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सैक्स के लालच में ठगी

आजकल हर उम्र के लोग सैक्स के मजे के लिए इतने ज्यादा उतावले रहते हैं कि लड़कियां उन्हें आसानी से अपने जाल में फंसा लेती हैं. कुछ दिन पहले एक 25 साला खूबसूरत लड़की रागिनी ने आगरा के एक 50 साला कारोबारी रामदास के 3 लाख रुपए लूट लिए थे. कारोबारी रामदास धौलपुर के कुछ दुकानदारों से अपने सामान की उधारी के 3 लाख रुपए की उगाही कर स्कूटर से आगरा जा रहे थे. धौलपुर के बसस्टैंड से कुछ ही दूर पहुंचे थे कि सड़क के किनारे खड़ी एक लड़की ने उन से लिफ्ट मांगी. उस लड़की ने अपना नाम रागिनी बताया. तरस खा कर रामदास ने उसे अपने स्कूटर पर बिठा लिया. रागिनी ने जब उन की कमर को पकड़ा, तो उस के हाथ की छुअन से उन्हें बड़ा मजा आने लगा था.

जब उन्होंने स्कूटर की रफ्तार तेज की, तो रागिनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘जरा आराम से चलिए. आप के साथ चलने में मुझे बड़ा मजा आ रहा है.’’

‘‘वह क्यों ’’ रामदास ने मुसकराते हुए उस से पूछा, तो वह बोली, ‘‘आप अभी भी एकदम जवान लगते हैं.’’

यह सुन कर रामदास खुश हो कर उस से बोले, ‘‘अब भी मुझ में इतनी ताकत है कि आप की उम्र की लड़की से सैक्स करूं, तो उसे भी 1-2 बार में पेट से कर सकता हूं.’’

रागिनी हंसते हुए बोली, ‘‘फिर तो आप काम के आदमी हैं.’’

‘‘कैसे ’’ सुन कर रामदास ने उस से पूछा, तो रागिनी बोली, ‘‘आगरा में मेरी एक सहेली है दीप्ति. 2 साल पहले उस की शादी हुई थी, मगर अभी तक उस के बच्चा नहीं हुआ है. उस का पति दिनरात उस से सैक्स करता है, मगर बच्चा ठहरता ही नहीं. अगर आप उस के साथ सैक्स कर के उसे पेट से कर दें, तो वह और मैं कभी आप का यह एहसान नहीं भूलेंगीं.’’

यह सुन कर कारोबारी रामदास चहकते हुए बोले, ‘‘अगर मैं तुम्हारी सहेली को पेट से कर दूं, तो इनाम में मुझे क्या मिलेगा ’’

‘‘आप को इनाम में क्या चाहिए ’’ रागिनी ने पूछा.

रामदास बोले, ‘‘इनाम में मैं तुम्हारे साथ सैक्स करना चाहता हूं.’’

रागिनी की कमर में प्यार से चपत लगाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को मजे देने के लिए तैयार हूं.’’ रामदास ने बीच रास्ते में ही स्कूटर रोका और रागिनी को पेड़ों की ओट में ले गए और अपनी बांहों में ले कर उस के गालों को चूम लिया. उस समय वे इतने उतावले हो रहे थे कि वे उसे झाडि़यों की ओर ले जाने लगे, तो वह उन की ओर मुसकरा कर बोली, ‘‘यहां पर कुछ मजा नहीं आएगा. आनेजाने वाले लोगों के डर से ठीक से सैक्स नहीं हो पाएगा. हम आगरा पहुंच कर आज रात किसी होटल में रुक कर पूरी रात सैक्स के मजे लेंगे. मैं अपनी उस सहेली को भी वहां ले आऊंगी.  ‘पर यह ध्यान रखना कि आप को मेरी सहेली को पेट से करना है, मुझे नहीं. क्योंकि अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’

जब वे आगरा के निकट पहुंचे, तो रागिनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप जरा यहीं पर खड़े रहिए. मेरी सहेली का घर पास में ही है. मैं उसे आप के स्कूटर से 10-15 मिनट में ले कर आती हूं.’’ इतना कह कर रागिनी उन के स्कूटर को ले कर अपनी सहेली के यहां पर चली गई. शाम तक रामदास वहीं खड़े हो कर रागिनी के आने के इंतजार में परेशान हो गए थे, मगर वह वापस नहीं लौटी थी. कुछ दूरी पर उन्हें अपना स्कूटर तो मिल गया था, मगर उस की डिग्गी में रखे 3 लाख रुपए गायब थे.

यह देख कर रामदास उस खूबसूरत लड़की और उस की सहेली के साथ सैक्स के मजे के लालच पर पछतावे के आंसू बहा रहे थे. कुछ इसी तरह से कचरा बीनने वाली 2 लड़कियों ने एक अफसर के 20 साला लड़के को लूटा था.

दोपहर का समय था. संदीप और उस का दोस्त सुरेश बंगले का गेट खोल मोबाइल फोन पर गाने सुन रहे थे. उन्हें वहां पर कचरा बीनने वाली 2 लड़कियां दिखाई दीं. उन दोनों लड़कियों ने उन से पानी मांगा, तो उन्होंने फ्रिज से बोतल निकाल कर उन्हें पानी पिलाया. उन में से एक लड़की ने उन की ओर मुसकरा कर देखा, तो संदीप ने उस का हाथ पकड़ लिया.

वह लड़की उस से बोली, ‘‘हाथ पकड़ने से क्या होगा  अगर मजे लेने हैं, तो कुछ खर्चा करना पड़ेगा.’’ यह सुन कर संदीप ने उन दोनों लड़कियों को अंदर आने को कहा.

संदीप ने उन से पूछा, ‘‘मजे देने के लिए तुम्हें क्या चाहिए ’’

एक लड़की बोली, ‘‘हमें सोने का कोई जेवर चाहिए.’’ संदीप कुछ सोचने लगा, तभी उन दोनों लड़कियों ने अपनी कमीज के बटन खोल कर दिखाए, तो संदीप और सुरेश ने जोश में आ कर उन्हें अपनी बांहों में भर लिया. यह देख कर एक लड़की उस से बोली, ‘‘अगर मजे चाहिए, तो पहले हमें सोने का एकएक जेवर दो. हम आप को ऐसे मजे देंगे, जैसे अब तक किसी ने नहीं दिए होंगे.’’ संदीप ने अलमारी खोल कर उस में से 2 सोने की चेनें निकाल कर उन्हें दीं, तो वे दोनों मजे देने के लिए उन के बैड पर लेट गई थीं. उन दोनों से मजे लेते हुए संदीप और उस का दोस्त सुरेश खुशी से मुसकरा रहे थे. मजे ले कर जब वे लोग एकदूसरे से अलग हुए, तो संदीप उन से बोला, ‘‘क्या तुम दोनों आज रात यहां आ सकती हो  यहां पर तुम्हें अंगरेजी शराब के साथसाथ खाने में लजीज चिकन व तंदूरी रोटियां मिलेंगी. 2-2 हजार रुपए भी मिलेंगे.’’

यह सुन कर वे दोनों लड़कियां रात में आने की कह कर वहां से चली गईं. संदीप और उस का दोस्त सुरेश रात होने का इंतजार करने लगे थे. रात को जब वे दोनों लड़कियां वहां आईं, तो लड़कियों ने चुपके से शराब में नशे की गोलियां मिला कर संदीप और सुरेश को बेहोश कर दिया. दोपहर में जब संदीप ने अलमारी से निकाल कर उन्हें सोने की चेनें दी थीं, तभी उन लड़कियों ने चाबी रखने की जगह देख ली थी, इसलिए उन दोनों को बेहोश करने के बाद उन्होंने अलमारी से सोने के सभी जेवर और रुपए निकाले और वहां से चंपत हो गईं. संदीप को जब पता चला कि वे लड़कियां उसे लूट चुकी हैं, तो मारे घबराहट के उस ने ट्रेन के आगे छलांग लगा कर खुदकुशी कर ली. कुछ पलों का सुख संदीप के लिए जानलेवा साबित हुआ.

आदिवासियों को बेदखल करने की साजिश

झारखंड में रांची शहर के पास नामकुम इलाके का रहने वाला आदिवासी सुरेश उरांव गुस्से में कहता है, ‘‘आदिवासी जान दे देगा, पर जंगल और जमीन नहीं छोड़ेगा. आदिवासियों के राज्य में आदिवासियों को जंगल और जमीन से उजाड़ कर तरक्की हो ही नहीं सकती. उद्योग लगाने के नाम पर आदिवासियों को हटाया जाता है, पर न उन्हें मुआवजा मिलता है, न उद्योग ही लग पाता है.’’ सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव कर सरकार ने आदिवासियों से उन का हक छीनने की जबरदस्त साजिश रची है. आदिवासी उसे किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने देंगे.

इस मसले को ले कर एक बार फिर झारखंड में बंद, तोड़फोड़ और आगजनी का सिलसिला शुरू हो चुका है. सरकार इस मामले में यह दावा कर रही है कि इस ऐक्ट की वजह से ही राज्य और आदिवासियों की तरक्की नहीं हो पा रही थी, इसलिए उस में बदलाव करना जरूरी हो गया था. 22 नवंबर, 2016 को सीएनटी ऐक्ट (छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908) व एसपीटी ऐक्ट (संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम-1949) में बदलाव कर के रघवुर दास सरकार ने बैठेबिठाए नया झमेला मोल ले लिया है. ऐक्ट की धारा-21, धारा-49 (1), धारा-49 (2) और धारा-71 (ए) में बदलाव किया गया है.

धारा-21 में बदलाव कर गैरकृषि उपयोग के कारोबारी इस्तेमाल की इजाजत दी गई है, पर जमीन पर रैयत का कब्जा कायम रखा गया है. वहीं धारा 49 (1) में कहा गया है कि जमीन का मालिक सरकारी और विकास संबंधी योजनाओं के लिए जमीन को उपयोग करने के लिए दे सकता है. स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, संचार, पंचायत, नहर, रेल वगैरह योजनाओं के लिए आदिवासी अपनी जमीन बेच सकता है. पहले ऐसा मुमकिन नहीं था. धारा-49 (2) में सुधार कर कहा गया है कि जिस योजना के लिए आदिवासी से जमीन ली गई है, उस जमीन को उसी योजना के लिए इस्तेमाल में लाना है. दूसरे किसी काम में ऐसी जमीन का इस्तेमाल नहीं हो सकेगा. इतना ही नहीं, अगर 5 साल तक ऐसी जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो जमीन वापस रैयत के पास चली जाएगी और रुपए भी वापस नहीं किए जाएंगे. पहले 15 साल के अंदर जमीन के इस्तेमाल करने की समय सीमा थी. धारा-71 (ए) की उपधारा-2 में बदलाव कर यह कहा गया है कि अब आदिवासी मुआवजे के आधार पर अपनी जमीन किसी को नहीं दे सकेंगे. मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते हैं कि सीएनटीएसपीटी ऐक्ट की वजह से राज्य में कई परियोजनाएं लटकी हुई थीं. राज्य और आदिवासियों की तरक्की की राह में रुकावट पैदा हो रही थी. किसी भी योजना को चालू करने से पहले जमीन के अधिग्रहण के लिए सीएनटीएसपीटी ऐक्ट रोड़ा बन जाता था. काफी जरूरत पड़ने पर भी आदिवासी अपनी जमीन नहीं बेच सकते थे. ऐसी जमीनों पर बैंक लोन देने से कतराते थे. ऐक्ट में बदलाव करने से आदिवासियों के साथसाथ राज्य का भी भला होगा. विरोधी दलों ने इस बात को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया है कि सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव करने से आदिवासी की जमीन से उस का दावा खत्म हो जाएगा.

झारखंड मुक्ति मोरचा के नेता हेमंत सोरेन कहते हैं कि रघुवर सरकार आदिवासियों को जंगल और जमीन से बेदखल करने की साजिश रच रही है. राज्य की कुल आबादी सवा 3 करोड़ है, जिस में 26 फीसदी आदिवासी हैं, जिस की चिंता सरकार को नहीं है. आदिवासियों की कब्र पर झारखंड की तरक्की का सपना देखा जा रहा है, जिसे आदिवासी हरगिज पूरा नहीं होने देंगे. आदिवासियों की तरक्की के लिए साल 2000 में बिहार से अलग करके बने झारखंड राज्य में आज भी आदिवासियों की हालत बदतर बनी हुई है. राज्य की कोरबा जनजाति की हालत को देख कर ही आदिवासियों की बदहाली का अंदाजा लगाया जा सकता है. यह जनजाति भुखमरी में जीती है और जंगली फल और चिडि़या, चूहा, खरगोश वगैरह खा कर गुजारा करती है. साफ पानी पीने के लिए लोगों को रोज मीलों भटकना पड़ता है. आदिवासी मजदूर जीवक बताता है कि उन लोगों का समूचा दिन खाने और पीने की चीजों की जुगाड़ में ही निकल जाता है. कोरबा जनजाति के ज्यादातर लोग महुआ की दारू और चावल खा कर गुजारा करते हैं. जंगलों में घूमघूम कर फल, फूल, लकड़ी, चूहा वगैरह ढूंढ़ना उन का काम है. कुछ लोग खेती, पशुपालन और मजदूरी करते हैं. बगैर हल, बैल, खाद, बीज और पानी की खेती कैसी होगी,

इस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. महाजनों और सूदखोरों के चंगुल में फंस कर कई कोरबा बंधुआ मजदूर बन कर रह गए हैं. आदिवासियों की जमीन के लिए पिछले कई सालों से आवाज उठा रही दयामनि बारला कहती हैं कि जनजातियों की तरक्की के लिए आजादी के बाद से ले कर अब तक की सरकारी योजनाओं का रत्तीभर भी हिस्सा उन तक नहीं पहुंच सका है. बीमार पड़ने पर कोरबा तंत्रमंत्र और ओझागुनी के चक्कर में फंस कर अपनी जनजाति को धीरेधीरे खत्म कर रहे हैं. सुरेश कोरबा बताता है कि पहले उन के इलाके में एक डिस्पैंसरी थी, जहां दवा मिलती थी, पर 10-12 साल पहले वह भी बंद हो गई है. कोरबा इलाज के लिए ओझाओं के पास जाने को मजबूर हैं. अपनी जमीन से उजड़ने के बाद कोरबा जनजाति मिटने के कगार पर पहुंच चुकी है और सरकार कान में तेल डाल कर सो रही है.

दरअसल, झारखंड की सियासी उठापटक और लचर विस्थापन व पुनर्वास नीति की वजह से नए उद्योगों के लगने की गति में तेजी नहीं आ पा रही है, वहीं तकरीबन साढ़े 3 लाख आदिवासी विस्थापन का दर्द झेलने को मजबूर हैं. आदिवासियों की तरक्की के नाम पर झारखंड राज्य बने 16 साल से ज्यादा हो गए हैं, पर अब तक आदिवासी अपना हक लेने के लिए दरदर भटक रहे हैं. रांची हाईकोर्ट के वकील अभय सिन्हा कहते हैं कि अलग झारखंड राज्य बनने के बाद से अब तक तकरीबन 66 एमओयू पर दस्तखत हुए, पर एक पर भी काम चालू नहीं हो सका है. झारखंड विस्थापन संघर्ष समिति के नेता चेतन भगत बताते हैं कि राज्य में अब तक 3 लाख से ज्यादा आदिवासी विस्थापित हो चुके हैं, इस में सब से ज्यादा विस्थापन खदानों की वजह से हुआ है. रोज नई खदानों में काम चालू होते रहे और आदिवासियों को जंगल और जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा. बड़े बांधों और सिंचाई की योजनाओं की वजह से भी विस्थापन होते रहे. कुल विस्थापितों में से 70 फीसदी आदिवासी पुनर्वास के लिए दरदर भटक रहे हैं, जिन की सुनने वाला कोई नहीं है. आदिवासियों का रोना यह है कि उन्हें उन की जमीन से उजाड़ दिया गया और वहां कोई योजना भी शुरू नहीं हो पाती है.

रांची भूअर्जन महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, जमीन का अधिग्रहण कर महकमे को दाखिलखारिज दिला देने के बाद भी योजनाओं पर काम शुरू नहीं हो पाता है. पर महकमे ने जितनी जमीनों पर कब्जा किया है, अगर उन पर काम चालू हो जाता, तो राज्य का चेहरा ही बदल जाता. साल 2014 तक तकरीबन 4 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर दाखिलखारिज कई महकमों को दिलाया जा चुका है, पर ज्यादातर पर काम चालू नहीं हो पाया है. इस से आदिवासियों में काफी गुस्सा है.

आदिवासी भोलन डुंगडुंग कहता है कि न तो सरकार आदिवासियों को उन की जमीन से उजाड़ कर कारखाने ही लगा सकी है और न ही आदिवासियों को मुआवजा और नई जगह पर बसाने का काम कर पाई है. इस से आदिवासियों के राज्य को दोतरफा नुकसान हो रहा है. सरकार का दावा है कि राज्य में आदिवासियों के लिए बने छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908 और संथालपरगना काश्तकारी अधिनियम-1949 जैसे कानून आज की तारीख में बेकार साबित हो रहे थे. ये कानून आदिवासियों की परेशानियों को दूर नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन के लिए रोज नई परेशानी पैदा कर रहे थे, इसलिए इस में बदलाव करना काफी जरूरी हो गया था, वहीं दूसरी ओर विरोधी दल इस मसले पर सरकार के खिलाफ गोलबंद हो गए हैं और ऐक्ट में किए गए बदलाव को वापस लेने की जिद पर अड़ गए हैं.

नोटबंदी : जनता से हिसाब, नेताओं पर नकाब

गोमतीनगर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का सब से पौश इलाका है. यहां नेताओं और अफसरों की बड़ीबड़ी कोठियां हैं, जिन की कीमत करोड़ों में है. इनको आलीशान ढंग से बनाया गया है. कोठियों में महंगी से महंगी लकड़ी का काम कराया गया है और संगमरमर से ले कर दूसरे महंगे से महंगे पत्थरों से इन को सजाया गया है.

कोठियों में रहने वाले लोगों से ज्यादा उन की महंगी गाडि़यां सफर के लिए तैयार खड़ी रहती हैं. हैरत की बात यह है कि ऐसे तमाम नेताओं और अफसरों को सरकार ने लखनऊ में ही रहने के लिए सरकारी बंगले और सफर करने के लिए सरकारी गाडि़यां दे रखी हैं.

इन के बच्चे भी देशविदेश के बड़ेबड़े स्कूलकालेजों में पढ़ते हैं और हवाईजहाज से सफर करते हैं. इन नेताओं व अफसरों के घरों में कुत्तों से ले कर कई पक्षी तक पाले जाते हैं, जिन की कीमत लाखों रुपए होती है. ये एयरकंडीशंड कमरों में रहते हैं और कार में सफर करते हैं. सभी के महंगेमहंगे फार्महाउस हैं. कई लोगों ने अपने इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेज तक खोल रखे हैं. ऐसे लोगों के कई शहरों में भी बंगले हैं.

सरकार का बड़े से बड़ा अफसर भी 2 लाख रुपए हर महीने से ज्यादा की तनख्वाह नहीं पाता है. साल का 24 लाख रुपए कमाने वाला अफसर 10 साल में ढाई करोड़ रुपए ही जमा कर पाएगा.

अपनी पूरी नौकरी में वह 7 से 8 करोड़ रुपए की कमाई कर पाएगा, इस के बाद भी उस के पास इस से ज्यादा पैसा कहां से आया  जबकि वह अपनी तनख्वाह की सौ फीसदी बचत भी नहीं कर पाएगा, यह बहुत ही अहम सवाल है. इनकम टैक्स महकमे को ऐसे नेताओं और अफसरों के पास पैसा नहीं दिखता है. एक आम आदमी के पास 4 लाख रुपए कहां से आ गए, यह जानने की जुगत में सिर खपाने वाले इनकम टैक्स के अफसरों को ऐसे बड़ेबड़े नेताओं और अफसरों के घर दिखाई नहीं देते हैं. वे ज्वैलरी का कारोबार करने वाले सुनारों के यहां तो छापे मार रहे हैं, जबकि नेताओंअफसरों से नहीं पूछ रहे हैं कि उन के पास रखा सोना कहां से आया

मौज कर रहे हैं नेता अफसर

दरअसल, यह हाल केवल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का ही नहीं है, बल्कि देश की राजधानी नई दिल्ली से सटे नोएडा और गुड़गांव का भी है. हर प्रदेश में ऐसे बड़े शहर हैं, जहां नेताओं और अफसरों के गठजोड़ ने अलग शहर बसा दिया है. ऐसे शहरों के पास गांव भी हैं और गरीब तबके के रहने वाले लोग भी हैं. इन के रहनसहन और अमीरों के रहनसहन में फर्क देखा जा सकता है, जिस से हालात साफ दिखते हैं कि काला धन और मेहनत का धन कहां है.

देश की जनता को यह उम्मीद थी कि काला धन जब्त करने की शुरुआत ऐसे नेताओं और अफसरों से होगी, लेकिन इनकम टैक्स महकमा छोटी मछलियों को पकड़ कर दिखावा करने की कोशिश कर रहा है, जिस से जनता को लग रहा है कि नोटबंदी व काला धन की परेशानी जनता के लिए है.

नोटबंदी से उम्मीद की जा रही थी कि राजनीति में पैसों की तंगी दिखेगी, जिस का फर्क चुनावी यात्राओं और रैलियों की भव्यता पर दिखेगा. नोटबंदी के 50 दिन भी पूरे नहीं हुए थे कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी की ‘परिवर्तन रैली’ का आयोजन 24 दिसंबर, 2016 को किया गया था.

केंद्रीय गृह मंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह इस रैली में हिस्सा ले रहे थे. पूरे शहर को भाजपा के प्रचार से ढक दिया गया था. भाजपा प्रदेश दफ्तर को मौडर्न डिजाइन वाले फ्लैक्सों से सजा दिया गया था. एलसीडी लगे प्रचार होर्डिंग का इस्तेमाल किया गया था. लखनऊ में भीड़ दिखाने के लिए गाडि़यों से दूरदूर से लोग लाए गए थे.

नोटबंदी के मुश्किल दौर में जब जनता बैंक से अपने पैसे निकालने के लिए सरकार और बैंकों की मुहताज है, तो नेताओं के पास खर्च करने के लिए इतने ज्यादा पैसे कहां से आए यह सवाल मुंहबाए खड़ा है.

पार्टियों पर नहीं असर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में बारबार इस बात को कहते हैं कि बेईमानों को सजा मिलेगी, पर जनता को भरोसा नहीं हो रहा है.

इनकम टैक्स महकमे से ले कर भारतीय रिजर्व बैंक तक रोजाना आंकड़े जारी कर रहे हैं कि गरीब लोगों के खातों में लाखों रुपए जमा हो रहे हैं. गरीबों के खाते में रुपए जमा करने के बहाने यह बताने की कोशिश की जा रही है कि देश की जनता बेईमान है. हर दल के नेता इस बात पर चुप हैं कि नोटबंदी के बाद और उस से 6 महीने पहले पार्टी फंड में कितना पैसा जमा हुआ है  जनता के गुल्लक का हिसाब मांग कर काले धन को खत्म करने की बात करने वाले जब इस बात पर चुप हो जाते हैं, तो साफ दिखता है कि नेताओं को नकाब के पीछे रखा जा रहा है.

जब राजनीतिक दलों के फंड में पारदर्शिता की बात होती है, तो सरकार दिखावा करने के लिए 255 दलों की मान्यता रद्द करने का दावा करती है. यहां भी सरकार के भेदभाव को देखा जा सकता है.

ये वे राजनीतिक दल हैं, जिन्होंने साल 2005 के बाद से एक भी चुनाव नहीं लड़ा है. इन में से बहुत से दल केवल कागजों पर ही मौजूद थे. इन के खातों में कितना पैसा जमा था और क्यों इन की मान्यता रद्द की गई  ऐसे सवालों पर सरकार चुप है. कम से कम इन दलों की मान्यता रद्द करने के पीछे काला धन कोई वजह नहीं दिखती है.

सरकार ऐसी खबरों को दिखा कर जनता में उम्मीद जगा रही है कि काले धन को ले कर चली मुहिम में नेताओं और उन पार्टियों को भी नहीं बख्शा जाएगा. जब तक भाजपा की अपनी रैलियों में लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च होंगे, तब तक लोगों को इस बात पर भरोसा करना मुश्किल है कि राजनीति में काले धन का खात्मा हो रहा है.

पार्टी फंड बना चंदे का धंधा

क्या वजह है कि राजनीतिक दल जनता के बजाय कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का काम करते हैं  इस की सब से बड़ी वजह चुनावी चंदा है. राष्ट्रीय दलों को सब से ज्यादा पैसा कारपोरेट घरानों से मिलता है.

साल 2015-16 में राष्ट्रीय दलों को तकरीबन 103 करोड़ रुपए चंदा मिला. इस में से 76 फीसदी चंदा 359 कारपोरेट घरानों से मिला, जो दिए गए चंदे का 77 फीसदी बनता है.

भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की रिपोर्ट में 473 ऐसे चंदे मिले, जिन में पैन कार्ड का जिक्र तक नहीं किया गया था. इन दलों को तकरीबन 12 करोड़ चंदा बिना पैन कार्ड की जानकारी के दिया गया है.

राष्ट्रीय दलों को 1744 लोगों या संस्थाओं द्वारा चंदा दिया गया है. जहां 77 करोड़, 28 लाख रुपए का चंदा कारपोरेट घरानों से मिला, वहीं 23 करोड़, 41 लाख रुपए का चंदा 1322 निजी दाताओं से मिला, जो महज 23 फीसदी है.

राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की सब  खास बात यह भी है कि पार्टी केवल 20 हजार रुपए से ज्यादा का चंदा देने वालों के बारे में चुनाव आयोग को बताती है. 20 हजार रुपए से कम चंदा देने वालों की जानकारी राजनीतिक दल नहीं देते हैं. असल खेल यहां भी होता है.

20 हजार रुपए से कम के रूप में कईकई बार एक ही आदमी के नाम से चंदा लिया और दिया जाता है, जिस का हिसाब देने से भी दलों को छूट मिली है. अब सवाल उठता है कि यह चंदा लोग क्यों देते हैं  यह किस हिसाब से दिया जाता है  कारपोरेट घराने हर दल को उस की हैसियत के हिसाब से चंदा देते हैं. हैसियत का अंदाजा इस बात से लगता है कि वह पार्टी सत्ता में कितना दखल रखती है. जब कांग्रेस सत्ता में होती है, तो उसे सब से ज्यादा चंदा मिलता है और जब भाजपा सत्ता में रहती है, तो उसे ज्यादा चंदा मिलता है.

बड़े दलों के अलावा अलगअलग प्रदेशों में सत्ता में रहने वाले दलों को भी इसी हिसाब से कम या ज्यादा चंदा मिलता है. जिस प्रदेश में जिन कारपोरेट घरानों को अपना कारोबार करना होता है, वे वहां के सत्ताधारी और प्रमुख विपक्षी दलों को सब से ज्यादा चंदा देते हैं.

यह चंदा पार्टी फंड के साथ और भी तमाम जरीए से होता है. यही चंदे की चमक पार्टी की ऐशोआराम को दिखाती है. इस को देखने के लिए किसी बहुत बड़े बहीखाते की जरूरत नहीं होती है.

पार्टियों में सत्ता की चमक

उत्तर प्रदेश में 30 सालों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. प्रमुख पार्टियों में कांग्रेस का ही पार्टी दफ्तर सब से खस्ताहाल हालत में दिखता है. कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, भाजपा और बसपा के पार्टी दफ्तर चमक बिखेरते दिखते हैं. यह हालत तब नहीं थी, जब कांग्रेस सत्ता में थी. कांगे्रस जब सत्ता में थी, तो वहां चमक थी और बाकी दलों में वीरानी पसरी रहती थी. केंद्र से ले कर प्रदेश तक में इस पैमाने पर सत्ता की चमक को देखा जा सकता है. यह चमक पार्टी को मिलने वाले चंदे से आती है. साल 2015-16 में मिले पार्टी चंदे के एक उदाहरण से इस बात को और अच्छी तरह से समझा जा सकता है. इस दौरान सत्या इलैक्टोरल ट्रस्ट ने भाजपा को 45 करोड़ रुपए का चंदा दिया और केंद्र में सब से ज्यादा सरकार चलाने वाली कांगे्रस को केवल 2 करोड़ रुपए चंदे के रूप में दिए. राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का 80 फीसदी हिस्सा नकद चंदे के रूप में होता है, जिस का खुलासा कोई पार्टी नहीं करती है. अगर नकद चंदे को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए, तो काले धन को  पार्टी में जमा होने से रोका जा सकता है. चुनाव में उम्मीदवार के पैसे को खर्च करने की सीमा तय होती है. उस की पार्टी कितना पैसा खर्च करती है, इस की सीमा तय नहीं होती है, जिस से काले धन का इस्तेमाल पार्टी के प्रचार में होता है.

यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दलों को सरकार द्वारा चुनाव लड़ने का फंड दिया जाए. निजी चंदे पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए. इस तरह के उपाय से काले धन के पार्टी धन बनने से रोकने में मदद मिलेगी.

राजाओं से हो गए नेता अफसर

राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए पैसे का सब से ज्यादा गलत इस्तेमाल करने लगे हैं. अपने पक्ष में प्रचार करने के अलावा वे वोट खरीदने के लिए कार्यकर्ताओं से ले कर वोटरों तक को पैसा दे रहे हैं. रैलियों में भीड़ जुटाने से ले कर चकाचौंध बिखेरने तक में पैसे का असर दिखता है. इस पैसे में काले धन का इस्तेमाल ही किया जाता है. ऐसे में ज्यादातर वोटर अपनी समझदारी से वोट डालने की जगह पैसे के असर से वोट डालते हैं, जिस से असल परेशानियों पर वोट नहीं पड़ते हैं, जो देश और समाज के लिए काफी खतरनाक है. पैसों की चमक के चलते ही चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल काम हो गया है. कोई ऐसा शख्स चुनाव लड़ने की हिम्मत ही नहीं कर सकता, जिस के पास पैसा न हो. पैसे का दबदबा चुनाव दर चुनाव बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि अब सभी राजनीकि दल अपने चंदे का हिसाब दें, जिस से राजनीति पैसा छापने की मशीन न बन सके.

कई अफसर कुरसी जाने के बाद भी राजनीति में आ कर पावर को अपनी कैद में रखना चाहते हैं. मजेदार बात यह है कि जिस अफसर को नेता गाली देते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं, जब वह उसी के दल में शामिल हो जाता है, तो कोई मलाल नहीं रहता है. राजनीतिक दलों के नेता भी अब विचारों की राजनीति से दूर हो गए हैं. ऐसे में जरूरी है कि नए सिरे से राजनीतिक सोच और परिपाटी बदले, नहीं तो केवल कुछ नेताओं और अफसरों के परिवार ही नए किस्म के राजा हो जाएंगे, जो पीढ़ी दर पीढ़ी देश की सत्ता पर राज करते रहेंगे.

छापे को दलित विरोधी बता रही हैं मायावती

नोटबंदी के दौरान खातों में जमा हुए पैसों की जांच में बहुजन समाज पार्टी सब से पहले जांच के दायरे में आई है. जांच में बसपा के खाते में 104 करोड़ रुपए और मायावती के भाई के खाते में एक करोड़, 43 लाख रुपए पाए गए. ईडी ने इस बात की जानकारी इनकम टैक्स महकमे को दी है. बसपा नेता मायावती ने इस जांच को गलत बताते हुए कहा कि यह बसपा को बदनाम करने की साजिश है. बसपा नेता मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा है कि पहले वे 8 नवंबर के बाद और पहले 10 महीने में भाजपा के खाते में जमा पैसों का हिसाब जनता को दें. वे आगे कहती हैं कि 31 अगस्त के बाद वे दिल्ली नहीं जा सकीं, इसलिए चंदे का पैसा जमा नहीं हो पाया. यह वही पैसा है. भाई आनंद कुमार बिजनेसमैन हैं. उन का पैसा नियमों के मुताबिक ही जमा कराया गया था.

दरअसल, मायावती को लगता है कि भाजपा के इस कदम से दलित उन के पक्ष में एकजुट होंगे. मायावती ने भाजपा की बुराई भी की और उस को धन्यवाद भी दिया. बसपा पर पड़े छापे का लाभ मायावती को कितना मिलेगा, यह पता नहीं, पर अब भाजपा पर यह दबाव बढ़ गया है कि वह अपने खातों का भी हिसाब दे. ‘लोकतंत्र मुक्त आंदोलन’ चला रहे लखनऊ के प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘पार्टी में काला धन जमा हुआ इस का सुबूत बसपा की जांच से सामने आ चुका है. यह केवल बसपा में ही नहीं जमा हुआ है, बल्कि दूसरे दल भी इस में शामिल हैं. ऐसे में जरूरी है कि खुद भाजपा और दूसरे दल पार्टी फंड का हिसाब जनता को दें.’’

भारतीय क्रिकेट के 10 रोचक तथ्य कर देंगे आपको हैरान

यह तो हम सब जानते हैं कि क्रिकेट अनिश्चिताओं का खेल है. फिर चाहे वह सचिन का रिटायरमेंट हो या धोनी का कैपटेंसी और टेस्ट क्रिकेट छोड़ने का फैसला.

यह एक ऐसा खेल है जहां नित्य ही नए रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते हैं. एक रिकॉर्ड जो आज इंग्लैंड के खाते में है वही रिकॉर्ड कल भारत के नाम हो जाता है.

भारत में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं धर्म है. जहां टी20, वनडे और आईपीएल, बिग बैश जैसे लीग के कारण टेस्ट क्रिकेट अपनी पहचान खोता जा रहा है वहीं टीम इंडिया इस फॉरमेट में 120 अंको के साथ टॉप पर है.

आज के समय में देखा जाए तो भारतीय क्रिकेट टीम दुनिया के बेहतरीन टीमों में से एक है. हाल ही में इंग्लैंड के साथ खेले गए टेस्ट, वनडे और टी20 सीरीज को टीम इंडिया ने अपने नाम किया.

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो रोमांच से भरा है. भारतीय क्रिकेट इतिहास में भी कुछ ऐसे लम्हें और स्कोर हैं जो आपको रोमांचित कर देंगे. इन तथ्यों से अनजान होंगे आप. तो जानिए भारतीय क्रिकेट के कुछ अनकहे और अनसुने तथ्यों के बारे में..

1.12 जनवरी 1964 में भारत-इंग्लैंड के बीच खेले गए मुकाबले में स्पिनर बापू नादकरनी ने लगातार 21 मेडन ओवर किए थे.

2. विराट कोहली के कप्तानी संभालने के बाद भारतीय टीम ने 5 पांच बार 300 से ज्यादा रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत हासिल की.

3. 1975 के वर्ल्ड कप में भारत-इंग्लैंड के बीच खेले गए एक मैच में सुनील गावस्कर ने 174 बॉल में मात्र 36 रन बनाए थे. इस मैच में भारत को 335 रनों का लक्ष्य का पीछा करना था. 60 ओवर के इस मैच में भारत 132 रन ही बना सका.

4. सौरभ गांगुली एक मात्र ऐसे भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्ल्ड कप के नॉक आउट मुकाबले में शतक जमाया था.

5. 21वीं सदी में भारत के खिलाफ तीन खिलाड़ियों के उनके सर्वाधिक स्कोर के जिम्मेदार इशांत शर्मा ही रहे हैं. उनकी खराब फील्डिंग ने एलेस्टेयर कुक (294), माइकल क्लार्क (329*) और ब्रेंडन मैकुलम (302) को उनके सर्वाधिक स्कोर तक पहुंचाया.

6. सौरभ गांगुली ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें लगातार 4 बार मैन ऑफ द मैच अवार्ड मिला.

7. क्रिकेट इतिहास में 1989 एक ऐसे साल के रूप में जाना जाता है जब 24 खिलाड़ियों ने क्रिकेट में अपना डेब्यू मैच खेला था. सचिन तेंदुलकर भी उन्हीं 24 खिलाड़ियों में से एक हैं.

8. विरेंद्र सहवाग का तीनों फॉरमेट में बहुत ही अनोखा सर्वाधिक स्कोर है. तीनों फॉरमेट में उनके सर्वाधिक स्कोर में अंतिम अंक 19 है. टेस्ट- 319, वनडे- 219 और टी20 में 119.

9. सुरेश रैना और महेंद्र सिंह धोनी ने आज तक टी20 में एशिया के बाहर शतक नहीं लगाया है.

10. सचिन रणजी ट्रॉफी में सिर्फ एक बार ‘डक’ के शिकार हुए हैं. भुवनेश्वर कुमार ने सचिन को 0 पर आउट किया था.

मेरा ब्वायफ्रैंड विवाह से पूर्व सेक्स करना चाहता है लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहती. मैं उसे कैसे मना करूं.

सवाल

मैं 17 वर्षीय युवती हूं, 20 वर्षीय युवक से प्यार करती हूं. समस्या यह है कि वह विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध कायम करना चाहता है लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं चाहती. मैं उसे कैसे मना करूं. क्या शारीरिक संबंध के लिए मना करना सही होगा, कहीं इस से हमारे संबंधों में कड़वाहट तो नहीं आ जाएगी? सलाह दें.

जवाब

सब से पहली बात अभी आप की उम्र छोटी है. यह उम्र कैरियर व शिक्षा पर ध्यान देने की है. आप का निर्णय बिलकुल सही है और आप अपनी बात अपने बौयफ्रैंड से साफसाफ बिना किसी हिचकिचाहट के कह दें. अगर वह आप से सच्चा प्यार करता है तो आप की बात को अवश्य समझेगा और अगर उसे आप के निर्णय से कोई परेशानी होगी तो इस का अर्थ साफ होगा कि उस की आप में रुचि सिर्फ सैक्स संबंध बनाने तक है. सैक्स संबंध दोनों की आपसी सहमति व चाहत पर ही बनने चाहिए और दोनों को उस के जोखिमों को साथ सहने का संकल्प लेना चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

बजट के बाद क्या हुआ सस्ता और क्या महंगा

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 के लिए बजट पेश कर दिया है. वित्त मंत्री का बजट इस बार किसानों के नाम ही रहा. किसानों के उत्थान के लिए कई योजनाएं लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है. देश को काला धन मुक्त बनाने के लिए भी कई प्रस्ताव रखे गए हैं. एक तरफ मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ कम किया गया हैं वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों के लिए भी मुश्किलें बढ़ा दी गई हैं.

अब 3 लाख से ज्यादा का कैश ट्रांजेक्शन संभव नहीं होगा. इसके साथ ही कई उत्‍पादों पर कस्‍टम ड्यूटी को बढ़ाया गया है तो कई पर घटाया गया है. इससे कुछ चीजें सस्‍ती हो गई हैं तो कुछ महंगी.

ये चीजें हो गईं सस्ती-

– एलएनजी (लिक्वीफाइड नैचुरल गैस)

– लेदर

– कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए पीओएस मशीनें

– फींगर स्कैनर, माइक्रो एटीएम और आइरस स्कैनर भी सस्ता हो गया है

– निकेल

– आरओ मेम्‍बरेन एलीमेंट्स

– विंड ऑपरेटेड एनर्जी जनरेटर

– सौर ऊर्जा बैटरी

– वेजीटेबल टैनिंग एक्‍सट्रैक्‍ट्स

इसके अतिरिक्त रेलवे ई-टिकट पर अब सर्विस चार्ज नहीं लगेगा. यानी कि ई-टिकट भी सस्ते हो जाएंगे.

इन चीजों के बढ़ गए दाम-

– पान मसाला, गुटका

– सिगरेट और सिगार

– विदेशी काजू

– पेपर रोल बीड़ी

– चांदी के सिक्के और चांदी के गहने

– एल्यूमीनियम

– एलईडी बल्ब

– मोबाइल फोन विनिर्माण में काम आने वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड पर सीमा शुल्क शून्य से बढ़ाकर दो प्रतिशत किया गया. इससे मोबाइल फोन भी महंगे हो जाएंगे.

– स्टील का सामान

– सिल्वर फॉयल

वित्त मंत्री के बजट को सब तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है. पर ये तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा कि किसके दिन कितने अच्छे होंगे.

जब रैना के छक्के ने एक बच्चे को कर दिया जख्मी

भारत और इंग्लैंड के बीच बंगलुरु में हुए तीसरे टी20 मैच में सुरेश रैना की ताबड़तोड़ बल्लेबाजी भारत की जीत में अहम भूमिका रही. भारत ने तीसरा मैच जीतकर 2-1 से टी20 सीरीज भी अपने नाम की.

यह मैच सुरेश रैना के लिए खास रहा. इसमें उन्होंने करीब सात साल बाद अंतरराष्ट्रीय टी20 मैच में अर्धशतक लगाया. इस दौरान रैना ने पांच गगनचुंबी छक्के भी जड़े. हालांकि स्टैंड में गिरे उनके एक छक्के से एक बच्चा घायल भी हो गया. इस छक्के ने मैच देखने आए बच्चे को अस्पताल पहुंचा दिया.

रैना का यह छक्का मैच देख रहे एक 6 साल के बच्चे की जांघ पर जाकर लगा. हालांकि बच्चे को मामूली चोट लगी थी और सामान्य उपचार के बाद उसे जल्द ही अस्पताल से डिस्चार्ज भी कर दिया गया. उस बच्चे में मैच देखने की कुछ ऐसी ललक थी कि इलाज के बाद वह फिर से दर्शक दीर्घा में पहुंचा और मैच का लुत्फ लिया.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी क्रिकेट मैच में ऐसी घटना हुई हो. अप्रैल, 2012 में भी रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु और पुणे वारियर्स के बीच मैच के दौरान क्रिस गेल के शॉट पर 10 साल की बच्ची के चेहरे पर गेंद जा लगी थी और वह जख्मी हो गई थी.

दरअसल, इस मैच में सुरेश रैना ने अपने टी-20 करियर का चौथा अर्धशतक जमाया और उन्होंने 45 गेंदों पर 63 रनों की पारी खेली. इस पारी में रैना ने दो चौके और 5 छक्के लगाए. उन्होंने अपने 50 रन केवल 39 बॉल पर पूरे किए थे.

दिलचस्प बात यह है कि रैना ने करीब सात साल बाद भारत के लिए टी-20 मैच में अर्धशतक जमाया. इससे पहले रैना ने जून 2010 में जिम्बाब्वे के खिलाफ फिफ्टी जमाई थी.

भारत से मिले 203 रनों के चुनौतीपूर्ण लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड टीम 16.1 ओवरों में 127 रन बनाकर ढेर हो गई. इंग्लैंड के आखिरी आठ विकेट आठ रन के अंदर गिरे. चहल को 'मैन ऑफ द मैच' और 'मैन ऑफ सीरीज' दोनों अवार्ड मिले. चहल ने अपने चार ओवरों के कोटे में 25 रन देकर छह विकेट चटकाए.

इसके साथ ही इंग्लैंड के खिलाफ यादगार प्रदर्शन करने वाले अंतर्राष्ट्रीय टी-20 में युजवेंद्र किसी एक पारी में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले गेंदबाज बन गए. इस मामले में वह दुनिया में तीसरे स्थान पर रहे. उनसे आगे सिर्फ श्रीलंका के अजंता मेंडिस ही हैं.

अंतर्राष्ट्रीय टी-20 में किसी एक पारी में सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी का रिकॉर्ड अजंता मेंडिस के नाम है, जो उन्होंने दो बार किया है. मेंडिस ने सितंबर, 2012 में जिम्बाब्वे के खिलाफ आठ रन देकर छह विकेट लिए थे. इससे पहले अगस्त, 2011 में मेंडिस ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 16 रन देकर छह विकेट लिए थे.

भारत की इस जीत के साथ ही विराट कोहली ने कप्तान के रूप में एक नया रिकॉर्ड बना लिया है. विराट कोहली भारत के ऐसे पहले कप्तान बन गए हैं जिन्होंने कप्तानी संभालते ही तीनों फार्मेट की सीरीजों पर कब्जा जमाया है. विराट की कप्तानी में भारत ने पांच टेस्ट मैचों की सीरीज 4-0 और वनडे सीरीज 2-1 से जीतने के बाद ट्वेंटी-20 सीरीज पर 2-1 से कब्जा जमाया है.

भारत ने इससे पहले इंग्लैंड के खिलाफ कोई भी ट्वेंटी-20 सीरीज नहीं जीती थी. दोनों टीमों के बीच इसके पहले चार ट्वेंटी-20 सीरीज में तीन सीरीज इंग्लैंड ने जीती थी जबकि एक सीरीज ड्रॉ रही थी. इस जीत के साथ विराट की कप्तानी में इंग्लैंड के खिलाफ ट्वेंटी-20 सीरीज में पहली जीत का नया रिकॉर्ड भी जुड़ गया है.

अलिफ : सामाजिक सरोकारों से युक्त बेहतरीन फिल्म

‘‘लड़ना नहीं पढ़ना जरुरी है’’ का संदेश देने वाले जैगम इमाम की फिल्म ‘अलिफ’ की कहानी वाराणसी के मुस्लिम परिवेश की है. पर फिल्म में मदरसा और कंवेंट एज्यूकेशन के बीच टकराव के साथ साथ इस बात पर करारी चोट की गयी है कि धार्मिक कट्टरता के चलते मुस्लिम समाज किस तरह अपने बच्चों को वास्तविक शिक्षा से दूर रखकर प्रगति को अवरुद्ध कर रहा है. जैगम ने मुस्लिम परिवेश के कथानक वाली इस फिल्म में सवाल उठाया है कि तरक्की की राह में बढ़ रही दुनिया में कौन सी शिक्षा आवश्यक है?

फिल्म ‘‘अलिफ’’ की कहानी अली (मोहम्मद सउद) के परिवार की है. अली के पिता (दानिष हुसेन) हकीम हैं. दादाजान बीमार रहते हैं. मां गृहिणी है.च चेरी बहन (भावना पाणी) शेरो शायरी करती है. अली की फूफीजान (नीलिमा अजीम) पाकिस्तान में रहती हैं. जो कि अपने भाई को अक्सर पत्र लिखते रहती हैं, मगर वह उन्हे जवाब नहीं देते हैं. अली और उसका खास दोस्त (ईशान कौरव) एक साथ मदरसा में पढ़ने जाते हैं. अली पतंग उड़ाने में माहिर है, जबकि शकील को पतंग उड़ाने में अली मदद करता है. सब कुछ ठीक चल रहा होता है. एक दिन अचानक अली की फूफीजान, पाकिस्तान से भारत पहुंच जाती हैं. पिता व अपने भाई से गिले शिकवे खत्म करने के बाद फूफीजान ऐलान कर देती हैं कि अली को वह अपने भाई की तरह हकीम की बजाय डाक्टर बनाना चाहती हैं. इसलिए वह अली को मदरसा की बजाय एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ने भेजना शुरू करवाती हैं. अंग्रेजी स्कूल में अली को तीसरी कक्षा में प्रवेश मिलता है.

उधर शकील के नए रिश्तेदार अब हाफिज (आदित्य ओम) बनकर आ गए हैं. इस नए हाफिज के साथ अली की चचेरी बहन का इश्क शुरू हो जाता है. क्योंकि दोनों शायरी लिखने व पढ़ने के शौकीन हैं. पर यह हाफिज कट्टरवादी है. उसे यह पसंद नहीं आता कि अली मदरसा की पढ़ाई छोड़कर अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने जाए. इसी के चलते इस नए हाफिज व अली की चचेरी बहन का इश्क खत्म हो जाता है. क्योंकि हाफिज को अल्लाह से प्यार है. इस पर हाफिज से अली की चचेरी बहन कहती है-‘‘जो इंसान जीते जागते इंसान से प्यार नहीं कर सकता, वह अल्लाह से क्या प्यार करेगा.’’

अली को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में प्रवेश मिल जाता है. मगर उस स्कूल में भी कुछ शिक्षक ऐसे हैं, जिन्हे यह पसंद नहीं कि मदरसा में पढ़ने वाला बालक उनके स्कूल में पढ़े. इस कारण वह बात बात में अली की गलती ढूढ़कर उसे मारता पीटता है. अली भी अंग्रेजी स्कूल के नियम कायदों व भाषा से परेशान हो जाता है. तो वहीं मौलवी व हाफिज भी नाराज होते हैं कि अली को मदरसा की बजाय अंग्रेजी स्कूल में क्यों डाला गया. अंततः अली के पिता अली को फिर से मदरसा में पढ़ने के लिए भेजने लगते हैं. यह सब शकील को भी पसंद नही. शकील चाहता है कि उसका दोस्त अली मदरसा की बजाय अंग्रेजी स्कूल में पढ़े, जिससे वह भी कुछ सीखेगा.

इसी बीच फूफीजान का वीजा खत्म होने को है और उन्हे वापस पाकिस्तान जाना पड़ेगा, पर वह पाकिस्तान में जिस नरक की जिंदगी जीती रही हैं, उससे दुबारा न जुड़ने के लिए पाकिस्तान नहीं जाना चाहती. अली के पिता एक पुलिस इंस्पेक्टर से बात करते हैं. पुलिस इंस्पेक्टर अली के पिता से पैसे से लेकर उन्हे राह बता देता है कि अपनी बहन की नकली कब्र बनाकर सबूत दे दे. जिससे पुलिस अपने रिकार्ड में उन्हे मृत बताकर फाइल बंद कर देगी. अली के पिता यह सब कर देते हैं. अब उन्हे सकून है कि उनकी बहन को पाकिस्तान में नर्क की जिंदगी जीने के लिए नही जाना  पड़ेगा.

पर जब फूफीजान को पता चलता है कि अली फिर से मदरसा जाने लगा है, तो वह जिद पर अड़कर अली को अंग्रेजी स्कूल खुद छोड़ने जाती है. इस पर हाफिज व अली के पिता के बीच बहस होती है. हाफिज कहता है कि वह अली को मदरसा भेजना बंद करे अन्यथा वह शिकायत करेगा कि अली की फूफीजान जिंदा है और उसे वापस पाकिस्तान भिजवाकर मानेगा. अली के पिता परेशान हैं. पर फूफीजान हर हाल में अली को अंग्रेजी स्कूल में पढ़वाकर डाक्टर बनाना चाहती हैं. इस्लाम व मदरसा के कट्टर हिमायती हाफिज पुलिस व विदेश मंत्रालय में शिकायत दर्ज करा देते हैं. पुलिस फूफीजान को पाकिस्तान भेज देती है. पर अली अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता रहता है. पंद्रह साल बाद वह डाक्टर बनकर अपने गांव में लोगों की सेवा करना शुरू करता है.

पत्रकारिता से फिल्मकार बने जैगम इमाम की यह दूसरी फिल्म है. उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘‘दोजखः इन सर्च आफ हेवेन’’ द्वारा भी लोगों को सोचने पर मजबूर किया था और अब फिल्म ‘‘अलिफ’’ भी लोगों को सोचने पर मजबूर करेगी. उत्कृष्ट कथानक व पटकथा वाली फिल्म ‘अलिफ’ जहां लोगों को शिक्षा, धर्म व प्यार को लेकर सोचने पर बाध्य करती है, वहीं दर्शकों को पूरी फिल्म में बांधकर रखती है तथा उनका मनोरंजन भी करती है. फिल्म में निर्देशक ने मुस्लिम परिवार के उन सभी अंर्तद्वंदो को बहुत बेहतरी से पिरोया है, जिनसे हर मुस्लिम परिवार न सिर्फ जूझ रहा है, बल्कि हर परिवार के अंदर आए दिन बहस होती रहती है. वाराणसी में फिल्म को फिल्माकर निर्देशक ने यथार्थपरक वातावरण फिल्म में पेश किया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बाल कलाकार मोहम्मद सउद और ईशान कौरव का अभिनय हर किसी को मोहित कर लेता है. दोनों बाल कलाकारों ने बौलीवुड के कई दिग्गजों को दिखा दिया है कि अभिनय क्या होता है. नीलिमा अजीम तो बेहतरीन कलाकार हैं. हाफिज के किरदार में आदित्य ओम का अभिनय भी सराहनीय है. भावना पाणी ने भी एक शायरा के रूप में अच्छी छवि छोड़ी है.

फिल्म ‘‘अलिफ’’ का निर्माण पवन तिवारी और जैगम इमाम ने किया है. लेखक व निर्देशक जैगम इमाम तथा कलाकार हैं – नीलिमा अजीम, दानिष हुसेन, आदित्य ओम, सिमाला प्रसाद, मोहम्मद सउद और ईशान कौरव.

गहनों के शौकीन पुरुष नेता

विधानसभा चुनावों में दी जाने वाली जानकारी से यह पता चलता है कि गहनों का शौक केवल महिलाओं को ही नहीं है पुरुष नेता भी इसके शौकीन हैं और इनके पास उतने ही गहने हैं जितने कि सामान्य घर की महिला के पास भी नहीं होते हैं. यह गहने वह नहीं हैं जो नेता की पत्नी के पास हैं. नेता की पत्नी से अलग गहने नेता जी के पास हैं. वैसे तो यह शौक प्रदेश भर के नेताओं में कमोबेश एक जैसा पाया जाता है. युवा नेता भी इस शौक से अछूते नहीं हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जब हमने इस मामले की पड़ताल की तो पता चला कि यह शौक हर पार्टी के नेताओं में बराबर का है.

राजधानी लखनऊ से चुनाव लड रहे पुरुष नेताओं के गहनों में सबसे अधिक अंगूठी और चेन पाई गई. कुछ नेताओं के पास सोने के ब्रेसलेट और रूद्राक्ष की माला भी देखने को मिली. बक्शी का तालाब से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी अविनाश त्रिवेदी की पत्नी के पास 22 लाख के गहने हैं तो खुद उनके पास 3 लाख के गहने हैं. ब्रजेश पाठक के पास पति पत्नी के लाखों के गहने हैं. नकुल दुबे के पास 22 तोला गहने हैं. राजीव श्रीवास्तव के पास 26 लाख के गहने पति पत्नी को मिलाकर हैं. अनुराग सिह भदौरिया के पास 450 ग्राम सोने और हीरे के गहने हैं तो पत्नी के पास 1300 ग्राम सोना है. मारूफ के पास 20 ग्राम सोना है तो पत्नी के पास 700 ग्राम सोना है. अभिषेक मिश्रा के पास पति पत्नी को मिलाकर 1 किलो से उपर सोना है.

असल में अब नेताओं के रहन सहन और फैशन के तरीके बदल चुके हैं. सभी को अचछे ब्रांड के कपड़े, जूते, घडियों, जैकेट का शौक होता है. हाथ में अंगूठी और चेन सभी के पास होती है. कई बार तो गले में पहने जानी वाली चेन में रूद्राक्ष की माला भी पहनी जाती है. इसमें भी सोने का प्रयोग किया जाता है. युवा नेताओं के हाथ में ब्रेसलेट भी खूब दिखने लगा है. चुनाव में जो विवरण भरा जाता है वह बहुत नहीं होता है. ज्यादातर नेता मजबूरी में इसको भरते हैं. कोशिश यह होती है कि कम से कम भरा जाये. आज के दौर में केवल नेताओं के पास ही नहीं दूसरे शौकीन लोगों के पास गहने होते हैं. नेताओं से सादगी की उम्मीद की जाती है. इस कारण उनका फैशन सवालों के घेरे में आ जाता है.

जिस तरह से नेताओं का रहन सहन बदल रहा है उसमें गहनों का शौक कोई बजूबी बात नहीं है. आज चुनाव के समय की बात हो या किसी नेता की बड़ी रैली नेताओं की फैशनेबल पोशाके बिकने लगती हैं. यह मंहगी और सस्ती दोनों ही तरह की होती हैं. गहने के शौक पर एक नेता का कहना है कि जितना हम दिखाते हैं उससे कहीं अधिक तो समाज में दूसरे लोग पहने दिखते हैं.

डिजिटल कुबेर

तिरुपति बालाजी मंदिर की कथा बड़ी दिलचस्प है जिस के तहत यहां चढ़ाया गया पैसा विष्णु देवता के पास नहीं बल्कि धन के देवता लेकिन जाति के राक्षस कुबेर के पास पहुंचता है क्योंकि उस ने विष्णु की मांग पर उस की शादी के लिए एक तरह से कुछ शर्तों पर पैसा दिया था जिसे सहूलियत के लिए मैरिज लोन कहा जा सकता है.  इस प्रसंग का वर्तमान लोकतंत्र से भी संबंध स्थापित होता लगने लगा है. आम लोगों का बचाखुचा पैसा नोटबंदी के बाद कहां और किन कुबेरों के पास जा रहा है, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा. प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी बीते दिनों तिरुपति बालाजी के मंदिर पहुंचे और परंपरागत पोशाक पहन पूजन किया तो भी यह तय कर पाना मुश्किल था कि कौन किस की पूजा कर रहा है. मोदीजी ने क्या मांगा, यह तो वही जानें लेकिन दूर कहीं कंदराओं में बैठे कुबेर ने जरूर यहां दुआ की होगी कि हे मोदी, तुम मुझे क्यों डिजिटल किए दे रहे हो.

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