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महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाता प्रीस्कूल बिजनैस

प्रीस्कूल, डेकेयर भारतीय शिक्षा के आयाम में एक नया चलन बन कर उभर रहे हैं और ऐसा माना जाता है कि महिलाएं इन क्षेत्रों का बेहतरीन प्रबंधन कर सकती हैं. महिलाओं में कारोबार करने के साथसाथ बच्चों को संभालने तथा उन्हें सिखाने की अधिक क्षमता होती है. प्रीस्कूल, डेकेयर में भारी वृद्धि देखी गई है, जिस के कारणवश यह भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में एक स्थापित स्तंभ बन चुका है. प्रीस्कूल, डेकेयर जैसे शैक्षणिक व्यवसायों में महिला उद्यमियों की बढ़ती भागीदारी एवं सफलता के लिए तत्परता यह साबित करती है कि महिलाएं कुछ भी कर सकती हैं. महिलाएं न केवल इन प्रीस्कूलों का कुशलता से संचालन कर रही हैं बल्कि उच्च आर्थिक लाभ भी अर्जित कर रही हैं. सेंफोर्ट ग्रुप औफ प्रीस्कूल्स की डायरैक्टर कविता राठौर के अनुसार, ‘‘सुदृढ़ आय के साथसाथ गुणात्मक शिक्षा की कभी न खत्म होने वाली मांग के कारण प्रीस्कूल, डेकेयर गतिविधियों का भारत में एक बहुत बड़ा बाजार तैयार हो गया है. मैट्रो तथा बड़े महानगरों के बाद अब अवसरों से भरपूर टियर टू

और टीयर थ्री शहरों की मांग को पूरा करने के लिए, स्वदेशी और विदेशी प्रीस्कूल चेन भारतभर में तेजी से उभर रही हैं. फलस्वरूप, महिला निवेशकों एवं उद्यमियों के पास अपनी उद्यमशीलता दिखाने के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं.’’

बाजार पर एक नजर

क्रिसिल रिसर्च इंगित करता है कि प्रीस्कूल बाजार में 20.6 फीसदी की वृद्धि होने की संभावना है. इस के पहले यह 11 फीसदी की दर से बढ़ रहा था. इस का मुख्य कारण शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में बढ़ती जागरूकता, मौजूद खिलाडि़यों की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं और अधिक संगठित एवं पेशेवर खिलाडि़यों का इस क्षेत्र में बढ़ता प्रवेश है. प्रीस्कूल शिक्षा भारत में 4,000 करोड़ रुपए का उद्योग है जो प्रति वर्ष बढ़ रहा है.

लाभदायक क्षेत्र

भारत में तीव्र गति से बढ़ रहा प्रीस्कूल उद्योग, महिला उद्यमियों को व्यापार के अच्छे अवसर मुहैया करा रहा है. गौरतलब है कि अधिकांश प्रीस्कूल और डेकेयर ब्रैंड्स की फ्रैंचाइजी का 80 फीसदी हिस्सा महिला उद्यमियों के पास ही है जो अपने क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही हैं. महिलाओं ने इस क्षेत्र में आशा से बढ़ कर प्रदर्शन किया है. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है, प्रीस्कूल फ्रैंचाइजी व्यापार महिला उद्यमियों के लिए सब से सुरक्षित एवं फलदायक है. किसी भी महिला के लिए एक प्रीस्कूल और अर्ली चाइल्ड केयर केंद्र को चलाने का सब से बड़ा लाभ यह है कि इस में एक औपचारिक सीनियर सैकंडरी स्कूल की तुलना में काफी कम पूंजी की आवश्यकता होती है. यह एक गृहिणी से उद्यमी बनने के सफर को काफी आसान कर देता है. सीनियर सैकंडरी स्कूल की तुलना में इस में एक अपेक्षाकृत तनावमुक्त क्षेत्र में वित्त, संचालन, कानूनी, जनशक्ति, विपणन और पाठ्यक्रम में डील करना तथा सीखना ज्यादा आसान है.

कम जोखिम : शिक्षा क्षेत्र को स्पष्ट रूप से किसी भी अन्य क्षेत्र के व्यापार के मुकाबले कम से कम न्यूनतम प्रभाव वाले एवं सुरक्षित उद्योग के रूप में पहचाना गया है. अपने खुद के प्रीस्कूल के साथ एक महिला उद्यमी बाजार में उतारचढ़ाव के बावजूद अच्छा राजस्व कमाने की स्थिति में रहती है.

उपयुक्त समय : प्रीस्कूल में काम करने के लिए निर्धारित समय काफी बेहतर है. आमतौर पर एक दिन में 3 से 4 घंटे का समय काम के लिए निर्धारित किया जाता है. उस में आसानी से महिलाएं कुशलता से अपने काम और परिवार के बीच संतुलन बिठा सकती हैं.

नियमित छुट्टियां और ब्रेक्स : इस व्यापार का रोमांचक तथ्य यह है कि इस में काम करने वाली महिलाओं और उद्यमियों को भी बच्चों के साथसाथ ही छुट्टी मिल जाती है.

बच्चों के साथ बेजोड़ तालमेल : रिसर्च से यह सिद्ध हुआ है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक सामाजिक ज्ञान होता है व उन का स्वभाव नम्र होता है. परिणामस्वरूप, वे बच्चों के साथ एक बेहतर तालमेल बना लेती हैं. उन के अत्यंत देखभाल का स्वभाव और स्नेह के साथ बच्चों से पेश आना, उन्हें सहजता से बच्चे के साथ जोड़ देता है. परंतु ध्यान रखने वाली बात यह है कि प्रीस्कूल की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से सक्षम होनी चाहिए. प्रीस्कूल के कर्मचारियों को भी काम करने में माहिर होना चाहिए. बच्चों के अनुकूल प्रीस्कूल और इतने सारे भावी युवाओं के जीवन के लिए नींव की स्थापना कर सकने से स्वयं को आंतरिक संतुष्टि होती है. यह पुरस्कार किसी अन्य व्यवसाय में नहीं मिल सकता है. इस के अलावा समाज में शिक्षण के कार्य को मिलने वाला सम्मान उल्लेखनीय होता है. इस तरह प्रीस्कूल बिजनैस महिलाओं के लिए अति उपयोगी साबित हो रहा है.

आडवाणी का सपना धराशायी

वे लोग वाकई अतिदूरदर्शी व ज्ञानी हैं जो यह कह रहे हैं कि लालकृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन सहित 13 अन्य लोगों पर साजिश का मुकदमा चलाने का फैसला दिया है. इन में एक और अहम नाम साध्वी उमा भारती का भी है, जिन्होंने उम्मीद के मुताबिक बड़ी मासूमियत से कहा कि जो था खुल्लमखुल्ला था, कोई साजिश नहीं थी. अव्वल तो उमा का सार्वजनिक रूप से दिया गया यह बयान ही यह जताने के लिए काफी है कि सचमुच उस दिन अयोध्या में कोई साजिश नहीं हुई थी, अब यह तो अदालत की दरियादिली या मजबूरी है कि वह किसी फैसले पर पहुंचने के लिए चार्जशीट, गवाह और सुबूतों वाला नाटक खेले और इस ऐतिहासिक मुकदमे का अंत करे.

मुकदमे के राजनीतिक माने

धार्मिक तौर पर इस विवाद के अलग माने हैं. अयोध्या मसले पर 25 साल से हिंदू और मुसलिम धर्मगुरु अपनी रोटियां सेंक रहे हैं, जिन की मंशा झगड़ा सुलझाने की नहीं इसे लटकाए रखने की ज्यादा रही है. जब भी इन के धंधे पर मंदी मंडराती है तो ये झट से बाबरी मसजिद और रामजन्मभूमि का राग छेड़ देते हैं. इस मुकदमे के अपने सियासी माने भी हैं, जिस का फायदा भाजपा उठाती रही है और रामराम करते ही इतनी मजबूत हो पाई है कि आज केंद्र और अधिकांश राज्यों में उस की सत्ता है. इन दिनों भाजपा जो राजनीति कर रही है उस में हल्ला ज्यादा है, सुधार और विकास की बातें कम हैं.

ऐसे में यह फैसला उस के लिए वरदान ही है जिस से उसे उग्र हिंदूवादी नेताओं की दावेदारी और भागीदारी से बैठेबिठाए छुटकारा मिल गया है. अब लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती व मनोहर जोशी सरीखे नेता अपने दम पर कोई फसाद राममंदिर के नाम पर खड़ा करने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि न केवल ये लोग बल्कि पूरी भाजपा नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मुहताज हो गई है.

आमतौर पर भाजपाई जब खुश होते हैं तो आतिशबाजी जरूर चलाते हैं, जो इस फैसले पर नहीं चलाई गई तो आम लोगों को लगा कि ऐसा होना भाजपा सहन नहीं कर सकती, जबकि हकीकत यह है कि केसरिया मनों में लड्डू फूट रहे हैं. 2019 की गरमी तक फैसला आ पाया तो चित नरेंद्र मोदी की और पट भाजपा की होगी. अगर मुलजिम साहेबान बरी हुए और न हुए तो भी एक और मंदिरनिर्माण की पटकथा तो लिखनी शुरू हो ही गई है. बकौल विनय कटियार और उमा भारती, ‘जान देनी पड़े या फांसी हो, मंदिर वहीं बनाएंगे.’ देश का माहौल धार्मिक कट्टरवाद की इतनी गिरफ्त में शायद

90 के दशक में भी नहीं था जब भजभज मंडली राम के नाम पर घरघर से चंदा इकट्ठा करती मंदिर निर्माण के लिए इसी आस्था की दुहाई देते प्राणों की आहुति देने को आमादा थी. अब तसवीर यह है कि मुसलमानों का टेंटुआ हिंदूवादियों के पंजे में है, अजान से किसी गवैये की नींद खुलती है तो वह झट से ट्वीट कर देता है और देखते ही देखते हल्ला मच जाता है. मोदी, योगी को मुसलिम महिलाओं पर दया आ रही है, क्योंकि उन्हें झट से तलाक मिल जाता है, हिंदू दंपतियों की तरह सालोंसाल अदालत की चौखट पर नाक रगड़ते एक उम्र जाया नहीं करनी पड़ती.

इस पर भी मिसाल द्रौपदी के चीरहरण की दी जाती है, सीता की अग्निपरीक्षा की नहीं. सार यह कि अपने दामन के दाग नहीं देखने हैं, बस, जैसे भी हो 2 साल इसी तरह गुजार देने हैं. इस के बाद आएगा अदालती फैसला जो भाजपा का अगला मुद्दा हो जाएगा कि बस, अब बहुत हो गया, बात आस्था और करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की है, इसलिए सारे झंझटें और मुद्दे (अगर बचे तो) डालो डस्टबिन में और चलो अयोध्या वरना विश्वगुरु बनने का सपना मिट्टी में मिल जाएगा.

आरएसएस का दांव

लोग तो धर्म के अंधे हमेशा से ही हैं, लिहाजा वे भगवा ध्वज ले कर कूच करते रेडीमेड पुण्य कमाने से चूकेंगे, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. भाजपा ने कभी नहीं  कहा कि आडवाणी या जोशी राष्ट्रपति होंगे, न ही कभी ऐसा कहेगी. ये तो बलि के बकरे बन गए हैं जो 2 सालों तक रोज अपनी ईद मनते देखने को विवश हैं. कर्मफल के सिद्धांतों की बात करें तो ये अपने किए की सजा भुगतेंगे. यह राजनीति में ही हो सकता है कि प्यादे वजीर और वजीर प्यादे बन जाएं. इस बिसात के दोनों तरफ से चालें चलने वाला आरएसएस तय करेगा कि राष्ट्रपति किसे बनाया जाए.

मुमकिन है इस दफा मंदिरनिर्माण के लिए दलितों का सहयोग बाकायदा घोषित तौर पर लिया जाए और उन्हें मौजूदा लोकतांत्रिक वर्णव्यवस्था में हनुमान व जामवंत बना कर चतुर्थ श्रेणी का हिंदू घोषित कर दिया जाए.सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लग यह रहा है कि अगले आम चुनावों में मोदी सरकार के 5 सालों का कामकाज मुद्दा नहीं होगा बल्कि कोई रथयात्रा निकाली जा सकती है, कोई भी मुहिम मंदिर के नाम पर  छेड़ी जा सकती है, जिस से नएनए आडवाणी, जोशी , उमा, विनय, कल्याण और ऋतंभरा पैदा किए जा सकें. इस से लोगों को अपनी परेशानियां और दुख भुलाने में सहूलियत रहेगी. एक बार मंदिर बन भर जाए, फिर तो सारे कष्ट रामजी हर ही लेंगे, जिन्होंने अपने भक्तों को इस फैसले की शक्ल में  संजीवनी दिला दी है.       

मुकदमा चलाने के फैसले से दोषी नेता भी खुश हैं. वे मंदिर के नाम पर फांसी चढ़ने और जान देने की बात कर रहे हैं तो उन्हें यह एहसास है कि अगर कल को फिर से मंदिरनिर्माण मुद्दा बनाने के लिए पार्टी मजबूर हुई तो आगे उन्हें ही रखा जाएगा. वैसे भी मुकदमे से जुड़े तमाम नेता हर स्तर पर खारिज हो चुके हैं और मोदी बाली भाजपा पर भार ही बने हुए हैं. नरेंद्र मोदी कैसा भारत गढ़ना चाहते हैं, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है पर इतना हर किसी की समझ में आ रहा है कि देश न पहले कभी धर्मनिरपेक्ष था न आज है और हालात यही रहे तो कभी हो भी नहीं पाएगा.

पूजापाठ, यज्ञहवन में उलझे लोगों को भी मजबूत और सशक्त नेता नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर पाखंड और विवाद करने वाले नेता ही पसंद आते हैं. जब तक कांग्रेसी इस में आगे रहे तो लोग उन्हें वोट देते रहे और अब भाजपा बाजी मार रही है तो वह सत्ता में है. अब साफ दिख रहा है कि दोषियों को सजा हुई तो फिर आस्था के नाम पर बवंडर मचाया जाएगा. यह भाजपा की राजनीतिक जरूरत भी होगी और अगर अभियुक्त बरी हुए तो देशभर में जश्न का माहौल होगा, गलीगली में दीवाली, होली मनाई जाएगी. कहा यह जाएगा कि रामनाम की महिमा अपरंपार है और बेहतर यह होगा कि भाजपा के राष्ट्रवाद, जो कट्टर हिंदूवाद का नया नाम भर है, को सभी मान लें, वरना तो देश छोड़ देने का विकल्प तो उन के पास है ही.    

इन्हें भी आजमाइए

– चेहरे की त्वचा को साफ करने के लिए नमक में कुछ अच्छे किस्म के तेल जैसे लेवेंडर, पिपरमिंट या रोजमैरी आदि के तेल मिलाएं और लगाएं. ऐसा करने से चेहरे के मुंहासे गायब होने लगेंगे. इसे महीने में केवल एक बार ही प्रयोग करें.

– गरमी के मौसम में लिप ग्लौस न लगाएं क्योंकि यह होंठों पर ज्यादा देर नहीं टिकता. होंठों पर लिपस्टिक लंबे समय तक टिकी रहे, इस के लिए पहले होंठों पर हलका फाउंडेशन लगाएं. उस के बाद लिपस्टिक का एक कोट लगाएं.

– घर में जहां चीटियां हों वहां नीबू के छिलके रख दें, चीटियां भाग जाएंगी. इस के अलावा नीबू का रस निचोड़ें और नमक मिला दें, यह घोल उस जगह डालें जहां चीटियां दिखाई दे रही हैं.

– कपड़ों से पसीने का दाग हटाने के लिए पानी में एक चम्मच सिरका डाल कर कपड़ों को कुछ समय के लिए भिगो दें. कुछ देर बाद साबुन से धो लें.

– गरमी में तैलीय चीजों और मसालेदार चीजों को भूल, पेय पदार्थों को अधिक लें और जौ से बनी चीजों को प्राथमिकता दें.

– विटामिन और मिनरल्स से भरपूर गुड़ को गरम कर के खाने से कब्ज में बहुत आराम मिलता है.

हम हो जाएं हम

पल जो अनजाने में पीछे छोड़ आए हम

वक्त से आज फिर उन्हें छीन लाएं हम

सूख रहा प्रेमरस अजब सी तपिश है

बूंदबूंद सागर फिर से भर लाएं हम

हम चुप बने रहें और समझ जाओ तुम

खामोशियों में अपनी बात कह जाएं हम

शब्दशब्द चुन कोई प्रेमग्रंथ हम लिखें

प्रेमभाव के मधुरस में डूब जाएं हम

तोड़ न सके जिसे वक्त का सितम

प्रेम के ऐसे बंधन में बंध जाएं हम

वक्त की धूल जिस पर न छा सके

मुहब्बत का ऐसा नाम बन जाएं हम

मन के दर्पण पर कुछ धुंध सी जम गई

कुहासे में उजली धूप बन जाएं हम

नेह की फुहार मन के आंगन में बरसे

प्रेमसरिता के प्रवाह में बह जाएं हम

बात मुहब्बत की हो तो बात हो हमारी

जहांभर में मिसाल बन जाएं हम

मैं रहूं न मैं, तुम रहो न तुम

मैं-तुम भूल, हम हो जाएं हम

चलो एक बार फिर हम हो जाएं हम

सब भूल एकदूजे में खो जाएं हम.

– रीता कौशल

जीएसटी तंत्र पर नहीं होगा साइबर हमले का असर

देश में एकीकृत कर प्रणाली वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संसद के बजट सत्र में पारित किया जा चुका है और कुछ समय बाद यह व्यवस्था पूरे देश में लागू हो जाएगी. देश के आर्थिक विकास की दिशा में इस व्यवस्था को अहम माना जा रहा है. इसे लागू करने से पहले इस के सभी पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है.

जीएसटी नैटवर्क पर सब से बड़ा खतरा साइबर हमले को ले कर जताया जा रहा था लेकिन वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि साइबर हमले के लिहाज से इसे बहुत सुरक्षित बनाया गया है और इस पर किसी भी तरह का खतरा नहीं है. सरकार का दावा है कि वस्तु एवं सेवा कर नैटवर्क जीएसटीएन को कोई भी साइबर हमला भेद नहीं सकता. इस के लिए सभी जरूरी सुरक्षित उपाय किए गए हैं और देश की सब से बड़ी साइबर सुरक्षा एजेंसी राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संयोजक एनसीएसएसी तथा अन्य संबंद्ध एजेंसियों के सुझावों के साथ इसे अत्यधिक सुरक्षित बनाया गया है.

मंत्रालय का यह भी दावा है कि इस नैटवर्क से अब तक करीब 49 लाख करदाता जुड़ चुके हैं. सरकार की योजना जीएसटीएन के जरिए 60 लाख करदाताओं को औनलाइन पंजीकरण तथा रिटर्न भरने जैसी सुविधाएं एक ही प्लेटफौर्म पर उपलब्ध कराने की है.

जीएसटीएन को सुरक्षित बनाने का दावा तो ठीक है लेकिन पिछले दिनों जब देश के सब से बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक का डाटा चोरी हो गया था तो उस के बाद से साइबर सुरक्षा पर सवाल उठने लगे थे. लोगों के दिमाग से साइबर हमले का भय अभी कम नहीं हुआ है. यह डर स्वाभाविक है. लोगों की सिर्फएक ही चिंता है कि उन के खाते में किसी तरह की सेंधमारी नहीं हो और कोई डाटा किसी भी स्तर पर लीक नहीं होने पाए.

शेयर बाजार 30 हजार अंक के पार

अप्रैल के आखिरी सप्ताह के तीसरे दिन बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक ने पहली बार 30 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर नया रिकौर्ड बनाया. नैशनल स्टौक एक्सचेंज का सूचकांक भी 9,300 अंक को पार कर नए स्तर पर पहुंचा. सूचकांक ने पहली बार यह ऊंचाई हासिल की है.

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक बाजारों से मजबूती के संकेतों तथा रिलायंस एवं विप्रो जैसी प्रमुख कंपनियों केपरिणामों और सरकार के आर्थिक सुधार के प्रयासों के कारण बाजार ने यह रिकौर्ड स्तर बनाया है. इस दौरान रुपया भी 20 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंचा है. हालांकि इस से पहले के सप्ताह के दौरान बाजार में गिरावट का माहौल रहा. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ जैसे वैश्विक संस्थानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत रहने की भविष्यवाणी की है. संस्था के राजकोषीय मामलों के निदेशक विटोर गासपेट ने कहा है कि हाल के दिनों में भारत ने अच्छी आर्थिक विकास दर हासिल की है.

भारत ही नहीं, दुनियाभर के शेयर बाजारों पर फ्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव और उत्तर कोरिया तथा अमेरिका के बीच बन रहे युद्ध जैसे हालात का असर भी देखने को मिला. हालांकि बौंबे स्टौक एक्सचेंज में रिलायंस और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों के चौथी तिमाही के उत्साहवर्धक परिणामों के कारण उत्साह का माहौल रहा. इन परिणामों के कारण अप्रैल का आखिरी सप्ताह बाजार के लिए उत्साहजनक बना रहा.

 

कश्मीर में होश की जरूरत

जम्मू कश्मीर में नाराज कश्मीरियों के पत्थरमार अभियान से बचाव के लिए भारतीय सेना ने एक अजीब प्रयोग किया जो बुरी तरह उल्टा पड़ गया. सेना ने एक कश्मीरी युवक को अपनी जीप के आगे बांध दिया और अपनी एक आवश्यक गश्त बिना पत्थरमारों के प्रहार के पूरी कर ली. पर आज के जमाने में हरेक के हाथ में स्मार्टफोन है जिस के चलते सेना की यह तरकीब जल्दी ही दुनियाभर में फैल गई. सेना द्वारा मानव कवच के इस्तेमाल पर खूब हल्ला मच रहा है.

कश्मीर की गुत्थी लगातार उलझ रही है. यह उमीद की गई थी कि भारतीय जनता पार्टी, जो कश्मीर में सख्त कदमों की हिमायती रही है, कश्मीरी युवाओं को सही रास्ते पर ले आएगी. लेकिन महबूबा मुफ्ती के साथ उस की बनाई गई सरकार बुरी तरह फिसड्डी रही है. इस बार वहां उपचुनाव में 3 फीसदी वोटिंग के रिकौर्ड तय किए गए. ऐसे माहौल में मानव कवच ने चिंगारियों पर पैट्रोल छिड़कने का काम किया है.

कश्मीर घाटी के युवा अब बंदूकों और बंदूकों से ही नहीं, पत्थरों से भी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. सेना जवाब में क्या करें, उस की समझ नहीं आ रहा. ये पत्थर फेंकने वाले 12-15 साल के बच्चे होते हैं और उन पर गोलियां चलाना आसान नहीं है.

जो लोग 65-70 साल से कश्मीर के मामले को बिगाड़ने का दोष कांग्रेस को देते रहे हैं उन को अब समझ नहीं आ रहा है कि क्या प्रतिक्रिया करें और मानव कवच को सही ठहराएं या नहीं.

मानव कवच विद्रोहियों द्वारा दुनियाभर में इस्तेमाल किया जाता है. अमेरिका में बहुत से अकेले उग्रवादियों और सिरफिरे हत्यारों ने मानव कवच के सहारे ही अपना बचाव किया है. यह एक पुराना तरीका है जिस का इतिहास में अकसर जिक्र मिलता है. पर आमतौर पर खलनायक, जो कमजोर होते हैं, वे इसे इस्तेमाल करते हैं. भारतीय सेना द्वारा इस का इस्तेमाल शहर की सड़कों पर करना गंभीर आलोचना का विषय बन गया. दुनियाभर के मानव अधिकारों के समर्थक इस पर बेहद खफा हैं. इस से भारत की छवि पर गहरा धब्बा लगा है.

कश्मीर भारत का अंग है और रहेगा. और भारत और उस की सेना का यह कर्तव्य है कि इस की रक्षा में कोई चूक न होने पाए. पत्थरों की तो छोडि़ए, बमों और टैंकों से भी कोई कश्मीर को भारत के हाथों से नहीं छीन सकता. पर भारत को देश का हिस्सा बचाने के लिए मानवीय नियमों का तो पालन करना ही पड़ेगा.

सेना के इस कदम के चलते भारत सरकार की दुनियाभर में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश पर पानी फिर गया है. सरकार खुद आलोचना का निशाना बन गई है. यह न भूलें कि सीरिया में अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को टौमहाक मिसाइलों से 89 टन का बम बरसाने का मौका तब ही मिला जब सीरिया में विद्रोहियों पर राष्ट्रपति बशर अल असद की फौजों ने कैमिकल अटैक किया, जिस में आम बच्चे तक झुलस कर मर गए. कश्मीर में देश को जोश से नहीं, होश से काम लेना होगा.

 

जीवन सरिता : कामयाबी की भूलभुलैया

आज आदमी कामयाबी का सोपान कैसे चढ़ रहा है कि जीवन की तमाम खुशियां ही बिखर गई हैं. संतुष्टि का मंत्र कहीं दूर जा कर खो गया है. जीवनपथ पर हर कोई भाग रहा है. चारों ओर स्पर्धाओं की आपाधापी मची हुई है. हर कोई एकदूसरे से आगे निकलने के लिए तत्पर है. महत्त्वाकांक्षा और कामयाबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह निर्विवाद सत्य है कि महत्त्वाकांक्षा और कामयाबी एकदूसरे के पर्याय हैं. महत्त्वाकांक्षा जीवन की संजीवनी बूटी है, जिजीविषा है, लालसा है, शक्ति है, निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा है, उत्साहउमंग का परिचायक है. इस के बिना जीवन निष्क्रिय है, मृतवत है. पर सबकुछ तो नहीं, कि जिस के लिए हम जीना ही भूल जाएं.

कामयाब होना अति उत्तम है पर अति महत्त्वाकांक्षी बन कर थोड़े समय में बहुतकुछ प्राप्त करने की चाहत आज जनून बन कर आम आदमी का सुकून तो नहीं छीन रही है? उस के अनंत सपनों का आकाश, उस के पंखों को काट उड़ने के हौसले तो नहीं छीन रही है? असीम महत्त्वाकांक्षाओं के सागर की लहरें उस के जीवन को डुबो तो नहीं रही हैं? कामयाबी की असीम चाहत उस के जीवन को कही असंतुलित तो नहीं कर रही, जिसे संतुलित करने के सतत प्रयास में वह असंतुलित हो कर जीवन को यज्ञ की वेदी बना कर अपने अमनचैन की आहुति दे रहा है. कुछ ऐसा ही हो रहा है आज. अति महत्त्वाकांक्षी बन कर लोग जीना ही भूल गए हैं. ऐसी भी क्या सफलता जो जीवनसंगीत से सुर, ताल औैर लय ही छीन ले.

डा. एस के खन्ना, जो पटना के बहुत नामी डाक्टर हैं, अपने नर्सिंग होम में सुबह 9 बजे से ले कर रात 2 बजे तक अपने चैंबर में बैठे रहते हैं. थक जाने पर भी निरंतर मरीजों को देखते ही रहते हैं. ज्यादा से ज्यादा कमाई कर लें, यही उन की सोच है. न तो परिवार को समय दे पाते हैं, न स्वयं को ही. कोई सोशललाइफ भी नहीं है. झूठी शानोशौकत के लिए उन की पत्नी और बच्चे पानी की तरह पैसा बहाते हैं. कहने वाले कहते हैं कि कोई आवश्यकता नहीं होने पर भी वे मरीजों को पैसों के लिए नर्सिंग होम में रहने को मजबूर करते हैं.

बहुत बड़ी होती हैं छोटीछोटी खुशियां. अंतर्मन में सकारात्मकता का संचार कर जीवन को सींचती हैं ये खुशियां. जीवन अनमोल है, कामयाबी की भूलभुलैया में इसे न खोएं. स्वास्थ्य ही जीवन है, इसे भूलें नहीं. बड़ीबड़ी खुशियों को तलाशते हुए छोटीछोटी खुशियों को बड़ी उपब्धियों की चाहत में खोना, आदि कितने प्रश्न हैं जिन का समाधान अगर नहीं हुआ तो भौतिक सुखसुविधाओं से सुसज्जित जीवन की धज्जियां उड़ते देर नहीं लगेगी. कामयाबी की चाहत अगर मृगतृष्णा के जाल में फंसी, तो फिर जीवन तनाव, एंग्जायटी और डिप्रैशन जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का शिकार बन जाएगा.

पटना में कमल अग्रवाल के 2 ज्वैलरी शोरूम होने के साथ कपड़े और मोटर बेचने का कारोबार है. कुबेरपति हैं पर इतनी भागदौड़ में लगे रहते हैं कि जीवन ही मशीन बन कर रह गया है. अनियमितता के चलते कितनी बीमारियों के शिकार हो गए हैं. सारी सुखसुविधाएं हैं पर उन का कोई भोग नहीं है. घर में इतनी सिक्योरिटी है, फिर भी डरेसहमे रहते हैं. उन से तो सुखी उन के नौकरचाकर हैं, कम से कम अपनों के साथ हंसबोल तो लेते हैं.

महत्त्वाकांक्षाओं की सीमा

माना कि परिवार, समाज और देश की उन्नति महत्त्वाकांक्षा और इस की कामयाबी पर निर्भर करती है पर इस के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी खुशियों की आहुति देने का कोई औचित्य नहीं है. आज जितने व्यक्ति, उतनी महत्त्वाकांक्षाएं और अनंत कामयाबी की राहें. किसी को धनदौलत की चाहत तो किसी को धन लुटाने की होड़. किसी को ज्ञानार्जन की लगन तो किसी को ज्ञानास्रोत की तलाश. सफल वे ही होते हैं जिन की लगन सच्ची होती है. यही सकारात्मक महत्त्वाकांक्षाएं जब अतिशयोक्ति की सीमा का अतिक्रमण करती हैं तो जनून बन कर प्राप्ति और खुशियों के बीच असंतुलन बन कर जीवनरोग बन जाती हैं.

पटना के किदवईपुरी में रहने वाले करोड़पति मठाधीश दंपती की हत्या कर दी गई. कड़ी सिक्योरिटी में रहने के बावजूद धनदौलत के लिए उन की हत्या कर दी गई और यह किसी अपने का ही काम था. उन्होंने एक मठाधीश हो कर कैसे इतनी संपत्ति अर्जित कर ली कि 40 करोड़ रुपए के मकान में रहते थे. अवश्य ही नाजायज ढंग से धन का अर्जन किया होगा. कुबेर का खजाना तो अर्जित कर लिया, पर भोगा तो नहीं. आज समाज और देश में परिवर्तन की क्रांति छाई हुई है जिस की लहरों पर सवार हर व्यक्ति की आकांक्षाएं आकाशमय हो रही हैं. आज देशविदेश में बेहतरीन अवसर हैं. आर्थिक सुविधाओं ने उन अवसरों की प्राप्ति की राहों को सरल बना दिया है जो आज से पहले उपलब्ध नहीं थीं.

सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन की दौड़ से आम आदमी की सोच प्रभावित है. यही कारण है कि आज नगरोंमहानगरों में लोगों की संस्कृति उपभोक्तावादी बन गई है. शानोशौकत से रहने की प्रबल इच्छा पर नैतिकता कुरबान हो रही है. हर क्षेत्र में एकदूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा इतनी है कि लोगों के पास पलभर सांस लेने के लिए एक छोटा पल भी नहीं है. धैर्य की बात तो दूर रही. हर कोई अल्प समय में अनंत पा लेना चाहता है चाहे राहें कठिन हों या आसान, गलत हों या ठीक, कोई परवा नहीं. बस, हासिल करना ही लक्ष्य होता है. दिग्भ्रमित हो कर इस पथ के राही बेहाल हैं.

नैतिकता की बलि

2016 में बोरिंग रोड चौराहे पर रहने वाले किसी सरकारी अधिकारी के यहां सीबीआई वालों ने छापा मार कर 2 सौ करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की. नौकरी से भी संस्पैंडैड हैं. फिर भी वे सीना तान कर यों चलते हैं मानो सबकुछ हासिल कर लिया हो. उन्हीं के फ्लोर पर रहने वाले एसबीआई बैंक में काम करने वाले अनिल पांडेय ने अपने फ्लैट को अमेरिकन स्टाइल में बनवाने के लिए बैंक से 1 करोड़ से ज्यादा रुपए का लोन लिया. निश्चित अवधि में लोन नहीं चुका सकने के कारण नौकरी से सस्पैंडैड तो हैं ही, हर 3 महीने में वे परिवार सहित गायब हो जाते हैं क्योंकि उन के फ्लैट में बैंक वाले ताला लगवा जाते हैं. कुछ दिनों के बाद ताला खुल भी जाता है.

यह कैसी महत्त्वाकांक्षा है कि जिस की पूर्ति में अपनी नैतिकता का परित्याग करना पड़ जाता है. क्या ऐसी मानसिकता से जीवन सुखी हो सकता है? माना कि परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है, सफलता की कुंजी है यह, फिर भी अल्प समय में अधिक प्राप्ति की चाह में मशीन न बनें क्योंकि इस से बढ़ रही है अपनों के बीच की दूरी और बढ़ रहा है अकेलेपन का अभिशाप. साथ ही, छूट रहा है अपनों का साथ. भावनात्मक आधार के अभाव के चलते जीवन से खुशियां तिरोहित हो गई हैं. आकांक्षाओं और महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए लोग मशीन बनते जा रहे हैं. एकदूसरे से रहनसहन की प्रतियोगिता में वे असंतुष्ट तो रहते ही हैं, साथ में ये स्थितियां उन्हें आर्थिक व सामाजिक रूप से असुरक्षा की भावना से भी घेरे रहती हैं. दूसरों की सफलता को वे सहन नहीं कर पाते. फिर, ऐसी प्रतिस्पर्धाओं के तनाव से आपसी नजदीकियां समाप्त हो जाती हैं.

स्पर्धा की अग्नि में जीवन की सुखशांति की आहुति कभी नहीं देनी चाहिए क्योंकि कामयाबी के शीर्ष पर आदमी आरूढ़ तो हो जाता है पर अंत में अकेलेपन का शिकार हो कर अवसाद में घिर भी जाता है. सफलता की ओर अग्रसर रहना, उसे उस खास मुकाम पर बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है. जितना मिलता है, उस से और ज्यादा पाने की पिपासा बढ़ती जाती है. फिर खुशियों का उपवन जलते रेगिस्तान में तबदील हो जाता है और तमाम जिंदगी आदमी अर्जन की मृगतृष्णा में उलझ कर रह जाता है. कामयाबी की दौड़ और दोहरी जिम्मेदारियों को निभाने की चाह रखने वाली महिलाओं में भी अप्रत्याशित बदलाव आए हैं. पारिवारिक स्तर को ऊंचा बनाने के लिए वे भी हर तरह से प्रयत्नशील हैं, सफलीभूत भी हैं. पर घरबाहर की चुनौतीपूर्ण दोहरी जिम्मेदारियों में वे किसी चक्की की पाट की तरह पिस रही हैं. अनंत अपेक्षाएं उन्हें भी शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताडि़त कर नाना प्रकार की उलझनें ही पैदा कर रही हैं.

अतीत की धरोहर संयुक्त परिवार के टूटने से उन्हें कोई भावनात्मक आधार भी नहीं मिल पाता. फलस्वरूप, महिलाओं का जीवन भी बिखर रहा है. फिर भी यह जिद है कि कामयाबी को किसी न किसी तरह से हासिल करना ही है. पाने की चाहत में वे वास्तविक सुखों की बली चढ़ा रही हैं.

खुशहाली का मापदंड

हम से कामयाबी है, न कि हम कामयाबी से. छोटीछोटी खुशियां ही दीपमालिका बन कर बड़ी खुशियों का सृजन करती हैं. आज का आदमी इतना व्यस्त है कि छोटीछोटी खुशियों को महसूस करने के लिए उस के पास वक्त ही नहीं है. चुनौतियों से भरी उपलब्धियां कामयाब बना सकती हैं पर खुशहाल नहीं. पाने की तृष्णा असीमित, अछोर और अनंत हैं पर अनमोल जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं है. कामयाबी, जो जीवन की खुशहाली का मापदंड बना हुआ है, मात्र भ्रम है. इस की प्राप्ति की राह में कभी विस्मृत नहीं होना चाहिए कि हम से कामयाबी है, न कि हम कामयाबी से. जीवन के संतुलन को हर हाल में बनाए रखना चाहिए. कोहरे में घिरी कामयाबी को आत्मतुष्टि की उष्मा से पिघलते रहना चाहिए ताकि यह जनून बन कर जीवन का सारा सुकून न छीन ले.        

पुकारो प्यार से

कुछ ऐसा तुम बोलो प्रिये

पतझड़ भी मुसकराएं

डालें गलबहियां पुष्प पुष्प को

कांटे झुका नजर शरमाएं

भावों से छू लो भावों को

दिल से दिल का संगम हो

नजरों से जब मिले नजर

रगरग में स्पंदन हो

बिना कहे ही कहो कुछ ऐसा

उथलपुथल मच जाए

गठरी मन की खोलो प्रिये

पलपल का हिसाब करो

अगलेपिछले सारे शिकवे

एकएक कर साफ करो

यों पुकारो प्यार से मुझ को

मन लहरलहर लहराए

डाले गलबहियां पुष्प पुष्प को

कांटे झुका नजर शरमाएं.

       

– सपना मांगलिक     

ऐसी जुगुनी- भाग 3: जुगुनी ने अपने ससुरालवालों के साथ क्या किया?

इधर कोई 3 वर्षों तक जुगुनी गर्भवती नहीं हुई तो मायके वालों को चिंता हो गई कि कहीं तेजेंद्र नामर्द या नपुंसक तो नहीं है. अम्मा के सिखाने पर जुगुनी ने पड़ोस में ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि कमी तेजेंद्र में है.

अम्मा मुंबई आई तो उस ने जुगुनी की आंखों में झांक कर देखा, ‘‘बिटिया, कोई खास बात है क्या?’’ वह आंखें नचाते हुए बोल पड़ी, ‘‘अम्मा, मुझे तो लगता है कि तेजेंद्र का अपने ही औफिस में किसी लड़की के साथ कोई चक्करवक्कर चल रहा है. वरना शादी के 3 वर्षों बाद भी…’’ पर, सचाई यह थी कि तेजेंद्र बड़ी सावधानी बरतता था और कुछ वर्षों तक बालबच्चों की जिम्मेदारियों से दूर रहना चाहता था.

एक दिन तेजेंद्र के औफिस जाते ही अम्मा जुगुनी को खींचती हुई एक मौलवी के पास ले गई. मौलवी ने अम्मा और जुगुनी की सारी समस्याएं सुनने के बाद उन के शक पर सच की मुहर लगा दी, ‘‘आप की बिटिया के पांव इसलिए भारी नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि उस के शौहर के किसी के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं और वह जल्दी ही आप की बिटिया को छोड़ कर उस से निकाह करने जा रहा है. पर, उस बदचलन औरत से इस के शौहर का छुटकारा दिलाने का तिलिस्मी नुसखा मेरे पास है. कल तुम दोनों मुझ से पीर बाबा के मजार पर मिलना.’’

अम्मा को मौलवी द्वारा बताई गई एकएक बात पर भरोसा हो गया. मौलवी ने दोनों को नाको चने चबवाए. ऐसेऐसे कर्मकांड करवाए कि अम्मा के सिवा कोई और औरत होती तो भाग खड़ी होती.

अम्मा ने तो मौलवी के नुसखों को खूब आजमाया. बदले में, उसे मुंहमांगा पैसा दिया. इस के अलावा, मौलवी के कर्मकांडों में शिरकत करने के लिए जुगुनी को एक रात उसी के यहां छोड़ कर भी आई और तेजेंद्र से बहाना बना दिया कि जुगुनी अपनी एक सहेली की शादी में गई हुई है और रातभर वहीं रहेगी.

इस तरह उस ने मौलवी द्वारा दिए गए झाड़फूंक वाले कुछ रसायन और राखभभूत भी चोरीछिपे तेजेंद्र को भोजन में मिला कर खिलाई जिस से वह कभीकभी बीमार भी पड़ गया. पर, जब सारे नुसखे बेकार हो गए तो फिर, वह उसे कर्मकांडी ओझाओं और बाबाओं के पास भी ले गई.

यह सब करते हुए जुगुनी उकता गई, ‘‘अम्मा, हमारी दुर्दशा काहे कर रही हो? अब जब तेजेंद्र ही नालायक और बेपरवाह हो कर गैरों पर अपना सर्वस्व लुटा चुका है तो हमारा कल्याण कभी नहीं हो सकता.’’

इसी दरम्यान, जुगुनी की एक रिश्ते की बहन कल्लो, जिसे टोनेटोटकों में बड़ी महारत हासिल थी, ने अम्मा को फोन कर के बताया, ‘‘मामी, जुगुनी के गर्भवती न होने का एक अहम कारण यह है कि तेजेंद्र के घर वालों ने ओझाओं द्वारा कुछ कर्मकांड करवाए हैं.

‘‘इस बार जब आप वापस घर आना तो जुगुनी को भी ले कर आना. मैं उस कर्मकांड की काट बताऊंगी. जुगुनी निश्चित तौर पर मां बनेगी और तेजेंद्र उस का साया बन कर उस के आगेपीछे डोलता फिरेगा.’’

उस के बाद, जब जुगुनी मायके गई तो उस की रिश्ते की बहन कल्लो समेत उस के जीजा ने भी उस से ढेरों कर्मकांड करवाए. उस ने अपने जीजा के घर में कुछ दिनों रह कर भी बहुतकुछ कर्मकांड किए. उन के साथ श्मशान घाट, पीर बाबा की मजार और शिवाले भी गई.

यों तो उस के जीजा किसी प्राइवेट औफिस में कार्यरत थे, पर वे भी हस्तविद्या, अंकविद्या जैसी ज्योतिष विद्याओं में पारंगत होने का खूब दम भरते थे और ज्योतिष की किताबें भी पढ़ा करते थे.

खुद जुगुनी ने तेजेंद्र को अपने जीजा की इस क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बतलाया था कि उन्होंने कितनों को ही हीरा, पन्ना, नीलम और पुखराज जैसे पत्थरों की अंगूठियां पहना कर उन के समय में चारचांद लगाए हैं और तुम्हें उन से मिल कर अवश्य ही उपकृत-लाभान्वित होना चाहिए.

ऐसी बातों का हमेशा मखौल उड़ाने वाला तेजेंद्र उस की बात ही टाल जाता. बहरहाल, जब वह जीजा के यहां से वापस मायके आई तो तेजेंद्र के बड़े भाई कमलेंद्र उसे अपने शहर लेने आ गए. उन्होंने अम्मा से कहा, ‘‘मम्मीजी, जुगुनी को कुछ दिन मेरे यहां भी रहने के लिए भेज दीजिए, बच्चे अपनी छोटी आंटी से मिलने के लिए बेचैन हैं.’’

अम्मा तो कमलेंद्र की शक्लसूरत और कीरतसीरत पर पहले से ही फिदा थी और कई बार यह भी तमन्ना कर चुकी थी कि काश, जुगुनी को कमलेंद्र जैसा पति मिला होता. सो, उस ने कोई नानुकुर किए बिना, कमलेंद्र के साथ जुगुनी को विदा कर दिया, जहां वह उस के और उस के परिवार के साथ 2 हफ्ते रही.

कुल मिला कर, अम्मा तो इसी बात से बेहद खुश थी कि चलो, अपने पति तेजेंद्र के साथ रह कर जुगुनी भले ही खुश न रह पा रही हो, मायके आ कर कुछ दिन प्रसन्नचित्त तो हो जाती है. यहां वह अपने जीजा और तेजेंद्र के बड़े भाई के साथ कुछ दिन गुजार कर चैनसुकून की सांस ले पाती है.

उस ने उस से कहा भी, ‘‘जुगुनी, कभीकभार मायके आ कर रह जाया करो. मन बहल जाया करेगा. करमजले तेजेंद्र से दूर रह कर थोड़ी सी राहत तो तुम्हें मिल ही जाती है. यहां रहोगी तो हमारे प्रयास से तुम पेट से भी हो सकोगी. हम जल्दी ही मौलवियों, ज्योतिषियों, कर्मकांडियों और तुम्हारे जीजाजी के प्रयास से कुछ न कुछ करने में सफल हो ही जाएंगे. अब तो तुम्हारे जेठ भी तुम में बहुत दिलचस्पी लेने लगे हैं. वे तुम्हारे लिए बड़े चिंतित रहते हैं, कहते हैं कि जुगुनी को तेजेंद्र के रूप में नालायक शौहर मिला है.’’

वापस मुंबई लौट कर जुगुनी बहुत खुश थी. तेजेंद्र ने उस से कईर् बार उस की खुशी का राज जानना चाहा. वह बारबार एक ही बात कहती, ‘‘तुम्हें इतनी जलन क्यों हो रही है?’’

तेजेंद्र मायूस हो जाता, ‘‘मुझे जलन क्यों होने लगी? क्या मुझे तुम्हारी खुशी में शामिल होने का हक नहीं है?’’

तब वह तुनक उठती, ‘‘तुम्हें तो असली खुशी अपने भाईबहनों के साथ मिलती है. तुम्हें तो उन्हीं से शादी कर लेनी चाहिए थी.’’ वह चुप हो जाता, फुजूल में बात का बतंगड़ बनाने से क्या फायदा.

मायके से लौटने के बाद जुगुनी के तेवर बदलेबदले से थे. वह बारबार तेजेंद्र से उस की तनख्वाह और खर्च के बारे में पूछने लगी थी. पहले तो तेजेंद्र झल्ला गया, फिर, उस ने शांत मन से बतलाया, ‘‘मैं तो खर्चे का पैसा यथास्थान डब्बे में डाल ही देता हूं जहां से जिसे जितनी जरूरत हो, निकाल सकता है. कभी मैं ने यह नहीं पूछा कि किस मद में कितना पैसा खर्च हुआ है. तुम्हें भी अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए पर्याप्त पैसे दे देता हूं. फिर तुम ये सब क्यों पूछ रही हो?

घर के लिए कमाता हूं और घर पर ही खर्च करता हूं. मेरी कोई ऐसीवैसी नाजायज आदत तो है भी नहीं कि पैसे का दुरुपयोग करूं. हां, तुम जब चाहो, मुझ से हिसाब ले सकती हो.’’ जुगुनी आवेश में आ गई, ‘‘हांहां, मुझे सब पता है. तुम झूठे नंबर वन हो. सारा पैसा अपने घर, अपने भाईबहनों को भेज देते हो. तभी तो हमें इतनी तंगहाली में दिन गुजारने पड़ रहे हैं. उन कमीनों ने तुम्हारे ऊपर जादू कर के तुम्हें अपने वश में कर रखा है.’’

रोजरोज के ऐसे ताने सुन कर तेजेंद्र गुस्से में आ जाता. वह सोचता कि इतने रुपए खर्च करने और इतने आरामऐश से रखने पर भी जुगुनी की शिकायत बनी रहती है. पर वह कोई जवाब दिए बिना ऊपर छत पर चला जाता.

जुगुनी के मायके से आने के बाद कोई 2 हफ्ते ही गुजरे होंगे कि उस का जी मतलाने और सिरदर्द तथा बुखार आने की वजह से तेजेंद्र उसे डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने सारे चैकअप करने के बाद बताया कि जुगुनी गर्भवती है. डाक्टर की घोषणा पर तेजेंद्र झूम उठा, ‘‘अरे, मैं ने तो इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था कि तुम्हारा पति बनने के बाद पिता भी बनना होगा.’’ उस ने डाक्टर के यहां से घर लौटते समय रास्ते में ही मिठाई खरीदी और पड़ोस के हरेक घर में बंटवाई.

अगले दिन, औफिस में दोस्तों का भी मुंह मीठा करवाया. जुगुनी ने अम्मा को फोन कर के यह खुशखबरी दी तो उधर की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी, ‘‘देखा न, मेरे कर्मकांडों का असर. अगर यह सब मैं न करती तो तुम्हें जीवनभर बांझ औरत होने का ताना खुद अपने ससुरालियों और पति से सुनना पड़ता. अब तेजेंद्र को उस औफिस वाली रखैल को छोड़ कर वापस तुम्हारे पास आना ही पड़ेगा.’’

जीजा और कमलेंद्र की ओर से भी शुभकामनाएं आईं. पर, जुगुनी इस उधेड़बुन में थी कि वह किस को धन्यवाद दे? मुंबई वाले मौलवी को या अपने मायके वाले कर्मकांडियों को या अपनी रिश्ते की बहन-कल्लो को, या तेजेंद्र के भाई को? सभी ने उसे पेट से होने के लिए क्याक्या उपाय नहीं किए थे.

महीने और साल गुजरते गए. पहला बेटा होने के कोई 5 वर्षों बाद दूसरी संतान बिटिया के रूप में हुई. तेजेंद्र ने एक आदर्श परिवार का निर्माण किया. वह जिस तर्कपूर्ण वैज्ञानिक दौर में जी रहा था, उस में उस ने अपने बलबूते पर एक अच्छे इलाके में अपने लिए एक घर लिया, एक कार खरीदी और जरूरत के अधिकतर सामान इकट्ठे किए.

कहीं किसी औघड़ द्वारा तावीज पहन कर उसे ये चीजें मुहैया नहीं हुईं, जबकि सास का यह दावा था कि उस के अमुक पूजापाठ करवाने की वजह से तेजेंद्र एयर कंडीशन और वाशिंग मशीन खरीद सका. मेरे द्वारा फलानी देवी मइया के दर्शन से वह कार और स्कूटर खरीद पाया और प्रयाग में महाकुंभ स्नान करने पर वह अपने मकान में गृहप्रवेश कर सका.

अगर वह इतने ढेर सारे तामझाम और टोनेटोटके न करती तो वह सड़कछाप ही रह गया होता. बहरहाल, घर में कीमती सामान इकट्ठे कर के जुगुनी पूरे महल्ले में इतरा रही थी और पड़ोसवाले दिनेशजी, राय साहब व चौधरी साहब के बराबर अपनी हैसियत होने का वहम पाल रही थी.

पर, उफ्फ, तेजेंद्र के साथ सब से बुरी बात यह हुई कि छोटी बहनों में दूसरे नंबर की बहन मीठी की अचानक मौत हो गई. डाक्टरों ने कभी उसे क्षयरोग की दवा दी तो कभी निमोनिया की. कभी उसे पीलिया से ग्रस्त बताया गया तो कभी थैलीसीमिया से.

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