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घर बैठे लिंक करें अपना पैन और आधार कार्ड

अगर आपका पैन नंबर और आधार अभी तक लिंक नहीं हो पाया है तो परेशान न हों. आपके लिए अब आयकर विभाग यानी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने भी ऐसी फैसिलिटी शुरू कर दी है जिससे आप आसानी से घर बैठे-बैठे ऑनलाइन इसे लिंक कर सकते हैं.

आयकर विभाग ने स्थायी खाता संख्या (पैन) और आधार में नामों में गलतियों और दूसरे ब्यौरे को ठीक करने के लिए एक ऑनलाइन सिस्टम शुरू किया है. इनकम टैक्स विभाग ने अपनी ई-फाइलिंग वेबसाइट पर बायोमेट्रिक पहचान आधार और पैन को जोड़ने की सुविधा के साथ दो अलग हाइपरलिंक भी पेश किए हैं.

इनमें एक मौजूदा पैन-डेटा में बदलाव के लिए और भारतीय या विदेशी नागरिक द्वारा नए पैन के लिए आवेदन से संबंधित है. और दूसरा हाइपरलिंक उन लोगों के लिए है जो अपने आधार ब्यौरे को अपडेट करना चाहते हैं. इसके लिए वे अपनी विशिष्ट पहचान संख्या का इस्तेमाल कर ‘आधार सेल्फ सर्विस अपडेट पोर्टल’ पर लॉग कर सकते हैं. इसके बाद लोग स्कैंड दस्तावेजों को डेटा अपडेट रिक्वेस्ट के सर्टिफिकेशन के रूप में अपलोड कर सकते हैं.

करीब 1.22 करोड़ लोगों ने आधार को पहले ही पैन से जोड़ लिया है. हालांकि, यह आंकड़ा इस लिहाज से काफी कम है कि देश में 25 करोड़ पैन कार्ड धारक हैं. वहीं आधार 111 करोड़ लोगों को जारी किया गया है. इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 6 करोड़ लोग आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं.

वित्त अधिनियम, 2017 में करदाताओं के लिए पैन को आधार से जोड़ना अनिवार्य बनाया है. सरकार ने पैन के लिए आवेदन देने के लिए आधार होना अनिवार्य बना दिया है, यह एक जुलाई, 2017 से लागू होगा.

ऐसा करने से सरकार को यह स्थापित करने में मदद मिलेगी कि उसकी सब्सिडी लक्षित वर्ग तक पहुंच रही हे और आयकर विभाग लाभार्थी और आयग्रुप में लिंक की पुष्टि कर सकता है. सरकार कर चोरी पर रोक लगाने तथा कालेधन पर निगरानी के लिए आधार को बहुत ही प्रभावी उपाय मानती है.

किआरा अडवाणी की सिफारिश कर रहे हैं सुशांत सिंह राजपूत

बालीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि सुशांत सिंह राजपूत भले ही किआरा अडवाणी के नजदीक नजर आ रहे हों, मगर वह फिल्मों के लिए किआरा अडवाणी की सिफारिश कर रहे हैं. इसके पीछे वजहें हैं. वास्तव में सुशांत सिंह राजपूत इन दिनों निर्देशक राबी ग्रेवाल के निर्देशन में जासूसी रोमांचक फिल्म ‘‘रोमियो अकबर वाल्टर’’ कर रहे हैं. इसी फिल्म के निर्देशक राबी ग्रेवाल ने पिछले दिनों किआरा अडवाणी को अपने आफिस में बुलाकर एक फिल्म की पटकथा सुनायी. पूरे दो घंटे तक यह बैठक चली. उसके बाद किआरा अडवाणी ने इस फिल्म को करने के लिए हामी भर दी. वैसे किआरा अडवाणी ने अभी तक फिल्म करने के लिए अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. पर वह फिल्म का नाम भी उजागर नहीं करना चाहती.

सर्वविदित है कि सुशांत सिंह राजपूत इससे पहले किआरा अडवाणी के संग फिल्म ‘‘एम एस धोनी’’ कर चुके हैं. बालीवुड में लंबे समय से चर्चा रही है कि वह अपनी एक सहकलाकार के नाम की सिफारिश फिल्मकारों से कर रहे हैं. पर अब तक लोगों को लग रहा था कि व कृति सैनन की सिफारिश कर रहे होंगे. मगर अब चर्चा है कि राबी ग्रेवाल को किआरा अडवाणी का नाम सुशांत सिंह राजपूत ने ही सुझाया होगा..खैर..आज नहीं तो कल सच सबके सामने होगा.

अब दलजीत कौर ने गुदवाया टैटू

इन दिनों टीवी कलाकारों  के सिर पर भी टैटू गुदवाने का भूत सवार है. ऐसे में भला टीवी कलाकार दलजीत कौर कैसे पीछे रह जातीं. उन्होंने भी अपने हाथ पर एक लंबा सा टैटू गुदवाया है. टैटू गुदवाकर उत्साहित दलजीत कौर ने खुद हमसे इसकी चर्चा करते हुए कहा-‘‘टैटू गुदवाकर बहुत खुश हूं. मैंने अपनी भुजा पर टैटू गुदवाया है. यह मेरे बेटे जयदान के नाम के साथ ‘वाइकिंग’ चिन्ह और दिल की धड़कनें हैं.

‘वाइकिंग’चिन्ह जीवन में संपूर्णता और खुशियों के भरे होने का प्रतीक है. फिर बेटे के नाम के साथ दिल की धड़कन को गुदवाना, मेरा अपने बेटे को बताने का तरीका है कि वह मेरी जिंदगी है. मेरे दिल की धड़कन वही है. मेरे यह टैटू मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं. मैं इसे बहुत गंभीरता से लेती हूं.’’

क्यों गमगीन हैं अनिरूद्ध दवे

धीरज कुमार निर्मित सीरियल ‘‘यारों का टशन’’ को 218 एपीसोड के प्रसारण के बाद अचानक बंद करने के निर्णय से सबसे अधिक गमगीन अभिनेता अनिरूद्ध दवे हैं. आखिर उनके गमगीन होने की वजह जानने के लिए जब हमने अनिरूद्ध दवे से बात की, तो अनिरूद्ध दवे ने भरी दुःखी मन से कहा- ‘‘इस सीरियल में अभिनय करने का मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा. इस सीरियल का मेरा किरदार काफी चुनौतीपूर्ण रहा. इस सीरियल ने मुझे बच्चों के बीच लोकप्रिय बना दिया. मैं कुछ समय पहले लखनऊ एक स्कूल के कार्यक्रम में गया था, जहां आठ हजार बच्चे थे. सभी मुझसे मिलने व बात करने को आतुर थे. कुछ बच्चों ने तो मुझे अलग अलग तरह की टीशर्ट भेजी हैं. इसी के चलते मैं सीरियल ‘यारों का टशन’ के सेट, इससे जुड़े कलाकारों को ‘मिस’ कर रहा हूं. और अंदर से काफी गमगीन हूं. मुझे लगता है कि यदि हर इंसान ‘यारों का टशन’ के मेरे किरदार की भांति हो जाए, तो चीजें बहुत सहज हो जाएं. यह जो अनुभव है, उसे भी मैं मिस कर रहा हूं.’’

भुगतान का नया तरीका आधार पे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के बाद देश में डिजिटल भुगतान की जो नई अवधारणा शुरू की उस का सकारात्मक असर बाजार में दिखाई देने लगा है और लोग बड़े स्तर पर डिजिटल भुगतान व्यवस्था का इस्तेमाल करने लगे हैं. मोबाइल रिचार्ज, बिजली, गैस, पानी आदि के बिलों का भुगतान बड़े स्तर पर औनलाइन व्यवस्था के जरिए किया जा रहा है. युवा पीढ़ी सचमुच बड़े स्तर पर यह व्यवस्था अपना रही है. स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने वाले ज्यादा लोग मोबाइल वौलेट का प्रयोग कर रहे हैं. यह उन के लिए भुगतान का सब से आसान तरीका है.

सरकार कम पढ़ेलिखे लोगों में भी इस का प्रचलन बढ़ाने का प्रयास कर रही है और इस के लिए उस ने आधार पे के जरिए भुगतान का नया तरीका निकाला है. आधार पे के माध्यम से ग्राहक को अपने आधार नंबर या अंगूठे का निशान लगा कर भुगतान करना होता है. इस के लिए इंटरनैट डाटा की जरूरत भी नहीं होती है. दुकानदार को ऐप डाउनलोड कर के अपने मोबाइल नंबर तथा आधार नंबर दे कर खुद को पंजीकृत कर के  इस सेवा का इस्तेमाल शुरू करना होता है. इस का बड़ा लाभ उन उपभोक्ताओं को मिलेगा जिन के पास क्रैडिट कार्ड या डैबिट कार्ड नहीं हैं. अंगूठे का निशान दे कर उपभोक्ता अपने सामान का भुगतान कर सकते हैं. इस ऐप का इस्तेमाल करने वाले दुकानदारों के लिए सरकार ने प्रोत्साहन योजना भी शुरू की है.

निश्चितरूप रूप से आधार पे तकनीक का लाभ उन लाखोंकरोड़ों लोगों को मिलेगा जो मोबाइल वौलेट, डैबिट, क्रैडिट कार्ड या मोबाइल फोन का भुगतान करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं. सरकार के डिजिटल इंडिया का सपना साकार करने की दिशा में यह महत्त्वपूर्ण कदम है.

सरकार ने भीम तथा रुपे जैसे ऐप भी शुरू किए हैं लेकिन जिस स्तर पर उन्हें लोकप्रियता मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली और इस के लिए सरकार का तंत्र ही दोषी है. सरकार ने देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए अलग से एक नियम भी बनाया था लेकिन नोटबंदी के दौरान उसे जो लोकप्रियता मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल पाई.

परम सिंह और हर्षिता गौड़ में हुआ अलगाव

एक तरफ बौलीवुड की शादीशुदा जोड़ियां बिखर रही हैं, तो दूसरी तरफ टीवी इंडस्ट्री से भी कोई अच्छी खबर नहीं आ रही है. एक तरफ टीवी अभिनेत्री मुस्कान मेहानी की साढ़े तीन वर्ष पुरानी शादी टूटने के कगार पर है, तो दूसरी तरफ टीवी कलाकार परम सिंह और टीवी अभिनेत्री हर्षिता गौड़ का शादी से पहले ही अलगाव हो चुका है. टीवी इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों की माने तो परम सिंह और हर्षिता के बीच पिछले दो वर्ष से रोमांस चल रहा था. लोग बेसब्री से इनकी शादी की तारीख सुनने का इंतजार कर रहे थे. मगर अब खबर आ गयी है कि दोनों अलग हो चुके हैं.

मजेदार बात तो यह है कि परम सिंह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि हर्षिता के संग कभी वह रोमांस फरमा रहे थे. हां! परम सिंह दावा कर रहे हैं कि हर्षिता से उनका कभी कोई रिश्ता नहीं रहा. वह दोनों तो हमेशा से दोस्त रहे हैं.

खुद परम सिंह ने हमसे बात करते हुए कहा-‘‘हर्षिता मेरी बहुत अच्छी दोस्त है. इसलिए कुछ लोग जलन के कारण इस तरह की खबरें फैला रहे हैं. मगर हम दोनों को इस तरह की खबरों से कोई फर्क नहीं पड़ता. वह कल भी मेरी अच्छी दोस्त थीं और आज भी मेरी अच्छी दोस्त हैं. हमारी मित्रता बनी रहेगी.’’

‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’ में आमिर खान की प्रेमिका कौन?

बौलीवुड में कुछ भी संभव है. लोग फिल्म के प्रचार के लिए अजीबो गरीब खबरें फैलाते रहते हैं. विजय कृष्णन के निर्देशन में बन रही ‘यशराज फिल्मस’ की फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’’ में दो नायिकाएं है. दोनों के ही किरदार काफी सशक्त हैं. एक नायिका आमिर खान के किरदार के दल का हिस्सा है, जबकि दूसरी नायिका एक ब्रिटिश लड़की है, जिससे आमिर खान के किरदार को प्यार होता है. आमिर खान के दल का हिस्सा होने वाली नायिका जबरदस्त एक्शन करते हुए नजर आएगी. यानी कि वह एक फाइटर होगी.

जब ‘‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’’ के लिए कटरीना कैफ के बाद ‘दंगल’ फेम अदाकारा फातिमा सना शेख को अनुबंधित किया गया, तो मीडिया में प्रचारित किया गया कि ‘‘दंगल’’ में आमिर खान व फातिमा सना शेख, पिता पुत्री के किरदार में थे और अब ‘‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’’ में फातिमा सना शेख, आमिर खान की प्रेमिका बनी हैं. इतना ही नहीं यह भी प्रचारित किया गया कि आमिर खान किस तरह फातिमा सना शेख को प्रेम के गुण सिखा रहे हैं.

जबकि सूत्रों का दावा है कि फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’’ में कटरीना कैफ उस ब्रिटिश लड़की के किरदार में नजर आएंगी, जिससे आमिर खान के किरदार को प्यार होता है. तथा इस फिल्म में फातिमा सना शेख, आमिर खान के दल का हिस्सा हैं. फिल्म ‘दंगल’ में फातिमा सना शेख एक्शन कर चुकी हैं. इस कारण इस फिल्म में उन्हें एक्शन प्रधान किरदार के लिए चुना गया है.

‘नूर द रेडिंयस’ में दिखा लखनवीं अंदाज

लखनऊ के फैशन में चिकनकारी का अपना महत्व होता है. ‘नूर द रेडिंयस औफ वुमन’ में चिकनकारी के खूबसूरत नजारे दिखाई दिये. इसमें चिकनकारी का खूबसूरत अंदाज पेश किया गया. इसमें साड़ी, कुर्ता, पायजामा और स्कर्ट को खूबसूरत अंदाज में पेश किया. डिजाइनर ओमदीप मोटियानी और प्रतिमा अहिरवार ने अपने कलेक्शन पेश किये गये. इसमें ब्राइडल साडी से लेकर लंहगे और शेरवानी के अलगअलग डिजाइंस के पेश किये गये. फैशन शो में चंचला मोइत्रा द्वारा तैयार की गई पेपर ज्वेलरी का प्रयोग किया गया.

एंपावर उत्तर प्रदेश द्वारा पेश किये गये इस कार्यक्रम की शुरूआत लखनवी कथक में हुई. इसमें महिला के हर रूप को दिखाया गया. मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी और एंपावर उत्तर प्रदेश की प्रेसीडेंट श्वेता सिंह, विपुल जायसवाल, शांभवी सिंह और पर्वतारोही आईपीएस अधिकारी अपर्णा कुमार ने कठिन हालातों में काम करने वाली बबिता देवी, गीता और संजू वर्मा को नूर अवार्ड से सम्मानित किया.

उत्तर प्रदेश सरकार की मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि हमें लड़कियों की परवरिश कुछ इस तरह से करनी चाहिये कि वह हर हालात का मुकाबला कर सके. जिससे समाज में वह अपने दम पर रह सके. एंपावर उत्तर प्रदेश की प्रेसीडेंट श्वेता सिंह ने कहा कि हम महिलाओं को मजबूत करना चाहते हैं. जिससे वह अपनी राह खुद चुन सके.

जब छूट जाए साथ जीवनसाथी का

पहले के समय में 50 वर्ष के बाद वानप्रस्थ का नियम घर में सही तालमेल व पारिवारिक शांति के दृष्टिकोण से बनाया गया होगा. बेटे का गृहस्थाश्रम में प्रवेश और बहू के आगमन के साथ ही परिवार की सत्ता का हस्तांतरण स्वाभाविक समझ कर वानप्रस्थ की कल्पना की गई होगी.

लेकिन, आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं. आधुनिक मैडिकल साइंस ने विभिन्न बीमारियों से नजात दिला कर उत्तम स्वास्थ्य का विकल्प दिया है. उस ने मनुष्य को स्वस्थ जीवन दे कर उस की आयु बढ़ा दी है. आज पुरुष हो या स्त्री, स्वस्थ जीवनशैली अपना कर 80-85 वर्ष की आयु में भी वे खुशहाल जीवन जी रहे हैं.

समाज में आजकल एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है. मांबाप बच्चे को अच्छी शिक्षा के लिए बचपन से ही होस्टल या अपने से दूर दूसरे शहर में भेज देते हैं. उच्च शिक्षा के लिए तो उसे घर से दूर जाना ही होता है, यहां तक कि महानगरों में रहने पर भी बच्चों को होस्टल में रखा जाता है. नौकरी करने के लिए तो उन्हें अपने घरों से दूर जाना ही होता है.

नतीजतन, मांबाप लंबे समय तक स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जीते हैं. घर से दूर रह कर बच्चों का भी स्वतंत्र रूप से जीने का स्टाइल और अपना अलग तौरतरीका बन जाता है.

ऐसी स्थिति में दोनों के लिए एकदूसरे की जीवनशैली के साथ सामंजस्य बिठाना कठिन होता है. इसलिए न तो मांबाप और न ही बच्चे अपनेअपने जीवन में हस्तक्षेप पसंद करते हैं. यही कारण है कि जब पतिपत्नी में से कोई एक अकेला बचता है तो अब वह क्या करे या कहां जाए जैसी समस्या उठ खड़ी होती है.

गोंडा के सतीश और उन की पत्नी विमला खुशहाल जीवन जी रहे थे. फलताफूलता व्यापार था. 1 बेटी पूजा, 2 जुड़वां बेटे. संपन्न परिवार का समाज में मानसम्मान भी खूब था. दोनों बेटों की आंखें बचपन से कमजोर थीं.

16 वर्ष की उम्र तक आतेआते दोनों बेटे आंखों की रोशनी खो बैठे. वे बेटों के इलाज को ले कर दिल्लीमुंबई भागदौड़ कर रहे थे, तभी दबे पांव पत्नी कैंसर से पीडि़त हो गई और शीघ्र ही उन की दुनिया उजड़ गई.

23 वर्ष की पूजा मां, भाई और गृहस्थी सबकुछ संभाल रही थी. उस की शादी की उम्र हो चुकी थी. बेटी की विदाई हुई तो वे फूटफूट कर रो पड़े थे. उस समय उन की उम्र 62 वर्ष थी. वे शरीर से स्वस्थ थे. 2 बेटे जवान परंतु उन का दृष्टिहीन जीवन व्यर्थ सा था. मेड के सहारे किसी तरह दिन बीतने लगे. जीवन अव्यवस्थित था. हर नया दिन नई उलझन और परेशानी ले कर आता.

तभी उन की बहन एक 50 वर्षीय अपनी परिचित महिला को ले कर उन के घर आई और एक हफ्ते उन के घर में साथ रही. महिला के पास अपने 2 बच्चे थे. वह तलाकशुदा थी. बहन सुधा ने उन के सामने उस महिला के साथ शादी का प्रस्ताव रखा था. काफी सोचविचार कर के सतीश ने अपनी बहन के सुझाव को स्वीकार कर लिया. शादी हो गई.

उन की बेटी पूजा ने नाराज हो कर उन से रिश्ता तोड़ लिया. सगेसंबंधियों ने भी समाज में उन का मजाक बनाया परंतु वे अपने निर्णय पर दृढ़ रहे और आज प्रसन्नतापूर्वक अपना जीवन जी रहे हैं. उन के  जीवन में फिर खुशियां लौट आई हैं. दूसरी पत्नी ने अपने अच्छे व्यवहार से टूटे रिश्तों को जोड़ लिया. उन की बेटी को भी उस ने अपने लाड़प्यार के बंधन में बांध कर अपना बनाया.

जिंदगी को मिली राह

इलाहाबाद की नीरजा बैंक मैनेजर की पत्नी थीं. वे दिमाग से थोड़ी कमजोर थीं और कभीकभी उन्हें हिस्टीरिया के दौरे पड़ जाते थे. पति नवीन ने प्यार से देखभाल की थी, इसलिए नीरजा की बीमारी के विषय में कोई कुछ नहीं जानता था. खुशहाल परिवार, 1 बेटी और 2 बेटे. सबकुछ सुखमय. बेटे, बेटी की शादियां संपन्न परिवारों में धूमधाम से हो चुकी थीं.

पति नवीन कैंसर रोग की गिरफ्त में आ गए और जल्द ही इस दुनिया से विदा हो गए. नीरजा को उन के छोटे बेटे ने संभाला. दोनों एकदूसरे का सहारा बन गए. 2 साल बीततेबीतते बेटे की शादी हुई. बहू के आते ही घर और रसोई के अधिकार उन के हाथ से फिसलने लगे. वे अवसाद से ग्रस्त होने लगीं. वे फुटबौल की तरह कभी बेटी, तो कभी बड़े बेटे, तो कभी छोटे बेटे के सहारे दिन गुजारने लगीं. उन को फिर से दौरा पड़ा. डाक्टर ने उन्हें अकेले न छोड़ने की सलाह दी. छोटी बहू को किसी प्रोजैक्ट के सिलसिले में सालभर के  लिए अमेरिका जाना था. वैसे भी नीरजा दिनभर घर में अकेली रह कर अपने जीवन से परेशान एवं निराश हो चुकी थीं.

उन्होंने स्वयं ही वृद्धाश्रम जाने का निश्चय किया. सब ने आपस में विचारविमर्श कर उन के निर्णय को स्वीकार कर लिया. अब वे वहां अन्य वृद्धों के बीच अधिक प्रसन्न व स्वस्थ हैं. उन के बच्चे आजादी से अपना जीवन जी रहे हैं. वे स्वयं भी अपने निर्णय से खुश व संतुष्ट हैं. अपने बच्चों के साथ अब उन के रिश्ते बहुत अच्छे हैं.

फर्रूखाबाद के श्रीनिवास पेशे से इंजीनियर थे. नौकरचाकर, बंगला सबकुछ था. 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. तीसरी बेटी की शादी की तैयारी में लगे थे. बेटा 16 वर्ष का ही था. तभी पत्नी गीता को हृदयरोग हो गया. उसी वर्ष वे रिटायर हो कर अपने पुश्तैनी घर लौटे परंतु पत्नी को ससुराल की चौखट नहीं भायी. अच्छे से अच्छे इलाज के बाद भी 6 महीने में ही उन की मृत्यु हो गई. श्रीनिवास अपने अकेलेपन को ले कर मानसिक रूप से तैयार थे क्योंकि डाक्टरों ने उन्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि उन की पत्नी कुछ ही दिनों की मेहमान है. उन्होंने मेड के सहारे अकेले अपनी गृहस्थी चलाई. अपनी कंसल्टैंसी शुरू की. अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मौर्निंग वाक, कसरत, नाश्ता आदि सबकुछ समय से करते. अपने शौक पूरे किए.

वे दैनिक समाचारपत्र में शहर की समस्याओं के विषय में पत्र लिखते थे. दवाइयों पर उन की अच्छी पकड़ थी, इसलिए छोटेमोटे मर्जों के लिए लोगों को मुफ्त दवा भी दिया करते थे. उन्हें अपने अकेलेपन से कोई शिकायत नहीं थी. उन्होंने प्रसन्न मन से जीवन को जिया. 

सच को स्वीकारें

ग्वालियर की सुनीता वर्मा का जीवन पलभर में बदल गया. तीनों बच्चों की शादी कर के वे पति के साथ आजाद जिंदगी जी रही थीं. बच्चे अपने जीवन में सुखी एवं व्यस्त थे और अपने घरौंदों में थे. सुनीता बड़ी सी कोठी की मालकिन थीं. आखिर, पति किसी समय में एक बड़ी कंपनी के वाइसप्रैसिडैंट रह चुके थे. सुखीसंपन्न जीवन था उन का. पति उन पर जान छिड़कते थे. वे स्वयं अकसर बीमार रहने लगी थीं, तो बेटे को दिल्ली से भागभाग कर आना पड़ता. ढलती उम्र और बीमारी को देखते हुए बेटे ने दोनों को अपने साथ दिल्ली ले जाने का निर्णय कर लिया. बेटा सीनियर इंजीनियर था, बड़ा सा फ्लैट, वहां कोई परेशानी नहीं थी. परंतु अपनी इतनी प्यार से संजोई हुई गृहस्थी को छिन्नभिन्न होते देख वे मन ही मन बहुत आहत हो उठी थीं.

मजबूरी के कारण वे उदास मन से बेटे के घर में शिफ्ट हो गईं. वे वहां एडजस्ट होने का प्रयास कर ही रही थीं कि साल बीतने के पहले ही एक रात पति को दिल का दौरा पड़ा और लाख प्रयास करने पर भी वे उन का साथ छोड़ कर दुनिया से विदा हो गए. सुनीता के लिए दुनिया सूनी हो गई थी. जो पति हर समय उन के आगेपीछे घूमते रहते थे उन की सारी इच्छाओं, आवश्यकताओं को बिना कहे समझ लेते थे, उन के बिना वे कैसे जिएं. वे नकारात्मक विचारों से घिर गई थीं. य-पि कि उन की उम्र 72 वर्ष थी परंतु सही इलाज से पूर्णतया स्वस्थ हो गई थीं.

धीरेधीरे बहू संध्या ने उन्हें अपने साथ कभी मौल, कभी फंक्शन, कभी किटी पार्टी आदि के बहाने घर से बाहर निकलने को प्रेरित किया. जल्दी ही उन्होंने सच को स्वीकार कर लिया कि अब उन्हें अकेले मजबूत बन कर जीवन जीना है. बचपन से ही उन्हें पढ़ने व जानकारी हासिल करने का शौक था. अब वे रोज सुबह घंटों समाचारपत्र, पत्रिकाएं पढ़तीं और शाम को 5 बजे नजदीक के एक महिला क्लब में जातीं जहां महिलाएं सामाजिक विषयों पर चर्चा करती हैं. महिलाएं अपने लेख या कहीं से कुछ अच्छा विषय पढ़ कर एकदूसरे को सुनाती हैं. जीवन की इस नई पारी में वे व्यस्त एवं प्रसन्न हैं.

बेटे, बहू और बेटियां उन की व्यस्त दिनचर्या से खुश हैं. परिवार में कोई तनाव या नोकझोंक नहीं, बल्कि सबकुछ व्यवस्थित है.

चलती रहे जिंदगी

फतेहपुर के किशनपुर गांव के मदनमोहन पांडे पेशे से अध्यापक थे. अपनी पत्नी राधा के साथ सुखी जीवन जी रहे थे. दोनों एकदूसरे को पूर्णतया समर्पित थे. बच्चे हुए नहीं, परंतु उन के मन में कोई अफसोस नहीं था. अचानक एक दुर्घटना में पत्नी इस दुनिया से विदा हो गई. उसी साल उन का रिटायरमैंट हुआ था. न कोई कामकाज, न कोई जिम्मेदारी. उन की दुनिया सूनी हो गई थी.

उस समय उन के घर की मेड ने घर को संभाला. महल्ले के बच्चों के प्यारभरे अनुरोध को वे नहीं टाल सके थे और घर पर निशुल्क कोचिंग शुरू कर दी. बच्चों को अच्छी पुस्तकों के लिए यहांवहां भटकते देख उन्होंने साथी अध्यापकों और परिचितों की मदद से अपने घर में ही लाइब्रेरी बनाने का निर्णय किया.

उन का छोटा सा प्रयास जन आंदोलन बन गया. आज 75 वर्ष की अवस्था में वे अपने कार्य में लीन हैं. छोटे से गांव में समाज के विरोध को नकारते हुए उन्होंने अपनी मेड सरोज को अपने घर में रखा, उस के बेटे को पढ़ालिखा कर इंजीनियर बनाया और उसे ही अपने घर का उत्तराधिकारी बना कर वसीयत कर दी. दैनिक समाचारपत्र, पत्रिकाओं आदि के लिए लोगों की भीड़ उन के सूने घर को रौनक से भर देती है. आज समाज में वे सम्मानित दृष्टि से देखे जाते हैं.

निष्कर्ष यह है कि यदि आप का जीवनसाथी इस दुनिया से विदा हो गया है और अब आप अकेले रह गए हैं तो इस सच को स्वीकार करना होगा कि सबकुछ समाप्त नहीं हुआ है बल्कि आगे जाना है. हमें अपने जीवन को रचनात्मकता देनी है. यदि हमें अपने बेटे या बेटी के साथ ही रहना है तो उस से अनावश्यक अपेक्षा एवं कदमकदम पर टोकाटाकी के स्थान पर स्वयं को उस की परिस्थिति पर रख कर विचार करने की जरूरत है. आज स्थितियां बदल चुकी हैं. जीवन के संघर्ष एवं आपाधापी में हमारे बच्चे अपने झंझावातों से गुजर रहे हैं. उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में, अपने परिवार में हर क्षण नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. यह सही है कि आप के पास अनुभव अधिक है परंतु अपने समय को याद करें जब आप को भी अपने बुजुर्गों का अनावश्यक हस्तक्षेप या मीनमेख रुचिकर नहीं लगता था. संभवतया आप ने चुप रह कर उन्हें अनसुना कर दिया था. परंतु आज की पीढ़ी चुप रहने वाली नहीं है, मुंहफट है.

यदि जीवन में नई शुरुआत करनी है तो कभी देर नहीं होती. उम्र के हर पायदान पर जीवन की खुशियां झोली फैला कर आप की राह देखती रहती हैं.

भारत बना चैंपियंस ट्रॉफी का विजेता तो..

क्रिकेट दुनिया के सबसे धनी खेलों में शुमार है. ऐसे में हर बड़े गेम के लिए करोड़ों रुपए प्राइज मनी रखी जाती है. इसी क्रम में इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) ने 1 जून से इंग्लैंड में होने वाली आईसीसी चैंपियन ट्रॉफी 2017 के लिए दी जाने वाली प्राइज मनी घोषणा कर दी है.

इस घोषणा को सुनते ही चैंपियंस ट्रॉफी में विजेता बनने वाली टीम की खुशी इस बार और बढ़ने वाली है. आईसीसी ने इस साल की चैंपियंस ट्रॉफी की इनामी राशि 500,000 डॉलर बढ़ाकर इसे 45 लाख डॉलर कर दी है, जिसमें टूर्नामेंट की चैंपियन टीम को 22 लाख डॉलर की राशि मिलेगी.

आईसीसी ने घोषणा की, ‘इंग्‍लैंड एवं वेल्स में 1 से 18 जून तक होने वाली आगामी आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी की कुल इनामी राशि 45 लाख डॉलर होगी और आठ टीमों के टूर्नामेंट में विजेता टीम को अब 22 लाख डॉलर का चेक मिलेगा.’ उप विजेता टीम को 11 लाख डॉलर का चेक मिलेगा जबकि सेमीफाइनल में पहुंचने वाली अन्य दो टीमों को 450,000 डॉलर मिलेंगे.

प्रत्येक ग्रुप में तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम को 90,000 डॉलर जबकि ग्रुप में अंतिम स्थान पर रहने वाली टीमों को 60,000 डॉलर मिलेंगे.

गौरतलब है कि पिछली बार 2013 में हुई चैंपियंस ट्रॉफी में महेंद्र सिंह धोनी की कप्‍तानी वाली टीम इंडिया चैंपियन रही थी. उस समय भारतीय टीम ने फाइनल में इंग्‍लैंड को पांच रन से हराया था. वर्षा के कारण यह फाइनल मैच 20-20 ओवर का कर दिया गया था. मैच में भारतीय टीम ने पहले बैटिंग करते हुए सात विकेट खोकर 129 रन बनाए थे जवाब में इंग्‍लैंड की टीम आठ विकेट खोकर 124 रन ही बना पाई थी.

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