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बीमा पॉलिसी के प्रीमियम लैप्स से बचिए

अक्सर देखा गया है कि जीवन बीमा का प्रीमियम भरने के लिए लोग एजेंट का सहारा लेते हैं. एक एजेंट के पास कई लोगों के प्रीमियम भुगतान की डिटेल होती है. मान लीजिए कि किसी कारणवश आपका एजेंट प्रीमियम भुगतान की तारीख भूल जाता है तो आप की सारी मेहनत पर एक बार में ही पानी फिर सकता है.

बीमा कंपनिया देती हैं विकल्प

जीवन बीमा के प्रीमियम का भुगतान साल में केवल एक बार ही करना होता है. वार्षिक भुगतान में एक बात का डर हमेशा बना रहता है कि कहीं पॉलिसी लैप्स ना हो जाए. इस समस्या से पार पाने के लिए लाइफ इंश्योरेंश कंपनी अपने ग्राहकों को प्रीमियम का समय पर भुगतान करने के लिए कई विकल्प देती है.

इन विकल्पों में से कोई भी एक विकल्प अपनाकर आप अपनी पॉलिसी का भुगतान समय पर कर सकते हैं.

ऑनलाइन भुगतान

लाइफ इंश्योरेंस के प्रीमियम का भुगतान ऑनलाइन भी किया जा सकता है. इसके लिए आपको बीमा कंपनी की वेबसाइट में लॉगिन करना होगा. वेबसाइट में लॉगिन करने के बाद आप अपने प्रीमियम की डिटेल देख सकते हैं साथ ही अगले प्रीमियम भुगतान की तारीख के बारे में भी जान सकते हैं. इसी में आपको पेमेंट का विकल्प मिलेगा जहां से आप अपने प्रीमियम का भुगतान नेट बैंकिंग, क्रेडिट या फिर डेबिट कार्ड के जरिए कर सकते हैं.

ऑटो डेबिट के जरिए भुगतान

इस सुविधा में आपको दो भुगतान के लिए नेशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस यानि NACH का इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिं सर्विस यानि ECS का विकल्प मिलता है. इसमें रजिस्ट्रेशन के बाद आप बीमा का ऑटो डेबिट के लिए जरूरी निर्देश दे सकते हैं. इस प्रक्रिया में क्रेडिट कार्ड का होना जरूरी है. क्रेडिट कार्ड के जरिए ही ECS NACH रजिस्टर होता है. इस प्रक्रिया में एक बार रजिस्ट्रेशन हो जाने के बाद आपके प्रीमियम का भुगतान अंतिम तारीख से पहले अपने आप हो जाता है.

फोन से भुगतान

बीमा कंपनिया आईवीआर की सुविधा भी देती हैं. आईवीआर यानि इंटरेक्टिव वॉयस रेस्पांस सिस्टम के जरि भी प्रीमियम का भुगतान भी कर सकते हैं. इस भुगतान प्रक्रिया में आपको बीमा कंपनी के दिए गे नंबर पर कॉल करना पड़ता है फिर बताए गए निर्देशों का पालन करते हुए प्रीमियम का भुगतान करना होता है. इस भुगतान विकल्प के लिए क्रेडिट कार्ड होना आवश्यक है.

यह बात भी ध्यान रखें

प्रीमियम का ऑनलाइन भुगतान करने के बाद इस बात का ख्याल रखें कि जो इलेक्ट्रॉनिक रिसीट जेनरेट हो रही है उसे जरूर सेव कर लें ताकि बाद में आपको किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े.

हेमंत बिर्जे की बेटी भी बनी अभिनेत्री

बौलीवुड में स्टार पुत्रों व स्टार पुत्रियों का तेजी से आगमन होता रहता है. मगर कुछ स्टार पुत्र या स्टार पुत्री ऐसी होती हैं, जिन्हें बौलीवुड में आपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती है. ऐसी ही एक स्टार पुत्री हैं – फिल्म ‘‘टार्जन’’ फेम अभिनेता हेमंत बिर्जे की बेटी सोनिया बिर्जे, जो कि खूबसूरत, ग्लैमरस और सैक्सी हैं. वे भी अभिनेत्री बन चुकी हैं, पर उनका संघर्ष अब भी चल रहा है. सोनिया बिर्जे ने एक हिंदी और एक दक्षिण भारत की फिल्म में बतौर हीरोईन अभिनय किया है, मगर दुर्भाग्यवश यह दोंनों ही फिल्में सिनेमा घरों में नहीं पहुंच पायी, परिणामतः सोनिया बिर्जे का फिल्मी करियर उड़ान नहीं भर पाया.

मगर अब वे तमाम सुपर हिट टीवी सीरियलों के लेखक मीर मुनीर लिखित हास्य नाटक ‘‘हलो डार्लिंग’’ में बिंदू दारा सिंह, शीबा, पायल गोगा कपूर और साध रंधावा के संग अभिनय कर रही हैं. इस नाटक का पहला शो सात मई को शाम साढ़े सात बजे मुंबई में बांदरा स्थित ‘‘रंग शारदा ऑडीटोरियम’’ में होगा. इस नाटक में निर्माता व निर्देशक हैं योगेष संघवी. इस नाटक में सोनिया बिर्जे एक ग्लैमरस लड़की के किरदार में हैं.

जब सोनिया बिर्जे से हमारी बात हुई, तो सोनिया बिर्जे ने कहा- ‘‘नाटकों में अभिनय करने से अभिनय में निखार आता है. नाटक में रीटेक की गुंजाइश नहीं होती है. दर्शक नाटक देखते वक्त तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देता है, जिसके आधार पर आप अपने अभिनय में सुधार ला सकते हैं.’’

सोनिया बिर्जे सिर्फ नाटक में ही काम नहीं कर रही हैं. वे बताती हैं- ‘‘मेरी दो फिल्में अभी तक प्रदर्शित नहीं हो पायीं हैं. मगर मैंने एक नई हिंदी फिल्म अनुबंधित की है, जिसकी शूटिंग जून माह में शुरू होने वाली है. मैं तो नारी प्रधान फिल्मों के साथ साथ हर जोनर की फिल्में करना चाहती हूं.’’

प्रतिष्ठा की प्रतीक नहीं शवयात्रा की भीड़

विनोद खन्ना निसंदेह एक खूबसूरत, कामयाब और प्रतिभाशाली अभिनेता थे पर वे बहुत ज्यादा मिलनसार और सामाजिक व्यक्ति नहीं थें. अंतर्मुखी स्वभाव के विनोद खन्ना की शवयात्रा में फिल्म इंडस्ट्री के जूनियर कलाकारों की गैर मौजूदगी चर्चा का विषय रही क्योंकि जब उनकी अंतिम यात्रा निकल रही थी तब कई जूनियर कलाकार अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की पार्टी में शिरकत कर रहे थें. इस बात पर अभिनेता ऋषि कपूर भड़के तो इससे उजागर सिर्फ एक सच हुआ कि नई पीढ़ी चाहे वह फिल्म इंडस्ट्री की हो या आम मध्यम वर्ग की रोने धोने और अनावश्यक औपचारिकताओं को निभाने में यकीन नहीं करती और इस बाबत उसे विवश भी नहीं किया जा सकता.

अपनी भड़ास में ऋषि कपूर ने यह भी जोड़ा कि उन्हें कंधा देने भी लोग (कलाकार) नहीं आएंगे तो यह अकेले उनके नहीं बल्कि देश भर के बुढ़ाते लोगों की व्यथा है जो शवयात्रा की भीड़ को प्रतिष्ठा, धर्म और सामाजिक शक्ति से जोड़ कर देखते हैं. मुमकिन यह भी है कि ऋषि कपूर की एक चिंता फिल्म इंडस्ट्री की एकता की रही हो जिसका बड़ा पैमाना उसकी सुबह तक चलने वाली पार्टियां और ऐसे शोक के मौके भी रहते हैं जो विनोद खन्ना की शवयात्रा में नहीं दिखे तो वे गुस्सा उठे.

ऋषि कपूर की इस व्यथा को दूसरे नजरिए से देखा जाना भी जरूरी है कि उनके पिता शो मैन राजकपूर पार्टियों के बेहद शौकीन थें और उनकी होली पार्टी में फिल्म इंडस्ट्री के छोटे बड़े सभी कलाकार शामिल होने को अपना सौभाग्य समझते थे. यह वह दौर था जब ऋषि कपूर बच्चे थे और अपने घर जमा भीड़ को ही समाज समझते थे हालांकि यह बात गलत भी नहीं पर अब दुनिया और जमाना कितना बदल गया है यह उन्हें विनोद खन्ना की शवयात्रा से समझ आ गया है लेकिन वे इस बदलाव को पचा नहीं पा रहे हैं तो यह जरूर उनकी ही गलती है.

प्रतिष्ठा का पैमाना

दिक्कत तो यह है कि सुनहरे पर्दे पर आम लोगों के किरदार निभाने वाले कलाकारों को भी यह मालूम नहीं रहता कि इन दिनों समाज का सच क्या है वे तो डायरेक्टर के इशारे पर नाचने वाले पैड आर्टिस्ट रहते हैं जो साउंड, म्यूजिक, एक्शन, री-टेक ओके और पैक अप वाली भाषा के आदी हो जाते हैं. शवयात्रा में भीड़ की तादाद हर वर्ग के लोगों के लिए प्रतिष्ठा की बात हर दौर में रही है. जिसकी अंतिम यात्रा में जितनी ज्यादा भीड़ रहती है उसे ज्यादा लोकप्रिय और इज्जतदार मान लिया जाता है.

70 -80 के दशक तक शवयात्राओं में शामिल होना एक सामाजिक अनिवार्यता हुआ करती थी तब शहरीकरण की शुरुआत हुई थी दूसरे लफ्जों में कहें तो आज जितनी कथित संवेदनहीनता नहीं आई थी. शहर छोटे छोटे थे और लोगों के बीच बिना किसी सोशल मीडिया के एक सतत संपर्क और संवाद बना रहता था जिसे याद कर आज भी ऋषि कपूर की उम्र के लोग अतीत के मोह में खो जाते हैं कि वे भी क्या दिन थे जब किसी भी शवयात्रा में पूरा गांव या शहर उमड़ पड़ता था. हालांकि पूरा सच यह है कि शवयात्राओ में भीड़ मृतक की प्रतिष्ठा, जाति, पद,  व्यवसाय और रईसी बगेरह देख कर ही उमड़ती थी और इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि मृतक के वारिसों की भी उपयोगिता भी देखी जाती थी.

बदलाव ये आए हैं कि अब सिर्फ इन वारिसों की उपयोगिता ही देखी जाती है. हालत यह है कि किसी शहर के पार्षद का पिता भी मरता है तो लोग मुंह लटकाए उसकी शवयात्रा में घुस जाते हैं और उसे अपना लटका मुंह दिखाने की ऐसी कोशिश करते हैं जैसे खुद उनका कोई सगे वाला नहीं रहा हो. यहां यह बात कोई मायने नहीं रखती कि मृतक से उनका कोई वास्ता ही कभी नहीं रही था. फिर विधायक, सांसद या किसी दूसरे अहम राजनैतिक पद पर आसीन व्यक्ति का कोई सगे वाला मरता है तो भीड़ भी उसी तादाद में बढ़ती जाती है. सरकारी अधिकारियों के घर हुई मौतों की शवयात्राओं में भी भीड़ उसके पद के हिसाब से उमड़ती है. उलट इसके व्यापारी वर्ग की हालत थोड़ी अलग है जो अपने व्यापारिक सम्बन्धों को निभाने आम तौर पर छोटे बड़े में कम ही भेदभाव करते हैं.

बढ़ते शहर सिमटती भीड़

अब शहर बड़े होते जा रहे हैं ऐसे में भीड़ हर किसी की शवयात्रा में उल्लेखनीय नहीं रहती तो इस पर समाज और संवेदनाओं को कोसना कतई तुक की बात नहीं बल्कि लोगों की मजबूरियां समझने की है कि एक शवयात्रा में शामिल होने का मतलब है एक कार्य दिवस का नुकसान उठाना, दूसरे घरों में पहले से सदस्य भी नहीं हैं जो शवयात्रा में शामिल होकर सामाजिक शिष्टाचार निभा सकें.

मिसाल भोपाल शहर की लें तो 5 किलोमीटर दूर भी मृतक के घर आने जाने वालों को हजार बार सोचना पड़ता है कि जाएं कि नहीं और जाना जरूरी हो तो घर के इंतजाम कैसे करें. किसी के यहां खुद बीमार मां बाप हैं तो किसी के बच्चों को स्कूल से लाने ले जाने वाला कोई नहीं, किसी की कामकाजी पत्नी दफ्तर में होती है तो किसी को अपने ही दफ्तर या कारोबार के जरूरी कामकाज निबटाना होते हैं. दूसरी दिक्कत श्मशान घाटों का दूर दूर होना भी है जहां आजकल लोग सीधे पहुंचना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन जिनके पास अपने वाहन नहीं है वे तो घाटों तक पहुंच ही नहीं पाते और टैक्सी या ऑटो रिक्शा करें तो खर्च तीन चार सौ रुपये से कम नहीं बैठता जाहिर है जिसके पास अपना वाहन नहीं होगा वह यह राशि एक शवयात्रा में शामिल होने खर्च नहीं कर सकता.

बी श्रेणी के शहरों की हालत यह हो चली है कि कई लोगों को तो अपने यहां हुई मौत का दुख मनाने से पहले दस लोगों को जुटाना मुश्किल हो जाता है फिर तो और बड़े शहरों की तो बात ही और है. बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी के एक इंजीनियर अर्पित अपने पिता को साथ ले गया था जहां हार्ट अटेक से उनकी मौत हुई तो वह दुख में कम बेबसी पर ज्यादा रोया था.

अर्पित बताता है, पड़ोस के फ्लैट वाले भी नहीं आए जबकि उन्हें मालूम था, कंपनी के सह कर्मियों को फोन किया तो उन्होने कहा पहुंचने में ही 2 घंटे लग जाएंगे तुम डैड की बॉडी लेकर श्मशान घाट पहुंचो हम वहीं मिलेंगे. भारी भरकम भुगतान पर ही सही शांति वाहन अपार्टमेंट के नीचे आकर खड़ा तो हो गया था पर समस्या शव को नीचे ले जाने की थी. मध्य प्रदेश में रह रहे रिश्तेदार तो पहले ही इतने जल्दी बेंगलुरु पहुंचने में स्वभाविक असमर्थता जता चुके थे.  शव की हालत भी ऐसी नहीं थी कि उसे घर भोपाल ले जाया जा सके जैसे तैसे पत्नी और सिक्योर्टी गार्डों की मदद से वह शव श्मशान घाट तक ले गया और 5 सह कर्मियों की सहायता से पिता का विद्धुत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार किया. बाद में अर्पित को मालूम हुआ कि आजकल हर बड़े शहर में कुछ एजेंसियां अंतिम संस्कार की जिम्मेदारियां लेने लगी हैं पर उसके साथ जो हुआ उसे वह शायद ही कभी भूल पाये.

धार्मिक आडंबर भी जिम्मेदार

शवयात्रा की भीड़ को प्रतिष्ठा या संवेदनाओं से जोड़ कर देखने वाले ऋषि कपूर जैसे लोगों की मानसिकता दरअसल में धार्मिक पाखंडों में जकड़ी होती है जिसके तहत यह माना जाता है कि शवयात्रा में शामिल होने से पुण्य मिलता है. होता यह है कि पहले रोने धोने के बाद शव के साथ भी इतने कर्मकांड किए जाते हैं कि शवयात्रा में शामिल होने आए लोग बार बार अपनी घड़ी देख दुख में नहीं बल्कि हो रही देरी पर रो पड़ते हैं. हिम्मत वाले यानि व्यावहारिक लोग ही वहां से खिसक लेने की हिम्मत जुटा पाते हैं. चिलचिलाती धूप हो या घुमड़ते बादल हों या फिर कडकड़ाती ठंड हो मृतक के परिजनों को दुख की इस घड़ी में साथ देने आए शुभचिंतकों की परेशानियों से ज्यादा चिंता कर्मकांडों की रहती है.

पहले शव को स्नान कराया जाता है फिर तरह तरह की दूसरी रस्में अदा की जाती हैं यह प्रक्रिया शमशान घाट में भी चलती है आग और दाग देने के पहले मुंडन होते हैं. पंडित तरह तरह के मंत्रोच्चार करता है फिर कहीं जाकर अग्नि दी जाती है जिसके लिए लोग आए होते हैं. ये 4-6 घंटे भूखे प्यासे गुजारना कई लोगों पर इतना भारी पड़ता है कि वे शव यात्राओं मे जाने से कतराने लगते हैं तो इसमें हैरानी की क्या बात.

बात श्मशान घाट में ही खत्म नहीं हो जाती बल्कि वहां से घर लौटने पर खुद नहाना भी एक धार्मिक वाध्यता है. क्यों है इसका तार्किक जबाब किसी के पास नहीं सिवाय इसके कि चूंकि सूतक लगे होते हैं इसलिए नहाया जाता है और तब तक कुछ खाना पीना निषिद्ध होता है. बेवकूफी की यह इंतहा ही है कि जब किसी दूसरे के यहां जाते हैं तो ये बातें लोगों को पाखंड लगती हैं पर खुद करते हैं तो धर्म लगने लगती हैं.

ध्यान रखें

सम्बन्ध निभाने की हर मुमकिन कोशिश हर कोई करता है और करना भी चाहिए खासतौर से दुख की घड़ी में लेकिन इन्हें बहुत बड़े नुकसान की शर्त या परेशानियां ढोते निभाना कतई बुद्धिमानी की बात नहीं. किसी की भी शवयात्रा में जाने से ज्यादा अगर कोई दूसरा जरूरी काम घर, दफ्तर, दुकान या कारोबार में है तो उसे प्राथमिकता से करना चाहिए, मृतक के यहां बाद में कभी भी अपनी सुविधानुसार जाया जा सकता है. जिन धार्मिक पाखंडो को हम दूसरे के यहां होते देख उन्हें कोसते हैं उन्हे अपने यहां होने से रोकने की हिम्मत करें तो यह एक अनुकरणीय पहल होगी. मृत्यु भोज के मामले में ऐसा होने भी लगा है.

मध्यम वर्ग की यह बीमार मानसिकता है कि वह शवयात्रा की भीड़ को प्रतिष्ठा मानता है और हालत यह है कि यह भी ध्यान रखता है कि जो हमारे यहां नहीं आया हम भी उसके यहां नहीं जाएंगे यानि शव यात्रा भी सामाजिक बैर का शिकार हो चली है इससे कम से कम खुद को तो बचाया ही जा सकता है संभव है जो आपके यहां नहीं आया उसकी कोई मजबूरी रही हो. रही बात राजनैतिक और फिल्मी शवयात्राओं की तो वे अपवाद हैं लोग उनमे जुनून और जज्बातों के चलते ज्यादा जाते हैं लेकिन ऋषि कपूर जैसे अभिनेता इस पर भी तिलमिलाने लगे हैं तो जाहिर है वे स्टारडम को लेकर पूर्वाग्रह और कुंठा के शिकार हैं.

बाहुबली 2 : बेहतरीन पटकथा, निर्देशन व अभिनय से सजी फिल्म

फिल्म ‘बाहुबली 2 : कंकल्यूजन’ की वापसी इस सवाल के साथ हुई है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? इसी के साथ यह सवाल भी है कि राजमाता शिवागामी (रमैया कृष्णन) ने भल्लाल देव (राणा डग्गूबटी) की बजाय अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) को महिस्पति के राज सिंहासन पर बैठाने के निर्णय क्यों बदला?

राज सत्ता का सुख भोगने की लालसा में धर्म व अधर्म की व्याख्या बदलने व राजनीतिक साजिशों, इंसानी छल कपट, स्वार्थपूर्ति के लिए अपने भाई के खून के प्यासे इंसान की कहानी है ‘‘बाहुबली’’. इसे आधुनिक युग में ‘महाभारत’ की व्याख्या भी कह सकते हैं. ‘महाभारत’ में पुत्र मोह से ग्रसित धृष्टराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन की कपट व साजिशों को न समझकर हस्तिनापुर के सर्वनाश का असली कारण बनते हैं. जबकि ‘बाहुबली’ में महिस्पति की राजमाता शिवागामी अपने पति बिज्जल देव तथा अपने बेटे भल्लाल देव के कपट व साजिश को नहीं समझ पाती है और जब उन्हें इस सच का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

फिल्म शुरू होती है गाने के साथ. गाने के साथ ही परदे पर चित्रों के माध्यम से बाहुबली एक की कथा बयां हो जाती है. अब कई दृश्यों से बाहुबली की वीरता के अलावा उनका राजमाता शिवागामी के प्रति प्यार व समर्पण और महिस्पति राजसिंहासन की सुरक्षा का भाव प्रकट होता है. विजयादशमी को अमरेंद्र बाहुबली का राजतिलक होने से पहले प्रजा के सुख दुख को समझने के लिए अमरेंद्र बाहुबली राज माता के आदेश से कटप्पा (सत्यराज) के साथ देश भ्रमण पर निकलते हैं. और कुंतल राज्य की राजकुमारी देवसेना (अनुष्का शेट्टी) की वीरता पर लट्टू हो मामा भांजे आम इंसान की तरह उनके साथ हो जाते हैं. इधर भल्लाल देव के जासूस यह खबर उसे देते हैं तो वह राजमाता से पत्नी के रूप में देवसेना की मांग कर देता है. राजमाता कुंतल राजा के पास प्रस्ताव भेजती है, पर राजकुमारी देवसेना उनके प्रस्ताव को ठुकरा देती हैं.

भल्लाल देव की सलाह पर राजमाता, अमरेंद्र बाहुबली के पास देवसेना को बंदी बनाकर लाने का संदेश भेजती हैं. इधर कुंतल राज्य को शत्रुओं से बचाकर अमरेंद्र, देवसेना के दिल में जगह बना लेते हैं. तभी उन्हें राजमाता का संदेश मिलता है. वह देवसेना को मरते दम तक साथ देने व उनके मान सम्मान की रक्षा का वचन देता है. जब वह महिस्पति राज्य वापस पहुंचते हैं तो राजमाता अमरेंद्र के निर्णय से नाखुश होकर उनकी जगह भल्लाल देव को राजा और उन्हें सेनापति बना देती है. भल्लाल देव का राजतिलक हो जाता है. उसके बाद भल्लाल देव अपनी कुटिल राजनीतिक साजिश चलकर अमरेंद्र को सेनापति और फिर राज्य से बाहर करवा देता है. उसके बाद राजा भल्लाल देव साजिश रचकर अमरेंद्र की हत्या व देवसेना को बंदी बना लेते हैं.

कटप्पा महिस्पति राज सिंहासन से बंधे हुए हैं. कटप्पा के पुर्वजों ने शपथ ली थी कि वह आजीवन महिस्पति के सिंहासन के प्रति वफादार रहेगें. कटप्पा भी उस शपथ से बंधे हुए हैं. महिस्पति राज सिंहासन से बंधे होने के ही कारण कटप्पा को भ्ज्ञी कुछ कदम अनचाहे उठाने पड़ते हैं.

जबकि राजमाता शिवागामी, अमंरेंद्र के बेटे महेंद्र बाहुबली को राजा घोषित कर उसकी जान बचाते हुए मौत में समा जाती हैं. अब 25 साल बाद महेंद्र बाहुबली वापस कटप्पा के मुंह से सच जानकर भल्लाल देव की हत्या कर महिस्पति का राजसिंहासन संभलता है.

इस बार प्रभास की वापसी जबरदस्त हुई है. प्रभास ने अपने दमदार अभिनय से साबित कर दिया कि इस तरह के चुनौतीपूर्ण किरदार के साथ उनके जैसे बिरले कलाकार ही न्याय कर सकते हैं. वह शानदार अभिनेता हैं. इसमें कोई दो राय नहीं. उन्होंने विविधतापूर्ण अभिनय क्षमता का परिचय दिया है, तो वहीं क्रूरता के दृश्यों में भी वह जमे हैं.

देवसेना के किरदार में अनुष्का शेट्टी ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. वास्तव में फिल्म का इंटरवल से पहले का भाग तो बाहुबली और देवसेना की प्रेम कहानी के ही इर्द गिर्द घूमता है. भल्लाल देव के किरदार में राणा डग्गूबटी और राजमाता शिवागामी के किरदार में रमैया कृष्णन ने जान डाल दी है. कटप्पा के किरदार के लिए सत्यराज की जितनी तारीफ की जाए, कम है.

जहां तक कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा सवाल का है? तो फिल्मकार एस एस राजामौली ने फिल्म में इस सवाल का जवाब बहुत बेहतर तरीके से दिया है. एस एस राजामौली ने ही फिल्म की पटकथा भी लिखी है, इसलिए एक बेहतरीन पटकथा लिखने के लिए उनकी प्रशंशा की जानी चाहिए.

फिल्म कुछ लंबी हो गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर इंटरवल से पहले कसा जा सकता था. इंटरवल से पहले बाहुबली और देवसेना की प्रेम कहानी बहुत खूबसूरत अंदाज में पात्रों की हैसियत को ध्यान मे रखते हुए रचा गया है. जब इंटरवल के बाद जब कहानी कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा का सवाल ढूढ़ना शुरू करती है, तो रोचक ज्यादा आ जाती है. इसके लिए फिल्म की पटकथा लेखक व निर्देशक एस एस राजामौली बधाई के पात्र हैं.

एस एस राजामौली ने साबित कर दिखाया कि हमारे देश में हमारी संस्कृति में खूबसूरत कहानयों का जखीरा है, यदि हम उन पर काम करके फिल्म बनाएं, तो दर्शकों के दिलों में आसानी से जगह बना सकते हैं. इस फिल्म को देखते समय दर्शकों को ‘महाभारत’ के कुछ पात्र व कुछ घटनाएं याद आ जाए, तो उसमें आश्चर्य वाली कोई बात नही होनी चाहिए. मसलन जिस तरह कौरव यानी कि दुर्योधन के चलते पांडवों की जिंदगी में 12-13 साल गुजरते हैं, उसी तरह से राजा भल्लाल देव की वजह से अमरेंद्र बाहुबली को भी आम प्रजा के साथ उन्ही की तरह रहना पड़ता है.

जहां तक वीएफएक्स व साल गुजरेतयुद्ध के दृश्यों का सवाल है, तो ‘बाहुबली एक’ के मुकाबले ‘बाहुबली 2’ कमतर है. युद्ध रणनीति वगैरह पर इस बार निर्देशक का ध्यान कम रहा है. कुछ युद्ध दृश्य ज्यादा रोचक नहीं बन पाए. फिर भी यह फिल्म साबित करती है कि हम अपने देश में हॉलीवुड से ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं. और उन्हें चुनौती दे सकते हैं. फिल्म का गीत संगीत भी बेहतर है.

भव्यता के स्तर पर कोई कमी नहीं है बल्कि भव्यता के स्तर पर अति श्रेष्ठ फिल्म है. बेहतरीन सेट है. कैमरामैन के सेंथिल कुमार की केमरे की करतब गीरी फिल्म में चार चांद लगाती है. 

दो घंटे 48 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘बाहुबली 2 : द कंकलूजन’ के निर्माता शोबू यारलागद्दा व प्रसाद देवीनेनी, निर्देशक एस एस राजामौली, संगीतकार एम एम कीरवानी, कैमरामैन के के सेंथिल कुमार, कहानीकार के वी राजेंद्र प्रसाद हैं. साथ ही कलाकार हैं प्रभास, राणा डगुबट्टी, अनुष्का शेट्टी, रमैया कृष्णन,तमन्ना भाटिया व अन्य.

इन खिलाड़ियों के निकनेम के पीछे की कहानी जानते हैं आप!

क्रिकेट की ऐसी फैन फॉलोइंग है कि लोग क्रिकेट के नियम से लेकर क्रिकेटरों के बारे में लगभग सब कुछ जानते हैं या जानना चाहते हैं. आप अपने पसंदीदा क्रिकेटर के बारे में लगभग सब जानते होंगे यहां तक की उनके निकनेम से भी वाकिफ होंगे. लेकिन क्या आप इस निकनेम की पीछे की कहानी जानते हैं? नहीं तो जानें खिलाड़ियों के निकनेम और उसके पीछे की कहानी.

माइकल होल्डिंग- मौत की सनसनी

वेस्टइंडीज के इस तेज गेंदबाज को चुपचाप गेंदबाजी करने के लिए जाना जाता था. माइकल को अंपायर डिकी बर्ड ने यह नाम (मौत की सनसनी) तब दिया था जब क्रीज के पास खड़े रहने के बावजूद उन्हें माइकल होल्डिंग के दौड़ के आने की भनक तक नहीं लगी थी.

स्टीव वॉ- टुग्गा

स्टीव वॉ को खेल के मैदान पर मुश्किल परिस्थितियों में भी मुस्कुराने के लिए जाना जाता था. वह ऑस्ट्रेलिया के इस धाकड़ बल्लेबाज को क्रिकेट फिल्ड पर शांत और धैर्य से मुश्किलों का सामना करने के लिए उनके साथियों द्वारा दिया गया था उपनाम.

अनिल कुंबले- जंबो

भारत के दिग्गज लेग स्पिनर अनिल कुंबले को यह नाम हरफनमौला नवजोत सिंह सिद्धू ने दिया था. कुंबले की गेंदें जिस तरह से अचानक बाउंस करती थीं, उससे अच्छे-अच्छे बल्लेबाज भी चकमा खा जाते थे.

राहुल द्रविड़ – द वॉल

राहुल द्रविड़ को टीम इंडिया की दीवार माना जाता था, क्योंकि जब भी टीम संकट में होती थी द्रविड़ एक छोर थामे रखते थे. इसी वजह से उनका नाम 'द वॉल' पड़ गया. द्रविड़ का एक दूसरा निकनेम जैमी इसलिए पड़ा क्योंकि उनके पिता जैम बनाने वाली कंपनी 'किसान' में काम करते थे.

ग्लैन मैक्ग्रा- कबूतर

ऑस्ट्रेलिया के इस तेज गेंदबाज को नीक नेम कबूतर करियर के शुरूआती दौर में ही मिल गया था जब उनकी टीम के सदस्यों ने बालिंग के दौरान उनके लंबे पतले टांगों को देखते हुए पिजन का उपनाम दिया था.

महेंद्र सिंह धोनी- कैप्टन कूल

मैदान पर हमेशा शांतचित रहने वाले टीम इंडिया के वनडे और टी-20 कैप्टन धोनी को विषम परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने के लिए क्रिकेट विशेषज्ञों और फैन्स ने उन्हें कैप्टन कूल कहना शुरू कर दिया, जो उनके नाम के आगे अब लगभग हमेशा ही नजर में आता है.

शाहिद आफरीदी- बूम बूम

पाकिस्तान के तुफानी ऑलराउंडर शाहिद आफरीदी गेंद की बेरहमी से धुनाई के कारण बूम-बूम कहे जाते हैं. वो जब भी क्रीज पर आते हैं तो या को खुद जल्दी पैवेलियन लौट जाते हैं या फिर अपने बल्ले से गेंद को पैवेलियन का रास्ता दिखा देते हैं. बैटिंग की अपनी आक्रामक शैली के कारण बूम-बूम खासे चर्चा में रहते हैं.

विराट कोहली- चीकू

विराट कोहली को प्यार से चीकू कहकर बुलाया जाता है. कप्तान धौनी और टीम के दूसरे खिलाड़ी भी उन्हें प्यार से चीकू ही बुलाते है. विराट कोहली का यह निकनेम दिल्ली के कोच अजीत चौधरी ने दिया था. उन्होंने विराट का यह नाम उनकी हेयर स्टाइल को देखते हुए रखा था.

हर उम्र कि लिए करें फाइनेंशियल प्लानिंग

आजकल के समय में लोग फाइनेंशियल प्लानिंग के बारे में सोचते तो हैं पर वे इसे लेकर बिल्कुल सुनिश्चित नहीं हैं. बहुत से लोगों ने समय के साथ संपत्ति बनाई है और अपनी क्षमताओं के मुताबिक इन्वेस्टिंग की दुनिया में आगे भी बढ़े हैं. लोगों को लाइफ के हर पड़ाव में पर्सनल फाइनेंस के बारे में जानना चाहिए?

1. मिडल ऐज वाले प्रोफेशनल्स को यह जानना चाहिए कि ह्यूमन ऐसेट पर रिटर्न के साथ जोखिम भी जुड़े होते हैं, जो उम्र के साथ बढ़ सकते हैं. रिटायरमेंट इस तरह का एक बड़ा जोखिम है, लेकिन इकनॉमिक साइकल्स के साथ नौकरी जाना, छंटनी और कम इंक्रिमेंट जैसे मुद्दे भी सामने आ सकते हैं.

कुछ प्रोफेशन समय बढ़ने के साथ अपनी साख के मुताबिक आपको आमदनी भी ज्यादा देते हैं, लेकिन कुछ अन्य उम्र बढ़ने पर आपके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. अगर आप 40 साल के हैं, तो भविष्य के 50 वर्षों के लिए अपनी आमदनी का हकीकत के करीब रहते हुए अनुमान लगाएं.

2. यह देखें कि, लंबे समय में महंगाई कितना नुकसान पहुंचा सकती है. यह याद रखना चाहिए कि ‘सुरक्षित माना जाने वाला बैंक डिपॉजिट आपको फिक्स्ड और फ्लैट इंटरेस्ट इनकम देता है, जबकि खर्च महंगाई की दर के साथ बढ़ते रहते हैं’. इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि अगर अनुमानित इनफ्लेशन रेट 7 से 8 फीसदी है, तो आपके खर्चे 9 से 10 वर्षों में दोगुने हो जाएंगे. इसका मतलब है कि नुकसान से बचने के लिए ये हर 10 साल में दोगुना हो जाना चाहिए. इस समस्या से निपटने के केवल दो ही रास्ते हैं.

पहला, जिन वर्षों में आपकी आमदनी खर्चों से ज्यादा है, तो जितना अधिक हो सके, बचत करें.

और दूसरा, बचत को ऐसी जगह इन्वेस्ट करें, जहां आपको कम से कम इनफ्लेशन रेट, जितना रिटर्न मिले. 50 साल का होने पर जब आपके पास घर और कार मौजूद है तो आपको अपनी इनकम का 50 फीसदी बचाना चाहिए.

3. अपने ऐसेट्स को देखें और उन्हें भविष्य के इस्तेमाल के लिए ऐलोकेट करें. अगर आपके पास एक घर है, जिसमें आप रहते हैं और कुछ डिपॉजिट, शेयर्स और म्यूचुअल फंड्स हैं, तो इन्हें अपनी जरूरतों के मुताबिक मैप कर लें. घर से आपका भविष्य में किराए पर खर्च बचेगा. अन्य ऐसेट्स आपके बच्चे की हायर एजुकेशन और शादी, आपके इंटरनैशनल ट्रैवल प्लान, रेग्युलर इनकम कम होने पर इन्वेस्टमेंट इनकम की जरूरत और अपने बच्चों के लिए ऐसेट्स छोड़ने के काम आएंगे. यह तय कर लें कि आपके पास कौन से ऐसेट्स हैं और उनका इस्तेमाल करने की आपकी क्या योजना है.

4. अपने इन्वेस्टमेंट को तीन हिस्सों में बांटें. कोर पोर्टफोलियो की जरूरत आपको अपनी जीवन के दौरान होगी और इसका एकमात्र मकसद आपकी जरूरतें पूरी करने का है. अगर इस पोर्टफोलियो में नुकसान होता है तो आपकी नींद उड़ जानी चाहिए.

इनफ्लेशन के साथ अजस्टेड अपने खर्चों का अनुमान लगाने के बाद यह पक्का करें कि इस खर्च को पूरा करने वाले फंड इसी पोर्टफोलियो में रखे जाएं. आपका घर, गोल्ड, पीपीएफ, पीएफ, बैंक डिपॉजिट, सेविंग सर्टिफिकेट्स और प्रत्येक अन्य सुरक्षित ऐसेट इसमें होना चाहिए.

5. अगर आपको ऐसी इनकम की जरूरत है, जो इनफ्लेशन के साथ बढ़े, तो यह कंपोनेंट हर 10 साल में दोगुना हो जाना चाहिए. यह सुरक्षित और इनकम जेनरेट करने वाला होने की वजह से वैल्यू में नहीं बढ़ेगा. आपको अपने जीवन के दौरान इनमें इन्वेस्ट करना होगा. इसी वजह से आपको वेल्थ पोर्टफोलियो की जरूरत होती है.

यह आपका रिस्की पोर्टफोलियो होता है. इसे उन ऐसेट्स में इन्वेस्ट करें, जिनकी वैल्यू समय के साथ बढ़े, लेकिन शॉर्ट टर्म में यह वोलेटाइल हो सकता है. शेयर्स, म्यूचुअल फंड्स और सेकंड प्रॉपर्टी इसमें शामिल हो सकती है. इस पोर्टफोलियो के बिना आपका कोर पोर्टफोलियो इनफ्लेशन से लड़ने में संघर्ष करता नजर आएगा.

6. अगर आपको पीपीएफ में 8 फीसदी रिटर्न 15 वर्ष के अवधि में मिल रहा है, तो इक्विटी कंपोनेंट से आपको अपना पैसा ज्यादा समय तक बरकरार रखने और केवल पीपीएफ पर निर्भर रहने की स्थिति से कम बचत करने में मदद मिलेगी.

7. इसके अलावा आपका फैंसी पोर्टफोलियो है. इसमें कुछ ऐसी चीजें हो सकती हैं, जिनमें रिस्क ज्यादा है, जैसे इक्विटी, डेरिवेटिव और कमोडिटी ट्रेडिंग, प्राइवेट इक्विटी और आर्ट. इनमें लगाई जाने वाली रकम इस बात पर निर्भर करेगी कि आप अन्य दो कंपोनेंट के लिए कितनी रकम निकालते हैं.

8. अपने जीवन के प्रत्येक 10 वर्षों के लिए योजना बनाएं. 40 वर्ष का होने पर ऊपर बताई गई बातों पर ध्यान दें और यह समीक्षा करें कि आपके पास क्या है. 50 वर्ष का होने तक अपनी इनकम को मैप करें.

यह देखें कि आप क्या बचा रहे हैं और ज्यादा बचत करें. अपने उधार को कम करें या खत्म कर दें. ऐसे ऐसेट्स बनाएं, जो कम से कम आपके मौजूदा खर्च को आपके 50 वर्ष का होने तक कवर करें. जो भी अतिरिक्त हो, उसे वेल्थ पोर्टफोलियो में इन्वेस्ट करें.

9. अगर आप 40 की उम्र में अच्छा कर रहे हैं तो आप पाएंगे कि आपके कोर ऐसेट्स नौकरी जाने की स्थिति में आपकी सुरक्षा करेंगे और आपके वेल्थ ऐसेट्स के पास वैल्यू में ग्रोथ के लिए काफी समय होगा.

10. जब आप 50 वर्ष के हो जाएं तो वेल्थ पोर्टफोलियो को और बढ़ाएं. 60 वर्ष के बाद से अपना लाइफस्टाइल बरकरार रखने के लिए वेल्थ से कोर पोर्टफोलियो में ट्रांसफर करते रहें. अगर इसके बाद भी अतिरिक्त पैसा बचता है, तो आप उससे मजे कर सकते हैं.

70 वर्ष का होने पर अपने वेल्थ पोर्टफोलियो का आकलन करें और जिसकी आपको जरूरत नहीं है, उसे किसी को दिया जा सकता है. 80 वर्ष तक आपके कोर एक्सपेंस घट जाएंगे और आप अपनी सभी वेल्थ को अपने कोर पोर्टफोलियो में ट्रांसफर कर अच्छा जीवन जीने में सक्षम होंगे.

म्युचुअल फंड में निवेश करते समय ध्यान रखें ये बातें

शेयर बाजार में निवेश करने का सबसे आसान और सुरक्षित जरिया म्युचुअल फंड है. लेकिन जरूरी नहीं है कि म्युचुअल फंड में निवेश हमेशा फायदेमंद ही होगा. जो लोग पहली बार म्युचुअल फंड में निवेश कर रहे होते हैं उनके लिए ढ़ेरों फंड्स में से अपनी जरूरत और लक्ष्य के हिसाब से फंड का चुनाव, उनकी पर्फोर्मेंस ट्रैक करना आसान काम नहीं होता. वास्तव में स्कीम में निवेश करने से पहले कई चीजें ध्यान में रखनी चाहिए. सबसे पहला फैक्टर चयन होता है. निवेशकों को अपना पैसा उस विशेष फंड में लगाना चाहिए जो उनकी जरूरतों को पूरा करता हो. म्युचुअल फंड्स में निवेश करने वाले निवेशकों को कुछ अहम जान लेना बेहद आवश्यक है.

अगर म्युचुअल फंड्स में कर रहे है पहली बार निवेश तो ध्यान रखें कुछ बातें

लक्ष्य से जुड़ा हो आपका निवेश

आपका हर निवेश आपके लक्ष्यों की सारी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होना चाहिए. निवेश से पहले सुनिश्चित कर लें कि आपकी असल जरूरतें क्या हैं? उसके बाद फैसला करें कि कितनी राशि निवेश करनी है. अपनी जरूरतों को समझने के बाद ही आप निवेश से अच्छा रिटर्न्स हासिल कर सकते हैं.

अपनी जोखिम उठाने की क्षमता को जानिए

अपने लक्ष्यों को पहचानने के बाद यह देखें कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं. यह आप कई वेबसाइट्स पर जाकर जांच सकते हैं. इसमें सवाल दिए होते हैं जिसके जवाब देने पर वे आपको आपकी रिस्क प्रोफाइल बता देते हैं.

मुख्य रुप से तीन तरह के निवेशक होते हैं- कंजर्वेटिव, मॉडरेट और एग्रेसिव-

1. एग्रेसिव निवेशक वे होते हैं जो इक्विटी में ज्यादा निवेश करते हैं जैसे इंडिविजुअल स्टॉक्स और म्युचुअल फंड्स. इनकी जोखिम उठाने की क्षमता ज्यादा होती है. ये अपने पोर्टफोलियो में तेजी से ग्रोथ की अपेक्षा करते हैं और इनमें से कई डे ट्रेडर्स भी होते हैं. ये डेट म्युचुअल फंड्स में निवेश ज्यादा करते हैं. इनके लिए न्यूनतम टाइमफ्रेम 15 वर्ष होता है. इस तरह के निवेशक 12 से 14 फीसदी तक के रिटर्न की उम्मीद रखते हैं.

2. मॉडरेट निवेशक की जोखिम क्षमता थोड़ी सी ज्यादा होती है. यह पांच वर्ष से अधिक समय के लिए निवेश करते हैं.

3. कंसर्वेटिव निवेशक वे होते हैं जिनकी जोखिम क्षमता कम होती है. यह अधिकतम तीन वर्ष के लिए निवेश करते हैं. यह इक्विटी से दूर रहते हैं. यह रियल एस्टेट इंवेस्टमेंट ट्रस्ट, इंडिविजुअल बॉन्ड, बॉन्ड फंड्स आदि में निवेश करते हैं.

स्कीम के प्रदर्शन को साल में एक बार जरूर जांचे

जब भी आप निवेश करते हैं तो वर्ष में एक बार स्कीम का प्रदर्शन जरूर जांच लें. ऐसा इसलिए क्योंकि जरूरी नहीं है कि एक स्कीम आजीवन अच्छा प्रदर्शन ही करे. पिछले समय में किसी स्कीम के अच्छे प्रदर्शन का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि यह भविष्य में भी अच्छा ही रिटर्न देगा.

बैलेंस्ड फंड्स में करें निवेश

पहली बार म्युचुअल फंड्स में निवेश करने वालों को बैलेंस्ड फंड्स का चयन करना चाहिए. जो निवेशक तीन वर्ष की अवधि में कम जोखिम उठाते हुए निवेश करना चाहते हैं उनके लिए बैलेंस्ड फंड्स होते हैं. यह ऐसे निवेशकों के लिए बेहतर हैं जो न्यूनतम पांच वर्ष के लिए निवेश करना चाहते हैं.

कब म्यूचुअल फंड्स से नहीं मिलता फायदा

निश्चित रिटर्न पाने के लिए म्यूचुअल फंड एक सही विकल्प नहीं है. जैसे कि यह इक्विटी और फिक्स्ड इनकम मार्केट में निवेश करते हैं तो इसका रिटर्न बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है.

जानें क्रिकेट को और भी रोमांचक बनाने वाले पावरप्ले के बारे में

क्रिकेट मैच तो हम सभी देखते हैं. मैच देखते हुए हम अकसर ही बोलते हैं कि अभी पावरप्ले चल रहा अब तो मैच देखने का अलग ही आनंद आएगा. पावरप्ले तो हम आसानी से बोल देते हैं लेकिन क्या आप पावरप्ले के बारे में जानते हैं. जैसे की क्या होता है यह पावरप्ले, क्या नियम हैं इसके आदि. अगर नहीं, तो जानें पावरप्ले के बारे में सम्पूर्ण जानकारी.

सीमित ओवरों की क्रिकेट में पावरप्ले के लिए कुछ ओवर निर्धारित किए जाते हैं. इस दौरान क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम को 30 गज के घेरे के बाहर एक निश्चित संख्या में क्षेत्ररक्षक रखने की इजाजत होती है. मौजूदा नियमों के मुताबिक एक पारी में पावरप्ले के 15 ओवर होते हैं. इन पावरप्ले को दो ब्लॉकों में बांटा गया है जिनके नाम अनिवार्य पावरप्ले, और गेंदबाजी पावरप्ले हैं. पावरप्ले के नियम समय समय पर परिवर्तित होते रहे हैं. खासकर साल 2000 के बाद से इन नियमों में कई बार तब्दीली की जी चुकी है.

कैसे हुई पावरप्ले की शुरुआत

पावरप्ले को आधुनिक क्रिकेट की आत्मा कहा जाता है. पावरप्ले के कारण ही मैदान में जबरदस्त हिटिंग देखने को मिलती है. 1970 में पहली बार क्रिकेट का हिस्सा बने पावरप्ले को एक प्रयोग के रूप में क्रिकेट में शामिल किया गया था. इसका इस्तेमाल सबसे पहले वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट में किया गया.

हालांकि पावरप्ले को पहले पांच विश्व कप में स्थान नहीं दिया गया और पहली बार इसे 1996 के विश्व कप में लागू किया गया. इसके बाद से पावरप्ले सीमित ओवर की क्रिकेट का मुख्य अंग बन गया. पावरप्ले ने आगे के सालों में कई आतिशी सलामी बल्लाबाजों को जन्म दिया जो आते ही विरोधी गेंदबाजों की बखिया उधेड़ने लगे.

इस दौरान आज की तरह पावरप्ले 15 ओवरों का ही होता था, लेकिन यह पावरप्ले अनिवार्य पावरप्ले होता था जो पहले 15 ओवरों तक चलता था. इस पावरप्ले के दौरान तीन खिलाड़ियों को 30 गज के घेरे के बाहर रहने की इजाजत रहती थी. 16वें ओवर के बाद घेरे के बाहर पांच खिलाड़ी रखने की इजाजत होती थी साथ ही पावरप्ले के दौरान दो खिलाड़ियों के कैचिंग पॉजीशन पर रहना भी जरूरी होता था.

बदल गए पावरप्ले के नियम

सन् 2005 में क्रिकेट को अधिक मनोरंजक बनाने के लिए इसके नियमों में तब्दीलियां की गईं और पावरप्ले को 20 ओवरों का बना दिया गया. साथ ही पावरप्ले को तीन ब्लॉकों में भी बांट दिया गया. ताकि इनमें से एक ब्लॉक को बीच के ओवरों में इस्तेमाल करके बल्लेबाजी करने वाली टीम तेजी से रन बना सके और खेल को और मनोरंजक बनाया जा सके. ये तीन पावरप्ले अनिवार्य पावरप्ले, बैटिंग पावरप्ले और बॉलिंग पावरप्ले थे.

अनिवार्य पावरप्ले

क्रिकेट मैच की हर पारी के शुरू के 10 ओवरों को अनिवार्य पावरप्ले के रूप में रखा जाता है. इस दौरान फील्डिंग करने वाली टीम 30 गज के घेरे के बाहर अधिकतम दो फील्डर रख सकती है. यह आवश्यक है कि ये क्षेत्ररक्षक स्ट्राइकिंग छोर पर खड़े बल्लेबाज से 15 गज पर हों. इस पावरप्ले में बल्लेबाज अपने शुरुआती विकेट बचाते हुए जमकर हिटिंग करते हैं.

गेंदबाजी पावरप्ले

यह पावरप्ले अनिवार्य पावरप्ले (10 ओवर) के तुरंत बाद लिया जा सकता है. इस पावरप्ले में ओवरों की संख्या 5 होती है. साथ ही इसके इस्तेमाल करने का हक क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम के पास होता है. ज्यादातर देखा जाता है कि अगर मैच कुछ हद तक फील्डिंग करने वाली टीम के हाथ में होता है तो वह इस पावरप्ले को तुरंत लेकर बल्लेबाजों पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं.

लेकिन अगर टीम आतिशी अंदाज में खेल रही हो तो वे इस पावरप्ले को लेने के लिए सही समय का इंतजार करते हैं. इस पावरप्ले में तीन क्षेत्ररक्षकों को 30 गज के घेरे के बाहर रखा जा सकता है. साथ ही इस पावरप्ले को 40 ओवरों तक खत्म करना जरूरी रहता है.

बल्लेबाजी पावरप्ले

पांच ओवर का यह पावरप्ले कब लिया जाए यह बैटिंग करने वाली टीम तय करती है. इसका मकसद बीच के ओवरों में भी बल्लेबाजों को रन बनाने के ज्यादा मौके देना और इस तरह खेल को ज्यादा दिलचस्प बनाना होता है. इस पावरप्ले में भी बॉलिंग पावरप्ले के नियम लागू होते हैं. इस दौरान 30 गज के सर्कल के बाहर तीन से ज्यादा फील्डर नहीं हो सकते.

विश्व कप 2015 के बाद फिर बदल गए नियम

विश्व कप 2015 में बैटिंग पावरप्ले की वजह से क्रिकेट में असंतुलन देखा गया जब गेंदबाजों की पूरे विश्व कप में बेतरतीब धुनाई की गई. विश्व कप के तुरंत बाद आईसीसी ने एक बैठक बुलाई और पावरप्ले के नियमों में एक बार फिर से बदलाव किए गए.

नए नियमों के मुताबिक बैटिंग पावरप्ले को हटा दिया गया और अंतिम 10 ओवरों में क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम को मैदान में 5 खिलाड़ी रखने की इजाजत दी गई जो इसके पहले चार थी. साथ ही अनिवार्य पावरप्ले में दो कैचरों की बाध्यता को हटा दिया गया.

चूंकि गेंदबाजी पावर प्लेको बरकरार रखा गया जिसके अंतर्गत 3 क्षेत्ररक्षकों को 30 गज के घेरे के बाहर क्षेत्ररक्षण करने की इजाजत होती है. साथ ही पावरप्ले खत्म होने के बाद 40 ओवरों तक चार क्षेत्ररक्षकों को 30 गज के घेरे के बाहर रखने की इजाजत दी गई.

अब बीच में नहीं रुकेगा ब्रॉडबैंड या वाईफाई इंटरनेट

अगर आपके ब्रॉडबैंड या वाईफाई डाटा कनेक्शन की स्पीड कम है या बार-बार घटती बढ़ती रहती है तो यकीनन आप परेशान होते होंगे. कुछ आसान सी ट्रिक्स से आप अपने इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड बढ़ा सकते हैं.

टेस्ट करें अपने कनेक्शन की स्पीड

इससे पहले की आप अपने कनेक्शन की स्पीड बढ़ाने की ट्रिक्स फॉलो करें अपने कनेक्शन को एक बार टेस्ट कर लें. इसके लिए आप एक वेबसाइट http://www.speedtest.net/ का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये वेबसाइट आपके कनेक्शन की स्पीड ऑनलाइन टेस्ट करती है. इसे दिन के अलग-अलग समय में टेस्ट किया जा सकता है.

वाईफाई एक्सटेंडर

ये आपके घर के हर कोने में वाईफाई या लेन (LAN) इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने में सबसे ज्यादा काम आता है. अगर आपको ये समस्या आ रही है कि नेट कभी चलता है और कभी बहुत स्लो हो जाता है तो ये वीक सिग्नल की समस्या भी हो सकती है. इसके लिए आप वाईफाई एक्सटेंडर का इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे कई मीटर तक सिग्नल रेंज बढ़ाई जा सकती है.

यहां हम आपको बताना चाहते हैं कि अगर आपका मॉडम किसी इलेक्ट्रिॉनिक डिवाइस के आस पास रखा है तो उससे भी सिग्नल ब्रेक हो सकते हैं. ऐसे में अपने मॉडम की जगह चेंज करके देखें.

वाईफाई को करें सिक्योर

अपने वाईफाई पासवर्ड को हमेशा चेंज करते रहें. इसके अलावा, आप खुद राउटर का पासवर्ड सेट कर सकते हैं. इसके लिए फॉलो करने होंगे ये स्टेप्स-

1. अपने राउटर की सेटिंग्स में जाएं. यहां जाने के लिए आपको वेब ब्राउजर में URL की जगह राउटर का IP ऐड्रेस डालना होगा.

2. दिया गया एडमिन पासवर्ड डालिए. ये आम तौर पर राउटर पर भी प्रिंट रहता है. इसके बाद आपके सामने सिक्योरिटी इंस्ट्रक्शन मैनुअल भी आ जाएगा. अब अपने वाई-फाई राउटर का पासवर्ड खुद सेट करें और ये प्रॉसेस कम से कम हर 45 दिन में करते रहें.

अपने वाई-फाई मॉडम की लाइट चेक करें

आपके वाई-फाई राउटर में कई तरह की लाइट जलती रहती है. इनमें से एक इंटरनेट कनेक्टिविटी की, एक लैन की और एक वायरलेस डिवाइस की होती है. अगर आपको यह पता करना है कि कोई आपके वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल बिना आपको बताए कर रहा है, तो इसका पता लगाने का एक आसान तरीका है कि सभी वायरलेस डिवाइसेस को बंद कर देना.

लैपटॉप, कम्प्यूटर, स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी जैसे सभी डिवाइस को अगर बंद कर दिया जाए तो मॉडम में 4 में से तीन लाइट बंद हो जाएंगी. अगर ऐसा करने के बाद भी लाइट बंद नहीं होती तो हो सकता है कि कोई आपका वाई-फाई नेटवर्क इस्तेमाल कर रहा है. यह तरीका आसान जरूर है, लेकिन इसे अचूक कहना सही नहीं होगा.

इसकी वजह है कि कई बार बंद होने के बाद भी स्मार्ट डिवाइसेस आपके मॉडम से कनेक्ट रहती हैं. ऐसा करने से ये पता चल जाएगा की वाई-फाई का कोई गलत इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है. इससे मॉडम का पासवर्ड और यूजरनेम बदलकर कुछ हद तक अनचाहे कनेक्शन को बंद किया जा सकता है. इससे आपके वाई-फाई की स्पीड बढ़ेगी.

जानिए कुछ खास टैकनिकल ट्रिक्स

1. स्टार्ट मेन्यू में जा कर रन में जाएं और "Gpedit.msc" टाइप करें. इसके बाद ओके प्रेस करें.

2. इसके बाद आपकी कम्प्यूटर स्क्रीन पर एक टैब ओपन होगा. उसमें Computer configuration पर क्लिक करें.

3. अब Administrative templates पर क्लिक करें. इसके बाद नेटवर्क पर क्लिक करें.

4. इसके बाद आपके सामने कई ऑप्शन्स होंगे जिसमें से आपको ‘Qos Packet Scheduler’ को सिलेक्ट करना है.

5. अब ‘Limits reservable bandwidth’ पर क्लिक करें. इसके बाद नया टैब ओपन होगा जिसमें 3 ऑप्शन्स दिए गए हैं इसमें से आपको डिस्एबिल्ड को सिलेक्ट करना है.

6. इसके बाद इसी टैब में सबसे नीचे अप्लाई का ऑप्शन दिया गया है. इसपर क्लिक करके ओके पर क्लिक करें.

इन स्टेप्स को फॉलो करने से आपके इंटरनेट की स्पीड बढ़ जाएगी. आगे की स्लाइड में जानें क्यों बढ़ती है इस ट्रिक से इंटरनेट की स्पीड. अलग-अलग सिस्टम और नेटवर्क के हिसाब से स्पीड बदल जाती है. ब्रॉडबैंड में स्पीड और वाई-फाई में स्पीड अलग होगी.

क्यों बढ़ जाती है स्पीड

‘Limits reservable bandwidth’ को डिसेबल करने से आपका कम्प्यूटर विंडोज रिलेटेड ऐसे टास्क्स अलाउ करना बंद कर देता है, जिसके लिए बैंडविथ की जरूरत पड़ती हो. साथ ही ऑटोमैटिक अपडेट्स भी बंद हो जाते हैं और इंटरनेट की स्पीड बढ़ जाती है.

अगर आप गेमिंग के दौरान इस सेटिंग को एनेबल कर देते हैं तो कई पॉपअप्स आते हैं. ये न सिर्फ इरिटेटिंग होते हैं बल्कि नेट की स्पीड भी स्लो कर देते हैं. ऐसे में इस सेटिंग को डिसेबल करके आप अपने इंटरनेट की स्पीड बढ़ा दें.

हमेशा वायरस करें स्कैन

कम्प्यूटर में कई ऐसे प्रोग्राम्स होते हैं जो फालतू में इंटरनेट स्पीड का इस्तेमाल करते हैं. वायरस स्कैन से ऐसे प्रोग्राम्स का पता लगाया जा सकता है.

इसके अलावा, बूस्ट स्पीड प्रोग्राम्स जैसे क्लीन मास्टर वगैराह यूजर्स को बताते रहेंगे कि सिस्टम में कितनी मेमोरी का इस्तेमाल हो रहा है और कितनी का नहीं. रेग्युलर वायरस स्कैनिंग से इंटरनेट ब्राउजिंग की स्पीड बढ़ाई जा सकती है.

एमसीडी चुनाव : केजरीवाल की हार नहीं, जीत है

एमसीडी चुनाव में भाजपा की जीत पर इतना शोर समझ से परे है. मीडिया का ज्यादातर हिस्सा 'आप' पर पिल पड़ा है. भाजपा ने तीनों नगर निगम किसी से छीने नहीं हैं, यहां भाजपा पहले से आसीन थी. यह जीत उसने बरकरार रखी है. इसमें 'आप' की हार कहां हुयी? आप ने तो एमसीडी में पहली बार 48 सीटों के साथ जीत हासिल की है.

दिल्ली विधान सभा चुनाव में 'आप' की प्रचंड जीत (70 में से 67 सीटें) के बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तब भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटें जीत ली थी तब इतना हल्ला नहीं मचा कि केजरीवाल हार गए? दिल्ली में 'आप' की हार नहीं बताया गया. एमसीडी, विधानसभा और लोकसभा चुनाव हर जगह कमोवेश अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं. दिल्ली में भी तीनों चुनावों के मुद्दे अलग-अलग हैं. 

असल में यह 'आप' की हार नहीं, जीत है. यह जंतर-मंतर के उस जन आंदोलन; जनाक्रोश की जीत है जिसने कांग्रेस और भाजपा को अपनी भ्रष्ट, गलत नीतियों को बदलने पर जबरन मजबूर कर दिया. वरना तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा दोनों मिल कर उस जन आंदोलन का विरोध कर रही थी, कुचलने पर आमादा थी. केजरीवाल उसी आंदोलन के अगवाओं में एक थे. देश भर से उमड़े जनसैलाब के गुस्से का सन्देश भाजपा को उसी समय समझ में आ गया था और वह जनोन्मुखी ईमानदार नीतियों पर चलने पर विवश हुई.

मनमोहन सिंह के समय सब मंत्री बेलगाम दिखते थे, सत्ता के गलियारों में दलालों का बोलबाला था. आज केंद्र में मोदी के अलावा दूसरे मंत्रियों की आवाजें गुम हैं. इसलिए कि जनाक्रोश के डर से मंत्रियों सहित नौकशाहों पर लगाम कसी दिख रही है. यह उस जन आंदोलन का सुपरिणाम है. दिल्ली के मतदाता अच्छी तरह समझते हैं कि केंद्र शासित दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हाथ में ज्यादा ताकत नहीं है. उसे हर फैसले के लिये केंद्र के बैठाये एलजी का मुंह ताकना पड़ता है. वह असहाय है. 

आज की तारीख में केंद्र में बैठी भाजपा ज्यादा पावरफुल है, दिल्ली के वोटर यह जानते हैं, इसलिये भाजपा को जीताना ज्यादा मुनासिब समझा गया. यह तो केजरीवाल की नीतियों की जीत है जिस के चलते भाजपा को अपने तमाम पुराने पार्षदों की जगह सभी नए चेहरों को मैदान में उतारना पड़ा. इनमें कई भ्रष्ट और निकम्मे थे. 

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