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गोल्फ स्टिक ने बचाई गोल्फर की जान

यह सच ही कहा गया है कि कभी कभी ताकत से ज्यादा अक्ल काम आती है. कुछ ऐसा ही हुआ एक गल्फर के साथ. अमेरिका के एक गोल्फर के स्टिक ने उनकी जान बचा ली. स्टिक की मदद से वह 10 फुट के घड़ियाल के हमले को नाकाम करने में सफल रहे.

फ्लोरिडा के नार्थ फोर्ट मायर्स में रहने वाले टोनी आर्ट्स पर घड़ियाल ने हमला करके उनका टखना पकड़ लिया था. ऐसे में उन्होंने अपने पटर (गोल्फ स्टिक, धातु लगी हुई) की मदद से उसे घायल कर दिया.

पानी में ले गया

मीडियो में आई खबरों की मानें तो टोनी ने कहा कि “जब मैं पानी से पांच से छह फुट दूर चल रहा था तब मैंने अचानक पानी में हलचल की आवाज सुनी और मैं समझ गया कि यह घड़ियाल है और उसने मुझे पकड़ लिया. घड़ियाल ने टोनी का दायां टखना पकड़ लिया और उन्हें पानी में ले गया. टोनी ने कहा, मुझे याद है कि मेरा क्लब (गोल्फ की स्टिक) मेरे हाथ में था और जैसे ही वह मुझे कमर तक पानी में ले गया, मैंने उसके सिर पर वार कर दिया. घड़ियाल ने हालांकि आसानी से हार नहीं मानी और जल्द ही मैं छाती तक पानी में चला तया.”

आंख पर वार से बची जान

टोनी ने अंतत: घड़ियाल की आंख के पास वार किया जिससे उनकी जान बची. उन्होंने कहा, मैंने उसकी आंख के पास वार करना शुरू किया. उस पर तीन वार किए और उसने मेरा पैर छोड़ दिया जिसके बाद मैं रेंगते हुए पानी से बाहर आया.

घड़ियाल के हमले के बाद टोनी की मदद के लिए जो लोग पहुंचे वे फ्लोरिडा मत्स्य एवं वन्यजीव संरक्षण आयोग के अधिकारी थे जिन्होंने बाद में घड़ियाल को पकड़ लिया. टोनी ने घड़ियाल के साथ संघर्ष पर कहा, यह अच्छी बात है कि मेरे पास पटर था. यह अच्छा, मजबूत और भारी पटर था. मुझे लगता है कि गोल्फर को हमेशा अपने हाथ में क्लब रखना चाहिए.

मेरी साली ने एक दिन जबरदस्ती मेरे साथ सेक्स किया. अब वह रोजाना संबंध बनाने को कहती है. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 28 साल का हूं. मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं. मेरी छोटी साली भी हमारे साथ रहती है.

एक दिन बीवी घर पर नहीं थी और मैं टीवी देख रहा था, तभी साली अचानक कमरे में आई और मुझे गिरा कर चूमने लगी. मेरे मना करने पर भी उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और उस ने वह सब कर डाला, जो अमूमन बीवी करती है.

अब वह मुझ से रोजाना संबंध बनाने को कहती है और रात में भी अपने साथ सोने को कहती है. मना करने पर अपनी बहन को बताने की धमकी देती है. मैं क्या करूं?

जवाब

आप का तो घर बैठे ही बंपर ड्रा निकल आया, मगर यह बम की तरह खतरनाक भी हो सकता है. साली कहीं पेट से हो गई, तो और बवाल हो जाएगा. बीवी को पता चलेगा, तो भी फसाद ही होगा.

बेहतर यही होगा कि आप किसी बहाने से साली को वापस उस के घर भेज दें और हो सके तो अपना तबादला कहीं दूर करा लें.        

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

वेडिंग इंश्योरेंस है न…

दीपाली के घर से विवाह की सजावट भी नहीं उतरी थी कि पूरे घर को एक सन्नाटे ने घेर लिया दीपाली की शादी में लाखों रुपए खर्च कर चुके उस के पापा अस्पताल पहुंच चुके थे. दरअसल हुआ यह कि दीपाली की शादी में स्टेज पर शौट सर्किट की वजह से आग लग गई और दीपाली के पापा की जिंदगी भर की मेहनत की कमाई राख हो गई.

यह देख कर दीपाली के पापा को हार्ट अटैक हो गया, विवाहस्थल पर हुए नुकसान, साथसाथ दवाओं व आपरेशन का खर्च उठा पाना अब उन के लिए मुश्किल हो चला था. जिंदगी में ऐसे कई लमहे आ जाते हैं, जिन के बारे में लोग सोचना भी नहीं चाहते हैं और फिर शादीब्याह तो ऐसे मौके हैं, जो बेहद यादगार पलों में शुमार होते हैं. सभी चाहते हैं कि जब भी वे उन लमहों को याद करें, तो चेहरे पर आंसू की बूंदें होने के बजाय मुसकराहट हो.

आप के जीवन के ये यादगार खुशी के पल दुखद न हों, इसलिए वेडिंग इंश्योरेंस अवश्य कराएं. ज्यादातर लोग यह सोच कर इंश्योरेंस नहीं कराते कि इंश्योरेंस बेहद महंगा होगा, लेकिन आप को यह जान कर हैरानी होगी कि इस का प्रीमियम तकरीब 3,770 रुपए से 14,076 रुपए तक होता है. जहां 5 लाख रुपए के इंश्योरेंस के लिए करीब 0.50 से 3.05 फीसदी प्रीमियम देना पड़ता है, वहीं 2 लाख रुपए के इंश्योरेंस के लिए करीब 3,770 रुपए का प्रीमियम देना होता है.

आज बाजार में कई कंपनियां आप की मदद के लिए खड़ी हैं. बस, जरूरत है यह जानने की कि आप अपने विवाह आयोजन का इंश्योरेंस कैसे कराएं और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखें.

कवर वेडिंग इंश्योरेंस

वेडिंग इंश्योरेंस में आप को उन छोटी चीजों का भी कवर दिया जाता है, जिन के बारे में शायद आप सोचते भी नहीं होंगे. इंश्योरेंस में कैटरिंग, पंडितपुरोहित, ब्यूटीशियन, कुक, डाक्टर, मैरिज हाल, फोटोग्राफी, म्यूजिक पार्टी वगैरह पर भी कवर मिलता है.बुरे वक्त की सोच कर चलें, अगर आप के विवाह समारोह में कुछ बुरा घट जाता है, मसलन किसी सदस्य की अचानक तबीयत खराब होना, पंडित का समय पर न पहुंचना, खाने में किसी तरह की परेशानी होना या किसी प्राकृतिक आपदा के चलते कोई समस्या उत्पन्न होना, आप की पौलिसी में जोजो कवर होंगे क्लेम करने पर आप को भुगतान कर दिया जाएगा.

इन परेशानियों से तो आप फिर भी अपने स्तर पर निबट सकते हैं. लेकिन किन्ही कारणों से अगर विवाह को स्थगित करना पड़े, तो भी बेकार बहने वाला पैसा आप के लिए आर्थिक समस्या खड़ी कर सकता है. ऐसे में अगर आप ने विवाह समारोह का इंश्योरेंस कराया हुआ है, तो आप विवाह स्थगित होने पर क्लेम कर सकते हैं. ऐसे में कंपनी आप के नुकसान का भुगतान करती है. लेकिन विवाह स्थगित क्लेम विवाह की तिथि से 3 दिन पहले तक की अवधि में स्थगित होने पर ही किया जा सकता है.

सामान्यत: आग लगने या किसी प्राकृतिक आपदा, किसी सगेसंबंधी की अकस्मात मौत या दुर्घटना या अथवा दूल्हे या दुलहन की दुर्घटना वगैरह कारणों से विवाह स्थगित होने पर ही आप क्लेम कर सकते हैं. वेडिंग इंश्योरेंस से आप को जहां इन बड़ीबड़ी समस्याओं से राहत मिलती है, वहीं यह दूल्हे व दुलहन की डे्रस को भी कवर करता है, मतलब अगर ऐन वक्त पर दूल्हे या दुलहन की वेडिंग डे्रस में कोई परेशानी होती है, तो भी आप की मदद के लिए इंश्योरेंस है न.

वेडिंग इंश्योरेंस कवर नहीं करता

लगभग विवाह के दौरान होने वाली हर समस्या से बचा लेने वाली वेडिंग पौलिसी में कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो कवर नहीं की जातीं जैसे विवाह टूटने की वजह अगर परिवार की आपसी अनबन, दूल्हा या दुलहन में से किसी एक का शादी से इनकार करना या विवाह स्थल से उठ कर चले जाने पर इंश्योरेंस कंपनी को क्लेम नहीं किया जा सकता. इस के अलावा किसी तरह के आपराधिक मामले, दुर्व्यवहार, क्लेम के इरादे से की गई लापरवाही या स्वयं को दीवालिया घोषित करने पर क्लेम मान्य नहीं होगा.

बाजार में मौजूद इंश्योरेंस कंपनियां

आज आम आदमी की जरूरत को देखते हुए बाजार में कई बीमा कंपनियां वेडिंग इंश्योरेंस करा रही हैं. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी, युनाइटिड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी और न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी आदि ऐसी कंपनियां हैं, जो वेडिंग इंश्योरेंस देती हैं. बजाज आलियांज और आईसीआईसीआई भी पिछले कुछ समय से वेडिंग इश्योरेंस पालिसी दे रही हैं.

ऐसे करें क्लेम

क्लेम के लिए आप को यह साबित करना होगा कि जिस घटना के लिए आप क्लेम कर रहे हैं वह आप के साथ घटित हुई है. इसी के साथ आप को अपने नुकसान का ब्योरा व इस के साक्ष्य के तौर पर सभी कागजात व बिल भी कंपनी को देने होते हैं.

क्लेम करना कौस्ट इफेक्टिव और बेहद आसान है, जिस से आप विवाह समारोह को बिना किसी डर के सुकून से एंज्वाय करते हुए संपन्न करा सकते हैं. क्लेम करने के लिए अपने इंश्योरर से बात करें. क्लेम के दौरान आप को एक फार्म भरने के लिए दिया जाएगा, जिस में आप को अपने इंश्योरेंस के पूरे ब्योरे के

साथ ही क्लेम का मोड भी बताना पड़ेगा. आप चाहें तो औनलाइन क्लेम भी कर सकते हैं. एक बार आप का क्लेम स्वीकार होने पर आप के पास आप की निर्धारित राशि पहुंचा दी जाएगी.

कुछ खास बातें

– विवाह समारोह के दौरान ज्यादा कांट्रैक्ट न करें, क्योंकि जितने कांट्रैक्ट होंगे आप को प्रीमियम उतना ही ज्यादा देना पड़ेगा, इसलिए ध्यान रखें कि कांट्रक्टों की संख्या ज्यादा न हो.

– खरीदारी करते समय कुछ पैसे बचाने के  चक्कर में बिल लेने से परहेज न करें, क्योंकि क्लेम के समय आप को उन्हीं चीजों पर भुगतान किया जाता है, जिन का आप बिल देते हैं.

– परिवार के सभी सदस्यों को भी इस बात से सूचित कर दें कि वे कोई भी सामान खरीदते समय उस का बिल जरूर ले लें.

– क्लेम करने के लिए जाएं, तो अपने साथ हर जरूरी कागज ले जाएं. इन कागजातों में सभी सर्टिफिकेट, किए गए खर्च के बिल वगैरह दें.

– ध्यान रहे, जब तक मांगे न जाएं ओरिजनल बिल व सर्टिफिकेट इंश्योरेंस कंपनी को न दें. इन की फोटोस्टेट ही फार्म के साथ लगाएं.

– क्लेम के समय सभी चीजों का पूरा ब्योरा दें. अगर प्रौपर्टी डैमेज का क्लेम कर रहे हैं, तो सजावट में लगा खर्च, विवाह स्थल पर लगाए गए सेट, उन के लिए हायर किए गए डेकोरेटरों का खर्च या बुकिंग खर्च को भी सूची में लिखें.

अब कपास की चुनाई हुई आसान

भारत में कपास की खेती का रकबा बढ़ रहा है. कपास खिलने के बाद एकसाथ चुनाई होती है. उस समय मजदूरों की कमी हो जाती है और किसानों को तकलीफ का सामना करना पड़ता है. इसलिए साईमा काटन डेवलपमेंट कोयंबटूर ने कपास चुनने का यंत्र बनाया है, जिस का प्रदर्शन हाल ही में 2000 किसानों के सामने सीटी सिड्रा किसान मेले में किया गया.

मशीन की खासीयतें

* सस्ती कीमत.

* कटाई में 70 फीसदी तक कम लागत.

* कम कूड़ाकरकट

* कपास की सभी तरह की कटाई के लिए फायदेमंद.

* बहुत कम रखरखाव खर्च.

* कम से कम शारीरिक तनाव.

इस मशीन को 8 घंटे चार्ज करने पर 8 घंटे तक चलाया जा सकता है. इस मशीन के 8 घंटे इस्तेमाल से 150 किलोग्राम कपास चुनी जा सकती है. इस मशीन को बनाने वाली कंपनी का कहना?है कि इस की कीमत सिर्फ 7000 रुपए सभी कर सहित रखी गई है और किसानों के लिए सब्सिडी की बात भी चल रही है. यदि ऐसा हो जाता है तो यह किसानों को 4000 रुपए में मिल जाएगी. भारतीय वस्त्र उद्योग संगठन द्वारा 4 मशीनें प्रदर्शन के लिए अजमेर, पाली, जोधपुर और नागौर में दी गई हैं. राजस्थान के जोधपुर जिले के भोपालगढ़ क्षेत्र के रामकिशोर ने इस मशीन का कामयाब तरीके से इस्तेमाल किया. रामकिशोर ने इस को किसानों के लिए एक अच्छी मशीन बताया?है. यदि बैटरी का वजन थोड़ा कम कर दिया जाए, तो इस की कूवत और बढ़ सकती?है. रामकिशोर ने अपने खेत की कपास की इसी मशीन से चुनाई की है.

मशीन कहां मिलेगी, उस की कीमत और यह कैसे काम करती है के बारे में जानने के लिए मशीन बनाने वाली कंपनी के मोबाइल नंबर 09845833965 पर या किसान रामकिशोर के मोबाइल नंबर 09649473007 और लेखक के मोबाइल नंबर 09414921262 पर संपर्क कर सकते हैं.

फूलों से महकाएं जीवन की बगिया

उद्यानिकी यानी बागबानी की एक शाखा है फूलों की खेती. इस में परफ्यूम इंडस्ट्री के अलावा फार्मास्यूटिकल आदि शामिल हैं. इस व्यवसाय को शुरू करने वालों को फ्लोरिस्ट कहते हैं. युवकयुवतियां इस व्यवसाय को शुरू कर के खासी कमाई कर सकते हैं.

योग्यता : जो युवा इस क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहते हैं उन के लिए इस बाबत जानकारी होनी जरूरी है. सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिगरी जैसे कोर्स के लिए 10+2 में बायोलौजी, फिजिक्स, कैमिस्ट्री के साथ पास होना जरूरी है, लेकिन फ्लोरीकल्चर में मास्टर्स डिगरी हासिल करने के लिए एग्रीकल्चर में बैचलर डिगरी होनी जरूरी है. तकरीबन हर यूनिवर्सिटी में फ्लोरीकल्चर पढ़ाया जाता है.

जगह : इस काम के लिए सवा बीघा जमीन काफी है, लेकिन जमीन 5 बीघा हो तो वारेन्यारे हैं. इसे एक नर्सरी के तौर पर खोला जाए. यहां कम से कम 2 नलकूप जरूर हों.

विविधता : नर्सरी में रैनन क्लाउज, स्वीट, विलियम, डेहलिया, लुपिन, वेरबना, कासमांस आदि के फूल लगा सकते हैं. इस के अलावा गुलाब की प्रजातियों में चाइना मैन, मेट्रोकोनिया फर्स्ट प्राइज, आइसबर्ग और ओक्लाहोमा जैसी नई विविधताएं हैं, जो शर्तिया कमाई देती हैं. इस के साथसाथ मोगरा, रात की रानी, मोतिया, जूही आदि झाडि़यों के अलावा साइप्रस चाइना जैसे छोटेछोटे पेड़ लगा कर अच्छी कमाई की जा सकती है.

कब शुरू करें : फूलों की पैदावार के लिए सब से उपयुक्त समय सितंबर से मार्च तक है, लेकिन अक्तूबर से फरवरी का समय इस व्यवसाय के लिए सब से बढि़या है. वैसे तो फूलों का कारोबार और पैदावार सालभर चलती है, पर जाड़ों में यह बढ़ जाता है.

बचाव : कीटभक्षी पक्षी और छोटेछोटे कीड़ेमकोड़े फूलों के दुश्मन होते हैं. इन से बचाव के पूरे इंतजाम होने चाहिए. समयसमय पर दवाओं का छिड़काव भी जरूरी है. सर्दी के दिनों में फूलों की पैदावार को बचाने के लिए क्यारियों पर हरे रंग की जाली का प्रयोग करना चाहिए.

कहां बेचें : फूलों की सब से बड़ी मंडी दिल्ली में है. इस मंडी में देशविदेश के फूल व्यापारी खरीदफरोख्त करते हैं. लगभग सौ कंपनियां फूल उत्पादन व उन के व्यापार में 2,500 करोड़ रुपए की पूंजी निवेश कर चुकी हैं. इन कंपनियों के एजेंट हर जगह उपलब्ध हैं. आप अपने खेतों में उत्पन्न फूलों को बेचने के लिए इन से संपर्क कर सकते हैं. फूल सजावट के काम आते हैं. इन से माला, गजरा, सुगंधित तेल, गुलाबजल, गुलदस्ता, परफ्यूम आदि बनाए जाते हैं. इस के अलावा, सामाजिक कार्यक्रमों, केशसज्जा, गृहसज्जा और विवाहअभिनंदन आदि अवसरों पर भी ये उपयोग किए जाते हैं. उपरोक्त कार्य के अलावा पुष्पउत्पादक किसानों से आप थोकभाव में फूल खरीद कर मंडी में पहुंचा सकते हैं. विदेशों में निर्यात कर सकते हैं, मंडियों से खरीद कर कसबों में वितरण कर सकते हैं. अधिक लाभ के लिए फूल व्यवसाय उत्तम विकल्प है.

आमदनी : कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूक किसान यदि एक हेक्टेयर गेंदा के  फूल लगाते हैं तो वे वार्षिक आमदनी 1 से 2 लाख रुपए तक बढ़ा सकते हैं. इतने ही क्षेत्र में गुलाब की खेती करते हैं तो दोगुनी तथा गुलदाउदी की फसल से तकरीबन 7 लाख रुपए तक कमा सकते हैं. भारत में गेंदा, गुलाब, गुलदाउदी आदि फूलों के उत्पादन के लिए जलवायु काफी अनुकूल है. फिर भी मिट्टी, खाद व खरपतवार की सफाई व समय पर बुआई का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

गुलदाउदी की सफल बागबानी के लिए बलूई दोमट मिट्टी सर्वश्रेष्ठ है. खेत की ग्रीष्मकाल में अच्छी जुताई करनी चाहिए. फूलों की लगभग सभी प्रजातियों की बुआई सितंबर-अक्तूबर में की जाती है. गुलाब और गेंदा हर प्रकार की मिट्टी में लगाए जा सकते हैं, परंतु दोमट, बलुआर या मटियार भूमि ज्यादा उपयोगी है. गुलाब की खेती कलम लगा कर की जाती है. रोपाई सायंकाल में होती है. उन्नत किस्म के बीज दिल्ली स्थित पूसा इंस्टिट्यूट या देश के किसी भी बड़े अनुसंधान केंद्र से प्राप्त किए जा सकते हैं. कौन सा फूल किस मौसम में लगाया जाता है, इन सभी बातों की जानकारी अनुसंधान केंद्र से मिल जाती है.

कैरियर की संभावनाएं : नर्सरी खोल कर स्वरोजगार करें तो अच्छी कमाई हो सकती है. इस के अलावा, फ्लोरल डिजाइनर, लैंडस्केप डिजाइनर, फ्लोरीकल्चर थेरैपिस्ट, ग्राउंडकीपर्स प्लांटेशन ऐक्सपर्ट के अलावा पीएचडी कर के देश की किसी भी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में बतौर लेक्चरर नियुक्त हो सकते हैं.

सरकार से ऋण व्यवस्था : इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए सरकारी बैंक 5 लाख रुपए तक का ऋण उपलब्ध करवाते हैं. फूलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली कई संस्थाएं भी प्लानिंग तथा ऋण उपलब्ध कराती हैं. ये संस्थाएं यह भी सुनिश्चित करती हैं कि आप को निश्चित आमदनी होती रहे.

फ्लोरीकल्चर में चुनौतियां : भारतीय फूल उद्योग उत्साहित नहीं करता. फसल उगाने के तौरतरीके बहुत पुराने हैं, उन में कुछ नयापन नजर नहीं आता. इस के अलावा फ्लोरीकल्चर के बीज महंगे दामों पर किसानों को मिलते हैं. किसानों को सिंचाई के साधनों व तौरतरीकों की जानकारी का अभाव है. कुशल प्रशिक्षकों की कमी है. पौध लगाने के लिए आवश्यक सुविधाएं नहीं मिलतीं. पुरानी पौध देर तक खेत में रहने के कारण वह फसल पर बुरा  असर डालती है. दूसरी अहम बात यह है कि सुपर मार्केट द्वारा फूलों के व्यापार करने से किसानों को यह व्यापार महंगा पड़ता है.

बीज : भारतीय फूल उद्योग में कंपनियां फूलों के बीज उपलब्ध करवाती हैं. अधिकतर किसान अपनी जमीन की उपजाऊ स्थिति को देखते हुए फूलों की प्रजातियों का चयन करते हैं.

फूलों की खेती : फूलों की अधिकतर खेती देश के विभिन्न राज्यों, जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में की जाती है.

व्यापार को बढ़ावा कैसे : बीजों का भंडारण, उन की सफाई व कुशल कारीगरों की व्यवस्था करने के लिए सरकार द्वारा कम ब्याज दर पर कर्ज मुहैया करवाया जाए, सिंचाईर् के नएनए तरीके अपनाए जाएं और कुशल प्रशिक्षण दिया जाए ताकि फूलों की खेती पर खराब असर न पड़े. व्यापार के लिए देश के सभी राज्यों में फलों के साथसाथ फूलों की मंडी भी बनाई जाएं. हर राज्य की सरकार फूलों के व्यवसाय पर ध्यान दे. साथ ही, 2 हफ्तों का प्रशिक्षण भी दिया जाए ताकि नईनईर् तकनीकों द्वारा किसान फूलों की बेहतर खेती कर सकें और अपनी आमदनी के स्रोत को बढ़ा सकें.

खाद का इस्तेमाल : फूलों की खेती में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख खादों में ब्रैड फील्ड और्गेनिक, डेनिल्स, अर्थवर्क, एस्पोमा गोल्डन टौन, और्गेनिका प्लांट बूस्टर, पियरल वैली आदि शामिल हैं. अधिकतर किसान इन्हीं रासायनिक खादों का प्रयोग करते हैं. इन खादों को किसान तरल बना कर फूलों की पौध पर छिड़काव करते हैं.           

ट्रंप का अमेरिका

अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी की दोपहर से सत्ता में आ गए और वाशिंगटन की उस दिन की मटमैली धूप की तरह दुनिया के देशों के राष्ट्रप्रमुखों पर रोशनी कम हो गई. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले भाषण में ऐसा कुछ नहीं कहा जिस से लगे कि चुनावी भाषणों में उन्होंने जो भी कहा था वह सिर्फ तालियां बजवाने या वोट बटोरने के लिए था. बिजनैसमैन डोनाल्ड ट्रंप का वादा है मुनाफे का, केवल अमेरिका के मुनाफे का और किसी भी तरह गोरे अमेरिकियों को सत्ता लौटाने का.

अमेरिका ने एक बदलाव की ओर कदम रखा है. दुनिया में अब कहीं भी मानवाधिकारों का हनन हो, एक मजबूत देश किसी कमजोर देश पर हमला करे, कहीं भुखमरी, प्राकृतिक हादसा हो, महामारी हो, सरकार द्वारा अपनी जनता को तंग करना हो, अमेरिका को तब तक मतलब नहीं होगा जब तक उस को कोई हानि न हो. अमेरिका अब दुनिया का पुलिसमैन नहीं है, अमेरिका अब स्वतंत्रताओं, उदारता, बराबरी, बर्बरता, कट्टरता की चिंता नहीं करेगा. अमेरिका को ट्रंप की सौगात है कि अमेरिकी फलेफूलें, वह भी गोरे अमेरिकी.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना भारत के लिए एक मिश्रित परिणाम है. ट्रंप जैसे विचार हमारे वर्तमान शासकों के भी हैं कि वहां के गोरों की तरह यहां ऊंचे, सवर्णों, अमीरों, सरकारी अफसरों का राज चले. अमेरिकियों की तरह भारत का एस्टेब्लिशमैंट भी इसलामी आतंकवाद को समाप्त करना चाहता है चाहे उसे करने में निर्दोष औरतें, बच्चे, आदमी मारे जाएं. पर, डर यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अमेरिकी कंपनियों को भारत से सस्ता सामान नहीं खरीदने देंगे. अमेरिकी कंपनियों को अमेरिकियों की जगह, सस्ते होने के कारण भारतीयों को नौकरी पर रखने की इजाजत न देंगे.

ट्रंप की दृष्टि में अमेरिका अमेरिकियों के लिए है, उन गोरे, यूरोप से गए अमेरिकियों के लिए जिन के पुरखों ने एक बियाबान, उजाड़ भूभाग को आबाद किया, दुनिया का सब से अमीर और खुशहाल देश बनाया. अमेरिकियों ने अगर दूसरों को आने दिया तो गुलामों की तरह. उन को व उन की संतानों को अपनी जगह फिर वहीं बना लेनी चाहिए. डोनाल्ड ट्रंप का दिया संदेश है कि किसी के पास अमेरिकी पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसैंस होना बराबरी का हक नहीं देता. यह केवल सेवा करने की इजाजत देता है, गोरे अमेरिकियों की. इसी मिशन के चलते डोनाल्ड ट्रंप जीते हैं और यही अमेरिका की नई पहचान है.

आज बहुमत में न होने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं और वे उस आवरण को फाड़ देना चाहते हैं जिस ने अमेरिका की प्रतिभा को सुरक्षा दी, परिश्रम को बचाया, प्रतिबद्धता को रंग दिया, प्रजा को रोबोट बनने से बचाया. डोनाल्ड ट्रंप की बातों पर जाएं तो चंगेज खां, तैमूर लंग, रूसी जार पीटर द इविल, हिटलर, स्टालिन, माओ, पौल पौट की याद आती है कि क्या वे उन की तरह के विध्वंसक नेता साबित होंगे?

टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया की 10 बड़ी जीत

भारत दौरे पर एकमात्र टेस्ट मैच खेलने आई बांग्लादेश को भारत ने 208 रन से हरा दिया. यह भारत की लगातार छठी सीरीज जीत है. इसके अलावा विराट कोहली के नेतृत्व में टीम इंडिया पिछले 19 मैचों से अजेय हैं. इस जीत के साथ भारतीय कप्तान विराट कोहली ने सुनील गवासकर के रिकॉर्ड को तोड़ दिया. गवासकर के नेतृत्व में टीम इंडिया 18 टेस्ट मैच तक अजेय रही थी. वहीं विराट कोहली के नेतृत्व में टीम इंडिया ने पिछले 19 टेस्ट से हार का मुंह नहीं देखा है.

क्रिकेट इतिहास में भारतीय टीम के नाम कई ऐतिहासिक जीत दर्ज हैं. तो आइए जानें, टेस्ट मैचों में भारत की ऐसी ही 10 बड़ी जीतों के बारे में…

भारत-इंग्लैंड

24 अगस्त, 1971 को भारत को इंग्लैंड में पहली टेस्ट जीत हासिल हुई थी. टीम इंडिया ने यह मुकाबला इंग्लैंड के ओवल में जीता था, जहां अजीत वाडेकर की कप्तानी में टीम इंडिया ने इंग्लैंड को 4 विकेट से मात दी थी. भारत ने ऐसी टीम को मात दी थी, जो लगातार 26 टेस्ट मैचों में अजेय रही थी.

भारत-पाकिस्तान

1980 के दशक में भारत ने कुल 8 टेस्ट मैचों में विजय हासिल की. इनमें से पहली जीत टीम इंडिया ने जनवरी, 1980 में पाकिस्तानी टीम को 10 विकेट से परास्त कर हासिल की थी. कपिल देव ने पाक टीम के चार विकेट चटकाकर 272 रनों पर ही समेट दिया. इसके बाद उन्होंने 98 गेंदों में 84 रन की पारी भी खेली. सुनील गावस्कर ने 166 रन जड़े थे.

भारत-पाकिस्तान

7 फरवरी, 1999 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में अनिल कुंबले पाकिस्तान के सभी 10 विकेट चटकाकर यह कारनामा करने वाले दुनिया के दूसरे गेंदबाज बन गए थे. टेस्ट सीरीज के इस दूसरे टेस्ट में जीत हासिल कर भारत के पास सीरीज ड्रॉ कराने का मौका था. पाकिस्तान के पास 420 रन का टारगेट था. आखिरी दिन पाक ने मैच ड्रॉ कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा और भारत को 19 साल बाद अपने चिर प्रतिद्वंदी पर जीत हासिल हुई.

भरत-ऑस्ट्रेलिया

2001 में कोलकाता के ईडन गार्डन में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेले गए मैच में भारत ने पहली पारी में फॉलोआन खेलने के बावजूद जीत हासिल की. इस मैच को वीवीएस लक्ष्मण की 281 रन की शानदार पारी और हरभजन सिंह की हैट्रिक के लिए जाना जाता है.

भारत-इंग्लैंड

हेडिंग्ले में 2002 में खेले गए मैच में भारत ने इंग्लैंड को पारी और 46 रन से मात दी. इस मुकाबले मे तिकड़ी कहे जाने वाले राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली ने क्रमश: 148, 193 और 128 रन बनाए. भारत ने पहली पारी में 628 रन बनाए और इंग्लैंड की टीम इस लक्ष्य को दोनों पारियों में खेलकर भी हासिल नहीं कर सकी.

भारत-ऑस्ट्रेलिया

2003 में एडीलेड में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत की जीत को विदेश धरती पर सबसे बड़ी जीतों में से एक माना जाता है. इस मुकाबले में भी राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण की जोड़ी ने गजब का खेल दिखाया. द्रविड़ ने इस मैच में 248 रन की बड़ी पारी खेली, जबकि लक्ष्मण ने 148 रन का स्कोर बनाया. दोनों ने यह पारियां ऑस्ट्रेलियाई टीम के 556 रन के विशाल स्कोर के जवाब में 85 रन पर ही भारत के 4 विकेट गिरने के बाद खेली थी. दूसरी पारी में जीत के लिए भारत को 230 रन का लक्ष्य मिला था, जिसे भारत ने आसानी से हासिल कर लिया.

भारत-पाकिस्तान

मार्च, 2004 में मुल्तान में पाकिस्तान को भारत ने पारी और 72 रन से परास्त किया था. इस मुकाबले में पहली पारी में भारत ने 675 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया था. इसमें सहवाग की 309 रन की रेकॉर्ड पारी की बड़ी भूमिका थी. इस पारी के बाद ही उन्हें 'मुल्तान का सुल्तान' कहा जाने लगा.

भारच-साउथ अफ्रीका

ईडन गार्डन में साउथ अफ्रीका के खिलाफ 2004 में खेले गए मैच में हरभजन की फिरकी ने एक बार फिर कमाल किया. हरभजन ने साउथ अफ्रीका की दूसरी पारी में 7 विकेट चटका दिए. इसका ही कमाल था कि भारत को जीत के लिए महज 117 रन का लक्ष्य मिला, जिसे भारत ने दो विकेट गंवाकर ही हासिल कर लिया.

भारत-इंग्लैंड

2008 में चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ मुकाबले में साउथ अफ्रीका को उलटफेर का शिकार होना पड़ा. इस मुकाबले में भारत ने 387 रनों का विशाल लक्ष्य हासिल कर जीत दर्ज की.2010 में मोहाली में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वीवीएस लक्ष्मण ने एक बार फिर कमाल करते हुए 73 गेंदों पर नाबाद 79 रन की पारी खेली. उनकी इस पारी के चलते ही भारत ने इस नाटकीय उतार-चढ़ाव वाले मुकाबले मे नौवें विकेट के लिए लक्ष्मण और इशांत शर्मा के बीच हुई 81 रनों की साझेदारी ने भारत को एक विकेट से जीत दिला दी.

नाच पर आंच क्यों

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ब्लौक छपारा की भीमगढ़ कालोनी में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से आ कर रह रही लता डांस पार्टी में 40 लोग थे. इन में नौजवान लड़कियों की तादाद ज्यादा थी. भीमगढ़ कालोनी में पार्टी के सदस्यों ने डेरा डाला. किराए पर लिए गए कच्चेपक्के मकानों में बुनियादी सहूलियतों का टोटा था, पर इन्हें इस से कोई खास फर्क पड़ा, हो ऐसा लगा नहीं.

अस्थायी गृहस्थी में जरूरत का सारा सामान था, मसलन खाना बनाने के बरतन, कपड़े रखने के लिए पेटियां, सूटकेस और इन के लिए सब से ज्यादा अहम मेकअप का सामान जो करीने से सजा कर रखा गया था. डांसरों की नई चमकीली ड्रैसें संभाल कर दीवार के सहारे टांग दी गई थीं. 3-4 अधनंगे बच्चे भी इन के साथ थे जो दिनभर हुड़दंग मचाते रहते थे पर गांव के दूसरे बच्चे इन के साथ नहीं खेलते थे, जिस का इन्हें मलाल था.

बच्चे तो ठहरे बच्चे, जो यह नहीं समझ पाए कि गांव के बच्चों को उन से दूर रहने की नसीहत और समझाइश दी गई है. पर बिगड़ते माहौल का अंदाजा डांस पार्टी की उम्रदराज मुखिया यानी मैनेजर जोति बाई को था और कमसिन, खूबसूरत, तीखे नैननक्श वाली डांसर रति को भी. पर इन्हें इस तरह के एतराज का तजरबा है, लिहाजा इन्होंने कोई खास तवज्जुह गांव वालों के एतराज पर नहीं की. फिर भी एक चिंता तो लग ही गई थी.

छपारा में डेरा डालने से पहले ये लोग थाने गई थीं और वहां अपनी आमद दर्ज कराई थी. आमद के साथ मुंहजबानी यह ब्योरा भी इन्होंने थानाध्यक्ष को दिया था कि हम नाचनेगाने वाले लोग हैं और हर साल यहां आ कर ठहरा करते हैं. ऐसा एहतियात के तौर पर इसलिए किया गया था कि अगर इस इलाके में कोई जुर्म हो तो गांव वाले उस का ठीकरा डांस पार्टी के सिर पर न फोड़ दें और दूसरा मकसद इस से भी ज्यादा अहम, अपने ग्रुप की सुरक्षा का था.

लता डांस पार्टी के आ जाने की खबर मिनटों में इलाके में फैल गई थी और अपने डेरे पर पहुंचने के तुरंत बाद ही जोतिबाई को बुकिंग मिलनी शुरू हो गई थीं. कुछ पुराने जानपहचान वाले लोग खासतौर से मिलने आए थे जिन्होंने यह तसल्ली कर ली थी कि डांस पार्टी साल के आखिर तक तो रुकेगी ही, और अगर काम मिलता रहा तो होली तक भी रुक सकती है.

डांस पार्टी के आ जाने की खबरभर से न केवल छपारा बल्कि आसपास के गांवों में भी रौनक सी आ गई थी. गांवदेहातों में अब गणेश और दुर्गा की झांकियां इफरात से लगने लगी हैं जिन में तबीयत से नाचगाना होता है. कुकुरमुत्ते सी उग रही धार्मिक समितियों में राजनेता वोट पकाते हैं, पंडेपुजारी दक्षिणा झटकते हैं और आमलोग झांकी में बैठी मूर्ति के पांव पड़ कर सीधे जा पहुंचते हैं स्टेज के नीचे खासतौर से बने पंडाल में, जहां फिल्मी गानों की तर्ज पर रति के साथ दूसरी डांसर्स थिरक रही होती हैं.

डेरे पर डांस पार्टी की सुबह नहीं होती, बल्कि सीधे दोपहर होती है, क्योंकि नाचगाने का प्रोग्राम सुबह तक चलता है. इस दौरान गांव की आबादी के मुताबिक, 4-5 सौ से ले कर 2 हजार तक की तादाद में बैठे लोग अपने पसंदीदा गाने की फरमाइश स्टेज तक पहुंचाते और खूब नोट भी लुटाते हैं.

रातभर फरमाइशी गानों पर डांस पेश करतेकरते इन डांसर्स का अंगअंग दुखने लगता है पर इन का जोश कम नहीं होता. एकएक कर ये स्टेज पर आ कर नाचती हैं, कभी 2-4 के समूह में भी डांस पेश करती हैं.

कौन हैं ये

केवल राजनांदगांव या छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के अधिकांश जिलों में ऐसी हजारों डांस पार्टियां हैं जो तकरीबन 8 महीने मध्य प्रदेश के किसी जिले में जा कर अपना डेरा डालती हैं और अपना पेट पालती हैं. इन डांसरों में कुछ आदिवासी जाति की लड़कियां हैं तो कुछ दूसरी छोटी जाति की भी हैं. गानेबजाने का जरूरी सामान डांस पार्टी अपने साथ ले कर चलती है. 

नाचगाना इन का पुश्तैनी पेशा है. इन के समूह में मर्द कहने भर को होते हैं जिन का काम बाहरी भागदौड़ करना और डांस के दौरान स्टेज के नीचे तैनात रहना होता है, जिस से कभी कोई झगड़ाफसाद हो तो ये हालत संभाल लें. जब लड़कियां डांस कर रही होती हैं तब ये फरमाइशी पर्चियां बटोर रहे होते हैं.

ग्रुप की मुखिया जोति बाई बताती हैं, ‘‘हम तो अपनी दादीनानी के जमाने से इसी तरह प्रोग्राम देते चले आ रहे हैं. यही हमारा पेशा है. इस के अलावा हमें कुछ और पता नहीं.’’ हां, इतना जरूर है कि पहले ग्रुप का नाम डांस पार्टी न हो कर नौटंकी हुआ करता था जिन में गानों के साथसाथ कुछ पुराने जमाने के नाटक भी खेला करते थे.

डांस कहां से सीखा? पूछने पर रति झिझकती हुए बताती है, ‘‘उस ने डांस बचपन से बुआओं और मौसियों से सीखा है और लगभग सभी हिट फिल्मी गानों पर वह नाच लेती है. पहले टेपरिकौर्डर और कैसेट से गाने सुन अभ्यास करती थी पर अब सीडी व पैनड्राइव आ गई हैं जिन के जरिए वह नाचगानों का अभ्यास करती है.’’ रति आगे बताती है, ‘‘एक प्रोग्राम की बुकिंग 2-3 हजार रुपए की होती है पर पार्टी तगड़ी हो तो 8-10 हजार रुपए तक मिल जाते हैं.’’

ये पैसे न्योछावर के पैसों से अलग होते हैं जिन्हें ज्यादा से ज्यादा झटकने की हर डांसर कोशिश करती है कि भीड़ का दिल जीत सके क्योंकि पैसा अच्छे डांस पर ज्यादा बरसता है. एक प्रोग्राम में 4-5 हजार रुपए की न्योछावर मिलनी आम बात है. डेरे पर जा कर पूरे पैसे का हिसाब होता है और रकम सब में बराबर बंट जाती है. कुछ सीनियर डांसर्स को कुछ ज्यादा पैसा मिलता है क्योंकि वे अपने नाम से जानी जाती हैं और भीड़ जमा करने में उन की भूमिका अहम होती है.

नहीं हैं धंधेवालियां हम

रति और जोति दोनों मानती हैं कि हर किसी को उन्हें और उन के पेशे को ले कर गलतफहमी हो जाती है, जिसे वे जल्द दूर भी कर देती हैं. जब गांव वालों को बात समझ आ जाती है तो फिर कोई झंझट नहीं रह जाता. इस के बाद भी कुछ लोग पेशकश कर ही देते हैं जिन्हें ये  सख्ती दिखाते झिड़क देती हैं.

जोति और रति को भी अपना इतिहास पूरा नहीं मालूम जिस की उन्हें जरूरत भी महसूस नहीं होती पर अंगरेजों के जमाने से कुछ छोटी जाति वाले नाचगा कर अपना पेट भरते रहे हैं. पहले ये लोग जमींदारों या दूसरे पैसे वालों के यहां शादीब्याह या दूसरे मौकों पर नाचते थे लेकिन जैसेजैसे वक्त गुजरता गया वैसेवैसे इन के पेशे में भी तबदीलियां आती गईं.

जमींदारी खत्म हुई तो ये लोग दूसरे सूबों में जा कर नाचगाना करने लगे और अब हालत यह है कि इन की जाति की लड़कियां मुंबई के डांस बारों तक जा पहुंची हैं. कुछ नागपुर, पुणे सहित महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहरों के डांसबार में पहुंच गई हैं. पर अधिकांश लड़कियां शहर जाना ठीक नहीं समझतीं, ये किसी मंडली में ही खुद को महफूज महसूस करती हैं.

कमाई ज्यादा नहीं

पैसा इन पर बरसता जरूर है लेकिन वह इतना नहीं होता कि ये लोग शान की जिंदगी जी पाएं. पेट भरने लायक ही ये कमा पाती हैं. इन लड़कियों के सपने बहुत बड़े नहीं हैं. कभीकभार शौकिया तौर पर ये कोई बड़ा शहर घूम आती हैं, वरना इन का पूरा वक्त अपनी डांस पार्टी के साथ घूमते रह कर प्रोग्राम करने और बारिश के 4 महीने अपने गांव में गुजारने में बीतते हैं. बारिश में चूंकि कमाई नहीं होती, इसलिए बाकी 8 महीने कमाया पैसा खर्च हो जाता है.

कुछ डांसर्स ने स्कूल का मुंह देखा है पर सिर्फ 2-4 साल के लिए ही. इस के बाद घुंघरुओं ने इन्हें जकड़ा तो जवानी कब आ कर चली गई, इन्हें पता भी नहीं चला. 35-40 वर्ष की होतेहोते कुछ डांसर्स शादी कर लेती हैं. बाद में यही अपनी डांस पार्टी बना लेती हैं क्योंकि तब तक इन्हें प्रोग्रामों और दूसरे कई मसलों का तजरबा हो जाता है.

कमाई का बड़ा हिस्सा ड्रैस और मेकअप के आइटमों पर खर्च हो जाता है. एक डांसर बताती है, ‘‘और कोई शौक हमें नहीं है, चांदी के गहने जरूर हम बनवाती हैं, यही हमारी बचत है जो बुढ़ापे में हमारा सहारा बनती है.’’

यह डांसर बताती है कि उस की दादीनानी सस्ते कौस्मेटिक प्रौडक्ट इस्तेमाल करती थीं पर ये लोग ब्रैंडेड प्रौडक्ट इस्तेमाल करती हैं.

बड़े शहरों के मुकाबले कसबों में प्रोग्राम करना ये ज्यादा पसंद करती हैं क्योंकि वहां आमदनी ज्यादा होती है और अन्य अड़चनें भी कम रहती हैं. 6-8 महीने में ये तकरीबन 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी गांवों में प्रोग्राम दे आती हैं.

छोटी जगहों में नाचगाने का चलन ज्यादा होने लगा है और लोगों के पास वक्त भी खूब होता है. नाचगाने के शौकीन लोग रातरातभर बैठे डांस का लुत्फ उठाते हैं और दिल खोल कर डांसरों पर पैसे लुटाते रहते हैं.

बावजूद इस के यानी हाड़तोड़ मेहनत के, इन डांसरों की कमाई इतनी नहीं है कि ये बुढ़ापे को ले कर बेफिक्र हो सकें. इसलिए इन की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि उम्र यानी जवानी रहते ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा लें.

मुसीबतें भी कम नहीं

ये डांस पार्टियां कहीं भी जाएं, परेशानियां और मुसीबतें साए की तरह इन के पीछे लगी रहती हैं. कहीं पुलिस वाले परेशान करते हैं तो कहींकहीं स्थानीय रसूखदार नाक में दम कर डालते हैं.

डांसरों के साथ छेड़छाड़ आम बात है, जिस की ये इतनी आदी हो जाती हैं कि ये उस का लुत्फ उठाने लगती हैं. हालांकि डांस के जलसों में भारी भीड़ के चलते कोई खास खतरा इन्हें नहीं रहता लेकिन दिक्कत उस वक्त पेश आती है जब गुंडेमवाली टाइप के लोग इन के डेरे के बाहर चक्कर काटना शुरू कर देते हैं.

ऐसे वक्त में डांस पार्टी की उम्रदराज औरतें काफी काम आती हैं जो इन शोहदों और लफंगों को ऐेसे काबू करती हैं कि ये दोबारा डेरे के पास नहीं फटकते. पर ऐसा करते वक्त इन्हें काफी सब्र, समझदारी और दिमाग से काम लेना पड़ता है. अगर चक्कर काटने वाले रसूखदारों के बेटे हों तो उन से निबटना थोड़ा मुश्किल होता है और उन्हें फटकारने पर कभीकभी लेने के देने पड़ जाते हैं.

आजकल गांवों में सभी नेता हो गए हैं जिन की पहुंच ऊपर तक होती है. लिहाजा, वे बेइज्जत किए जाने पर हल्ला मचा देते हैं कि ये डांस पार्टियां माहौल खराब कर रही हैं. वे लोग प्रचार यह करते हैं कि इन डेरों पर नाचने वालियां नहीं, बल्कि ध्ांधेवालियां हैं. लिहाजा, इन्हें भगाया जाए.

एक बड़ी परेशानी उस वक्त भी खड़ी हो जाती है जब गांव या कसबे के किसी बाहुबली का संदेश आ जाता है कि साहब अकेले में अपनी हवेली पर डांस देखना चाहते हैं और इस बाबत मुंहमांगी रकम देने को तैयार हैं. रंगीनमिजाज रसूखदारों की हवेली में जा कर डांस करना खतरे वाला काम होता है क्योंकि नशे में वे मनमानी पर उतारू हो आएं तो उन से निबटना आसान काम नहीं होता. ऐसी हालत में कई बार डांसरों को वह सब झेलना पड़ता है जिस से वे खुद को अब तक बचाए रखे थीं.

इन परेशानियों से बचने के लिए ये उन बड़े लोगों से दूर ही रहती हैं जो भीड़ में अकसर डांस देखना अपनी तौहीन समझते हैं.

छपारा की भीमगढ़ कालोनी के लोगों ने थाने जा कर इस डांस पार्टी की शिकायत की थी कि इन लोगों के यहां आने से माहौल खराब हो रहा है. इस पर भीमगढ़ पुलिस चौकी के इंचार्ज जी पी शर्मा ने शिकायत करने वालों से पूछा था कि आप ही बताइए, किस कानून के तहत इन पर इलजाम लगा कर कार्यवाही की जाए. ये लोग अपना हुनर दिखा कर पेट पाल रहे हैं और कानून हर किसी को इस की इजाजत देता है.

इस पर गांव वालों ने सरपंच राजकुमारी काकोडि़या की अगुआई में यह शिकायत की थी कि इन लोगों के खुले में शौच जाने से गंदगी फैलती है जबकि उन की पंचायत निर्मल ग्राम पंचायत है.

छोटी जाति से चिढ़

इस इलजाम में कोई खास दम नहीं था, इसलिए पुलिस वालों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया. लेकिन हर कोई जानता है कि इन डांसर्स से चिढ़ की एक अहम वजह उन की छोटी जाति का होना भी है.

चिढ़ भी इतनी कि छोटी जाति वालों को सार्वजनिक स्थलों से पानी नहीं भरने दिया जाता. उन के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव किसी सुबूत का भले मुहताज नहीं हो, लेकिन छपारा के मामले से एक बात यह भी हैरतअंगेज तरीके से लगातार हुई कि सार्वजनिक शौचालयों तक में इन के साथ भेदभाव होने लगा है.

अगर इन डांसरों के खुले में शौच जाने से ग्रामपंचायत निर्मल नहीं रह जाती है तो इन्हें सार्वजनिक शौचालयों में क्यों नहीं जाने दिया गया, इस सवाल का जवाब शायद ही कोई सरपंच दे पाए.

हकीकत यह है कि चूंकि ये आदिवासी और दूसरी छोटी जाति की थीं, इसलिए आंख में खटक रही थीं. ये बिंदास हो कर नाच का अपना हुनर पेश कर रही थीं, इसलिए इन्हें माहौल खराब करने वाली कहा गया. सालों से यह डांस पार्टी यहां आ रही है और सभी तरह के लोग इन के डांस का लुत्फ उठाते हैं. धार्मिक जलसे इन से आबाद होने लगे, इसलिए कई ऊंची जाति वाले भी इन की तरफदारी करने लगे हैं क्योंकि उन की खुदगरजी इन से जुड़ी है और पूरी भी होती है. इसीलिए इन्हें आसानी से खदेड़ा नहीं जा सकता.

चिंता की बात, कला में भी भेदभाव है. किसी सरकारी या गैरसरकारी बड़े जलसे में कोई नामी डांसर स्टेज पर डांस पेश करे तो उस का नाम और फोटो अखबारों में छपता है और टीवी चैनल्स में भी उन्हें दिखाया जाता है. पीढि़यों से नाच रही जोति और रति बाई का डांस, डांस नहीं है बल्कि माहौल खराब करने वाला पेशा है, जबकि उन के बारे में ऐसा कहा जाता है, तो तय है दोहरापन लोगों की सोच में है. जिन्हें सरकार बड़ेबड़े इनाम, तमगे और खिताब देदे वह कला हो जाती है और ये कलाकार, जिन के हिस्से में हवाईयात्रा, बड़े बंगले और एयरकंडीशन वगैरा तो दूर की चीजें हैं, पेटभर खाने के लाले पड़े रहते हैं, जाने क्यों कलंक करार दिए जाने लगते हैं.

छपारा के एक युवा पत्रकार हाशिम खान की मानें तो यह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार की हकीकत उजागर करती बात है कि वहां के बाश्ंिदों को रोजगार के लिए यहांवहां भटकना पड़ रहा है. जाहिर है सरकारी योजनाओं का फायदा इन्हें नहीं मिल पा रहा है जिन्हें ले कर बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं. इन के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे, इस की जिम्मेदारी किस की है, कहां गया सर्वशिक्षा अभियान और रोजगार का वादा. इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए.

हाशिम का जोश और आरोप अपनी जगह ठीक है पर गड़बड़ ऊपर से भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परंपरागत व्यवसायों को बढ़ावा देने की बात करते रहते हैं लेकिन वह राजमिस्त्रियों और कुम्हारों तक में सिमटी रहती है.

देशभर में एक अंदाजे के मुताबिक, घुमक्कड़ नाचनेगाने वालियों की तादाद सवा करोड़ से भी ज्यादा है पर इन के लिए न कुछ सोचा जा रहा, न ही कुछ किया जा रहा. मानो नाचगाना कोई गुनाह हो.

गांवगांव घूम कर आम और खास लोगों का दिल बहलाने वाली ये डांसर्स उम्रभर तपती हैं, तब कहीं जा कर अपना और अपने घरवालों का पेट भर पाती हैं. इस पर भी तरहतरह की जिल्लतें, जलालतें और दुश्वारियां इन्हें उठानी पड़ती हैं.

इन्हें समाज में बराबरी का दरजा या इज्जत न मिले, यह खास हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है इन्हें दोयम दरजे का मानना, इन्हें धकियाना व धकेलना और इन पर घटिया इलजाम लगाना.

बदलाव इतनाभर आया है जो इन के लिहाज से अच्छा है या बुरा, यह तय कर पाना मुश्किल है कि अब धार्मिक जलसे छोटी जाति वाले भी करने लगे हैं और झांकियों में भी अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करने लगे हैं, इसलिए वे इन छोटी जाति वालों व डांसर्स को बुलाने लगे हैं, नचाने लगे हैं और पैसा बरसाने लगे हैं. यह बात ऊंची जाति वालों को रास नहीं आ रही, मानो भगवान को पूजने और खुश करने का हक उन्हीं को है.

धर्म के नाम पर छोटी जाति वाले कैसेकैसे ठगे जा रहे हैं, यह अलग मुद्दा है पर इन डांसर्स का इस में अहम रोल है जो गणेश और दुर्गा की झांकियों में नाचगा कर रौनक ला देती हैं.

नोटबंदी की मार

छपारा की डांस पार्टी शिकायतों और दबाव में आ कर नहीं गई, पर 8 नवंबर की नोटबंदी इन डांसर्स को भी महंगी पड़ी. जैसे ही बड़े नोटों का चलन बंद हुआ तो अफरातफरी मच गई और नोटों की कमी की मार इन छोटे स्तर की डांसर्स पर भी पड़ी. मुंबई के डांस बार हों या देहात के नाचनेगाने वाले कलाकार, सभी को पैसों के लाले पड़ गए.

छोटी जगहों में डांसरों पर छोटे नोट ज्यादा लुटाए जाते हैं. जब उन का ही टोटा पड़ गया तो इस डांस पार्टी ने राजनांदगांव वापस जाने में ही भलाई समझी.

अब आने वाले कल को ले कर जोति बाई पसोपेश में है कि क्या होगा. सालभर की कमाई का कोटा पूरा नहीं हुआ था. इसलिए खानेपीने की समस्या सब लोगों के सामने मुंहबाए खड़ी है. नोटों की किल्लत के चलते इन का पूरा हिसाबकिताब गड़बड़ा गया है.      

शस्त्रों की होड़ में पिसती शांति

संयुक्त राष्ट्र संघ की बच्चों के उत्थान के लिए काम करने वाली एजेंसी यूनिसेफ यानी यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रैंस फंड का आकलन है कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही रहे तो इस साल 80 हजार बच्चों पर मौत का साया मंडरा रहा है. यूनिसेफ ने यह आकलन नाइजीरिया के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए लगाया है. उस के मुताबिक, नौर्थईस्ट नाइजीरिया में इस साल 5 लाख बच्चों को भुखमरी का सामना करना पड़ सकता है. वहीं, बोको हराम की वजह से पैदा हुए मानवीय संकटके कारण 80 हजार बच्चों को अगर इलाज की सुविधा नहीं मिली तो उन की मौत हो सकती है. इस तरह, अकेले नाइजीरिया में ही हजारों बच्चों का भविष्य अधर में है. वहीं, दूसरी ओर सीरिया के अलेप्पो में राष्ट्रपति बशर अल असद की सेनाओं ने शहर के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा कर लिया है. ऐेसे में अलेप्पो के पूर्वी हिस्से में विद्रोहियों के कब्जे वाले छोटे से इलाके में फंसे लोगों ने भावुक अंतिम संदेश भेजे हैं. सीरियाई सेना की तेज बमबारी के बीच इन लोगों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की. अपने ट्वीट में कार्यकर्ता लीना ने लिखा कि पूरी दुनिया के लोगों, सोना मत. आप कुछ कर सकते हो. प्रदर्शन करो, यहां के नरसंहार को रोको.

अपने वीडियो संदेश में लीना ने कहा कि घेराबंदी में फंसे अलेप्पो में नरसंहार हो रहा है. यह मेरा अंतिम वीडियो हो सकता है. असद के खिलाफ विद्रोह करने वाले 50 हजार से अधिक लोगों पर नरसंहार का खतरा है. लोग बमबारी में मारे जा रहे हैं. अलेप्पो को बचाओ, इंसानियत को बचाओ. कई संदेशों में उम्मीद खत्म होती दिखती है. एक वीडियो में एक व्यक्ति कह रहा है कि हम बातचीत से थक गए हैं. कोई हमारी नहीं सुन रहा है. वह देखो, बैरल बम गिर रहा है. यह वीडियो बम गिरने की आवाज के साथ खत्म होता है. सुबह उठा एक व्यक्ति लिखता है, ‘क्या मैं अभी जिंदा हूं?’ भारत व पाकिस्तान के बीच वर्ष 1971 में हुए युद्घ में 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने दुश्मन के 93 हजार सैनिकों को, आत्मसमर्पण कराने के बाद, बंदी बना लिया था. बंदी बनाए गए इन सैनिकों की, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के अडि़यल रवैए के कारण, ढाई वर्ष तक भारत को मजबूरी में मेहमाननवाजी करनी पड़ी. एक जिद्दी प्रधानमंत्री के कारण हजारों सैनिकों तथा उन के परिवारजनों को कष्ट झेलना पड़ा. भारत को भी उन की सुरक्षा तथा खानेपीने के लिए भारी खर्च करना पड़ा.

पिछले 20 सालों से चल रहे प्रोजैक्ट का नतीजा है कि भारत ने इंटरकौंटिनैंटल बैलिस्टिक मिसाइल का 5वां टैस्ट सफलतापूर्वक कर लिया है. अग्नि-5 मिसाइल एटमी हथियार ले जाने की क्षमता रखती है तथा 5,500 किलोमीटर तक मार कर सकती है. चीन भी इस की जद में है. मिसाइल का चौथा टैस्ट जनवरी 2015 में किया गया था. रक्षा मामलों में होने वाले खर्च में भारत ने रूस को पछाड़ा. पहले नंबर पर अमेरिका, दूसरे पर चीन, तीसरे स्थान पर ब्रिटेन, चौथे पर भारत तथा 5वें स्थान पर रूस है. रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि इस के मुताबिक, वर्ष 2018 में ब्रिटेन को पछाड़ते हुए भारत सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा, क्योंकि पिछली सरकारों ने इस कार्यक्रम पर बहुत पैसा खर्च किया था. लेकिन व्यापक विनाश के हथियार आतंकियों के हाथों न पड़ें, इस मुद्दे को भारत ने यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में जोरदार तरीके से उठाया है. विश्व की शांति की सब से बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधि तन्मय लाल ने कहा कि विनाशकारी हथियार को आतंकियों के हाथ में पहुंचने से रोकने के लिए हुआ समझौता देशों की सरकारों को जल्द से जल्द स्वीकार करना चाहिए. पाकिस्तान की सेना के संरक्षण में वहीं रह रहे आतंकवादी हाफिज सईद ने अपने योग्य व तेजतर्रार छात्रों से दूसरे देशों के न्यूक्लियर शोध संस्थानों में दाखिला लेने की अपील की है. यह दुनिया के लिए चिंता का विषय है. आतंकवादियों का विभिन्न नागरिकताओं का कौकेटेल बड़ी तादाद में अलगअलग देशों में नुकसान पहुंचाने की घातक योजना बना रहा है. अपनी सुविधा व सुरक्षा के लिए किए तकनीकी विकास द्वारा मानव ने, नासमझी से, दुनिया को ही खत्म करने के सारे इंतजाम कर लिए हैं. क्यूबा देश ने चेक रिपब्लिक देश का कर्ज चुकाने के लिए अनोखा औफर दिया है. शीतयुद्घ के दौरान लिए गए कर्ज को उतारने के लिए उस ने रुपए की जगह रम शराब देने की पेशकश की है.

चेक रिपब्लिक के वित्त मंत्रालय ने बताया कि क्यूबा सरकार की ओर से 18 अरब रुपयों (222 मिलियन पाउंड) का कर्ज शराब के रूप में चुकाने का प्रस्ताव रखा गया है. क्यूबा ने कहा है कि वह रुपयों के बदले उतने ही मूल्य की रम शराब देगा और किस्तों में कर्ज चुकाएगा. अगर चेक रिपब्लिक क्यूबा के इस प्रस्ताव को मान लेता है तो उस के पास इतनी रम शराब जमा हो जाएगी जो शायद आने वाले 100 साल में भी खत्म न हो.

युद्ध के नाम पर कर्ज

इस तरह के मामले दिखाते हैं कि कुछ देशों की अर्थव्यवस्था शराब, अफीम तथा घातक हथियारों के वृहद उत्पादन पर निर्भर होती जा रही है. क्यूबा ने यह कर्ज शीतयुद्घ के दौरान अपने शत्रु अमेरिका को डराने के लिए हथियार खरीदने के लिए लिया था. इन देशों की युद्घ के नाम पर अपने नागरिकों को कर्जे में लादने तथा किसी भी तरीके से अपनी तथा अपने नागरिकों की आय बढ़ाने की नीयत खोटी है. यह नीति शराबखोरी, नशाखोरी तथा घातक शस्त्रों की होड़ को बढ़ा रही है.

साउथ चाइना सी में चीन अति आधुनिक तथा मारक मिसाइलें तैनात कर रहा है. सैटेलाइट से ली गई तसवीरें इस सत्य को दुनिया के सामने उजागर कर रही हैं. चीन ने अपने मिलिटरी पावर का प्रदर्शन करने के लिए वहां पर जोरदार युद्घ अभ्यास भी किया है. साउथ चाइना सी के द्वीपों को ले कर दक्षिणपूर्व एशिया के अन्य देश भी अपना अधिकार व्यक्त कर चुके हैं. और वे भी चीन से मुकाबले को तैयार हैं. चीन की प्रभावी क्षेत्र विस्तार की नीति पूरे विश्व के लिए खतरा बन गई है. अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताईवान से बातचीत करने पर बीजिंग ने अमेरिका को धमकी दे डाली है. सीमा विवाद को ले कर भारत का चीन के साथ हमेशा तनाव बना रहता है.

विश्व के अनेक गरीब देश शिक्षा की दयनीय हालत से जूझ रहे हैं. सरकारों को जो पैसा शिक्षा जैसे सब से महत्त्वपूर्ण कार्य पर खर्च करना चाहिए, विश्व में शक्तिशाली देशों की गलत नीतियों तथा शोषण की प्रवृत्ति के कारण गरीब तथा छोटे देशों को अपने रक्षा बजट पर खर्च करना पड़ रहा है. बड़े देश घातक तथा अधिक मारक शस्त्रों का निर्माण कर के उस की बिक्री बढ़ाने के लिए नएनए हथकंडे अपनाते हैं. विश्व के सभी छोटेबड़े देशों का रक्षा बजट प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है. कभी आप ने सोचा है कि देश की अर्थव्यवस्था अगर बहुत बुरी हालत में चली जाए या फिर आप कंगाल हो गए, तो क्या करेंगे? नौर्वे में एक प्रथा है कि स्कूली पढ़ाई खत्म होने पर लगभग 18 वर्ष की उम्र में लोग बहुत कम पैसों के साथ बच्चों को अफ्रीका भेज देते हैं. वहां कोई होटल बुकिंग नहीं होती. कोई साथी नहीं होता. वे टैंट वगैरा में रेगिस्तान में रहते हैं, कुछ भी खातेपीते हैं. इस बीच, वे कई चीजें सीखते हैं, जीवन का मूल्य समझते हैं. इस प्रकार नौर्वे के बच्चे विश्व में बढ़ते शरणार्थियों को गाली नहीं देते, क्योंकि वे उन का कठिन जीवन देख चुके होते हैं. गरीबी का दर्द गरीब व्यक्ति ही बेहतर तरीके से समझ सकता है. नौर्वे ने चांद तथा मंगल पर अपने रौकेट नहीं भेजे लेकिन वह देश विश्व में अपने वृद्घों को सभी प्रकार की सुविधाएं देने में सब से आगे है. विश्व के सभी देशों के नीतिनिर्माताओं को नौर्वे से अच्छी सीख ले कर उसे अपने देश में भी अपनाना चाहिए. हमें 100 वर्षों की दीर्घकालीन योजनाएं बनाने से पहले अपने देशप्रदेश के सब से अंतिम व्यक्ति के हित को ध्यान में रख कर विकास की योजनाएं बनानी चाहिए, न कि सब से घातक शस्त्र बनाने की होड़ में पड़ने के और झूठे राष्ट्रवाद व देशभक्ति के नारे लगाने के.      

औनलाइन बिक्री में रिश्ते भी

अपनेपन से पनपने वाले रिश्ते यों तो अनमोल होते हैं लेकिन अगर यही रिश्ते कुछ कीमत में या किराए पर मिल जाएं तो? यह सवाल इसलिए है कि अब तकनीक के दौर में रिश्ते औनलाइन शौपिंग वैबसाइटों पर प्यार की गारंटी के साथ तय समय के लिए भी मिलने लगे हैं. पत्नी के प्यार के साथ, मातापिता ममता के दिखावे के साथ तो बच्चे फैमिली पैकेज के तौर पर डिस्काउंट के साथ उपलब्ध हैं, वह भी एक फोन कौल पर. अभी तक ये हालात जापान और चीन जैसे देशों में थे, लेकिन कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जल्दी ही भारत में भी इन की शुरुआत हो जाए. ऐसा अंदेशा उन घटनाओं से जन्म ले रहा है जो बीते कुछ समय में सामने आई हैं जिन में पत्नी की बोली पति ने औनलाइन लगा दी तो सास से त्रस्त बहू ने सास को ही बेचने का विज्ञापन औनलाइन चस्पां कर दिया. पत्नी ने पति को कम कीमत में बेचने का विज्ञापन दे डाला.

उन लोगों के लिए यह सुनना अजीब हो सकता है जिन्होंने रिश्तों की बुनियाद को प्रेम से सींचते देखा है, लेकिन रिश्तों की अहमियत से बेफिक्र और ब्रेकअप, बौयफ्रैंड जैसी पश्चिमी संस्कृति में रंगे एक खास तबके के लिए यह एक सहूलियत और अवसर है. यही वजह है कि अब रिश्ते औनलाइन दुकानों पर बिक रहे हैं. साथ ही, ब्रेकअप कराने वाली वैबसाइट्स भी वजूद में आ गई हैं जो ब्रेकअप को ज्यादा रोचक व आसान बना रही हैं. भारत जैसे देश में इस तरह की घटनाएं इसलिए भी ज्यादा ध्यान खींचती हैं क्योंकि यहां रिश्तों की मर्यादा जिंदगी से भी बड़ी मानी जाती है. इस के बावजूद इसी देश में औनलाइन दुकानों पर किफायती कीमत पर रिश्तों का कारोबार जन्म ले रहा है.

हालांकि ऐसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं जब जिगर के टुकड़े चंद रुपयों में बेच दिए गए तो बेटियों, पत्नियों के भी खरीदनेबेचने के मामले सुने गए, जो कभी पेट की खातिर तो कभी परंपरा के नाम पर अंजाम दिए गए. मगर ये चंद ही घटनाएं है जो अज्ञानता और भुखमरी की तसवीरें बयां करती हैं, लेकिन तकनीक से कदम मिला कर चलते उन लोगों की सोच पर कौन लगाम लगाए जो रिश्तों की बोली भी लगा रहे हैं और इन की खरीदफरोख्त भी कर रहे हैं.

औनलाइन संस्कृति

अपनी आदर्श संस्कृति के लिए मशहूर देश भारत में कोई भी धर्ममजहब हो, दासप्रथा जैसी बुराइयों से सभी त्रस्त रहे. नए हिंदुस्तान में इस बुराई को कानून बना कर दूर करने की कोशिश की गई. इस से काफी रोक भी लगी. इस के बावजूद महाराष्ट्र के नांदेड़ के वैधु समाज जैसे कुछ समुदायों में परंपराओं के नाम पर चोरीछिपे बेटियों को बेचने का चलन आज भी जारी है. लेकिन, यहां सवाल उस नई प्रथा की शुरुआत का है जिसे आज की औनलाइन संस्कृति जन्म दे रही है. रिश्तों के कारोबार के चलन से यह आशंका भी जोर पकड़ रही है कि कहीं यह चलन समाज को खींच कर फिर उसी कबीलाई दौर की तरफ न ले जाए जहां इंसान बेचेखरीदे जाते थे. दासप्रथा में तो फिर भी दूसरे समुदाय के बंदी बनाए गए लोगों को बेचा जाता था लेकिन इस नए समाज में तकनीक घर बैठे सास, पत्नी और पति को बेचने की सहूलियतें भी मुहैया करा रही है, जो समाज के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक है.

ऐसी ही एक घटना ने रिश्तों  को शर्मसार कर दिया जब पति ने ही पत्नी की औनलाइन बोली लगा दी. हरियाणा के पटियाकार गांव में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को पौर्न फिल्ममेकर को बेच दिया क्योंकि पत्नी दहेज नहीं लाई थी और उसे दहेज की कीमत वसूल करनी थी. मार्च 2016 में मिनी मुंबई के नाम से मशहूर मध्य प्रदेश के इंदौर में दिलीप माली ने अपनी पत्नी और बेटी की बोली सोशल साइट पर लगा दी. इस के लिए उस ने सोशल साइट पर पत्नी और बेटी की फोटो अपलोड की और लिखा, ‘‘मैं कर्ज के बोझ तले दबा हूं, मुझे किसी को पैसे लौटाने हैं, इसलिए मुझे रुपयों की जरूरत है. जो मेरी बीवी, बच्ची को खरीदना चाहे, मुझ से संपर्क करे.’’

उस ने पत्नी की कीमत भी तय कर दी 1 लाख रुपए. साथ ही, अपना मोबाइल नंबर भी दर्ज कर दिया ताकि लोग आसानी से उस से संपर्क कर सकें.

अपना प्राइस टैग

वहीं, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो रातोंरात अमीर बनने के ख्वाब देखते हैं और इस सपने को साकार करने की कोशिश में वे अपनी ही बोली लगा देते हैं. आईआईटी खड़गपुर के एक छात्र आकाश नीरज मित्तल ने खुद को फ्लिपकार्ट पर बेचने की कोशिश की. इस के लिए उस ने फ्लिपकार्ट की वैबसाइट पर खुद ही एक विज्ञापन भी चस्पां कर डाला. साथ ही, छात्र ने विज्ञापन में अपनी कीमत 27,60,200 रुपए भी लिखी और फ्री डिलीवरी का विकल्प भी दिया. उच्च शिक्षित युवा की ऐसी सोच किस तरह के समाज को गढ़ रही है, समझा जा सकता है.

वर्ष 2015 में औनलाइन खरीदफरोख्त का ऐसा एक मामला सामने आया जिस ने सोचने पर मजबूर कर दिया था. सासबहू सीरियल बुद्धूबक्से पर महिलाओं के मनोरंजन का खास जरिया बनते रहे हैं. इन में खासकर सासबहू के रिश्तों की जो कड़वाहट परोसी जाती है उस ने भी महिलाओं की सोच को काफी हद तक प्रभावित किया है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि नफरत की आग में जल रही एक बहू ने शौपिंग साइट पर अपनी सास की तसवीर को न सिर्फ अपलोड किया बल्कि उस ने शब्दों में भी अपनी नफरत उजागर की. कंपनी की साइट पर विज्ञापन में उस ने लिखा, ‘‘मदर इन-ला, गुड कंडीशन, सास की उम्र 60 के करीब है, लेकिन कंडीशन फंक्शनल है, आवाज इतनी मीठी कि आसपास वालों की भी जान ले ले. खाने की शानदार आलोचक. आप कितना ही अच्छा खाना बना लें, वे खामी निकाल ही देंगी. बेहतरीन सलाहकार भी हैं. कीमत कुछ भी नहीं, बदले में चाहिए दिमाग को शांति देने वाली किताबें.’’

कीमत के स्थान को खाली छोड़ दिया गया. इस तरह का विज्ञापन देख वैबसाइट ने कुछ ही देर में विज्ञापन हटा दिया. बहू की इस हरकत को आईटी कानून के तहत अपराध माना गया और उस के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही हुई. एक महिला ने क्विकर के पैट्स सैगमैंट में अपने पति की फोटो डाल कर लिखा था, ‘हसबैंड फौर सेल’ और पति की कीमत मात्र 3,500 रुपए. उस ने पैट टाइप में लिखा था, ‘‘हसबैंड, कीमत 3,500 रुपए.’’ वहीं, इसी साइट पर एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को मात्र 100 रुपए में बेचने का विज्ञापन इन शब्दों के साथ दिया, ‘‘यह आदर्श पत्नी है, घर का काम बहुत अच्छे से करती है पर बोलती बहुत है, इसलिए इतने कम दाम में बेच रहा हूं.’’

कुछ भी बेचने की संस्कृति

रिश्तों की यह कौन सी परिभाषा है जो नएपन के इस दौर में लोेगों में अपनेआप  ही पनपने लगी है. कुछ भी बेच दो की संस्कृति कम से कम भारतीय समाज के स्वभाव से तो मेल नहीं खाती. हालांकि इसी समाज में कुछ लोग अपने बच्चों का सौदा करते रहे हैं. बिहार राज्य के गरीबी से त्रस्त लोग बेटियों को बेचने के लिए बदनाम हैं ही. वहीं, हरियाणा में बेटियों को पेट में ही मारने के चलन के साथ महिलाओं को खरीद कर उन से विवाह करने के मामले सामने आना नई बात नहीं है. गरीबी और प्राकृतिक आपदाओं से तबाह हुए लोगों के बारे में भी सामने आता रहा है कि वे कुछ वक्त की रोटी के लिए अपने बच्चों को बेचने पर मजबूर हो जाते हैं. बीते साल पटना के नंदनगर में पति की प्रताड़ना और आर्थिक तंगी से मजबूर एक महिला ने अपनी दुधमुंही बच्ची को महज 10 हजार रुपयों के लिए बेच दिया.

जुलाई 2015 में रांची के करमटोली की गायत्री ने भुखमरी से तंग आ कर अपनी 8 माह की बेटी को 14 हजार रुपए में बेचा. इसी साल मध्य प्रदेश के मोहनपुर गांव के एक किसान लाल सिंह ने 1 साल के लिए अपने 2 बेटों को 35,000 रुपयों में बेच दिया. वजह थी तबाह हुई फसल और कर्ज. उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक महिला का बयान रिश्तों के खोखलेपन को उजागर कर गया जब उस ने अपने पति पर अपने ही 5 बच्चों को बेचने का आरोप लगाया. वहीं बुंदेलखंड के सहरिया आदिवासी लोगों द्वारा कर्र्ज की वजह से अपने बच्चों को बेचने की घटनाएं देश की बदहाली की दास्तां पेश करती रही हैं. भारत और इंडिया दोनों में ही इंसानों को बेचने का चलन जारी है, फिर वजह चाहे खुशी से किसी को खरीदने की हो या बदहाली में बेचने की. हर हाल में यहां इंसान बिक रहे हैं. ऐसे में भला भविष्य में संबंधों के प्रति सम्मान की संस्कृति बने रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

नया समाज, कुरीतियां पुरानी

यह कैसा नया समाज है जहां पुराने समाज की कुरीतियां आधुनिकता के नाम पर अपनाई जा रही हैं. जापान में तो ‘रैंट ए वाइफ औटटावा डौट कौम’ नाम की वैबसाइट बनी हुई है जिस पर मांबाप, पत्नी और पति किसी भी रिश्ते को किराए पर लेने की सुविधा दी जा रही है. वहीं, चीन जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश में भी बेच दो संस्कृति पैर पसारे हुए है. वहां के फुजियान प्रांत में एक दंपती ने अपनी 18 माह की बच्ची को महज 3,530 डौलर यानी 2.37 लाख रुपए में सिर्फ इसलिए औनलाइन बेचने का विज्ञापन पोस्ट किया क्योंकि उन्हें आईफोन खरीदना था. एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में हर साल 2 लाख बच्चों का अपहरण कर उन्हें औनलाइन बेचा जाता है.

वहीं, अमेरिका में एक आदमी ने अपनी बाइक के साथ अपनी पत्नी की फोटो भी औनलाइन सेल के लिए डाल दी और लिखा, ‘‘मेरी बाइक 2006 की मौडल है और मेरी पत्नी 1959 मौडल है जो दिखने में बहुत ही खूबसूरत है.’’ ब्राजील में 2013 में एक व्यक्ति का अपने बच्चे को बेचने का औनलाइन विज्ञापन चर्चा का विषय बना था, क्योंकि वह बच्चे के रोने के शोर से बचने के लिए उसे बेचना चाहता था. देशदुनिया में इंसान नहीं बिक रहे, बल्कि औनलाइन पशुओं को बेचने की भी शुरुआत हो गई है और इंसानों की कीमत से कहीं ज्यादा में पशु बिक रहे हैं. साथ ही, उन के गोबर की भी बिक्री हो रही है. दिसंबर 2014 में अमेरिका में औनलाइन कंपनी ‘कार्ड्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी’ ने 30 हजार लोगों को महज 30 मिनट में गोबर तक बेच दिया. लोगों ने गोबर क्यों खरीदा, यह जिज्ञासा का विषय हो सकता है.

मनपसंद डेटिंग पार्टनर

आखिर औनलाइन खरीदारी की तरफ लोगों का अंधझुकाव क्यों है? इस की वजह शायद आकर्षक औफर और घरबैठे खरीदारी की सहूलियत है. एसोचैम और प्राइसवाटर हाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) ने अपने अनुमान में कहा है कि बाजार में सुस्ती के बावजूद 2017 में औनलाइन शौपिंग में 78 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना है. 2015 में यह 66 फीसदी थी. लोगों के इसी रुझान को देख कर वे लोग भी लाभ उठाने को तैयार बैठे हैं जो औनलाइन इंसानी रिश्तों को बेचने के मौके तलाश रहे हैं. तकनीक ने ऐसे लोगों के हाथ में औनलाइन खरीदारी के तौर पर एक नया विकल्प दे दिया है. इतना ही नहीं, रिश्तों के साथ ही किसी महिला या पुरुष के साथ वक्त गुजारने का जरिया भी कुछ वैबसाइट दे रही हैं. हाल में महिलाओं के लिए डेटिंग औनलाइन शौपिंग वैबसाइट्स लोगों की तवज्जुह अपनी तरफ खींच रही है. इस पर महिलाएं अपनी पसंद का पुरुष चुनने, उन के साथ डेटिंग करने की सहूलियत पा सकती हैं.

अमेरिकी समाचारपत्र ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इंटरनैट डेटिंग का ट्रैंड तो बढ़ ही रहा है, साथ ही अपराध भी पनप रहा है. वहीं कुछ साइट्स समलैंगिकों के लिए भी जारी हैं. चूंकि भारत में इस तरह के रिश्ते अपराध माने जाते हैं, ऐसे में समलैंगिक औनलाइन डेटिंग के जरिए अपना पार्टनर तलाश कर रहे हैं. इस के लिए कई साइट्स औनलाइन डेटिंग ऐप, ग्रिडर, एलएलसी, प्लैनेट रोमियो बीवी ऐप्स उपलब्ध करा रही हैं. भारत में ये ऐप्स काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. इंटरनैट, औनलाइन खरीदारी जैसी सहूलियतें जीवन को आसान बनाने के लिए हैं, मगर इन्हीं पर रिश्तों का मजाक बन रहा है. प्राइस टैग के साथ औनलाइन रिश्तों की बिक्री समाज में किस तरह का बदलाव लाएगी, समझने की जरूरत है.

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