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ऐसा भी होता है

हम पति पत्नी घूमने के लिए अमेरिका गए थे. वाशिंगटन शहर के निकट ही पोटोमैक सिटी में हम अपने पारिवारिक मित्र दंपती के साथ ठहरे हुए थे. शनिवार का दिन होने के कारण सभी का अवकाश था. सो, सुबह ही खानेपीने की सारी तैयारियां कर हम ने मैरीलैंड के कई सीन देखने का प्रोग्राम बनाया. उस के बाद हमें गाड़ी से ही फिलाडैल्फिया जाना था. मित्र दंपती, उन की बेटी व उन के दोनों बच्चे तथा हम पतिपत्नी गाड़ी में बैठ कर निकल पड़े.

बड़ा ही सुहावना मौसम था. ठंडी हवा चल रही थी. इतने में बूंदाबांदी शुरू हो गई. मित्र ने एक बटन दबाया और उन की कार की छत का सामने वाला ऊपर का थोड़ा सा हिस्सा खुल गया. ठंडी हवाओं ने हमें अंदर तक सिहरा दिया. कमाल की बात यह थी कि बूंदें कार की छत पर गिरती दिख रही थीं किंतु हमें भिगो नहीं रही थीं. सड़क के दोनों ओर घने पेड़ लगे थे. तरतीब से कटी झाडि़यां, जो सड़क के दोनों तरफ थीं, वातावरण की शोभा बढ़ा रही थीं.

भैया ने कहा कि आप लोगों को एक मजेदार जगह दिखाता हूं, जरा सड़क पार करने का अनुशासन रखिएगा. हम कुछ पूछ पाते  तब तक गाड़ी उन्होंने एक जैब्रा क्रौसिंग पर रोक दी. दूसरी साइड की सभी गाडि़यां रुकी हुई थीं. हम ने देखा कि क्रौसिंग के बीचोंबीच एक बड़ी बतख खड़ी क्वैकक्वैक की आवाज कर रही है.

देखते ही देखते सड़क के एक किनारे झाडि़यों के करीब बड़ी से छोटी हर आकार की 15-16 बतखें निकलीं. अब मध्य में खड़ी बतख उन के निकट आई, क्वैकक्वैक की आवाज कर अपनी भाषा में उस ने कुछ समझाया, फिर स्वयं आगे बढ़ी. पीछे से कतारबद्ध सभी बतखें चलने लगीं. उन्हें मध्य सड़क तक ला कर वह वहीं खड़ी हो गई. अन्य सभी बतखें धीरेधीरे सड़क पार कर दूसरी तरफ के जंगलों में प्रवेश कर गईं. तब तक लगातार वह क्वैकक्वैक की आवाज करती रही.

फिर जब सब से नन्हीं 2 बच्चा बतखें भी जंगल में चली गईं तब वह तेज चाल से लगभग दौड़ती हुई जंगल में विलीन हो गई. बड़ा ही मनोहारी दृश्य था. मित्र ने बताया कि यह दृश्य प्रतिदिन जातेआते में देखने को मिलता है, किंतु केवल इसी क्रौसिंग से ये सड़क पार करती हैं. कितना संयम था उन जीवों में, शायद मनुष्य भी ऐसे नियम का पालन नहीं कर पाते हमारे देश में. इस क्रौसिंग का नाम बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा है-डक क्रौसिंग.

– डा. निर्मला सिंह

दिन दहाड़े

सुबह के वक्त पति के औफिस जाने के बाद 11 बजे मैं मेनगेट बंद करने जा रही थी. उसी समय 26-27 वर्ष का एक लड़का मेरे पास आया. मेरे पैर छू कर उस ने प्रणाम किया और बोला, ‘‘चाचीजी, आप ने हमें नहीं पहचाना, मैं पंडितजी का लड़का हूं.’’ मैं थोड़ी सकपका गई और न कहते हुए सिर हिलाया. लेकिन फिर भी उस ने कहा, ‘‘स्थानीय नर्सिंग होम में मेरी पत्नी की डिलीवरी हुई है, मां ने शाम को छठी में आप को बुलाया है कि मैं आप से 2,000 रुपए ले आऊं.’’

चूंकि वह इतने आत्मविश्वास के साथ बोला और देखने में भी भला सा लग रहा था, तो मुझे भी लगा कि हो सकता है, गांव के पंडितजी का लड़का हो. यह कहते हुए कि अभी तो मेरे पास इतने ही हैं, 1,000 रुपए उसे दे दिए. दूसरे दिन जब मेरे पति ने पंडितजी से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लड़के की तो शादी ही नहीं हुई है.’’

अगले दिन पंडितजी अपने लड़के को ले कर मेरे घर पर आए और बोले, ‘‘क्या यही लड़का था?’’ मैं बोली, ‘‘नहीं.’’ तब मुझे समझ में आया कि दिनदहाड़े कोई मुझे चूना लगा गया था.       

– शोभा दास

*

मैं अपने मायके बनारस आई हुई थी. मेरा भतीजा, जोकि बिहार के एक गांव में रहता है, की पत्नी अपने 2 बच्चों के साथ बनारस में रह कर उन्हें शिक्षा दिला रही थी. पिछले 17 अप्रैल को गांव से मेरे भाईभाभी अपनी इस बहू के पास बनारस आए हुए थे. भाभी को कान के टौप्स लेने थे. अगले दिन वे अपनी बहूबेटे के साथ बाजार गईं और उन्होंने टौप्स खरीदे. बहू ने टौप्स का पाउच ज्वैलर्स के थैले से निकाल कर दूसरे थैले में रख दिया, जिस में दवा आदि थी. चूंकि घर पास ही था, वे पैदल ही आ रहे थे. रास्ते में साड़ी की दुकान देख भाभी साड़ी लेने बहू के साथ दुकान में चली गईं और उन का बेटा, उन्हें दुकान में छोड़, अपने काम से चला गया. घर, दुकान से 30-40 गज की ही दूरी पर था.

साड़ी खरीदने के बाद भाभी और बहू घर की गली में मुड़ी ही थीं कि एक जुलूस सा निकल रहा था. वे उस से बचते हुए सावधानी से घर आ गईं. घर आने पर भाई ने कहा कि कैसे टौप्स लाई हो, दिखाओ. बहू ने टौप्स निकालने के लिए बैग में हाथ डाला तो बैग में वह पाउच नहीं था, बाकी सबकुछ था. ध्यान से देखा तो उस थैले में 5-6 इंच का लंबा कट था, बहू यह देख अंचभित थी. कब, कहां, किस ने वह थैला काटा और सिर्फ वही टौप्स वाला पाउच निकाला.       

– मंजु रस्तोगी

बच्चों के मुख से

मेरा 5 वर्षीय बेटा प्रांशुल टैलीविजन का बहुत शौकीन है. वह खासकर ‘आहट’ या फिर ‘कोई है’, जैसे डरावने सीरियल भी डरतेडरते देख लेता है. एक दिन की बात है. मैं पीहर में सब के साथ लौन में बैठी थी. प्रांशुल चिल्लाते हुए आया, ‘‘मम्मी, आत्मा आ गई, मम्मी आत्मा आ गई, गेट बंद कर लो.’’ हम सब चौंक गए कि आखिर माजरा क्या है. जा कर देखा, तो पिताजी के पुराने मित्र थे, जिन्होंने प्रांशुल से पूछा कि तुम्हारे नानाजी कहां है, जा कर कहो कि उन का दोस्त आत्मा आया है.

बस, फिर क्या था, मेरा बेटा एकदम डर गया. अभी तक उस ने ‘आत्मा’ नाम का मतलब ‘आहट’ सीरियल की आत्मा से ही जाना था. जब आत्माराम अंकल को सारी बात का पता चला तो वे भी हमारे साथ हंस पड़े. वैसे, इस तरह के सीरियल अंधविश्वास फैलाने के सिवा कुछ भी सीख नहीं देते इसलिए बच्चों को इस से दूर ही रखें तो बेहतर है.  

– अंजु सिगंड़ोदिया

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मेरा 7 वर्षीय भांजा बहुत ही नटखट है. वह टैलीविजन पर फिल्म व गाने बड़े गौर से देखता व सुनता है. एक दिन हम सब बैठे ऐसे ही उस से उस की शादी के लिए कहकह कर छेड़ रहे थे. कुछ देर तो वह सुनता रहा, फिर बोला, ‘‘शादी के बारे में बोले जा रहे हैं, पहले मुझे यह तो बताओ कि लड़की मिलेगी तो मैं कौन सा गाना उस के लिए गाऊंगा.’’ उस की भोली बात सुन कर हम सब बहुत हंसे.   

– तृप्ता अग्रवाल

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मैं उत्तर प्रदेश के एक कसबे के इंटर कालेज में उपप्रधानाचार्य था. कसबे के पुलिस इंस्पैक्टर मिस्टर भारद्वाज का बेटा मनोज मेरे बेटे अतुलेश का सहपाठी था. दोनों कक्षा 4 में पढ़ते थे. एक दिन शाम के समय वे दोनों हमारे घर में खेल रहे थे. किसी बात पर दोनों में नाराजगी हो गई. मनोज ने कहा, ‘‘पता है, मेरे पापा पुलिस इंस्पैक्टर हैं.’’ इस के जवाब में अतुलेश बोला, ‘‘और तुम्हें मालूम है, मेरे पापा 22 स्कूलों के प्रिंसिपल (वाइस प्रिंसिपल) हैं.’’

अतुलेश की बात सुन कर मुझे हंसी आ गई. अंगरेजी के ‘वाइस’ शब्द को हिंदी की गिनती के साथ जोड़ कर उस ने एक नया अर्थ दे दिया था. इस पुरानी घटना की याद कर आज भी मुझे हंसी आ जाती है.     

– हरिश्चंद्र

यह भी खूब रही

मुझे किडनी की शिकायत होने पर चिकित्सक के परामर्श के कारण पीने के पानी पर खास सख्ती बरती गई थी. रक्षाबंधन पर मेरी बहन ख्याति राखी बांधने आई, मैं ने राखी बंधवा ली और शगुन भी दिया. जब वह जाने लगी तब मैं ने कहा, ‘‘कंजूस, मिठाई या मेवा कुछ तो खिला दे.’’ तभी उस ने पानी का गिलास मेरे हाथ में थमा दिया और चली गई. मैं आश्चर्यचकित हो कर मुसकरा कर रह गया.    

– कैलाश बिंदल

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मेरी एक मौसीसास हैं, जो बहुत बुजुर्ग हैं. उन की जवानी के समय की बात है. मौसाससुर उन दिनों तहसीलदार थे. इसलिए मौसीजी की अपनी सहेलियों में बड़ी प्रतिष्ठा थी. मौसीजी की अंगरेजी सीख कर अपनी सहेलियों में रोब झाड़ने की तमन्ना  थी.

एक दिन उन्होंने अपने एक भांजे से पूछा कि किशोर, अंगरेजी में मक्खियों को क्या  कहते हैं और मच्छरों को क्या कहते हैं? किशोर बड़ा नटखट था, वह बोला, ‘‘मौसीजी मक्खियों को बफैलो (भैंस ) कहते हैं और मच्छरों को एलीफैंट (हाथी).’’ दूसरे दिन मौसी जी जब सहेलियों में बैठीं तो बोलीं कि भई, गरमी के दिन हैं तो दिन में बफैलो चैन नहीं लेने देतीं और रात को एलीफैंट सोने नहीं देते. सब सहेलियां एकदूसरे का मुंह देखती हुई चुप रहीं.

रात में जब यही वाक्य मौसीजी ने मौसाजी के सामने कहा तो उन्होंने चौंक कर पूछा कि क्या तुम्हें इस का मतलब पता है? मौसीजी ने मुसकरा कर उत्तर दिया, ‘‘अरे, मक्खियां और मच्छर जो कि दिन और रात को बड़ा तंग करते हैं. मौसाजी बोले कि तुम्हें यह अंगरेजी जरूर किशोर ने सिखाई होगी चूंकि वे किशोर की आदत से वाकिफ थे. जब उन्होंने बफैलो और एलीफैंट का अर्थ समझाया तो मौसीजी सिर पकड़ कर बैठ गईं.   

– कृष्णा मेहता

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मेरे नन्हीं सी बच्ची पैदा हुई थी. एक दिन मैं घर के बाहर सब्जी के ठेले वाले से सब्जी खरीद रही थी. बैगन खरीदने पर उस ने तौल में एक छोटा बैगन दिया. मेरे बड़ा बैगन मांगने पर उस ने कहा, ‘‘बहनजी, बैगन के साथ एक उस का बच्चा भी ले लो.’’ तभी मैं ने तपाक से उत्तर दिया, ‘‘अरे भैया, मैं इस बच्चे का क्या करूंगी. मैं ने तो अभीअभी बच्चा जना है.’’

मेरा यह वाक्य सुन वहां खड़े सभी लोग हंसने लगे. जब मुझे अपनी कही बात का अर्थ समझ में आया तब मेरा चेहरा शर्म के मारे झुक गया था.

– शैलजा सक्सेना

अब घर बैठे बनेंगे वोटर आईडी कार्ड

भारत में 18 वर्ष की उम्र के नागरिक मतदान करने के लिए वैध माने जाते हैं. लेकिन नागरिकों को अपने परिचय पत्र (वोटर आईडी) बनवाने  के लिए लाइनों में लग कर अपना कीमती समय गवाना पड़ता है. लेकिन बाजार में अब ऐसा ऐप आ गया है जिसकी मदद से आप कभी भी, घर बैठे अपना परिचय पत्र (वोटर आईडी) बिना किसी चार्ज के बनवा सकते है. पहले जहां ब्लैक एंड व्हाइट वोटर आईडी कार्ड बनते थे वहीं, अब कलर वोटर आईडी कार्ड बनाए जा रहे है. ऐसे में आप घर बैठे अपने स्मार्टफोन या कम्प्यूटर की मदद से वोटर आईडी कार्ड बनवा सकते है. इसके लिए आपको ऑनलाइन एप्लाई करना होगा ऑनलाइन एप्लाई करने के लिए आपके पास पर्सनल ई-मेल आईडी एवं मोबाइल नंबर होना चाहिए. इसके बाद चुनाव आयोग की वेबसाइट पर http://eci-citizenservices.nic.in  फार्म भरना होता है.

परिचय पत्र (वोटर आईडी) के लिए ऐंसे भरे ऑनलाइन फार्म

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर न्यु रजिस्ट्रेशन ऑप्शन पर क्लिक करके वोटर आईडी रजिस्ट्रेशन के लिए फार्म आएगा उसमे मांगी गई जानकारी को भरना होगा एवं अपना सफेद बैकग्राउंड वाला फोटो भी अपलोड करना होगा.

रजिस्ट्रेशन के लिए आवश्यक दस्तावेज

ऑनलाइन वोटर आईडी कार्ड के लिए आधार कार्ड एवं कक्षा दसवीं की मार्कशीट और एक कलर फोटो स्केन करके फॉर्म में अपलोड करना होगा.

1 माह में घर आ जाएगा कार्ड

 फॉर्म में दी गई जानकारियों का वेरिफिकेशन करके, 1 माह में आपका वोटर आईडी कार्ड घर पर आ जाएगा.      

इन्हें भी आजमाइए

– पुराने अखबार से कई तरह के गिफ्ट रैपर बना सकते हैं. अगर आप को बच्चों के लिए गिफ्ट रैपर बनाना है तो आप अखबार का कौमिक सैक्शन चुन सकते हैं और अगर किसी फैशनपसंद दोस्त के लिए गिफ्ट रैपर बनाना है तो फैशन सैक्शन को काट सकते हैं.

– आप चाहे कोई भी सब्जी बनाने जा रही हों, सब से पहले उसे थोड़े से औयल में फ्राई कर लें. इस प्रक्रिया में ज्यादा समय नहीं लगेगा जबकि विशेष स्वाद आ जाएगा.

– स्टाइलिश दिखने के लिए जरूरी है आप जो पहन रहे हैं वो आप पर सूट कर रहा हो. शरीर की बनावट का ध्यान रखें. अगर आप हैल्दी शरीर के हैं तो कसे हुए कपड़ों को नजरअंदाज करें.

– दिन में 2 या 3 बार ही न खाएं, हर थोड़ी देर के अंतराल पर कुछ भी हलकाफुलका खाते रहें. इस से खाना फैट बन कर एकत्र नहीं होगा और आप इकट्ठे ज्यादा भी नहीं खाएंगे.

– अगर आप पतले होना चाहते हैं और सामाजिक भी, तो अपने दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां जाना शुरू कर दें, ट्रैवल करने से काफी कैलोरी बर्न होती है.

– अगर आप चाशनी बनाने जा रही हैं तो बरतन के चारों ओर थोड़ा औयल लगा लें. इस से चाशनी बरतन में चिपकेगी नहीं.

सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक छत्तीसगढ़ का राजिम शहर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित राजिम शहर को देवालयों की नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां जहां भी आप की नजर जाएगी कोई न कोई मंदिर जरूर नजर आएगा. राजिम की तुलना छत्तीसगढ़ के लोग प्रयाग से करते हैं क्योंकि यहां राज्य की 3 प्रमुख नदियों पैरी-महानदी-सोढूर का संगम होता है.

दक्षिण कोसल के नाम से भी प्रसिद्घ राजिम प्राचीन सभ्यता के लिए तो जाना ही जाता है, संस्कृति और कलाओं के महत्त्व के लिहाज से यह शहर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलाप्रेमियों के आकर्षण व जिज्ञासा का विषय हमेशा से रहा है.

छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अथक प्रयासों के चलते अब बड़ी तादाद में सैलानी भी यहां आने लगे हैं. खासतौर से हर साल आयोजित होने वाले मेले राजिम कुंभ में तो देशभर से लोग यहां आते हैं. यहां विदेशी पर्यटकों का दिखना एक सुखद अनुभूति है. यह आयोजन प्रतिवर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से प्रारंभ हो कर महाशिवरात्रि पर संपन्न होता है.

छत्तीसगढ़ की गंगा कही जाने वाली नदी महानदी के किनारे बसे प्रमुख शहरों में से एक राजिम को ले कर किवदंतियों की भरमार है. शिलालेखों का यहां अपना अलग ऐतिहासिक महत्त्व है. रतनपुर के कलचुरी राजा नरेश जाजल्य प्रथम एवं रत्नदेव द्वितीय की युद्घविजयी गाथाएं इन शिलालेखों में उल्लिखित हैं.

भारतीय स्थापत्यकला और मूर्तिकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ अंचल का योगदान क्या और कितना है, यह राजिम स्वयं सिद्घ करता है. सामान्य सर्वेक्षणों में राजिम में बड़ी तादाद में मृण्मय अवशेष मिलते हैं जिन के आधार पर यहां के सांस्कृतिक अनुक्रम का अनुमानित कालक्रम निर्धारित होना संभव हो पाया.

राजिम के देवालयों के निर्माण का समय 7वीं से ले कर 14वीं शताब्दी के बीच हुआ, ऐसा माना जाता है. प्रसिद्घ राजीव लोचन मंदिर का भूविन्यास महामंडप, अंतराल गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ 4 भागों में बंटा हुआ है. राजिम के कुछ स्थानों पर शाल भंजिका की भी मूर्ति है. कहींकहीं खजुराहो जैसे आलिंगनबद्घ मूर्तियां भी दिखती हैं.

राजिम कुंभ, पर्यटकों को यहां के इतिहास के बारे में जानने का बड़ा मौका भी होता है. रायपुर से बस या टैक्सी द्वारा राजिम आसानी से पहुंचा जा सकता है.     

विभागों की चक्करघिरनी में फंसा बिहार पर्यटन

बिहार के चप्पेचप्पे में पर्यटन बिखरा हुआ है. इस के बावजूद यहां का पर्यटन उद्योग दम तोड़ रहा है. पर्यटन की बदहाली पर गौर करें तो इस की वजह साफ हो जाती है. राज्य की पर्यटन नीति यहां की औद्योगिक नीति के तहत संचालित होती है. औद्योगिक नीति को उद्योग विभाग तय करता है. वहीं टूरिस्ट बसों को परिमिट देने का काम परिवहन विभाग के पास है. टूरिस्ट होटलों के रजिस्ट्रेशन का नियंत्रण 1863 के सराय ऐक्ट के तहत जिलाधीश की मुट्ठी में है. इस लिहाज से पर्यटन विभाग कहने को ही पर्यटन विभाग है. उस के पास अपने बूते पर्यटन की तरक्की की योजना बनाने की बात तो दूर, एक कदम अपनी मरजी से चलने की भी क्षमता नहीं है.

पर्यटन स्थलों के रखरखाव के अलावा पर्यटन विभाग के पास कोई काम नहीं है. ऐसी हालत में राज्य में पर्यटन की तरक्की की बात ही बेमानी हो जाती है. बिहार का पर्यटन कई विभागों के जाल में फंसा हुआ है. कोई भी नई योजना बनाने और उसे पास कराने के लिए उसे कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, इस से राज्य का पर्यटन उद्योग लचर व लाचार बन कर रह गया है. हालत यह है कि पर्यटन के क्षेत्र में निवेश के नाम पर केवल बयानबाजी और ऐलान ही होते रहे हैं. बिहार में पर्यटन की तमाम संभावनाओं के बाद भी कोई निवेशक आगे नहीं आ पाता है. दरअसल, राज्य के पर्यटन में निवेश करने के लिए कई देशी और विदेशी निवेशक इच्छुक हैं, पर विभागों की चक्करघिरनी में फंसने को वे भी तैयार नहीं हैं.

फाइलों में उलझी योजना

साल 2003 में केंद्रीय पर्यटन विभाग ने 20 सालों के लिए एक बड़ी योजना बनाई. उस वक्त पर्यटन के दिन फिरने की उम्मीद जगी थी, पर 13 सालों के बाद भी 241 पृष्ठों में बनी योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी. जिस से पर्यटन उद्योग पंगु होता गया और पर्यटक बिदकने लगे. राज्य सरकारें पर्यटन की तरक्की को ले कर कितनी लापरवाह और उदासीन हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि साल 2010 में अलग पर्यटन नीति बनने के बाद भी उस पर रत्तीभर भी अमल नहीं हो सका है. इतना ही नहीं, पर्यटन विभाग को सभ्य बनाने की सारी कवायद उस समय धराशायी हो गई जब साल 2011 में पर्यटन नीति को फिर से औद्योगिक नीति से जोड़ दिया गया. इस से पर्यटन की तरक्की की जो उम्मीद जगी थी वह एक बार फिर से टूट गई. और तब से पर्यटन उद्योग की हालत लगातार खस्ता होती जा रही है.

नई और अलग पर्यटन नीति बनने के बाद कुछ निवेशक निवेश के  लिए आगे आए थे पर बाद में उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए. पर्यटन नीति वापस उद्योग विभाग की चारदीवारी में कैद हो गई. बिहार के ही एक बड़े बिल्डर ने पर्यटन में निवेश का मूड बनाया था, पर कुछ दिनों की बातचीत के बाद ही सरकारी रवैए व विभागों की उदासीनता देख उस ने भी अपने कदम वापस खींच लिए. बिल्डर का कहना है कि कई विभागों के जाल में पर्यटन विभाग के फंसे होने की वजह से पर्यटन से जुड़ी किसी भी छोटीबड़ी योजना को पास कराने के लिए निवेशक को पर्यटन विभाग के साथ उद्योग विभाग के चक्कर काटने पड़ेंगे. इस से सारा मामला बाबुओं की टेबलों के बीच चक्कर लगाता रह जाएगा.

राज्य में पर्यटन की तरक्की के लिए राज्य सरकार ने कुछ राज्यों के पर्यटन और पर्यटन नीति के बारे में जानकारियां इकट्ठी कीं पर उस पर कोई अमल नहीं हो सका. गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे पर्यटन के मामले में विकसित राज्यों में पर्यटन से जुड़ी तमाम योजनाएं पर्यटन नीति के तहत ही बनती और अमल में लाई जाती हैं. बिहार में सरकार ऐसा करने में लापरवाही बरतती रही है जिस से यहां पर्यटन की हालत बदतर होती जा रही है.

पर्यटन से प्राप्ति

समूची दुनिया में पर्यटन ही इकलौता उद्योग है जिस की पिछले 20 सालों के दौरान विकास दर 5 फीसदी प्रतिवर्ष है. वहीं ग्लोबल जीडीपी में पर्यटन उद्योग का योगदान 11 फीसदी है. दुनिया के कुल रोजगार में से 8 फीसदी रोजगार पर्यटन उद्योग में है. वर्ल्ड ट्रैवल ऐंड टूरिज्म काउंसिल के सर्वे के मुताबिक, भारत के जीडीपी में पर्यटन का योगदान 6.60 फीसदी तक हो सकता है और देश में पैदा होने वाले कुल रोजगार में 7.70 फीसदी पर्यटन में होगा. बिहार में पर्यटन स्थलों के आसपास का माहौल और सुविधाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नहीं हैं. विदेशी पर्यटकों के साथ भारत के दूसरे राज्यों के पर्यटकों में बिहार की छवि यही बनी हुई है कि यहां पर्यटकों की सुरक्षा का खास इंतजाम नहीं है, सड़क और बाकी परिवहन की सुविधा दुरुस्त नहीं है. राज्य में राजगीर, वैशाली, नालंदा और बोधगया जैसे कई बौद्ध पर्यटन स्थल होने के बाद भी दुनियाभर में उस का खास प्रचारप्रसार नहीं किया गया है. पर्यटकों की सुरक्षा के लिए अलग फोर्स नहीं है और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के गाइड ही हैं. लिहाजा, यहां विदेशी पर्यटकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

बिहार में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, ग्रामीण, योग आधारित पर्यटन और बुद्धिस्ट, सिख, सूफी और जैन सर्किट हैं. राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में सेवाक्षेत्र का योगदान 56.40 फीसदी है और इस में होटल तथा रैस्टोरैंट का हिस्सा 22.30 फीसदी है. पर्यटन मामलों के जानकार सुनील राज बताते हैं कि अगर बिहार सरकार पर्यटन पर ध्यान दे तो इस में काफी ऊंची छलांग लगाई जा सकती है. राज्य में होटलों के कमरों और पर्यटकों का औसत एक कमरा, प्रति एक हजार भी नहीं है.

उपेक्षा की मार

बिहार में पिछले साल पर्यटन का बजट 155 करोड़ रुपए के करीब था, जिस में योजना मद के लिए केवल 8.43 करोड़ रुपए तय किए गए थे. इस से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य सरकार पर्यटन को ले कर कितनी लापरवाह व उदासीन है. इसी लापरवाही की वजह से बिहार सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी राज्य में देसी और विदेशी पर्यटकों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो पा रहा है. साल 2014 से 2 करोड़ 25 लाख 44 हजार 377 देसी और 8 लाख 29 हजार 508 विदेशी पर्यटक बिहार आए. साल 2012 और 2013 में भी यह आंकड़ा इसी के आसपास था. साल 2012 में 2 करोड़ 14 लाख 47 हजार 099 देसी और 10 लाख 96 हजार 933 विदेशी पर्यटकों ने बिहार के पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया. 2013 में 2 करोड़ 15 लाख 88 हजार 306 देसी और 7 लाख 56 हजार 835 विदेशी पर्यटक बिहार घूमने आए थे. विदेशी पर्यटकों के मामले में बिहार की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले ठीकठाक है पर देसी पर्यटकों को लुभाने के मामले में बिहार टौप 10 की सूची में नहीं है. आर्थिक मामलों के जानकार विनोद पांडे कहते हैं कि बिहार की जीडीपी और रोजगार पैदा करने के मामले में पर्यटन का योगदान जीरो है. वहीं, पर्यटन के क्षेत्र में निवेश का आंकड़ा भी जीरो ही है. यूनाइटेड नैशन वर्ल्ड टूरिस्ट और्गेनाइजेशन के मुताबिक, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन का योगदान करीब 6.7 फीसदी है. पर्यटन के क्षेत्र में करीब 3 करोड़ रोजगार सृजन हो रहा है. वहीं, देश के कुल निवेश का 6.2 फीसदी पर्यटन के क्षेत्र में हो रहा है.                 

टौप 5 सूची में लाने की कवायद

पर्यटन के क्षेत्र में काफी पिछड़ने के बाद अब राज्य सरकार की नींद खुली है. उस ने पर्यटन के मामले में बिहार को देश के टौप 5 राज्यों की लिस्ट में शुमार कराने के लिए कमर कस ली है. इस के लिए पर्यटन रोडमैप बनाने की कवायद शुरू की गई है. राज्य की पर्यटन मंत्री अनिता देवी ने बताया कि इस के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है और रोडमैप बनाने के लिए कंसल्टैंट की बहाली की जाएगी. पर्यटन विभाग के साथ कलासंस्कृति विभाग भी इस में मदद करेगा. उन्होंने  उम्मीद जताई कि रोडमैप को जमीन पर उतारने के बाद पर्यटन के क्षेत्र में बिहार लंबी छलांग लगाएगा.

राष्ट्रप्रेम थोपा नहीं जा सकता

12 दिसंबर, 2016 को तिरुअनंतपुरम में इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल औफ केरल के आयोजन के दौरान 6 लोग राष्ट्रगान बजने पर खड़े नहीं हुए तो उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस घटना के एक दिन पहले चेन्नई के अशोक नगर इलाके के काशी थिएटर में भी 9 लोग राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए तो उन्हें भी राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर लिया गया था.

इस के पहले राष्ट्रगान के अपमान के मामले न के बराबर हो रहे थे क्योंकि थिएटर में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं था. अब अनिवार्य हो गया है तो ऐसे मामलों की तादाद और बढ़ना तय दिख रही है. थिएटरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को ले कर बहस बडे़ पैमाने पर शुरू हो गई है. कई लोग सुप्रीम कोर्ट के 30 नवंबर, 2016 के फैसले से सहमति न रखते हुए यह दलील देने लगे हैं कि राष्ट्रगान की आड़ में लोगों के दिलों में देशप्रेम का जज्बा जबरन पैदा नहीं किया जा सकता तो इन लोगों को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता.

अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य होगा और इस दौरान थिएटर में मौजूद सभी दर्शकों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना जरूरी होगा. 52 सैकंड के राष्ट्रगान के दौरान हौल में कोई आएगाजाएगा नहीं और स्क्रीन पर राष्ट्रध्वज दिखाना जरूरी होगा. विकलांगों को खड़े न होने की छूट होगी. फैसले को कड़ा या प्रभावी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह हिदायत भी दी है कि राष्ट्रगान हमारी राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा हुआ है. देश में रह रहे हर भारतीय नागरिक को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने संभावित आपत्तियोें को ध्यान में रखते यह भी स्पष्ट कर दिया कि आप लोग (भारतीय) विदेशों में सभी बंदिशों का पालन करते हैं पर भारत में कहते हैं कि कोई बंदिश न लगाई जाए. अगर आप भारतीय हैं तो आप को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक अजीब बात इस फैसले में यह कही गई जो विवाद की वजह बन सकती है. वह यह है कि शास्त्रों में भी राष्ट्रगान को स्वीकार किया गया है, इसलिए देश के सम्मान के प्रतीक राष्ट्रगान का सम्मान करना आप का भी दायित्व बनता है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस बाबत अधिसूचना जारी कर जागरूकता के लिए अखबारों व न्यूज चैनल्स पर विज्ञापन दे.

ठोस वजह नहीं है

थिएटरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता लागू करने के पीछे कोई गंभीर या भारीभरकम वजह नहीं है, बल्कि यह एक दायर याचिका के एवज में आया फैसला है. भोपाल के शाहपुरा इलाके में रहने वाले 77 वर्षीय श्यामसुंदर चौकसे भोपाल के एक सिनेमाघर में ‘कभी खुशी कभी गम’ फिल्म देखने गए थे. जब राष्ट्रगान शुरू हुआ तो वे खड़े हो गए. इस पर मौजूद दूसरे बैठे दर्शकों ने उन की हूटिंग की तो वे दुखी हो उठे और जगहजगह इस वाकए की शिकायत की. इस पर कोई सुनवाई नही हुई तो उन्होंने जबलपुर हाइकोर्ट में याचिका दायर कर दी. 24 जुलाई, 2004 को फैसला उन के हक में आया पर फिल्म निर्देशक करण जौहर इस पर स्थगन आदेश ले आए. इस पर श्यामसुंदर ने सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और उस में कहा कि सिनेमाहौल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान जरूरी हो. अपनी याचिका में उन्होंने राष्ट्रगान की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए अदालत को कई बिंदु बताए.

30 नवंबर, 2016 को पहली सुनवाई में ही जस्टिस दीपक मिश्रा और अमिताव राय की पीठ ने उन से इत्तफाक रखते यह फैसला दे दिया.

यह है सजा

फैसला आते ही आम लोग अचंभित रह गए और इस का उल्लंघन करने पर सजा के प्रावधान से दहशत में भी हैं. प्रिवैंशन औफ इन्सल्ट टू नैशनल ओनर ऐक्ट 1971 की धारा 3 के मुताबिक, राष्ट्रगान में खलल डालने या राष्ट्रगान को रोकने की कोशिश करने पर 3 साल तक की कैद हो सकती है. यह ऐक्ट और धारा दोनों विरोधाभासी इस लिहाज से हैं कि इन में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जाए. थिएटरों में राष्ट्रगान की शुरुआत 60 के दशक में हुई थी लेकिन 20 साल बाद इसे बंद कर दिया गया था क्योंकि सभी लोग थिएटरों में इस के बजने के दौरान खड़े नहीं होते थे. दूसरी व्यावहारिक दिक्कतें ये थीं कि लोग सिनेमाघर मनोरंजन के लिए जाते हैं, ऐसे में वहां राष्ट्रगान के दौरान बंद हौल में खड़े होने की बाध्यता उन्हें असहज बना रही थी. किसी पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह देशप्रेमी नहीं है या राष्ट्रगान के दौरान खड़े न हो कर देशद्रोही हो गया है. इस की अपनी वजहें और तर्क हैं लेकिन कड़ी सजा के प्रावधान से लग ऐसा रहा है कि अब बात अंधभक्ति की हो रही है.

अंधभक्ति न हो

यह वाकई जरूरी है कि लोग राष्ट्रगान, ध्वज और दूसरे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें. लेकिन वह धर्म की तरह अंधभ्क्ति जैसा हो जाए, इस बात में कोई तर्क नहीं होता. उलटे, लोगों का जी उचटाने वाली बात साबित हो जाती है. देश के कई मंदिरों में प्रवेश और पूजापाठ का अपना एक अलग संविधान और विधिविधान है और यहां तक है कि बनारस, पुरी, हरिद्वार व इलाहाबाद सहित कई शहरों के मंदिरों में साफसाफ लिखा है कि यहां गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है. शनि शिगणापुर के मंदिर में लोग जाते हैं तो उन्हें धोती पहनने के लिए पंडों द्वारा मजबूर किया जाता है. इस पर वहां आएदिन विवादफसाद होते रहते हैं.

मध्य प्रदेश के दतिया स्थित देवी पीतांबरा पीठ में 2 महीने पहले कई दिग्गज भाजपाई नेता पहुंचे थे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मंदिर के गर्भगृह में नहीं जा पाए थे क्योंकि वे धोती नहीं पहने थे. किसी भी गुरुद्वारे में दाखिल होने से पहले सिर पर रूमाल रखना एक अनिवार्यता है. ऐसे कई कायदेकानूननियम अधिकांश धर्मस्थलों में जाने के बाबत हैं. इसी तरह राष्ट्रगान के दौरान वह भी थिएटरों में, खड़े होने की बाध्यता इस के अपमान को जन्म देने और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. केरल और चेन्नई के मामले इस की बानगी भर हैं. अब जगहजगह इस बात को ले कर फसाद होंगे ठीक वैसे ही जैसे 80 के दशक में होते थे. तब अकेले महाराष्ट्र्र को छोड़ कर देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की बाध्यता खत्म करनी पड़ी थी. देश का माहौल राष्ट्र और धर्म को ले कर कतई ठीक नहीं है. हिंदूवादी राष्ट्रभक्ति को धर्म से जोड़ कर लोगों को न केवल उपदेश दे रहे हैं बल्कि धर्म की नई दुकानें भी खोल रहे हैं. भारत माता की जय बोलना और वंदे मातरम कहना जैसे विवाद जबतब होते रहते हैं.

अब तो कई धार्मिक आयोजनों में बाकायदा आरती के साथसाथ राष्ट्रगान भी गाया जाने लगा है. भक्तगणों के हाथ में तिरंगा थमा दिया जाता है यानी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रप्रेम को धर्म के दुकानदारों ने भुनाना शुरू कर दिया है. पिछले दिसंबर माह के तीसरे हफ्ते में भोपाल के एक धार्मिक समारोह में यह नजारा देख लोग हैरत में थे कि ऐसा क्यों किया जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि देश और धर्म को अलग किया जाए, न कि इन्हें एकदूसरे का पर्याय बना दिया जाए. रही बात कानून की, तो साफ दिख रहा है कि राष्ट्रप्रेम उस के जरिए न पैदा किया जा सकता है, न ही थोपा जा सकता है. लोगों में यह भावना जगाने के दूसरे तरीके भी हैं. स्कूलकालेजों में राष्ट्रगान अनिवार्य है और छात्र उस का पालन भी करते हैं. सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के दौरान कोई खड़ा न हो तो साथ के लोग एतराज जताते हैं और लड़ाईझगड़ा करते हैं. यह कानून इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने वाला साबित होगा. राष्ट्रगान का अपमान करने वालों को सजा देना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उस का थोपा जाना ‘सम्मान न करना, अपमान के दायरे में लाना जरूर चिंता की बात है. अब तक देशभक्ति और धर्मभक्ति में एक फर्क हुआ करता था, उस का खत्म हो जाना भी चिंता और हर्ज की बात है. हिंदू धर्म के नाम पर योग, सूर्य नमस्कार एक तरह से थोपे ही जा रहे हैं. इसी तरह हर धर्म अपने उसूलों और बंदिशों से बंधा हुआ है जिन का पालन करना अनुयायियों की मजबूरी होती है. ऐसा न करने पर वे नास्तिक और पापी करार दे कर तिरस्कृत किए जाने लगते हैं. अब देशभक्ति के मामले में भी यही कानूनीतौर पर होगा तो धर्मभक्ति और देशभक्ति में क्या फर्क रह जाएगा.

अब तो स्टार भी नहीं रहे

5 राज्यों में चुनावप्रचार करने के लिए स्टारप्रचारकों की सूची में भाजपा ने इस बार लालकृष्ण आडवाणी का नाम  शामिल नहीं किया है. इस खबर या ज्यादती से किसी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा, तो जाहिर है कि आडवाणी अपनी उपयोगिता खो बैठे हैं और उन का खेमा, अघोषित तौर पर नरेंद्र मोदी ने तितरबितर कर दिया है. ये वही आडवाणी हैं जिन के बगैर कभी भाजपा चुनावी रणनीति के बारे में सोच भी नहीं पाती थी. अब हालत यह है कि उन के बिना ही सोचती है.

जाहिर है हिंदुत्व और राममंदिर जैसे उबाऊ मुद्दों से छुटकारा पाने के लिए भी उसे उन से किनारा करना पड़ रहा है.  वैसे भी, कांग्रेस की तर्ज पर शासन कर रही भाजपा में सिवा नरेंद्र मोदी के कोई और स्टार है नहीं. ऐसे में आडवाणी को वह दोहा याद आ रहा हो कि, ‘पुरुष बलि नहीं होत है समय होत बलबान,’ तो कोई संशय नहीं.  

 

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