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महबूबा के लिए मां का कत्ल

पुराने भोपाल में बन्ने मियां और उन की पत्नी जमीला का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं था. उन्हें वहां हर कोई जानता था. बन्ने मियां की इमेज एक भाजपा समर्थक मुसलमान नेता की थी. वह आपातकाल के समय गिरफ्तार कर के जेल भी भेजे गए थे. वह बड़ी शान से खुद को मीसाबंदी बताते हुए जेल के उस समय यानी सन 1975 के किस्से लोगों को सुनाते रहते थे कि कांग्रेसी शासनकाल में हम नई आजादी के सिपाहियों पर किसकिस तरह के जुल्मोसितम ढाए गए थे.

48 साल की जमीला बेगम उन की दूसरी पत्नी थीं. वह भी राजनीति में जरूरत के हिसाब से सक्रिय रहने वाली महिला थीं और कदकाठी से भी काफी मजबूत थीं. उन की इमेज झुग्गीझोपड़ी की राजनीति करने वाली औरत की थी, जो अपने पति की पहुंच और रसूख के दम पर झुग्गीझोपड़ी का कारोबार भी करती थी. इस काम से उन्होंने खासा पैसा बनाया था. हालांकि पैसों की कमी उन्हें वैसे भी नहीं थी, क्योंकि बन्ने मियां खानदानी आदमी थे. उन्हें विरासत में ही कोई 25 एकड़ जमीन मिली थी, जिस की कीमत अब करोड़ों में थी.

दूसरी शादी कर के बन्ने मियां गौतमनगर  थाना इलाके के इंदिरानगर में रहने लगे थे. जमीला से उन्हें एक बेटा अमन था, जो अब 22 साल का बांका जवान हो चुका था. बन्ने मियां की पहली बीवी अपने 4 बच्चों के साथ गांधीनगर इलाके में रहती थी. उन के बच्चों में से एक बेटा अपराधी प्रवृत्ति का था. जिंदगी में कई उतारचढ़ाव देखने वाले बन्ने मियां यह कहने का हक तो रखते ही थे कि मियां ऊपर वाले के फजल से सब कुछ है मेरे पास, किसी चीज की कमी नहीं है.

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा अब कहने भर का रह गया है, जिस में पुराने जमाने के इनेगिने नेता ही सक्रिय हैं और इस इकाई को जैसेतैसे ढो रहे हैं. लेकिन उन्हें इस का अच्छाखासा फायदा मिल रहा है. बन्ने मियां और जमीला बेगम सियासत करते हुए तबीयत से भाजपाई राज में चांदी काट रहे थे. इन दोनों ने मिल कर अपना खासा समर्थक वर्ग भी तैयार कर रखा था.

30 नवंबर की दोपहर को अचानक जमीला बेगम की मौत की खबर आग की तरह फैली. दोपहर के वक्त इंदिरानगर में आमतौर पर औरतें और बच्चे ही होते थे. मर्द अपनेअपने काम पर निकल चुके होते थे. अमन ने तंग गली में बने अपने मकान के बाहर आ कर शोर मचाया तो वहां मौजूद तमाम औरतें अपना कामधंधा छोड़ कर जमीला के घर की ओर भागीं. हर एक की जुबान पर यही सवाल था कि क्या हुआ?

जवाब में घबराए अमन ने बताया कि अम्मी को करंट लगा है. औरतों ने देखा कि जमीला बेगम खाट पर लेटी थीं और उन के शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी. लिहाजा तुरंत नजदीक से औटो बुलवा कर उन्हें हमीदिया अस्पताल ले जाया गया. घर आई औरतों में कुछ औरतें हैरानी से घर की दीवारों को देख रही थीं कि जमीला को करंट लगा कैसे? यह सवाल अमन से किया गया तो वह घबराहट में कोई जवाब नहीं दे सका. औरतों ने भी उस की हालत देखते हुए ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा.

अलबत्ता, जमीला को जब औटो से ले जाया जा रहा था तो जरूर कुछ औरतों ने उस के बाएं कंधे के नीचे एक सुराख देखा था. लेकिन अस्पताल पहुंचने की जल्दबाजी में किसी ने इस बाबत सवाल नहीं किया. बन्ने मियां उस समय अपनी मीसाबंदियों वाली पेंशन लेने बैंक गए हुए थे. जैसे ही उन्हें बीवी की मौत की खबर मिली, वह भी भागेभागे हमीदिया अस्पताल पहुंचे. तब तक डाक्टरों ने जमीला का निरीक्षण कर उन्हें मृत घोषित कर दिया था. अस्पताल में खासी भीड़ जमा हो गई थी. जमीला बेगम के दफनाए जाने की यानी अंतिम संस्कार की बातें और तैयारियां दोनों शुरू हो गई थीं.

जमीला की मौत की खबर थाना गौतमनगर के थानाप्रभारी मुख्तार कुरैशी तक पहुंची तो वह तुरंत हरकत में आ गए. जमीला की मौत कुदरती नहीं, बल्कि संदिग्ध थी. यह बात उन्हें अपने सूत्रों से पता चल चुकी थी, साथ ही यह भी कि जमीला के घर वाले यानी खासतौर पर पति बन्ने मियां और बेटा अमन इस मौत को राज ही रखना चाहते हैं, इसलिए कफनदफन के इंतजाम में जुट गए हैं.

मुख्तार कुरैशी के लिए जमीला की मौत संदिग्ध इस लिहाज से भी थी कि 2 दिनों पहले ही ट्रैक्टर रखने को ले कर कुछ पड़ोसियों से जमीला का विवाद हुआ था. कुछ लोगों के खिलाफ जमीला ने थाने में शिकायत भी दर्ज करा रखी थी. कुरैशी नहीं चाहते थे कि किसी को कुछ कहने का मौका मिले, क्योंकि मामला एक भाजपा नेत्री की संदिग्ध मौत का था, जिस पर उचित काररवाई न करने पर बवाल भी मच सकता था. लिहाजा वह बगैर वक्त गंवाए हमीदिया अस्पताल पहुंच गए.

उन का शक सच निकला. जमीला बेगम के बाएं कंधे के नीचे सुराख था. लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि खून का कहीं नामोनिशान नहीं था. कुरैशी ने तुरंत जमीला के कंधे पर बने सुराख का एक्सरे कराया तो इस बात की पुष्टि हो गई कि उन की मौत करंट लगने से नहीं, बल्कि गोली लगने से हुई थी. साफ हो गया कि यह हत्या का मामला था. एक्सरे रिपोर्ट से यह भी साफ हो गया था कि कंधे में धंसी गोली 318 बोर के कट्टे की थी.

जमीला के अंतिम संस्कार की बात अब खत्म हो गई थी और उन का पोस्टमार्टम शुरू हो चुका था. पोस्टमार्टम के बाद उन का शव घर वालों यानी बन्ने मियां और अमन को सौंप दिया गया. पूछताछ में पुलिस को अमन से कुछ हासिल नहीं हुआ. वह कभी करंट लगने की बात कहता था तो कभी यह शक भी जाहिर करता था कि मुमकिन है कि मम्मी को किसी ने घर में घुस कर गोली मारी हो, जिस का उसे पता नहीं चला, क्योंकि उस वक्त वह सो रहा था.

दूसरी ओर शहर में यह अफवाह फैल चुकी थी कि जमीला की हत्या की गई है, पर हत्यारे कौन हैं, इस का पता नहीं चल पा रहा है. पुलिस को अमन पर शक था, लेकिन उसे कातिल ठहराने की कोई ठोस वजह उन के पास नहीं थी. पूछताछ में पड़ोसियों से विवाद की बात भी सामने आई थी. उस से भी ज्यादा दिलचस्प लेकिन गंभीर बात यह भी उजागर हुई थी कि बन्ने मियां का पहली पत्नी से कुछ दिनों पहले ही जायदाद को ले कर झगड़ा हुआ था, जिस का एक बेटा अपराधी प्रवृत्ति का था. लिहाजा वह भी शक के दायरे में आ गया था.

आमतौर पर हत्या के ऐसे मामलों में पुलिस 1-2 दिन में ही असली कातिल तक पहुंच जाती है, लेकिन जमीला बेगम की हत्या पुलिस वालों के लिए गुत्थी बनती जा रही थी. पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो झगड़े की बात तो उन्होंने स्वीकारी, लेकिन जमीला की मौत के तार उन से जुड़ नहीं पाए. बन्ने मियां की पहली बीवी और बच्चों से भी पूछताछ की गई, लेकिन कोई ऐसी वजह सामने नहीं आई, जिस से उन पर शक किया जाता.

कोई नतीजा न निकलते देख एसपी (नौर्थ) अरविंद सक्सेना ने यह मामला क्राइम ब्रांच के सुपुर्द कर दिया. अब मामला क्राइम ब्रांच के एएसपी शैलेंद्र सिंह के हाथ में आ गया, जो अपनी खास स्टाइल के चलते ऐसे ब्लाइंड मर्डर सुलझाने के लिए जाने जाते हैं.

मुखबिरों के जरिए और जो नई बातें पता चलीं, उन में एक अहम बात यह थी कि हादसे के वक्त बन्ने मियां पेंशन लेने बैंक नहीं गए थे, जैसा कि उन्होंने बताया था, बल्कि वह एक फड़ पर बैठे ताश खेल रहे थे. दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह भी पता चली थी कि कुछ दिनों पहले ही बन्ने मियां और जमीला का किसी बात पर इतना झगड़ा हुआ था कि जमीला नाराज हो कर घर छोड़ कर अपनी बहन के यहां चली गई थी, जहां से बाद में बन्ने मियां उसे मना कर ले आए थे. आते हुए उन्होंने साली से अपनी गलती के लिए माफी भी मांगी थी.

अब शक की सुई बन्ने मियां पर घूमी तो वह झल्ला उठे और एसपी (नौर्थ) से मिल कर शिकायत की कि बीवी के कत्ल के मामले में पुलिस वाले उन के घर वालों को पूछताछ के नाम पर परेशान कर रहे हैं. पुलिस वाले बन्ने मियां को हलके में लेने की भूल नहीं कर रहे थे, जो पेशे से नेता थे और बातबात में नेतागिरी के दम पर सिर पर आसमान उठाने के हुनर में माहिर थे.

पर अब उन में पहले सा आत्मविश्वास नहीं रह गया था, इसलिए पुलिस वाले ताड़ गए कि दाल में कुछ काला जरूर है. पर दाल कहां और कितनी काली है, वहां तक पहुंचने के लिए सब्र की जरूरत थी. लिहाजा ढील दे कर पतंग उड़ाने की शैली अपनाई गई. बन्ने मियां पर शक की वजह यह मनोवैज्ञानिक पहलू भी था कि कई बार कलह के बाद शौहर सुलह करता है तो एक खतरनाक खयाल उस के दिमाग में बीवी को देख लेने या उसे सबक सिखाने का भी पनप रहा होता है.

पुलिस की बारबार की पूछताछ और छानबीन कम हो जाने से बन्ने मियां और अमन को थोड़ा सुकून मिला. अब तक जमीला बेगम की हत्या हुए 3 हफ्ते गुजर चुके थे और लोग इस मामले को भूल चुके थे. जिन्हें याद था, उन्होंने अपनी तरफ से उसे ब्लाइंड मर्डर की लिस्ट में डाल दिया था.

आखिरकार 20 दिसंबर, 2016 को सनसनीखेज तरीके से इस हत्याकांड से पुलिस ने परदा उठाया तो लोग एक बार फिर यह जान कर चौंके कि बेटा अमन ही अपनी मां जमीला का हत्यारा था और हत्या की वजह एक लड़की थी, जो उस की माशूका थी. पूछताछ में अमन टूट गया था और अपना जुर्म कबूल करते हुए उस ने हत्या में प्रयुक्त कट्टा भी बरामद करा दिया था.

अमन निकम्मा और आलसी किस्म का बेजा लाड़प्यार में पला लड़का था, जिस का एक शौक बाइक चलाना भी था. कई लड़कियों से उस की दोस्ती थी. लेकिन मोहल्ले की ही एक लड़की से उसे सच्चा प्यार हो गया था. लड़की चूंकि बिरादरी की थी, इसलिए उस के लिहाज से शादी में कोई अड़चन पेश नहीं आनी थी. लेकिन इस प्रेमप्रसंग की गहराई के बारे में जब जमीला बेगम को पता चला तो वह दुखी भी हुईं और बेटे पर भड़क भी उठीं, क्योंकि उन्होंने अपनी रिश्तेदारी की एक लड़की को बहू के रूप में चुन रखा था और उन रिश्तेदारों को वह जुबान भी दे चुकी थीं.

जमीला ने तरहतरह से अमन को समझाया, पर वह टस से मस नहीं हुआ. वारदात की दोपहर वह सो कर उठा तो मम्मी से चाय की फरमाइश की. इस पर जमीला बाहर नुक्कड़ की किराने की दुकान पर गईं और दूध का पैकेट तथा लड्डू ले आईं. बेटे के लिए चाय बनातेबनाते उन का ध्यान इस तरफ गया कि बिस्तर पर पड़ा बेटा अपनी माशूका से गुफ्तगू कर रहा है तो उन का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उन्होंने उसे खुली चेतावनी दे दी, ‘तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं तय कर चुकी हूं. अपनी पसंद की लड़की से शादी करना है तो मेरे मरने के बाद कर लेना.’

इस कलयुगी आशिक बेटे ने मां की हिदायत कुछ इस तरह मानी कि तकिए के नीचे रखा कट्टा निकाला और उन पर गोली दाग दी. अब वह मां के मरने के बाद अपनी मरजी से शादी करने के लिए आजाद था. मां के कंधे से निकले खून को उस ने गीले कपड़े से पोंछ दिया. हत्या के बाद जो हुआ, वह शुरू में बताया जा चुका है.

जल्दी ही बन्ने मियां की समझ में आ गया था कि उन की बीवी का कत्ल किस ने किया है. बीवी तो वह खो ही चुके थे, अब बेटे को नहीं खोना चाहते थे. लिहाजा जांच के दौरान पड़ोसियों से ट्रैक्टर को ले कर झगड़े को उन्होंने तूल दे कर पुलिस का ध्यान बंटाने की कोशिश की और पहली बीवी से हुए विवाद को भी उन्होंने तूल दिया, जो पुलिसिया जांच में खारिज हो गए थे.

बिगड़ैल अमन मांबाप के बेजा लाड़प्यार के चलते ज्यादा पढ़लिख नहीं पाया था. लेकिन इश्क में मास्टर डिग्री हासिल कर चुका था. उस की महबूबा एकांत में अकसर उस के साथ होती थी और दोनों साथ जीनेमरने की कसमें खाते रहते थे. नई आजादी के सिपाही बन्ने मियां की दुनिया लुट चुकी है. कातिल बेटा जेल में है और करोड़ों की पुश्तैनी जायदाद अब उन्हें मुंह चिढ़ा रही है, जिस का पहली बीवी और बच्चों के हिस्से में जाना तय दिख रहा है.

जमीला की जिद खुद उन्हें भारी पड़ी. अगर वह पुरानी कहानी की तरह बेटे को उस की माशूका को देने के लिए अपना कलेजा सौंप देतीं तो बात बन जाती. इधर अमन का सोचना यह था कि अगर अपनी मरजी से शादी की तो मांबाप के पैसों पर ऐश करने को नहीं मिलेगा. तय है कि जमीला को इस बात का अहसास नहीं था कि बेटा गले तक इश्क के समंदर में डूब चुका है. गोली मारने के पहले उस ने कहा भी था कि अब्बा ने भी तुम से इसी तरह शादी की थी.

पुराने भोपाल के गरीब जरूरतमंद बाशिंदों को झोपड़ी दिलाने का कारोबार करने वाली जमीला का घर अब उजड़ चुका है, जिस में अब बन्ने मियां गमगीन से बैठे रहते हैं. बेटे की परवरिश में कहां गलती हो गई, यह अब उन्हें सब कुछ लुटने के बाद समझ आ रहा है.

इन पांच सितारों की सगाई तो हुई, पर शादी नहीं हो पाई

शाहरुख और सलमान की फिल्मों से ज्यादा लोग धारावाहिकों में अधिक रुची रखते है. लोगों को फिल्मों से ज्यादा उनके रोज के धारावाहिकों और उन धारावाहिकों में काम कर रहें कलाकारों के बारे में कोई भी खबर जानने में बहुत उत्साह होता है.

टीवी पर ऐसे बहुत से प्रेमी जोड़े हैं जिन्होंने सगाई तो कर ली लेकिन अपने व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों के चलते शादी नहीं कर पाए. और उन सभी प्रेमी जोड़ों ने शादी नहीं करने के अलग-अलग कारण बताये.

मशहूर कोरियोग्राफर फराह खान के भाई साजिद खान और गौहर खान अपने करियर के शुरूआती दौर में थे, तब उन्होंने सगाई कर ली थी.

उस समय गौहर खान ने एक्टिंग की दुनिया में कदम ही रखा था, और साजिद उस समय टीवी शो होस्ट करते थे.

करण सिंह ग्रोवर ने हाल ही में बिपाशा बासु से शादी की है. करण सिंह ग्रोवर पहले भी जेनिफर विंगेट और श्रद्धा निगम के शादी कर चुके हैं.  लेकिन करण सिंह ग्रोवर ने अपनी दो शादीओं के पहले भी बर्खा बिष्ट से सगाई की थी लेकिन बाद में शादी नहीं कर पाए.

भाभी जी घर पर है कि अंगुरी भाभी मतलब शिल्पा शिंडे और टीवी कलाकार रोमित राज ने साल 2009 में शादी करने का प्लान बनाया था और सगाई कर ली थी. लेकिन बाद में इन दोनों ने इस शादी को रद्द कर दिया. सुत्रों के अनुसार शिल्पा का कहना है कि उन्होंने शादी को बचाने की बहुत कोशिश की थी. लेकिन वे सफल नहीं हो पायी.

राखी सावंत ने टीवी के एक प्रोग्राम “राखी का स्वयंवर” के द्वारा इलेश परुजानवाला को अपना दूल्हा चुना था. बाद में राखी ने स्वीकार किया था कि उन्हें फ्लैट खरीदने के लिए पैसे चाहिए थे इसलिए उन्होंने इस स्वयंवर में भाग लिया था और अपना स्वयंवर रचा था.

राखी सावंत के बाद ही टीवी पर एक बार फिर से स्वयंवर का प्रोग्राम आया था और रतन राजपूत ने इस स्वयंवर के द्वारा अभिनव शर्मा को दुल्हे के रूप में चुना था और उनसे सगाई भी की थी लेकिन बाद में इन दोनों में आपसी तालमेल नहीं बैठने के कारण शादी के इरादे को बदल दिया.

उपेन पटेल और करिश्मा तन्ना के बीच बिग बॉस के दौरान प्यार हुआ था दोनों के बीच नजदीकियां इतनी बढ़ गयी थी की इन दोनों ने शादी का मन बना लिया था और साल 2014 में सगाई कर ली थी. लेकिन कुछ कारणों से इन दोनों ने अपने रिश्ते को दो साल बाद समाप्त कर दिया.

एक दिन में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड है इस खिलाड़ी के नाम

मौजूदा समय में टेस्ट क्रिकेट क्रिकेट में काफी बदलाव आया हैं. अब टेस्ट में भी बल्लेबाज तेजी से खेलते हैं. बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट सुधरा है. आजकल कोई भी टीम 1 दिन में औसतन 275 से 300 रन बनाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक दिन में किसी एक बल्लेबाज द्वारा बनाया गया सर्वाधिक स्कोर क्या है?

क्रिकेट के शुरूआती दौर में भी ऐसे बल्लेबाज थे जिन्होंने एक दिन में दोहरा शतक बनाया. खासकर डॉन ब्रेडमैन तो एक दिन में 200 से ज्यादा रन बनाने के माहिर मानें जाते थें. उन्होंने अपने करियर में कुल 6 बार एक दिन में 200 से ज्यादा रन बनाया. तो आइए जानते हैं एक दिन में किसी बल्लेबाज द्वारा बनाया गया सर्वाधिक स्कोर क्या है?

डॉन ब्रेडमैन (309 रन)

ऑस्ट्रेलिया के महान बल्लेबाज डॉन ब्रेडमैन दुनिया के एकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में 300 से ज्यादा रन बनाने का कारनामा अंजाम दिया. यह कारनामा उन्होंने 1930 में इंग्लैंड के खिलाफ लीड्स टेस्ट के दौरान किया था. इस मैच में उन्होंने मैच के पहले ही दिन जबरदस्त बल्लेबाजी करते हुए 309 रन बना दिये. ब्रेडमैन की इस विस्फोटक बल्लेबाजी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही दिन का खेल खत्म होने तक 3 विकेट खोकर 458 रन बना लिया था.

वॉली हेमंड (295 रन)

इंग्लैंड के महान बल्लेबाज वॉली हेमंड टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में दूसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं. उन्होंने 1933 में न्यूजीलैंड के खिलाफ ऑकलैंड टेस्ट के दूसरे दिन 295 रन बना दिये थे. हेमंड पहले दिन 41 रन बनाकर नाबाद लौटे थे और दूसरे दिन जब वह आउट हुए तो उनका स्कोर 336 रन हो चुका था. हालांकि हेमंड की आक्रामक बल्लेबाजी भी मैच का नतीजा लाने में असफल रही और इंग्लैंड को यह मैच ड्रॉ से संतोष करना पड़ा.

वीरेन्द्र सहवाग (284 रन)

भारत के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग क्रिकेट में भी वनडे अंदाज में बल्लेबाज करने के लिए जानें जाते थे. सहवाग एकलौते ऐसे एशियाई बल्लेबाज हैं जिन्होंने 2 बार एक दिन में 250 से ज्यादा रन बनाने का कारनामा अंजाम दिया. सहवाग ने पहली बार यह कारनामा 2009 में अंजाम दिया. श्रीलंका के खिलाफ मुंबई टेस्ट में उन्होंने एक दिन में ही 284 रन ठोंक दिये थे. मैच के दूसरे दिन उनके बल्ले से 40 चौके और 7 हवाई छक्के निकले. सहवाग मैच के तीसरे दिन 293 रन बनाकर आउट हुए.

डेनिस कांपटन (273 रन)

इंग्लैंड के डेनिस कांपटन ने पाकिस्तान के खिलाफ 1954 में नॉटिंघम टेस्ट के दौरान एक दिन में 273 रन बना दिये थे. कांपटन मैच के पहले दिन 5 रन पर नाबाद थे, लेकिन दूसरे दिन उन्होंने पाकिस्तानी गेंदबाजों की खबर लेते हुए 273 रन और जोड़ दिये. कांपटन जब आउट हुए तो वह 278 रन बना चुके थे.

अब नहीं देखने पड़ेंगे यूट्यूब पर विज्ञापन

अक्सर यूट्यूब पर गाने सुनने वाले, ऑन लाइन फिल्में देखने वाले या यूट्यूब पर वीडियोज देखने वाले लोगों के लिए गूगल की ओर से एक खुश खबरी है. गूगल ने घोषणा करते हुए जानकारी दी है कि यूट्यूब पर वीडियो शुरू होने के पहले आने वाले 30 सेकंड्स के विज्ञापन जिन्हें अब तक हटाया नहीं जा सकता था, उन्हें गूगल 2018 तक बंद कर देगी. अब तक मिली खबरों के अनुसार गूगल के एक प्रवक्ता के मुताबिक अब गूगल कमर्शियल फॉर्मेट की तरफ ध्यान देगा, जो कि विज्ञापनदाताओं और दर्शकों दोनों के ही लिए लाभदायक होगा.

गूगल के अनुसार, गूगल उपयोगकर्ताओं को ऑनलाइन बेहतर से बेहतर ऐड एक्सपिरिएंस या अच्छे विज्ञापन अनुभव देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. यही कारण है कि गूगल ने ये फैसला किया है. इसीलिए अब साल 2018 तक गूगल यूट्यूब पर 30 सेकंड्स के ना हटाया जा सकने वाले विज्ञापनों को सपोर्ट करना बंद कर देगा. और अब गूगल, इसकी जगह यूट्यूब पर ऐसे विज्ञापन फॉर्मेट्स पर काम करेगा जो उपयोगकर्ताओं और एडवर्टाइजर्स यानि कि विज्ञापनदाताओं दोनों के लिए बेहतर और फायदेमंद हो.

आप यहां ये ना भूलें कि यूट्यूब पर वीडियो के पहले आने वाले 30 सेकंड वाले ना हटाये जा सकने वाले विज्ञापन के खत्म होने के बाद भी यहां 15 से 20 सेकंड्स वाले ऐड वीडियोज नजर आते रहेंगे. और इसके साथ ही साथ ही 6 सेकंड्स वाले बंपर कहे जाने वाले वीडियोज की संख्या भी बढ़ सकती है.

अब इस फैसले को लागू करने के लिए साल 2018  तक का इंतजार किया जा रहा है. अब ऐसे में अभी आगे आने वाले कई महीनों, आपको 30 सेकंड्स के विज्ञापन वीडियोज देखने ही पड़ेंगे. अब तो उम्मीद है करते हैं कि गूगल यूट्यूब वीडियोज के बीच आने वाले लंबे विज्ञापन वीडियोज भी बंद कर दे. अगर ऐसा होता है तो ये सभी उपयोगकर्ताओं के लिए और भी बेहतर होगा.

निवेश से जुड़ी छोटी छोटी मगर मोटी बातें

कम उम्र में ही बचत की शुरुआत करने से भविष्य में वित्तीय परेशानियों से बचा जा सकता है. आजकल लोग 22-23 की उम्र से नौकरी करने लगते हैं, पर बचत या निवेश शुरु करने में काफी समय लगा देते हैं. जिन्दगी को दिल खोल कर जीने के चक्कर में अपने हाथ कुछ ज्यादा ही खुले छोड़ देते हैं. जिन्दगी को दिल खोलकर ही जीना चाहिए, पर संभलकर चलना बहुत जरूरी है. कल किसी ने नहीं देखा है. कोरपोरेट की दुनिया में असमय ही मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है. इसलिए भविष्य को ध्यान में रखकर चलना बहुत जरूरी है.

सही समय पर अगर सही निवेश किया जाए तो तो आपका भविष्य सुरक्षित हो सकता है. इसके साथ ही आपके उम्र के आखिरी पड़ाव में किसी पर निर्भर भी नहीं होना पड़ेगा.

ज्यादा रिटर्न पाने के लिए कम उम्र में ही शुरु करें सही जगह निवेश

1. बचत है करना है जरूरी

बचत करना बहुत जरूरी है. बचत कम करें, पर जरूर करें. छोटी से छोटी बचत भी जरूरत के समय बहुत काम आती है. बचत की आदत डालना बहुत जरूरी है. शुरुआत इक्विटी फंड में निवेश या सेविंग के लिए अलग खाता खुलवाकर कर सकते हैं.

2. सही जगह करें निवेश

निवेश में हड़बड़ी में गड़बड़ी की संभावनाएं बनी रहती है. इसलिए रिटर्न को ध्यान में रखकर ही निवेश करें. जहां रिटर्न की ज्यादा से ज्यादा संभावनाएं हों वहीं निवेश करें. अगर आप बैंक में 8 फीसदी सालाना दर पर एफडी करवाते हैं और महंगाई की दर भी 8 फीसदी ही है तो महंगाई आपके रिटर्न को खत्म कर देती है. ऐसे में लंबे समय तक आपको निवेश से कोई फायदा नहीं होता है.

3. सही जानकारी से बचाएं टैक्स

टैक्स सेविंग को लेकर युवा ज्यादा गंभीर नहीं होते हैं और आराम से अपनी लाइफ गुजारते हैं. उम्र के इस पड़ाव में अगर हम इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में निवेश कर टैक्स की बचत की जा सकती है. इसके साथ ही इसमें अच्छे रिटर्न की संभावनाएं भी बढ़ जाती है.

कुछ ऐसी रही आईपीएल 2017 की नीलामी

आईपीएल के दसवें सीजन के लिए को बंगलुरु में हुए ऑक्शन में कई खिलाड़ियों के लिए बोली लगी जिनमें कई खिलाड़ी करोड़पति बने तो किसी को कोई खरीदार नहीं मिला. इंग्लैंड के बेन स्टोक्स सबसे महंगे खिलाड़ी रहें. उन्हें राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स ने 14.5 करोड़ रुपये में खरीदा. लेकिन भारत के इशांत शर्मा, इरफान पठान जैसे कई खिलाड़ी नहीं बिक पाए.

आईपीएल 2017 के लिए 66 खिलाड़ियों की बोली लगी. टीमों ने 91.15 करोड़ रु. खर्च किए. आईपीएल का 10वां संस्करण 5 अप्रैल से 21 मई तक खेला जाएगा. आईपीएल 2017 के लिए खिलाड़ियों की नीलामी के बाद अब 8 टीमें इस प्रकार होंगी.

गुजरात लायंस

मौजूदा टीम

सुरेश रैना (कप्तान), रवींद्र जडेजा, जेम्स फॉकनर, ब्रेंडन मैक्कुलम, ड्वेन ब्रावो, आरोन फिंच, ड्वेन स्मिथ, कार्तिक (विकेटकीपर), धवल कुलकर्णी, प्रवीण कुमार, एंड्रयू टी, ईशान किशन, प्रदीप सांगवान, शिविल कौशिक, शादाब जकाती, जयदेव शाह

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

मनप्रीत गोनी, नाथू सिंह, बासिल थंपी, टीएस बारोका, जेसन रॉय, मुनाफ पटेल, चिराग सुरी, शैली शौर्या, शुभम अग्रवाल, प्रथम सिंह और अक्श दीप नाथ

सनराइजर्स हैदराबाद

मौजूदा टीम

डेविड वॉर्नर (कप्तान), शिखर धवन, भुवनेश्वर कुमार, एम. हेनरिक्स, नमन ओझा (विकेटकीपर), रिकी भुई, केन विलियम्सन, सिद्धार्थ कौल, बिपुल शर्मा, आशीष नेहरा, युवराज सिंह , बेन कटिंग, अभिमन्यु मिथुन, मुस्ताफिजुर रहमान, बरिंदर सरां, दीपक हुड्डा, विजय शंकर

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

तन्मय अग्रवाल, राशिद खान, प्रवीण तांबे, मो. नबी, एकलव्य द्विवेदी, बेन लाफलिन, मो. सिराज

रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु

मौजूदा टीम

विराट कोहली (कप्तान), एबी डिविलियर्स, क्रिस गेल, यजुवेंद्र चहल, हर्षल पटेल, मंदीप सिंह, एडम मिलने, सरफराज खान, एस. अरविंद, केदार जाधव, शेन वॉटसन, स्टूअर्ट बिन्नी, सैम्युअल बद्री, ट्राविस हेड, सचिन बेबी, इकबाल अब्दुल्ला, केएल राहुल, अवेश खान, तबरेज शम्सी

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

टायमल मिल्स, पवन नेगी, अनिकेत चौधरी, प्रवीण दुबे, बिली स्टैनलेक

किंग्स इलेवन पंजाब

मौजूदा टीम

मुरली विजय (कप्तान), डेविड मिलर,मनन वोहरा, अक्षर पटेल, ग्लेन मैक्सवेल, गुरकीरत सिंह, अनुरीत सिंह, संदीप शर्मा, शार्दुल ठाकुर, शॉन मार्श, ऋद्धिमान साहा (विकेटकीपर), निखिल नाइक, मोहित शर्मा, मार्कस स्टोइनिस, केसी करिअप्पा, अरमान जाफर, प्रदीप साहू, स्वप्निल सिंह, हाशिम अमला

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

वरोण आरोन, मैट हेनरी, टी. नटराजन, इयोन मॉर्गन, राहुल तेवतिया, मार्टिन गुप्टिल, डैरेन सैमी, रिंकू सिंह

कोलकाता नाइट राइडर्स

मौजूदा टीम

गौतम गंभीर (कप्तान), सुनील नरेन, कुलदीप यादव, मनीष पांडे, सूर्यकुमार यादव, पीयूष चावला, रॉबिन उथप्पा (विकेटकीपर), शाकिब अल हसन, क्रिस लिन, उमेश यादव, यूसुफ पठान, शेलडन जैकसन, अंकित सिंह राजपूत

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

क्रिस वोक्स, ट्रेंट बोल्ट, ऋषि धवन, नाथन कुल्टर नाइल, रॉवमैन पॉवेल, संजय यादव, ईशांक जग्गी, डेरेन ब्रावो, श्याम घोष

मुंबई इंडियंस

रोहित शर्मा (कप्तान), कीरोन पोलार्ड, लसिथ मलिंगा, हरभजन सिंह,अंबति रायुडू, जसप्रीत बुमराह, श्रेयस गोपाल, लेंडल सिमंस, विनय कुमार, पार्थिव पटेल (विकेटकीपर), मिचेल मैक्लेनाघन, नीतीश राणा, सिद्धार्थ लाड, जे सुचित, हार्दिक पंड्या, जोस बटलर, टिम साउदी, जितेश शर्मा, क्रुनाल पंड्या, दीपक पूनिया

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

निकोलस पूरन, मिचेल जॉनसन, गौथम के., कर्ण शर्मा, सौरभ तिवारी, असेला गुणरत्ना, कुलवंत खेजरोलिया

दिल्ली डेयडेविल्स

मौजूदा टीम

जेपी डुमिनी (कप्तान), मो. शमी, क्विंटन डि कॉक (विकेटकीपर), शाहबाज नदीम, जयंत यादव, अमित मिश्रा, श्रेयस अय्यर, जहीर खान, सैम बिलिंग्स, क्रिस मॉरिस, कार्लोस ब्रेथवेट, करुण नायर, ऋषभ पंत, सीवी मिलिंद, सैयद अहमद, प्रत्युष सिंह

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

एंजेलो मैथ्यूज, कोरी एंडरसन, पैट्रिक कमिंस, अनिकेत बवाने, कागिसो रबाडा, आदित्य तारे, नवदीप सैनी, शशांक सिंह

राइजिंग पुणे सुपरजायंट्स

मौजूदा टीम

स्टीवन स्मिथ (कप्तान), एमएस धोनी(विकेटकीपर),अजिंक्य रहाणे, आर. अश्विन, फाफ डु प्लेसिस, मिचेल मार्श, अशोक डिंडा, अंकुश बैंस, रजत भाटिया, अंकित शर्मा, ईश्वर पांडे, एडम जांपा, जसकरन सिंह, बाबा अपराजित, दीपक चाहर, उस्मान ख्वाजा, मयंक अग्रवाल

नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी

बेन स्टोक्स, जयदेव उनादकट, राहुल चहार, सौरभ कुमार, डैन क्रिस्टियन, मिलिंद टंडन, मनोज तिवारी, लोकी फर्ग्यूसन

ऑक्शन के दौरान विदेशी खिलाड़ियों की धूम मची तो वहीं देशी खिलाड़ियों में कुछ ही खिलाड़ी अच्छी रकम में बिक पाये.

विदेशी खिलाड़ी, जो छाए रहे

– बेन स्टोक्स (इंग्लैंड) 14.5 करोड़ में पुणे ने खरीदा

– टायमल मिल्स (इंग्लैंड) 12 करोड़ में बंगलुरु ने खरीदा

– कागिसो रबाडा (साउथ अफ्रीका) 5 करोड़ में दिल्ली ने खरीदा

– ट्रेंट बोल्ट (न्यूजीलैंड) 5 करोड़ में कोलकाता ने खरीदा

– पैट कमिंस (ऑस्ट्रेलिया) 4.5 करोड़ में दिल्ली ने खरीदा

– एंजेलो मैथ्यूज (श्रीलंका) दिल्ली ने 2 करोड़ में खरीदा

– मिशेल जॉनसन (ऑस्ट्रेलिया) को मुंबई ने 2 करोड़ में खरीदा

– कोरी एंडरसन (न्यूजीलैंड) को दिल्ली ने 1 करोड़ में खरीदा

देशी खिलाड़ी, कुछ छाए कुछ बिक नहीं पाए

– तमिलनाडु के टी नटराजन को पंजाब ने 3 करोड़ रुपये में खरीदा

– वरुण एरोन को पंजाब ने 2.8 करोड़ में खरीदा

– ऑलराउंडर कृष्णप्पा गौथम को मुंबई इंडियंस ने 2 करोड़ रुपये में खरीदा

– मुनाफ पटेल को गुजरात ने 30 लाख में खरीदा

– आरसीबी ने पवन नेगी को 1 करोड़ में खरीदा

– ईशांत शर्मा को नहीं मिला खरीदार

– इरफान पठान को नहीं मिला खरीदार

– चेतेश्वर पुजारा को किसी भी टीम ने नहीं खरीदा

– एस बद्रीनाथ, अभिनव मुकुंद और मनोज तिवारी को किसी ने नहीं खरीदा

– कश्मीरी ऑलराउंर परवेज रसूल की ओर किसी फ्रेंचाइजी का ध्यान नहीं गया

– टी-20 में तिहरा शतक जड़ने वाले मोहित अहलावत को नहीं मिला कोई भी खरीदार

आईपीएल में ऊंचे दामों पर बिकने वाले खिलाड़ियों में ज्यादातर टीम इंडिया के खिलाड़ी शामिल रहे हैं लेकिन इस बार इंग्लैंड के खिलाड़ी बेन स्टोक्स ने बाजी मार ली है. स्टोक्स को 14.5 करोड़ में राइजिंग पुणे सुपरजायन्‍ट्स की टीम ने खरीदा. एक नजर डालते हैं आईपीएल इतिहास में सबसे महंगे बिकने वाले पांच खिलाड़ियों पर.

बेन स्टोक्स (राइजिंग पुणे सुपरजायन्‍ट्स, 2017)

आईपीएल सीजन 10 में सबसे ज्यादा रकम बेन स्टोक्स को मिली है. स्टोक्स को पुणे ने 14.50 करोड़ में खरीदा. ऑल-राउंडर स्टोक्स को अपने बेस प्राइस से 7 गुना ज्यादा दाम पर पुणे ने खरीदा है. स्टोक्स बड़े शॉट्स लगाते हैं और 140 किलोमीटर प्रतिधंटे की रफ्तार से लगातार गेंद फेंकते है. टी20 के माहिर खिलाड़ी स्टोक्स पुणे के लिए एक मैच फीनिशर की भूमिका बखूबी निभा सकते हैं.

युवराज सिंह (दिल्ली डेयरडेविल्स, 2015)

आईपीएल में सबसे महंगे बिकने का रिकॉर्ड युवराज सिंह के नाम है. युवराज सिंह एक धमाकेदार बल्लेबाज हैं इस बात से किसी को इनकार नहीं है, लेकिन आईपीएल 2015 में उन्हें 16 करोड़ में दिल्ली डेयरडेविल्स की टीम ने खरीदकर सबको अचंभे में डाल दिया. टी20 वर्ल्ड कप में 6 गेंदों पर 6 छक्के लगाने वाले युवराज ने कई मैचों में अपनी शानदार बल्लेबाजी भी दिखाई. युवी ने 2015 सीजन के 14 मैचों में 248 रन बनाए और 1 विकेट झटका.

वैसे युवराज ने आईपीएल के 108 मैचों में दो हजार से ज्यादा रन बनाए हैं और गेंदबाजी करते हुए 35 विकेट लिए हैं. आईपीएल 2014 में भी युवराज सिंह पर जमकर बोली लगी थी. युवी को रॉयल चैलेंजर बंगलुरू ने 14 करोड़ में खरीदा था. इस सीजन युवराज ने 14 मैचों में 376 रन बनाए और 5 विकेट लिए.

दिनेश कार्तिक (दिल्ली डेयरडेविल्स, 2014)

आईपीएल 2014 में युवराज के अलावा दिनेश कार्तिक की भी किस्मत खुली. कार्तिक को दिल्ली ने 12.5 करोड़ में खरीदा था. विकेटकीपर-बल्लेबाज कार्तिक ने उस सीजन 14 मैचों में 325 रन बनाए जिसमें 3 अर्द्धशतकीय पारी शामिल थी. वैसे अगले सीज़न उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा. कार्तिक 2015 सीजन में अपने नाम और दाम के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सके.

रविंद्र जडेजा (चेन्नई सुपरकिंग्स, 2012)

ऑलराउंडर रविंद्र जडेजा को चेन्नई सुपर किंग्स ने 2011 में 9.72 करोड़ में खरीदा. जडेजा ने मिले दाम को सही साबित किया और सीजन दर सीजन चेन्नई के लिए मैच विनर साबित हुए. जडेजा ने 2011 सीजन में 14 मैचों में 283 रन बनाए और 8 विकेट लिए. वैसे 'सर जडेजा' नाम से मशहूर जडेजा के खाते में आईपीएल के 126 मैचों में 1574 रन हैं और 77 विकेट हैं.

गौतम गंभीर (कोलकाता नाइटराइडर्स, 2011)

कोलकाता नाइटराइडर्स अगर दो दफा आईपीएल चैंपियन (2012 और 2014) बनी तो इसका श्रेय गौतम गंभीर को जाता है. शाहरुख खान की टीम ने दिल्ली के दमदार को 2011 सीजन में 11.4 करोड़ में खरीदा. इसके बाद से गंभीर लगातार टीम के साथ बने हुए हैं. गंभीर ने 2011 सीजन में 15 मैचों में 378 रन बनाए. वैसे गंभीर के नाम आईपीएल के 132 मैचों में 3634 रन हैं.

मेरी बीवी की सैक्स करने की इच्छा बहुत कम होती है. क्या इस की कोई दवा है.

सवाल

मेरी बीवी की सैक्स करने की इच्छा बहुत कम होती है. क्या इस की कोई दवा है?

जवाब

आप अपनी बीवी को रोमांटिक किताबें पढ़ने को दें और नियमित रूप से रोमांटिक व सैक्सी फिल्में भी दिखाएं. इस से बीवी की फितरत पर फर्क पड़ेगा. हमबिस्तरी से पहले उसे देर तक फोरप्ले कर के जोश में लाएं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मैं एक तलाकशुदा औरत के साथ कई बार सेक्स कर चुका हूं. घर वाले शादी को राजी नहीं हैं. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 25 साल का हूं और पड़ोस की एक तलाकशुदा औरत से बहुत प्यार करता हूं. मैं उस के साथ कई बार हमबिस्तरी भी कर चुका हूं. चूंकि वह औरत दूसरी जाति की है, इसलिए घर वाले शादी के लिए राजी नहीं हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

दूसरी जाति की औरत के साथ हमबिस्तरी की जा सकती है, तो शादी क्यों नहीं कर सकते? आप दोनों अदालती शादी कर के अपना घर बसा लें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

बिना इंटरनेट कनेक्शन के करें पेमेंट

डिजिटल भुगतान पर जोर देने के लिए सरकार ने कई नई सुविधाएं लॉन्च की है. इसी कड़ी में अब सरकार ने देसी क्विक रिस्पांस(क्यूआर) कोड भी जारी कर दिया है. अब आप एक ही क्यूआर कोड से किसी भी पेमेंट नेटवर्क के जरिए भुगतान कर सकते हैं. अब आप छोटी सी छोटी जगह पर भी बिना बिजली और इंटरनेट कनेक्शन के आसानी से भुगतान कर सकते हैं.

इन्होंने किया विकसित

भारतक्यूआर कोड को नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने मास्टर कार्ड और वीजा ने विकसित किया है. भारतक्यूआर के जरिए पेमेंट करने के लिए बैंक की मोबाइल ऐप में डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड की जानकारी सेव करनी होगी. जल्द ही क्यूआर कोड के जरिए यूपीआई और आधार कार्ड से जुड़ी पेमेंट्स भी की जा सकेंगी.

अलग-अलग पेमेंट ऐप्स का एक ही दुकान पर अलग-अलग क्यूआर कोड रखा या टंगा होता है. पर भारतक्यूआर से व्यापारियों और दुकानदारों को बड़ी सहूलियत होगी. इसके लिए डिजिटल पीओएस मशीन की भी जरूरत नहीं होगी. बस आपके पास एक स्मार्ट फोन होना चाहिए.

क्यूआर कोड आधारित भुगतान व्यवस्था से भुगतान आसानी से हो जाता है. इसमें बस स्कैन कर भुगतान करना होता है. भारतक्यूआर में बैंक अकाउंट व आईएफसी कोड, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस और आधार की जानकारी देने की भी सुविधा उपलब्ध होगी. इससे डिजिटल भुगतान के लिए ज्यादा से ज्यादा आधार मौजूद होंगे. नैशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने पेमेंट के लिए भीम ऐप लॉन्च किया गया था.

राजनीति के बिगड़े बोल

भारतीय राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी. ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है. ये ऐसा समय है जब शब्द सहमे हुए हैं, क्योंकि उनके दुरुपयोग की घटनाएं लगातार जारी हैं. राजनीति जिसे देश चलाना है और देश को रास्ता दिखाना है, वह खुद गहरे भटकाव की शिकार है. लोग निरंतर अपने ही बड़बोलेपन से ही मैदान जीतने की जुगत में हैं और उन्हें लगता है कि यह ‘टीवी समय’ उन्हें चुनावी राजनीति में स्थापित कर देगा. दिखने और बोलने की संयुक्त जुगलबंदी ने टीवी चैनलों को कच्चा माल उपलब्ध कराया हुआ है, तो राजनीति में जल्दी स्थापित होने की त्वरा में लगे नए नौजवान भी भाषा की विद्रूपता का ही अभ्यास कर रहे हैं.

यह गिरावट चौतरफा है. बड़े रास्ता दिखा रहे हैं, नए उनसे सीख रहे हैं. टीवी और सोशल मीडिया इस विद्रूप का प्रचारक और विस्तारक बना हुआ है. न पद का लिहाज, न आयु का, ना ही भाषा की मर्यादा-सब इसी हमाम में नंगे होने को आतुर हैं. राजनीति से व्यंग्य गायब है, हंसी गायब है, परिहास गायब है- उनकी जगह गालियों और कटु वचनों ने ले ली है. राजनीतिक विरोधी के साथ शत्रु की भाषा बोली और बरती जा रही है. यह संकटकाल बड़ा है और कठिन है.

पहले एकाध आदित्यनाथ थे. आज सब इन्हें हटाकर खुद को उनकी जगह स्थापित करना चाहते हैं. केंद्रीय राजनीति के सूरमा हों या स्थानीय मठाधीश कोई भाषा की शुचिता का पालन करता नहीं दिखता. जुमलों और कटु वचनों ने जैसी जगह मंचों पर बनाई, उसे देखकर हैरत होती है. बड़े पदों पर आसीन राजनेता भी चुनावी मोड में अपने पद की मर्यादा भूलकर जैसी टिप्पणियां कर रहे हैं, उसका मूल्यांकन समय करेगा. किंतु इतना तो यह है कि यह समय राजनीति भाषा की गिरावट का समय बन चुका है.

आलोचना, विरोध, षडयंत्र का अंतर भी लोग भूल गए हैं. आलोचना अगर स्वस्थ तरीके से की जाए, अच्छी भाषा में की जाए तो भी प्रभाव छोड़ती है. अच्छी भाषा में भी कड़ी से कड़ी आलोचना की जा सकती है. किंतु इस टीवी समय में राजनेता की मजबूरी कुछ सेकेंड की बाइट में बड़ा प्रभाव छोड़ने की रहती है. ऐसे में वह कब अपनी राह से भटक जाता है उसे खुद भी पता नहीं लगता. भाषा की गिरावट यह दौर आने वाले समय में भी रूकने वाला नहीं है. टीवी से सोशल मीडिया, फिर मोबाइल टीवी तक यह गिरावट जारी ही रहने वाली है. हमारे समय का संकट यह है कि राजनीति में आर्दश हाशिए पर हैं. शुचिता और पवित्रता के सवाल राजनीति में बेमानी लगने लगे हैं. जिनकी वाणी पर देश मुग्ध रहा करता था ऐसा राजनेता न सिर्फ खामोश हैं बल्कि काल के प्रवाह में वे अप्रासंगिक भी लगने लगे हैं. संसद से लेकर विधानसभाओं तक में बहस का स्तर गिर रहा है. नेता सदनों से भाग रहे हैं और मीडिया पर सारी जंग लड़ने पर आमादा हैं.

ऐसे कठिन समय में राजनेताओं, राजनीतिक दलों और राजनीतिक विश्लेषकों को नई राह तलाशनी होगी. उन्हें एक नया पथ बताना होगा जिसमें स्वस्थ संवाद की बहाली हो. मीडिया की व्यापक मौजूदगी, कैमरों की चकाचौंध और पल-पल की कवरेज के बावजूद हमारे चुनाव अभियानों से गंभीरता गायब है, मुद्दे गायब हैं और लोगों का दर्द गायब है. आरोप-प्रत्यारोप और दूसरे से बेहतर मैं, सारी बहस इसी पर टिकी है. यह गजब है ईमानदारी, भ्रष्टाचार, जातिवाद और परिवादवाद जैसे सवालों पर राजनीतिक दलों ने शीर्षासन कर दिया है. कोई दल आज प्रत्याशी चयन तक में शुचिता का संकल्प नहीं ले सकता. दलबदल तो थोक में जारी है. सरकार की आज दूसरे दलों में जाकर शामिल हो जाती है. ऐसे में पार्टी या विचारधारा के सवाल बहुत पीछे छूट गए हैं. काडर पीछे छूट गया है और जीत सकने वाले उम्मीदवारों का हर दल में स्वागत है. उनका अतीत राजनीतिक दलों के मूल्यांकन का विषय नहीं है.

अब सिर्फ दलों के झंडे अलग हैं और मैदानी राजनीति में उनका आचरण कमोबेश एक सा ही है. ऐसे में ये उम्मीदवार जीतकर भी एक बड़ी पराजय सरीखे ही हैं. सारे सिद्धातों की बलि व्यवहारिक राजनीति के नाम पर चढ़ाई जा रही है. राजनीतिक दलों में गिरावट की स्पर्धा है. कौन ज्यादा गिर सकता है, इसकी होड़ है. शुचिता और पवित्रता के शब्द मैदानी राजनीति के लिए अछूत ही हैं. राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ बोलते हुए राजनेता अपने ही दल के अपराधियों को महिमामंडित करने से नहीं चूकते. यहां तक की आलोचना का केंद्र रहा व्यक्ति दल बदल करते ही नए दल के लिए पवित्र हो जाता है.

डा. राममनोहर लोहिया शायद इसीलिए कहते थे “लोकराज लोकलाज से चलता है.” लेकिन हमने देखा उनके अनुयायियों ने लोकलाज की सारी सीमाएं तोड़ दीं.  आज जबकि राजनीति के मैदान कीचड़ से सने हैं, तो भी हमें इसकी सफाई के लिए कुछ जतन तो करने ही होगें. चुनाव एक अवसर होते हैं जब राजनीतिक दलों और राजनीति के शुद्धिकरण की सोच रखने वालों को इसकी शुचिता पर सोचना ही चाहिए. यह पहल हमने आज नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी.

– संजय द्विवेदी

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