Download App

जोगी की टकसाल में सिक्कों का कारोबार

कांग्रेस से निकाले जाने के बाद अपनी अलग पार्टी बना चुके छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी शरद पवार या ममता बनर्जी साबित होंगे या नहीं, इस सवाल का जबाब 2 साल बाद विधान सभा चुनाव नतीजे देंगे, पर हाल फिलहाल फुर्सत में बैठे अजीत जोगी ने चुनावी फंड इकट्ठा करने अपना खुद का टकसाल खोलने का मन जरूर बना लिया है. फैसला प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की 8 नवंबर वाली नोट बंदी से लिया गया लगता है, जिसने देश भर में हाहाकार मचा दिया था. उलट इसके जोगी की मंशा अपने नाम के सिक्के चलवाने की है, जिन्हे बाकायदा बेचने की योजना जोगी कांग्रेस के उत्साही रणनीतिकार रायपुर में बैठकर बना चुके हैं.

योजना के मुताबिक जोगी कांग्रेस 500 किलो चांदी खरीदेगी, जिसकी कीमत लगभग 2.5 करोड़ रुपये होती है. इस चांदी को सिक्कों में ढाला जाएगा. एक सिक्का 5 ग्राम वजन का होगा, जिसे 2 हजार रुपये में बेचा जाएगा. इस तरह तकरीबन 20 करोड़ रुपये इकट्ठा किये जाएंगे. अंदाजा है कि सिक्के ढालने यानि टकसाल डालने मे 50 लाख रुपये का खर्च आएगा. सिक्के की खासियत यह होगी कि इसके एक तरफ अजीत जोगी का फोटो होगा, तो दूसरी तरफ रजत अक्षरों में अंकित होगा 50 वर्षों की समर्पित जनसेवा.

सार्वजनिक जीवन के 50 साल पूरे करने जा रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी कभी नेहरू गांधी परिवार के इतने नजदीक माने जाते थे कि कहा यह भी जाने लगा था कि राजीव या सोनिया गांधी को छींक भी आती थी तो जो कांग्रेसी अपनी नाक पोंछने लगते थे अजीत जोगी उनमे से एक होते थे. अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की लुटिया डुबो दी, यह कतई दिक्कत की बात नहीं थी. दिक्कत की बात थी उनका बेटे अमित सहित राहुल गांधी पर आखें तरेरने लगना, नतीजा वही जिसके लिए कांग्रेस जानी जाती है पार्टी से निष्कासन. दाद देनी होगी अजीत जोगी की हिम्मत को जो निष्कासन के बाद ज्यादा रोये गाये नहीं और रातों रात अपनी पार्टी खड़ी कर ली.

यह दीगर बात है कि जोगी कांग्रेस अपनी उम्र और हैसियत के मुताबिक अभी घुटनो के बल घिसट सी रही है उसके पास नींद से ज्यादा और बड़े सपने हैं. एक हादसे में अपने दोनों पैर गंवा चुके जोगी के हौसले बुलंद हैं, जिनका राजनैतिक चिंतन मंथन एक दायरे में सिमटा है कि छग की जनता मुख्यमंत्री रमन सिंह और भाजपा से आजिज़ आ चुकी है और कांग्रेस उनके बगैर चलने से रही, लिहाजा उनकी तो चांदी ही चांदी है. इसी चांदी चिंतन की देन है चांदी के सिक्के जो अभी बनना शुरू नहीं हुये हैं, लेकिन 25-30 कार्यकर्ताओं ने उनकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग शुरू कर दी है. अब देखना दिलचस्पी की बात होगी कि लोग सौ रुपये का सिक्का 2 हजार में खरीदते हैं या नहीं.  

क्या हैकर्स के कंट्रोल में है आपका हेडफोन

आए दिन हम हैकर्स के बारे में सुनते रहते हैं, हैकर्स आपका फेसबुक अकाउंट, ई-मेल अकाउंट जैसी चीजें हैक करते हैं. आज के समय में हैकर इतने होशियार हो गए हैं कि वे अब लोगों के हेडफोन तक हैक करने लगे हैं.

यह जानकर आपको आश्‍चर्य होगा कि हेडफोन भी हैक होने लगे हैं. एक रिपोर्ट ने अनुसार, इजरायली विशेषज्ञों के द्वारा हेडफोन हैकिंग का मामला सामने लाया गया है.

इजरायली विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट तैयार किया है. इसमें यह बताया गया है कि हैकर्स आपके ऑडियो को रिकॉर्ड करने के लिए या आपकी बातचीत को सुनने के लिए हेडफोन को कैसे हैक कर सकते हैं. और सबसे हैरानी की जब आपका हेडफोन आपके कंप्यूटर और मोबाइल से कनेक्ट नहीं होगा तब भी हैकर्स, आपकी बातचीत सुन सकते हैं.

हेडफोन हैक करने की प्रक्रिया

मैलवेयर नाम के सॉफ्वेयर के जरिए आपके हेडफोन को माइक्रोफोन में बदल दिया जाता है और फिर इसके जरिए आपकी बातचीत रिकॉर्ड होती रहती है.

मैलेवेयर सॉफ्वेयर के जरिए इयरबड में लगे स्पीकर को माइक्रोफोन में कनवर्ट कर दिया जाता है जिससे आप-पास की बातें हैकर्स के पास जा सकती हैं. इससे एक पूरे कमरे में की जा रही बातचीत को कवर किया जा सकता है.

इयर बड्स को माइक्रोफोन के तौर पर आप भी यूज कर सकते हैं ये ज्यादा मुश्किल नहीं है. हैकर्स हेडफोन हैकिंग के लिए पहले कंप्यूटर के ऑडियो कोडेक चिपसेट Realtek Audio को हैक करते हैं. एक बार ऑडियो चिप हैक हो जाती है तो फिर इनपुट और आउटपुट को स्विच कर दिया जाता है और इस वजह से हेडफोन इनपुट डिवाइस के तौर पर काम करने लगता है.

आपके हेडफोन में इन्बिल्ट माइक्रोफोन है तो हैक करने वालों का काम आसान हो जाएगा. लेकिन अगर माइक्रोफोन नहीं है तो भी हैकर्स चाहें तो आपके हेडफोन को अपने कंट्रोल में ले सकते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय सिनेमा का जलवा

दो भारतीय फिल्मों को वार्षिक बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में शीर्ष सम्मान प्राप्त हुए हैं. बॉलीवुड अभिनेता राज कुमार राव और अंजलि पाटिल द्वारा अभिनीत एक राजनीतिक व्यंग्य आधारित फिल्म न्यूटन ने बर्लिन के 67 वें बर्लिन फिल्म समारोह के फोरम सेगमेंट में, इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ आर्ट सिनेमाज अवार्ड (सीआईसीएई) जीता है. एक और भारतीय लघु फिल्म ‘आबा’ भी इस समारोह में सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म के लिए अंतर्राष्ट्रीय सूची में शामिल है. फिल्म ‘आबा’ ने इस फिल्म महोत्सव की जूरी का विशेष पुरस्कार भी जीता.

बर्लिन के इस 67 वें फिल्म समारोह में फिल्म ‘न्यूटन’ का वर्ल्ड प्रीमियर भी प्रदर्शित किया गया. इस फिल्म का निर्देशन अमित मसूरकर ने किया है, वहीं फिल्म ‘आबा’, नो वन किल्ड जेसिका के निर्देशक राजकुमार गुप्ता द्वारा तैयार की गई है. इसका निर्देशन अमर कौशिक द्वारा किया गया है. फिल्म एक अपरंपरागत प्रेम कहानी है.

राज कुमार राव ने भी अपनी फिल्म न्यूटन को लेकर ये खबर अपने ट्विटर एकाउण्ट के जरिए सभी से सांझा की है. निर्देशक अमित ने भी पुष्टि कर दी है कि फिल्म साल 2017 के मध्य रिलीज की जाऐगी.

फिल्म न्यूटन की पूरी कहानी, चुनाव ड्यूटी पर तैनात एक क्लर्क के जीवन पर आधारित है. जो कि मध्य भारत के एक संघर्ष से जूझ रहे जंगली क्षेत्र में, स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान संचालित करने की पूरी कोशिश करता है. फिल्म की कहानी राजनीति के कई दावपेचों के इर्दगिर्द घूमती है.

कलाकार होने की यह सबसे बड़ी खूबसूरती है : शाहिद कपूर

शाहिद कपूर के करियर पर जब निगाह दौड़ाते हैं, तो पता चलता है कि शाहिद ने जब जब विशाल भारद्वाज के निर्देशन में फिल्में की है, तब तब उन्हें सफलता मिली है. फिलहाल वह विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म ‘‘रंगून’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं.

आपके करियर में जो टर्निंग प्वाइंट रहे हैं, उनका आपकी निजी जिंदगी में क्या असर रहा?

मेरी जिंदगी व मेरे करियर में पहला टर्निंग प्वाइंट पहली फिल्म ‘‘इश्क विश्क’’ का मिलना ही रहा. मैं किसी स्टार का बेटा नही हूं. मेरे पिता कलाकार हैं, स्टार नहीं. आप भी जानते हैं कि कलाकार और स्टार में बहुत बड़ा फर्क होता है. दोनों को किस तरह से ट्रीट किया जाता है, उससे भी आप वाकिफ हैं. उसके बाद दूसरा टर्निंग प्वाइंट रहा, जब मैंने ‘विवाह’ और ‘जब वी मेट’ जैसी फिल्में की. इन फिल्मों से मेरी एक रोमांटिक इमेज लोगों के जेहन में बसी. अब इस ईमेज को तोड़ना भी मेरे लिए चुनौती बन गयी थी.

उसके बाद तीसरा टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘कमीने’’ करना रहा. जहां मैंने अपनी इमेज को तोड़ा. यह मेरे लिए अच्छी बात रही. क्योंकि इमेज में बंधकर काम करना मुझे कभी पसंद नहीं रहा. मेरा मानना है कि जब कलाकार किसी इमेज में बंध जाता है, तो कई बंदिशों से वह घिर जाता है. इसके बाद चौथा टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘आर राजकुमार’’ को मिली सफलता रही. क्योंकि इससे पहले मेरी तीन चार फिल्में बुरी तरह से असफल हो चुकी थीं. इस वजह से ‘आर राजकुमार’ मेरे लिए बहुत महत्व रखती है.

फिर दो तीन वर्षों में ‘हैदर’, ‘उड़ता पंजाब’ और अब ‘रंगून’ टर्निंग प्वाइंट हैं. इसके बाद ‘पद्मावती’ भी मेरे करियर में टर्निग प्वाइंट लेकर आएगी. हां! बीच में ‘शानदार’ की असफलता भी टर्निंग प्वाइंट थी, इसने मुझे हिला दिया था. पर बहुत कुछ सिखाया भी. पर यह सच है कि हर टर्निंग प्वाइंट के समय मैं अलग अलग स्टेट ऑफ माइंड में रहा. इन सभी टर्निंग प्वाइंट ने मुझे एक ऐसी दिशा दी, जिससे कि मैं कलाकार के तौर पर कुछ बेहतरीन काम कर सकूं. मैं नयी नयी चीजें दर्शकों और प्रशंसकों को देना चाहता हूं. यदि ‘रंगून’ और ‘पद्मावती’ सफल हो गयीं, तो मेरा आत्म विश्वास और बढ़ेगा. दर्शकों का मुझ पर यकीन बढ़ेगा.

आपकी पहली फिल्म के कैमरामैन रहे अमित राय आपके बड़े आलोचक हैं. उनकी राय में आपने अपने करियर में फिल्मों के चयन में काफी गलतियां की हैं?

वह सही कह रहे हैं. मैंने कुछ गलत फिल्में की. फिर अंदर से ही मेरी गलतियों का एहसास जागा. अमित राय जैसे कुछ शुभचिंतकों ने भी मुझे आगाह किया. मुझे लगता है कि हम कुछ अनुभवों व समय के साथ अपने अंदर की आवाज को बेहतर तरीके से सुनने व समझने लगते है.

उड़ता पंजाब के प्रदर्शन के बाद जब आप पंजाब गए होंगे, तो किस तरह का रिस्पांस मिला?

मैं पंजाब तो अक्सर जाता रहता हूं. ‘उड़ता पंजाब’के प्रदर्शन के बाद मैं पंजाब अपने निजी कारणों से गया था. मगर जब यह फिल्म प्रदर्शित हो रही थी, उस वक्त लोगों की तरफ से सकारात्मक रिस्पांस मिल रहे थे, लोगों को खुशी थी कि यह फिल्म पंजाब की एक बड़ी समस्या पर बात कर रही है. उनकी परेशानियों के बारे में बात की जा रही है. सबसे ज्यादा रिस्पांस तो कालेज में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता से मिला, कि उनके बच्चे को पता चल रहा है कि राज्य के अंदर क्या हो रहा है. तो मुझे बहुत प्यार मिला.

‘उड़ता पंजाब’ महज एक फिल्म नहीं है, उससे कहीं ज्यादा है. फिल्म में जो संदेश है, उससे पूरा देश सहमत है. इस फिल्म में महत्वपूर्ण संदेश बच्चों व यंगस्टर्स तक पहुंचाया है. मैंने यह फिल्म यंगस्टर्स के लिए ही किया था. देखिए,मेरी बहन व दो भाई है. मेरी बहन 25 साल की है. मेरा एक भाई 21 व एक भाई 20 साल का है. उस उम्र से गुजर रहे हैं, जब ड्रग्स का असर उन पर बहुत आसानी से हो सकता है. मैंने इस फिल्म को निजी एहसास के साथ किया था.

‘‘उड़ता पंजाब’’ और ‘‘रंगून’’ के किरदार एक दूसरे से बहुत अलग हैं. आप इन्हें किस रूप में लेते हैं?

‘उड़ता पंजाब’ में पंजाबी स्टार गायक है, जो कि ड्रग्स के शिकंजे यानी कि ड्रग्स की लत का शिकार है. घमंडी है, खुद को ही सब कुछ समझता है. जबकि अंदर से एक डरा हुआ बच्चा है. तो दूसरी तरफ ‘रंगून’ में नबाब मलिक आजादी से पहले ब्रिटिश सेना में है, पर अंदर से भारतीय व देशभक्त है. जो अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार है. उसके सामने अजीब सी दुविधा है. एक तरफ अंदर से देशप्रेमी है, पर वह निजी जिंदगी में अपने देश के ही दुश्मन ब्रिटिश सेना में नौकरी कर रहा है. तो वह अपनी इस दोहरी जिंदगी के साथ कैसे जूझता है. इस तरह नबाब मलिक बहुत ही ज्यादा रोचक किरदार है. नबाब मलिक फिल्म के अंदर जो कुछ करता है, वह बहुत ही ज्यादा ‘हीरोईक’ है. इस फिल्म को करने के बाद भारतीय सेना के प्रति मेरे मन में सम्मान व प्यार बढ़ गया.

‘रंगून’ से पहले मैंने अपने पिता पंकज कपूर के निर्देशन में एक फिल्म ‘‘मौसम’’ की थी. जिसमें मैने एअरफोर्स पायलट का किरदार निभाया था. इसके लिए मैंने ग्वालियर में एअरबेस में जाकर ट्रेनिंग ली थी. मैंने वहां पर कई दिन बिताए थे. वहां पर विंग कमांडर सरताज हैं, उनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी थी. उसी तरीके से जब सेना के किसी भी अंग से जुड़े सैनिक से मिलते हो, तो बहुत कुछ सीखते व समझते हैं. इससे हमें प्रेरणा मिलती है, हमें समझ में आता है कि असली हीरो कौन है.

नबाब मलिक का किरदार व उस काल व उस वक्त के इतिहास को समझने के लिए आपने क्या किया?

विशाल सर ने इस पर काफी रिसर्च करके रखा हुआ था. वह आठ साल से पटकथा को विकसित कर रहे थे. ज्यादातर चीजें मुझे उनके माध्यम से ही पता चल गयी. उन्होंने मुझे उस वक्त के कुछ वीडियो शेयर किए. उस वक्त इनको जमादार कहा जाता था. जमादार नवाब मलिक सुनकर मैं चौंक गया. तब विशाल भारद्वाज ने मुझसे कहा कि वीडियो ध्यान से देखकर समझो. वीडियो देखकर समझ में आया कि उस वक्त लोगों की दिमागी सोच क्या थी? जो भारतीय युवा सैनिक थे, मगर वह ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे, उन्हें वह मान सम्मान नहीं मिलता था, जैसा ब्रिटिश मूल के सैनिकों को मिलता था. फिर भी नौकरी करने की वजह से वह लड़ते थे.

उनके अंदर का जज्बा किसी भी सैनिक से कम नहीं होता था. इस फिल्म को करके आजादी से चार पांच साल पहले के समय को समझना बहुत रोचक रहा. आजादी को लेकर कई फिल्में बनी हैं. पर आजादी से तीन साल पहले जब आजादी को लेकर सर गर्मियां बढ़ी थीं, उस पर कोई फिल्म नहीं बनी. क्योंकि जब आजादी की आग पूरे देश में फैल रही थी, तो लोगों के अंदर देशभक्ति का जज्बा बहुत ज्यादा था. और नवाब मलिक उसी जज्बे का प्रतीक है. नवाब मलिक का किरदार कई स्टेज से गुजरता है.

इस फिल्म के किरदार के साथ न्याय करने के लिए आपने एक गोल्ड मैडलिस्ट से ट्रेनिंग ली?

देखिए, यूं तो ‘‘रंगून’’ एक प्रेम कहानी है, पर इसमें एक्शन भी है. क्योंकि कहानी की पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्व युद्ध भी है. मैं इसमें एक सैनिक नवाब मलिक का किरदार निभा रहा हूं. मेरे किरदार के साथ युद्ध के दृष्य भी हैं. उन युद्ध के दृष्यों को फिल्माने से पहले जिस तरह की तैयारी की जरूरत थी, उसके लिए मुझे गोल्ड मैडलिस्ट से ट्रेनिंग लेनी पड़ी. हमने इस फिल्म को बहुत ही यथार्थपरक बनाया है. हर फिल्म की कहानी व फिल्म के किरदार के साथ भी न्याय करने की मैंने पूरी कोशिश की है.

ट्रेनिंग के दौरान आप सैनिकों की भावनाओं से भी रूबरू हो पाते होंगे?

जी हां! कलाकार का काम ही ऐसा है. हम कलाकार देष के अलग अलग हिस्सों में रहने वाले अलग अलग तरह के काम करने वाले लोगों से मिलते हैं. उनके हावभाव, उनके बात करने का लहजा, उनके जज्बात आदि को समझने और फिर उसे अपने किरदारों के माध्यम से परदे पर पेश करने का बड़ा काम करते रहे हैं. और मेरी पिछली कुछ वर्षों की यात्रा भी इसी तरह की है.

यदि आप मेरे करियर पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि मैंने फिल्म ‘हैदर’ की, जो कि कश्मीर के दिल में बसी हुई है. इसमें मैंने ऐसे आम इंसान का किरदार निभाया है, जिसका जब पिता खो जाता है, तो उसे क्या महसूस होता है. कश्मीर के आम इंसान के अहसास को परदे पर उकेरना बहुत मुश्किल रहा. मुझे लगता है कि मेरे लिए यह बहुत अच्छा मौका था. उसके बाद फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ में पंजाब के अंदर फैले ड्रग्स के व्यापार पर फिल्म थी. अब ‘रंगून’ आजादी से तीन चार साल पहले की कहानी है. हमें इसके लिए अरूणाचल में जाकर सीमा पर शूटिंग करने का मौका मिला. वहां के लोगों से हमें मिलने का मौका मिला. जब हम इस तरह के किरदार निभाते हैं, तो कहीं न कहीं अपनेपन का अहसास ही होता है. परदे पर इस तरह के किरदारों को देखकर दर्शक को भी उसी तरह के जज्बातों का अहसास होता है.

विशाल भारद्वाज के साथ तीन फिल्में की. इन फिल्मों को करते समय विशाल के साथ आपके समीकरण किस तरह से बनते बिगड़ते रहे हैं. आपको विशाल भारद्वाज में कुछ बदलाव नजर आ रहा है?

विशाल सर के साथ तो मेरे रिश्ते बहुत रोचक रहे हैं. ‘‘कमीने’’ के वक्त हम दोनों के बीच बहुत खास रिश्ता था. ‘‘हैदर’’ के समय मुझे लगा कि हम दोनों निजी रूप में बहुत करीब आ गए हैं. इस फिल्म ‘‘रंगून’’ के समय मुझे बार बार लग रहा था कि वह मुझे और ज्यादा वक्त क्यों नहीं दे रहे हैं. क्योंकि इस फिल्म में दो बड़े सह कलाकार थे. तो उन्हें उनको भी कुछ समय देना पड़ा. इस तरह मैंने ‘‘रंगून’’ करते समय सीखा कि कलाकारों के साथ कैसे शेयर करना चाहिए. विशाल सर के संग हमारे संबंध बहुत बेहतरीन हैं. मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं कि मुझे विशाल सर के साथ तीन फिल्में करने का मौका मिला. वह इतने बेहतरीन निर्देशक हैं कि हर कलाकार उनके साथ काम करने को लालायित रहता है. वह अब तक कलाकार के तौर पर मुझसे बोर नहीं हुए हैं.

‘‘रंगून’’ के लिए अरूणाचल में शूटिंग की. उत्तर पूर्वी भारत, भारत की मुख्य धारा से अलग थलग ही रहता है. ऐसे में आपके अपने अनुभव क्या रहे?

जी हां! कमाल की बात यह रही कि उन्होंने हमारा शानदार स्वागत किया.जबकि मैं भी सोच रहा था कि पता नही वह हिंदी फिल्में देखते हैं या नहीं. वह हमें अपने बीच पाकर कोई अड़चन तो पैदा नहीं करेंगे? कहीं उन्हें ऐसा तो नही लगेगा कि हम उन्हें परेशान करने पहुंचे हैं. पर ऐसा कुछ नही हुआ.

मेरी शंकाएं निर्मूल साबित हुई. मुझे याद है, हम फ्लाइट पकड़कर मुंबई से डिब्रूगढ़ गए. वहां से सड़क मार्ग से हम ब्रम्हपुत्रा गए. फिर हमने ब्रम्हपुत्रा नदी पार की. उसके बाद लगभग तीन घंटे की यात्रा करके आसाम सीमा पार की. फिर एक घंटे की यात्रा कर हम पासीघाट पहुंचे, जो कि अरूणाचल प्रदेश में है. हमें याद है कि जब हम आसाम की सीमा पर पहुंचे, तो हमारा स्वागत करने के लिए ढाई तीन हजार लोग मौजूद थे. उस जगह पर आसाम की पुलिस हमें छोड़ती है और अरूणाचलत प्रदेश की पुलिस हमारे साथ हो जाती है. इसी के चलते हमें लगभग एक मिनट रूकना पड़ा. मैंने देखा कि उस वक्त वहां खड़े लोग इस तरह से चिल्ला रहे थे जैसे कोई लाइव शो चल रहा हो.

मुझे अहसास हुआ कि वहां के लोग हम भारतीय कलाकारों और हमारी फिल्मों से कितना प्यार करते हैं. जब हम होटल पहुंचे, तो वहां बहुत भीड़ जमा थी. उसके बाद हम वहां 25 दिन रहे. हर दिन दो बार नीचे जाकर वहां मौजूद लोगों का हम हाथ हिलाकर अभिवादन करते थे या उनसे कुछ बातचीत करते थे. फिर वह लोग वापस अपने अपने घर चले जाते थे. इससे मैं बहुत भावुक हुआ. मुझे उन लोगों से बहुत अपनापन और प्यार मिला. मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं कि मैं अपनी फिल्मों की शूटिंग के सिलसिले में कई ऐसी जगहों पर गया हूं, जहां को लेकर हम तमाम तरह की बातें सुनते रहते हैं. पर मुझे हर जगह प्यार व अपनापन मिला. देखिए, हम फिल्म वालों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि हम लोगों में प्यार बांटते हैं. कलाकार होने की यह सबसे बड़ी खूबसूरती है.

‘‘पद्मावती’’ को लेकर जो कुछ हो रहा है. राजपूतों की करणी सेना ने पटकथा को सेंसर करने की मांग की है. आपकी राय?

मैं इन चीजों पर कोई प्रतिक्रिया नही देना चाहता. मैं तो हमेशा लोगों से यही कहना चाहता हूं कि कोई भी फिल्म हो,आप पहले फिल्म देखें,फिर निर्णय लें.

पिता बनने के बाद क्या सोच रहे हैं?

सच कहूं तो ज्यादा से ज्यादा समय मैं मीशा के साथ रहने का प्रयास करता हूं. पिता बनते ही कई तरह के एहसास अपने आप जाग गए. अब खुश हूं. अंदर से और मेहनत करने, अच्छा काम करने की भावना जगी है. अब मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं, जिन्हें मैं अपनी बेटी को गर्व के साथ दिखा सकूं.

पत्नी मीरा को लेकर क्या कहेंगे?

वह आज की पीढ़ी की हैं. आज की पीढ़ी के लोग संकोची तो होते नहीं है. वह कैमरे के सामने बहुत सहज होती हैं.

ओल्ड इज गोल्ड का फैशन ट्रैंड

क्याआप जानते हैं कि करीना कपूर यानी बेबो ने अपनी शादी में शर्मिला टैगोर का वही शरारा पहना था, जो शर्मिला टैगोर ने अपनी शादी के दिन पहना था और पटौदी परिवार की परंपरा को निभाया था? बौलीवुड की इसी तर्ज पर चलते हुए आज की युवतियों को भी पुरानी साडि़यों और लहंगों को रीसाइकल कर नया रूप देना और उन्हें पहन कर फ्लौंट करना खासा भा रहा है. इस से भावनात्मक जुड़ाव तो झलकता ही है, साथ ही पुराना फैशन भी धरोहर के रूप में जीवित रहता है. अगर फैशन डिजाइनरों की मानें तो मां, दादी या सास के लहंगे को अपनी शादी में पहनने का चलन आजकल फैशन में है.

बचपन से आप को अपनी मम्मी, दादी या नानी का लहंगा या फिर बनारसी साड़ी पसंद थी तो आप अपनी शादी में उस साड़ी का रीवैंप करा कर नया लुक देने के साथसाथ अपने रिश्तों के साथ भावनात्मक जुड़ाव को भी मजबूत कर सकती हैं.

लहंगों की रीडिजाइनिंग

फैशन डिजाइनर, मीनाक्षी सभरवाल का कहना है कि महिलाएं पुराने लहंगे को ही फिर से नए तरीके से तैयार करवा रही हैं. अगर फैब्रिक की बात करें तो ब्रौकेड, टिशू, चंदेरी, शिफौन व जौर्जेट के लहंगों पर बेहतरीन काम करवा कर उन्हें खूबसूरत बनाया जाता है. इन पर गोटा लेस, सोना, चांदी व कलर्ड स्टोंस लगा कर खूबसूरत लुक दिया जाता है. निम्न टिप्स पर अमल कर आप अपनी मां या दादी की पुरानी साड़ी या फिर लहंगे को नया रूप दे सकती हैं:

– लहंगे का बौर्डर चेंज कर उसे नया लुक भी दे सकती हैं जैसे मैचिंग चोली के बजाय पोंचू, शर्ट या कंट्रास्ट कलर ट्राई करें. इस से ईजी लुक मिलेगा.

– कांजीवरम या बनारसी साड़ी से खूबसूरत अनारकली बनवा सकती हैं. इस से आप की साड़ी को नया लुक भी मिलेगा और इसे पहनना भी आसान हो जाएगा.

– आप अपनी मां या दादी की प्लेन सिल्क की साड़ी का गाउन भी बनवा सकती हैं और रिसैप्शन या संगीत कार्यक्रम में पहन सकती हैं.

– अगर साड़ी का बौर्डर घिस या फट गया है, तो उस पर नया बौर्डर लगवाया जा सकता है. अगर आप दिल्ली में रहती हैं, तो चांदनी चौक का किनारी बाजार स्टाइलिश बौर्डर के लिए परफैक्ट हब है. बौर्डर चेंज के बाद साड़ी का रूप बिलकुल निखर जाएगा यानी साड़ी बिलकुल नईर् जैसी हो जाएगी और ऐसी साड़ी आप को बाजार में कहीं नहीं मिलेगी. अगर साड़ी का बीच का हिस्सा कट या फट गया है, तो आप उस जगह पर कंट्रास्ट कलर का जौर्जेट या शिफौन का फैब्रिक लगवा सकती हैं. इस से आप की साड़ी डिजाइनर बन जाएगी.

ऐक्सपैरिमैंट करें: शादी के टाइम आप अपनी मां के लहंगे को क्रौप टौप या कोर्सेट के साथ पहन कर इंडोवैस्टर्न लुक पा सकती हैं. आप चाहें तो लहंगे को शीयर जैकेट के साथ भी पहन सकती हैं. इस से लहंगे को नया लुक मिलेगा.

लहंगे को बनाएं अनारकली: अपनी मां के लहंगे या चोली से अनारकली भी बनवा सकती हैं. इस के लिए मनपसंद फैब्रिक को लहंगे के घेरे के साथ सिलवा लें. ऐसे ही अगर आप के पास कोई पुरानी लेकिन स्टाइलिश चोली है तो आप उस के साथ मनचाहा फैब्रिक जुड़वा कर अनारकली बनवा सकती हैं.

बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा: आप अपनी मां की बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा भी बनवा सकती हैं और प्लेन स्कर्ट या सलवारसूट के साथ पेयर कर सकती हैं. ऐसा करने से आप के पैसे भी बचेंगे और नया व ऐक्सक्लूसिव लुक भी मिलेगा. दुपट्टा स्ट्रेट फिट वाले सूट, अनारकली, पटियाला सलवारकमीज सभी के साथ बखूबी जंचता है.

लेटैस्ट कलर इन ट्रैंड: लाल रंग अब आउट औफ ट्रैंड हो गया है यानी लाल रंग की अब कोई बंदिश नहीं रह गई है. अब लड़कियां नएनए रंग आजमा रही हैं. आज की दुलहन पेस्टल रंग जैसे हलका गुलाबी, सी ग्रीन, क्रीम रंग या गाढ़ा नारंगी रंग भी कौन्फिडैंटली कैरी कर रही हैं.

लाइट वेट नैट लहंगे: भारीभरकम लहंगों की जगह अब लाइट वेट नैट और वैलवेट के लहंगों ने ले ली है. ये लाइट वेट होने से काफी पसंद किए जा रहे हैं. नैट लहंगे डार्क और लाइट दोनों ही कलर कौंबिनेशन के साथ मौजूद हैं. लाइट पिंक, पर्पल, क्रीम के साथ यलो, ब्लू, ग्रीन, रैड आदि कलर कौंबिनेशन के नैट के लहंगे युवतियों के आकर्षण का केंद्र हैं. ये स्टाइलिश लुक और डिजाइनर होने के कारण काफी खूबसूरत लुक और जुदा अंदाज देते हैं.

प्यार का भयानक अंजाम

नींद न आने की वजह से सुशीला बेचैनी से करवट बदल रही थी. जिंदगी ने उसे एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया था, जहां वह पति प्रदीप से जुदा हो सकती थी. चाहत हर किसी की कमजोरी होती है और जब कोई इंसान किसी की कमजोरी बन जाता है तो वह उस से बिछुड़ने के खयाल से ही बेचैन हो उठता है.

सुशीला और प्रदीप का भी यही हाल था. प्रदीप उसे कई बार समझा चुका था, फिर भी सुशीला उस के खयालों में डूबी रातरात भर बेचैनी से करवट बदलती रहती थी. उस रात भी कुछ वैसा ही था. रात में नींद न आने की वजह से सुबह भी सुशीला के चेहरे पर बेचैनी और चिंता साफ झलक रही थी. उसे परेशान देख कर प्रदीप ने उसे पास बैठाया तो उस ने उसे हसरत भरी निगाहों से देखा. उस की आंखों में उसे बेपनाह प्यार का सागर लहराता नजर आया.

कुछ कहने के लिए सुशीला के होंठ हिले जरूर, लेकिन जुबान ने साथ नहीं दिया तो उस की आंखों में आंसू उमड़ आए. प्रदीप ने गालों पर आए आंसुओं को हथेली से पोंछते हुए कहा, ‘‘सुशीला, तुम इतनी कमजोर नहीं हो, जो इस तरह आंसू बहाओ. हम ने कसम खाई थी कि हर पल खुशी से बिताएंगे और एकदूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे.’’

‘‘साथ ही छूटने का तो डर लग रहा है मुझे.’’ सुशीला ने झिझकते हुए कहा.

‘‘सच्चा प्यार करने वालों की खुशियां कभी अधूरी नहीं होतीं सुशीला.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती प्रदीप. तुम मेरी जिंदगी हो. यह जिस्म मेरा है, दिल मेरा है, लेकिन मेरे दिल की हर धड़कन तुम्हारी नजदीकियों की मोहताज है.’’

सुशीला के इतना कहते ही प्रदीप तड़प उठा. अपनी हथेली उस के होंठों पर रख कर उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा सुशीला. मैं तुम्हें सारे जहां की खुशियां दूंगा. तुम्हारे चेहरे पर उदासी नहीं, सिर्फ खुशी अच्छी लगती है, इसलिए तुम खुश रहा करो. इस फूल से खिलते चेहरे ने मुझे हमेशा हिम्मत दी है, वरना हम कब के हार चुके होते.’’

‘‘मैं ने सुना है कि मेरे घर वालों ने धमकी दी है कि वे हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे?’’ सुशीला ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘अब तक कुछ नहीं हुआ तो आगे भी कुछ नहीं होगा, इसलिए तुम बेफिक्र रहो. अब तो हमारे प्यार की एक और निशानी जल्द ही दुनिया में आ जाएगी. हम हमेशा इसी तरह खुशी से रहेंगे.’’ प्रदीप ने कहा.

पति के कहने पर सुशीला ने बुरे खयालों को दिल से निकाल दिया. नवंबर, 2016 के पहले सप्ताह की बात थी यह. अगर सुशीला ने प्रदीप से प्यार न किया होता तो उसे यह डर कभी न सताता. प्यार के शिखर पर पहुंच कर दोनों खुश थे. यह बात अलग थी कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने काफी विरोध का सामना किया था.

उन्होंने ऐसी जगह प्यार का तराना गुनगुनाया था, जहां कभी सामाजिक व्यवस्था तो कभी गोत्र तो कभी झूठी शान के लिए प्यार को गुनाह मान कर अपने ही खून के प्यासे बन जाते हैं.

प्रदीप हरियाणा के सोनीपत जिले के खरखौदा कस्बे के बरोणा मार्ग निवासी धानक समाज के सुरेश का बेटा था. वह मूलरूप से झज्जर जिले के जसौर खेड़ी के रहने वाले थे, लेकिन करीब 17 साल पहले आ कर यहां बस गए थे. उन के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे एवं एक बेटी थी. बच्चों में प्रदीप बड़ा था. सुरेश खेती से अपने इस परिवार को पाल रहे थे.

3 साल पहले की बात है. प्रदीप जिस कालेज में पढ़ता था, वहीं उस की मुलाकात नजदीक के गांव बिरधाना की रहने वाली सुशीला से हुई. सुशीला जाट बिरादरी के किसान ओमप्रकाश की बेटी थी. दोनों की नजरें चार हुईं तो वे एकदूसरे को देखते रह गए. इस के बाद जब भी सुशीला राह चलती मिल जाती, प्रदीप उसे हसरत भरी निगाहों से देखता रह जाता.

सुशीला खूबसूरत थी. उम्र के नाजुक पायदान पर कदम रख कर उस का दिल कब धड़कना सीख गया था, इस का उसे खुद भी पता नहीं चल पाया था. वह हसीन ख्वाबों की दुनिया में जीने लगी थी. प्रदीप उस के दिल में दस्तक दे चुका था.

सुशीला समझ गई थी कि खुद उसी के दिल की तरह प्रदीप के दिल में भी कुछ पनप रहा है. दोनों के बीच थोड़ी बातचीत से जानपहचान भी हो गई थी. यह अलग बात थी कि प्रदीप ने कभी उस पर कुछ जाहिर नहीं किया था. वक्त के साथ आंखों से शुरू हुआ प्यार उन के दिलों में चाहत के फूल खिलाने लगा था.

एक दिन सुशीला बाजार गई थी. वह पैदल ही चली जा रही थी, तभी उसे अपने पीछे प्रदीप आता दिखाई दिया. उसे आता देख कर उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. वह थोड़ा तेज चलने लगी. प्रदीप के आने का मकसद चाहे जो भी रहा हो, लेकिन सामाजिक लिहाज से यह ठीक नहीं था.

प्रदीप ने जब सुशीला का पीछा करना काफी दूरी तक नहीं छोड़ा तो वह रुक गई. उसे रुकता देख कर प्रदीप हिचकिचाया जरूर, लेकिन वह उस के निकट पहुंच गया. सुशीला ने नजरें झुका कर शोखी से पूछा, ‘‘मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?’’

‘‘तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है?’’ प्रदीप ने सवाल के जवाब में सवाल ही कर दिया.

‘‘इतनी देर से पीछा कर रहे हो, इस में लगने जैसा क्या है.’’

‘‘तुम से बातें करने का दिल हो रहा था मेरा.’’ प्रदीप ने कहा.

‘‘इस तरह मेरे पीछे मत आओ, किसी ने देख लिया तो…’’ सुशीला ने कहा.

प्रदीप उस दिन जैसे ठान कर आया था, इसलिए इधरउधर नजरें दौड़ा कर उस ने कहा, ‘‘अगर किसी से 2 बातें करने की तड़प दिल में हो तो रहा नहीं जाता सुशीला. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. तुम पहली लड़की हो, जिसे मैं प्यार करने लगा हूं.’’

सुशीला ने उस की बातों का जवाब नहीं दिया और मुसकरा कर आगे बढ़ गई. हालांकि प्रदीप की बातों से वह मन ही मन खुश हुई थी. वह भी प्रदीप को चाहने लगी थी. उस रात दोनों की ही आंखों से नींद गायब हो गई थी.

इस के बाद उन की मुलाकात हुई तो सुशीला प्रदीप को देख कर नजरों में ही इस तरह मुसकराई, जैसे दिल का हाल कह दिया हो. इस तरह प्यार का इजहार होते ही उन के बीच बातों और मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. प्यार के पौधे को रोपने में भले ही वक्त लगता है, लेकिन वह बढ़ता बहुत तेजी से है.

यह जानते हुए भी कि दोनों की जाति अलगअलग हैं, वे प्यार के डगर पर चल निकले. सुशीला प्रदीप के साथ घूमनेफिरने लगी. प्यार अगर दिल की गहराइयों से किया जाए तो वह कोई बड़ा गुला खिलाता है. दोनों का यह प्यार वक्ती नहीं था, इसलिए उन्होंने साथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं.

समाज प्यार करने वालों के खिलाफ होता है, यह सोच कर उन के दिलों में निराशा जरूर काबिज हो जाती थी. यही सोच कर एक दिन मुलाकात के क्षणों में सुशीला प्रदीप से कहने लगी, ‘‘मैं हमेशा के लिए तुम्हारी होना चाहती हूं प्रदीप, लेकिन शायद ऐसा न हो पाए.’’

‘‘क्यों?’’ कड़वी हकीकत को जानते हुए भी प्रदीप ने अंजान बन कर पूछा.

‘‘मेरे घर वाले शायद कभी तैयार नहीं होंगे.’’

‘‘बस, तुम कभी मेरा साथ मत छोड़ना, मैं तुम्हारे लिए हर मुश्किल पार करने को तैयार हूं.’’

‘‘यह साथ तो अब मरने के बाद ही छूटेगा.’’ सुशीला ने प्रदीप से वादा किया.

प्यार उस शय का नाम है, जो कभी छिपाए नहीं छिपता. सुशीला के घर वालों को जब बेटी के प्यार के बारे में पता चला तो घर में भूचाल आ गया. ओमप्रकाश के पैरों तले से यह सुन कर जमीन खिसक गई कि उन की बेटी किसी अन्य जाति के लड़के से प्यार करती है. उन्होंने सुशीला को आड़े हाथों लिया और डांटाफटकारा, साथ ही उस की पिटाई भी की. उन्होंने जमाना देखा था, इसलिए उस पर पहरा लगा दिया.

शायद उन्हें पता नहीं था कि सुशीला का प्यार हद से गुजर चुका है. इस से पहले कि कोई ऊंचनीच हो, ओमप्रकाश ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी. सुशीला ने दबी जुबान से मना किया कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उस की किसी ने नहीं सुनी.

प्यार करने वालों पर जितने अधिक पहरे लगाए जाते हैं, उन की चाहत का सागर उतना ही उफनता है. सुशीला के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक दिन किसी तरह मौका मिला तो उस ने प्रदीप को फोन किया. उस से संपर्क न हो पाने के कारण वह भी परेशान था.

फोन मिलने पर सुशीला ने डूबे दिल से कहा, ‘‘मेरे घर वालों को हमारे प्यार का पता चल गया है प्रदीप. अब शायद मैं तुम से कभी न मिल पाऊं. वे मेरे लिए रिश्ता तलाश रहे हैं.’’

यह सुन कर प्रदीप सकते में आ गया. उस ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता सुशीला. तुम सिर्फ मेरा प्यार हो. तुम जानती हो, अगर ऐसा हुआ तो मैं जिंदा नहीं रहूंगा.’’

‘‘उस से पहले मैं खुद भी मर जाना चाहती हूं. प्रदीप जल्दी कुछ करो, वरना…’’ सुशीला ने कहा और रोने लगी.

प्रदीप ने उसे हौसला बंधाते हुए कहा, ‘‘मुझे सोचने का थोड़ा वक्त दो सुशीला. पहले मैं अपने घर वालों को मना लूं.’’

दोनों के कई दिन चिंता में बीते. प्रदीप ने अपने घर वालों को दिल का राज बता कर उन्हें सुशीला से विवाह के लिए मना लिया. जबकि सुशीला का परिवार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ था. उन्होंने उस पर पहरा लगा दिया था. मारपीट के साथ उसे समझाने की भी कोशिश की गई थी, लेकिन वह प्रदीप से विवाह की जिद पर अड़ी थी.

सुशीला बगावत पर उतर आई थी, क्योंकि प्रदीप के बिना उसे जिंदगी अधूरी लग रही थी. कई दिनों की कलह के बाद भी जब वह नहीं मानी तो उसे घर वालों ने अपनी जिंदगी से बेदखल कर के उस के हाल पर छोड़ दिया.

प्रदीप ने भी सुशीला को समझाया, ‘‘प्यार करने वालों की राह आसान नहीं होती सुशीला. हम दोनों शादी कर लेंगे तो बाद में तुम्हारे घर वाले मान जाएंगे.’’

एक दिन सुशीला ने चुपके से अपना घर छोड़ दिया. पहले दोनों ने कोर्ट में, उस के बाद सादे समारोह में शादी कर के एकदूसरे को जीवनसाथी चुन लिया. इसी के साथ परिवार से सुशीला के रिश्ते खत्म हो गए.

सुशीला और प्रदीप ने प्यार की मंजिल पा ली थी. इस बीच प्रदीप ने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. एक साल बाद प्यार की निशानी के रूप में सुशीला ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने प्रिया रखा. वह 3 साल की हो चुकी थी. अब एक और खुशी उन के आंगन में आने वाली थी.

इतने दिन हो गए थे, फिर भी एक अंजाना सा डर सुशीला के दिल में समाया रहता था. इस की वजह थी उस के परिवार वाले. उन से उसे धमकियां मिलती रहती थीं. उस दिन भी सुशीला इसीलिए परेशान थी. सुशीला के घर वालों की नाराजगी बरकरार थी.

अपने रिश्ते को उन्होंने सुशीला से पूरी तरह खत्म कर लिया था. एक बार प्रदीप की होने के बाद सुशीला भी कभी अपने मायके नहीं गई थी. उसे मायके की याद तो आती थी, लेकिन मजबूरन अपने जज्बातों को दफन कर लेती थी. उस ने सोच लिया था कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा.

प्रदीप और सुशीला अपने घर में नए मेहमान के आने की खुशी से खुश थे, लेकिन जिंदगी में खुशियों का स्थाई ठिकाना हो, यह जरूरी नहीं है. कई बार खुशियां रूठ जाती हैं और वक्त ऐसे दर्दनाक जख्म दे जाता है, जिन का कोई मरहम नहीं होता. सुशीला और प्रदीप की भी खुशियां कितने दिनों की मेहमान थीं, इस बात को कोई नहीं जानता था.

18 नवंबर, 2016 की रात की बात है. प्रदीप के घर के सभी लोग सो रहे थे. प्रदीप और सुशीला बेटी के साथ अपने कमरे में सो रहे थे, जबकि उस के मातापिता सुरेश और सुनीता, भाई सूरज अलग कमरे में सो रहे थे. बहन ललिता अपने ताऊ के घर गई थी. समूचे इलाके में खामोशी और सन्नाटा पसरा था. तभी किसी ने प्रदीप के दरवाजे पर दस्तक दी. प्रदीप ने दरवाजा खोला तो सामने कुछ हथियारबंद लोग खड़े थे.

प्रदीप कुछ समझ पाता, उस से पहले ही उन्होंने उस पर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही प्रदीप जमीन पर गिर पड़ा. सुशीला बाहर आई तो उसे भी गोली मार दी गई. प्रदीप के पिता सुरेश और मां सुनीता के बाहर आते ही हमलावरों ने उन पर भी गोलियां चला दीं. सूरज की भी आंखें खुल गई थीं. खूनखराबा देख कर उस के होश उड़ गए. हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा.

गोलियों की तड़तड़ाहट से वातावरण गूंज उठा था. आसपास के लोग इकट्ठा होते, उस के पहले ही हमलावर भाग गए थे. घटना की सूचना स्थानीय थाना खरखौदा को दी गई. थानाप्रभारी कर्मबीर सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. पुलिस आननफानन घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई. तीनों की हालत गंभीर थी, लिहाजा प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें रोहतक के पीजीआई अस्पताल रेफर कर दिया गया.

उपचार के दौरान सुरेश, सुनीता और प्रदीप की मौत हो गई, जबकि डाक्टर सुशीला और सूरज की जान बचाने में जुट गए. सूरज के कंधे में गोली लगी थी और सुशीला की पीठ में. डाक्टरों ने औपरेशन कर के गोलियां निकालीं. सुरक्षा के लिहाज से अस्पताल में पुलिस तैनात कर दी गई थी. सुशीला गर्भ से थी. उस के शिशु की जान को भी खतरा हो सकता था.

डाक्टरों ने उस की सीजेरियन डिलीवरी की. उस ने स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. डाक्टरों ने दोनों को खतरे से निकाल लिया था. पति और सासससुर की मौत ने उसे तोड़ कर रख दिया था. सुशीला बहुत दुखी थी. अचानक हुई घटना ने उस के जीवन में अंधेरा ला दिया था. वह दर्द और आंसुओं की लकीरों के बीच उलझ चुकी थी.

घायल सूरज ने पुलिस को जो बताया था, उसी के आधार पर अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या और हत्या के प्रयास का मुकदजा दर्ज किया गया. एसपी अश्विन शैणवी ने अविलंब आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए. 3 लोगों की हत्या से क्षेत्र में दहशत फैल गई थी.

अगले दिन एसपी अश्विन शैणवी और डीएसपी प्रदीप ने भी घटनास्थल का दौरा किया. उन के निर्देश पर पुलिस टीमों का गठन किया गया. एसआईटी इंचार्ज राज सिंह को भी टीम में शामिल किया गया. पुलिस ने जांच शुरू की तो सुशीला और प्रदीप के प्रेम विवाह की बात सामने आई.

पुलिस ने सुशीला से पूछताछ की, लेकिन वह सही से बात करने की स्थिति में नहीं थी. फिर भी उस ने हमले का शक मायके वालों पर जताया. मामला औनर किलिंग का लगा. पुलिस ने सुशीला के पिता के घर दबिश दी तो वह और उन के बेटे सोनू एवं मोनू फरार मिले.

इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि हत्याकांड को इन्हीं लोगों के इशारे पर अंजाम दिया गया था. पुलिस के हाथ सुराग लग गया कि खूनी खेल खेलने वाले कोई और नहीं, बल्कि सुशीला के घर वाले ही थे. पुलिस सुशीला के पिता और उस के बेटों की तलाश में जुट गई.

उन की तलाश में झज्जर, बेरी, दादरी, रिवाड़ी और बहादुरगढ़ में दबिशें दी गईं. पुलिस ने उन के मोबाइल नंबर हासिल कर के जांच शुरू कर दी. 22 नवंबर को पुलिस ने सुशीला के एक भाई सोनू को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ की गई तो नफरत की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

दरअसल, सुशीला के अपनी मरजी से अंतरजातीय विवाह करने से पूरा परिवार खून का घूंट पी कर रह गया था. सोनू और मोनू को बहन के बारे में सोच कर लगता था कि उस ने उन की शान के खिलाफ कदम उठाया है. उन्हें सब से ज्यादा इस बात की तकलीफ थी कि सुशीला ने एक पिछड़ी जाति के लड़के से शादी की थी.

उन के दिलों में आग सुलग रही थी. मोनू आपराधिक प्रवृत्ति का था. उस की बुआ का बेटा हरीश भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. हरीश पर हत्या का मुकदमा चल रहा था और वह जेल में था. समय अपनी गति से बीत रहा था. समाज में भी उन्हें समयसमय पर ताने सुनने को मिल रहे थे. जब भी सुशीला का जिक्र आता, उन का खून खौल उठता था.

मोनू ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपनी बहन को उस के किए की सजा दे कर रहेगा. उस के इरादों से परिवार वाले भी अंजान नहीं थे. जुलाई, 2016 में मोनू की बुआ का बेटा हरीश पैरोल पर जेल से बाहर आया तो वह मोनू का साथ देने को तैयार हो गया. मोनू लोगों के सामने धमकियां देता रहता था कि वह बहन को तो सजा देगा ही, प्रदीप से भी अपनी इज्जत का बदला ले कर रहेगा.

मोनू शातिर दिमाग था. वह योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना चाहता था. उस ने छोटे भाई सोनू को सुशीला के घर भेजना शुरू कर दिया. इस के पीछे उस का मकसद यह जानना था कि वे लोग कहांकहां सोते हैं, कोई हथियार आदि तो नहीं रखते. इस बीच जबजब सुशीला को पता चलता कि मोनू प्रदीप और उस के घर वालों को मारने की धमकी दे रहा है, वह परेशान हो उठती थी.

मोनू का भाई सोनू और पिता भी इस खतरनाक योजना में शामिल थे. जब मोनू पहली प्लानिंग में कामयाब हो गया तो उस ने वारदात को अंजाम देने की ठान ली. हरीश के साथ मिल कर उस ने देशी हथियारों के साथ एक कार का इंतजाम किया. इस के बाद वह कार से अपने साथियों के साथ रात में सुशीला के घर जा पहुंचा और वारदात को अंजाम दे कर फरार हो गया.

एक दिन बाद पुलिस ने सुशीला के षडयंत्रकारी पिता ओमप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद दोनों आरोपियों को पुलिस ने अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. इस बीच खरखौदा थाने का चार्ज इंसपेक्टर प्रदीप के सुपुर्द कर दिया गया. वह मुख्य आरोपी मोनू की तलाश में जुटे हैं.

  सुशीला ने सोचा भी नहीं था कि उसे प्यार करने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी. ओमप्रकाश और उस के बेटे ने सुशीला के विवाह को अपनी झूठी शान से न जोड़ा होता तो शायद ऐसी नौबत न आती. सुशीला का सुहाग उजाड़ कर वे सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं. कथा लिखे जाने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस मोनू और उस के अन्य साथियों की सरगर्मी से तलाश कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जलन हमेशा बुरी नहीं

जलन या ईर्ष्या की भावना को आजकल मनोवैज्ञानिक तथा समाज विश्लेषक एक नए अंदाज में देखने लगे हैं. उन के शोध यह साबित कर रहे हैं कि अगर उन्हें किसी की तरक्की का ग्राफ देख कर जलन महसूस होती है तो घबराई सी दशा में रहने के बजाय उस के सकारात्मक पक्ष टटोलें. अगर जलन से प्रेरित हो कर अपनी दशा सुधारने में लग जाएंगे तो हालात सुधरने लगेंगे. इस का लाभ यह होगा कि यह ईर्ष्या कुंठा तक जाने के बजाय खुशियों की राह आसान करती जाएगी.

दूसरे की तरक्की या सफलता देख कर अगर मारे जलन के आप अच्छी मेहनत करने का संकल्प लेते हैं, तो यह ईर्ष्या आप के लिए सुखद परिणाम ला सकती है. यह भविष्य के लिए शुभ संकेत है.

नए प्रयोग करें

कहते हैं न कि भावनाओं पर तो किसी का भी वश नहीं चल पाता, परंतु अपना नजरिया तो ठीक किया ही जा सकता है न? कहने का तात्पर्य यह है कि दृष्टिकोण को सही फ्रेम में लगा कर अपने को अच्छे वातावरण के लिए तैयार करते रहें वरना खाली ईर्ष्या ही ईर्ष्या करने से मानसिक शांति का तो सर्वनाश होगा ही, साथ ही हृदय, लिवर, रक्तचाप आदि बीमारियां भी अपना ठिकाना आप के शरीर में ही बना लेंगी. समय के मिजाज को भांप कर भी अपनी जलन का लाभ उठाया जा सकता है यानी दुनिया नए प्रयोग कर के आगे बढ़ रही है तो आप भी करिए. अगर समय नवीनता और ताजापन चाहता है तो आप भी वैसा करने की तरफ अपना ध्यान दीजिए.

लक्ष्य बना लें

मन में जलन की भावना पैठ बना ले तो अपना ध्यान कुछ करने के जज्बे की तरफ मोड़ लेना बहुत लाभकारी हो सकता है. इस मामले में आलसी, निकम्मे लोग बस सोचत ही रह जाते हैं या वक्त को कोसते रहते हैं जबकि सही सोच रखने वाले खुद को भटकने नहीं देते. फट से अपनी कमियों की तरफ ध्यान देते हैं. अपना एक लक्ष्य तय करते हैं और ईर्ष्या को रोग की जगह बना डालते हैं अपनी बहुत अच्छी औषधि. ईर्ष्या अगर सकारात्मक भाव पैदा करने लगी है, तो ऐसी कथाएं बारबार सुनते हुए या पढ़ते रहना भी लाभदायक है जो आप में एक तरंग पैदा कर दें, आप की ताकत को कई गुना बढ़ा दें और आप एक अच्छा पद, अच्छी स्थिति या फिर अच्छा नाम प्राप्त करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दें.

मूल्यांकन करें

अपनी स्पर्धा अपनेआप से ही करना अति उत्तम होता है यानी हर दिन पिछले दिनों से अच्छा और उत्पादक बने, इस के लिए एक कैलेंडर बना कर रखना बहुत ही मददगार साबित होता है. अपनेआप का सच्चा मूल्यांकन भी करते रहना चाहिए. इस में कैलेंडर सहायक रहता है. समय का चक्र और प्रकृति हमारे लिए हमेशा बेहतर से बेहतर व्यवस्था बना कर रखती है. इस पर विचार अवश्य करते रहना चाहिए. खुद से ही रायमशविरा करेंगे तो आप की हर कमजोरी खुद आप के सामने आएगी. अपनी कमजोरी को अपनी चुनौती बना कर हौसला रखना सचमुच जिंदादिली का पर्याय है. हिचकिचाएं बिलकुल नहीं, बस नाराजगी और शिकायतों में थोड़ी सी कटौती कर संभावनाएं जाग्रत करें और जीवन को संवार लें.

दांपत्य के 9 वचन

समय के साथसाथ परिवर्तन भी जरूरी है. आज के युग में दंपतियों विशेषकर नवविवाहित जोड़ों को अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए अपने विचारों, अपनी भावनाओं का नजरिया थोड़ा बदलना ही चाहिए. पहले विवाह का मतलब सिर्फ प्यार और समर्पण था, जिस में ज्यादातर पत्नियां ही पति और उस के घरपरिवार के लिए समर्पित रहने में अपने जीवन की सार्थकता मानती थीं और त्याग व कर्तव्य की प्रतिमा बनीं सारा जीवन खुशीखुशी गुजार देती थीं. घरपरिवार में इसी से उन्हें इज्जत भी मिला करती थी.

पुरुष भी ऐसी पत्नी पा कर खुश होते थे. उन की सोच भी औरतों के लिए बस यही थी. पर आज हालात बदल गए हैं. स्त्रीपुरुष दोनों इस बात को समझ चुके हैं. आज औरतें भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में काम कर रही हैं, आगे बढ़ रही हैं. आज प्यार और समर्पण की शक्ल प्यार और साझेदारी ने ले ली है, जो व्यावहारिक भी है.

वरवधू शादी के समय रस्म के तौर पर 7 वचन लेते हैं और शायद बहुत जल्दी भूल भी जाते हैं पर दंपती सर्वेक्षण के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप निकले इन वचनों को शादी के बाद भी लें, इन्हें याद रखें और निभाएं भी. विवाह का यह प्यारा बंधन प्यार, विश्वास और साझेदारी का ही तो है, जहां पतिपत्नी दोनों ही घरबाहर के काम करते हैं, तो दोनों को ही एकदूसरे के काम में सहयोग द्वारा तालमेल बैठा कर चलने की जरूरत है, जिस में ये सब के विचार मंथन से निकले निम्न वचन बड़े काम के हैं:

जो मेरा है वह तुम्हारा भी

लखनऊ के आर्किटैक्ट सुहास और उन की पत्नी सीमा में शुरूशुरू में छोटीछोटी बातों को ले कर अकसर अनबन हो जाती थी. सीमा कहती है, ‘‘जैसे मायके से मिले महंगे बैड कवर, क्रौकरी आदि को अगर सुहास अपने दोस्तों, रिश्तेदारों के लिए इस्तेमाल करते, तो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. इसी तरह इन्हें भी मेरे रिश्तेदारों, सहेलियों द्वारा इन के म्यूजिक सिस्टम, नौवलों से छेड़छाड़ एकदम नागवार गुजरती. फिर एक दिन हम ने तय किया कि हम एक हैं, तो एकदूसरे की चीजों का इस्तेमाल क्यों न करें? उस दिन से सारा परायापन दूर हो गया.’’

जैसे मुझे अपने मम्मीपापा, भाईबहन, दोस्तरिश्तेदार प्यारे हैं वैसे ही तुम्हें भी अपने

जयपुर के डा. राजेश और उन की होममेकर पत्नी ईशा ने इस बात का खुलासा किया कि पतिपत्नी दोनों के परिवारों का, रिश्तेदारों का घर में बराबर का सम्मान जरूरी है. राजेश ने अपनी बहन रीमा के घर में अपने व अपने मातापिता के बारबार अपमानित होने की घटना बताई. बहन अपने पति के इस अपमानित व्यवहार से आहत रहती है.

इस से उन के आपसी रिश्ते कभी मधुर नहीं हो पाए. यह तो गलत अपेक्षा है कि केवल पत्नी पति के घर वालों को पलकों पर बैठाए और पति उस के पीहर के लोगों को सम्मान न दे कर जबतब अपमानित करता फिरे. पति का भी उतना ही फर्ज है. पत्नी अर्धांगिनी है, सहचरी है कोई गुलाम नहीं.

जैसे मेरी जरूरतें जरूरी वैसे तुम्हारी भी

सुजाता एक कौरपोरेट औफिस में काम करती है. अकसर उसे घर आने में देर हो जाती है. घर पर भी कभीकभी उसे औफिस का काम निबटाना पड़ता है. इस पर पति विशाल चिड़चिड़ करता था. एक दिन सुजाता ने उसे बैठा कर अच्छी

तरह समझाया कि विशाल मैं ने शादी के पहले ही तुम्हें बता दिया था. तब तो तुम्हें मेरे अच्छे पैकेज के आगे सब मंजूर था. जब तुम अपनी बिजनैस मीटिंग से लेट आते हो तब मुझे तो कोई आपत्ति नहीं होती. फिर तुम क्यों नहीं समझते? मैं नौकरी नहीं छोड़ सकती. मां का हर महीने ब्लड ट्रांसफ्यूजन मैं नहीं रोक सकती. बेशक तुम मुझे छोड़ सकते हो. मुझे इस में भी कोई आपत्ति नहीं. मैं तलाक के लिए तैयार हूं.

मैं कल ही कहीं और शिफ्ट हो जाती हूं. पर सोचो मेरी मां की जगह तुम्हारी मां होती तो भी तुम यही कहते? अपनीअपनी जौब, जरूरत व जिम्मेदारी पूरी करने में एकदूसरे का सहयोग होगा तभी संबंधों में मधुरता आएगी और संबंध बना रहेगा वरना अपनेअपने रास्ते जाना ही बेहतर है.

उस दिन से विशाल समझ गया. अब बड़ीबड़ी क्या मेरी भूखप्यास, नींद जैसी छोटी जरूरतों को भी तवज्जो देने लगा है. मेरा दर्द, मेरी थकान उसे सब समझ आता है. लाइफ पार्टनर बने हैं तो यह जरूरी भी है.

अपनी आदतें, शौक, संस्कार जैसे मेरे वैसे तुम्हारे

पति पत्नी अलग परिवारों से अलग परवरिश से आते हैं पर दूसरे से अपने जैसा व्यवहार, रहनसहन की ही अपेक्षा रखते हैं या अलग देख मखौल उड़ाते हैं तो वह ठीक नहीं, बल्कि हल ढूंढ़ना उचित है. स्कूल टीचर दीप्ति अपने बैंक मैनेजर पति शिखर के नंगे पांव घर में घूमने के बाद बिस्तर में घुसने से परेशान रहती थी, तो शिखर उस के कहीं से आने के बाद कपड़े चैंज कर बिस्तर पर छोड़ देने से परेशान रहता था. आखिर एक दिन बैठ कर दोनों ने समस्या का हल निकाला. अब पैरों की गंदगी से बचने के लिए शिखर ने कारपेट बिछा दिया तो दीप्ति ने भी शिखर की देखादेखी कपड़े सलीके से हैंग करने शुरू कर दिए. उन की जिंदगी फिर से गुनगुनाने लगी है.

दूसरों के सामने एकदूसरे की मीनमेख या मखौल नहीं

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश की माला पहली बार विवाह के बाद हवाईयात्रा कर रही थी. पति अंश पेशे से चार्टर्ड अकाउंटैंट था. उस का एक दोस्त भी सपत्नीक उन के साथ था. सब किसी तीसरे दोस्त की शादी में जा रहे थे. बैल्ट बांधने की घोषणा हुई तो माला ने जल्दी से बगल वाली सीट की बैल्ट उठा ली और लगाने की कोशिश करने लगी. यह देख अंश हंस पड़ा, ‘‘अकल घास चरने गई है क्या? इतना भी नहीं आता क्या?’’ यह देख सब मुसकराने लगे तो माला को बहुत बुरा लगा. अत: बोली, ‘‘तुम्हें हंसने के बजाय मेरी मदद करनी चाहिए थी या इन की तरह अमीर घर की पत्नी लाते.’’

अंश को अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.

इसी तरह बरेली निवासी गीता के भैयाभाभी उस से मिलने आए तो पति दीपक बोतल से ही पानी पी रहा था. उस ने भैया को भी पानी की वही बोतल औफर कर दी.

‘‘रुकिए, मैं गिलास लाती हूं. हमारे यहां कोई गंवारों जैसे नहीं पीता,’’ गीता बोली.

दीपक को उस की बात चुभ गई. बोला, ‘‘और हमारे यहां भी पति से ऐसे कोई बात नहीं करता.’’

‘‘भैया ने गीता को टोक कर बात संभाली. बाद में दोनों ने एकदूसरे को सौरी बोला और दूसरों के सामने एकदूसरे का मखौल न उड़ाने और मीनमेख न निकालने का वादा किया.’’

जैसी मेरी सोशल बौंडिंग वैसी तुम्हारी भी

दीपांकर की पत्नी जया शादी से पहले के ही बड़ी सोशल रही है. सब के दुखसुख, उत्सवत्योहार इत्यादि में शामिल होती आई है. औफिस हो या पड़ोसरिश्तेदार सब से निभाती आई है और अब भी निभा रही है. दीपांकर भी उसे सहयोग करता है, सो जया भी दीपांकर के सामाजिक रिश्तों को निभाने में कोई गुरेज नहीं करती.

जैसे मुझे कुछ स्पेस चाहिए वैसे ही तुम्हें भी

पारुल ने बताया सारा दिन तो वह पति रवि के सिर पर सवार नहीं रहती. कुछ वक्त उसे अकेला छोड़ देती है ताकि वह अपना कुछ काम कर सके. पति भी इस बात का ध्यान रखता है कि मुझ को स्पेस मिलता रहे. दोनों में इस बात को ले कर कभी कोई तकरार नहीं होती. अगले दिन के लिए अपना होमवर्क भी आसानी से कर लेते हैं. साथ होते हैं तो खूब छनती है.

जैसी मेरी कुछ सीक्रेट्स न बताने की मेरी इच्छा वैसी ही तुम्हारी भी

शादी के पहले क्या हुआ था पति के साथ या पत्नी के साथ या उन के घरखानदान में. यदि यह बात कोई नहीं बताना चाहता है तो ठीक है, कुरेदकुरेद कर पूछना क्यों? शक में रहना बेकार है. कालेज के अंगरेजी के व्याख्याता डा. नगेंद्र और उन की हिंदी की व्याख्याता पत्नी नीलम का यही मानना है. उन के अनुसार रिश्ते की प्रगाढ़ता के लिए यह आवश्यक है. वर्तमान को देखें, एकदूसरे का आत्मसम्मान बना रहने दें.

पौकेट मनी खर्च पर नो रोकटोक

‘‘अपन दोनों की मस्त लाइफ का यही तो सीधा फंडा है. घर खर्च में हम सहमति से बराबर शेयर करते हैं और पौकेट मनी पर एकदूसरे की नो टोकाटोकी,’’ स्टेट बैंक कर्मी प्रिया और उन के असिस्टैंट मैनेजर पति करण ने अपनी मजेदार बातों में एक और महत्त्वपूर्ण वचन भी बता दिया.

तो अब देर किस बात की. शादी के समय 7 वचन लिए हैं, तो शादी के बाद पतिपत्नी दोनों इन वचनों को आत्मसात कर लें और फिर प्रेमपूर्वक निभाएं यह रिश्ता.

लोकतंत्र का राजतंत्रीकरण

विधानसभा चुनावों में एक बात साफ हो रही है कि राजनीति अब पुश्तैनी पेशा बन गया है. जो भी एक बार राजनीति में सफल हो जाए वह अपने बच्चों को अन्य व्यवसायों में भेजने के बजाय राजनीति में भेजना पसंद करता है. गांधी व सिंधिया परिवार, मुलायम सिंह यादव, एम करुणानिधि, लालू प्रसाद यादव, प्रकाश सिंह बादल, देवीलाल, हेमवतीनंदन बहुगुणा, बाल ठाकरे आदि के उदाहरण भरे पड़े हैं. विदेशों में भी ऐसा ही कुछ होता है और क्यूबा, उत्तर कोरिया, सिंगापुर इस के उदाहरण हैं. यह लोकतंत्र का असल में राजतंत्रीकरण करना है.

नेताओं के बच्चों को बहुत जल्दी समझ आ जाता है कि राजनीति में भले ही उतारचढ़ाव हों, पर कैरियर सुरक्षित रहता है, नेता हार कर भी नेता बना रहता है. कैरियर यदि खराब होता है तो किसी कांड में फंसने से होता है, पर कैट हैज नाइन लाइव्स की तरह राजनीति नेताओं के बच्चों को मरने नहीं देती और छोटेमोटे पद, ट्रस्टों की दादागीरी, बैंकों की चैयरमैनशिप मिलती ही रहती है. राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने हाथ मिला कर अपने पुरखों के दुश्मन से इंदिरासोनिया गांधी व मुलायम सिंह यादव की लड़ाई को भुला कर इस बार चुनावों में साथ कैरियर बनाने की कोशिश की है. कांग्रेस की अब खासीयत है कि वह जिस पार्टी के साथ छोटी पार्टनर बनती है, वह जीत जाती है चाहे कांग्रेस खुद अकेले न जीत पाए.

राजनीति कैरियर के रूप में बुरा क्षेत्र नहीं है. इसे सत्तालोलुपता  कहना गलत होगा. यह तो एक तरह से सेवा है, जिस की कीमत मिलती है. सरकार चलाना किसी भी तरह से मुफ्त में नहीं हो सकता. कोई भी बिना पैसे लिए जनता के लिए काम नहीं करेगा. जनता के लिए अगर समाजसेवी संस्था चलाओ तो भी संचालक से चपरासी तक को वेतन तो देना ही होगा. ऐसे ही हर नेता को अच्छाखासा पैसा चाहिए ताकि आफत के दिनों में उसे याचक बन कर दरदर न भटकना पड़े. जो युवा राजनीति को खराब समझते हैं, उन्हें सबक सीखना चाहिए कि रोहित वेमुला और कन्हैया जैसों की भी जरूरत है तो अखिलेश यादव व स्टालिन की भी.

यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कैरियर एक एमबीए पास के कैरियर से भी मुश्किल है. इस में बुद्धि और शारीरिक बल दोनों चाहिए. सैकड़ों लोगों से मिलना, उन के नाम याद रखना, समस्याओं की जड़ों में जाना झगड़ेफसाद या खर्च, वाकपटु होना, भाषण देने की कला आना सब जरूरी है और जो यह नहीं कर सकता वह पीछे रह जाता है. यह कैरियर नेता पुत्रों के लिए तो अच्छा है ही, अन्य लोगों के लिए भी बुरा नहीं. सही नेता ही समाज को नई दिशा देते हैं. कभी सरकार को मनमानी करने से रोकते हैं तो कभी सरकार चलाते हैं.

अपनी ही जिंदगी का दुश्मन आईपीएस अधिकारी

22 दिसंबर, 2016 की बात है. जयपुर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. शाम करीब साढे़ 7 बजे राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के एडिशनल एसपी आशीष प्रभाकर ने अपने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया. उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे के पास एक कार में एक महिला और एक पुरुष के शव पड़े हैं.’’

कंट्रोल रूम का ड्यूटी अफसर कुछ और पूछ पाता, इस से पहले ही एएसपी प्रभाकर ने फोन काट दिया. ड्यूटी अफसर ने फोन की विश्वसनीयता जानने के लिए पुलिस अधिकारियों के फोन नंबरों की सूची निकाली. उस में एएसपी आशीष प्रभाकर का मोबाइल नंबर देख कर ड्यूटी अफसर ने उस नंबर पर फोन लगाया, लेकिन फोन नो रिप्लाई जाता रहा. कई बार ट्राई करने के बाद भी आशीष के मोबाइल नंबर पर कोई रेस्पांस नहीं मिला.

थकहार कर ड्यूटी अफसर ने पैट्रोलिंग पुलिस टीमों को वायरलैस पर शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे के पास कार में 2 शव पड़े होने की सूचना प्रसारित कर दी.

वायरलैस संदेश मिलते ही पैट्रोलिंग पुलिस टीमें विधानी चौराहे की ओर रवाना हो गईं. वहां उन्होंने कई जगह देखा, लेकिन ऐसी कोई कार नजर नहीं आई. कई लोगों से पूछताछ भी की, लेकिन किसी कार के एक्सीडेंट होने की भी कोई जानकारी नहीं मिली.

फोन पर मिली सूचना झूठी होगी, यह सोच कर पैट्रोलिंग टीमें वापस लौटने लगीं, तभी एक पैट्रोलिंग टीम को विधानी चौराहे से करीब 500 मीटर दूर एक निर्माणाधीन अस्पताल के सामने पुलिस की बत्ती लगी सरकारी स्कौर्पियो कार खड़ी नजर आई. पुलिस टीम उत्सुकतावश उस कार के पास गई. कार में कोई हलचल नजर नहीं आ रही थी.

पैट्रोलिंग अधिकारी ने स्कौर्पियो पर टौर्च से रोशनी डाली तो वह हैरान रह गया. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति का सिर स्टीयरिंग पर टिका हुआ था और खून बह रहा था. पैट्रोलिंग टीम के इंचार्ज ने टौर्च की रोशनी से कार के अंदर झांक कर देखा तो आगे की सीट पर बैठी एक महिला भी मृत पड़ी दिखाई दी. महिला के शरीर से भी खून बह रहा था.

पैट्रोलिंग टीम ने घटना की सूचना तुरंत अधिकारियों को दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही शिवदासपुरा एसीपी मौके पर पहुंच गए. थोड़ी देर बाद पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल, एटीएस के मुखिया उमेश मिश्रा सहित कई अन्य अधिकारी भी वहां आ गए. कार की ड्राइविंग सीट पर मृत अवस्था में पड़े व्यक्ति को पुलिस अधिकारियों ने तुरंत पहचान लिया. वह एटीएस के एएसपी आशीष प्रभाकर थे. उन के पास ही कार में आगे की सीट पर मृत पड़ी महिला की उस वक्त शिनाख्त नहीं हो सकी. अलबत्ता कार में शराब की खाली बोतल और चिप्स के पैकेट पड़े मिले. आशीष का सर्विस रिवौल्वर भी उन के हाथ में था.

मौके के हालात से लग रहा था कि एएसपी आशीष ने सर्विस रिवौल्वर से पहले कार में अगली सीट पर बैठी महिला को गोली मारी और उस के बाद उसी रिवौल्वर से अपनी कनपटी पर गोली मार ली. सिर में गोली लगने से आशीष की भी मौत हो गई.

यह खबर मिलने पर आशीष के बैचमेट कई अधिकारी वहां पहुंच गए. उन्होंने महिला का शव देख कर यह बात साफ कर दी कि वह आशीष की पत्नी नहीं, बल्कि फ्रैंड थी. लेकिन मृतका का नामपता कोई अधिकारी नहीं बता सका. अलबत्ता आशीष के साथी अधिकारियों से यह बात जरूर पता चली कि उन दिनों आशीष घरेलू विवाद की वजह से तनाव में चल रहे थे. इसी के चलते कुछ समय से वह उदास रहते थे.

कार की जांचपड़ताल के दौरान इस बात के सबूत भी मिले कि आशीष और उन की महिला मित्र के बीच छीनाझपटी हुई थी. 2 गोलियां कार के गेट के शीशे पर और एक गोली कार की छत में लगी मिली. इस से अधिकारियों को लगा कि आशीष ने सुसाइड के लिए जैसे ही अपना सर्विस रिवौल्वर निकाला होगा, तभी उन का अपनी महिला मित्र ने विवाद हुआ होगा. महिला मित्र ने आशीष का रिवौल्वर वाला हाथ पकड़ा होगा, इसी दौरान गोलियां कार के गेट और छत पर लगी होगीं.

अधिकारियों को कार में आशीष के पास से एक सुसाइड नोट भी मिला. सुसाइड नोट में आशीष ने अपनी पत्नी से माफी मांगते हुए लिखा था कि वह गलत रास्ते पर चले गए थे और एक महिला उन्हें ब्लैकमेल कर रही थी. पत्नी अनीता को संबोधित करते हुए उन्होंने सुसाइड नोट में आगे लिखा था कि ‘मैं अपने दोनों बच्चों के लिए बहुत कुछ करना चाहता था, लेकिन समस्या कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा, मुझे माफ कर देना.’

सुसाइड नोट मिलने से यह माना गया कि आशीष ने महिला मित्र को कार में बैठाने से पहले ही पूरा मन बना कर सुसाइड नोट लिख लिया होगा. कार में आशीष का मोबाइल भी मिला.

पुलिस अधिकारियों ने आशीष के घर वालों को सूचना दे कर मौके पर बुला लिया. आशीष की पत्नी अनीता उस समय जयपुर में ही चौड़ा रास्ता स्थित अपने मायके में रह रही थीं. आशीष के ससुराल वाले और परिजन घटनास्थल पर आ गए. उन की मौजूदगी में पुलिस ने आवश्यक काररवाई की. विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) के अधिकारियों ने मौके से जरूरी सबूत जुटाए. प्राथमिक काररवाई के बाद रात को ही आशीष और उन की महिला मित्र के शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिए गए.

आशीष करीब 20 दिनों पहले ही एटीएस में आए थे. इस से पहले उन्होंने राजस्थान पुलिस अकादमी में 10 महीने की ट्रेनिंग पूरी की थी. घटना से करीब एक महीना पहले पुलिस अकादमी में वह ट्रेनिंग के दौरान लापता हो गए थे. जब काफी देर तक उन का मोबाइल कनेक्ट नहीं हुआ तो उन की पत्नी अनीता ने पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर नाकाबंदी करवाई थी. बाद में वह जयपुर में ही जलमहल के पास मिले थे. आशीष के अचानक ट्रेनिंग से गायब होने पर काफी विवाद भी हुआ था. बहरहाल, बाद में उन की नियुक्ति एटीएस में हो गई थी.

जांचपड़ताल में यह बात सामने आई कि उस दिन सुबह रोजाना की तरह आशीष करीब 10 बजे अपने औफिस पहुंच गए थे. दिन भर काम करने के बाद वह शाम करीब साढे़ 5 बजे औफिस से निकले थे. उस समय वह अकेले ही थे. बाद में उन्होंने अपनी महिला मित्र को साथ लिया होगा. महिला मित्र के साथ वह सरकारी कार में करीब 2 घंटे तक घूमते रहे. इधरउधर घूमने के बाद वह शिवदासपुरा क्षेत्र में विधानी चौराहे के पास पहुंचे थे. पुलिस रात भर मामले की जांचपड़ताल में जुटी रही.

जांच में सामने आया कि राजस्थान में इंडियन मुजाहिदीन के मौड्यूल को तोड़ने में अहम भूमिका निभाने वाले आशीष पूनम के प्रेमजाल में फंसे हुए थे. आशीष करीब 40 साल के थे. पुलिस को घटना के दूसरे दिन एक और सुसाइड नोट मिला. उस में उन्होंने लिखा था कि पूनम शर्मा ने उन की जिंदगी बरबाद कर दी है. उस ने प्रदेश के कई पुलिस और अन्य अधिकारियों को भी अपनी सुंदरता के जाल में फांस रखा था. वह अपने साथियों के साथ मिल कर मुझे ब्लैकमेल कर रही थी.

एक पुलिस अफसर होने के नाते मैं ने उसे सजा दे दी. आशीष ने इस दूसरे सुसाइड नोट में लिखा था कि पूनम ने प्यार का नाटक कर मुझे व मेरे परिवार को तबाह कर दिया. वह अफसरों को अपनी सुंदरता के जाल में फंसाती थी. अपने इस सुसाइड नोट में आशीष ने पूनम के अलावा रोशन, दीपक, उमेश, प्रभाकर, महेश, नरसीराम व मुकेश मीणा आदि 7 लोगों के नाम और 5 मोबाइल नंबर लिख कर कहा था कि पुलिस इन से पूछताछ करे.

दूसरे दिन आशीष के साथ कार में मृत मिली उन की महिला मित्र की शिनाख्त हो गई. वह पूनम ही थी. इस के बाद पुलिस ने शिवदासपुरा थानाप्रभारी की रिपोर्ट पर आशीष प्रभाकर के खिलाफ पूनम की हत्या करने और उस के बाद सुसाइड करने का मामला दर्ज कर लिया. आशीष और पूनम के शवों का पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस ने शव उन के घर वालों को सौंप दिए.

शव सौंपे जाते समय पूनम के घर वालों ने आरोप लगाया कि आशीष ने पूनम की हत्या कर दी और मरतेमरते उसे बदनाम भी कर गया. पूनम के घर वालों का कहना था कि उस के मोबाइल में न तो आशीष की कोई फोटो है और न ही नंबर. आशीष इस मामले को गलत दिशा दे कर खुद को सही साबित करना चाहता है.

पूनम का शव उस के घर वाले उसी दिन अलवर जिले के टहला थाना इलाके के गांव रामपुरा ले गए. रामपुरा में पूनम की अंत्येष्टि कर दी गई. दूसरी ओर आशीष के घर वालों ने आशीष के शव का जयपुर में ही अंतिम संस्कार कर दिया.

पुलिस की शुरुआती जांचपड़ताल में आशीष व पूनम की जो प्रेम कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

आशीष अजमेर में अलवर गेट के रहने वाले जानेमाने साहित्यकार प्रफुल्ल प्रभाकर के बेटे थे. उन की 2 बहनें हैं. एक बहन की ससुराल जयपुर में है और दूसरी की ग्वालियर में. आशीष ने अजमेर के सेंट एंसलम से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद डीएवी कालेज से ग्रैजुएशन किया. घर में साहित्य का माहौल होने के कारण आशीष ने बाद में पत्रकारिता की पढ़ाई की. उन्होंने एक साल तक एक दैनिक अखबार में बतौर ट्रेनी नौकरी भी की. बाद में उन का चयन राजस्थान पुलिस सेवा (आरपीएस) में हो गया. आशीष अपने काम के प्रति ईमानदार थे. वह शरमीले और सीधेसादे माने जाते थे.

काफी समय से आशीष जयपुर में रह रहे थे. जयपुर में अजमेरी गेट के पास उन्हें पुलिस क्वार्टर मिला हुआ था. दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल और राजस्थान एटीएस ने मार्च 2014 में जयपुर और जोधपुर में एक साथ काररवाई कर के इंडियन मुजाहिदीन मौड्यूल का खुलासा किया था.

इस में आईएम का सरगना तहसीन अख्तर उर्फ मोनू, बम मेकर वकास और जयपुर, जोधपुर तथा सीकर से कई लोग गिरफ्तार हुए थे. इस मामले की खोजबीन आशीष प्रभाकर ने की थी. पुलिसकर्मियों की हत्या कर करीब सवा साल पहले हिरासत से फरार हुए कुख्यात अपराधी आनंदपाल के गिरोह के कुछ गुर्गे पकड़ने में भी आशीष की अहम भूमिका रही थी.

कुछ साल पहले उन्होंने जयपुर में गोपालपुरा बाईपास पर अपने किसी परिचित के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट खोला था.

पूनम अलवर जिले के रामपुरा गांव के रहने वाले लक्ष्मणप्रसाद शर्मा की बेटी थी. पूनम की शादी सन 2011 में हो गई थी, लेकिन कुछ समय बाद ही उस का पति से झगड़ा हो गया. उस समय जयपुर के माणक चौक थाने में पूनम की ओर से दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराया गया था. आशीष तब माणक चौक इलाके के सर्किल अफसर थे. पूनम की अपने केस के सिलसिले में आशीष से मुलाकात होती थी. इन्हीं मुलाकातों के दौरान पूनम की आशीष से नजदीकियां बढ़ गईं. इस बीच पूनम का अपने पति से तलाक हो गया.

पूनम पढ़ीलिखी थी. पति से तलाक के बाद वह सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी.  पूनम की इच्छा राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की अधिकारी बनने की थी. इस के लिए वह आरएएस की कोचिंग करने लगी. आशीष प्रभाकर ने गोपालपुरा बाईपास पर कोचिंग सेंटर खोला तो पूनम उसी में पढ़ने के लिए जाने लगी. इसी दौरान पूनम और आशीष की प्रेमकहानी तेजी से आगे बढ़ने लगी.

सन 2011-12 में शुरू हुई पूनम और आशीष की प्रेमकहानी में करीब 6 महीने पहले उस समय मोड़ आ गया, जब पूनम आशीष पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. इस से आशीष का घरपरिवार बिखरने की नौबत आ गई. घटना से करीब एक महीने पहले आशीष जब आरपीए में ट्रेनिंग कर रहे थे, तब एक दिन आशीष का पूनम से किसी बात पर विवाद हो गया. इस पर पूनम ने जयपुर के बजाजनगर थाने जा कर आशीष प्रभाकर के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करा दी. आशीष को जब इस बात का पता चला तो वह घर से गायब हो गए और ट्रेनिंग छोड़ कर चले गए.

घटना वाले दिन 22 दिसंबर को एएसपी आशीष प्रभाकर शाम करीब साढ़े 5 बजे एटीएस औफिस से निकले. वहां से वह सीधे पूनम के निवास पर गए. इस दौरान उन्होंने शराब भी पी. पूनम को अपनी सरकारी कार स्कौर्पियो में साथ ले कर वह काफी देर तक सड़कों पर घूमते रहे. बाद में वह शिवदासपुरा इलाके में विधानी चौराहे की तरफ चले गए. वहां पहुंच कर आशीष ने फिर शराब पी. इस दौरान उन की पूनम से अपने संबंधों को ले कर बात होती रही.

रात करीब साढ़े 7 बजे आशीष ने अपने मोबाइल से पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के 2 लोगों के शव पड़े होने की सूचना दी. इस के कुछ देर बाद ही आशीष ने अपना सर्विस रिवौल्वर निकाल लिया. आशीष के हाथ में रिवौल्वर देख कर पूनम घबरा गई. कार में आगे की सीट पर बैठी पूनम ने आशीष से रिवौल्वर छीनने की कोशिश की. इसी छीनाझपटी में रिवौल्वर से गोलियां चल गईं. ये गोलियां कार के शीशे और छत पर लगीं.

आशीष की पकड़ मजबूत थी. उन्होंने रिवौल्वर नहीं छोड़ा, बल्कि इस की जगह पूनम की दाईं कनपटी पर रिवौल्वर लगा कर गोली दाग दी. गोली लगते ही पूनम के सिर से खून का फव्वारा फूट निकला. वह सीट पर लुढ़क गई. आशीष को जब लगा कि पूनम मर चुकी है तो कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने सर्विस रिवौल्वर से ही अपनी कनपटी पर गोली मार ली.

गोली लगते ही आशीष के सिर से भी खून निकलने लगा. ड्राइविंग सीट पर बैठे आशीष स्टीयरिंग पर ही लुढ़क गए. बाद में पुलिस को आशीष के रिवौल्वर की मैगजीन में 7 जिंदा कारतूस और कार में गोलियों के 2 खोखे मिले.

मामले की जांच के लिए पुलिस ने एएसपी आशीष प्रभाकर और पूनम के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाईं. इस से पता चला कि आशीष की पूनम से घटना के दिन से पहले 17 दिसंबर को बात हुई थी. जांच में यह भी जानकारी मिली कि आशीष ने दूसरे सुसाइड नोट में 7 लोगों के नाम लिखते हुए जो 5 मोबाइल नंबर लिखे थे, उन में 3 नंबर आशीष प्रभाकर और 2 नंबर पूनम के नाम से जारी हुए थे. पुलिस यह जांच कर रही है कि इन मोबाइल नंबरों के सिमकार्ड का उपयोग कौन कर रहा है. पुलिस यह भी पता लगा रही है कि पूनम के माध्यम से कोई व्यक्ति आशीष को ब्लैकमेल तो नहीं कर रहा था.

घटना के एक सप्ताह बाद 28 दिसंबर, 2016 को जांचपड़ताल के दौरान पुलिस को एटीएस कार्यालय में आशीष प्रभाकर के कमरे की तलाशी के दौरान उन की अलमारी से 2 सुसाइड नोट और मिले. इन में एक सुसाइड नोट में उन्होंने मातापिता से माफी मांगते हुए लिखा था कि ‘मैं आप का अच्छा बेटा साबित नहीं हो सका.’ बच्चों के नाम लिखे गए दूसरे सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा था कि ‘मेरी तरह गलत रास्ते पर मत चले जाना. तुम लोग पढ़ाई करना, कभी हिम्मत मत हारना.’

ये 2 सुसाइड नोट और मिलने से यह बात सामने आई कि आशीष ने पूनम की हत्या करने के बाद सुसाइड करने की योजना पहले ही बना ली थी. आशीष ने घटना को अंजाम देने से पहले 4 सुसाइड नोट लिखे थे. इन में 2 नोट वह अपने औफिस की अलमारी में छोड़ गए थे और 2 नोट साथ ले गए थे.

कथा लिखे जाने तक पुलिस मामले की जांचपड़ताल में जुटी थी. मामले की तह तक जाने के लिए पूनम व आशीष के घर वालों के बयान लिए गए हैं. वहीं एटीएस के अधिकारियों व कर्मचारियों के बयान भी लिए गए हैं. पुलिस का मानना है कि मर्डर और सुसाइड की यह मिस्ट्री बेवफाई के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही है. पुलिस अफसर का मामला होने के कारण फिलहाल पुलिस इस मामले में पूरी गोपनीयता बरत रही है.

अफसरों का मानना है कि पूनम व प्रभाकर की कुछ समय से बात नहीं हो रही थी. इस का बड़ा कारण यह था कि पूनम की कुछ अन्य लोगों से मोबाइल पर बातचीत होती थी. संभवत: इसी बात से प्रभाकर खफा थे. उन्होंने इस बारे में कई बार पूनम को समझाने की कोशिश की, लेकिन पूनम ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. संभवत: पूनम की हत्या की वजह यह भी हो सकती है.

जयपुर में तैनात राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी ने इस मामले में पुलिस विभाग पर ही सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया था कि आशीष प्रभाकर की मौत टाली जा सकती थी. एक होनहार अधिकारी समाज और पुलिस विभाग पर कई सवाल छोड़ गए हैं. मैं जितना इस अधिकारी के बारे में जान सका हूं, यह पुलिस के लिए बड़ा नुकसान है.

ऐसे क्या कारण रहे कि पुलिस विभाग को इस अधिकारी की मानसिक दशा का आभास नहीं हो सका. पुलिस विभाग एक परिवार के रूप में है. क्या आशीष को सब से ज्यादा असुरक्षा और भय अपने ही विभाग से था, जो अपनी व्यथा विभाग के सामने रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका. अगर ब्लैकमेलिंग व चीटिंग से परिवार तबाह होने के कगार पर था तो पुलिस पर भरोसा होना चाहिए था. इस के बदले उन्होंने यह मान लिया कि विभाग के अधिकारी उन का पक्ष नहीं मानेंगे और उन्हें हंसी का पात्र बना देंगे.   

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें