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कुछ कहती हैं तसवीरें

देश का जलसा : गणतंत्र दिवस की शान निराली होती है. एक ओर विशाल टैंकों की कशिश होती है, तो दूसरी ओर नवयुवतियों की अठखेलियां होती हैं. एनसीसी की पोशाक में भारतीय बाला कुछ खास ही लग रही है.

खेती की माटी से तिलक दरकिनार होते किसानों के मुद्दे

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में देश का सब से बड़ा किसान वर्ग किसी राजनीतिक दल के एजेंउे में नहीं है. जो लोग किसानों की बात कर भी रहे हैं, वे उन को बरगलाने का काम कर रहे हैं. कोई कर्ज देने की बात कर रहा है, तो कोई कर्ज माफ कराने का दम भर रहा है. केंद्र में सरकार चला रही भाजपा तो किसानों को खेत की माटी का तिलक लगा कर रिझाने की कोशिश कर रही है. किसान चाहते?हैं कि उन की पैदावार बेकार न हो. उस का पूरा दाम मिले. ऐसे मुद्दे किसी पार्टी के लिए अहम नहीं रह गए हैं. किसानों को चाहिए कि वे जाति और धर्म की बातें छोड़ कर किसानी के मुद्दों को ले कर एकजुट हो कर वोट करें. तभी वे चुनाव में मुद्दा बन सकेंगे. 

उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव का चुनावी उत्सव शुरू हो चुका है. सब से बड़ी बात यह कि इन चुनावों में एक बार फिर से किसान के मुद्दे गायब हो रहे हैं. केवल किसानों को रिझाने के लिए ‘खेती की माटी से तिलक’ जैसे दिखावे हो रहे हैं. बात केवल किसी खास दल की नहीं है. सभी दलों में किसानों के मुद्दे केवल घोषणापत्र तक सीमित रह जा रहे हैं. चुनाव से पहले ‘खाट सभा’ कर के किसानों के हित साधने वाली कांग्रेस चुनाव में किसानों को भूल गई है.

कांग्रेस केवल किसानों के कर्ज माफ, बिजली बिल हाफ व समर्थन मूल्य का हिसाब जैसी बातें करती है. चुनाव से पहले कांग्रेस ने ‘27 साल यूपी बेहाल’ का नारा दिया. चुनावी रणनीति के तहत उसे समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करना पड़ा, जिस की कई बार प्रदेश में सरकार रही है. ऐसे में अब यह नारा प्रभावी नहीं रह गया है. ‘खाट सभा’ में किसानों के मुद्दे उठा कर कांग्रेस को एक बढ़त मिली थी. बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में किसानों ने कांग्रेस का समर्थन किया. कांग्रेस ‘खाट सभा’ के असर को आगे नहीं बढ़ा पाई. गांवों में कांग्रेस के लोगों ने जो असर पैदा किया था, वह खत्म हो गया. सपा से गठबंधन के बाद तो गांव और किसान जैसे मुद्दे पीछे छूट गए. केवल कांग्रेस ही नहीं समाजवादी पार्टी भी किसानों के मुद्दों को ले कर चुनाव में जाती नहीं दिख रही है. अपने घोषणापत्र में सपा ने गांवों में रहने वाली महिलाओं को कुकर और दूसरे लोगों को स्मार्टफोन देने जैसे वादे किए पर किसानों के लिए सही तरह से बात को नहीं उठा पाए.

सपा को किसानों की हितैषी पार्टी माना जाता है. सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव किसानों से जुड़े रहे और किसान आंदोलन से ही उन की राजनीति शुरू हुई थी. अब पार्टी में मुलायम राज खत्म हो गया है. ऐसे में किसानों के मुद्दे भी पीछे छूट गए हैं. देखा जाए तो अखिलेश सरकार ने किसानों के लिए बहुत सारे काम किए?हैं. इस के बाद भी चुनाव में वह बहुत कुछ करते नहीं दिख रही. किसानों को ले कर कोई बड़ी घोषणा नहीं हो सकी है. परिवार विवाद के बाद सपा किसानों के बजाय दूसरे मुद्दों पर फोकस करने लगी है. सपा और कांग्रेस से अलग बहुजन समाज पार्टी तो पूरी तरह से किसानों से दूर है.

यह बात जरूर है कि बसपा का सब से बड़ा वोट बैंक गांवों में रहता है. बसपा की नजर किसानों की बजाय उन गांवों पर है, जहां पर किसान रहते हैं. किसानों को ले कर कोई खास एजेंडा बसपा के पास नहीं है. बसपा केवल गरीबों और गांवों की बात करती है. पार्टी की सोच है कि गांव में किसान ही रहते हैं. ऐसे में जब गांवों की बात होगी तो किसानों की बात ही हो जाएगी. किसानों को ले कर कभी साफ योजना नहीं दिखी.

इन पार्टियों से अलग भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को मुद्दा तो बनाया, पर उसे केवल दिखावे भर के लिए रखा. भाजपा की सब से बड़ी चिंता गांवों को ले कर है. वहां पर नोटबंदी के बाद पार्टी का विरोध है. उसे कम करने के लिए भाजपा ने गांवों में किसानों के खेतों की माटी से उन का तिलक करने की योजना शुरू की. इस योजना को पूरा करने से पहले ही भाजपा ने अपना एजेंडा बदल दिया. अब उस ने परिवारवाद को बढ़ावा देने जैसे दूसरे काम शुरू कर दिए. भाजपा ने प्रदेश के लोगों को एक बार फिर से राममंदिर का लालच देते हुए कहा कि अगर उन की पार्टी का बहुमत आया तो अयोध्या में राम मंदिर बनेगा.

असल में केंद्र सरकार से किसानों को बहुत सारी उम्मीदें थीं. केंद्र सरकार ने अपने ढाई साल के कामकाज से ऐसा कुछ भी संकेत नहीं दिया कि वह किसानों के मुद्दों पर काम कर रही है. नोटबंदी से आई मंदी का सब से ज्यादा शिकार किसान ही हुए हैं.

नोटबंदी के बाद से किसानों की हालत बेहद खराब हो गई है. लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र सरकार ने आदर्श ग्राम योजना चलाई. इस के तहत हर सांसद को 1 गांव का चुनाव कर के उस का विकास करना था. 1 साल के बाद प्रधानमंत्री की यह योजना पटरी से उतर गई. अब एक बार फिर से चुनाव आ गए हैं और भाजपा ने किसानों के माटी से तिलक करने की योजना शुरू की है. भाजपा ने किसानों को ले कर भावुकता जरूर दिखाई, पर असल मुद्दों को दरकिनार कर दिया है.

मंदिरमस्जिद की राजनीति और धर्म बिरादरी की राजनीति से किसानें को नुकसान हुआ है. 1990 से पहले चुनावों में किसानों से जुडे़ मुद्दे उठते थे. किसानों के लोन माफ करने की शुरुआत प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने की थी. इस के जरीए मूल मूद्दों से किसानों को भटकाने का काम किया गया.

किसान इस बात को समझ नहीं पाए. आज भी किसानों को बरगलाने का यह काम जारी है. किसानों को खुद पर भरोसा कर के एकजुट होना पड़ेगा. जो किसान धरती की छाती चीर कर फसलें उगा सकते हैं, वे अपनी लड़ाई लड़ सकते हैं. बस उनहें एकजुट होने की देर है. उन के एकजुट होते ही राजनीतिक दल उन के आगेपीछे घूमते नजर आने लगेंगे. देखा जाए तो इस के लिए किसान ही दोषी हैं. वे अपने मुद्दों के बजाय जाति और धर्म को ले कर वोट देने लगे हैं.

अगर किसान एकजुट हो जाएं तो उन से बड़ा कोई दूसरा वोटबैंक नहीं है. इस के बाद भी किसान अपनी बात को ठीक तरह से सब के सामने रख नहीं पा रहे?हैं. राजनीतिक दल किसानों को जाति और धर्म में फंसा कर उन की जरूरतों से दूर रखना पसंद करते हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में ही नहीं, पंजाब के चुनाव में भी किसानों की बात कोई नहीं कर रहा है.

अगर किसान ही अपनी बात नहीं रखेंगे, तो दूसरे लोग उन की बात क्यों करेंगे? अगर किसानों का भला करना है, तो कर्ज जैसी बातों से दूर खेती पर ध्यान देना होगा. किसानों की पैदावार ज्यादा हो तो उन को नुकसान न हो. उन्हें अपने आलू, टमाटर और प्याज सड़कों पर न फेंकने पड़ें. यह भी देखना होगा कि किसानों की कमाई का लाभ बिचौलियों को न मिले.

क्या कहते हैं जानकार

‘उत्तर प्रदेश’ में आधे से ज्यादा किसानों के खेतों की गुणवत्ता सही नहीं है. वे ज्यादा से ज्यादा फसल पैदा करने के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशाकों का बेहिसाब इस्तेमाल करते हैं. इस से खेती की लागत बढ़ती है और मुनाफा कम होता है. जमीन प्रबंधन के साथ ही साथ किसान कई तरह के कानूनी जालों में उलझ कर खेती के लिए पूरा समय नहीं दे पाते. प्रदेश के बहुत सारे हिस्सों में बाढ़ एक बड़ी परेशानी है. जब तक इस का हल नहीं होगा, किसानों के हालात नहीं सुधर पाएंगे.

‘देश में तमाम सारे उत्पादन करने के कारखाने हैं. इन सभी को अपने उत्पादनों के मूल्य तय करने का अधिकार होता है. केवल किसान ही अकेला ऐसा है, जिस के उत्पादनों के मूल्य सरकार तय करती है. किसानों को वोट देने से पहले सभी चुनाव लड़ रहे नेताओं से पूछना चाहिए कि वे उन की समस्याओं के बारे में क्या जानते हैं और उन को कैसे दूर करेंगे?’                                      

    – नागेंद्र बहादुर सिंह चौहान, लेखक                                               

‘जब देश में तकनीक का इस्तेमाल कर के 1 लाख की नैनो कार बन सकती है, तो सस्ते किस्म के  ट्रैक्टर और दूसरी खेती की मशीनें क्यों नहीं बनाई जा सकतीं. सरकार ने खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के लिए सहूलियतें देते हुए कहा है कि वे पहले खेती के लिए ढांचे तैयार करेंगे और कोल्ड स्टोर बनाएंगे. ये कंपनियां यह काम कैसे करेंगी, इस बात को बताने के बजाय सरकार मौन है. खेती की दशा सुधारने के नाम पर विदेशी कंपनियां केवल सस्ते में जमीन लेगीं इस के बाद अपने मन से बाकी काम करेंगी. इस से किसानों के साथ ही साथ खुदरा कारोबार भी चौपट हो जाएगा. किसानों को खेती की नईनई जानकारियां देने के लिए सरकार को इंतजाम करना होगा. इस के लिए कृषि स्कूलों को खोलना पड़ेगा. छात्र कृषि शिक्षा की तरफ बढ़ें, इस के लिए नई योजनाएं तैयार करनी होंगी. कृषि से जुड़े कारोबार करने वालों को सुविधाएं देनी होंगी. उत्पाद खरीदने और बेचने में किसानों को लाभ हो, इस का खयाल भी रखना होगा.’                    

    -शशि भूषण, पानी संस्थान

 

 

अमित साध के लिए मोहब्बत पहले, काम बाद में

‘‘क्यों होता है प्यार’’,‘‘गन्स एंड रोजेस’’,‘‘कोहीनूर’’ जैसे टीवी सीरियलों और ‘‘फूंक’, ‘कई पो चे’, ‘गुड्डू रंगीला’, ‘सुल्तान’ व ‘अकीरा’ जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा का जबरदस्त परिचय दे चुके अमित साध की निजी जिंदगी में काफी उतार चढ़ाव रहे हैं. लंबे संघर्ष के बाद जब उनका करियर सही दिशा में आगे बढ़ रहा था, तब उन्होंने अभिनेत्री नीरू बाजवा के संग प्यार किया. और शादी भी की. पर उनका रिश्ता लंबे समय तक टिक नही पाया. जिसका उनकी निजी जिंदगी व करियर पर भी काफी असर पड़ा. आज वेलेनटाइन डे पर जब हमने इसकी तरफ उनका ध्यान दिलाया, तो अमित साध ने माना कि जब ग्रहण लगता है तो समुद्र की लहरों में भी असर पड़ता है, तो फिर इंसान क्या है.

जी हां! जब हमने अमित साध से पूछा कि करियर में जब आप संघर्ष कर रहे होते हैं, उस वक्त जब जिंदगी में उतार चढ़ाव आते हैं, आप किसी से प्रेम व शादी करते हैं. फिर तलाक हो जाता है. मेरे कहने का अर्थ यह हैं कि नीरू वाजवा के साथ आपकी शादी और फिर उसका टूटने का आपके करियर पर कितना असर पड़ा? इस पर अमित साध ने दार्शनिक अंदाज में जवाब देते हुए कहा-‘‘देखिए, हम सभी इंसान हैं. करियर भी हमारी जिंदगी का विस्तारित हिस्सा है, जो कि बहुत कमजोर, नाजुक व भावुक वाला मामला होता है. देखिए, जब ग्रहण पड़ते हैं, तो समुद्र की लहरों में फर्क आ जाता है. हर ग्रहण हर इंसान की जिंदगी पर भी असर डालते हैं. पर हम लोग यह सब मानते नही हैं. हम लोग एक कठोर जिंदगी जी रहे हैं. हम सभी अपने आपको खुदा मानकर सोचते हैं कि हमें दूसरों की वजह से कोई फर्क नहीं पड़ता, जबकि ऐसा नहीं है. मसलन आप मुझसे बात करने आए हैं, यदि आप बहुत कठोर लहजे में बात करें, मुस्कुराएं नहीं, तो कहीं न कहीं वह मेरे दिल को, मेरे अंदर कुछ हलचल जरूर करेगा. मैं तो बहुत ही ज्यादा भावुक और संजीदा इंसान हूं. इसलिए मुझ पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. मेरे शरीर, मेरे स्वास्थ्य, मेरी सोच पर भी असर पड़ा. फिर भी जिंदगी यही है कि हमें इन सब चीजों से लड़ते हुए व जूझते हुए, अपने अंदर की शक्ति को बटोरते हुए फिर से उठ खड़ा होना है. मेरी सोच हमेशा यही रही है कि मोहब्बत पहले, काम बाद में. मैं हर इंसान के साथ खुलकर बात करना पसंद करता हूं. उसके साथ खाना पीना पसंद करता हूं. मैं एकाकी जीवन नहीं जी सकता.’’

कलाकंद दूध और चीनी का मेल

कलाकंद एक तरह की खोए वाली बरफी होती है. यह दूसरी तरह की तमाम बरफियों से अलग होती है. बाकी बरफियां खोए से तैयार होती हैं, पर यह दूध और छेने से तैयार की जाती है. इस की सब से खास बात यह होती है कि यह खाने में छेने और खोए दोनों के मिलेजुले स्वाद का एहसास कराती है. दानेदार बरफी होने के कारण यह दूसरी बरफियों से अलग होती है. जो किसान पशुपालन और दूध उत्पादन का काम करते हैं. वे इसे बना कर रोजगार कर सकते हैं. कलाकंद बरफी को बनाना बेहद आसान होता है. यह 5-6 दिनों तक ही सही रहती है, इसलिए इसे बनाने के बाद इस की जल्द से जल्द खपत का हिसाब लगा लेना चाहिए. कलाकंद बरफी खाने में अलग स्वाद देती है, इसलिए इसे लोग खूब पसंद करते हैं. कलाकंद बरफी दूध और खोए से भी तैयार की जाती है.

कलाकंद बरफी को बनाना भले ही आसान होता हो, पर थोड़ी सी असावधानी होने से दूध के लगने या जलने का खतरा बना रहता है, जो इस के स्वाद को खराब कर सकता है. इस में दूध और चीनी की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जो कलाकंद के स्वाद को बनाए रखते हुए मिठास का एहसास कराए. चीनी स्वाद के मुताबिक होनी चाहिए. इलायचीपाउडर डालने से इस की खुशबू अच्छी हो जाती है. पिस्ता, बादाम और चांदी के वर्क का इस्तेमाल कलाकंद को सजाने के लिए किया जाता है. कलाकंद बरफी को मनचाहे आकार में काटा जाता है.  

बड़ा है बाजार

कलाकंद का बाजार बड़ा है. यह छोटी से बड़ी हर मिठाई की दुकान में मिल जाती है. लखनऊ की रहने वाली मिठाइों की शौकीन जिया आहूजा कहती हैं, ‘वैसे तो कलाकंद ठंडा होने पर खाई जाती है, पर मुझे तो गरमगरम कलाकंद खाने में ज्यादा मजा देती है. कलाकंद जब ताजा होती है, तो ज्यादा अच्छी लगती है.’

कलाकंद का भाव अलगअलग होता है. यह बाजार में 250 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 500 रुपए प्रति किलोग्राम तक में बिकती है. रबड़ी के बाद फ्रेश मिठाइयों में कलाकंद बरफी की मांग सब से ज्यादा होती है. लिहाजा इसे बना कर बेचना फायदेमंद होता है.

मिठाई के बाजार में कलाकंद बरफी का नाम पुराना है. अब इस की मार्केटिंग नए तरह से हो रही है. ऐसे में लोग कलाकंद बरफी की खूब खरीदारी करने लगे हैं. कुछ लोग इसे खरीद कर ले जाते हैं और फिर घरों में इस से खोए वाली गुझिया भी बना लेते हैं. ऐसे में कलाकंद बरफी की अहमियत बढ़ जाती है.

 

कैसे बनाएं कलाकंद

 

 

कलाकंद बनाने के लिए फुल क्रीम वाले दूध को लेना चाहिए. दूध को 2 हिस्सों में बांट लेना चाहिए. एक हिस्से को गरम करने के बाद उस का छेना बनाना चाहिए. छेना बनाने के लिए दूध जब उबलने लगे, तो उसे नीचे उतार लें फिर उस में नीबू के रस की 2-3 बूदें डालें. इस से छेना और दूध का पानी अलगअलग हो जाते हैं. छेना अलग करने के लिए इसे मोटे कपडे़ में छान लें.

अब बचा हुआ दूध गरम करें. उसे तब तक उबालें, जब तक कि वह गाढ़ा हो कर आधा न हो जाए. इसी दौरान उस में छेना मिला दें. इस के बाद जब यह खोए जैसा लगने लगे, तो इस में चीनी भी मिला दें. जब यह गाढ़ा हो कर बरफी जमाने लायक हो जाए तो इस में इलायचीपाउडर मिला दें. अब तैयार मिश्रण को किसी बड़े थाल में ठंडा होने के लिए फैला दें. इस के ऊपर से पिस्ता और बादाम डालें. जब यह जम जाए तो इसे अलगअलग आकार में काट लें. इसे बनाने के 4-5 दिनों में खत्म कर दें. ज्यादा दिन रोकने इस का जायका बिगड़ जाता?है.

 

नोटबंदी करेला तो बैंकिंग है नीम

नोटबंदी के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि जनता उन्हें सिर्फ 50 दिन दे दे, उस के बाद उस की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. लेकिन 50 दिनों की समयसीमा खत्म होने के बाद दिन और महीने बीते, देश और जनता को महसूस हुआ कि नकली करैंसी और कालेधन के खिलाफ अभियान के तौर पर कोई तैयारी किए बिना की गई नोटबंदी से सिर्फ उस की परेशानी ही बढ़ी.

जिस बैंकिंग प्रणाली के बल पर ब्लैकमनी के खात्मे का अंदाजा लगाया गया था, वह न केवल मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा साबित हुई, बल्कि नकली करैंसी की रोकथाम का मंसूबा भी धरा रह गया. इस की तसदीक 24 जनवरी को भारतीय रिजर्व बैंक ने यह स्वीकारते हुए की कि नोटबंदी के 11 हफ्ते बाद भी उस के पास इस का कोई आंकड़ा नहीं है कि नकली नोटों का क्या हुआ.

नोटबंदी का एक उलटा असर यह जरूर हुआ कि बैंक में बैठे बाबुओं ने इसे अपनी अवैध कमाई का जरिया बना लिया. बैंकिंग के भ्रष्टाचार ने एक तरफ सरकार को चूना लगा दिया, तो दूसरी तरफ जनता को लाइनों में धक्के खाने को मजबूर कर दिया. इस दौरान कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन के चलते बैंकों पर दशकों से जनता का कायम भरोसा टूट कर बिखर गया.

नोटबंदी के जो दुखदर्द थे, वे तो अपनी जगह थे ही, पर धीरेधीरे यह भी साफ हुआ कि बिना विचारे लिए गए इस फैसले की कितनी बड़ी कीमत देश व उस की अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ी है. मोदी सरकार ने ऐलानिया अंदाज में कहा था कि नोटबंदी से देश को कई फायदे एकसाथ होने जा रहे हैं. आतंकवाद का पोषण करने वाली नकली करैंसी थमेगी और ब्लैकमनी बाहर आ जाएगी.

नकली करैंसी कितनी बाहर आई, इस की जानकारी जब एक आरटीआई कार्यकर्ता अनिल वी गलगली ने आरटीआई दाखिल कर आरबीआई से जवाब मांगा तो 24 जनवरी को जवाब मिला कि बैंक के पास नोटबंदी के बाद से नकली नोटों की संख्या का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

आरबीआई के मुद्रा प्रबंधन विभाग (जाली नोट सतर्कता प्रभाग) ने आरटीआई के जवाब में लिखित रूप में कहा कि हमारे पास इस का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. गलगली ने आरबीआई से पूछा था कि वह 8 नवंबर से 10 दिसंबर, 2016 के बीच जब्त किए गए नकली नोटों, बैंकों के नाम, तारीख आदि की जानकारी साझा करे. गलगली ने आरबीआई के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि नकली नोटों के खिलाफ नोटबंदी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने के सरकार के दावे खोखले साबित हुए.

बेमकसद फैसला

यही नहीं, इसी तारीख को बंगाल में 2 हजार रुपए के नकली नोटों की एक खेप एक बंगलादेशी नागरिक के पास से बरामद हुई. यह घटना साबित करती है कि पड़ोसी देशों से नकली करैंसी की आमद रोकने का उपाय वह नहीं है जो सरकार ने नोटबंदी के रूप में सोचा, बल्कि इस के लिए उसे दूसरे तौरतरीकों पर गौर करना होगा.

नोटबंदी से सरकार का एक अहम मकसद कालेधन पर अंकुश लगाना था. उस का दावा था कि 500 व 1,000 रुपए के नोटों के रूप में अर्थव्यवस्था में प्रचलित 84 प्रतिशत रकम बैंकों में वापस लाई जाएगी, वे लोग जो अपना पैसा बैंकों में जमा नहीं कराएंगे वो असल में कालाधन है. आरबीआई और सरकार का अनुमान था कि यह कुल रकम 15.44 लाख करोड़ रुपए है पर इस में से 12.44 लाख करोड़ रुपए तो 10 दिसंबर, 2016 तक ही रिजर्व बैंक के पास वापस पहुंच पाए.

इस से पहले यह अनुमान लगाया गया कि कालेधन की रोकथाम के रूप में सरकार की अमीरी सिर्फ 1 लाख करोड़ रुपए ही बढ़ेगी जबकि उस का अंदाजा 3-4 लाख करोड़ रुपयों का था जिसे ब्लैकमनी माना गया था और यह अनुमान लगाया गया था कि नोटबंदी के असर से यह रकम सिस्टम में वापस नहीं आएगी.

लेकिन जनवरी 2017 बीततेबीतते आरबीआई यह बताने में नाकाम रहा कि असल में कितनी रकम वापस आई. इस से यह संदेह जगा कि संभवतया सारी रकम सिस्टम में वापस आ गई, यानी जितना भी कालाधन लोगों के पास मौजूद था, बैंककर्मियों की मिलीभगत और कई दूसरे तरीकों से उन्होंने वह पैसा सिस्टम में वापस धकेल दिया यानी सरकार अपने दूसरे उद्देश्य में भी नाकाम रही. इस से यह एक बड़ा सवाल पैदा हुआ कि आखिर नोटबंदी का मकसद ही क्या था, क्या सिर्फ जनता को परेशान करना?

इस में संदेह नहीं कि नोटबंदी के बाद से सिर्फ करैंसी बदलने की वजह से ही नहीं, रोजगार गंवाने से ले कर पूंजी गंवाने तक के कई कष्ट जनता ने भुगते हैं. आम जनता सालोंसाल बैंकों को अपनी पूंजी सौंप कर यह सपना देखती रही है कि मुसीबत के वक्त बैंक उस के काम आएंगे, उन्हीं बैंकों और उन के कर्मचारियों ने उस से दगाबाजी की. लोग यह देख कर हैरान रह गए कि नोटबंदी की घोषणा के बाद से देश के कई सारे बैंकों के छोटे और मझोले स्तर के अधिकारीकर्मचारी कालेधन को सफेद बनाने के काम में जुट गए.

देश की राजधानी से ले कर झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों और बंगाल में बंगलादेश की सीमा के पास मौजूद बैंकों के अधिकारियों की वे काली करतूतें टीवी चैनलों द्वारा कराए गए स्ंिटग औपरेशन में सामने आईं कि कैसे वे दलालों के जरिए पुराने 500 व 1,000 रुपए के नोटों को 30-35 फीसदी कमीशन के बदले चोरीछिपे बदलते रहे और जनता बैंक शाखाओं व एटीएम के बाहर कैश मिलने का इंतजार करती रही.

इस से साबित हुआ कि नोटबंदी से देश को कोई विशेष लाभ नहीं, बल्कि कई गुना नुकसान जरूर हो गया. जाहिर है, इस के लिए दोष सरकार का है कि उस ने कोई गणित बिठाए बिना, नोटबंदी का फरमान सुना दिया. उतना ही दोष भ्रष्ट बैंकिंग प्रणाली का है जो ब्लैकमनी के पोषण में ही संलिप्त पाई गई.

समस्या यह है कि सरकार ने इसी बैंकिंग के माध्यम से डिजिटल लेनदेन की कामयाबी का सपना पाल रखा है. ऐसे में सोचना होगा कि कहीं यह डिजिटल प्रबंध आम लोगों की दिक्कतों में और इजाफा तो नहीं करने जा रहे हैं.

काली करतूतों की फेहरिस्त

बैंकों में मनीलौंड्रिंग (कालेधन को सफेद करने) के लिए जो नुसखे आजमाए गए, उन में सब से अहम था फर्जी खातों में बड़ी रकम जमा कराना और इस के लिए जनधन खातों तक का इस्तेमाल किया गया.

एक गड़बड़ी उस समय पकड़ में आई जब दिल्ली स्थित ऐक्सिस बैंक की चांदनी चौक शाखा के 44 फर्जी खातों में 100 करोड़ रुपए जमा कराए गए. कुछ और बैंकों में भी अवैध तरीके से रखी हुई भारी रकमें पकड़ी गईं. जैसे, नोएडा में एक केबल औपरेटर के कर्मचारी के खाते में 13 करोड़ रुपए की रकम जमा कराई गई.

इसी तरह जयपुर में द इंटीग्रल अर्बन कोऔपरेटिव बैंक से आयकर विभाग ने 156.59 करोड़ रुपए कैश बरामद किया. इस के अलावा 1.38 करोड़ रुपए 2,000 के नोट की शक्ल में बरामद हुए. बैंक के एक खाली लौकर में 2 किलो सोना भी मिला. 2,000 रुपए के नए नोटों से बनी करोड़ों की गड्डियां चेन्नई और बेंगलुरु समेत देश के कई शहरों से बरामद हुईं.

दिल्ली में ही, जिस तरह एक बड़े वकील रोहित टंडन ने उद्यमी पारसमल लोढ़ा और रेड्डी आदि रसूखदारों की ब्लैकमनी को सफेद करने की कोशिश की, पता चला कि उस में भी कुछ बैंककर्मियों की भूमिका थी. रोहित टंडन मामले में खुलासा हुआ कि उस के 38 करोड़ रुपए की ब्लैकमनी को सफेदधन में बदलने के लिए कोटक महिंद्रा बैंक के मैनेजर आशीष कुमार ने सहयोग किया और इस के लिए उस ने 13 करोड़ रुपए की दलाली ली.

प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, कालेधन को सफेद करने के लिए आशीष ने कोटक महिंद्रा बैंक की कस्तूरबा गांधी मार्ग शाखा में कई फर्जी कंपनियों के खाते खोले और उन में 38 करोड़ रुपए जमा कराए. रुपए जमा कराने के तत्काल बाद उन से फर्जी कंपनियों के नाम ड्राफ्ट बना लिए गए थे और इरादा यह था कि नोटबंदी की सीमा खत्म होने के बाद इन डिमांड ड्राफ्टों को रद्द करवा कर उन्हें नए नोटों में निकलवा लिया जाएगा. आयकर विभाग ने आशीष के पास से ऐसे 76 डिमांड ड्राफ्ट पकड़े थे.

ऐसे गोरखधंधे में सिर्फ आशीष अकेला शामिल नहीं रहा. देश के हर कोने से कई अन्य बैंकों के कर्मचारियों ने इसी तरह अमीरों और कमीशन के बदले नए नोट की मांग करने वाले व्यापारियों का कालाधन रातोंरात सफेद कर दिया. वैसे तो नोटबंदी के फौरन बाद भारी मात्रा में सोना (एक ही रात में 15 टन सोने की खरीद हुई, जिस की कीमत करीब 3 हजार करोड़ रुपए होती है), महंगी कारों और बीमा पौलिसियों की भी जम कर खरीदारी की गई और सैकड़ों लोगों ने वर्षों से चले आ रहे कर्ज का एकमुश्त भुगतान पुराने नोटों में कर दिया और इस तरह ब्लैकमनी वापस सिस्टम में खपा दी गई. लेकिन इन में सब से ज्यादा अफसोसनाक रवैया बैंकों (असल में उन के कर्मचारियों व अधिकारियों) का रहा जिन पर जनता भरोसा करती आई है. इस का तकलीफदेह पक्ष यह था कि एक तरफ जनता नए नोटों के लिए तरस रही थी, तो दूसरी तरफ बैंक शाखाओं में आई नई करैंसी चोर रास्तों से अमीरों का कालाधन सफेद करने में खपाईर् जा रही थी.

हैरानी यह थी कि अकसर सभी निजी व सरकारी बैंकों के शीर्ष अधिकारी रिजर्व बैंक औफ इंडिया की मदद से जनता की सहूलियत के लिए नई करैंसी जल्दी से जल्दी पहुंचाने का दावा कर रहे थे, लेकिन उन के कई कर्मचारी व मैनेजर दूसरों के कालेधन को खपाने में तल्लीन थे. आयकर विभाग ने ऐसे 1.14 लाख बैंक खातों का पता लगाया है जिन में 10 नवंबर से 17 दिसंबर के बीच प्रत्येक खाते में औसतन 80 लाख रुपए से अधिक पुराने नोट जमा किए गए. इन में से 5 हजार खाताधारकों को आयकर विभाग ने नोटिस भी भेजे.

इसी तरह 51 हजार ऐसे खातों की पहचान भी की गई जिन में 8 नवंबर के बाद 1 करोड़ से ज्यादा पुराने नोट जमा किए गए. सिर्फफर्जी ही नहीं, बंद पड़े लाखों खातों में बड़ी रकम जमा करवा कर कालेधन को सफेद करने का गोलमाल किया गया. आयकर विभाग ने देश में ऐसे 1.23 लाख खातों का पता लगाया जो 2 साल से बंद पड़े थे, लेकिन अचानक उन में 15,398 करोड़ रुपए की भारीभरकम धनराशि जमा कराई गई.

जनधन खातों से भी गोलमाल

नोटबंदी प्रकरण में एक हैरान करने वाला पहलू जनधन खातों से भी जुड़ा है जिन्हें खोलने के लिए सरकार ने यह सुविधा दी थी कि वे शून्य राशि के आधार पर भी खोले और चालू रखे जा सकते हैं. प्रधानमंत्री जनधन योजना की वैबसाइट के आंकड़ों के अनुसार 21 दिसंबर, 2016 को देश में 26 करोड़ से ज्यादा जनधन खाते चालू हालत में थे और इन में जमा रकम 74,123 करोड़ रुपए थी. यह उल्लेखनीय है कि अगस्त 2014 में योजना की शुरुआत से नवंबर 2016 तक इन खातों में जमा रकम कुल 45 हजार करोड़ रुपए थी.

तकनीकी रूप से इन खातों में

50 हजार रुपए से ज्यादा रकम 1 साल में जमा नहीं कराई जा सकती, लेकिन नोटबंदी के बाद के पहले 15 दिनों में ही इन में 27 हजार करोड़ रुपए जमा कराए गए. जनधन खातों के दुरुपयोग की आशंका के मद्देनजर ही रिजर्व बैंक औफ इंडिया को यह प्रावधान करना पड़ा कि बिना केवाईसी (नो योर कस्टमर) वाले जनधन खातों से अधिकतम 5,000 रुपए ही निकाले जा सकेंगे.

जनधन खातों में संदिग्ध जमाओं का एक सीधा मतलब यह निकलता है कि उन खातों में जमा रकम किसी और की है और यह एक प्रकार से टैक्सचोरी का मामला बनता है. यही वजह है कि सरकार ने ऐलान किया कि जनधन खातों के दुरुपयोग के मामलों में बेनामी लेनदेन से रोकने से जुड़े कानून को लागू किया जाएगा और इस के तहत जमा रकम की जब्ती के साथ रकम के मूल मालिक (खाताधारक नहीं) को 7 साल की सजा भी दी जा सकती है.

गौरतलब है कि सख्ती की इस घोषणा के बाद भी जनधन खातों से पैसा निकालने में तेजी आई. 21 दिसंबर तक इन खातों से करीब 2,600 करोड़ रुपयों की निकासी की गई, जिस से संदेह और बढ़ा.

फर्जी खातों, बंद खातों और जनधन खातों के दुरुपयोग के अलावा कमीशन के बदले पुराने नोटों को नए से बदलने में कई बैंककर्मियों की तत्परता से 2 बातें साफ हुईं. एक तो यह कि नोटबंदी से कालाधन जमा होने की प्रक्रिया पर कोई करारी चोट नहीं पड़ सकी, और दूसरी यह कि बैंकों द्वारा आम लोगों की तकलीफों की साफ अनदेखी करते हुए ताकतवर लोगों को नए नोटों की शक्ल में भारी रकम मुहैया कराई गई. हालांकि, ऐसी घटनाओं से चिंतित सरकार ने देश के विभिन्न बैंकों के करीब 500 दलालों को पकड़ा.

सरकार ने दावा किया कि हर दोषी व्यक्ति पर कार्यवाही की जाएगी. उधर, जिन बैंकों के कर्मचारी-अधिकारी गोरखधंधे में संलिप्त पाए गए, उन बैंकों की तरफ से आश्वस्त किया गया कि ऐसे लोगों को बख्शा नहीं जाएगा. पर इस दौरान यह लगभग साफ ही हुआ कि बैंकों का स्वरूप इतना अमीरपरस्त हो चुका है कि सारा खेल ऊपर ही ऊपर हो जा रहा है.

उदारीकरण के बाद से बैंकों ने बिजनैस क्लास के साथ अपना मजबूत रिश्ता बनाया है, लेकिन यही रिश्ता अब समस्या पैदा कर रहा है. कई बैंक अपने मालदार ग्राहकों को खोने के डर से उन्हें अनुचित लाभ पहुंचा रहे हैं. आम आदमी के पास तो कोई विकल्प नहीं है.

नियमों की अनदेखी

सरकार जिस बैंकिंग प्रणाली के बूते कालेधन के खिलाफ अभियान चला रही है, लगभग हर दिन उसी में भारी भ्रष्टाचार के मामले सामने आए. बात सिर्फ जनधन खातों में ही करोड़ों रुपए जमा होने की नहीं है, बल्कि हर ग्राहक की पहचान सत्यापित करने वाले केवाईसी नियम की खुल्लमखुल्ला अनदेखी हुई और बड़े वित्तीय लेनदेन या संदिग्ध लेनदेन की जानकारी एफआईयू (फाइनैंशियल इंटैलिजैंस यूनिट) को देने के नियमों को भी ताक पर रख दिया गया. आयकर विभाग, सीबीआई और ईडी (इनफौर्समैंट डायरैक्टोरेट) की तरफ से हुई छापेमारी में किसी बैंक में सैकड़ों करोड़ रुपए फर्जी खातों में जमा कराने के मामले पकड़े गए, तो किसी में अवैध तरीके से लौकरों में रखी गईर् भारी रकम पकड़ में आई.

ऐसा नहीं है कि मनीलौड्रिंग यानी कालेधन को सफेद करने में बैंकों की यह भूमिका पहली बार सामने आई हो. इस से पहले भी कई बार घटनाएं पकड़ में आई हैं, जब निजी और कुछ सरकारी बैंकों ने व्यवसायी वर्ग को कर्ज मुहैया कराने, उन की ब्लैकमनी को खपाने और नियमों को तोड़मरोड़ कर उसे फायदा पहुंचाने की कोशिश की है.

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2009 से 2013 के बीच बैंककर्मियों की मिलीभगत से की गई मनीलौंड्रिंग के कारण बैंकों को 6 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है और इस से उन के एनपीए (नौन परफौर्मिंग ऐसेट) में लगातार इजाफा हुआ है. दिसंबर 2013 में तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने लोकसभा में बताया था कि सिर्फ एक साल में कालेधन को सफेद करने के अवैध हवाला कारोबार के 143 मामले दर्ज किए गए थे.

दिल्ली स्थित एक बैंक ने जिस तरह चावल के निर्यात के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपए हौंगकौंग के बैंकों में पहुंचा दिए थे, वह मनीलौंड्रिंग और हवाला कारोबार का एक बड़ा उदाहरण था. इन घटनाओं के बारे में बैंक आमतौर पर यह तर्क देते हैं कि मालदार ग्राहकों को खोने के डर से वे कई बार उन्हें कुछ नियमों में छूट प्रदान करते हैं.

पर नोटबंदी के बाद साबित हुआ है कि असल में कई बैंकों के अफसरों-कर्मचारियों को जनता की समस्याओं की नहीं, सिर्फ अपनी ऊपरी अवैध कमाई की चिंता है जिस के बेशुमार मौके उन्हें इस बार मिल गए हैं. ऐसा करते वक्त वे यह भूल गए कि जिस भरोसे के बल पर खास ही नहीं, आम जनता ने अपनी जमापूंजी को संभालने का जिम्मा उन्हें सौंपा था, वह विश्वास अब पूरी तरह खंडित हो जाएगा, जो कि हो गया है.

बैंकों से आम लोगों का भरोसा खत्म होना कई गंभीर नतीजे सामने ला सकता है. पर सवाल है कि मौजूदा स्थितियों में क्या किया जाए, खासतौर से यह देखते हुए कि सरकार जिस डिजिटल बैंकिंग की व्यवस्था बनाने पर जोर दे रही है, उस में धोखाधड़ी की किसी भी गुजांइश को खत्म करने की और भी ज्यादा जरूरत है. असल में, इस वक्त सरकार की प्राथमिकता बैंकिंग सिस्टम को नकारा बनाने में संलग्न लोगों की धरपकड़ करना और भ्रष्ट कर्मचारियोंअधिकारियों को तत्काल दंडित करना होना चाहिए.

अपनी जिम्मेदारी निभाना छोड़ सरकार व जनता, दोनों से छल करने वालों को दंडित कर के ही पुराना भरोसा वापस लाया जा सकता है. इस के अलावा बैंकों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाना और उस में कायम खामियां (लूपहोल्स) को दूर करना भी जरूरी है ताकि मनुष्य में बैंक कालेधन को सफेद में बदलने वाली मशीनरी के रूप में काम न कर सकें.

यह ध्यान रखना जरूरी है कि साफसुथरी बैंकिंग प्रणाली के बिना लोगों की जरूरतें पूरी नहीं होंगी और अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकेगी. नोटबंदी को ले कर प्रधानमंत्री का दावा था कि इस से गरीब चैन की नींद सोएंगे जबकि अमीरों की नींद हराम हो जाएगी. पर अभी ऐसा लग रहा है कि अमीरों ने बैंकों से मिलीभगत कर के अपनी काली कमाई को सफेद कर लिया, जबकि गरीब की रोजीरोटी पर भी आफत आ गई.

बेर की बागबानी में कमाते हैं लाखों रुपए सालाना

जोधपुर के पाल और गंगाणा गांवों में खेती करने वाले मेहनतकश किसान इंतखाब आलम अंसारी ने अपनी ऊंची तालीम का फायदा खेतीकिसानी में भी लेना शुरू कर दिया है. साल 1965 से इन के परिवार में खेती होती आ रही है. विरासत में मिली खेती में अपनी समझ के मुताबिक सफलता के तरीके जोड़ते हुए इंतखाब सूर्यनगरी जोधपुर के किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं. पेश?है इंतखाब की सफलता की कहानी, उन्हीं की जबानी:

42 बीघे के खेत में धीरेधीरे पानी खत्म होने की समस्या हो गई. फिर हिम्मत जुटा कर इसी खेत पर नलकूप खुदवाया. संजोग से पानी तो मीठा निकल आया, पर बहुत कम मात्रा में था. अब ड्रिप सिंचाई की मदद ली, कम पानी में होने वाली फसलों की जानकारी जुटाई. पता चला बेर एक बेहतरीन फसल हो सकती है. कृषि विभाग से प्रेरित हो कर मैं ने 18 साल पहले बेर की बागबानी शुरू की. मैं ने थोड़ा सा नवाचार करते हुए अपने बाग में कुछ हट कर विधियां अपनाई हैं.

लंबे समय तक बारानी खेती के बाद मैं ने पहली बार बेर की बागबानी का मन बनाया तो उद्यान विभाग से 500 ग्राफ्टेड बेर के पौधों की थैलियां ले आया. ग्राफ्टेड बेर के पौधे 3 सालों तक ‘बेबी प्लांट’ रहते हैं, जबकि देशी पौधे दूसरे ही साल जवान हो जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं ने मेरे खेत में पहले से उगी हुई झाड़बेरी और देशी बेर के पौधों को भी उगे रहने दिया. सरकारी मार्गदर्शन के मुताबिक मैं ने 6×6 मीटर (20×20 फुट) की चौकड़ी में सरकारी नर्सरी से अनुदान में मिले पौधे उगाए. वैसे तो 20 बीघे बगीचे में करीब 900 पौधे ही लगाने थे, लेकिन मैं ने अपनेआप उगे हुए पुराने और नए देशी बेर के पौधों को भी पनपने का मौका दिया. बाद में उन पर कलम कर दी.

इस तरह आज यहां 1000 से भी ज्यादा बेर के पेड़ हैं. भरपूर बारिश के बाद उगे बेशुमार खरपतवारों को मिटाने के लिए मैं हेरो का इस्तेमाल करता हूं. इस का फायदा भी है, हरी खाद भी मिल जाती है. मेरा तजरबा रहा है कि इस से जमीन में मिट्टी पलट होने से सूरज की रोशनी भी मिलती है और फंगस (कवक) भी खत्म हो जाते हैं. इस से मिट्टी में पोषक तत्त्वों का रिचार्ज भी हो जाता है. यही तकनीक इन पौधों की बढ़वार के लिए मुझे ज्यादा कारगर लगी. इस से खरपतवार निराई की मजदूरी की बचत भी होती है. कुछ और बातें हैं, जो मैं ने लीक से हट कर अपनाई हैं. कुछ बुजुर्ग मित्रों की टोकाटाकी के बावजूद मैं ने बेर की कटाई यानी प्रूनिंग में नया प्रयोग आजमाया . सब से पहले साल 1980 में जब काजरी के वैज्ञानिकों ने कलमी बेर का ईजाद किया था, उस समय जलवायु और तापमान 30-35 डिगरी रहता था, तब के हालात के मुताबिक मार्च में प्रूनिंग वाजिब थी. लेकिन पिछले 36 सालों में अब 50 डिगरी तक तापमान जा चुका है. अब जलवायु परिवर्तन के कारण व्यावहारिक तौर पर जुलाई में प्रूनिंग करना सही रहता है. ज्यादातर किसान मार्च में बसंत की प्रूनिंग यानी काटछांट करते हैं, जबकि मैं जुलाई महीने में करता हूं. ऐसा करने पर मेरा उत्पादन दूसरे किसानों से बेहतर ही रहता है.

सिंचाई में भी सावधानी

मैं अपने बगीचे में दोहरी सिंचाई अपनाता हूं. मैं खारे पानी की सिंचाई करता हूं, इस से फसल का घनत्व फलभार बढ़ जाता है, क्योंकि बहुत से प्रोटीन, विटामिन व पोषक तत्त्व खारे पानी में नहीं घुलते हैं. मीठे पानी से जरूरत पड़ने पर बूंदबूंद सिंचाई करता हूं. सिंचाई के मामले में मेरा मानना है कि टहनियों के विकासकाल में सिर्फ जरूरत जितना ही पानी देना सही रहता है. कभी भी ज्यादा पानी नहीं देना चाहिए. इस के विपरीत फूल पनपने के 2-3 दौर चलते हैं, लिहाजा फल भी 2-3 चरणों में ही मिलेंगे. इस का ध्यान रखते हुए जागरूक किसानों को दिन ही नहीं बल्कि घंटों की गिनती करते हुए फलोत्पादक दशा में भरपूर सिंचाई करनी चाहिए. अलगअलग खेतों की मिट्टी और जलवायु में फर्क होता है, इसीलिए किसान खुद अपने स्तर पर पुख्ता प्रयोग करते रहें तो बेहतर परिणाम ले सकते हैं. जहां तमाम किसान अपने फूलों की सुरक्षा के लिए बेधड़क अंधाधुंध दवा स्प्रे करते हैं, वहीं मैं इस मामले में सावधान रहता हूं. लोग भले ही मुझे कंजूस मान लें, मैं जरूरत होने पर ही, कम से कम मात्रा में जैविक कीटनाशी स्प्रे करता हूं, मैं दवाओं का छिड़काव अगस्त के पहले हफ्ते और अक्तूबर के पहले हफ्ते में करता हूं. पहले बेसिक दवाएं हलकी मात्रा में इस्तेमाल करनी चाहिए, तब भारी दवा की जरूरत ही नहीं पड़ती.

जरूरी है मित्र कीट प्रबंधन

यह मेरा तजरबा रहा है कि करीब 11 बजे सुबह मधुमक्खियां फूलों पर आना शुरू होती हैं और 2 बजे तक उन का ‘पीक टाइम’ रहता है. इस दौरान कभी भी स्प्रे नहीं करना चाहिए. बेर के पेड़ों को झाड़ीनुमा रख कर ही हम बेहतर फसल ले सकते हैं. इसीलिए मैं हर साल पिछले साल की कटाई से महज 6 इंच आगे या ऊपर से कटाई करता हूं, ताकि हर साल नए कल्ले फूटें. बेर के फूल बहुत ही महीन होते हैं, लिहाजा स्प्रेयर का नोजल बारीक होना चाहिए, ताकि महीन फव्वारे लायक स्प्रे कर सके. बारीक फव्वारे के रूप में घोल छिड़कने से पूरे पौधे की सभी मंजरियों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है. इसीलिए इस में सावधानी रखनी चाहिए. हर  ‘मंजरी गुच्छ’ के पास स्प्रे करने में थोड़ा समय जरूर लगता है, लेकिन खर्च किए गए दवा के घोल का सौ फीसदी फायदा मिल जाता है.

दिलदिमाग से करें खेती

मैं वैज्ञानिक प्रयोगों को खेतों में लागू करने पर भी ध्यान देता हूं. आज सरकारी प्रयोगशालाओं में नाममात्र की फीस पर मिट्टी व पानी के टेस्ट होते हैं. मैं हर साल टेस्ट करा कर प्रयोगशाला की सिफारिश के मुताबिक बाग में माइक्रो न्यूट्रिएंस डालता हूं. यह खर्च वास्तव में कुछ भी नहीं है, लेकिन इस का फायदा लाखों में है. अगर आप यह खर्च बचाएंगे तो फसल में लाखों रुपयों का नुकसान तो होगा ही, जमीन भी बंजर ही जाएगी. मैं गोबर की खाद का इस्तेमाल करता हूं. 20 बीघे में 25 ट्रैक्टर ट्राली खाद डलवाता हूं. मेरे बगीचे के बेरों औसत वजन 35 से 40 ग्राम है, जो जोधपुर संभाग में शायद सब से ज्यादा ऊंची बाजार दर पर बिकता है. इस बाग और गंगाना गांव वाले बाग के बेरों की उपज को मिला कर सालाना 25 लाख रुपए की कमाई हो जाती है.

डंठल समेत तोड़े जाते है बेर

बेरों की तोड़ाई के वक्त मेरे मजदूर डंठल को भी साथ में तोड़ते हैं, इसलिए फल लंबे समय तक ताजे बने रहते हैं और उन में किसी प्रकार के संक्रामक कीड़े घुस नहीं सकते. दिसंबर के आखिरी दिनों में बेर पकने शुरू हो जाते हैं, जो कि मार्च के आखिर तक चलते रहते हैं. इस दौरान मैं कैमिकल की बजाय बायोपेस्ट इस्तेमाल करता हूं. कुछ लोग बाजार में बेर खा कर गले में खराश होने की शिकायत करते हैं, इस की वजह होती है फलों पर छिड़की गई केमिकल दवा. इसी वजह से ऐसे फल खाते ही गला पकड़ते हैं और कई तरह की बीमारियों को जन्म देते हैं.

डिलीट फाइल ऐसे होंगी आसानी से रिकवर

आज के समय में काम-काज वाले लोगों के पास बहुत सी फाइल एवं डेटा होता है और डेटा ज्यादा होने की वजह से कभी-कभी कुछ महत्वपूर्ण फाइल गलती से या वायरस की वजह से डिलीट भी हो जाती है. इनको रिकवर करने में बहुत परेशानी भी होती है.

ऐसे में रिक्यूवा एक ऐसा टूल है जो हार्ड डिस्क, मेमोरी कार्ड या यूएसबी मेमोरी जैसे स्टोरेज डिवाइस से कोई फाइल डिलीट हो जाए तो उसे रिकवर करने में मदद करता है. फाइल को रिकवर करने की संभावना को बढ़ाने के लिए जरूरी है कि एक बार फाइल के डिलीट हो जाने के बाद डिस्क या कार्ड पर कोई भी चीज ओवरराइट ना करें.

रिकवरी की प्रक्रिया

रिक्यूवा(Recuva) को डाउनलोड करे और प्रोग्राम को अपने कम्प्यूटर पर इंस्टॉल करे और डाउनलोड की गई फाइल को रन करे. इंस्टॉलेशन विजार्ड के निर्देशों का पालन करे. जब इंस्टॉलेशन प्रक्रिया पूरी हो जाएगी तो रिक्यूवा विजार्ड आपके सामने प्रदर्शित होगा. इसके बाद अगले पेज पर जाए और जिस फाइल (फोटो, गाना, दस्तावेज) को रिकवर करना चाहते है उसे सिलेक्ट करे. और नेक्स्ट पर क्लिक करे.

इसके बाद उस लोकेशन को चुने जहां फाइल के रिकवर करना चाहते है.  रिक्यूवा(Recuva) फाइल को खोजने में आपकी मदद करेगी. रिक्यूवा(Recuva) द्वारा जब फाइलों को खोज लिया जाएगा तो जो रिक्यूवा द्वारा खोजी गई फाइले है वह स्क्रीन पर प्रदर्शित होने लगेंगी. इसके बाद आप जिस फाइल को रिकवर करना चाहते हैं उसे सिलेक्ट कर लिजिए और रिकवर पर क्लिक किजिए.

अब उस लोकेशन को चुनिए जहां आप फाइल को रिकवर होने के बाद सेव करके रखना चाहते है. फाइल सेव करते समय यह ध्यान रखे की जो फोल्डर आप फाइल सेव करने के लिए सिलेक्ट कर रहे हैं वह उस फोल्डर से अलग होना चाहिए जहां से फाइल डिलीट हुई थी.

बिजनैस वर्ल्ड का नया मंत्र टेक इट ईजी

मुंबई में किसी भी टैलीविजन चैनल के दफ्तर में जिधर भी नजर जाती है, सब की पोशाकें स्मार्ट कैजुअल दिखती हैं. जींस, टीशर्ट, लैगिंग्स, टौप्स आदि विभिन्न रंगों की पोशाकें चारों तरफ दिखाई पड़ती हैं. पूछने पर पता चला कि ऐसी पोशाक वे हर दिन पहनते हैं. वजह बहुत साधारण थी. ऐसी पोशाक को न तो प्रैस की जरूरत होती है, न ही अधिक रखरखाव की. मीटिंग से ले कर आउटडोर वर्क, हर जगह कैजुअल पोशाक आसानी से चलती हैं. अधिक समय तक इसे पहने रहने पर थकान का अनुभव भी नहीं होता.

इतना ही नहीं, किसी भी ऐड एजेंसी के व्यक्ति, कितने ही टौप पोस्ट पर क्यों न हों, जींस और टीशर्ट ही पहनना पसंद करते हैं. एक मीटिंग के दौरान स्टार टीवी की वाइस प्रैसिडैंट जब कैजुअल ड्रैस के साथ मिलने आईं तो यह समझना मुश्किल था कि वे इतनी बड़ी पोस्ट पर बिना फौर्मल ड्रैस के कैसे काम कर रही हैं.

सालों से चले आ रहे ड्रैस कोड जब मौडर्न बिजनैस पैटर्न के साथसाथ बदले गए तो बहुत सारे दिग्गजों ने नाकभौं सिकोड़े. दरअसल, आज के यंग बिजनैस फाउंडर्स ने पुरुषों और महिलाओं को बिना ड्रैस कोड के औफिस में आने की इजाजत दी. वे सभी कर्मचारियों को उन के फर्स्ट नाम से बुलाने और उन के साथ टीम बना कर काम करने में विश्वास करने लगे. उन का मानना है कि ऐसा करने से वे हर कर्मचारी के नजदीक होंगे और ऐसे में उन की सोच व कंपनी का भरोसा उन्हें आगे बढ़ने में मददगार साबित होगा. यह देखा भी गया कि कैजुअल ड्रैस में उन के व्यवहार भी काफी अच्छे थे, वे किसी विषय पर खुल कर बात करने में घबराते नहीं थे.

ड्रैस कोड को हटाने में पहले कई बड़ी कंपनियों ने पहल की और पाया कि फौर्मल ड्रैस से अधिक कैजुअल ड्रैस टीम कल्चर को आगे बढ़ाती है. इस के अलावा न्यू ड्रैस कोड लोगों को काफी आकर्षित करता है. दूसरी तरफ कंपनी के बौस भी इस संस्कृति को अधिक महत्त्व देने लगे. यह सही है कि कुछ खास अवसरों पर फौर्मल ड्रैस कोड जरूरी होता है. इस से आप की अहमियत बढ़ती है. लेकिन जरूरत के बिना फौर्मल ड्रैस आज की युवा पीढ़ी पसंद नहीं करती. जिस का समर्थन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी भी करते हैं. उन के हिसाब से वयस्कों के अनुभव और युवा ऊर्जा से ही उन की कंपनी आगे बढ़ सकती है और ऐसा देखा भी गया है कि युवा अधिकतर हलकेफुलके परिवेश को पसंद करता है. ऐसे में उन्हें ड्रैस पहनने की आजादी है. यह परिवर्तन केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में आजकल चल रहा है. जरमनी, फ्रांस, अमेरिका आदि सभी स्थानों पर इस का प्रभाव देखा जा रहा है.

सहजता में सफलता

ड्रैस कोड केवल कौर्पोरेट सैक्टर में ही नहीं, बल्कि राजनेता से ले कर सभी इसी का अनुसरण करते हैं. राजनेता मानते हैं कि उन का खादी कुरता और चूड़ीदार पजामा, उन की सहजता, गतिशीलता और ‘डाउन टू अर्थ’ स्वभाव को दर्शाते हैं. लेकिन आज की नई पीढ़ी के युवा नेता इस से हट कर जींस और टीशर्ट में भी नजर आते हैं, क्योंकि वे इस पहनावे से अपनेआप को आम लोगों के करीब समझते हैं. इधर, कौर्पोरेट सैक्टर के  बौस मौडर्न ड्रैस कोड के द्वारा यह दिखाना चाहते हैं कि उन की कंपनी उबाऊ नहीं, जैसा लोग समझते हैं.

इस बदलाव से व्यवसाय को बढ़ाने का भी काफी मौका मिल रहा है. आजकल यूनिवर्सिटी में स्नातकों की कमी नहीं है और वह जमाना गया जब एक नामचीन कंपनी में काम करने के लिए युवा लालायित रहते थे. आज के युवा वहां काम करना पसंद करते हैं जहां उन्हें काम करने की आजादी हो. कुछ कंपनियों के बौस भी अपनेआप को यंग और डाइनेमिक समझते हैं और अपनेआप को वे वैसा ही सिद्ध करने की कोशिश करते हैं.

जब पहली बार इनफोसिस के विशाल सिक्का टीशर्ट और जींस में अपने कर्मचारियों को संबोधित करने आए तो सभी चौंक गए. लेकिन सब को उन का यह बदलाव अच्छा लगा. क्योंकि इस से पहले कर्मचारियों को हफ्ते में केवल एक दिन कैजुअल पहनने की इजाजत थी. इस के बाद उन्होंने अपने कर्मचारियों को कैजुअल पोशाकें हर दिन पहनने की आजादी दी. इनफोसिस के इस कदम के कुछ दिनों के  बाद हिंदुस्तान यूनिलीवर ने भी अपने कर्मचारियों को कैजुअल पोशाक पहनने की आजादी दी और पाया कि कंपनी में इस का असर सकारात्मक दिखा.

इस का एक और उदाहरण यशराज फिल्म्स में दिखाई पड़ता है जहां फिल्मकार यश चोपड़ा हमेशा फौर्मल ड्रैस में ही अपने औफिस में आते थे लेकिन अब उन के बेटे आदित्य चोपड़ा जींस टीशर्ट में औफिस आते हैं. उन के सभी कर्मचारी स्मार्ट कैजुअल में औफिस आते हैं. आदित्य चोपड़ा अपने दफ्तर में कई बार ट्रैक सूट, टीशर्ट में मिलते हैं. उन के हिसाब से वे अपनेआप को नए माहौल और यूथ से ऐडजस्ट करने के लिए ऐसा करते हैं. वे मानते हैं कि जितना वे सहज होंगे उतना ही वे अपने काम में सफल हो सकेंगे. टी सीरीज के मालिक भूषण कुमार और अभिनेता अनिल कुमार भी अपने दफ्तरों में अकसर कैजुअल्स में दिखते हैं.

इस चलन की शुरुआत की बात करें तो सालों पहले जब एक मीडियाकर्मी ने अभिनेता गोविंदा को चीची कर संबोधित किया, तो वे भड़क उठे और इंटरव्यू देने से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें इस तरह अभद्र तरीके से बुलाया जाना पसंद नहीं था. वहीं, आज की प्रियंका चोपड़ा अपनेआप को ‘पिग्गी चोप्स’ कहलाने से नाखुश नहीं होतीं. सलमान खान को ‘सल्लू’ बुलाए जाने पर वे उत्साहित हो जाते हैं. शाहरुख खान अपने सहयोगियों के बीच हमेशा एसआरके और रवीना टंडन ‘राव्स’ नाम से जानी जाती हैं.

स्मार्ट कैजुअल अब बिजनैस वर्ल्ड का मंत्र बन गया है जो पुराने ड्रैस कोड से थोड़ा हट कर है. इस में पोशाक थोड़ी स्टाइलिश होने के साथसाथ आरामदायक भी है. यह घर पर पहने जाने वाले कपड़ों से थोड़ी मौडर्न लुक की होती है. इन कपड़ों में स्लीवलैस टौप, जींस, स्कर्ट्स, फ्रौक आदि महिलाओं के  लिए होती हैं जबकि पुरुषों के लिए टीशर्ट, जैकेट, और जींस अधिक पहनी जाती हैं. इस कैजुअलनैस से कई फर्मों की सोच में बदलाव आया है. केवल ड्रैस कोड ही नहीं, बल्कि उन की बातचीत और व्यवहार में भी परिवर्तन आया है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कैजुअलनैस कंपनी के आगे बढ़ने की दिशा में ठीक है पर समय और अवसर के अनुसार इस में बदलाव की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि अगर किसी को उस के फर्स्ट नाम या शौर्ट नाम से किसी खास जगह पर बुलाया जाता है तो कुछ लोग, जो इस तरह के व्यवहार से परिचित नहीं होते, उस जगह पर अपनेआप को अकेला समझ सकते हैं, या उन्हें कुछ अजीब भी लग सकता है.

जियो शुरु करेगा संख्या 6 से शुरु होने वाले मोबाइल नंबर

अभी तक के अपने और आपके जानने वालों सभी के, सारे मोबाइल नंबर्स पर एक बार फिर ध्यान दीजिए. ये बात तो आप समझ ही चुके हैं कि आपने अब तक 9, 8 और 7 इन सीरीज से शुरू होने वाले मोबाइल नंबर ही देखे हैं और इस्तेमाल किए हैं, पर जल्द ही आपके पास 6-सीरीज वाले मोबाइल नंबर भी आने वाले हैं. टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो ने, डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम से संख्या 6 से शुरु होने वाले मोबाइल नंबर्स बांटने की अनुमति ले ली है. दूरसंचार विभाग (डीओटी) इसके लिए कंपनी को 6 सीरीज वाले मोबाइल स्विचिंग कोड या MSC देगी.

रिलायंस जियो देश की ऐसी पहली कंपनी होगी जो 6 से शुरू होने वाले मोबाइल नंबर उपलब्ध कराएगी. नए फोन नंबर की ये पेशकश उन्हीं लोगों से शुरू की जाएगी जो अब नए कनेक्शन लेने वाले हैं. हालांकि, रिलायंस जियो इन नए नंबरों का अभी केवल कुछ ही क्षेत्रों में शुभारंभ करेंगे. भारतीय दूरसंचार पोर्टल की रिपोर्ट के मुताबिक 6 सीरीज वाले नंबर्स के लिए दिये जाने वाले कोड अभी असम, राजस्थान और तमिलनाडु में जारी किए हैं. कथित तौर पर राजस्थान को 60010-60019 एमएससी कोड, असम को 60020-60029 एमएससी कोड और तमिलनाडु को 60030-60039 प्राप्त हुआ है.

रिलायंस जियो से ग्राहकों के जुड़ने का अब तक का आंकड़ा 72.4 करोड़ ग्राहकों का है. ऐसे में 9, 8 और 7-सीरीज वाले मोबाइल नंबर्स खत्म होने की कगार पर हैं. वहीं दूसरी तरफ दूरसंचार की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा कंपनी से 10 लाख नए ग्राहकों को जोड़ने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए किया गया है. टेलीकॉम रेगूलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, नवंबर 2016 तक भारतीय सब्सक्राइबर्स में 2.1 करोड़ इजाफे के साथ 112 करोड़ हो गया है. इसका ज्यादातर श्रेय जियो को ही जाता है. 5 सितंबर से शुरुआत करने वाले रिलायंस जियो के बीते साल 31 दिसंबर तक 7.2 लाख ग्राहक हो चुके थे.

तो अब अगर आप एक नया रिलायंस जियो सिम कार्ड के लिए आवेदन कर रहे हैं तो आपको अंक 6 के साथ शुरू होने वाला मोबाइल नंबर भी मिल सकता है.

मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. हमने सेक्स भी किया है. लड़की के पिता शादी को तैयार नहीं हैं. क्या करूं.

सवाल

मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता हूं. हम दोनों ने कई बार हमबिस्तरी भी की है. मेरे घर वाले हमारी शादी के लिए राजी हैं, पर लड़की के पिता तैयार नहीं हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप खुद लड़की के पिता से बात कर के उन्हें समझाएं. लड़की भी जब आप के साथ सो सकती है, तो अपने पिता से दोटूक बात भी कर सकती है. जरूरत पड़ने पर आप अपने माता पिता की मदद भी ले सकते हैं. फिर भी लड़की के पिता न मानें, तो कोर्ट मैरिज कर लें. अलबत्ता, आप दोनों की उम्र शादी लायक होनी चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

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