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क्यों हिंदी प्रेमी हैं अंग्रेजी मातृभाषी टेरेंस लुईस

आमिर खान की फिल्म ‘‘लगान’’ सहित अन्य कई फिल्मों के मशहूर नृत्य निर्देशक व नृत्य के रियालिटी शो ‘‘डांस इंडिया डांस’’ के जज,  रियालिटी शो ‘‘खतरों के खिलाड़ी’’ में प्रतियोगी रह चुके और लघु फिल्म ‘‘द गुड गर्ल’’ में अभिनय कर शोहरत बटोर रहे टेरेंस लुईस मूलतः अंग्रेजी भाषी हैं. उनकी मातृभाषा अंग्रेजी है. उनकी शिक्षा दीक्षा अंग्रेजी माध्यम यानि कि कांवेंट स्कूल में हुई है. वह स्कूल के दिनो में फ्रेंच भाषा के साथ, विद्यालय नियम के मुताबिक तीसरी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ते थे.

लेकिन जब टेरेंस लुईस टीवी चैनल पर बात करते हैं या पत्रकारों से मिलते हैं, तो एकदम साफ उच्चारण वाली क्लिष्ट हिंदी में ही बात करते हैं. टेरेंस लुईस के हिंदी उच्चारण में कहीं भी अंग्रेजी वाला एक्सेंट नहीं नजर आता. उन्हे हिंदी में बात करते हुए देखकर यह मानना मुश्किल हो जाता है कि टेरेंस लुईस की मातृभाषा अंग्रेजी है. बल्कि लोग सोचने लगते हैं कि इनकी मातृभाषा हिंदी ही है और वे मुंबई की बजाय उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद, कानपुर या लखनऊ शहर में पले बढ़े हैं.

इसी के चलते हाल ही में जब टेरेंस लुईस से उनके मुंबई स्थित दफ्तर में हमारी मुलाकात हुई, तो उनके मुंह से शुद्ध हिंदी उच्चारण को सुनकर हमने उनसे पूछ ही लिया कि उन्होंने इतनी साफ हिंदी बोलना कहां से सीखा? इस पर ‘‘सरिता’’ पत्रिका से एक्सक्लूसिव बात करते हुए टेरेंस लुईस ने कहा- ‘‘यॅूं तो मैं हर किसी से कह देता हूं कि मजबूरी ने हिंदी सिखा दी, मगर आज पहली बार आपको व आपकी पत्रिका ‘सरिता’ को सच बताना चाहूंगा. यह सच है कि मेरी मातृभाषा अंग्रेजी है पर स्कूल मे मैंने फ्रेंच भी पढ़ी है. स्कूल व कालेज के दिनों में मैं अंग्रेजी भाषण प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता था और जीतकर आता था और हिंदी वाला हर बार हारकर आता था. उस भाषा में मुझे जोश व कहने का लजहा नहीं था जिससे कि मैं विजेता बनता, पर शिक्षकों ने मुझे भेजने का निर्णय लिया. उस वक्त तक मेरी हिंदी अच्छी नहीं थी".

"मैं मुंबई में अंधेरी व विलेपार्ले के बीच ईर्ला इलाके की पठान चाल में पैदा हुआ हूं, इसलिए हिंदी बोल तो जरुर लेता था, हिंदी समझ लेता था. कभी मेरी हिंदी में अंग्रेजी वाला एक्सेंट नहीं था, क्योंकि मैं जिस चाल में रहता था, उस चाल में सभी हिंदी व उर्दू बोलते थे. उनके बीच बचपन से ही मैं हिंदी में ही बात किया करता था, पर ये हिंदी मुंबईया थी और स्कूल में शुद्ध क्लिष्ट इलाहाबादी हिंदी हमें पढ़ाई जाती है. तब शिक्षकों ने मुझे हिंदी पढ़ना व लिखना सिखाना शुरू कर दिया था. नौंवी व दसवीं कक्षा तक मेरी हिंदी काफी सुधर गयी और हाई स्कूल में मुझे अंग्रेजी की बनिस्बत हिंदी में ज्यादा अच्छे नंबर मिले. कॉलेज में हिंदी से मेरी दूरी बढ़ गयी थी. फिर जब मैं ईर्ला छेाड़कर बांदरा रहने आ गया, तो हिंदी छूटती गयी. सच कहूं तो ‘डांस इंडिया डांस’ के पहले सीजन में जब मैं जज बनकर गया, तो मैं बहुत गलत हिंदी बोलता था. मुझे खुद शर्म आयी. मैं प्रोफेशनल हूं और सब कुछ सही ढंग से करना पसंद करता हूं. मैने ‘डांस इंडिया डांस’ के अपने डीवीडी मंगाकर घर पर बैठकर देखे, अपनी गलतियों पर मुझे जैसे रोना आ गया. फिर मैंने नए सिरे से किताबे मंगाकर हिंदी सीखना शुरू किया. घर पर हिंदी के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स वगैरह मंगाना शुरू किया. दिन रात हिंदी के शब्द सीखना शुरू किया. टीवी पर भी सिर्फ समाचार ही देखता व सुनता था. फिर मुझे आठवीं, नौवीं व दसवीं में जो कुछ हिंदी के शब्द सीखे थे, वो सब याद आने शुरू हो गए. मगर मुंबई में रोजमर्रा की जिंदगी में हम अच्छी हिंदी बोलते ही नही हैं. पर ‘महाभारत’ सीरियल में जो हिंदी थी, वह मुझे आकर्षित नहीं करती. मुझे वह हिंदी आकर्षित करती है, जिस तरह की हिंदी अमिताभ बच्चन जी बोलते हैं. जब वह बात करते हैं, तो उनका लहजा, बात करते समय उनका ठहराव, विचार मुझे पसंद आते हैं. मैं भी उन्ही की तरह साफ, शुद्ध हिंदी में बात करना व हिंदी भाषा को सम्मान देने का प्रयास करता हूं. मुझे भिन्न- भिन्न भाषाओं को सीखने का बहुत शौक है और साथ ही लिखावट भी अच्छी होनी चाहिए."

जब हमने उनसे पूछा कि अब वह हिंदी की किताबे पढ़ना पसंद करते हैं अथवा अंग्रेजी की? तो टेरेंस लुईस ने बड़ी साफ गोई के साथ कहा- ‘‘इंसान के अंदर इमानदारी जरुरी है. तभी वह सफलता पाता है. मैने प्रेमचंद की तमाम कहानिंयां पढ़ी हैं, मेरे पास गुलजार की कुछ किताबे हैं, जिन्हें पढ़ता रहता हूं. मैं ज्यादातर हिंदी में लिखी हुई किताबें घर पर लेकर आता हूं और पढ़ता हूं. मैं जब भी पृथ्वी थिएटर जाता हूं, तो वहां से कोई न कोई हिंदी साहित्य या नाटक की किताब लेकर आता ही हूं. मैंने अपने सदगुरू की आध्यात्मिक किताबें भी हिंदी में ली हैं. मेरे लिए आध्यात्मिक किताबों को हिंदी में पढ़ना मुश्किल हो जाता है, पर मैं ऐसा ही करता हूं. मुझे अच्छा लगता है, जब कोई मुझसे साफ शुद्ध या क्लिष्ट हिंदी में बात करता है.’’

टेरेंस लुईस इन दिनों एक फिल्म की पटकथा लिखने में व्यस्त हैं. उन्होने कुछ कतिवाएं भी अंग्रेजी भाषा में लिखी हैं. इसकी चर्चा करते हुए टेरेंस ने कहा- ‘सच कहूं तो मैं अंग्रेजी में ही लिखता रहा हूं, मैं हिंदी में कविताएं नहीं लिखता और अंग्रेजी में बड़ी फूर्ती से कविताएं लिख लेता हूं. सच यह है कि हिंदी में लिखते समय मुझे समय लगता है. हां कुछ कहानियां लिखी हैं. अभी एक टूटे दिल की कहानी लिखी है, पर वह भी अंग्रेजी में लिखी है. एक कविता को लिखने में मुझे एक माह का वक्त लगता है. दिल को छू जाने वाली कविताएं लिखना पसंद करता हूं. मैं व्यंग नहीं लिखता और मैं किसी पर व्यंग करता भी नहीं. मुझे अपने आप पर कोई घमंड नहीं है. मुझे हंसाने वाले या मेरी खिल्ली उड़ाने वाले लोग मुझे पसंद हैं.’

रोमांटिक कविता वर्मा के बोल

फिल्म ‘‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’’ की चर्चा करते हुए राष्ट्रिय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित व मशहूर कत्थक डांसर रही कविता वर्मा कहती हैं- ‘‘मैंने इस फिल्म में पलक का किरदार निभाया है. मैं निजी जीवन में बहुत ही ज्यादा रोमांटिक हूं. और इस फिल्म में मेरा किरदार भी कुछ इसी तरह का है.’’

संजय दत्त के साथ फिल्म ‘‘पुलिसगीरी’’ में अभिनय कर चुकी अदाकारा कविता वर्मा लंबे समय से गायब थी. मगर इन दिनों वह अपनी नई फिल्म ‘‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’’ को लेकर उत्साहित हैं. इस रोमांटिक फिल्म में कमल हासन की बेटी अक्षरा हासन और नसिरूद्दीन शाह के बेटे विवान शाह की जोड़ी है.

अपना ही तमाशा बनाने वाली लड़की: भाग 2

लोगों में भी सरकार के प्रति आक्रोश उभरने लगा. उसी दिन शाम को दीनदयाल वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म की घटना के विरोध में स्टैच्यू सर्किल पर कैंडल मार्च निकाला.

11 जनवरी को देश भर की मीडिया में छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म की घटना सुर्खियों में छाई रही. इस से पुलिस की किरकिरी हुई. सरकार की भी बदनामी हुई. स्थिति को देखते हुए पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को आरोपियों का जल्द से जल्द पता लगाने को कहा. रात भर की जांच के बाद दूसरे दिन सुबह से ही पुलिस की अलगअलग टीमें मामले की तह में जाने के लिए पूरे उत्साह से जुट गईं. आरोपी औटोचालक का पता लगाने के लिए पूरे शहर में अभियान चलाया गया. औटोचालक यूनियनों के पदाधिकारियों से बात की गई. उर्वशी ने रेलवे स्टेशन से औटो में बैठने के बाद सिंधी कैंप, नारायण सिंह सर्किल आदि जिन रास्तों से औटो के जाने की बात बताई थी, उन तमाम रास्तों की सीसीटीवी फुटेज खंगाली गई.

पुलिस की एक टीम पीडि़त छात्रा उर्वशी को ले कर शहर में उस जगह का पता लगाने का प्रयास करती रही, जहां पीडि़ता ने सामूहिक दुष्कर्म की बात बताई थी. पीडि़ता को उस के बताए रास्ते में आने वाले पार्क व जगहजगह खाली पड़े प्लौट, पार्क दिखाए गए, लेकिन उर्वशी ने किसी भी प्लौट या पार्क की पहचान नहीं की.

इस तरह दिन भर खाक छानने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच राज्य महिला आयोग ने स्वत: संज्ञान ले कर पुलिस महानिदेशक को छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म के आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार करने को कहा, साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरे चालू हैं या नहीं, इस की भी रिपोर्ट मांगी.

दूसरे दिन का नतीजा शून्य रहने पर जांच में लगे पुलिस अधिकारियों ने मीटिंग कर के पूरे मामले पर फिर से गंभीरता से विचार किया. इस विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि ट्रेन से स्टेशन पर उतरते ही उर्वशी ने अपने भाई को फोन कर के कहा था कि घर पहुंचने में देर हो जाएगी, वह खाना खा कर सो जाए.

उस ने घर लेट पहुंचने की बात क्यों कही थी? इस के अलावा अकेली लड़की होने के बावजूद वह औटो में 3 लड़कों के साथ क्यों बैठी? इतनी कड़ाके की ठंड में रात भर वह पार्क में कैसे रही? दुष्कर्म करने वाले उसे पार्क में छोड़ कर क्यों नहीं गए? उन्होंने उसे एमएनआईटी पर ले जा कर क्यों छोड़ा? आरोपी उस का मोबाइल छीन कर क्यों नहीं ले गए?

ये सवाल उभरे तो पुलिस ने नए सिरे से जांच करने का फैसला किया. इस के अलावा यह भी आशंका जताई गई कि कहीं कोई व्यक्ति अलवर से ही तो उर्वशी का पीछा नहीं कर रहा था, जिस ने जयपुर पहुंच कर अपने साथियों की मदद से दरिंदगी की हो. इस का पता लगाने के लिए एक पुलिस टीम अलवर स्टेश्न पर सीसीटीवी कैमरों की जांच के लिए भेजी गई.

तीसरे दिन पुलिस ने नए सिरे से जांच शुरू की. उर्वशी के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगाली गई. उस की 9 जनवरी को जिन लोगों से बातें हुई थीं, उन से पूछताछ की गई. उर्वशी से भी अलगअलग तरीके से पूछताछ की गई. उस के परिचित युवकों से भी पूछताछ की गई. इस सारी मशक्कत से पुलिस को उम्मीद की कुछ किरणें नजर आईं तो वह उसी दिशा में आगे बढ़ती गई. युवती के परिवार के बारे में जांच के लिए एक टीम उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर भेजी गई.

पुलिस अब कामयाबी की दिशा में आगे बढ़ रही थी. पुलिस ने उन दोनों युवकों संदीप और ब्रजेश का भी पता लगा लिया, जिन के नाम उर्वशी ने बताए थे. पुलिस अब आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए सबूत जुटाने में लग गई. तीसरे दिन रात भर और चौथे दिन दोपहर तक की जांच के बाद पुलिस ने उर्वशी द्वारा बताए गए गैंपरेप की गुत्थी सुलझा ली. 13 जनवरी को जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में गैंगरेप के मामले का परदाफाश किया गया.

पुलिस कमिश्नर ने बताया कि उक्त युवती ने नर्सिंग के छात्र को ब्लैकमेल कर के 5 लाख रुपए वसूलने के लिए अपहरण और गैंगरेप की झूठी कहानी अपने बौयफ्रैंड के साथ मिल कर रची थी. पुलिस ने इस मामले में उर्वशी और उस के बौयफ्रैंड ऋषिराज मीणा को गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस कमिश्नर ने बताया कि करीब 3 सौ पुलिस अधिकारियों ने करीब 80 घंटे तक लगातार जांच कर के जानकारी जुटाई और इस मामले का परदाफाश किया.

पुलिस की ओर से उर्वशी व ऋषिराज मीणा से की गई पूछताछ और व्यापक जांच में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह अनैतिक काम से लोगों को ब्लैकमेल कर के पैसा कमाने की कहानी थी.

उर्वशी अपने पिता व भाईबहनों के साथ उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रहती थी. उस की मां की कुछ समय पहले मौत हो गई थी. उस के पिता मानसिक रूप से कमजोर थे. परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. उर्वशी के 2 भाई और 2 बहनें हैं.

करीब 2 साल पहले घर में उर्वशी का अपने अविवाहित भाई से झगड़ा हो गया था. तब वह नाराज हो कर अपनी बुआ के पास काशीपुर चली गई थी. काशीपुर में रहते हुए वह प्राइवेट ग्रैजुएशन की तैयारी करने लगी, साथ ही वह सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी.

करीब 5-6 महीने पहले ऋषिराज मीणा किसी काम से काशीपुर गया था, जहां उस की मुलाकात उर्वशी से हुई. उर्वशी उसे स्वच्छंद लड़की लगी. 2-4 दिन वहां रहने के दौरान ऋषिराज की उर्वशी से घनिष्ठता हो गई. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. बाद में ऋषिराज जयपुर आ गया. इस के बाद भी उर्वशी और ऋषिराज में लगातार बातें होती रहीं.

उर्वशी आगरा जा कर रहने लगी तो उस दौरान भी ऋषिराज की उस से लगातार बातें होती रहीं. कई बार बातोंबातों में उर्वशी ने ऋषिराज को अपनी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं होने और नौकरी करने की बात बताई. इस पर ऋषिराज ने उसे जल्दी ही रेलवे में नौकरी लगवाने का विश्वास दिलाया.

घटना से करीब ढाई-3 महीने पहले ऋषिराज ने उर्वशी को फोन कर के कहा कि वह जयपुर आ जाए. वह उसे किराए का मकान दिलवा देगा. जयपुर में रहेगी तो नौकरी तलाशने में आसानी रहेगी. ऋषिराज के कहने पर उर्वशी जयपुर आ गई. ऋषिराज ने जगतपुरा की सरस्वती कालोनी में उसे किराए का मकान दिलवा दिया. ऋषिराज तो उर्वशी का पहले से ही परिचित था. जयपुर में उस की कई अन्य युवकों से भी दोस्ती हो गई. युवकों से दोस्ती के चलते मकान मालिक ने उसे निकाल दिया.

उर्वशी ने ऋषिराज को समस्या बताई तो उस ने जगतपुरा में ही जगदीशपुरी कालोनी में उसे किराए का दूसरा मकान दिलवा दिया. कुछ समय बाद उर्वशी अपने पिता व छोटे भाई को भी जयपुर ले आई. जयपुर आ कर वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी. उस ने कुछ समय पहले स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा के लिए फार्म भरा था.

उस का परीक्षा केंद्र अलवर में पड़ा था. 9 जनवरी को उस की परीक्षा थी. इस के लिए वह जयपुर से अलवर गई. परीक्षा समाप्त होने के बाद वह 9 जनवरी को अलवर से शाम को मुजफ्फरनगर-पोरबंदर एक्सप्रैस टे्रन में सवार हो कर शाम सवा 7 बजे जयपुर जंक्शन पर उतरी. ट्रेन से उतर कर उर्वशी ने करीब 7 बज कर 20 मिनट पर अपने छोटे भाई को फोन कर के कहा कि उसे घर पहुंचने में देर हो जाएगी. वे लोग खाना खा कर सो जाएं. वह जब घर आएगी तो दरवाजा खटखटा देगी.

11 दुल्हों की फरेबी दुलहन

देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा शहर में कारखानों और बड़ीबड़ी कंपनियों के तमाम औफिस हैं, जिन में काम करने के लिए देश के अलगअलग राज्यों से आए लोग यहां रह रहे हैं. रहने  वालों की संख्या बढ़ती गई तो फ्लैट कल्चर कायम हुआ. जिन में रहने वाले लोग एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते.  इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि लोग निजी जिंदगी में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं करते. ऐसे में किस फ्लैट में कौन रहता है और कौन क्या करता है, पड़ोसियों तक को पता नहीं होता. नोएडा शहर के ही सैक्टर-120 स्थित जोडिएक अपार्टमेंट सोसाइटी भी इस आधुनिक हकीकत से अलग नहीं थी. 17 दिसंबर, 2016 की सुबह पुलिस की 2 गाडि़यां सोसाइटी में आ कर रुकीं. पुलिस ने गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से कुछ पूछताछ की और फिर एक सुरक्षाकर्मी को साथ ले कर सीधे 11वीं मंजिल पर बने फ्लैट नंबर-1104 के सामने जा पहुंची.

पुलिस के इशारे पर सुरक्षाकर्मी ने दरवाजे के ठीक बराबर में लगी डोरबैल बजाई तो अंदर से किसी लड़की की आवाज आई, ‘‘कौन है?’’

सुरक्षाकर्मी ने जवाब में कहा, ‘‘दरवाजा खोलिए मैम, मैं गार्ड हूं.’’

‘‘क्या बात है?’’

‘‘आप से कोई मिलने आया है.’’ गार्ड ने कहा.

कुछ पलों की खामोशी के बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला तो दरवाजे पर पुलिस वालों को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह कुछ समझ पाती, उस के पहले ही एक पुलिसकर्मी ने पूछा, ‘‘मेघा कहां है?’’

पुलिस वाले के इस सवाल पर वह चौंकी, लेकिन तुरंत ही संभलने की कोशिश करते हुए जवाब देने के बजाए सवाल दाग दिया, ‘‘एक्सक्यूजमी सर, कौन मेघा? मैं समझी नहीं. आप शायद गलत जगह आ गए हैं. यहां कोई मेघा नहीं रहती.’’

लड़की के जवाब से एकबारगी पुलिसकर्मी सकते में आ गए. लेकिन अगले ही पल उस ने कहा, ‘‘यह नाटक बंद करो और जल्दी बताओ कि मेघा कहां है?’’

वह लड़की कोई जवाब देती, उस के पहले ही पुलिसकर्मी फ्लैट में दाखिल हो गए. अंदर बैडरूम में एक लड़की एक युवक के साथ बैठी टीवी देख रही थी. पुलिसकर्मियों की नजर जैसे ही उस लड़की पर पड़ी, उन के चेहरे पर मुसकान तैर गई. जबकि लड़की ने हारे हुए जुआरी की तरह दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया.

उस की हालत देख कर उस पुलिसकर्मी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘‘यहां भी तुम शादी करने आई होगी मेघा? चलो, बहुत शादियां कर लीं, अब बाकी का वक्त जेल में बिता लेना.’’

लड़की हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दीजिए सर, अब आगे से ऐसी गलती नहीं करूंगी.’’ पुलिसकर्मियों ने उस की बातों को नजरअंदाज करते हुए फ्लैट में रहने वाले तीनों लोगों को कस्टडी में ले कर औपचारिक पूछताछ की. इस के बाद पुलिस तीनों को थाना फेज-2 ले आई, जहां उन से लंबी पूछताछ की गई. गिरफ्तार तीनों लोगों में मेघा भार्गव, उस की बहन प्राची और जीजा देवेंद्र शर्मा शामिल थे. अगले दिन मेघा की गिरफ्तारी अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बन गई. इस की वजह यह थी कि मेघा कोई मामूली लड़की नहीं थी. उस ने 11 लोगों से शादी कर के उन से करीब एक करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी की थी. लोग उस की सुंदरता के जाल में आसानी से फंस जाते थे. उसे ले कर ढेरों अरमान सजाते थे, जबकि वह शादी की शहनाई में धोखे की धुन बजाती थी.

उन की नईनवेली दुलहन मेघा फरेबी होती थी और वह कुछ ही दिनों में पूरे परिवार को नींद की गोलियां खिला कर घर में रखी नकदी और गहने ले कर रफूचक्कर हो जाती थी. इस के बाद ऐशपरस्त जिंदगी जीने वाली मेघा एक बार फिर नए दूल्हे की तलाश में निकल पड़ती थी. सिलसिला था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. केरल के त्रिवेंद्रम में भी मेघा फरेब का ऐसा ही खेल खेल कर आई थी. नोएडा पुलिस की मदद से उसे गिरफ्तार करने  वाली केरल पुलिस ही थी. उस के कारनामे से हर कोई दंग था. तीनों आरोपियों को केरल ले जाना था, लिहाजा पुलिस ने तीनों को सूरजपुर स्थित न्यायालय में पेश किया और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के उन्हें साथ ले कर केरल के लिए रवाना हो गई. सचमुच इस लुटेरी दुलहन का हर कारनामा चौंकाने वाला था.

27 वर्षीया मेघा भार्गव मूलरूप से भोपाल के अशोकनगर निवासी उमेश भार्गव की 4 बेटियों में तीसरे नंबर के बेटी थी. उस ने एमबीए की पढ़ाई की थी. वह शुरू से ही शातिर दिमाग और महत्वाकांक्षी थी. उस के ऐशपरस्ती के जो सपने थे, वे साधारण जिंदगी में कभी पूरे नहीं हो सकते थे. लेकिन वह अपने सपनों को पूरा करना चाहती थी. करीब 6 साल पहले मेघा ने केतन नामक युवक से एक कालेज में एडमीशन कराने के नाम पर 80 हजार रुपए ले लिए थे. लेकिन एडमीशन नहीं हो सका तो केतन अपने रुपए वापस मांगने लगा. मेघा ने रुपए लौटाने में आनाकानी की तो उस ने उस के खिलाफ ठगी का मामला दर्ज करा दिया. दरअसल, मेघा का मकसद उसे धोखा देना ही था. पुलिस ने इस मामले में उस के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की तो केतन न्यायालय चला गया. इस के बाद मेघा का परिवार मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के गोयल विहार में शिफ्ट हो गया. लेकिन केतन ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. अंत में पुलिस से दबाव  डलवा कर उस ने अपनी रकम वसूल कर ही ली. मेघा ने पीछा छुड़ाने के लिए यह रकम कर्ज ले कर अदा की थी. कर्ज अदा करने के लिए उस ने एक संस्थान में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली. समय अपनी गति से चलता रहा. करीब 2 साल पहले मेघा की मुलाकात महेंद्र बुंदेला से हुई. समाज में ऐसे शातिर लोगों की कमी नहीं है, जो महत्वाकांक्षी लोगों का इस्तेमाल अपने हिसाब से करने में माहिर होते हैं.

मेघा के रंगढंग और पैसे की जरूरतों को देख कर महेंद्र समझ गया कि यह ऐसी लड़की है, जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है. मौका देख कर उस ने मेघा से कहा, ‘‘मेघा, तुम ऐश की जिंदगी जीना चाहती हो न?’’

‘‘बिलकुल.’’ मेघा की आंखों में एकाएक चमक आ गई. ‘‘मेरे पास एक आइडिया है. तुम चाहो तो महीने भर में ही इतनी रकम कमा सकती हो कि पूरे साल मेहनत कर के भी उतना नहीं कमा सकती. लेकिन इस के लिए मैं जिस से कहूं, तुम्हें उस से शादी करनी होगी. वहां से जो माल मिलेगा, उस में मुझे आधा हिस्सा देना होगा.’’

‘‘क…क्या,’’ मेघा चौंकी, ‘‘लेकिन मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘शादी तो एक नाटक होगी, लेकिन उसी से तुम अमीर बन सकती हो.’’ महेंद्र ने उसे समझाया, ‘‘मैं किसी ऐसे अमीर को पकडूंगा, जिस की शादी नहीं हो रही होगी. शादी के बाद उस के माल पर हाथ साफ कर के तुम दूर निकल जाना.’’

मेघा को महेंद्र की यह योजना पसंद आ गई. इस के बाद महेंद्र एक ऐसा तलाकशुदा आदमी ढूंढ कर लाया, जो शादी के लिए काफी परेशान था. महेंद्र ने उसे मेघा की फोटो दिखा कर किसी दूसरे राज्य की अनाथ लड़की बताया. फोटो देखते ही उस ने मेघा को पसंद कर लिया तो उस ने दोनों की मुलाकात करा दी. मेघा सुंदर भी थी और पढीलिखी भी. उस आदमी की जिंदगी में जैसे खुशियों की बहार खुद चल कर आ रही थी. महेंद्र ने कहा कि लड़की जल्द से जल्द शादी करना चाहती है, क्योंकि उसे पति के रूप में सहारा चाहिए. इस पर वह आदमी और भी खुश हुआ. इस मौके को वह हाथ से जाने नहीं देना चाहता था, इसलिए जल्दी ही महेंद्र ने एक मंदिर में उन का विवाह करा दिया.

विवाह के अभी 10 दिन ही बीते थे कि मेघा एक रात करीब साढ़े 11 लाख रुपए की नकदी ले कर लापता हो गई. उस आदमी ने महेंद्र से संपर्क किया तो उस ने हाथ खड़े कर दिए. उस ने कहा कि उस अनाथ लड़की से उस की जानपहचान जरूर थी, लेकिन वह कहां की रहने वाली थी, इस बारे में उसे पता नहीं था. यह उस आदमी की शराफत थी  कि उस ने पुलिस में शिकायत नहीं की. जैसा तय था, मेघा ने आधी रकम महेंद्र को दे दी.

इस के बाद मेघा मुंबई चली गई. कुछ दिन मस्ती में गुजारने के बाद उस ने नया शिकार तलाश कर लिया और इस नए शिकार को उस ने 40 लाख रुपए का चूना लगाया. मेघा को ठगी का यह अनोखा धंधा रास आ गया. अब तक वह इतनी तेज हो गई थी कि उस ने महेंद्र का साथ छोड़ दिया और खुद ही अपने लिए दूल्हे ढूंढने लगी.

उस ने पुणे के एक अमीर परिवार के अपाहिज लड़के से शादी कर के वहां 90 लाख रुपए का चूना लगाया. इस के बाद उस ने मुंबई छोड़ दी. इस बीच मेघा की बड़ी बहन प्राची का विवाह देवेंद्र से हो चुका था. मेघा के धंधे से वे वाकिफ थे. रुपयों के लालच में वे भी उस की फितरत में शामिल हो गए.

कभी पैसोंपैसों के लिए मोहताज रहने वाली मेघा नोटों से खेलने लगी. वह अच्छा खाने और महंगे कपड़े पहनने की शौकीन थी. बड़े शहरों में घूमने के लिए हवाई जहाज की यात्राएं करती थी. मेघा सौ, 5 सौ के नोट टिप में दे दिया करती थी.

उस का कोई स्थाई ठिकाना नहीं था. वह शादियों के विज्ञापन देने वाली इंटरनेट बेवसाइट्स पर शिकार की तलाश करती थी. खास बात यह थी कि वह पैसे वाले तलाकशुदा और विकलांगों से ही शादी करती थी. इस की वजह यह थी कि उन्हें अच्छी लड़की मिल रही होती थी. ऐसे जरूरतमंद लोग ज्यादा छानबीन किए बिना शादी के लिए आसानी से तैयार हो जाते थे.

मेघा की बहन और जीजा भावी दूल्हे के परिवार से मिलते थे और माली हालत का अंदाजा लगा कर ही रिश्ता पक्का करते थे. रिश्ता पक्का होते ही शादी की जल्दी करते थे. वह अपनी कमजोर माली हालत का परिचय देते तो शादी का खर्च भी लड़के वाले ही उठाते थे. जिन की माली हालत लूटने लायक नहीं होती थी, वहां वे कोई न कोई बहाना बना कर रिश्ता तोड़ देते थे.

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा राजस्थान और बिहार में भी मेघा ने लोगों को अपना शिकार बनाया था. परिवार के नाम पर मेघा की शादी में बहन और जीजा ही शामिल होते थे. कुछ मामलों में वह खुद को अनाथ और दुखियारी लड़की बता कर अकेली ही रिश्ता पक्का कर लेती थी. वह हंसमुख स्वभाव की थी, इसलिए शादी के बाद दूल्हे के घर वालों से मीठीमीठी बातें कर के घुलमिल जाती थी.

ससुराल वाले तो अपनी नईनवेली दुलहन की तारीफ करते नहीं थकते थे कि उन के नसीब अच्छे थे, जो गुणी बहू मिली. रुपए और गहने कहां रखे होते थे, इस की वह जल्दी से जल्दी जानकारी हासिल कर लेती थी. उस में एक खास बात यह थी कि वह घर में खाना बनाने का काम भी जल्दी ही संभाल लेती थी.

ऐसा कर के वह एक तीर से 2 शिकार करती थी. एक तो लड़के वाले उस के कामकाज की प्रशंसा कर के विश्वास करने लगते थे, दूसरे उसे नींद की गोलियां मिलाने में सुविधा हो जाती थी. वह ऐसी अदाकारा बन चुकी थी कि सभी उस पर पूरी तरह विश्वास कर बैठते थे. वारदात करने से पहले वह बहन और जीजा को बता देती थी, जिस से तय समय पर वे घर के बाहर पहुंच जाते थे. इस के बाद मेघा सामान समेट कर उन के साथ निकल जाती थी.

प्रत्येक वारदात के बाद मेघा अपने मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ कर फेंक देती थी. कुछ लोगों ने पुलिस में शिकायतें भी कीं, लेकिन पुलिस कभी उस तक पहुंच नहीं पाई. इस से उस के हौसले बढ़ते गए. पिछले साल मेघा अपनी बहन और जीजा के साथ केरल पहुंची. मेघा ने अपने पुराने अंदाज में शादी कर के 4 लोगों को ठगा. कुछ महीने पहले उस ने त्रिवेंद्रम के लौरेन जोसटिस से शादी की.

शादी के 20 दिनों बाद ही वह करीब 15 लाख के माल पर हाथ साफ कर के भाग निकली. उस के शिकार हुए लोग लुटने के बाद सिर पीट कर रह जाते थे, लेकिन लौरेन सिर पीटने वालों में नहीं थे. उन्होंने सीधा पुलिस का रुख किया और मेघा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने मामले को गंभीरता लिया और इस केस की जांच का जिम्मा इंसपेक्टर टी. सज्जी को सौंपा गया. कुछ समय मुंबई में रहने के बाद मेघा, प्राची और देवेंद्र नोएडा आ कर रहने लगे.

यह इत्तेफाक ही था कि अभी तक मेघा कभी पकड़ी नहीं गई थी. उस का सोचना था कि उस का जन्म ही शादी की चाह रखने वाले लोगों को ठगने के लिए हुआ है. तीनों फ्लैट में गुमनाम जिंदगी जी रहे थे और किसी से कोई वास्ता नहीं रखते थे. आसपास के लोगों को खबर भी नहीं थी कि वहां शादी के नाम पर अपने हाथों में मक्कारी की मेहंदी लगाने वाली जालसाज दुलहन रहती है. नोएडा में भी वे नए शिकार की तलाश में जुट गए थे. उधर केरल पुलिस ने ठगी के इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उस ने मेघा के फोटो हासिल करने के साथ ही उस के मोबाइल नंबर को हासिल कर के उस की कौल डिटेल्स निकलवाई. उन की गहराई से जांचपड़ताल की गई. उस में 2 नंबर मिले, जिन पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. इन तीनों की लोकेशन भी साथसाथ होती थी. यही दोनों नंबर उस की बहन और जीजा के थे. लेकिन परेशानी की बात यह थी कि तीनों ही नंबर बंद कर दिए गए थे.

जिन मोबाइल हैंडसेट में ये नंबर इस्तेमाल होते थे, उन पर कोई दूसरा नंबर भी नहीं चल रहा था. लेकिन एक महीने बाद एक मोबाइल हैंडसेट में नया नंबर चल गया. जांच में यह नंबर मेघा के जीजा देवेंद्र का निकला. इस नंबर के संपर्क में 2॒ नंबर और आए. पुलिस समझ गई कि ये मेघा और प्राची के नंबर हैं. पुलिस ने इन नंबरों की लोकेशन पता कराई तो वह नोएडा की मिली. इस के बाद पुलिस ने तीनों ही नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. बहुत जल्दी साफ हो गया कि ये नंबर शादी के नाम पर ठगी करने वाली तिगड़ी के हैं. मेघा कोई नया शिकार फांस कर नंबर बदल सकती थी, इसलिए उसे जल्दी गिरफ्तार करना जरूरी था.

इंसपेक्टर टी. सज्जी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम नोएडा आ पहुंची और एसएसपी धर्मेंद्र यादव से मिली. एसएसपी ने एसपी (सिटी) दिनेश यादव को मदद करने के निर्देश दिए. उन्होंने फेज-2 थानाप्रभारी उम्मेद सिंह को केरल से आई पुलिस टीम के साथ लगा दिया. पुलिस ने पहले सुरागसी की, उस के बाद सोसाइटी जा कर तीनों को गिरफ्तार कर लिया. मेघा के पकड़े जाने के बाद केरल के वे अन्य लोग भी सामने आ गए हैं, जिन्हें मेघा ने ठगा था. पुलिस ने मेघा, प्राची और देवेंद्र को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. मेघा ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता और पढ़ाई का सही इस्तेमाल किया होता तो आज उसे जेल जाने की नौबत न आती. 

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

संगीत सुकून देने वाला साथी है : डा. काकोली बोरठाकुर

एक तरफ गजल गायक व गजल सुनने वाले गायब होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुंबई की जानीमानी रेडियोलौजिस्ट डा. काकोली बोरठाकुर अपने पहले 6 गजलों के सोलो गजल अलबम ‘दिल के पास’ में आवाज का जादू बिखेरेंगी. इस में शकील बदायुनी की डुएट गजल ‘कैसे कह दूं कि मुलाकात नहीं होती…’ को डा. काकोली ने भजन सम्राट अनूप जलोटा के साथ गाया है. आसाम में जन्मी काकोली की परवरिश डाक्टर परिवार में हुई है. उन के मातापिता के साथसाथ भाईबहन, चाचा सभी डाक्टर हैं. लेकिन काकोली को संगीत भी अपनी मां से विरासत में मिला. उन की मां आरती डाक्टर होने के साथसाथ फोक गायिका भी थीं.

घर के माहौल ने आप को संगीत से जोड़ा?

सच कहूं तो शुरुआत में मेरी मां डाक्टर आरती ने ही मुझे संगीत सीखने के लिए भेजा. यह वह दौर था, जब बच्चे अपने बड़ों की बात आंख मूंद कर मानते थे. स्कूल में संगीत सीखते और घर में रियाज करतेकरते मेरे अंदर भी संगीत के प्रति ललक बढ़ गई. बचपन में संगीत की समझ न होने पर भी हम सीखते रहे. पर बाद में संगीत की समझ हुई. मुंबई आने के बाद जब मेरा संपर्क भजन सम्राट व गजल गायक अनूप जलोटाजी से हुआ, तब मैं ने उन से संगीत की कुछ बारीकियां सीखीं. अब मैं संगीत को गहराइयों में जा कर समझती हूं. संगीत में रूह बहुत जरूरी है. यह रूह आप सीख नहीं सकते, यह तो दिल से आती है.

संगीत के अलावा डाक्टरी पेशा?

मेरे परिवार में सभी डाक्टर हैं. मैं भी पढ़ाई में गोल्ड मैडलिस्ट थी. मेरे घर में मेरे मम्मीपापा, बूआ, भाई सभी डाक्टर हैं. मतलब मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है, जो डाक्टर न हो. हां, मेरे पति संगीत जगत में नहीं हैं. वे रिलायंस में हैं.

मुंबई आने से पहले आप ने सिर्फ अपनी मां से ही संगीत सीखा था?

हां, मुझे संगीत की प्रेरणा अपनी मां से मिली. पर बाद में मैं ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. मैं ने 1996 में लखनऊ के ‘भातखंडे संगीत विद्यापीठ’ से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में विशारद की डिगरी हासिल की. मैं ने मुंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल से रेडियोलौजी में पोस्ट ग्रैजुएशन भी किया है. 15 वर्षों से नवी मुंबई में रेडियोलौजिस्ट के रूप में अपना खुद का अस्पताल चला रही हूं.

अस्पताल में महिलाओं के स्वास्थ्य की फिक्र, तो घर पर मां और पत्नी की जिम्मेदारियों को निभाना कभी आसान नही रहा. पर हर जिम्मेदारी को निभाते हुए संगीत से भी जुड़ी रही. सुबहशाम संगीत का रियाज करने से मेरी सारी थकावट दूर हो जाती है. संगीत के पैशन ने मुझे हमेशा प्रसन्न रखा. मेरी 2 टीनऐजर बेटियां भी खुश हैं. मुंबई पहुंचने के बाद मेरी मुलाकात भजन सम्राट अनूप जलोटा, पंडित अजय पोहनकर, उस्ताद मकबूल खान और राकेश पंडित से हुई. मैं ने मुंबई में अपने संगीत के कार्यक्रम देने शुरू किए. तब मेरी मुलाकात अनूप जलोटा से हुई. मैं ने उन के साथ भी कई बार स्टेज पर गाया. अनूप जलोटा के साथ मैं ने गजल, भजन और सेमीक्लासिकल गीत गाए हैं. मेरा अपना पहला गजल अलबम ‘दिल के पास’ है, जिसे ‘टाइम्स म्यूजिक’ बाजार में ले कर आया है.

आप ने अपना पहला गजल अलबम ‘दिल के पास’ बनाने की बात कब सोची?

मुंबई के स्टेज कार्यक्रमों में मैं गजल तो गा ही रही थी, इत्तफाक से मेरे दिमाग में एक दिन आया कि मुझे भी अपना संगीत अलबम बनाना चाहिए. यदि मैं यह कहूं कि संगीत के प्रति पैशन और गजल को बढ़ावा देने के मकसद से मैं अपना पहला गजल अलबम ‘दिल के पास’ ले कर आ रही हूं तो भी गलत नहीं होगा. पर मैं ने डाक्टरी पेशे से समय निकाल कर संगीत की साधना करते हुए इस अलबम को तैयार किया है. इसे तैयार करने में भजन सम्राट व गजल गायक अनूप जलोटा से काफी मदद मिली.

इस अलबम में किस तरह की गजलें हैं?

इस अलबम की सभी गजलें रोमांस से जुड़ी हैं. इन गजलों में रोमांस का हर पहलू नजर आएगा. इस अलबम की गजलें शकील बदायुनी, शकील आजमी और इरशाद दलाल ने लिखी हैं. इस में नए गजलकार इरशाद दलाल की एक गजल है ‘उन से नजरें मिलाने को जी चाहता है, जमाना भूल जाने को जी चाहता है…’ जबकि गजल ‘आए नहीं साजन…’ में श्रोताओं को ठुमरी का रसास्वादन मिलेगा. इस के साथसाथ अलबम में नए कलाकारों को भी मौका मिला है.

आप के लिए संगीत क्या है?

मेरे लिए संगीत खुद को तनावमुक्त रखने का बेहतरीन माध्यम है. संगीत खुद को समझाने के साथसाथ दूसरों को भी समझा देता है. संगीत दोस्त व हमराही है. संगीत तनहाई को दूर करता है. मेरे जैसे दूसरे पेशे में व्यस्त रहने वाले लोगों के लिए भी संगीत सब से बड़ा सुकून देने वाला साथी है.

आप मशहूर रेडियोलौजिस्ट हैं और संगीत से भी जुड़ी हुई हैं. ऐसे में आप की दिनचर्या क्या रहती है?

सुबह 6 बजे उठ कर घर का काम निबटा कर 2 घंटे संगीत का रियाज करती हूं. फिर तैयार हो कर 10 बजे तक अस्पताल पहुंच जाती हूं. शाम को 6 बजे घर पहुंचती हूं. चाय वगैरह पीने के बाद 2 घंटे संगीत का रियाज करती हूं. फिर घर के काम करती हूं.

कभी पैसों के लिए ऐक्टिंग नहीं की : संध्या मृदुल

कुछ अलग हट कर करने का जनून ही संध्या को सिनेमा तक खींच लाया. उन्होंने कमर्शियल सिनेमाई भूमिकाओं से हट कर अलग सिनेमा चुना पर उस में उन्हें वह पहचान नहीं मिल पाई जो उन की समकक्ष अभिनेत्रियों को मिली. उम्र के 40 बसंत देख चुकीं संध्या ने अपने कैरियर की शुरुआत छोटे परदे से 1994 में जी टीवी के शो ‘बनेगी अपनी बात’ से की. इस के बाद उन्होंने छोटे परदे पर कई शो किए लेकिन वह पहचान हासिल नहीं कर पाईं जो वे चाहती थीं. हिंदी सिनेमा में आने का मौका यशराज की फिल्म ‘साथिया’ से मिला लेकिन दर्शकों की निगाहों में मधुर भंडारकर की फिल्म ‘पेज 3’ से आईं, जिस में सशक्त भूमिका के लिए संध्या को आईफा अवार्ड से सम्मानित किया गया.

फिल्मों के बाद छोटे परदे का रुख संध्या ने एक बार फिर पकड़ा है. वह स्टारप्लस पर आ रहे शो ‘पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के’ में सिंगल मदर नाजनीन की भूमिका कर रही हैं. प्रस्तुत हैं शो के प्रमोशन पर गृहशोभा से हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

छोटे परदे पर आप की वापसी बहुत दिनों बाद हो रही है इस का कारण

मैं ने जब अपने कैरियर की शुरुआत ही छोटे परदे से की थी तो भला इसे कैसे भूल सकती हूं जिस ने मुझे पहचान दिलाई. मैं एक बात और बताना चाहती हूं कि ऐक्टिंग से मैं ने कभी ब्रेक नहीं लिया, मैं हमेशा कुछ न कुछ करती रही हूं. कुछ फिल्में जैसे ‘द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई’, ‘ऐंग्री इंडियन गौडेस’ के बारे में तो अधिकांश लोगों को मालूम भी न होगा क्योंकि इन की पब्लिसिटी बिलकुल नहीं की गई थी. जब विदेशों में इन फिल्मों को वाहवाही मिली तब यहां के लोगों ने जाना. रही बात छोटे परदे की तो मैं बहुत दिनों से किसी ऐसे शो की स्क्रिप्ट की तलाश में थी जिस शो को सारा परिवार साथ बैठ कर देख सके.

फिल्मों में आप का किरदार हमेशा मजबूत व्यक्तित्व वाला होता है इस की कोई खास वजह?

मैं कभी यह सोच कर कोई फिल्म साइन नहीं करती कि इस में मेरा लीड रोल होगा, हां यह जरूर सोचती हूं कि जो रोल मुझे मिला है उसे कैसे सशक्त बनाऊं. एक बात तो है कि महिलाएं ज्यादा मजबूत होती हैं. जब मेरे पिताजी का निधन हुआ तब लगा कि मेरी मम्मी जो हाउस वाइफ हैं बिलकुल टूट जाएगीं, पर ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. उन्होंने मजबूती से हमें संभाला और आज तक मैं जितनी भी महिलाओं से मिली हूं उन में वे सब से मजबूत महिला हैं. उन्होंने अपने दर्द को समेटा और वही किया जो करना चाहिए. ऐसे किरदार मुझे वास्तविक लगते हैं. इसीलिए ऐसे किरदारों को मैं करती हूं.

काम के प्रति क्या नजरिया है?

मैं ने कभी पैसों के लिए ऐक्टिंग नहीं की, बल्कि बचपन से ही ऐक्टिंग करना मेरा शौक रहा है. मैं जल्द ही एक तरह के काम कर के उकता जाती हूं. यही बात है कि मैं ने हमेशा अलगअलग भूमिकाओं वाली फिल्मों और टीवी शोज को चुना है. मुझे टाईपकास्ट बनने से चिढ़ है, इसलिए मैं किसी शो या फिल्म को साइन करने से पहले उस के कंटैंट को अच्छी तरह समझती हूं तभी हां करती हूं. इसलिए दर्शक मुझे पहचानते नहीं हैं, क्योंकि मैं आर्ट मूवी करती हूं और देखने वाले दर्शकों की संख्या कितनी है यह सब को पता है. मुझे न तो संजनेसंवरने का शौक है और न ही पब्लिसिटी करने का, सिर्फ एक शौक है और वह है सिर्फ और सिर्फ ऐक्टिंग करने का.

छोटे और बड़े परदे में आज क्या बदलाव आए हैं?

मेरे देखते ही देखते सिनेमा में बहुत परिवर्तन हुए हैं. ‘पिंक’ और ‘तलवार’ जैसी फिल्मों का बौक्स औफिस पर सफल होना बताता है कि हमारे दर्शकों का भी फिल्म देखने का टेस्ट बदल गया है. आज की युवा पीढ़ी वास्तविकता और समाज के मुद्दों से भरी फिल्में देखाना चाहती है. लेकिन यह चेंज अभी छोटे परदे पर नहीं आया. आज भी नागनागिन, चुड़ैल, धार्मिक अंधविश्वास से भरे शोज की हर चैनल पर भरमार है. कुछ युवा निर्माता अगर सामाजिक मुद्दों से भरे शोज को बनाते भी हैं तो टीआरपी की दौड़ में जल्दी ही वे शोज दम तोड़ देते हैं. लेकिन आज जो सब से बड़ी उपलब्धि मिली है वह है सोशल मीडिया की, जिस की वजह से आप अपने शो  की और अपनी पब्लिसिटी कर सकते हैं.

कभी कमर्शियल फिल्में करने का मन नहीं हुआ?

पहले तो कभी नहीं हुआ था, लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब मेरी फिल्में बौक्स औफिस पर कब आईं कब गईं इस का पता ही नहीं चलता था. मुझे लोगों को बताना पड़ता था कि मैं ने उस फिल्म में काम किया है तब लगा कि मुझे इस सिनेमा से नाता तोड़ कर कमर्शियल सिनेमा करना चाहिए. पर दिल ने कहा कि वही काम करो जिस में तुम्हें खुशी मिले और मुझे खुशी तो लीक से हट कर फिल्मों में काम कर के मिलती है. दिल की सुनी और सिनेमा करती गई. जितने दर्शक मिले उतने में ही संतोष कर लिया. लेकिन आज संजय मिश्रा, रणवीर शौरी, नंदिता दास जैसे बौलीवुड ऐक्टरों को सफल होते देखती हूं तो लगता है कि मैं सही राह पर चल रही हूं.

आप को लग रहा है कि अब दर्शकों का टेस्ट बदल रहा है?

ऐसी फिल्में देखने वाले दर्शक हर दशक के सिनेमा में मौजूद हैं. ‘अर्धसत्य’ से ले कर ‘तलवार’ फिल्मों तक के लिए हमेशा दर्शक मौजूद रहे हैं. लेकिन उन दर्शकों की संख्या सीमित है. अब हर निर्मातानिर्देशक घाटा उठा कर हमेशा तो सामाजिक मुद्दों वाली फिल्में बना नहीं सकता इसलिए ऐसी फिल्में कम दिखती हैं. दूसरा सब से बड़ा कारण है इन फिल्मों का प्रमोशन नहीं किया जाता. अब तो सोशल मीडिया के प्रमोशन के कारण दर्शकों की नजरों में फिल्म का नाम आ जाता है. मैं जहां भी जाती हूं लोग मेरी फिल्मों के बारे में तारीफ करते हैं. यही सुन कर मुझे तसल्ली हो जाती है.

हमारी फिल्मों को विदेशी ठप्पे की जरूरत क्यों पड़ती है?

कहावत ‘घर की मुरगी दाल बराबर’ हमारी फिल्मों के लिए बिलकुल सटीक बैठती है. मेरी फिल्म ‘ऐंग्री इंडियन गौडेस’ जब रोम में अवार्ड जीत कर आई तब कहीं यहां हमें उस फिल्म के लिए डिस्ट्रीब्यूटर मिले. हमारे यहां की यही सब से बड़ी समस्या है. कई फिल्में हैं जिन्हें जब देश से बाहर वाहवाही मिली तब हमारे देश के दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता जगी. इस का कारण यह नहीं कि हमारे दर्शकों को अच्छी फिल्मों की समझ नहीं है. लेकिन आज भी दर्शकों का भारी वर्ग स्टार कलाकारों की फिल्मों को सिरआंखों पर बैठाता है, चाहे उन फिल्मों की कहानी कैसी भी हो.

इस शो को चुनने की कोई खास वजह?

मैं हमेशा से हट कर भूमिकाएं करती रही हूं. जब इस शो के लिए निखिल ने मुझ से संपर्क किया और बताया कि उन का यह शो युद्ध बंदियों के परिवार की कहानियों पर आधारित है तो मैं ने तुरंत हां कर दी, क्योंकि सीमा पर शहीद हुए या युद्ध के दौरान दुश्मन देश में बंदी बने जवान के परिवार पर खासकर उन की पत्नियों पर क्या गुजरती है इस को दिखाना जरूरी है. इन रीयल हीरों की कहानियों को सब के सामने लाना चाहिए ताकि देश जान सके कि एक सैनिक का परिवार किस तरह से देश की सेवा कर रहा है. एक सैनिक जब सीमा से गायब होता है, तब हम लोग उसे सिर्फ एक घटना मान कर भुला देते हैं पर उस का परिवार सालोंसाल सिर्फ इसी उम्मीद पर जिंदा रहता है कि कभी न कभी तो वह वापस आएगा.

इस शो में सिंगल मदर की भूमिका कैसे निभाई?

पहली बात तो यह कि मैं अभी मदर नहीं हूं, पर एक मां के दिल के एहसास को बखूबी समझती हूं. लेकिन एक प्रिजनर की बीवी, जिस के बच्चे हों, की क्या मनोदशा होती है. इस की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. यह करना मेरे लिए चैंलेंज था. मैं ने कई सहेलियों से, जो मदर हैं, बात की और खुद सोचा कि अगर इस स्थिति में मैं खुद होती तो कैसा रिएक्ट करती. तभी यह रोल मैं अच्छी तरह कर पाई.

काम से थक जाती हैं तो क्या करती हैं?

जब काम से थक जाती हूं तो कमरा बंद कर के ऋषि दा की फिल्में देखती हूं और अकेले ही खूब हंसती हूं. ‘गोलमाल’, ‘अंगूर’ जैसी फिल्में मेरी पसंदीदा हैं. इन्हें मैं ने न जाने कितनी बार देखा है. इन्हें देख कर मन रिफ्रैश हो जाता है और एक काम मैं रोजाना करती हूं. वह है ऐक्सरसाइज. इस से मैं हमेशा ताजगी महसूस करती हूं.

संध्या की नजर में प्रेम की परिभाषा क्या है?

प्रेम में समर्पण अनिवार्य है. या तो आप खुद को पूरा सौंप दीजिए या फिर प्रेम कीजिए ही नहीं. इस में आप हंसेंगे भी और रोएंगे भी. यह आप से सबकुछ छीन लेता है और मैं ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए कभी प्रेम में पड़ी ही नहीं.

18 सालों में कभी पीछे मुड़ कर देखा है?

मुझे पीछे मुड़ कर देखना पसंद नहीं. पीछे वे देखते हैं जिन्होंने कुछ प्लान किया होता है या फिर गलतियां. मुझे नहीं लगता कि मैं ने ऐसा कुछ किया है. मैं ने वही किया जो दिल ने कहा. मैं अपना रीव्यू नहीं करती सिर्फ आगे देखती हूं कि अब क्या करना है. मैं किसी दूसरे के साथ कभी भी रेस नहीं लगाती. रेस लगाती भी हूं, तुलना करती भी हूं तो अपने पिछले काम से अपने नए काम की कि इस में क्या गलतियां कर गई. मैं रानी मुखर्जी, काजोल और तब्बू की हमेशा प्रशंसक रही हूं. अगर कभी मौका मिलता है तो मैं फिल्म ‘उमराव जान’ में जो रेखाजी का कैरेक्टर है उसे प्ले करना चाहूंगी.    

संघ का शिगूफा

भारतीय जनता पार्टी की असल जान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊंचे पदों पर बैठे लोग अकसर शास्त्रों में दी गई जाति को फिर से जिंदा करने की बात करने लगते हैं और जाति के तोड़ आरक्षण को खत्म करने पर सोचने का सुझाव दे डालते हैं. यह बात दूसरी है कि पार्टी में ही खलबली मचने पर वे कहते फिरते हैं कि उन का मतलब कुछ और था. इन महानों में मोहन भागवत व मनमोहन वै- शामिल हैं. सही बात तो यह है कि जाति का सवाल हमारी सोच में इस तरह घुलामिला है कि इसे खत्म करने की कोशिश नाकाम है. पैदा होते ही हर बच्चे के गले में जाति की तख्ती लटका दी जाती है, जो उसे जिंदगीभर ढोनी होती है. जो ऊंची जातियों के हैं, वे भी खुश हैं, जरूरी नहीं. अगर ब्राह्मण का बेटा दूसरों के साथ खेलता है, तो उसे ‘ओ पंडे’, ‘ओ शास्त्री’ सुनने को मिलता है. अछूत का बच्चा ऊंचों के साथ खेलता है, तो दुत्कारा जाता है.

मजेदार बात यह है कि नीची सताई जातियां भी अपनों में ऊंचनीच का जम कर खयाल रखती हैं और शादी के समय खयाल रखती हैं कि कहीं लड़का किसी नीची जाति की लड़की को घर न ले आए. मोहन भागवत और मनमोहन वै- ने जाति के आरक्षण को खत्म करने की बात कर के गलत नहीं कहा, क्योंकि 70 साल के आरक्षण ने कुछ बदलाव नहीं किया. यह हमारे समाज की पथरीली सोच का नतीजा है. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने सोचा था कि 10-20 साल में आजादी के बाद आई साइंस की सोच सब को साथ कर देगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और आज भी सारी राजनीति और सारी सरकारी मशीनरी जाति पर टिकी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनावों में जाति व धर्म के नाम पर वोट न लिए जाएं, पर देने वालों को कौन कैसे रोक सकता है. जाति, जो पैदा होते ही माथे पर लिख दी जाती है, वोट डालते हुए जोर मारती है और चुनावी हारजीत इस पर ही टिकी है.

भारतीय जनता पार्टी जिस जाति व्यवस्था को चाहती है, उस में सब से ऊंचे ब्राह्मणों को सब से ऊंची जगह देने की सिफारिश ही नहीं हुक्म है, पर शास्त्रों के कहने के बाद भी ब्राह्मणों में से भी कुछ को छोड़ कर बाकी गरीब केवल जाति का बिल्ला लगाए जैसेतैसे पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहे हैं. अगर उन्होंने जाति छोड़ दी होती तो वे आज ज्यादा खुशहाल होते, पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसे शास्त्रसम्मत मान कर गले से उतारने की कोशिश कर रहा है और नतीजा यह है कि इज्जत व सत्ता दोनों हाथ से निकल रही है.

मोहन भागवत और मनमोहन वै- को समझना चाहिए कि 2 हजार सालों में विदेशियों के राज ने उन का ज्यादा नुकसान किया है. वे पढ़ेलिखे, नई जानकारी ली तो पैसा कमाया है. शास्त्रसम्मत हवनपूजा करते रहे तो कुछ न मिला. आरक्षण का सवाल उठा कर वे अपनी कमजोरी ही दिखा रहे हैं.

सैरोगेसी : नया कानून कितना सही

सैरोगेसी विशेषज्ञों और गे ऐक्टिविस्ट्स ने पिछले साल 24 अगस्त को यूनियन कैबिनेट के बनाए ड्राफ्ट सैरोगेसी बिल-2016 की आलोचना की है. बिल का उद्देश्य है कि सैरोगेसी व्यवसाय न बन जाए. यह बिल अविवाहित पुरुषों और स्त्रियों को सैरोगेट मां की मदद लेने से रोकने के लिए है, पर इस से बेऔलाद दंपतियों की मुश्किलें भी बढ़ने वाली हैं.

मुंबई के एक प्रसिद्ध डाक्टर जो अपना नाम नहीं बताना चाहते, का कहना है, ‘‘इस से हजारों सैरोगेट मांओं की रोजीरोटी भी छिनेगी और अगर निकट संबंधी ही सैरोगेसी कर सकता है तो विवाहित दंपती के लिए भी इस में मुश्किलें बढ़ेंगी. इस से सिंगल और गे लोगों को बहुत मुश्किल होगी.’’

अभी तक सैरोगेसी में एक स्त्री एक दंपती के लिए या 1 सिंगल पुरुष अथवा स्त्री के लिए बच्चे को जन्म देती है और फिर उस व्यक्ति को बच्चा सौंप देती है. वह सैरोगेसी जिस में सैरोगेट मां और इंश्योरैंस कवरेज के लिए मैडिकल खर्च के अलावा कोई और धन या फीस नहीं ली जाती, उसे जनसेवी सैरोगेसी कहा जा सकता है. यदि सैरोगेट मां अपनी सेवाओं के लिए पैसे लेती है, तो उसे कमर्शियल सैरोगेसी कहा जाता है. नए ड्राफ्ट बिल के अनुसार तो अभिनेता तुषार कपूर अपने पिता बनने का सपना पूरा न कर पाते, शाहरुख खान भी जिन की तीसरी संतान सैरोगेसी से हुई है न कर पाते, क्योंकि केवल बेऔलाद दंपती ही ड्राफ्ट बिल के अनुसार इस के अधिकारी हैं.

क्या है नया कानून

समान अधिकार समाजसेवी अशोक कवि का कहना है, ‘‘हम अदालत में इस बिल को चैलेंज करेंगे. यह व्यक्ति की समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों के खिलाफ है. कानून को धोखा देने के लिए लोग रास्ता ढूंढ़ ही लेंगे. आप कैसे तय कर सकते हैं कि होमोसैक्सुअल पेरैंट्स के द्वारा पाला गया बच्चा समाज के लिए बुरा होगा? नैतिकता की बातें दूर रख कर हमारे देश को सैक्सुअलिटी की बातों का सामना करना

आना चाहिए.’’

‘एशिया पैसिफिक इनीशिएटिव औन रिप्रोडक्शन’ के प्रैजीडैंट डा. जयदीप का कहना है, ‘‘यह बिल महिलाओं को बहुत प्रभावित करेगा. उन महिलाओं का क्या होगा जो बच्चा पैदा नहीं कर सकतीं पर उन के पति और परिवार को हर कीमत पर एक वारिस चाहिए? इन महिलाओं का तो फिर तलाक होगा, उन के पति दूसरा विवाह कर लेंगे. पुरुषों की संतान की इच्छा के कारण महिलाओं का शोषण होगा.’’

देश की मशहूर सैरोगेसी विशेषज्ञा डाक्टर नयना पटेल ने बिल को बच्चा न पैदा कर सकने वाले पहले से ही दुखी दंपती पर एक कू्रर मजाक कहती हैं. डा. पटेल पिछले 10 सालों में सैरोगेसी द्वारा 1,120 बच्चों की डिलिवरी करवाई है. ये असिस्टिड प्रैगनैंसी के क्षेत्र में अग्रणी मानी जाती हैं.

डा. पटेल के अनुसार, ‘‘इस नए बिल ने लाखों व्यावसायिक सैरोगेट मांओं की रोजीरोटी को संकट में डाल दिया है. इन स्त्रियों ने सैरोगेट बन कर अपने परिवार को सहारा दिया है. बिल सिर्फ उन्हें ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था को भी प्र्रभावित करेगा. विदेशी दंपती सैरोगेसी के लिए 7 से 11 लाख तक खर्च कर देते हैं और भारतीय दंपती 6 लाख तक.’’

नया बिल यह भी कहता है कि एक स्त्री अपने जीवनकाल में एक बार से ज्यादा सैरोगेट मदर नहीं बन सकती और उसे विवाहित और कम से कम एक स्वस्थ बच्चे की मां भी होना चाहिए. इस के अतिरिक्त विवाह के कम से कम 5 साल के बाद ही दंपती सैरोगेसी की मदद ले सकते हैं. फिर भी बिल उन दंपतियों के लिए, जिन के बच्चे शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, छूट देता है.

संकट में रोजीरोटी

2012 में सब से पहले व्यावसायिक सैरोगेसी के लिए गृहमंत्रालय ने भारत में सैरोगेसी ले रहे विदेशियों के लिए कड़े वीजा नियम बनाए थे. उन में कहा गया था कि विदेशी गे दंपती या सिंगल पेरैंट को सैरोगेसी के लिए भारत आने की अनुमति नहीं दी जाएगी. ये लोग भारत सिर्फ मैडिकल वीजा के लिए ही आ सकते थे, टूरिस्ट वीजा पर नहीं.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है, ‘‘सैरोगेसी से बच्चा चाहने वालों को कानूनी रूप से विवाहित होना चाहिए. सिंगल पेरैंट, लिव इन कपल, होमोसैक्सुअल कपल सैरोगेसी प्राप्त नहीं कर सकते. इस समय लगभग 2,000 सैरोगेसी क्लीनिक हैं.’’

इन दंपतियों में पत्नी की उम्र 23 से 50 साल और पति की 26 से 55 साल होनी चाहिए. यह सोच असल में कट्टर हिंदू धर्म से प्रेरित है जबकि स्वयं हिंदू पुरुषों में नियोग की परंपरा के अनेक उदाहरण हैं, जिन में पत्नी से किसी और पराए पुरुष के शारीरिक संबंध बनाए जाते थे पर पत्नी से पैदा संतान पति की संतान कही जाती थी.

शाहरुख खान जिन की तीसरी संतान अबराम सैरोगेसी से हुई है, का नाम लिए बिना सुषमा स्वराज ने कहा था कि दुख होता है कि जरूरत अब फैशन बन गई है. कई सैलिब्रिटी हैं जिन के 2 बच्चे हैं, 1 बेटा, 1 बेटी, फिर भी वे सैरोगेट बच्चा इसलिए चाहते हैं, क्योंकि उन की पत्नी लेबर पेन नहीं सहना चाहती. यह जरूरत के लिए है, फैशन के लिए नहीं.’’

आईवीएफ में मां के एगसैल को पिता के स्पर्म से लैब में फर्टिलाइज कर के सैरोगेट मां के गर्भाशय में प्रतिरोपित यानी पहुंचाया जाता है. सैरोगेट मां के गर्भाशय में रहने के बाद भी बच्चे का संबंध जेनेटिकली और बायलौजिकली अपने मातापिता से ही होता है, क्योंकि बच्चे के गुण स्पर्म और एगसैल पर निर्भर होते हैं, गर्भाशय

पर नहीं. यह मुश्किल काम है पर इस में पैसा अच्छा है.

सैरोगेट मांओं की बढ़ती संख्या

पवई हौस्पिटल की स्त्री रोग विशेषज्ञा डा. कविता गुप्ता बताती हैं, ‘‘सैरोगेट मां बनने को तैयार औरतों की संख्या बढ़ती जा रही है, उन में से ज्यादातर 10वीं कक्षा भी पास नहीं होती हैं. ज्यादातर केसेज में उन की कोई अन्य आय नहीं है. या तो उन के पति कुछ काम नहीं करते या उन्हें छोड़ चुके हैं. कुछ ने तो अपने पूरे जीवन में 500 रुपए से ज्यादा देखे ही नहीं हैं. अब वे लाखों कमा सकती हैं और अपने बच्चों को पढ़ा भी सकती हैं.’’

बांद्रा के एक क्लीनिक ने प्रभा देवी, सिद्धिविनायक मंदिर के पास 15 सैरोगेट मांओं के लिए फ्लैट किराए पर लिया है, क्योंकि आईवीएफ सैरोगेसी के केस पिछले कुछ समय से बढ़ते ही जा रहे हैं. शुरू में यहां सिर्फ 4-5 स्त्रियां थीं पर अब यह संख्या 20 तक जा पहुंची है. कुछ ने बच्चों को जन्म भी दिया है. साढ़े 3 लाख फीस ली और अपनेअपने घर चली गईं. यहां ये 15 स्त्रियां गद्दों पर सोती हैं, उन के उचित खानपान, दवा आदि का ध्यान रखा जाता है. साफसफाई के लिए मेड होती है.

सिक्के का दूसरा पहलू भी है

मानखुर्द और गोवंडी में इन सैरोगेट मांओं के एजेंट होते हैं. हां, ये कभीकभी झूठे बहाने भी बनाते हैं. डा. गुप्ता ने बताया, ‘‘पिछले केस में एक स्त्री जो 38 साल की थी, उस ने सैरोगेसी के लिए अपनी उम्र छिपाते हुए कहा कि वह

32 साल की है. इस से प्रैगनैंसी में काफी जटिलताएं हुईं. प्रीमैच्योर डिलिवरी हुई. उस स्त्री ने हम लोगों से झूठ बोला, क्योंकि उसे पैसों की बहुत जरूरत थी. उस के दामाद ने उस की 19 वर्षीय बेटी को घर से निकाल दिया था, क्योंकि वह दहेज नहीं दे पाई थी.’’

इस प्रभा देवी के फ्लैट में रह रही एक स्त्री ने अपने परिवार को बताया था कि वह शहर से बाहर नर्र्स का काम कर रही है. उस के अपने बच्चे को दिल की बीमारी थी और सर्जरी के लिए उसे 2-3 लाख की जरूरत थी.

इस फ्लैट में भीड़ तो है पर सब खुश भी दिखती हैं. 15 स्त्रियां, 6 से ज्यादा बच्चे, क्योंकि कुछ अपने खुद के बच्चे भी साथ लाई थीं.

अपना नाम न बताते हुए इस फ्लैट के एक पड़ोसी कहते हैं, ‘‘हमें इस से कोई समस्या नहीं है पर जब एकदूसरे से लड़ पड़ती हैं तो बहुत शोर होता है.’’

एक सैरोगेट मां तो अब एक एजेंट बन गई है, जिसे हर सैरोगेट मां को ढूंढ़ने के 50 हजार मिलते हैं. वह कहती है, ‘‘मैं 2 बार सैरोगेट मां बनी, अब यह नहीं कर सकती, इसलिए अब एजेंट बन गई हूं. अब इस की बहुत मांग है. आईवीएफ सैंटर एजेंट ढूंढ़ते हैं, यह अच्छा कैरियर है.’’

नया बिल सही नहीं है, पर सरकारें अकसर जनता को बेवकूफ समझ कर कानून बनाती रहती हैं. अच्छेबुरे परिणाम जनता को खुद परखने दो. हर चीज का अच्छाबुरा पहलू होता है. इस कानून का भविष्य में क्या प्रभाव होगा, देखते हैं.

 

शिथिल न पड़ जाएं यौन संबंध

आज अदीति अपनी जिस शादी को बचाने के लिए काउंसलर के चक्कर काट रही थी, उस के पीछे एक बहुत ही साधारण सा मगर जटिल कारण है. अदीति और उस के पति की सैक्स लाइफ में कई जटिलताएं थीं, जो अभिव्यक्ति की असफलता से शुरू हो कर घुटन और निराशा में तबदील हो गई थीं. आखिर ऐसी क्या बात हुई जो सैक्स जैसा मनोरंजक विषय घुटन का कारण बन गया? पतिपत्नी के बीच सैक्स लाइफ प्रगाढ़ संबंध की निशानी है. इस में सुरक्षा का एहसास, नाजुक अनुभूतियां, आपसी तालमेल, प्रेम की गहराई वह सब कुछ होना चाहिए, जो स्थाई और ऊर्जावान संबंध के लिए जरूरी है. पर इस के लिए कुछ जुगत भी करनी पड़ती है. अच्छे सैक्स जीवन और गहरे रिश्ते के एहसास के लिए अभिव्यक्ति की आजादी को स्वीकारना पड़ता है.

दोनों पतिपत्नी का रूटीन की तरह सैक्स को निभाते जाना न सिर्फ सैक्स लाइफ में उबाने वाली शिथिलता ला देता है, बल्कि रिश्ते के असफल हो जाने में भी कोई कसर नहीं रहती. शहर कहें या गांव, भारतीय और इसलामिक समाज में स्त्रियों के लिए सैक्स पर चर्चा तथा इस मामले में अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति को नीच मानसिकता कह कर अनुत्साहित किया जाता है. वैसी स्त्रियां जो अपने पार्टनर से सैक्स के बारे में अपनी इच्छाएं खुल कर कहना चाहती हैं सभ्य और सुसंस्कृत नहीं मानी जातीं. बड़े शहरों की बिंदास लड़कियों को छोड़ दें, तो बाकी सैक्स को पति की सेवा का ही अहम हिस्सा मान कर चलती हैं तथा अपनी इच्छाअनिच्छा पति से बोलने की जरूरत महसूस नहीं करतीं.

भेदभाव क्यों

थोड़ा गहराई में जाएं तो पाएंगे कि सैक्स की इच्छा और क्षमता को मानव जीवन का प्रधान तत्त्व समझा जा सकता है. सैक्स जीवन को नियंत्रित करने में जीववैज्ञानिक, नैतिक, सांस्कृतिक, कानूनी, धार्मिक आदि विभिन्न दृष्टिकोणों का योगदान होता है यानी सैक्स जीवन और इस की अभिव्यक्ति पर इन बातों का बहुत प्र्रभाव रहता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने व्यक्ति के सैक्स जीवन की महत्ता पर बल देते हुए इस के प्रति सकारात्मक और सम्माननीय दृष्टिकोण अपनाने की बात कही है. इस संगठन ने माना कि अपने साथी के साथ सैक्स संबंध बिना किसी भेदभाव, हिंसा और शारीरिक, मानसिक शोषण के पूरी ऊर्जा और भावनात्मक संतुलन के साथ होना चाहिए.

सवाल अहम है कि हमारे देश में जहां स्त्रियों पर सैक्स से संबंधित बलात्कार, मानसिक शोषण, घरेलू हिंसा बदस्तूर जारी है, स्त्री के सैक्स संबंधी अधिकार और सैक्स के प्रति खुली राय क्या स्वीकार्य है?

अगर जागरूकता आ जाए और स्त्रियां भी इस मामले में अपनी भावनाओं को पूरा महत्त्व दें व पार्टनर से खुली बातचीत करें तो बहुत फायदे मिल सकते हैं.

आपस में दोस्ती का रिश्ता: अगर पतिपत्नी के बीच दोस्ती की भावना विकसित हो जाए तो इन के बीच ऊंचनीच, बड़ेछोटे का अहंकारपूर्ण भेद अपनेआप मिट जाए. दोनों का आपस में एकदूसरे की सैक्स इच्छाओं के बारे में बताने से यह आसानी से हो सकता है.

व्यक्तित्व का विकास: अगर स्त्री सैक्स के मामले में सिर्फ समर्पिता न रह कर पसंदनापसंद को जाहिर करे, तो वह पुरुष पार्टनर के दिल में आसानी से अपने लिए रुचि जगा सकती है, जो व्यक्तित्व विकास में सहायक है.

आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी: सिर्फ पुरुष की इच्छा पर चलना सैक्स जीवन में एक मशीनी प्रभाव उत्पन्न करता है, लेकिन स्त्री भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाए तो जीवन में फिर से नई ऊर्जा का संचार हो जाए.

वैसे तो भारतीय परिवेश को अभी भी लंबा वक्त लगेगा कुसंस्कारों के बंधनों से मुक्त होने में, लेकिन उन कारकों के बारे में बातें कर पिछड़ी मानसिकता को कुछ हद तक कम करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं.

बचपन से ही पारिवारिक माहौल में लड़कियों को यह शिक्षा मिलती है कि सैक्स निकृष्ट है और इस से लड़कियों को दूर रहना चाहिए.

चरित्र को भी सैक्स के साथ जोड़ा जाता है. सैक्स की इच्छा को दबा कर या इस के बारे में अपनी राय को छिपा कर ही सद्चरित्र रहा जा सकता है.

चरित्र को परिवार की इज्जत के साथ जोड़ा जाता है. लड़की परिवार की इज्जत मानी जाती है यानी सैक्स के बारे में निजी खुली सोच दुष्चरित्र होने की निशानी है, जिस से परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाती है.

शादी के बाद यही संस्कार स्त्री में मूलरूप से जमे होते हैं और वह सैक्स के बारे में पति से स्वयं अपनी इच्छा बताने में भारी संकोच महसूस करती है.

इस मामले में आम पुरुषों की सोच भी परंपरावादी सामंती प्रथा से प्रभावित लगती है. उन्हें अपनी पत्नी का सैक्स मामले में खुलना और इच्छा जाहिर करना स्त्री सभ्यता के विपरीत लगता है. इस सोच के साथ पुरुष स्त्रियों का कई बार मजाक भी उड़ाते हैं या उन की भावनाओं की कद्र नहीं करते. तब स्त्री के पास भी अपनी खोल में सिमट जाने के अलावा और कोई चारा नहीं होता. बाद में यही पुरुष सैक्स के वक्त स्त्री के मृत जैसा पड़े रहने के उलाहने भी देते हैं, जो संबंध में भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं.

स्त्री जब इन सारी बाधाओं को पार कर समान मूल्य और अधिकार का आनंद ले पाएगी तभी वह एक भोग्या की तरह नहीं एक सही साथी की तरह जिंदगी के इन खुशगवार पलों का उपभोग कर पाएगी. 

बेटी के नाम पर कलंक

पंजाब के जिला गुरदासपुर के कस्बाथाना धारीवाल के रहने वाले जाट सरदार पलविंदर सिंह के परिवार में पत्नी परमजीत कौर के अलावा 20 साल की बेटी हरमीत कौर थी. वह पंजाब पुलिस में हवलदार थे और इन दिनों पीएसी की 75वीं बटालियन की ओर से धार्मिक गुरु बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनात थे. वह शरीफ, ईमानदार और जांबाज सिपाही थे.

पलविंदर सिंह एक जिम्मेदार पिता और पति ही नहीं, समाजसेवक भी थे. उन्होंने कई रक्तदान कैंप अपने खर्चे पर लगवाए थे और जरूरतमंद लोगों के लिए सैकड़ों यूनिट खून जमा करा कर प्रशासन को दिया था. बाबा भनियार वाले की सुरक्षा में तैनाती के बाद से वह काफी व्यस्त हो गए थे. वह महीने, डेढ़ महीने में ही घर आ पाते थे.

28 अगस्त, 2016 को वह 4 दिनों की छुट्टी ले कर घर आए थे. सोमवार की रात को खाना खा कर वह आंगन में ही चारपाई डाल कर सो गए थे, जबकि पत्नी और बेटी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गई थीं. रात करीब 2 बजे कमरे में सो रही परमजीत कौर को आंगन में सो रहे पति के कराहने की आवाज सुनाई दी तो वह कमरे से निकल कर पति के पास आ गई. उस समय पलविंदर सिंह तड़पते हुए छाती को जोरजोर से मसल रहे थे.

परमजीत कौर को लगा कि पति को हार्ट अटैक आया है, वह भी उन के सीने को सहलाने लगी. तभी उन्होंने देखा कि पति के नाक और मुंह से खून निकल रहा है. यह देख कर वह घबरा गईं और जल्दी से जा कर पड़ोस में रहने वाले जेठ मंगल सिंह को बुला लाई. पत्नी के साथ वह तुरंत आ गए. लेकिन जब वह आए तो पलविंदर एकदम शांति से बिस्तर पर लेटे थे. उन्होंने उन्हें हिलाडुला कर भी देखा. ऐसा लगा, जैसे उन में जान ही नहीं है. अब तक मंगल सिंह का बेटा और पलविंदर की बेटी हरमीत कौर भी वहां आ गई थी.

पलविंदर को उठा कर गाड़ी में डाल कर गुरदासपुर के सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने चैकअप कर के उन्हें मृत घोषित कर दिया. घर वालों ने बताया था कि यह मौत हार्ट अटैक से हुई है, लेकिन चैकअप करने वालों डाक्टरों को यह मौत हार्ट अटैक से नहीं लगी तो उन्होंने इस की सूचना थाना धारीवाल पुलिस को दे दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर कुलवंत सिंह अधीनस्थों के साथ सिविल अस्पताल पहुंच गए थे.

पलविंदर की लाश कब्जे में ले कर कुलवंत सिंह ने परमजीत कौर से पूछताछ की तो उन्होंने उन से भी बताया कि रात में सोने के दौरान उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. इस के बाद कुलवंत सिंह ने सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई करते हुए मौत की पुष्टि के लिए लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

पर परमजीत कौर का कहना था कि उस के पति की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पोस्टमार्टम कराने की क्या जरूरत है, अंतिम संस्कार के लिए लाश उन के हवाले कर दी जाए. इस बात को ले कर परमजीत कौर और हरमीत कौर ने अस्पताल में अच्छाखासा हंगामा भी किया, लेकिन कुलवंत सिंह ने यह कह कर उन्हें शांत करा दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए यह जरूरी है. यह 30 अगस्त, 2016 की बात है.

सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने एक पैनल बना कर उसी दिन पलविंदर सिंह की लाश का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी, जो काफी चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार मृतक का गला किसी तेजधार हथियार से काटा गया था. श्वांस नली कटने से पलविंदर की मौत हुई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कुलवंत सिंह को यह मामला काफी संदिग्ध लगा. उन्हें परमजीत का बयान रहस्यमय लगने लगा, इसलिए उन्होंने तुरंत एएसआई जसबीर सिंह और हैडकांस्टेबल गुरमुख सिंह को मृतक पलविंदर सिंह के घर भेज कर घटनास्थल को सील करा दिया, जिस से घटनास्थल पर किसी चीज से छेड़छाड़ न की जा सके. इस के बाद उन्होंने इस घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी थी.

चूंकि मामला विभाग के एक पुलिसकर्मी की रहस्यमयी मौत का था,इसलिए सूचना मिलते ही एसएसपी जगदीप सिंह, एसपी प्रदीप मलिक, डीएसपी ए.डी. सिंह मृतक पलविंदर सिंह के घर पहुंच गए थे. क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया तो उन्हें यह मामला हत्या का लगा. क्योंकि पलविंदर सिंह जिस बिस्तर पर सोए थे, वह खून से तर था. नाक और कान से इतना खून नहीं निकल सकता था.

एसएसपी जगदीप सिंह के आदेश पर थाना धारीवाल पुलिस ने पलविंदर सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. कुलवंत सिंह को लगा था कि परमजीत कौर को या तो कुछ पता नहीं है या फिर वह झूठ बोल रही है. क्योंकि हार्ट अटैक से हुई मौत और हत्या में जमीनआसमान का फर्क होता है.

उन्होंने एएसआई जसबीर सिंह, विजय कुमार, हैडकांस्टेबल ओंकार सिंह, गुरमुख सिंह, कुलविंदर सिंह, कांस्टेबल मंजीत को मिला कर एक टीम बनाई और उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए लगा दिया. पड़ोसियों से की गई पूछताछ में कुलवंत सिंह को पता चला कि पलविंदर सिंह की बेटी हरमीत कौर से किसी बात को ले कर अकसर कहासुनी होती रहती थी.

ऐसी ही एक हैरान करने वाली जानकारी यह भी मिली कि हरमीत कौर का किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी. जबकि पलविंदर सिंह इस शादी के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उन की पत्नी परमजीत कौर राजी थी. इसी बात को ले कर अकसर घर में झगड़ा होता रहता था.

कुलवंत सिंह ने इस बात को ध्यान में रख कर जांच शुरू की. महिला सिपाही सुरजीत कौर ने हरमीत कौर से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने वासनापूर्ति के लिए जिस बाप ने अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, पढ़ालिखा कर समाज में जीने का मकसद दिया, उसी को मार दिया था.

इस के बाद परमजीत कौर ने भी स्वीकार कर लिया था कि उस ने भी बेटी को बचाने के लिए झूठ बोला था. कुलवंत सिंह ने उसी दिन हरमीत कौर की निशानदेही पर गांव दोस्तपुर से हरमीत कौर के प्रेमी गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी तथा उस के दोस्त मनजिंदर सिंह को गिरफ्तार कर सभी को जिला मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर विस्तृत पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.

रिमांड अवधि के दौरान सभी से हुई पूछताछ में पलविंदर सिंह की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अधिक लाडप्यार में बिगड़ी औलाद और स्वार्थ की खोखली नींव पर टिके रिश्ते की कहानी थी—

हरमीत कौर बचपन से ही पलविंदर सिंह की बेहद लाडली थी. वह बेटी को दुनिया की तमाम खुशियां देना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने उस की पढ़ाई महंगे स्कूलों में कराई. वह चाहते थे कि हरमीत कौर उच्च शिक्षा हासिल कर आईपीएस बने. लेकिन कालेज में कदम रखते ही हरमीत कौर उन के अरमानों पर पानी फेर कर आधुनिकता के रंग में रंग कर आशिकी के चक्कर में पड़ गई.

हरमीत कौर सुंदर तो थी ही, उस की बातचीत की शैली और व्यक्तित्व भी काफी प्रभावशाली था. उस के चाहने वाले तो बहुत थे, पर उस का दिल गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी पर आ गया.  धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों में शारीरिक संबंध भी बन गए. फिर तो हरमीत को इस का ऐसा चस्का लगा कि वह गुरप्रीत से बाहर तो मिलती ही थी, घर भी बुलाने लगी.

क्योंकि घर में उसे पूरी तरह एकांत मिलता था. उस की मां का अलग कमरा था. वह ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. पलविंदर महीने, डेढ़ महीने में आते थे. ऐसे में हरमीत मरजी की मालिक बन गई थी. यही नहीं, वह दिन पर दिन जिद्दी भी होती जा रही थी.

अपने इसी जिद्दी स्वभाव की वजह उस ने तय कर लिया था कि वह शादी करेगी तो गुरप्रीत से ही करेगी. पलविंदर सिंह बेटी के इस फैसले और हरकत से अंजान उस के भविष्य को संवारने के लिए एकएक पैसा जोड़ रहे थे. जिस दिन उन्हें हरमीत की इस आवारगी का पता चला, गहरा आघात लगा.

पहले तो उन्होंने पत्नी परमजीत को आड़े हाथों लिया, उस के बाद हरमीत कौर की खबर ली. उन्होंने साफसाफ कह दिया कि इश्कमुश्क और शादीब्याह को दिमाग से निकाल कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. अब अगर उन्होंने सुन लिया कि वह उस लड़के से मिली है तो ठीक नहीं होगा.

लेकिन जिद्दी हरमीत कौर ने पिता की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया और बेहिचक पहले की ही तरह गुरप्रीत से मिलती रही. ऐसे में ही किसी दिन उस ने गुरप्रीत से कहा, ‘‘पापा के जीते जी तो हम दोनों कभी शादी कर नहीं सकते, क्यों न हम दोनों भाग कर शादी कर लें?’’

‘‘घर से भाग कर शादी करने के लिए काफी रुपयों की जरूरत होती है, जो हमारे पास नहीं है.’’ गुरप्रीत ने कहा तो हरमीत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम रुपयों की चिंता मत करो. मेरे पापा ने मेरे भविष्य के लिए बहुत रुपए जमा कर रखे हैं.’’

हरमीत कौर ने गुरप्रीत के साथ भागने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार वह यह सोच कर शांत बैठ गई कि अंजान जगह पर अंजान लोगों के बीच वह कैसे रह पाएगी? एक दिन किसी ने पलविंदर को हरमीत और गुरप्रीत के मिलने की जगह और समय बता दिया तो पलविंदर ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

इस बार उस ने हरमीत कौर को लताड़ा ही नहीं, 2-4 थप्पड़ जड़ कर हाथ जोड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘मेरे सपने और अपना भविष्य बरबाद मत कर बेटी. मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा और आत्महत्या कर लूंगा.’’

हरमीत कौर को पिता पर दया आने के बजाय घृणा हो गई. उस के मन में आया कि पिता की सर्विस रिवौल्वर से गोली मार उन्हें खत्म कर दे. बाद में कह देगी कि किसी बदमाश ने उन पर हमला किया है. इस के बाद दिनरात वह केवल एक ही बात सोचने लगी कि प्रेम कहानी में रोड़ा बन रहे पिता को कैसे रास्ते से हटाया जाए?

एक दिन पलविंदर सिंह पत्नी के साथ सो रहा था, तभी रात 1 बजे उसे हरमीत कौर के कमरे से खटरपटर की आवाजें आती सुनाई दीं. वह उठ कर बाहर आया तो उस के कमरे से एक साए को निकल कर दीवार फांदते देखा.

पलविंदर सिंह समझ गया कि वह गुरप्रीत ही था. अगले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले पलविंदर ने हरमीत को खूब समझाया. अंत में उस ने यह भी बताया कि रात को उस ने सब कुछ देख लिया है. वह यह सब बंद कर दे, वरना परिणाम बहुत भयानक होगा.

बस, उसी दिन हरमीत कौर ने तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो, वह पिता को जिंदा नहीं छोड़ेगी. उसी दिन गुरप्रीत से मिल कर उस ने पिता की हत्या की योजना बना डाली.

चूंकि गुरप्रीत यह काम अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने जिगरी दोस्त मनजिंदर सिंह को अपने साथ मिला लिया. उस ने इस काम के लिए उसे कुछ पैसे भी देने को कहा. हरमीत कौर ने कुछ रुपए गुरप्रीत को दिए, जिस से उस ने एक तेजधार वाला दातर खरीदा और कुछ रुपए मनजिंदर को दे दिए.

अब उन्हें इंतजार था पलविंदर सिंह के छुट्टी आने का. 29 अगस्त को वह छुट्टी पर घर आए और हरमीत कौर पर नजर रखने के लिए अपना बिस्तर आंगन में लगाया.

हरमीत कौर ने रात 9 बजे गुरप्रीत को पिता के घर आने और आंगन में सोने की सूचना दे दी. रात करीब 1 बजे हरमीत कौर ने उठ कर बाहर के दरवाजे की कुंडी खोल दी, जिस से गुरप्रीत को अंदर आने में परेशानी न हो. रात 2 बजे के करीब गुरप्रीत अपने दोस्त मनजिंदर के साथ हरमीत के घर पहुंचा तो वह उसे बरामदे में खड़ी मिली.

बिना आवाज किए तीनों पलविंदर सिंह की चारपाई के पास पहुंचे. मनजिंदर और हरमीत कौर ने गहरी नींद सो रहे पलविंदर सिंह के हाथपैर पकड़ लिए तो गुरप्रीत ने दातर से उस की श्वांस नली काट दी, जिस से उस की तुरंत मौत हो गई. पलविंदर सिंह की हत्या कर के गुरप्रीत और मनजिंदर चले गए तो हरमीत कौर मां के साथ मिल कर पिता की हार्ट अटैक से हुई मौत का नाटक करने लगी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने वह दातर बरामद कर लिया था, जिस से पलविंदर सिंह की हत्या की गई थी. इस के बाद 3 सितंबर, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

इस तरह स्वार्थी रिश्तों ने खून को पानी बना दिया और एक कानून के रक्षक की बेटी यह भी नहीं सोच सकी कि चाहे कितना भी झूठ क्यों न बोला जाए, सच से आखिर परदा उठ कर ही रहता है.       

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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