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आज से लागू हुआ रियल एस्टेट कानून ‘तय समय पर मिलेगा फ्लैट’

अगर आप घर खरीदने का मन बना रहे हैं, लेकिन बिल्डरों द्वारा प्रोजेक्ट लेट किए जाने की आशंका से डरे हुए हैं तो आपके लिए राहत की खबर है. एक मई से बहुप्रतीक्षित रियल एस्टेट एक्ट (RERA) यानी रेरा लागू हो रहा है. बिल्डरों की मनमानी से निजात दिलाने और बॉयर्स को शोषण से बचाने का ये क्रांतिकारी कानून पिछले साल मार्च में संसद में पास हुआ था और सोमवार यानी एक मई से ये लागू हो गया है. कानून लागू होने के बाद बिल्डर किसी भी हालत में खरीददार से धोखाधड़ी नहीं कर सकेगा. नियम तोड़ने पर बिल्डर को तीन साल तक की जेल हो सकती है.

नए प्रावधानों के अनुसार सभी बिल्डरों को जुलाई आखिर तक पहले से चल रहे और नए आवासीय प्रोजेक्ट को रीयल एस्टेट अथॉरिटी में पंजीकरण कराना होगा. वहीं, हर प्रोजेक्ट का अथॉरिटी से सेक्शन प्लान और लेआउट प्लान अपनी वेबसाइट के साथ सभी कार्यालयों की साइट्स पर छह वर्ग फीट के बोर्ड पर लगाना होगा.

खरीदारों को होगा ये फायदा

रेरा से डेवलेपरों को बहुत फायदा होगा जैसे-डेवलेपरों के वो सभी प्रोजेक्ट जो अभी अंडर कंस्ट्रक्शन हैं या जिन्हें कंपलीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला है या फिर जो नए प्रोजेक्ट लांच होने वाले हैं उन सबको तीन महीने के अंदर नियामक प्राधिकरण में रजिस्टर्ड कराना होगा. राज्यों के लिए ये जरूरी है कि वे इसके तहत प्राधिकरण गठित करें. सभी रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट का पूर्ण विवरण प्राधिकरण के पास होगा, जिसमें प्रमोटर, परियोजना, ले-आउट, योजना, भूमि की स्थिति, समझौते, रियल एस्‍टेट एजेंट, ठेकेदार, इंजीनियरों आदि के बारे में विस्‍तृत जानकारी होगी. प्रोजेक्ट कब पूरा होगा इसकी तारीख भी देनी होगी.

धांधली करने पर हो सकती है जेल

घर खरीदारों की सबसे बड़ी शिकायत यही रहती है कि उनसे जिन सुविधाओं की बात बिल्डर ने की थी वह नहीं मिली. प्रोजेक्ट का लेआउट व अन्य चीजें बीच में बिना उनकी सहमति से बदल दी जाती हैं लेकिन रेरा के तहत अगर बिल्‍डर प्रोजेक्‍ट के ब्रौशर और विज्ञापन में किए गए वादे पूरा नहीं करता तो उसे 3 से 5 साल तक की जेल हो सकती है. बिल्‍डर अगर कोई अन्य धांधली करता है जिससे पांच साल के भीतर उसपर कोई जुर्माना लगाया जाता है तो उसका वहन बिल्डर को ही करना होगा न कि खरीदारों को.

13 राज्यों में रेरा को हरी झंडी

रेरा की सभी 92 धाराएं एक मई से प्रभावी हो जाएंगी. हालांकि केवल 13 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों ने ही अबतक इसके नियम अधिसूचित किए हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, चंडीगढ़, दादर और नागर हवेली, दमनदीव, लक्षद्वीप आदि ने नियम अधिसूचित किए हैं.

भारत का रियल एस्टेट मार्केट

भारत में रियल एस्टेट कारोबार की बात करें तो देश में 76 हजार रियल एस्टेट कंपनियां हैं. हर साल 10 लाख लोग मकान खरीदते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, 2011-15 में हर साल 2,349 से 4,488 प्रॉजेक्ट लॉन्च हुए और 2011-15 में 13.70 लाख करोड़ का निवेश हुआ. वहीं, 2011-15 में 27 शहरों में 17,526 प्रॉजेक्ट लॉन्च किए गए.

ये हैं इस एक्ट की खास बातें :

– तीन महीने के भीतर नए और पुराने का अथारिटी में पंजीकरण होगा.

– तयशुदा नियमों के अनुसार प्रोजेक्ट पर होगा काम, खरीददार और बिल्डर के बीच गलतफहमी नहीं होगी.

– नया प्रोजेक्ट शुरू करते वक्त खरीददारों से इकट्ठा की गई राशि का 70 फीसदी अलग बैंक अकाउंट में रखना होगा. वहीं, पुराने प्रोजेक्ट की बची राशि के 70 फीसदी का कोष बनेगा.

– पांच साल तक फ्लैट के रख-रखाव का जिम्मा डेवलपर के पास होगा.

– रेगुलरिटी अथॉरिटी या अपीलीय प्राधिकरण को आदेश का उल्लंघन करने पर डेवलपर को तीन साल और एजेंट या खरीददार को एक साल जेल की सजा हो सकती है.

– बिल्डर व खरीददार की ब्याज दर पर किसी भी हालत में देरी होने पर 2 फीसदी अतिरिक्त देना होगा.

‘खेल गांव’, जहां हर घर में बसता है खिलाड़ी

आज खेल का प्रभुत्व बढता जा रहा है और इसका उदहारण है छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा गांव है, जहां हर घर में एक खिलाड़ी रहता है. डिस्‍ट्रिक्‍ट हेडक्‍वॉर्टर से महज 12 किलोमीटर दूर पुरई नाम का यह गांव ‘खेल गांव’ के रूप में मशहूर है.

इस गांव के खिलाड़ियों ने जिला,  प्रदेश और देश में गांव का नाम रोशन किया है. गांव का एक खिलाड़ी तो इंटरनेशनल खो-खो मैच में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुका है.

'हमर छत्तीसगढ़' योजना के तहत रायपुर आए सरपंच सुखित यादव बताते हैं कि गांव के हर घर में अमूमन एक खिलाड़ी है. खेलों की बदौलत यहां के करीब 40 युवा पुलिस, सेना और व्यायाम शिक्षक की नौकरियों में हैं. खिलाड़ियों को बेहतर सुविधा मुहैया कराने और उनका हुनर निखारने यहां ग्राम समग्र विकास योजना के तहत 31 लाख रुपए की लागत से मिनी स्टेडियम बनाया गया है.

आगे उन्होंने कहा कि गांव में खुला मैदान तो था, लेकिन अभ्यास के दौरान वहां आने-जाने वालों की वजह से असुविधा होती थी और खेल में व्यवधान भी पड़ता था. मिनी स्टेडियम बन जाने से खिलाड़ी अब अपना पूरा ध्यान खेल पर लगा सकेंगे.

इसके बन जाने से गांव के बच्चों और युवाओं की एक बहुप्रतीक्षित मांग पूरी हो गई है. करीब चार एकड़ क्षेत्र में फैले इस स्टेडियम में अब अनेक खेल आयोजनों के साथ ही गांव के खिलाड़ी बिना किसी व्यवधान के अभ्यास कर सकेंगे.

पुरई के सरपंच यादव बताते हैं कि खेलों के कारण गांव में लोग स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर बहुत जागरूक हैं. यहां स्वच्छ भारत मिशन को भी खासी सफलता मिली है. जबकि खेलों के प्रति एक अलग ही लगाव यहां देखा जाता है.

आपके स्मार्टफोन की ‘लाइफलाइन’

आजकल पावर बैंक स्मार्टफोन की सबसे बड़ी जरुरत है. स्मार्टफोन के समय में बैटरी यूजर्स के बीच सबसे बड़ी समस्या है. मल्टी टास्टिंग होने के कारण स्मार्टफोन्स की बैटरी जल्दी खत्म होती है. ज्यादातर स्मार्टफोन यूजर्स जब घर से बाहर निकलते हैं तो उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि फोन की बैटरी कितनी देर तक उनका साथ देगी.

इस परेशानी का समाधान पोर्टेबल पावरबैंक ही दे सकता है. आज हम आपको ऐसे पावरबैंक के बारे में बता रहे हैं जो कम कीमत में आपके स्मार्टफोन की ‘लाइफलाइन’ बन सकते हैं.

शाओमी Mi पावर बैंक : शाओमी के कई रेंज में बाजार में पावर बैंक उपलब्ध है. शाओमी Mi 10400mAh पावरबैंक 999 रुपये में उपलब्ध है वहीं शाओमी का 5000mAh वाला पावरबैंक 699 रुपये में उपलब्ध है.

वनप्लस 10,000mAh पावर बैंक : वनप्लस का ये पावर बैंक हल्का और सबसे बेहतर डिजाइन वाला पावर बैंक है. 10,000 mAh की लीथियम पॉलिमर बैटरी वाला ये पावर बैंक 5.5 घंटे में फुल चार्ज होता है. इसकी कीमत 1,799 रुपये है.

आसुस जेनपावर 10,050 mAh : सिंगल यूएसबी पोर्ट के साथ ये पावर बैंक 5V का इनपुट लेता है और 5.1V का आउटपुट देता है. इसकी कीमत 1679 रुपये है.

हुआवे ऑनर 13,000 mAh : इसमें दो यूएसबी पोर्ट दिया गया है. एल्यूमिनियम बॉडी वाले इस पावर बैंक को काफी कॉम्पैक्ट डिजाइन दिया गया है. इसकी कीमत 1699 रुपये है.

इंटेक्स 11000mAh पावर बैंक : इस पावर बैंक में तीन यूएसबी स्लॉट दिए गए हैं. साथ ही पावर इंडिकेटर के लिए एलईडी लाइट दी गई है. पावर बैंक की कीमत 929 रुपये है.

..इसलिए बदला गया पासपोर्ट नियम

पासपोर्ट बनवाने में एवरेस्ट चढ़ने से भी ज्यादा दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है. कोशिश करने पर लोग एक दफा एवरेस्ट तो फतह कर सकते हैं पर पासपोर्ट बन जाएगा इसकी कोई  गारंटी नहीं. देश भर के पासपोर्ट दफ्तरों के बाहर आवेदक रोनी सूरत लिए पासपोर्ट बनवाने लाइन लगाए खड़े रहते हैं लेकिन यह एक दो बार में नहीं बनता कई बार तो दर्जनों चक्कर उन्हें लगाना पड़ते हैं.

दरअसल में पासपोर्ट हासिल करने में इतनी कागजी कारवाइयां आवेदकों को करनी होती हैं और तरह तरह के दस्तावेज नत्थी करना पड़ते हैं कि वे पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया से तंग आकर उसका खयाल तक छोड़ने लगते हैं. ऐसी कठिन घड़ी में पासपोर्ट कार्यालयों के बाहर घूमते दलाल वाजिब दक्षिणा लेकर उनका काम करवा देते हैं जिनके अंतरंग सम्बन्ध कमीशन पर मुलाजिमों से होते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों का यह दर्द समझते हुए नियमों में कुछ रियायतें दी हैं. इंडियन मर्चेन्ट चेम्बर्स की महिला विंग के गोल्डन जुबली समारोह में मोदी ने दरियादिली दिखाते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये घोषणा की कि अब पासपोर्ट के लिए शादी या तलाक के दस्तावेज नहीं दिखाने होंगे, यह महिलाओं का अधिकार है कि वे पासपोर्ट पर माता पिता का नाम इस्तेमाल करें.

हालांकि इसके पहले 8 फरवरी को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में बता चुकीं थीं कि अब बिना शादी के पैदा हुये, अनाथ या गोद लिए बच्चों की सहूलियत के मद्देनजर नियमों मे ढील दी जा रही है पर इस बात पर उन्होंने खासा जोर दिया था कि अलग रह रहे लोगों को पासपोर्ट के लिए पति या पत्नी का नाम या तलाक का प्रमाणपत्र पेश करने की जरूरत नहीं है.

नरेंद्र मोदी ने जब यह बात दोहराई तो जिन हजारों परित्यक्ता और तलाकशुदा महिलाओं ने राहत की सांस ली तो उनमें से एक उनकी पत्नी जसोदा बेन भी हैं. गौरतलब है कि जसोदाबेन ने पिछले साल अपना पासपोर्ट बनवाने अहमदाबाद के पासपोर्ट दफ्तर मे दरखास्त दी थी जिसे क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी जेड ए खान ने इस बिना पर खारिज कर दिया था कि चूंकि जसोदाबेन ने अपनी शादी का कोई प्रमाण पत्र या ऐसा कोई संयुक्त शपथ पत्र पेश नहीं किया है जिससे यह साबित होता हो कि उनकी शादी नरेंद्र मोदी से हुई है इसलिए उन्हें पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता. विदेश जाकर अपने रिश्तेदारों से मिलने की इच्छुक जसोदाबेन का इस आपत्ति पर  तिलमिलाना लाजिमी था इसलिए उन्होंने आर टी आई के जरिये आवेदन कर यह जानकारी मांग डाली कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते अपना पासपोर्ट बनवाने नरेंद्र मोदी ने शादी से ताल्लुक रखते अगर कोई दस्तावेज जमा किए हों तो उनकी प्रति उन्हें मुहैया कराई जाये साथ ही मोदी के पासपोर्ट की एक प्रति भी उन्हें उपलब्ध कराई जाये.

इस काम में उनके भाई अशोक मोदी ने अपनी बहिन की मदद के लिए के लिए काफी भागादौड़ी की थी. इस सटीक जबाबी हमले का असर यह हुआ कि अहमदाबाद से लेकर दिल्ली तक के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया क्योंकि मामला प्रधानमंत्री की कथित निजता से जुड़ा हुआ था. जसोदाबेन चाहतीं तो पति को अदालत में भी इस बाबत घसीट सकतीं थीं क्योंकि अपने चुनावी हलफनामे में मोदी ने उन्हें पत्नी माना था. नए नियम कोई रियायत नहीं बल्कि अपना पिंड छुड़ाने बनाए गए हैं जिनके तहत अब अनिवार्य नहीं कि जसोदाबेन पासपोर्ट आवेदन में शादी और पति के नाम का उल्लेख करें. अब वे माता पिता का नाम उपयोग कर पासपोर्ट हासिल कर सकती हैं.

अब इसे दरियादिली कहा और माना जाये या फिर मजबूरी कि मोदी ने पत्नी की परेशानी भी दूर कर दी है और खुद की भी कर ली है. यानि लोग बेवजह नरेंद्र मोदी के दिमाग और बुद्धि की तारीफ नहीं करते जिन्होंने अपने इस उलझे मामले में सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाली कहावत को चरितार्थ कर दिखाया और किसी को उनकी असल मंशा भी समझ नहीं आई.

‘दादासाहब फाल्के’ के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें

हम भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहब फाल्के की बात कर रहे हैं. वही दादासाहब फाल्के, जिन्होंने पहली भारतीय फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई थी. आज हम दादासाहब फाल्के के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी ही बातें लेकर आये हैं, जिनसे शायद आप अब तक अंजान हैं.

जिस समय भारत अंग्रेजों के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस समय एक व्यक्ति भारत का एक नया अध्याय लिख रहा था. इस अध्याय को लिखते समय उसके साथियों ने उसका मज़ाक उड़ाया और समाज ने उसे पागल करार दिया, पर बिना किसी की भी परवाह किये बिना वे अपने आप में लगे रहे और उन्होंने भारत के उस सुनहरे भविष्य की नींव रखी, जिस पर आज भारतीय सिनेमा टिका हुआ है.

कल दादासाहब फाल्के यानि कि भारतीय सिनेमा के पिता का जन्मदिन था. जानिए उनके जीवन से जुड़ी वो बातें, जो उन्हें वाकई में सिनेमा का जनक बनाती हैं.

कौन थे दादा साहब फाल्के

दादासाहब फाल्के का जन्म एक देशस्थ ब्राह्मण मराठी परिवार में 30 अप्रैल 1870 में नासिक के त्र्यम्बकेश्वर में हुआ था. क्या आप जानते हैं अपने कॉलेज के शुरुआती दौर में दादासाहब ने मूर्तिकला, पेंटिंग और फोटोग्राफी पर हाथ आजमाये. एक फोटोग्राफर के रूप में ही उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने खुद का प्रिंटिंग प्रेस खोला और उन्हें राजा रवि वर्मा के साथ काम करने का मौका मिला.

हिन्दी सिनेमा का नया अध्याय

फाल्के के जीवन में फिल्म निर्माण से जुड़ा रचनात्मक मोड़ फिल्म 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखने के बाद आया. इसी से उन्हें फिल्म निर्माण की प्रेरणा मिली अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने से पहले दादासाहब ने फिल्मों का गहन अध्ययन किया और 5 पाउंड में कैमरा खरीद कर उस पर 20 घंटे से ज्यादा समय तक अभ्यास किया.

जिस समय उन पर फिल्म बनाने का जुनून सवार था, उन दिनों वे आर्थिक तंगियों से गुजर रहे थे. इस कठिन समय में उनकी पत्नी सरस्वती बाई ने उनका साथ दिया और तमाम सामाजिक तानों के बावजूद अपने पति के साथ खड़ी रहीं. साल 1912 में फिल्म निर्माण का काम सीखने के लिए दादासाहब विदेश भी गए और वहां फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं.

भारत लौटकर उन्होंने अपनी पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चन्द्र का निर्माण कर देश को एक नया सपना दिया. उस ख्वाब को हम आज बॉलीवुड के नाम से जानते हैं.

ये बात आप में से बहुत कम लोग जानते होंगे कि साल 1913 में जब फिल्म बनाने की बारी आई, तो उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे फिल्म को कागज पर भी उतार पाते. ऐसे कठिन समय में उन्हें फिर अपनी पत्नी का साथ मिला. दादासाहब की कोशिशों से ही 1913 में पहली भारतीय मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बन कर तैयार हुई. 21 अप्रैल 1913 को ये फिल्म दिखाई गई. इस फिल्म के लेखन से ले कर फोटोग्राफी और सम्पादन का काम खुद दादासाहब ने किया.

अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में कुल 95 फिल्में और 26 लघु फिल्में बनाई. साल 1937 में उन्होंने फिल्मों से सन्यास ले लिया. इस दौरान उन्होंने अंतिम फिल्म 'गंगावतरण' बनाई. भारतीय फिल्म का अध्याय लिखने वाले दादासाहेब फाल्के 74 वर्ष की उम्र में 16 फरवरी 1944 को अपनी कहानियां हमारे बीच छोड़ गए और इस जगत को अलविदा कहा.

उनके नाम पर भारत सरकार ने 1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा की.

अवार्ड से जुड़ी खास बातें-

1. दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का पिता कहा जाता है और उनके नाम पर ही अवॉर्ड की शुरुआत साल 1969 में हुई थी.

2. इस सम्मान के तहत सम्मानित होने वाले व्यक्ति को एक स्वर्ण कमल मेडल और रुपये दिए जाते हैं.

3. सबसे पहला दादा साहेब फाल्के सम्मान देविका रानी को दिया गया था.

4. इसके बाद पृथ्वीराज कपूर, सुलोचना, दुर्गा खोटे, नौशाद, अशोक कुमार, सत्यजीत रे, वी शांताराम, लता मंगेशकर, भूपेन हजारिका, दिलीप कुमार, मजरूह सुल्तानपुरी, कवि प्रदीप, बीआर चोपड़ा, ऋषिकेश मुखर्जी, आशा भोसले, यश चोपड़ा, देव आनंद, श्याम बेनेगल, मन्ना डे समेत समेत कई हस्तियों को इस सम्मान से नवाजा गया.

अपने यादगार फिल्मी सफर के तकरीबन 25 वर्षो में उन्होंने 'राजा हरिश्चंद्र' के अलावा सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्रीकृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), कंस वध (1920), शकुंतला (1920), संत तुकाराम (1921), और भक्त गोरा (1923) सहित कई सराहनीय और यादगार फिल्में बनाईं.

..तो इन्होंने विराट को फर्श से अर्श तक पहुंचाया

टीम इंडिया के कप्तान कोहली को विराट बनाने के पीछे उनकी फिटनेस का बहुत बड़ा हाथ है. विराट रोजाना एक्सरसाइज करते हैं और अपने खान-पान का खासा ध्यान देते हैं. आरसीबी के स्ट्रेंथ और कंडिशनिंग कोच शंकर बासू के साथ खास इंटरव्यू में विराट कोहली ने अपनी डाइट और मनपसंद एक्सरसाइज का खुलासा किया है. विराट ने बताया कि कैसे फिटनेस ने उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया.

विराट ने अपनी ट्रेनिंग पर खुलासा किया कि ‘साधारण ट्रेनिंग और पेशेवर ट्रेनिंग में खासा अंतर होता है. एक एथलीट को एथलीट की तरह ही ट्रेनिंग करनी चाहिए. अगर आपको क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट खेलने हैं तो आपका शरीर उस लायक होना चाहिए, इसीलिए मैं कड़ी ट्रेनिंग करता हूं. फिटनेस ने मेरे खेल को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है. मुझे लगता है मैं मैदान पर कुछ भी कर सकता हूं, मैं बहुत ताकतवर महसूस करता हूं.’

आपको बता दें शंकर बासू ही वो शख्स हैं जिन्होंने विराट को फिट से सुपरफिट बनाया है. शंकर बासू आरसीबी के फिटनेस और कंडिशनिंग कोच हैं. विराट ने इंटरव्यू के दौरान अपनी फेवरेट एक्सरसाइज भी बताई, विराट ने कहा कि जिम में उनकी फेवरेट एक्सरसाइज पावर स्नैच है.

विराट बताते हैंं कि "पावर स्नैच से शरीर का हर हिस्सा मजबूत होता है. खासकर शरीर का पिछला हिस्सा. पावर स्नैच से आपकी गर्दन, कंधे, पैर खासे मजबूत होते हैं. पावर स्नैच से आपकी लोअर बैक मजबूत होती है. ये जिम में सबसे अच्छी और सबसे मुश्किल एक्सरसाइज है. अगर मुझे जिम में कोई एक एक्सरसाइज करने को कहे तो मैं पावर स्नैच के 3 सेट करूंगा."

वेज कबाब की बढती मांग

उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा मीट पर लगे प्रतिबंध के बाद होटलों में शाकाहारी कबाब की मांग बढती जा रही है. ऐसे में वेज कबाब को लेकर प्रचार प्रसार भी तेज हो गया है. बेज कबाब के बनाने में सोया बड़ी का सबसे बड़ा योगदान होता है.

ऐसे में लखनऊ की मशहूर शेफ पंकज भदौरिया ने न्यूट्रीला कबाब फेस्टिवल का आयोजन अपने हजरतगंज स्थित पंकज भदौरिया कलनरी एकेडमी में किया. इसमें पंकज भदौरिया ने न्यूट्रीला से तैयार सोया बोटी कबाब, सोया शामी कबाब और सोया सीक कबाब को बना कर दिखाया.

शाकाहारी लोगों को सबसे अधिक प्रोटीन सोया के द्वारा ही मिलता है. ऐसे में वह अपने खाने में सोया को ज्यादा से ज्यादा मात्रा में शामिल कर शरीर को मजबूत कर सकते हैं.

पंकज भदौरिया जानी मानी शेफ हैं. वह कहती हैं सोया के द्वारा शरीर को सबसे अधिक प्रोटीन मिलता है. जब हम वेज कबाब की बात करते हैं तो सोया को उपयोग बेहद जरूरी हो जाता है. इसके जरीये हम वेज अवधी कबाब को तैयार कर लेते हैं. यह शरीर को मजबूती भी देने का काम करता है. सोया प्रोटीन को एनिमल प्रोटीन के विकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाता है. सोया प्रोटीन सेचुरेटेड फैटस और कैलोस्ट्राल का भी विकल्प है. यह सबसे अच्छा शाकाहारी प्रोटीन होता है.

रूचि सोया के सीओओ सत्येन्द्र अग्रवाल ने कहा सोया को अलग अलग रूप में पेश करने का काम हमने किया है. जिससे किसी भी तरह के व्यंजन के रूप में इसका प्रयोग आसानी से किया जा सके और लोग इसका सेवन कर सके. लखनऊ कबाब के लिये मशहूर है. ऐसे में न्यूट्रीला सोया के प्रयोग यहा के कबाब बना कर दिखाये गये.

वेज कबाब का स्वाद ले रहे लोगों ने बताया कि कबाब के शौकीन लोग अब वेज कबाब को खा कर आनंद लेंगे. मीट को लेकर जिस तरह से बातें सामने आ रही है उससे तो यही लगता है कि मीट कबाब की जगह पर सोया से तैयार वेज कबाब का ही मजा लिया जा सके.

कैसे बदलें अपने गूगल सर्च पेज का बैकग्राउंड?

आप हर रोज कम्प्यूटर पर काम करते हैं और गूगल में सर्च करते समय रोज रोज एक ही जैसा बैकग्राउंड देखने में बोरियत होने लगती है इसलिए अगर आप चाहें तो अपने गूगल क्रोम के बैकग्राउंड को बदल सकते हैं.

ये उतना ही आसान है जितना कि आपके कम्प्यूटर डैस्कटोप का वॉलपेपर या बैकग्राउण्ड इमेज बदलना. गूगल क्रोम बैकग्राउंड को बदलने के लिए सबसे पहले…

गूगल क्रोम के टूल ऑप्‍शन में जाएं और एक्‍सटेंशन ऑपशन पर क्लिक करें, क्रोम एक्‍टेंशन में जाकर सेटिंग ऑप्‍शन चूज करें.

सेटिंग ऑप्‍शन में जाकर यहां सेटिंग पेज में आपके सामने, आपको दो ऑप्‍शन मिलेंगे

1. पहला अगर आप अपने डेस्‍कटॉप से कोई फोटो बैकग्राउंड में लगाना चाहते है तो उसे अपलोड कर दें

2. या फिर फिर गूगल सर्च की मदद से अपनी पसंद की फोटो सर्च करके सलेक्‍ट कर लें.

फोटो सलेक्‍ट करने के बाद आप चाहें तो इमेज की पोजीशन भी बदल सकते हैं जैसे उसे सेंटर में रखेंगे या फिर साइड में, सारी सेटिंग करने के बाद थीम को सेव कर दें.

जीनत अमान बनीं गायिका

भेड़चल के लिए मशहूर बॉलीवुड में इन दिनों हर कलाकार अभिनय के साथ साथ संगीत के क्षेत्र में भी कदम रख रहा है. जिसे देखो वही गायक बन रहा है. प्रियंका चोपड़ा, श्रद्धा कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, परिणीति चोपड़ा, आयुष्मान खुराना, फरहान अख्तर यह सभी अभिनय के अलावा संगीत के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. तो फिर अपने जमाने की मशहूर अदाकारा जीनत अमान कैसे पीछे रह जाएं? वह भी अब गायक बन गई हैं.

जीनत अमान ने हाल ही में संगीतकार निखिल कामथ के निर्देशन में वेब सीरीज ‘‘लव लाइफ एंड स्क्रूअप’’ के लिए एक गाना अपनी आवाज में रिकॉर्ड किया है. यह एक फुटटैपिंग रेट्रो नंबर है, जिसके बोल हैं- ‘‘ये है जोआना..’’. इसे विमल कश्यप ने लिखा है.

जीनत अमान कहती हैं, ‘‘मैंने खुद इस गाने को अपनी आवाज में रिकॉर्ड करने के लिए निखिल से कहा. जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. वैसे मैं इस वेब सीरीज में अभिनय भी कर रही हूं’’.

नदी की सियासत पर तारीफों के पुल

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मध्यप्रदेश के मंडला जिले के शहपुर कस्बे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चर्चित नमामि देवी नर्मदे यात्रा की तारीफ में जो कसीदे गढ़े उन्हें सुन लोगों का दिल भर आया कि लो हमारे यशस्वी सी एम इतने होनहार और विद्वान हैं और एक हम मूढ़ हैं कि सूबे की कानून व्यवस्था को कोसते रहते हैं.

अब जब सारी समस्याएं मां नर्मदा की पूजा, अर्चना, वंदना और आराधना से ही हल होना है तो बेकार के गिले शिकवे क्यों यह तो अधार्मिकता है. इससे बचना चाहिए और अब तो योगी जी तक कह रहे हैं कि शिवराज ने जो इतिहास गढ़ा वह बेमिसाल है अब यू पी में गंगा का उद्धार भी इसी तरह किया जाएगा. इस सेवा यात्रा की तारीफ करने विभिन्न क्षेत्रों की दर्जनों हस्तियां मध्य प्रदेश बुलाई जा चुकी हैं पर आदित्यनाथ की बात अलग हटकर थी वे जिज्ञासा का विषय हैं जिनकी मांग इन दिनों पीएम नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा है इसलिए उनके लिए खासतौर से भीड़ इकट्ठा की गई थी.

योगी तारीफ ही करेंगे इसका अंदाजा हर किसी को था पर हद से ज्यादा करेंगे यह कम ही लोगों ने सोचा था. नर्मदा किनारे तारीफों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है अपनी तारीफ सुनने शिवराज सिंह जनता का करोड़ों रुपया फूंक चुके हैं फिर भी उनका जी नहीं भर रहा है तो लग ऐसा रहा है कि जब तक खुद नर्मदा मैया मानव अवतार में प्रकट होकर अपने इस पुत्र को चिर काल तक राज करने का आशीर्वाद नहीं दे देंगी वे मानेंगे भी नहीं. यह और बात है कि आजकल ऐसे चमत्कार होते नहीं अब शिवराज की भक्ति और आस्था यह भी कर डाले तो किसी को खास हैरानी भी नहीं होगी.

आदित्यनाथ योगी हैं, वे बेहतर समझते हैं कि धर्म और पंडे पुजारियों का धंधा नदी पहाड़ के इस खेल से ही फलता फूलता है इसलिए शिवराज ठीक कर रहे हैं और भाजपा की सवर्णों और दलितों को एक साथ साधने की राजनीति के लिए यह जरूरी भी है कि अम्बेडकर जयंती भी धूम धाम से मनाई जाये और परशुराम जयंती भी जिससे चारों वर्णों के लोग खुश रहें. आधा घंटे शिवराज, नर्मदा और मध्य प्रदेश की कल्याणकारी योजनाओं की आरती के बाद योगी ने यू पी की पूर्ववर्ती सरकार को कोसा कि वह बड़ी निकम्मी और भ्रष्टाचारी थी इसलिए अब जनता ने उन्हें चुना. उन्होंने फिर एक जरूरी काम, नरेंद्र मोदी की तारीफ किया जिसके बगैर इन दिनों कोई भी भाजपा जलसा इन दिनों मान्य नहीं होता.

आदित्यनाथ, शिवराज सिंह से जूनियर हैं इस बात का उन्होंने पूरा ध्यान रखा. खुद को शिवराज का छोटा भाई वे अप्रत्यक्ष बताते रहे पर यू पी को एम पी का बड़ा भाई बताया. भाईचारे और तारीफ पर तारीफ का खेल खत्म हुआ तब जानकारों को समझ आया कि आदित्यनाथ अभी शिवराज के मुकाबले कच्चे खिलाड़ी हैं और भाषण कला में भी पिछड़े हैं. ये कमजोरियां ऐसे ही समारोहों से दूर होंगी. महकौशल इलाके में हास परिहास इस बात पर भी हुआ कि यह तो भाजपा के कांग्रेसी करण की शुरुआत है अगर ये दोनों भाई वाकई एक हो गए तो पार्टी के कई दादाओं की मुश्किल हो जाएगी.

अब इस सेवा यात्रा के समापन के लिए 15 मई को नरेंद्र मोदी का आना बांकी है जो योगी की हर गतिविधि पर बेहद बारीक नजर रखे हुये हैं क्योंकि यू पी में वोट उनके नाम पर मिला है, आदित्यनाथ के नाम पर नहीं. उलट इसके एम पी वोट शिवराज के नाम पर डलते हैं और उन्हीं के नाम पर डलते रहें नमामि देवी नर्मदे इसी मुहिम का नतीजा है. एम पी के संक्षिप्त प्रवास से योगी आदित्यनाथ को यह मंत्र जरूर मिल गया है कि कुर्सी पर जमे रहने प्रोपोगेंडा जरूरी है फिर चाहे वे गंगा के नाम पर हो या गाय के नाम पर जिनका मकसद लोगों को उलझाए रखना होता है. अब देखना दिलचस्प होगा कि वे धर्म का कौन सा तत्व चुनते हैं.

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