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एसआईपी के बारे में जानते हैं आप…?

एसआईपी आपको एक म्युचुअल फंड में एक साथ 5,000 रूपये के निवेश की बजाय 500 रूपये के 10 बंटे हुये निवेश की सुविधा देता है. ये आपको एक बार में भारी पैसा निवेश करने की जगह म्यूचुअल फंड में कम अवधि का (मासिक या त्रैमासिक) निवेश करने की आजादी देता है. इससे आप अपनी अन्य वित्तीय जिम्मेदारियों को प्रभावित किये बिना म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं. एसआईपी कैसे काम करता है ये बेहतर समझने के लिये आपको Rupee cost averaging और धन के जुड़ते रहने की शक्ति (power of compounding) को समझना जरूरी है.

एसआईपी एक औसत आदमी की पहुंच के अंदर म्यूचुअल फंड निवेश को ले आया है क्योंकि यह उन तंग बजट लोगों को भी निवेश करने योग्य बनाता है जो एक बार में बड़ा निवेश करने के बजाय 500 या 1,000 रूपये नियमित रूप से निवेश कर सकते हैं.

एसआईपी के माध्यम से छोटी छोटी बचत करना शायद पहली बार में आकर्षक न लगे लेकिन ये निवेशकों में बचत की आदत डालता है और बढ़ते वर्षों में इससे आपको अच्छा-खासा प्रतिलाभ (रिटर्न) मिलेता है. 1,000 रुपये महीने का एक एसआईपी का धन 9% की दर से 10 वर्षों में बढकर 6.69 लाख रूपये, 30 साल में 17.38 लाख रूपये और 40 साल में 44.20 लाख तक हो सकता है.

यही नही धनी लोगों को भी ये गलत समय और गलत जगह पर निवेश करने की आशंका से बचाता है. हांलाकि एसआईपी का असली फायदा निचले स्तर पर निवेश करने से मिलता है.

एसआईपी के बहुत सारे लाभ हैं

1. अनुशासित निवेश

अपने धन कोष को सुरक्षित बनाये रखने के मुख्य नियम हैं- लगातार निवेश करना, अपने निवेशों पर ध्यान केन्द्रित रखना और अपने निवेश के तरीके में अनुशासन बनाये रखना. हर महीने कुछ राशि अलग निकालने से आपकी मासिक आमदनी पर अधिक अन्तर नही पड़ेगा. आपके लिये भी बड़े निवेश हेतु इकट्ठा पैसा निकालने से बेहतर होगा कि हर महीने कुछ रुपये बचाये जायें.

2. रुपये के जुड़ते रहने की शक्ति (Power of Compounding)

निवेश गुरु सुझाव देते हैं कि किसी भी व्यक्ति को हमेशा जल्दी निवेश शुरु करना चाहिये. इसका एक मुख्य कारण है चक्रवृद्धि ब्याज मिलने का लाभ. चलिये इसे एक उदाहरण से समझते हैं. प्रसून(अ) 30 साल की उम्र से 1,000 रूपये हर साल बचाना शुरू करता है, वहीं प्रसूव (ब) भी इतना ही धन बचाता है लेकिन 35 साल की आयु से. जब 60 साल की उम्र में दोनों अपना निवेश किया हुआ पैसा प्राप्त करते हैं तो (अ) का फंड 12.23 लाख होता है और (ब) का केवल 7.89 लाख. इस उदाहरण में हम 8% की दर से रिटर्न मिलना मान सकते हैं. तो ये साफ है कि शुरु में 50,000 रूपये निवेश का फर्क आखिरी फंड पर 4 लाख से ज्यादा का प्रभाव डालता है. ये रुपये के जुड़ते रहने की शक्ति (Power of compounding) के कारण होता है. जितना लंबा समय आप निवेश करेंगे उतना ज्यादा आपको रिटर्न मिलेगा.

अब मान लीजिये कि (अ) हर साल 10,000 निवेश करने की बजाय 35 वर्ष की उम्र से हर 5 साल बाद 50,000 निवेश करता है इस स्थिति में उसकी निवेश किया धन उतना ही रहेगा (जो कि 3 लाख है) लेकिन उसे 60 साल की उम्र में 10.43 लाख का फंड (कोष) मिलता है. इससे पता चलता है कि देर से निवेश करने में समान धन डालने पर भी व्यक्ति शुरू में मिलने वाले चक्रवृद्धि ब्याज के फायदे को खो देता है.

3. रुपये की कीमत का औसत (Rupee Cost Averaging)

ये मुख्य रूप से शेयरों में निवेश के लिये उपयोगी है. जब आप एक फंड में लगातार धन का निवेश करते हैं तो रुपये की कम कीमत के समय में आप शेयर की ज्यादा यूनिट खरीदते हैं. इस प्रकार समय के साथ आपकी प्रति शेयर या (प्रति यूनिट) औसत कीमत कम होती जाती है. यह रुपये की औसत लागत की नीति होती है जो एक लंबी अवधि के समझदार निवेश के लिये बनाई गयी है. ये सुविधा अस्थिर बाजार में निवेश के खतरे को कम करती है और बाजार के उतार चढ़ाव भरे सफर में आपको सहज बनाये रखती है.

जो लोग एसआईपी के माध्यम से निवेश करते हैं वे बाजार के उतार के समय को भी उतनी ही अच्छी तरह संभाल सकते हैं जैसे वो बाजार के चढ़ाव के समय को. एसआईपी के द्वारा आप के निवेश की औसत लागत कम होती है, तब भी जब आप बाजार के ऊंचे या नीचे सभी प्रकार के दौर से गुजरते हैं.

4. सुविधाजनक

ये निवेश का बहुत ही आसान तरीका है. आपको केवल पूरे भरे हुये नामांकन फॉर्म के साथ चेक जमा करना होगा जिससे म्यूचु्अल फंड में आपके द्वारा कही गयी तारीख पर चेक जमा हो जायेगा और अपके खाते में शेयर यूनिट आ जायेंगी .

5. अन्य लाभ

इसमें कैपिटल गेन पर लगने वाला टैक्स (जहां भी लागू होता है) निवेश करने के समय पर निर्भर होता है.

धोनी के इन हेलीकॉप्टर शॉट्स को देखा क्या!

टीम इंडिया के सबसे सफलतम कप्तान के रूप में खुद को स्थापित करने वाले महेंद्र सिंह धोनी अपने शांत स्वभाव व हेलीकॉप्टर शॉट के लिए दुनिया में विख्यात हैं. आपको बता दें कि धोनी ने जब से अपने इस जादुई शॉट की मदद से गेंद को दर्शकों के बीच पहुंचानी शुरू की है तभी से ही धोनी का यह शॉट चर्चा का विषय बना हुआ है.

जिस वक्त पहली बार महेंद्र सिंह धोनी ने हेलीकॉप्टर शॉट खेला था उस वक्त लोग यह देखकर चकित हो गए थे और लोग इस शॉट का जनक धोनी को ही मानते थे. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि धोनी के हेलीकॉप्टर शॉट के पीछे कोई और है. असल में यह हेलीकॉप्टर शॉट उनके एक दोस्त ने इजाद किया था.

इस शॉट के जनक धोनी के बचपन के दोस्त संतोष लाल थे, जिन्होंने कड़ी मेहनत के बाद धोनी को इस शॉट को खेलना सिखाया. धोनी की सफलता में इस हेलीकॉप्टर शॉट और उसे खेलने की ट्रेनिंग देने वाले संतोष का भी अप्रत्यक्ष योगदान है.

धोनी ने अपने क्रिकेट करियर में कई हेलीकॉप्टर शॉट खेले हैं. तो आइए आज नजर डालते हैं भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह द्वारा अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में खेले गए 5 सर्वश्रेष्ठ हेलीकॉप्टर शॉट पर.

प्राकृतिक है मासिक धर्म, अपवित्र नहीं

मासिक धर्म पर जितने आडंबर अपने देश में हैं दुनिया में शायद कहीं नहीं हैं. युवतियों और औरतों की हर महीने वाली यह ‘समस्या’ को समाज के सत्ताधारियों ने ही समस्या घोषित कर दिया है. गौरतलब है कि ऐसे नियम बनाने वालों को खुद पीरियड्स नहीं होते. इन नियमों को यथासंभव पालन हमारी माताएं और बहनें भी निश्चित करतीं हैं. मासिक धर्म कोई ‘समस्या’ या 'अपवित्रता' नहीं है जैसा कि धर्म के ठेकेदारों ने फैला रखा है. विज्ञान ने मासिक धर्म के कारणों को बहुत पहले ही सिद्ध कर दिया था. मगर धर्म के नाम पर अंधे हो चुके समाज को यह दिखाई नहीं देता.

मासिक धर्म के समय महिलाएं कई शारीरिक, मानसिक और हॉरमोनल बदलावों से गुजरती हैं. हमारे देश में बहुत सी लड़कियों और महिलाओं को रजोधर्म या मासिक धर्म के बारे में सटिक और सही जानकारी ही नहीं है. जानकारी के अभाव में लड़कियां और महिलाएं अपनी साफ-सफाई का ठीक से ध्यान नहीं रख पातीं और इसका खामियाजा उन्हें बाद में भुगतना पड़ता है.

मासिक धर्म को लेकर हमारे समाज में कई कुरीतियां हैं. कई परिवारों में आज भी ये नियमों का पालन किया और करवाया जाता है. कई घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को रसोई घर में और तथाकथित ‘पूजा घर’ में प्रवेश नहीं करने दिया जाता. यही नहीं, कुछ परिवारों में तो मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को घर के कोने में रखा जाता है और परिवार के दूसरे लोगों को स्पर्श करना वर्जित कर दिया जाता है. अलग थाली में खाने से लेकर एक वक्त के खाने तक, यह सब चोंचले हमारे समाज में विद्यमान हैं. अगर यह सब पढ़कर आप चौंक गए हैं, तो यह भी जान लीजिए कि मासिक धर्म के दौरान कुछ महिलाओं का श्रृंगार करना भी वर्जित है. देश में पैठ बनाकर बसी हुए कई धर्म की दुकानों( जैसे सबरीमाला मंदिर, केरल) में भी मासिक धर्म वाली महिलाओं का महीने के 5 दिन नहीं, पर एक तय आयु वर्ग का जाना मना है.

सोचने वाली बात यह कि इन सब ड्रामेबाजी का महिलाओं के मन मस्तष्कि पर क्या प्रभाव पड़ता होगा. न चाहते हुए भी वे खुद को अलग-थलग और अपवित्र महसूस करती होंगी. समाज में व्याप्त इन नियमों का बोलबाला है. इसका मुख्य कारण है प्युबर्टी, रिप्रोड्कटिव हेल्थ, मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी का अभाव. इस समस्या का समाधान सही प्लैनिंग से ही मिल सकता है.  

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ट्रैफिक जैम कम्युनिकेशन (दिल्ली में स्थापित एक इन्टीग्रेटेड मार्केटिंग कम्युनिकेशन्स ऐजेंसी) ने डबल बैरल कम्युनिकेशन के साथ मिलकर #IAmUp कैंपेन शुरु किया है. इस कैंपेन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं, युवतियों और लड़कियों से जुड़ी गंभीर समस्याओं पर बातचीत करना और उनके सशक्तिकरण के लिए यथोचित समाधान निकालना है. इसी अवसर पर #IAmUp कैंपेन के नाम से एक वीडियो भी रिलीज किया गया. इस कैंपेन के अंतर्गत भविष्य में कई वीडियो रिलीज किए जाएंगे.

ट्रैफिक जैम कम्युनिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर हितेश छाबरा ने कहा, ‘हमें समाज पर कठोर प्रश्न उठाने होंगे. हमें यह पूछना होगा कि आज भी हम पुराने समय में क्यों जी रहे हैं और मासिक धर्म को अपिवत्र क्यों मानते हैं. कुछ समय पहले इन्सटाग्राम ने एक महिला की पीरियड्स वाली तस्वार को हटा लिया था. यह गलत है. अधिकतर मामलों में एक औरत ही दूसरे औरत को मासिक धर्म को लेकर असहज महसूस करवाती हैं.’

वहीं डबल बैरल कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर निलेश फड़निस ने कहा, ‘हमें इस बात पर विचार करना होगा कि जब एक औरत ही दूसरे औरत को नीचा दिखाना चाहती हो, तो क्या महिला सशक्तिकरण संभव है? हमें यह समझना बहुत जरूरी है कि मासिक धर्म एक सामान्य प्रक्रिया है.’

महिलाएं बेझिझक बढ़ें आगे

धर्म और उस के ठेकेदार भले ही मासिकधर्म से गुजर रही महिलाओं को दुत्कारने और कोसने का अपना धर्म निभाते रहें लेकिन महिलाओं में कतई यह निराशा, हताशा, अवसाद या कुंठा की बात नहीं होनी चाहिए. उन्हें सेनेटरी नेपकिंस के उत्साहभर देने वाले विज्ञापनों से सबक लेना चाहिए जिन में पूरे आत्मविश्वास से बताया जाता है कि उन 5 दिनों में वे कैसे बगैर किसी झंझट या परेशानी के न केवल अपने रोजमर्रा के कामकाज कर सकती हैं बल्कि खेलकूद में भी झंडे गाड़ सकती हैं. यानी दिक्कत की बात गीलापन या चिपचिप नहीं, बल्कि धर्म है जो मासिकधर्म से भी पैसा बनाने के जुगाड़ में है.

प्राकृतिक है मासिकधर्म

अगर वाकई भगवान नामक कोई शक्ति है तो कम से कम उस ने तो लड़केलड़की का भेद नहीं किया. अगर करता तो आज तथाकथित रूप से उस की यह सृष्टि ही नहीं होती. वैसे इस भेदभाव के लिए अकेले पुरुषवर्ग जिम्मेदार नहीं है. महिलाएं भी बड़ी संख्या में ऐसे अंधविश्वास का समर्थन करती हैं कि महीने के 5 दिनों तक लड़कियों का शरीर अपवित्र रहता है. लगभग हर घर में कुछ महिलाएं हैं जो आंखें मूंदे खुद तो परंपरा के नाम पर इन नियमों का पालन करती ही हैं, अपने बच्चों पर भी यह कुसंस्कार थोपती रहती हैं.

आश्चर्यजनक है टाटा मोटर्स की पहली सुपर रेस कार ‘रेस मो’

जिनेवा के स्विजरलैंड में शुरू हो चुके जिनेवा ऑटो शो 2017 में टाटा मोटर्स द्वारा अपने नये परफॉर्मेंस ब्रांड टैमो (TAMO) के तहत आने वाली नयी स्पोर्ट्स कार ‘रेस मो’ पेश की है. यह ऑटो शो साल 1905 से प्रारंभ किया गया था. इस 87वें अंतर्राष्ट्रीय जिनेवा ऑटो शो का नाम दुनियाभर के ऑटो शोज या गाड़ियों के प्रदर्शन में सबसे ऊपर आता है.

हम आपको बता देना चाहते हैं कि टाटा मोटर्स जो कि एक भारतीय बहुराष्ट्रीय मोटर वाहन विनिर्माण कंपनी है, का जिनेवा ऑटो शो में शिरकत करने का यह 20वां साल है. इस शो में जाहिर तौर पर टैमो ‘रेस मो’, टाटा की सबसे खास पेशकश है.

इस रेस मो को भारत में अगले साल 2018 में लॉन्च किया जाएगा. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस कार के दो वर्जनस ‘रेस मो’ और ‘रेस मो प्लस’ बाजार में उतारे जाएंगे. इसका जो पहला वाला वर्जन होगा वो बाजार की आम बिक्री के लिए होगा और दूसरा वर्जन केवल रेस ट्रैक्स के लिए उपलब्ध कराया जाएगा.

क्या आप जानते हैं कि ये दोनों पहली भारतीय कारें होंगी जो माइक्रोसॉफ्ट द्वारा चलाए जा रहे ओपन वर्ल्ड रेसिंग वीडियो गेम फोरज़ा होराइज़न-3 का हिस्सा बनेंगी.

इनका डिजायन काफी शार्प और आकर्षक है. 'रेस मो’ को तैयार करने में टाटा ने अलग चीजों का इस्तेमाल किया है, जिसकी वजह से ही ये अद्वतीय सी लगती है. लग्जरी स्पोर्ट्स कारें बनाने वाली कंपनी मैकलॉरेन की मैकलॉरेन पी-1 की तरह इस में भी ऊपर की तरफ खुलने वाले सीज़र डोर दिए गए हैं. इस कार में एग्जॉस्ट पाइप को ऊंचा रखा गया है. टाटा के मुताबिक रेस मो को एमएमएस स्ट्रक्चर (मल्टी-मैटेरियल सैंडविच) पर बनाया गया है जो कि पहली बार किसी पैसेंजर व्हीकल यानि कि यात्री वाहन में इस्तेमाल हुआ है.

ऑटो प्रौद्योगिकी की भाषा में बात करें तो इस कार को नए मोफ्लैक्स प्लेटफार्म पर तैयार किया गया है. यह रेस मो में टर्बोचार्ज्ड रेवोट्रोन इंजन दिया गया है, कंपनी का कहना है कि यह इंजन 190 पीएस की पावर और 210 एनएम का टॉर्क देगा. इस कार में ऑटोमैटिक गियरबॉक्स के साथ पैडल शिफ्टर्स भी दिए गए हैं. टाटा ने दावा किया है कि है इस कार को 100किमी प्रति घण्टे की रफ्तार पाने में 6 सेकंड से भी कम समय लगता है.

अपने फेवरेट खिलाड़ी का निकनेम जानते हैं आप!

क्रिकेट दुनिया के लोकप्रिय खेलों में से एक है. और भारत में तो इसकी लोकप्रियता का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता. क्रिकेट भारत में सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला खेल है.

क्रिकेट की ऐसी फैन फॉलोइंग है कि लोग क्रिकेट के नियम से लेकर क्रिकेटरों के बारे में लगभग सब कुछ जानते हैं या जानना चाहते हैं. आप अपने पसंदीदा क्रिकेटर के बारे में सब जानते हैं लेकिन क्या उनके निकनेम से वाकिफ हैं. नहीं ना. तो आइए जानते हैं भारतीय खिलाड़ियों के थोड़े अजीबोगरीब लेकिन प्यारभरे निकनेम.

सचिन तेंदुलकर

सचिन तेंदुलकर को सभी लोग ‘लिटिल मास्टर’, ‘मास्टर ब्लास्टर’ नाम से जानते हैं लेकिन साथी खिलाड़ी इन्हें मैदान पर तेंद्ल्या व पाजी (बड़ा भाई) के नाम से पुकारते हैं.

अनिल कुंबले

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और टीम इंडिया के वर्तमान कोच अनिल कुंबले को साथी खिलाड़ी ‘जंबो’ के नाम से पुकारते हैं क्योंकि गेंदबाजी करते समय इनकी गेंद मैदान (पिच) पर ज्यादा उछाल लेती थी. इस कारण से इनका नाम जंबो पड़ा.

राहुल द्रविड़

दाएं हाथ के पूर्व बल्लेबाज राहुल द्रविड़ को टीम के खिलाड़ी प्यार से ‘जेमी’ के नाम से पुकारते थें. इनके पिता शरद किसान कम्पनी में कार्यरत थे जो कि फलों का जैम व सिरप बनाती है. आपको बता दें कि राहुल द्रविण किसान कम्पनी के ब्रांड अम्बेसडर भी थे. इसलिए इनको लोग प्यार से जेमी भी कहते थे. इनके बेहतरीन खेल के कारण इन्हें ‘दी वाल’ (The wall ) के नाम से भी जाना जाता है.

महेंद्र सिंह धोनी

भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को इनके साथ खिलाड़ी ‘माही’ के नाम से पुकारते हैं. लोग इन्हें ‘कैप्टन कुल’ के नाम से भी जानते हैं.

विराट कोहली

भारतीय कप्तान विराट कोहली को लोग प्यार से ‘चीकू’ के नाम से पुकारते हैं. इनका ये नाम दिल्ली के कोच (प्रशिक्षक) अजित चौधरी ने दिया था. इनके बालों के स्टाइल के कारण ही इनका ये नाम पड़ा.

सौरभ गांगुली

पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली को लोग प्यार से ‘दादा’ के नाम से पुकारते हैं. इन्हें ‘द प्रिंस ऑफ कोलकाता’ के नाम से भी लोग जाने जाते हैं.

वीरेंद्र सहवाग

पूर्व भारतीय विस्फोटक बल्लेबाज को लोग ‘नजफगढ़ का नवाब’ के नाम से व साथी खिलाड़ी इन्हें ‘वीरू’ के नाम से पुकारते हैं.

हरभजन सिंह

भारतीय स्पिन गेंदबाज हरभजन सिंह को साथी खिलाड़ी प्यार से ‘भज्जी’ के नाम से जानते हैं. अपने शानदार स्पिन के बदौलत मैच का रुख मोड़ देने वाले हरभजन को लोग ‘टर्बनेटर’ नाम से भी पुकारे जैते हैं.

युवराज सिंह

भारतीय विस्फोटक बल्लेबाज युवराज सिंह को लोग ‘सिक्सर किंग’ के नाम से भी जानते हैं. साथी खिलाड़ी इन्हें प्यार से ‘युवी’ के नाम से भी पुकारते हैं. युवराज का ये प्यारा नाम मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने रखा था.

अजित अगरकर

पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज अजित अगरकर को ‘बॉम्बे डक’ के नाम से लोग जानते हैं. एक बेहतरीन तेज गेंदबाज होने के साथ ही साथ ये एक बढ़िया बल्लेबाज भी हैं. आपको बता दें कि इनका ये नाम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार पारी खेलने के लिए पड़ा था.

जवागल श्रीनाथ

पूर्व भारतीय गेंदबाज को ‘मैसूर एक्सप्रेस’ के नाम से जाना जाता हैं.

कपिलदेव

‘द हरयाणा हरिकेन’ के नाम से जाने जाते हैं.

गोविंदा : विनाशकाले विपरीत बुद्धि

गोविंदा का दावा है कि वह धर्म कर्म में यकीन करते हैं. वह अक्सर अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते रहने का दावा करते हैं. जबकि बॉलीवुड के सूत्र दावा करते हैं कि गोविंदा की कथनी व करनी में जमीन आसमान का अंतर है. बहरहाल, गोविंदा के ही शब्दों में कहें तो गोविंदा अपने कर्मों का फल भुगत रहे हैं. जब गोविंदा स्टार बन गए थे, तो वह इस कदर अहम के शिकार व आत्ममुग्ध हो गए थे कि जिसने भी उनकी प्रशंसा नहीं की, वही उनका दुश्मन हो जाता था. राजनेता बनने और कॉग्रेस की लहर के दौरान सांसद बन जाने पर तो वह अपने आपको ईश्वर से भी बड़ा मानने लगे थे. परिणामतः अपने प्रशंसको को थप्पड़ रसीद करना, शूटिंग के लिए सेट पर छह से आठ घंटे देरी से पहुंचना उनकी आदत का हिस्सा था. हर जगह उनके साथ तमाम चमचे चिपके रहते थे. बॉलीवुड के बिचैलियों की माने तो उन दिनों गोविंदा किसी से भी सीधे मुंह बात नहीं करते थे. मगर गोविंदा के ही शब्दों में कहें तो अब जब उन पर ईश्वर की लाठी चली है, तो अब उनका करियर संवर ही नहीं पा रहा है. वह अपनी बेटी का भी करियर नहीं बना सके.

गोविंदा ने अपनी बेटी के करियर को संवारने के लिए ही फिल्म ‘‘अभिनय चक्र’’ की शुरूआत की थी, पर वह इस फिल्म को नहीं बना सके. फिर उनकी बेटी ने अन्य निर्माता की फिल्म से करियर शुरू किया था. पर उस फिल्म की बॉक्स आफिस पर बड़ी दुर्गति हुई. अंततः गोविंदा ने फिल्म ‘‘अभिनय चक्र’’ के कथानक में थोड़ा फेरबदल कर ‘‘आ गया हीरो’’ की नए सिरे से शुरूआत की, जिसमें वह खुद हीरो बन गए. मगर हालात ऐसे हैं या यूं कहें कि उनके कर्म ऐेसे हैं कि यह फिल्म थिएटरों में पहुंच नहीं पा रही है.

गोविंदा के पास धन की कमी नहीं है. मगर उनका अहम अभी भी सबसे उपर है. वह अपनी कार्यशैली में बदलाव करने को तैयार नहीं हैं. अपने अहम और खुद को सर्वश्रेष्ठ हीरो साबित करने के चलते वह गलतियों पर गलतियां करते जा रहे हैं. इसमें उनकी पीआर टीम भी अपना हाथ सेंक रही है. बॉलीवुड में तो लोग अब खुलेआम इस बात का दावा कर रहे हैं कि गोविंदा की पीआर टीम उनके करियर को संवारने की दिशा में काम नहीं कर रही है.

जबकि गोविंदा ‘‘विनाश काले  विपरीत बुद्धि’’ की तर्ज पर अपनी फिल्म ‘‘आ गया हीरो’’ को पिछले तीन माह से प्रमोट करते आ रहे हैं. फिल्म के प्रमोशन पर वह किसकी सलाह पर अनाप शनाप धन खर्च कर रहे हैं, यह तो गोविंदा ही जाने. पर इसके परिणाम सकारात्मक नहीं निकल रहे हैं. वह हर जगह खुद को सबसे बड़ा स्टार साबित करते रहते हैं. सूत्रों की माने तो  टीवी के कुछ रियालिटी शो में भी गोविंदा इतनी देर से पहुंचे कि रियालिटी शो के निर्माताओ ने गविंदा के बिना ही सत्तर प्रतिशत एपीसोड फिल्मा लिया. इतना ही नहीं अपने अहम के चलते गोविंदा देश के कई बड़े अखबारों को भी नजरंदाज करते आ रहे हैं. उनका दावा है कि वह आज भी इतने बड़े हीरो हैं कि उन्हें मीडिया की नहीं, मीडिया को उनकी जरुरत है. 

अब गोविंदा कितने बड़े हीरो हैं, यह सच तो उनका अंतर्मन ही जानता होगा. पर जो सामने नजर आ रहा है, उसके अनुसार गोविंदा की हीरो वाली फिल्म ‘‘आ गया हीरो’’ के सिनेमाघरो में पहुंचने की राह अवरूद्ध हो चुकी है. इस फिल्म का वितरण करने के लिए वितरक नहीं मिल रहे हैं. पहले यह फिल्म 24 फरवरी को प्रदर्शित होनी थी. पर वितरकों के अभाव में यह फिल्म 24 फरवरी को प्रदर्शित नहीं हुई. उसके बाद तीन मार्च की तारीख तय हुई, मगर तीन मार्च को भी ‘आ गया हीरो’ प्रदर्शित नहीं हो पायी. यानी कि संकट बरकरार रहा. अब गोविंदा ने दावा किया है कि वह अपनी फिल्म ‘‘आ गया हीरो’’ को सत्रह मार्च को प्रदर्शित करके ही रहेंगे. मगर बॉलीवुड से जुड़े लोग दावा कर रहे हैं कि ‘आ गया हीरो’ के सत्रह मार्च को भी प्रदर्शित होने की उम्मीदें कम हैं.

हमें सच पता नहीं. मगर बॉलीवुड ही नहीं गोविंदा के अति नजदीकी सूत्र दावा कर रहे हैं कि गोविंदा तो फिल्म वितरकों को अपनी फिल्म को प्रदर्शित करने के लिए अपनी जेब से धन देने को तैयार हैं, इसके बावजूद वितरक आगे नहीं आ रहे हैं. सूत्र दावा करते है कि फिल्म ‘आ गया हीरो’ के पीआर ने भी एक बड़े स्टूडियो के साथ बात करने का वादा किया था, पर कुछ नही हो पाया.

उधर फिल्म ‘आ गया हीरो’ देख चुके लोग आपस में फुसफुसा रहे हैं कि ‘आ गा हीरो’ तो ‘आउट डेटेड’ फिल्म है. अब तो बॉलीवुड की फिल्मों में वीएफएक्स वगैरह की भरमार होती है. गोविंदा का सबसे बड़ा हथियार उनका नृत्य रहा है, मगर इस फिल्म के गाने व नृत्य भी लोगों को अपनी तरफ आकर्शित नहीं कर पा रहे हैं. गोविंदा ने अपनी तरफ से भले ही फिल्म को प्रमोट कर दिया हो, पर फिल्म की कहीं कोई चर्चा नहीं है.

गोविंदा के हालात इतने बदतर हो गए हैं कि बॉलीवुड से जुड़े छुटभैए भी गोविंदा को सलाह देने लगे हैं. यह लोग कह रहे हैं सूरज पर पत्थर फेंकने, किसी को गाली देने या किसी के खिलाफ अनाप-शनाप बकने, अपनी गलतियों के लिए दूसरों को कटघरे में खड़ा करने से इंसान ज्यादा समय तक खुद को बड़ा नहीं साबित कर सकता. जरुरत इस बात की है गोविंदा को नए सिरे से अपनी कार्यशैली पर विचार करना चाहिए. बदले हुए हालात के मुताबिक काम करना चाहिए. अन्यथा उनके बारे में लोग यही रटेंगे ‘‘विनाश काले विपरीत बुद्धि.’’

पेश है आईडीएफसी का आधार पे ऐप

इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी (आईडीएफसी) ने एक लॉन्च इवेंट में आईडीएफसी आधार पे ऐप को लॉन्च किया. इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी (आईडीएफसी) को अप्रैल 2014 में बैकिंग लाइसेंस दिया गया था. खबरों के अनुसार माना जा रहा है कि यह भारत में पहला आधार से जुड़ा कैशलेस मर्चेंट सॉल्यूशन है. इस एंड्रॉयड ऐप की मदद से ग्राहक दुकानदारों को किसी भी राशि का भुगतान कर सकते हैं. लॉन्च किए जाने से पहले 16 राज्यों के 1500 मर्चेंट द्वारा ऐप का इस्तेमाल कर लिया गया है.

आईडीएफसी आधार पे ऐप को आईडीएफसी बैंक द्वारा बनाया गया है. इसमें बैंक को नीति आयोग, सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, यूआईडीएआई और एनपीसीआई की मदद मिली है. यह अभी सिर्फ उन दुकानदारों के लिए उपलब्ध कराया गया जिन्होंने ई-केवाईसी प्रक्रिया पूरी की है.

बैंक की रिपोर्ट में इस सेवा से जुड़ने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है. आईडीएफसी आधार पे ऐप को का लाभ लेने के लिए, एक एसएमएस लिंक की मदद से दुकानदार किसी भी स्मार्टफोन पर ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं. इसके बाद फोन को एसटीक्यूसी द्वारा सर्टिफाइड आधार बायोमैट्रिक रीडर से जोड़ने की जरूरत पड़ेगी.

पेमेंट करने के लिए ग्राहकों को अपने बैंक का नाम चुनना होगा. इसके बाद मर्चेंट के फोन में अपना आधार नंबर लिखना होगा. इसके बाद ग्राहक के फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल करके भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. ट्रांजेक्शन के लिए ग्राहक के पास स्मार्टफोन होना जरूरी नहीं है. इस तरह से यह ऐप ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा कारगर साबित होगा.

ग्राहकों को डेबिट या क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने की जरूरत भी नहीं है. जो लोग डेबिट या क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने में असुरक्षा महसूस करते हैं उनके लिए यह कारगर साबित होगा. और ना ही मोबाइल एप्लिकेशन डाउनलोड करना जरूरी है. कैशलेस ट्रांजेक्शन बिना मोबाइल के भी संभव होगा. यह ऐप पासवर्ड याद रखने की परेशानी से भी छुटकारा दिलाता है.

अभिनेत्री बनने के लिए सुंदरता ही जरूरी नहीं : अदा शर्मा

15 वर्ष की उम्र से अभिनय के क्षेत्र में उतरने वाली हंसमुख, विनम्र स्वभाव की अभिनेत्री अदा शर्मा ने विक्रम भट्ट की हौरर फिल्म ‘1920’ से अभिनय की शुरुआत की. उन्हें अभिनय से लगाव था. किसी भी रूप में उन्हें अभिनेत्री ही बनना था, जिस में साथ दिया उन के मातापिता ने, जिन्होंने हमेशा हर काम करने की आजादी दी. हिंदी के अलावा उन्होंने तमिल, तेलुगू और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया है. मुंबई की अदा शर्मा के पिता मर्चेंट नेवी में थे और उन की मां एक क्लासिकल डांसर हैं. बचपन से ही उन्हें कला का माहौल मिला है. अदा एक जिमनास्ट हैं. उन्होंने 3 साल की उम्र से डांस सीखना शुरू किया था. उन्होंने मुंबई के ‘नटराज गोपी किशन कथक डांस एकैडमी’ से कथक में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. उन्होंने सालसा व जैज नृत्य भी सीखा है और वे एक अच्छी बैले डांसर भी हैं. उन्हें हर तरह की फिल्में करने का शौक है और किसी भी प्रकार के दृश्य अगर कहानी में जरूरत है, तो उन्हें करने से हिचकिचाती नहीं हैं. इन दिनों वे अपनी फिल्म ‘कमांडो 2’ को ले कर व्यस्त हैं, उन से मिल कर बात करना रोचक था. पेश हैं उन से हुई बातचीत के अंश.

इस फिल्म का मिलना कैसे संभव हुआ?

मैं 2 बड़ी फिल्में साउथ में तेलुगू में कर रही थी. एक कमर्शियल फिल्म ‘गरम’ और दूसरी ‘शनम’ जो रियलिस्टिक लव स्टोरी है. मैं ‘कमांडो 2’ का औडिशन दे कर हैदराबाद शूट के लिए चली गई थी. मुझे कोई फोन नहीं आया. ‘शनम’ फिल्म के रिलीज होने के बाद मैं साउथ में थी. वहां मुझे फोन आया कि मैं इस फिल्म में हूं और पूछा गया कि मैं कब मुंबई आ रही हूं. बस, यहीं से इस फिल्म से जुड़ गई.

इस फिल्म का ‘वाउ’ फैक्टर क्या था, जिस से आप आकर्षित हुईं?

यह एक ऐक्शन फिल्म है. मैं ने ऐसी भूमिका अभी तक नहीं निभाई है, साउथ की फिल्मों में मेरी भूमिका काफी सीरियस और इमोशनल ड्रामा वाली रही है. रोनाधोना बहुत है, इस तरह का किरदार मुझे पहले कभी नहीं मिला है. इस में दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिलेगा. इस के अलावा हैदराबादी तेलुगू भाषा, जो इस में मैं ने बोली है वह भी नई है. इस से पहले विद्या बालन ने हैदराबादी भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन हैदराबादी तेलुगू का प्रयोग किसी ने नहीं किया है.

किस तरह की तैयारी आप ने की है?

मैं एक नैशनल जिमनास्ट हूं. मैं ने 4 साल की उम्र से इसे सीखा है. मेरी मां एक डांसर हैं. मैं ने मलखम्भ भी किया है. मैं एक छोटे से शहर विजयवाड़ा से हूं, लेकिन अब मुंबई में रहती हूं. इसलिए बहुत सारी बेसिक बातें ऐक्शन के बारे में जानती हूं. इस फिल्म में मैं एनकाउंटर स्पैशलिस्ट बनी हूं. इसलिए ‘गन ’ को सही पकड़ना आदि सभी ऐक्शन की ट्रेनिंग शैड्यूल से 20 दिन पहले मैं ने और विद्युत ने विदेश से लाए गए ट्रेनर से ली है. शारीरिक ट्रेनिंग में मेरी ‘किक्स’ और ‘पंचेस’ अब काफी अच्छे हो गए हैं.

फिल्मों में आने की प्रेरणा कहां से मिली? कितना संघर्ष था?

10वीं की परीक्षा देने के बाद मैं ने निर्णय लिया कि मैं फिल्मों में काम करूंगी, लेकिन पता नहीं यह कीड़ा कहां से आया था. मैं ने अपना पोर्टफोलियो बनवा कर औडिशन देना शुरू कर दिया था. मैं इंडस्ट्री से बाहर की हूं मुझे पता था कि कोई भी काम मुझे आसानी से नहीं मिलेगा. करीब 1 साल के बाद फिल्म ‘1920’ के लिए औडिशन हुआ. मैं अपनेआप को लक्की मानती हूं कि पहली फिल्म में मुझे अभिनय करने का मौका मिला. ऐक्ंिटग के स्केल पर मैं जितना कर सकती थी किया. आज भी लोग उस फिल्म के बारे में बात करते हैं.

मेरे मातापिता हमेशा बहुत सहयोग देते हैं. मैं उन की इकलौती संतान हूं. बचपन में मैं हर तरह की फिल्में देखना पसंद करती थी. मुझे लगता है कि अगर फिल्म खराब है तो भी मैं देख लूं. इस से मुझे पता चलता है कि मुझे ऐसा काम नहीं करना चाहिए. सब के लिए एक्टिंग भी करती हूं. मुझे मिमिक्री करने का बहुत शौक है.

दक्षिण की फिल्मों और बौलीवुड की फिल्मों में क्या अंतर महसूस करती हैं?

अंतर कुछ भी नहीं है. ये सब निर्देशक पर निर्भर करता है. निर्देशक के दिमाग में पूरी फिल्म होती है. इस के अलावा सारे तकनीशियन वहां से यहां भी आते हैं, काम करते हैं. सिर्फ भाषा अलग है.

विद्युत जामवाल के साथ काम करना कैसा लगा?

विद्युत एक मंजे हुए कलाकार हैं. उन के  साथ काम करना बहुत आसान और मजेदार था. वे सीरियस दृश्य भी आसानी से कर लेते हैं. सैट पर खूब मस्ती की है और अब हम दोनों अच्छे दोस्त बन चुके हैं.

फिल्म का कठिन भाग क्या था?

फिल्म में मेरा एक्सैंट बहुत कठिन था, क्योंकि निर्देशक ने सोचा था कि फिल्म की भाषा ऐसी हो, जो सब को समझ में आए. मेरी टीचर सुनीता मैडम ने मेरे साथ 2 महीने तक भाषा पर काम किया.

ग्लैमर वर्ल्ड में टिके रहने के लिए किस तरह की मनोदशा रखनी चाहिए?

हर क्षेत्र में लोग आप को नकारात्मक सोच देने के लिए लगे रहते हैं. ग्लैमर वर्ल्ड में यह बात कुछ अधिक है, नैगेटिविटी आप को यहां अधिक मिलती है. ‘पौजिटिविटी’ को बनाए रखना यहां बहुत कठिन होता है.

बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो आप को नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. यहां मन से बहुत स्ट्रौंग रहने की जरूरत होती है. यह क्षेत्र बहुत शेकी है. आज जो ऊपर है कल कहां होगा, कुछ पता नहीं होता, कुछ सुरक्षा नहीं होती. इसलिए हमेशा पौजिटिव रहना, किसी के बारे में बुरा न सोचना बहुत जरूरी है. अगर आप उस में एक बार चले जाते हैं, तो किसी की बुराई करना, उसे भलाबुरा कहना आप की आदत बन जाती है, जिस में आप खुद ही फंस जाते हैं. यह शक्ति मुझे मेरे परिवार से मिली है. मेरे पिता ने हमेशा कहा है कि अपनेआप को ऊंचा दिखाने के लिए किसी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है.

कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है क्या?

मेरा स्ट्रौंग जोनर रोमांस है और भारतीय सिनेमा में रोमांस एक जबरदस्त भूमिका निभाता है. मुझे वैसी फिल्में करने में अच्छा लगता है.मैं हर तरह की फिल्में करना चाहती हूं. मैं स्ट्रौंग अभिनेत्री की भूमिका हमेशा निभाना चाहती हूं, ताकि लोग हौल से निकल कर मेरी भूमिका को याद रखें. मैं सभी निर्देशकों के साथ काम करना चाहती हूं.

फिल्मों में इंटीमेट सीन करने में कितनी सहज हैं?

जब मैं अभिनय की ओर आई तो हमेशा सोचा कि मैं अपनेआप को किसी भी बात से न रोकूं, क्योंकि मैं ने देखा है कि लोग कुछ कहते हैं, लेकिन कुछ सालों बाद वही सीन करते हैं. मैं बहुत साहसी हूं और सच बोलना पसंद करती हूं. मैं काफी बोल्ड हूं. पहली फिल्म में दांतों पर कालाकाला रंग लगा कर परदे पर आना, चीखनाचिल्लाना किसी भी हीरोइन के लिए आसान नहीं होता. ऐसे में किसिंग सीन तो बहुत आसान हैं.

समय मिले तो क्या करती हैं?

हर तरह की फिल्में देखती हूं, पियानो बजाती हूं और डांस की प्रैक्टिस भी करती हूं.

कितनी फैशनेबल और फूडी हैं?

रियल लाइफ में मैं अधिक फैशनेबल नहीं हूं, लेकिन जरूरत के अनुसार कपड़े पहनती हूं. मैं किसी ब्रैंड के कपड़े पहनने में विश्वास नहीं करती, जो पसंद आए उसे पहन लेती हूं. मुझे स्टाइल पसंद है. मैं बहुत फूडी हूं और हर तरह की डिशेज खाती हूं. मैं शाकाहारी हूं. स्ट्रीट फूड में मुझे चाट बहुत पसंद है. हफ्ते में 4 बार पानीपूरी खाती हूं.

फिटनैस पर कितना ध्यान देती हैं?

मैं मलखंभ और डांस करती हूं. जो करीब 1 से 2 घंटे का होता है. इसे मैं समय के अनुसार करती रहती हूं.

यूथ के लिए क्या मैसेज देना चाहती हैं?

आज की लड़कियां अधिक सुंदर हैं. अगर आप में अभिनय की प्रतिभा है तो आप उसे आगे बढ़ाएं, उस पर ध्यान दें. केवल सुंदर होने से अभिनेत्री नहीं बना जा सकता कुछ अलग ऐक्स फैक्टर्स आप में होने चाहिए ताकि लोग चकित रह जाएं. आजकल अच्छी भूमिकाएं लड़कियों के लिए भी लिखी जा रही हैं.

किस बात से गुस्सा आता है?

जो लोग जानवरों के साथ खिलवाड़ करते हैं. उन पर गुस्सा आता है. मैं एनिमल लवर हूं और जानवरों को आजाद रखने में विश्वास करती हूं. उन्हें किसी फ्लैट या पिंजरे में कैद कर के रखना पसंद नहीं करती. मेरे फ्लैट में एक कौआ रोज आता है, जिसे मैं रोज खाना देती हूं.

महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे होने के बावजूद प्रताडि़त हो रही हैं, इस की क्या वजह मानती हैं?

यह सही है. इस का जिम्मेदार मैं परिवार में मातापिता की भूमिका को मानती हूं, जो जन्म के बाद से उन का पालनपोषण करते हैं. उन्हें सहीसही हर बात छोटी उम्र से बतानी चाहिए. परिवार में मां, बहन, दादी, नानी आदि सभी महिलाओं का सम्मान उन्हें बचपन से सिखाया जाना चाहिए. घर से परिवार और परिवार से समाज बनता है.

नीट परीक्षा बेईमानी की सीढ़ियां

हम अपने युवाओं को पढ़ने के लिए नहीं परीक्षा में बैठने के लिए तैयार करते हैं. देशभर के मैडिकल इंजीनियरिंग, एमबीए, आर्किटैक्चर, फैशन डिजाइनिंग आदि कालेजों में क्या पढ़ा कर योग्य छात्रों को तैयार किया जाता है, यह चिंता कोई नहीं करता, इन सरकारी या प्राइवेट संस्थानों में दाखिला कैसे मिलता है, यह तैयारी कैसी हो, इस के नियमकानून कैसे हों, इसी पर सरकार, शिक्षा मंत्रालय, वाइस चांसलर, डीन, अदालतें दिमाग खपाती रहती हैं. मैडिकल व डैंटल कोर्सों के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं में कितनी बार छात्र बैठ सकते हैं इस पर हार कर सरकार ने 3 बारी को मान लिया है. हर राज्य का कोटा 85% हो, अपने राज्य के कालेजों में इस पर हल्ला जारी है. इन में आरक्षण की बात तो उठाई ही जाती है, प्रवेश परीक्षा देने की उम्र बढ़ाने की मांग भी की जा रही है.

यह हम अपने युवाओं के लिए खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं. जो पैसा 6 लाख बच्चे प्रवेश परीक्षाओं में पास होने के लिए कोचिंग, किताबों, बरबाद हुए समय पर खर्च करते हैं, उस से न जाने कितने नए संस्थान खुल जाएं कि जो छात्र चाहे दाखिला पा सके. पर हम चाहते हैं कि ऊंची शिक्षा सिर्फ चुने हुओं को मिले. ऐरागैरा दाखिला न ले सके. तभी तो सिफारिशियों की गिनती बनती है. तभी तो नेताओं और अफसरों के यहां भीड़ जुटती है. तभी तो पैसा ले कर दाखिला मिलता है.

यह एक देश के दिमागी दिवालिएपन का नमूना है. हम एकलव्य बनाने में इतने इच्छुक नहीं हैं जितने खुद सीखे एकलव्य से दक्षिणा पाने को हैं. कोई भला पूछे कि उस द्रोणाचार्य को कैसे महान कहा जा सकता है जो बिना पढ़ाए किसी से फीस ले ले, और हम हैं कि उसी का राग अलापे जाते हैं, सड़कों का नाम, पुरस्कारों का नाम, विश्वविद्यालयों का नाम उस द्रोणाचार्य के नाम पर रखते हैं जिस ने एकलव्य के साथ बेईमानी की, जो बेईमानी आज के शिक्षकों में कूटकूट कर भरी है, जिस पर मध्य प्रदेश का व्यापम कांड हुआ पर अंत में दब गया.

भोलेभाले अबोध बच्चों को हमारा समाज और हमारी तिरंगी हों, लाल हों, हरी हों या भगवा, सरकारें बेईमानी की मशीन में ठूंस देती हैं. साफ मन को काला करने की कला हमें आती है. नीट परीक्षाएं कोई साफसूफ नहीं, बेईमानी की सीढि़यां हैं और इसीलिए इस में रोज बदलाव की मांग की जाती है. हर जवां चाहता है कि जो भी उस पर चढ़े वह काले रंग में रंग जाए, क्योंकि ज्ञान नहीं लेना, स्वर्ग के रास्ते पर घुसना है. मंदिर में घुस कर क्या होता है, क्या यह बताना जरूरी है?

गुप्त रोग लाइलाज नहीं

सैक्स का जिक्र आते ही युवा मन में एक विशेष प्रकार की सरसराहट होने लगती है. मन हसीन सपनों में खो जाता है, क्योंकि यह प्रक्रिया है 2 जवां दिलों के आपसी मिलन की. रमेश का विवाह नेहा से तय हो गया था. रमेश नेहा की खूबसूरती देख पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया था. नेहा को ले कर उस ने हसीन सपने बुन रखे थे. बस, इंतजार था शादी व मिलन की रात का. रमेश ने पहले कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाए थे, इसलिए उस के लिए तो यह नया अनुभव था. मिलन की रात जब रमेश ने नेहा को अपने आगोश में लिया तो उस का धैर्य जवाब देने लगा. उस ने जल्दी से नेहा के कपड़े उतारे और सैक्स को तत्पर हो गया, पर अभी वे एकदूसरे में समा भी न पाए थे कि वह शांत हो गया.

नेहा अतृप्त रह गई. जिस आनंद के सपने उस ने संजो रखे थे सब धराशायी हो गए. रमेश अपने को बहुत लज्जित महसूस कर रहा था. रमेश जैसी स्थिति किसी भी युवा के साथ आ सकती है. अकसर युवा इसे अपनी शारीरिक कमजोरी या गुप्त रोग मान लेते हैं और उन्हें लगता है कि वे कभी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं कर पाएंगे. बहुत से युवा अपने मन की बात किसी से संकोचवश कर नहीं पाते और हताशा का शिकार हो कर आत्महत्या तक कर लेते हैं. कुछ युवा नीमहकीमों के चक्कर में पड़ जाते हैं जो उन्हें पहले नामर्द ठहराते हैं और फिर शर्तिया इलाज की गारंटी दे कर लूटते हैं. युवाओं को समझना चाहिए कि ऐसी समस्या मानसिक स्थिति के कारण उत्पन्न होती है.प्रसिद्ध स्किन व वीडी स्पैशलिस्ट डा. ए के श्रीवास्तव का कहना है कि ‘पहली रात में सैक्स न कर पाना एक आम समस्या है, क्योंकि युवाओं को सैक्स की जानकारी नहीं होती. वे सैक्स को भी अन्य कामों की तरह निबटाना चाहते हैं, जबकि सैक्स में धैर्य, संयम और आपसी मनुहार अत्यंत आवश्यक है.

डा. श्रीवास्तव कहते हैं कि सैक्स से पहले फोरप्ले जरूरी है, इस से रक्त संचार तेज होता है और पुरुष के अंग में पर्याप्त कसाव आता है. कसाव आने पर ही सैक्स क्रिया का आनंद आता है और वह पूर्ण होती है. इसलिए युवाओं को सैक्स को गुप्त रोग नहीं समझना चाहिए. यदि फिर भी कोई समस्या है तो स्किन व वीडी विश्ेषज्ञ की राय लें.

आइए, एक नजर डालते हैं कुछ खास यौन रोगों पर :

शीघ्रपतन

अकसर युवाओं में शीघ्रपतन की समस्या पाई जाती है. यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि दिमागी विकारों की वजह से ऐसा होता है. इस समस्या में युवा अपने पार्टनर को पूरी तरह से संतुष्ट करने से पहले ही स्खलित हो जाते हैं. यह बीमारी वैसे तो दिमागी नियंत्रण से ठीक हो जाती है, लेकिन अगर समस्या तब भी बनी रहे तो किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श ले कर इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है.

नपुंसकता

नपुंसकता एक जन्मजात बीमारी है. इस रोग से ग्रसित लोग स्त्री को शारीरिक सुख देने में सक्षम नहीं होते और न ही संतान पैदा कर पाते हैं. कुछ युवाओं में क्रोमोसोम्स की कमी भी नपुंसकता का कारण होती है. युवाओं को शादी से पहले पता ही नहीं चलता कि उन के क्रोमोसोम्स या तो सक्रिय नहीं हैं या उन में दोष है. कुछ युवा शुरू में नपुंसक नहीं होते पर अन्य शारीरिक विकारों की वजह से वे सैक्स क्रिया सही तरीके से नहीं कर पाते. इसलिए उन को नपुंसक की श्रेणी में रखा जाता है. आजकल तो इंपोटैंसी टैस्ट भी उपलब्ध हैं. अगर ऐसी कोई समस्या है तो इस टैस्ट को अवश्य कराएं.

पुरुष हारमोंस की कमी

पुरुषों में टैस्टेटोरोन नाम का हारमोन बनता है. यही हारमोन पुरुष होने का प्रमाण है. कभीकभी किन्हीं वजहों से टैस्टेटोरोन स्रावित होना बंद हो जाता है तो वह व्यक्ति गुप्त रोग का शिकार हो जाता है. 50 से 55 वर्ष की आयु के बाद इस हारमोन के बनने की गति धीमी पड़ जाती है इसलिए ऐसे व्यक्ति सैक्स क्रिया में जोश से वंचित रह जाते हैं.

सिफलिस

यह वाकई एक गुप्त रोग है जो किसी अनजान के साथ यौन संबंध बनाने से होता है. अकसर यह रोग सफाई न रखने या ऐसे पार्टनर से सैक्स संबंध कायम करने से होता है जो अलगअलग लोगों से सैक्स संबंध बनाता है. इस रोग में यौनांग पर दाने निकल आते हैं. कभीकभी इन दानों से खून या मवाद का रिसाव तक होता रहता है. यदि आप के यौन अंग पर ऐसे दाने उभरते हैं तो तुरंत त्वचा व गुप्त रोग विशेषज्ञ से राय लें और इलाज कराएं. इस का इलाज संभव है. जिस तरह पुरुषों में यौन या गुप्त रोग होते हैं, उसी तरह महिलाओं में भी गुप्त रोग हो सकते हैं. अकसर बहुत सी युवतियों की सैक्स में रुचि नहीं होती. सैक्स के नाम से वे घबरा जाती हैं ऐसी युवतियां या तो बचपन में किसी हादसे का शिकार हुई होती हैं या फिर किसी गुप्त रोग से पीडि़त होती हैं, यहां तक कि वे शादी करने तक से घबराती हैं.

महिलाओं के कुछ खास गुप्त रोग

बांझपन

युवतियों में 12-13 वर्ष की उम्र से माहवारी आनी शुरू हो जाती है. कभीकभी यह 1-2 साल आगेपीछे भी हो जाती है पर ऐसी भी युवतियां हैं जिन के माहवारी होती ही नहीं. ऐसी युवतियां बांझपन का शिकार हो जाती हैं. स्त्री बांझपन भी पुरुष नपुंसकता की तरह जन्मजात रोग है. बहुतों में अनेक शारीरिक व्याधियों के चलते भी हो जाती है लेकिन वह अस्थायी होती है और इलाज से ठीक भी हो जाता है. अगर किसी किशोरी को माहवारी की समस्या है तो उसे तुरंत किसी योग्य स्त्रीरोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.

जननांगों में खुजली

जब से समाज में खुलापन आया है युवा मस्ती में कब हदें पार कर देते हैं पता ही नहीं चलता. चूंकि इन्हें जननांगों की साफसफाई कैसे रखी जाए, यह पता नहीं होता इसलिए ये खुजली जैसे यौन संक्रमणों का शिकार हो जाते हैं. यदि बौयफ्रैंड को कोई यौन संक्रमण है तो गर्लफ्रैंड को इस यौन संक्रमण से बचाया नहीं जा सकता. अत: दोनों को ही शारीरिक संबंध बनाने से पहले अपने यौनांगों की अच्छी तरह सफाई कर लेनी चाहिए.

एंड्रोजन हारमोन का अभाव

जिस तरह पुरुषों में पुरुष हारमोन टैस्टेटोरोन होता है, उसी तरह युवतियों में एंड्रोजन हारमोन होता है. जिन युवतियों में इस हारमोन की कमी होती है, उन में सैक्स के प्रति उत्साह कम देखा गया है, क्योंकि यही हारमोन सैक्स क्रिया को भड़काता है. यदि कोई युवती एंड्रोजन हारमोन की कमी का शिकार है तो उसे तुरंत गाइनोकोलौजिस्ट से राय लेनी चाहिए. यह कोई लाइलाज रोग नहीं है.

लिकोरिया

लिकोरिया गंदगी की वजह से होने वाला एक महिला गुप्त रोग है. इस रोग में योनि से सफेद बदबूदार पानी का स्राव होता रहता है, जिस से शरीर में कैल्शियम व आयरन की कमी हो जाती है. इस रोग से बचने के लिए युवतियों को अपने गुप्तांगों की नियमित सफाई रखनी चाहिए और किसी दूसरी युवती के अंदरूनी वस्त्र नहीं पहनने चाहिए. लिकोरिया की शिकार युवतियों को तुरंत लेडी डाक्टर से सलाह लेना चाहिए, वरना यह रोग बढ़ कर बेकाबू हो सकता है.

सैक्स में भ्रांतियां न पालें

सैक्स की अज्ञानता की वजह से अकसर युवकयुवतियां सैक्स को ले कर तरहतरह की भ्रांतियां पाल लेते हैं.

हस्तमैथुन

यह एक स्वाभाविक क्रिया है. अकसर युवकों को हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है. ज्यादा हस्तमैथुन करने वाले युवकों को लगता है कि उन का अंग छोटा या टेढ़ा हो गया है और वे विवाह के बाद अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने में कामयाब नहीं होंगे. कई नीमहकीम भी युवकों को डरा देते हैं कि हस्तमैथुन से अंग की नसें कमजोर पड़ जाती हैं और वे अपनी पत्नी को खुश नहीं रख सकेंगे, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. हस्तमैथुन शरीर की आवश्यकता है. शरीर में वीर्य बनने पर उस का बाहर आना भी जरूरी है. इस में किसी प्रकार की कोई बुराई नहीं है. युवक ही नहीं युवतियां भी हस्तमैथुन करती हैं. डाक्टरों का भी मत है कि हस्तमैथुन का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता.

ज्यादा सैक्स सेहत के लिए हानिकारक

अकसर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि ज्यादा सैक्स सेहत के लिए हानिकारक है पर ऐसा बिलकुल भी नहीं है. बल्कि सैक्स से महरूम रहना सेहत पर असर डालता है. सैक्स से मानसिक थकावट कम होती है, चित्त प्रफुल्लित रहता है जो सेहत के लिए अत्यंत जरूरी है.

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