैं, उन का दिमाग बहुत तेज होता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक हरी सब्जियां खाने वालों को अल्जाइमर व डिमेंशिया जैसे रोग होने का डर भी नहीं रहता. हरी सब्जियों में पाए जाने वाले विटामिन के, फोलेट व बीटा कैरोटीन दिमाग को दुरुस्त रखने में कारगर रहते हैं.

मांस खाने से गुरदे को खतरा : आमतौर पर मांसाहारी खाना सेहत के लिए मुफीद माना जाता है, मगर हाल में की गई खोजों में इस के नुकसानदायक पहलू भी सामने आए हैं. नई खोजों के मुताबिक खाने में मांस से बनी चीजें ज्यादा मात्रा में होने से किडनी (गुरदा) फेल होने का खतरा बढ़ जाता है. गुरदे के पुराने मरीजों में इस बात का खौफ और ज्यादा होता है.

यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया से जुड़ी तनुश्री बनर्जी और उन के सहयोगियों के मुताबिक इनसान के खाने का सेहत के तमाम पहलुओं के साथसाथ गुरदे के काम पर भी असर पड़ता है. इन लोगों ने नतीजा निकाला कि अम्लीय खाना खाने से किडनी फेल होने का डर 3 गुना बढ़ जाता है.

अमेरिकन सोसाइटी आफ नेफ्रोलाजी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक शोध के दौरान जिन मरीजों ने खाने में मीट के बजाय फल व सब्जियां ज्यादा खाईं, उन्हें किडनी के मामले में बेहतर नतीजे मिले.

हरी मिर्च घटाएगी मोटापा?: यों तो आयुर्वेद में हरी मिर्च को सेहत के लिहाज से अच्छा माना जाता है, मगर अब नए जमाने के वैज्ञानिकों को?भी हरी मिर्च में तमाम खूबियां नजर आने लगी हैं. वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि हरी मिर्च खाने से मोटापा घटाया जा सकता?है.

अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ वेयोनिंग में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डा. भास्कर त्यागराजन ने बायोफिजिकल सोसायटी की बैठक में इस शोध की जानकारी दी. डा. भास्कर के मुताबिक हरी मिर्च में कैप्सेसिन खास तत्त्व के तौर पर पाया जाता है, जो कैलोरी पर रोक लगाए बगैर ऊर्जा को बढ़ावा देता है.

डा. भास्कर के मुताबिक हरी मिर्च मोटापे पर लगाम लगाने के साथसाथ टाइप 2 डायबिटीज, हाई?ब्लडप्रेशर और दिल संबंधी रोगों को दुरुस्त करने में भी कारगर होती है.

आमतौर पर मोटापा ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाने और ऊर्जा के खर्च में असंतुलन की वजह से होता है. हरी मिर्च खाने और ऊर्जा के खर्च में संतुलन बनाती है, नतीजतन मोटापा काबू में रहता है.

स्तनपान सिखाता है ठोस आहार लेना : यह हकीकत तो जगजाहिर है कि नवजात शिशुओं के लिए मां का दूध ही सब से?ज्यादा मुफीद होता?है. फ्रंटियर्स इन सेलुलर एंड इंफेक्शन माइक्रोबायोलाजी में छपे नए अध्ययन के मुताबिक पैदा होने के बाद शुरू में स्तनपान के अलावा दूसरे जरीयों से खुराक लेने वाले बच्चों के मुकाबले महज स्तनपान करने वाले शिशु ठोस आहार खाना जल्दी सीख जाते?हैं. ऐसे बच्चों की सेहत भी अच्छी होती है.

यूनिवर्सिटी आफ नार्थ कैरोलिना के वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरूशुरू में स्तनपान का बच्चे की शारीरिक बनावट पर गहरा असर पड़ता है. मां के दूध में ऐसे नायाब तत्त्व पाए जाते हैं, जो बच्चे के हाजमे को सही करते?हैं. इसी वजह से बच्चे जल्दी ही ठोस आहार खाने लायक हो

जाते?हैं.

बीयर सुधारती है दिमाग : आमतौर पर हलकीफुलकी बीयर को शराब की छोटी बहन मान कर नकार दिया जाता है, मगर सेहत के लिहाज से अगर जरा सी बीयर पी जाए तो इस में बुराई नहीं?है. वैज्ञानिकों के मुताबिक याददाश्त से जुड़ी बीमारियों में बीयर कारगर रहती है.

लांझाउ विश्वविद्यालय (अमेरिका) के शोधकर्ताओं का कहना है कि बीयर में शांथोहुमोल नामक तत्त्व पाया जाता है, जो दिमाग की कोशिकाओं को महफूज रखता?है, नतीजत अल्जाइमर व पार्किंसन जैसी बीमारियां नहीं होने पाती. यानी बीयर पीने से इनसान की याददाश्त चौकस रहती है.

कैंसर से बचाती है ग्रीन टी : ग्रीन टी को सामान्य चाय के मुकाबले हमेशा तरजीह दी जाती है, अलबत्ता आम लोगों को आम चाय का ही ज्यादा चसका होता है.

नई खोजों से खुलासा हुआ?है कि ग्रीन टी पीने से मुंह के कैंसर का खतरा नहीं रहता?है. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने ग्रीन टी में एक ऐसा तत्त्व पाया है, जो मुंह की कैंसर कोशिकाओं को मार सकता है. इस से स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं होता.

कुल मिला कर ग्रीन टी सेहत के लिए बेहद मुफीद होती है, लिहाजा सभी को इस का इस्तेमाल करना चाहिए.                        ठ्ठ

कीड़ों की रोकथाम

तैला या जैसिड : इस के बच्चे व जवान दोनों कीड़े हरे रंग के व छोटे आकार के होते हैं. ये पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से ऊपर की तरफ मुड़ जाती हैं. पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है और बाद में वे सूख जाती हैं.

रोकथाम

* कीटनाशी थायोमिथाक्सोम 25 डब्ल्यूपी 100 जी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 125 मिलीलीटर या डायमेथोएट की 1 लीटर मात्रा का 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : इस मक्खी का प्रकोप बरसात की फसल में ज्यादा होता है. इस के बच्चे और जवान दोनों सफेद रंग के होते हैं. ये कीड़े पत्ती में मोड़क बीमारी फैलाते हैं.

रोकथाम

* पीले रंग के कार्ड खेत में कई जगह लगाएं.

* नीम का तेल 5 फीसदी (5 मिलीलीटर प्रति लीटर) या 5 किलोग्राम नीम की खली प्रति एकड़ डालें.

* इमिडाक्लोप्रिड 05 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से मिला कर 8-10 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें.

फलीबेधक व तनाभेदक कीड़ा : यह कीड़ा फलियों में छेद कर के बीजों को नुकसान पहुंचाता है. फली खाने लायक नहीं रहती है. यह कीड़ा पौधे की आखिरी शिरा में छेद कर देता है, जिस से पौधे का ऊपरी हिस्सा मुरझा जाता है.

रोकथाम

* कीड़ा लगी शाखा व फल को तोड़ कर हटा दें.

* प्रकाश प्रपंच व फिरोमोन जाल की व्यवस्था करें.

* फसल की शुरू से निगरानी रखें. जैसे ही पौधे पर कीड़े का हमला दिखाई दे तो ट्राइकोकार्ड (ट्राइकोग्राम किलोनिस) नामक परजीवी कीट के 1,00,000 अंडे/प्यूपा प्रति हेक्टेयर की दर से 5-6 बार 15 दिनों के अंतर पर फसल पर छोड़ने चाहिए. ज्यादा प्रकोप होने पर कीटनाशक लैम्डा सायहेलोथ्रिन 5 ईसी की 800 मिलीलीटर मात्रा या फेंथोएट 50 ईसी की 1 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें.

जड़ सड़न या डेंपिंग आफ : इस बीमारी में पौधा शुरुआत में ही जमीन के पास से सड़ जाता और गिर कर सूख जाता है. बारिश के मौसम में ज्यादा बुरा असर होता है.

रोकथाम

* बीजों को बोआई से पहले बाविस्टीन या थीरम से उपचारित करें.

* फफूंदनाशक से जमीन को भी उपचारित करना चाहिए.

पीला विषाणु रोग : इस बीमारी में पौधे की पत्तियों की नसें पीली पड़ जाती हैं. बाद में पूरी पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं. यह बीमारी सफेद मक्खी द्वारा फैलाई जाती है.

रोकथाम

* खेत के पास लगे बीमार पौधों को उखाड़ कर दबा दें. * सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए मेलाथियान 50 ईसी की 1.5 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिला कर 800 लीटर घोल का प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें. * इमिडाक्लोप्रिड 05 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. * रोग के लक्षण दिखते ही फौरन दवा का छिड़काव करें व बीमार पौधों को खेत से निकाल कर जला दें या कहीं दबा दें.

भिंडी की उन्नत खेती से ज्यादा उत्पादन

घरघर में पसंद की जाने वाली भिंडी भारत में उगाई जाने वाली खास फसल है. इसे देश में साल भर उगाया जाता है. भिंडी को वैसे तो सब्जी की तरह इस्तेमाल में लाया जाता है, लेकिन भिंडी के पौधे का गुड़ बनाने के कारोबार में भी इस्तेमाल किया जाता है. भिंडी की फली से प्रोटीन, कैल्शियम व कई खनिज लवण मिलते हैं. भिंडी को काफी बड़ी मात्रा में विदेशों में भेजा जाता है. भिंडी खासतौर से बीमार लोगों के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है, लेकिन इस के दूसरे भागों जैसे तना वगैरह को कारोबारी तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है.

आबोहवा : भिंडी के बीज जमाव के लिए सही तापमान 17 से 22 डिगरी सेल्सियस है. पौधे की सही बढ़वार के लिए 25-35 डिगरी सेल्सियस तक तापमान सही माना जाता है. भिंडी की फसल सूखा व पाला सहन नहीं कर सकती है. तापमान 42 डिगरी सेल्सियस से ऊपर बढ़ने पर इस के फूलों का झड़ना शुरू हो जाता है. भिंडी की बढ़वार के लिए सूरज की रोशनी व गरम दिनों का होना जरूरी है.

उन्नतशील किस्में : पूसा ए 4 प्रभनी क्रांति, आजाद क्रांति वर्षा उपहार, अर्का अनामिका, पंजाब 7, अर्का अभय, हिसार उन्नत.

संकर किस्में : डीवीआर 1, डीवीआर 2, डीवीआर 3.

मिट्टी : मिट्टी में खाद की मात्रा भरपूर होनी चाहिए. खेत से पानी निकलने का सही इंतजाम होना चाहिए. हलकी जमीन भिंडी की खेती के लिए सही मानी जाती है. जमीन का पीएच मान 6-7 के बीच होना चाहिए.

जमीन की तैयारी : भिंडी की जड़ गहरी होने के कारण जमीन की 25-30 सेंटीमीटर गहरी जुताई करनी चाहिए. खेत तैयार करने के लिए 2-3 बार जुताई करें. इस के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल कर लेना चाहिए.

बोआई का समय : गरमी के मौसम में फरवरी से मार्च तक बोआई का सही समय होता है. बरसात के मौसम (खरीफ) में जून से जुलाई तक बोआई के लिए सही समय माना जाता है.

बीज की मात्रा : गरमी की फसल में 18-20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और बारिश के मौसम में 10-12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

अंतराल : गरमी की फसल में लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखें. बरसात की फसल में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखें.

बोआई का तरीका : भिंडी की मेंड़ के दोनों ओर बराबर से बोआई की जाती है. मेंड़ पर बोआई करने से गरमी में सिंचाई में कम पानी लगता है व बरसात में पानी का जमाव नहीं होता है. एकसाथ 2 बीज बोना फायदेमंद होता है ताकि पौधों की तादाद सही रह सके. बीजों को बोने से पहले 12 घंटे तक पानी में भिगोने से अंकुरण जल्दी हो जाता है. बोआई से पहले 2 ग्राम बावस्टीन प्रति किलोग्राम बीज में मिला कर बीजों का उपचार करें. बोआई के समय खेत में नमी होना बहुत जरूरी है.

खरपतवार की रोकथाम : बरसात की फसल में खरपतवार की समस्या ज्यादा होती है. पहली निराई बोआई के 20-25 दिनों बाद करें. फिर 15 दिनों के अंतर पर निराई करते रहना चाहिए. बोआई के बाद व जमाव से पहले स्टांप 30 ईसी का 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से 4-5 हफ्ते तक खरपतवार काबू किए जा सकते हैं.

खाद व उर्वरक : खेत की तैयारी के समय 150 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद खेत में मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन 50 किलोग्राम  (108 किलोग्राम यूरिया), फास्फोरस 50 किलोग्राम (312 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) और पोटाश 50 किलोग्राम (83 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश) आखिरी जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए. 50 किलोग्राम नाइट्रोजन (108 किलोग्राम यूरिया) बोआई के 4 हफ्ते बाद खड़ी फसल में डालें. यदि फसल की बढ़वार ठीक न हो तो 1 फीसदी यूरिया (10 ग्राम प्रति लीटर पानी में) के 2-3 छिड़काव पैदावार बढ़ाने में मदद करते हैं. जब फूल आने लगें तो नाइट्रोजन की 50 किलोग्राम (108 किलोग्राम यूरिया) मात्रा कतारों में देनी चाहिए. मिट्टी के नमूने की जांच करने के बाद पता चल जाता है कि इस में कौनकौन से जरूरी तत्त्व मिलाए जाएं.

सिंचाई : पहली सिंचाई अंकुरण के बाद पहली पत्ती निकलने के बाद करनी चाहिए, वरना बीज सड़ सकता है. भिंडी में मेंड़ों के बीच मेंड़ के आधे भाग से ज्यादा ऊंचाई पर पानी नहीं देना चाहिए. फल बनने के समय सही नमी बनी रहना जरूरी है, नहीं तो फलों में पकने से पहले ही रेशा बन जाता है, जिस से भिंडी की गुणवत्ता कम हो जाती है. बरसात में ज्यादा से ज्यादा पानी निकलने की व्यवस्था होनी चाहिए. गरमी के दिनों में 4-5 दिनों के अंतर पर हलकी सिंचाई करना चाहिए.

तोड़ाई : भिंडी की फलियों को फूल खिलने के 3-4 दिनों बाद हर तीसरे दिन तोड़ते रहें. भिंडी की नसों में रेशा पड़ने से पहले तोड़ाई जरूर कर लेनी चाहिए. अगेती तोड़ाई में पैदावार भी कम होती है और फली की तोड़ाई के बाद वह जल्दी सड़ने लगती है. भिंडी की तोड़ाई हाथों पर दस्ताने पहन कर करनी चाहिए और तोड़ी गई भिंडी को कपड़े के थैले में रखना चाहिए, इस से हाथों को होने वाली खुजली से बचाया जा सकता है. फलियों की तोड़ाई सुबह या शाम को करनी चाहिए.

तोड़ाई के बाद रखरखाव : भिंडी की फलियों की तोड़ाई उन की नर्म अवस्था में कर के छाया में रखें. फलियों की तोड़ाई हर तीसरे दिन करते रहें. अगर बाजार दूर है तो पकने से पहले फली की तोड़ाई करनी चाहिए. तोड़ाई के बाद भिंडी को खरोंच से बचाने के लिए उसे अच्छी तरह से पैक करना चाहिए. तोड़ाई के बाद भिंडी को ठंडी जगह पर रखने से फलियां ज्यादा दिनों तक ताजी बनी रहती हैं.

उपज : गरमी की फसल से 90 से 100 क्विंटल और बरसात की फसल से 150-170 क्विंटल प्रति हेक्टेयर भिंडी की उपज हासिल होती है.

 

– डा. ऋषिपाल व डा. राजेंद्र सिंह

ओ के जानू : घिसी पिटी व दोहराव वाली कहानी

मणि रत्नम निर्देशित तमिल फिल्म‘ ‘ओ कदल कंमनी’’ की हिंदी रीमेक फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ एक रोमांटिक फिल्म है. पर तमिल फिल्म के मुकाबले हिंदी फिल्म कहीं नहीं ठहरती.

फिल्म की कहानी शुरू होती है मुंबई से. जहारं गोपी श्रीवास्तव (नसिरूद्दीन शाह) और चारूलता (लीला सैम्सन) के मकान में आदित्य (आदित्य रॉय कपूर) किराएदार है.

गोपी अपनी अल्जमाइजर से पीड़ित पत्नी चारूलता की सेवा करते रहते हैं. 25 वर्षीय आदित्य गुंजन लखनऊ से आया हुआ वीडियो गेम डिजायनर है. मुंबई में वीडियो गेम्स की कंपनी में नौकरी कर रहा है. उसके सपने बहुत बड़े हैं. वह अमेरिका जाना चाहता है. उसे वीडियो गेम्स में नाम व पैसे कमाने हैं. अमेरिका जाने में अभी छह माह  का समय है. तो वह मुंबई शहर को देख व समझ रहा है. मौज मस्ती कर रहा है. दोस्तों के साथ घूम रहा है. वह रिश्तों में ज्यादा उलझना नहीं चाहता. एक दिन एक मित्र जेनी की शादी में उसकी मुलाकात हाल ही में कालेज से आर्किटेक्ट की पढ़ाई पूरी कर निकली तारा (श्रद्धा कपूर) नामक अति महत्वाकांक्षी लड़की से होती है.

तारा का सपना पेरिस जाकर आर्किटेक्ट की उच्च शिक्षा हासिल करना है. वह पूरी तरह से करियर ओरिएंटेड है. उसका सारा ध्यान अपने करियर पर है. तारा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे उसको लेकर क्या कह रहे हैं? वह हमेशा अपनी मनमर्जी का काम करती है.

बहरहाल, आदित्य व तारा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और फिर एक दिन आदित्य व तारा जाकर गोपी से बात करते हैं और अंत में दोनों एक साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगते हैं. दोनों कहते हैं कि उन्हे शादी नहीं करनी है. मगर जब दोनों को अपने करियर के लिए मुंबई से अमेरिका व पेरिस निकलने में दस दिन का समय बचता है, तो आदित्य व तारा दोनों एक दूसरे से अपने दिल की बात कह बैठते हैं.

नसिरूद्दीन शाह, लीला सैम्सन, आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर के अच्छे अभिनय के बावजूद निर्देशक शाद अली की कमजोरी के चलते यह फिल्म दर्शकों को बांधकर नहीं रख पाती. यहां तक कि संगीतकार ए आर रहमान का संगीत भी दर्शकों को बांध नहीं पाता. फिल्म में नकली मिठास वाली प्रेम कहानी नजर आती है. अफसोस की बात है कि मणि रत्नम लिखित पटकथा को परदे पर उतारने में शाद अली बुरी तरह से असफल रहे हैं. करियर, प्यार व शादी में से किसे चुने जैसा एक अति सामायिक विषय को परदे पर ठीक से उभर ही नही पाया.

लेखक ने फिल्म में बुजुर्ग दंपति गोपी श्रीवास्तव व चारूलता की अतीत की जिंदगी को रेखांकित कर यह दिखाने का प्रयास नहीं किया कि इनके बीच पर कैसे प्यार पल्लवित हुआ और आज भी इनकी जिंदगी में प्यार की महक बरकरार है. गुलजार के संवाद व गीत भी प्रभावित नही करते.

इस फिल्म में आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर के बीच ‘आशिकी 2’ जैसी आन स्क्रीन केमिस्ट्री का भी अभाव नजर आता है. जबकि दोनों ने अपनी तरफ से बेहतरीन परफार्मेंस दी है. यहां कमजोर पटकथा व निर्देशकीय कमजोरी उभरती है. दिल के जिस अहसास को तीन चार दृश्यों में बयां किया जा सकता था, उसके लिए निर्देशक ने आधी फिल्म खत्म कर दी. फिल्म काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है. कथानक के स्तर पर वही दोहराव है. फिल्म का अंत पहले से ही लोगों को पता रहता है. फिल्म में इमोशन का घोर अभाव है. फिल्म  के अंत में  थोड़ा बहुत इमोशन संभाला गया है. पर फिल्म कुल मिलाकर मनोरंजन करने की बजाय बोर ही करती है.

दो घंटे 15 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ओ के जानू’’ का निर्माण मणि रत्नम, करण जोहर, अपूर्वा मेहता, हीरु यश जोहर ने ‘मद्रास टॉकीज’ व ‘धर्मा प्रोडक्शन’ के बैनर तले किया है. निर्देशक शाद अली, कथा व पटकथा लेखक मणि रत्नम, संवाद लेखक व गीतकार गुलजार, संगीतकार ए आर रहमान, कैमरामैन रवि के चंद्रन तथा फिल्म के कलाकार हैं- आदित्य रॉय कपूर, श्रद्धा कपूर, लीला सैम्सन, नसिरूद्दीन शाह, करण नाथ व अन्य.    

अब पत्रकारिता भी सिखायेगा फेसबुक

पूरी दुनिया में कनेक्टिविटी रेवल्युशन लाने वाला फेसबुक अब दुनिया को पत्रकारिता के गुर भी सिखायेगा. दुनिया में सूचनाओं के सबसे बड़े स्त्रोत के रूप में फेसबुक लगातार अपनी भूमिका बढ़ा रहा है. विश्व की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ने फेसबुक जर्नलिज्म प्रोजेक्ट का एलान किया है. इस पहल का उद्देश्य फेसबुक और न्यूज इंडस्ट्री के बीच मजबूत रिश्ते कायम करना है.

फेसबुक के उत्पाद निदेशक फिडजी सिमो प्रेस रिलीज जारी करते हुए दुनिया को बताया, ‘हम जानते हैं कि समुदाय के मूल्यों को साझा करना और विचारों व खबरों पर चर्चा करना हमारी सर्विस का एक हिस्सा है. हम चाहते हैं कि एक हेल्दी न्यूज इकोसिस्टम और जर्नलिज्म तैयार हो.’

प्रोडक्ट तैयार करने में न्यूज ऑर्गनाईजेशन फेसबुक की सहायता करेंगे. फेसबुक इस पार्टनरशिप के जरिए ज्यादा से ज्यादा यूजर्स से जुड़ना चाहता है. द वॉशिंगटन पोस्ट और वोक्स मीडिया समेत अन्य पब्लिशर की साझेदारी में यह प्रोजेक्ट आने वाले हफ्तों में शुरू हो जाएगा.

फेसबुक जर्नलिज्म प्रोजेक्ट तीन फीचर्स पर आधारित है. पहला, कंपनी नए फीचर्स तैयार कर रही है जिससे पब्लिशर्स अपनी स्टोरी और बिजनेस को फेसबुक के प्लेटफॉर्म के जरिए बेहतर तरीके से पब्लिश और प्रमोट कर पाएं.

दूसरा, फेसबुक एक नया टूल बना रहा है जिससे पत्रकारों को अपनी रिपोर्टिंग के लिए सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल करने में सहायता हो. इसके साथ ही फेसबुक पत्रकारों को ट्रेनिंग देगा कि वह किस तरह फेसबुक का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं.

तीसरा, कंपनी नकली या फर्जी खबरों पर नियंत्रण की तैयारी कर रहा है और अपने यूजर्स को सिखाएगा कि किन खबरों पर विश्वास किया जा सकता है.

ऐसी योजना से भ्रामिक खबरों, अफ्वाहों पर रोक लगाई जा सकेगी. गलत खबरों के प्रचार के लिए फेसबुक का इस्तेमाल किया जाता है. पिछले कुछ वर्षों में फेसबुक द्वारा हिंसा फैलाए जाने की बहुत सी घटनायें सामने आई हैं.

अब अपने स्मार्टफोन को बनाएं सीसीटीवी कैमरा

आप अपने घर में सीसीटीवी कैमरा लगाना चाहते हैं लेकिन एक्स्ट्रा पैसे खर्च नहीं करना चाहते? तो चिंता की कोई बात नहीं. हम आपको बता रहे हैं एंड्रॉयड स्मार्टफोन से सीसीटीवी कैमरा बनाने की ट्रिक, जिससे आप कहीं भी रह कर अपने घर ऑफिस या बच्चों पर निगरानी रख सकते हैं.

सबसे पहले करें ये काम

स्मार्टफोन को सीसीटीवी कैमरा बनाने के लिए आपके पास 2 एंड्रॉयड स्मार्टफोन होने चाहिए.

दोनों फोन में होम सीक्योरिटी कैमरा एलफ्रेड (Home Security Camera-Alfred)  एप डाउनलोड करें.

दोनों फोन में इंटरनेट एक्सेस होना जरूरी है.

ऐसे बनाएं अपने स्मार्टफोन को बनाएं सीसीटीवी कैमरा

1. दोनों स्मार्टफोन्स में होम सीक्योरिटी कैमरा एलफ्रेड (Home Security Camera-Alfred)  एप को डाउनलोड कर इंस्टॉल करें.

2. इंस्टॉल हो जाने के बाद स्क्रीन को राइट में स्क्रॉल करके स्टार्ट बटन पर क्लिक करें.

3. स्टार्ट होने के लिए ये आप से कुछ डिटेल्स मांगेगा. जैसे कि आपकी ई-मेल आईडी. डिटेल्स फिल करके आपको रिकॉर्डिंग स्टार्ट करनी है. दोनों फोन (कैमरा और रिसीवर) में आपको एक ही ई-मेल आईडी से लॉगइन करना है.

4. इसके बाद आपको सिलेक्ट करना होगा कि दोनों में से किस डिवाइस को आप सीसीटीवी कैमरा के तौर पर और किस डिवाइस को रिसीवर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं.

5. अब आपको कैमरा और रिसीवर दोनों स्मार्टफोन में फुटेज दिखाई देंगे. ये दोनों डिवाइसेस 2 अलग नेटवर्क से कनेक्टेड होते हैं. ऐसे में आप कहीं भी रह कर अपने घर, ऑफिस या बच्चों पर निगरानी रख सकते हैं.

6. बारी आती है फोन के प्लेसिंग की. आप इसे पेन स्टैंड में, टंगी हुई जींस की पॉकेट में या फिर जहां आप प्लेस करना चाहें कर सकते हैं.

मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. मझे बताइए उसे किस प्रकार आई लव यू बोलूं.

सवाल

मैं 17 साल का लड़का हूं और एक लड़की से प्यार करता हूं. मैं ने उसे आई लव यू कहा तो उस ने ना कर दी, लेकिन वह अब भी मेरे साथ बातचीत करती है. मैं उसे एक बार फिर से आई लव यू कहना चाहता हूं, तो बताइए उसे किस प्रकार आई लव यू बोलूं?

जवाब

पहले तो यह समझ लीजिए कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है, जो आप को उस से हो गया है लेकिन उसे आप से नहीं. आप के पत्र से लगता है कि वह आप की फ्रैंडशिप में तो है, लेकिन आप से प्यार नहीं करती. इस तरह आप का प्यार एकतरफा है. ऐसे में आई लव यू कहने से बात बनने वाली नहीं. उस के दिल में उतरना होगा आप को. उस की पसंदीदा हर बात कीजिए, फिर शायद उधर से ही आई लव यू कह दिया जाए, लेकिन जल्दबाजी न कीजिए. उस की भावनाओं का सम्मान करते हुए उचित मौका देख कर प्यार से एक बार फिर इश्क का इजहार कर दीजिए. यदि वह आंखें नीची कर मुसकरा दे तो प्यार का इकरार समझ लीजिए. हां, जोरजबरदस्ती कभी न कीजिएगा वरना दोस्ती से भी हाथ धो बैठेंगे.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

हाईटेक है टीम इंडिया की नई जर्सी

वनडे मैचों के लिए टीम इंडिया की नई किट लॉन्च कर दी गई है. इस नई किट को नाइकी ने 'सेल्फ बिलीफ' स्लोगन के साथ लॉन्च किया. पुरुष और महिला टीमों के लिए स्टाइलिश जर्सी कई नए फीचर्स से लैस है.

15 जनवरी से शुरू हो रहे भारत-इंग्लैंड सीरीज में अब भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी हाई टेक्नोलॉजी फीचर से लैस नई जर्सी में खेलते नजर आएंगे.

15 जनवरी नई जर्सी में नजर आएगी टीम इंडिया

पुरुष क्रिकेट टीम नई जर्सी में 15 जनवरी को इंग्लैंड के खिलाफ पुणे में पहला वनडे मैच खेलने उतरेगी.

जर्सी की विशेषताएं

नई जर्सी में 4डी क्विकनेस टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया है. यह फीचर प्लेयर को क्विकनेस के लिए मल्टी डायरेक्शनल और मल्टी डाइमेन्शनल स्ट्रेच फैसिलिटी देता है. यह टेक्नोलॉजी खिलाड़ियों को किसी भी दिशा में खिंचाव में मदद करती है.

इसमें ‘जीरो डिस्ट्रेक्शन’ की भी विशेषता रहेगी. खिलाड़ियों के तापमान को भी नियंत्रित करती है उन्हें ठंडा रखती है. इस जर्सी में बॉडी टेम्प्रेचर को बनाए रखने और उन्हें कूल रखने के लिए ट्यून्ड ब्रीथेबिलिटी भी दी गई है.

नाइकी ने लॉन्च किया किट

नई जर्सी को नाइकी ने डिजाइन और लॉन्च किया है. नाइकी 12 साल से क्रिकेट टीम की ऑफिशियल किट पार्टनर है. नई जर्सी को डिजाइन करने से पहले कंपनी के ऑफिशियल्स ने क्रिकेटर्स से बात की थी. कंपनी ने प्लेयर्स की डिमांड्स को समझा. एमएस धोनी भी अच्छी परफॉर्मेंस के लिए अच्छी किट की जरूरत पर जोर दे चुके हैं.

सावधान! बाउंस हो सकता है आपका भी चेक

नोटबंदी के बाद से ही चेक का प्रयोग पहले से बढ़ गया है. इससे पहले हमारे देश में लोग चेक का प्रयोग कम ही करते थे. अब जब चेक से लेन-देन बढ़ रहा है तो आपको चेक बाउंस होने के बारे में भी पता होना चाहिए. चेक बाउंस होना एक आम समस्या बनती जा रही है. अब तो चेक बाउंस होने पर कड़ी सजा का व्यवधान है.

अगर आपको लगता है कि चेक बाउंस होने का कारण अकाउंट में बैलेंस न होना है तो ऐसा नहीं है. चेक बाउंस होने के कई कारण हैं.

ये हैं चेक बाउंस होने के कारण

1. बैलेंस हो कम

अगर आपके अकाउंट में चेक पर लिखी राशि से कम बैलेंस है, तो आपका चेक बाउंस हो जाएगा. अकाउंट में राशि शून्य होने पर ही चेक बाउंस हो, ये जरूरी नहीं है.

2. जब फ्रीज हो जाए अकाउंट

अगर आपका अकाउंट किसी कारण से फ्रीज हो जाए तब भी आपका चेक बाउंस हो सकता है. अकाउंट फ्रीज होने के कई कारण हो सकते हैं. फ्रीज अकाउंट में पैसे होने पर भी चेक बाउंस हो जाएगा.

3. हस्ताक्षर

बैंक हमारे हस्ताक्षर की एक प्रति अपने पास सेव करके रखता है. अगर आपने किसी के नाम पर चेक इश्यू किया है, पर उस पर बैंक में मौजूद प्रति जैसे दस्तखत नहीं किए है, तो भी आपका चेक बाउंस हो जाएगा.

4. पुराने चेक लगाने पर

किसी भी मल्टीसिटी चैक की वैलिडीटी 3 महीने की होती है. अगर आपने 3 महीने पुरानी चेक बैंक में जमा की है, तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है.

5. चेक में नाम या तारीख बदलना

मान लीजिए आपने किसी के नाम पर चेक इश्यू करना है, पर गलती से आपने उस व्यक्ति का नाम गलत लिख दिया या फिर कोई गलत तारीख लिख दे दी. तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है. अगर आपने अमाउंट में भी कोई बदलाव किए हैं, तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है.

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