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सुपरहीरो बनाते हैं आपको ऐग्रेसीव

बचपन से ही कोई न कोई सुपरहीरो हमारा आईडल होता है. ऐडल्ट होने के बाद भी ये सुपरहीरो हमारे जीवन का अहम हिस्सा बने रहते हैं. पर एक नये अध्ययन के मुताबिक यह बात सामने आयी है कि वास्तविकता में सुपरहीरो की संस्कृति बच्चों में रक्षा करने की क्षमता बढा़ने के बजाए आक्रामकता को बढ़ावा देती है.

अमेरिका के बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि शिशु विद्यालय की उम्र वाले लड़के और लड़कियां भी सुपरहीरो वाली संस्कृति की तरफ बहुत तेजी से खींचे चले जा रहे है. रिसर्च में शामिल एक शोधकर्ता ने बताया, ‘बहुत सारे शिशु विद्यालय के छात्र सुपरहीरो वाली दुनिया में जीना चाहते हैं और कई माता-पिता भी यह सोचते हैं कि सुपरहीरो में विश्वास करने से उनके बच्चों को अन्य चीजों से रक्षा करने में मदद मिलेगी.’

शोधकर्ता ने आगे बताया, ‘लेकिन हमारा अध्ययन इस धारणा के बिल्कुल विपरीत है. बच्चें इससे जल्दी आक्रामक हो जाते हैं.’ शोध में पाया गया कि जो बच्चें सुपरहीरो संस्कृति के आकर्षण में जल्दी आ जाते हैं वे एक साल बाद शारीरिक तौर पर आक्रामक होने के साथ-साथ संबंधों में भी ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं.

शोध के दौरान यह भी पाया गया कि बच्चें इससे बदमाशों से अपनी रक्षा भी नहीं कर पाते हैं और उसके सामाजिक मेलजोल की भी संभावना नहीं होती है.

पद्मावती के लिए शाहिद ने किया बॉडी ट्रांसफॉर्म

​शाहीद कपूर फिल्म पद्मावती की शूटिंग में व्यस्त हैं​. फिल्म पद्मावती में वह अपने करियर का अबतक का सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार निभा रहे हैं. फिल्म में राजा रतन सिंह के रूप में नजर आने वाले शाहिद किरदार को स्क्रीन पर असल दिखाने के लिए पुरे जीजान से लगे हुए हैं.

​शाहिद कपूर को इंडस्ट्री में अपने डिसिप्लिन और प्रोफेशनल होने के लिए पहचाना जाता है. शाहिद ने  एक पूरा बूट शिविर किया है और प्रशिक्षक समीर जौरा के मार्गदर्शन में अपनी बॉडी पर काम किया.

शाहिद दिन भर काम करने के अलावा हर रोज दिन में 2 घण्टे व्यायाम करते हैं, साथ ही शाहिद 40 दिन के सख्त डाइट पर हैं, उस डाइट में 50 ग्राम ब्राउन राइस, उबली हुई सब्जियां पुरे दिन के लिए होती है. बस इतना ही नहीं उनके इस डाइट नमक और शक्कर 15 दिनों के लिए पूरी तरह से गायब है.

​शाहिद कपूर अपने फिल्म के करियर में अलग अलग रूप में नजर आये हैं, लेकिन फिल्म पद्मावती में शाहिद का लुक अब तक का सबसे अलग होगा जो दर्शको ने अभी तक देखा नहीं होगा. ​वे दिन के 14 घंटे की शिफ्ट में काम तो कर ही रहे हैं साथ ही हर रोज 2 घंटे कसरत करते हैं.

​शाहिद के ट्रेनर समीर कहते हैं कि "हमारा  ​उद्देश्य था की शरीर का फैट कम किया जाए और मसल्स को बढ़ाया जाये. हमने उनकी ट्रेनिंग और डाइट शूटिंग शुरू होने के 40 दिन पूर्व से शुरू की थी, शूटिंग के 15 दिन पहले उनके डाइट से नमक और शक्कर को पूरी तरह से बंद किया गया था. अब शाही वेशभूषा वाले सीन्स शुरू हो गये हैं जिसमे वे बखूबी जच रहे हैं. 

आसानी से बदलवायें अपना ऐड्रेस प्रूफ

आपको अकसर ऐड्रेस प्रूफ की जरूरत पड़ती है. बैंक अकाउंट खुलवाना हो या पैन कार्ड बनवाना हो ऐड्रेस प्रूफ एक अहम दस्तावेज है. जब आप बैंक में केवाईसी डॉक्युमेंट्स जमा करते हैं तो उसमें भी ऐड्रेस प्रूफ की जरूरत पड़ती है. और कई बार लोगों के पास ऐड्रेस प्रूफ ही नहीं होता है.  

इसकी सबसे बड़ी वजह है समय-असमय आवास का बदलना. चाहे कोई नौकरीपेशा हो या बिजनस करने वाले, पर काम के सिलसिले में सबकों घर और शहर बदलना ही पड़ता है. इसकी वजह है चाहे नौकरीशुदा लोग हों या बिजनस करने वाले, सबको काम के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है. जैसे ही आवास बदलता है, किसी भी व्यक्ति को नए ऐड्रेस प्रूफ की जरूरत पड़ती है. पर इतनी जल्दी ऐड्रेस प्रूफ कैसे मिले? आप इन तरीकों से आसानी से ऐड्रेस प्रूफ हासिल कर सकते हैं.

1. पोस्ट ऑफिस

पोस्ट ऑफिस से आप आसानी से ऐड्रेस प्रूफ प्राप्त कर सकते हैं. आपको अपने नजदीकी पोस्ट ऑफिस पर जाकर ऐड्रेस प्रूफ बदलने के लिए ऐप्लाई करना होगा. पोस्टमैन आपके घर पर आकर वेरीफिकेशन करेगा और आपको ऐड्रेस प्रूफ देगा. 5-7 दिन के अंदर आपको ऐड्रेस प्रूफ मिल जाएगा. अगर आप पीजी या किराए के मकान में रहते हैं तो भी आप पोस्ट ऑफिस से ऐड्रेस प्रूफ प्राप्त कर सकते हैं.

2. आधार कार्ड है ना?

आधार कार्ड से ऐड्रेस प्रूफ बदलवाना काफी आसान है. यह आसान होने के साथ-साथ घर बैठे भी किया जा सकता है. इसके लिए आपको http://uidai.gov.in/update-your-aadhaar-data.html पर जाना होगा. यहां पर आप अपने नए पते की स्कैन की हुई कॉपी अपलोड करें. 1-2 दिन में ही आप नए ऐड्रेस प्रूफ का ई-आधार डाउनलोड कर सकते हैं.

अगर आपने अपनी नौकरी, जॉब लोकेशन या बिजनेस शिफ्ट किया है तो ये डॉक्यूमेंट भी आपके काम आ सकते हैं:

1. रेंट अग्रीमेंट

आपने अगर मकान किराए पर लिया है तो ध्यान से मकान का ओनर से रेंट ऐग्रीमेंट बनवा लें. ये भविष्य में आप ही के काम आएगा. कई बार कुछ पैसे बचाने के लिए लोग रेंट ऐग्रीमेंट नहीं बनवाते हैं. ऐसा करने से बचें.

2. रजिस्टर्ड कंपनी का लेटरहेड पर लिखा हुआ लेटर.

3. कंपनी द्वारा जारी किया गया फोटो आईडी कार्ड.

4. सरकारी फोटो आईडी कार्ड.

आमतौर पर सरकारी नौकरी वालों और पब्लिक सेकटर में काम करने वालों को फोटो आईडी की दिक्कत नहीं होती. प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत लोग एचआर डिपार्टमेंट से फोटो आईडी मांग सकते हैं. अगर एचआर डिपार्टमेंट आनाकानी करे तो आप रेंट एग्रीमेंट का इस्तेमाल कर सकते हैं. 

तालिबान से भारत को खतरा

तालिबानियों को रूस, चीन व पाकिस्तान का सीमित समर्थन मिलने का मतलब है कि भारत के लिए आतंकवादियों से खतरा बढ़ना. मास्को में दिसंबर के अंत में तीनों देशों ने इस बारे में अनौपचारिक बातचीत की और कुछ हद तक तालिबानियों को अफगानिस्तान में डटे रहने की छूट दे दी है. सीरिया और इराक में इसलामिक स्टेट के जिहादियों की हार से मुसलिम कट्टरपंथियों के हौसले कम नहीं हुए हैं और अब वे फिर से अफगानिस्तान में जमा होने लगे हैं. और काबुल की अमेरिका व भारत समर्थित सरकार मुंह देख रही है कि हवा किस ओर की है. काबुल में राज कर रहे 2 धड़ों में विवाद चल रहा है, तालिबान के नियंत्रण में अफगानिस्तान का जो हिस्सा है, वहां वह चैन से मनमरजी कर रहा है.

इस का अर्थ है कि भारत की आतंकवाद से निबटने की उम्मीदें और कम हो गई हैं. अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनेआप में खब्ती हैं और वे कब क्या फैसला लेंगे, इस का किसी को पता नहीं. उन्होंने चुनावों के दौरान यही कहा कि उन्हें अमेरिकियों से मतलब है, विश्व सिक्योरिटीमैन बनने की उन की कोई इच्छा नहीं. अफगान तालिबानियों के लिए भारत का कश्मीर शहद का छत्ता है जिस के लालच में वे पाकिस्तान ही नहीं, पूरे मध्यएशिया के मुसलिम कट्टरपंथियों को आकर्षित कर उन्हें कश्मीर में उत्पात मचाने के लिए तैयार कर सकते हैं. भारत को तालिबानियों से निबटने के लिए अकेले ही तैयार होना होगा. तालिबानियों का कट्टरपन और जिहादीपन ऐसा है कि हमारे लिए उन्हें कंट्रोल करना आसान नहीं है. भारत की विदेश नीति हमेशा ढुलमुल रही है और उस में स्वार्थ कम, अंधभक्ति ज्यादा रही है. दुश्मन को साथी बनाना हमारे रजनीतिक दल जानते हैं, पर हमारा विदेश मंत्रालय नहीं.

नरेंद्र मोदी : पास या फेल

26 मई, 2014 को जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब भगवा खेमे के 5-6 फीसदी लोगों को छोड़ बाकियों ने बड़े तटस्थ और निरपेक्ष भाव से यह सोचते सत्ता मोदी के हाथ में सौंप दी थी कि चलो, एक दफा इन्हें भी देख लेते हैं, हर्ज क्या है. बातें तो इन्होंने दूसरों के मुकाबले ज्यादा बड़ीबड़ी की हैं कि ये कर दूंगा वो कर दूंगा, अब देखते हैं क्याक्या चमत्कार होते हैं. उन का यह भी कहना था कि कांग्रेस और गांधीनेहरू परिवार देश को खोखला कर रहे थे, वे उसे मजबूती देंगे.

लोगों ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया था तो उस की एक अहम वजह वाकई कांग्रेस का कुशासन था, जिस से लोग आजिज आ गए थे. दूसरी बात, नरेंद्र मोदी का अपनी ही पार्टी के कई दिग्गजों को धकिया कर खुद को अधिकृत तौर पर प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करवा लेना था.

यह वाकई 2014 की राजनीति के लिहाज से अनूठी बात थी. लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह और मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और राजनाथ सिंह हैरानी से मोदी का धुआंधार चुनावी प्रचार देख सकते थे. 2 महीने दिनरात एक कर नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में आम सभाएं कीं और खुद को एक चमत्कार के रूप में पेश करने में इतने कामयाब हुए कि ‘हरहर मोदी, घरघर मोदी’ जैसे नारे लगने लगे थे.

‘अब की बार, मोदी सरकार’ नारा भी चला और जब चुनावी सम्मोहन टूटा तो नरेंद्र मोदी नए प्रधानमंत्री के रूप में लोगों के सामने नए वादों व इरादों के साथ मौजूद थे. उस वक्त उन के कई घोर विरोधी भी उन की जीत को पुरुषार्थ और पराक्रम बता रहे थे. देश का बदलना शुरू नहीं हुआ था बल्कि हुआ इतना भर था कि सत्ता में कांग्रेस की जगह भाजपा आ गई थी जिस ने कांग्रेस के ही नक्शेकदम पर चलना शुरू किया था. यह बात नरेंद्र मोदी ने अपना मंत्रिमंडल बनाते साबित भी कर दी थी जब उन्होंने अरुण जेटली और स्मृति ईरानी जैसे पिटे चुनावी चेहरों को वरिष्ठ मंत्री बनाया था. अरुण जेटली को वित्त और रक्षा जैसे अहम मंत्रालय दिए गए तो पेशे से अभिनेत्री स्मृति ईरानी को  मानव संसाधन जैसा महत्त्वपूर्ण विभाग दे दिया गया था.

कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वाले नरेंद्र मोदी ने पहला काम ही कांग्रेसी कल्चर वाला किया तो कुछ ही लोगों को समझ आया था कि मोदी उतने अनाड़ी, भावुक, समर्पित या प्रतिबद्ध हैं नहीं, जितना कि उन्होंने खुद को पेश किया था. बिलाशक, यह प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार की बात है कि वह यह तय करे कि किसे मंत्रिमंडल में लेना है, किसे नहीं. लेकिन जब उन्होंने इन दोनों की नियुक्ति के मामले में काबिलीयत को नजरअंदाज किया तो आगे क्याक्या होना है, यह अंदाजा भी लोगों को हो गया था कि मोदी जिद्दी हैं, वे किसी की सुनेंगे नहीं.

अरुण जेटली क्यों मोदी की मजबूरी हो गए थे और आज भी हैं, देशहित के मद्देनजर इस की कोई कीमत नहीं, पर भाजपा के अंदर है. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का खेमा खुश नहीं था जिसे ले कर मोदी आशंकित भी थे कि कहीं ऐसा न हो कि यह गुट बगावत कर दे. प्रमोद महाजन की मौत के बाद अघोषित तौर पर फंड मैनेजर का रोल निभा रहे अरुण जेटली एक जुगाड़तुगाड़ वाले नेता हैं जिन का अपना जनसमर्थन नहीं है लेकिन मोदी के बेहद करीबी व भरोसेमंद हैं. एकसाथ 2 भारीभरकम मंत्रालय दे कर मोदी ने एक तरह से उन्हें नंबर दो घोषित कर दिया था.

अमृतसर की जनता द्वारा नकार दिए गए अरुण जेटली से मंत्रिमंडल के पहले फेरबदल में रक्षा मंत्रालय वापस ले लिया गया था तो यह भी पार्टी स्तर की एक व्यवस्था थी जिस पर जेटली को कोई एतराज नहीं था जिन का इकलौता काम प्रधानमंत्री की हर हां में हां मिलाना था.

सासबहू वाले सीरियलों से लोकप्रिय हुईं स्मृति ईरानी को राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने और हारने के एवज में पुरस्कृत किया गया. स्मृति ईरानी उन कुछ गिनेचुने मंत्रियों में से थीं जिन्हें नहीं मालूम था कि उन्हें क्या करना है. उन के कामकाज और उन की नाकाबिलीयत पर उंगलियां उठीं तो वक्त रहते मोदी ने उन्हें पदावनत कर दिया वरना जेएनयू और कन्हैया कुमार के मुद्दे पर सरकार की निरर्थक किरकिरी करा देने वाली स्मृति की शैक्षणिक योग्यताओं पर भी सवाल उठने लगे थे.

इस मामले में भी वे बचकाने ढंग से खुद को पर्याप्त शिक्षित बताती एक झूठ बोल बैठीं और उसे सिद्ध करने के लिए बचकाने अंदाज में ही एक शौर्टटर्म विदेशी कोर्स का प्रमाणपत्र भी पेश कर बैठीं. नरेंद्र मोदी ने उन्हें आखिरकार कपड़ा मंत्रालय में भेज दिया.

8 नवंबर की नोटबंदी के ऐतिहासिक फैसले में अरुण जेटली की भूमिका मात्र एक सहायक उद्घोषक की ही थी. जब तक लोगों को समझ आ गया था कि हमेशा खुद को व्यापारी बुद्धि वाला कहते रहने वाले नरेंद्र मोदी ने बेवजह जेटली को वित्त मंत्री नहीं बनाए रखा है.

मोदी क्या करेंगे, यह उत्सुकता आम लोगों में इसलिए भी थी कि वे कांग्रेसी शैली से मुक्त शासन को देखना चाहते थे जिस में परिवारवाद, भ्रष्टाचार, महंगाई और भय वगैरा न हों. इधर, मोदी सत्ता के साथसाथ भाजपा संगठन पर भी शिकंजा कस रहे थे जिस से कि उन्हें मनमरजी करने में कोई अड़ंगा पेश न आए.

किसी भी नए प्रधानमंत्री के लिए पहले स्वतंत्रता दिवस पर दिया जाने वाला भाषण बड़ा अहम होता है. इस भाषण से लोग अंदाजा लगाते हैं कि  सरकार और प्रधानमंत्री देश व देशवासियों के लिए क्या करने वाले हैं. अपने पहले ही भाषण में नरेंद्र मोदी ने जब जनधन योजना शुरू करने का ऐलान किया और उस के फायदे गिनाए तो न अर्थशास्त्रियों को इस में कोई दम दिखा था और न ही आम लोगों को उन की असल मंशा समझ आई थी कि सभी लोग अगर बैंकिंग से जुड़ जाएंगे तो कौन सी आर्थिक क्रांति का सूत्रपात हो जाएगा और लोगों को रोजगार या पैसा कहां से मिलेगा. यह, दरअसल, देश की 60 फीसदी गरीब जनता के मन में एक उत्सुकता पैदा करने वाली बात थी जिस ने कभी बैंक की दहलीज पर पांव नहीं रखा था. इस वक्त तक चुनावी खुमारी पूरी तरह उतरी नहीं थी और इन्हीं अभावग्रस्त 60 फीसदी लोगों के दिलोदिमाग में नरेंद्र मोदी का वह वादा लालच के रूप में कील की तरह ठुक चुका था कि विदेशों में जमा जो कालाधन लाने का चमत्कार मोदी जी करने वाले हैं यह उस की शुरुआत है. चुनाव के समय कहा यह गया था कि 15-15 लाख रुपए बैंक खाते में जमा किए जाएंगे, इसलिए मुफ्त का खाता खुलवाने में हर्ज क्या है. इस में अपनी जेब से तो कुछ जा नहीं रहा. उलटे, कभी आया तो उसे निकालने में सहूलियत रहेगी.

फ्लौप जनधन योजना

इस योजना का अहम मकसद आम लोगों को बैंकिंग से जोड़ना था. इस के दीगर फायदे भी गिनाए गए थे. इस की खूबी यह थी कि बैंक खाता जीरो बैलेंस से भी खोला जा सकता था और खाता खोलने के लिए नियम भी सरल कर दिए गए थे. करोड़ों रुपए अपनी पहली महत्त्वाकांक्षी योजना पर सरकार ने प्रचारप्रसार में बहाए जिस के अपेक्षित नतीजे भी सामने आए. दावा किया गया कि पहले ही दिन बैंकों में डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा खाते खुले जिन की तादाद देखतेदेखते 25 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई.

बैंकिंग सेवा से न जुड़ना देश की गरीबी की वजह नहीं थी जैसा कि भाजपा समर्थक अर्थशास्त्री इस योजना का हल्ला मचने के बाद बोल रहे थे. रिकौर्ड खाते खुलने की वजह यह प्रचार या अफवाह भी थी कि विदेशों में भारतीयों के जमा कालेधन को वहां से ला कर गरीबों के इन्हीं जनधन खातों में डाल दिया जाएगा.

यह दूर की कौड़ी थी. आम लोगों ने इस लालच में भी खाते खुलवाए थे कि इस में दुर्घटना बीमा शामिल था और सरकार यह भी कह रही थी कि अगर खाता 6 महीने ठीकठाक चला यानी उस में लेनदेन हुआ तो खाताधारक को 5 हजार रुपए का ओवरड्राफ्ट दिया जाएगा.

गांवदेहातों में संदेश यह गया कि अब सरकार खाताधारकों को 5-5 हजार रुपए बतौर ऐसा कर्ज देगी जो वापस नहीं करना पड़ेगा. जनधन खाता खुलवाने के लिए देशभर में लाइनें लगने लगीं तो सरकार अपनी पीठ थपथपाती नजर आई.

दरअसल, नोटबंदी की प्रेरणा या आइडिया इसी योजना की देन प्रतीत इस लिहाज से होता है कि नरेंद्र मोदी का सोचना यह था कि देश के 60 करोड़ गरीब लोग अपनी छोटीमोटी बचत नकदी की शक्ल में घर में जमा रखते हैं, यदि वे बैंकों में जमा हो जाए तो अरबों रुपए बैंकों के जरिए सरकार के पास होंगे.

बहरहाल, खाते तो खुल गए पर यह कोई नहीं पूछ रहा था, न बता रहा था कि इन में पैसे कहां से आएंगे. चूंकि सरकार ने टारगेट दिया था, इसलिए बैंककर्मियों ने दौड़दौड़ कर खाते खुलवाए और एकएक रुपया अपनी जेब से इन में जमा किया जो उन के लिए घाटे का सौदा नहीं था. जिसे प्रोत्साहन कहा जा रहा था वह दरअसल लालच और छल निकला.

अप्रैल 2016 में गिनाया गया था कि अब तक लगभग 21 करोड़ खाते खुल चुके हैं और उन में 36 हजार 800 करोड़ रुपए की राशि जमा हुई है. यह वह वक्त था जब आम लोग बीमा दावे और ओवरड्राफ्ट के लिए बैंकों के चक्कर लगाने लगे थे. हालांकि 30 फीसदी खातों में एक रुपया भी जमा नहीं हुआ था.

योजना की पोल तब खुलनी शुरू हुई जब बैंकों द्वारा लोगों को योजना से संबंधित तरहतरह के नियमकायदेकानून बता कर टरकाना शुरू किया जाने लगा. देश के हर हिस्से से यह खबर आने लगी थी कि एक लाख रुपए की दुर्घटना बीमा का फायदा उसी को दिया जाएगा जिस ने दुर्घटना के पहले के 45 दिनों में कोई लेनदेन खाते में किया हो. जब इस ओर ऐसे कई आधारों पर बीमा दावे खारिज किए जाने लगे तो लोगों की समझ में आ गया कि सरकार ने उन्हें खूबसूरत तरीके से बेवकूफ बनाते हुए ठग लिया है.

इधर, 5 हजार रुपए का ओवरड्राफ्ट चाहने वालों की भी हालत यही थी.

उन से कहा जा रहा था कि चूंकि आप ने लेनदेन नहीं किया है, इसलिए ओवरड्राफ्ट या एडवांस कर्ज वगैरा नहीं दिया जा सकता. अब लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ कि 5 हजार रुपए देने की बात कई शर्तों पर सवार थी जिस पर वे महज खाताधारक होने के नाते खरे नहीं उतरते यानी इस के पात्र नहीं हो जाते.

देखते ही देखते गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज जनधन योजना की खुमारी उतरने लगी. लेकिन नोटबंदी के बाद जनधन खाते फिर सुर्खियों में आए क्योंकि 8 नवंबर, 2016 के बाद हैरतअंगेज तरीके से इन खातों में लगभग 30 हजार करोड़ रुपए की राशि जमा हुई. ढाई साल पहले खुलवाए खाते पुराने नोटों को नई शक्ल देने में कारगर साबित होने लगे.

जब जनधन खातों के जरिए नोट बदलने की बात तूल पकड़ने लगी तो पहले से घबराए नरेंद्र मोदी ने उपदेशात्मक लहजे में कहा, बेईमानी मत करो, न करने दो. अपने खाते में दूसरे का पैसा जमा मत करो फिर कोरी बेईमानी के उपदेश पर उतर आए कि अगर किसी और के पुराने नोट जमा करे हैं तो निकाल कर उसे न लौटाएं. उन्होंने कहा, ‘‘मैं दिमाग लगा रहा हूं कि कैसे यह पैसा तुम्हारा हो.’’

दिमाग लगाना यानी माथापच्ची करना अभी तक जारी है. एक बड़ा आर्थिक गड़बड़झाला खुद सरकार ने कर दिया है. अब मुमकिन है 100 रुपए कमाने वाले गरीब की गिरेहबान पकड़ कर उस से हिसाब मांगा जाए कि बता, तेरे खाते में ये हजारोंलाखों रुपए कहां से आए वरना सजा भुगतने को तैयार हो जा.

आम लोगों द्वारा बुरे वक्त के लिए बचा कर रखा गया पैसा पहले जनधन खाते खुलवा कर बाहर निकलवाया गया, फिर नोटबंदी के बाद झटका गया. पर इस से न तो अर्थव्यवस्था में कोई सुधार हुआ, न गरीबी दूर हुई, न लोगों को रोजगार मिला और न ही लोग बैंकिंग सिस्टम से जुड़ पाए. इतना जरूर हुआ कि दोनों ही वक्त आम लोगों ने तीर्थस्थल की तरह बैंकों की कईकई बार सप्ताहों तक परिक्रमा की.

अब सालोंसाल तक खातों में जमा पैसे की पड़ताल होती रहेगी जिस में जनधन खातों की मूल अवधारणा कहीं नहीं है. एक गुबार लाया गया और उन गरीबों की जेब पर डाका डाल दिया गया जिन के कथित भले के लिए खाते खोले गए थे. ये बेचारे दूसरों का तो दूर की बात है, खुद का ही जमा पैसा निकालने में डर रहे हैं.

अहम सवाल जिस का जवाब शायद ही कोई अर्थशास्त्री, विशेषज्ञ या फिर सरकार दे पाए कि 8 नवंबर के पहले जनधन खातों में जमा 45,675 करोड़ रुपए की राशि क्या कालाधन थी. अगर नहीं थी तो जाहिर है इन खातों का बडे़ पैमाने पर इस्तेमाल पहले से ही कालाधन सफेद करने में हो रहा था. और अगर यह राशि कालाधन थी तो वाकई देश संपन्न है जिस में गरीबों के पास भी कालाधन है.

अब बैंकों में न तो कोई जनधन खाताधारी बीमा क्लेम करने जा रहा, न ही ओवरड्राफ्ट मांगने जा रहा. यही इन खातों की असफलता है जिस में नरेंद्र मोदी पूरी तरह फेल साबित हुए हैं.

कालेधन के मुद्दे पर भी मोदी फेल हो चुके हैं. लोग अपना सफेद धन यानी मेहनत की कमाई बचाने में व्यस्त हैं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी का यह आरोप गलत नहीं कहा जा सकता  कि मोदी अपने इस वादे को पूरा नहीं कर पाए.

भ्रष्ट सिस्टम पर वार : सरकार फेल

प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद ही नरेंद्र मोदी को यह ज्ञान प्राप्त हो गया था कि वे भ्रष्ट सिस्टम से ज्यादा जूझ नहीं सकते. लिहाजा, लोगों का ध्यान बांटे रखने के लिए उन्होंने कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की तर्ज पर लुभावनी योजनाओं की घोषणाओं की बौछार कर दी. ढाई साल में वे तकरीबन सौ योजनाएं लौंच कर चुके हैं जिन में से अधिकांश के कहीं अतेपते नहीं हैं.

अब ये योजनाएं सोशल मीडिया पर लोगों के मनोरंजन का माध्यम बन गई हैं. सोशल मीडिया के यूजर चटखारे ले कर बताते हैं कि गैस सब्सिडी छोड़ने से उतना पैसा नहीं बचा जितना इस के बाबत इश्तिहारों पर फूंक दिया गया. जाहिर है मोदी पूरे वक्त अपनी छवि चमकाने में लगे रहते हैं और कांग्रेसी पदचिह्नों पर चलते आम लोगों के भले की योजनाओं का ढोल पीटते रहते हैं.

बीमा योजना से परेशान किसान

मोदीराज में सब से ज्यादा मार किसानों ने झेली. सब का तथाकथित भला करने वाले मोदी ने किसानों के लिए भी जनवरी 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की थी. इस योजना के तहत रबी की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम का भुगतान तय किया गया था.

इधर, नोटबंदी की भागमभाग के चलते हालत यह थी कि किसान बुआई ही नहीं कर पाए. भाजपा शासित  राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की हालत यह थी कि दिसंबर तक 30 हजार हेक्टेयर रकबे में बुआई नहीं हो पाई थी क्योंकि किसानों के पास बीज, खाद, डीजल, हकाई, जुताई और सिंचाई के लिए नकदी नहीं थी. बीमा की रकम में अगर कुछ मुआवजा मिलने का प्रावधान था भी, तो किसे देने की फुरसत थी.

किसानों की परेशानी और बदहाली का सच आंकड़ों के आइने में देखें तो साफ समझ आता है कि असल परेशानियां तो अब शुरू हुई हैं. भोपाल शहर के 641 गांवों में किसानों की संख्या 85 हजार के लगभग है. इन में से महज 36,800 केसीसी कार्डधारी हैं. इन किसानों की ऋणसीमा 41 करोड़ रुपए है जबकि ऋण मिला महज 15 हजार किसानों को. इन में से भी अधिकांश बड़े रसूखदार और राजनीति से ताल्लुक रखते किसान हैं. बैंकों की लाइन में लगे किसान मांग करते ही रह गए कि बुआई के लिए उन्हें 24 हजार रुपए के बजाय एक लाख रुपए दिया जाए पर उन की भी सुनवाई नहीं हुई.

उद्योगधंधे ठप

साल के आखिरी महीने तक मध्य प्रदेश में ही तकरीबन 80 लाख लोग बेरोजगार हो चुके थे. तमाम उद्योगधंधे मंदी की मार झेल रहे हैं. व्यापारियों का कहना यह है कि यह तो शुरुआत है, मोदी की मार का असर तो अब दिखना शुरू होगा जिस का सही आकलन न तो वित्त मंत्री अरुण जेटली कर पाए हैं और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

यानी सबकुछ ठप होता जा रहा है और सरकार कह रही है कि कैशलैस हो जाओ. इस बाबत बड़ेबड़े रंगीन विज्ञापन छापे और दिखाए जा रहे हैं.

भूमि अधिग्रहण फेल

एनडीए सरकार के वजूद में आने के बाद एक बड़ा हल्ला भूमि अधिग्रहण का मचा था. जिस का किसान हितैषी चेहरा उस वक्त उजागर हुआ था जब उस ने 2013 के भूमि अधिग्रहण विधेयक में अपनी मरजी के मुताबिक बदलाव किए थे. इन में खास बातें ये थीं कि जमीन लेने के बाद कंपनियों को उस पर काम शुरू करना जरूरी नहीं रह गया था यानी सरकार जिस किसी कंपनी को जमीन, किसान से छुड़ा कर देगी वह इस बात के लिए कार्यवाही नहीं कर सकता कि जमीन पर कुछ नहीं किया जा रहा है.

मोदी सरकार ने मुआवजे की परिभाषा बदलते हुए कहा था कि अगर किसान के खाते में मुआवजा नहीं गया है लेकिन सरकार ने मुआवजा सरकारी खाते या अदालत में जमा करा दिया है तो उसे मुआवजा माना जाएगा.

यहां तक तो बात ज्यादती वाली थी, पर इस करेले पर नीम यह कहते चढ़ा दी गई कि अब सरकार और निजी कंपनियों की साझा योजनाओं में 80 फीसदी किसानों की सहमति जरूरी नहीं.

इसी तरह सरकारी परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत जमीन में 70 फीसदी किसानों की सहमति का भी प्रावधान खत्म कर मोदी ने जता दिया था कि कुछ भी हो जाए, अधिग्रहण वह भी सरकारी शर्तों पर जारी रहेगा. अगर भूमिस्वामी या किसान मुआवजा लेने से इनकार करता है तो मुआवजा सरकारी खाते में जमा कर भूमिस्वामी को भूमि से बेदखल कर दिया जाएगा. इतना कहर, कांग्रेस तो दूर की बात है, अंगरेजों ने भी किसानों पर नहीं ढाया था. उलटे, उन्होंने किसानों के भले के लिए कई काम किए थे.

यह मामला अभी ठंडे बस्ते में पड़ा है लेकिन नुकसान किसानों का हो रहा है. नोटबंदी के हल्ले में यह बात भी दब गई जिस पर अब न विपक्षी दल कुछ बोल रहे हैं और न ही समाजसेवी अन्ना हजारे जो 2015 में आस्तीनें चढ़ाए सरकार को भूमि अधिग्रहण की बाबत चुनौती देने के लिए जंतरमंतर पर अनशन पर बैठे थे.

औंधेमुंह किसान विकासपत्र

भूमि अधिग्रहण मुद्दा फिर जोर पकड़ेगा. लेकिन सरकार की किसान विकासपत्र योजना (केवीसी) औंधेमुंह लुढ़की पड़ी है. वजह, इस के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं. कम आमदनी वालों को पेश की गई केवीसी में कोई पैसा नहीं लगा रहा क्योंकि इस में पैसा साढ़े 8 साल में दोगुना होता है और इस में आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत कर में छूट का प्रावधान नहीं है. साथ ही, इस पर टीडीएस काटे जाने का भी इंतजाम है. इतना ही नहीं, परिपक्वता पर पैसा नकद न दिया जा कर ग्राहक के बचत खाते में डाले जाने की शर्त जोड़ी गई तो किसी ने इस में दिलचस्पी नहीं ली.

वित्त मंत्री अरुण जेटली का सौ महीने में पैसा दोगुना करने का मशवरा अब किस कोने में पड़ा धूल खा रहा है, किसी को नहीं पता.

कैसा स्वच्छ भारत अभियान

पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजैक्ट ‘स्वच्छ भारत मिशन’ देश के कई बड़े राज्यों में फेल साबित हुआ है. स्वच्छ भारत अभियान में फेल होने वाले राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र (वाराणसी) वाला उत्तर प्रदेश भी शामिल है. उत्तर प्रदेश के अलावा इस फेहरिस्त में दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और बिहार के नाम शामिल हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान के लिए 9 नामीगिरामी हस्तियों को इस अभियान का अगुआ बनाया. क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, गोआ की राज्यपाल मृदुला सिन्हा, कांग्रेस नेता शशि थरूर, मशहूर उद्योगपति अनिल अंबानी, प्रख्यात फिल्म अभिनेता कमल हासन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा, योगगुरु बाबा रामदेव और पारिवारिक धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की पूरी टीम को इस अभियान से जोड़ा गया.

इस के बाद और भी कई बड़ी हस्तियां इस अभियान से जुड़ीं और इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की. लेकिन इस अभियान के 2 साल पूरे होने जाने के बाद सामने आई तसवीरें तो कुछ और ही हकीकत बयां कर रही हैं.

हर ओर कूड़ेकचरे के ढेर लगे हैं, सड़कों पर गंदा पानी भरा है, कूड़े के ढेर पर मुंह मारते आवारा पशु… वगैरावगैरा. हर गांवशहर से कमोबेश कुछ ऐसी तसवीरें सामने आई हैं, जिन्हें देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वच्छ भारत अभियान की असली तसवीर क्या है.

नमूने के तौर पर राजस्थान की ही बात करें तो प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भले ही स्वच्छता मामले में डूंगरपुर की मिसाल देती हों, लेकिन देशभर में राजस्थान का स्वच्छता मामले में बेहद खराब प्रदर्शन रहा है.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय यानी एनएसएसओ की ओर से किए गए सर्वेक्षण के नतीजों ने प्रदेश में स्वच्छ भारत अभियान की पोल खोल कर रख दी है. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की ओर से जारी इन नतीजों में राजस्थान का बेहद खराब प्रदर्शन रहा है. राजस्थान को महज 35.8 फीसदी अंक हासिल हुए हैं.

बता दें कि राजस्थान से 4 शहरों का नाम कथित स्मार्ट सिटी की फेहरिस्त में शामिल किया गया है, लेकिन राज्य में गंदगी के हालात को देख कर इन शहरों के स्मार्ट सिटी बनने पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है.

प्रदेश में स्वच्छ भारत अभियान की असफलता के पीछे कारण कुछ भी रहे हों, गांवोंशहरों को स्वच्छ बनाने का मोदी का दावा कोरा शिगूफा ही साबित हो रहा है.

मेक इन इंडिया केवल नारा

मेक इन इंडिया की, तो भारत को मुंबई का उल्लहासनगर बना कर रख दिया है. इस के तहत कई औद्योगिक कौरीडोर बनाए गए. पर विदेशी सरकारों के साथ साझेदारी कर के इन के विकास की योजना है. मेक इन इंडिया का एक हिस्सा है स्मार्ट सिटी. बताया जाता है इस के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कानूनी मानदंडों में ढील दी जा रही है.

मोदी की मेक इन इंडिया योजना से चीन बड़ा उत्साहित है. मुद्रा अवमूल्यन के झटके से उबरने के लिए चीन हाथपांव मार रहा है. मोदी के मेक इन इंडिया से उस को बड़ी उम्मीदें हैं. इस से पहले 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत यात्रा अहमदाबाद से शुरू की थी. मोदी का मेक इन इंडिया भी बड़ी हद तक चीन का मुंह ताक रहा है. बीबीसी का दावा है कि रिलायंस को चाइना डैवलपमैंट बैंक ने 10 अरब डौलर का कर्ज दिया है. और इसी के बल पर अंबानी की नैटक्रांति मेक इन इंडिया बन गई. रिलायंस के अलावा चीनी बैंक और भी बहुत सारी भारतीय कंपनियों को कर्ज दे रहा है.

एक चीनी मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि वे मेक इन इंडिया और मेड इन चाइना के विलय के पक्ष में हैं. मोदी अगली बार चुनाव जीत पाएं या न पाएं – पर तब तक भारत चीन की जद में जाता चला जाएगा. अभी तो केवल हम ‘टौक्सिक’ चीनी खिलौनों और मांझे से जूझ रहे हैं. जाहिर है मेक इन इंडिया के लिए चीनी निवेश आगे चल कर भारत को भारी पड़ने जा रहा है. 

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस की सफलता को संदिग्ध बताते हुए मोदी सरकार को चेतावनी भी दी थी. लेकिन तब मोदी का मंत्रिमंडल मोदी को मनमानी करने देने के लिए रघुराम के जाने का इंतजार करने लगा. कुल मिला कर, जैसा कि जानकार बताते हैं, मेक इन इंडिया देशी ही नहीं, विदेशी ‘परजीवियों’ के लिए भी खुला न्योता है कि आओ, भारत में निर्माण करो और उस के मालिक बन कर भारत की जनता को लूटते रहो. मोदी की यह योजना अपनेआप में विष की अमरबेल है.

कभी जमीनी राजनीति करने वाले नरेंद्र मोदी ने मेक इन इंडिया का भी लुभावना नारा दिया कि अब हर चीज भारत में बनाओ, तो सस्ती पड़ेगी. लोगों को अच्छा पैसा मिलेगा, रोजगार के मौके बढ़ेंगे और हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे.

मेक इन इंडिया के तहत कहां, क्या बन रहा है, यह पहेली कोई नहीं सुलझा पा रहा, सिवा बाबा रामदेव के, जिन्होंने विदेशी कंपनियों को धता बताते अपना अरबों का कारोबार खड़ा कर लिया और विज्ञापनों में बड़ी शान से वे विदेशी कंपनियों को झूठे प्रचार के बाबत कोसते भी नजर आते हैं.

डिजिटल इंडिया का शिगूफा

आधा देश भी औपचारिक तौर पर शिक्षित नहीं हुआ है पर नरेंद्र मोदी ने इस सच को नजरअंदाज करते डिजिटल इंडिया की घोषणा कर डाली. इस योजना को लागू करने के लिए 13 हजार करोड़ रुपए के भारीभरकम बजट का प्रावधान किया गया.

डिजिटल इंडिया का मकसद लोगों को सरकारी विभागों की ईसेवा से जोड़ना है. मोदी की ख्वाहिश है कि हर गांव में इंटरनैट हो और कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा व चिकित्सा सहित न्यायिक सेवाएं भी इंटरनैट के जरिए लोगों तक या लोग उन तक पहुंचे. सशक्त भारत निर्माण की परिकल्पना को साकार करती इस योजना में कंप्यूटर पर एक क्लिक के जरिए सबकुछ अलादीन के चिराग के जिन्न की तरह हाजिर होगा. डिजिटल इंडिया के लिए जरूरी है कि ईसाक्षरता हो. यह और बात है कि देश के गांवदेहातों में अभी साक्षरता के ही कहीं अतेपते नहीं हैं. शहरों के गरीब इलाके भी ग्रामीण इलाकों की तरह ही हैं.

अव्वल तो शुरुआती दौर में ही डिजिटल इंडिया का अंजाम साफसाफ दिख रहा है कि यह भी एक शिगूफा भर है.

लेकिन असल रोड़ा खुद सरकारी विभाग हैं जो भ्रष्टाचार के ऐसे नएनए तरीके ईजाद कर लेते हैं कि लोग भौचक्के रह जाते हैं. नोटबंदी के दौरान बैंककर्मियों ने जम कर वह चांदी काटी जो कई पुश्तों तक काम आएगी, ईबैंकिंग 20 फीसदी खातेदार ही इस्तेमाल कर पा रहे हैं जो शहरी हैं. और इन में से भी अधिकांश साइबर क्राइम के डर से सहमे रहते हैं.

नरेंद्र मोदी की योजनाओं और फैसलों की दवा जहर बनती जा रही है और लोग उसे बूंदबूंद कर पीने को मजबूर हैं. आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि अपना ही कमाया पैसा लोगों को पराया लग रहा है.

सरकारी विभाग कैसेकैसे डिजिटल का पुलिंदा बांधते हैं, इस की बेहतर मिसाल भोपाल है, जहां कहा गया कि अब सभी जमीनों के खसरे औनलाइन उपलब्ध हैं. लोग जब चाहें तब जमीनों का भूगोल और इतिहास पता कर सकते हैं. इस योजना में हुआ इतनाभर कि पटवारियों ने अपने तमाम खसरे औनलाइन कर दिए. जो पटवारी कंप्यूटर चलाना नहीं जानते, उन्होंने ठेके पर यह काम करा कर सरकारी जवाबदेही से छुटकारा पा लिया.

अब तमाम पटवारी अपनी मूंछों पर ताव देते किसानों का दोहनशोषण बदस्तूर कर रहे हैं जिन्हें नामांतरण वगैरा के लिए आखिरकार उन्हीं के पास आ कर दक्षिणा चढ़ानी पड़ती है. ई-रजिस्ट्री के हाल ये हैं कि इसे औनलाइन कराने के बाद भी रजिस्ट्रार के दफ्तर में क्रेताविक्रेता को जाना ही पड़ता है.

यही हाल डिजिटल इंडिया के तहत हर एक विभाग का होना तय है. फिर डिजिटल के माने क्या हुए, बात समझ से परे है. कुछ पंचायतों में कंप्यूटर हैं लेकिन वहां नैटवर्क नहीं है. जहां थोड़ाबहुत नैटवर्क आता है, वहां औपरेटर नहीं हैं. नजारा बड़ा दिलचस्प है कि अरबों रुपए डिजिटल के नाम पर इस चुटकुले के मद्देनजर फूंके जा रहे हैं कि चश्मा लगने के बाद निरक्षर व्यक्ति भी पढ़ना सीख जाएगा. सलीके से हिंदी न पढ़ पाने वालों के हाथ में इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स थमाया जा रहा है कि इसे पढ़ो, तो जागरूक हो जाओगे.

अपने कार्यकाल में केवल सर्जिकल स्ट्राइक के फैसले पर नरेंद्र मोदी को वाहवाही मिली थी जब सितंबर के आखिरी हफ्ते में भारतीय सेना ने पीओके में चल रहे आतंकी ठिकानों को निशाने पर लेते कई आतंकियों को ढेर कर दिया था. इस पर सोशल मीडिया पर सक्रिय मोदीभक्तों ने आसमान ऐसे सिर पर उठा लिया था जैसे भारत ने लाहौरकराची फतह कर लिए हों.

यह वाहवाही भी चार दिन की चांदनी सरीखी साबित हुई और हफ्तेभर की खामोशी के बाद आतंकियों ने फिर उपद्रव किए, भारतीय जवानों की लाशें सीमापार से आनी शुरू हुईं तो साबित हो गया कि यह एक शिगूफा भर था जिस की परिणति पठानकोट हमले के रूप में हुई तो देश में निराशा छा गई. आतंकवाद का खात्मा और एक के बदले 10 सिर काट लाने का दावा भी खोखला साबित हुआ. जम्मूकश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती आतंकियों को कोसती जरूर रहीं लेकिन इस से यह समस्या हल नहीं हुई. उलटे, लोगों ने इसे भाजपा व पीडीपी के बेमेल गठबंठन और सत्ता में बने रहने के लिए कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति करार दिया.

अब चर्चा में प्रस्तावित जीएसटी कानून है जिसे 1 अप्रैल से लागू करने की बात वित्त मंत्री अरुण जेटली कह चुके हैं. व्यापारी वर्ग ने इस का विरोध शुरू कर दिया है लेकिन नोटबंदी पर कोई उम्मीद के मुताबिक बवाल नहीं मचा. बकौल सरकार, विरोध होता तो लोग लाइनों में नहीं लगे होते, सड़कों पर होते. सरकार के हौसले बुलंद हैं. उस के लिए अपने फैसले थोपने का यह मुनासिब वक्त है जब टुकड़ों में बंटा विपक्ष उस का सटीक विरोध नहीं कर पा रहा और आमलोग नकदी की मारामारी से नजात पाने में लगे हैं.

मोदी की महत्त्वाकांक्षा

सब से पहले तो भारतीय राजनीति में स्वर्णाक्षरों में अपना नाम लिखना नरेंद्र मोदी का एकमात्र लक्ष्य है. पिछले

2 साल 6 महीनों में उन की सरकार की तमाम घोषणाएं उन के इसी लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश मात्र हैं. उन की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं बहुत सी हैं. बड़ा सवाल यह है कि इन तमाम जद्दोजेहद में मोदीजी कहां तक सफल रहे?

अंतर्राष्ट्रीय सफलता

कुछ कर दिखाने के नाम पर उन्होंने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं कीं और इतनी कीं कि एक वक्त में लोग मजाक में कहने लगे थे कि कुछ दिन तो देश में गुजारें प्रधानमंत्रीजी. कोई यह भी कहता कि भारत के प्रधानमंत्री एनआरआई हैं. विदेशों में खूब रहते हैं. इन विदेश यात्राओं से देश को कुछ हासिल हुआ हो, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. हां, इतना जरूर हुआ कि मोदी की ब्रैंडिंग दुनियाभर में हो गई. देश ने तो स्वीकार लिया था पर विदेशों में भी वे खासतौर से गए और तसल्ली कर ली कि पूरी दुनिया ने उन्हें भारत का प्रधानमंत्री मान लिया है.

नरेंद्र मोदी की विदेशयात्रा और उन का प्रोटोकौल को धता बता कर विश्व के बड़ेबड़े राष्ट्राध्यक्षों के साथ बेबाकी का आचारव्यवहार भी इसी कड़ी का हिस्सा है. उन की मंशा के साथ उन के ‘भक्तों’ की भी मंशा यह है कि वे यानी नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्र्रीय स्तर पर लोकप्रिय राष्ट्राध्यक्ष के रूप में स्थापित हो जाएं. रही बात एशिया में मोदी के कद की, तो पाकिस्तान और चीन हर रोज मुंह चिढ़ा देते हैं.

2014 में मोदी ने शपथग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई नेताओं को बुला कर सार्क में अपनी छवि को बनाने की कोशिश की थी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपना यार बताने के लिए उन की जन्मदिन की बधाई देने हेतु शरीफ  की बेटी की शादी में बिन बुलाए वहां पहुंच गए. अन्य पड़ोसी देशों बंगलादेश, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल और म्यांमार के साथ भी उन के संबंधों को कोई नया आयाम नहीं मिला. पाकिस्तान को चीन का समर्थन मजबूत हो रहा है. नेपाल लगातार चीन की तरफ झुक रहा है. राजीव गांधी के बाद मोदी ने 2015 में जाफना का दौरा किया और वहां के तमिल नेतृत्व से श्रीलंका सरकार को थोड़ा वक्त देने की अपील की. तमिलों ने वक्त दिया. पर श्रीलंका में तमिल समस्या का समाधान नहीं हो पाया है.

हिंद महासागर में क्षेत्रीय ताकतों की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय है. चीनी गतिविधियां यहां बढ़ गई हैं. वह भी उस समय जब मोदी देश की सीमा की हिफाजत पर ज्यादा जोर दे रहे थे. नरेंद्र मोदी ने यूएन में अपनी साख बनाने की कोशिश की. लेकिन सुरक्षा परिषद में भारत की एंट्री दिलाने में वे अब तक नाकाम रहे. चीन ने भारत का रास्ता रोक रखा है. भक्तों का दावा भले ही मोदी के जग जीत लेने का हो, पर मोदी चीन को साध न सके. कुल मिला कर नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने नाम का झंडा तो ऊंचा किया, पर देश को कूटनीतिक सफलता नहीं दिला सके.

रीता हो जाएगा अनाज भंडार

नोटबंदी से ज्यादा प्रभावित किसान और खेतिहर मजदूर हुआ है. इस का दूरगामी प्रभाव देश के अनाज भंडार पर पड़ना लाजिमी है. नोटबंदी से उपजे संकट से भारत को उबरने में सालों लग जाएंगे. नकदी समस्या का असर बीज और खाद पर जिस तरह पड़ा है, डर है ‘मोदी आपदा’ के बाद और कोई प्राकृतिक आपदा आई तो देश का अनाज भंडार खाली हो जाएगा. कृषिप्रधान देश भारत को अब अनाज के लिए आयात पर निर्भर होना पड़ेगा. अभी भी दाल, तेल और गेहूं का आयात करना पड़ रहा है और आगे जाने कितनी चीजों का आयात करना पड़े. फिर भी आने वाले दिनों में अकाल जैसी स्थिति होगी. मुद्रास्फीति सालों तक हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी.

नाकामी का बजा डंका

ब्लैकमनी का ‘गोलपोस्ट’ कैशलैस इकोनौमी की तरफ  खिसक चुका है. इसी के साथ मोदी के अपनों ने ही उन की नाकामी का डंका बजा दिया है. हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बयान दिया कि डिजिटल लेनदेन नकद का विकल्प नहीं, यह समानांतर व्यवस्था हो सकती है. यानी नकदी का विकल्प डिजिटल लेनदेन नहीं हो सकता. अर्थव्यवस्था कैशलैस के बजाय लैसकैश हो सकती है. पर इस को भी चरणबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए. बहरहाल, अरुण जेटली ने ऐसा बयान दे कर मोदी और जनता के 50 दिनों के तप पर पानी फेर दिया है. वहीं, संघ भी मोदी की नोटबंदी से कोई बहुत खुश नहीं है. संघ बारबार इंफ्रास्ट्रचर का सवाल उठा रहा है.

पर मोदी तो मोदी हैं. कैशलैस इकोनौमी का मोह इन से छोड़ते नहीं बन रहा है. इसीलिए इस को कामयाब बनाने के लिए वे जीजान से जुट गए हैं.

सौ दिनों तक हर रोज 15 हजार लोगों को 1 हजार रुपए का ‘क्रिसमस गिफ्ट’ मिलेगा. यह गिफ्ट 50 रुपए से ले कर 3 हजार रुपए तक की डिजिटल खरीदारी के लिए दिया जाना है.

मोदी ने कहा कि यह योजना अमीरों के लिए नहीं, गरीबों के लिए है. पर गरीब मजदूर तो हर रोज 10.30 रुपए तक की खरीदारी करता है. इन के लिए कोई रबड़ी नहीं है मोदी की झोली में जबकि करोबारियों के लिए साप्ताहिक 5 से 50 हजार रुपए तक और व्यापारियों के लिए 12 लाख से 50 लाख रुपए तक का इनाम रखा गया है. बहरहाल, इस ‘क्रिसमस गिफ्ट’ के लिए 340 करोड़ रुपए भी मंजूर कर दिए गए हैं. काश, यह रकम मोदी अपने फुतूर के बजाय जनता की सहूलियत पर खर्च करते.

विख्यात दार्शनिक प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में लिखा है कि समस्या जटिल से जटिलतर तब हो जाती है जब एक शासक अपने ही शासन के प्रेम में पड़ जाता है. नरेंद्र मोदी भी एक बड़ी हद तक आत्मश्लाघा के शिकार हैं. कहीं ऐसा न हो, अपने कार्यकाल को अजरअमर राजनीतिक इतिहास बनाने की मंशा रखने वाले मोदी के लिए उन का कार्यकाल एक चुटकुला बन कर रह जाए. मई 2014 में मोदी ने जब बहुमत हासिल किया था, तब देश को उन से बड़ी उम्मीद थी. पिछले ढाई सालों में इस फिल्म का ‘इंटरवल’ हो चुका है. इंटरवल के बाद की आधी फिल्म में क्या गुल खिलेगा, यह देखना है.

हर बात का श्रेय लेने की आदत बना लेने वाले हमारे प्रधानमंत्री को होना तो दूरदर्शी था, पर वे स्वप्नदर्शी साबित हो रहे हैं? कहीं नाकामी के मद्देनजर सरकार की मंशा ही तो नहीं बदल गई है. या फिर नरेंद्र मोदी कोई भी एक सपना देख लेते हैं और बगैर तैयारी के खामाखां उसे सच करने के लिए मैदान में कूद पड़ते हैं. मोदी के सपनों के बोझ तले बेबस जनता हाहाकार करने को मजबूर है. मोदी के ऐडवैंचर का खमियाजा जनता उठा रही है.

नोटबंदी से जनता परेशान

8 नवंबर, 2016 तक जनधन योजना के 25 करोड़ 58 लाख खातों में 45,635 करोड़ रुपए की राशि जमा थी. यह एक दयनीय हालत थी जो देश की गरीबी बयान कर रही थी कि औसत भारतीय सालभर में लगभग 1,785 रुपए ही कमाता या बचाता है. यानी औसत भारतीय की रोजाना की कमाई सौ रुपए भी नहीं है.

अलगअलग अंदाजों और आंकड़ों के मुताबिक, नोटबंदी के फैसले के बाद तकरीबन 30 हजार करोड़ रुपए की राशि जनधन खातों में जमा हुई जिस पर कहा यह गया कि काले पैसे वालों ने टुकड़ोंटुकड़ों में कमीशन पर इन खातों और खाताधारकों का इस्तेमाल किया. इस तरह औसतन 1,500 रुपए हर एक जनधन खाते में नोटबंदी के बाद जमा हुए.

कुछ हजार से ले कर दोचार लाख रुपए के पुराने नोटधारक सरकार की नजर में चोर थे ही, पर अब लपेटे में वह गरीब भी आ गया था जिस के खाते में 4 हजार रुपए जमा हुए थे. बैंकिंग क्षेत्र की यह हास्यास्पद स्थिति थी जब नोटधारी भी झोंक रहे थे और नोटविहीन भी. सब के सब अपनेआप को जबरन कुसूरवार समझ रहे थे.

अगर किसी ने नौकरों, अधीनस्थों और मजदूरों के खाते में रुपए जमा कर नोट बदले तो क्या यह गुनाह था, इस बात से सरकार ने कोई सरोकार नहीं रखा जिस ने नोटबदली के नियम हर तीसरे दिन बदलबदल कर लोगों की सांसें हलक में अटकाए रखीं.

नोटबंदी के जरिए देशभर में खलबली सरकार ने मचाई तो अब कोई विदेशों से जमा कालाधन लाने की बात नहीं कर रहा.

जिस नोटबंदी को नरेंद्र मोदी कालाधन और भ्रष्टाचार खत्म कर देने वाला होने का दावा कर रहे थे उस छलनी के छेद तो 15 नवंबर से ही दिखना शुरू हो गए थे पर एक महीने बाद बड़े पैमाने पर इस के सूराख नजर आने लगे जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 7 दिसंबर को देशभर में 10 बैंकों की 50 शाखाओं पर हवाला और मनी लौंड्रिंग के शक में छापे मारे. इस के बाद तो यह रोजमर्रा का काम हो गया.

यह तो साबित हो गया कि किसी भी और कम से कम नोटबंदी के तरीके से तो कालाधन और भ्रष्टाचार काबू नहीं हो सकते पर चांदी उन अफसरों की हो आई जिन्होंने खूब पैसा बनाया. पहले बैंककर्मियों ने थोक में थैलीशाहों से नोट बदलवाई के एवज में नेग लिया, फिर पुलिस वालों ने जगहजगह दबिश दे कर नएपुराने नोट जुगाड़े, अब बारी जांच एजेंसियों के अफसरों की है कि वे अब लीपापोती के एवज में शगुन लेंगे.

नोटबंदी को 50 दिन से ज्यादा समय गुजर गया है. अभी तक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है. जानकारों की राय में स्थिति सामान्य होने में अधिकतम 1 साल से 5 साल लग जाएंगे.

एसोसिएशन औफ माइक्रो फाइनैंस इंस्टिट्यूट यानी एएमएफआई का कहना है कि इस दौरान माइक्रो लोन की मंजूरी मिलनी लगभग बंद हो जाएगी. दरअसल, यह संस्थाएं छोटे व्यापारी वर्ग को ही ऐसे कर्ज दिया करती हैं.

एएमएफआई के चेयरमैन अजित माइति का कहना है कि बंगाल में सालभर में औसतन 50 हजार करोड़ रुपए का लेनदेन होता है. लेकिन नोटबंदी के दौर में सब ठप है.

पिछले एक महीने से इन वित्तीय संस्थानों का काम ठप है. न तो नया कर्ज दिया जा रहा है और न ही कर्ज की रकम की वापसी हो रही है. जाहिर है छोटे व्यापारी नोटबंदी की मार की चपेट में हैं.

इन अफसरों की हालत त्रेता युग के ऋषिमुनियों सरीखी और नोटबंदी की हालत एक हवन जैसी है जो अन्न की पैदावार बढ़ाने के लिए किया जाता है और वेदी में भी अन्न डाला जाता है. एवज में ऋषिमुनियों को फलफूल, मिष्ठान, वस्त्र, स्वर्ण, गौ और भूमिदान किए जाते हैं. नोटबंदी के बाद से ये कर्मकांड लोकतांत्रिक तरीके से हो रहे हैं. हवन चालू है. अब जब मार्च में लोग इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करेंगे तब भी यही होगा. पहले राजा के सिपाही हर किसी को राजद्रोह के अपराध में पकड़ लेते थे, फिर दक्षिणा झटक कर छोड़ देते थे. आज कोई गारंटी से नहीं कह पा रहा कि नोटबंदी के हवन में उसे कब, कहां, कितना चढ़ाना पड़ जाए.

अफसरों की चांदी

नकदी के खिलाफ युद्ध अकेले नरेंद्र मोदी नहीं कर रहे हैं. लगभग 2 साल पहले सिंगापुर ने अपने यहां के सब से बड़े नोट पर बैन लगाया. यूरोपियन सैंट्रल बैंक ने भी हाल ही में 500 यूरो कीमत के नोट को बाजार से वापस ले लिया था. बताया जाता है कि दक्षिण कोरिया भी 2020 तक कागज के नोट का प्रचलन खत्म करने जा रहा है. लेकिन इस के लिए वहां सालों से आधारभूत ढांचे को तैयार करने का काम हो रहा है. वहीं, जनता को मानसिक रूप से तैयार भी किया जा रहा है. वहां एकदम से अचानक सरकारी फरमान थोपा नहीं जा रहा है.

नोटबंदी के फैसले से साबित इतना भर हुआ कि नरेंद्र मोदी ने चक्रवर्ती सम्राट बनने के चक्कर में एक अश्वमेघ यज्ञ कर डाला है जिस में हर एक को आहुति डालनी अनिवार्य हो गई है और वाकई देशभर के लोग अभी तक यज्ञशालाओं यानी बैंकों के चक्कर काट रहे हैं. बैंकर्स के चेहरों पर पंडेपुरोहितों जैसा गर्व है और राजा का खजाना भर रहा है. भंडारे के भोजन की तरह प्रजा को पेट भरने लायक परोसने की व्यवस्था कर दी गई है जिस से कोई विरोध न हो और जनाक्रोश न फैले.

लोकतंत्र किस चिडि़या का नाम है, यह अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और तो और मीडिया वाले भी भूल चले हैं. आम जनता अब निरीह हैरानपरेशान हो कर ऊपर वाले का मुंह ताक रही है जिस के वोट की ताकत मोदीलीला के सामने कहीं नहीं ठहर रही. इस फैसले ने आर्थिक वर्णवाद की धारणा देश को दे दी है कि जो नोट बदलवाने लाइन में न लगा हो वह ब्राह्मण, जो लाइन में अपने दासों को लगवा रहा है वह क्षत्रिय और जो लाइन में लगा है वह वैश्य और शूद्र है.

वे जो कभी नोटों की इस लाइन का हिस्सा ही नहीं रहे और जो नोटबंदी के फैसले के मद्देनजर यह समझ रहे हैं कि यह एक सनक भर है, वे कसमसा रहे हैं. वे भक्तों को यह नहीं बता पा रहे कि तुम्हारी हालत आज भी पशुओं सरीखी है, तुम ब्रह्मा का पांव थे और पांव ही रहोगे. देश ऐसे हाथों में चला गया है जो मेहनत के लिए नहीं, बल्कि आचमन और आरती के लिए उठते हैं और कुछ इन्हें आता नहीं. लोकतंत्र इन के लिए स्वर्ग की सीढ़ी और राजनीतिक मोक्ष साबित हो रहा है.

नोटबंदी एक बड़ी साजिश है जिस का मकसद लोगों को आर्थिक शूद्र बनाए रखना है. लोकतंत्र के ये मनु देश नहीं चला रहे, इन्हें विकास की नहीं, बल्कि यज्ञहवनों की फिक्र रहती है. नोटबंदी के हवन में सब से, जिस खास मकसद से आहुति चढ़वाई गई है, वह यह है कि लोग पैसे वाले न हों, जागरूक न हों, सोचनेसमझने की ताकत हासिल न कर लें. इसलिए, एक झटके में उन्हें कंगाल कर दिया गया. अब उन्हें वापस अपनी हैसियत में आने में सालों लग जाएंगे.    

आदर्श गांव के अधूरे ख्वाब

कई गांवों के नाम के आगे आदर्श शब्द तो जुड़ गया, लेकिन जमीनी धरातल पर ये गांव आज भी आदर्श नहीं बन पाए. गांवों को दिखाए गए विकास व तरक्की के सपने अधूरे ही हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के गांवों को आदर्श बनाने का सपना दिखाया था. इस के लिए सांसदों को आदर्श गांव बनाने का जिम्मा भी दिया गया था. ऐसे में सांसदों द्वारा बड़े जोरशोर से गांवों को गोद भी लिया गया और इन गांवों के विकास व तरक्की के लिए बड़ेबड़े वादे व दावे भी खूब किए गए. लेकिन ढाई साल बीत चुके हैं और गांवों को दिखाए गए विकास व तरक्की के सपने अधूरे के अधूरे ही हैं.

सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर सांसद की ओर से गोद लिए गए गांव बायतु भोपजी में सरकारी विभागों में कार्मिकों की कमी, बसस्टैंड का अभाव, संकरी सड़कों सहित समस्याओं के अंबार के चलते लोगों को कहीं पर आदर्श गांव की तसवीर नजर नहीं आती. इस प्रतिनिधि ने आदर्श गांव का दौरा किया तो कहीं कोई उजली तसवीर उभर कर नहीं आई. लोगों ने बताया कि उन के क्षेत्र में सांसद आए ही नहीं.

बायतु उपखंड से जोगासर की तरफ जाने वाली सड़क पर 2 किलोमीटर तक तो निर्माण कार्य हो चुका है, लेकिन 3 किलोमीटर में 7 सालों से डामरीकरण नहीं हुआ.

स्वास्थ्य केंद्र में पद रिक्त : बायतु भोपजी स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तकरीबन 300-400 लोगों की कतारें लगी हुई दिखाई दीं. स्टाफ की कमी केचलते लोगों को घंटों लाइनों में खड़ा रहना पड़ता है. स्वास्थ्य केंद्र में 2 फार्मासिस्ट, 1 सर्जन, 1 गाइनीकोलौजिस्ट, 2 मेल नर्स द्वितीय, 1 शिशु रोग विशेषज्ञ के पद रिक्त हैं. स्वास्थ्य केंद्र के चारों ओर दीवार नहीं होने से सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बढ़ रहे हैं और स्वास्थ्य केंद्र की परिधि सिमटती जा रही है.

विद्यालयों की खस्ता हालत : विद्यालय में 900 से ज्यादा बालकबालिकाएं हैं. यहां पर दसों कमरे विद्यार्थियों से ठसाठस भरे दिखाई दिए. ऐसे तो यहां पर 36 शिक्षकों का स्टाफ है लेकिन प्रथम लैवल का एक भी शिक्षक नहीं है. जबकि कक्षा 1 से 5 तक 160 बच्चे पढ़ रहे हैं. विद्यालय में साइंस, गणित के शिक्षक पद स्वीकृत होने के बावजूद पढ़ाने वाला नहीं है. पीने के लिए बरसाती पानी का ही सहारा है.

विद्यालय में पुरानी लैब बनी हुई है, किचन शैड की कोई व्यवस्था नहीं है, न ही साइकिल स्टैंड है. बरसात के मौसम में विद्यालय की छत टपकने लग जाती है.

आदर्श गांव के राष्ट्रीय प्राथमिक विद्यालय, बायतु भोपजी को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में जोड़ देने के बाद विद्यार्थियों को वहां स्थानांतरित कर दिया गया. इन विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक नहीं हैं. इस के चलते अन्य अध्यापकों की समस्या बढ़ गई है. 2 स्कूलों को मिलाने के बाद शिक्षिकाओं को अन्य विद्यालयों में लगा दिया गया और विद्यालय भवन धूल फांक रहा है. कमरों के अभाव में बच्चों को रेत पर दरी बिछा कर बैठना पड़ता है.

यहां का बालिका विद्यालय भवन नया बना है, 317 बालिकाएं पढ़ रही हैं. कई पद रिक्त हैं. ऐसे में जहां एक तरफ सरकार बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है वहीं दूसरी तरफ बालिकाएं ट्रांसफर कराने को मजबूर हो रही हैं क्योंकि पहली से 8वीं तक पढ़ाने के लिए महज 2 शिक्षक कार्यरत हैं.

आदर्श परिवहन पर बसस्टैंड कहां : बसों के ठहराव के लिए कोई स्थान नहीं होने से बस, टैक्सी, जीपें सभी मुख्य सड़क पर खड़े हो जाते हैं. इस से आएदिन सड़क पर हादसे होना आम बात है. यहां यात्रियों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी व्यवस्था भी नहीं है.

जयपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रामचरण बोहरा ने जिले का विजयपुरा गांव गोद लिया है, लेकिन न तो काम जमीन पर आ सके और न ही वे लोगों को इस बात का भरोसा दिला सके कि गांव वाकई आदर्श की ओर बढ़ रहा है. अभी ऐसा कोई भी काम नहीं हो पाया है जिसे आदर्श माना जा सके.

गांव के विकास के लिए सांसद की सक्रियता भी कम ही नजर आ रही है. अभी तक सांसद निधि से करीब 7 लाख रुपए ही गांव के लिए दिए गए हैं. गांव के लोग बताते हैं कि सांसद के गांव को गोद लेते वक्त कुछ उम्मीदें जगी थीं, लेकिन अब वे सब टूटने लगी हैं.

भीलवाड़ा जिले के दौलतगढ़ गांव को सांसद वी पी सिंह ने गोद लिया हुआ है, लेकिन हालात पहले जैसे ही होने से यह गांव कागजों में ही आदर्श बना हुआ है. गोद लिए जाने के बावजूद गांव में कुछ नहीं बदला.

60 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है, सीवर लाइनें नहीं हैं. साफसफाई को ले कर पंचायत के पास संसाधन ही नहीं. वहीं, पानी का फिल्टर प्लांट नहीं होने एवं नियमित बिजली नहीं मिलने से पेयजल की समस्या बनी हुई है. कचरा फेंकने के लिए ग्राउंड नहीं है तथा खेल के मैदान का अभाव है.

रोडवाल गांव की हकीकत

अलवर जिला व शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर बसा रोडवाल गांव सांसद चांदनाथ ने गोद लिया है, लेकिन 18 माह बाद भी हालात नहीं बदले. गांव में न तो सड़कें हैं और न नालियां. गांव वाले कचरे के ढेरों के बीच जीने को मजबूर हैं. लोगों को पानी सिर पर ढो कर लाना पड़ता है. उप स्वास्थ्य केंद्र में अकसर ताला लगा रहता है. गांव के विकास के लिए प्रशासनिक स्तर पर 2 करोड़ रुपए की योजना बनाई गई है, वह भी जमीन पर नहीं उतरी है.

सांसद अर्जुनलाल मीणा ने उदयपुर के टोडा गांव को गोद ले कर गांव को आदर्श ग्राम बनाने का दावा किया था. सांसद के निर्देश पर गांव में कुछ दिनों तक महकमाई अफसरों ने डेरा भी डाला था, लेकिन विकास कार्य के नाम पर गांव में सिर्फ बाजार व चौक से अतिक्रमण हटा कर ब्लौक व बाउंड्रीवाल किया गया. गांव की जर्जर सड़कों से ग्रामीण बेहाल हैं.

यहां नवीन हाई स्कूल भवन, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, हाईटेक पंचायत भवन, प्रशिक्षण केंद्र भवन, 5 आंगनवाड़ी केंद्र भवन, 2 गार्डन, उप मंडी बनाना, कालेज शुरू होना व पूरे गांव में सड़कों का निर्माण कर गांव को चकाचक करना था, लेकिन वर्तमान में कोई काम होता नहीं दिख रहा है.

जयपुर जिला मुख्यालय से महज 18 किलोमीटर दूर स्थित है आदर्श ग्राम बाड़ापदमपुरा. गांव की आबादी 5,300 के करीब है. बिजली, पानी, सड़क समेत अन्य समस्याओं से ग्रस्त इस गांव को प्रधानमंत्री की सांसद ग्राम योजना के तहत क्षेत्रीय भारतीय जनता पार्टी के सांसद हरीश मीणा ने गोद लिया था. तब से इस की समस्याओं के सुलझाने की कवायद चल रही है.

प्रशासन योजनाएं बना रहा है और विकास की बातें हो रही हैं. कागजों और जमीनी हकीकत में मीलों का अंतर है. हाल यह है कि एक बार गांव को गोद लेने के बाद सांसद ने गांव को पलट कर नहीं देखा.

पीने के पानी के लिए कहने को बीसलपुर योजना काम कर रही है, लेकिन पानी 5 दिनों में एक बार ही आता है. इस सांसद ग्राम में सब से अधिक जरूरत पीने के पानी की है. कहने को गांव के करीब ढूंढ नदी है, लेकिन फिर भी किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है.

राजस्थान की बात देश के हर प्रदेश में दोहराई जा रही है क्योंकि आदर्श गांव बातों व नारों से नहीं बनते. कुल मिला कर यह भी फेल योजना है.

कैशलैस जनता, फेसलैस सरकार

किसी एक व्यक्ति के व्यक्तिगत रोमांच के लिए पूरा देश कामकाज छोड़ कर बैंकों में धक्के खाने को मजबूर है, यह न सिर्फ जनता के साथ नाइंसाफी है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत अनुचित भी है, सुन रहे हैं न प्रधानमंत्रीजी.

डिजिटाइजेशन आधुनिकता का मानदंड रही है. जब दूसरे शिगूफे टांयटांयफिस हो गए तो डिजिटल लेनदेन का हाथ थाम कर कैशलैस इकोनौमी बनाने का फरमान जारी कर दिया गया है. डीमोनेटाइजेशन को मोदीभक्त व भाजपाई फाइनैंशियल सर्जिकल स्ट्राइक बता रहे हैं. इस फाइनैंशियल सर्जिकल स्ट्राइक से भ्रष्टाचारियों को कितना नुकसान हुआ? कितना कालाधन वापस आया? पिछले कुछ समय से ये जो कुछ सवाल खड़े हो गए हैं, उन के भक्त किसी को पूछने नहीं दे रहे हैं.

रिजर्व बैंक की प्रैस कौन्फ्रैंस से लगभग यह साफ हो चुका है कि इस तथाकथित आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक से कालेधन की वापसी का कुछ लेनादेना नहीं रहा. विदेश से कालाधन आया नहीं, और जो कालाधन देश में था, वह सफेद हो गया. अब तो काली रकम बरामद हो रही है उस में ज्यादातर 2,000 रुपए के नए गुलाबी नोट हैं. पूरे देश में रमेश शाह, रोहित टंडन जैसे ‘कालाधन के दलाल’ नेताओं व बिल्डरों के लिए काम कर रहे हैं. इस तरह नया गुलाबी कालाधन देश में तैयार हो गया है. मोदी का ‘ऐडवैंचर’ नाकाम रहा. फाइनैंशियल सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर सब से ज्यादा तकलीफ रोज कुआं खोद कर पानी पीने वालों और आम कमानेखाने वाली आम जनता को हुई है.

देश के बदलने का भ्रम

जहां तक देश बदलने का सवाल है तो देश बदल रहा है, पर यह बदलाव सकारात्मक नहीं है. देश आगे बढ़ने के बजाय पीछे की तरफ जा रहा है. हलाकान जनता ने बार्टर सिस्टम शुरू कर लिया है. यह वामपंथियों जैसा है जहां गरीब के मुंह से निवाला छिन जाता है.

हर किसी के साथ कभीनकभी स्कूल में यह हुआ होगा कि क्लास के कुछ गिनेचुने दुष्ट बच्चों की वजह से पूरी की पूरी क्लास को बैंच पर खड़ा कर दिया गया हो. नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी का फैसला ऐसा ही था. लेकिन अब सरकार का दावा है कि यह सजा नहीं, बल्कि बैंच पर संतुलन बनाए रख कर खड़ा होना सिखा रही है सरकार. यानी कैशलैस भारत.

वैसे, यह नुसखा केवल आम गरीब जनता, जिस में दलित, पिछड़े ज्यादा हैं, के लिए है. खास लोग तो 500 करोड़ रुपए की शादी अब भी कर रहे हैं. नोटबंदी के दौरान भाजपा के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी ने अपनी बेटी ब्राह्मणी की शाही शादी करवाई.

इंडिया-भारत की खाई बढ़ी

प्रधानमंत्री ने कहा कि ईबैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और ऐसे बहुत सारे तकनीक के इस्तेमाल का समय सब के लिए, खासतौर पर युवा मित्रों के लिए आ गया है. एक तरफ पुराणों का गुणगान करने वालों और गणेश में सर्जरी का कमाल देखने वाले प्रधानमंत्री हैं तो दूसरी तरफ अमेरिकी बैंकों द्वारा बनाई गई कार्ड संस्कृति को बेचने वाले प्रधानमंत्री जो उस इंटरनैट पर निर्भर रहना चाहते हैं जिस की कमान अमेरिका के वैज्ञानिकों के हाथों में है और रहेगी. देश का अपना आधारभूत ढांचा है कहां? चीनी अमेरिकी मोबाइल फोनों के उपभोक्ताओं की संख्या भले ही लगभग 103.5 करोड़ हो गई हो, इस में से केवल 30 प्रतिशत ही स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं. इस पर भी मोबाइल डाटा का इस्तेमाल महज एकतिहाई लोग ही करते हैं. रही बात ग्रामीण भारत की, तो अभी तक इंटरनैट की वहां पूरी तरह से पहुंच नहीं हुई है. गांवदेहात में ईवौलेट, प्लास्टिक मनी, नैटबैंकिंग अभी तक दूर की कौड़ी हैं. इन क्षेत्रों में सरकार को सब से पहले आम साक्षरता का अभियान चलाना होगा, फिर डिजिटल का. पक्का है कि इंडिया और भारत का अंतर रहते देश कैशलैस अर्थव्यवस्था की ओर कभी नहीं बढ़ पाएगा. मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाले मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा पिछड़े भारत में ही तो बसता है, जो नरेंद्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ के जुमले से भरमा गया था.

इंडिया के 4 प्रतिशत के मुकाबले 96 प्रतिशत भारत कहीं पीछे छूटा जा रहा है. नोटबंदी का सच जैसेजैसे सामने आ रहा है क्योंकि भारत खुद को प्रताडि़त, शोषित और ठगा सा हुआ महसूस कर रहा है.

फेल होती कार्ड सुरक्षा

झक मार कर लोग डिजिटल लेनदेन की ओर बढ़ रहे हैं. वे हर पल लुटने को तैयार भी रहें क्योंकि डिजिटल चोर लूटखसोट को तैयार हैं. फिर वह पेटीएम हो, ईवौलेट या बैंकों के ऐप. कहा जा रहा है कि नकदी की कमी के चलते जेबकतरों का धंधा मंदा हो गया है. शहरों से ले कर गांवदेहात में सेंध मार कर या पौकेटमारी कर चोरी की वारदातें कम हो गई हैं. सट्टेबाज, उठाएगिरे भले ही कम सक्रिय हैं, लेकिन पढ़ेलिखे डिजिटल चोरों की पौबारह है. मोबाइल हैकर सक्रिय हैं. वे, और तो और, पूर्व न्यायाधीश श्यामल सेन तक को चूना लगा चुके हैं.

फेल होगा कैशलैस झुनझुना

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफसाफ कह दिया कि देश को अब जबरन नकदरहित लेनदेन की आदत डाल लेनी होगी. इतना ही नहीं, नकदरहित लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए छूट का ऐलान भी किया गया.

डिजिटाइजेशन या कैशलैस लेनदेन से देशवासियों को गुरेज नहीं है. पर इस के लिए जनता पर जिस तरह से दबाव बनाया जा रहा है, उस का विरोध होना लाजिमी है. इस के लिए आधारभूत ढांचा धीरेधीरे तैयार होता है.

स्वीडन, फ्रांस, कनाडा, जरमनी, दक्षिण कोरिया और बेलजियम की 80-90 प्रतिशत कैशलैस इकोनौमी का हवाला दिया जा रहा है. अव्वल तो भारत की तुलना इन विकसित देश से की ही नहीं जा सकती, इन देशों में भ्रष्टाचार लगभग नहीं के बराबर है.

 संसद में वित्त राज्यमंत्री अर्जुन मेघवाल ने प्लास्टिक मनी लाए जाने की घोषणा की. इस के लिए सरकार कच्चा माल खरीद रही है. यहां सवाल यह है कि अगर देश की अर्थव्यवस्था को नकदरहित ही हो जाना है तो प्लास्टिक मनी आखिर क्यों? इस के लिए कच्चा माल खरीदने या इसे लाने के लिए कमर कसने से पहले सरकार ने जरूरी तैयारी कर ली है या फिर किसी एक दिन अचानक प्रधानमंत्री फिर से टीवी के परदे पर अवतरित होंगे और जनता को प्लास्टिक मनी के लिए कतार में खड़ा करवा देंगे.

रातोंरात जनता की जेब को मरुस्थल बना कर, बाजार की नकदी पर डाका डाल कर देश पर डिजिटल लेनदेन या कैशलैस अर्थव्यवस्था को थोपा नहीं जा सकता.

मोदी के हावभाव ने जनता के एक बड़े हिस्से में यह उम्मीद जताई कि अगले एक महीने में देश वाकई बदल जाएगा, सरकार देश की जनता को कोई नई दिशा दिखाएगी, लेकिन हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तमाम भ्रम पर से परदा उठा कर यह बहाना बनाने की कोशिश की है कि सरकार के इस कदम का मकसद कैशलैस भारत ही था.  

आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक के फटे परदे ढकने के लिए एक महीने के बाद मामले का रुख सरकार ने नकदरहित अर्थव्यवस्था यानी कैशलैस इकोनौमी की ओर मोड़ दिया है. सरकार है ही लक्ष्यभ्रष्ट. करना कुछ आता ही नहीं, सिर्फ मंत्र पढ़ना, हवन करना आता है. होना कुछ था, हो कुछ और रहा है.

साथ में मदन कोथुनियां और साधना शाह

अब खादी पर भी राजनीति का रंग

नरेंद्र मोदी में महात्मा गांधी को बेदखल कर दिया. शाब्दिक अर्थ में कुछ ऐसा ही हुआ है. अभी कुछ दिन पहले की बात है. कयास लगाया जा रहा था कि हो सकता है मोदी सरकार भारतीय नोट से गांधी को अवकाश में भेज दे और उनकी जगह किसी अन्य स्वतंत्रता सेनानी को दी जाएगी. बहरहाल, अभी तक यह तो नहीं हुआ. लेकिन खादी विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन ने 2017 साल का जो कैलेंडर और डायरी प्रकाशित किया है, उसमें खादी से गांधीजी की छुट्टी जरूर हो गयी. इससे देश के विभिन्न तबके की जनता में बहुत नाराजगी है.

इसे लेकर मीडिया में तो मोदी-कौआ और कौवे के अपमान की बात तक कर दी गयी है. लेकिन जहां तक देश की आम जनता का सवाल है तो जनता के एक बड़े तबके में इसको लेकर आक्रोश है. राजनीतिक पार्टी की बात अगर जाने भी दें तो खादी और खादी वस्त्र का कारोबार करनेवाले दूकानदारों से लेकर इन दूकानों में काम करनेवालों में भी नाराजगी साफ नजर आ रही है. बताया जा रहा है कि खादी कमीशन के कर्मचारियों ने मुंह पर काला कपड़ा बांध कर इस पर अपना विरोध जताया है.

आजादी के बाद से खादी के श्वेत-श्याम कैलेंडर पर धोती पहन कर अपने चिरपरिचित अंदाज में बैठे मोहनदास कमरचंद गांधी को चरखा चलाते देखा जाता रहा है. पीढ़ी दर पीढ़ी गांधीजी को इसी रूप में देखती आ रही है. गांधीजी खादी का ट्रेडमार्क बन चुके हैं. पर आज यह ट्रेडमार्क बदल गया है. ट्रेडमार्क के रंगीन होने पर एतराज नहीं होता. लेकिन गांधी की जगह नरेंद्र मोदी के ले लेने से बहुसंख्यक जनता को एतराज है.

कोलकाता के बड़ा बाजार के महात्मा गांधी रोड के दोनों तरफ कतार में बहुत सारी खादी की दूकानें हैं. खादी भंडार के एक बुजुर्ग दूकानदार का कहना था कि याद है संजय दत्त की एक फिल्म आयी थी! बुजुर्ग दूकानदार फिल्म का नाम याद करने की कोशिश करते हुए कहते हैं मुन्ना भाई करके थी. मैंने कहा ‘लगे रहो मुन्ना भाई’? बोले, हां-हां. इसमें मुन्ना भाई को मुगालता हो जाता है कि भारतीय नोट में गांधी जी के बदले उसकी तस्वीर हुआ करेगी. मुन्ना भाई के दिमाग में तो कैमिकल लोचा हुआ था, लेकिन नरेंद्र भाई मोदी को यह क्या हुआ? खादी के लिए अगर मॉडलिंग करते तो भी एक बात थी. किसी को आपत्ति नहीं होती. लेकिन गांधीजी को हटा कर उनकी जगह लेने की भला क्या जरूरत आन पड़ी मोदी जी को! कहां एक अहिंसावादी व्यक्तित्व और कहां गुजरात नरसंहार का आरोप झेल चुके नरेंद्र मोदी.

वहीं कोलकाता में हैंडलूम और खादी के मार्केट में गांधी खादी भंडार के एक विक्रेता विनोद सिंह का कहना है कि खादी का ट्रेडमार्क तो अहिंसावादी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही हैं और वहीं रहेंगे. यह छवि भारतीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जन-जन के दिलोदिमाग पर बैठ चुकी है. वहां तक नरेंद्र मोदी की पहुंच कभी नहीं हो पाएंगी.

रतनलाल पासवान का कहना है कि गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय चरखा कात कर खादी के जरिए स्वदेशी पर गर्व करने और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में देशवासियों को एक संदेश दिया था. यही नहीं, वे हर रोज नियमपूर्वक घंटा-दो घंटा चरखा चलाया करते थे. लेकिन महज तस्वीर खींचवाने के मकसद से नरेंद्र मोदी का चरखे के सामने बैठ कर चरखा कातने का पोज दिया जाना गांधी जी से जुड़ी देश की भावना को ठेस पहुंचाना है. खादी कमीशन ने ऐसा करके खादी की आत्मा को लहूलुहान कर दिया है.

आरोप यह भी है कि गांधीजी के तमाम आदर्शों को सरकार आहिस्ते-आहिस्ते धो-पोंछ कर साफ करती जा रही है. पिछले साल भी ऐसी कोशिश की गयी थी. तब भी मजदूर संगठन के विरोध के बाद अधिकारियों ने भविष्य में ऐसा कभी न होने का आश्वासन दिया था. बावजूद इसके इस साल फिर से ऐसा किया गया.

कमीशन की सफाई नहीं टिक पायी

हालांकि खादी विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन ने अपनी तरफ से सफाई दिया कि नरेंद्र मोदी लंबे समय से खादी की पोशाक पहनते आ रहे हैं. मोदी ने आम जनता के बीच खादी को लोकप्रिय बनाया है. दावा यह भी किया गया है कि विदेश में मोदी ने खादी को पहचान दी है. गौरतलब है कि हिप्पी संस्कृति के दौरान भी खादी पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गया था. और गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन को नरेंद्र मोदी का मेन इन इंडिया नाम दिया जाना नई बोतल में पुरानी शराब ही कहलाता है. हां, गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन में किसी तरह की मिलावट नहीं थी. 

बचाव में कहा तो यह भी जा रहा है कि अमुक-अमुक सालों में भी कैलेंडर में गांधीजी की तस्वीर नहीं छपी थी. इस साल भी अगर गांधी जी कैलेंडर और डायरी में नहीं है तो इतना हंगामा क्यों बरपा है? नहीं छपी थी तो नहीं छपी थी, गांधीजी खादी के ट्रेडमार्क तब भी थे. उन्हें बेदखल नहीं किया गया था. लेकिन अब गांधीजी के बदले मोदी दिखना ट्रेडमार्क ‘हैइजैक’ होने जैसा माना जा रहा है.

ब्रांडिंग के नाम पर

खादी विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन का कहना है कि नरेंद्र मोदी युवा जनमानस के आईकॉन हैं. मोदी कुर्ता को नरेंद्र मोदी ने लोकप्रिय बनाया. दरअसल, गुजरात में पड़नेवाली गर्मी के मद्देनजर नरेंद्र मोदी के लिए फतुआ टाइप सूती कुर्ता सहूलियत वाला पोशाक रहा है. गांव-देहात में यह हमेशा से पहना जाता रहा है. हां, 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जिस तरह से ब्रांडिंग की गयी, उसमें उनका कुर्त्ते की भी ब्रांडिंग हो गयी. इस तरह मोदी द्वारा पहना जानेवाला कुर्ता मोदी कुर्ता बन गया. इससे खादी का कुछ लेना-देना नहीं है. मोदी और कुर्ते की ब्रांडिंग के साथ ओबामा के भारत दौरे के समय मोदी के दर्जी चौहान ब्रर्दर की भी ब्रांडिंग हो गयी. दरअसल, अहमदाबाद के खानदानी तौर पर दर्जी के पेशे से जुड़े चिमनलाल चौहान के यहां मोदी का कुर्ता सिला जाता था. तब यह इतना विख्यात भी नहीं था. हां, मोदी के दसलखिया सूट के सामने आने पर जेड ब्लू लाइफस्टाइल इंडिया लिमिटेड के चौहान ब्रर्दर (विपिन चौहान-जितेंद्र चौहान) लाइमलाइट में आए. इन सबमें खादी का कोई लेना-देना नहीं रहा है.

खादी में गांधी जी जगह ले चुके नरेंद्र मोदी की चर्चा तो पहले ही है. अब डीएवीपी यानि डायरेक्टोरेट ऑफ एडवरटाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी के 2017 के कैलेंडर में जनवरी से लेकर दिसंबर तक हरेक पन्ने में नरेंद्र मोदी ने जगह बना ली है. पांच राज्यों में होनेवाले चुनाव के मद्देनजर इस कैलेंडर में केंद्र सरकार की योजनाओं के बहाने मोदी का प्रचार किया गया है. जनवरी महीने के पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के साथ बात करते हुए दिखाया गया है.

किसी महीने में मेक इन इंडिया का प्रचार में किसी एक फैक्टरी में मजदूर हेलमेट पहने है तो किसी महीने में अपने चुनाव क्षेत्र बराणसी में रिक्शा बांटते हुए दिख रहे हैं. कभी महिला बुनकरों के साथ तो कभी किसानों के साथ, कभी सेना के बीच तो कभी कैशलेस इकोनौमी का प्रचार करते हुए, कभी स्वच्छ भारत मिशन के प्रचार में. यहां तक कि मई में चरखा कातते हुए भी नजर आते हैं. नवंबर में संसद परिसर में तो दिसंबर में दिव्यांग जन के साथ. बहरहाल, मोदी की ब्रांडिंग में खादी हो गयी बदनाम.

लुट गए बापू

गुलाम भारत में देश की आजादी के संग्राम का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है गांधी टोपी. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह टोपी लोकप्रिय हुआ और देशभक्ति का एक प्रतीक चिह्न बन गया. बाद में कांग्रेसी विचारधारा के साथ ऐसा जुड़ा कि गांधी टोपी को कांग्रेस जन का ट्रेडमार्क बन गया. इसकी लोकप्रियता का जो ज्वार स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उठा था, आजादी के बाद के छठे दशक के अंत तक यह भाटा में तब्दील हो गया. लोकप्रियता का ज्वार ऐसा उतरा कि एक समय ऐसा भी आया जब बंबइया सिनेमा में राजनीतिक विलेन को गांधी टोपी धारी दिखाया जाने लगा. कह सकते हैं कि फिल्मों ने गांधी टोपी को एक बड़े हद तक बदनाम ही किया है.. याद कीजिए, अर्द्धसत्य और आक्रोश जैसी फिल्मों में खलनायक खद्दर और गांधी टोपी में दिखाई देता है.

आजादी के 65 सालों के बाद समाजसेवी अन्ना हजारे की अगुवाई में अगस्त 2011 को आम जनता ने इस टोपी पर अपनी आस्था ‍जताया. बड़े पैमाने पर भारत के विभिन्न शहरों में इसे सिर पर धारण कर देश का आम आदमी सड़क पर उतरा और ‘मैं अन्ना हूं’ का उद्घोष करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शामिल हुआ. तब यह अन्ना टोपी गांधी टोपी के समानांतर खड़ा हो गया. दूसरे शब्दों में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन के दौरान एक बार फिर यह गांधी टोपी आम जनता के बीच नेकनजर से देखा जाने लगा.

लेकिन इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में अपने पैर फैलाने के मकसद से इस गांधी उर्फ अन्ना हजारे की गांधी टोपी को भुनाया और इसकी ब्रांडिंग आम आदमी पार्टी के रूप में कर दी. सब जानते हैं कि अरविंद केजरीवाल कोई गांधीवादी तो है नहीं. उनका व्यक्तित्व नौकरशाह का है. आज भी वे मुख्यमंत्री कम और नौकरशाह कहीं अधिक नजर आते हैं. उनकी नौकरशाही शैली में गांधी टोपी कभी फबी भी नहीं. बहरहाल, ‘आप’ के गांधी टोपी ने जनता को खूब भरमाया.

कमोवेश खद्दर का भी राजनीति से लेकर सिनेमा में भ्रष्ट राजनीतिक व्यक्तित्व का पोट्रेट में इसी तरह इस्तेमाल किया गया है. कुल मिला कर गांधीजी के सादगीपूर्ण रहन-सहन और सादे विचार को बदनाम किया गया. आज चरखे पर भी बदनामी का चादर डाल दिया गया. महात्मा गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलन व विरोध-प्रदर्शन का मूक पर जबरदस्त हथियार हुआ करता था चरखा. इतना ही नहीं, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चरखा को चित के शुद्धिकरण का भी जरिया माना जाता रहा है.

गांधीजी की टोपी, गांधी जी का खद्दर, गांधीजी का चरखा– सब कुछ देश की राजनीति ने लूट लिया है. राष्ट्रपिता व महात्मा कहला कर गांधी लुट गए हैं. (गनीमत है गांधीजी की धोती सलामत है) बावजूद इसके यह भी सच है कि देश का जन-जन गांधीजी की टोपी, खद्दर और चरखा के मोह से दूर नहीं हो पायी है. मार-काट, उठा-पटक, कादा-कीचड़ की राजनीति के बीच आज भी गांधीजी का हैंगओवर है. इस देश की जनता के मन में गांधीजी के लिए जगह कुछ कम नहीं हुई है. इसी कारण खादी के कैलेंडर में राष्ट्रपिता की जगह नरेंद्र मोदी को देख देश उबल रहा है.

यह भी खूब रही

हमारे पड़ोस में एक रिटायर्ड आयुर्वेदिक डाक्टर रहते थे. उन का लड़का मेरे भैया का घनिष्ठ मित्र था. वे अकसर हमारे घर आया करते थे. वे जब भैया से मिलते तो अपने अन्य मित्रों के बारे में ये कहते हुए नहीं थकते थे कि वो साला बहुत खराब है, वो साला ऐसा है, वैसा है, वगैरावगैरा. यह सब सुनतेसुनते मेरे भैया परेशान हो गए तो एक दिन बातबात में बोले, ‘‘अरे जीजाजी, होगा आप का साला खराब, लेकिन इतना गुस्सा करना आप के लिए ठीक नहीं. वैसे, यह बताओ, ऐसे कितने साले हैं आप के.’’ यह सुन कर वे बहुत शर्मिंदा हुए और उस के बाद से उन्होंने बातबात पर ‘साला’ कहना बंद कर दिया.

विद्या व्यास, मंदसौर  (म.प्र.)

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हम उन दिनों पटना में रहते थे. पति के दोस्त की शादी बिहार के एक गांव में हुई थी. रिवाज के मुताबिक गौना कुछ सालों के बाद होता है. दोस्त पत्नी को विदा कराने गांव पहुंचे. उन्होंने गांव के मेले में अपनी दुलहन को एक बार देखा था पर पत्नी ने शायद उन्हें नहीं देखा था. विदाई के बाद पत्नी ट्रेन में अपनी सीट पर बैठ गई थी और पति अपने साले साहब के साथ प्लेटफौर्म पर खड़े हो कर बात कर रहे थे. इसी बीच पत्नी को पानी लेने के लिए प्लेटफौर्म के नल पर पहुंचते पति ने देख लिया था. नल पर भीड़ थी. पत्नी की मदद के लिए पति उस के पीछे पहुंच गए और उन्होंने पत्नी के हाथ से जग ले कर भरने की कोशिश की तो उसी क्षण पत्नी ने आव देखा न ताव, एक चांटा पति को जड़ दिया. पति सन्नाटे में थे. तभी उन का साला ‘मेहमानमेहमान’ (जमाईसाहब) कहते हुए आ गया. पत्नी के होश गुम हो गए. वह फौरन पति के पैर पकड़ कर माफी मांगने लगी. आसपास के सारे लोग माजरे को समझने की कोशिश करते हुए मुसकरा रहे थे.

चेतना भाटिया, नालगोंडा (आं.प्र.)

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एक दिन बड़े भैया हमें समझा रहे थे कि हम सब को आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए. आपसी सहयोग से कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है. बुरे व्यक्ति के साथ बुराई करने से किसी को कुछ लाभ नहीं मिलता है. सो, अपना दिल बड़ा कर के उस को वक्त पर छोड़ देना चाहिए. तभी छोटे भाई इंद्रेश स्वर को गंभीर बना कर बोला, ‘‘बड़े भैया, यदि हम ने दिल बड़ा कर लिया तो हम सब को ‘इनलार्जमैंट औफ हार्ट’ की बीमारी हो जाएगी. उस की यह बात सुन कर हम सब के साथ बड़े भैया भी हंस पड़े.     

अनु वडोला, धौलपुर (राज.)

गिन्नी माही : चेतना का स्वर

भेदभाव का दंश झेल रहे दलित समुदाय में इन दिनों विद्रोह का नया ट्रैंड दिखाई दे रहा है. पढ़ीलिखी नई दलित पीढ़ी सोशल मीडिया पर अपना आक्रोश व्यक्त करने के साथसाथ मंचों पर लाइव कार्यक्रमों में गीतों के माध्यम से विद्रोह के सुर तेज कर रही है. इन गीतों में स्वतंत्रता और अधिकारों के साथसाथ ललकार व एकता की गूंज भी सुनाई पड़ रही है. आजादी के समय लोगों में गीतों के माध्यम से देशभक्ति दिखाई दी थी, आज दलित समुदाय में गायकी के जरिए स्वतंत्रता, सम्मान हासिल करने का जनून नजर आ रहा है. यह नया तेवर देशभर के लाखों दलितों को बहुत भा रहा है और उन्हें एकजुट होने को प्रेरित कर रहा है. यूट्यूब पर कई दलित गायकों के हजारों समर्थक भेदभाव, छुआछूत, अत्याचार के खिलाफ खड़े दिखते हैं.

इन गीतों की गूंज खासतौर से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में अधिक है. दलितों मे सब से पहले चेतना जगाने वाले महाराष्ट्र के दलित गायकों की पौध बड़ी है पर उत्तर भारत के कुछ गायक ज्यादा लोकप्रिय रहे हैं. छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ मानवता की अलख जगाने वाले कबीर, रविदास के भजनों और सूफी गायकों से एकदम हट कर इन नए गायकों के सुरों में, तेवरों में सीधा आक्रोश, विद्रोह और ललकार है. आज जब देशभर में दलितों पर हो रहे अत्याचार को ले कर राजनीतिक और सामाजिक माहौल गरमाया हुआ है, ऐसे में दलित गायकों के गीत दलित समुदाय में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. कुछ समय पहले दलित गायकों के लिए एक कैसेट निकलने में सालों लग जाते थे पर आज एलबम, वीडियो एक के बाद एक निकल व मशहूर हो रहे हैं. इस समुदाय के गायकों की एक पूरी पीढ़ी सक्रिय है. वैसे तो किशोर कुमार पगला, राजेश राजू, अंजलि भारती, रेशमा, रूपलाल धीर, जे एच तानपुरी, चमकीला, राज ददराल जैसे कई दलित गायक हैं पर उत्तर भारत में खासतौर से पंजाब की गुरकंवल भारती, जो मंचों पर गिन्नी माही के नाम से मशहूर हैं, इन दिनों लोकप्रियता के शिखर पर हैं.

जालंधर की गिन्नी माही अपने गीतों से दलित चेतना का अलख जगा रही हैं. रविदास, भीमराव अंबेडकर पर गाए उन के पंजाबी गीतों की धूम मची है. मंचों और लाइव कायक्रमों में उन के गीत खूब सराहे जा रहे हैं. महज 18 साल की गिन्नी की गायकी अनूठी है. वे अपने कार्यक्रमों में अंबेडकर के संदेश फैला रही हैं. गिन्नी की कामयाबी दबेकुचले दलित वर्ग की आवाज है. जालंधर के एचएमवी कालेज में प्रथम वर्ष (म्यूजिक) में पढ़ रही गिन्नी को यूट्यूब, फेसबुक पर मिल रहे लाखों हिट्स उन की सफलता के सुबूत हैं. गिन्नी माही का ‘चमार पौप’ पंजाब में खूब लोकप्रिय है. ‘हुंदे असले वध डेंजर चमार’ यानी हथियारों से अधिक खतरनाक चमार है. गिन्नी के ‘डेंजर चमार’ पौप में सामाजिक पक्षपात और आर्थिक रूप से दलितों को वंचित रखने वाली शक्तियों के खिलाफ समुदाय को एकजुट करने का आह्वान है. अपनी जाति पर अपमान के बजाय गर्व करने की सीख उस में है. गिन्नी कहती हैं, ‘‘मेरे गीतों में जाति, आयु और आर्थिक हालात से हट कर देखने और दलितों को खुद अन्याय व दमन के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा है. मैं ने अपनी दादी, परदादी और पुराने लोगों से सुना था कि उन लोगों के साथ भेदभाव, छुआछूत, अत्याचार होते थे, हालांकि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. पहले हमारे समुदाय के लोग जाति छिपाते थे, अपमान महसूस करते थे पर अब वे गर्व के साथ अपनी जाति बताने के लिए आगे आ रहे हैं. मेरा गीत ‘डेंजर-2’ जो चमारों पर है, उन्हें खुद पर गर्व करने के लिए प्रेरित करने वाला है.’’

जागरूक दृष्टिकोण

गिन्नी के अब तक 5 मल्टी एलबम आ चुके हैं. वे एक हजार से अधिक स्टेज शो वे लाइव कार्यक्रमों में भाग ले चुकी है. ‘गुरां दी दीवानी’ व ‘गुरपूरब है कांशी वाले दा’ दोनों एलबम ज्यादा लोकप्रिय हैं. जाति, धर्म के सवाल पर गिन्नी कहती हैं, ‘‘मैं मानवता को मानती हूं. अंबेडकर ने समानता का संविधान, रविदास, कबीरदास ने जातपांत से हट कर मानवता पर जोर दिया. मेरे गीतों में भी यही संदेश है.’’ गिन्नी राजनीतिक और सामाजिक तौर पर काफी परिपक्व व जागरूक हैं. वे जानती हैं कि संविधान लिखने वाले अंबेडकर की वजह से ही दलितों का उत्थान हो रहा है. अंबेडकर को अपना आदर्श मानने वाली गिन्नी माही कहती हैं कि आज हमारे सभी अधिकार भीमराव अंबेडकर की देन हैं. उन पर एक गीत भी गाया है, ‘मैं फैन बाबासाहेब दी, जिने लिखिया सी संविधान.’

‘की होया जे मैं धी हां,’ गीत में गिन्नी ने कन्याभ्रूण हत्या के खिलाफ भी सुर दिया है. गिन्नी का कहना है कि उन्हें कुदरत की तरफ से दमदार आवाज मिली है तो वे अपनी आवाज से लोगों को सामाजिक पिछड़ेपन से बाहर निकालने की कोशिश करती रहेंगी. 8 साल की उम्र में पिता राकेश माही ने बेटी के अंदर गायन प्रतिभा को पहचाना था और जालंधर के कला जगत नारायण स्कूल में दाखिला करवा दिया. माही ने गुरु रविदास की स्तुति में गंभीरता से संगीत का अभ्यास किया. फिर अमर औडियो के अमरजीत सिंह ने माही के 2 एलबम ‘गुरां दी दीवानी’ व ‘गुरपूरब है कांशी वाले दा’ निकाले. इन दोनों एलबमों से माही को पहचान मिलनी शुरू हुई. पंजाब की तरह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी दलित आक्रोश गीतों में प्रकट हो रहा है. महाराष्ट्र में मराठी, आंध्र प्रदेश में स्थानीय बोली में गायक सामाजिक विसंगतियों के राग अलाप रहे हैं और लोग उन्हें काफी पसंद कर रहे हैं. ‘जागो बहुजन साथियों’, ‘कह गए कांशीराम जमाना बदलेगा’, ‘काम दलितों का क्या किया साहेब’, ‘जो कुछ भी दिया है अंबेडकर ने दिया है’, ‘बाबासाहेब का मिशन दिल्ली से’, ‘सुनो सिपाही भीम के’, ‘जाग रे समाज’, ‘तेरी जय हो बाबा’, ‘मेरे बाबा भीम महान’ जैसे गीत दलित गायक मंचों से गा कर अपने समुदाय को जगाने का आह्वान कर रहे हैं. बौलीवुड में वर्सेटाइल सिंगर बनने का ख्वाब देख रही गिन्नी माही गुरु रविदास के बारे में कहती हैं कि उन्होंने केवल दलित समाज के लिए नहीं, पूरे विश्व के लिए कहा था कि वे ऐसा समाज चाहते हैं जहां पर किसी तरह का भी भेदभाव न हो, सभी को समानता मिले. अपने गीतों में मैं यही संदेश दोहरा रही हूं.

क्रांति की दस्तक

आजादी के बाद पहली बार दलित समुदाय की नई पीढ़ी ने जातिगत व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का माध्यम गीतों को चुना है. इस से पहले की पीढि़यां चुपचाप छुआछूत, भेदभाव का दंश सहन करती आ रही थीं. यह एक नए तरह का बदलाव है, क्रांति की दस्तक है जिसे ऊंची जाति की नई पीढ़ी भी स्वीकार कर रही है, जाति और धर्म के धंधेबाजों को छोड़ कर. देश के भीतर एक नए तरह की आजादी के तराने दलित युवाओं में नया जोश व उम्मीद जगाते प्रतीत हो रहे हैं. दलित वर्ग शिक्षा, व्यापार, उद्योग, राजनीति व प्रशासन में आगे आ रहा है और वह अपनी आवाज उठाने में अब पीछे नहीं है. रोहित वेमुला आत्महत्या, उना गौकशी, मिर्चपुर मामला, पलवल, फरीदाबाद जैसी घटनाएं राष्ट्रीय सुर्खियां बनीं जो कि दलितों की जागरूकता को जाहिर करती हैं. यह सही है कि आजादी के 69 वर्षों बाद भी दलितों की दशा नहीं सुधरी है. संविधान में बराबरी के अधिकार के बावजूद सामाजिक बराबरी से यह तबका अभी दूर है. इस के पास जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने वाली सुविधाएं नहीं हैं. गांवों में 45 फीसदी दलित परिवारों के पास जमीनें नहीं हैं. वे छोटीछोटी मजदूरी कर के गुजारा करते हैं.

सोच में बदलाव की जरूरत

भले ही देश में शिक्षा, साक्षरता का स्तर बढ़ा हो पर दलितों के प्रति सामाजिक सोच में बदलाव नहीं हुआ. हालांकि सरकार उन के स्तर को सुधारने में पैसा खर्च कर रही है पर यह धन कहां जाता है, इस का कोई हिसाब नहीं. 2016-17 में सरकार ने दलितों के लिए 38,832 करोड़ रुपए आवंटित किए. यह राशि पिछले बजट से 30 हजार करोड़ रुपए ज्यादा थी पर दलितों के उत्थान में नाममात्र का ही खर्च हुआ. देश की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत दलित अपने बुनियादी हकों के लिए तरस रहा है. सदियों से धर्म के आधिपत्य में रहे समाज और राज की दिशा अन्यायी धर्म द्वारा तय की जाती रही. ऐसे में समाज का निचला तबका सामाजिक, आर्थिक तौर पर गुलामी में जकड़ा रहा. दलित आज गीतों में अंबेडकर का गुणगान कर रहे हैं, इसलिए कि उन्हें जो भी अधिकार मिले हैं, ब्रिटिश उपनिवेश के बाद मिले हैं. भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ल कर तमाम अनुच्छेद स्वतंत्रता, समानता, न्याय के मानवीय अधिकारों की रक्षा करते नजर आते हैं. अंबेडकर ने ही दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की और आज वे उन के लिए गीतों की प्रेरणा बने हैं. गीत क्रांति का जरिया है तो क्या दलित गीत देश में दलितों में नई जागृति, नई क्रांति के वाहक बन रहे हैं?

गिन्नी माही कहती हैं कि कलाकार की कोई जाति नहीं होती, जातियां तो इंसानों द्वारा बनाई गई हैं. हमारा मकसद इंसानों में समानता, स्वतंत्रता का भाव पैदा करना है. दलित अब इसे पाने के लिए जाग रहा है. गिन्नी माही के पिता राकेश कुमार बेटी की कामयाबी से खुश हैं और वे दलित समुदाय के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बेटी की गायकी को प्रोत्साहन देने में पीछे नहीं हैं. लता मंगेशकर, श्रेया घोषाल, राहत फतेहअली खान, सोनू निगम और पंजाबी गायक फिरोज खान व सुबेश कुमारी को पसंदीदा गायक मानने वाली गिन्नी माही दलित समुदाय में अस्मिता जगाने में सफल दिखती हैं. देश में भक्ति आंदोलन जैसी कई जनजागरण मुहिम चलीं, बराबरी, स्वतंत्रता, जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना समाज में नहीं हो पाई. दलित गीत उसी कड़ी में एक आंदोलन है जिस के जरिए वे स्वतंत्रता, समानता की अपनी वेदना जहांतहां व्यक्त कर रहे हैं. इस का कुछ तो असर पड़ेगा ही.

दिन दहाड़े

मैं अपनी बेटी के यहां दिल्ली गई. 25 दिसंबर को उस का जन्मदिन होता है. जन्मदिन की पार्टी के लिए दामाद सामान लेने बाजार गए. उन्होंने सामान खरीदा और जितना बिल बना था, दुकानदार को पैसा दिया. दुकानदार ने पैसे ले कर बाकी के 400 रुपए उन को लौटाए. उन्होंने उन रुपयों को अपनी जैकेट की साइड की जेब में रख लिया और आगे जाने लगे. जब वे जा रहे थे तो एक बच्चा उन से टकराया. उन्हें दुख हुआ कि बच्चा टकरा कर गिर गया. कुछ कहते किंतु तब तक वह लड़का जा चुका था. उन्हें कुछ और सामान लेना था. उन्होंने सामान खरीदा और जेब में रखे पैसे देने लगे तो हैरान रह गए, जेब में पैसे ही नहीं थे. तब वह दुकानदार बोला कि वह लड़का जो आप से टकराया था, ले गया होगा. ये ऐसे ही पौकेटमारी करते हैं.    

काशी चौहान, कोटा (राज.)

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मैं शासकीय सेवा में हूं. इस बार भोपाल की अरेरा कालोनी में मुझे रहने के लिए क्वार्टर मिला. क्वार्टर पौश कालोनी के नजदीक है. एक बार एक लड़का दरवाजे पर आया और मुझे एक एलबम तथा एक लैटर दिखाया. एलबम में फोटो के अलावा विज्ञापन था जो राजस्थान के किसी संस्थान ‘विकलांग सेवा संस्थान’ का था और लैटर में विकलांग बच्चों के लिए स्वेच्छा से कुछ भी दान करने की मार्मिक अपील थी. देखा कि वह लड़का भी पोलियोग्रस्त था. मैं ने तुरंत ही 50 रुपए निकाले, दे दिए. यही नहीं, अपनी कालोनी में उस के साथ सहायता राशि भी एकत्र करवाई.

कुछ महीनों बाद इसी तरह एक और विकलांग लड़का मेरे घर पर आया और एलबम व लैटर दिखा कर मदद मांगी. मैं ने फिर मदद की. फिर 2 महीने बाद फिर एक और विकलांग लड़का आया तब मैं ने उस को कुछ नहीं दिया और उस से उस का नामपता नोट किया. मेरे घर के पास पुलिस थाना है. मैं ने उस से पुलिस थाना चलने को कहा तो उस ने डर के मारे सबकुछ बताया कि हम सभी लड़के, जो विकलांग हैं, एक संस्था में नौकरी करते हैं. अच्छी, बड़ी कालोनियों में जा कर विकलांगता के साथ एलबम, पत्र दिखा कर दान के नाम पर रुपए वसूलते हैं. इस के लिए हमें मासिक वेतन मिलता है. इस दान का उपयोग कहीं भी, किसी विकलांग सेवा संस्थान में नहीं होता.

मैं ने उस लड़के को विकलांग होने के कारण, छोड़ दिया. आज के शहरीकरण के कारण ‘विकलांगता’ भी कुछ लोगों का व्यवसाय बन गई है जो आम जनता से दिन दहाड़े विकलांगता का दान वसूल कर रहे हैं.

भवानी शंकर सिकरवार, भोपाल

जूनियर हौकी टीम की खिताबी जीत

भारतीय हौकी प्रेमियों ने ऐसा मंजर वर्षों बाद देखा जब टीम के हर मूव पर दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में ‘इंडिया इंडिया’ के नारे लगाए जा रहे थे. कोई तिरंगा लहरा रहा था तो कोई खुशी से झूम रहा था. ऐसा अकसर क्रिकेट मैचों में देखने को मिलता है. लेकिन इस बार मौका था जूनियर हौकी विश्व प्रतियोगिता के फाइनल मैच का.

जीत के अवश्मेघी रथ पर सवार भारतीय टीम ने 15 साल बाद हौकी का खिताब बेल्जियम को 2-1 से हरा कर जीत लिया. इस से पहले वर्ष 2001 में आस्ट्रेलिया के होबर्ट में भारतीय टीम ने अर्जेंटीना को 6-1 से हरा कर जूनियर वर्ल्ड कप जीता था.

इतने वर्षों बाद यह खिताबी जीत वाकई उम्मीद जगाने वाली है. देश के लिए यह जीत कई माने में खास रही. कई ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ी उभर कर निकले हैं जो भविष्य में लंबी पारी खेल सकते हैं.

जिस प्रकार युवा खिलाडि़यों ने आक्रामकता दिखाते हुए यह खिताबी जीत हासिल की है उस से युवा खिलाडि़यों को विदेशी मैदानों में इस का फायदा मिलेगा. वैसे भी, हौकी तेज गति का खेल है और इस में आक्रामक तेवर दिखाने होंगे. भारतीय जूनियर टीम को इसी शैली को बरकरार रखना होगा.

बहरहाल, ऐसा कम ही देखा गया है कि क्रिकेट के बाद किसी दूसरे खेल में दर्शकों ने इतना उत्साह दिखाया हो. पिछले कुछ समय में दूसरे खेलों के प्रति भी खेलप्रेमियों का उत्साह बढ़ा है चाहे वह कबड्डी हो, हौकी हो या फिर कुश्ती. मगर खेलप्रेमी तभी खुश होते हैं जब उन के खिलाड़ी या उन के देश के खिलाड़ी प्रदर्शन अच्छा करते हैं.

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