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Hindi Satire : यूट्यूबिया पकवान मांगे डाटा

Hindi Satire :  कुछ नया बनाने के चक्कर में मिसेज यूट्यूब छान मारती हैं और इधर हम ‘आजा वे माही तेरा रास्ता उड़ीक दियां…’ गाना गाते रसोई की ओर टकटकी लगाए इंतजार में बैठे हैं कि शायद अब कुछ खाने को मिल जाए.

अहा साहब. क्या दिन आ गए. जब से मेरी मिसेज ने हमें एक से एक लजीज गंद खिलाने के लिए रैसिपीज स्कूल औफ यूट्यूब जौइन किया है, तब से हमारे घर में चाय तो बनती ही यूट्यूबिया विधि से है, पर चाय का पानी भी यूट्यूब पर, चाय का पानी कैसे गरम किया जाए, देख कर ही गरम होता है. इसलिए अब मैं ने मिसेज के मोबाइल को अनलिमिटेड डाटापैक की सुविधा मुहैया करवा दी है. अपने मोबाइल पर भले ही इनकमिंग सुविधा ही हो, तो भी चलेगा.

वैसे भी मुझे औफिस में मिसेज के सिवा किसी दूसरे का फोन तो आता नहीं और मिसेज की कौल आने पर मुझे कुछ बोलने का मौका मिल जाए, ऐसा मेरा समय कहां. आप को घर में तो छोडि़ए, मिसेज की कौल आने पर उस को कुछ तो कहने का मौका कभी मिलता होगा, सो आप बहुत लकी हैं जनाब. मैं ने तो घर में फोन पर आज तक मिसेज को, बस सुना ही सुना है.

जब तक मेरी मिसेज ने रैसिपीज स्कूल औफ यूट्यूब रैग्युलर जौइन नहीं किया था तब तक मैं उस का मोबाइल डेढ़ जीबी पर डे के पैक वाला रिर्चाज करवाता था. मैं खुश था तो वह बहुत खुश पर जब से उस ने रैसिपीज स्कूल औफ यूट्यूब रेग्युलर जौइन किया था तब से मुझे भी लगने लगा था कि उस का अब डेढ़ जीबी में पेट नहीं भर रहा. जब औफिस से घर आता तो वह चुपचाप मेरी ओर देखते मोबाइल के पेट पर हाथ फेरने लग जाती. मैं तत्काल सब समझ जाता.

गुलाम पति अपनी पत्नी की हर बात उस के संकेत मात्र से समझ जाता है. जो नहीं समझाता वह बातबात पर मुंह की खाता है, तब मैं जान गया कि यूट्यूब पर स्वादिष्ठ चावल बनाने की विधि में ही खोजी का एक जीबी डाटा कनज्यूम हो रहा है. अब दाल, चपाती और भी न जाने क्याक्या.

बंधुओ, अब हमारे घर में उतना होहल्ला आटा खत्म होने पर नहीं होता जितना बायचांस किसी का डाटा खत्म होने पर होता है. होगा भी क्यों, आटे से अधिक मांग अब हमारे घर में डाटा की है. इन दिनों हमारे घर में आटा कम, डाटा अधिक खाया जाता है. किचन में आटे से आटे का कनस्तर नहीं, डाटा से मोबाइल फुल होना रहता है. अगर डाटा से मोबाइल भरा हुआ है तो आटा जाए भाड़ में. वैसे, आटे की अपेक्षा डाटा पचाने में कम कसरत करनी पड़ती है, मेरी यह बात सुन लो, हे फिटनैस के लिए जिम जाने वालो.

हमारे घर में इन दिनों बिन यूट्यूब की सहायता के बिना कुछ भी नहीं बनता. मिसेज कुछ भी बनाने से पहले घंटों यूट्यूब पर इतनी रिसर्च करती है कि कुछ बनाने में उस के पसीने छूटें या न, पर कुछ भी बनाने की सही विधियों में से सब से सही विधि छांटतेछांटते उस के पसीने जरूर छूट जाते हैं. जितनी मेहनत जो वह साधारण सा बनाने के लिए भी यूट्यूब पर करती है, इतनी तो बड़ेबड़े आविष्कारकों ने अपने आविष्कार करने के लिए भी क्या ही की होगी.

अब कुछ भी बनाना छोडि़ए, अब तो यूट्यूब देख कर ही हमारी गैस पर तवा चढ़ता है इस इरादे से कि जो यूट्यूब पर बताए कोण से गैस पर तवा चढ़ाया जाए तो चपाती बहुत पाचक पकती है.

यूट्यूब के आने से पहले हमारे घर में बैगन बनाने के लिए कड़ाही में तेल डालते थे. मसालेदानी खोलते थे. मसालेदानी में जो भी मसाला मिला, उसी से काम चला लिया. बैगन काट कर, धो कर एक थाली में रखे और बैगन बनाने का काम शुरू और आज बैगन थाली में पड़ापड़ा लुढ़कता रहता है.

तरहतरह के मसालों से कूटकूट कर भरी मसालेदानी सामने पड़ी रहती है. बिन तेल डली कड़ाही गैस पर चढ़ी जलती रहती है और शैफ होता है कि यूट्यूब पर बैगन बनाने की विधि खोज रहा होता है. मिसेज असमंजस में, घोर असमंजस में. अब पता ही नहीं चलता कि बैगन बनाने की किस विधि से बैगन बनाए जाएं और किस विधि से क्याक्या किसकिस मात्रा में डाल उन्हें खास बकवास स्वाद बनाया जाए. इसी स्वाद बनाने के चक्कर में परिवार के आधे तो केवल बिन बैगन खाए डाटा खातेखाते सो भी लेते हैं.

गए वे दिन मांएं चावल धोएं और चुपचाप पतीले में पकने को डाल देती थीं. अब न वे मांएं रहीं न वे बीवियां. अब तो अधिकतर यूट्यूबियां मांएं हो गई हैं और पत्नियां यूट्यूबिया मिसिजें. काश. आज कोई धर्मपत्नी न सही तो न सही, कम से कम एक अदद पत्नी भी होती.

ऊपर से मिसेज सारा दिन घर में अकेली करे भी तो क्या करे? जब से मोबाइल आया है, तब से अड़ोसपड़ोस में जाना अपशकुन माना जाता है. जब से मोबाइल आया है, तब से पासपड़ोस बातें करने को बचे नहीं. अब वे उजड़ चुके हैं. इसलिए जिसे देखो, जब देखो, सब अपनेअपने घर में मोबाइल से चिपके हुए. अंधभक्त मोबाइल पर भक्ति की अजस्त्र धारा में सिर से पांव तक नहा रहे हैं तो ओटीटी के दीवाने मोबाइल पर बदतमीज सीरियलों की नदी में डुबकियां लगा रहे हैं. ऐसे में बेचारी वह भी मोबाइल से बातें करने के सिवा और किस से बातें करे?

अब तो हम जैसे आलीशान खंडहरों में रह रहे हों. सब अपना मोबाइल लिए अपनीअपनी गुफाओं में घुसे हुए हैं. पासपड़ोस तो छोडि़ए, अब तो एक ही घर में रहते हुए भी किसी के पास एकदूसरे से बात करने का वक्त नहीं. कल तक जो रिश्तेदारों से चिपके रहते थे, वे आज मोबाइल से चिपके हुए हैं. ऐसे में, अड़ोसपड़ोस तो छोडि़ए, अब तो अपना घर तक सब के होने के बाद भी बियाबान ही लगता है. कसम खा कर कहता हूं, जो आज बंदे के पास मोबाइल न होता तो वह अपने अकेलेपन से कभी का पागल हो गया होता.

कल मिसेज को फिर बहुत परेशानी हुई. बेचारी के दिमाग में यूट्यूब पर कद्दू बनाने की विधि छांटतेछांटते ऐसा सिवीयर पेन हुआ कि मुझे अपनी जान बचानी मुश्किल हो गई. यूट्यूब पर कद्दू एक पर कद्दू बनाने की विधियां अनेक. कोई अपने यूट्यूब चैनल पर लाइक, कमैंट, सब्सक्राइब करने की दुहाई देता कहता कि कद्दू इस तरह बनाओ तो उंगलियां काटते रह जाओगे, तो कोई अपने यूट्यूब चैनल को लाइक, कमैंट, सब्सक्राइब करने की दुहाई देता कहता है कि कद्दू इस तरह बनाओ तो घर वाले उंगलियां काटते नहीं, कड़ाही चाटते रह जाएंगे.

तब मैं ने साफसाफ देखा कि कद्दू बनाने की इन बीसियों विधियों को मिसेज द्वारा देखने के बीच थाली में कटा कद्दू इतना परेशान हो उठा था कि जैसे वह खुद ही थाली से उछल कर कड़ाही में पड़ना चाह रहा हो कि जब मुझे जलना ही है तो कड़ाही में जाने में इतनी देर क्यों? लो, भाई साहब.

मैं खुद ही कड़ाही के हवाले हुआ, क्योंकि वह जानता था कि केवल डाटा खाने वाले उसे स्वाद लगालगा कर तो खाएंगे ही क्या? बस, पेट भरेंगे, थाली के बदले मोबाइल पर नजरें गड़ाए. हो सकता है तब उन का रोटी लिए हाथ मुंह के बदले कान में ही चला जाए.

Love Rules : जो शर्तों पर किया जाए वो प्यार नहीं सौदा है

Love Rules :  कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुम ने किया, साहिबा प्यार में सौदा नहीं. इस तरह के न जाने कितने ही बौलीवुड गाने हैं जो प्यार में शर्तों पर बने हैं और प्यार में कोई शर्त नहीं होती. यही संदेश देते नजर आए हैं. वाकई प्रेम तो एक स्वार्थ रहित भावना है वहां शर्तों का क्या काम. लेकिन आजकल प्यार की भावना कहीं गुम हो रही है और उस का स्थान शर्तों ने ले लिया है.

अभी हाल ही में यूपी की रहने वाली 25 वर्षीय सृष्टि तुली कमर्शियल पायलट थी. उस की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है. सृष्टि ने मुंबई में अपने किराए के फ्लैट में डेटा केबल से फांसी लगा कर जान दे दी थी. इस मामले में पुलिस ने मृतका सृष्टि तुली के प्रेमी आदित्य पंडित को गिरफ्तार किया है. आरोप यह भी है कि आदित्य पंडित, सृष्टि को नौनवेज खाना छोड़ ने के लिए प्रताड़ित करता था. लड़की ने लड़के को बहुत समझाया पर वह नहीं माना और लड़की ने इस विवाद के चलते अपनी जान दे दी. अब आप इसे क्या कहेंगे. क्या आप को लगता है उस लड़के को लड़की से प्यार था?  जो प्रेम शर्तों पर हो उस के लिए मरने की जरूरत नहीं है

दूसरी बात, धर्म और रीतिरिवाजों के कारण बहुत सारे प्रेम प्रेम नहीं रह जाते. वह असलियत में समझौते बन जाते हैं. पहले दिन जब नौनवेज खाया तो अगले दिन मना कर देता कि हमारा नहीं चल पाएगा. बात को आगे बढ़ाने की जरूरत ही क्यों थी. लड़की नौनवेज खाती है ये बात तो आप को 2 -4 मीटिंग्स में पता चल ही गई होगी. फिर क्यूं तब आप ने इस रिश्ते को इतना आगे बढ़ने दिया?

शायद आप को लग रहा होगा कि मेरे प्यार में नौनवेज क्या कोई बड़ी चीज है इतना तो वह जब मैं कहूंगा वह तभी छोड़ देगी. यही बात और सोच तो गलत है, अगर आप की प्रायोरिटी थी कि लड़की वेज ही खाती हो तो यह बात पहले ही क्लियर कर लेनी चाहिए थी. ताकि किसी की जान तो नहीं जाती. इस का मतलब साफ है कि वह लड़का प्रेम के लायक ही नहीं है. ऐसे प्रेम के लिए किसी को भी जान देने की जरूरत नहीं है बस हिम्मत कर के उस रिश्ते से निकलने की जरूरत होती है.
ये घटनाएं अब आम हो गई हैं जिस में एक साथी अपनी कोई शर्त रख देता है और दूसरा उसे ना माने तो उस पर विवाद इतना बाद जाता है कि प्यार के दावे तो ऐसे में बहुत पीछे रह जाते हैं. जो प्रेम में शर्तें लगाता हो उसे प्रेमी कहा ही नहीं जा सकता.

प्यार शर्तों पर होता है या नहीं इस बारे में लोगों की राय

बैंक से रिटायर सुनील जी का इस बारे में कहना है मैं एक पिता हूं, और मैं अपने बेटे से बिना शर्त प्यार करता हूं. मुझे लगता है कि मैं अपनी पत्नी से भी बिना शर्त प्यार करता हूं. इस के साथ ही, मेरी पत्नी ऐसी कुछ चीजें या गलती करती है जो हमारी शादी को खत्म कर सकती हैं, लेकिन मुझे लगता है कि मैं उस से तब भी प्यार करूंगा. शायद मेरा बेटा ऐसी कुछ चीजें कर सकता है जो मुझे बिलकुल भी बर्दाश्त ना हो और शायद मैं उस के साथ एक घर में ना रह पाऊं. लेकिन फिर भी इस का मतलब यह नहीं है कि मैं उस से प्यार नहीं करूंगा.

मुझे लगता है कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि “प्यार” से क्या तात्पर्य है. मैं बहुत से लोगों से प्यार करता हूं. प्रेम पर कोई शर्त नहीं लगती है. हालांकि, हमारे पास अन्य सामाजिक अनुबंध हैं जिन पर शर्तें हैं, और वे केवल इसलिए उन शर्तों को नहीं तोड़ सकते क्योंकि मैं उन से प्यार करता हूं.
वहीं इस बारे में हिमांशु का कहना है कि प्यार में शर्त नहीं होती. प्यार निःस्वार्थ होता हैं. ऐसा मैं मानता हूं. हां, बिल्कुल यदि बीच में कोई शर्त हो तो, क्या आप प्यार दे पाएंगे? नही न, क्योंकि आप पूरे वक्त उस शर्त को ही सोचते रहेंगे की कही आप से कोई गलती ना हो जाए और शर्त टूट ना जाए. आप हमेशा कांशियस रहेंगे पर प्यार में तो आजादी होती है. एकदूसरे के लिये सम्मान होता है.

आशा का इस बारे में कहना है प्रेम निडर, निर्भय और स्वार्थ रहित, परमार्थी बनाता है जहां प्रेम होगा वहां निश्चित रूप से समर्पण होगा. एक बात समझ लें कि समर्पण प्रेम की शर्त नहीं है, समर्पण प्रेम का स्वभाव है. जिस में शर्त हो वह सौदा है. प्रेम में शर्त नहीं होती और जो शर्त रखता है वह प्रेम कर ही नहीं सकता. यदि प्रेम करना चाहते हो तो तुम्हें समर्पण कर ना पड़ेगा. यह वैसी ही बात है कि दीया जलेगा तो प्रकाश होगा ही. तुम दीप जलाओ और प्रकाश न हो यह तो संभव नहीं है. जहां प्रेम की ज्योति जलती है, वहां समर्पण का प्रकाश होना ही है.

क्या होती हैं शर्तें
1. नौनवेज खाना छोड़ दो
2. मेरा धर्म अपनाना पड़ेगा
3. मेरी मम्मी के साथ तो एडजस्ट करना ही पड़ेगा
4. हमारे यहां ट्रैडिशनल कपड़े ही पसंद किए जाते हैं
5. तुम शादी के बाद जौब करोगी या नहीं ये मेरे घरवाले ही तय करेंगें

लड़की की शर्तें
1 मेरे अलावा तुम किसी और लड़की से दोस्ती नहीं रखोगे
2 वीकेंड पर देर तक सोने वाले लड़के मुझे पसंद नहीं आते
3 ये हर वक्त दोस्तों की कंपनी मुझे पसंद नहीं, तुम्हें छोड़नी पड़ेगी
4 अपने गेम खेलने की आदत तुम्हें बदलनी पड़ेगी
5 मैं तुम्हारी इतनी बड़ी जौइंट फैमिली में एडजस्ट नहीं कर पाऊंगी हम अलग घर में रहेंगे
6 हम दोनों एक ही करियर चूज करेंगे

शर्तों पर प्यार करने के नुकसान

आज जो व्यक्ति इतनी शर्तें रख रहा है वह कल अपनी बात को मनवाने के लिए आपको टौर्चर भी कर सकता है. ऐसे प्यार की कोई गारंटी नहीं ये शर्त कब जिद में बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. ऐसे रिश्ते में सम्मान की कोई जगह नहीं होती क्यूंकि ये रिश्ता बराबरी का नहीं है. बराबरी वहां होती है जहां दोनों एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करें लेकिन यहां कोई एक अपनी चला रहा है. ऐसे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है.

जब प्यार शर्तों पर किया जाएं तब क्या करें

कुछ मुलाकातों में ही समझ आ जाना चाहिए कि इस बंदे का क्या नेचर है? उस के घर का माहौल कैसा है? लाइफ को लेकर उस की प्रायोरिटी क्या है? लेकिन अगर नहीं समझ आया तो समझने की कोशिश करें. आखिर यह पूरी जिंदगी का मामला है. अगर लड़के को आप के नौनवेज खाने से दिक्कत है या फिर आप को उस की जौइंट फैमिली से परेशानी है या इसी तरह की कोई और बात नजर आ रही है, तो ऐसे में रिश्ते को ज्यादा लम्बा खींचने से कोई फायदा नहीं है.

साथी से  बात करें कि यह शर्तें आप को मान्य नहीं है.

जो इंसान आज आप से शर्तों पर प्यार कर रहा है क्या वाकई आप को लगता है वह भरोसे के काबिल है. आज उस की एक शर्त है जिसे वह आप के लिए बदल नहीं पा रहा इस बात की क्या गारंटी है कल वह ऐसे हजार शर्ते नहीं रख देगा. ऐसे साथी को छोड़ देने में समझदारी हैं लेकिन उसे सिर्फ छोड़ना नहीं है बल्कि एक बुरा सपना समझकर भूल भी जाना है.

 

बिना शर्त के प्रेम कैसा होता है

सच्चा प्रेम बिना किसी शर्त या अपेक्षा के होता है. इसका मतलब है कि प्रेमी अपने साथी को बिना किसी बाहरी कारण के प्यार करता है, जैसे कि उस के गुण, उस की स्थिति, या किसी अन्य शर्त की वजह से. बिना शर्त प्रेम का मतलब यह भी है कि दोनों साथी एकदूसरे को अपनी पूरी वास्तविकता और खामियों के साथ स्वीकार करते हैं.
वह आप को कभी जज नहीं करता हो. आप का लाइफस्टाइल, आप के पहनने ओढ़ने, चलनेफिरने के स्टाइल के बजाए खुशी से साथ स्वीकार करें.

 

Parenting Rules : बच्‍चे कितने अच्‍छे 1, 2 या ?

Parenting Rules :क्या बच्चा पैदा कर उसे पढ़ालिखा देना ही अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री करना है? बच्चा पैदा करने और अपनी जिम्मेदारियां निभाते उसे सही भविष्य देने में मदद करने में जमीनआसमान का अंतर है.

आज के समय में बच्चा पैदा करना, उस की परवरिश करना, उसे शिक्षित करना लगभग 25 वर्षों के लंबे समय का प्रोजैक्ट होता है, जिस में नर्सरी से ले कर 12वीं क्लास तक और उस के बाद कालेज की पढ़ाई, कोचिंग, होस्टल, जेब खर्च, वाहन, रहनसहन, होटल पार्टी, घूमनाफिरना आदि शामिल होते हैं. यदि आज के समय में अनुमान लगाया जाए तो लगभग 2 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा ही खर्च हो सकता है.

इस के अलावा शिक्षा के लिए ऋण, यदि विदेश गए तो विदेश की शिक्षा का खर्च, वीजापासपोर्ट, आनाजाना जैसी सभी गतिविधियां भारी खर्च वाली होती हैं. पतिपत्नी दोनों नौकरी करते हैं तो भी और चाहे वे मध्यवर्ग या उच्चमध्यवर्ग के हों, सभी को बहुत भारी पड़ता है. कम से कम एक या दो संतानें होनी जरूरी हैं, यह लगभग सभी पारिवारिक व सामाजिक लोगों का मानना है.

परिस्थिति के मुताबिक योजना बनाना

जो विवाहित दंपती हैं, उन्हें संतान को जन्म देने से पहले वर्तमान समय, काल, परिस्थिति के मुताबिक योजना बनाना बहुत जरूरी है, जैसे आज हम कितना कमाते हैं, आगे हम कितना कमा पाएंगे, हमारी शारीरिक व मानसिक कार्यक्षमता कैसी रहेगी.

यह अनुमान बहुत जरूरी है. जिस दिन बच्चा गर्भ में आता है, उस दिन से ही खर्चे बढ़ जाते हैं, बच्चे की मां का चिकित्सा परीक्षण, दवा आदि के खर्चे. किसी भी बहुत अच्छे अस्पताल में डिलीवरी कराना, चाहे नौर्मल हो या सिजेरियन, अस्पताल का खर्च दोतीन लाख रुपए होना सामान्य बात है.
अधिकांश महिलाएं नौकरीपेशा होती हैं, इसलिए संतान होने के बाद 6 माह या उस से अधिक का नौकरी से अवकाश लेना या नौकरी छोड़ना पड़ता है. अब संयुक्त परिवार नहीं हैं कि बच्चे को दादादादी व चाचीबूआ आदि संभाल सकें.
ज्यादातर विवाहित दंपती अकेले ही रहते हैं. यदि शिशु अबोध है और शिशु की मां को नौकरी भी करनी है तो बच्चे को किसी बेबी क्रैच में छोड़ा जाए या घर पर कोई मेड रखी जाए, दोनों का ही खर्च उठाना होता है.

इस तरह से संतान का पालनपोषण करना सफेद हाथी पालने जैसा है. एक ही संतान का पालनपोषण बुरी तरह से निचोड़ कर रख देता है. कुल मिला कर कमाने वाले एटीएम मशीन बन कर रह जाते हैं.

संतान के जन्म से ले कर विवाह होने तक आर्थिक और नैतिक जवाबदारी से मुक्ति नहीं मिल पाती है. खुद को भी शारीरिक व मानसिक तौर पर सक्षम बनाए रखना जरूरी होता है. वहीं आर्थिक रूप से पारिवारिक व सामाजिक जीवन को सम्मानजनक स्तर का बनाए रखना जरूरी है.

आर्थिक परिस्थितियों को समझें

पहले अपनी दूरदर्शिता और परस्थितियों का आकलन करिए, उस के बाद संतान को जन्म दीजिए. रेलयात्रा के समय एक सहयात्री से पता चला कि उसे जब अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाना था, तब पता चला कि नर्सरी की फीस 10 हजार रुपए महीना है. करीब रोज स्कूल आनेजाने का खर्च, स्कूल यूनिफौर्म और किताबें, बैग, वाटर बौटल आदि मिला कर लगभग 5-6 हजार रुपए का खर्च आ रहा था.

उस ने अनुमान लगाया कि यह सब कर के भी उस का बच्चा इंग्लिश की कुछ राइम्स बोल सकेगा, इंग्लिश में अपना नाम बता सकेगा और कुछ वस्तुओं आदि के इंग्लिश नाम बता सकेगा. जैसे क्लास बढ़ेगी वैसे ही शिक्षाखर्च भी बढ़ता जाएगा और उस के बाद कोचिंगट्यूशन आदि का खर्च होगा तथा उसे शिक्षा के लिए ऋण भी लेना पड़ सकता है.

यह बात उस ने साल 2000 के आसपास की बताई. सो, उस ने अपने बच्चे को अपना बचपन जीने का समय दिया, खेलनेकूदने दिया. जब बच्चा 4 से 5 साल का हुआ तो वह रंगीन चित्रों की किताबें, खिलौने आदि, जो शिक्षा में उपयोगी हैं, ले आया और उस ने एक नर्सरी की शिक्षिका को घर पर ही प्रतिदिन एक घंटा बच्चे के साथ रहने के लिए रखा. बच्चे की मां भी उस शिक्षिका के साथ बच्चे को अक्षर ज्ञान और अन्य व्यावहारिक शिक्षा के लिए मदद करती रही.

बच्चे का समाजीकरण हो और उस के मन में स्कूल के नाम से डर न रहे, इसलिए घर के आसपास के बच्चों को भी घर में बुलाया जाता रहा. जब बच्चा 5 साल का हुआ तो उसे अच्छे स्तर के सरकारी स्कूल में पहली क्लास में प्रवेश दिला दिया गया और उस की शिक्षा में हिंदी व इंग्लिश दोनों ही का उपयोग किया गया.

जैसेजैसे क्लास बढ़ती गई, उस ने गणित, इंग्लिश, विज्ञान की घर में पढ़ाने की शिक्षिका की व्यवस्था की. साथ ही, प्रतिवर्ष सालभर की शिक्षा का जो भारी खर्च किसी प्राइवेट स्कूल में आता है, लगभग उतना ही पैसा म्यूचुअल फंड 7व विविध बीमा योजनाओं में प्रतिवर्ष जमा किया.

समझदारी से काम लें

बच्चे को उस ने 10वीं में कोई कठिन विषय नहीं दिलाया बल्कि कला संकाय से शिक्षित किया. उस ने बताया कि जब उस का बेटा 12वीं क्लास पास हुआ तब तक बच्चे के लिए लगभग डेढ़ करोड़ से ज्यादा रुपया खर्च हो चुका था. वह व्यक्ति प्राइमरी शिक्षित था और किराना दुकान चला कर जीवनयापन करता था. उस की दूरदर्शिता और युक्ति से इतना धन इकट्ठा हो गया कि वह अपने शिक्षित बच्चे को स्थापित कर सके.

उस ने बताया कि उस का बच्चा जब कौमर्स विषय ले कर कालेज जाने लगा तो वह उसे कुछ समय के लिए दुकान पर भी काम के लिए बुलाता रहा, जिस से उसे व्यापारव्यवसाय का व्यावहारिक ज्ञान मिला. उस ने अपने बेटे को मसाले का कारखाना खुलवाया.

आज उस का बेटा प्रतिष्ठित फर्म का मालिक है और देश के महानगरों के साथ ही विदेशों में भी उस की फर्म का सामान जाता है. तात्पर्य यह है कि हम दूरदर्शिता की कमी के कारण से इस प्रकार उल?ा जाते हैं कि बच्चों का पालनपोषण हमारे लिए तनाव का कारण बन जाता है.

बहुत ज्यादा महंगे स्कूल में पढ़ कर भी कुछ इनेगिने ही उच्च सफलता के शिखर पर पहुंच पाते हैं, बाकी ज्यादातर इंग्लिश माध्यम से सीख कर उतना ही पढ़ सकते या समझ सकते हैं जो किसी मैडिकल स्टोर पर कार्य करने वाला सम?ा सकता है. अच्छा टैलेंट बहुत है, उस की कहीं कोई कमी नहीं है.

अपने बच्चों के लिए हमें जागृत रहना जरूरी है. घर में किसी मेहमान के आने पर हम हर तरह की व्यवस्था करते हैं, ठीक उसी प्रकार से संतान को जन्म देने से पहने उस के लगभग जन्म से 7 ले कर 25 साल तक के जीवन का वर्तमान समय और आने वाले समय को ध्यान में रख कर आकलन करना जरूरी है.
हम अपनी आर्थिक, शारीरिक व पारिवारिक क्षमताओं व समय का आकलन करें. उस के बाद नौनिहाल को दुनिया में आने दीजिए. ऐसा करने से आप का दामन भी खुशियों से भरा होगा और संतान भी खुश रहेगी.

 

Matrimony Trends : समाज में वायरल हो रहा है जाति और क्‍लास का न्‍यू ट्रैंड

Matrimony Trends : आर्थिक वर्ण व्यवस्था कभी मानव कल्पना से परे बात थी लेकिन अब समाज और सोच का हिस्सा बन गई है. एक ही जाति के लोग आपस में आर्थिक हैसियत की बिना पर फर्क करने लगे हैं. यह भी भारतीय सामाजिक संरचना से मेल खाती बात नहीं थी लेकिन अब है.

आईएएस अधिकारी नेहा मारव्या का दर्द

2011 के बैच की मध्य प्रदेश काडर की आईएएस अधिकारी नेहा मारव्या का दर्द, भड़ास या कुंठा कुछ भी कह लें आखिर सोशल मीडिया के जरिए फूट ही पड़ा. आईएएस अधिकारियों के लिए बने एक व्हाट्सएप ग्रुप में बीती 20 दिसंबर को उन्होंने अंग्रेजी में लिखा –

“मुझे 14 साल की नौकरी में एक बार भी फील्ड की पोस्टिंग नहीं मिली. साढ़े तीन साल मुझे पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में उपसचिव बना कर बैठाया गया. फिर ढाई साल से राजस्व विभाग में उपसचिव बिना काम के बनाया हुआ है. 9 महीने से मैं सिर्फ औफिस आती हूं और चली जाती हूं. दीवारों में मुझे कैद कर के रख दिया गया है. मैं अकेले होने का दर्द बहुत अच्छे से समझ सकती हूं.”

बस इतना कहना था कि मीडियावीर अगलापिछला सब खोद लाए कि नेहा मारव्या ने शिवपुरी में पदस्थ रहते एक बार ज्योतिरादित्य सिंधिया से और एक बार उन की मंत्री बुआ यशोधराराजे सिंधिया से पंगा लिया था. इतना ही नहीं एक बार तो उन्होंने कलैक्टर की टैक्सी का बिल रोक लिया था क्योंकि वह निर्धारित किराए से कोई 8 हजार रुपए ज्यादा था. और एक बार उन्होंने अपने आला अफसर का गलत आदेश मानने से इंकार कर दिया था और एक बार तो उस वक्त हद हो गई थी जब उन्होंने…..

ये किस्से कहानियां 4 दिन में ही खत्म हो गए लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया कि नेहा ने यह बात आईएएस अफसरों के व्हाट्सग्रुप में ही क्यों शेयर की. अपने विभाग के दूसरे ग्रुपों में कभी क्यों साझा नहीं कि जिन में क्लास 2 से ले कर क्लास 4 तक के अधिकारी कर्मचारी मेंबर होते हैं.

साफ दिख रहा है कि नेहा को अपने अधीनस्थों यानी नीचे वालों के ग्रुप में अपना दुखड़ा रोना हेठी की बात लग रही थी. वह अपने बराबर के अफसरों में बात कहना बेहतर समझ रही थीं. यानी बात ‘क्लास फीलिंग’ की थी जो आजकल समाज और कार्यालयों में तो बेहद आम है. लेकिन हर कहीं यहां तक कि वैवाहिक विज्ञापनों तक में देख ने को मिल जाती है.

कास्ट में भी क्लास

अखबारों में छपने वाले वर्गीकृत वैवाहिक विज्ञापनों में इन दिनों एक दिलचस्प बात यह देखने में आ रही है कि वधु पक्ष के पेरैंट्स अपनी बिटिया की आमदनी का जिक्र जरूर करते हैं. हालांकि यह बायोडाटा का सामान्य पहलू है लेकिन असल में होता कुछ और है. इस बारे में भोपाल के कायस्थ समुदाय के रिश्ते तय कराने वाले एक वरिष्ठ समाजसेवी बताते हैं कि लड़कियां अपने से कम पैकेज वाले लड़के से शादी नहीं करना चाहतीं. इतना ही नहीं अगर वे बड़ी नामी कंपनी में कार्यरत हैं तो उन्हें लोकल और छोटी कंपनी वाला लड़का भी सूट नहीं करता.

अपनी बात को और स्पष्ट करते वे कहते हैं, “मैं 8 साल से रिश्ते तय करवा रहा हूं इस दरम्यान मैं ने एक भी रिश्ता ऐसा होते नहीं देखा जिस में आमदनी मुद्दा न हो. हमारे जमाने में यानी अब से कोई 40 – 50 साल पहले लड़के का होना ही काफी होता था. इकलौती शर्त उस का कायस्थ होना होती थी. वह कुछ करताधरता भी है यह बात कोई खास माने नहीं रखती थी.

अब ऐसा नहीं है लड़का सजातीय हो तो उस की कमाई बड़ा इशू रिश्ते तय करने में होता है. आप दूसरी ऊंची जातियों में भी देख लें सभी में ऐसा होने लगा है और तो और छोटी जाति वाले भी चाहते हैं कि उन का बेटा या बेटी अपने से कम आमदनी वाले से शादी न करे.

यह निश्चित रूप से जाति में कमाई का उदाहरण है जो अच्छा इस लिहाज से है कि दोनों खुशहाल जिंदगी गुजर करें. लेकिन अगर ऐसा होता तो अलगाव और तलाक के मामले इस शर्त को पूरा करने वाले रिश्तों में कम से कम इसी आधार पर तो नहीं होना चाहिए जो कि इफरात से देखने में आ रहे हैं.

एक ही जाति में रोटीबेटी के संबंध बेहद

रिश्ता बराबरी वालों में ही होना बेहतर और कामयाब होता है, यह बहुत पुरानी धारणा या सिद्धांत है जो अब नए तरीके से देखने में आ रहा है. इस में गौरतलब बात यही है कि आर्थिक असमानता अब बिलकुल स्वीकार्य नहीं है. इस का जाति के स्तर पर आ जाना जरूर एक चौंका देने वाली बात है. पिछले 2 दशकों से हर जाति में 2 तरह के वर्ग हो चले हैं- एक पैसे वाला और दूसरा उस से कम पैसे वाला.

जब जातियों के गलीमहल्ले और टोले हुआ करते थे तब एक ही जाति में रोटीबेटी के संबंध बेहद आम और स्वीकार्य होते थे. सुखदुख के मौकों और तीज त्योहारों पर लोग एकदूसरे के घर आतेजाते थे और यह नहीं देखते थे कि चूंकि यह कम पैसे वाला है इसलिए इस के यहां कुछ देर बैठ कर चायनाश्ता करना कोई गलत काम या गुनाह है.

2 दशकों में ही इन्फोर्मेशन टैक्नोलौजी हरेक की जिंदगी का अहम हिस्सा हो गई है. अब बिना सोशल मीडिया के आप समाज में सहज ढंग से रह नहीं सकते. मिसाल व्हाट्सएप ग्रुपों की लें तो इन में भी आर्थिक आधार पर भेदभाव होने लगा है. एक आईएएस अधिकारी अपनी बात बराबरी वालों के ग्रुप में ही क्यों शेयर कर पाती है और क्यों कोई कायस्थ लड़की खुद से कम कमाई वाले सजातीय लड़के से शादी नहीं करना चाहती.

यह कोई लंबीचौड़ी रिसर्च की बात नहीं है. दरअसल में लोग अब पौराणिक के साथसाथ टैक्निकल पंडेपुजारियों और उस के अदृश्य मठाधीशों की गुलामी ढो रहे हैं. किसी भी तरह की बराबरी न पहले थी न अब है. इन दोनों का ही मकसद सामाजिक लोकतंत्र की मानसिकता को पनपने से रोकना है जिस से कमाईमलाई इफरात से डकारी जा सके.

आर्थिक वर्ण व्यवस्था

कास्ट आज भी कम अहम नहीं लेकिन अब उस में क्लास का भी तड़का लग गया है. ऊंची जाति वाले वैवाहिक विज्ञापनों में यह भी स्पष्ट लिखने लगे हैं कि सभी समकक्ष जाति वाले मान्य और स्वीकार्य हैं. यानी ब्राह्मण समुदाय के लोग कायस्थ, वैश्य और क्षत्रिय को प्राथमिकता में रख रहे हैं. लेकिन ओबीसी और एससीएसटी वाले उन्हें मंजूर नहीं. तो क्या मनु की वर्ण व्यवस्था नए तरीके से आकार ले रही है इस सवाल का जवाब हां में ही निकलता है.

इस दिलचस्प वर्ण व्यवस्था में अगड़े एक हो रहे हैं लेकिन पैसे वाले, गरीब अगड़े जो अमीर अगड़ों के मुकाबले कम, उन की संख्या का कोई 20 फीसदी हैं उन्हें इस नए उच्च वर्ण जो ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों का गुट है में एंट्री नहीं है. इन 20 फीसदी लोगों की दिक्कत यह है कि ये जातिगत अहम के चलते दलितों, पिछड़ों और शूद्रों के समाज का हिस्सा भी नहीं बन पा रहे. हां पैसे वाले पिछड़ों से इन्हें भी परहेज नहीं, उन में ये बेटी दे और ले भी लेते हैं इसलिए भी ये अपने समाज के पैसे वालों से बहिष्कृत हैं.

जातियों के करवट लेते इस पदानुक्रम में सोशल मीडिया का रोल बड़ा तगड़ा रहा है जो बहुत जल्द मनचाहे लोगों की प्रोफाइल आप के सामने परोस देता है. एक दिलचस्प वाकिया भोपाल का ही है. बेंगलुरु की एक आईटी कंपनी में 24 लाख सालाना के पैकेज पर नौकरी कर रही बनिया समाज की एक युवती का कहना है कि वह अपनी जाति या समाज के उस लड़के से शादी नहीं कर सकती जो दुकानदार हो या फिर सरकारी मास्टर या क्लर्क हो क्योंकि उन्हें औसतन 60 – 70 हजार रुपए महीना मिलते हैं. इस में दिक्कत यह है कि उन की मेंटेलिटी भी संकरी हो जाती है. उन से बेहतर तो कोई ठाकुर, ब्राह्मण या कायस्थ ठीक रहेगा जिस की सैलरी मेरे बराबर या उन्नीस बीस हो.

भेदभाव धर्म से नहीं बल्कि इन्फोर्मेशन टैक्नोलौजी

सोशल मीडिया पर भी यह मानसिकता बड़े दिलचस्प तरीके से दिखती है. व्हाट्सएप वगैरह के धार्मिक ग्रुपों में मेंबर बनाते वक्त आमदनी नहीं जाति देखी जाती है. उलट इस के पारिवारिक और सामाजिक ग्रुपों में जाति नहीं आमदनी देखी जाती है. किसी जाति के एक समान स्टेटस और आमदनी के लोग ग्रुप बनाते हैं तो कम हैसियत और कम आमदनी वाले को उस में शामिल नहीं करते.

यह भेदभाव धर्म से नहीं बल्कि इन्फोर्मेशन टैक्नोलौजी से पैदा हुआ है जो लोकतंत्र के मूलभूत उसूलों से मेल नहीं खाता. इस के फेर में एक आईएएस अधिकारी भी अपनों से अनदेखी के चलते अलगथलग पड़ जाती है और एक क्लर्क भी जिसे अपने ही कुनबे और समाज के धनाढ्य लोग भाव नहीं देते. वर्चुअल समाज कैसेकैसे अलगाव पैदा कर रहा है इस से हर कोई हर कभी दो चार होता है लेकिन उस की असल वजह नहीं समझ पाता.

भोपाल के एक पौश इलाके में अधिकतर सवर्ण सरकारी कर्मचारी रहते हैं. उन की महिलाओं के बनाए व्हाट्सएप ग्रुप में कालोनी की एससी की 2 महिलाएं शामिल नहीं की गई हैं जो उन के पतियों की तरह ही ऊंचे पदों पर हैं. इस ग्रुप में हर तरह की बातें होती हैं. ये बातें तीज त्योहारों और पारिवारिक समारोहों में फेस टू फेस भी होती हैं.

यहां भी वे 2 दलित महिला अफसर आलोचना का विषय और केंद्र रहती हैं. निष्कर्ष यह कि ज्यादा कमाई और ऊंचे पद वाली दलित महिला भी सवर्ण महिलाओं को स्वीकार्य नहीं. हाई इनकम लोवर कास्ट जैसा कोई प्रमेय अभी नहीं बनी है ठीक वैसे ही जैसे लो इनकम अपरकास्ट की नहीं बनी है.

ऐसा पहले भी था लेकिन उस की सघनता आज जितनी नहीं थी. जातपात और कमाई के गड्ढे अब ऐसी दीवारों में तब्दील होते जा रहे हैं जिन के पार देख पाना भी मुमकिन नहीं हो पाता क्योंकि ये दीवार खड़ी करने वाले टैक्नोलौजी के मालिक और कारोबारी हैं जिन्हें एहसास है कि इनइक्वलिटी से कमाई वैसे ही होगी जैसे पंडेपुजारियों की होती है, फर्क बस इतना है कि उन की नजर धर्म और जाति पर रहती है और इन की इनकम पर.

 

Parenting Tips : बच्‍चों में तुलना करने का साइड इफेक्‍ट समझें मम्‍मीपापा

Parenting Tips : मौम, डैड आप हमेशा से दीदी से ज्यादा प्यार करते हो, उन्हें हर बात में इंपौर्टेन्स देते हो, कहीं जाना हो तो आप उन से ही पूछते हो, क्या खाना है- इस के लिए भी दीदी की चौइस पूछते हो, वो आप की फेवरेट और बेस्ट हैं, आप ने उन्हें हमेशा उन के बड़े होने का फायदा दिया है, दीदी जितना मरजी गलत करें वो कभी गलत नहीं होतीं, आप उन्हें कुछ नहीं कहते, हमेशा मुझे ही गलत कहते हो. आखिर, आप ऐसा क्यों करते हो?
ऊपर लिखे डायलौग्स वो हैं जो अकसर उन युवाओं के मुंह से सुनने को मिलते हैं जिन्हें बचपन से मन ही मन में यह लगता है कि उन के पेरैंट्स उन के सिबलिंग और उन में भेदभाव करते हैं. और वे ये डायलौग्स कभी मजाक में, कभी शिकायत में, कभी रो कर, कभी हंस कर तो कभी गुस्सा हो कर बोलते हैं और युवावस्था तक आतेआते उन का अपने पेरैंट्स के साथ रिश्ता इतना खराब हो जाता है कि कई बार वे अपने पेरैंट्स के साथ डिस्टेंस तक बना लेते हैं. उन्हें विश्वास नहीं होता कि पेरैंट्स अपने ही 2 बच्चों के साथ ऐसा भेदभाव कैसे कर लेते हैं.

हमेशा पेरैंट्स ही होते हैं कल्प्रिट

पेरैंट्स का काम होता है अपने बच्चों के बीच प्यार और अपनापन बनाए रखना. लेकिन पेरैंट्स अपने फायदे के लिए एक बच्चे को अच्छा दूसरे को बुरा, एक को सही दूसरे को गलत बोलबोल कर न केवल दोनों बच्चों के बीच कभी न टूटने वाली दीवार खड़ी कर देते हैं बल्कि अपने लिए भी बच्चे के मन में जहर भर देते हैं जो बचपन से ले कर पूरी ज़िंदगी बच्चे को अंदरअंदर खोखला कर देता है.

गुप्ताजी के 2 बेटे हैं रोहन और राजीव. (प्राइवेसी के चलते चरित्र के नाम बदल दिए गए हैं) रोहन बचपन से ले कर उस के खुद के बच्चे बड़े होने तक अपने पेरैंट्स के साथ रहा. उन के हर सुखदुख में साथ खड़ा रहा. अपनी, अपने बच्चों, वाइफ की इच्छाओं को कभी इंपौर्टेन्स नहीं दी. वहीं, दूसरा बेटा राजीव 12वीं कक्षा पास करने के बाद से अलग रहा. शादी के बाद भी अलग रहा. साल में एकदो बार मेहमान की तरह आता, पेरैंट्स की तरफ कभी कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई लेकिन राजीव सदा गुप्ताजी का लाड़ला और फेवरेट बना रहा.

बचपन से गुप्ताजी ने राजीव को रोहन से अधिक प्यार, केयर, इंपौर्टेन्स दी. रोहन को कभी उस के हिस्से का प्यार, सम्मान नहीं दिया और आखिर में भी अपने फेवरेट बेटे राजीव के नाम अपनी पूरी प्रौपर्टी कर दी. गुप्ताजी के बचपन से चले इस फेवरेटिज्म के गेम के चलते आज रोहन ने पिता से रिश्ता तोड़ लिया है, भाई राजीव से उस की कोई बोलचाल नहीं है. आज रोहन के मन में अपने पिता के लिए जहर भरा हुआ है और वह अपनी स्थिति के लिए अपने पिता को कल्प्रिट यानी अपराधी मानता है.

इन सिग्नल्स से जान जाएं कि पेरैंट्स आप के साथ भेदभाव कर रहे हैं-

  1. आप के सिबलिंग को ‘मेरा शोना, मेरा बच्चा’ और आप को आप के नाम से पुकारना इस बात का सिग्नल है कि आप के पेरैंट्स आप में और आप के सिबलिंग में भेदभाव करते हैं.
  2. अगर आप के पेरैंट्स हमेशा आप से पहले आप के सिबलिंग को खाना खाने की कोई चीज औफर करते हैं तो यह संकेत है कि वे आप के और आप के सिबलिंग के बीच फेवरेटफेवरेट का गेम खेल रहे हैं.
  3.  सिर्फ एक ही बच्चे से बारबार घर के हर काम कराना, उसे ही काम के लिए आवाज लगाना भेदभाव का संकेत होता है.
  4.  घर में कुछ भी गलत काम होने, जैसे कुछ सामान टूट जाने, कुछ सामान नहीं मिलने पर बिना जाने व बिना पता लगाए कि गलती किस की है, हमेशा एक ही बच्चे को डांटना, गलत काम के लिए ब्लेम करना इस बात का संकेत है कि पेरैंट्स आप के साथ भेदभाव कर रहे हैं.
  5. अपने बच्‍चे की सफलता और उपलब्धियों के बारे में बात करना सामान्य बात है लेकिन अगर कोई पेरैंट्स सिर्फ अपने किसी एक बच्‍चे के बारे में ही हमेशा बात करते हैं तो यह किसी भी पेरैंट्स का फेवरेटफेवरेट गेम खेलने का संकेत है.
  6. अगर आप के पेरैंट्स आप के सिबलिंग के साथ ज्यादा समय बिताते हैं, उस के साथ रह कर ज्‍यादा खुश रहते हैं, उस के साथ अपनी सारी बातें शेयर करते हैं तो यह आप के पेरैंट्स की तरफ से आप के साथ भेदभाव होने का संकेत है.

संभल जाएं पेरैंट्स वरना होंगे निम्न परिणाम

कुछ महीने पहले पुणे की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली और अपने पेरैंट्स के लिए एक नोट छोड़ा जिस में लिखा था कि उस के पेरैंट्स उस से प्यार नहीं करते हैं, उस के सिबलिंग को ज्यादा प्यार करते हैं. जांच अधिकारी ने बताया कि जांच से पता चला कि उस के मातापिता ने लड़की को अनदेखा कर दिया था क्योंकि वे उस के छोटे भाई पर अधिक ध्यान देते थे. उस के सुसाइड नोट से भी यही बात सामने आई कि उस के मातापिता ने उस की उपेक्षा की है.
इस दुखद घटना से यह बात साबित होती है कि पेरैंट्स का अपने किसी एक बच्चे के प्रति ज्यादा ध्यान, लाड़प्यार दूसरे बच्चे के मन पर कितना गहरा असर करती है जिसे पेरैंट्स सामान्य बात समझते हैं. पैरेंट्स के लिए उन के सभी बच्‍चे एकसमान होने चाहिए और उन्‍हें अपने बच्‍चों में फेवरेट्स का गेम नहीं खेलना चाहिए वरना आगे चल कर यह उन्हें बहुत महंगा पड़ सकता है. आप का यह व्यवहार न केवल 2 भाई या बहन के रिश्ते को बिगाड़ेगा बल्कि आप के लिए उन का प्यार और सम्मान हमेशा के लिए कहीं खो जाएगा.

 न खड़ी करें दोनों बच्चों के बीच इनविजिबल दीवार

22 वर्षीया रिया और उस की छोटी बहन सिया में 2 साल का अंतर है. रिया सिया से बहुत प्यार करती थी लेकिन जब धीरेधीरे उसे महसूस होने लगा कि उस के पेरैंट्स सिया से ज्यादा प्यार करते हैं, हर बात में सिया को इंपौर्टेंस देते हैं तो वह मन ही मन सिया से नफरत करने लगी, नफरत भी इस हद तक कि वह कई बार गुस्से में उस की कोई ड्रैस या उस का कालेज का प्रोजैक्ट तक खराब कर देती. वह अपने पेरैंट्स को तो कुछ कह नहीं पाती थी, इसलिए अपना गुस्सा और चिड़चिड़ाहट सिया का नुकसान कर के निकालती. सोचिए जिन 2 बहनों को एकदूसरे का सपोर्ट सिस्टम होना चाहिए था, आज पेरैंट्स के फेवरेटिज्म के कारण उन दोनों के बीच कड़वाहट की दीवार खड़ी हो गई.

सिबलिंग बनें एकदूसरे की ताकत

आज के समय में जब परिवार सिकुड़ते जा रहे हैं, ऐसे में फेमिली में सिबलिंग का होना बहुत बड़ी बात है क्योंकि पेरैंट्स के जाने के बाद सिबलिंग ही होते हैं जो एकदूसरे के सुखदुख के साथी होते हैं. जरूरत पड़ने पर वे दूसरे की ताकत बन सकते हैं. अगर एक सिबलिंग इस बात को समझता है कि उस के पेरैंट्स उस में और उस के सिबलिंग में भेदभाव करते हैं तो उन्हें न केवल एकदूसरे को सपोर्ट करना चाहिए बल्कि उन्हें पेरैंट्स से मिल कर इस भेदभाव के खिलाफ लड़ना भी चाहिए ताकि उन्हें उन की गलती का एहसास हो.
जब भी पैरेंट्स बच्चों में भेदभाव करते हैं तो कई बार कुछ युवा कुछ कह नहीं पाते लेकिन उन का नाजुक मन यह भेदभाव अपने दिल में महसूस करता है और इस का असर कुछ इस तरह दिखाई पड़ता है-

इंफीरिऔरिटी कौम्प्लैक्स का आना

जब पेरैंट्स अकसर ही अपने एक बच्चे को अच्छा व सही और दूसरे को बुरा व गलत बताते रहते हैं तो उस के मन में हीनभावना यानी इंफीरिऔरिटी कौम्प्लैक्स पैदा हो जाता है. उस के मन में अकेलेपन की भावना घर कर जाती है. ऐसे में वह तनाव में आ सकता है जो उस के विकास में एक बड़ा बाधक बन सकता है.

बदले की भावना

भेदभाव होने की फीलिंग के चलते बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं और वे पेरैंट्स की बातों को इग्नोर कर, उन की बातें न मान कर और कभीकभी तो पेरैंट्स के कहने के ठीक उलटा कर के वे अपना बदला लेते हैं.

Inspirational Story : मेरे पापा की शादी

Inspirational Story : चांदीलाल आरष्टी के एक कार्यक्रम से स्कूटी से वापस लौट रहे थे. उन्हें घर वापसी में देरी हो गई थी. जैसे ही ‘सदर चैराहे‘ पर पहुंचे, तो उन की नजर शराब की दुकान पर पड़ी. उन्हें तुरंत ध्यान आया कि घर पर शराब की बोतल खाली हो गई थी और शाम की खुराक के लिए कुछ नहीं है.

उन्होंने स्कूटी एक ओर खड़ी की और अंगरेजी शराब का एक पव्वा खरीद लिया, जो उन की 2-3 दिन की खुराक थी. जब वे स्कूटी से घर की ओर चले तो उन्हें ध्यान आया कि पुलिस विभाग में भरती होने से पहले वे शराब को हाथ तक नहीं लगाते थे. फिर अपने विभाग के साथियों के साथ उठतेबैठते उन्हें शराब पीने की लत लग गई थी. सिस्टम में कई चीजें अपनेआप होने लगती हैं और उन से हम कठोर प्रण कर के ही बच सकते हैं. अब तो पीने की आदत ऐसी हो गई है कि शाम को बिना पिए निवाला हलक से नीचे उतरता ही नहीं.

घर पहुंच कर चांदीलाल ने अपने खाली मकान का ताला खोला. रसोई से ताजा खाने की गंध सी आ रही थी. इस का मतलब था कि घर की नौकरानी स्वीटी खाना बना कर जा चुकी थी. आनंदी के गुजरने के बाद मुख्य दरवाजे और रसोई की चाबी स्वीटी को दे दी गई थी, जिस से वह समय से खाना बना कर अपने घर जा सके.

आनंदी के बिना घर वीरान सा हो गया था. यही घर, जिस में आनंदी के रहते कैसी चहलपहल सी रहती थी, रिश्तेदारों और जानपहचान वालों का आनाजाना लगा ही रहता था, अब कैसा खालीखाली सा रहता है. घर का खालीपन कैसा काटने को दौड़ता है. सबकुछ होते हुए भी, कुछ भी न होने का एहसास होता है. केवल और केवल अकेला आदमी ही इस एहसास को परिभाषित कर सकता है. किसी ने सच कहा है ‘घर घरवाली का‘. वह है तो घर है, नहीं तो मुरदाघाट.

चांदीलाल को अब शराब की खुराक लेने की जल्दी थी. उन्होंने पैंटशर्ट उतारी और नेकरबनियान पहने हुए ही पैग तैयार करने लगे. तभी उन्हें ध्यान आया कि वे जल्दबाजी में पानी लाना तो भूल ही गए हैं. पुरानी आदतें मुश्किल से ही मरती हैं. आदतन, उन्होंने आवाज लगाई, ‘‘आनंदी, जरा एक गिलास पानी तो लाना.‘‘

लेकिन जब कुछ देर तक पानी नहीं आया, तो चांदीलाल ने रसोई की तरफ देखा. वहां कोई नहीं था. अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, फिर अफसोस हुआ और इस के बाद आनंदी को याद कर उन की आंखें भर आईं. वह उठे और पानी लेने के लिए खुद रसोई की तरफ गए.

एक पैग लेने के बाद, वे सोचने लगे कि अपनी मां की 13वीं के बाद मंझली बेटी रजनी ने उन से कितनी जिद की थी जयपुर चलने की. भला क्या कहा था उस ने, ”पापा, जयपुर में हमारे पास कितना बड़ा मकान है, एक कमरे में आप रह लेना. आप का अकेलापन भी दूर हो जाएगा और आप की देखभाल भी अच्छे से हो जाएगी.”

यही बात नागपुर में रहने वाली बड़ी बेटी सलोनी और इसी शहर में रहने वाली सब से छोटी बेटी तारा ने भी कही थी. फिर वे सोचने लगे, ‘‘मैं भी कितना दकियानूसी और रूढ़िवादी हूं. भला इस जमाने में बेटाबेटी में क्या फर्क है? कितने ही लोग हैं, जो बेटा न होने के कारण अपना बुढ़ापा बेटी और दामाद के घर गुजारते हैं और एक मैं हूं पुराने खयालातों का, जो अपनी बेटी के घर का पानी भी पीना पसंद नहीं करता, उन के यहां रहना तो बहुत दूर की बात.

चांदीलाल का दूसरा पैग बनाने का मन तो नहीं था, लेकिन अब शराब किसी दोस्त की संगति की तरह अच्छी लगती थी. शराब पीना और फिर नशे में बड़बड़ाना अकेलेपन को दूर करने का एक अच्छा जरीया भी तो था. शराब पी कर खाना खाने के बाद नींद भी तो अच्छी आती थी. फिर वह खाना खाने के बाद थकान और नशे की धुन में नींद के आगोश में चले गए.

चांदीलाल पूजापाठी थे. उन की सुबह स्नानध्यान से शुरू होती. नौकरी से रिटायर होने के बाद कोई खास काम तो था नहीं, अखबार पढ़ते, टीवी देखते और पौधों में पानी लगाते. कभी कोई मेहमान आ जाता तो उस के साथ गपशप कर लेते. लेकिन कुछ जानपहचान के लोग ऐसे थे, जो अब कुछ ज्यादा ही आने लगे थे. ये वे मेंढक थे, जो मौका पा कर बारिश का मजा लेना चाहते थे.

ऐसा ही एक मेहमान था चांदीलाल का दूर का भतीजा शक्ति सिंह. वह प्रोपर्टी डीलिंग का काम करता था. वह जब भी आता घुमाफरा कर चांदीलाल से उन के मकान की चर्चा करता, ‘‘चचा, आप का यह मकान 50 लाख रुपए से कम का नहीं है. बेटियां तो आप की बाहर रहती हैं, आप के बाद इस मकान का क्या होगा?‘‘

‘‘क्या होगा? मेरे मरने के बाद मेरी प्रोपर्टी पर मेरी बेटियों का अधिकार होगा,‘‘ चांदीलाल उसे समझाते.

‘‘लेकिन, जयपुर और नागपुर वाली बेटियां तो यहां लौट कर आने वाली नहीं. रही बात तारा की, तो उस के पास तो खुद इस शहर में इतना बड़ा मकान है, वह भी आधुनिक तरीके से बना हुआ. वह इस पुराने मकान का क्या करेगी?‘‘

‘‘कोई कुछ करे या न करे, शक्ति तुम से मतलब?‘‘ चांदीलाल कुछ तल्ख लहजे में बोले.

‘‘अरे, आप तो नाराज होने लगे. मैं तो आप की मदद करना चाहता था, आप के मकान की सही कीमत लगा कर.‘‘

‘‘फिर मैं कहां रहूंगा, शक्ति? क्या तुम ने यह कभी सोचा है?‘‘ चांदीलाल ने सवाल दागा.

‘‘चचा, अगर कुछ पैसे ले कर आप यह मकान मेरे नाम कर दो, तो आप मेरे ही पास रह लेना. आखिर मैं आप का भतीजा हूं, बिलकुल आप के बेटे जैसा. आप के बुढ़ापे में आप की सेवा मैं ही कर दूंगा.‘‘

चांदीलाल कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो शक्ति सिंह की बात का मतलब न समझ रहे हों. उन्होंने नहले पे दहला जड़ते हुए कहा, ”शक्ति, तुम्हें मेरी सेवा की इतनी ही चिंता है तो ऐसे ही मेरी सेवा कर दो, अपने नाम क्या मकान लिखवाना जरूरी है. और वैसे भी तुम को एक बात और बता दूं, तुम जैसों से ही बचने के लिए आनंदी पहले ही इस मकान की वसीयत मरने से बहुत पहले ही अपनी बेटियों के नाम कर चुकी थी, क्योंकि आनंदी को इस मामले में मुझ पर भी विश्वास नहीं था. वह सोचती थी कि शक्ति सिंह जैसा कोई व्यक्ति कहीं मुझे अध्धापव्वा पिला कर नशे की हालत में मुझ से यह प्रोपर्टी अपने नाम न करवा ले. शक्ति सिंह तुम्हें देख कर आज सोचता हूं कि आनंदी का फैसला कितना सही था?”

शक्ति सिंह समझ गया कि यहां उस की दाल गलने वाली नहीं. वह बहाना बना कर चलने के लिए उठा, तो चांदीलाल ने कटाक्ष करते हुए कहा, ”अरे बेटा, चाय तो पीता जा. अभी हमें सेवा का मौका दे, फिर तुम हमारी सेवा कर लेना.”

लेकिन इतनी देर में शक्ति सिंह अपनी कार में बैठ चुका था और उस दिन के बाद वह अपने इन चचा से मिलने फिर कभी नहीं आया.

कुछ ही देर बाद चांदीलाल का एक पुराना परिचित चंदन आ धमका. वह किसी पक्के इरादे से आया था, इसलिए चांदीलाल से लगभग सट कर बैठा. फिर बात को घुमाफिरा कर अपने इरादे पर ले आया.

‘‘भाईसाहब, अकेलापन भी बहुत बुरा होता है. खाली घर तो काटने को दौड़ता है,‘‘ चंदन ने भूमिका बनानी शुरू की.

‘‘हां चंदन, यह तो है. लेकिन क्या करें, किस ने सोचा था कि आनंदी इतनी जल्दी चली जाएगी. बस अब तो यों ही जिंदगी गुजारनी है. अब किया ही क्या जा सकता है?‘‘

‘‘नहीं भाईसाहब, यह जरूरी तो नहीं कि जिंदगी अकेले काटी जाए,‘‘ चंदन ने अपनी बात आगे बढ़ाई.

‘‘चंदन, और इस उम्र में करना क्या है? तीनों बेटियों का घर अच्छे से बसा हुआ है. वे सुखी हैं तो मैं भी सुखी हूं.‘‘

चंदन तो अपने मकसद से आया था. वह बोला, ”अरे भाईसाहब, क्या कहते हो? इस उम्र में क्या नहीं किया जा सकता? मर्द कभी बूढ़ा होता है क्या?”

उस की बात पर चांदीलाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘चंदन, तुम भी अच्छा मजाक कर लेते हो. अब तो तुम कवियों और दार्शनिकों की तरह बात करने लगे हो. मैं कोई शायर नहीं कि कल्पना लोक में जिऊं. मैं ने पुलिस विभाग में नौकरी की है. मेरा वास्तविकताओं से पाला पड़ा है, मैं पक्का यथार्थवादी हूं. 60 साल की उम्र में सरकार रिटायर कर देती है और मैं 65 पार कर चुका हूं.‘‘

लेकिन चंदन हार मानने वालों में से नहीं था. उस ने कहा, ‘‘भाईसाहब, इस उम्र में तो न जाने कितने लोग शादी करते हैं. आप भी पीछे मत रहिए, शादी कर ही लीजिए. एक लड़की मतलब एक औरत मेरी नजर में है, यदि आप चाहो तो बात… ‘‘

‘मतलब चंदन, तुम्हें कोई शर्मलिहाज नहीं. भला, मैं इस उम्र में दूसरी शादी कर के समाज में क्या मुंह दिखलाऊंगा? मेरी बेटियां और दामाद क्या सोचेंगे?’

अब चंदन चांदीलाल के और निकट सरक आया और आगे बोला, ‘अरे भाईसाहब, यह जमाना तो न जाने क्याक्या कहता है? लेकिन यह जमाना यह नहीं जानता कि अकेले जीवन काटना कितना मुश्किल होता है?’

”कितना भी मुश्किल हो चंदन, लेकिन इस उम्र में दूसरा विवाह करना शोभा नहीं देता.”

‘‘भाईसाहब, अभी तो आप के हाथपैर चल रहे हैं, लेकिन उस दिन की तो सोचिए, जब बुढ़ापे और कमजोरी के कारण आप का चलनाफिरना भी मुश्किल हो जाएगा. अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण आप अपनी बेटियों के पास तो जाओगे नहीं. अपने भाईभतीजों से भी आप की बनती नहीं. तब की सोचिए न, तब क्या होगा?‘‘ चंदन ने आंखें चौड़ी करते हुए प्रश्नवाचक दृष्टि से कहा.

यह सुन कर चांदीलाल सोचने को मजबूर हुए. उन्हें लगा कि चंदन कह तो सच ही रहा है, लेकिन वह अपनेआप को संभालते हुए बोले, ‘‘चंदन, तब की तब देखी जाएगी.”

‘‘देख लो भाईसाहब. जरूरी नहीं, आप को सरोज जैसी अच्छी और हसीन औरत फिर मिल जाए. अच्छा, एक काम करो, एक बार बस आप सरोज से मिल लो. मैं यह नहीं कह रहा कि आप उस से शादी ही करो. लेकिन, एक बार उस से मिलने में क्या हर्ज है?‘‘

‘‘मिलने में तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन यदि मेरी बेटियों को यह सब पता चला तो…?‘‘ चांदीलाल ने प्रश्न किया.

‘‘उन्हें तो तब पता चलेगा, जब हम उन्हें पता चलने देंगे,‘‘ चंदन ने बड़े विश्वास के साथ कहा. तब तक स्वीटी उन के लिए चाय बना कर ले आई थी. चाय पी कर चंदन चला गया.

फिर चंदन एक दिन सरोज को चुपचाप कार में बैठा कर चांदीलाल के घर ले आया. चांदीलाल को सरोज पहली ही नजर में भा गई. वे सोचने लगे, ‘बुढ़ापे में इतना हसीन साथी मिल जाए तो बुढ़ापा आराम से गुजर जाए.‘

महिलाओं के आकर्षणपाश में बड़ेबड़े ऋषिमुनि फंस गए, चांदीलाल तो फिर भी एक साधारण से इनसान थे, आखिर किस खेत की मूली थे.
अब बात करवाने में चंदन तो पीछे रह गया, चांदीलाल खुद ही मोबाइल पर रोज सरोज से बतियाने लगे. जब चंदन और सरोज की सारी गोटियां फिट बैठ गईं, तो एक दिन चंदन ने चांदीलाल से कहा, ‘‘भाईसाहब, एक बार सलोनी, रजनी और तारा बिटिया से भी बात कर लेते.‘‘

लेकिन, अब तक तो चांदीलाल के सिर पर बुढ़ापे का इश्क सवार हो चुका था. वे किसी भी हाल में सरोज को नहीं खोना चाहते थे. चंदन की बात को सुन कर वे एकदम से बोले, ‘‘नहीं, नहीं, चंदन. मैं अपनी बेटियों को अच्छे से जानता हूं, वे सरोज को घर में घुसने भी नहीं देंगी. पहले सरोज से कोर्टमैरिज हो जाने दो, फिर देखा जाएगा.‘‘

चंदन समझ गया कि चांदीलाल के इश्क का तीर गहरा लगा है. उस की योजना पूरी तरह से सफल हो रही है.

फिर एक दिन चंदन योजनाबद्ध तरीके से सरोज को आमनेसामने की बातचीत कराने के बहाने चांदीलाल के घर ले कर पहुंचा. बातचीत पूरी होने के बाद चंदन ने कहा, ‘‘ठीक है भाईसाहब, मैं चलता हूं. रात भी बहुत हो चुकी है. आज रात सरोज यहीं रहेगी. आप दोनों एकदूसरे को अच्छे से समझ लो, मैं सुबह को सूरज उगने से पहले ही यहां से ले जाऊंगा.‘‘

चांदीलाल को भला इस में क्या एतराज हो सकता था, वह तो खुशी के मारे गदगद हो गए.

‘‘सुना है, आप शाम को ड्रिंक भी करते हैं.‘‘

‘‘हां सरोज, लेकिन तुम्हें कैसे पता?‘‘

‘‘चंदन ने हमें सबकुछ बता रखा है आप के बारे में,‘‘ सरोज ने चांदीलाल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘अच्छा… तो फिर पानी ले आओ, मैं अपना पैग बना लेता हूं,‘‘ चांदीलाल ने सरोज का हाथ स्पर्श करते हुए कहा.

‘‘आप क्यों कष्ट उठाइएगा. पैग भी हम ही बना देंगे. लेकिन, एक बात पूछनी थी, पूछूं?‘‘

‘‘क्या बात करती हो, सरोज? एक नहीं दस पूछो,‘‘ चांदीलाल ने प्यारभरी नजरों से सरोज को निहारते हुए कहा.

‘‘आप हमारे लिए क्या करोगे?‘‘

‘‘सरोज, बड़ी बात तो नहीं. जो कुछ मेरा है, वह सब तुम्हारा ही तो है. बस, इस मकान को छोड़ कर, इस की वसीयत बेटियों के नाम है.‘‘

यह सुन कर सरोज कुछ निराश हुई और पानी लेने के बहाने रसोई में गई. वहां जा कर उस ने मोबाइल से चंदन से बात करते हुए कहा, ‘‘चंदन, यह मकान बुड्ढे के नाम नहीं है.‘‘

उधर से आवाज आई, ‘‘तो फिर अपना काम बना कर रफूचक्कर हो जा, नहीं तो बुड्ढा तेरे से कोर्टमैरिज कर के ही मानेगा.‘‘

उधर चांदीलाल बेचैन हो रहा था. सरोज के पानी लाते ही उन्होंने पूछा, ‘‘सरोज, अपना हाथ आगे बढ़ाओ.‘‘

सरोज ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, तो उस की उंगली में सोने की अंगूठी पहनाते हुए चांदीलाल ने कहा, ‘‘सरोज, यह आनंदी की अंगूठी है. अब तुम ही मेरी आनंदी हो.‘‘

सरोज ने चांदीलाल का पैग बनाते हुए नशीली आंखों से कहा, ‘‘लीजिए, जनाब की लालपरी तैयार है. लेकिन पी कर बेसुध मत हो जाइएगा, कभी किसी काम के न रहिएगा.‘‘

चांदीलाल इन शब्दों का अर्थ अच्छे से समझते थे. लेकिन यह क्या? वह तो पहला पैग पीते ही बेसुध हो गए.

सुबह के समय जब उन की आंखें खुली तो वह अभी भी अपने को नशे की चपेट में महसूस कर रहे थे. टायलेट जाते समय भी उन के पैर लड़खड़ा रहे थे. उन्हें ध्यान आया कि शराब पी कर तो वे कभी ऐसे बेसुध नहीं हुए. टायलेट से आ कर वे सरोज को तलाशने लगे. लेकिन वह कहीं हो तो दिखाई दे. इधरउधर नजर डाली तो देखा, सेफ और अलमारियां खुली पड़ी हैं. उन्हें अब समझते देर न लगी कि उन के साथ क्या हुआ है. वे लुट गए. घर में रखी नकदी और जेवरात गायब थे. सरोज का फोन भी नहीं लग रहा था. चांदीलाल का सारा नशा और इश्क एक ही झटके में काफूर हो चुका था.

उन्होंने चंदन को फोन लगा कर सारी बात बताई. उस ने कहा, ‘‘चांदीलाल सुन, मेरा उस सरोज से कोई लेनादेना नहीं. मैं ने तो बस तुम दोनों की मुलाकात कराई थी. इस मसले पर कहीं जिक्र मत करना, नहीं तो बदनामी तुम्हारी होगी. कहो तो तुम्हारी नीच हरकत का जिक्र तुम्हारी बेटियों से करूं कि इस उम्र में तुम अनजानी औरतों को अंगूठी पहनाते फिर रहे हो.‘‘

‘‘नहीं, नहीं, ऐसा मत करना, चंदन. नहीं तो मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी,‘‘ चांदीलाल ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘तो फिर अपनी जबान बंद रखना, नहीं तो बेटियों और दामाद सब के सामने तुम्हारी पोल खोल कर रख दूंगा,‘‘ चंदन ने लगभग धमकी देते हुए कहा.

चांदीलाल के पास जबान बंद रखने के सिवा और कोई चारा न था.

कुछ दिनों के बाद चांदीलाल का जन्मदिन था. इस बार तीनों बहनें सलोनी, रजनी और तारा ने यह फैसला किया था कि वे तीनों मिल कर पापा का जन्मदिन उन के पास आ कर मनाएंगी.

जन्मदिन वाले दिन वे सभी बहनें पापा के पास पहुंच गईं. सलोनी अपने साथ एक अधेड़ उम्र की महिला को भी ले कर आई थी. तीनों बहनें उस महिला को आंटी कह कर पुकार रही थीं.चांदीलाल ने सलोनी से पूछा, ‘‘बिटिया सलोनी, यह तुम्हारी आंटी कौन है?‘‘

‘‘पापा, पहले ये आंटी वृद्धाश्रम में रहती थीं, लेकिन अब ये हमारे साथ रहती हैं. आप को पसंद हैं क्या, हमारी यह आंटी?‘‘

‘‘अरे सलोनी बेटी, कैसी बात करती हो? मैं ने तो बस यों ही पूछ लिया था. इस में पसंदनापसंद की क्या बात है?‘‘

‘‘नहीं पापा, देख लो. यदि आंटी आप को पसंद हो, तो हम इन को यहीं छोड़ जाएंगे. इन का भी यहां कोई नहीं है. इन के बच्चे इन्हें छोड़ कर विदेशों में जा बसे हैं. आप का घर ये अच्छे से संभाल लेंगी,‘‘ सलोनी ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अरे सलोनी बेटा, ऐसे बातें कर के क्यों मेरे साथ मजाक कर रही हो?‘‘

तभी मंझली बेटी रजनी ने पापा के गले में हाथ डाल कर कहा, ‘‘पापा, सलोनी दीदी मजाक नहीं कर रही हैं. आप अकेले रहते हैं, आप के सहारे के लिए भी तो कोई न कोई चाहिए. क्यों पापा?‘‘

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन बेटा…‘‘

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं पापा, हमें भी दूसरी मम्मी चाहिए, बस,‘‘ सब से छोटी बेटी तारा ने छोटे बच्चों की तरह मचलते हुए कहा.

‘‘नहीं बेटी, तारा. इस उम्र में ये सब बातें शोभा नहीं देतीं.‘‘

‘‘अच्छा पापा, फिर वो सरोज आंटी… जिन्हें आप मम्मी की यह अंगूठी पहनाए थे… और जो आप को धोखा दे कर लूट कर भाग गई… हमारी वाली ये सुमन आंटी ऐसी नहीं हैं.‘‘

तारा के यह कहते ही चांदीलाल को सांप सूंघ गया. उन्हें यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि सरोज को पहनाई गई अंगूठी तारा के पास कहां से और कैसे आई?

पापा को अचंभित होता देख तारा बोली, ‘‘पापा, आप को अचंभित होने या फिर हम से कुछ भी छुपाने की कोई जरूरत नहीं है. स्वीटी हमें सब बातें बता देती थी. उस ने हमें सरोज को ले कर आगाह किया था. हम पूरी तरह से उस दिन चैकन्ने हो गए थे, जिस दिन सरोज यहां रुकी थी. हमें आप की दूसरी शादी से कोई एतराज नहीं था. लेकिन, हम इस बात से हैरान थे कि आप ने हम से इस बात का जिक्र तक नहीं किया.‘‘

‘‘इस का मतलब कि तुम सरोज को जानते हो?‘‘

‘‘पापा, मैं और आप के दामाद मुकेश आप से उस दिन मिलने ही आ रहे थे. जब हम आए तो सरोज लूटपाट कर भागने ही वाली थी कि हम ने उसे चोरी करते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया. आप उस समय अचेत पड़े हुए थे. आप को पानी में घोल कर नशे की गोलियां दी गई थीं. हम ने उस से मम्मी की अंगूठी समेत सारा सामान वापस ले लिया था. थाने में इसलिए शिकायत नहीं की कि कहीं आप को कोर्टकचहरी के चक्कर न लगाने पड़ें. उस दिन सुबह आप का नशा उतरने तक हम घर में ही थे और सलोनी व रजनी के संपर्क में भी थे. उसी रात हम सब ने तुम्हारी दूसरी शादी करने की योजना बना ली थी, क्योंकि आप हमारे साथ तो रहने वाले हैं नहीं.‘‘

अभी चांदीलाल कुछ कहने वाले थे, लेकिन उस से पहले ही रजनी बोल पड़ी, ‘‘अब बताओ पापा, आप को सुमन आंटी पसंद हैं कि नहीं. अब आप यह भी नहीं कह सकते कि आप इस उम्र में विवाह नहीं करना चाहते.‘‘

चांदीलाल के पास रजनी की बात का कोई जवाब नहीं था. वह हलके से मुसकरा दिए. फिर गंभीर होते हुए वे बोले, ‘‘तुम्हारी आंटी से मैं शादी करने के लिए तैयार हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है. मैं एक पुलिस वाला रहा हूं. मैं अपनी पुलिस की ड्यूटी अभी भी निभाऊंगा.‘‘

‘‘ मतलब, पापा?‘‘ तीनों बेटी एकसाथ बोलीं.

‘मतलब यह कि मैं चंदन और सरोज दोनों को जेल भिजवा कर ही रहूंगा, दोनों ही समाज के असामाजिक तत्व हैं.’

‘‘जैसे आप की मरजी, हमारे बहादुर पापा.‘‘तारा ने तभी अपनी मां आनंदी की अंगूठी पापा को पकड़ाई और चांदीलाल ने वह अंगूठी सुमन को पहना दी. अब पापा विधुर नहीं रह गए थे, बल्कि खुली सोच की बेटियों की वजह से एक विधवा सुमन भी सधवा बन गई थी.

Love Story In Hindi : कहां हो तुम आ जाओ

Love Story In Hindi :  ऋतु अपने कालेज के गेट के बाहर निकली तो उस ने देखा बहुत तेज बारिश हो रही है. ‘ओ नो, अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’ उस ने परेशान होते हुए अपनेआप से कहा. इतनी तेज बारिश में तो छाता भी नाकामयाब हो जाता है और ऊपर से यह तेज हवा व पानी की बौछारें जो उसे लगातार गीला कर रही थीं. सड़क पर इतने बड़ेबड़े गड्ढे थे कि संभलसंभल कर चलना पड़ रहा था. जरा सा चूके नहीं कि सड़क पर नीचे गिर जाओ. लाख संभालने की कोशिश करने पर भी हवा का आवेग छाते को बारबार उस के हाथों से छुड़ा ले जा रहा था. ऐसे में अगर औटोरिक्शा मिल जाता तो कितना अच्छा होता पर जितने भी औटोरिक्शा दिखे, सब सवारियों से लदे हुए थे.

उस ने एक ठंडी सी आह भरी और पैदल ही रवाना हो गई, उसे लगा जैसे मौसम ने उस के खिलाफ कोई साजिश रची हो. झुंझलाहट से भरी धीरेधीरे वह अपने घर की तरफ बढ़ने लगी कि अचानक किसी ने उस के आगे स्कूटर रोका. उस ने छाता हटा कर देखा तो यह पिनाकी था. ‘‘हैलो ऋतु, इतनी बारिश में कहां जा रही हो?’’

‘‘यार, कालेज से घर जा रही हूं और कहां जाऊंगी.’’ ‘‘इस तरह भीगते हुए क्यों जा रही है?’’

‘‘तू खुद भी तो भीग रहा है, देख.’’ ‘‘ओके, अब तुम छाते को बंद करो और जल्दी से मेरे स्कूटर पर बैठो, यह बारिश रुकने वाली नहीं, समझी.’’

ऋतु ने छाता बंद किया और किसी यंत्रचालित गुडि़या की तरह चुपचाप उस के स्कूटर पर बैठ गई. आज उसे पिनाकी बहुत भला लग रहा था, जैसे डूबते को कोई तिनका मिल गया हो. हालांकि दोनों भीगते हुए घर पहुंचे पर ऋतु खुश थी. घर पहुंची तो देखा मां ने चाय के साथ गरमागरम पकौड़े बनाए हैं. उन की खुशबू से ही वह खिंचती हुई सीधी रसोई में पहुंच गई और प्लेट में रखे पकौड़ों पर हाथ साफ करने लगी तो मां ने उस का हाथ बीच में ही रोक लिया और बोली, ‘‘न न ऋ तु, ऐसे नहीं, पहले हाथमुंह धो कर आ और अपने कपड़े देख, पूरे गीले हैं, जुकाम हो जाएगा, जा पहले कपड़े बदल ले. पापा और भैया बालकनी में बैठे हैं, तुम भी वहीं आ जाना.’’ ‘भूख के मारे तो मेरी जान निकली जा रही है और मां हैं कि…’ यह बुदबुदाती सी वह अपने कमरे में गई और जल्दी से फ्रैश हो कर अपने दोनों भाइयों के बीच आ कर बैठ गई. छोटे वाले मुकेश भैया ने उस के सिर पर चपत लगाते हुए कहा, ‘‘पगली, इतनी बारिश में भीगती हुई आई है, एक फोन कर दिया होता तो मैं तुझे लेने आ जाता.’’

‘‘हां भैया, मैं इतनी परेशान हुई और कोई औटोरिक्शा भी नहीं मिला, वह तो भला हो पिनाकी का जो मुझे आधे रास्ते में मिल गया वरना पता नहीं आज क्या होता.’’ इतना कह कर वह किसी भूखी शेरनी की तरह पकौड़ों पर टूट पड़ी. अब बारिश कुछ कम हो गई थी और ढलते हुए सूरज के साथ आकाश में रेनबो धीरेधीरे आकार ले रहा था. कितना मनोरम दृश्य था, बालकनी की दीवार पर हाथ रख कर मैं कुदरत के इस अद्भुत नजारे को निहार रही थी कि मां ने पकौड़े की प्लेट देते हुए कहा, ‘‘ले ऋ तु, ये मिसेज मुखर्जी को दे आ.’’ उस ने प्लेट पकड़ी और पड़ोस में पहुंच गई. घर के अंदर घुसते ही उसे हीक सी आने लगी, उस ने अपनी नाक सिकोड़ ली. उस की ऐसी मुखमुद्रा देख कर पिनाकी की हंसी छूट गई.

वह ठहाका लगाते हुए बोला, ‘‘भीगी बिल्ली की नाक तो देखो कैसी सिकुड़ गई है,’’ यह सुन कर ऋ तु गुस्से में उस के पीछे भागी और उस की पीठ पर एक धौल जमाई. पिनाकी उहआह करता हुआ बोला, ‘‘तुम लड़कियां कितनी कठोर होती हो, किसी के दर्द का तुम्हें एहसास तक नहीं होता.’’

‘‘हा…हा…हा… बड़ा आया दर्द का एहसास नहीं होता, मुझे चिढ़ाएगा तो ऐसे ही मार खाएगा.’’ मिसेज मुखर्जी रसोई में मछली तल रही थीं, जिस की बदबू से ऋ तु की हालत खराब हो रही थी. उस ने पकौड़ों की प्लेट उन्हें पकड़ाई और बाहर की ओर लपकते हुए बोली, ‘‘मैं तो जा रही हूं बाबा, वरना इस बदबू से मैं बेहोश हो जाऊंगी.’’

मिसेज मुखर्जी ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम को मछली की बदबू आती है लेकिन ऋ तु अगर तुम्हारी शादी किसी बंगाली घर में हो गई, तब क्या करेगी.’’

बंगाली लोग प्यारी लड़की को लाली कह कर बुलाते हैं. पिनाकी की मां को ऋ तु के लाललाल गालों पर मुसकान बहुत पसंद थी. वह अकसर उसे कालेज जाते हुए देख कर छेड़ा करती थी. ‘‘ऋ तु तुमी खूब शुंदर लागछी, देखो कोई तुमा के उठा कर न ले जाए.’’

पिनाकी ने सच ही तो कहा था ऋ तु को उस के दर्द का एहसास कहां था. वह जब भी उसे देखता उस के दिल में दर्द होता था. ऋ तु अपनी लंबीलंबी 2 चोटियों को पीठ के पीछे फेंकते हुए अपनी बड़ीबड़ी और गहरी आंखें कुछ यों घूमाती है कि उन्हें देख कर पिनाकी के होश उड़ जाते हैं और जब बात करतेकरते वह अपना निचला होंठ दांतों के नीचे दबाती है तो उस की हर अदा पर फिदा पिनाकी उस की अदाओं पर मरमिटना चाहता है. पर ऋतु से वह इस बात को कहे तो कैसे कहे. कहीं ऐसा न हो कि ऋतु यह बात जानने के बाद उस से दोस्ती ही तोड़ दे. फिर उसे देखे बिना, उस से बात किए बिना वह जी ही नहीं पाएगा न, बस यही सोच कर मन की बात मन में लिए अपने प्यार को किसी कीमती हीरे की तरह मन में छिपाए उसे छिपछिप कर देखता है. आमनेसामने घर होने की वजह से उस की यह ख्वाहिश तो पूरी हो ही जाती है. कभी बाहर जाते हुए तो कभी बालकनी में खड़ी ऋतु उसे दिख ही जाती है पर वह उसे छिप कर देखता है अपने कमरे की खिड़की से.

‘‘पिनाकी, क्या सोच रहा है?’’ ऋतु उस के पास खड़ी चिल्ला रही थी इस बात से बेखबर कि वह उसी के खयालों में खोया हुआ है. कितना फासला होता है ख्वाब और उस की ताबीर में. ख्वाब में वह उस के जितनी नजदीक थी असल में उतनी ही दूर. जितना खूबसूरत उस का खयाल था, क्या उस की ताबीर भी उतनी ही खूबसूरत थी. हां, मगर ख्वाब और उस की ताबीर के बीच का फासला मिटाना उस के वश की बात नहीं थी. ‘‘तू चल मेरे साथ,’’ ऋतु उसे खींचती हुई स्टडी टेबल तक ले गई. ‘‘कल सर ने मैथ्स का यह नया चैप्टर सौल्व करवाया, लेकिन मेरे तो भेजे में कुछ नहीं बैठा, अब तू ही कुछ समझा दे न.’’

ऋतु को पता था कि पिनाकी मैथ्स का मास्टर है, इसलिए जब भी उसे कोई सवाल समझ नहीं आता तो वह पिनाकी की मदद लेती है, ‘‘कितनी बार कहा था मां से यह मैथ्स मेरे बस का रोग नहीं, लेकिन वे सुनती ही नहीं, अब निशा को ही देख आर्ट्स लिया है उस ने, कितनी फ्री रहती है. कोई पढ़ाई का बोझ नहीं और यहां तो बस, कलम घिसते रहो, फिर भी कुछ हासिल नहीं होता.’’ ‘‘इतनी बकबक में दिमाग लगाने के बजाय थोड़ा पढ़ाई में लगाया होता तो सब समझ आ जाता.’’

‘‘मेरा और मैथ्स का तो शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है, पिनाकी.’’ पिनाकी एक घंटे तक उसे समझाने की कोशिश करता रहा पर ऋ तु के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था.

‘‘तुम सही कहती हो ऋतु, यह मैथ्स तुम्हारे बस की नहीं है, तुम्हारा तो इस में पास होना भी मुश्किल है यार.’’

पिनाकी ने अपना सिर धुनते हुए कहा तो ऋ तु को हंसी आ गई. वह जोरजोर से हंसे जा रही थी और पिनाकी उसे अपलक निहारे जा रहा था. उस के जाने के बाद पिनाकी तकिए को सीने से चिपटाए ऋ तु के ख्वाब देखने में मगन हो गया. जब वह उस के पास बैठी थी तो उस के लंबे खुले बाल पंखे की हवा से उड़ कर बारबार उस के कंधे को छू रहे थे और इत्र में घुली मदहोश करती उस की सांसों की खुशबू ने पिनाकी के होश उड़ा दिए थे. पर अपने मन की इन कोमल संवेदनशील भावनाओं को दिल में छिपा कर रखने में, इस दबीछिपी सी चाहत में, शायद उस के दिल को ज्यादा सुकून मिलता था. कहते हैं अगर प्यार हो जाए तो उस का इजहार कर देना चाहिए. मगर क्या यह इतना आसान होता है और फिर दोस्ती में यह और भी ज्यादा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि यह जो दिल है, शीशे सा नाजुक होता है. जरा सी ठेस लगी नहीं, कि छन्न से टूट कर बिखर जाता है. इसीलिए अपने नाजुक दिल को मनामना कर दिल में प्रीत का ख्वाब संजोए पिनाकी ऋ तु की दोस्ती में ही खुश था, क्योंकि इस तरह वे दोनों जिंदादिली से मिलतेजुलते और हंसतेखेलते थे.

ऋतु भले ही पिनाकी के दिल की बात न समझ पाई हो पर उस की सहेली उमा ने यह बात भांप ली थी कि पिनाकी के लिए ऋ तु दोस्त से कहीं बढ़ कर है. उस ने ऋतु से कहा भी था, ‘‘तुझे पता है ऋतु, पिनाकी दीवाना है तेरा.’’ और यह सुन कर खूब हंसी थी वह और कहा था, ‘‘धत्त पगली, वह मेरा अच्छा दोस्त है. एक ऐसा दोस्त जो हर मुश्किल घड़ी में न जाने कैसे किसी सुपरमैन की तरह मेरी मदद के लिए पहुंच जाता है और फिर यह कहां लिखा है कि एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते, इस बात को दिल से निकाल दे, ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘पर मैं ने कई बार उस की आंखों में तेरे लिए उमड़ते प्यार को देखा है, पगली चाहता है वह तुझे.’’ ‘‘तेरा तो दिमाग खराब हो गया लगता है. उस की आंखें ही पढ़ती रहती है, कहीं तुझे ही तो उस से प्यार नहीं हो गया. कहे तो तेरी बात चलाएं.’’

‘‘तुझे तो समझाना ही बेकार है.’’ ‘‘उमा, सच कहूं तो मुझे ये बातें बकवास लगती हैं. मुझे लगता है हमारे मातापिता हमारे लिए जो जीवनसाथी चुनते हैं, वही सही होता है. मैं तो अरेंज मैरिज में ज्यादा विश्वास रखती हूं, सात फेरों के बाद जीवनसाथी से जो प्यार होता है वही सच्चा प्यार है और वह प्यार कभी उम्र के साथ कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता ही है.’’

उमा आंखें फाड़े ऋ तु को देख रही थी, ‘‘मैं ने सोचा नहीं था कि तू इतनी ज्ञानी है. धन्य हो, आप के चरण कहां हैं देवी.’’ और फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं.

इस के बाद फिर कभी उमा ने यह बात नहीं छेड़ी, पर उसे इस बात का एहसास जरूर था कि एक न एक दिन यह एकतरफा प्यार पिनाकी को तोड़ कर रख देगा. पर कुछ हालात होते ही ऐसे हैं जिन पर इंसान का बस नहीं चलता. और अब घर में भी ऋ तु की शादी के चर्चे चलने लगे थे, जिन्हें सुन कर वह मन ही मन बड़ी खुश होती थी कि चलो, अब कम से कम पढ़ाई से तो छुटकारा मिलेगा. सुंदर तो थी ही वह, इसीलिए रिश्तों की लाइन सी लग गई थी. उस के दोनों भाई हंसते हुए चुटकी लेते थे, ‘‘तेरी तो लौटरी लग गई ऋ तु, लड़कों की लाइन लगी है तेरे रिश्ते के लिए. यह तो वही बात हुई, ‘एक अनार और सौ बीमार’?’’

‘‘मम्मी, देखो न भैया को,’’ यह कह कर वह शरमा जाती थी. ऋतु और उमा बड़े गौर से कुछ तसवीरें देखने में मग्न थीं. ऋ तु तसवीरों को देखदेख कर टेबल पर रखती जा रही थी, फिर अचानक एक तसवीर पर उन दोनों सहेलियों को निगाहें थम गईं. दोनों ने एकदूसरे की तरफ देखा. ऋतु की आंखों की चमक साफसाफ बता रही थी कि उसे यह लड़का पसंद आ गया था. गोरा रंग, अच्छी कदकाठी और पहनावा ये सारी चीजें उस के शानदार व्यक्तित्व की झलकियां लग रही थीं. उमा ने भौंहें उचका कर इशारा किया तो ऋतु ने पलक झपका दी. उमा बोली, ‘‘तो ये हैं हमारे होने वाले जीजाजी,’’ उस ने तसवीर ऋ तु के हाथ से खींच ली और भागने लगी.

‘‘उमा की बच्ची, दे मुझे,’’ कहती ऋ तु उस के पीछे भागी. पर उमा ने एक न सुनी, तसवीर ले जा कर ऋतु की मम्मी को दे दी और बोली, ‘‘यह लो आंटी, आप का होने वाला दामाद.’’

मां ने पहले तसवीर को, फिर ऋतु को देखा तो वह शरमा कर वहां से भाग गई. लड़का डाक्टर था और उस का परिवार भी काफी संपन्न व उच्च विचारों वाला था. एक लड़की जो भी गुण अपने पति में चाहती है वे सारे गुण उस के होने वाले पति कार्तिक में थे. और क्या चाहिए था उसे. उस की जिंदगी तो संवरने जा रही थी और वह यह सोच कर भी खुश थी कि अब शादी हो जाएगी तो पढ़ाई से पीछा छूटेगा. उस ने जितना पढ़ लिया, काफी था. पर लड़के वालों ने कहा कि उस का ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद ही वे शादी करेंगे. ऋ तु की सहमति से रिश्ता तय हुआ और आननफानन सगाई की तारीख भी पक्की हो गई.

सगाई के दिन पिनाकी और उस का परिवार वहां मौजूद नहीं था. उस की दादी की बीमारी की खबर सुन कर वे लोग गांव चले गए थे. गांव से लौटने में उन्हें 15 दिन लग गए. वापस लौटा तो सब से पहले ऋ तु को ही देखना चाहता था पिनाकी. और ऋ तु भी उतावली थी अपने सब से प्यारे दोस्त को सगाई की अंगूठी दिखाने के लिए. जैसे ही उसे पता चला कि पिनाकी लौट आया है वह दौड़ीदौड़ी चली आई पिनाकी के घर. पिनाकी की नजर खिड़की के बाहर उस के घर की ओर ही लगी थी. जब उस ने ऋ तु को अपने घर की ओर आते देखा तो वह सोच रहा था आज कुछ भी हो जाए वह उसे अपने दिल की बात बता कर ही रहेगा. उसे क्या पता था कि उस की पीठ पीछे उस की दुनिया उजाड़ने की तैयारी हो चुकी है. ‘‘पिनाकी बाबू, किधर हो,’’ ऋतु शोर मचाती हुई अंदर दाखिल हुई.

‘‘हैलो ऋतु, आज खूब खुश लागछी तुमी?’’ पिनाकी की मां ने उस के चेहरे पर इतनी खुशी और चमक देख कर पूछा. ‘‘बात ही कुछ ऐसी है आंटी, ये देखो,’’ ऐसा कह कर उस ने अपनी अंगूठी वाला हाथ आगे कर दिया और चहकते हुए अपनी सगाई का किस्सा सुनाने लगी.

पिनाकी पास खड़ा सब सुन रहा था. उसे देख कर ऋ तु उस के पास जा कर अपनी अंगूठी दिखाते हुए कहने लगी, ‘‘देख ना, कैसी है, है न सुंदर. अब ऐसा मुंह बना कर क्यों खड़ा है, अरे यार, तुम लोग गांव गए थे और मुहूर्त तो किसी का इंतजार नहीं करता न, बस इसीलिए, पर तू चिंता मत कर, तुझे पार्टी जरूर दूंगी.’’

पिनाकी मुंह फेर कर खड़ा था, शायद वह अपने आंसू छिपाना चाहता था. फिर वह वहां से चला गया. ऋ तु उसे आवाज लगाती रह गई. ‘‘अरे पिनाकी, सुन तो क्या हुआ,’’ ऋ तु उस की तरफ बढ़ते हुए बोली.

पर वह वापस नहीं आया और दोबारा उसे कभी नहीं मिला क्योंकि अगले दिन ही वह शहर छोड़ कर गांव चला गया. ऋ तु सोचती रह गई. ‘‘आखिर क्या गलती हुई उस से जो उस का प्यारा दोस्त उस से रूठ गया. उस की शादी हो गई और वह अपनी गृहस्थी में रम गई पर पिनाकी जैसे दोस्त को खो कर कई बार उस का दुखी मन पुकारा करता, ‘‘कहां हो तुम?’’

Short story in Hindi : पति परमेश्‍वर नहीं सिर्फ साथी

Short story in Hindi : 3 दिन हो गए स्वाति का फोन नहीं आया तो मैं घबरा उठी. मन आशंकाओं से घिरने लगा. वह प्रतिदिन तो नहीं मगर हर दूसरे दिन फोन जरूर करती थी. मैं उसे फोन नहीं करती थी यह सोच कर कि शायद वह बिजी हो. कोई जरूरत होती तो मैसेज कर देती थी. मगर आज मुझ से नहीं रहा गया और शाम होतेहोते मैं ने स्वाति का नंबर डायल कर दिया. उधर से एक पुरुष स्वर सुन कर मैं चौंक गई. हालांकि फोन तुरंत स्वाति ने ले लिया मगर मैं उस से सवाल किए बिना नहीं रह सकी.

‘‘फोन किस ने उठाया था स्वाति?’’

‘‘मां, वह रोहन था… मेरा दोस्त’’, स्वाति ने बेहिचक जवाब दिया.

‘‘मगर तुम तो महिला छात्रावास में रहती हो ना. क्या वहां पुरुष मित्रों को भी आने की इजाजत है? वह भी इस वक्त?’’  मैं ने थोड़ा कड़े लहजे में पूछा.

‘‘मां अब मैं होस्टल में नहीं रहती. मैं रोहन के साथ रह रही हूं उस के फ्लैट में. रोहन मेरे साथ ही कालेज में पढ़ता है.’’

‘‘क्या? कहीं तुम ने हमें बताए बिना शादी तो नहीं कर ली?’’

‘‘नहीं मां, हम लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं.’’

‘‘स्वाति, तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो? अभी तुम्हारी उम्र अपना कैरियर बनाने की है. और तुम्हारी ही उम्र का रोहन…वह क्या तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी समझता है?’’

‘‘मां, हम दोनों सिर्फ दोस्त हैं.’’

‘‘लड़कालड़की दोस्त होने से पहले एक लड़की और लड़का होते हैं. कुछ नहीं तो कम से कम अपने और परिवार की मर्यादा का तो खयाल रखा होता. हम ने तुझे आधुनिक बनाया है, इस का मतलब यह तो नहीं कि तू हमें यह दिन दिखाए. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?’’ मैं पूरी तरह से तिलमिला गई थी.

‘‘मां, समाज और बिरादरी की बात न ही करो तो अच्छा है. वैसे भी आप की दी गई शिक्षा ने मुझे अच्छेबुरे का फर्क तो समझा ही दिया है.

‘‘रोहन उन छिछोरे लड़कों की तरह नहीं है जो सिर्फ मौजमस्ती के लिए लिवइन में रहते हैं और न ही मैं वैसी हूं. हम दोनों एकदूसरे की पढ़ाई में भी मदद करते हैं और कैरियर के प्रति भी हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं.’’

‘‘लेकिन बेटा, कल को अगर रोहन ने तुम्हें छोड़ दिया तो…तुम्हारी मानसिक स्थिति…’’ मैं अपनी बेटी के भविष्य को ले कर कोई सवाल नहीं छोड़ना चाहती थी.

‘‘मां, हम दोनों पतिपत्नी नहीं हैं, इसलिए ‘छोड़ने’ जैसा तो सवाल ही नहीं उठता. और अगर कभी हमारे बीच में कोई प्रौब्लम होगी तो हम एकदूसरे के साथ नहीं रहेंगे और उस के लिए हम दोनों मानसिक रूप से तैयार हैं,’’ स्वाति पूरे आत्मविश्वास से बोल रही थी.

‘‘और यदि तुम दोनों के बीच बने दैहिक संबंधों के कारण…’’ मैं ने हिचकते हुए सब से मुख्य सवाल भी पूछ ही लिया.

‘‘यह महानगर है, मां, तुम चिंता मत करो. मैं ने इस के लिए भी डाक्टर और काउंसलर दोनों से बात कर ली है.’’

‘‘अच्छा, तभी इतनी समझदारी की बात कर रही हो. ठीक है मैं भी जल्दी ही आती हूं तुम्हारे रोहन से मिलने.’’

‘‘सब से बड़ी समझदारी तो आप के संस्कारों और मेरे प्रति आप के विश्वास ने दी है मगर एक बात आप लोग भी याद रखिएगा, मां…कि आप उस से सिर्फ मेरा दोस्त समझ कर मिलिएगा, मेरा पति समझ कर नहीं.’’

स्वाति से बात कर मैं सोफे पर बैठ गई. स्वाति की बातें सुन यह महसूस हो रहा था कि बचपन से ही बच्चों की जड़ों में सुसंस्कारों और मर्यादित आचरण

का खादपानी देना हम मातापिता की जिम्मेदारी है. इन्हीं आदर्शों को स्वयं में संचित कर ये बच्चे जब अपनी सोचसमझ से कोई निर्णय या अपनी इच्छा के अनुरूप चलना चाहते हैं, तब मातापिता का उन्हें अपना सहयोग देना समझदारी है.

स्वाति के चेहरे पर अब निश्चिंतता के भाव थे.

Hindi kahani : विश्वनाथ जी की 3 बेटियां

Hindi kahani :  देर शाम अनुष्का का फोन आया. कामधाम से खाली होती तो अपने पिता विश्वनाथ को फोन कर अपना दुखसुख अवश्य साझा करती. शादी के 3 साल हो गए, यह क्रम आज भी बना हुआ था. पिता को बेटियेां से ज्यादा लगाव होता है, जबकि मां को बेटों से. इस नाते अनुष्का निसंकोच अपनी बात कह कर जी हलका कर लेती.

‘‘पापा, आज फिर ये जोरजोर से चिल्लाने लगे,’’ अनुष्का ने अपने पति कृष्णा का जिक्र किया.

‘‘क्यों?’’ विश्वनाथ निर्विकार भाव से बोले.

‘‘इसी का जवाब मैं खोज रही हूं.’’ कह कर वह भावुक हो गई.

विश्वनाथ का जी पसीज गया. विश्वनाथ उन पिताओं जैसे नहीं थे जो बेटी का विवाह कर के गंगा नहा लेते थे. वे उन पिताओं सरीखे थे जिन्हें अपनी बेटी का दुख भारी लगता. तनिक सोच कर बोले, “उन की बातों को ज्यादा तवज्जुह मत दिया करो. अपने काम से काम रखो.’’

जब भी अनुष्का का फोन आता वे उसे धैर्य और बरदाश्त करने की सलाह देते. विश्वनाथ की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपनी तरफ से कभी बेटियों को निराश नहीं किया. उन की बात पूरी लगन से सुनते. वे चाहते तो कह सकते थे कि यह तुम दोनों का आपसी मामला है. बारबार फोन कर के मुझे परेशान मत किया करो. ज्यादातर पिताओं की यही भूमिका होती है. बेटियों की शादी कर दिया तो अपने बेटाबहू में रम गए.

विश्वनाथ की 3 बेटियां थीं और एक बेटा. उन्होंने बेटाबेटियों में कोई फर्क नहीं किया. अमूमन लोग बेटियों को बोझ समझते हैं. इस के विपरीत विश्वनाथ को लगता, उन की बेटियां ही उन की ताकत हैं. उन की पत्नी कौशल्या की सोच उन से इतर थी. उन्हें अपना बेटा ही हीरा लगता. वे बेटियों को जबतब कोसती रहतीं. विश्वनाथ को बुरा लगता. इसी बात पर तूतूमैंमैं शुरू हो जाती.

विश्वनाथ का जीवन अभावपूर्ण था. बड़े संघर्षो से गुजर कर उन्होंने अपनी औलादों को पढ़ालिखा कर इस लायक बनाया कि वे अपने पैरों पर खडे हो गए. बड़ी बेटी की शादी से वे खुश नहीं थे क्योंकि दामाद का कामधाम कोई खास नहीं था. वे अच्छी तरह जानते थे कि उन की कामाऊ बेटी की बदौलत ही गृहस्थी की गाड़ी चलेगी. उन की मजबूरी थी. कहां से अच्छे वर के लिए दहेज ले आते? बेटी की शक्लसूरत कोई खास नहीं थी. हां, पढ़ने में तेज जरूर थी. पहली से निबटे तो दूसरी अनुष्का आ गई. सब बेटियों में 2 से 3 साल का फर्क था. अनुष्का देखनेसुनने के साथ पढ़ने में भी होशियार थी. उस ने साफसाफ कह दिया कि वह किसी भी सूरत में प्राइवेट नौकरी वाले लडके से शादी नहीं करेगी. सब चिंता में पड गए. कहां से लड़का ढूंढें.

ऐसे में उन के बड़े दामाद ने कृष्णा का जिक्र किया. वह सरकारी नौकरी में था. देखने में ठीकठाक था. रही पढ़ाई, तो वह अनुष्का की तुलना में औसत दर्जे का था तो भी क्या? सरकारी नौकरी थी. जिस आर्थिक अनिश्चितता के दौर से विश्वनाथ का परिवार गुजरा, उस से तो मुक्ति मिलेगी. यही सब सोच कर विश्वनाथ इस रिश्ते के लिए अपने दामाद की मनुहार करने लगे. साथसाथ, उन्होंने अपनी तीसरी बेटी के लिए भी सरकारी नौकरी वाले वर से करने का मन बना लिया.

लड़के को अनुष्का पसंद आ गई. दहेज पर मामला रुका, तो विश्वनाथ ने साफसाफ कह दिया कि उन की औकात ज्यादाकुछ देने की नहीं है. सांवले रंग के कृष्णा को जब गोरीचिट्टी अनुष्का मिली तो वह न न कर सका. इस के पहले उस ने काफी लड़कियां देखीं. किसी की पढ़ाई पसंद आती तो रूपरंग मनमाफिक न मिलता. रूपरंग होता तो पढ़ाई साधारण रहती. यहां सब था. नहीं था तो दहेज की रकम. कृष्णा को लगा अब अगर और छानबीन में लगा रहेगा तो उम्र निकल जाएगी, ढंग की लड़की न मिलेगी. लिहाजा, उसे भी गरज थी. शादी संपन्न हो गई.

अनुष्का फूले नहीं समा रही थी. उस ने जो चाहा वह मिल गया. बिना आर्थिक किचकिच के जिंदगी आसानी से कटेगी. शादी होते ही वह जयपुर घूमने निकल गई. बड़ी बहन लतिका को तकलीफ हुई. वह सोचने लगी, आज उस का भी पति ऐसी ही नौकरी में होता तो वह भी वैवाहिक जीवन की इस प्रथम पायदान पर चढ़ कर जिदगी का लुफ्त उठाती.

दोनों के विवाह का शुरुआती दौर बिना किसी शिकवाशिकायत के कटा. अनुष्का इस रिश्ते से निहाल थी. वहीं कृष्णा को लगा, उस ने जैसा चाहा उसे मिल गया. इस बीच, वह एक बेटे की मां बनी.

कृष्णा में एक खामी थी. उसे रुपए से बहुत मोह था. घरगृहस्थी के लिए खर्च करने में कोई कोताही नहीं बरतता तो भी बिना मेहनत के धन ही मिल जाए तो हर्ज ही क्या है. इसी लालच में उस ने अपना काफी रुपया शेयर में लगा दिया. अनुष्का ने एकाध बार टोका. मगर कृष्णा ने नजरअंदाज कर दिया.

एक दिन तो हद हो गई, कहने लगा, ‘‘मेरा रुपया है, जहां भी खर्च करूं.’’

कृष्णा को ऐसे तेवर में देख कर अनुष्का सहम गई. एकाएक उस के व्यवहार में आए परिवर्तन ने उसे असहज कर दिया. उस का मन खिन्न हो गया. मारे खुन्नस कृष्णा से बोली नहीं. कृष्णा की आदत थी, जल्द ही सामान्य हो जाता. वहीं अनुष्का के लिए आसान न था. चूंकि यह पहला अवसर था, इसलिए अनुष्का ने भी अपनी तरफ से भूलना मुनासिब समझा. मगर कब तक. जल्द ही उसे लगा कि कृष्णा अपने मन के हैं, उन्हें समझाना आसान नहीं. इस बीच, शेयर के भाव बुरी तरह से नीचे आ गए और उस के लाखों रुपए डूब गए. सो, अनुष्का को कहने का मौका मिल गया.

कृष्णा बुरी तरह टूट गया. परिणामस्वरूप, उस के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया. हालांकि, उस की तनख्वाह कम न थी. तो भी, 10 साल की कमाई पानी में बह जाए, तो क्या उसे भूल पाना आसान होगा? वह भी ऐसे आदमी के लिए जो बिना मेहनत अमीर बनने की ख्वाहिश रखता हो. कृष्णा अनमने सा रहने लगा. उस का किसी काम में मन न लगता. कब क्या बोल दे, कुछ कहा न जा सकता था. कभीकभी तो बिना बात के चिल्लाने लगता. आहिस्ताआहिस्ता यह उस की आदत में शामिल होता गया.

अनुष्का पहले तो लिहाज करती रही, बाद में वह भी पलट कर जवाब देने लगी. बस, यहीं से आपसी टकराव बढ़ने लगे. अनुष्का का यह हाल हो गया कि अपनी जरूरतों के लिए कृष्णा से रुपए मांगने में भी भय लगता. इसलिए अनुष्का ने अपनी जरूरतों के लिए एक स्कूल में नौकरी कर ली. स्कूल से पढ़ा कर आती, तो बच्चों को टयूशन पढ़ाती. इस तरह उस के पास खासा रुपया आने लगा. अब वह आत्मनिर्भर थी.

अनुष्का जब से नौकरी करने लगी तो घर के संभालने की जिम्मेदारी कृष्णा के ऊपर भी आ गई. अनुष्का को कमाऊ पत्नी के रूप में देख कर कृष्णा अंदर ही अंदर खुश था, मगर जाहिर होने न देता. अनुष्का जहां सुबह जाती, वहीं कृष्णा 10 बजे के आसपास. इस बीच उसे इतना समय मिल जाता था कि चाहे तो अस्तव्यस्त घर को ठीक कर सकता था मगर करता नहीं. वजह वही कि वह मर्द है. एक दिन अनुष्का से रहा न गया, गुस्से में कृष्णा का उपन्यास उसी के ऊपर फेंक दिया.

‘‘यह क्या बदतमीजी है?’’ कृष्णा की त्योरियां चढ गईं.

“घर को सलीके से रखने का ठेका क्या मैं ने ही ले रखा है. आप की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती,’’ अनुष्का ने तेवर कड़े किए.

‘‘8 घंटे डयूटी दूं कि घर संभालूं,’’ कृष्णा का स्वर तल्ख था.

‘‘नौकरी तो मैं भी करती हूं. क्या आप अपना काम भी नहीं कर सकते? बड़े जीजाजी को देखिए. कितना सहयोग दीदी का करते हैं.’’

‘‘उन के पास काम ही क्या है. बेकार आदमी, घर नहीं संभालेगा तो क्या करेगा?’’

‘‘आप से तो अच्छे ही हैं. कम से कम अपने परिवार के प्रति समर्पित हैं.’’

‘‘मैं कौन सा कोठे पर जाता हूं?’’ कृष्णा चिढ़ गया.

‘‘औफिस से आते ही टीवी खोल कर बैठ जाते है. न बच्चे को पढ़ाना, न ही घर की दूसरे जरूरतों को पूरा करना. मैं स्कूल भी जाऊं, टयूशनें भी करूं, खाना भी बनाऊं,’’ अनुष्का रोंआासी हो गई.

‘मत करो नौकरी, क्या जरूरत है नौकरी करने की,’’ कृष्णा ने कह तो दिया पर अंदर ही अंदर डरा भी था कि कहीं नौकरी छोड़ दी तो आमदनी का एक जरिया बंद हो जाएगा.

‘‘जब से शेयर में रुपया डूबा है, आप रुपए के मामले में कुछ ज्यादा ही कंजूस हो गए हैं. अपनी जरूरतों के लिए मांगती हूं तो तुरंत आप का मुंह बन जाता है. ऐसे में मैं नौकरी न करूं तो क्या करूं,’’ अनुष्का ने सफाई दी.

‘‘तो मुझ से शिकायत मत करो कि मैं घर की चादर ठीक करता फिरूं.’’

कृष्णा के कथन पर अनुष्का को न रोते बन रहा था न हंसते. कैसे निष्ठुर पति से शादी हो गई. उसे अपनी पत्नी से जरा भी सहानुभूति नहीं, सोच कर उस का दिल भर आया.

कृष्णा की मां अकसर बीमार रहती थी. अवस्था भी लगभग 75 वर्ष से ऊपर हो चली थी. अब न वह ठीक से चल पाती, न अपनी जरूरतों के लिए पहल कर पाती. उस का ज्यादा समय बिस्तर पर ही गुजरता. कृष्णा को मां से कुछ ज्यादा लगाव था. उसे अपने पास ले आया.

अनुष्का को यह नागवार लगा. उन के 3 और बेटे थे. तीनों अच्छी नौकरी में थे. अपनीअपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो आराम की जिंदगी गुजार रहे थे. अनुष्का चाहती थी कि वह उन्हीं के पास रहे. वह घर देखे कि बच्चे या नौकरी. वहीं उन के तीनों बेटों के बहुओं के पास अतिरिक्त कोई जिम्मेदारी न थी. वे दिनभर या तो टीवी देखतीं या फिर रिश्तेदारी का लुफ्त उठातीं.

अनुष्का ने कुछ दिन अपनी सास की परेशानियों को झेला, मगर यह लंबे समय तक संभव न था. एक दिन वह मुखर हो गई, “आप माताजी को उन के अन्य बेटों के पास छोड क्यों नहीं देते?’’

‘‘वे वहां नहीं रहेंगी?’’ कृष्णा ने दो टूक कहा.

‘‘क्यों नहीं रहेंगी? क्या उन का फर्ज नहीं बनता?’’अुनष्का का स्वर तल्ख था.

‘‘मैं तुम्हारी बकवास नहीं सुनना चाहता. तुम्हें उन की सेवा करनी हो तो करो वरना मैं सक्षम हूं’’

‘‘खाक सक्षम हैं. कल आप नहीं थे, बिस्तर गंदा कर दिया. मुझे ही साफ करना पडा.’’

“कौन सा गुनाह कर दिया. वे तुम्हारी सास हैं.’’

‘‘यह रोजरोज का किस्सा है. आप उन की देखभाल के लिए एक आया क्यों नहीं रख लेते?’’ आया के नाम पर कृष्णा कन्नी काट लेता. एक तरफ खुद जिम्मेदारी लेने की बात करता, दूसरी तरफ सब अनुष्का पर छोड़ कर निश्चिंत रहता. जाहिर है, वह आया पर रुपए खर्च करने के पक्ष में नहीं था. शेयर में लाखों रुपए डूबाना उसे मंजूर था मगर मां के लिए आया रखने में उसे तकलीफ होती.

कंजूसी की भी हद होती है. रात अनुष्का, पिता विश्वनाथ को फोन कर के सुबकने लगी, “पापा, आप ने कैसे आदमी से मेरी शादी कर दी. एकदम जड़बुद्वि के हैं. मेरी सुनते ही नहीं.’’ फिर एक के बाद उस ने सारा किस्सा बयां कर दिया. सब सुन कर विश्वनाथ को भी तीव्र क्रोध आया. मगर चुप रहे यह सोच कर कि बेटी दिया है.

‘‘तुम से जितना बन पड़ता है, करो,’’ पिता विश्वनाथ का स्वर तिक्त था.

‘‘सास को यहां लाने की क्या जरूरत थी? 3 बेटे अच्छी नौकरियों में हैं. सब अपनेअपने बेटेबेटियों की शादी कर के मुक्त हैं. क्या अपनी मां को नहीं रख सकते थे? यहां कितनी दिक्कत हो रही है. किराए का मकान. वह भी जरूरत के हिसाब से लिए गए कमरे. जबकि उन तीनों बेटों के निजी मकान हैं. आराम से रह सकती थीं वहां.’’

‘‘अब मैं उन की बुद्वि के लिए क्या कहूं’’ विश्वनाथ ने उसांस ली.

गरमी की छुट्टियां हुईं. अनुष्का अपने बेटे को ले कर मायके आई. कृष्णा उसे मायके पहुंचा कर अपने भाईयों से मिलने चला गया. ससुराल में रुकने को वह अपनी तौहीन समझता. भाईयों का यह हाल था कि वे सिर्फ कहने के भाई थे, कभी दुख में झांकने तक नहीं आते. इतनी ही संवेदनशीलता होती तो जरूर अपनी मां की खोजखबर लेते. वे सब इसी में खुश थे कि अच्छा हुआ, कृष्णा ने मां को अपने पास रख लिया. अब आराम से अपनीअपनी बीवियों के साथ सैरसपाटे कर सकेंगे.

दो दिनों बाद कृष्णा अनुष्का को छोड़ कर इंदौर अपनी नौकरी पर चला गया. मां को दूसरे के भरोसे छोड़ कर आया था, इसलिए उस का वापस जाना जरूरी था. बातचीत का दौर चलता, तो जब भी समय मिलता अनुष्का अपना दुखड़ा ले कर विश्वनाथ के पास बैठ जाती.

एक दिन विश्वनाथ से रहा न गया, बोले, ‘‘तुम यहीं रह जाओ. कोई जरूरत नहीं है उस के पास जाने की.”

अनुष्का ने कोई जवाब नहीं दिया. बगल में खड़ी अनुष्का की मां कौशल्या से रहा न गया, “आप भी बिनासोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं.’’ अनुष्का की चुप्पी बता रही थी कि यह न तो संभव था न ही व्यावहारिक. भावावेश में आ कर भले ही पिता विश्वनाथ ने कह दिया हो मगर वे भी अच्छी तरह जानते थे कि बेटी को मायके में रहना आसान नहीं है. फिर पतिपत्नी के रिश्ते का क्या होगा? अगर ऐसा हुआ तो दोनों के बीच दूरियां बढ़ेंगी जिसे बाद में पाट पाना आसान न होगा.

अनुष्का की आंखें भर आईं. उसे लग रहा था वह ऐसे दलदल में फंस गई है जहां से निकल पाना आसान न होगा. आज उसे लग रहा था कि रुपयापैसा ही महत्त्वपूर्ण नहीं, बल्कि आदमी का व्यावहारिक व सुलझा हुआ होना भी जरूरी है. पिता विश्वनाथ को आदर्श मानने वाली अनुष्का को लगा, पापा का सुलझापन ही था जो तमाम आर्थिक परेशानियों के बाद भी उन्होंने हम सब भाईबहनेां को पढ़ालिखा कर इस लायक बनाया कि समाज में सम्मान के साथ जी सकें. वहीं, कृष्णा के पास रुपयों के आगमन की कोई कमी नहीं तिस पर उन की सोच हकीकत से कोसों दूर है.

पिता विश्वनाथ की जिंदगी आसान न थी. सीमित आमदनी, उस पर 3 बेटियों ओैर एक बेटे की परवरिश. वे अपने परिवार को ले कर हमेशा चिंतित रहते. मगर जाहिर होने न देते. उन के लिए औलाद ही सबकुछ थे. पत्नी कौशल्या जब तब अपनी बेटियों को डांटतीफटकारती रहती जिस को ले कर पतिपत्नी में अकसर विवाद होता. बेटियों का कभी भी उन्होंने तिरस्कार नहीं किया. उन का लाड़प्यार उन पर हमेशा बरसता रहता. इसलिए बेटियां उन के ज्यादा करीब थीं. यही वजह थी कि बेटियां आज भी अपने पिता को अपना आदर्श मानतीं. जब बेटा हुआ तो मां कौशल्या का सारा प्यार उसी पर उमड़ने लगा. यह अलग बात थी कि जब उन की तीनों बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हो गईं तो उन की नजर उन के प्रति सीधी हो गई.

एक महीना रहने के बाद अनुष्का कृष्णा के पास वापस इंदौर जाने की तैयारी करने लगी तो अचानक एक शाम विश्वनाथ को क्या सूझा, कहने लगे, ‘‘क्या तुम्हारी मां मुझ से खुश थीं?” सुन कर क्षणांश वह किंकर्तव्यविमूढ हो गई. अनुष्का मां की तरफ देखी. उन की आंखें सजल थीं. मानो अतीत का सारा दृश्य उन के सामने तैर गया हो. वे आगे बोले, ‘‘जब वह मुझ से खुश नहीं थी तो तुम कैसे अपने पति से अपेक्षा कर सकती हो वह हमेशा तुम्हें खुश रखेगा?’’

पिता की बेबाक टिप्पणी पर अनुष्का को कुछ कहते नहीं बन पड़ा. वह तो अपने पिता को आदर्श मानती थी. वह तो यही मान कर चलती थी कि उस के पिता समान कोई हो ही नहीं सकता. बेशक पिता के रूप में वे सफल थे मगर क्या पति के रूप में भी वे उतने ही सफल थे? क्या उन्होंने हमेशा वही किया जो कौशल्या को पसंद था? शायद नहीं. वे आगे बोलते रहे, ‘‘यह लगभग सभी के साथ होता है. पत्नी अपने पति से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करती है. पर खुशी का पैमाना क्या है? क्या कृष्णा शराबी या जुआरी है? कामधाम नहीं करता या मारतापीटता है? सिर्फ विचारों और आदतों की भिन्नता के कारण हम किसी को नापंसद नहीं कर सकते? जब एक गर्भ से पैदा भाईयों में मतभेद हो सकते हैं तो पतिपत्नी में क्यों नहीं.’’

अनुष्का को अपने पिता से यह उम्मीद न थी. उन के व्यवहार में आए परिवर्तन ने उसे असहज बना दिया. अभी तक उसे यही लग रहा था कि कृष्णा जो कुछ कर रहा है वह एक तरह से उस पर मनोवैज्ञानिक अत्याचार था. उन के कथन ने एक तरह से उसे भी कुसूरवार बना दिया. आहत मन से बोली, “पापा, जब ऐसी बात थी तो फिर आप ने मुझे क्यों मायके में ही रहने की सलाह दी?’’

वे किंचिंत भावुक स्वर में बोले, ‘‘एक पिता के नाते तुम्हारा दुख मेरा था. पुत्रीमोह के चलते मैं ने तुम्हें यहां रहने की सलाह दी. मगर यह व्यावहारिक न था. काफी सोचविचार कर मुझे लगा कि शायद मैं तुम्हें गलत रास्ते पर चलने की नसीहत दे रहा हूं. बड़ेबुजर्ग का कर्तव्य है कि पतिपत्नी के बीच की गलतफहमियां अपने अनुभव से दूर करें, न कि आवेश में आ कर दूरियां बढ़ा दें, जो बाद में आत्मघाती सिद्व हो.’’

अनुष्का पर पिता विश्वनाथ की बातों का असर पड़ा. उस ने मन बना लिया कि अब से वह कृष्णा को भी समझने का कोशिश करेगी.

Mayawati की चुप्‍पी : धार्मिक कुरीतियों पर बोलने की आजादी पर BAN

Mayawati की चुप्‍पी :  जो मुद्दे कभी दलित आंदोलन का केंद्र बिंदु थे आज उन के बोलने पर ही पाबंदी है, जो बोलता है वो जेल जाता है जिस का पक्ष लेने वाला कोई नेता रहा नहीं.

24 दिसंबर को बहुजन समाज पार्टी ने संविधान बचाओ के नाम पर धरना प्रदर्शन किया था. बसपा संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के भीमराव आंबेडकर पर दिए बयान को ले कर आक्रोश में थी. बसपा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन किया था. लखनऊ में बसपा कार्यकर्ताओं ने हजरतगंज चौराहे पर भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर प्रदर्शन किया था. इस के लिए गांवगांव से बसपा के कार्यकर्ता प्रदर्शन करने पहुंचे थे. लंबे समय के बाद बसपा ने सड़क पर उतर कर इस तरह का प्रदर्शन किया था.

बसपा की मांग थी कि गृहमंत्री अमित शाह अपने बयान से माफी मांगे. गृहमंत्री ने अपने बयान से बहुजन समाज के भगवान का अपमान किया है. इस के पहले मायावती भी कह चुकी थीं कि ‘गृहमंत्री बहुजन समाज से माफी मांग लें.’ इस के बाद भी जब माफी नहीं मांगी तो बसपा ने इस प्रदर्शन का आयोजन किया था. बसपा के कार्यकर्ता झंडे ले कर प्रदर्शन करने आ रहे थे. इन में से एक थे ओमप्रकाश गौतम जो लखनऊ जिले के निगोहां थाना क्षेत्र के मीरखनगर गांव के रहने वाले थे.

ओमप्रकाश गौतम का वायरल वीडियो

ओमप्रकाश गौतम की बातचीत को ले कर एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिस में वह कहते हैं, “देवी दुर्गा काली सरस्वती ने हमारे लिए कुछ नहीं किया. यह विदेश से आई आर्य थीं. (अपनी बात कहतेकहते ओमप्रकाश ने आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया) यह मैं ने बहुजन समाज और बुद्धजी की किताबों में पढ़ा है जो लोग नहीं जानते वह पूजापाठ करें.”

वे आगे कहते हैं, “हम पत्थर की देवी की पूजा नहीं करेंगे. उन को मिट्टी से हम ही ने बनाया है. उस की पूजा करने लगे. न वो हम को कुछ दे सकती हैं न बोल सकती हैं न हम से कुछ ले सकती हैं. बाबा साहब ने हमें मानसम्मान स्वाभिमान दिया. हमारा खून नीला हो गया है. अमित शाह ने बाबा साहब का अपमान किया है.”
इस वीडियो के वायरल होने के बाद हर तरफ से प्रतिक्रिया आने लगी. निगोंहा क्षेत्र के ही रहने वाले समाजसेवी भंवरेश्वर चौरसिया, भाजपा मंडल अध्यक्ष आशुतोष शुक्ला, कार्यकर्ता शिवनारायण वाजपेई और करणी सेना के दीपू सिंह ने थाने में ओमप्रकाश गौतम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.

पुलिस ने वैमनस्यता फैलाने के आरोप में ओमप्रकाश गौतम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. पुलिस के सामने ओमप्रकाश गौतम ने कहा कि “हम से बहुत बड़ी गलती हो गई, हमारे देवीदेवता भगवान हैं, हमारे पूजनीय हैं, अब जीवन में कभी ऐसी गलती नहीं होगी.”

विचारधारा से भटकी बसपा

ओमप्रकाश गौतम ने जो कहा वह 90 के दशक में बहुजन समाज पार्टी भी कहती रहती थी. बहुजन समाज का आंदोलन इसी विचारधारा को ले कर शुरू था. उस समय बामसेफ के कार्यकर्ता गांवगांव नुक्कड़ नाटक के जरिए यह समझाते थे कि किस तरह से सवर्ण उन पर अत्याचार करते थे. यह नुक्कड़ नाटक गांवगांव होते थे. कई बार इन को ले कर दलितसवर्ण विवाद भी होते थे. बहुजन समाज के नाम से तमाम ऐसी किताबें भी थीं जिन में हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों की आलोचना होती थीं.

90 के दशक में जब वीडियो सीडी का चलन आया था तब कुरीतियों के खिलाफ एक सीडी बहुत चर्चा में थी उस का नाम था ‘तीसरी पीढी’. इस में भी दलित उत्थान की बातें कही गई थीं जो पहले नुक्कड़ नाटकों में कही जाती थीं. इस को बनाने वाले भी बामसेफ और दूसरे दलित संगठनों के कुछ लोग थे.

जिस समय यह सीडी आई उस दौर में मायावती भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से दूसरी बार 1997 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी थीं. ऐसे में मायावती ने इस सीडी पर बैन लगा कर इस के बनाने और दिखाने वालों के खिलाफ मुकदमा कायम करा दिया था.

बसपा के विचारों में बदलाव

बसपा के विचारों में बदलाव 1995 में ही शुरू हो गया था. उस समय पहली बार भाजपा के सहयोग से मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं. ‘मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ और ‘ठाकुर बामन, बनिया छोड़ बाकी सब है डीएस फोर’ और ‘ठाकुर बामन बनिया चोर, इन को मारो जूते चार’ वाले नारे बसपा ने लगाने बंद कर दिए थे.

बसपा ने यह भी कहा कि यह नारे कभी भी उस ने नहीं दिए. जब मायावती मुख्यमंत्री थीं तब उन्होंने लखनऊ में दलित महापुरूषों की मूर्तियां लगानी शुरू की. आंबेडकर, कांशीराम, रमाबाई और गौतम बुद्ध के नाम पर पार्क बनाए. उन की योजना रामास्वामी पेरियार की मूर्ति लगाने की भी थी.

रामास्वामी पेरियार हिंदू धर्म के आलोचक थे. ऐसे में भाजपा को दिक्कत थी. भाजपा ने पेरियार की मूर्ति लगाने का विरोध किया तो मायावती ने अपना फैसला वापस ले लिया. 2003 में मायावती के भाषण की सीडी चर्चा में आई थी जिस में उन्होंने भी देवीदेवताओं की आलोचना की थी. उस समय विपक्षी रही समाजवादी पार्टी ने इस को मुद्दा भी बनाया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने धीरेधीरे समझौते करने शुरू किए. धर्म और कुरीतियों की आलोचना करना लगभग बंद ही कर दिया.

बहुजन समाज पार्टी का ब्राह्मणों के साथ चुनावी गठबंधन करने के बाद मायावती इस को सर्वजन समाज पार्टी कहने लगी थी. लखनऊ में अपनी कोठी के मुख्यद्वार पर गणेश की मूर्ति स्थापित करवाई और बसपा के चुनावचिन्ह हाथी का एक नया रूप सामने आया. जो हाथी कांशीराम के जमाने में मनुवादियों को कुचलने चला था, बसपा का नया नारा बना ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश है.’

इस के बाद भी मायावती हिंदुत्ववादियों के हाथों धर्म परिवर्तन करने वालों के उत्पीड़न से बहुत परेशान रहती थी. उन्होंने धमकी दी थी कि अगर भाजपा ने दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों के प्रति अपनी सोच नहीं बदली तो वे लाखों समर्थकों के साथ बौद्धधर्म अपना लेगी. मायावती 14 अक्तूबर 2006 को नागपुर में दीक्षा भूमि गईं जहां उन्हें पहले किए गए वादे के मुताबिक बौद्ध धर्म अपनाना था. यह वादा कांशीराम ने किया था कि बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन की स्वर्ण जयंती के मौके पर वह खुद और उन की उत्तराधिकारी मायावती बौद्ध बन जाएंगे.

मायावती ने वहां बौद्ध धर्मगुरूओं से आशीर्वाद तो लिया लेकिन सभा में कहा, ‘मैं बौद्धधर्म तब अपनाऊंगी जब आप लोग मुझे प्रधानमंत्री बना देंगे.’ राजनीतिक रूप से मायावती तब से सकंट वाले दौर से गुजर रही हैं. अब लोगों को उन से सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं. बसपा के पास केवल 9 प्रतिशत वोट ही बचा है. मायावती के उत्तराधिकारी के रूप में उन के भतीजे आकाश आनंद भी कोई चमत्कार नहीं दिखा पा रहे हैं.

ऐसे में पार्टी के वे कार्यकर्ता जो पूरी तरह से बसपा से जुड़े हैं उस की पुरानी नीतियों पर चल रहे हैं. वे परेशान हैं. जैसे ओमप्रकाश गौतम हिंदूधर्म के खिलाफ बोलने को ले कर जेल चले गए.

चन्द्रशेखर नहीं हो सकते मायावती का विकल्प

2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने दलित ब्राह्मण गठजोड़ बनाया जिस के बाद उन को जीत मिली. वह चौथी बार बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुईं. यहां एक नया नारा आया ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’. यहां से मायावती और उन की दलित राजनीति का ढलान शुरू हो गया. इस का परिणाम यह हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी जीत नसीब नहीं हुई.

चन्द्रशेखर की आजाद समाज पार्टी से चन्द्रशेखर खुद सांसद का चुनाव जीत गए. इस के बाद राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई कि चन्द्रशेखर दलित राजनीति का नया चेहरा हैं. वे मायावती के विकल्प के रूप आगे आ सकते हैं. असल में चन्द्रशेखर की राजनीति मायावती से अलग है. मायावती को दलित राजनीति और मुद्दों की समझ है. चन्द्रशेखर ने केवल खुद को स्थापित करने में समय दिया है. मायावती ने दलित वर्ग के लिए तमाम काम किए हैं. ऐसे में उन की समझ बहुत अलग है.

चुनावी जीतहार से अलग वे दलित वर्ग की जरूरत को समझती हैं. चन्द्रशेखर खुद भी इस बात को जानते हैं. इस कारण वे कभी मायावती की आलोचना नहीं करते हैं. जो भी मायावती की आलोचना करता है उस को वह करारा जवाब भी देते हैं.

राजनीति में जीतहार के मुद्दे से अलग धर्म की कुरीतियों और दलित मुद्दों पर आवाज उठाने वालों को बोलने की आजादी नहीं है. लोकतंत्र में हर किसी को अपनी विचारधारा बोलने की आजादी होती है. आज के दौर में वह आजादी छिन चुकी है. जैसे ही कोई बोलता है उस की आवाज को बंद कर दिया जाता है. उसे जेल जाना पड़ता है. पहले इन मुद्दों पर आवाज उठती थी. दलित आंदोलन का पूरा इतिहास इस से जुड़ा हुआ है.

ओमप्रकाश गौतम ने जो तर्क दे कर कहा उसे गलती नहीं कहा जा सकता है. गलती है तो उस के गाली वाले शब्दों से. उस ने जो कहा वह गुस्से में कहा क्योंकि भाजपा नेता अमित शाह ने भीमराव आंबेडकर को ले कर जो कहा वह ठीक नहीं था. इस की प्रतिक्रिया में ओमप्रकाश गौतम गुस्से में बोल गए जिस पर मुकदमा हो गया. उन को जेल जाना पड़ा.

इन मुद्दों पर राजनीति करने वाले खामोश हैं. बसपा से समाजवादी पार्टी में आए मोहनलालगंज के सांसद आरके चौधरी कुछ बोल नहीं रहे. रामचरितमानस की आलोचना करने वाले स्वामीप्रसाद मौर्य भी चुप हैं. ऐसे में दलित विचारों को ले कर चलने वाले समझ नहीं पा रहे कि वे किधर जाएं?

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