Download App

सलमान की बाहों में फूट कर रो पड़ी थीं ये अदाकारा!

यहां हम बात कर रहे हैं 90 के दशक की फिल्मों की, जब सलमान खान और भाग्यश्री की सुपरहिट फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ रिलीज हुई थी. ये फिल्म इतनी सुपरहिट हुई थी कि आज भी लोग इसे देखने का मौका नहीं छोड़ते. फिल्म में सलमान और भाग्यश्री की जोड़ी ने जो कमाल किया था वो यादगार है.

फिल्म का हर एक गाना, एक एक सीन इतना बेहतरीन था कि फिल्म सुपरहिट तो हुई ही, साथ ही सदाबहार फिल्मों की सूची में भी शुमार हो गई. आज यहां हम आपको इस फिल्म से जुड़ी कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जो आपको निश्चित ही हैरान करने के साथ, आपके चेहरे पर मुस्कुहाहट ले आएगी. हम 90 के दशक की अभिनेत्री भाग्यश्री के द्वारा एक फिल्म की शूटिंग के दौरान के उनके अनुभव को आपसे भी शेयर कर रहे हैं.

एक सीन में सलमान को भरना था बाहों में

दरअसल उस समय फिल्म के गाने कबूतर जा जा जा… की शूटिंग चल रही थी. इस गाने के तुरंत खत्म होने के बाद भाग्यश्री को सलमान खान की बाहों में आने का सीन दिया गया था.

जोर से रोने लगीं भाग्यश्री

जब गाने का फाइनल सीन आया और सलमान ने भाग्यश्री को बाहों में लिया वह जोर-जोर से रोने लगीं. भाग्यश्री को रोता देख सभी हैरान रह गए.

सलमान ने पास जाकर पूछा कारण

भाग्यश्री को ऐसे रोता देख सलमान भी परेशान हो गए. सलमान उनके गए पास सलमान ने पूछा क्या उनसे कोई गलती हुई, जवाब देते हुए भाग्यश्री ने ‘ना’ में सिर हिलाया. इसके बाद फिल्म के डायरेक्टर सूरज बड़जात्या और सलमान फिर से भाग्यश्री के पास गए.

सलमान खान ने की उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश

सभी लोग भाग्यश्री को समझाते हुए चुप कराने की कोशिश कर रहे थे. थोड़ी देर बाद भाग्यश्री नॉर्मल भी हो गईं और फिर बाद में भाग्यश्री ने अपने रोने की असली वजह बताई.

इतने पुराने ख्यालों की हैं भाग्यश्री

भाग्यश्री ने बताया कि वे एक पुराने ख्यालों वाले परिवार से ताल्लुक रखती थीं और उन्होंने कभी किसी गैरमर्द को गले नहीं लगाया था और इसलिए शायद वे अच्छा अनुभव नहीं कर रहीं थी.

घबरा गई थीं भाग्यश्री

जैसे ही फिल्म के हीरे सलमान खान ने उन्हें गले लगाया वे इतनी घबरा गईं कि उन्हें रोना आ गया. भाग्यश्री की बात सुनकर सेट पर उपस्थित सभी लोग थोड़े गंभीर हो गए थे. इसके बाद उन्होंने भाग्यश्री से कहा कि जैसे भी उन्हें सही लगता हो वे वैसे ये सीन करें और इस तरह यह सीन फाइनल हुआ.

रेडियो शो पर भी खूब चला ये किस्सा

हम आपको बता दें कि अन्नु कपूर ने यह किस्सा अपने रेडियो शो ‘सुहाना सफर विद अन्नु कपूर’ में भी सुनाया था. उस समय इस किस्से ने काफी शोर मचा रखा था.

डिलीट करने को भी तैयार थे निर्देशक ये सीन

हम आपको बता देना चाहते हैं कि बड़जात्या उस शॉट को डिलीट करने के लिए भी तैयार थे, लेकिन बाद में भाग्यश्री ने खुद को ही समझाया कि ये तो सिर्फ एक सीन है.

तो एक आम इंसान की तरह कुछ ऐसे किस्से भी होते हैं हमारे सितारों के जीवन में, जो हम सभी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं.

विनोद खन्ना, एक यादगार पारी का अंत

अभिनेता और नेता रहे विनोद खन्ना का निधन 70 साल की उम्र में होने के बाद पूरे हिंदी सिनेमा जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है. फिल्म फेटर्निटी ने इस दिवंगत अभिनेता को श्रधांजलि देने के लिए अपने सभी कामकाज रोक दिए है. बृहस्पतिवार करीब 11.20 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली. वे ब्लैडर कैंसर से पीड़ित थे और काफी समय से बीमार चल रहे थें. बीच में उनकी एक जीर्ण अवस्था की फोटो वायरल भी हुई थी. ‘दिलवाले’ फिल्म में अंतिम बार वे नजर आये थे.

विनोद खन्ना ने दो शादियां की थी. पहली पत्नी गीतांजलि थी जिनसे 1985 में तलाक हो गया था. बाद में उन्होंने कविता से शादी की. उनके तीन बेटे अक्षय खन्ना, राहुल खन्ना और साक्षी खन्ना हैं.

साल 1968 में ‘मन का मीत’ फिल्म से बॉलीवुड में एक लम्बी पारी खेलने वाले अभिनेता विनोद खन्ना ने विलेन के रोल से अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद वह फिल्म ‘मेरे अपने’, ’मेरा गांव मेरा देश’, ‘इम्तिहान’, ‘इनकार’, ‘लहू के दो रंग’, ‘कुर्बानी’, ‘दयावान’ और ‘जुर्म’ जैसी कई फिल्मों में अभिनय के लिए जाने जाते रहे. हालांकि उनका जन्म पेशावर में हुआ था, पर विभाजन के समय वे अपने अपने परिवार के साथ मुंबई आ गए थे. यहां अपनी पढाई पूरी करने के बाद वे अभिनय की ओर मुड़े.

फिल्मों में काम करना उनके लिए आसान नहीं था, उनके पिता व्यवसायी थें और चाहते थें कि वे भी पढ़ लिखकर उनके व्यवसाय में शामिल हों. एक बार उन्होंने एक अवॉर्ड फंक्शन में कहा था कि जब उन्हें पहली फिल्म का ऑफर मिला था और उन्होंने घर पर कहा था तो पिता ने उनको डांटते हुए बंदूक तान ली थी, लेकिन मां के समझाने पर वे राजी हुए और कहा था कि उन्हें अपने आप को सिद्ध करने के लिए केवल दो साल मिलेंगे, अगर वे कामयाब नहीं हुए तो वापस उनके व्यवसाय में हाथ बटाएंगे.

उन्होंने कई फिल्मों में नायक और खलनायक की भूमिका अदा की. उन्होंने केवल मसाला फिल्में ही नहीं की, बल्कि हर तरह की फिल्मों में काम किया है. वे उस समय के हैंड्सम अभिनेताओं में गिने जाते थे. शुरूआती दिनों में उन्हें कोई बड़ी भूमिका नहीं मिली, वे अधिकतर सह अभिनेता या विलेन के रूप में ही नजर आते रहे. उन्होंने कई ऐसी फिल्में भी की हैं जिसमें एक्ट्रेस ही लीड रोल में होती थी. जैसे फिल्म ‘लीला’ जिसमें अभिनेत्री डिंपल कपाडिया मुख्य भूमिका में थी और फिल्म ‘रिहाई’ जिसमें अभिनेत्री हेमामालिनी लीड में थी.

उनकी सबसे पहली सोलो अभिनेता वाली फिल्म साल 1971 की ‘हम तुम और वो’ थी. जिसमें उन्हें कुछ खास सफलता नहीं मिली. उनकी सबसे अधिक कामयाब फिल्म ‘परवरिश’ थी, जिससे उन्होंने ‘स्टारडम’ का मजा चखा. वे शांतप्रिय इंसान थे और किसी को जानबूझकर नाराज करना नहीं चाहते थे. कई बार एक साथ में कई फिल्मों को भी साईन कर लिया करते थें. गुलजार की फिल्म ‘अचानक’ में उन्होंने नानावटी मर्डर केस पर आधारित फिल्म में आर्मी ऑफिसर की भूमिका निभाकर काफी प्रसंशा बटोरी थी. इसके बाद उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ हेरा फेरी, खून पसीना, मुकद्दर का सिकंदर आदि कई सफल फिल्में की.

एक दौर ऐसा भी आया, जब विनोद खन्ना इतने प्रसिद्ध हो गए थे कि अमिताभ बच्चन पर भी भारी पड़ने लगे थे. लेकिन वे ओशो आश्रम चले गए और वहां काफी दिनों तक रहने के बाद फिर वापस आकर दूसरी पारी शुरू की. डायरेक्टर रंजीत की फिल्म ‘कारनामा’ के शूटिंग के दौरान जब उनसे आश्रम जाने और माली बनकर काम करने की बात पूछा गया तो वे बहुत ही शांत भाव से उन सभी सवालों के जवाब दिए. उन्हें गुस्सा बहुत कम आता था. उनके ऊपर ‘स्टारडम’ कभी हावी नहीं हुआ, फिर चाहे वह फोटोग्राफर हो या मीडिया कर्मी सबके साथ बैठकर खाना खाते थें.

विनोद खन्ना की दूसरी पारी की फिल्मी जर्नी भी बहुत सफल थी. ‘सत्मेव जयते’ और ‘इन्साफ’ दो बड़े डायरेक्टर की फिल्म एक साथ रिलीज पर थी. दोनों में होड़ थी कि किसे रिलीज पहले किया जाय. पहले ‘सत्यमेव जयते’ रिलीज हुई और एक सप्ताह बाद ‘इन्साफ’. दोनों फिल्में जबरदस्त हिट हुई और विनोद खन्ना एक बार फिर स्टैब्लिश हो गए.

बहुत कम लोग ये जानते है कि विनोद खन्ना की दूसरी पारी में दो फिल्मों के हिट होने के बाद निर्माता निर्देशकों की भीड़ उनके घर के आगे लग गयी. उन दिनों मुकेश भट्ट जिनके साथ विनोद खन्ना की अच्छी दोस्ती थी और उन्होंने ही उन्हें ओशो आश्रम लेकर गए थे. एक फिल्म साईन करवाने जब विनोद खन्ना के पास गए, तो उन्होंने डेट न दे पाने की वजह से उन्हें मना कर दिया, जिससे मुकेश भट्ट नाराज हो गए और कहा था कि मैं खून से साईन कर कहता हूं कि मैं विनोद खन्ना को अपनी फिल्म में कभी नहीं लूंगा, लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने फिर उन्हें अपनी फिल्म में लिया.

अभिनेता सलमान खान उन्हें अपनी फिल्मों में लेना हमेशा पसंद करते थें. उनके साथ सलमान ने कई फिल्में की थी. ‘निश्चय’, ‘वांटेड’, ‘दबंग’, ‘दबंग 2’ और ‘दबंग 3’ के लिए भी उन्हें साईन कर लिया गया था. फिल्मों के अलावा विनोद खन्ना का राजनीतिक जीवन भी ठीक ठाक था. साल 1997 और 1999 में वे दो बार पंजाब के गुरुदासपुर क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी की ओर से सांसद चुने गए और बाद में राज्य मंत्री भी बने.

विनोद खन्ना की अगर खामियों की बात करें तो वे बहुत लेट लतीफ हुआ करते थें. कभी भी समय पर सेट पर नहीं पहुंचते थे, लेकिन जब एक बार सेट पर पहुंच जाते थे, तो जब तक काम खत्म न हो, किसी और चीज की तरफ ध्यान नहीं देते थे. यही वजह थी कि सारे निर्देशक इसे नजर अंदाज करते थे. अभिनय के अलावा वे प्रोडूसर भी बने और अपने पुत्र को फिल्म ‘हिमालय पुत्र’ में लौंच किया और तब उन्हें प्रोड्यूसर की परेशानियां समझ में आई थी.

बहरहाल, ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता के देहांत पर एक युग का अंत हो गया, जिसे लेकर सभी कलाकारों ने अपनी श्रधांजलि अलग-अलग ढंग से दिया.

सुभाष घई

मैं विनोद खन्ना से पिछले साल अपने एक्टिंग स्कूल के वार्षिक अवार्ड सेरिमोनी में मिला था. जहां उन्हें छात्रों ने सम्मानित किया था. वे ऑनस्क्रीन और ऑफ स्क्रीन दोनों जगह एक हैंड्सम हीरो थे. उन्होंने प्यार और सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जी है. वे हमेशा मेरे दिल और दिमाग में जिन्दा रहेंगे. अलविदा विनोद.

बप्पी लहरी

मैं इस समय विदेश में हूं और मैंने उनके साथ बहुत काम किया है. मुझे बहुत दुःख हो रहा है. वे हमेशा अमर रहें.

अशोक पंडित

विनोद खन्ना जी का हर रोल और परफॉर्मेंस बेहतरीन था. एक ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे, जो सबकुछ अपने अंदर समेट लेते थें.

कबीर बेदी

दुःख महसूस हो रहा है, मैं उनकी तबियत से वाकिफ था, ऐसा लग रहा है कि मेरे परिवार का कोई सदस्य चला गया है. मेरी पहली हिट फिल्म ‘कच्चे धागे’ से हम दोस्त बने थे, क्योंकि हमने साथ काम किया था. हमने शाहरुख़ खान की फिल्म ‘दिलवाले’ में भी साथ काम किया था. उन्होंने एक जिंदगी में सबकुछ कर दिखाया है. 40 साल की हमारी दोस्ती अब ख़त्म हो गयी है. बहुत अच्छा दोस्त था विनोद. मैं बहुत शोक्ड हूं.

हेमा मालिनी

फिल्मों से लेकर राजनीति तक विनोद खन्ना ने मेरा साथ दिया है. उनके निधन की खबर दुखद है.

कारण जोहर

करण जोहर ने ट्वीट कर कहा कि उनकी छवि को कोई टक्कर नहीं दे सकता. उनके सुपरस्टार टैग को देखते हुए मैं बड़ा हुआ हूं.

संजय दत्त

विनोद जी की देहांत से मैं बहुत दुखी हुआ हूं. मैंने बचपन से उनकी फिल्मों में उनकी करिश्माई अभिनय और स्टाइल से बहुत प्रेरित था. इंडस्ट्री को एक बहुत बड़ा आघात है. वे हमेशा दत्त परिवार के एक सदस्य के रूप में रहेंगे. उनकी आत्मा को शांति मिले. इस शोक की घड़ी में मेरी संवेदना कविता भाभी, अक्षय, राहुल और साक्षी के साथ है.

स्मार्टफोन के लिए पेश हैं बेहतरीन ऐप लॉकर

अपने स्मार्टफोन में आप न जाने कितने पर्सनल डेटा रखते होंगे. फोन में पर्सनल मैसेज से लेकर सोशल मीडिया ऐप तक होते हैं. इसके साथ-साथ हमारे फोन में बैंकिंग डिटेल और कई महत्वपूर्ण सूचनाएं भी होती हैं. हम अपने स्मार्टफोन में प्राइवेट फोटोज और वीडियो भी रखते हैं लेकिन हमारे ये प्राइवेट डेटा कितने सुरक्षित हैं, इस बात की जानकारी हमें नहीं होती. हम इनकी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत होते हैं. कुछ बेहतरीन ऐप लॉकर जो आपके डेटा को सुरक्षित रखने में आपकी मदद करेंगे.

प्राइवेसी नाइट ऐपलॉक

प्राइवेसी नाइट ऐप को अलिबाबा समूह द्वारा विकसित किया गया है. यह एक ऐड फ्री ऐप है, जो प्ले स्टोर से फ्री डाउनलोड किया जा सकता है. हालांकि यह ऐप अभी बहुत ज्यादा चर्चित नहीं है. ये एक बेहतरीन ऐप लॉकर है. इसमें आपको पिन, पैटर्न, फिंगरप्रिंट, फेस लॉक तक की सुविधा मिलती है. प्राइवेसी नाइट की मदद से आप ऐप के साथ-साथ इनकमिंग कॉल को भी लॉक कर सकते हैं. इसके अलावा ऐप गलत पासवर्ड डालने वाले की फोटो भी ले लेता है.

नॉर्टन ऐप लॉक

आपने नॉर्टन एंटीवायरस के बारे में सुना होगा. कंपनी एंटीवायरस के साथ-साथ ऐप लॉक भी बनाती है जो कि एक ऐड फ्री सिक्यूरिटी ऐप है. इस ऐप से आप कई तरह के लॉक ऑप्शन का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें आपको फिंगरप्रिंट, पिन या पैटर्न लॉक का विकल्प मिलता है। साथ ही तीन बार गलत पासवर्ड डालने वाले की ऐप तस्वीर भी ले लेता है जिससे आपको पता चल जाएगा कि आपके फोन का किसने इस्तेमाल किया था.

हेक्सलॉक ऐप लॉक

हेक्सलॉक नया ऐप है लेकिन अपने यूजर फ्रेडली इंटरफेस के कारण यह काफी चर्चित है. इस ऐप में भी आपको फिंगरप्रिंट, पिन और पैटर्न लॉक की सुविधा मिलती है. इस ऐप में आपको ऐड रिमूव करने का विकल्प मिलता है. आप ऐप को खरीदकर उससे ऐड को हटा सकते हैं. ऐप कई प्रकार की प्रोफाइल को सपोर्ट करता है. इसके साथ ही ऐप स्मार्टफोन का गलत पिन डालने वाले की तस्वीर भी ले लेता है.

ऐप लॉकर : फिंगरप्रिंट और पिन

ऐप लॉकर एंड्रॉयड मोबाइल ऐप दुसरे मोबाइल ऐप लॉकर की तरह चर्चित नहीं है लेकिन ये एक शानदार मोबाइल सिक्यूरिटी ऐप है. ऐप में कई यूनिक फीचर हैं. ऐप आपको कस्टमाइज ऐप लॉक का विकल्प देता है जो बहुत कम ही ऐप में मिलता है. इसके साथ-साथ ऐप आपको लॉकिंग के लगभग सभी विकल्प देता है, जो अन्य ऐप आपको प्रदान करते हैं.

ऐप लॉक

ऐप लॉक प्ले स्टोर का एक चर्चित ऐप लॉकर है. इसे अब तक 100 मिलियन से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है. एंड्रॉयड स्मार्टफोन के लिए ये एक शानदार ऐप लॉकर है. ऐप लॉक की मदद से आप अपने ऐप के साथ-साथ वाईफाई, ब्लूटूथ, मोबाइल डाटा को भी लॉक कर सकते हैं. साथ ही ऐप लॉक आपको वार्निंग मैजेस की सुविधा भी देता है. इस ऐप में आप अपना फोटो और वीडियो वालेट भी बना सकते हैं, जिसमें आप अपनी फोटोज सेव कर के रख सकते हैं.

हरिनारायण राय : हीरो से बने जीरो

साल 2005 से ले कर साल 2009 के बीच झारखंड के त्रिशंकु जनादेश के बीच सब से ज्यादा मलाई काटने वाले हरिनारायण राय को कानून ने 7 साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है. हरिनारायण राय देश के पहले ऐसे नेता हैं, जो प्रिवैंशन औफ मनी लाउंड्रिंग ऐक्ट के तहत कुसूरवार पाए गए हैं. उन पर साल 2007 से ले कर साल 2008 के बीच 4 करोड़, 83 लाख रुपए की मनी लाउंड्रिंग का आरोप है. उन के साथ उन की बीवी सुशीला देवी और भाई संजय राय भी जेल में ठूंस दिए गए हैं. राज्य की राजनीति में जीरो से हीरो तक की छलांग लगाने वाले हरिनारायण राय ने निर्दलीय विधायकों के साथ सियासत का खूब गेम खेला और करोड़ों रुपयों के वारेन्यारे किए. वे कई बार पाला बदल कर सरकार गिराने और बनाने का खेल खेलते रहे. एक के बाद एक 3 सरकारों को उन्होंने अपनी उंगलियों पर नचाया और जब चाहा सरकार बना दी, जब चाहा गिरा दी.

साल 2005 में अपनी सियासी पारी शुरू कर पहली बार विधायक बनने वाले हरिनारायण राय झारखंड के किंगमेकर बने और अब जेल की हवा खाने के लिए मजबूर हैं. प्रवर्तन निदेशालय की विशेष अदालत ने हरिनारायण राय को प्रिवैंशन औफ मनी लाउंड्रिंग ऐक्ट के तहत कुसूरवार पाया और उन्हें 7 साल की कैद की सजा सुना दी. साथ ही, उन पर 50 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है. 4 सितंबर, 2009 को ईडी ने उन के खिलाफ मनी लाउंड्रिंग मामले में केस दर्ज किया था. 27 नवंबर, 2011 को चार्ज फ्रेम हुआ था. 5 अक्तूबर, 1965 को देवघर में जनमे हरिनारायण राय पहली बार देवघर के जरमुंडी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव जीत कर साल 2005 में विधायक बने थे.

हरिनारायण राय के अलावा झारखंड के जिन नेताओं ने अपने इशारों पर कई सरकारों को बनाने और गिराने का खेल खेला, वे आज कानून के फंदे में फंस कर जेल और अदालत के बीच चक्कर लगा रहे हैं. करोड़ोंअरबों रुपयों की काली कमाई उन्हें जेल की काली कोठरी से नजात नहीं दिला पा रही है. आदिवासियों के लिए बने अलग राज्य झारखंड को मधु कोड़ा, एनोस एक्का, भानुप्रताप शाही, हरिनारायण राय, कमलेश सिंह जैसे नेताओं ने लूट लिया. साल 2005 से ले कर साल 2009 तक कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा किया. आज पांचों नेता जेल की सलाखों के पीछे हैं.

मधु कोड़ा राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना घोटाला, प्रदूषण नियंत्रण घोटाला, कमाई से ज्यादा संपत्ति और मनी लाउंड्रिंग के मामले के आरोप में 30 नवंबर, 2009 से जेल की हवा खा रहे हैं. एनोस एक्का और हरिनारायण राय पर मनी लाउंड्रिंग व आमदनी से ज्यादा जायदाद रखने का आरोप साबित हो चुका है और दोनों सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए हैं. कमलेश सिंह भी इन्हीं आरोपों के पेंच में फंस कर सींखचों के पीछे दिनरात बिता रहे हैं. कोड़ा मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे भानुप्रताप शाही 130 करोड़ रुपए के दवा घोटाला, मनी लाउंड्रिंग और आमदनी से ज्यादा कमाई के आरोप में 5 अगस्त, 2011 को सीबीआई के हत्थे चढ़े थे.

रांची महानगर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे विनय कुमार सिन्हा कहते हैं कि कानून से खेल करने वालों और जनता का भरोसा तोड़ने वालों को कानून ने सही जगह पहुंचा दिया है. कोड़ा मंत्रिमंडल में रहे 14 में से 5 लोग जेल की हवा खा रहे हैं, जिस में मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा भी शामिल हैं. झारखंड बनने के बाद साल 2005 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में मधु कोड़ा, कमलेश सिंह, भानुप्रताप शाही, एनोस एक्का और हरिनारायण राय को जीत मिली और तब से ये लोग झारखंड को लूटने और सत्ता का खेल खेलने में लगे रहे. चुनाव के तुरंत बाद शिबू सोरेन की अगुआई वाली संप्रग सरकार में ये पांचों शामिल हुए और 7 दिनों के बाद ही पाला बदल कर अर्जुन मुंडा की अगुआई वाली राजग सरकार का झंडा उठा लिया.

साल 2006 आतेआते उन लोगों को दूसरे का झंडा उठाने में खास फायदा नहीं दिखा, तो निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनने के लिए राजी कर सत्ता की पूरी चाबी अपने हाथों में ले ली. उस के बाद खुल कर लूट का खेल खेला और सत्ता की मलाई खाई. झारखंड में विधानसभा और अपने इलाके की जनता के बीच समय गुजारने के बजाय झारखंड के ज्यादातर विधायक और मंत्री जेल, अदालत, सीबीआई के दफ्तर और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं. सरकार बनाने और गिराने के खेल में ‘मोटी कमाई’ करने वाले नेताओं ने अपनी सियासी जमीन तो कमजोर कर ही ली है, राज्य का भी कबाड़ा कर के रख दिया है.

राज्य के 15 विधायक पिछले साल हुए राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों से पैसा ले कर वोट डालने के आरोप में सीबीआई के शिकंजे में फंसे हुए हैं. किसी का बंगला सील कर दिया गया है, तो किसी के बैंकों की पासबुक और जमीन के कागजात जब्त कर लिए गए. किसी के लैपटौप और मोबाइल फोन के डाटा को खंगालने के लिए सीबीआई अपने साथ ले गई. झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं और किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 42 सीटों की दरकार होती है. जानकारों का मानना है कि झारखंड में जबतब पैदा होने वाली सियासी उठापटक को दूर करने के लिए झारखंड विधानसभा में कम से कम 150 सीटें होनी चाहिए. विधानसभा सदस्यों की तादाद कम होने से ही अस्थिरता की हालत पैदा हो जाती है, जिस का खमियाजा झारखंड राज्य को भुगतना पड़ रहा है. सीटें बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार समेत राज्य की सियासी पार्टियां पिछले कई सालों से बात कर रही हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकल सका है.

लोकगीत भोजपुरी फिल्मों का दिल है : रितु सिंह

फिल्मों में काम करने का सपना तो सभी का होता है, पर इस के लिए जरूरी है कि सही दिशा में पूरी मेहनत की जाए. बक्सर, बिहार की रहने वाली रितु सिंह के पिता अपनी नौकरी के चलते उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में रहे. ऐसे में रितु की पढ़ाई गोरखपुर में हुई. सब से अच्छी बात यह रही कि वे दोनों ही जगह भोजपुरी बोली के करीब रहीं. रितु सिंह को बचपन से ही डांस करने का शौक था. डांस के दौरान उन्हें ऐक्टिंग का शौक हुआ. उन्होंने ऐक्टिंग सीखने के लिए लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी में पढ़ाई की. इस बीच उन को भोजपुरी की पहली फिल्म ‘दिलदार सांवरिया’ में काम करने का मौका मिला. इस फिल्म में उन के काम की खूब तारीफ की गई. इस के बाद रितु सिंह का भोजपुरी फिल्मों में काम करने का सिलसिला चल निकला. 3 साल पहले रितु सिंह सपनों की नगरी मुंबई आ गईं. अब तक 11 फिल्में कर चुकी रितु सिंह को हिंदी टैलीविजन सीरियलों में काम करना पसंद है. पेश हैं, उन के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

आप के पिताजी पुलिस में हैं. आप परिवार की एकलौती लड़की हैं. फिल्मों में कैरियर बनाने को ले कर आप के सामने किसी तरह की कोई परेशानी तो नहीं आई?

जी नहीं. मुझे बचपन से ही डांस करना बहुत पसंद है. यह बात मेरे मातापिता को पता थी. जब फिल्मों में काम करने का औफर मिला, तो मैं ने अपने घर वालों को बताया. वे तुरंत ही राजी हो गए.

भोजपुरी फिल्मों में डांस और गीतों की बड़ी अहमियत है. इन फिल्मों में कहानी से ज्यादा समय डांस और गीतों को दिया जाता है. कोई खास वजह?

यह बात तो सही है. भोजपुरी फिल्मों में गीत ज्यादा होते हैं. वैसे, अब पहले के मुकाबले काफी कुछ कम हो गए हैं. पहले जहां भोजपुरी फिल्मों में 11 से 12 गीत होते थे, अब 6 से 7 गीत होते हैं. इस की वजह यही है कि लोकगीत भोजपुरी फिल्मों का दिल है. दर्शक लोकगीतों को सब से ज्यादा पसंद करते हैं. वैसे, अब इन फिल्मों में कहानी को ज्यादा अहमियत दी जाने लगी है.

बहुत से भोजपुरी गीतों को बेहूदा कहा जाता है. आप इस की क्या वजह मानती हैं?

लोकधुनों पर बने गीत कई बार दो मतलब के होते हैं. इस को बेहूदा मान लिया जाता है. वैसे देखा जाए तो लोकगीतों का यही रंग सुनने वालों को पसंद भी आता है. दर्शक इस को बेहूदा भी नहीं मानते हैं. लेकिन यह भी सच है कि भोजपुरी फिल्मों से ज्यादा खुलापन हिंदी फिल्मों में होता है. भोजपुरी फिल्मों के ज्यादातर दर्शक गंवई समाज से होते हैं. उन को यही सब पसंद आता है.

आज के समय में जो नईनवेली लड़कियां भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन बनने के लिए आ रही हैं, उन को कैसे तैयारी करनी चाहिए?

फिल्मों में काम करने का कोई शौर्टकट रास्ता नहीं है. अब वक्त बदल गया है. फिल्म हो या टैलीविजन शो, सभी अपने कलाकारों का आडिशन करते हैं. बिना आडिशन दिए किसी को नहीं चुनते. नए लोगों को चाहिए कि वे पूरी तैयारी से आएं. अपना सब्र न खोएं और आडिशन देते रहें. खुद से अच्छाबुरा परखें. अपने परिवार को सच जरूर बताते रहें. अब ऐक्टिंग में पहले से ज्यादा स्कोप है. फिल्मों के अलावा एंकरिंग, टैलीविजन सीरियल भी हैं. मैं ने भी खाली समय में कई टैलीविजन शो में एंकरिंग की है, जिन से मेरी अलग पहचान भी बनी.

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनों की जीरो साइज फिगर पसंद नहीं की जाती है. आप की नजर में इस की कोई खास वजह है क्या?

पहले एक दौर था, जब भोजपुरी या कहें तो बाकी बोलियों की फिल्मों में भी भरेपूरे बदन की हीरोइनें पसंद की जाती थीं, पर अब हर जगह फिट हीरोइन को ही लोग पसंद कर रहे हैं. इस की अहम वजह यह भी है कि अब भोजपुरी फिल्मों के दर्शक बदल रहे हैं. दर्शकों के साथसाथ फिल्मों में भी तमाम तरह के बदलाव हो रहे हैं. अब कहानी के साथसाथ हीरोइन के पहनावे, उस के बोलने के तरीके, उस की फिगर वगैरह पर खासा ध्यान दिया जाता है.

आप को और क्याक्या काम करने पसंद हैं?

मुझे मोटरसाइकिल चलाना काफी पसंद है. फिल्म ‘धूम’ की तरह मैं भी किसी फिल्म में मोटरसाइकिल चलाना चाहती हूं. मुझे ड्रैस डिजाइनिंग का भी शौक है. मुझे खाने में भिंडी की सब्जी, रोटी और दही बहुत पसंद है.

तारीफ वाला फैसला

पत्नियों को सुप्रीम कोर्ट को शुक्रिया कहना चाहिए कि उस ने राष्ट्रीय व राज्य के राजमार्गों पर 500 मीटर तक शराब बेचने व परोसने पर रोक लगा दी ताकि लोग एक घूंट चढ़ा कर ड्राइविंग का मजा न ले सकें. ड्राइवरों को तो मजा आता था पर पत्नियों की जान सूखी रहती थी कि न जाने कब कहां कौन सी दुर्घटना शराब के नशे में हो जाए. देश में होने वाली लाखों सड़क मौतों के पीछे ज्यादातर शराब ही जिम्मेदार होती है.

ये राजमार्ग कई शहरों के बीच से भी गुजरते हैं और बहुत से बढि़या होटलों से ले कर रेस्तरां व ढाबे भी इन के पास बने हुए थे जहां दारू चढ़ाते लोगों को देखा जा सकता है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि बेचारी औरतें चुप बैठी हैं और साथ के मर्द लंबी बातें करते रंगीन पानी के साथ पीए जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने झटके से देश भर की आधे से ज्यादा शराब की दुकानों को बंद करा दिया है. अब शराब पीने या खरीदने के लिए कम से कम 1 किलोमीटर अतिरिक्त जाना ही पड़ेगा और वह भी संकरी सड़कों पर.

शराब का नुकसान ज्यादातर आरतों को ही होता है चाहे उन्हें पतियों के पीने पर लंबीचौड़ी आपत्ति न हो और वे खुद भी 2-4 घूंट चढ़ा लेती हों. औरतों की घर की आय में तो सेंध लगती ही है, घर के कमाऊ जने का स्वास्थ्य खराब होने का डर भी बना रहता है. आजकल तो मांओं को यह भी चिंता होने लगी है कि बेटेबेटी पी पा कर पता नहीं क्या कर गुजरें. सड़कों के किनारे शराब बंद करने से शराब रुक नहीं जाएगी पर यह संदेश जरूर जाएगा कि शराब कुछ ऐसी चीज है जिस से न केवल दुर्घटना हो सकती है, उसे पाने के लिए मशक्कत भी करनी पड़ेगी. जैसे बंद जगहों पर सिगरेट की पाबंदी का असर यह हुआ है कि रेलों, होटलों, रेस्तराओं आदि में सिगरेट का धुआं नहीं दिखता वैसे ही शराब पर अंकुश असर दिखाएगा.

यह तरीफ की बात है कि यह फैसला गौमांस प्रतिबंध की तरह भाजपा सरकार का नहीं सुप्रीम कोर्ट का पूरी सुनवाई के बाद लिया गया है. इस में कट्टरता कम और व्यावहारिकता ज्यादा है. देश में शराब की अति होने लगी है और जैसे लोग मंदिरों में भरभर कर पैसा खर्च कर रहे हैं वैसे ही शराब पर कर रहे हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की रोक कम से कम नशे पर तो रोक लगाएगी और जो पैसा बचेगा औरतें उस से जरूरत की चीजों व दवा के साथसाथ साडि़यों और ब्यूटीपार्लरों पर भी खर्च कर सकेंगी.

वर्चुअल नहीं ऐक्चुअल दुनिया में जीएं

दूरदर्शन पर 1990 में एक धारावाहिक प्रसारित होता था ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने.’ मुंगेरीलाल का किरदार निभाया था मशहूर ऐक्टर रघुबीर यादव ने. इस धारावाहिक को मनोहर श्याम जोशी ने लिखा था और निर्देशक थे, प्रकाश झा. मुंगेरीलाल एक ऐसा पात्र था, जो बड़ेबड़े सपने देखता था लेकिन अफसोस कि उस के सपने साकार नहीं होते थे.

आज के किशोर भी मुंगेरीलाल की तरह ही काल्पनिक दुनिया में जीते हैं, वे दुनिया की हर नेमत पा लेना चाहते हैं. सपने देखने में कोई बुराई नहीं है पर केवल सपने देखने से ही कोई चीज प्राप्त नहीं हो जाती, उस के लिए अथक प्रयास भी करने पड़ते हैं, लेकिन इंटरनैट की खोखली दुनिया में जी रहे किशोर यह बात समझने को तैयार नहीं हैं.

राहुल 10वीं कक्षा का छात्र था. उस का सपना बड़े हो कर पायलट बनने का था, क्योंकि उस के पापा भी पायलट थे और वह उन की तरह ही बनना चाहता था. उस के पापा अकसर उस से कहते, ‘‘बेटा, पायलट बनने के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है, अच्छे अंकों से पास होना पड़ता है इसलिए जम कर पढ़ाई किया करो. हरदम मोबाइल पर चैटिंग या लैपटौप पर फेसबुक ही न चलाते रहा करो.’’

 ‘‘पापा, आप भी बस सवेरेसवेरे लैक्चर झाड़ने लग जाते हैं. मुझे सब पता है. अभी ऐग्जाम में काफी समय है, मैं समय पर पढ़ाई कर लूंगा,’’ हमेशा राहुल का यही जवाब होता. हार कर पापा ने राहुल को पढ़ाई के लिए टोकना बंद कर दिया. इस से वह और आजाद हो गया. दिनभर लैपटौप पर दोस्तों के साथ चैटिंग में लगा रहता. बाहर जाता तो मोबाइल पर ही समय बिताता. वार्षिक परीक्षा के लिए बस एक महीना ही बचा था. अब राहुल को पढ़ाई की चिंता सताने लगी, लेकिन जब वह पढ़ने बैठता तो उसे कुछ समझ न आता. व्हाट्सऐप पर आते मैसेज बारबार उस का ध्यान भटकाते. आखिर परीक्षा में वह बैठ तो गया पर रिजल्ट नकारात्मक रहा.

इसी प्रकार मोहित का बड़ा भाई अवनीश एक नामी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर था. मोहित भी अवनीश की तरह सौफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता था. अवनीश ने मोहित को समझाया कि किसी को देख कर उस जैसा प्रोफैशन चुनना ठीक नहीं, क्योंकि यह जरूरी नहीं कि अगर मैं सौफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में सफल हूं तो तुम भी सफल हो ही जाओ. इसलिए जिस क्षेत्र में तुम्हारा इंटरैस्ट है, उसी क्षेत्र में जाओ तो तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा.

मैं ने देखा है कि तुम बहुत अच्छी फोटोग्राफी करते हो. खासतौर से तुम्हारे खींचे पशुपक्षियों के फोटो देख कर कोई भी यह नहीं कह सकता कि तुम एक अच्छे वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर नहीं बन सकते. भले ही यह एक मुश्किल काम है. कैमरा ले कर जंगलों में भटकना पड़ता है पर एकएक फोटो की कीमत हजारों में होती है. इसलिए पढ़ाई के साथसाथ तुम फोटोग्राफी भी सीखते रहो तो अच्छा होगा.

जानते हो, सुधीर शिवराम पहले आईटी प्रोफैशनल थे, लेकिन उन की आईटी में कोई दिलचस्पी नहीं थी इसलिए वे प्रगति नहीं कर पा रहे थे, लेकिन उन्हें वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी का बहुत शौक था, इसलिए बाद में उन्होंने अपने इस शौक को कैरियर में बदल लिया और सफल हुए. आज वाइल्ड फोटोग्राफी में उन का नाम शिद्दत से लिया जाता है.

मोहित को समझ आ गया कि इंसान को वही काम करना चाहिए जिस में वह सफल हो सके.

मशहूर पार्श्व गायिका लता मंगेशकर पहले फोटोग्राफर बनना चाहती थीं. उन के पास एक से एक महंगे कैमरे थे, लेकिन एक बार उन्होंने एक फिल्म फोटोग्राफर को अपने खींचे कुछ फोटो दिखाए तो उस ने कुछ विपरीत टिप्पणी कर दी.

लता मंगेशकर को लगा कि वाकई उन के फोटो में वह बात नहीं है जो एक टौप फोटोग्राफर में होनी चाहिए. उस दिन के बाद लता ने कैमरे को हाथ नहीं लगाया और संगीत को अपना प्रोफैशन बना लिया. इस क्षेत्र में उन्होंने जितना नाम कमाया और शोहरत पाई उतनी शायद किसी गायक को नहीं मिली.

अगर लताजी या शिवराम सिर्फ काल्पनिक दुनिया में ही गोते लगाते रहते और वास्तविकता को नकार देते तो महज पछतावे के उन के हाथ कुछ न लगता. इसलिए किशोरों को चाहिए कि वे ऐक्चुअल जिंदगी में विश्वास रखें  और वर्चुअल यानी काल्पनिक दुनिया में न जीएं.

आज किशोर ही नहीं किशोरियां भी वर्चुअल वर्ल्ड में जीती हैं. कोई किशोरी यदि रूपरंग में अच्छी है तो वह अपने को किसी अभिनेत्री से कम नहीं आंकती और हीरोइन बनने के ख्वाब देखने लगती है. अनेक लड़कियां हर साल हीरोइन बनने मुंबई जाती हैं और दिनरात निर्मातानिर्देशकों के चक्कर काटती हैं. उन में से कुछ ही ऐसी होती हैं जिन को छोटामोटा रोल मिल पाता है.

श्वेता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. श्वेता को अपनी ब्यूटी पर बहुत नाज था. अकसर वह सहेलियों से कहती थी कि देखना एक दिन मैं बहुत बड़ी ऐक्ट्रैस बनूंगी. सहेलियां उसे बहुत समझातीं कि वह हीरोइन बनने का इरादा त्याग दे. खूबसूरत होने का अर्थ यह नहीं होता कि उसे फिल्मों में काम मिल ही जाए, पर श्वेता ने उन की एक न सुनी और ग्रैजुएशन में फर्स्ट डिवीजन लाने के बावजूद मम्मीपापा से जिद कर के मुंबई चली गई. मुंबई जा कर उस ने 5-6 महीने काम ढूंढ़ा, लेकिन उसे किसी निर्माता ने साइन नहीं किया, क्योंकि सुंदर होने के बावजूद उस का फेस फोटोजैनिक नहीं था. औडिशन में भी वह फेल हो जाती थी.

आखिरकार श्वेता वापस आ गई और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दी, जिस में वह सलैक्ट हो गई. आज वह एक नामी कंपनी में इलैक्ट्रौनिक इंजीनियर है. वह मानती है कि वर्चुअल दुनिया में जीते हुए उस ने पहले गलत फैसला लिया था, क्योंकि उसे ग्लैमर की दुनिया बहुत पसंद थी.

एक नहीं अनेक मामले ऐसे प्रकाश में आते रहते हैं जब किशोरकिशोरियां वर्चुअल वर्ल्ड की चकाचौंध में गलत फैसला ले लेते हैं. अत: किशोरों को चाहिए कि वे वर्चुअल के बजाय ऐक्चुअल दुनिया में जीएं ताकि अपनी मंजिल पा सकें.    

यहां दिए टिप्स फौलो कर के किशोरकिशोरियां अपने कैरियर के साथ ही सोशल लाइफ को भी बेहतर बना सकते हैं :

मेहनत से जी न चुराएं

परिश्रम ही सफलता की कुंजी है, इस बात को हमेशा ध्यान में रखें. किशोर सपने तो बड़ेबड़े देखते हैं पर उन्हें साकार करने के लिए प्रयास नहीं करते, इसलिए सफल नहीं होते. जो आप कर सकते हैं उन पर ही ध्यान केंद्रित करें तो आप अपने टारगेट को अचीव कर सकते हैं.

कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता

इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. अकसर किशोर बहुत से काम करना पसंद नहीं करते. उन को वह काम छोटा लगता है. वे भूल जाते हैं कि भले ही वह काम उन की नजर में छोटा है, लेकिन अगर उसे पूरी लगन से किया जाए तो एक दिन वही काम बड़ा हो जाता है.

अंधविश्वास में न पड़ें

बहुत से किशोर अंधविश्वास में पड़ कर अपना भविष्य खराब कर लेते हैं. वे पढ़ाईलिखाई पर ध्यान न दे कर पूजापाठ पर यकीन करते हैं. इस के लिए कुछ हद तक पेरैंट्स भी दोषी होते हैं, जो बचपन से ही बच्चों के मन में ऐसी दकियानूसी धारणाएं भर देते हैं. इसलिए किशोरों को चाहिए कि वे काल्पनिक भगवान या अंधविश्वास पर यकीन न कर ऐक्चुअल जिंदगी जीएं, परिश्रम केसाथ पढ़ाई करें, सोशल मीडिया जैसी काल्पनिक दुनिया में विचरण न करें, तो वे आसानी से अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं.

102 वर्ष की उम्र में भी काम से लगाव  

 

कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई ऐसा काम नहीं जिसे कर पाना असंभव हो. ऐसे में उम्र भी आड़े नहीं आती.

 

इस का जीताजागता उदाहरण वरिष्ठ वैज्ञानिक डेविड गुडाल हैं, जो 102 वर्ष के हैं. उन की लंबी उम्र का राज हमेशा काम से जुड़े रहना ही है. असल में जब पथ के एडिर्थ कोवान विश्वविद्यालय ने उन्हें कहा कि अब वे इस उम्र में आराम करें और उन्हें अब डेली एक घंटे का सफर तय कर के कैंपस आने की जरूरत नहीं, तो वे इस से परेशान हो गए. उन्हें लगा कि उन के जीने का मकसद उन से छीना जा रहा है वह भी तब जब वे हर कार्य करने में समर्थ हैं. इस पर उन्होंने विरोध जताया और उन का यही विरोध रंग लाया और उन्हें कैंपस में ही आ कर पढ़ाने की इजाजत मिली. वे विश्वविद्यालय में बिना वेतन के मानद एसोसिएट के तौर पर कार्य कर रहे हैं.

 

कहते हैं जहां चाह होती है वहां राह खुद ब खुद मिल जाती है, जिसे डेविड गुडाल ने साबित किया. उन की शोध छात्रों को दी सलाह भी बहुत महत्त्वपूर्ण समझी जाती है.

 

जसप्रीत की प्रीति में उलझी ‘किरण’

पंजाब के जिला होशियारपुर के टांडा उड़मुड़ के रहने वाले सरदार सुखदेव सिंह सुखी और संपन्न किसान थे. उन के परिवार में पत्नी और 3 बच्चे, जिन में 2 बेटियां मनदीप कौर, संदीप कौर और एक बेटा गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी था. उन्होंने बड़ी बेटी मनदीप कौर की शादी जिस लड़के से की थी, वह आस्ट्रेलिया में रहता था.

शादी के बाद मनदीप कौर भी पति के साथ आस्ट्रेलिया जा कर रहने लगी थी. बहन के जाने के बाद गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी का भी मन बहन के पास आस्ट्रेलिया जाने का हुआ तो सुखदेव सिंह ने उसे भी आस्ट्रेलिया भेज दिया. वहां बहन और बहनोई की मदद से गुरप्रीत ने जो काम शुरू किया, वह चल निकला था. जीजा की वजह से गुरप्रीत को भी वहां की नागरिकता मिल गई थी. सुखदेव सिंह का बेटा एनआरआई बन गया तो उस के लिए अच्छे घरों के रिश्ते आने लगे. उन्होंने कुछ लड़कियों के फोटो गुरप्रीत के पास भेजे तो उन में से उस ने किरणदीप कौर को पसंद कर लिया. इस के बाद आस्ट्रेलिया से पंजाब आ कर उस ने किरणदीप कौर से शादी कर ली.

शादी के बाद गुरप्रीत सिंह आस्ट्रेलिया चला गया. कुछ दिनों बाद किरणदीप कौर के भी आस्ट्रेलिया जाने की व्यवस्था कर दी गई. वह कुछ दिनों तक पति के पास आस्ट्रेलिया में रहती तो कुछ दिनों के लिए पंजाब आ कर सासससुर के साथ रह कर उन की सेवा करती. गुरप्रीत के आस्ट्रेलिया जाने के बाद सुखदेव सिंह गांव वाला मकान बेच कर टांडा शहर के बाईपास के पास पौश इलाके में एक बड़ी सी कोठी खरीद कर उसी में रहने लगे थे. खेतों को उन्होंने ठेके पर दे दिया था.

26 मार्च, 2016 की रात गुरप्रीत सिंह ने पिता सुखदेव सिंह को फोन किया. वह पिता को बताना चाहता था कि उन के आस्ट्रेलिया आने की व्यवस्था हो गई है. दरअसल वह अपने मातापिता को भी स्थाई रूप से अपने साथ रखना चाहता था, जिस से उन की ठीक से देखभाल हो सके. लेकिन पूरी घंटी बजने के बाद भी फोन नहीं उठा था. उस ने कई बार फोन किया. हर बार पूरी घंटी बजी, पर फोन नहीं उठा.

फोन न उठने से वह परेशान हो उठा. पत्नी किरणदीप और छोटी बहन संदीप ने समझाया कि दोनों लोग सो गए होंगे, इसीलिए फोन नहीं उठ रहा. सुबह फोन कर लेना. संदीप कौर उन दिनों गुरप्रीत सिंह के पास ही थी. पंजाब में उस समय सुखदेव सिंह ही पत्नी संतोष कौर के साथ थे. पत्नी और बहन ने कहा तो गुरप्रीत को भी लगा कि शायद वे सो गए होंगे.

अगले दिन यानी 27 मार्च को उस ने फोन किया तो फिर वैसा ही हुआ. घंटी पूरी बजती थी, पर फोन नहीं उठता था. वह पूरे दिन फोन करता रहा, पर फोन नहीं उठा. मांबाप में से किसी ने फोन नहीं उठाया तो वह परेशान हो गया. रात 11 बजे उस ने टांडा के शिमला पहाड़ी में रहने वाले अपने मौसा बलबीर सिंह को फोन कर के सारी बात बता कर उस ने आग्रह किया कि वह उस की कोठी पर जा कर देखें कि पिता और मांजी फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं.

उस समय रात के 11 बज रहे थे, इसलिए बलबीर सिंह ने कहा कि अब उतनी रात को तो वह नहीं जा सकते, सवेरा होते ही उस के यहां जा कर पता करेंगे कि क्या बात है, जो उन का फोन नहीं उठ रहा है. गुरप्रीत की मौसी विजय कौर ने उसी समय अपने भाई कुलदीप सिंह को फोन कर के यह बात बता कर कह दिया था कि सुबह उठ कर उन्हें सीधे वहां पहुंच जाना है.

कुलदीप सिंह वार्ड नंबर-1 दारापुर, टांडा दसुइया में रहते थे. सवेरे उठ कर वह अपने बहनोई सुखदेव सिंह की कोठी पर पहुंचे तो बाहर वाला गेट खुला था. इस बात पर तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उन्होंने पूरी कोठी के दरवाजे खुले देखे तो उन्हें हैरानी हुई. उन्हें मामला गड़बड़ लगा.

वह भाग कर बैडरूम में पहुंचे तो सामने बैड पर उन की बहन संतोष कौर और बहनोई सुखदेव सिंह चित लेटे थे. कोठी के एक कमरे से उन के पालतू कुत्ते के भौंकने की आवाजें आ रही थीं. कुलदीप सिंह आवाजें देते हुए बैड के पास पहुंचे तो देखा, दोनों के शरीरों में किसी तरह की कोई हरकत नहीं हो रही थी. वह समझ गए कि दोनों जीवित नहीं हैं.

वह घबरा गए और उन्होंने तुरंत बहन विजय कौर और जीजा बलबीर सिंह को फोन कर के यह बात बता दी. इस के बाद अन्य रिश्तेदारों को भी सूचना दे दी गई. थोड़ी ही देर में सब इकट्ठा हो गए तो थाना टांडा पुलिस को इस बात की सूचना दी गई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर जगजीत सिंह एएसआई भूपेंद्र सिंह और कुछ सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. फोन कर के क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया था. घटनास्थल के निरीक्षण में वहां ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिस से यह पता चलता कि उन की हत्या की गई थी या उन्होंने आत्महत्या की थी. लाशों पर चोट के भी निशान नहीं थे. कोठी का सारा सामान सुरक्षित था.

सिर्फ एक बात हैरान करने वाली यह थी कि कोठी के सभी कमरों के दरवाजे खुले थे, जबकि पालतू कुत्ते के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था. जगजीत सिंह ने रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पूछताछ की. पड़ोसियों का कहना था कि कोठी का गेट 2 दिनों से खुला था. इस बीच सुखदेव सिंह और उन की पत्नी संतोष कौर दिखाई नहीं दीं. उन की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. रिश्तेदारों के अलावा उन के यहां किसी का आनाजाना भी नहीं था.

इस तरह शुरुआती जांच में पुलिस यह नहीं पता कर पाई कि मृतकों ने आत्महत्या की थी या उन की हत्या की गई थी. डीएसपी परमजीत सिंह हीर के निर्देश पर इंसपेक्टर जगजीत सिंह ने कुलदीप सिंह की शिकायत पर रपट नंबर-13 पर सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. घटना की सूचना आस्ट्रेलिया में रह रहे सुखदेव सिंह के बच्चों को भी दे दी गई थी.

अगले दिन 3 डाक्टरों के पैनल द्वारा पोस्टमार्टम करने पर जो रिपोर्ट आई, वह चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार, सुखदेव सिंह और संतोष कौर की मौत दम घुटने से हुई थी. उन के गले पर गला घोंटने के निशान भी पाए गए थे. इस से साफ हो गया था कि यह आत्महत्या का नहीं, हत्या का मामला था.

पोस्टमार्टम के बाद सुखदेव सिंह और संतोष कौर की लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गई थीं. अब तक आस्ट्रेलिया से मृतक सुखदेव सिंह के परिवार के सभी लोग आ चुके थे. इस पूरे मामले में पुलिस की भागदौड़, मृतकों के अंतिम संस्कार से ले कर रिश्तेदारों के ठहरने तक का सारा इंतजाम मृतक की साली यानी गुरप्रीत की मौसी के दामाद जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी ने किया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद सुखदेव सिंह और संतोष कौर की हत्या का मुकदमा अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज कर जगजीत सिंह ने इस मामले की जांच शुरू कर दी थी. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्होंने अंदाजा लगाया था कि हत्यारे का मकसद लूटपाट नहीं, सिर्फ हत्या करना था. कोठी में पुलिस को चाय के 3 खाली कप मिले थे, जिन्हें पुलिस सीएफएसएल जांच के लिए भेजा दिया था. वहां से आई रिपोर्ट के अनुसार, 2 कपों में नशीली दवा पाई गई थी. इस का मतलब हत्यारा जो भी था, वह मृतकों का परिचित था.

पुलिस ने जानपहचान वालों और रिश्तेदारों को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई. जगजीत सिंह ने एएसआई दविंदर सिंह और भूपिंदर सिंह के नेतृत्व में 2 अलगअलग टीमें बना कर इस मामले की जांच पर लगा दिया था. इस के साथसाथ मुखबिरों की भी मदद ली गई. जानपहचान वालों और रिश्तेदारों में किसी पर शक नहीं हो रहा था. सब काफी दुखी लग रहे थे. मृतका संतोष कौर की बहन की बेटी का पति जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी तो बिना कुछ खाएपिए दिनरात घर वालों की ही नहीं, पुलिस वालों की भी जांच में हर तरह से मदद कर रहा था. धीरेधीरे एक महीना गुजर गया. पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा. आखिर एक दिन जगजीत सिंह के एक मुखबिर ने उन्हें एक ऐसी खबर दी, जिस से उन्हें जांच को आगे बढ़ाने की राह मिल गई.

मुखबिर ने उन्हें बताया था कि सुखदेव सिंह की बहू किरणदीप कौर के अपने पति गुरप्रीत सिंह के मौसी के दामाद जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी के साथ अवैध संबंध थे. कहीं उन दोनों की हत्या इसी अवैध संबंध की वजह से तो नहीं हुई.

यह वही जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी था, जो दिनरात पुलिस के साथ हत्यारों की तलाश में जुटा था, ताकि सपने में भी कोई उस पर शक न कर सके. इस के बाद जगजीत सिंह ने सीधे उस पर और किरणदीप कौर पर हाथ न डाल कर पहले उन के मोबाइल नंबर ले कर दोनों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार, पिछले डेढ़ महीने में जसप्रीत सिंह और किरणदीप कौर के बीच लगातार काफी लंबीलंबी बातें हुई थीं. 26 मार्च, 2016 की दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे के बीच दोनों में न जाने कितनी बार बातें हुई थीं. ज्यादातर फोन किरणदीप कौर ने ही किए थे. जसप्रीत सिंह मिस्डकाल करता था तो आस्ट्रेलिया से किरणदीप कौर फोन करती थी.

इन बातों का पता चलने के बाद जगजीत सिंह ने हत्याकांड के बारे में बात करने के बहाने जसप्रीत सिंह को थाने बुला कर उस का फोन ले कर चेक करवाया तो इस दोहरे हत्याकांड का रहस्य उजागर हो गया. पता चला कि मृतकों की बहू किरणदीप कौर ने ही प्रेमी जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी से दोनों की हत्या करवाई थी.

जगजीत सिंह ने जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी को उसी समय हिरासत में ले लिया. वह भी समझ गया कि झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए बिना किसी हीलाहवाली के उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि किरणदीप कौर के कहने पर ही उस ने अपने दोस्तों वार्ड नंबर-6 टांडा निवासी अजय कुमार उर्फ बंटी तथा बुताला ब्यास निवासी मनिंदर सिंह के साथ मिल कर मौसा ससुर सुखदेव सिंह और मौसी सास संतोष कौर की हत्या गला दबा कर की थी.

इस के बाद जगजीत सिंह ने उसी दिन अजय कुमार, मनिंदर सिंह और किरणदीप कौर को गिरफ्तार कर लिया था. अगले दिन सभी को अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. करीबी लोगों की गिरफ्तारी से घर वाले ही नहीं, सब हैरान तो थे ही, गहरे सदमे में भी थे. खासकर गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी, जिस के मांबाप मारे गए थे तो उन की हत्या के आरोप में पत्नी गिरफ्तार हो गई थी.

अभियुक्तों से पूछताछ के बाद दिल दहला देने वाले इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह स्वार्थ और वासनापूर्ति में उलझी आज की आधुनिक और भटकी हुई युवा पीढ़ी की घिनौनी सोच का नतीजा थी.

गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी की मौसेरी बहन जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी को ब्याही थी, इसलिए वे जीजासाले लगते थे. लेकिन रिश्ते से ज्यादा दोनों के बीच दोस्ती थी. गुरप्रीत सिंह की शादी से सब से ज्यादा जसप्रीत ही खुश था. शादी के बाद गुरप्रीत और जसप्रीत अपनीअपनी पत्नियों को साथ ले कर पंजाब के अनेक पर्यटनस्थलों पर घूमने भी गए थे.

एक साथ घूमने की वजह से किरणदीप कौर और जसप्रीत सिंह एकदूसरे से काफी घुलमिल गए थे. पासपोर्ट और वीजा न होने की वजह से किरणदीप कौर यहीं रह गई थी, जबकि गुरप्रीत सिंह आस्ट्रेलिया चला गया था. जाते समय उस ने मौसेरी बहन मनप्रीत कौर और उस के पति जसप्रीत सिंह से किरणदीप कौर का हर तरह से ध्यान रखने को कहा था.

गुरप्रीत सिंह के आस्ट्रेलिया जाते समय उस के कहे अनुसार, उस की मौसेरी बहन मनप्रीत कौर तो कभी किरणदीप से मिलने नहीं आई, लेकिन उस का पति जसप्रीत सिंह हर दूसरेतीसरे दिन उस से मिलने उस के घर आया करता था. धीरेधीरे वह बिना नागा रोज आने लगा.

उन का हंसीमजाक का रिश्ता था, इसलिए जसप्रीत सिंह और किरणदीप कौर अलग कमरे में बैठ कर आपस में बातें ही नहीं करते थे, बल्कि खूब हंसीमजाक भी करते थे. जल्दी ही किरणदीप कौर उस के साथ बाजार भी जाने लगी. इसी सब का नतीजा था कि उन के बीच नजदीकियां इतनी बढ़ गईं कि उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

पहले तो सुखदेव सिंह और संतोष कौर ने इसे ननदोई और सलहज का रिश्ता मान कर नजरअंदाज किया और उन के हंसीमजाक पर कोई आपत्ति नहीं जताई. लेकिन जब बात बेशरमी की हद तक पहुंच गई तो उन्होंने बहू को समझाते हुए मर्यादा में रहने की बात कही, जो किरणदीप कौर को काफी नागवार लगी.

अब उसे न सासससुर का डर रह गया था और न शरम. उसे जो करना होता था, वह अपनी मरजी से करती थी. सासससुर के मना करने के बावजूद किरणदीप कौर का जसप्रीत के साथ न घर से बाहर जाना बंद हुआ और न उस का घर आना.

सुखदेव सिंह और संतोष कौर बहू की इन हरकतों से दुखी ही नहीं थे, बल्कि असमंजस में भी थे कि दोनों को कैसे समझाएं. न वे बहू को डांट सकते थे, न ही जसप्रीत को कुछ कह सकते थे. इस की वजह यह थी कि अगर वह दामाद को कुछ कहते तो बात खुलने पर बिरादरी में बदनामी हो सकती थी. इसलिए उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा.

संयोग से उसी बीच किरणदीप कौर की आस्ट्रेलिया जाने की सारी प्रक्रिया पूरी हो गई और वह वहां चली गई तो सुखदेव सिंह और संतोष कौर ने राहत की सांस ली. किरणदीप कौर आस्ट्रेलिया तो चली गई, लेकिन उसे अधिक दिनों तक न वहां की खूबसूरती और आकर्षण बांध सका और न पति का प्यार. जसप्रीत के प्यार में पागल किरणदीप कौर सासससुर की सेवा के बहाने पंजाब लौट आई.

पंजाब आ कर किरणदीप कौर पहले की ही तरह जसप्रीत सिंह से मिलनेजुलने लगी. आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद वह काफी आधुनिक भी हो गई थी. सुखदेव सिंह और संतोष कौर को अब बहू मुसीबत लगने लगी थी, लेकिन इस बार वह पहले की तरह चुप नहीं रहे. उन्होंने किरणदीप कौर को टोकना और समझाना शुरू कर दिया. उसे ही नहीं, जसप्रीत सिंह को भी समझाया.

इस के बाद जसप्रीत ने उन के घर आना बंद कर दिया. सासससुर की बातों से किरणदीप कौर और जसप्रीत सिंह समझ गए थे कि उन के अनैतिक संबंधों की बात अब छिपी नहीं रही. जसप्रीत ने घर आना बंद कर दिया था और किरणदीप कौर भी ज्यादा समय तक बाहर नहीं रह सकती थी. इसलिए सुखदेव सिंह और संतोष कौर दोनों को खटकने लगे. ऐसे में जब किरणदीप कौर ने कहा कि इस हालत में उसे गुरप्रीत के पास आस्ट्रेलिया चली जाना चाहिए तो जसप्रीत ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रही हो, तुम्हारे जाने के बाद मेरा क्या होगा?’’

‘‘तुम्हारा क्या होगा, मुझे पता नहीं, लेकिन जब तक घर में यह बूढ़ा और बुढि़या है, तब तक हम ठीक से मिल नहीं सकते.’’ किरणदीप कौर ने कहा.

‘‘तो फिर चलो कहीं भाग चलते हैं.’’ जसप्रीत ने कहा.

जसप्रीत की इस बात पर किरणदीप कौर ने हंसते हुए कहा, ‘‘भागने के लिए तुम्हारे पास पैसे भी हैं? कोई कामधाम तो करते नहीं, मुझे भगाने के सपने देख रहे हो? तुम्हारे कहने से मैं इतनी जमीनजायदाद, धनदौलत और विदेशी नागरिकता छोड़ दूंगी? कुछ ऐसा सोचो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

‘‘तो फिर दोनों को निपटा देते हैं. इतनी बड़ी कोठी में कौन उन्हें मार गया, किसी को कहां पता चलेगा?’’

‘‘ये हुई न पते की बात.’’ किरणदीप कौर ने कहा, ‘‘सुनो, मैं जैसा कहूं, तुम वैसा ही करो.’’

किरणदीप कौर ने सासससुर की हत्या की फूलप्रूफ योजना बना कर उस में जसप्रीत सिंह के दोस्तों अजय कुमार उर्फ बंटी और मनिंदर सिंह को भी शामिल कर लिया. जसप्रीत और उस के ये आवारा दोस्त कुछ करतेधरते तो थे नहीं, इसलिए तीनों पर काफी कर्ज हो गया था. किरणदीप कौर ने कहा था कि अगर वे उस के सासससुर की हत्या वाला काम कर देंगे तो वह तीनों का कर्ज तो चुकता करवा ही देगी, ऊपर से 5-5 लाख रुपए और भी देगी. यह काम कब और कैसे करना है, यह भी किरणदीप कौर ने जसप्रीत सिंह को समझा दिया था.

योजना के अनुसार, किरणदीप कौर ने गुरप्रीत सिंह से कह कर अपना और छोटी ननद संदीप कौर का आस्ट्रेलिया जाने का वीजा लगवा लिया और फरवरी, 2016 में वह संदीप कौर के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. जाते समय वह जसप्रीत को खर्च के लिए काफी रुपए दे गई थी.

गुरप्रीत सिंह जब से आस्ट्रेलिया गया था, तब से वह मांबाप को अपने पास आस्ट्रेलिया बुलाना चाहता था. किरणदीप कौर आस्ट्रेलिया पहुंची तो सब से पहले उस ने यही बताया कि अब वह अपने मांबाप को हमेशा के लिए आस्ट्रेलिया बुला सकता है, क्योंकि उन के यहां आने की सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. वह इसी हफ्ते उन के टिकट भेजने जा रहा है.

यह सुन कर किरणदीप कौर बेचैन हो उठी. उसे लगा कि अगर वे दोनों आस्ट्रेलिया आ गए तो फिर न उन की हत्या हो सकती है और न ही वह कभी जसप्रीत के पास पंजाब जा सकती है. दोनों फोन द्वारा संपर्क में तो थे ही, गुरप्रीत टिकट भेजे उस के पहले ही किरणदीप कौर ने उन्हें खत्म करने को कह दिया.

26 मार्च, 2016 की दोपहर 3 बजे जसप्रीत सिंह अपने दोस्तों मनिंदर सिंह और अजय कुमार को कोठी के बाहर कुछ दूरी पर खड़ा कर के अकेला ही कोठी के अंदर चला गया. जसप्रीत सुखदेव सिंह और संतोष कौर को नमस्कार कर के उन के पास बैठ कर हालचाल पूछने लगा. उस ने चाय पीने की इच्छा व्यक्त की. संतोष कौर चाय बनाने के लिए जाने लगीं तो उस ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘मौसीजी, आप आराम करें. मैं खुद ही चाय बना लाता हूं.’’

इस के बाद रसोई में जा कर उस ने 3 कप चाय बनाई और 2 कपों में नशे की दवा मिला दी, जिसे पीते ही सुखदेव सिंह और संतोष कौर बेहोश हो गए. इस के बाद उस ने फोन कर के बाहर खड़े मनिंदर सिंह एवं अजय को अंदर बुला लिया और उन की मदद से दोनों की गला घोंट कर हत्या कर दी. इस के बाद उन्होंने उन के मुंह पर तकिया रख कर भी दबाए रखा. जब उन्हें विश्वास हो गया कि दोनों मर गए हैं तो जसप्रीत संतोष कौर के हाथों की सोने की चूडि़यां, कानों की बालियां और अंगूठियां खर्च के लिए घर में रखे 17 हजार रुपए ले कर दोस्तों के साथ चला गया. जाने से पहले उस ने कोठी से ही किरणदीप कौर को हत्या की जानकारी फोन द्वारा दे दी थी. यही नहीं, फोटो भी खींच कर वाट्सऐप द्वारा भेज दिया था. पालतू कुत्ते को उस ने उस के कमरे में बंद कर दिया था.

पूछताछ के बाद जगजीत सिंह ने जसप्रीत सिंह, अजय कुमार और मनिंदर की निशानदेही पर संतोष कौर के गहने और 2 हजार रुपए बरामद कर लिए थे. शेष रुपए उन्होंने खर्च कर दिए थे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 30 अप्रैल, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के 2 दिनों के और रिमांड पर लिया गया. इस दौरान अन्य सबूत जुटा कर 1 मई को फिर से उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जिला जेल भेज दिया गया. मामले की जांच कर के जगजीत सिंह ने चार्जशीट अदालत में पेश कर दी गई है. मुकदमा अभी विचाराधीन है.     

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शराबबंदी के बाद अब दहेजबंदी

‘‘अगर आपको पता चले कि आप जिस विवाह समारोह में जा रहे हैं, वहां दहेज लिया गया है तो वैसे  विवाह में कतई नहीं जाएं. अगर किसी मजबूरी की वजह से वहां जाना पड़े तो जाएं लेकिन वहां खाना नहीं खाएं.’’ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल हर सभाओं में यह बात जरूर कहते हैं. बिहार में शराबबंदी को खासी कामयाबी मिलने के बाद उन्होंने दहेजबंदी की पहल शुरू की है. दहेज के साथ ही बाल विवाह के खिलाफ भी उन्होंने मोर्चा खोल दिया है. नीतीश कहते हैं कि दहेज को रोकने की बात को ज्यादातार लोग नामुमकिन करार दे रहे हैं पर ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि शराब पर पाबंदी लगाने के बाद भी ऐसी ही दलीलें दी जा रही थी. अब यह हालत है कि बिहार में शराबबंदी को कामयाबी मिलने के बाद दूसरे राज्यों में भी शराब पर रोक लगाने की आवाजें बुलंद होने लगी हैं.

बिहार कमजोर वर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016-17 में 987 बेटियां दहेज के नाम पर मार दी गई. साल 2015 में 1154 बेटियों की जान दहेज की वजह से चली गई. महिला हेल्प लाइन में हर साल दहेज प्रताड़ना के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. 2015 में जहां 93 मामले दर्ज हुए थे वह 2016 में बढ़कर 111 हो गए. इसके अलाव साल 2016 में राज्य के अलग अलग थानों में दहेज उत्पीड़न के कुल 4852 मामले दर्ज किए गए थे. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरों के आंकड़े बताते हैं कि हरेक घंटे दहेज के नाम पर एक लड़की को मार दिया जाता है. कमजोर वर्ग के एडीजी विनय कुमार ने बताया कि दहेज प्रताड़ना में कानून किसी को बख्श नहीं रहा है, इसके बाद भी ऐसे मामलों में कमी नहीं आ रही है.

दहेज किस कदर परिवार को बर्बाद कर रहा है और बेटियों की जान ले रहा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साल 2016 में राज्य में जहां छेड़खानी के 342 मामले थानों में दर्ज हुए, वहीं दहेज की लालच में 987 बेटियों की जान ले ली गई. समाजसेवी आलोक कुमार दावा करते हैं कि सामाजिक जागरूकता के जरिए दहेज को कापफी हद तक कम किया जा सकता है. इसमें अगर सरकार गंभीरता से साथ दे तो शराबबंदी की तरह दहेजबंदी को भी कामयाबी मिली तय है.

शराबबंदी का ही असर है कि बिहार के सिवान के महादेव सहायक थाना के बंगाली पकड़ी इलाके में रहने वाली लाडो देवी ने अपने शराबी पति को जेल भिजवा दिया. लाडो का पति विकास राजभर रोज शराब पीकर घर आता था और उसके साथ मारपीट करता था. लाडो उसे रोज समझाती कि शराब छोड़ दे पर विकास कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं था. लाडो ने उसे शराबबंदी कानून का डर भी दिखाया, पर विकास उसकी बातों की खिल्ली उड़ाता रहता था. आजीज आकर लाडो ने थाने में अपने पति के खिलापफ एफआईआर दर्ज करा दिया. उसके बाद थाना इंचार्ज शंभूनाथ सिन्हा दलबल के साथ विकास के घर पहुंचे और उसे नशे की हालत में गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष अंजुम आरा बताती है कि शराबी पति की पिटाई और प्रताड़ना से तंग औरतों की रोज 3-4 शिकायतें आयोग को मिलती थी पर शराबबंदी के 8 महीने के गुजरने के बाद ऐसा एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है. इससे साफ हो जाता है कि शराब पर पाबंदी लगने से सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को ही मिला है. मर्द शराब पीते हैं और उसका खामियाजा महिलाओं और बच्चों समेत समूचे परिवार को उठाना पड़ता है. एक अप्रैल से राज्य में पूरी तरह से शराब के बनाने, बेचने, खरीदने और पीने पर रोक लगी हुई है. जिसके बेहतर नतीजे सामने आने लगे हैं. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं पर होने वाली 80 फीसदी हिंसक वारदातें नशे की हालत में ही होती हैं.

दहेज पर रोक लगाने के लिए बिहार सरकार ने बिहार राज्य दहेज निषेध नियमावली 1998 में दहेज निषेध अपफसर की तैनाती की बात कही है. आज तक ऐसे अफसरों की तैनाती की ही नहीं गई. दहेज निषेध अफसरों को दहेज लेने-देने वालों के खिलाफ कानूनन कारवाई करने के साथ-साथ सामाजिक जागरुकता फैलाने की जिम्मेवारी सौंपी गई है. आज तक दहेज निषेध अफसरों को फाइलों से बाहर ही नहीं निकाला गया. अब सरकार ने दहेज पर रोक लगाने के लिए कमर कसी है तो उम्मीद है कि दहेज के लिए बेटियों की जिंदगी दांव पर लगाने वालों को सबक सिखाया जा सकेगा.

विनोद खन्ना के निधन से गमगीन फिल्म उद्योग

बौलीवुड के दिग्गज अभिनेता, फिल्म निर्माता और पूर्व सांसद विनोद खन्ना का सत्तर वर्ष की उम्र में आज सुबह 11 बजकर चालिस मिनट पर निधन हो गया. विनोद खन्ना के निधन की खबर फैलते ही बौलीवुड के साथ-साथ पूरे भारतीय फिल्म उद्योग में शोक की लहर दौड़ गयी और हर काम ठप्प सा हो गया.

शोक में डूबे संपूर्ण हिंदी सिनेमा जगत के लगभग सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं. विनोद खन्ना को श्रृद्धांजली देने के लिए आज रात मुंबई में होने वाला फिल्म ‘‘बाहुबली 2’’ का प्रीमियर भी रद्द कर दिया गया है.

इस बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘‘बाहुबली 2’’ का प्रीमियर आज मुंबई स्थित, अंधेरी के पीवीआर मल्टीप्लैक्स, ‘‘पीवीआर ईसीटी’’ में रात नौ बजे आयोजित किया जाना था. इस फिल्म से जुड़े सभी कलाकार, टैकनीशियन्स, निर्माता, निर्देशक भी हैदराबाद से मुंबई पहुंच चुके हैं, मगर फिल्म के वितरक अनिल थडानी, फिल्म के सहनिर्माता करण जोहर व निर्देशक एस एस राजामौली ने मिलकर विनोद खन्ना के निधन के बाद उन्हे श्रृद्धांजली देने के लिए फिल्म अपनी ‘‘बाहुबली 2’’ के प्रीमियर शो को रद्द करने का निर्णय लिया है.

ज्ञातब्य है कि फिल्म ‘‘बाहुबली 2’’ के  प्रीमियर शो के लिए मीडिया के साथ साथ पूरा बौलीवुड आमंत्रित था. निर्माताओं की तरफ से इसके लिए खास इंतजाम भी किए गए थे. यहां एक बड़ा जश्न होना था, मगर बॉलावुड के अपने एक साथी के चले जाने के गम में ‘‘बाहुबली 2’’ का प्रीमियर रद्द कर अनिल थडानी, करण जोहर व एस एस राजामौली ने स्वागत करने योग्य कदम उठाया है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें