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भारतीय टीम का नया सुलतान

पहली फिफ्टी, पहला शतक, पहला दोहरा शतक और फिर पहला तिहरा शतक वह भी एक ही पारी में. ऐसा कमाल कर दिखाया है कर्नाटक के 25 वर्षीय भारतीय क्रिकेट टीम के बल्लेबाज करुण कलाधरन नायर ने. इसी के साथ चेन्नई के चेपक स्टेडियम में 5वें और अंतिम टैस्ट मैच में भारत ने इंगलैंड को पारी और 75 रन से करारी शिकस्त दे कर 5 टैस्ट मैचों की शृंखला 4-0 से जीत ली. करुण तिहरा शतक लगाने वाले दूसरे भारतीय बन गए.

भारतीय क्रिकेट में समयसमय पर कई युवा खिलाडि़यों ने कमाल किया है. करुण की इस लंबी व शानदार पारी का क्रिकेटप्रेमी कई सालों से इंतजार कर रहे थे. इस से पहले वीरेंद्र सहवाग ने यह कमाल किया था. करुण ने वैस्टइंडीज के महान बल्लेबाज सर गैरी सोबर्स और बौब सिंपसन के रिकौर्ड की भी बराबरी की जिन्होंने अपनी पहली शतकीय पारियों में तिहरे शतक बनाए थे.

काफी समय से टीम इंडिया में एक सहवाग को तलाशा जा रहा था. करुण की इस पारी से लगता है कि भारतीय टीम को नया सुलतान मिल गया है. तिहरे शतक की पारी से नायर ने कई रिकौर्ड्स ध्वस्त किए. इंगलैंड के खिलाफ खेलते हुए उन्होंने जैसे ही 215 रन बनाए तो वे 5वें नंबर पर आ कर इतने रन बनाने वाले पहले भारतीय बन गए. इस से पहले भारतीय बल्लेबाज वीवीएस लक्ष्मण का नाम था. इसी कड़ी में जब नायर ने 282 रन बनाए तो मार्च 2001 में लक्ष्मण के बनाए 281 रन का रिकौर्ड टूट गया. नायर पहली  टैस्ट सैंचुरी को डबल सैंचुरी में बदलने वाले तीसरे खिलाड़ी बने.

करुण ने जिस तरह मेहनत, लगन, समर्पण और जज्बे का परिचय दिया है उस से न सिर्फ उम्मीदें बंधती हैं बल्कि नई पीढ़ी के युवा खिलाडि़यों का उत्साह भी बढ़ता है.

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. गांवकसबे में ऐसे कई करुण मिल जाएंगे लेकिन जरूरत है उन्हें अवसर देने व खोज करने की. ऐसी प्रतिभाओं को खोज कर यदि उन्हें सही प्रशिक्षण देने के साथसाथ उन्हें अवसर दिया जाए तो भारतीय टीम को अच्छे खिलाड़ी मिल सकते हैं. पर समस्या यही है कि खिलाडि़यों को रणजी तक पहुंचने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह सिर्फ खिलाड़ी ही बता सकते हैं. कई ऐसे भी खिलाड़ी हैं जो रणजी तक भी नहीं पहुंच पाते और थकहार कर खेल को अलविदा कह देते हैं क्योंकि दौलत व शोहरत दिलाने वाले इस खेल में सब को मौका मिलना आसान नहीं है.

नशा करे नाश

प्रसिद्व साहित्यकार हरिवंशराय बच्चन के काव्यसंग्रह मधुशाला में मदिरा सेवन का खूबसूरती से महिमामंडन किया गया है. मदिरा के अतिरिक्त चरस, गांजा, स्मैक, अफीम, हीरोइन जैसे अनेक ऐसे नशीले पदार्थ हैं जिन से मनुष्य अपनी नशे की लत को पूर्ण करता है. अपनी मौजमस्ती और यारीदोस्ती निभाने के लिए किए गए किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ के जहर का सेवन न जाने कितने परिवारों की सुखशांति को छीन लेता है और कितने ही घर बरबाद कर देता है. मदिरा का सेवन तो आजकल स्टेटस सिंबल माना जाता है. कभीकभार किया जाने वाला नशा जब लत में परिवर्तित हो जाता है तो नशा करने वाले का शरीर अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है. इस से वह स्वयं तो परेशान रहता ही है, उस के घरपरिवार वालों को भी अनेक आर्थिक व मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

इंदौर का राहुल दवे पिछले 5 सालों से स्मैक पी रहा है. उस का शरीर स्मैक का इतना आदी हो गया है कि अगर उसे स्मैक की डोज नहीं मिले तो उस के हाथपैर कांपने लगते हैं. और उसे लगता है कि जान ही निकल जाएगी. उस के परिवार में 10 साल का बेटा और 4 साल की बेटी के अलावा पत्नी, मातापिता और एक भाई हैं. परिवार वाले पिछले कई सालों में न जाने कितने मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारे गए कि किसी प्रकार राहुल की नशे की लत छूट जाए पर इन जगहों पर क्या किसी को कोई लाभ हुआ है? झाड़फूंक करने वालों और गंडेताबीज बनाने वालों की शरण में भी गए पर ये तमाम अंधविश्वासी टोटके नाकाम साबित हुए.

कालू सिंह 20 साल से गांजे का सेवन कर रहे थे. घर वाले परेशान रहते थे परंतु उन की लत के आगे बेबस थे. प्रारंभ में उन की पत्नी उन्हें हर रोज एक महाराज के सत्संग में ले जाती थी क्योंकि महाराजजी ने उन की नशे की लत छुड़ाने की गारंटी ली थी. उन्होंने कहा था कि प्रतिदिन सत्संग में लाने से उन की नशे की लत भगवान भक्ति में लग जाएगी. सुबह पत्नी उन्हें जबरदस्ती सत्संग में ले जाती और शाम को वे नशे में धुत हो कर पत्नी को ही गाली देते और घर से निकल जाते. पड़ोसी उन्हें किसी तरह घर ले कर आते. अंत में पत्नी ने हार मान कर उन्हें उन के हाल पर छोड़ दिया.

रमेश त्यागी बहुत अच्छे घर से हैं. घर में कोई भी नशा नहीं करता. प्रारंभ में दोस्त जबरदस्ती उन्हें पिलाते थे पर धीरेधीरे उन्हें भी मजा आने लगा. फिर तो यह स्थिति हो गई कि जिस दिन उन्हें शराब नहीं मिलती थी, न भूख लगती थी न प्यास. बस, एक शराब ही थी जो उन्हें संतुष्टि देती थी. मातापिता बहुत परेशान रहते थे, घर में कलह होता था, और एक दिन गुस्से में आ कर उन के पिता ने उन्हें घर से ही निकाल दिया. उन की मां ने शराब की लत छुड़ाने के लिए कई उपवास किए. घर में हवन, कथा करवाई. पर नतीजा सिफर.

नशा मुक्ति केंद्र : उपरोक्त सभी नशा करने वाले लोग उज्जैन के नशा मुक्ति केंद्र में भरती हैं. जब एक नशा करने वाला इस अवस्था में पहुंच जाता है कि नशे के बिना वह रह नहीं पाता तो ऐसी अवस्था में फंसे लोगों की लत छुड़ाने के लिए सरकार ने नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना की है. इन आवासीय नशा मुक्ति केंद्रो में विभिन्न प्रकार के नशा करने वालों को काउंसलिंग, डाक्टरी सहायता और मनोरंजन द्वारा ठीक करने का प्रयास किया जाता है. यहां मरीज या तो स्वयं आते हैं अथवा मित्र या परिवार वाले ले कर आते हैं. लगभग 15 से 20 दिनों के उपचार के बाद यहां से मरीजों को छुट्टी दे दी जाती है.

मरीज की यातनाएं : नशा मुक्ति केंद्र में मरीज आता तो अपनी या परिवार वालों की मरजी से है परंतु यहां रह कर उसे कम तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ता है.

–       यहां पर सब से बड़ी कमी उसे परिवार की खलती है. परिवार के साथ न होने से मनोबल कमजोर हो जाता है और कई बार वह स्वयं को इस संसार में एकाकी महसूस करने लगता है.

–       नशे के आदी हो चुके शरीर को जब उस की डोज नहीं मिलती तो मरीज को मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की परेशानी होनी प्रारंभ हो जाती है. परिवार के साथ न होने से उतनी अच्छी देखभाल भी नहीं हो पाती.

–       जब नशे की लत को छुड़ाने की दवा दी जाती है तो शरीर पर उस का प्रतिरोधी असर होता है और उन्हें उलटी, दस्त, बुखार व डिप्रैशन जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस से शरीर बहुत कमजोर हो जाता है.

–       अकसर नशेड़ी बाहरी लोगों से बातचीत करने में कतराते हैं क्योंकि नशा इन का आत्मविश्वास समाप्त कर देता है.

–       मनचाहे भोजन, पारिवारिक वातावरण का अभाव, आर्थिक परेशानी और यहां की तयशुदा दिनचर्या से चलना कई बार उन के लिए बहुत बड़ी परेशानी का कारण बन जाता है.

–       कोई काम न होने से मन नहीं लगता और वे बड़ी कठिनता से यहां समय व्यतीत कर पाते हैं.

परिवार की यातनाएं : नशा करने वाले का परिवार पूरी तरह निर्दोष होता है परंतु बीमार के साथसाथ परिवारजन भी अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करते हैं. अपने दिल पर पत्थर रख कर वे अपने परिवार के सदस्य को यहां छोड़ कर जाते हैं. क्योंकि यहां सिर्फ मरीज के रहने की ही व्यवस्था होती है. दूर से प्रतिदिन मिलने आना संभव नहीं होता. ऐसे में दिन में कई बार फोन द्वारा वे अपने रिश्तेदार का हालचाल लेते रहते हैं. कईर् घरों के तो मुखिया ही नशे के शिकार होते हैं, ऐसे में घर वालों के सामने रोजीरोटी का ही प्रश्न खड़ा हो जाता है.

–       एक व्यक्ति जब नशा कर के आता है तो घर में कलह करता है. कई बार तो पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट भी करता है. जिस से छोटे बच्चे सहम जाते हैं और उन के मन में पिता के प्रति सम्मान ही समाप्त हो जाता है.

–       मेरी एक सहेली के पति को शराब की लत है. जब उन की बेटी की 12वीं की बोर्ड परीक्षा हो रही थी, उन्होंने घर में आ कर सहेली के साथ मारपीट की. देररात तक दोनों में कहासुनी होती रही. फलस्वरूप, बेटी अगले दिन की परीक्षा की तैयारी नहीं कर पाई. उस विषय में उस के बहुत कम अंक आने से परीक्षा परिणाम खराब हो गया.

–       कई बार पिता का अनुसरण कर के बच्चे भी नशा करना प्रारंभ कर देते हैं. जिस से उन का पूरा जीवन बरबाद हो जाता है.

–       बच्चों के दोस्त उन के पिता के नशे को ले कर मजाक उड़ाते हैं जिस से उन का बालमन आहत हो जाता है. वे तनाव के शिकार हो जाते हैं.

आर्थिक संकट : नशे की लत जब एक बार शरीर को लग जाती है तो उसे किसी भी कीमत पर नशे की डोज की आवश्यकता होती है. एक नशा मुक्ति केंद्र के प्रभारी राजेश ठाकुर बताते हैं कि यों तो सभी प्रकार के नशे खर्चीले होते हैं परंतु स्मैक का नशा सर्वाधिक खतरनाक और खर्चीला होता है. 10 ग्राम स्मैक की पुडि़या 200 रुपए में आती है और एक नशेड़ी एक दिन में 2 पुडि़यों का सेवन तो करता ही है. यानी प्रतिदिन 400 रुपए का खर्चा.

–       जब नशा करने वाले को पैसे नहीं मिलते तो वह बेचैन हो जाता है और पत्नी, मां के गहने व घर का सामान तक बेच देता है.

–       नशा कोई भी हो, उसे करने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है और जब नशेडि़यों को सुगमता से पैसे प्राप्त नहीं होते तो वे चोरी, डकैती और लूटमार जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगते हैं.

–       नशा मुक्ति केंद्र में भेजने के बाद भी मरीज के भोजन, चायनाश्ता, और कईर् बार दवाओं व फल आदि का इंतजाम भी परिवारीजनों को करना पड़ता है. इस से उन पर अतिरिक्त आर्थिक भार आ जाता है.

प्रतिष्ठा को ठेस : समाज में नशा करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. नशा करने वालों और उन के परिवार के प्रति लोगों का सम्मान समाप्त हो जाता है. परिवार के सदस्य स्वयं भी आत्मविश्वास की कमी के कारण लोगों से बातचीत करने में कतराते हैं. मेरी एक परिचित कालेज में प्रोफैसर है. उस के पति नशे की लत के इस कदर शिकार हैं कि अकसर सड़क पर पड़े मिल जाते हैं. इस कारण उस को सब के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. परेशान हो कर उस ने लोगों से मिलनाजुलना ही छोड़ दिया है. नशा चाहे किसी भी प्रकार का हो, नुकसानदायक ही होता है. बेहतर है कि इस का शौक पालने से ही बचा जाए. आमतौर पर इस प्रकार का शौक यारीदोस्ती में उत्पन्न होता है. इसलिए आवश्यक है कि ऐसे लोगों से समय रहते दूरी बना ली जाए. कई बार नशा मुक्ति केंद्र में रहने के बाद नशे की लत से मुक्ति मिल जाती है परंतु घर जा कर यारदोस्तों के प्रभाव में आ कर व्यक्ति फिर से नशा प्रारंभ कर देता है. नशा करने वाला तो अपनी मौजमस्ती करता है परंतु मानसिक, आर्थिक और सामाजिक तकलीफ व परेशानी उस के परिवार को सहनी पड़ती है.

XXX रिटर्न ऑफ जेंडर केज: खोदा पहाड़ निकली चुहिया

बॉलीवुड अदाकारा दीपिका पादुकोण के हॉलीवुड कलाकार विन डीजल के संग हॉलीवुड फिल्म ‘XXX: रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ से हॉलीवुड में करियर शुरू करने की काफी चर्चाएं रही हैं. दीपिका पादुकोण के अभिनय को लेकर लंबी चौड़ी बातें की जा रही थीं.

विन डीजल खुद एक दिन के लिए इस फिल्म को दीपिका के साथ प्रमोट करने के लिए मुंबई आए. इतना ही नहीं पूरे विश्व में इस फिल्म के प्रोमोशन से एक सप्ताह पहले इसे भारत में प्रदर्शित किया गया. फिल्म को लेकर बहुत ढिंढोरा पीटा गया, पर फिल्म देखने के बाद ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ वाली बात ही उभर कर आती है.

फिल्म ‘XXX: रिटर्न ऑफ जेंडर कैज’ की कहानी के केंद्र में एथलिट और अमरीकन एजेंट जेंडर केज (विन डीजल) हैं. अचानक पूरे विश्व के सामने खतरा मंडराने लगता है. इसलिए जेंडर केज को एक मिशन पर निकलना पड़ता है. वह अपने इस मिशन में सेरिना (दीपिका पादुकोण), निक्स (क्रिस वू), एडिल वुल्फ (रूबी रोज), बेकी (नीना डोबरेव) को लेकर जाते हैं. उनकी टीम को एक अति शक्तिशाली व विनाशकारी हथियार पंडोरा बॉक्स की तलाश करनी है. पंडोरा बॉक्स की मदद से सेटेलाइट को निष्क्रिय कर नीचे जमीन पर गिराया जा सकता है. जिसकी वजह से पूरे विश्व पर संकट का आना तय है.

अब जेंडर केज की पूरी टीम का मकसद विश्व को इस खतरे से बचाना है. जेंडर केज की टीम लगभग सफल हो जाती है, पर अचानक कुछ सरकारी अधिकारी उनके सामने रोड़ा बनकर आ जाते हैं. पर अंततः जीत तो जेंडर केज व उनकी टीम की होती है.

फिल्म में विन डीजल के साथ दीपिका पादुकोण के चुंबन दृष्यों को नजरंदाज कर दें, तो इस फिल्म में हर कलाकार को बराबर का मौका मिला है, इसमें दीपिका के लिए कुछ खास नहीं है. इंटरवल से पहले तो दीपिका पादुकोण का किरदार बहुत कम समय के लिए पर्दे पर आता है. इंटरवल के बाद पूरी टीम के साथ वह भी हैं. फिल्म में एक्शन दृश्यों की ही भरमार है. आम हॉलीवुड और वह भी एक्शन प्रधान फिल्म की ही तरह इस फिल्म में भी इमोशन का घोर अभाव है. कुछ दृश्यों में दीपिका पादुकोण खूबसूरत लगी हैं. अन्यथा इसमें अभिनय के नाम पर उन्हें कुछ करना नहीं था. फिल्म में विन डीजल व दीपिका पादुकोण के साथ ही डॉली येन, रूबी रोज, नीना डोबरेव ने भी अच्छा काम किया है. फिल्म खत्म होने के बाद मेरी समझ में नहीं आया कि दीपिका पादुकोण बॉलीवुड में सारा काम धाम छोड़कर हॉलीवुड के नाम पर इस फिल्म के पीछे क्यों दीवानी थीं? कम से कम हॉलीवुड की यह फिल्म ऐसी फिल्म नहीं है, जिसे लोग याद रखना चाहें.

हां! फिल्म के तकनीकी पक्ष की जरुर तारीफ की जानी चाहिए. कैमरामैन भी तारीफ के हकदार हैं. मगर कथानक व संवादों के स्तर पर यह फिल्म बहुत निराश करती है. पटकथा के स्तर पर काफी कमियां हैं. फिल्म में रोचकता का अभाव है. एक्शन के शौकीन दर्शकों को फिल्म भा सकती है. शुरूआती एक दो दिन दीपिका पादुकोण व विन डीजल के नाम पर इस फिल्म को दर्शक मिल सकते हैं, अन्यथा फिल्म की असफलता तय है. वैसे टिपिकल हॉलीवुड फिल्में देखने के शोकीन दर्शकों के लिए भी यह फिल्म नहीं है.

एक घंटा 49 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘XXX: रिटर्न ऑफ जेंडर कैज’ के निर्देशक डी जे कारूसो हैं. फिल्म में दीपिका पादुकोण, विन डीजल, डॉनी येन, रूबी रोज, नीना डोबरेव, सैम्युअल जैक्सन, टोनी जा व अन्य ने काम किया है.

मोक्षप्राप्ति का भ्रमजाल

आशा अपनी दोनों बेटियों गुड्डो और लाडो के साथ खेल में व्यस्त थी. उन की बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखदेख कर निहाल हो रही थी. तभी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आ गईं. मुसकान तिरछी करते हुए बोलीं, ‘‘खूब मस्ती हो रही है मांबेटियों के बीच.’’

‘‘आइए आंटीजी, कहते हुए आशा बेटियों को खेलता छोड़ उन के लिए कुरसी ले आई.’’

‘‘अब फटाफट एक बेटा और कर ले, ताकि परिवार पूरा हो जाए,’’ आंटी ने अपनापन जताते हुए कहा.

‘‘हम दो, हमारे दो, हमें ये 2 बेटियां ही काफी हैं. हमारा परिवार पूरा हो गया, आंटी. हमें तीसरे बच्चे की चाह नहीं है. आप बताइए क्या लेंगी, चाय या कौफी?’’ आशा ने बात का रुख बदलते हुए कहा.

‘‘अरे, कैसी नासमझी वाली बातें करती हो? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बेटे के हाथों पिंडदान न हो तो मोक्ष नहीं मिलता. जब तक चिता को बेटा मुखाग्नि नहीं देता, आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती.’’

‘‘आंटी, क्या आप ने चिता के बाद की दुनिया देखी है? क्या आप दावे से कह सकती हो कि मरने के बाद क्या होता है?’’ आशा ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर आप कैसे कह सकती हैं कि बेटा मुखाग्नि नहीं देगा तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी? बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिन के कोई संतान ही नहीं होती. या फिर संतान इतनी दूर होती है कि समय पर पहुंच ही नहीं पाती. उन की आत्माएं क्या भटकती रहती हैं?’’ आशा के तर्कों ने आंटी को निरुत्तर कर दिया. उसे अपने बचपन की एक घटना मालूम थी. उस के चाचा के अपना कोई बेटा नहीं था. जब उन की मृत्यु हुई तो मुखाग्नि देने के लिए पंडितजी ने बेटे की अनिवार्यता बताई. बेटी ने मुखाग्नि देने की बात कही. मगर पंडितजी ने मना कर दिया. वही पुरानी बातें कि ऐसा करने से मृतक को मोक्ष नहीं मिलेगा, उस की आत्मा जन्मजन्मांतर तक भटकती रहेगी आदिआदि. आननफानन उन की बहन के बेटे को उन का दत्तक पुत्र बना कर अंतिम संस्कार करवाया गया. उस के बाद के क्रियाकर्म भी उसी के हाथों संपन्न करवाए गए. चाची पर गाज तो तब गिरी जब कुछ महीने बाद वह दत्तक पुत्र चाचाजी के पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा मांगने लगा. तब पता चला कि पंडित ने बहन से खूब दक्षिणा बटोरी थी.

आज भी हमारे देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा प्रतिशत मोक्ष के जाल में उलझा हुआ है. मोक्ष यानी आत्मा का जन्मजन्मांतर के बंधन से मुक्त हो कर परमात्मा में विलीन हो जाना.

हर जगह हैं धर्म के धंधेबाज

हिंदू धर्मशास्त्रों में पितरों का उद्घार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि पुत्र के हाथों पिंडदान होने से ही प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है. इस पुराण के अनुसार, मोक्ष से आशय है पितृलोक से स्वर्गगमन और वह पुत्र के हाथों ही संभव है. इस तथ्य में कोई सचाई नहीं है. फिर भी पढ़ेलिखे लोग भी बिना विरोध किए सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को आंखें भींच निभाते चले आ रहे हैं. दरअसल, इन बातों को रातदिन दोहरा कर पूरे समाज को हिप्नोटाइज कर डराया जा रहा है. यह सारी दुनिया में हो रहा है क्योंकि धर्म के धंधेबाज हर जगह हैं.

पंडों, पादरियों और मौलवियों, जो अपनेआप को पृथ्वी पर ईश्वर का दूत मानते हैं, ने मृत्यु के बाद का एक काल्पनिक संसार रच दिया है लोगों के दिलोदिमाग में. अपनेआप को शास्त्रों का ज्ञाता बताने वाले इन दूतों ने हरेक कर्मकांड को धर्म से जोड़ कर यजमानों के आसपास ईश्वर के प्रकोप और अनहोनी का जाल बुन दिया है. इस जाल के तानेबाने इतने सशक्त हैं कि धर्मभीरू जनता के लिए इन्हें तोड़ना आसान नहीं. अगर कोई कोशिश भी करना चाहे तो उसे परलोक का भय दिखा कर डराया जाता है. हरेक धर्म के अपने धर्मगुरु होते हैं. समाज का एक बड़ा तबका इन का अनुयायी होता है. इन गुरुओं की रोजीरोटी अपने यजमानों के कारण ही चलती है. जब भी यजमान को कोई परेशानी होती है, वह इन गुरुओं की शरण में आता है और गुरुजी तत्काल उस समस्या का कोई समाधान सुझा देते हैं. बदले में वे मोटी दक्षिणा वसूलते हैं. समस्या जितनी बड़ी होगी, समाधान भी उतना ही महंगा होगा. पिछले दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाले एक मित्र का देहांत हो गया. उन का बड़ा बेटा जो कि विदेश में रहता है, अंतिम संस्कार के समय नहीं पहुंच सका. मुखाग्नि छोटे बेटे के हाथों दिलवाई गई. मगर पगड़ी रस्म के समय पंडितजी ने कहा कि बड़े बेटे के रहते छोटे को पगड़ी नहीं पहनाई जाएगी. कुछ अतिरिक्त दक्षिणा ले कर उन्होंने उस का भी तोड़ निकाल दिया. बड़े बेटे की तसवीर को पाटे पर रख कर रस्मपगड़ी संपन्न करवाई गई.

मरने वाले को मोक्ष मिलता है या नहीं, इस का तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है ही नहीं, मगर क्रियाकर्म करवाने वाले यानी पंडित के जरूर वारेन्यारे हो जाते हैं. अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कोई भी पुत्र कुछ भी करने को तैयार हो जाता है क्योंकि उसे यह समझाया जाता है कि उस पर अपने उन पितरों का ऋण है जो उसे इस दुनिया में लाए थे. यह भी कि यह ऋण उतारना उस की नैतिक जिम्मेदारी है वरना उस के पूर्वजों की अतृप्त आत्माएं भटकती रहेंगी. मगर पुत्र ही क्यों? पुत्री भी तो इन्हीं पूर्वजों द्वारा संसार में लाई गई हैं तो पितृऋण तो उस पर भी होना चाहिए. अपने पूर्वजों के इस ऋण को उतारने के लिए पुत्र पर मानसिक दबाव बनाया जाता है, कई तरह के किस्से गढ़ कर सुनाए जाते हैं और प्राचीन शास्त्रों का हवाला दिया जाता है. कई बार तो इस ऋण को उतारने की कवायद में व्यक्ति सिर से पांव तक कर्जे में डूब जाता है. यानी पूर्वजों का ऋण उतार कर वंशजों को ऋण में डुबो देता है.

पिछले दिनों एक परिचित से मिलना हुआ. पता चला वे अपने पिताजी का श्राद्धकर्म करने के लिए गया जा रहे हैं क्योंकि पंडितजी ने पितृदोष बताया है. मेरे पूछने पर कि उन्हें कैसे पता चला कि ये पितृदोष है, तो वे बोले कि कई दिनों से परिवार में कोई न कोई बीमार हो जाता है. कभी व्यापार में घाटा हो जाता है तो कभी आपस में मनमुटाव. रोजरोज की परेशानियों से निबटने के लिए जब पंडितजी से उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि मेरे चाचाजी, जिन की मृत्यु ऐक्सिडैंट में हुई थी, का क्रियाकर्म उचित ढंग से नहीं हुआ, इसलिए उन की आत्मा को शांति नहीं मिल रही है और हमारे परिवार पर पितृदोष लगा है. अब इस का एकमात्र उपाय गया में उन का श्राद्ध कर्म करना ही है. मैं ने बहुत समझाया कि अगर कोई बीमार है तो डाक्टर की सलाह लो, न कि पंडितजी की. मगर उन की आंखों पर तो पंडितजी ने धर्म की ऐसी पट्टी बांधी जो 2-3 लाख रुपए खर्च होने पर ही खुली क्योंकि गया में भव्य श्राद्धकर्म करने के बाद भी परिवार और व्यापार की स्थिति में आशातीत सुधार नहीं आया था. तब बात उन की समझ में आई मगर तब तक उन का काफी नुकसान हो चुका था.

हमारी नई वैज्ञानिक पीढ़ी जरूर इन आडंबरों से दूर है मगर यह प्रतिशत भी सिर्फ बड़े शहरों में ही अधिक देखने को मिलता है. छोटे कसबों और गांवों में अभी भी हालात अधिक बदले हुए नजर नहीं आते.

धर्म का डर

राधा की सास की मृत्यु के बाद 12 दिनों तक उन की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पंडितजी ने कई क्रियाएं करवाईं. प्रतिदिन पंडितजी को वे सब पकवान बना कर खिलाए जाते जो उस की सास को बेहद प्रिय थे. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, यह सारा भोजन पंडितजी के माध्यम से उस की सास तक पहुंच रहा था और ये सारा ज्ञान पंडितजी का ही दिया हुआ था. सास तक क्या पहुंचा, क्या नहीं, मगर 12 दिन पंडितजी ने खूब तर माल उड़ाया और अपनी सेहत बनाई. साथ ही, मोटी दक्षिणा भी वसूली. राधा के परिवार को कितना कर्जा लेना पड़ा, इस से उन्हें कोई सरोकार नहीं. दरअसल, पूजापाठ से मिलने वाली दानदक्षिणा ही प्राचीनकाल से पंडेपुजारियों के जीवनयापन का साधन रही है. जैसेजैसे लोग पढ़नेलिखने लगे, उन की सोच भी तार्किक होने लगी. ऐसे में पंडितोंमुल्लाओं का धंधा चौपट होने लगा. इसलिए यजमानों को धर्म का डर दिखाना उन के लिए जरूरी हो गया वरना उन की रोजीरोटी पर संकट खड़ा हो जाता. अब इस तरह के कर्मकांड रोज तो होते नहीं, इसलिए जब भी ऐसा मौका आता है ये ईश्वर के दूत सक्रिय हो जाते हैं और अधिक वसूलने की कोशिश करते हैं. अपने यजमानों को मोक्ष का ज्ञान देने वाले ये पंडित खुद गहरे मायाजाल में फंसे हुए हैं और अपने स्वार्थ के लिए ही इन के द्वारा ये भ्रांति और अंधविश्वास फैलाया गया है कि पुत्र ही मातापिता को मृत्यु के बाद मुक्ति प्रदान करता है. और इसी धारणा का नतीजा है आम आदमी की पुत्रचाह की मानसिकता. मोक्षप्राप्ति की लालसा में पुत्र की कामना प्राचीनकाल में जनसंख्या वृद्धि का एक अहम कारण बनी और आधुनिक काल में कन्याभू्रण हत्या का.

अलबत्ता तो मृत्यु के बाद मोक्ष की अवधारणा  ही कल्पना मात्र है और इस के लिए भी पुत्र की अनिवार्यता महज पंडोपादरियों द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है. ऐसा कोई काम नहीं जो पुत्र कर सके और पुत्री नहीं. आखिर हैं तो दोनों एक ही मातापिता की संतान. हमें इन कर्मकांडों और पाखंडों के बजाय तार्किक और वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता है. अंधविश्वास के अंधेरों से बाहर निकल कर तथ्यों की रोशनी में हकीकत देखने और समझने की जरूरत है. हालांकि मस्तिष्क में गहरे तक जड़ जमा चुके इन धार्मिक आडंबरों के जाल से बाहर निकलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत है क्योंकि हो सकता है समाज का एक धड़ा आप के विरोध में उठा खड़ा हो. मगर सचाई यह भी है कि जब तक हम डरते रहेंगे, ईश्वर के तथाकथित दूत यानी पंडित लोग हमें लूटते रहेंगे. अगर हम तर्क की तलवार ले कर इन का सामना करें तो इन के फैलाए पाखंड के जाल को काट सकेंगे.

समाचार

चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में मनाया गया किसान दिवस
हिसार (हरियाणा) : 23 दिसंबर को देश में अनेक जगहों पर किसान दिवस का आयोजन किया गया. किसान दिवस कृषि विज्ञान केंद्र हिसार में भी मनाया गया.

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती पर आयोजित किसान दिवस पर किसानों को संबोधित करते हुए केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि कृषि को?लाभकारी बनाने के लिए किसानों को फसल पैदा करने के साथ उस की मार्केटिंग भी खुद करनी होगी. उन्होंने कहा कि बिचौलिए खेती के उत्पादों को कम दामों पर खरीद कर ज्यादा दामों पर बेचते?हैं, जिस से ज्यादातर मुनाफा बिचौलिए के खाते में चला जाता?है. यदि किसान खेती के साथसाथ अपने उत्पादों की मार्केटिंग को अपना लें और अपना सामान खुद बेचें तो उन का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा. देश में कृषि पैदावार में बढ़ोतरी हुई?है, जिस का श्रेय कृषि वैज्ञानिकों को जाता है. बीरेंद्र सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि वे उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित करने के साथ आर्थिक पहलू का भी अध्ययन जरूर करें ताकि कृषि किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सके. हरियाणा के किसानों को राज्य की राष्ट्रीय राजधानी के नजदीक होने का फायदा उठाना चाहिए और उन्हें खेती से जुड़े फल, सब्जी, दूध व दूध से बनी चीजें खुद जा कर बेचनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि सम्मेलन में आमंत्रित किए गए प्रदेश के प्रगतिशील किसानों को सम्मानित करना अच्छी बात है, पर उन किसानों को जो कृषि में पिछड़े हैं, विशेष रूप से आमंत्रित किया जाए ताकि वे भी इन किसानों से प्रेरित हो कर खुद भी प्रगतिशील किसान बनने की कोशिश करें. इस से प्रदेश व देश की कुल कृषि पैदावार में बढ़ोतरी होगी.

समारोह की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों ने न केवल देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि आज हम कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहे?हैं. हरियाणा हर क्षेत्र में अग्रणी है. अन्न उत्पादन के बाद भारतीय सेना में भी 11 फीसदी सैनिक हरियाणा से ही?हैं. उन्होंने चौधरी चरण सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय उन की नीतियों का अनुसरण करते हुए कृषि व किसानों की उन्नत के लिए कार्य कर रहा है. उन्होंने कहा कि देश में 55 फीसदी रोजगार खेती से?हैं. खेती कम हुई तो देश में बेरोजगारी की समस्या पैदा हो सकती है. इसलिए खेती को न केवल बनाए रखना होगा, बल्कि उसे आधुनिक तकनीकों के साथ और उन्नत बनाना होगा. उन्होंने लोगों से कहा कि वे खेती से विमुख न हों. जिस तरह कृषि उत्पादन की मांग बढ़ रही?है ऐसे में कृषि का उज्जवल भविष्य है.इस अवसर पर मुख्य संसदीय सचिव डा. कमल गुप्ता ने कहा कि पिछले वर्ष सफेद मक्खी के प्रकोप से कपास की फसल का भारी नुकसान हुआ?है. नतीजतन प्रदेश सरकार को फसल नुकसान की भरपाई करने के लिए किसानों को 967 करोड़ रुपए का मुआवजा देना पड़ा है. वैज्ञानिकों को इस प्रकार के घातक कीटों व रोगों की रोकथाम का?स्थायी हल निकालना चाहिए.

इस से पहले अनुसंधान निदेशक डा. एसएस सिवाच ने प्रदेशभर से इस कार्यक्रम में शामिल हुए किसानों और कृषक महिलाओं को विश्वविद्यालय की अनुसंधान उपलब्धियों की जानकारी दी. कार्यक्रम को विस्तार शिक्षा निदेशक डा. प्रवीण पूनिया ने भी संबोधित किया, जबकि विश्वविद्यालय के यूनिट रेडियो स्टेशन के परामर्शदाता डा. रामफल चहल ने मंच का संचालन किया.

इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रगतिशील किसानों चौधरी बीरेंद्र सिंह ने प्रशस्तिपत्र, शाल व प्रमाणपत्र दे कर सम्मानित किया. सम्मानित किए गए इन किसानों में हरभजन सिंह (अंबाला), राम प्रसाद (बावल, रेवाड़ी), सत्य प्रकाश (भिवानी), राजू (फतेहाबाद), त्रषिराज त्यागी (फरीदाबाद), जगपाल सिंह (झज्जर), जय भगवान (जिंद), केपी सिरोह (कैथल), सुलतान सिंह (करनाल), विरेंद्र सिंह (कुरुक्षेत्र), महेंद्र पाल सिंह (मंडकोला, मेवात), राजबीर (महेंद्रगढ़), जितेंद्र मुल्लतानी (पिंजौर, पंचकुला), पालविंद्र सिंह (पानीपत), विरेंद्र मलिक (रोहतक) और राजकुमार (सदलपुर, हिसार) आदि शामिल थे. 

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मधुमक्खियां बढ़ा रहीं पैदावार

पुणे : सुन कर हैरान होना लाजिम है कि भला शहद देने वाली मधुमक्खियां कैसे खेती कर रही हैं. लेकिन यह सच है. पुणे, अहमदनगर और उस के आसपास के जिलों में जा कर देखें कि वहां किस तरह से मधुमक्खियां इस काम को अंजाम दे रही हैं. अपने खेतों में और बागानों में मधुमक्खियों के डब्बे रख कर किसान घर आ कर बैठ जाते हैं. इस से उन की पैदावार बढ़ने लगी है. सब से ज्यादा असर प्याज और अनाज जैसी फसलों पर हुआ है. खेती की इस विधि में न ज्यादा फर्टीलाइजर देने की जरूरत है और न ही कुछ और. बस खेत व बागान में इन का बसेरा करने भर से पैदावार बढ़ने लगी है. यह सब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सर्वोत्तम कृषि विज्ञान केंद्र बासमती के वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है. दरअसल, परागीकरण वाली फसलों पर यह विधि जादू का काम करती है. अनार के बागान में एक समय पर लगने वाले नर व मादा फूलों के परागों को उसी समय परस्पर फैलाने से यह कामयाब होने लगी है.

शहद से ज्यादा फायदा फसलों की पैदावार बढ़ने से हो रहा है.

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योजना

पंचायत भवनों में बैंक खुलेंगे

पटना : बिहार के सभी पंचायत भवनों में बैंकों की शाखाएं खोलने की मुहिम शुरू की गई है. राज्य सरकार ने सभी बैंकों को यह प्रस्ताव भेजा है. राज्य के ग्रामीण इलाकों में बैंकों की कमी है और सही जगह नहीं मिलने की वजह से कई?बैंक पंचायतों में अपनी शाखाएं नहीं खोल पा रहे हैं. सरकार ने बैंकों को यह सुझाव दिया है कि पंचायत भवनों में वे बैंक की शाखाएं खोल सकते हैं. राज्य में फिलहाल 236 पंचायत सरकारी भवन बन कर तैयार हैं. भारतीय रिजर्व बैंक का नियम कहता है कि 11000 लोगों की आबादी पर बैंक की 1 शाखा होनी चाहिए, लेकिन बिहार में 17000 लोगों की आबादी पर 1 बैंक की शाखा है. आरबीआई ने 13 मार्च 2017 तक 5000 से?ज्यादा आबादी वाले राज्य के 1640 गांवों में बैंकों की शाखाएं खोलने का लक्ष्य तय किया था, पर अभी तक केवल 78 शाखाएं ही खुल सकी हैं. बिहार के वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दकी कहते हैं कि गांवों में बैंकों की शाखाओं की कमी होने की वजह से गांव वालों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. राज्य सरकार शाखाएं खोलने के लिए बैंकों को हर तरह की सुविधा देने को तैयार है. इसी के तहत पंचायत भवनों में बैंकों की शाखाएं खोलने का आफर दिया गया है. 

उम्मीद

दाल के दाम और ज्यादा घटने के आसार

नई दिल्ली : बीते साल 2016 में दाल का हंगामा जम कर मचा. लोग 200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से दाल खरीदने पर भी मजबूर हुए. मगर साल खत्म होने तक दालों की हालत काफी सुधर गई. बंपर पैदावार ने दाल की हालत बेहतर कर दी है. अब किसान अरहर की अच्छी पैदावार के बाद उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 1384 रुपए प्रति क्विंटल या 27 फीसदी कम दामों पर बेचने पर मजबूर हो गए हैं. गौरतलब है कि सरकार ने वित्त साल 2015-16 के खरीफ सत्र के लिए अरहर का एमएसपी 5050 रुपए प्रति क्विंटल तय किया था. मगर 3666 रुपए प्रति क्विंटल की दर से फिलहाल अरहर थोक बाजार में बिक रही है. इस से पहले किसानों को मूंग की बिक्री में भी झटका लग चुका है. अरहर दाल के थोक भाव में अगले महीने और कमी आने की उम्मीद की जा रही?है. यकीनन इस से आम खरीदारों को सस्ती दाल मिल सकेगी, लेकिन किसानों को कम लाभ मिलने से दाल की खेती के प्रति निराशा होगी. बेशक सरकार ने वित्त साल 2015-16 के खरीफ सत्र के लिए अरहर की एमएसपी 5050 रुपए प्रति क्विंटल तय की थी, मगर कर्नाटक के गडक जिले में अरहर का थोक दाम घट कर 3666 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है. कर्नाटक सूबे के गुलबर्गा जिले में अरहर का थोक दाम 4572 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है. गौरतलब है कि सरकार ने जून 2016 में अरहर दाल का एमएसपी 4625 रुपए से बढ़ा कर 5050 रुपए प्रति क्विंटल किया था. उसी दौरान मूंग का एमएसपी 4850 रुपए से बढ़ा कर 5225 रुपए प्रति क्विंटल किया गया था. किसान सितंबर 2016 में मूंग की नई फसल आने के वक्त से ही उसे एमएसपी से कम दामों पर बेचने पर मजबूर हैं.

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात सूबों से अरहर की नई फसल जनवरी 2017 के दौरान आ जाएगी. इस नई फसल से थोक बाजार में अरहर के दामों में और ज्यादा कमी आ सकती है. पिछले साल सितंबर में सरकार ने देश में 20 लाख टन दाल का बफर स्टाक बनाने का फैसला किया था. खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक सरकार अब तक महज 6.95 लाख?टन दाल ही खरीद पाई है. सरकार की तरफ से दाल की खरीद बेहद सुस्त होने की वजह से किसान बाजार में कम दामों पर दाल बेचने पर मजबूर हैं. अब सुब्रमणियन समित ने दाल की एमएसपी 6000 रुपए प्रति क्विंटल करने की पुरजोर सिफारिश की है.                  

कमाल

अरविंद मलिक ने उगाया 4 किलोग्राम का गन्ना

मेरठ : गांव बधाईकलां, मुजफ्फरनगर के किसान अरविंद मलिक गन्ने की खास पैदावार के लिए जाने जाते?हैं. देशविदेश से भी लोग उन की गन्ना फसल को देखने के लिए आते हैं. अभी हाल में मुजफ्फरनगर में सब से अधिक वजनदार गन्ना पैदा करने के लिए उन्हें पहला पुरस्कार दिया गया. 4 किलोग्राम प्रति गन्ना वजन की फसल पैदा करने के लिए जिला अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, जिला गन्ना अधिकारी मुजफ्फरनगर व निदेशक गन्ना शोध संस्थान मुजफ्फरनगर की उपस्थिति में उन्हें पहले पुरस्कार से नवाजा गया. यह पुरस्कार उन की नामौजूदगी में उन के छोटे भाई संजय मलिक ने प्राप्त किया. इस के अलावा राष्ट्रीय खाद्य योजना मिशन के तहत गन्ना प्रजनन संस्थान, करनाल के निदेशक डा. नीरज कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक व फार्म इंचार्ज डा. रवींद्र सिंह और डा. मीणा ने उन के खेतों का दौरा किया और उन के द्वारा किए गए की सराहना की.                                                                             

मुहिम

भेड़बकरियों को लगेगा टीका

पटना : बिहार की तमाम भेड़ों और बकरियों को पीपीआर यानी गोट प्लेग का टीका लगाया जाएगा. राज्य के पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार कुशवाहा ने दानापुर अनुमंडल के वेटनरी अस्पताल में पशु स्वास्थ्य पखवारे की शुरुआत करते हुए कहा कि राज्य में कुल 80 लाख, 52 हजार भेड़बकरियां हैं और उन सभी को मुफ्त में टीके लगवाए जाएंगे. इस के लिए गांवगांव में पशुपालकों को जागरूक किया जाएगा कि वे अपनी बकरियों और भेड़ों को टीका लगवाएं. उन के टीकाकरण का पूरा रिकार्ड भी रखा जाएगा. इस योजना को कामयाब बनाने के लिए जिला लेबल पर निगरानी की जाएगी.

गौरतलब है कि गोट प्लेग से भेड़ों और बकरियों की मौतें होती रही हैं, जिस से गरीब पशुपालकों को काफी नुकसान होता है. गोट प्लेग होने पर बकरियों और भेड़ों को तेज बुखार हो जाता है. नतीजतन वे सुस्त पड़ जाती हैं और उन्हें काफी छींकें आने लगती हैं. उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगती है और उन की आंखों, नाक और मुंह से गाढ़ा स्राव होने लगता है. गोट प्लेग भेड़ों और बकरियों की संक्रामक व छुआछूत वाली बीमारी है. यह मेरबिल वायरस के जरीए तेजी से फैलती है. यह जानलेवा बीमारी है. यह 4 महीने से ले कर 1 साल तक की भेड़ों और बकरियों पर बहुत तेजी से हमला करती है.

इजाफा

रंग ला रही है खेती की मुहिम खाद्यान्न उत्पादन की होगी रिकार्ड पैदावार

नई दिल्ली : 2 सालों तक लगातार सूखे के बाद बेहतर मानूसन रहने के कारण साल 2016-17 के दौरान कृषि उत्पादन में फिर तेजी लौटने और उत्पादन रिकार्ड स्तर यानी 27 करोड़ टन हो जाने की उम्मीद है. लेकिन नोटबंदी और बिक्री से कम मूल्य प्राप्ति की मार से किसानों को नजात मिलती नहीं दिख रही है. किसान अभी भी बेहाल हैं. चालू वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र वृद्धिदर बढ़ कर करीब 5 फीसदी होने का अनुमान है, जो पिछले साल 1.2 फीसदी ही थी. देश के अधिकांश हिस्सों में बेहतर मानसून के कारण 13.5 करोड़ टन के रिकार्ड खरीफ खाद्यान्न उत्पादन और चालू रबी सत्र में भारी उत्पादन होने की संभावना है. कृषि सचिव शोभना पटनायक ने कहा कि मौजूदा साल के दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतरीन प्रदर्शन किया?है. हम ने सूखे के सालों का सामना करने के बाद बेहतर मानसून देखा है. सामान्य तौर पर खरीफ उत्पादन काफी अच्छा रहा है और रबी की बोआई भी बेहतर है. हमें इस साल भारी उत्पादन होने की पूरी उम्मीद है.

हालांकि कृषि विशेषज्ञों ने कुछ नोटों को चलन से बाहर करने के रबी फसल के उत्पादन पर पड़ने वाले असर और संभावित रूप से सर्दियां कम रहने से गेहूं के उत्पादन पर होने वाले असर के बारे में चिंता जताई है.

उन्होंने कहा, हमारी 27 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने की योजना है, जबकि हमारा पिछला सब से अधिक उत्पादन फसल साल 2013-14 जुलाईजून में 26 करोड़ 50.4 लाख टन का हुआ था.

उन्होंने कहा कि तापमान में बढ़वार के कारण अगर पूरे देश भर में गेहूं की उत्पादकता में 3 फीसदी की कमी आती है, तो भी कृषि व सहायक क्षेत्रों की वृद्धि दर 5.3 फीसदी रहेगी.

कुछ बड़े नोटों का चलन प्रतिबंधित करने के खराब असर के बारे में पूछने पर शोभना पटनायक ने कहा कि इस का ज्यादा असर नहीं हुआ है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में उधारी की प्रणाली मजबूत रही है और साल दर साल किसानों में जूझने की क्षमता बढ़ी है.

उन्होंने कहा कि हमारे किसानों ने पिछले 2 सालों से सूखे का सामना किया है, लेकिन उस के बावजूद वे फिर से सामने आए हैं. मुझे नहीं लगता कि इस के कारण कोई प्रभाव हुआ है.

इस के उलट किसान संगठनों के साथसाथ पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने कुछ नोटों को चलन से बाहर करने के बुरे असर के बारे में चिंता जताई है. उन का कहना है कि इस के कारण किसान अपनी रबी फसल के लिए गुणवत्ता वाले बीजों और उर्वरकों को खरीद नहीं पाए और मांग नदारद होने से वे अपनी फसलों को बेचने में समस्या का सामना कर रहे हैं.

चालू वर्ष के खरीफ सत्र में भारी उत्पादन होने और रबी सत्र में अच्छी फसल होने की उम्मीदों के विपरीत घरेलू और वैश्विक जिंसों की कीमतें कमजोर रहने के साथ बिक्री से होने वाली कम मूल्य प्राप्ति के कारण किसानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है.

सरकारी अनुमान के मुताबिक गेहूं उत्पादन 8.6 करोड़ टन से बढ़ कर 9 करोड़, 35 लाख टन हो गया. लेकिन एफसीआई की खरीद में भारी कमी आई और साल के अंत तक गेहूं और इस के उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगीं. सरकार ने घरेलू आपूर्ति को बढ़ाने के लिए गेहूं पर आयात शुल्क को खत्म कर दिया.

साल के दौरान सरकार ने देश भर में सफलतापूर्वक ऐतिहासिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून एनएफएसए को लागू किया.

 किसानों की आय को बढ़ाने के लिए नई फसल बीमा योजना की शुरूआत की गई और देश की 585 मंडियों को इलेक्ट्रानिक व्यापार मंच से जोड़ने वाले ‘ई नाम’ जैसे तमाम कारगर कार्यक्रमों की घोषणा की गई.

इस साल के बजट में सरकार ने कृषि कर्ज की सीमा को 50,000 करोड़ रुपए बढ़ाते हुए चालू वित्तवर्ष के लिए 9 लाख करोड़ कर दिया और कृषि क्षेत्र में तमाम पहलकदमियों के वित्तपोषण करने के लिए सभी कर लायक सेवाओं पर 0.5 फीसदी का कृषि कल्याण उपकर सेस लगाया.

मशहूर कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने इस नई योजना का स्वागत किया. लेकिन इसे सही तरह से लागू करने पर जोर दिया. स्वामीनाथन का कहना है कि सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी के तहत उत्पादन लागत से 50 फीसदी अधिक का भुगतान करना चाहिए.

वजूद

किसान मेले का मतलब किसानों से है

मुजफ्फरपुर : ‘कृषि यांत्रिकरण मेले में जब किसान ही मौजूद नहीं हों तो इस मेले का कोई मतलब नहीं रह जाता है. अगर मुझे यह पहले से पता होता तो शायद उद्घाटन समारोह में नहीं आती.’ ये बातें दिसंबर महीने में मुशहरी स्थित प्रसार प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित जिला स्तरीय कृषि यांत्रिकरण मेले के उद्घाटन के दौरान बोचहां विधायक बेबी कुमारी ने कहीं. कृषि विभाग सिर्फ समाचारपत्रों के माध्यम से किसानों को सूचना देता है, पर जो किसान समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं, उन्हें इस आयोजन की जानकारी नहीं हो पाती है और वे सरकारी लाभ से वंचित हो जाते हैं. विभाग को हर किसान तक सूचना पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए. ऐसे आयोजनों से किसानों का भला नहीं हो सकता. किसान नेता वीरेंद्र राय ने भी ऐसे आयोजन पर नाराजगी जताई. इस तरह की यह पहली घटना नहीं है इस प्रकार के वाकिए पहले भी होते रहे?हैं. किसान मेले में कई बार किसान कम अधिकारी ज्यादा होते हैं.

एक बार ‘फार्म एन फूड’ की?टीम के साथ भी ऐसा ही वाकिया हुआ. बड़े स्तर पर कृषि मेला लगना था, जिस की जानकारी इंटरनेट पर कृषि विभाग की साइट पर दी गई थी. लेकिन जब टीम दिल्ली से 140 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर में मेले की जगह पर पहुंची, तो वहां कोई मेला नहीं लगा था. दिए गए फोन नंबर पर बात की गई तो संबंधित अधिकारी ने बताया कि कृषि मेला टल गया?है जिस की जानकारी विभाग द्वारा नेट पर अपडेट भी नहीं की गई थी.

पहल

मरे हुए पशुओं से बन रही समाधि खाद

रतलाम : खेती में रासायनिक के बाद जैविक खाद के इस्तेमाल के उदाहरण सैकड़ों आते हैं. अब समाधि खाद का कांसेप्ट भी आ गया है. रतलाम के बांगरोद में मरे हुए जानवरों को खाद में बदल कर खेती में इस्तेमाल किया जा रहा है और यही खाद मुंबई तक एक्सपोर्ट भी की जा रही है. गांव में 5 सालों में 655 मवेशियों की समाधि बना कर उन्हें खाद में बदला जा चुका है. इस नई सोच के साथ खेती में ज्यादा उत्पादन और लाभ की उम्मीद जगी है. गांव की श्रीराम गोशाला से 17 फरवरी 2011 से यह सिलसिला शुरू हुआ. गोशाला में पहले मवेशी की मौत होती, तो शव गांव के बाहर छोड़ दिया जाता था. गांव के लोगों को यह दुर्गति अच्छी नहीं लगी. इसी समय गायत्री परिवार मंदसौर की एक टीम गांव में आई. उस ने मवेशियों की समाधि बनाने का सुझाव दिया. गोशाला से जुड़े लोगों को जनअभियान परिषद के माध्यम से समाधि खाद बनाने का आइडिया मिला. 2011 में पहली समाधि बनाई. इसे एक साल बाद खोला. नमूने लैब में टेस्ट कराए तो बेहतर नतीजे मिले. इस के बाद जब भी मवेशी की मौत होती, उसे गड्ढे में दफना दिया जाता. इसी तरह शुरू हुआ समाधि खाद बनाने का सिलसिला. बांगरोद में 51 किसानों की एक समिति है.

समाधि खाद से तैयार गेहूं 5000 रुपए प्रति क्विंटल और तैयार आटा 6000 रुपए प्रति  क्विंटल के भाव से बेचा गया. समाधि खाद से तैयार भूसा मवेशियों को खिलाया गया तो उन के दूध से तैयार घी 1000 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिका. गोशाला से हर साल 1700 बैग खाद 500 एकड़ खेती में इस्तेमाल के लिए बेची गई. बांगरोद में जब भी किसी मवेशी की मौत होती हैं, उसे 4 फुट गहरे गड्ढे में दफना दिया जाता है. गड्ढे में गोबर, नमक, बेसन, गुड़ आदि डाला जाता है और बंद कर दिया जाता है. 

मुहिम
सरकार खरीदेगी दाल

नई दिल्ली : कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने गुरुवार को कहा कि अगर दालों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे जाते हैं, तो सरकार किसानों से एमएसपी पर दालों की खरीद करेगी. केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर दलहनों की बिक्री को सुनिश्चित करने के प्रावधान किए हैं. प्रावधान के तहत जहां कहीं भी दलहन का मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होता है, वहां भारत सरकार किसानों को समर्थन मूल्य सुनिश्चित करेगी. इस के अलावा उन्होंने कहा कि सरकार ने 20 लाख टन दलहनों का बफर स्टाक बनाने का भी फैसला किया है, ताकि जब बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो लोगों को सस्ते दर पर दलहन उपलब्ध कराया जा सके.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है, ताकि आम लोगों को दलहन के पोषण तत्त्वों के बारे में जागरूक किया जा सके.

सिंह ने कहा कि सरकार ने दलहन की खेती और उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए इस के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है. उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष, 2016 में कई सारे कदम उठाए गए हैं, ताकि देश में दलहन फसलों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाया जा सके.

सरकार ने साल 2016-17 के लिए 200 लाख टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य तय किया है, जबकि साल 2017-18 के लिए यह लक्ष्य 210 लाख टन और साल 2020-21 के लिए 240 लाख टन है. राधा मोहन सिंह ने कहा कि भारतीय दलहन शोध संस्थान, कानपुर के साथ 10 कृषि विश्वविद्यालयों के क्षेत्रीय केंद्रों पर 20.39 करोड़ रुपए की लागत से अतिरिक्त ‘ब्रीडर सीड’ उत्पादन कार्यक्रम शुरू किया गया है.                                 

तरीका

ईको फ्रेंडली पद्धति से रोकें दलहनी फसलों का नुकसान

नई दिल्ली : दलहनी फसलों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अब भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान पर्यावरणीय अनुकूलन पद्धति से दवाओं का निर्माण करने की ओर अग्रसर है. वैज्ञानिकों की मानें तो इस से 30 फीसदी तक नुकसान को बचाया जा सकता है. ईको फ्रेंडली पद्धति से फसलों को बदलते मौसम व बीमारियों और कीड़ों के प्रभाव से बचाया जाएगा. किसानों को इस का सीधा असर और फायदा होगा. कम नुकसान और ज्यादा पैदावार से उन की आमदनी बढ़ेगी. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की राष्ट्रीय कार्यशाला में इन बातों को वैज्ञानिकों ने सामने रखा. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान में संस्थान व?भारतीय पादप विकृति विज्ञान सोयाइटी की ओर से आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में शिरकत करते हुए वैज्ञानिकों ने ‘पादप रोग प्रबंधन के लिए पर्यावरण अनुकूल पद्धति, वर्तमान प्रवृति और संभावनाएं’ विषय पर अपने विचार रखे. एनडीयूएटी, फैजाबाद के कुलपति प्रो. अख्तर हसीब ने मौजूद वैज्ञानिकों से कहा कि पादप रोग प्रबंधन के लिए पर्यावरण अनुकूल पद्धति पर एकजुट हो कर शोध करें. संस्थान के निदेशक डा. एनपी सिंह ने कहा कि पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी को और ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है.

खास जानकारी : भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने मौसम और कीड़ों से बचाव के बारे में जानकारी दी. वैज्ञानिकों की मानें तो मसूर की फसल को झुलसा रोग और चने की फसल को सूखा रोग से सब से ज्यादा नुकसान होता?है. इस समय उड़द और मूंग में पीला चित्तीदार रोग, राजमा व लोबिया की फसल में कर्ल रोग लग रहा है. इन की रोकथाम के लिए वैज्ञानिकों ने अब ऐसे वायरस खोजें हैं, जिन के माध्यम से रोग उत्पन्न करने वाले कीड़ों को मारा जा सकेगा. इन में मुख्य रूप से पहला वायरस एनपीवी है, जो फलीभेदक कीड़े को खत्म करने में कारगर है. वैज्ञानिकों का कहना?है इस के स्प्रे करने भर से ही कीड़े की मौत हो जाती?है. इसी तरह बीटी वायरस, जो जमीन में पाया जाने वाला बैक्टीरिया है, वह भी कीड़ें को मारता है. निदेशक, आईआईपीआर की मानें तो किसान हर साल पूरी फसल में 20 से 30 फीसदी तक का नुकसान सहते?हैं. उन्हें कम से कम नुकसान हो और ज्यादा से?ज्यादा उन की आमदनी बढ़े, इस के लिए संस्थान के वैज्ञानिक लगातार नई खोज करने में जुटे हुए हैं.

योजना
3.66 करोड़ का फसलबीमा

नई दिल्ली : साल 2016 में खरीफ मौसम के दौरान 3.66 करोड़ किसानों ने फसल बीमा कराया. गौरतलब है कि पिछले साल फसलबीमा कराने वाले किसानों की तादाद महज 2.94 करोड़ थी. केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के मुताबिक भारत में फसलबीमा योजना को अपनाने वाले किसानों की तादाद में काफी तेजी से इजाफा दर्ज किया जा रहा है. राजधानी दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राधामोहन सिंह ने कहा कि एनडीए सरकार के 30 महीने के कार्यकाल में कृषि के मामले में तमाम अहम काम किए गए?हैं. फसलबीमा योजना इन में सब से ज्यादा खास है. कृषि मंत्री ने कहा कि फसलबीमा योजना ने किसानों को फसल सुरक्षा की गारंटी दी?है. पहले कुदरती आपदाओं के कारण फसल बरबाद होने पर किसान लाचार हो जाते थे, मगर अब उन के नुकसान की भरपाई हो रही है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की बातें सतही तौर पर किसानों की बहुत भलाई करती नजर आती?हैं, मगर हकीकत की कसौटी पर फसलबीमा योजना से किसान किस हद तक फायदा ले पाएंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.    

अनुदान
किसानों को गोदाम बनाने में मदद

पटना : बिहार में इच्छुक किसानों को अनाज गोदाम बनाने में होने वाले खर्च का 25 फीसदी अनुदान दिया जाएगा. राज्य में अनाज भंडारण के लिए गोदामों की कमी को दूर करने के लिए किसानों को गोदाम बनाने की लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. उद्योग मंत्री जय कुमार सिंह ने बताया कि धान और गेहूं के भंडारण के लिए गोदामों की ज्यादा जरूरत है. इस के लिए विभाग की ओर से अधिकतम 5 करोड़ रुपए का अनुदान मिलेगा. 5 करोड़ रुपए का अनुदान 20 करोड़ या उस से अधिक लागत वाले गोदामों को बनाने के लिए दिया जाएगा.

सलाह
अनाज भंडारण की जानकारी

मुंगेर : सदर प्रखंड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में केंद्रीय भंडारण निगम की ओर से कृषकों के लिए आयोजित 2 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के तहत किसानों को सुरक्षित अन्न भंडारण की बारीकियों के बारे में बताया गया. वैज्ञानिकों ने किसानों को सुरक्षित भंडारण के बारे में बताते हुए कहा कि लंबे समय तक अन्न के भंडारण से पहले कई प्रकार की सावधानियां बरतनी होती हैं. इस में सब से पहले  देखना होता?है कि अनाज में नमी की मात्रा सही है या नहीं. यदि नमी की मात्रा ज्यादा हो तो अनाज को सुखाना बेहद जरूरी होता?है.

इस के बाद जिस कमरे में अनाज को रखना होता?है, उस की अच्छी तरह साफसफाई करनी चाहिए. इस के बाद कमरे में डीडीवीपी या अन्य कीटनाशक का छिड़काव करना चाहिए. इस के बाद अनाज की पुरानी बोरी से निकाल कर नई बोरी में डालना चाहिए, क्योंकि पुरानी बोरी में रखे अनाज में कीड़े लगे हो सकते हैं. यहां इस बात का खयाल रखें कि नई उपज को नई बोरी में ही रखें. यदि बोरी पुरानी हो तो उसे धो कर इस्तेमाल करें. इस के बाद गोदाम के फर्श की नमी को पूरी तरह से सुखा लें, क्योंकि नमी के कारण अनाज में कीड़े लगने का खतरा ज्यादा होता है. कमरे की नमी को खत्म करने के लिए डनेज का इस्तेमाल करें. इस के लिए पोलीथीन या बांस की चटाई का इस्तेमाल करें. जहां तक मुमकिन हो धूप वाले दिनों में गोदामों की खिड़कियों को खोल कर रखें. अनाज में लगातार हवा लगने से कीड़े लगने की संभावना कम हो जाती?है. इस के साथ ही अनाज को चूहों से बचाएं, क्योंकि यह देखा जाता?है कि अनाज के उत्पादन से ले कर उस के उपभोग तक में तकरीबन 25 फीसदी अनाज बेकार हो जाता है.

उम्मीद
थाली में और बढ़ेगी दाल

कानपुर : अब भोजन की थाली में दाल की कमी नहीं रहेगी, क्योंकि यूरिया की कालाबाजारी रुकने व मौसम के साथ देने से इस बार देश में दलहनी फसलों की रिकार्ड उत्पादन की स्थिति बनी है. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की मानें तो देश में दालों की उपलब्धता का औसत प्रतिव्यक्ति रोजाना 38 ग्राम से बढ़ कर 42 ग्राम तक पहुंच सकता है.

दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए नवीन शोध व खेती की तकनीकी पर काम कर रहे भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने आकलन कर नतीजे निकाले हैं कि इस बार चना, अरहर व दूसरी दालों के उत्पादन में रिकार्ड बढ़ोतरी होने जा रही है. ऐसा मौसम के साथ देने के कारण तो हो ही रहा है, साथ ही किसानों द्वारा दलहनी खेती में नई तकनीक अपनाने और फसलों को भरपूर खाद मिलना भी इस की वजह है. आंकड़े बताते हैं कि कुल दालों में 40 से 50 फीसदी चने की दाल होती है. अरहर का उत्पादन व प्रयोग भी ज्यादा है. इस बार दोनों के ही उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि की उम्मीद है. ऐसे में देश दालों की जरूरत के लक्ष्य के बहुत नजदीक पहुंचने वाला है.

डा. एनपी सिंह, निदेशक भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने कहा कि हम दालों की जरूरत के लक्ष्य के काफी करीब पहुंच गए हैं. अब दालों का आयात कम करना होगा. मौसम की मार सह कर भी उत्पादन देने वाली प्रजातियां निकाली जा रही हैं.

किसानों को छूट पर मिलने वाली यूरिया की कालाबाजारी रोकना कारगर साबित हो रहा है. सरकार ने यूरिया नीम कोटेड की, जिस से यूरिया में हो रही दलाली रुकी है. पहले तकरीबन 40 फीसदी किसानों के पास पहुंचने से पहले ही यूरिया गायब हो जाती थी, लेकिन इस बार किसानों को काम लायक यूरिया मिल रही है.

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मुहिम
राजस्थान में होगी पिस्ते की खेती

जयपुर : कृषि विभाग ने राजस्थान में पिस्ते की खेती की संभावनाओं के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं और इस के लिए विभाग ने हार्टीकल्चर के 4 एक्सपर्ट की एक कमेटी भी बना दी है. अब जल्द ही यह कमेटी टर्की जाएगी और वहां होने वाली पिस्ते की खेती के बारे में जानकारी जुटाएगी.

इस बारे में कृषि विभाग ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मंजूरी के लिए फाइल भेज दी है और बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने सैद्धांतिक रूप से अपनी मंजूरी भी दे दी है. कृषि विभाग इस से पहले बीकानेर में पिस्ते की खेती के अनुकूल वातावरण और मिट्टी की रिपोर्ट मंगा चुका है. विभाग पहले बीकानेर में प्रायोगिक तौर पर पिस्ते की खेती करेगा.

उल्लेखनीय है कि भारत में अभी पिस्ते की खेती कहीं पर भी नहीं हो रही है. दुनिया में करीब 7 देशों में ही पिस्ते की खेती होती है. ऐसे में अगर राजस्थान का कृषि विभाग अपने प्रयासों में कामयाब हो जाता है तो यह प्रदेश के साथसाथ देश के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी.                   

इजाफा

अब प्रति व्यक्ति 500 ग्राम दूध

पटना : केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा है कि साल 2020 तक देश में प्रति व्यक्ति 500 ग्राम दूध की उपलब्धता हो जाएगी. फिलहाल प्रति व्यक्ति के लिए 337 ग्राम दूध मौजूद है. इस के लिए एकसाथ कई योजनाओं की शुरुआत की गई?हैं. देसी नस्ल के दुधारू पशुओं को बचाने की योजना को जोरशोर से चालू किया गया है. नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राधामोहन सिंह ने कहा कि पिछले 15 सालों से दूध उत्पादन के मामले में भारत पहले नंबर पर?है और इस का पूरा श्रेय छोटेछोटे दूध उत्पादकों को जाता है. देश भर में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के जरीए दूध उत्पादन बढ़ाने के कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. साल 2014 से 2017 तक इस योजना पर 500 करोड़ रुपए खर्च किए जाने?हैं. नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड की योजनाएं साल 2019 तक पूरी होंगी. इन योजनाओं पर 2242 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे. दुनिया भर में दूध उत्पादन की बढ़ोत्तरी दर 2 फीसदी है, वहीं भारत में यह दर 4 फीसदी?है. साल 2015-16 में तो यह दर 6 फीसदी रिकार्ड की गई थी.       

मदद
फफूंदी मिटाएगा कृषि विभाग

मेरठ : फसलों पर कहर बरपाने वाली फफूंदी को नष्ट करने के लिए कृषि विभाग ने कमर कस ली है. इस में किसानों का भी सहयोग लिया जाएगा. इस में फफूंदी जनित रोगों से बीजों की बोआई के समय ही निबटने की योजना बनाई गई है. इस के लिए रसायनों व कीनाशकों पर कृषि विभाग किसानों को अनुदान भी देगा. खेतों में तैयार हो रही फसलों पर फफूंदी जनित रोगों का हमला होने के बाद इन से निबट पाना बड़ा मुश्किल होता है. कंडुआ, करनाल बंट और झुलसा जैसे फफूंदी जनित रोगों से निबटने के लिए रसायनों का सहारा लिया जाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है.

इस से फसलों के साथसाथ किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है. अधिक खर्च होने के कारण अधिकांश किसान रसायनों का छिड़काव नहीं करते, जिस से ये रोग फसलों को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं.

फसलों को इन रोगों से बचाने के लिए शासन ने कृषि विभाग को युद्धस्तर पर अभियान छेड़ने के निर्देश दिए हैं. हापुड़ के जिला कृषि रक्षा अधिकारी डा. सतीश मलिक ने बताया कि फफूंदी जनित रोगों से निबटने के लिए बीजशोधन सब से कारगर तरीका?है. कृषि अधिकारियों ने बताया कि गेहूं में करनाल बंट और कंडुआ रोग से हर साल बहुत फसल बरबाद होती है, इसलिए पोलियो उन्मूलन की तर्ज पर इन रोगों के खिलाफ किसानों के साथ मिल कर अभियान छेड़ा जा रहा है. बीजशोधन कर के इन रोगों पर पूरी तरह नियंत्रण पाया जा सकता है. इस के लिए ट्राइकोडर्मा, बैसियान बेवेरिया, सूडोनोमास नामक बायोपेस्टीसाइड का इस्तेमाल करना चाहिए. इस के लिए किसानों को 50 फीसदी का अनुदान दिया जा रहा है. बीजशोधन के लिए इस्तेमाल होने वाले थीरम और कार्बांडाजिम रसायनों पर भी अनुदान दिया जा रहा है. इस प्रयास के सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं.

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तबाही

नोटबंदी से किसानों का बंटाधार

नागपुर : नोटबंदी के फैसले ने विदर्भ के संतरा किसानों का बंटाधार कर दिया. नोटबंदी से पहले जो संतरे 30000 रुपए प्रति टन बिक रहे थे, अब नकदी की कमी के चलते उन की कीमतें कम मिल रही हैं. अच्छी फसल और कमाई की उम्मीद कर रहे किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया. नोटबंदी के बाद संतरे की फसल की कीमत 30000 रुपए प्रति टन से गिर कर सीधे 10000 रुपए प्रति टन हो गई. संतरा उत्पादक किसानों की हालत मरता क्या न करता वाली हो गई. वे ज्यादा दिनों तक रुक नहीं सकते थे, क्योंकि पेड़ से तोड़े जाने के बाद 5 से 7 दिनों के अंदर संतरे का इस्तेमाल हो जाना चाहिए, वरना वे खराब होने लगते हैं. इसलिए कम कीमत में बेचाने पड़ रहे हैं. अमरावती जिले के संतरा उत्पादक ताज खान 150 एकड़ जमीन पर संतरे की खेती करते हैं. वे कहते हैं कि नोटबंदी के कहर से संतरा बाजार धीरेधीरे उबरने लगा है. 10 दिन पहले की तुलना में संतरे की कीमतें औसतन 25000 रुपए प्रति टन तक पहुंची हैं. ताज खान कहते हैं कि नोटबंदी से पहले संतरे का लेनदेन पूरी तरह से नकद में हुआ करता था, पर अब चेक से भुगतान होने लगा है, क्योंकि किसी के पास पैसा ही नहीं है.

बेबसी
हार कर नहर में कर डाली खेती

गोंडा : उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों की तरह गोंडा जिले की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं?है. जिले में मौजूद नहरों के हाल एकदम बेहाल हैं. कई सालों से नहरों में पानी नहीं मिलने से नाराज किसानों ने हार कर नहरों में ही खेती करना चालू कर दिया है. गोंडा के तरबगंज व कटरा इलाकों में ऐसी तमाम नहरें हैं, जिन में रबी की आलू, मटर, सरसों व गेहूं जैसी फसलें उगाई जा रही हैं. किसानों का कहना है कि अपने खेतों की सिंचाई के लिए उन्होंने अपनी महंगी जमीनें मुहैया कराईं. नहरें तो बनीं, मगर कई साल गुजरने के बावजूद नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया. किसानों का कहना?है कि वे तो खाली पड़ी नहरों की जमीनों का सही इस्तेमाल कर रहे हैं. सरयू नहर परियोजना का जिले में बुरा हाल है. यों तो यह योजना पिछले 38 सालों से पूर्वांचल के 10 जिलों में चल रही?है, पर अभी तक इस की नहरें ठप पड़ी हैं. 50 से ज्यादा नहरें तो ऐसी हैं, जिन की खुदाई के बाद से उन में बिलकुल पानी नहीं छोड़ा गया. कटरा की सवांगपुर, छिटनापुर व सोनहारा की नहरें इसी किस्म की नहरें हैं. सरयू नहर परियोजना में दर्जनों नहरें हकीकत में सूखी हैं, पर कागजों में बाकायदा चल रही हैं.

कामयाबी
कृषि मंत्री ने गिनाए कारगर काम

नई दिल्ली : पिछले दिनों नई दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कृषि मंत्री ने केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले कामों का बढ़चढ़ कर बखान किया. उन्होंने बताया कि कृषि मंत्रालय ने जमीन की उर्वरा कूवत की जांच के लिए सायल हेल्थ कार्ड योजना पर जोर दिया है. इस योजना के तहत 12.82 करोड़ कार्ड बनाए जाते?हैं. इन में से अब तक 4.31 करोड़ कार्ड तैयार हो चुके?हैं और 4.25 करोड़ कार्ड किसानों को बांटे जा चुके हैं. 2016 में 2.33 करोड़ मिट्टी के नमूने जमा किए गए हैं, जिन की जांच की जा रही है. कृषि मंत्री ने कहा कि भारत में इस बीते साल में दूध के उत्पादन में 6.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई?है और दूध की बिक्री में भी इजाफा हुआ?है. नवंबर 2016 में रोजाना दूध की बिक्री 64.55 करोड़ रुपए की थी, जो दिसंबर 2016 में रोजाना 74.25 करोड़ रुपए तक पहुंच गई.

कृषि मंत्री ने बताया कि पिछले साल की तुलना में 2016 में कई सूबों में बीजों की बिक्री में भी इजाफा हुआ है. खासकर महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश सूबों में बीजों की बिक्री ज्यादा बढ़ी है. उन्होंने खेती के क्षेत्र में उठाए गए अन्य कदमों का जिक्र करते हुए कहा कि फसलों के समर्थन मूल्यों में इजाफा किया गया है.

मधुप सहाय, भानु प्रकाश व बीरेंद्र बरियार

सवाल किसानों के

सवाल : गेहूं के खेत में नहर से सिंचाई करते?हैं, लेकिन इस से पौधे पीले पड़ जाते?हैं. क्या करूं?

-एसएमएस द्वारा

जवाब : नहर की सिंचाई में खेत में काफी पानी भर जाता है, जबकि गेहूं को हलकी सिंचाई की जरूरत होती है. ज्यादा पानी देने से पौधे पीले पड़ जाते?हैं, लिहाजा खयाल रखें कि गेहूं के खेत में?ज्यादा पानी न भरने पाए.

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सवाल : गन्ना कटने के बाद जो पत्तियां खेत में रह जाती?हैं, उन्हें खेत में मिलाने के लिए किस मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए? क्या इस मशीन से गन्ने की जड़ें भी जमीन में मिल जाती?हैं? यह मशीन करीब कितने रुपए की मिलेगी?

-एसएमएस द्वारा

जवाब : गन्ने की पत्तियों को खेत में मिलाने से दीमक वगैरह का प्रकोप हो सकता है. गन्ने की कटाई के बाद गन्ने के?ठूंठों को जमीन से मिला कर काटने के लिए स्टबल रोवर के नाम से यंत्र आता?है. इस से?ठूंठों को काट कर पत्तियों को खेत में बिछा दिया जाता है, जिस से कल्ले ज्यादा निकलते हैं. यह यंत्र 25000 रुपए में मिलता है.

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सवाल : डालर चने के पौधे पीले पड़ रहे हैं, क्या करूं?

-एम पाटीदार, एसएमएस द्वारा

जवाब : चने के पौधे खेत में उकठा का प्रकोप होने पर या खेत में जरूरत से ज्यादा नमी होने पर पीले पड़ते हैं. चने की बोआई हमेशा मेंड़ों पर करें. यदि उकठा का प्रकोप दिखाई दे तो किसी फफूंदीनाशक दवा का इस्तेमाल करें.

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सवाल : भिंडी बोने का सही समय क्या?है?

-अजीत कुमार, एसएमएस द्वारा

जवाब : भिंडी बोने का सही समय 15 फरवरी से 15 मार्च के बीच है.

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सवाल : एलोवेरा की खेती व बीज की जानकारी दें?

-एसएमएस द्वारा

जवाब : ऐलोवेरा की खेती सिंचित व असिंचित दोनों तरह की जमीन में की जाती?है. इस में पौधे से पौधे की दूरी 40 सेंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 50 सेंटीमीटर रखते?हैं. 1 हेक्टेयर में इस के करीब 50000 पौधे लगते?हैं. इस की रोपाई जुलाईअगस्त में की जाती?है. इस के पौधे सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौ. वि. वि. मेरठ और सुशीला देवी हर्बल मार्डन, ऋषिकेश से हासिल किए जा सकते?हैं.

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सवाल : अरहर के पौधों में कहीं फूल लगे?हैं, कहीं फलियां लग रही?हैं, लेकिन आजकल कोहरा छाया रहता?है. क्या कोहरे से फसल को कोई नुकसान होगा? अगर हां, तो बचाव के लिए क्या करना होगा.

-एसएमएस द्वारा

जवाब : जब अरहर में फूल बनना बंद हो जाए, तभी खेत में हलकी सिंचाई कर के कोहरे व पाले से फसल को बचाएं या खेत के चारों ओर आग सुलगा दें. अगर मुमकिन हो तो किसी कृषि वैज्ञानिक से खेत की जांच कराएं.

दिक्कत आप की दवा फार्म एन फूड  की

खेतीकिसानी से जुड़ी अपनी समस्याएं हमें लिख कर भेजें. आप की समस्याओं का समाधान एक्सपर्ट करेंगे. समस्या के साथ अपना नाम व पता जरूर लिखें. आप हमें स्रूस् भी कर सकते हैं.

सवाल जवाब विभाग, फार्म एन फूड ई-3, झंडेवालान एस्टेट, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-55, नंबर: 08447177778 पत्रिका में छपे लेखों व बातों पर आप की राय आमंत्रित है. अगर आप किसी खास लेख/लेखक के बारे में कुछ और कहना या जानना चाहते हैं, तो कृपया हमें इस पते पर लिखें : खतोकिताबत, फार्म एन फूड,ई-3, झंडेवालान एस्टेट, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055. या स्रूस् द्वारा इस फोन नंबर 08447177778 पर भेजें.

फसल अवशेष मशीन से बनाएं खाद

कुछ सालों पहले तक किसानों के लिए उन के खेतों में पैदा होने वाली हर चीज काम लायक होती थी. खाने के लिए अनाज के अलावा बाकी बचे पुआल, भूसा व गन्ने की पत्तियों को मवेशियों के लिए चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन अब अवशेष किसानों को बेकार लगने लगे हैं. वे इन अवशेषों को खेतों में ही जलाने लगे हैं. किसान सब कुछ जानते हुए भी यह काम कर रहे हैं, जिस के तमाम बुरे नतीजे सामने आ रहे हैं. इस से वातावरण खराब हो रहा है. इस से धरती का तापमान बढ़ता है और खेतों की मिट्टी की फसल पैदावार कूवत कम होती है. इस से जमीन कठोर हो जाती है और कुदरती वनस्पति व जीवजंतु आदि नष्ट हो जाते हैं. तमाम तरह के पक्षी खत्म होने की कगार पर हैं, जो कीटपतंगों को खा कर फसल की रक्षा भी करते हैं. ये सब ऐसे नुकसान हैं, जिन्हें किसान नजरअंदाज कर रहे हैं. हम सभी को पता है कि फसल के अवशेषों को खेतों में जलाने पर बहुत वायु प्रदूषण बढ़ता है. अभी पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकार को आदेश दिया था कि वे किसानों के फसलों के अवशेषों को जलाने पर रोक लगाएं. तमाम प्रगतिशील व समझदार किसानों ने इस बात को समझा और माना भी. उन्होंने अपने धान के पुआल को रोटावेटर जैसी मशीनों से खेत में मिला कर सड़ा कर खाद में बदल दिया.

फतेहाबाद, हरियाणा के ऐसे ही एक किसान सुखविंदर सिंह संधु हैं, जिन्हें कई बार सरकार सम्मानित कर चुकी है. उन्होंने भी पिछले 5 सालों से अपने खेत के अवशेष नहीं जलाए हैं. उन का मानना?है कि फसलों के अवशेषों से बढि़या कोई खाद नहीं हो सकती. उन्होंने बताया कि वे फसल के अवशेषों को ट्रैक्टर से जोत कर जमीन में ही मिला देते?हैं, जिस से जमीन में कार्बनिक पदार्थ बढ़ते?हैं. किसानों को समझना चाहिए कि खेत की ऊपरी सतह में ही तमाम जरूरी पोषक तत्त्व होते हैं, जो आग लगाने के कारण नष्ट हो जाते हैं, लिहाजा फसल के अवशेषों को खेत में न जला कर उन से खाद बना देनी चाहिए. 1 एकड़ खेत में करीब 3 से 4 टन तक गन्ने की पत्तियां होती हैं, उन पत्तियों को अगर मशीन से खेत में जोत दिया जाए, तो एक तरफ तो प्रदूषण नहीं होगा और दूसरी तरफ जो खाद बनेगी उस से जमीन की पैदावार कूवत बढ़ेगी. इस से पैसे की भी बचत होगी.

शुगरकेन ट्रैश श्रेडर मशीन
(शुगरकेन लीफ कटर)

गुरु एग्रो इंडस्ट्रीज की यह मशीन बहुत कम समय में अच्छे खासे एरिए की गन्ने की पत्तियों आदि का चूरा कर के खाद बना देती है. इस कंपनी से जुड़े विक्की ने बताया कि इस मशीन के इस्तेमाल से भारी मात्रा में खाद हासिल होती है, जो जमीन को उपजाऊ बनाने में कारगर होती है. इस से पानी की बचत होती और घासफूस से छुटकारा भी मिलता है. भारत सरकार से मान्यता प्राप्त इस शुगरकेन लीफ कटर को 50 हार्स पावर या इस से ज्यादा हार्स पावर के ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है. इस मशीन की कीमत 1,75,000 रुपए से ले कर 1,92,000 रुपए तक है. मशीन से संबंधित ज्यादा जानकारी के लिए कंपनी के नंबरों 01652-232998, 228698 व मोबाइल नंबर 09876126998 पर बात कर सकते हैं. 

मास्किओ गास्पार्दो का टर्मिनेटर

इस टर्मिनेटर मशीन के बारे में मेरठ के मशीन विक्रेता सुरेंद्र सिंह वर्मा ने बताया कि अच्छी तकनीक और बेहतर डिजाइन के साथ बनाई गई यह श्रेडर मशीन टर्मिनेटर के नाम से हमारे पास उपलब्ध है. यह पुआल, पत्ती व डंठल जैसे फसल अवशेषों को बारीक करने के लिए बेहतर क्वालिटी का कृषि यंत्र है. यह गन्ने की पत्तियों, गेहूं व धान आदि फसलों के अवशेषों का खेत में ही चूरा बना कर खेत के लिए खाद तैयार करती है. इटैलियन तकनीक पर बनी यह श्रेडर मशीन 2 साइजों 6 फुट व 7 फुट में मिलती है, जिन की कीमत लगभग 1,56,000 व 1,61,000 रुपए है. इन मशीनों के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप सुरेंद्र सिंह वर्मा के मोबाइल नंबर 7830422722 पर बात कर सकते हैं.

किसान नेता चौधरी चरण सिंह की 114वीं वर्षगांठ पर किसान मेला और किसान सम्मान दिवस

यकीनन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह किसानों के सच्चे हितैषी थे. वे सही मानों में एक किसान नेता थे और हर हाल में खेतीकिसानी और किसानों का भला ही चाहते थे. वे आजकल के तमाम नेताओं से कतई अलग थे. आजकल के नेता महज वोटों के लिए किसानों को मुद्दा बनाते हैं, वरना उन्हें किसानों की खस्ता हालत से कोई सरोकार नहीं होता. किसानों के रहनुमा माने जाने वाले चौधरी चरण सिंह की 114वीं सालगिरह के मौके पर मुरादनगर, गाजियाबाद में  शानदार मेले का आयोजन किया गया. इस मेले के दौरान ही प्री रबी गोष्ठी भी की गई और जिले के खासखास किसानों को सम्मानित भी किया गया. गाजियाबाद के पूर्व विधायक/सांसद प्रतिनिधि नरेंद्र सिसौदिया द्वारा चौधरी चरण सिंह की तस्वीर पर माला चढ़ाने के बाद कार्यक्रम की शुरुआत की गई.

मनौटा गांव के काफी बड़े दायरे में फैले वीएस फार्म हाउस में इस शानदार मेले को लगाया गया था. खास मेहमानों व मुख्य मेहमान के लिए शानदार मंच सजाया गया था. खूबसूरती से मंच के दोनों ओर देश की नामी कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ के बैनर भी सजे हुए थे. ‘फार्म एन फूड’ ने तो अपनी मौजूदगी मेले के मुख्य गेट से ही दर्ज करा दी थी. मेले में लगाए गए तमाम स्टालों के बीच ‘फार्म एन फूड’ का स्टाल अपनी अलग ही छाप छोड़ रहा था. तमाम किसान और मेले के दर्शक ‘फार्म एन फूड’ के बारे में ज्यादा से ज्यादा पूछताछ कर रहे थे और इसे हासिल करने का फार्म मांग रहे थे. मेले के दूसरे स्टालों पर भी खेती से जुड़ी खास चीजें मौजूद थीं, जिन्हें उन के प्रतिनिधि दर्शकों को दिखा रहे थे. कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर का स्टाल भी ‘फार्म एन फूड’ के स्टाल के ऐन बगल में लगा था. इस स्टाल में भी खेती से जुड़ी तमाम जानकारियां मौजूद थीं.

मेले के उद्घाटन के बाद कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद के कार्यक्रम समन्वयक और इंचार्ज डा. हंसराज सिंह ने आने वाले किसानों और दर्शकों का स्वागत किया और कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा की जा रही गतिविधियों का खुलासा किया. डा. हंसराज सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र की तमाम गतिविधियों पर रोशनी डालने के अलावा कुछ मुद्दों को खासतौर पर ज्यादा उभारा. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र की मिट्टी जांच लैब का जिक्र करते हुए कहा कि कोई भी किसान अपने खेत की मिट्टी की जांच वहां बेहद मामूली फीस चुका कर करा सकता है. उन्होंने किसानों को जांच के लिए मिट्टी का नमूना लेने का तरीका भी बाकायदा समझाया.

डा. हंसराज सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र की जैव प्रयोगशाला में दी जा रही सुविधाओं का भी विस्तार से जिक्र किया. उन्होंने किसानों का मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाए जाने की जानकारी भी दी. मेले में मौजूद जिले के किसान नेता संजय त्यागी ने कृषि विज्ञान केंद्र गाजियाबाद द्वारा चलाई जा रही गतिविधियों की तारीफ करते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रम समयसमय पर होते रहने चाहिए. उन्होंने माना कि कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को खेती की नईनई जानकारियां मुहैया कराई जाती हैं. कृषि विज्ञान केंद्र के अभियंत्रण वैज्ञानिक डा. पीएस तिवारी ने किसानों को खेती के नए यंत्रों के इस्तेमाल व रखरखाव की जानकारी विस्तार से दी. कृषि विज्ञान केंद्र की गृहविज्ञान विशेषज्ञा अनिता यादव ने मेले में मौजूद लोगों को अचार, मुरब्बा वगैरह बनाने के बारे में समझाया. उन्होंने हस्तशिल्प कला के बारे में भी बताया और नवजात शिशुओं व माताओं के संतुलित खाने की भी जानकारी दी.

कृषि विज्ञान केंद्र के पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डा. अरविंद कुमार ने कीटनाशकों के बेहिसाब इस्तेमाल से होने वाले नुकसानों के बारे में बताया. उन्होंने जैविक तरीके से रोगों व कीड़ों की रोकथाम के बारे में किसानों को विस्तार से बताया.

कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक

डा. अनंत कुमार ने सब्जियों की बेमौसमी नर्सरी तैयार करने की जानकारी दी. उन्होंने कद्दू वर्गीय सब्जियों लौकी, तुरई, करेला व टिंडा वगैरह की खेती से जुड़ी खास बातें भी बताईं. कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक डा. पीके मडके ने मेले में मौजूद पशुपालकों को पशुपालन से जुड़ी तमाम खास बातें बताईं. उन्होंने कहा कि अगर पशुपालक अपने पशुओं को संतुलित मात्रा में पशुआहार और मिनरल मिश्रण रोजाना दें, तो पशुओं में बांझपन की समस्या से नजात पाई जा सकती है. नरेंद्र सिसौदिया ने कहा कि चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन के मौके पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की टीम ने मनौटा मेले में मौजूद किसानों के तमाम सवालों के हल पेश किए. उन्होंने पुराना वाकया सुनाते हुए कहा  कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चौधरी चरण सिंह से कहा था कि भारत को भी रूस की तरह सामूहिक खेती करनी चाहिए, मगर चौधरी चरण सिंह ने नेहरूजी की सलाह को नकार दिया था. कृषि विज्ञान केंद्र मुरादनगर, गाजियाबाद की डा. तुलसा रानी, डा. देवेंद्र पाल, जईम खान, योगेंद्र शर्मा व नीरज यादव वगैरह ने भी मेले में खेती के बारे में अपनेअपने खयाल जाहिर किए. मंच का संचालन कृषि विज्ञान केंद्र के शस्य वैज्ञानिक डा. विपिन कुमार ने शुरू से अंत तक किया और डा. पीएस तिवारी ने आयोजन पर समापन की मोहर लगाई.

कार्यक्रम खत्म होने से पहले भारत की मशहूर कृषि मैगजीन ‘फार्म एन फूड’ की ओर से कृषि विज्ञान केंद्र के इंचार्ज डा. हंसराज सिंह, उद्यान वैज्ञानिक डा. अनंत कुमार और शस्य वैज्ञानिक डा. विपिन कुमार को पत्रिका को मिलने वाले उन के सहयोग व उल्लेखनीय कामों के लिए प्रमाणपत्र दे कर सम्मानित किया गया.

वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक
कृषि वैज्ञानिकों ने बताईं नई बातें

साल 2016 के जाने और साल 2017 के आने के मौके पर पिछले दिनों कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर गाजियाबाद में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक की गई. बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों व नामी पत्रकारों के साथ खेती की दुनिया से जुड़े तमाम माहिरों ने हिस्सा ले कर किसानों को खेती की नईनई जानकारियां मुहैया कराईं. इस बैठक में सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ के निदेशक प्रसार शिक्षा डा. रघुवीर सिंह और डा. आरबी यादव ने खासतौर पर हिस्सा लिया और अपने तजरबों से किसानों की जानकारियों में इजाफा किया. कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी (इंचार्ज) डा. हंसराज सिंह ने बताया कि केंद्र की वेबसाइट (222.द्दद्धड्ड5द्बड्डड्ढड्डस्र.द्म1द्म४.द्बठ्ठ) शुरू कर दी गई?है. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि केंद्र पर तमाम फसलों मसलन गेहूं, चना व सरसों वगैरह का प्रदर्शन कराया गया?है. उन्होंने बताया कि केंद्र में मुरगीपालन इकाई भी चल रही?है और मिट्टी जांच की लैब भी काम कर रही?है. केंद्र के शस्य वैज्ञानिक डा. विपिन कुमार ने केंद्र द्वारा पिछले साल के दौरान किए गए कामों का तफसील से खुलासा किया. इस के अलावा उन्होंने आने वाले साल में किए जाने वाले कामों से?भी किसानों को परिचित कराया.

शस्य विज्ञान के दिग्गज डा. आरबी यादव ने कहा कि वर्मी कंपोस्ट की जगह पर आर्गेनिक वेस्ट और औद्यौगिक वेस्ट का भी प्रदर्शन लगा कर देखना चाहिए. इसी सिलसिले में अपने खयाल जाहिर करते हुए निदेश प्रसार डा. रघुवीर सिंह ने कहा कि फसलों के अवशेषों को जलाना सेहत और पर्यावरण के लिहाज से मुनासिब नहीं है, लिहाजा इस मसले पर भी प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है. उन्होंने इस मामले में किसानों के लिए खास ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित किए जाने की जरूरत पर बल दिया. डा. रघुवीर सिंह ने धान की फसल में सीधी बोआई व एसआरआई विधि अपनाने की सलाह दी. उन्होंने बरसीम की नई प्रजाति के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया. डा. आरबी यादव ने कहा कि दलहनी फसलों में रेज्ड बेड तकनीकी का नतीजा बेहतर है, लिहाजा इसे जरूर अपनाया जाना चाहिए. उन्होंने धान की फसल में ब्राउन मैन्यूरिंग पर भी प्रदर्शन कराने पर जोर दिया, ताकि इस के असर को आसानी से समझा जा सके.

डा. आरबी यादव ने दलहन की फसलों में कल्चर राईजोबियम के साथ आयरन और मोलिब्डेनम जरूर देने को कहा,?क्योंकि इस से नाइट्रोजन की स्थिरता में मदद मिलती है. उन्होंने बताया कि अरहर की फसल में फूल आने से पहले नाइट्रोजन का 0.2 फीसदी का पर्णीय छिड़काव हर हालत में करें. इसी कड़ी में केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डा. अनंत कुमार ने साल 2016 में केंद्र द्वारा उद्यान के?क्षेत्र में किए गए खास कामों का खुलासा किया और आगामी साल में किए जाने वाले कामों के बारे में तफसील से बताया. केंद्र के पशु वैज्ञानिक डा. पीके मडके ने भी सभा में मौजूद कृषि जगत के माहिरों के बीच पशुपालन के बारे में किए गए खास कामों का खुलासा किया. उन्होंने पशुओं की सेहत बनाए रखने के बारे में खास बातें बताई और जानवरों की बीमारियों के बारे में भी बताया.

पशुओं के मामले में डा. आरबी यादव ने कहा कि जिन इलाकों में मवेशियों को अगोला खिलाया जाता?है, वहां पर फास्फोरस की कमी देखी जा रही है, लिहाजा इस बारे में भी केंद्र को प्रदर्शन आयोजित करना चाहिए. केंद्र के कृषि अभियंत्रक डा. पीएस तिवारी ने केंद्र में मौजूद तमाम मशीनों की जानकारी देते हुए इन की अहमियत का खुलासा किया. उन्होंने मशीनों से किसानों को होने वाले फायदों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि केंद्र द्वारा किसानों को नईनई मशीनों की जानकारी बराबर मुहैया कराई जाती है. इस बारे में डा. आरबी यादव ने कहा कि रोटावेटर का नतीजा किसानों द्वारा अच्छा नहीं बताया जा रहा, लिहाजा इस की जांच कर के रिपोर्ट किसानों तक पहुंचाना जरूरी?है. केंद्र की गृहविज्ञान की वैज्ञानिक अनिता यादव ने गृहविज्ञान के सिलसिले में केंद्र द्वारा किए गए खास कामों का खुलासा किया. उन्होंने केंद्र द्वारा महिला किसानों को जागरूक किए जाने की बातें बताईं. उन्होंने बताया कि महिला किसान पापड़, बड़ी वगैरह चीजें बनाने में खासी दिलचस्पी ले रही?हैं. केंद्र की मृदा विज्ञान की वैज्ञानिक और मृदा प्रयोगशाला की प्रभारी अधिकारी डा. तुलसा रानी ने मिट्टी जांच से जुड़े मुद्दों पर रोशनी डाली. उन्होंने इस मामले में किसानों को जागरूक करने की बात कही और बताया कि मिट्टी की जांच के लिए किसानों को पूरा सहयोग दिया जा रहा है.

केंद्र के पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डा. अरविंद कुमार ने पौध सुरक्षा के?क्षेत्र में किए गए कामों का तफसील से खुलासा किया. उन्होंने कीड़ों व बीमारियों से पौधों की हिफाजत के बारे में काफी तफसील से जानकारी दी. वैज्ञानिक सलाहकार समिति की सदस्यता और एनजीओ की सचिव नीलम त्यागी ने अपने खयाल जाहिर करते हुए कहा कि केंद्र में सोयाबीन उत्पादों के बारे में भी ट्रेनिंग दी जानी चािहए. उन्होंने यह भी कहा कि किसान महिलाओं को सिलाईकढ़ाई वगैरह की तालीम भी दी जानी चाहिए ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. कुल मिला कर केंद्र के दिग्गजों और खेती जगत के धुरंधरों के साथ आयोजित की गई वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक खासी सार्थक साबित हुई. केंद्र में मौजूद तमाम किसानों ने माहिरों की बातों को गौर से सुना. बातचीत के दौरान कई बुजुर्ग किसानों ने कहा कि वाकई कृषि विज्ञान केंद्र से उन्हें समयसमय पर भरपूर लाभ मिलता रहता?है. किसानों ने बताया कि वे माहिरों व वैज्ञानिकों की हिदायतों का पालन करने की पूरी कोशिश करते हैं.

कामुक तांत्रिक और शातिर बेगम: भाग 2

दुकान पर आने वाली लड़कियों से भी वह छेड़छाड़ करता रहता था. यही वजह थी कि गांव की कुछ आवारा किस्म की औरतों से उस के संबंध बन गए थे. उन्हीं में एक कमला भी थी.

कमला राशिद के पड़ोस में ही रहती थी. कहा जाता है कि राशिद के संबंध कमला से तो थे ही, उस के माध्यम से उस ने कई अन्य औरतों से भी संबंध बनाए थे. लेकिन बढ़ती उम्र की वजह से अब औरतें उस के पास आने से कतराने लगी थीं.

इस से परेशान राशिद को अखबारों से ऐसे तांत्रिकों के बारे में पता चला, जो तंत्रमंत्र की ओट में महिलाओं का यौनशोषण करते थे. उस ने वही तरीका अपनाने की ठान कर कमला से बात की तो वह उस का साथ देने को राजी हो गई. राशिद जानता था कि तांत्रिक बनने में डबल फायदा है. एक तो नईनई औरतें अय्याशी के लिए मिलेंगी, दूसरे कमाई भी होगी.

इस के बाद पूरी योजना बना कर उस ने दाढ़ी बढ़ा ली और पांचों वक्त का नमाजी बन गया. इस के अलावा यहांवहां से कुछ तंत्रमंत्र सीख कर वह तांत्रिक बन गया. इस में कमला ने उस का पूरा साथ दिया. अगर वह मदद न करती तो शायद राशिद की तंत्रमंत्र की दुकान इतनी जल्दी न जम पाती.

दरअसल, कमला ने ही गांव की औरतों में यह बात फैला दी कि राशिद बाबा को रूहानी ताकत ने तंत्रमंत्र की शक्ति दी है, इसलिए उन की झाड़फूंक से बड़ी से बड़ी समस्या और बड़ी से बड़ी बीमारी दूर हो जाती है. अगर इस तरह की बातें फैलानी हों तो औरतों की मदद ले लो, फिर देखो इस तरह की बात फैलते देर नहीं लगेंगी.

राशिद के मामले में भी यही हुआ था. कमला ने नमकमिर्च लगा कर देखतेदेखते राशिद को आसपास के गांवों में बड़ा तांत्रिक के रूप में घोषित कर दिया. फिर क्या था, राशिद बाबा के यहां अपनी समस्याओं के हल और बीमारियों के इलाज के लिए औरतों की भीड़ लगने लगी.

राशिद ने तो योजना बना कर ही काम शुरू किया था. उस ने अपनी तंत्रमंत्र की दुकान कुछ इस तरह जमाई कि उस के पास समस्या ले कर आने वाली महिलाओं से पहले कमला बात करती थी, उस के बाद कमला उस की पूरी बात राशिद बाबा को बता देती थी.

समस्या ले कर आई महिला राशिद बाबा के सामने जाती थी तो वह उस के बिना कुछ कहे ही उस की समस्या के बारे में बता देता था. गांव की भोलीभाली औरतें समझ नहीं पातीं कि बाबा को यह बात कमला ने बताई होगी. वे तो बाबा को अंतरयामी मान कर उन के चरणों में गिर जाती थीं.

बाबा उन की पीठ पर हाथ फेर कर उन्हें ढेरों आशीर्वाद देता. जबकि असलियत में शातिर राशिद आशीर्वाद देने के बहाने वह अपनी ठरक मिटा रहा होता था.

इस दौरान वह महिला के हावभाव पर पूरी नजर रखता था. इसी पहले स्पर्श में वह समझ जाता था कि किस महिला के साथ कैसे पेश आना है. जो महिला उस के चंगुल में फंस सकती थी, उस के लिए वह कमला को इशारा कर देता था. कमला उस औरत को धीरेधीरे बाबा की विशेष सेवा के लिए राजी कर लेती थी. इस तरह कमला की मदद से राशिद बाबा की दुकानदारी बढि़या चल रही थी, साथ ही उसे अय्याशी के लिए नईनई औरतें भी मिल रही थीं.

राशिद पैसा भी कमा रहा था और मौज भी कर रहा था. कमला को भी इस का फायदा मिल रहा था, इसलिए वह आसपास के गांवों में ऐसी महिलाओं पर नजर रखती थी, जो किसी न किसी परेशानी में होती थीं. वह ऐसी औरतों को पकड़ती थी, जो बाबा पर पैसा भी लुटा सकें और जरूरत पड़ने पर बाबा को मौज भी करा सकें.

कमला को जब मीराबाई के पति रूप सिंह की बीमारी के बारे में पता चलने के साथ यह भी पता चला कि उस के घर युवा हो रही बेटी भी है तो वह मीराबाई से मिली और उसे राशिद बाबा के बारे में खूब बढ़ाचढ़ा कर बताया.

मीराबाई परेशान तो थी ही, उस ने कमला के पैर पकड़ कर कहा कि अगर वह उस के पति की बीमारी ठीक करवा दे तो वह जिंदगी भर उस का एहसान मानेगी. कमला ने उसे भरोसा दिलाया कि वह बाबा से रूप सिंह की बीमारी ठीक करवा देगी.

इस के बाद कमला बाबा को ले कर अगले ही दिन मीराबाई के घर आ पहुंची. दुर्भाग्य से जिस समय राशिद मीराबाई के घर पहुंचा, सत्यवती सजीधजी कहीं जाने को तैयार थी. उसे देखते ही राशिद की नीयत डोल गई. उस ने मीराबाई और रूप सिंह से मीठीमीठी बातें कर के तंत्रमंत्र का नाटक करते हुए कहा कि साल भर में वह उस की बीमारी ठीक कर देगा. लेकिन इस के लिए उसे उस के यहां से दवा ला कर खानी होगी.

रूप सिंह तो चलफिर नहीं सकता था, मीराबाई उस की देखाभाल में लगी रहती थी, इसलिए तय हुआ कि सत्यवती हर सप्ताह बाबा के यहां दवा लेने जाएगी. इस के अलावा जरूरत पड़ने पर बाबा खुद आ कर रूप सिंह की झाड़फूंक कर देगा.

सत्यवती हर सप्ताह दवा के लिए नेमावर जाने लगी. राशिद बाबा ने कमला की मदद से सत्यवती पर जाल फेंकना शुरू कर दिया. उस ने सत्यवती से कहा कि उस की सरकारी अफसरों से अच्छी जानपहचान है. अगर वह चाहे तो वह उस की सरकारी नौकरी ही नहीं लगवा सकता, बल्कि अच्छे लड़के से उस की शादी भी करवा सकता है. शादी की बात सुन कर सत्यवती लजाई तो बाबा ने हंस कर उसे सीने से लगा लिया और आशीर्वाद देने के बहाने कभी पीठ तो कभी कंधे पर हाथ फेरने लगा.

सत्यवती के कंधे से सरक कर राशिद बाबा का हाथ कब नीचे आ गया, सत्यवती को पता ही नहीं चला. इसी तरह एक दिन उस ने पूजा के नाम पर उसे निर्वस्त्र कर के उस के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बना डाला. वह रोने लगी तो राशिद ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने इस बारे में किसी को कुछ बताया या दवा लेने नहीं आई तो वह अपने तंत्रमंत्र से न केवल उस के पिता की जान ले लेगा, बल्कि उस के शरीर में कोढ़ भी पैदा कर देगा.

मासूम सत्यवती को राशिद ने तो डराया ही, कमला ने भी कसर नहीं छोड़ी. उस ने सत्यवती से कहा कि बाबा ने उस के साथ जो किया है, उस से उस की किस्मत खुल गई है. बाबा जल्दी ही उस की सरकारी नौकरी लगवा देगा. उस के पिता भी एकदम ठीक हो जाएंगे. उस ने भी यह बात किसी को बताने से मना किया.

पिता की मौत और खुद को कोढ़ हो जाने के डर से सत्यवती ने बाबा के पाप को मां से छिपा लिया तो राशिद बाबा की हिम्मत बढ़ गई. सत्यवती जब भी उस के यहां दवा लेने आती, कमला की मदद से वह उस से अपनी हवस मिटाता.

बाबा की यह पाप लीला न जाने कब तक चलती रहती. लेकिन बरसात में बाबा का रंगीन मन कुछ ज्यादा ही मचल उठा. कमला को भेज कर उस ने चुपचाप सत्यवती को बुला लिया. सत्यवती घर में बता कर नहीं आई थी, इसलिए मांबाप परेशान हो उठे.

इधरउधर तलाशने पर सत्यवती नहीं मिली तो मीराबाई पुलिस तक पहुंच गई. उस के बाद तांत्रिक राशिद बाबा की पोल खुल गई. राशिद बाबा की सारी हकीकत सामने आने के बाद थानाप्रभारी तहजीब काजी ने उसे और उस की सहयोगी कमला को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.     ?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. सत्यवती बदला हुआ नाम है.

कुछ कहती हैं तसवीरें

दूध उत्पादन के मामले में भारत दुनियाभर में पहले नंबर पर है. उस में भी देश का उत्तर प्रदेश राज्य साल 2015-16 में दूध उत्पादन के क्षेत्र में सब से बड़ा राज्य रहा. डेरी से जुड़ी बारीकियों को जानने के लिए ‘फार्म एन फूड’ ने ‘गंगोल सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ’ परतापुर मेरठ, उत्तर प्रदेश में स्थित पराग डेरी का भ्रमण किया. जहां सहकारी समितियों के माध्यम से दूध पहुंचाया जाता?है. उस दूध को अनेक मापदंडों पर खरा उतरने के बाद ही आप तक पहुंचाया जाता है. कुछ तसवीरें आप के लिए.

खस्ता आलू नाश्ता मजेदार

खस्ता उत्तर भारत में शौक से खाया जाता है. आलू की सब्जी के साथ यह ज्यादा स्वादिष्ठ लगता है. सुबह के नाश्ते में यह बहुत पसंद किया जाता है. करीबकरीब हर शहर में दुकानों पर सुबहसुबह नाश्ते के लिए गरमागरम खस्ता तैयार किया जाता है. यह उड़द की दाल भर कर भी बनाया जाता है. आलू की सब्जी, मिर्च और चटनी के साथ इसे खाया जाता है. 2 से 4 खस्ते अच्छेखासे भोजन की तरह पेट को भर देते हैं. कई जगहों पर इसे जलेबी के साथ भी खाया जाता है. खस्ता और जलेबी का खाने में चोलीदामन वाला साथ होता है. शहरों की दुकानों से ले कर छोटे बाजारों तक में खस्ता खूब बिकता है. इस के कारोबार में भरपूर मुनाफा है. जरूरत है कि आप का खस्ता खाने वाले को पसंद आ जाए. इस तरह की दुकानें खोलने में लागत कम आती है, इस वजह से मुनाफा ज्यादा होता है. यह किसी सीजन का मुहताज नहीं, पूरे साल इस की बिक्री होती है.

सामग्री

मैदा 400 ग्राम, रिफाइंड तेल 100 ग्राम, धुली उड़द 70 ग्राम, हींग 1-2 चुटकी, जीरा चौथाई छोटा चम्मच, धनिया पाउडर 1 छोटा चम्मच, सौंफ पाउडर 1 छोटा चम्मच, गरममसाला आधा छोटा चम्मच, हरी मिर्च 2 बारीक कटी हुई, अदरक 1 टुकड़ा बारीक कटा हुआ, हरा धनिया 2 चम्मच बारीक कटा, नमक स्वादानुसार और तलने के लिए तेल.

बनाने की विधि

खस्ता बनाने के लिए सब से पहले दाल को 3-4 घंटे के लिए पानी में भिगो दें और दूसरी तरफ मैदे में रिफाइंड तेल और स्वादानुसार नमक डाल कर मिला लें और उसे पानी में नरम गूंध लें और फिर 20 मिनट के लिए ढक कर रख दें. भीगी हुई दाल को मिस्की में दरदरा पीस लें. कड़ाही में 2-3 टेबल स्पून तेल डाल कर गरम करें फिर उस में जीरा, हींग, धनिया पाउडर, सौंफ पाउडर, हरी मिर्च और अदरक डाल कर भून लें. फिर उस में पिसी हुई दाल मिला दें और चम्मच से धीरेधीरे चलाएं. जब वह भुन कर भूरे रंग की हो जाए तो उस में हरा धनिया और गरममसाला मिला कर 2 मिनट तक और भून लें. अब खस्तों में भरने के लिए दाल की पिट्ठी तैयार है.

खस्ता तलने के लिए कड़ाही में तेल डाल कर गैस पर रख दें. गूंधे हुए मैदे से बराबर की 20 लोइयां बना लें. हर लोई को चकले पर बेलन से थोड़ा सा बेल कर उस में 1-1 छोटा चम्मच भर के दाल की पिट्ठी रख दें. चारों ओर से लोई उठाएं और दाल को बंद कर दें. दाल भरी लोई को हथेली से थोड़ा सा दबा कर चपटा करें और फिर बेलन से कम ताकत लगा कर उसे 3-4 इंच के व्यास में बेल लें.

ध्यान रखें कि लोई फटे नहीं, इसलिए उसे थोड़ा मोटा ही रखें. बेला गया खस्ता गरम तेल में डालें और पलटपलट कर दोनों ओर से भूरा होने  तक धीमी गैस पर तलें. फिर उसे कड़ाही से निकाल कर प्लेट में नैपकिन के ऊपर रखें. आप एकसाथ 3 या 4 खस्ते तल सकते हैं. सभी खस्ते इसी तरह तल कर तैयार कर लें और हरे धनिए की चटनी या आलू की सब्जी के साथ खाएं. आलू की रसेदार सब्जी के अलावा कहींकहीं लोग इसे सूखी सब्जी के साथ खाना पसंद करते हैं, तो कई जगहों पर इसे मटर की सब्जी के साथ भी खाते हैं.

खस्ता खानेपीने की छोटीबड़ी हर दुकान में मिल जाता है. यह 10 रुपए से  कर 25 रुपए  प्रति प्लेट तक मिलता है. 1 प्लेट में आमतौरपर 2 खस्ते और सब्जी होती है. कई दुकानों में इस के साथ मीठी या तीखी चटनी भी दी जाती .

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