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ब्रेकअप के बाद इनकी खूबसूरती में लग गए चार चांद

सितारे बॉलीवुड के हों या टीवी के, प्यार, इश्क और मोहब्ब्त में अगर इन लोगों में कोई एक बात कॉमन है तो वो है ‘ब्रेकअप’. कुछ जल्दी जल्दी तो कुछ देर सवेर इसका शिकार होते ही रहते हैं. पर आज बात ब्रेकअप के बाद रोने धोने की नहीं, बल्कि उसके बाद निखरने की. आज हम आपको बताने जा रहे हैं उन सितारों के बारे में जिनकी खूबसूरती में लग गए हैं चार चांद और वो  ब्रेकअप के बाद. जानिए कौन हैं वो…

मलाइका अरोड़ा

वैसे इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मलाइका अरोड़ा पहले भी बेहद हॉट थीं. हां, अब अपने पति अरबाज खान से ब्रेकअप के बाद वह और भी ज्‍यादा हॉट हो गई हैं. हाल ही में छुट्टियां मनाने गोवा पहुंची मलाइका की सामने आई तस्‍वीरों को ही ले लीजिए. एक से बढ़कर एक हॉट शॉट में नजर आईं हैं वो.

करिश्‍मा कपूर

फिलहाल अपने पति से अलग हो चुकी हैं बॉलीवुड एक्‍ट्रेस करिश्‍मा कपूर. फैशन गुरुओं का ऐसा मानना है कि अब इनके ड्रेसिंग सेंस में काफी बदलाव आ गया है. किसी भी इवेंट पर देख लीजिए करिश्‍मा आपको बदले हुए स्‍टाइलिश लुक में नजर आएंगी. यही नहीं, पहले की अपेक्षा अब सोशल मीडिया पर भी उनकी मौजूदगी ज्‍यादा नजर आती है.

अंकिता लोखंडे

ये बात तो सभी जानते हैं कि टेलीविजन एक्‍ट्रेस अंकिता लोखंडे काफी लंबे समय से एक्‍टर सुशांत सिंह राजपूत के साथ रिलेशन में थीं. वहीं अब दोनों का ब्रेकअप हो चुका है. इस ब्रेकअप के बाद अब अगर आप सोच रहे हैं कि अंकिता मायूस नजर आएंगी, तो ऐसा नहीं है. अब उन्‍होंने खुद को पहले से कहीं ज्‍यादा बदल लिया है. सिर्फ यही नहीं खुद को बदलने के बाद अब वह अपनी फोटो को इंस्‍टाग्राम पर पोस्‍ट करना बिल्‍कुल नहीं भूलतीं.

श्‍वेता रोहिरा

बॉलीवुड एक्‍टर पुलकित सम्राट से शादी करने के बाद श्‍वेता रोहिरा काफी चर्चा में आईं. दोनों के बारे में लंबे समय तक काफी अच्‍छी बातें सुनने को मिलीं, लेकिन उसके बाद फिर अचानक हालात बदल गए. दोनों के बीच तनाव की स्‍थिति आई और दोनों अलग हो गए. अलग होने के बाद अब श्‍वेता के लुक में काफी चेंज आ गया है. नया हेयर कट लेकर अब उन्‍होंने अपनी फिटनेस पर ध्‍यान देना शुरू कर दिया है. इसी के चलते उन्‍होंने काफी हद तक अपना वजन कम भी कर लिया है.

दलजीत कौर

टीवी एक्‍ट्रेस दलजीत कौर का तो नाम सुना ही होगा आपने. शालीन के साथ शादी करने के बाद दोनों अभी काफी अच्‍छे से एकदूसरे के साथ रिलेशन को मेनटेन कर रहे थे. इतने में अचानक न जाने क्‍या हुआ और दोनों ने एकदूसरे से अलग होने का फैसला ले लिया. अब फिलहाल पति से अलग होने के बाद दलजीत ने अपना वजन कम कर लिया है. सिर्फ यही नहीं अब उन्‍होंने अपने लुक में भी काफी बदलाव कर लिया है.

जेनिफर विंगेट

टेलीविजन एक्‍ट्रेस जेनिफर विंगेट ने करण सिंह ग्रोवर से शादी की. कुछ समय दोनों साथ रहे और उसके बाद दोनों का ब्रेकअप भी हो गया. दोनों एकदूसरे से अलग जरूर हो गए, लेकिन जेनिफर ने खुद को टूटने नहीं दिया. बल्‍कि अब वह पहले से और ज्‍यादा स्‍टाइलिश और खूबसूरत हो गई हैं.

रश्‍मी देसाई

एक और टेलीविजन एक्‍ट्रेस इस क्रम में. ये हैं रश्‍मि देसाई. टेलीविजन एक्‍टर नंदीश संधू से शादी करने के बाद कुछ दिन तो इस फैमिली की गाड़ी पटरी पर चली. फिर उसके बाद इस गाड़ी के पहिए डगमगाने लगे और अचानक इसपर ब्रेक लग गया ब्रेकअप का. फिलहाल अब रश्‍मि देसाई फिर से हो चुकी हैं अकेली, लेकिन पहले से कहीं ज्‍यादा स्‍मार्ट और स्‍टाइलिश.

मैं मां बनने के सुख से वंचित हूं. डाक्टर ने बताया कि मेरे अंडे कमजोर हैं. मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल

मेरी उम्र 38 साल है. शादी को 10 साल से अधिक हो गए हैं, लेकिन मां बनने के सुख से वंचित हूं. डाक्टर ने बताया कि मेरे अंडे कमजोर हैं. इसी वजह से एक बार मेरा 3 माह का गर्भ भी गिर चुका है. बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

इस उम्र में गर्भधारण करना आमतौर पर थोड़ा मुश्किल हो जाता है. आप का 3 माह का गर्भ गिरना भी यही साबित करता है कि आप के अंडे कमजोर हैं. लेकिन आप को निराश होने की आवश्यकता नहीं है. अगर आप के पति में कोई कमी नहीं है तो आप एग डोनेशन तकनीक का सहारा ले सकती हैं. किसी अन्य महिला के अंडे आप के गर्भाशय में ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं. इस के लिए आवश्यक है कि उक्त महिला शादीशुदा हो और बच्चे को जन्म दे चुकी हो.

नारों में बदजबानी

उत्तर प्रदेश की चुनावी सभाओं में अखिलेश राहुल एक तरफ और मोदीशाह दूसरी तरफ नारों की बरसात तो करते रहे हैं, पर उन से इस बड़े राज्य का भला होने वाला है, ऐसा कहीं नहीं दिखता. आमतौर पर चुनावों में सिर्फ वादे किए जाते हैं और नारे लगाए जाते हैं, पर दोनों में आम गरीब जनता का भला करने की बात होती है. इस बार भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी तीनों ही एकदूसरे पर लट्ठमार जबान चलाते रहे हैं, जनता के लिए क्या करेंगे, इस की बात तक नहीं कही गई. ठीक है. हमारे देश की ही नहीं, दुनिया के लगभग सारे देशों की जनता ने चुनावों को महज शासकों को टौफी बांटने का खेल बना लिया है. हर 5 या 4 साल बाद कौन बनेगा राजा का खेल होता है और एक आधाअधूरा नेता टौफी को ट्रौफी की तरह ले जाता है और अपने नए मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री निवास में सजा देता है. आम वोटर वहीं का वहीं.

उत्तर प्रदेश की गरीबी को बयान करने की जरूरत नहीं. कहीं से उत्तर प्रदेश में घुसो या आसमान से टपको, ऐसा लगेगा मानो किसी जंगल में आ गए हो. कूड़ों के ढेर, रिकशे की भरमार. सड़कों पर दुकानें, दुकानों में ऊंघते मालिक, खंभों पर टूटे बल्ब, पर नए नेताओं के फ्लैक्सी चेहरे, भीड़भाड़, धूलधक्कड़ सब मिलेगा. कहीं ऐसा नहीं लगेगा कि यहां सरकार नाम की चीज है. इन कामों की जिम्मेदारी वैसे नगरपालिकाओं की होती है, पर वे कौन सी नरेंद्र मोदी, अखिलेश यादव या मायावती से अलग हैं. सभी एक थैली के चट्टेबट्टे और शान से उत्तर प्रदेश की जनता को कहते रहे कि हम से वादे भी न लो, बस दूसरों की बुराई सुनो. हम खराब हैं तो क्या दूसरे तो हम से भी खराब. हम कुछ नहीं करेंगे, तो परेशानी क्या है. दूसरे कहां कह रहे हैं कि वे कुछ करेंगे. नतीजा यह है कि अखिलेशराहुल जोड़ी जीते या न जीते, उत्तर प्रदेश उसी तरह उलटा प्रदेश बना रहेगा, यह पक्का है. यहां कुछ नहीं होगा, क्योंकि न तो वोटर काम करने को राजी है, न नेता काम कराने को. वोटरों को जय हो के नारे लगाने की आदत हो गई है और नेताओं को खादी के कलफ लगे सफेद कपड़े और मोदी जैकेट पहनने की. राज्य की खुशहाली के लिए बस यही काफी है.

ये चुनाव हों, इस से पिछले वाले हों या उस से पिछले वाले, हर बार वही कहानी दोहराई जाती है. कुछ सड़कें बन जाती हैं, कुछ भव्य भवन बन जाते हैं और शासक उन का राग अलापते रहते हैं. पैसा कमाने के लिए जो खेतों में हड्डियां तोड़ते हैं, उन्हें बस जिंदा रहने लायक मिलता है. आधों के घरों से तो कोई न कोई पत्नीबच्चे छोड़ कर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जा कर काम करता है. चुनाव में यह मुद्दा भी कोई नहीं उठाता कि आखिर उत्तर प्रदेश के लोगों को बाहर जा कर काम करने की जरूरत क्यों पड़ती है? बाहर वाले आ कर सत्ता में बैठने को तैयार हैं, पर काम करने को क्यों नहीं?

धार्मिक शोर पर किस का जोर

‘आवाज’ फाउंडेशन की संस्थापक सुमाइरा अब्दुलाली, प्रसिद्ध पर्यावरणविद ने पहली बार भारत में ध्वनि प्रदूषण का डाटा इकट्ठा किया, जिसे सरकार, कोर्ट, पुलिस तथा आम जनता तक पहुंचाया गया. पहली बार यह जाहिर किया गया कि ध्वनि प्रदूषण (पटाखों का शोर, ट्रैफिक का शोर, हवाईजहाज या ट्रेन से उत्पन्न शोर, औद्योगिक उपकरणों व निर्माण आदि से उत्पन्न शोर, लाउडस्पीकरों द्वारा शोर आदि) मनुष्य के लिए बहुत घातक हो सकता है. ऐसे शोर को काबू में करने के लिए नियमकानून भी बने हैं, लेकिन एक और बड़ा स्रोत है

ध्वनि प्रदूषण का- धार्मिक उत्सवों से उठता शोर. इस प्रकार के शोर के सामने जानकार प्राधिकारी भी अपने कान मूंद लेने में होशियारी समझते हैं. धार्मिक स्थलों को साइलेंट जोन माना जाता है, किंतु देखा जाता है कि धार्मिक स्थल बेपरवाही से लाउडस्पीकर लगवा कर मनचाहा शोर मचाते हैं खासकर त्योहारों के समय पर.

हाल ही में दिल्ली और कर्नाटक उच्च न्यायालयों ने धार्मिक स्थलों द्वारा शोर मचाने पर पाबंदी लगाई कि लाउडस्पीकर का मुंह धार्मिक स्थल की ओर होना चाहिए न कि रिहाइशी इलाके की तरफ. सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि धर्म की आड़ में ध्वनि प्रदूषण नियम तोड़ना गलत है. हर प्रकार के धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर टिप्पणी करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘ऐसा लगता है जैसे भिन्नभिन्न धर्मों के इन स्थलों को भगवान का आशीर्वाद शोर मचाने से ही मिलता है. हर धर्म में प्रार्थना तब से चली आ रही है जब बिजली भी नहीं थी.’’

कानून की दृष्टि से

भारत के संविधान की धारा 21 के अनुसार इस देश के नागरिकों को सभ्य वातावरण, शांतिपूर्ण जीवन, रात को अच्छी नींद और सुकून का हक है अर्थात जीवन जीने का अधिकार. ध्वनि प्रदूषण कानून के अनुसार दिन और रात में ध्वनि को निर्धारित सीमा में ही बजा सकते हैं. मसलन, दिन में 50 डीबी और रात में 40 डीबी. जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त और उपअधीक्षक से उच्च पदवी वाले अधिकारी ही ध्वनि प्रदूषण के नियमकानून को लागू कर सकते हैं. केरल उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि धार्मिक स्थलों द्वारा भजनकीर्तन का शोर ध्वनिप्रदूषण के मानदंडों के अनुसार ही होना चाहिए. सुबह हो या शाम अथवा दिन का कोई भी पहर, ध्वनिप्रदूषण के नियमों का पालन होना चाहिए.

मद्रास उच्च न्यायालय में मंदिर में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल द्वारा ध्वनि प्रदूषण का एक केस आया. कोर्ट ने आदेश दिया कि हर कानून इस देश की संसद में पारित हो कर बनता है और उस का पालन करना अधिकारियों का कर्तव्य है. सामाजिक कार्यकर्ता कुमारवेलु की याचिका पर न्यायाधीश संजय किशन कौल तथा न्यायाधीश एम.एम सुंद्रेश ने ऐसी जगहों के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश दिया जहां लाउडस्पीकरों आदि से ध्वनि प्रदूषण कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

आम जनता की दृष्टि से

मेरठ में हाईवे नं 8 के पास रहने वाले अंकित कहते हैं कि कांवर शुरू होते ही उन की मुसीबत शुरू हो जाती है. घर में बुजुर्ग मातापिता हैं, छोटा बच्चा है, लेकिन उन के घर से 500 मीटर दूर कांवरियों के लिए एक टैंट लग जाता है, जिस में दिनरात, सुबह के 3 बजे तक कानफोड़ू लाउडस्पीकरों पर भजन बजते रहते हैं. अपने ही घर में बैठे व्यक्ति को धार्मिक शोर से कोई छुटकारा नहीं, फिर चाहे वह कांवरियों के कारण हो अथवा गणपति पंडाल के कारण. इंदौर में रहने वाली मोना को रोज सुबह 5 बजे लाउडस्पीकर पर अजान की आवाज पर जबरन उठना पड़ता है. जालंधर की वृंदा को अल्लसुबह प्रभात फेरी पर बजते पटाखों से खासी परेशानी होती है. दीवाली के समय पर मुंबई के वर्ली सीफेस पर बेहिसाब पटाखों के शोर और धुएं से राहुल परेशान होते हैं, क्योंकि उन की मां को दमे का रोग है. उस पर बहरा कर देने वाला शोर और अगले दिन पूरे सीफेस पर पटाखों द्वारा फैली गंदगी.

मुंबई के अंधेरी ईस्ट इलाके में रह रहे डा. प्रभाकर राव के घर के पास ही बनी झुग्गियों में एक धार्मिक स्थल है. इस स्थल के ऊपर लाउडस्पीकरों से लगातार शोर उठता है. सुबह 5 बजे से प्रार्थना आरंभ होती है, तो सारा दिन चलती रहती है. डा. राव ऐसोसिएशन औफ मैडिकल कंसलटैंट के सदस्य भी हैं और ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ मोरचा चलाते रहते हैं. 2003 में ‘ऐसोसिएशन औफ मैडिकल कंसलटैंट’ तथा डा. सुमाइरा अब्दुलाली ने मिल कर मुंबई उच्च न्यायालय में मुंबई शहर की कुछ जगहों को साइलेंट जोन के अंतर्गत लाने की मांग की. कोर्ट के निर्देशानुसार नगर पालिका ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों व धार्मिक स्थलों पर यह नियम लागू किया. किंतु मुंबई पुलिस ने धार्मिक स्थलों को इस नियम के बाहर रख दिया.

स्वास्थ्य की दृष्टि से

मूलचंद अस्पताल से जुड़े प्रसिद्ध सर्जन डा. सचिन अंबेकर आगाह करते हैं कि अधिक ध्वनि से हारमोन पर असर पड़ता है, जिस से हृदय पर स्ट्रैस पहुंचता है और हृदयाघात होने की आशंका में वृद्धि हो सकती है. बढ़ते ध्वनि प्रदूषण के कारण मनुष्य के स्वास्थ्य में इस के घातक परिणामों की ओर लोगों का ध्यान खींचना आवश्यक है.न्यायाधीश आर. सी. लहौटी और न्यायाधीश अशोक भान ने ध्वनि प्रदूषण के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु इस बारे में बच्चों को स्कूली पुस्तकों में पढ़ाने पर जोर दिया है.  शोर मचाने वाले धार्मिक उत्सवों से पहले इस के दुष्परिणामों को उजागर करते हुए खास कैंपेन चलाई जानी चाहिए. लोगों को इस ओर जाग्रत करना चाहिए ताकि बाकी ध्वनि प्रदूषण के कारणों के साथ धार्मिक कारणों से उठता शोर भी आम इनसान का जीना दूभर न करता रहे वरना धर्म को श्रेष्ठ जताने की होड़ में धर्म के ठेकेदार लोगों को नुकसान पहुंचाते ही रहेंगे.                    

सुंदर पिचाई : दिग्गज सीईओ

देश में तेजी से बढ़ती डिजिटलीकरण की प्रक्रिया उन लोगों के उल्लेख के बगैर अधूरी है जिन्होंने देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भारत के डिजिटल चेहरे के रूप में अपनी पहचान बनाई है. इन्हीं में से एक नाम है पी सुंदरराजन का जिन्हें प्यार से सुंदर पिचाई कहा जाता है. इस समय वे इंटरनैट कंपनी गूगल के सीईओ हैं. बेशक आज सुंदर पिचाई कैरियर की बेहतरीन ऊंचाई पर हैं पर उन के जीवन की कहानी किसी ऐसे पढ़ेलिखे किशोर से अलग नहीं है जिस की आंखों में परिवार, समाज और देश के लिए कुछ कर गुजरने का एक सपना होता है.

जनवरी, 2017 में जब वे भारत दौरे पर थे तो उस दौरान वे आईआईटी खड़गपुर भी गए थे, जहां कभी उन्होंने पढ़ाई की थी. वहां के छात्रों से उन्होंने कई अनुभव साझा किए और अपनी कालेज लाइफ के दिलचस्प किस्से उन्हें बताए. उन्होंने बताया कि एक समय था जब उन के घर में न टीवी था, न कार और न ही टैलीफोन. तकनीक से उन का परिचय पहली बार 1984 में लैंडलाइन फोन से हुआ था, जो उन के घर पर लगाया गया था. तब सुंदर महज 12 साल के थे लेकिन उस टैलीफोन की बदौलत उन्हें दर्जनों लोगों के टैलीफोन नंबर मुंहजबानी याद हो गए थे. इस से उन्हें तकनीक को ले कर अपने लगाव का भी पता चला था. हालांकि इस में उन के पिता का भी योगदान है जो चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) स्थित एक ब्रिटिश कंपनी जीईसी में इंजीनियर थे.

सुंदर का परिवार 2 कमरे के मकान में रहता था और उस में सुंदर की पढ़ाई के लिए अलग से कोई कमरा नहीं था. वे ड्राइंगरूम के फर्श पर अपने छोटे भाई के साथ सोते थे, पर इन अभावों के बावजूद सुंदर सिर्फ 17 साल की उम्र में आईआईटी की परीक्षा पास कर आईआईटी, खड़गपुर में दाखिला पाने में सफल रहे. वहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई (1989-93) पूरी करने के दौरान हर बैच में सुंदर टौपर रहे.

1993 में फाइनल परीक्षा में अपने बैच में टौप करने के साथ ही उन्होंने सिल्वर मैडल हासिल किया. उस के बाद स्कौलरशिप पर आगे की पढ़ाई के लिए वे 1995 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय चले गए.

स्टैनफोर्ड में बतौर पेइंग गैस्ट रहते हुए पैसे बचाने के लिए उन्होंने कई पुरानी चीजें इस्तेमाल कीं, लेकिन पढ़ाई से समझौता नहीं किया. स्टैनफोर्ड में सुंदर पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो न सका. इसी बीच उन्होंने अमेरिका की सिलीकौन वैली में सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनी अप्लाइड मैटीरियल में बतौर इंजीनियर और प्रोडक्ट मैनेजर  काम शुरू कर दिया, लेकिन उन्हें यह नौकरी पसंद नहीं आई, इसलिए उसे बीच में छोड़ कर व्हार्टन स्कूल औफ द यूनिवर्सिटी औफ पेंसिलवेनिया एमबीए करने चले गए. व्हार्टन में पिचाई को साइबर स्कौलर और पामर स्कौलर उपाधियों से सम्मानित किया गया. एमबीए करते ही वे मैंकिजी ऐंड कंपनी में प्रबंध सलाहकार चुन लिए गए.

सफर गूगल का

सुंदर 1 अप्रैल, 2004 को गूगल में आए. यहां उन का पहला प्रोजैक्ट प्रोडक्ट मैनेजमैंट और इनोवेशन शाखा में गूगल के सर्च टूलबार को बेहतर बना कर दूसरे ब्राउजर के ट्रैफिक को गूगल पर लाना था. इस के बाद उन्होंने गूगल गीयर, गूगल पैक जैसे उत्पाद बनाए.

गूगल टूलबार पर काम करते हुए ही सुंदर को यह आइडिया आया था कि गूगल का अपना ब्राउजर होना चाहिए. ब्राउजर असल में इंटरनैट चलाने वाले माध्यम होते हैं जैसे इंटरनैट ऐक्सप्लोरर, फायर फौक्स, मोजिला आदि. हालांकि उस समय गूगल के सीईओ एरिक श्मिट को यह आइडिया पसंद नहीं आया, क्योंकि उन्हें यह एक महंगा काम लगा. लेकिन बाद में सुंदर ने गूगल के सहसंस्थापक लैरी पेज और सरगेई ब्रिन को गूगल का अपना वैब ब्राउजर बनाने के लिए राजी कर लिया.

वर्ष 2008 में गूगल क्रोम के नाम से यह ब्राउजर बन कर दुनिया के सामने आया और इंटरनैट की दुनिया में छा गया. आज सब से ज्यादा इसी का इस्तेमाल होता है.

सुंदर के इस योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 2008 में पहले वाइस प्रैसिडैंट बनाया गया, उस के बाद 2012 में वे सीनियर वाइस प्रैसिडैंट (क्रोम और ऐप्स) बनाए गए. वर्ष 2013 में पिचाईर् को गूगल में ऐंड्रौयड शाखा का मुखिया बनाया गया, जबकि 2014 में उन्हें प्रोडैक्ट चीफ घोषित किया गया.

वर्ष 2015 में जब गूगल ने एक और कंपनी अल्फाबेट बनाई तो कामकाज के बढ़ते दायरे को संभालने के लिए 10 अगस्त को सुंदर पिचाई कंपनी के सीआईओ बना दिए गए. गूगल का सीईओ बनने से पहले माइक्रोसौफ्ट के सीआईओ बनने की रेस में भी पिचाई का नाम शामिल था, लेकिन बाद में उन की जगह सत्य नडेला को चुना गया. बीच में ट्विटर ने भी उन को अपने पाले में करने का प्रयास किया था, लेकिन जानकारों के मुताबिक, गूगल ने 10 से 50 मिलियन डौलर का बोनस दे कर उन को कंपनी में बने रहने पर सहमत कर लिया.

नहीं भूलेंगे वे दिन

खुद पिचाई को अपनी किशोरावस्था और जवानी के दिनों की यादें सम्मोहित करती हैं. आईआईटी खड़गपुर के छात्रों से उन का नाता कभी नहीं टूटता और वे जबतब इंटरनैट के जरिए उन से अपने जीवन और कैरियर की बातें साझा करते रहते हैं. उन्होंने बताया कि चेन्नई में स्कूली पढ़ाई के दौरान उन्हें क्रिकेट खेलना बहुत अच्छा लगता था. हाईस्कूल क्रिकेट टीम में कप्तानी करते हुए सुंदर ने तमिलनाडु राज्य का क्षेत्रीय टूरनामैंट जीता था.

अपनी तेज याद्दाश्त के कारण भी पिचाई जाने जाते हैं. करीबी लोग उन से 1984 के दौर से भूले हुए टैलीफोन नंबर पूछते हैं, जो बता कर सुंदर उन्हें अचंभित कर देते हैं.

हां, मैं ने भी बंक मारा

आईआईटी खड़गपुर के छात्रों को सुंदर अपने कालेज जीवन की कई ऐसी बातें भी बता चुके हैं जिन के बारे में सुन कर विश्वास नहीं होता. जैसे, एक बार उन्होंने यह रहस्योद्घाटन किया कि छात्र जीवन में उन्होंने कई बार कालेज की कक्षाओं से बंक मारा. अकसर सुबह की क्लास में से वे गायब हो जाते थे.

सुंदर कहते हैं कि कालेज में पढ़ाई के दौरान ऐसा करना सही लगता था, लेकिन जीवन में कुछ बनना है. इस ध्येय को सामने रखते हुए उन्होंने मेहनत में कोई कमी नहीं आने दी. सुंदर को हिंदी नहीं आती थी, लेकिन स्कूल में हिंदी के बारे में जो कुछ सीखा था, उस से काम चलाने की कोशिश की, जिस में एकाध बार कुछ गड़बड़ी भी हो गई. जैसे, कालेज में अगर साथी छात्र मजे में एकदूसरे को बुलाने के लिए ‘अबे…’ कह कर गाली देते थे, तो सुंदर को लगता था कि यह एक तरह का संबोधन है.

एक बार खुद सुंदर ने इस का इस्तेमाल किया. एक बार कालेज मेस में अपने जानकार को जाते हुए देखा, तो उसे बुलाने के लिए आवाज लगाई ‘अबे…’ बाद में उन्हें पता चला कि यह तो गाली है. इस से वहां बैठे लोग बुरा मान गए और कुछ देर के लिए मैस बंद कर दिया गया.

कालेज मेस में खाने को ले कर सुंदर से जो मजेदार सवालजवाब किए जाते थे, उन में से खुद सुंदर को एक काफी पसंद आता था. यारदोस्त वहां अकसर सुंदर से पूछते थे. ‘बताओ, यह दाल है या सांबर,’ सुंदर कभी इस का सही उत्तर नहीं दे पाते थे.

आसान नहीं था गर्लफ्रैंड से मिलना

सुंदर पिचाई अपनी पत्नी यानी अंजलि से आईआईटी खड़गपुर में ही मिले थे. अंजलि वहीं की छात्रा थीं, पर अंजलि से मिलना आसान नहीं था. तब घर पर कंप्यूटर नहीं था और स्मार्टफोन भी नहीं होते थे. अंजलि आईआईटी के गर्ल्स होस्टल में रहती थी, लेकिन उस से मिलने के लिए होस्टल में जा कर वहां तैनात कर्मचारी से मिन्नतें करनी पड़ती थीं.

वह कर्मचारी तेज आवाज में पुकारता था, ‘अंजलि, आप से मिलने सुंदर आया है.’

यह आवाज सुन कर हरकोई जान जाता था कि कौन किस से मिलने आया है. उस समय इस से बड़ी झिझक होती थी. आईआईटी खड़गपुर के छात्रों को यह किस्सा सुनाते हुए सुंदर ने कहा था कि आज के मोबाइल युग में किसी से दिल की बात कहना कितना आसान हो गया है.

जीवन और कैरियर में सफलता को ले कर भी सुंदर पिचाई का नजरिया बहुत स्पष्ट है. उन का कहना है कि हो सकता है आप कभीकभी फेल भी हो जाएं, पर इस से घबराना नहीं चाहिए. इस के लिए वे खुद गूगल के सहसंस्थापक लैरी पेज का विचार सामने रखते हैं, जो कहा करते हैं कि आप को बड़े काम करने का लक्ष्य रखना चाहिए. ऐसे में यदि आप कभी नाकाम भी हो गए, तो आप कुछ ढंग का सृजित कर पाएंगे जिस से आप काफी कुछ सीखेंगे.                                                  

उत्तरी ध्रुव के अद्भुत दृश्य

गरमियों में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में बसे आइसलैंड, नौर्वे, ग्रीनलैंड, स्वीडन, फिनलैंड, रूस इत्यादि देशों में रात के 12 बजे भी सूर्य अपनी चमक बिखेरता नजर आता है. इसलिए इन देशों को अर्द्धरात्रि के सूर्य वाले देश भी कहा जाता है.

चूंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री झुकी है और इसी झुकाव के साथ जब वह गरमियों में अपनी धुरी पर चक्कर लगाते समय सूर्य की परिक्रमा करती है तब पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा दिनरात सूर्य के सामने ही रहता है जिस से रात 12 बजे भी वहां सूर्य अस्त नहीं होता जबकि सर्दियों में इस के विपरीत होता है. जब पृथ्वी इसी झुकाव के साथ सूर्य से दूसरी ओर अपनी धुरी पर चक्कर लगाते हुए पहुंच जाती है तब पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा दिनरात सूर्य के सामने नहीं रहता, जिस से सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में बसे इन देशों में 6 महीने रात रहती है. इस तरह उत्तरी ध्रुव में वर्ष में एक बार ही सूर्य उगता है और एक बार ही डूबता है. दक्षिणी गोलार्ध में इसी समय ठीक इस के विपरीत होता है.

प्रकृति के इस अद्भुत खेल को देखने की मेरी इच्छा बचपन से ही रही है. कैसा लगता होगा जब रात के 12 बजे भी सूर्य आसमान पर अपनी रोशनी बिखेरे रखता है? मुझे उत्तरी ध्रुव के आखिरी छोर पर बसे इन देशों में जाने का अवसर तो नहीं मिल पाया, लेकिन अभी हाल ही में, गरमियों के मौसम मईजून में मुझे बालटिक समुद्र के किनारे बसे यूरोप के एक देश लिथुआनिआ जाने का अवसर मिला. चूंकि यह देश भी उत्तरी गोलार्ध के अंतर्गत आता है अत: मुझे यहां भी अर्द्धरात्रि के सूर्य के दृश्य के साथसाथ अन्य कईर् अद्भुत दृश्य देखने को मिले. शाम साढ़े 9-10 बजे यहां सूर्य ऐसी धूप ऐसे बिखेर रहा था जैसे भारत में दोपहर 2 ढाई बजे तेज धूप निकली होती है.

एशिया से आने वाले पर्यटक इस चमकती धूप के कारण समय का सही अंदाजा लगाने में उस समय असफल हो जाते हैं, जब उन्हें रात के 10 बजे के बाद यहां के बाजार, रैस्टोरैंट इत्यादि बंद मिलते हैं. इस देश में आबादी बहुत कम होने के कारण शहर से बाहर निकलते ही बड़ेबड़े खेतखलिहान देखने को मिलते हैं. गांवों में तो दूरदूर तक इक्कादुक्का घर ही दिखाईर् देते हैं.

यहां खुले आसमान का आकार उलटी टोकरी के समान गोलाई लिए दिखाई देता है. आसमान धरती के बहुत नजदीक लगता है. दूर, धरती से छूते आसमान के किनारों का यह अद्भुत दृश्य उस समय और भी रोमांचक हो जाता है जब वर्षा के बादलों की काली घटाएं हवा के झोंकों के साथ उमड़तीघुमड़ती एकसाथ आती हैं. तब ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी के किनारों से ही शरारती बादल अठखेलियां करते, पृथ्वी पर ही लोटपोट हो कर उड़ते हुए आ रहे हों.

रात के समय जब आकाश साफ होता है उस समय चांदसितारे इतने चमकीले और नजदीक दिखाई देते हैं जैसे हम उन्हें किसी ऊंची बिल्डिंग की छत से उछल कर आसानी से अपने हाथों से पकड़ सकते हैं.

इस देश में एक अद्भुत दृश्य जो हमें देखने को मिला वह था रात के साढ़े 11 बजे, जब सूर्यास्त हो रहा था तब आधा आसमान अंधेरे की कालिमा से घिरा हुआ था और सामने की ओर अस्त होता सूर्य अपनी लालिमा आसमान पर बिखेरे हुए था.

यही नहीं सुबह 3 बजे से सूर्य फिर से दस्तक देने निकल पड़ा. रात को जिस दिशा में सूर्य अस्त होता दिखाई दिया था, सुबह वहीं कुछ दूरी पर फिर से सूर्य निकल आया.

वास्तव में पृथ्वी की गोलाई उत्तरी गोलार्ध में कम हो जाने के कारण ही ऐसा दृश्य उत्पन्न होता है. लिथुआनिया के एक बड़े शहर क्लाइपेडा से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर एक छोर ऐसा है जहां अगस्त में अद्भुत रंगबिरंगी नार्थन लाइट्स का मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है.

सूर्य से आने वाली गरम हवाएं जब अंतरिक्ष में बिखरे अरबों कणों के साथ घुलमिल कर आगे बढ़ती हैं तब यह दृश्य बनता है. पृथ्वी के चुंबकीय तत्त्व अंतरिक्ष के टुकड़ों, कणों को खुद से दूर फेंकते हैं, लेकिन उत्तरी ध्रुव के पास कुछ जगहों पर ये चुंबकीय क्षेत्र काम नहीं करते, जिस से यह अद्भुत दृश्य बनता है.

मनचाही सुंदरता पाएं

कहा जाता है कि सुंदरता जो कुदरत की देन है, अन्य तरीकों से हासिल नहीं की जा सकती, पर अब यह बात पुरानी हो गई है. साइंस की मदद से ऐसी तकनीक का विकास हो गया है कि अगर कोई चाहे तो मनचाही सुंदरता हासिल कर सकता है.

क्या सुंदरता जरूरी है

इस में संदेह नहीं कि एक सुंदर व्यक्ति किसी भी जगह अपनी उपस्थिति से पहली ही नजर में एक विशेष प्रभाव छोड़ता है.  सुंदरता कई फायदे भी दिला देती है. खासतौर से युवतियां तो सुंदरता के बल पर कई काम दूसरों से करवा लेती हैं. यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति सुंदर और आकर्षक होता है वह पैसे, रुतबे, शिक्षा और सामाजिक स्तर के मामले में दूसरों के मुकाबले काफी आगे होगा.  लिजा स्लेटरी वौकर ने अपने शोध के आधार पर कहा है कि सुंदरता से शिक्षा के क्षेत्र में कई लाभ मिल जाते हैं, जैसे स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर सुंदर दिखने वाले युवकयुवतियों को शिक्षक स्मार्ट और बुद्धिमान मानते हैं और उन्हें अच्छे नंबर दे देते हैं. इस से उन का आत्मविश्वास बढ़ता है और आगे चल कर खुद को साबित करने के ज्यादा मौके मिलते हैं. 

पुरानी है चाहत

पुराने जमाने में भी स्त्रीपुरुष सुंदर दिखना चाहते थे. खासतौर से युवतियां कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक 18वीं सदी में चेहरे पर लगाने के लिए जिस पाउडर का इस्तेमाल करती थीं, उस में भारी मात्रा में गंधक और पारे का प्रयोग किया जाता था. इसी तरह 19वीं सदी की युवतियां व्हेल मछली की हड्डियों से बने जो आभूषण चेहरे पर सजाती थीं, उन से उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती थी, लेकिन सुंदर दिखने के लिए वे यह तकलीफ उठाने को तैयार रहती थीं. इस समय दुनिया में लोग सिर्फ क्रीमपाउडर लगा कर ही सुंदर नहीं हो रहे हैं बल्कि ब्यूटी पार्लर जा कर वे अपने चेहरे और हाथपांव यानी नखशिख तक को आकर्षक बनवाने का प्रयास करते हैं. इसी तरह मेकअप का मतलब अब सिर्फ चेहरे पर क्रीमपाउडर आदि लगाना नहीं रहा बल्कि पहने या लगाए जा सकने वाले ऐसे मैडिकल पौलिमर पैच आदि जैसे तरीके ढूंढ़े जा रहे हैं जिन से चेहरे की कमियों को लंबे समय तक छिपाया जा सके. मेकअप के ऐसे सामान बनाने की कोशिश हो रही है जो न सिर्फ खूबसूरती को तुरंत बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं बल्कि त्वचा के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकते हैं. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि भविष्य में त्वचा की देखभाल करने वाले उत्पादों में पानी की भूमिका और भी बढ़ सकती है. 

दवाएं बनाएंगी सुंदर

आप सुंदर और सैक्सी दिखाई दें, इसलिए अरबों डौलर खर्च कर के दुनिया में कई प्रयोग हो रहे हैं और ऐसी दवाएं व तकनीक खोजी जा रही हैं जो इस काम में मददगार साबित हो सकें. अभी जिस तरह लोग बोटोक्स के इंजैक्शन लगवा कर अपने चेहरे का आकारप्रकार बदलवाते हैं, उसी प्रकार वैज्ञानिक अब अपीरियंस मैडिसिन कहलाने वाली अन्य दवाओं की खोज में जुटे हैं ताकि लोग दवाओं की बहुत सूक्ष्म मात्रा ले कर चेहरे के दोष दूर कर नाकहोंठ जैसे अंग सुधार सकें. वैज्ञानिक भी अपनी प्रयोगशालाओं में आम इंसान की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नुसखे तलाश रहे हैं. त्वचा की कोमलता बनाए रखने, मोटापा कम करने, कमर और पेट की चरबी पिघलाने, बाल उगाने  और अनचाहे बालों को हटाने के लिए नई दवाओं, क्रीमों और लेजर जैसी तकनीक की खोज की जा रही है. हम दिखने में सुंदर लगें, विज्ञान जगत इस के लिए ‘अपीरियंस मैडिसिन’ पर काम कर रहा है. ऐसी दवाओं का उद्देश्य चेहरे की झुर्रियां हटाना या उन्हें आने से रोकना है.

इस के अलावा त्वचा की रंगत सुधारने और होंठों की बनावट में चेहरे की सुंदरता के हिसाब से अंतर लाने वाली दवाओं और इंजैक्शन को अपीरियंस मैडिसिन की श्रेणी में गिना जाता है. कहा जा रहा है कि निकट भविष्य में क्रीमपाउडर से ज्यादा इस्तेमाल अपीरियंस मैडिसिन का होगा. खास बात यह होगी कि ऐसी दवाओं के साइड इफैक्ट्स भी न के बराबर होंगे. ये दवाएं कौन सी होंगी, इस का एक उदाहरण फ्लोरिडा (अमेरिका) के जूपिटर में स्थित स्क्राइप्स रिसर्च इंस्टिट्यूट में वैज्ञानिकों द्वारा एसआर9009 नामक एक ऐसा तत्त्व विकसित करने से मिलता है जो व्यायाम कराने वाले सारे फायदे दिला सकता है. फिलहाल एसआर9009 का परीक्षण चूहों पर किया गया है. पाया गया है कि इस से चूहों की भोजन पचाने की क्षमता बढ़ गई और वे पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय हो गए.

इसी तरह की एक खोज न्यूयौर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी मैडिकल सैंटर में हुई है, जहां एटीएक्स101 नामक एक सिंथैटिक मौलिक्यूल बनाया गया है जो चेहरे की चरबी कम करते हुए लोगों को डबलचिन जैसी समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है. शरीर में पहुंचने पर ये मौलेक्यूल त्वचा के नीचे मौजूद वसा को पिघलाने लगते हैं और उस वसा को शरीर में पहुंचा देते हैं ताकि वह ऊर्जा में बदल कर खत्म हो जाए. इंसानों में इस मौलिक्यूल के इस्तेमाल की भी अभी मंजूरी नहीं मिली है.

डीएनए और स्पेस तकनीक का इस्तेमाल

किसी व्यक्ति के चेहरे पर झुर्रियां न आएं और वह हमेशा जवान दिखे इस के लिए विज्ञान भी कोशिशें कर रहा है. अगर व्यक्ति बूढ़ा नहीं होगा, तो उस की सुंदरता भी बरकरार रह सकती है, इसलिए यह कोशिश डीएनए टैस्टिंग के जरिए की जा रही है. आस्ट्रेलिया में एक नए तरह का स्किन डीएनए टैस्ट विकसित किया गया है, जिस में किसी व्यक्ति के मुंह की लार के माध्यम से उस की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है. इस से यह पता चल सकता है कि किसी व्यक्ति में किस उम्र में जा कर चेहरे पर झुर्रियां पड़ सकती हैं और उस की त्वचा में कब रंग (पिगमैंटेशन) की समस्याएं बढ़ सकती हैं. इन तथ्यों को जान कर वह समय से इन का इलाज कर सकेगा.

भविष्य में डीएनए टैस्टिंग जैसी आधुनिक तकनीक ही लोगों को सुंदर बनाने में मददगार नहीं होगी बल्कि जिस स्पेस टैक्नोलौजी से अभी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जा रहे हैं और बाहरी अंतरिक्ष में खोजबीन का काम हो रहा है, उसी तकनीक से लोगों को सजीलासुंदर बनाने के प्रयास भी हो रहे हैं. जैसे अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा बाह्य अंतरिक्ष में अपने सैटेलाइट्स से अंतरतारकीय धूल कण (स्टेलर डस्ट पार्टिकल्स) पकड़ने के लिए जिस लिपोफिलिप तकनीक का इस्तेमाल करती है, उसी तकनीक के जरिए, ऐसे अनोखे कंघे बनाए जा रहे हैं जो सिर का मैल खींचते हुए बालों की चमक कायम रख सकते हैं और उन के इस्तेमाल से रूखापन नहीं होता. कुछ सौंदर्य विज्ञानी व्यंग्य में कह रहे हैं कि यह खोज चंद्रमा पर इंसान के कदम पड़ने जितनी क्रांतिकारी नहीं है, लेकिन आम इंसान भी चंद्रमा जितना चमकदार कहां होता है.

मशीन का सहारा ले कर बनें आकर्षक

सुंदरता में चारचांद लगाने का काम ब्यूटी पार्लर में इंसान ही क्यों करे? अच्छा हो कि यह काम मशीनों के हवाले कर दिया जाए जिस से व्यक्ति जब चाहे, मशीन से खुद को सुंदर बनाने का आकलन करवा सके और फिर उस के मुताबिक सुधार करवा सके. इसी नजरिए से सऊदी अरब की तेल अवीव यूनिवर्सिटी के डेनियल कोहेन और उन की टीम ने एक ब्यूटी मशीन बनाई है, जो किसी व्यक्ति के चेहरे की नापतोल कर के बता सकती है कि उस के चेहरे में क्याक्या सुधार किए जाएं जिस से वह सुंदर दिख सके. यह मशीन बनाने के लिए कोहेन ने इसराईली और जरमन लोगों के चेहरों का मिलान करते हुए 93 तरह के चेहरे बनाए. इन चेहरों की खूबियों को दर्ज करते हुए आकर्षण के बुनियादी सिद्धांत बनाए गए ताकि बेहतर और सुंदर चेहरों की एक निश्चित पहचान बनाई जा सके. मशीन से चेहरे में किए जाने वाले सुधारों की जानकारी ले कर प्लास्टिक सर्जन वैसे ही बदलाव सर्जरी के माध्यम से कर सकते हैं और कोई भी व्यक्ति सुंदर दिख सकता है.

घर में ऐबौर्शन

सीमा के पिता रेलवे में नौकरी करते थे, सो वे ज्यादातर दौरे पर रहते थे. सीमा की मां सारा दिन कालोनी में यहांवहां घूमती रहती थीं. सीमा घर पर होती तो उस की मां का रिश्तेदार चंदू आ जाता. चंदू तबीयत से दिलफेंक मिजाज का था और इस की वजह से उस की बीवी उसे छोड़ चुकी थी. वह प्राय: इधरउधर लड़कियों के पीछे घूमता रहता. सीमा की मां के लिए शहर से उपहार लाता तो वे खुश हो जातीं. एक दिन वह सीमा को शहर घुमाने के बहाने ले गया और उसे बहलाफुसला कर उस से संबंध बना लिए. सीमा को जब तक कुछ समझ में आता, उसे अनचाहा गर्भ ठहर चुका था.

अब चूंकि चंदू तो मतलब साध कर निकल गया, लेकिन जैसेजैसे सीमा पर दिन चढ़े तो उन की पड़ोसिन को संदेह हुआ. गांव में रहने के कारण मामला गंभीर था. अगर किसी को भनक लग गई तो पूरे गांव में बदनामी हो जाएगी. अब सीमा की मां को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें? क्योंकि 3-4 माह का गर्भ हो चुका था. यदि वे पति को बतातीं तो पति तो उन्हें ही बदचलन कह कर छोड़ देता. सीमा की मां अपनी पड़ोसिन के साथ पास के गांव की दाई रजिया के पास गई. रजिया ने यह काम आसानी से करने का भरोसा दिलाया और बतौर मेहताना मोटी रकम मांगी. वक्त तय हुआ रात 12 बजे का. सीमा के पिता नाइट ड्यूटी पर चले गए तब रजिया व पड़ोसिन सीमा के घर आए. उस ने सीमा को लिटाया. बिना किसी दवा व इंजैक्शन के रजिया ने सीमा की योनि से उस के गर्भ में एक कमची जैसी पतली लकड़ी डाली, जैसे हरे बांस की छड़ी होती है. उस पतली लकड़ी के भीतर डाले जाने से सीमा चीखने लगी. वह असहाय दर्द से बिलबिला उठी तो रजिया ने कहा कि उस का हाथ पकड़ कर रखो साथ ही मुंह भी दबा दो.

रजिया ने लकड़ी को गर्भाशय में आघात से चलाना शुरू किया व उस की मां व पड़ोसिन ने सीमा के हाथ कस कर पकड़े रखे और मुंह भी कपड़े से बांध दिया ताकि वह चीख न सके. लकड़ी के तेज आघात से सीमा का गर्भाशय क्षतविक्षत हो गया और जब ब्लीडिंग होने लगी तो सीमा की मां घबरा गई. रजिया बोली, ‘‘गर्भ गिर गया है. सुबह तक होश आ जाएगा.’’ वह पैसे ले कर चली गई. लेकिन न तो ब्लीडिंग रुकी और न ही सीमा होश में आई. वह असहनीय पीड़ा से तड़पतड़प कर प्राण गवां चुकी थी. सीमा की मां को सुबह पता चला कि सीमा का प्राणांत हो चुका है. कमरा सीमा के खून से भर चुका था. पुलिस ने जांच की तो रजिया की करतूत पता चली. सीमा की मां की रंगीनमिजाजी उस की बेटी को लील गई. इतना ही नहीं, चंदू की ऐयाशी अभी भी जारी रही क्योंकि वह पकड़ से दूर जा चुका था.

होली में ‘दीवाली’ का मजा लेंगे नेता

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव अब खत्म हो चुके हैं. नेताओं को चुनाव परिणाम का इंतजार है. 11 मार्च को मतगणना का काम होगा. 11 मार्च की दोपहर तक मतगणना से यह पता चल जायेगा कि किस पार्टी में कितना दम है? जीत का मजा लेने वाले नेता होली में ‘दीवाली’ का मजा लेंगे. उसके बाद होली के रंग खेलेंगे. हारने वाले नेताओं की होली फीकी होगी. उनके लिये होली का मजा नहीं रह जायेगा. नेताओं से अधिक उनके समर्थकों में जोश है. हर तरह होली में ‘दीवाली’ मनाने की तैयारी चल रही है. नेता और उनके समर्थक पूरी तरह से दीवाली मनाने की तैयारी में पहले ही पटाखे और फुलझडी खरीद रहे हैं. नेताओं का दावा है कि 11 मार्च को पहले जीत की खुशी में ‘दीवाली’ मनाई जायेगी इसके बाद होली का रंग और फाग खेला जायेगा. गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश में से सबसे अधिक कड़ा मुकाबला उत्तर प्रदेश में था. यहा 7 चरणों में चले चुनाव ने नेताओं को थका दिया. प्रदेश में एक माह से अधिक केवल चुनाव ही हुआ. बाकी जरूरी काम टाल दिये गये थे. तहसील और थाने तक सूने पड़ गये. चुनाव किसी रोजगार सरीखा दिखने लगा था. चुनाव प्रचार का यह हाल था कि बड़े नेताओं के उतरने से लग ही नहीं रहा था कि यह विधानसभा के चुनाव हैं. राहुल गांधी-अखिलेश यादव को जवाब देने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पूरी कैबिनेट प्रचार में उतार दी थी.

करोडों खर्च करने के बाद भी नेताओं को अपनी जीत का भरोसा नहीं हुआ. चुनाव के प्रचार से लेकर मतगणना के बीच के समय में वह लोग पूजा पाठ से लेकर तंत्रमंत्र तक का सहारा लेने लगे. चुनाव प्रचार के समय मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, मजार, सभी जगह माथा टेकते यह लोग देखे गये. चुनाव के बाद बहुत सारे नेता पंडितों और ज्योतिषयों के चक्कर लगाते देखे गये. कई लोगों ने तो गुप्त स्थानों पर विशेष पूजा अभियान भी शुरू कर रखा है. मीडिया और दूसरों की नजर से बचने के लिये यह लोग बहुत ही गोपनीय तरीके से पूजा करा रहे हैं. कई बड़े नेताओं के समर्थक तो अपने नेता की जीत के लिये उसके कपडे रखकर तंत्रमंत्र करने में लगे हैं. तंत्रमंत्र और ऐसी पूजा करने वाले के पौ बारह हो रहे हैं. इनको पता है कि अगर इनके कहे अनुसार नेता जीत गया तो आने वाले पूरे 5 साल इनकी चांदी रहेगी. अपने नेता से मनचाहा काम करा सकेंगे. चुनाव के समय से लेकर मतगणना तक कई नेताओं के हाथ में पहने जाने वाली अंगूठियों की संख्या में इजाफा हो गया. कुछ के गले में लाकेट बढ गया तो कुछ नेताओं ने रत्न लगा ब्रेसलेट पहन लिया.

विधायक का चुनाव लड़ रहे एक नेता जी तो चुनाव में पर्चा दाखिल करने से लेकर अब तक हर दिन के रंग के हिसाब से कपड़े अपने साथ रखने लगे. जिस दिन के रंग के हिसाब से वह कपड़े नहीं पहन पाते उस दिन के रंग का रूमाल उनकी जेब में आ गया. एक नेता जी को पंडित ने बताया कि प्रचार भर अपने बाल मत कटाना तो वह पूरे महीने बाल कटवाने नहीं गये. कई नेताओं की पत्नियों ने अपने पति की जीत के लिये व्रत रखा. मजे की बात यह है कि इसमें कई दलित नेता भी शामिल हैं जो पूजा का विरोध करते हैं. देखने वाली बात यह है कि जीत किसके पक्ष में रहती है. जिसके पक्ष में जीत होगी उसका पुजारी खुलकर बतायेगा और जो हारेगा उसका पुजारी मौन व्रत रख लेगा.

क्या खास है सोनाक्षी सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘नूर’ में

यूं तो सोनाक्षी सिन्हा को अपने फिल्मी करियर में बहुत अच्छी फिल्में मिलीं हैं और उनकी अगली आने वाली फिल्म ‘नूर’ की पहली झलक भी कुछ समय पहले देखने को मिली थी और ये पहली नजर भी काफी दिलचस्प थी. यहां हम आपको सोनाक्षी सिन्हा की नूर के बारे में कुछ तथ्यों से अवगत कराना चाहते हैं.

1. फिल्म ‘नूर’ बेस्टसेलर उपन्यास “कराची तुम मुझे मार रहे हो” पर आधारित है. यह पुस्तक पाकिस्तानी पत्रकार और लेखक सबा इम्तियाज द्वारा लिखा गया एक कॉमेडी और अपराध-थ्रिलर उपन्यास है. यह कहानी कराची में रहने वाली एक 20 वर्षीय रिपोर्टर जिसका नाम आयशा खान है, के इर्द-गिर्द घूमती है. कहा जा सकता है कि यह उपन्यास दुस्साहस और एक अच्छा प्रेमी की खोज के बारे में है.

2. उपन्यास की लेखक सबा इम्तियाज एक पाकिस्तानी लेखक, पत्रकार, संगीत आलोचक और कराची से ही पटकथा लेखक भी हैं. अपने अतीत में इन्होंने ‘द न्यूज इंटरनेशनल और ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ के लिए काम किया था. वर्तमान में सबा ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’, ‘द गार्जियन और ‘द ख्रिश्चन साइंस मॉनिटर’ के लिए लिखती हैं. सबा इम्तियाज का उपन्यास ‘कराची, तुम मुझे मार रहे हो!’ 1 फरवरी 2014 में प्रकाशित हुआ था. साल 2015 में उन्होंने उन्होंने फिल्म ‘देख मगर प्यार से’ भी लिखी.

3.फिल्म ‘नूर’ में सोनाक्षी सिन्हा ने कराची में रहने वाले 20 वर्षीय पत्रकार आयशा खान की शीर्ष भूमिका निभाई है. यह फिल्म 21 अप्रैल 2017 को सिनेमाघरों में आ रही है. यह फिल्म पाकिस्तानी पत्रकार लेखक नूर के दुस्साहसी होने और उनके जीवन को प्यार करने को दर्शाती है. वे अपने जीवन की सफलताओं का अपना रास्ता मुंबई के माध्यम से तलाशती हैं.

4. पाकिस्तान के कराची में पैदा हुए भारतीय फिल्मकार रमेश सिप्पी के भतीजे सुनील सिप्पी इस फिल्म के निर्देशक हैं. उम्मीद है कि 16 साल पहले से विज्ञापन बनाने में व्यस्त रहने वाले सुनील, अब नूर के साथ निर्देशन में एक अच्छी वापसी करेंगे और अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह वापसी कहां तक सफल रहेगी.

5. सोनाक्षी के अलावा फिल्म में एक दिलचस्प स्टार कास्ट भी हैं प्रसिद्ध कलाकार यौबेर और हास्य अभिनेता कनान गिल साद सहगल की भूमिका में अपनी शुरुआत करने जा रहा हैं. इनके अलावा इस फिल्म में हम अदाकारा शिबानी दांडेकर को जरा पटेल और अभिनेता पूरब कोहली को आयन बेनर्जी के रूप में देखेंगे.

उम्मीद है कि फिल्म ‘नूर’ निश्चित रूप से दिलचस्प होगी. फिल्म की झलक में सोनाक्षी भी बेहद खूबसूरत और युवा नजर आ रही हैं.

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