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Social Media : इंफ्लुएंसर्स का मुफ्त ज्ञान 

Social Media :  इंफ्लुएंसर्स आजकल नाचगाना, फालतू के स्टंट के रील्स बना व उन्हें सोशल मीडिया पर डालडाल कर आम लोगों को इस तरह हिप्टोनाइज कर चुके हैं कि अब सही और गलत की पहचान के लिए स्क्रीन पर दिखने वाला ही परफैक्ट लगता है. सोशल मीडिया पर इंस्टाग्राम, फेसबुक रील्स, व्हाट्सऐप रील्स, यूट्यूब कार्टून इतने हावी हो गए हैं कि देखने वालों की रैशनल कैपेसिटी ही खत्म हो गई है.

अब फाइनैंशियल ज्ञान

इस का फायदा इंफ्लुएंसर्स उठा ही रहे हैं, लोगों को फालतू की चीजें बेच कर, फालतू की जगहों पर ले जा कर, फालतू का बेकार का खाना खिला कर उन्हें वे लूटे जाने के लिए भी तैयार कर लेते हैं. जैसे धर्मवाले चमत्कारों की, भावनाओं की कहानियां सुनासुना कर उत्तेजित कर लेते हैं कि भक्तों को आज भी भगवान गड़ा हुआ सोना दिलवा सकते हैं, मनचाही लडक़ी कदमों में ला पटक सकते है, वैसे ही अब कुछ इंफ्लुएंसर्स अपने भक्तों/फौलोअरों के साथ कर रहे हैं.
ये इंफ्लुएंसर्स अब फाइनैंशियल ज्ञान भी मुफ्त में बांट रहे हैं. ये शेयर बाजार की बारीकियां भी बता रहे हैं. बैंक की 7-8 फीसदी की एफडी के चक्कर में न पड़ो, स्टौक मार्केट में जाओ, 15 से 20 फीसदी रिटर्न मिलना पक्का है. आईपीओ में इनवैस्ट करो, 30-40 फीसदी लाभ मिल सकता है. डिजिटल कौयन में लगाओ, 10 वर्षों में 20 हजार गुना तक कमा सकते हो.
भरोसा न हो तो व्हाट्सऐप ग्रुप में जुड़ो, लोगों के बैंकों के खातों पर नजर डालो. कैसे पैसे मिलते नहीं, टपकते हैं. स्क्रीन कह रही है, तो सही ही होगा. वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल में लिखा है तो सही ही है न, तो हमारी बात भी मान लो. स्क्रीन गलत नहीं होती. और फिर, आप स्क्रीन के अलावा कुछ पढ़तेलिखते तो हो ही नहीं कि आप को कहीं और से ज्ञान मिलेगा.

100 करोड़ से ज्‍यादा की ठगी

एक चीनी नागरिक फैंग चेनजिन तक ने इस गोरखधंधे में हाथ डाला और 100 करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए. उसे एक शिकायत पर गिरफ्तार किया गया. शिकायत करने वाला इंटैलिजैंट पंडित सुरेश कोलिचियिल अचुथन एक कंपनी में अकाउंटैंट है और वह सोशल मीडिया खंगालता रहता था ताकि कहीं से एक के चार करने का फार्मूला स्क्रीन से बाहर निकल आए.
एक व्हाट्सऐप ग्रुप का इनवाइट आया कि ‘इस में जुड़ें और लाखों कमाएं.’ अकाउंट जानने वाले पर चमत्कारों के इंफ्लूएंसों में गले तक डूबे साहब ने थोड़े से पैसे लगाए. जब वे पैसे एक ऐप में दोगुने, चारगुने होने लगे तो उन्होंने 43.50 लाख रुपए तक जमा कर डाले. ऐप उस समय उस के खाते में 2.20 करोड़ रुपए का बैलेंस दिखा रहा था. वाह, क्या चमत्कार है!
बंद दिमाग वाले पंडित सुरेश कोलिचियिल अचुथन को समझ नहीं आया कि इतना पैसा किस ने, कैसे कमा कर उसे बैठेबिठाए दे दिया होगा. इस में से थोड़ा सा पैसा निकालना चाहा तो ऐप कहने लगा कि कुछ और जमा कराओ तो ही निकाल सकते हो. तब इंफ्लुएंसर्स के विक्टिम्स रोतेधोते पुलिस स्टेशन गए. पुलिस ने फेंग चेनजिन को पकड़ लिया है पर दोषी वही ही है, यह बाद में पता चलेगा, चारपांच साल बाद. तब तक मामला ठंडा पड़ जाएगा. 100 करोड़ रुपए जमा करने वाले ऊपर वाले की स्क्रीन की मरजी के आगे घुटने टेक चुके होंगे.

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का सुपरग्रेजुएट

यह नौटंकी हर स्क्रीन पर चल रही है. कई लोग इसे हलके में लेते हैं, कई लोग इस में कही गई बातों को मान लेते हैं. पर जो देख रहा है, लगातार देख रहा है, वह फंस रहा है. वह क्योरियस ही नहीं है, वह स्क्रीनभक्त है. अंधभक्त है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का सुपरग्रेजुएट है. आयुर्वेद, होम्योपैथी, नैचुरोपैथी, हिप्टोनिज्म, डांस, स्लैंग, बुलडोजर सब का दीवाना है. उस में रत्तीभर एनालिटिकल पौवर नहीं है. वह तो कंपलेंट तक नहीं लिख सकता. सोशल मीडिया पर सुन और देख कर वह सिर्फ शिकायत के वीडियो या औडियो बना सकता है. इस चक्कर में जहां भी ब्रिकमोर्टार बिल्डिंग में काम कर रहा है, वहां की कमाई को गंवा रहा है. जय हो इस सोशल मीडिया की.

 

Wedding Shoot : शादी की फोटोग्राफी पर बेवजह मोटा खर्च

Wedding Shoot :  शादियों में वैडिंग फोटोग्राफी एक बड़े खर्च के रूप में बदल चुकी है. शादी के बाद वीडियो और फोटो कपल्स के किस काम के हैं.

वैडिंग फोटोग्राफी टैक्नोलौजी से जुड़ा विषय है. समय के साथ टैक्नोलौजी बदल रही है. 50 साल पहले के फोटोज आज कितने कपल्स के पास सुरक्षित होंगे?
30 साल पहले कलर फोटोग्राफी आई और शादी के कलर फोटो और वीडियो के कैसेट बनने लगे थे. जो वीसीआर यानी वीडियो कैसेट रिकौर्डर के जरिए टीवी पर देखे जाते थे. आज अगर वीडियो कैसेट है तो वीसीआर कितने कपल्स के पास है. फोटो एलबम प्लास्टिक वाले होते थे, जिन में सीलन से उस समय के फोटो खराब हो चुके होंगे. वीडियो कैसेट के बाद शादी के वीडियो सीडी यानी कम्पैट डिस्क में ली जाने लगी. यह सीडी कंप्यूटर, लैपटौप पर चलती थी. आज के दौर में इस की जगह भी खत्म हो गई है.

चुनौती मोबाइल से

अब पीडी यानी पेन ड्राइव का जमाना है. इस को टीवी, कंप्यूटर, लैपटौप और प्रोजैक्टर किसी भी रूप में देखा जा सकता है. अब फोटो और वीडियो को सब से बड़ी चुनौती मोबाइल से मिल रही है. वैडिंग फोटोग्राफर जहां कईकई महीने के बाद फोटो और वीडियो देता है वहीं मोबाइल से चटपट फोटो और वीडियो को क्लिक कर के सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जाता है. किसी भी फोटो के सोशल मीडिया पर अपलोड होते ही उस की कीमत खत्म हो जाती है. पिछले 30 सालों में टैक्नोलौजी तेजी से बदली है. बदलते दौर में चीजें तेजी से पुरानी होने लगी हैं.

ऐसे में आने वाले 20-30 सालों में आज के वीडियोज और फोटोज किस टैक्नोलौजी में होगे इस का अभी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इन को उस समय देखना सरल होगा भी या नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता. 30 साल पहले सोशल मीडिया नहीं था. उस समय किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इतनी तेजी से वीडियो और फोटो वायरल हो सकते हैं. फोटो और वीडियो को संरक्षित करना सरल नहीं है. पेपर वाले फोटो एलबम अब लैमिनेशन फोटो एलबम में बदल चुके हैं. जिन में चुनी गई 2-3 सौ फोटो लगी होती हैं. इन को न हटाया जा सकता है न एलबम में नई फोटो रखी जा सकती है.

पैकेज 70-80 हजार से ले कर 4 से 5 लाख तक

इस के बाद भी वैडिंग फोटो और वीडियो पर खर्च बढ़ गया है. 30 साल पहले सामान्य शादी में जितना खर्च होता था आज उतना वीडियो और फोटो पर खर्च होता है. लड़का और लड़की दोनों की तरफ से यह वीडियो और फोटोग्राफर रखे जाते हैं. जिस का अर्थ है कि खर्च डबल होता है. शादी की ज्यादातर रस्में लड़कालड़की की एक साथ होती है. ऐसे में दोहरे खर्च की जरूरत क्यों हैं ?

यह सोचने वाली बात है. वीडियो और फोटोग्राफर की एक टीम के साथ 5-6 लोग होते हैं. इन की पैकेज 70-80 हजार से ले कर 4 से 5 लाख तक होता है. यह कीमत शहर, फोटोग्राफर की खासियत पर निर्भर करती है. फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर के साथ ही साथ ट्रौली कैमरा और ड्रोन कैमरा भी जरूरी होता है. ट्रौली कैमरा शादी के इवेंट्स को वहां लगी एलईडी में तत्काल डिस्प्ले करता है. जिस से जो लोग दूसरी जगह पर है वह भी देख सके कि शादी के मुख्य आयोजन में क्या हो रहा है? ड्रोन कैमरा के जरिए वहां से फोटो लिए जाते हैं जहां मैनुअल कैमरा नहीं पहुंच पाता है. इन सब की अपनी कीमत होती है. जो पूरे पैकेज को मंहगा बनाती है.

किस तरह के कैमरा होते हैं इस्तेमाल

शादी की फोटोग्राफी के लिए ज्यादातर फोटोग्राफर डीएसएलआर कैमरे का इस्तेमाल करते हैं. प्रोफैशनल फोटोग्राफर डीएसएलआर या मिररलेस कैमरे का इस्तेमाल करते हैं. कैमरे के रूप में फोटोग्राफर सब से ज्यादा निकोन जेड6 का प्रयोग करते हैं. इस के अलावा पेनटेक्स के. 1000 मौडल का कैमरा भी बेहतर परिणाम देता है. यह एक मैनुअल फिल्म कैमरा है. ज्यादातर फोटोग्राफर इस से भी फोटो खींचना पसंद करते हैं.
इस के बाद कैनन ईएफ85एमएम है. इस का लेंस पोट्रेट शूट करने के लिए अच्छा माना जाता है. पेनटेक्स के70 कैमरा 24एमपी बेहतर मेगापिक्सेल के साथ आता है. फोटोग्राफर मानते हैं कि इस की बौडी बेहतर है. हर मौसम में अच्छा काम करती है. शादी की फोटोग्राफी के लिए फोटोग्राफर प्राइम और जूम लेंस दोनों का इस्तेमाल करते हैं. यह जूम लेंस भी अलगअलग तरह के होते हैं. एक फोटोग्राफर के पास 4 से 5 लाख का इंवेस्टमेंट होता है. कैमरे और लेंस के अलावा भी कई उपकरण का प्रयोग किया जाता है. इस के बाद वीडियोग्राफर का सेटअप अलग होता है. जिस का मतलब यह है कि जो वैडिंग शूट का पैकेज लेता है उस का इंवेस्टमेंट भी 5 से 10 लाख का होता है. जो सहायक कैमरा और वीडियो शूट करते हैं वह भी पैसा लेते हैं. फोटो और वीडियो एडिट करना भी कठिन काम होता है. हजारों वीडियो और फोटो में चुनी हुई 300 फोटो का एलबम प्रिंट कर के मिलता है. वीडियो और बाकी फोटो पेनड्राइव में कर के फोटोग्राफर देता है. सोशल मीडिया के लिए अलग से फोटो और वीडियो का ट्रेंड है. इस के लिए 2 से 3 मिनट की ट्रीजर यानी छोटी फिल्म बनाई जाती हैं.

मंहगी क्यों है फोटोग्राफी ?

वैडिंग फोटोग्राफर सूर्या गुप्ता बताते हैं, “हर साल वीडियो और फोटोग्राफी के उपकरण की टैक्नोलौजी बदल जाती है. ग्राहक यह चाहता है कि उस के यहां शूट में अच्छे वीडियो और कैमरे उपयोग में लाए जाएं. अधिकतर लोग टोकन मनी दे कर काम करा लेते हैं.
जब उन को पूरा पेमेंट देना होता है तो वह तमाम तरह के बहाने बनाते हैं. सब से बड़ा बहाना यह होता है कि फोटो और वीडियो में वह बात नहीं आई है जो आनी चाहिए. कई बार दुलहन शिकायत करती है मैं फोटो में सुदंर नहीं दिख रही हूं. कोई मोटी दिखती है तो कोई काली दिखने लगती है. इस का मकसद केवल फोटोग्राफर के पैसे काटने का होता है. वह कटौती कर के ही पैसा लंबा समय लगाने के बाद देते हैं.”

वैडिंग फोटोग्राफी का काम शादी के पहले से शुरू हो जाता है. प्रीवैडिंग शूट के अलावा हल्दी, रिंगसिरेमनी, लेडिज संगीत और भी कई इवेंट में होता है. ऐसे में केवल एक कैमरामैन और वीडियोग्राफर से काम नहीं चलता है. पूरी टीम काम करती है. सब के पास अलग कैमरा और वीडियो होते हैं. ऐसे में खर्च बढ़ जाता है.
एक अच्छा वैडिंग फोटोग्राफर विवाह के किसी रस्म को छोड़ना नहीं चाहता है. वह ग्राहक को यह मौका नहीं देना चाहता कि ग्राहक यह कह सके कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति छूट गया है. वैडिंग फोटोग्राफर एक तरह का छोटामोटा फिल्म डायरेक्टर सा हो जाता है. जो शादी की पूरी फिल्म ही बना देता है.

यह बात और है कि इस फिल्म को कोई दोबारा देखता नहीं है. शादी के 20-30 साल के बाद वीडियो और फोटो किस टैक्नोलौजी के रूप में मौजूद होंगे यह आज पता नहीं है. ऐेसे में यह वीडियो और फोटो कितने उपयोगी है यह भी कुछ कहा नहीं जा सकता है.
आज के दौर में जहां शादियों की ही गारंटी वहां यह वीडियो और फोटो सुकून के लिए नहीं कोर्ट में गवाह के रूप में ही पेश किए जाते हैं. ऐसे में इस खर्च को सीमित तरह से ही करना चाहिए. शादी में बहुत सारे खर्च केवल दिखावे के लिए होते हैं. जिस के पास जैसा बजट होता है वह खर्च करता है. बेहतर हो कि खर्च से अधिक ध्यान आपसी प्रेम और सांमजस्य पर दिया जाए. जिस के सहारे जिदंगी की गाड़ी आगे चलती है.

Generation Z : Dark Comedy की नई सनसनी समय रैना

Generation Z : समय रैना इस समय भारत के टौप कौमेडियन में से एक है. अपने वन लाइनर ह्युमारिस्टिक पंच ने उसे यूथ आइकन बना दिया है. हालांकि कभीकभी वह ओवर द टौप हो जाता है जो उस के पोडकास्टर जोए रीगन जैसा होने का आभास कराती है.

‘इंडियाज गोट लैटेन्ट’ यूट्यूब में ऐसा हिट शो बन गया है जिस की चर्चाएं आजकल हर जगह हैं. यह चर्चाएं इसलिए हैं क्योंकि इस का कांसेप्ट डार्क कौमेडी पर बेस्ड है और इस का होस्ट कौमडियन समय रैना है. समय रैना जो अपने वन लाइनर पंचेज, कंट्रोवेर्सीज, चैस गेम स्किल्स, स्टैंडअप के लिए मशहूर है. वह जो बोलता है उस के गहरे मतलब होते हैं, जो उस की बातें नहीं समझ पाता वो अपना माथा धुनता है और जो समझ जाता है वो खिलखिला जाता है और दंग रह जाता है.

कम उम्र में ऊंचा मुकाम

समय रैना 26 साल का है मगर इतनी छोटी उम्र में उस ने वो ऊंचाई हासिल कर ली है जिस के लिए सालों लग जाते हैं. कश्मीरी स्टैंडअप कौमेडियन जो कईयों के लिए सवाल बना हुआ है कि उस का माइंडसेट किस तरह काम करता है और उसे हर चीजें डार्क में कहने की आदत क्यों है? दूसरा यह कि वह सीरियस बातों को ह्यूमर के साथ नौन सीरियस तरीके से कैसे कह सकता है? साथ ही डार्क कौमेडी का ट्रेंड आजकल भारत में क्यों बढ़ रहा है?

एक समय था जब सेंसिटिव टौपिक्स को सेंसिटिवली हैंडल करने की बात कही जाती थी. जब कोई अपनी सीरियस बात बताता था तो मिनिमम अंडरस्टैंडिंग यह होती थी कि कोई उस समय उस का या उस बात का मजाक न बनाए लेकिन डार्क कौमेडी इसी बात पर आधारित है कि सेंसिटिव बातों को भी ह्यूमर के साथ मजाकिया अंदाज में कही जाए. दुखी माहौल में एक वन लाइनर आती है माहौल को खुशनुमा हो जाता है.

Generation Z में डार्क कौमेडी का ट्रेंड

डार्क कौमेडी का चलन भारत में बढ़ रहा है. जेनजी मिलेनियल्स इसे फन की तरह देखते हैं. यह शुरू तो अमेरिका से हुआ जहां स्कूलों में हो रही मास शूटिंग, रेसिज्म, धर्म और अमीरीगरीबी पर जम कर जोक बनते रहे पर अब 2-3 सालों से भारत में भी चलन में है और कास्टिज्म, चाइल्ड लेबर, वीमेन एट्रोसिटी, रेप, डोमेस्टिक वायलेंस, डेथ, मेंटल हेल्थ जैसे सेंसिटिव विषयों पर भी ह्यूमर और कौमेडी होती है.

यह एक तरह का सर्काज्म, सिनिसिज्म और ह्यूमर का मेल है. कईयों को कौमेडी का यह जौनर इंसेंसिटिव लगता है और इसे औफ लिमिट बताते हैं, जिस की कोई हद नहीं. पर कई ऐसे हैं जो इसे पोजिटिव तरीके से लेते हैं. वे मानते हैं कि डार्क ह्यूमर के चलते गंभीर मुद्दे यूथ के डिस्कसन में आते हैं.

समय रैना उस लिस्ट में है जिस ने इस विधा को पोजिटिवली लिया है. वह खुद को सेक्युलर बताता है. उस का जन्म जम्मू के एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ और उसे पलायन की मार झेलनी पड़ी. उस ने अपनी पढ़ाई हैदराबाद में की और आगे जा कर प्रिंटिंग इंजीयनियरिंग की, जिस चलते उसे बड़ी शोहरत मिली. उस का शुरूआती स्टैंडअप कौमेडी प्रिंटिंग इंजीयनियरिंग के अपने कोर्स पर ही थी जिस ने उसे चर्चाओं में ला दिया. इस के बाद ‘नरक’, ‘रोस्ट बैटल’ और कौमेडी व्लोग से उसे काफी पहचान मिली.

‘इंडियाज गोट लैटेंट’ शो का कमाल

इस समय रैना कौमेडी में डोमिनेट कर रहा है, यहां तक कि व्यूज के मामले में वह कपिल शर्मा को भी पीछे छोड़ चुका है. इस कारण उस डार्क ह्यूमर कौमेडी का होना है. उस के यूट्यूब पर ‘इंडियाज गोट लैटेंट’ शो के 11 एपिसोड आ चुके हैं और हर एपिसोड में लगभग ढाई करोड़ से अधिक व्यूज हैं. हालांकि यह शो भी अमेरिकन यूट्यूब शो ‘किल टोनी’ से कौपी किया गया है पर आज की डेट में समय का शो ‘किल टोनी’ से काफी आगे है.

डार्क ह्यूमर कोई नई विधा नहीं है. यह एक खास तरह की कौमेडी स्टाइल है, जो अब समय रैना के ‘इंडियाज गोट लैटेंट’ शो के चलते मेनस्ट्रीम में आ गई है. यह शो जो पोइंटलैस है, अपने सटायर और ह्यूमर के चलते बताता है कि दुनिया में सब फनी हो सकता है.

ऐसा नहीं कि कौमेडियन ने इसे फेमस किया, इस से पहले भी कई फिल्में आई हैं जो डार्क कौमेडी पर बेस्ड रहीं. भारत में बनीं ‘कलाकांडी’, ‘अंधाधुंध’, ‘देव डी’, ‘सुपर डीलक्स’, ‘भेजा फ्राई’ जैसी हिंदी फिल्में तो हैं ही पर टिपिकल डार्क ह्यूमर movi फिल्म हौलीवुड में बनती रहीं जैसे ‘द डिक्टेटर’, ‘फ़र्गो’, ‘फाइट क्लब’, ‘बोरात’ इत्यादि.

मशहूर डार्क कौमेडियन पीट और एंथनी

मौजूदा समय में अमेरिका में एंथनी जेसलनिक और पीट डेविडसन वे डार्क कौमेडियन हैं जो ऐसा कुछ करते हैं, जैसा भारत में समय रैना करते हैं. इन्हें लोग खूब देखते हैं. लेकिन चीजें सिर्फ डार्क और लाइट नहीं होतीं, कुछ ओरेंज और हरी भी होती हैं. प्रोब्लम तब आती है जब लोग डार्क ह्यूमर का इस्तेमाल गलत चीजों को छिपाने के लिए करते हैं. मानिए किसी अपर कास्ट लड़के को लोअर कास्ट लड़के से दिक्कत है. वह उस पर कास्टिस्ट तंज मारता है इस बहाने से कि यह डार्क ह्यूमर था और सब लोग ठहाके मारते हैं. जैसे यह भी कि किसी लड़के को किसी लड़की के इंडिपेंडेंट होने से दिक्कत है, वह उस पर फेमिनिस्ट जोक मार कर उस के इंडपेंडेंसी का मजाक बनाता है और वहां बैठे सारे लड़के हंसते हैं.

डार्क ह्यूमर में दिक्कत नहीं पर सेंसिटिव टौपिक्स पर ह्यूमरिस्टिक होने के बजाय “कुछ लोग” औफेंसिव और इनसेंसिटिव बातें बोलने का बहाना बना रहे होते हैं. जैसे सोशल मीडिया पर मुसलिमों के लिए डार्क ह्यूमर के नाम पर अपनी बहन से शादी करने का मजाक नौर्मली बनाया जाता है या खास म्यूजिक बजा कर टेररिस्ट लेबलिंग की जाती है.

इसे अमेरिका के कौमेडियन लुईस सीके के मामले से समझ सकते हैं. 2017 में, जब उन्होंने कई महिलाओं का यौन शोषण स्वीकार किया तो उस के बाद उन्होंने स्टैंडअप करना शुरू किया. अपने शो में उन्होंने पार्कलैंड स्कूल शूटिंग के सर्वाइवर्स का मजाक उड़ाया. उन्होंने इसे डार्क ह्यूमर बताया, लेकिन सच यह था कि उन के द्वारा कहे गए कई नफरती शब्द थे जो डार्क कौमेडी का नाम ले कर बोले गए.

वल्‍गर जोक्‍स पर तालियां पीटते  हैं Generation Z

ठीक इसी तरह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से एक्ट्रैस बनीं कुशा कपिला इस साल जून महीने में कौमेडियन आशीष सोलंकी के ‘प्रिटी गुड रोस्ट शो’ में नजर आई थी. वह इस शो की गेस्ट थी, जिसे रोस्ट किया जाना था. इस शो का कोई फौर्मेट नहीं था न ही यह स्क्रिप्ट बेस्ड था. हुआ यही कि इस शो में उन की बौडी और तलाक के बारे में काफी एडल्ट और इंसेंसिटिव जोक्स सुनाए गए, और डार्क कौमेडी के नाम पर अपनी हद पार करने वालों में समय रैना मुख्य कौमेडियन थे. ये जोक्स इस हद तक वल्गर थे कि जोक्स को म्यूट करना पड़ा.

हैरानी यह कि वहां आई पढ़ीलिखी जेनजी यूथ इन्हीं जोक्स पर तालियां पीटती रही. इस वाकए के बाद भारत में टीनएजर्स और यूथ ने कुशा को ट्रोल करना शुरू किया और हाल में दिए इंटरव्यू में कुशा ने बताया कि उन्हें कमेंट सैक्शन में लिखा गया कि ‘समय भाई ने इस औरत को उस की जगह दिखा दी.’

प्रौब्‍लम किसमें हैं शोज में या मौकापरस्‍त लोगों में

भारत और अमेरिका में टीनएजर्स में इस तरह की टेंडेंसी देखने को मिल रही है. अमेरिका में मागा वाले टीनएजर्स और यूथ अपने सोशल मीडिया पर ऐसे “जोक्स” शेयर करते हैं, जिन में माइग्रेंट्स, यहूदी या एलजीबीटी समुदाय के खिलाफ औफेंसिव बातें होती हैं. ऐसा ही भारत में डार्क कौमेडी के नाम पर है.

इस का एक उदहारण ऐसी एक रील से समझिए जिस में गुजरात में एलजीबीटीक्यू प्राइड परेड हो रही है और उस के ऊपर कैप्शन में लिखा है कि ‘हिंदू भाई जेसीबी ले कर आओ, मुसलिम जैकेट (टेरेरिस्ट स्लर) ले कर आओ, क्रिश्चियन ताबूत ले कर आओ, सिख तलवार ले कर आओ बाकि दलित कोर्ट केस संभाल लेना.’

हालांकि इस का ये मतलब कतई नहीं है कि डार्क ह्यूमर गलत है या ‘इंडियाज गोट लैटेंट’ या इस तरह के शो बंद हो जाने चाहिए. प्रोब्लम डार्क ह्यूमर नहीं है, बल्कि उन लोगों की है, जो इस की आड़ में नफरत फैलाते हैं.

अगर ये ट्रेंड ऐसे ही चलता रहा, तो सही तरीके से डार्क ह्यूमर करने वाले आर्टिस्ट्स को भी क्रिटिसिज्म झेलना पड़ सकता है. जरुरी यह भी है कि उन लोगों का क्रिटिक होना चाहिए जो डार्क ह्यूमर का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे लोग जो इस की आड़ में अपने दिमाग का गंद बाहर निकाल रहे हैं. समय रैना अपने इस जौनरा में मास्टर जरुर है, और चीजों को हैंडल कर रहा है, उस की कही हर लाइन ह्यूमर से भरी जरुर रहती है लेकिन एक पोइंट है जहां वह अपनी लिमिट क्रोस करता है. जो कभीकभी उसे जोए रीगन जैसा शेड भी देती है, जो विवादित है.

Marriage Trend : अजीब है शादी के पहले या शादी पर विवाह तोड़ने का ट्रैंड

Marriage Trend : भारतीय समाज में शादी एक ऐसा ओकेजन या कहें ऐसा खास दिन होता है जिस के साथ ढेरों सपने और उम्मीदें जुड़ी होती हैं और लोग इस के लिए ढेरों तैयारियां करते हैं और आखिर वह दिन आ जाता है जब दो लोग विवाह के खूबसूरत रिश्ते में बंधने वाले होते हैं लेकिन बहुत बार ऐसा नहीं हो पाता और कभीकभार यह सफर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है.

कई बार तो शादी की कई रस्में निभाने के बाद भी अचानक कुछ ऐसा हो जाता है कि या तो दुल्हन के परिवारवालों की तरफ से या दूल्हे के परिवारवालों की तरफ से रिश्ता तोड़ दिया जाता है और बारात या तो लौट जाती है या लौटा दी जाती है और आखिरी पल में शादी टूट जाती है. उस समय लिया गया फैसला बाद में एक ऐसा अनुभव होता है जो न केवल दूल्हादुल्हन को पूरी तरह तोड़कर रख देता है बल्कि उन के परिवारों के लिए भी बेहद दर्दनाक होता है.

बचकानी बातों पर शादी तोड़ना

ऐसे नहीं होगी शादी और न आएगा बैंड न बजेगा बाजा, न आएगी बरात. आजकल देखने में आ रहा है कि कुछ परिवार या लड़कालड़की छोटीछोटी या बेतुकी बात पर शादी से पहले ऐन मौके पर शादी तोड़ रहे हैं. हमारे आप के आसपास अनेक ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिन्होंने किसी न किसी बचकानी सी बात जैसे कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में सिर्फ इस बात पर शादी कैंसिल हो गई कि डीजे वाले बाबू ने बारातियों की पसंद का गाना नहीं बजाया.
दरअसल हुआ यूं था कि बारातियों ने डीजे वाले से एक गाना बजाने की डिमांड की लेकिन जब डीजे वाले ने वह गाना नहीं बजाया तो बारातियों ने हंगामा शुरू कर दिया और बाराती और घराती आपस में भिड़ गए और इस बात का जब दुल्हन पता लगा तो उस ने शादी ही तोड़ दी और दूल्हे से बारात वापस ले जाने को कहा.
अब आप ही जरा सोचिए इतनी छोटी सी बात पर शादी तोड़ देने से किसी को क्या फर्क पड़ा लेकिन वे दो लोग जो विवाह के बाद एक होने वाले थे अलग हो गए, उन्होंने शादी के बाद के जो सपने देखे थे वे टूट गए, दोनों परिवारों की अपने बच्चों के विवाह को ले कर अब तक की गई सारी मेहनत और इमोशन्स पर पानी फिर गया!
इसलिए छोटीछोटी बेतुकी बातों पर शादी तोड़ देने का यह चलन या सोच कहीं से ठीक नहीं है इस से किसी को कोई फायदा नहीं बल्कि नुकसान ही होता है. उस समय तो तैश में आ कर शादी तोड़ देने का निर्णय ले लिया लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि अगली बार ऐसा या इस से कुछ बड़ा नहीं होगा तो क्या फिर से बारात लौटा दी या ली जाएगी ?

बारात बिना दुल्हन के वापस जाएगी

ऐसे ही एक और किस्से में दूल्हे के नशे में होने पर दुल्हन ने शादी करने से साफ इनकार कर दिया. पहले वधू पक्ष को लगा कि दूल्हे की तबीयत खराब हो गई है, लेकिन कुछ ही देर में दूल्हे की असलियत सामने आ गई. असल में विवाह समारोह के दौरान दूल्हा नशे में टल्ली था. काफी देर तक दोनों पक्षों के बीच में बातचीत होती रही . आखिर में यह तय हुआ कि बारात बिना दुल्हन के वापस जाएगी और सामान और इंतजाम का खर्चा वर पक्ष वहन करेगा.
इसी तरह मेरठ में भी एक शादी समारोह में शादी की खुशियां रंज में बदल गईं. वर और वधू पक्ष ने विवाह की सभी तैयारियां पूरी कर लीं थी और शादी के लिए बारात विवाह स्थल पर भी पहुंची लेकिन बारात के पहुंचते ही पहले तो दुल्हन पक्ष ने वर पक्ष पर सही लहंगा न लाने का आरोप लगाया और इस बात पर दोनों पक्षों में विवाद हो गया फिर वर पक्ष ने दूल्हे के स्वागत के दौरान नेग कम देने का आरोप लगाया.
इस के बाद खाना शुरू हुआ तो वर पक्ष के लोगों ने खाना सही न होने का आरोप लगा दिया और इस तरह दोनों पक्षों के लोग एकदूसरे पर आरोप लगाने लगे और बात इतनी बिगड़ गई कि दूल्हे को बिना दुल्हन ही बारात संग लौटना पड़ा. अब आप ही सोचिए इस शादी को तोड़ने के पीछे की सारी वजहें बेकार की नहीं थी ?

शादी से पहले शादी वाले दिन शादी तोड़ने का सिलसिला या ट्रेंड

जी हां, हैरान मत होइए ऐसा सच में हो रहा है. आजकल शादी से पहले शादी वाले दिन शादी तोड़ने का सिलसिला या ट्रेंड कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ रहा है. आइए देखते हैं इस के कुछ उदाहरण –
झारखंड के देवघर में खुले आसमान के नीचे शादी के मंडप में दूल्हादुल्हन ने हंसीखुशी एकदूसरे को वरमाला डाली. पंडित जी ने शादी की रस्में शुरू कर दीं. इसी बीच दूल्हा कंपकंपाते हुए अचानक बेसुध होकर गिर पड़ा. दूल्हे का शरीर ठंडा पड़ गया. डौक्टर को बुलाया गया. दूल्हे को इंजेक्शन लगाए गए. करीब एक से डेढ़ घंटे बाद दूल्हे को होश आया. मंडप में दूल्हा फिर से बैठने को तैयार हुआ, लेकिन दुल्हन ने सात फेरे लेने से मना कर दिया और शादी तोड़ दी.
दुल्हन बोली- दूल्हे को पक्का कोई बीमारी है. मैं इस से शादी नहीं करूंगी. जबकि दूल्हे को ठंड के कारण चक्कर आ गया था और बेसुध होकर गिर पड़ा था. दूल्हा और उस के घर वालों ने दुल्हन को मनाने की बहुत कोशिश की कि शादी मत तोड़ो लेकिन दुल्हन नहीं मानी और उस ने शादी कैंसिल कर दी और शादी का अरमान लिए आये दूल्हे को बिना दुल्हन के घर लौटना पड़ा!

लड़की को दूल्हा पसंद नहीं

इसी तरह हाल ही में बिहार के नवादा में एक लड़की अपनी शादी से पहले घर से इसलिए फरार हो गई क्योंकि लड़की को दूल्हा पसंद नहीं था, उस का रंग सांवला था, परिवार वाले चाहते थे कि लड़की उस से शादी करे लेकिन वह उस से शादी नहीं करना चाह रही थी.
शादी से पहले कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बिल्कुल तवज्जो नहीं दिया जाना चाहिए जैसे शादी से पहले किसी दुर्घटना को अपशकुन मान लेना, एकदूसरे के हिसाब से कुछ रीतिरिवाजों का पालन नहीं होना, सामान एकदूसरे की पसंद का नहीं होना, शादी में लेनदेन की शर्तों का एकदूसरे के हिसाब से पूरा न होना, दोनों पक्षों के बीच बेबात पर लड़ाईझगड़ा होना, शादी समारोह में कोई छोटीमोटी गड़बड़ी जैसे खानापीना हिसाब से नहीं होना ऐसी बातों को तूल देना और इन बातों पर पर शादी तोड़ने का फैसला ले लेना बिल्कुल भी सही नहीं होता.

कब सही या गलत है शादी तोड़ने का निर्णय

यह सही बात है कि शादी एक ऐसा बंधन है, जिस में दूल्हादुल्हन पक्ष दोनों को ही किसी भी तरह की कोई बात नहीं छिपानी चाहिए. कई बार शादी के ऐन मौके पर कुछ ऐसी बात पता चलती है जिस से लड़का या लड़की की पूरी जिंदगी बर्बाद हो सकती है, जहां कोई जरूरी बात छिपाई जा रही हो और उस से लड़के या लड़की के भविष्य पर असर पड़ रहा हो तो शादी तोड़ना या बारात लौटना, या लौटा देना गलत नहीं है. जैसे शादी पक्की होने के बाद, शादी वाले दिन भी कहीं से पता पता चले कि परिवार लालची है, लड़के या लड़की वालों ने छिपाया है कि दोनों में से कोई पहले से मैरिड है, लड़के का कोई क्रिमिनल बैकग्राउंड है, लड़के या लड़के की फाइनेंशियल सिचुएशन के बारे में गलत जानकारी दी गई हो तो शादी तोड़ने का निर्णय सही हो सकता है लेकिन शराबी दोस्तों के हुड़दंग की वजह से एक दूल्हे की बारात बिना दुल्हन के बैरंग लौटा देना, दु्ल्हन को दूल्हे के परिवार द्वारा दिया गया अपना शादी का लहंगा पसंद न आना जैसी बेतुकी और बचकानी वजहे हैं जिन की वजह से बरात लौटने या लौटाने का निर्णय कहीं से कोई समझदारी नहीं है!

जेनुइन रीजन पर ही तोड़ें शादी

इस बात में दो राय नहीं कि शादी एक अहम फैसला है जिसे सोचसमझ कर लेना चाहिए क्योंकि कई बार एक गलत फैसला पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकता है ऐसे में शादी तोड़ना ही सही है जैसे निकिता और निमिष की शादी की तैयारियां जोरों पर थीं. दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था लेकिन शादी से कुछ दिन पहले निकिता को निमिष के बारे में पता चला कि वह न केवल कई लड़कियों के साथ सेक्शुअल रिलेशनशिप में है बल्कि उस पर कुछ क्रिमिनल केसेज भी चल रहे थे जिस के बारे में उस ने निकिता और उस के परिवार से छिपाया था. इस बात ने उसे झकझोर कर रख दिया. वह मान नहीं पा रही थी कि जिस इंसान पर विश्वास करके उस ने शादी करने का जीवन भर साथ रहने का फैसला किया था वह उस के साथ ऐसा धोखा कर सकता है. आखिरकार उस ने शादी तोड़ने का फैसला कर लिया और इस केस में निकिता का यह फैसला सही था.

बरात लौटा देने या लौटा लेने का बराबर असर

अब वह जमाना लद गया जब शादी से पहले बरात लौटने से सिर्फ लड़की या उस के परिवार वालों की बदनामी होती थी और कहा जाता था कि एकबार शादी टूट गई तो जिंदगी भर कुंवारा रहना पड़ेगा, दोबारा अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा, लड़की में ही कुछ कमी होगी.
आज समय बदल गया है, आज बेतुकी बातों पर बरात लौटा देने या बारात लौटा लेने का यह ट्रेंड न सिर्फ दोनों परिवारों पर भारी पड़ता है बल्कि लड़केलड़की दोनों पर भी इस का असर पड़ता है. आज लड़के और उसके परिवार वाले भी शादी टूटने से उतने ही इफेक्ट होते हैं जितने कि लड़की वाले उन के भी मन पर असर पड़ता है, उन के परिवार वालों की भी बदनामी होती है. शादी से ठीक पहले शादी टूटना यह एक ऐसा अनुभव होता है जो न केवल दूल्हादुल्हन को पूरी तरह तोड़ कर रख देता है बल्कि उन के परिवारों के लिए भी बेहद दर्दनाक होता है. बाद में ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो छोटीसी बात पर शादी तोड़ कर दोनों पक्षों को पछतावे के अलावा कुछ नहीं मिलता.

कुछ मामलों में समाज की परवाह न करें

कई बार लड़का या लड़की वाले समाज के डर से एक पक्ष के बारे में कुछ गलत जानकारी मिलने के बाद भी समाज में बदनामी के डर शादी से पहले शादी तोड़ने या बारात लौटने से डरते हैं. जैसा कि विवेक के केस में हुआ शादी से ठीक दो दिन पहले विवेक और उसके परिवार वालों को पता चला कि जिस लड़की से उसकी शादी होने वाली है उस लड़की को फिट्स पड़ते हैं जो लड़के के परिवार वालों ने लड़की के परिवार वालों से छिपाई.
ऐसे में अगर आपने सही कारण से शादी से पहले शादी तोड़ने का फैसला लिया है तो समाज को समझना होगा कि जिस तरह ब्रेकअप होता है उसी तरह शादी टूट गई, उसे तमाशा या इज्जत का सवाल न बनाएं, सामान्य तौर पर देखा गया है कि सेम एज वालों को शादी के टूटने से फर्क नहीं पड़ता लेकिन दकियानूसी सोच वालों को फर्क पड़ता है और वे इसे बड़ा इशू बनाते हैं जिस की परवाह नहीं करनी चाहिए .

क्या गारंटी कि बरात लौटाने के बाद अगला रिश्ता मनचाहा मिलेगा ?

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं जमीन कहीं आसमां नहीं मिलता
जीवन के महत्वपूर्ण ओकेजन शादी की भी यही सच्चाई है. जरूरी नहीं कि आज जिस में कमी निकाल कर बारात लौटा ली या दी, जिस से रिश्ता तोड़ा है अगली बार आप को उस से बेहतर रिश्ता मिलेगा हो सकता है अगली बार आप को आज जो मिल रहा है वह भी नहीं मिले!
इसलिए शादी होने से पहले उसे तोड़ने से पहले 10 बार सोचें. परिवार कैसा है, लड़का, लड़की का स्वभाव, कैरेक्टर कैसा है इस को महत्व दें, रंग, रूप, पैसा, जाति, धर्म, घर को महत्व न दें. रिश्ता में ज्यादा मीनमेख न निकालें, ज्यादा चूंचपड़ न करें. आप को जीवन में सब कुछ मनचाहा नहीं मिल सकता इसे जीवन का दस्तूर समझ कर स्वीकार करें और जब तक कुछ बहुत ज्यादा गलत न हो रिश्ते में बंध जाएं और बरात लौटाने की गलती न करें.
इस बात को इस उदाहरण से समझिए कि आज आपने एक मकान लिया, लेकिन बाद में मकान के पास गलत लोग आ कर बस गये, सीवर प्रौब्लम हो गई तो क्या आप घर बदल लेंगे नहीं न?

शादी के लिए इतनी बड़ी चेक लिस्ट

शादी मकान जिंदगी में एकबार बनता है बारबार नहीं बदला जाता इसलिए हर चीज परफेक्ट मिलेगी यह न सोचें और बेतुकी, बेवजह की बातों को तूल देकर जिस रिश्ते में बंधने वाले हैं उसे सम्मान से स्वीकारें और निभाएं.

Inspirational Story : मुकदमा

Inspirational Story :  ‘‘मेरे यहां न तो कोई गलत माल बनता है न ही मैं मिलावट करता हूं. मैं किस बात का महीना दूं?’’ लाला कुंदन लाल ने रोष भरे स्वर में कहा.

‘‘लालाजी, बात अकेली मिलावट की नहीं है…अब पुराने नियम और तरीके सब बदल चुके हैं. मिलावट के साथसाथ अब सफाई, रंग और कैलोरी आदि की भी जांच की जाती है,’’ स्वास्थ्य विभाग के चपरासी श्यामलाल ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘मगर मेरे यहां सफाई का स्तर ठीक है. आप सारे रेस्तरां में कहीं भी गंदगी दिखाएं, किचन में सबकुछ स्टैंडर्ड का है.’’

‘‘ये सब बातें कहने की हैं. अफसर लोग नहीं मानते.’’

‘‘मांग जायज हो तो मानें. पिछले 3 साल से महीने की दर बढ़तेबढ़ते 10 गुनी हो गई है…यह तो सरासर लूट है.’’

‘‘महीना सब का बढ़ाया है, अकेले आप ही का नहीं.’’

‘‘मगर मैं इतना नहीं दे सकता.’’

‘‘सोचविचार कर लीजिए. खामख्वाह पंगा पड़ जाएगा,’’ एक तरह से धमकी देता श्यामलाल चला गया.

चपरासी के जाते दोनों बेटे सुरेश और अशोक भी पिता के पास आ गए. कहां तो 100 रुपए महीना था, अब 3 हजार रुपए महीना मांगा जा रहा है. पहले मिलावट के मामले में सजा अधिकतम 6 महीने से 1 साल तक थी साथ में 1 से 2 हजार रुपए तक जुर्माना था.

नए प्रावधानों में अब न्यूनतम सजा 3 साल की तथा जुर्माना 25 हजार से 3 लाख रुपए तक हो गया था. जैसे ही कानून सख्त हुआ था वैसे ही रिश्वत की दर भी आसमान पर पहुंच गई. सफाई या हाईजिन स्तर के नाम पर किसी प्रतिष्ठान, दुकान को बंद करवाने का अधिकार भी खाद्य निरीक्षक को मिल गया था. इस से भी अब लूट बढ़ गई थी.

लालजी की गोलहट्टी के नाम से खानेपीने की दुकान सारे शहर में मशहूर थी. माल का स्तर शुरू से काफी अच्छा था. मिलावट वाली कोई वस्तु नहीं थी.  मिलावट तो नहीं थी मगर प्रयोग- शालाओं में कई अन्य आधारों पर नमूना फेल हो जाता था. नमूने को कभी स्तरहीन या अखाद्य या ‘एक्सपायर्ड’ भी करार दे दिया जाता था, जिस से मुकदमा दर्ज हो जाता था या फिर दुकान बंद हो जाती.

जितने ज्यादा नए कानून बनते उतने नए अपराधी बनते. जितना सख्त कानून होता उतना ज्यादा रिश्वत का रेट होता. अपराध तो कम नहीं होते थे, भ्रष्टाचार जरूर बढ़ जाता था.  लाला कुंदन लाल ने जीवनभर मिलावट नहीं की थी. वे ऐसा करना पसंद नहीं करते थे. ग्राहकों को साफसुथरा खाना देना अपना कर्तव्य समझते थे. किसी जमाने में मिलावट का नाम भी नहीं था. मिलावट क्या होती है…कोई नहीं जानता था.  तब खाद्य निरीक्षक का पद भी नहीं था. नगर परिषद का सैनेटरी इंस्पैक्टर कभीकभार बाजार का चक्कर लगा लेता था. किसीकिसी का सैंपल या नमूना ले कर प्रयोगशाला को भेज दिया करता था. सैंपल फेल कम आते थे. सैंपल फेल आने पर जुर्माना होता था जो 50 रुपए से 400-500 रुपए तक था. मगर ऐसा कम ही होता था. कोई सजा का मामला नहीं था.

अब वक्त बदल चुका था. आबादी बहुत बढ़ गई थी. साथ ही कानून और अपराधी भी. अब सैंपल या नमूना फेल ज्यादा आते थे, पास कम होते थे. गेहूं के साथ घुन भी पिसता है, के समान मिलावट न करने वाले भी फंस जाते थे.

लाला कुंदन लाल के साथ दोनों बेटे भी विचारमग्न थे. क्या करें? कभी रिश्वत मात्र 100  रुपए महीना थी अब 3 हजार रुपए मांगे जा रहे थे. कल को या भविष्य में 30 हजार रुपए महीना भी मांगे जा सकते थे. वे मिलावट नहीं करते थे मगर हर जगह बेईमानी थी. प्रयोगशालाओं में नमूने फेल, पास करवाए जाते थे.  अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए कई व्यापारी उस का नमूना प्रयोगशाला में फेल करवा देते थे. बदले समय के साथ अब व्यापार में भी घटियापन बढ़ गया था.

‘‘फूड इंस्पैक्टर 3 हजार रुपए महीना मांग रहा है,’’ लालाजी ने दोनों बेटों को बताया.

‘‘पिताजी, दे दीजिए. सैंपल भर लिया, फेल करवा दिया तब परेशानी बढ़ जाएगी,’’ छोटे बेटे अशोक ने कहा.

‘‘मगर इन की मांग सुरसा के मुंह के समान बढ़ती जा रही है. कभी 100 रुपए महीना था. अब 3 हजार रुपए मांग रहे हैं, साथ ही आधा दर्जन लोग खाने आ जाते हैं,’’ लालाजी ने रोष भरे स्वर में कहा.

इस पर दोनों बेटे खामोश हो गए. क्या करें? पुराना फूड इंस्पैक्टर शरीफ था. 100 रुपए महीना लेने पर भी विनम्रता से पेश आता था. नए जमाने का खाद्य निरीक्षक 3 हजार ले कर भी रूखे और रोबीले अंदाज में बात करता था.  लालाजी मिलावट पहले नहीं करते थे, अब भी नहीं करते. बात सिर्फ इंसाफ की थी. इंसाफ कहां था? प्रयोगशालाओं में निष्पक्षता न थी यही सब से बड़ी समस्या थी.  2 दिन बाद, चपरासी श्यामलाल दोबारा आया.

‘‘लालाजी, क्या इरादा है?’’

‘‘मैं ने पहले भी कहा है, मैं मिलावट नहीं करता. मैं महीना किस बात का दूं?’’ दोटूक स्वर में लालाजी ने कहा.

‘‘लालाजी, सोच लीजिए,’’ यह बोल कर गुस्से से तमतमाता चपरासी वापस चला गया.

‘‘पिताजी, आप ने यह क्या किया? अब यह हमारा सैंपल भरवा देगा?’’ दोनों बेटों ने पिताजी के पास आ कर कहा.

‘‘जो होगा देखेंगे. जोरजबरदस्ती की भी एक सीमा है. जब हम मिलावट ही नहीं करते तब महीना किस बात का दें.’’

‘‘पिताजी, वे प्रयोगशाला से नमूना फेल करवा देंगे.’’

‘‘जो होगा देखेंगे. अब मैं 60 साल का हूं. मुकदमा हो भी जाता है तो भी परवा नहीं है,’’ लालाजी के स्वर में एक निश्चय और चेहरे पर आभा थी.

शाम से पहले एक बड़ी स्टेशनवैगन गोलहट्टी के सामने आ कर रुकी. चिरपरिचित खाद्य निरीक्षक सोम कुमार और स्वास्थ्य अधिकारी मैडम शकुंतला उतर कर दुकान में प्रवेश कर गए.

‘‘दुकान का मालिक कौन है?’’ फूड इंस्पैक्टर ने रौब से पूछा.  लालाजी सब माजरा समझ रहे थे. दर्जनों बार परिवार सहित खापी कर जाने वाला पूछ रहा है कि दुकान का मालिक कौन है.

‘‘मैं हूं जी, बात क्या है?’’

इस दबंग जवाब की उम्मीद फूड इंस्पैक्टर को न थी.

‘‘क्याक्या बनाते हैं आप?’’

‘‘सामने काउंटर में रखा है, देख लीजिए.’’

‘‘आप के पास इस काम का लाइसैंस है?’’

‘‘हां, है जी. यह देखिए,’’ लालाजी ने शीशे से मढ़ी तसवीर के समान फ्रेम में जड़ी म्यूनिसिपैलिटी के लाइसैंस की कापी सामने रखते हुए कहा.

‘‘आप के खिलाफ स्तरहीन खाद्य- पदार्थ बनाने और बेचने की शिकायत है, आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए, किस चीज का नमूना दें?’’इस बेबाक जवाब पर खाद्य निरीक्षक सकपका गया. काउंटर वातानुकूलित था. माल सब साफ था. दुकान में मक्खी, कीट, मच्छर का नामोनिशान तक न था. दुकान में सर्वत्र साफसफाई थी. रसोईघर साफसुथरा था.  गुलाबजामुन और रसगुल्लों का नमूना ले लिया. पहले कभी आने पर लालाजी ड्राईफू्रट से आवभगत करते थे मगर इस बार जानबूझ कर पानी भी नहीं पूछा. इस से इंस्पैक्टर चिढ़ गया.

नमूना ले सब चले गए.  ‘‘पिताजी, अगर नमूना फेल हो गया तो?’’ दोनों बेटों ने कहा, ‘‘पड़ोसी कहता है वह एक दलाल को जानता है जो प्रयोगशाला से नमूना पास करवा सकता है.’’

‘‘मगर हम तो मिलावट करते नहीं हैं, हौसला रखो, जो होगा देखेंगे.’’  शाम को चपरासी फिर आया. लालाजी ने प्रश्नवाचक निगाहों से घूरते हुए उस की तरफ देखा.

‘‘फूड इंस्पैक्टर कहता है अगर आप को मामला निबटाना है तो निबट सकता है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप चाहें तो नमूना यहीं खत्म कर देते हैं. प्रयोगशाला में नहीं भेजेंगे और आप चाहें तो नमूना प्रयोगशाला से पास भी करवा सकते हैं. हमारे पास दोनों इंतजाम हैं.’’

‘‘जब मैं मिलावट नहीं करता तब कैसा भी इंतजाम क्यों करूं?’’

चपरासी चुपचाप चला गया. डेढ़ माह बाद नतीजा आया. दोनों नमूने पास हो गए. लालाजी का मनोबल ऊंचा हो गया. दुकान की साख बढ़ गई. 2 माह गुजर गए.  दोपहर को स्वास्थ्य विभाग की वही पहली वाली जीप दुकान के सामने आ कर रुकी.

‘‘आप के खिलाफ शिकायत है. किसी ग्राहक को आप के यहां नाश्ता करने के बाद पेट में दर्द हुआ था,’’ फूड इंस्पैक्टर ने कहा.

‘‘वह कौन है?’’

‘‘प्रमुख चिकित्सा अधिकारी के पास लिखित शिकायत आई थी. आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए.’’

लालाजी के स्वर की दृढ़ता से स्वास्थ्य अधिकारी भी थोड़ा विचलित था. खाद्य निरीक्षक ने दुकान में नजर दौड़ाई. दुकान छोटीमोटी रेस्तरां थी. 4-5 मिठाइयां जैसे रसगुल्ले, गुलाबजामुन, रसमलाई, मिल्ककेक, पिस्ता बर्फी और पुलावचावल के साथ राजमा और छोलेभठूरे आदि प्लेट और पीस रेट के हिसाब से बेचे जाते थे.  दीवार पर रेट लिस्ट लगी थी. साथ  ही लिखा था, ‘यहां गाय का दूध प्रयोग होता है.’, ‘मिल्क नौट फौर सेल’, ‘दूध बेचने के लिए नहीं है.’  प्रावधानों के अनुसार जो वस्तु बेचने के लिए न हो उस का नमूना नहीं लिया जा सकता था. मिठाई का सैंपल पास हो चुका था. चावल, पुलाव, राजमा, छोलेभठूरे में क्या मिलावट हो सकती थी?

‘‘जरा छोले दिखाइए.’’

लालाजी के इशारे पर कारीगर ने एक कटोरी में गैस पर रखे गरम छोले डाल कर दे दिए. नाक के समीप ला उस को सूंघते हुए फूड इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘मसाले की गंध कुछ अजीब सी है. आप इस का नमूना दे दीजिए.’’  मसालाचना, राजमा व छोले की तरी का नमूना अलग से ले टीम चली गई. इस बार चपरासी ‘इंतजाम’ की बात करने नहीं आया. बेटों के सामने भी ‘दलाल’ की मार्फत नमूना पास करवाने की बात नहीं उठाई.  डेढ़ महीने बाद नतीजा आया. राजमा, मसालाचना का नमूना पास हो गया था. छोलेतरी का नमूना निर्धारित मात्रा से ज्यादा मसाला मिलाने पर तकनीकी आधार पर फेल हो गया था.  रजिस्टर्ड डाक से लालाजी को नोटिस मिला. ‘आप का नमूना प्रयोगशाला द्वारा फेल घोषित किया गया है. आप इस तारीख को मुख्य दंडाधिकारी के न्यायालय में हाजिर हों. यदि आप राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट से असहमत हैं तो केंद्रीय प्रयोगशाला में नमूने को दोबारा परीक्षण हेतु 10 दिन के अंदरअंदर भिजवा सकते हैं.’

लालाजी नोटिस की प्रति ले कर अपने परिचित वकील के पास पहुंचे.  ‘‘अरे, भाई, इस मामले को निचले स्तर पर निबटा देना था. जो मांग रहे थे दे देते,’’ वकील साहब ने नोटिस पढ़ कर कहा.

‘‘मांग जायज होती तो पूरी कर भी देता. कभी 100-200 रुपए महीना मांगते थे अब 3 हजार रुपए और ऊपर से कभी भी खानेपीने को आ जाते. साथ में रौब अलग से.’’  ‘‘मगर मुकदमा कई साल चल सकता है. पेशियों की परेशानी है. नमूना तकनीकी आधार पर फेल है इसलिए सजा का मामला नहीं है. सजा मिलावट के मामले में होती है,’’ वकील साहब ने कहा.  ‘‘और अगर इसे केंद्रीय प्रयोगशाला में दोबारा परीक्षण के लिए भेज दूं तो?’’

‘‘तब कई पहलू हैं. केंद्रीय प्रयोगशाला इसे पास कर सकती है. राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट के समान ही रिपोर्ट दे सकती है. विभिन्न रिपोर्ट दे सकती है. मिलावट घोषित कर सकती है.’’

‘‘यह तो एक किस्म का जुआ है. ठीक है, हम नमूना दोबारा परीक्षण के लिए केंद्रीय प्रयोगशाला में भेज देते हैं.’’  निर्धारित तिथि को लालाजी, एक पड़ोसी दुकानदार को बतौर जमानती, एक पूर्व नगर पार्षद को बतौर शिनाख्ती और नमूना दोबारा भिजवाने के लिए लकड़ी का खाली डब्बा, रुई का बंडल, सफेद कपड़े का टुकड़ा ले अदालत पहुंच गए.  पहले जमानत हुई. फिर नमूना भेजने की तारीख पड़ी. तारीख वाले दिन नमूना दोबारा सील कर केंद्रीय प्रयोगशाला में रजिस्टर्ड पार्सल द्वारा भेज दिया गया.  चपरासी अब फिर आया.

‘‘लालाजी, हमारे पास केंद्रीय प्रयोगशाला में इंतजाम है.’’

‘‘नहीं भाई, मुझे इंतजाम नहीं करवाना. नमूना फेल भी आ जाता है तो भी कोई बात नहीं. जब तक अदालत फैसला सुनाएगी मैं इस दुनिया से बहुत दूर जा चुका होऊंगा.’’  लालाजी के इस बेबाक जवाब पर चपरासी चला गया. दुकान में खापी रहे ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़े.

2 महीने बाद नतीजा आया. नमूना मिलावटी नहीं था. मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से कम थी जबकि राज्य प्रयोगशाला ने मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से ज्यादा बताई थी.  चार्ज की पेशी पर बहस हुई. माननीय न्यायाधीश ने दोनों प्रयोगशालाओं द्वारा दी गई अलगअलग परीक्षण रिपोर्टों के आधार पर लालाजी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया.  सारे सिलसिले में 7-8 महीने का समय लगा? और 12 हजार रुपए खर्च हुए. थोड़ी परेशानी तो हुई मगर लालाजी के नैतिक साहस और बेबाकी की सारे दुकानदारों और पड़ोसियों में चर्चा और प्रशंसा हुई.

Hindi Stories 2025 : सॉरी भाभी

Hindi Stories 2025 : सोना भाभी वैसे तो कविता की भाभी थीं. कविता, जो स्कूल में मेरी सहपाठिनी थी और हमारे घर भी एक ही गली में थे. कविता के साथ मेरा दिनरात का उठनाबैठना ही नहीं उस घर से मेरा पारिवारिक संबंध भी रहा था. शिवेन भैया दोनों परिवारों में हम सब भाईबहनों में बड़े थे. जब सोना भाभी ब्याह कर आईं तो मुझे लगा ही नहीं कि वह मेरी अपनी सगी भाभी नहीं थीं.

सोना भाभी का नाम उषा था. उन का पुकारने का नाम भी सोना नहीं था, न हमारे घर बहू का नाम बदलने की कोई प्रथा ही थी पर चूंकि भाभी का रंग सोने जैसा था अत: हम सभी भाईबहन यों ही उन्हें सोना भाभी बुलाने लगे थे. बस, वह हमारे लिए उषा नहीं सोना भाभी ही बनी रहीं. सुंदर नाकनक्श, बड़ीबड़ी भावपूर्ण आंखें, मधुर गायन और सब से बढ़ कर उन का अपनत्व से भरा व्यवहार था. उन के हाथ का बना भोजन स्वाद से भरा होता था और उसे खिलाने की जो चिंता उन के चेहरे पर झलकती थी उसे देख कर हम उन की ओर बेहद आकृष्ट होते थे.

शिवेन भैया अभी इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे कि उन्हें मातापिता ही नहीं दादादादी के अनुरोध से विवाह बंधन में बंधना पड़ा. पढ़ाई पूरी कर के वह दिल्ली चले गए फिर वहीं रहे. हम लोग भी अपनेअपने विवाह के बाद अलगअलग शहरों में रहने लगे. कभी किसी खास आयोजन पर मिलते तो सोना भाभी का प्यार हमें स्नेह से सराबोर कर देता. उन का स्नेहिक आतिथ्य हमेें भावविभोर कर देता.

आखिरी बार जब सोना भाभी से मिलना हुआ उस समय उन्होंने सलवार सूट पहना हुआ था. वह मेरे सामने आने में झिझकीं. मैं ड्राइंगरूम में बैठने वाली तो थी नहीं, भाग कर दूसरे कमरे में पहुंची तो वह साड़ी पहनने जा रही थीं.

मैं ने छूटते ही कहा, ‘‘यह क्या भाभी, आज तो आप बड़ी सुंदर लग रही हो, खासकर इस सलवार सूट में.’’

‘‘नहीं,’’ उन्होंने जोर देते हुए कहा.

मैं ने उन्हें शह दी, ‘‘भाभी आप की कमसिन छरहरी काया पर यह सलवार सूट तो खूब फब रहा है.’’

‘‘नहीं, माया, मुझे संकोच लगता है. बस, 2 मिनट में.’’

‘‘पर क्यों? आजकल तो हर किसी ने सलवार सूट अपने पहनावे में शामिल कर लिया है. यहां तक कि उन बूढ़ी औरतों ने भी जिन्होंने पहले कभी सलवार सूट पहनने के बारे में सोचा तक नहीं था… सुविधाजनक होता है न भाभी, फिर रखरखाव में भी साड़ी से आसान है.’’

‘‘यह बात नहीं है, माया. मुझे कमर में दर्द रहता है तो सब ने कहा कि सलवार सूट पहना करूं ताकि उस से कमर अच्छी तरह ढंकी रहेगी तो वह हिस्सा गरम रहेगा.’’

‘‘हां, भाभी, सो तो है,’’ मैं ने हामी भरी पर मन में सोचा कि सब की देखादेखी उन्हें भी शौक हुआ होगा तो कमर दर्द का एक बहाना गढ़ लिया है…

सोना भाभी ने इस हंसीमजाक के  बीच अपनी जादुई उंगलियों से खूब स्वादिष्ठ भोजन बनाया. इस बीच कई बार मोबाइल फोन की घंटी बजी और भाभी मोबाइल से बात करती रहीं. कोई खास बात न थी. हां, शिवेन भैया आ गए थे. उन्होंने हंसीहंसी में कहा कि तुम्हारी भाभी को उठने में देर लगती थी, फोन बजता रहता था और कई बार तो बजतेबजते कट भी जाता था, इसी से इन के लिए मोबाइल लेना पड़ा.

साल भर बाद ही सुना कि सोना भाभी नहीं रहीं. उन्हें कैंसर हो गया था. सोना भाभी के साथ जीवन की कई मधुर स्मृतियां जुड़ी हुई थीं इसलिए दुख भी बहुत हुआ. लगभग 5 सालों के बाद कविता से मिली तब भी हम दोनों की बातों में सोना भाभी ही केंद्रित थीं. बातों के बीच अचानक मुझे लगा कि कविता कुछ कहतेकहते चुप हो गई थी. मैं ने कविता से पूछ ही लिया, ‘‘कविता, मुझे ऐसा लगता है कि तुम कुछ कहतेकहते चुप हो जाती हो…क्या बात है?’’

‘‘हां, माया, मैं अपने मन की बात तुम्हें बताना चाहती हूं पर कुछ सोच कर झिझकती भी हूं. बात यह है…

‘‘एक दिन सोना भाभी से बातोंबातों में पता लगा कि उन्हें प्राय: रक्तस्राव होता रहता है. भाभी बताने लगीं कि पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है. 50 से 5 साल ऊपर की हो रही हूं्…

‘‘भाभी पहले से भी सुंदर, कोमल लग रही थीं. बालों में एक भी रजत तार नहीं था. वह भी बिना किसी डाई के. वह इतनी अच्छी लग रही थीं कि मेरे मुंह से निकल गया, ‘भाभी, आप चिरयौवना हैं न इसीलिए. देखिए, आप का रंग पहले के मुकाबले और भी निखरानिखरा लग रहा है और चेहरा पहले से भी कोमल, सुंदर. आप बेकार में चिंता क्यों कर रही हैं.

‘‘यही कथन, यही सोच मेरे मन में आज भी कांटा सा चुभता रहता है. क्यों नहीं उस समय उन पर जोर दिया था कि आप के साथ जो कुछ हो रहा है वह ठीक नहीं है. आप डाक्टर से परामर्श लें. क्यों झूठा परिहास कर बैठी थी?’’

मुझे भी उन के कमर दर्द की शिकायत याद आई. मैं ने भी तो उन की बातों को गंभीरता से नहीं लिया था. मन में सोच कर मैं खामोश हो गई.

भाभी और भैया दोनों ही अस्पताल जाने से बहुत डरते थे या यों कहें कि कतराते थे. शायद कुछ कटु अनुभव हों. वहां बातबात में लाइन लगा कर खड़े रहना, नर्सो की डांटडपट, बेरहमी से सूई घुसेड़ना, अटेंडेंट की तीखी उपहास करती सी नजर, डाक्टरों का शुष्क व्यवहार आदि से बचना चाहते थे.

भाभी को सब से बढ़ कर डर था कि कैंसर बता दिया तो उस के कष्टदायक उपचार की पीड़ा को झेलना पड़ेगा. उन्हें मीठी गोली में बहुत विश्वास था. वह होम्योपैथिक दवा ले रही थीं.

‘‘माया, बहुत सी महिलाएं अपने दर्द का बखान करने लगती हैं तो उन की बातों की लड़ी टूटने में ही नहीं आती,’’ कविता बोली, ‘‘उन के बयान के आगे तो अपने को हो रहा भीषण दर्द भी बौना लगने लगता है. सोना भाभी को भी मैं ने ऐसा ही समझ लिया. उन से हंसी में कही बात आज भी मेरे मन को सालती है कि कहीं उन्होंने मेरे मुंह से अपनी काया को स्वस्थ कहे जाने को सच ही तो नहीं मान लिया था और गर्भाशय के अपने कैंसर के निदान में देर कर दी हो.

‘‘माया, लगता यही है कि उन्होंने इसीलिए अपने पर ध्यान नहीं दिया और इसे ही सच मान लिया कि रक्तस्राव होते रहना कोई अनहोनी बात नहीं है. सुनते हैं कि हारमोन वगैरह के इंजेक्शन से यौवन लौटाया जा रहा है पर भाभी के साथ ऐसा क्यों हुआ? मैं यहीं पर अपने को अपराधी मानती हूं, यह मैं किसी से बता न सकी पर तुम से बता रही हूं. भाभी मेरी बातों पर आंख मूंद कर विश्वास करती थीं. 3-4 महीने भी नहीं बीते थे जब रोग पूरे शरीर में फैल गया. सोने सी काया स्याह होने लगी. अस्पताल के चक्कर लगने लगे, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.’’

मुझे भी याद आने लगा जब मैं अंतिम बार उन से मिली थी. मैं ने भी उन्हें कहां गंभीरता से लिया था.

‘‘माया, तुम कहानियां लिखती हो न,’’ कविता बोली, ‘‘मैं चाहती हूं कि सोना भाभी के कष्ट की, हमारे दुख की, मेरे अपने मन की पीड़ा तुम लिख दो ताकि जो भी महिला कहानी पढ़े, वह अपने पर ध्यान दे और ऐसा कुछ हो तो शीघ्र ही निदान करा ले.’’

कविता बिलख रही थी. मेरी आंखें भी बरस रही थीं. उसे सांत्वना देने वाले शब्द मेरे पास नहीं थे. वह मेरी भी तो बहुत अपनी थी. कविता का अनुरोध नहीं टाल सकी हूं सो उस की व्यथाकथा लिख रही हूं.

Hindi Story 2025 : वो मेरा हीरो

Hindi Story 2025 :  बादलों की गड़गड़ाहट के साथ ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी. अपने घर की बालकनी में बैठी चाय की चुसकियों के साथ बारिश की बौछारों का मैं आनंद लेने लगी. आंखें अनायास ही सड़क पर तितरबितर होते भीड़ के रैले में किसी को तलाशने लगीं लेकिन उसे वहां न पा कर उदास हो गईं. आज ये फुहारें कितनी सुहानी लग रही हैं, जबकि यही गड़गड़ाहट, आसमान में चमकती बिजली की आंखमिचौली उस दिन कितना कहर बरपाती प्रतीत हो रही थी. समय और स्थान परिवर्तन के साथसाथ एक ही परिदृश्य के माने कितने बदल जाते हैं.

2 बरस पूर्व की यादें अभी भी जेहन में आते ही शरीर में झुरझुरी सी होने लगती है और इस के साथ ही आंखों के सामने उभर आता है एक रेखाचित्र, ‘हीरो’ का, जिस की मधुर स्मृति अनायास ही चेहरे पर मुसकान ला देती है.

उस दिन औफिस से निकलने में मुझे कुछ ज्यादा ही देर हो गई थी. काफी अंधेरा घिर आया था. स्ट्रीट लाइट्स जल चुकी थीं. मैं ने घड़ी देखी, घर पहुंचतेपहुंचते साढ़े 10 तो बज ही जाएंगे. मां चिंता करेंगी, सोच कर लिफ्ट से उतरते ही मैं ने मां को फोन लगा दिया.

‘हां, कहां तक पहुंची? आज तो बहुत तेज बारिश हो रही है. संभल कर आना,’ मां की चिंता उन की आवाज से साफ जाहिर हो रही थी.

‘बस, निकल गई हूं. अभी कैब पकड़ कर सीधे घर पहुंचती हूं और फिर मुंबई की बारिश से क्या घबराना, मां? हर साल ऐसे ही तो होती है. मेहमान और मुंबई की बारिश का कोई ठिकाना नहीं. कब, कहां टपक जाए कोई नहीं बता सकता,’ मैं बड़ी बेफिक्री से बोली.

‘अरे, आज साधारण बारिश नहीं है. पिछले 10 घंटे से लगातार हो रही मूसलाधार बारिश थमने या धीमे होने का नाम नहीं ले रही है. हैलो…हैलो…’ मां बोलती रह गईं.

मैं भी देर तक हैलो… हैलो… करती बिल्डिंग से बाहर आ गई थी. सिगनल जो उस वक्त आने बंद हुए तो फिर जुड़ ही नहीं पाए थे. बाहर का नजारा देख मैं अवाक रह गई थी. सड़कें स्विमिंग पूल में तबदील हो चुकी थीं. दूरदूर तक कैब क्या किसी भी चलती गाड़ी का नामोनिशान तक न था. घुटनों तक पानी में डूबे लोग अफरातफरी में इधरउधर जाते नजर आ रहे थे. महानगरीय जिंदगी में एक तो वैसे ही किसी को किसी से कोई सरोकार नहीं होता और उस पर ऐसा तूफानी मंजर… हर किसी को बस घर पहुंचने की जल्दी मची थी.

अपने औफिस की पूर्णतया वातानुकूलित इमारत जिस पर हमेशा से मुझे गर्व रहा है, पहली बार रोष उमड़ पड़ा. ऐसी भी क्या वातानुकूलित इमारत जो बाकी दीनदुनिया से आप का संपर्क ही काट दे. अंदर हमेशा एक सा मौसम, बाहर भले ही पतझड़ गुजर कर बसंत छा जाए. खैर, अपनी दार्शनिकता को ठेंगा दिखाते हुए मैं तेज कदमों से सड़क पर आ गई और इधरउधर टैक्सी के लिए नजरें दौड़ाने लगी. लेकिन वहां पानी के अति बहाव के कारण वाहनों का रेला ही थम गया था. वहां टैक्सी की खोज करना बेहद मूर्खतापूर्ण लग रहा था. कुछ अधडूबी कारें मंजर को और भी भयावह बना रही थीं. मैं ने भैया से संपर्क साधने के लिए एक बार और मोबाइल फोन का सहारा लेना चाहा, लेकिन सिगनल के अभाव में वह मात्र एक खिलौना रह गया था. शायद आगे पानी इतना गहरा न हो, यह सोच कर मैं ने बैग गले से कमर में टांगा और पानी में उतर पड़ी. कुछ कदम चलने पर ही मुझे सैंडल असुविधाजनक लगने लगे. उन्हें उतार कर मैं ने बैग में डाला.

आगे चलते लोगों का अनुसरण करते हुए मैं सहमसहम कर कदम बढ़ाने लगी. कहीं किसी गड्ढे या नाले में पांव न पड़ जाए, मैं न जाने कितनी देर चलती रही और कहां पहुंच गई, मुझे कुछ होश नहीं था. लोकल ट्रेन में आनेजाने के कारण मैं सड़क मार्गों से नितांत अपरिचित थी. आगे चलने वाले राहगीर भी जाने कब इधरउधर हो गए थे मुझे कुछ मालूम नहीं. मुझे चक्कर आने लगे थे. सारे कपड़े पूरी तरह भीग कर शरीर से चिपक गए थे. ठंड भी लग रही थी. अर्धबेहोशी की सी हालत में मैं कहीं बैठने की जगह तलाश करने लगी तभी जोर से बिजली कड़की और आसपास की बत्तियां गुल हो गईं. मेरी दबी सी चीख निकल गई.

फुटपाथ पर बने एक इलैक्ट्रिक पोल के स्टैंड पर मैं सहारा ले कर बैठ गई. आंखें स्वत: ही मुंद गईं. किसी ने झटके से मुझे खींचा तो मैं चीख मार कर उठ खड़ी हुई. ‘छोड़ो मुझे, छोड़ो,’ दहशत के मारे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. अंधेरे में आंखें चौड़ी कर देखने का प्रयास करने पर मैं ने पाया कि एक युवक ने मेरी बांह पकड़ रखी थी. ‘करेंट खा कर मरना है क्या?’  कहते हुए उस ने मेरी बांह छोड़ दी. वस्तुस्थिति समझ कर मेरे चेहरे पर शर्मिंदगी उभर आई. फिर तुरंत ही अपनी असहाय अवस्था का बोझ मुझ पर हावी हो गया. ‘प्लीज, मुझे मेरे घर पहुंचा दीजिए. मैं पिछले 3 घंटे से भटक रही हूं.’

‘और मैं 5 घंटे से,’ उस ने बिना किसी सहानुभूति के सपाट सा उत्तर दिया.

‘ओह, फिर अब क्या होगा? मुझ से तो एक कदम भी नहीं चला जा रहा. मैं यहीं बैठ कर किसी मदद के आने का इंतजार करती हूं,’ मैं खंभे से थोड़ा हट कर बैठ गई.

‘मदद आती नहीं, तलाश की जाती है.’

‘पर आगे कहीं बैठने की जगह भी न मिली तो?’ मैं किसी भी हाल में उठने को तैयार न थी.

‘ऐसी सोच के साथ तो सारी जिंदगी यहीं बैठी रह जाओगी.’

मेरी आंखें डबडबा आई थीं. शायद इतनी देर बाद किसी को अपने साथ पा कर दिल हमदर्दी पाने को मचल उठा था. पर वह शख्स तो किसी और ही मिट्टी का बना था.

‘आप को क्या लगता है कि मैं किसी फिल्मी हीरो की तरह आप को गोद में उठा कर इस पानी में से निकाल ले जाऊंगा? पिछले 5 घंटे से बरसते पानी में पैदल चलचल कर मेरी अपनी सांस फूल चुकी है. चलना है तो आगे चलो, वरना मरो यहीं पर.’

उस के सख्त रवैए से मैं सहम गई थी. डरतेडरते उस के पीछे फिर से चलने लगी. तभी मेरा पांव लड़खड़ाया. मैं गिरने ही वाली थी कि उस ने अपनी मजबूत बांहों से मुझे थाम लिया.

‘तुम आगे चलो. पीछे गिरगिरा कर बह गई तो मुझे पता भी नहीं चलेगा,’ आवाज की सख्ती थोड़ी कम हो गई थी और अनजाने ही वह आप से तुम पर आ गया था, पर मुझे अच्छा लगा. अपने साथ किसी को पा कर मेरी हिम्मत लौट आई थी. मैं दूने उत्साह से आगे बढ़ने लगी. तभी बिजली लौट आई. मेरे दिमाग में बिजली कौंधी, ‘आप के पास मोबाइल होगा न?’

‘हां, है.’

‘तो मुझे दीजिए प्लीज, मैं घर फोन कर के भैया को बुला लेती हूं.’

‘मैडम, आप को शायद स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं है. इस क्षेत्र की संचारव्यवस्था ठप हो गईर् है. सिगनल नहीं आ रहे हैं. पूरे इलाके में पानी भर जाने के कारण वाहनों का आवागमन भी रोक दिया गया है. हमारे परिजन चाह कर भी यहां तक नहीं आ सकते और न हम से संपर्क साध सकते हैं. स्थिति बदतर हो इस से पूर्व हमें ही किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचना होगा.’

‘लेकिन कैसे?’ मुझे एक बार फिर चारों ओर से निराशा ने घेर लिया था. बचने की कोईर् उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. लग रहा था आज यहीं हमारी जलसमाधि बन जाएगी. मुझे अपने हाथपांव शिथिल होते महसूस होने लगे. याद आया लंच के बाद से मैं ने कुछ खाया भी नहीं है. ‘मुझे तो बहुत जोर की भूख भी लग रही है. लंच के बाद से ही कुछ नहीं खाया है,’ बोलतेबोलते मेरा स्वर रोंआसा हो गया था.

‘अच्छा, मैं तो बराबर कुछ न कुछ उड़ा रहा हूं. कभी पावभाजी, कभी भेलपुरी, कभी बटाटाबड़ा… मुझे समझ नहीं आता तुम लड़कियां बारबार खुद को इतना निरीह साबित करने पर क्यों आमादा हो जाती हो? तुम्हें क्या लगता है मैं अभी सुपरहीरो की तरह उड़ कर जाऊंगा और पलक झपकते तुम्हारे लिए गरमागरम बटाटाबड़ा ले कर हाजिर हो जाऊंगा. फिर हम यहां पानी के बीच गरमागरम बड़े खाते हुए पिकनिक का लुत्फ उठाएंगे.’

‘जी नहीं, मैं ऐसी किसी काल्पनिकता में नहीं जी रही हूं. बटाटाबड़ा तो क्या, मुझे आप से सूखी रोटी की भी उम्मीद नहीं है.’ गुस्से में हाथपांव मारती मैं और भी तेजतेज चलने लगी. काफी आगे निकल जाने पर ही मेरी गति थोड़ी धीमी हुई. मैं चुपके से टोह लेने लगी, वह मेरे पीछे आ भी रहा है या नहीं?

‘मैं पीछे ही हूं. तुम चुपचाप चलती रहो और कृपया इसी गति से कदम बढ़ाती रहो.’

उस के व्यंग्य से मेरा गुस्सा और बढ़ गया. अब तो चाहे यहीं पानी में समाधि बन जाए, पर इस से किसी मदद की अपेक्षा नहीं रखूंगी. मेरी धीमी हुई गति ने फिर से रफ्तार पकड़ ली थी. अपनी सामर्थ्य पर खुद मुझे आश्चर्य हो रहा था. औफिस से आ कर सीधे बिस्तर पर ढेर हो जाने वाली मैं कैसे पिछले 7-8 घंटे से बिना कुछ खाएपीए चलती जा रही हूं, वह भी घुटनों से ऊपर चढ़ चुके पानी में. शरीर से चिपकते पौलीथीन, कचरा और खाली बोतलें मन में लिजलिजा सा एहसास उत्पन्न कर रहे थे. आज वाकई पर्यावरण को साफ रखने की आवश्यकता महसूस हो रही थी. यदि पौलीथीन से नाले न भर जाते तो सड़कों पर इस तरह पानी नहीं भरता. पानी भरने की सोच के साथ मुझे एहसास हुआ कि सड़क पर पानी का स्तर काफी कम हो गया है.

‘वाह,’ मेरे मुंह से खुशी की चीख निकल गई. वाकई यहां पानी का स्तर घुटनों से भी नीचा था. तभी एक बड़े से पत्थर से मेरा पांव टकरा गया. ‘ओह,’ मैं जोर से चिल्ला कर लड़खड़ाई. पीछे आ रहे युवक ने आगे आ कर एक बार फिर मुझे संभाल लिया. अब वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे चलाने लगा क्योंकि मेरे पांव से खून बहने लगा था और मैं लंगड़ा रही थी. पानी में बहती खून की धार देख कर मैं दहशत के मारे बेहोश सी होने लगी थी कि उस युवक के उत्साहित स्वर से मेरी चेतना लौटी, ‘वह देखो, सामने बरिस्ता होटल. वहां काफी चहलपहल है. उधर इतना पानी भी नहीं है.

हम वहां से जरूर फोन कर सकेंगे. हमारे घर वाले आ कर तुरंत हमें ले जाएंगे. देखो, मंजिल के इतने करीब पहुंच कर हिम्मत नहीं हारते. आंखें खोलो, देखो, मुझे तो गरमागरम बड़ापाव की खुशबू भी आ रही है.’

मैं ने जबरदस्ती आंखें खोलने का प्रयास किया. बस, इतना ही देख सकी कि वह साथी युवक मुझे लगभग घसीटता हुआ उस चहलपहल की ओर ले चला था. कुछ लोग उस की सहायतार्थ दौड़ पड़े थे. इस के बाद मुझे कुछ याद नहीं रहा. चक्कर और थकान के मारे मैं बेहोश हो गई थी. होश आया तो देखा एक आदमी चम्मच से मेरे मुंह में कुनकुनी चाय डाल रहा था और मेरा साथी युवक फोन पर जोरजोर से किसी को अपनी लोकेशन बता रहा था. मैं उठ कर बैठ गई. चाय का गिलास मैं ने हाथों में थाम लिया और धीरेधीरे पीने लगी. किसी ने मुझे 2 बिस्कुट भी पकड़ा दिए थे, जिन्हें खा कर मेरी जान में जान आई.

‘तुम भी घर वालों से बात कर लो.’

मैं ने भैया को फोन लगाया तो पता चला वे जीजाजी के संग वहीं कहीं आसपास ही मुझे खोज रहे थे. तुरंत वे मुझे लेने निकल पड़े. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, लेकिन आसपास मौजूद भीड़ की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. हर किसी की जबान पर प्रकृति के इस अनोखे तांडव की ही चर्चा थी.

‘मेरा साला मुझे लेने आ रहा है. तुम्हें कहां छोड़ना है बता दो… लो, वे आ गए.’अपनी गर्भवती पत्नी को भी गाड़ी से उतरते देख वह हैरत में पड़ गया, ‘अरे, तुम ऐसे में बाहर क्यों निकली? वह भी ऐसे मौसम में?’ बिना कोई जवाब दिए उस की पत्नी उस से बुरी तरह लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. वह उसे धीरज बंधाने लगा. मेरी भी आंखें भर आईं. पत्नी को अलग कर वह मुझ से मुखातिब हुआ, ‘पहली बार कोई हैल्प औफर कर रहा हूं. चलो, हम छोड़ देंगे.’

‘नहीं, थैंक्स, भैया और जीजाजी बस आ ही रहे हैं. लो, वे भी आ गए.’

‘अच्छा बाय,’ वह चला गया.

हम ने न एकदूसरे का नाम पूछा, न पता. उस की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए मैं ने उसे एक नाम दे दिया है, ‘हीरो’  वास्तविक हीरो की तरह बिना कोई हैरतअंगेज करतब दिखाए यदि कोई मुझे उस दिन मौत के दरिया से बाहर ला सकता था तो वही एक हीरो. उस समय तो मुझे उस पर गुस्सा आया ही था कि कैसा रफ आदमी है, लेकिन आज मैं आसानी से समझ सकती हूं उस का मुझे खिझाना, आक्रोशित करना, एक सोचीसमझी चालाकी के तहत था ताकि मैं उत्तेजित हो कर तेजतेज कदम बढ़ाऊं और समय रहते खतरे की सीमारेखा से बाहर निकल जाऊं. सड़क पर रेंगते अनजान चेहरों के काफिले में आज भी मेरी नजरें उसी ‘हीरो’ को तलाश रही हैं.

Girls Education : आखिर क्यों पढ़ाई छोड़ देती हैं SC/ST लड़कियां ?

Girls Education :  आजादी के 77 साल के बाद भी एससीएसटी लड़कियों और उन के परिवारों के बीच किस बात का डर बैठा है. जिस से वह लड़कियों को घर से बाहर भेजने में डरते हैं. उन की पढ़ाई छुड़वा देते हैं.

देशराज अपनी 18 साल की बेटी की शादी का न्यौता देने गांव के प्रधान इन्द्र प्रताप के पास गया. गांव के प्रधान ने पूछा, ‘इतनी कम उम्र में शादी क्यों कर रहे हैं? तुम ने बेटी को स्कूल की पढ़ाई भी नहीं करने दिया? कानून और संविधान के बहुत सारे प्रयासों के बाद भी दलित लड़कियां जल्दी पढ़ाई छोड़ रही हैं और उन की शादी भी जल्दी हो जा रही हैं. जिस से कम उम्र में कई बच्चों का पैदा होना उन को बीमार बनाता है.

‘पढ़ाई छोड़ने के कारण वह अच्छी नौकरी नहीं कर पाती हैं. जिस से मजदूरी ही करती रहती हैं. आजादी के 77 सालों के बाद आखिर एससीएसटी लड़कियों की ऐसी हालत क्यों है ? एससीएसटी वर्ग हिंसा का ज्यादा शिकार होता है. यह गरीब हैं और लड़कियां हैं. इसलिए इन को नीची नजरों से देखा जाता है. इन के पक्ष में खड़े होने वाले कम होते हैं. इसलिए इन्हें यौन हिंसा का ज्यादा शिकार होना पड़ता है.’

देश की आबादी में एससीएसटी महिलाओं की संख्या 18 से 20 फीसदी है. आजादी और आरक्षण के बाद भी वे जातीय व्यवस्था और भेदभाव का शिकार हैं. इन की परेशानी यह है कि ये घर के अंदर और बाहर दोनों ही जगहों पर उत्पीड़न का शिकार होती हैं. जिस कारण इन की पढ़ाई जल्दी छुड़वा दी जाती है. जबकि लड़कों को पढ़ने भेजा जाता है. मातापिता लड़कियों को जिम्मेदारी भरा बोझ समझ कर शादी कर देना चाहते हैं. जिस से इन की जिम्मेदारी पति उठाए.

जातिगत होती है यौन हिंसा

एससीएसटी लड़कियों के साथ किस तरह से जातिगत यौन हिंसा होती है उत्तर प्रदेश का हाथरस कांड इस का प्रमुख उदाहरण है. यहां एससी लड़की के साथ कथित तौर पर ऊंची जाति के लोगों द्वारा बलात्कार और हत्या का मसला सुर्खियों में रहा है. गांव के क्षेत्रों में एससी महिलाएं यौन हिंसा की शिकार रही हैं. यहां की अधिकांश भूमि, संसाधन और सामाजिक शक्ति उच्च और मध्यम जातियों के पास है.

एससीएसटी के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए 1989 में बनाए गए कानून के बावजूद, एससीएसटी महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कोई कमी नहीं आई है. आज भी इन का पीछा किया जाता है. इन के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं होती हैं. विरोध करने पर इन की हत्या भी की जाती है.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दिन 10 एससीएसटी महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में एससीएसटी लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा के सब से अधिक मामले होते हैं. 500 एससीएसटी महिलाओं पर की गई एक रिसर्च से पता चलता है कि 54 फीसदी महिलाओं पर शारीरिक हमला किया गया, 46 फीसदी महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया, 43 फीसदी महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना किया, 23 फीसदी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ तथा 62 फीसदी महिलाओं के साथ गालीगलौज की गई.

क्या है 1989 का कानून

1989 का कानून अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के नाम से जाना जाता है. इस को एससीएसटी एक्ट के नाम से भी जाना जाता है. यह अधिनियम, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव और हिंसा से बचाने के लिए बनाया गया था. यह अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 17 पर आधारित है. इस अधिनियम को 11 सितंबर, 1989 को पारित किया गया था और 30 जनवरी, 1990 से इसे जम्मूकश्मीर को छोड़ कर पूरे भारत में लागू किया गया.

कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू होने के कारण वहां यह कानून लागू नहीं हो सका था. 2019 में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अब यह कानून वहां भी लागू होता है. इस अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ शारीरिक हिंसा, उत्पीड़न, और सामाजिक भेदभाव जैसे अपराधों को अत्याचार माना गया. इस अधिनियम के तहत इन अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है. ऐसे अपराधों के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की गई है. इस के तहत ही पीड़ितों को राहत और पुनर्वास दिया जाता है. पीड़ितों को अपराध के स्वरूप और गंभीरता के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है.

कम उम्र की लड़कियां होती हैं शिकार

भारत के 16 जिलों में एससीएसटी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा की 100 घटनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि 46 फीसदी पीड़ित 18 वर्ष से कम आयु की थीं. 85 फीसदी 30 वर्ष से कम आयु की थीं. हिंसा के अपराधी एससी सहित 36 विभिन्न जातियों से थे. इस का अर्थ यह है कि दूसरी जाति के लोग ही नहीं अपनी जाति के लोग भी एससीएसटी महिलाओं पर हिंसा करते हैं. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि अब यह लड़कियां मुखर हो कर अपनी बात कहने लगी हैं. इन की आवाज को दबाने के लिए हिंसा की जाती है. एससी के बढ़ते दबदबे से सवर्ण जातियां विरोध करने लगी हैं.

एससी परिवारों में जागरूक और पढ़ेलिखे लोग भी अपनी लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए अवसर दे रहे हैं. ज्यादातर परिवार अपनी लड़कियों की पढ़ाई कक्षा 5 से 8 के बीच छुड़वा दे रहे हैं. पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या में दलित लड़कियां सब से आगे पाई जाती हैं. आज भी 18 से 20 साल के बीच इन की शादी तय कर दी जाती है. जो औसत उम्र से काफी कम है. जिस वजह से इन को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है. आंकड़ों के अनुसार 25 फीसदी आदिवासी और 20 फीसदी दलित 9वीं और 10वीं कक्षा में स्कूल छोड़ देते हैं.

एससीएसटी महिलाओं के साथ यौन हिंसा जीवन के हर पहलू में प्रभाव डाल रही है. इन को काम करने की जगहों पर यौन उत्पीड़न, लड़कियों की तस्करी, यौन शोषण और घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है. 20 साल एससी महिला प्रेमा बताती हैं, ‘जब वह पहली बार पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने गई, तो पुलिस ने उन के बलात्कार और अपहरण की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया. थाने में बिचौलिए ने कहा कि मैं आरोपी से कुछ पैसे ले लूं और मामले में समझौता कर लूं. समझौता करने के लिए दबाव बनाया गया.’

परिवार पर पड़ता है प्रभाव

आज भी पुलिस में एफआईआर दर्ज कराना सरल नहीं है. कई बार थाने में एफआईआर नहीं लिखी जाती तो पुलिस अधिकारियों तक जाना पड़ता है. पुलिस ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचने के बाद ही एफआईआर दर्ज कीं. कई मामलों में अदालत के आदेश के बाद ही मुकदमा हो पाता है. पुलिस और कोर्ट के चक्कर काटने में ही घर परिवार और नौकरी तक प्रभावित होती है. कई लोगों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है क्योंकि कोर्ट केस लड़ने के लिए उन को छु्ट्टी नहीं मिलती है.

देवरिया के रहने वाले राधे श्याम की 17 साल की बेटी कविता का अपहरण कर लिया गया. 2 साल तक उसे तस्करी, यौन शोषण और बाल मजदूरी का शिकार होना पड़ा. कई अलगअलग शहरों में मुकदमें दर्ज हुए. पुलिस के बयान, टेस्ट के लिए उसे अपनी बेटी को साथ ले कर जाना पड़ता था. इस के लिए उसे छुट्टियां लेनी पड़ती थी. जिस की वजह से काम से निकाल दिया जाता था. राधे श्याम बताते हैं, ‘मेरी बेटी के साथ बलात्कार हुआ. लेकिन उस की शिकायत करने पर थाना, अस्पताल और कचहरी में वही बात इतनी बार पूछी गई कि मुझे रोजरोज उस पीड़ा से गुजरना पड़ता था.’

एससीएसटी की ज्यादातर महिलाएं मजदूरी करती हैं. ऐसे में उन को पैसा देने वाले ठेकेदार और मैनेजर टाइप के लोग पैसा देने के बहाने जबरदस्ती करते हैं. उन को ज्यादा पैसा देने की बात कह कर यौन शोषण करना चाहते हैं. आज बड़ी संख्या में घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाली लड़कियों और महिलाओं के साथ भी ऐसी घटनाएं खूब घट रही हैं. 1997 में विशाखा कमेटी के दिशानिर्देश केवल कागजी साबित हो रहे हैं. इन महिलाओं के खिलाफ हिंसा कार्यस्थल और घर दोनों जगहों पर मौजूद है. घरेलू काम करने वाली लड़कियों की उम्र 15 से 18 साल होती है. यह शारीरिक हिंसा की सब से ज्यादा शिकार होती हैं.

चरित्रहीन साबित कर होती है बदनामी

बहुत सारी जागरूकता के बाद भी यौन हिंसा और रेप जैसी घटनाओं को महिलाओं के चरित्र से जोड़ कर देखा जाता है. इस में दोषी महिला को ही समझा जाता है. उसे ‘चरित्रहीन’ साबित किया जाता है. रूचि नामक एक एससी लड़की अपने परिवार की मदद करने के लिए एक डाक्टर दंपति के यहां घरेलू नौकरी करती थी. महिला डाक्टर के पति ने उस को लालच दे कर अपने साथ सैक्स करने के लिए तैयार कर लिया. एक दिन उन की पत्नी ने देख लिया. पतिपत्नी में थोड़ी नोंकझोंक हुई. इस का शिकार रूचि बनी. उसे चरित्रहीन बता कर काम से निकाल दिया. इस के बाद उस पूरी कालोनी में रूचि को दूसरी नौकरी नहीं मिली. लड़की ने बदनामी से बचने के लिए इस बात को दबा दिया.

रेप को दुर्घटना मान कर घर परिवार और समाज उस लड़की को आगे नहीं बढ़ने देते हैं. उस को चरित्रहीन समझा जाता है. ऐसे में वह जीवन भर उस पीड़ा को भूल नहीं पाती है. ऐसे में एससीएसटी परिवारों में लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है. जिस से किसी तरह की बदनामी से बचा जा सके. यह बात और है कि कम उम्र में शादी और मां बनने से लड़कियों का कैरियर और हैल्थ दोनों पर ही खराब प्रभाव पड़ता है. जिस से तरक्की की दौड़ में वह दूसरी महिलाओं से काफी पीछे छूट जाती है.

एससीएसटी समाज की लड़कियों के लिए सब से कठिन अपने ही घर परिवार के लोगों को समझाना होता है. जिस की वजह से उन की स्कूली पढ़ाई पूरी नहीं होती. वह शिक्षा से आज भी वंचित रह रही हैं.

Motivation : बुरे दौर से निकलने के लिए फ्रेश स्‍टार्ट करें, टोटके नहीं

Motivation : सब कुछ समय पर छोड़ कर, हाथ पर हाथ रख कर बैठने से कुछ सही नहीं होगा. चीजें और ज्यादा खराब ही होंगी. अपनी समस्यों से भागे नहीं बल्कि उन का सामना करते हुए कोशिश करते रहें और सब कुछ खुद से ही ठीक करने की कोशिश करें.

इसे ऐसे समझें

अगर कोई दूसरी कक्षा का छात्र शिकायत करे कि उस से दसवीं कक्षा के सवाल नहीं हल हो रहे, तो उसे आप समझदार कहेंगे या उस की बात पर हंस देंगे? दसवीं कक्षा के सवाल हल करने की कोशिश आठवींनौवीं में आ कर करना, अभी जो सामने है उस को समझें और उचित कदम उठाएं. कुछ लोग हर बात में कह देते हैं कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाता है. अरे भईया, अगर आप की टांग टूटी है और आप डाक्टर के पास नहीं गए, आप ने प्लास्टर नहीं करवाया. तो बेशक आप की टांग ठीक हो जाएगी. लेकिन आप जिंदगी भर लंगड़ाते रहोगे.

क्यूंकि जिस तरीके वो टूटी है न वो वैसे ही वह उलटी सीधी जुड़ जाएगी. लेकिन अगर उसे सही जगह जुड़वाना है तो वह खुद नहीं जुड़ेगी बल्कि डाक्टर की मदद से सही जगह जोड़नी पड़ेगी. वक्त पर छोड़ कर हाथ पर हाथ रख कर बैठने से सिर्फ नुकसान ही होगा, चीजें और उलझ सकती हैं आप को ठीक करना पड़ता है. इसी तरह वक्त के साथ सब ठीक नहीं होता. इसलिए प्रोफेशनल गाइडेंस ले, अपने आसपास के लोगों से मदद लें.

ये मत समझिए कि वो तो वीक लोगों का काम है. अगर आप को अपने को पूरी तरह से ठीक करना है तो ये तो करना ही पड़ेगा. अपनी समस्याओं का हल भी निकालना पड़ेगा और उन्हें ठीक भी करना पड़ेगा. जो ये सोचते हैं ठीक हो जाएगा उन के अपने घर में कमजोरी है. वो अपनी कमजोरी पर ध्यान नहीं दे रहें और सोचते हैं कि सब अपने आप ठीक हो जाएगा.

अगर लड़का पढ़ा नहीं, तो पिता का खुद का मध्यम वर्ग है, मां पढ़ीलिखी तो है पर नौकरी नहीं करती, वो जो 40 -50 हजार की आमदनी है उसी में खुश है. लड़के को पढ़ाने में उन्होंने कोई रूचि नहीं दिखाई, लड़के ने कोई स्किल भी सीखने की कोशिश नहीं की. क्यूंकि उसे लाइफ में कुछ करने, आगे बढ़ने की प्रेरणा कहीं से मिली ही नहीं, वह भी मां की तरह जो जैसा है उसी में खुश है. उसे भी लाइफ में आगे बढ़ कर कुछ नया करने की सोच या इच्छा नहीं है. फिर सब सोचते हैं सब ठीक हो जाएगा. अरे, ठीक कहां से होगा जब सारे इनपुट खराब है.

ये वही परिवार हैं जो चमत्कारों के भरोसे बैठे हैं. और बड़ाबड़ा चढ़ावा पंडितों को देते हैं, वो भी इन की कुंडली देख कर बेतुके हल बताते हैं कि अपने आप सब ठीक हो जाएगा. अभी ग्रह नक्षत्र की दिशा कुछ सही नहीं है, समय सही नहीं चल रहा, कुछ समय बाद अपने आप सब ठीक हो जाएगा.
अपनी जमीनी हकीकत को देखों चीजें अपने आप नहीं ठीक होती हैं.
आप बगैर इट, सीमेंट लाए पक्का मकान नहीं बना सकते. कच्चा मकान घासफूस से बना भी लिया तो इस तरह पहली बारिश में वो ढह जाएगा. इसलिए पहले अपने घर की नींव मजबूत करें. अपने घर की समस्याएं हल करें.

इस के लिए किसी की मदद लें सही करने के लिए हाथपैर मारें और इन पंडितों के जाल से बाहर निकल कर हकीकत की दुनिया में कदम रखें और वक्त के साथ सब सही नहीं होता बल्कि वक्त के साथ कदम से कदम मिला कर चलें और सब सही करने की कोशिश में खुद जुट जाएं. आइए जाने कुछ ऐसे ही सिचुएशन के बारे में जिन का हल खुद नहीं निकलता बल्कि निकालना पड़ता है.

सिचुएशन-1 लड़का कमाता नहीं, तो कोई नहीं शादी करा दो जिम्मेवारी आ जाएगी

कई घरों में देख ने में आता है कि अगर लड़का घर पर बेकार बैठा है, वो कुछ कमाता नहीं है, उसे किसी भी चीज कि कोई जिम्मेवारी नहीं है, तो अक्सर मातापिता को लगता है या रिश्तेदार ऐसा कहते हैं कि कोई नहीं अब इस की शादी करा देते हैं जिम्मेवारी पड़ेगी बीवी आएगी तो कमाना सीख ही लेगा. जब सर पर पड़ती है तो सब आ ही जाता है, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

हल क्या है- अपने निकम्मे लड़के की शादी करा देने से वह जिम्मेवार हो जाएगा यह सोच ही अपने आप में गलत है. बल्कि उस के बाद तो आप दोदो लोगों की जिम्मेवारी झेलेंगे. इस से तो अच्छा है अपने घर को ठीक करें, पहले जाने की बेटा पढ़ा क्यूं नहीं? क्या उस की रूचि किसी और चीज में है? उसे कोई प्रोफेशनल हेल्प दिलाएं, उस की समस्याओं का पहले हल निकाले, उसे किसी और स्किल में तैयार करें, किसी के साथ कोई बिजनेस कराएं और अगर वह चल पड़े तब शादी का सोचें.
किसी पंडित के कहने में आ कर कि शादी के बाद बेटा कमाने लगेगा यह बात ठीक नहीं है. शादी के बाद कोई चमत्कार नहीं होने वाला. बल्कि ऐसा कर के आप लड़की की जिंदगी भी खराब कर रहे हैं. जब तक बेटा कमाने लायक ना हो जाएं तब तक उस की शादी करना ठीक नहीं.

सिचुएशन 2-शादी में कुछ ठीक नहीं चल रहा कोई नहीं बच्चा कर लो सब ठीक हो जाएगा

कई बार देखने में आता है कि शादी में अगर पतिपत्नी की आपस में बन नहीं रही हो. दोनों के बीच झगड़े बढ़ते ही जा रहे हो, दोनों को एकदूसरे की शकल तक पसंद नहीं, बात इतनी बढ़ती जा रही है कि घरवालों तक पहुंच गए. बस फिर क्या था उन्होंने निकाल लिया एक हल कि बच्चा कर लो सब ठीक हो जाएगा. अब यहां यह बात समझ नहीं आई कि लड़ाई पतिपत्नी की है उस में बच्चे का क्या रोल.
उलटे बच्चे के आने से दोनों का रिश्ता और ज्यादा खराब हो जाएगा, बच्चे की जिम्मेवारी को ले कर झगड़े और बढ़ेंगे. तब तो हालत यह हो जाएगी कि न छोड़ते बनेगा और न ही साथ रहते. इसलिए सब ठीक करने का यह तरीका बहुत गलत है. कई बार पतिपत्नी बच्चे के चलते अपनी टोक्सिक शादी को निभाने के लिए मजबूर हो जाते हैं और फिर आधी जिंदगी लड़तेमरते बीत जाने पर बच्चों के बड़ा होने पर अलग होने का कोई फैसला करते है इस में ताउम्र बच्चे भी पिसते है.

हल क्या है- पतिपत्नी में अनबन है तो समय के साथ बच्चा होने पर कुछ भी ठीक नहीं होगा बल्कि अब 2 नहीं 3 लोग इस शादी में पीसेंगे इसलिए अगर नहीं बन रही है तो साथ बैठ कर बातचीत के जरिए अपने मसलों को सुलझाएं.
अगर फिर भी बात नहीं बन रही और लग रहा है गलत साथी का चुनाव हो गया है तो बच्चा लाने की तो सोचिए भी मत बल्कि इस टोक्सिक शादी से बाहर कैसे निकला जाए इस पर विचार करें ऐसे शादी में बच्चा समस्या का हल नहीं बल्कि खुद एक बड़ी समस्या बन कर पतिपत्नी के सामने आ जाता है.

सिचुएशन 3- पढ़ाई में मन नहीं है तो भी कौमर्स दिला दो, एडमिशन हो जाएगा तो पास भी हो ही जाएगा

अगर टीनएजर का मन नहीं है पढ़ाई में और उस ने स्कूल भी बहुत रो रो कर पास किया है, तो फिर ऐसे में यह सोचना कि कोई नहीं कालेज में एडमिशन तो लेना ही पड़ेगा, जब एडमिशन हो जाएगा तो पढ़ भी लेगा ही. ये सोच गलत है. ऐसे में वह और भी फ़्रस्टेटिड हो जाएगा. उसे पता ही नहीं चलेगा कि उसे लाइफ में करना क्या है. पढ़ाई वह कर नहीं पा रहा बिजनेस की उसे समझ नहीं. इसलिए कुछ सालों बाद न उसे जौब मिलेगी न ही कोई और स्किल उस के पास होंगे.

हल क्या है- अगर टीनएजर की पढ़ने में रूचि कम है तो उस के साथ बैठे उस की समस्याओं को समझें कि आखिर क्या वजह है जो वह पढ़ नहीं पा रहा. उसे कोई गाइडेंस चाहिए तो वो दें. उस का इंट्रेस्ट पढ़ाई में नहीं है और वो डांस, सिंगिंग या किसी और लाइन में कुछ करना चाहता है तो उसे वह कराएं. कई बार टीनएजर अपने मन के काम के ज्यादा सफल हो सकते हैं. पढ़ाई तो प्राइवेट भी पूरी कराई जा सकती है.

सिचुएशन 4- सासबहू की नहीं बन रही हो भी साथ में रहो समय लगेगा सब ठीक हो जाएगा

अगर सासबहू की नहीं बन रही, उन की पटरी साथ में नहीं जम रही, दोनों एकदूसरे को टार्चर करने और नीचे देख ने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहीं तो भी साथ में रहों क्यूंकि सब ठीक जो करना है. भले ही इस ठीक करने के चक्कर में सासबहू के साथसाथ और भी रिश्ते दांव पर क्यूं न लग जाए, पतिपत्नी का रिश्ता तलाक तक क्यूं न पहुंच जाएं? पर साथ में रहना जरुरी है. क्या ये सही है?

हल क्या है – अगर सासबहू की नहीं बन रही, तो ये किस किताब में लिखा है कि दोनों को पूरा जीवन लड़तेमरते एक ही घर में रहना जरुरी है? क्यूं बहू अलग घर में नहीं रह सकती? जब कि अगर नहीं बन रही और अलगअलग रहना शुरू कर दें तो एक संभावना है कि रिश्ते आगे जा कर इतने तो रही जाएंगे कि दोनों कभीकभार खुशी या गम के मौके पर एक साथ खड़े हो जाएं लेकिन अगर साथ रहें तो कुछ सालों बाद एकदूसरे की शकल भी बर्दाश नहीं करेंगे. इसलिए ये सब अपने आप ठीक नहीं होगा बल्कि दोनों को उन की जिंदगी अपनेअपने ढंग से जीने दें तभी दोनों एकदूसरे की थोड़े इज्जत कर पाएंगी.

सिचुएशन 5- जौब में सही नहीं चल रहा, तो भी उसी में टिके रहो कुछ समय में सब ठीक हो जाएगा

अभी हाल ही में पुणे की कंपनी की एक सीए लड़की की मौत की खबरें खूब पढ़ने में आई जो अपने ज्यादा काम के बोझ की वजह से परेशां थी और इसलिए उसे अटैक आ गया क्यूंकि उस ने भी सोचा होगा सब ठीक हो जाएगा. लेकिन जब जौब का वर्कप्रेशर वो नहीं झेल पा रही थी, तो जौब छोड़ने का फैसला उस ने क्यूं नहीं लिया? परेशां होते रहना लेकिन फिर भी अपनी समस्या का हल न निकालना और उसे वक्त पर छोड़ देना कहां की समझदारी है.

हल क्या है –अगर आप की कंपनी में आप के साथ कोई पोलटिक्स हो रही है, वर्कप्रेशर ज्यादा है, वहां काम करना अच्छा नहीं लग रहा, तो ये चीजें अपने आप ठीक नहीं होंगी. आप को ठीक करनी पड़ेगी. जो चीज पसंद नहीं या जिस के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहें उसे बताना पड़ेगा. अपने लिए खुद ही माहौल सही करना पड़ेगा, ज्यादा काम के लिए न बोलना पड़ेगा. लेकिन ऐसा कुछ करने के बजाए आप सोचें की कुछ समय में ये सब खुद ही ठीक हो जाएगा तो ये खुद कभी ठीक नहीं होगा. ठीक करने के लिए आप को मेहनत करनी होगी. आवाज उठानी होगी, और फिर भी अगर सही नहीं होता तो खुद ही ये जौब छोड़ कर दूसरी लेनी होगी.

 

जब समय ठीक न चल रहा हो, तो ये काम करने से मदद मिल सकती है:

सकारात्मक सोच रखें- क्यूंकि आप की सोच ही है जो आप को मुश्किल समय से निकाल सकती है.
परिवार का सहारा लें- परिवार की एकता में बहुत शक्ति होती है अपनों के साथ के भरोसे बड़ी से बड़ी कठिनाई को पार किया जा सकता है.
खुद को खुश रखें- जब आप हर हाल में खुश होंगे तभी तो आगे बढ़ने के बारे में रिलैक्स माइंड से कुछ सोच पाएंगे.
बारबार कोशिश करते रहें- अगर किसी काम में सफलता नहीं मिल रही तो भी कोशिश करते रहें. हिम्मत न हारे. एक दिन सफलता जरूर मिलेगी.
अपनी असफलता के कारणों का विश्लेषण करें- यह करना बहुत जरुरी है ताकि पता चल सके कि आप का मनचाहा आखिर हो क्यूं नहीं रहा. उन कारणों को ढूंढें और उन्हें खुद ही दूर करने का प्रयास करें.
अपनी कार्यशैली में बदलाव करें- हो सकता है जो काम आप कर रहे थे वह सही न हो. जिस तरह से कर रहे थे वह तरीका ही गलत हो. इसलिए पहले अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएं.
किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सलाह लें- अगर खुद कुछ समझ नहीं आ रहा तो किसी की मदद लें और अपनी समस्याओं को समझाने की कोशिश करें नाकि उन से भागें.
फिजिकल एक्टिविटीज करें- जी हां, डेली एक्सरसाइज, योग करने से मन शांत होता है और नएनए आईडिया आते हैं जिस से काम में मदद मिलती है.
काउंसलर से मिलें- काउंसलर से मिलने को कोई हौवा न बनाए वो आप की मदद के लिए ही हैं. उन से बात कर के बहुत सी ऐसी बातें आप के बारें में जान लेंगे जिन के बारे में आप को खुद भी पता नहीं होगा. फिर समस्या का हल भी बताएंगे.
अच्छे समय खुद नहीं आता – जीवन में हमें कभी किसी भी खास समय का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने हर समय को खास बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए. धैर्य बनाए रखें बारबार कोशिश करते रहें और हार न मानें. जब जीवन में कुछ भी सही नहीं होता है, तो हमें अपने मन को बदलने के लिए क्या करना चाहिए?

जब जीवन में कुछ भी सही नहीं हो रहा है, तो आप सब से पहले अपने मन को शांत करने की कोशिश करें, आप भी जानते हैं कि जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं होता है. इसलिए सब्र रखिए मित्र ये समय भी ‌‌‌‌‌‌‌निकल जाएगा, इस दौरान अपने परिवार, मित्रों के साथ समय बिताएं, उस से बात करें.
मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें- ध्यान, योग, या अन्य विश्राम तकनीकों का इस्तेमाल करें.
थोड़ी देर के लिए आराम करें- इस से ताजगी महसूस होती है और बेहतर फैसले लिए जा सकते हैं.
पौजिटिव गाने सुनें: इस से शरीर में एंडोफिन हार्मोन रिलीज होता है और बेहतर महसूस होता है.
विश्वास बनाए रखें: यह याद रखें कि कुछ भी हमेशा के लिए नहीं रहता. जीवन में उतारचढ़ाव आते रहते हैं.
इसलिए ऐसा हो सकता है कि रौशनी कम है और आप को मंजिल तक का पूरा रास्ता साफ नहीं दिख रहा, पर फिर भी दो कदम चलने लायक रौशनी है, तो आप का दायित्व है कि आप दो कदम चलें, आप जैसे ही थोड़ा आगे पहुंचेंगे आप को फिर कुछ कदम लेने लायक रौशनी मिल जाएगी, बस यह मांग मत रखिए कि आप को आखिरी कदम तक सब एक बार में क्यों नहीं दिख रहा.

 

Home Buying Tips : घर खरीदने से पहले बेहद जरूरी है जानना

Home Buying Tips :अपना घर अपना ही होता है भले छोटा ही हो. कई बार हम घर खरीदते समय ऐसी लापरवाहियां कर बैठते हैं जो बाद में दिक्कत देती हैं. आज के समय में घर खरीदते समय सावधानियां बरतना बहुत जरूरी होता है.

विवाह के बाद आजकल सब से पहले युवा दंपत्ती घर खरीदने के बारे में सोचते हैं, पर घर एक ऐसी खरीदारी है जिस के लिए एक लंबी प्लानिंग और जांचपड़ताल की जरूरत होती है. अपना घर होना सब का एक सपना होता है और यह किसी भी आम आदमी के जीवन की सब से बड़ी खरीदारी होती है.

आजकल युवा दंपत्ती बहुत जल्दी से अपना फ्लैट खरीदने के बारे में फैसला ले लेते हैं या कोई प्लौट खरीदना चाहते हैं. फ्लैट्स ज्यादा खरीदे जा रहे हैं, शहरों में इसी स्पीड से नईनई सोसाइटी देखतेदेखते ही खड़ी हो जाती हैं. इस का एक कारण यह भी हो सकता है कि गांव से अधिकतर लोग शहरों में आ कर बसने लगे हैं. घर बनाने से पहले कुछ जरूरी बातें जान लेनी चाहिए जिन से मेहनत से बनाया आशियाना सुरक्षित रह सके. कई शहरों में जीवन भर की जमा पूंजी से या होम लोन ले कर खुद की छत बसाने वालों की आंखों में कुछ गलतियों के कारण आंसू आ जाते हैं.

शहर में बिल्डर या प्रौपर्टी ब्रोकर चमकदार, स्टाइलिश ब्रोशर और कई तरह की स्कीम दिखा कर प्रौपर्टी बेच देते हैं. मुनाफे के लालच में अवैध निर्माण भी कर दिया जाता है जिसे आम आदमी समझ नहीं पाता. अकसर रजिस्ट्री हो जाने के बाद हम बेफिक्र हो जाते हैं पर इस के बावजूद कई ऐसे दस्तावेज हैं जिन्हें पहले ही देख लें तो बाद में मुश्किलें नहीं आएंगीं.

वे जरूरी बातें हैं

  •  जहां बिल्डिंग बनी है, उस का नक्शा विक्रेता से मांगें.
  • यदि बिल्डिंग या भवन निगम सीमा में है तो संबंधित जोनल औफिस या निगम औफिस से उस की जांच करवाएं.
  • निर्माण जिस भूखंड पर है, उस का नक्शा पास है या नहीं.
  • प्लौट का भूमि उपयोग क्या है?
  • प्लौट जिस नक्शे पर बना है वह कब पास हुआ और सही प्रक्रिया से पास है या नहीं.
  • जिस प्लौट पर बिल्डिंग बनी है, उस का उपयोग आवासीय है या कमर्शियल. कई जगह दोनों उपयोग भी नक्शे में होते हैं.
  • आप का फ्लैट किस श्रेणी में आ रहा है, यह नक्शे में दर्शाया होता है.
  •  कमर्शियल प्लौट की अनुमति टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से मिलती है.
  • फ्लैट के लिए प्रकोष्ठ पात्र मांगें. यह वह दस्तावेज है जिस से आप का उस बिल्डिंग में कितने हिस्से पर अधिकार है और बिल्डिंग के टूटने, गिरने या किसी अन्य तरह की घटना में जमींदोज होने पर आप के पास क्या बचेगा का प्रमाण होता है. यदि नई बिल्डिंग है तो यह दस्तावेज बिल्डर से मांगें. यदि आप फ्लैट पहले खरीद चुके हैं और प्रकोष्ठ पत्र नहीं लिया है तो निगम में रजिस्ट्री दिखा कर आवेदन करें.
  • बिल्डिंग या मकान जिस प्लौट पर है, उस प्लौट पर और जो फ्लैट या मकान खरीद रहे हैं, उस पर लोन तो नहीं है?
  •  यदि फ्लैट नया है तो पानी के कनेक्शन की स्थिति देख लें. यदि सामूहिक बोरिंग है तो उस में आप को कितना भुगतान करना होगा, यह भी देख लें. बिजली बिल में दर्ज रीडिंग का मीटर से मिलान कर लें. देख लें मीटर खराब या बिल बकाया तो नहीं?
  • पुराने फ्लैट में बिजली, पानी के पुराने बिल जरूर मांगें. बिल्डिंग के सामूहिक बिजली बिल और मेंटेनेंस की जानकारी भी ले लें.
    फ्लैट खरीदने से पहले उस की लोकैलिटी, अपना बजट, बिजली पानी की सुविधा जैसी बेसिक चीजें देख लेनी चाहिए. इस से फ्लैट की रीसेल वैल्यू भी अच्छी बनी रहती है. आजकल लोग इंडिपैंडेंट मकान की बजाए फ्लैट्स या अपार्टमेंट्स को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं. फ्लैट का कारपेट एरिया, लैंड रिकौर्ड, प्रौपर्टी की कानूनी जानकारी, पजेशन की डेट, लोन देने वाले बैंक, बिल्डर बायर एग्रीमेंट, फ्लैट का लोकेशन सब की अच्छी जानकारी पूरी तरह से ले लें.

अनबन हो जाए और तलाक हो जाए

कई बार ऐसी स्थिति भी बन जाती है कि पतिपत्नी में कुछ अनबन हो जाए और तलाक हो जाए, और होम लोन लिया हुआ हो तो इस से जुड़ी भी कुछ बातें जान लेनी चाहिए जैसे- तलाक के बाद होम लोन की स्थिति कई चीजों पर निर्भर करती है जैसे कि लोन किस के नाम पर लिया गया है, कितने सह आवेदक हैं और कोर्ट के आदेश क्या कहते हैं. इसे ऐसे समझा जा सकता है

  • यदि होम लोन केवल एक व्यक्ति के नाम पर है तो लोन की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होगी.
  • यदि लोन दोनों के नाम पर है तो लोन चुकाने की जिम्मेदारी दोनों की है भले ही तलाक हो गया हो.
  • यदि संपत्ति तलाक के बाद किसी एक व्यक्ति को दे दी जाती है तो कोर्ट के आदेश के अनुसार वह व्यक्ति लोन चुकाने का जिम्मेदार हो सकता है.
  • संपत्ति का स्वामित्व और लोन भुगतान अलग हो सकते हैं. यह बैंक और कोर्ट के फैसले पर निर्भर करता है.
  • बैंक के लिए लोन चुकाने वाले व्यक्ति की प्राथमिकता होती है, न कि तलाक से जुड़े मामले.
  • यदि दोनों पक्ष सहमत हैं तो बैंक से लोन ट्रांसफर या सह आवेदक को हटाने की बात की जा सकती है. लेकिन बैंक सह आवेदक को तभी हटाता है जब लोन पूरी तरह से एक व्यक्ति संभाल सके.
  • तलाक के बाद दोनों पक्षों को बैंक के साथ एक नया समझौता करना पड़ सकता है ताकि लोन का भुगतान और संपत्ति का मालिकाना स्पष्ट हो.

ऐसे में क्या कर सकते हैं?

1- बैंक से सलाह लें. अपने बैंक से मिल कर लोन की स्थिति और समाधान के बारे में बात करें.
2- तलाक और संपत्ति के बंटवारे के लिए एक वकील की हेल्प लें.
3- दोनों पक्ष आपस में बात कर के इस का हल निकालें.
4- यदि एक व्यक्ति पूरी तरह से लोन का भुगतान करने के लिए तैयार है तो लोन को रीफाइनैंस करने का विकल्प हो सकता है.

बढ़ती महंगाई के साथ अपना घर लेना बड़ी बात है, होम लोन सिर पर हो तो और भी प्रैशर रहता है. खूब छानबीन के बाद फ्लैट फाइनल करें. जो परिचित फ्लैट ले चुके हैं, उन से भी सलाह जरूर ले लें. अपनी सैलरी, अपने खर्चे अच्छी तरह से देख कर फ्लैट लेने की सोचें. दिखावे के चक्कर में न पड़ें. ईएमआई कितनी दे सकते हैं, यह भी सोच लें.
आर्थिक परेशानियों के दबाब के चलते आपस में मनमुटाव की नौबत न आए, इस बात का भी ध्यान रखें. उस के बाद भी आजकल अच्छा कमाने वालों का लाइफस्टाइल भी काफी खर्चीला हो गया है, और बहुत से खर्चें होते हैं, उन सब को ध्यान में रखते हुए घर लें. जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारें, यह कहावत हर जमाने में फिट बैठती आई है. कुछ महीने कम खर्चों में गुजारें, एक बार लोन की किस्तों के साथ कुछ समय एडजस्ट कर लें तो इंटीरियर कराएं. एक साथ सब काम न करवाएं. धीरेधीरे जेब और बचत देख कर काम करवाते रहें.

पंडों व वास्तुशास्त्रियों के लफड़ों में न पड़ें

सुमित पुजारी और गीता पुजारी दोनों वर्किंग हैं. शादी के दो साल वे सुमित के पेरैंट्स के साथ रहे, फिर उन्होंने उसी सोसाइटी में अपना फ्लैट होम लोन पर ले लिया. पेरैंट्स आतेजाते रहते हैं. दोनों अपने इस घर में बहुत खुश हैं. धीरेधीरे उन्होंने अपने फ्लैट का इंटीरियर करवाया, एकसाथ सब कुछ नहीं किया. मुंबई जैसे शहर में एक अपना सुंदर फ्लैट होना उन्हें बहुत खुशी देता है, इसे वे अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं.

फ्लैट में धूप और हवा का आनाजाना देखें, हो सके तो तर्क बुद्धि के साथ फ्लैट खरीदें, किसी पंडित को ले कर फ्लैट का शुभलाभ न दिखवाते फिरें. यहां मीरा के उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है.

कई साल पहले मीरा नईनई मुंबई आई थी, वह अपने पति और परिचित दंपत्ती के साथ कई फ्लैट्स देखने गई. मित्र खुद को वास्तु शास्त्र के विद्वान् बताते थे, जो फ्लैट्स मीरा और उस के पति को पसंद आ रहे थे, परिचित वास्तु के हिसाब से उस फ्लैट को सिरे से नकार देते थे. कई महीने ऐसे ही निकल गए. फिर मीरा और उस के पति खुद ही एक फ्लैट देखने गए जो उन्हें खुली जगह, धूप, हवा की दृष्टि से सही लगा और उन्होंने 15 दिन में ही उसे फाइनल कर लिया. आज उन्हें उस फ्लैट में रहते हुए 20 साल हो गए हैं और वे खुश हैं.

घर खरीदने के समय पैसा हो भी तो फालतू की पार्टीज में उसे खर्च न करें क्योंकि शुरू में ईएमआई का भी एक खर्चा सेट होने में टाइम लगता है. घर को खुशियों का आशियाना बनाने के लिए बहुत सोचसमझ कर चलना होता है, अपना घर होना एंजोए करें, कोनाकोना अपना होना बहुत सुखद होता है.

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