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सफर अनजाना

अपने पति और बच्चों के साथ मैं मायके जा रही थी. मायका एक ऐसे कसबे में है जहां जाने के लिए डायरैक्ट बस नहीं है. कई गांवों से गुजरते हुए, छोटेछोटे वाहन, जैसे जीप, आटो अकसर ही जाते हैं. उस के पहले वाले कसबे में, जहां से आटो आदि मिलते हैं, वहां हम सब बस से उतरे. जाड़े का समय था. शाम 6 बज गए थे. वहां पहुंचने के बाद पता चला कि आज आटो वालों की हड़ताल है तो हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई. वहां से मेरा मायका 15 मिलोमीटर दूर था. कोई साधन न मिलने से हम काफी घबरा गए.

अंधेरा बढ़ता जा रहा था. अचानक एक रिकशे वाला पास आ कर बोला, ‘‘अरे मैडम आप लोग यहां? दरअसल वह रिकशेवाला गणेश था जो हमारे यहां शहर में 2 वर्ष पहले काम करता था. हम लोगों ने अपनी परेशानी बताई. उस ने फौरन एक  जीप की व्यवस्था की और हमारे साथ मायके तक हमें पहुंचाने भी गया.

आज भी जब मायके जाने की बात आती है तो उस सफर और गणेश की इंसानियत की अनायास याद आ जाती है.  

माधुरी कुशवाहा

*

मैं ट्रेन से अजमेर से इंदौर जा रहा था. ट्रेन नागदा स्टेशन से गुजर रही थी, समय सुबह 4 या 4:30 बजे का रहा होगा. स्टेशन पर गाड़ी कुछ समय रुकी. वहां एक सज्जन अपने सूटकेस के साथ चढ़ गए. उन का जहां आरक्षण था, उस बर्थ पर उन्होंने अपना बिस्तर बिछाया. चूंकि उन की बर्थ सब से ऊपर थी, सो उन्होंने अपनी अटैची को सब से नीचे की बर्थ के नीचे चेन से बांध कर ऊपर जा कर सो गए.

ट्रेन नागदा से उज्जैन पहुंची ही होगी कि उन के फोन पर घंटी सुनाई दी. उन्होंने फोन उठाया. नागदा की पुलिस चौकी से कोई उन से कह रहा था कि आप की अटैची से किसी ने आप का लैपटौप निकाला है. वह हमें ट्रेन के टौयलेट में मिला जब हम गश्त लगा रहे थे. चूंकि उस में आप का मोबाइल नंबर था, हम ने आप के मोबाइल पर सूचना दी. आप यहां आएं और अपना लैपटौप ले जाएं.

वे सज्जन नीचे उतरे और हक्केबक्के रह गए. उन की अटैची वैसे ही चेन से बंधी थी. परंतु किसी ने अटैची से लैपटौप निकाल लिया. चूंकि पुलिस वाले गश्त लगाते हैं इसलिए चोर को इतना मौका नहीं मिला कि वे उसे ले कर नीचे उतर सकता. पुलिस की सतर्कता के कारण टौयलेट में पड़ा  हुआ लैपटौप उन सज्जन को वापस  मिल गया.    

विवेकानंद पेडणेकर

 

 

यह भी खूब रही

मेरी एक सहेली है जो औनलाइन खरीदारी की बहुत शौकीन है. एक बार हम सब किसी काम से लखनऊ गए. काम पूरा होने के बाद हम लोग चिकनकारी वाले कपड़े खरीदने बाजार जाना चाहते थे.

पुराने बाजारों की गलियों में बनी दुकानों में जा कर दोस्तों संग घूमते हुए, खरीदारी में जो मजा है, वह औनलाइन शौपिंग में कहां. यही समझ कर हम अपनी डिजिटल सहेली को बाजार ले गए. वहां जैसे ही एक दुकान में पहुंचे तो मेरी सहेली दुकानदार से बोली, ‘‘भैया, औनलाइन कुर्तियां दिखाना.’’ उस की बात सुन कर दुकानदार तो नहीं हंसा, पर हम सब लोग अपनी हंसी रोक नहीं पाए. 

नीतू पाठक

*

मई के पहले हफ्ते में एक शादी के सिलसिले में मैं पटना गया था. मेरा एक करीबी दोस्त भी साथ गया था. गरमी चरम पर थी. मेरी साली के ननद की शादी थी. रात 8 बजे बरात दरवाजे लगी. रस्में होतेहोते रात के 12 बज चुके थे. मैं ने पता किया कि कहीं आराम करने की जगह मिलेगी तो पता चला कि छत खुली है. वहां बिस्तरतकिया भी है, आराम से सो सकते हैं.

मैं छत पर चला गया. वहां खुले आसमान के नीचे बिस्तर लगा था और गरमी भी न के बराबर थी. मैं बिस्तर पर लेट गया था पर नींद नहीं आ रही थी. तभी मुझे अपने दोस्त की याद आई. मैं ने उसे एक एसएमएस किया, ‘मैं छत पर अकेले हूं. बिस्तर भी लगा है. यहीं आ जाओ. रात मजे में कट जाएगी.’

थोड़ी देर में मेरी साली घबराई हुई छत पर मेरी पत्नी के साथ आई और बोली, ‘‘यह क्या मजाक है जीजाजी? यह तो अच्छा हुआ कि एसएमएस सिर्फ मैं ने पढ़ा, फिर दीदी को दिखाया. दीदी ने कहा, ‘‘चल, देखते हैं माजरा क्या है?’’

मैं ने पूछा कि आखिर मैं ने क्या किया है तो मेरी बीवी ने फोन पर गया मैसेज मेरे सामने कर दिया. तब मैं ने सिर पीट लिया और कहा, ‘‘यह तुम्हें कैसे मिला.’’ तो उस ने कहा, ‘‘आप ने इसी नंबर पर भेजा है तो इसे ही मिलेगा न.’’

अब बात मेरे समझ में आई थी. छत पर लेटेलेटे ही बिना चश्मे के मैं ने गलत नंबर पर मैसेज भेज दिया था. दरअसल, मेरे दोस्त और मेरी साली के नाम (ज्योति) एक ही थे, सिर्फ सरनेम अलग थे. मित्र का सिंह और साली का सिंहा. इस चक्कर में मैं ने सिंह की जगह सिंहा को एसएमएस कर दिया. मैं ने किसी तरह साली और बीवी की कन्फ्यूजन दूर की.  

श्रीप्रकाश

 

पासबुक में बैंक देंगे लेनदेन का पूरा और स्पष्ट विवरण

एटीएम के इस्तेमाल तथा सेविंग बैंक के खातों में जमा न्यूनतम राशि को ले कर बैंकों ने नियमों में बदलाव किया है. इन बदलावों की खबरें समाचार माध्यमों में तो आईं लेकिन शायद वे सभी ग्राहकों तक नहीं पहुंचीं जिस से बैंक के ग्राहकों में भ्रम की स्थिति है.

बैंकों को इस भ्रम को दूर करने के लिए ग्राहकों को सूचना देनी चाहिए थी लेकिन मोबाइल, मेल या डाक द्वारा ग्राहकों को नियमों में बदलाव की सूचना नहीं दी गई. बैंक ग्राहक का कितना पैसा किस लेनेदेन पर काटता है, उस की ग्राहक को स्पष्ट सूचना नहीं दी जाती है जिस से ग्राहकों में हमेशा भ्रम की स्थिति बनी रहती है. इस भ्रम को दूर करने के लिए रिजर्व बैंक ने देश के सभी बैंकों को ग्राहकों की पासबुक पर उन के खाते से हुए लेनदेन का स्पष्ट विवरण लिखने को कहा है.

नए नियम के तहत बैंकों को लेनदेन का पर्याप्त और स्पष्ट विवरण ग्राहकों को उपलब्ध कराना है. नई नियमावली के तहत लेनदेन करने वाले का नाम, लेनदेन किस तरीके से किया गया, इस में कितना शुल्क बैंक ने लिया है या जुर्माना लगाया आदि मदों में काटे गए सभी विवरण स्पष्ट रूप से ग्राहक की पासबुक में प्रिंट किए जाने की हिदायत बैंकों को दी गई.

बैंक पहले यह सूचना देने के गूढ़ तथा जटिल तरीके अपनाते थे जो ग्राहक की समझ में नहीं आते थे. इस का सीधा फायदा बैंक उठाते थे. बैंक सामान्य व्यक्ति की बात आसानी से सुनते भी नहीं हैं. कुछ बैंक सामान्य शिकायतों के लिए बेहद जटिल रास्ते बताते हैं जिन की वजह से ग्राहक बैंकों की मनमानी पर चुप्पी साधना ही बेहतर समझते हैं.

बाजार में रही मजबूती

यूरोपीय क्षेत्र में जून माह में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की रफ्तार फीकी पड़ने और अमेरिका में बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदकों की संख्या ढाई लाख को पार करने का विश्व के शेयर बाजारों पर नकारात्मक असर देखा गया. हालांकि भारतीय बाजार में वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी लागू किए जाने के माहौल के बीच इस का असर ज्यादा नहीं रहा. बौंबे स्टौक एक्सचेंज का सूचकांक रिकौर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद मजबूत स्थिति में रहा. जीएसटी के धूमधाम से लागू होने और इस को ले कर जारी आशंकाओं को दूर करने के लिए किए जा रहे उपायों का भी बाजार पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला और निवेशकों में उत्साह का माहौल बना रहा.

हालांकि जीएसटी लागू होने से पहले निवेशकों का रुख कुछ ढीला पड़ा और वित्तीय बैंकिंग क्षेत्र में जम कर बिकवाली हुई जिस के कारण ईद के बाद बाजार में रौनक सुस्त रही और सूचकांक एक माह में एक दिन की सब से बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ. इस दौरान नैशनल स्टौक एक्सचेंज में भी गिरावट दर्ज की गई. डौलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर रहा. चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रियों को रोकने से दोनों  देशों के बीच उठे ताजा तनाव का बाजार पर नकारात्मक असर देखने को मिला.

प्रथम नागरिक

भारतीय जनता पार्टी एकएक कर के सभी मुख्य पदों पर कट्टरपंथी लोगों को बैठा रही है. भावी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ कार्यकर्ता रहे हैं. निष्ठावान समर्थक रहे हैं. दलित होते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदू मान्यताओं को स्वीकारा है जिन में कर्मवाद शामिल है. यह भारतीय जनता पार्टी का अधिकार है कि वह अपनी नीति के समर्थकों को महत्त्वपूर्ण पद दे क्योंकि उसे 2014 के बाद एक नहीं, कई चुनावों में सफलता मिली है.

राष्ट्रप्रमुख का पद आमतौर पर हर देश में सरकार प्रमुख के इशारों पर चलने वाले को मिलता है और दोनों में यदि यह समझौता न हो तो संवैधानिक गतिरोध पैदा हो जाता है. रामनाथ कोविंद चूंकि सत्तारूढ़ दल की बात दिल से सदा मानते रहे हैं, इसलिए उम्मीद नहीं है कि सरकार से कभी मतभेद होगा. हां,  विरोधी दलों का राष्ट्रपति से सरकार की शिकायत करनी महज औपचारिकता भर रह जाएगी.

कांग्रेस ने जब फखरुद्दीन अली अहमद, ज्ञानी जैल सिंह और प्रतिभा पाटिल जैसों को राष्ट्रपति बनाया था तो उस की भी इच्छा अपने यसमैन को रायसीना पहाड़ी पर बने राष्ट्रपति भवन में बैठाने की थी. भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ से एक सभ्य, सुसंस्कृत व साथसाथ दलित समुदाय से आने वाले को पद देने का फैसला कर परंपरा को दोहराया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिद्ध किया है कि वे सरकार पर पूरी पकड़ बनाए हुए हैं और उन की पार्टी ही नहीं, सहयोगी पार्टियों को भी उन का साथ देना पड़ेगा.

नरेंद्र मोदी के इस चयन पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती क्योंकि राष्ट्रपति होना ही ऐसा चाहिए जिस के बारे में विवाद कम हों और जिस की छवि साफसुथरी हो.

बरातों में नागिन डांस

शहर की सड़कों पर बरातों का निकलना आम बात है. इन की वजह से सड़क संकरी हो जाती है और सड़कों पर जाम लगने लगता है. यदि बरात चौराहे पर हो तो फिर चारों तरफ के रास्तों पर लंबा जाम लग जाता है. राहगीर हौर्न बजाते रह जाते हैं जबकि लोग नाचने में मगन रहते हैं. मेरे शहर की बरातों का तो क्या कहना, बरातियों का जोश देखते ही बनता है. बरात में नागिन डांस मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है. इस डांस के लिए बरातियों में बड़ा जोश दिखाई देता है. कुछ युवा तो इस डांस के लिए जम कर प्रैक्टिस भी करते हैं.

नागिन डांस करने वाला एक बराती रूमाल का एक छोर मुंह में दबा कर और दूसरा छोर हाथ में पकड़ कर सपेरा बन जाता है और बीन बजाने का अभिनय करता है जबकि दूसरा बराती नागिन की तरह डोलता है और बीचबीच में नागिन की तरह फुंफकारता भी है. कपड़ों की परवा किए बिना दोनों नागिन की धुन पर डांस करतेकरते सड़क पर लेट भी जाते हैं. यह तो एक उदाहरण है जो सड़कों पर निकलने वाली बरातों का आम नजारा पेश करता है. इस तरह के कई और डांस हैं जो बरात के चिरपरिचित हिस्सा हैं.

बरात में दूल्हे के दादादादी, नानानानी, मातापिता, चाचाचाची, भाईबहन, जीजाबहन से ले कर सारे करीबी और दूर के रिश्तेदारों को एकएक कर के डांस करने के लिए जबरदस्ती पकड़ कर लाया जाता है. कुछ तो डांस करने के इच्छुक ही रहते हैं. दूल्हे के मित्रगण बरात में डांस करने के लिए शराब का सेवन भी करते हैं और इस बाबत दूल्हे से पहले ही कमिटमैंट कर उचित राशि प्राप्त कर ली जाती है. अब तो बरात में महिलाएं भी डांस करने में पीछे नहीं हैं. वे भी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. इतने सारे लोग जब एक बरात का हिस्सा बनेंगे तो बरात को गंतव्य तक पहुंचने में समय तो लगेगा ही. जिस का खमियाजा सड़क पर चलने वाले राहगीरों को उठाना पड़ेगा. इन सब बातों से बरातियों को कोई लेनादेना नहीं. उन्हें तो बस अपना उत्साह दिखाना है. कुछ ऐसे भी राहगीर देखने को मिल जाएंगे जिन्हें डांस करने का बड़ा शौक होता है. वे भी इन बरात में अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते.

लेकिन बड़े दुख के साथ इन बरातियों को यह बताना पड़ेगा कि अब वे बरात में नागिन डांस नहीं कर पाएंगे क्योंकि इस डांस के कारण ही बरात को विवाहस्थल तक पहुंचने में विलंब होता है और सड़कों पर यातायात भी बाधित हो जाता है.

बरातियों पर जुर्माना

इसलिए मेरे प्रदेश के एक जिले के स्थानीय जिला प्रशासन ने निर्णय लिया है कि यातायात में बाधा बनने वाली इन बरातों के विरुद्ध कार्यवाही करने हेतु अब दूल्हे के घर वालों को बरात निकालने से पहले निकटतम थानों में जा कर इस की जानकारी देनी होगी कि बरात कहां से निकलेगी और कहां जा कर समाप्त होगी. इस दौरान आने वाली सूचनाओं के आधार पर ही यातायात और थाने की पुलिस बरातियों का मार्ग तय कर के देगी. जो बराती इस का पालन नहीं करेंगे उन बरातियों पर जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसे में लगता है कि आगे चल कर बरात को ज्यादा समय तक सड़कों पर विचरण करने पर भी प्रतिबंध लगेगा. जिस बरात में डांस करने का बरातियों को इंतजार रहता है, उस बरात का तो प्रशासन ने कबाड़ा ही कर दिया. अब तो बरात ऐसी लगेगी जैसे कोई मौन जुलूस जा रहा है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक बैंड पार्टी काफी मशहूर है. वह विदेशों में भी अपने बैंड का प्रदर्शन कर चुकी है. यही नहीं, कुछ फिल्मों में भी यह बैंड पार्टी नजर आई है. दूल्हा अपनी शादी में इसी बैंड पार्टी की मांग करता है. यदि इस बैंड की बुकिंग नहीं हो पा रही है तो घर वाले शादी की तारीख आगे बढ़ाने का भी मन बना लेते हैं. बरात कब निकलेगी, यह तो बैंड पार्टी पर निर्भर रहता है क्योंकि शहर में अच्छी बैंड पार्टियां कम होने के कारण ये बैंड 2 शिफ्ट में काम करते हैं. एक शिफ्ट शाम को 7 बजे से और दूसरी रात 9 बजे से. बराती भी यह पता लगा लेते हैं कि बैंड किस टाइम का है, उसी हिसाब से घर से निकलते हैं.

बैंड पार्टी में 2 व्यक्ति तो डमी होते हैं जो कोई वा-यंत्र नहीं बजाते मात्र न्योछावर में लुटाए जा रहे रुपयों को हथियाने का काम करते हैं. मुंह में नोट फंसा कर, हाथों में नोट थाम कर डांस करने वालों से नोट कैसे प्राप्त करने हैं, वे बखूबी जानते हैं. इन बरातों में कुछ जेबकतरे भी शामिल हो जाते हैं. बरात में दूल्हा चाहे घोड़ी पर बैठा हो या बग्घी पर या कार में, उस का पूरा ध्यान अपने बरातियों पर रहता है कि कौन डांस कर रहा है और कौन नहीं कर रहा है. कुछ रसूखदार अपनी आन, बान और शानोशौकत दिखाने के लिए जम कर हवाई फायर करते हैं. बरात में बिंदास बंदूकें दागी जाती हैं. अपनी खुशी जाहिर करने के लिए खुलेआम बंदूकें और पिस्तौल का इस्तेमाल कर बरात की शोभा बढ़ाई जाती है. चाहे किसी की जान चली जाए, इन्हें कोई परवा नहीं.

अकसर वरमाला के समय हवाई फायर किए जाते हैं, जिस के कारण कभीकभी लोगों की जानें भी चली जाती हैं. इस पर तो पहले से ही प्रतिबंध है, फिर भी पुलिस वाले इन्हें क्यों नहीं रोक पाते? यह सोचने की बात है. 

बेवजह फुजूलखर्ची

इतने सारे प्रतिबंधों के साथ अगर बरात निकलती है तो बरातियों को क्या मजा आएगा. शहर में एक बार बहुत बड़ा भूकंप आया था. उस वर्ष शहर की जनता ने सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समितियों के पदाधिकारियों से निवेदन किया था कि भूकंप से हुई बरबादी के कारण इस वर्ष दशहरा मितव्ययिता के साथ मनाया जाए, यानी जो भी चंदा इकट्ठा हो, उस में से कुछ हिस्सा शहर के विकास में लगा दिया जाए. लेकिन समितियों के इन पदाधिकारियों का यह कहना था कि दशहरा साल में एक बार ही आता है, उसे भी हम अच्छे से न मनाएं, संभव नहीं है. हम तो हर साल की तरह ही दशहरा मनाएंगे. यही सिद्धांत बरात पर भी लागू होता है. लड़का एक बार ही दूल्हा बनता है और एक ही बार बरात निकलती है. सो, बरात का जो उत्साह है उस में कमी नहीं की जा सकती.

ऐसे में यदि बरात शीघ्रता से और किस मार्ग से निकलेगी, यह स्थानीय यातायात और थाने की पुलिस तय करेगी तो कहां तक उचित है. बरातियों की खुशियों का दमन किया जा रहा है. बरात तो हम निकाल रहे हैं, बरात का सारा खर्च हम उठा रहे हैं लेकिन बरात निकलेगी तो यातायात और थाने की पुलिस की सलाह पर. जैसा वे कहेंगे वैसा ही करना पड़ेगा.

बरात को विवाहस्थल तक पहुंचने में यदि समय लग रहा है तो ये लोग बरातियों को दौड़ाने पर मजबूर कर सकते हैं. यदि कुछ ज्यादा ही कठोर कानून बना दिए  और पालन न करने पर पता लगा दूल्हे और बरातियों को जेल ही जाना पड़ जाएगा. शहरवासी हर त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. दशहरा का चलसमारोह तो ऐतिहासिक होता ही है, अब गणेशोत्सव भी धूमधाम से मनाया जता है. इन दोनों चलसमारोहों में बैंड की धुनों पर समितियों के सदस्य नाचते और नागिन डांस करते हुए नजर आ जाएंगे. चाहे वह चलसमारोह हो या बरात, नृत्यकला का प्रदर्शन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है. ऐसे में यदि चलसमारोह या बरात को गंतव्य तक जल्द पहुंचने पर प्रशासन द्वारा दबाव बनाया जाता है, तो शहर की इन प्रतिभाओं का क्या होगा? नृत्य करने की इस परंपरा को लोग भूल ही जाएंगे.       

नागिन डांस ने तोड़ी शादी

देश में हर शादी बिना नागिन डांस के पूरी नहीं होती. लेकिन किसी को नागिन डांस से इतनी एलर्जी भी हो सकती है कि वह बरात ही लौटा दे तो सुन कर ताज्जुब होगा. बात अजीब है, लेकिन सच भी. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 29 जून, 2017 को अनुभव मिश्र की बरात प्रियंका त्रिपाठी के घर गई. जब अनुभव मिश्र की बरात प्रियंका त्रिपाठी के घर पहुंची तो सभी बराती डांस कर रहे थे. जोश में दूल्हा भी बैंडबाजे की धुन पर नागिन डांस करने लगा. डांस में चूर हो कर वह यहांवहां गिर रहा था, इसलिए जब फेरे पड़ने की बारी आई तो दुलहन ने पिता से कहा कि वह शादी नहीं करेगी क्योंकि दूल्हा शराबी है. लड़की के पिता प्रमोद त्रिपाठी ने इस मामले में लड़की का साथ दिया. पुलिस और पंचायत के हस्तक्षेप के बाद मामला दहेज वापस करने पर शांत हुआ.

नागिन डांस करने के बाद दूल्हे का नशा जब कम हुआ तो उस ने लड़की को काफी मनाया लेकिन तब तक दुलहन अपना मूड बना चुकी थी. बेचारे दूल्हे को बिन दुलहन खाली हाथ लौटना पड़ा. नागिन डांस की कीमत अनुभव को यों चुकानी पड़ेगी, किसी ने सोचा न था.

मध्यकालीन लंदन की गंदगी और आज का भारत

 1 : दिल्ली के आईटीओ के पास स्थित डब्लूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन की बिल्डिंग. कहने को तो इस बिल्डिंग में दुनियाभर के स्वास्थ्य को दुरुस्त करने का काम जोरोंशोरों से निबटाया जाता है लेकिन बिल्डिंग के ठीक पीछे बसी झुग्गीझोंपडि़यों में पसरी गंदगी और जमे कीचड़ को देख कर चिराग तले अंधेरा वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आती है. झुग्गियों में बस रही आबादी या कहें जहरीली गंदगी के बीच सांस लेती सैकड़ों जिंदगियां मल, कीचड़ और दुर्गंधभरे नाले के किनारे बसी हैं, जिसे यमुना भी कह सकते हैं. पौलिथीन के टैंटनुमा बनीं इन झुग्गियों में न तो शौचालय की समुचित व्यवस्था है, न ही नहाने के ठिकाने हैं. हाल यह है कि जरा से परदे की ओट में खाना और पाखाना कार्यक्रम एकसाथ समाप्त किया जाता है. बदबू इतनी कि उस इलाके के पास से निकलने में ही बदन गंधा उठे. बारिश के दिनों का तो हाल ही मत पूछिए.

दृश्य 2 : उत्तर प्रदेश, हमीरपुर जिले का मौदहा कसबा. यहां के पूर्वी तारौस में साफसुथरा तालाब हुआ करता था. जहां आसपास के लोग नहाते और कभीकभार कपड़े भी धोते. कुछ ही दिनों में तालाब के आसपास आबादी बसने लगी और मकान बनने लगे. चूंकि मलनिकासी के लिए कोई सरकारी व्यवस्था मुहैया नहीं कराई गई और सीवर या ड्रेनेज सिस्टम न होने के चलते शौचालयों से निकलने वाला मल पाइपलाइन के जरिए तालाब में छोड़ दिया गया, इसलिए देखते ही देखते पूरा तालाब मानवमल और उस की दुर्गंध से भर गया. वहां नहाना तो दूर, पास से निकलना तक दूभर हो गया. लगातार बढ़ती दुर्गंध से बीमारियां फैलने लगीं. तालाब तो सूख गया लेकिन मल और कूड़ेकचरे के भंडार से पूरा इलाका हलकान है.

दृश्य 3 : कानपुर का जाजमऊ इलाका. यहां मृत जानवरों की खालें उतार कर चमड़ा बनाने का काम होता है. पूरे इलाके में बड़ेबड़े स्टोररूमनुमा हौल में ट्रक भरभर के जानवरों के मृत शरीर लाए जाते हैं. फिर इन की खालें निकाल कर बाकी बचे अवशेष को ट्रकों में भरा जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में बेतहाशा खून भी बहता है और बदबू की तो पूछिए ही मत. इस के बावजूद इस इलाके में न तो समुचित ड्रेनेज व्यवस्था है जिस से खून, अवशेष निकासी की जा सके और न ही दुर्गंध से निबटने के लिए वैंटीलेशन का कोई इंतजाम है.

यही है स्वच्छ भारत?

21वीं सदी और वर्ष 2017 में उपरोक्त दर्शाए गए सारे दृश्य प्रतिनिधि ने स्वयं देखे और भुगते हैं. यकीन मानिए ऐसे दृश्य देश के हर शहर, सोसाइटी, कसबे व झुग्गी बस्तियों में आम हैं. अगर देश की हवा में जहर घुल चुका है तो इस की वजह बेलगाम गंदगी के ढेर और इस से निबटने में सरकार व प्रशासन की नाकामी है. दलितपिछड़ों की झुग्गीबस्तियों के हाल छोड़ दीजिए, महानगरों के संभ्रांत इलाके के बहुमंजिली भवनों की नालियां, सीवर और गटर सड़कों पर गंदगी बहा रहे हैं. अरबों रुपए सरकार गटर और मैला पानी साफ करने के संयंत्रों पर खर्च करती है, लेकिन उस का असर कहीं नहीं दिखता. सारा पैसा फाइलों में ही दबा रहता है. जितना बड़ा शहर उतने ही ज्यादा शौचालय व उतनी ही दूषित नदियां. दिल्ली में यमुना हो, चाहे बनारस में गंगा. जो नदियां हमारी मान्यता में पवित्र हैं वे वास्तव में गटर बन चुकी हैं.

सरकार ने दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में अरबों रुपए खर्च कर मैला पानी साफ करने के संयंत्र स्थापित किए हैं, जो सीवेज ट्रीटमैंट प्लांट कहलाते हैं. पर नदियां दूषित ही बनी हुई हैं. ये सब संयंत्र दिल्ली जैसे महानगर में गटर का पानी बिना साफ किए यमुना में उड़ेल देते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की धज्जियां उड़ाते उपरोक्त दृश्य हम सब को दिख जाते हैं लेकिन सरकार, सफाई के लिए जिम्मेदार संस्थान व विभाग आंख मूंद कर सोया करते हैं और कागजों में पूरा देश साफसुथरा नजर आता है. सरकारी विज्ञापनों में झाड़ू मारते हुए नेता सिर्फ सड़कों पर गिरे पत्तों को साफ करते दिखते हैं. किसी नेता को गली में फैले कीचड़ या गटर से बाहर निकलते मल को साफ करते किसी ने देखा क्या? नहीं. सरकारी आंखों से देखें तो गंदगी के नाम पर देशभर में कुछेक पेड़ों से गिरे पत्ते हैं जो सरकारी लोग साफ कर चुके हैं. बाकी गंदगी देख कर न तो उन की नाक के बाल जलते हैं और न ही उबकाई आती है. आएगी भी कैसे, सरकारी अनुदान पर मिले बंगलों व एयरकंडीशंड कमरों की खिड़की से यह सब भला कहां नजर आता है.

देशभर के रिहायशी इलाके में जा कर देख लीजिए, ड्रेनेज सिस्टम ठप पड़ा है, सैक्टर की मार्केट हो या गली या लोकल बाजार, हाट सभी जगह ड्रेनेज सिस्टम ब्लौक है. गलियों में जलभराव की स्थिति बनी रहती है. मानसून का मौसम शुरू होते ही ठप ड्रेनेज सिस्टम से लोगों के घरों में गंदा पानी घुस जाता है. हालत यह है कि ड्रेनेज सिस्टम की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारी कचरा वहीं पर छोड़ कर चले जाते हैं जो आने वाले समय में सड़ कर बीमारी व दुर्गंध का कारण बनता है. जगहजगह सीवर के गटर खुले हैं, जिन से बदबू व बीमारियां फैल रही हैं. रात के अंधेरे में ये गटर नजर नहीं आते और हादसे हो जाते हैं.

तब और अब का लंदन

ऐतिहासिक मानकों में आज लंदन शहर दुनिया का सब से साफसुथरा, बेहतरीन ड्रेनेज, सीवर सिस्टम से लैस और साफसुथरी नदियों के लिए जाना जाता है. आज लंदनवासी रोज नहाते हैं, घरों से कूड़ा समय पर कलैक्ट होता है. लेकिन क्या आप को पता है कि 14-15वीं शताब्दी यानी मध्यकालीन दौर में लंदन से गंदी जगह शायद की कोई और रही हो. गंदगी से निबटने के मामले में जो अपंगता आज भारत में दिखाई दे रही है वह कभी मध्यकालीन समय के लंदन में भी थी. आज जब लेखक डैन स्नो उस दौर के लंदन की गंदगी और दुर्गंधभरी तसवीर सामने रखते हैं तो यकीन नहीं होता कि तब का गंदा और बदबूदार लंदन आज दुनियाभर के पर्यटकों के लिए साफसुथरा मनोरम पर्यटन स्थल बन चुका है.

डैन के मुताबिक, मध्यकालीन समय में लंदनवासी दुर्गंध से भरे होते थे क्योंकि तब रोज नहाने का चलन नहीं था. पर्सनल सैनीटेशन पर ध्यान नहीं दिया जाता था. हालांकि, इस के पीछे वहां के भौगोलिक हालात भी जिम्मेदार थे. मसलन, नहाने के लिए नदियां ही एक मात्र जरिया थीं. लेकिन वे इतनी गंदगी से लबालब होती थीं कि उन में नहाना मुश्किल होता था. नदियों में मानव मल से ले कर कलकारखानों की गंदगी व रसायन जमा होते थे. जाहिर है नदियों की हालत बेहद खराब हो जाती थी. बेहद ठंड के समय टेम्स जैसी नदी बर्फ में तबदील हो जाती थी तो नहाना और कपड़े धुलना असंभव हो जाता था ऐसे में लंदनवासी कई दिनों तक बिना नहाएधोए गंदे रहते और परफ्यूम्स से ही काम चलाते. लंदन की गलियों का हाल तो इस से भी बुरा होता था. उस दौर में न तो सीवर व ड्रेनेज का सही सिस्टम था और नालियां भी प्रणालीबद्ध नहीं थीं. लिहाजा, घरों की गंदगी, कचरा, गोबर, मल आदि सब गलियों में पसरा रहता जिस से बीमारियां फैलतीं और राह चलना भी मुश्किल होता. हालत यह थी कि उस दौर में लोग पैटन (एक खास तरह के जूते जिन के तलों पर ऊंची लकड़ी का बेस लगा होता था ताकि सड़क की फैली गंदगी से पैर बचे रहें) इस्तेमाल करते थे.

लंदन के कसाईखानों की हालत तो इस से भी बदतर थी. जानवरों की खाल निकाल कर चमड़ा बनाने की प्रक्रिया में इतनी गंदगी और दुर्गंध फैलती कि सारा शहर दुर्गंध से पट जाता. फैक्टरियों का रसायन तो इस में उत्प्रेरक का काम करता. कई बार तो बदबू और गंदगी से पैदा होने वाली जहरीली गैसें मुंह तक जला देती थीं. शौचालयों का हाल तो इस से भी बदतर था. अमीरवर्ग के घर से मल उठाने का काम गोंग फार्मर (मानव मल ढोने वाला तबका) करते थे. आज वही काम भारत में मैला ढोने वाले दलित करते हैं. इन्हें उस समय अच्छा मेहनताना मिलता था. रात में ये मल ढो कर कभी गड्ढों में जमा करते तो कभी नदियों में डाल देते और बारिश में कई बार यही गलियां मानव मल से भर जातीं.

कुल मिला कर उस दौर में लंदन सब से ज्यादा गंदा व बदबूदार शहर था. लेकिन ये हाल तब के हैं जब सीवर, ड्रेनेज और जलनिकासी की आधुनिक तकनीकें विकसित नहीं हुई थीं. समय बदला और अपनी मेहनत, तकनीक व कर्मण्यता के दम पर इस शहर ने अपनी गंदी और बदबूदार तसवीर को स्वच्छ लंदन में तबदील कर दिया.

लंदन बनाम भारत

अब इतनी गंदगी में जरा सोचिए कि लंदन ने किस तरह से अपना अस्तित्व बचा कर रखा होगा. सिर्फ अस्तित्व बचा कर ही नहीं रखा, बल्कि समय के साथसाथ जलमल निकासी, गटर व ड्रेनेज सिस्टम से ले कर सीवर की आधुनिक तकनीक ईजाद की. पूरे शहर को न सिर्फ गंदगी से दूर कर सफाई की सिस्टमैटिक प्रणाली स्थापित की बल्कि आज लंदन की नदियों को दुनिया की सब से स्वच्छ नदियों में शुमार किया जाता है. हर घर से कूड़ा समय पर जमा होता है. वेस्ट मैनेजमैंट की नई तकनीकें ईजाद कर उन से गैस व अन्य सार्थक उत्पादन हासिल किए जा रहे हैं. ढकी हुई नालियां और शहर के नीचे बहते गटर दुर्गंध का नामोनिशान नहीं फैलने देते.

यही वजह है जो दुनियाभर के पर्यटक इस शहर की साफ व्यवस्था की मिसाल देते हैं. पे टौयलेट से ले कर सफाई की हर उस तकनीक का इस्तेमाल आज लंदन में होता है जो लंदन को क्लीनैस्ट सिटी बनाता है. मध्यकालीन दौर के सड़े, दुर्गंधभरे लंदन से आज के नीटक्लीन लंदन तक का सफर तय करने में वहां की सरकार, सफाई विभाग और प्रशासन की सक्रियता के साथ आमजन की साफसफाई को ले कर जागरूकता ने प्रमुख भूमिका निभाई.

यहां लंदन का प्रसंग इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि आज हम लंदन के उसी मध्यकालीन और गंदे दौर में जी रहे हैं जहां सिर्फ गंदगी ही गंदगी है. सीवर, ड्रेनेज, गटर और जलमल निकासी के कोई इंतजाम नहीं हैं. तब न बिजली थी, न स्टीम इंजन. तब तकनीक का नामोनिशान न था, पंप नहीं थे. पानी के पाइप नहीं थे. सीवर का पाइप बनाने की तरकीब नहीं थी. कूड़े को ढंग से जमाने की व्यवस्था नहीं थी. वाहनों के नाम पर घोड़े थे जो लोट कर सड़कों को गंदा करते थे. आज हमारे पास सब तकनीक है पर हम आज भी 14-15वीं शताब्दी के लंदन की तरह रह रहे हैं. राजधानी में हर कोना गंदगी व बीमारी फैलाने वाले कचरे से भरा पड़ा है. किसी घर से कूड़ा समय पर नहीं उठाया जाता. यमुना नदी सिवा जहरीले कचरे के ढेर के कुछ नहीं रह गई है. कलकारखानों का कैमिकल यमुना को जहरीले नाले में तबदील कर चुका है. सरकार व सफाई महकमा सब देख कर भी आंखें बंद किए रहते हैं.

सोचने वाली बात यह है कि हम आज दुनियाभर से हर नई तकनीक, उन्नत हथियार और यहां तक कि चीनी कूड़ा तक आयात कर रहे हैं लेकिन अपने शहरों, कसबों, गलीमहल्लों के लिए लंदन सरीखी वह तकनीक आयात नहीं कर पाए जो देश को साफ रख सके. वहां के ड्रेनेज, सीवर और गटर से जुड़ी नई व्यवस्था व नई प्रणाली समझने लायक नहीं हो पाए. आज भी देश में पिछड़े और दलित मानव मल ढोने को मजबूर किए जाते हैं. हम आज चांद पर जाने और मेक इन इंडिया के जुमले दोहरा कर खुद को विश्वशक्ति बताते फिरते हैं. प्रधानमंत्री दुनियाभर में देश का महिमागान कर लौटते हैं लेकिन अपने गलीमहल्ले की गंदगी साफ करने की कूवत नहीं है हम में. चीन से मुकाबला करने और पाकिस्तान को नेस्तानाबूद करने की भभकियां दे सकते हैं हम लेकिन देश में गंदगी से लड़ने की क्षमता विकसित नहीं कर पाए आज तक.

शौचालय से ज्यादा स्मार्टफोन

बात भले ही मजाक में कही जाती हो लेकिन सच है कि भारत में शौचालयों से ज्यादा स्मार्टफोन हैं. सरकारें मुफ्त वाईफाई और इंटरनैट डाटा देने की बात तो करती हैं लेकिन साफसफाई करने, नदियों को पूजापाठ और कर्मकांडों के कूड़ेकचरे से बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाती हैं. जिन प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चे देश के भविष्य के लिए तैयार हो रहे होते हैं, वहां के शौचालयों के अंदर पानी के लिए बालटी और मग भी नहीं रखा जाता. मलमूत्रभरे शौचालयों में ही बच्चे शौच करने को मजबूर होते हैं. मुंह व मलद्वार के माध्यम से संक्रमण के चलते अमीबियासिस तथा जिआरडियासिस जैसी बीमारियां हो जाती हैं. लाखों लोग शहर और कसबों में शौच जाने के लिए जगह तलाशते हैं, रेलवे के ट्रैक तो मानवमल की गंदगी से पटे पड़े हैं ही.

यही हाल अस्पतालों का है. खासकर सरकारी अस्पतालों में उतनी गंदगी पसरी होती है कि अच्छाखासा आदमी वहां से दस बीमारियां ले कर लौटता है. कहने को मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान का शिगूफा छोड़ रखा है और फिल्मी हस्तियां खानापूर्ति के नाम पर झाड़ू लगा चुकी हैं लेकिन समूचा देश आज भी गंदगी के भंडार पर बैठा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान के लिए 9 नामीगिरामी हस्तियों को इस अभियान का अगुआ बनाया. इस प्रोजैक्ट के तहत हजारों करोड़ रुपए का बजट रखा तो गया लेकिन उत्तर प्रदेश से खबर आई कि यहां अफसरों और पंचायतीराज विभाग का सिंडिकेट पीएम के स्वच्छ भारत अभियान पर भारी पड़ रहा है.

करीब 3 हजार करोड़ रुपए के शौचालय घोटाले के खुलासे पर जांच तो बिठाई गई लेकिन उस का कोई नतीजा आज तक नहीं निकला. इस घोटाले में पूर्व विभागीय मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य से ले कर तत्कालीन पंचायतीराज निदेशक डी एस श्रीवास्तव समेत तमाम नाम आए लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात. मध्य प्रदेश के उज्जैन में तो उज्जैन नगरनिगम के कर्मचारियों ने वृद्ध को ही मल साफ करने को विवश कर डाला. जबकि सफाई के नाम पर सरकारी वेतन यह विभाग खुद उठाता है. ये हालात देख कर यह साफ हो जाता है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत सिर्फ स्वांग रचा गया जिस में न तो कोई ठोस सरकारी रणनीति अपनाई गई और न ही गंदगी से निबटने के लिए आमजन को इस अभियान से जोड़ने के लिए कोई खास सरकारी मशक्कत दिखी. फिर भी सरकार योजनाओं के ढेर पर बैठी खुद की पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रही है. 

हम बना सकते हैं स्वच्छ भारत

वैसे तो यह काम सरकार और निगमों का है क्योंकि हमारी मेहनत की कमाई जब टैक्स के तौर पर कटती है तब सरकारी संस्थानों में वेतन बनता है और सरकारी योजनाओं का फंड भी उसी से निकाला जाता है. इस के बावजूद अगर  देश साफ नहीं होता है तो हमें मोरचा संभालना होगा. सरकारी स्वांग योजनाओं से इतर अगर हम अपनी मानसकिता बदल कर साफसफाई को ले कर जागरूक हो जाएं, देश को गंदगीमुक्त किया जा सकता है. सब से पहले तो हमें धार्मिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होना पड़ेगा,  जहां यह बताया जाता है कि अपना कूड़ा साफ करने के लिए हमें दलित या पिछड़े वर्ग की जरूरत होगी. दक्षिण और पश्चिम एशिया के लोगों में अपने मलमूत्र के प्रति घृणा बहुत ज्यादा है. ये घृणा हमारे धार्मिक व सामाजिक संस्कारों में बस गई है.

अगर हम अपनी फैलाई गई गंदगी खुद ही साफ करने की आदत डाल लें तो इस समस्या से नजात मिल सकती है. देशविदेश में लोग अपना कूड़ा खुद साफ करते हैं. हम अपनी गली, महल्ले, सोसायटी की साफसफाई पर ध्यान रखना शुरू कर दें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें तो देश का एक बड़ा हिस्सा खुदबखुद गंदगी से मुक्त हो जाएगा.   अगर लंदन ने खुद को गंदगी के ढेर से हटा कर साफसुथरे शहर की छवि में कैद कर लिया है तो इस के पीछे की वजह है साफसफाई से जुड़ी उन्नत तकनीकों का प्रयोग. हमें इस मोरचे पर भी तैयार रहना होगा. कई देशों खासकर चीन, जापान, इंडोनेशिया में मलमूत्र को खाद बना कर खेतों में उपयोग करने की परंपरा रही है. हमारे यहां यह काम बड़े मानकों पर नहीं होता वरना हमें दोहरा लाभ होता. गंदगी से नजात मिलेगी और खाद व गैस का भी उत्पादन हो सकेगा.

इस के अलावा साफसफाई के काम से जुड़े श्रमिकों व कर्मचारियों के प्रति हमें अपने हेय दृष्टि से देखने वाले नजरिए को भी बदलना होगा. उन्हें उन के काम के एवज में सिर्फ धन देना काफी नहीं है. उन्हें उचित सम्मान भी देना होगा ताकि वे इस काम को ईमानदारी से करें. कोई भी देश रातोंरात साफ या गंदा नहीं बनता. जैसे लंदन को मध्यकाल की गंदगी से निकलने में वक्त लगा, ठीक वैसे ही भारत को भी साफ होने में वक्त लगेगा. यह तभी संभव हो सकेगा जब हम लंदन और बाकी साफसुथरे देशों द्वारा अपनाए तरीकों, मेहनत व जागरूकता को अपना कर देश को साफ करने का संकल्प लें. वरना हम मध्यकालीन दौर के लंदन की गंदगी के जैसे ढेर पर यों ही बैठे रहेंगे और हमारी अगली पीढि़यां बीमार, सड़ेगले संक्रमित माहौल में सांस लेने को मजबूर रहेंगी.      

स्वच्छता अभियान की पोल खोलते मंत्री महोदय

एक तरफ देश में स्वच्छ भारत अभियान और घरघर शौचालय का सरकारी ढोल जोरों से पीटा जा रहा है वहीं देश का एक वीआईपी मंत्री स्वच्छता के तमाम दावों की पोल खोलते हुए खुलेआम मूत्र विसर्जन करते दिखाई दे रहा है. कुछ दिनों पहलेकेंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की एक तसवीर सोशल मीडिया में बड़ी तेजी से वायरल हुई. तसवीर में मंत्रीजी सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी में खुले में एक इमारत की दीवार पर पेशाब करते नजर आए. तसवीर जैसे ही वायरल हुई, सफाई से जुड़े तमाम सरकारी दावों और अभियानों को ले कर आम लोगों की व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया आने लगी. कोई इस तसवीर को कृषि मंत्री के सिंचाई अभियान की शुरुआत बता रहा था  तो कोई मंत्रीजी की सादगी पर चुटकी ले रहा था.

मजाक अपनी जगह है लेकिन यह तसवीर एक तमाचा है देश के तथाकथित विकासपरक छवि पर. जरा सोचिए, अगर देश के कृषि मंत्री को एक टौयलेट ढूंढ़ने में इतनी परेशानी हो सकती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में सार्वजनिकटौयलेट की उपलब्धता कितनी कम है. बीते 70 सालों में देश में शौचालय की उपलब्धता का यही सच है.

एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक, देशभर में स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए गए लगभग 10 में से 6 शौचालयों में पानी की पर्याप्त सप्लाई ही नहीं है. यह सर्वे केंद्र की मोदी सरकार के 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के मिशन की हकीकत को बयां करता है. आलम यह है कि कई घरों में शौचालयों में पानी की सप्लाई और ड्रेनेज की सुविधा नहीं होने की वजह से लोगों ने शौचालयों को स्टोररूम बना लिया है.

व्हाट्सऐप : लत है गलत

जब से व्हाट्सऐप नामक तकनीकी भूचाल ने हमारी जिंदगी में प्रवेश किया है, तब से हमारी जिंदगी का स्वरूप ही बदल गया है. पुरुष हो या महिला, बुजुर्ग हों या बच्चे, सभी के हाथ में स्मार्टफोन हैं. सभी व्यस्त हैं अपनेआप में व्हाट्सऐप के माध्यम से. जहां एक तरफ व्हाट्सऐप ने हमारे लिए जीवन में अत्यंत सुगमता और खुशियां भर दी हैं वहीं उस की ही वजह से जिंदगी में अनेक तरह के तनाव भी उत्पन्न हो रहे हैं.

ये तनाव एक साइलैंट किलर की तरह हमारे स्वास्थ्य को खा रहे हैं जिस का एहसास हमें होता तो है पर अपने इस तनाव की चर्चा हम किसी से कर नहीं सकते. चर्चा करने पर हंसी के पात्र बनने की संभावना होती है, क्योंकि व्हाट्सऐप से उपजा तनाव होता ही है कुछ अलग तरह का.

व्हाट्सऐप से उत्पन्न होने वाले तनाव देखनेसुनने में तो बहुत मामूली लगते हैं पर जिन लोगों ने व्हाट्सऐप को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा बना रखा है, निश्चितरूप से ये छोटीछोटी बातें उन के दिलोदिमाग पर दिनरात हावी हो कर न केवल उन की दिनचर्या को प्रभावित करती हैं, बल्कि उन के मानसिक स्वास्थ्य और दैनिक व्यवहार को भी प्रभावित करती हैं.

जवाब का इंतजार

जब भी लोग व्हाट्सऐप पर कोई मैसेज भेजते हैं तो भेजने के तुरंत बाद से ही दिमाग यह जानने को उत्सुक हो उठता है कि मैसेज डिलीवर हुआ या नहीं और उस के तुरंत बाद से मैसेज के जवाब या उस पर आने वाले कमैंट्स के इंतजार में दिमाग उलझ जाता है. हर मिनट 2 मिनट पर व्हाट्सऐप औन कर के जवाब चैक किया जाता है.

अगर भेजे गए मैसेज का जवाब आशा के अनुरूप तुरंत आ गया तब तो ठीक है, किंतु यदि जवाब आने में देर हुई या किसी वजह से 1-2 दिनों तक नहीं आया तब तो तनाव का माप अत्यंत बढ़ जाता है. जैसा कि इंसान का स्वभाव होता है उस के दिमाग में गलत और खराब खयाल ही जल्दी आते हैं और वह बजाय यह सोचने के कि हो सकता है मैसेज पढ़ने वाला किसी वजह से अत्यंत व्यस्त या परेशान हो जिस की वजह से मैसेज का जवाब नहीं दे पाया, वह यह सोचने लगता है कि कहीं वह नाराज तो नहीं है, कहीं वह जानबूझ कर उपेक्षा तो नहीं कर रहा है या कहीं ऐसा तो नहीं कि मैसेज का जवाब न दे कर वह नीचा दिखाना चाहता है.

यानी मैसेज डिलीवर हुआ या नहीं, पढ़ा गया या नहीं और उस के बाद मैसेज का जवाब आया या नहीं और जवाब आया तो वह अनुकूल आया या प्रतिकूल, यह जिंदगी में व्हाट्सऐप के माध्यम से उत्पन्न हुआ ऐसा तनाव है जो हर पल, हर क्षण हमारे व्यवहार व हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है.

ग्रुप, चैटिंग व मनमुटाव

व्हाट्सऐप पर ग्रुप बनाना और ग्रुप चैटिंग करना मय व्यतीत करने और एक समय में ही बहुत सारे लोगों के साथ जुड़ने का बहुत ही रोचक व पसंदीदा माध्यम है. पारिवारिक सदस्यों का ग्रुप, मित्रों का ग्रुप, कार्यालय ग्रुप, पड़ोसियों का ग्रुप, बच्चों के स्कूल का ग्रुप, भाईबहनों का ग्रुप, ऐसे कम से कम 5-7 ग्रुप लगभग हर व्हाट्सऐप यूजर्स के होते हैं. ग्रुप चैटिंग की सब से खास बात यह होती है कि जब यह चैटिंग शुरू हो जाती है तब उस का रुकना और उस में शामिल न होना दोनों ही अपने वश में नहीं रह जाता और एकएक कर के अनेक लोग जब चैटिंग में शामिल होते जाते हैं तो एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है.

ग्रुप चैटिंग का समापन यदि अच्छी और खुशनुमा बातों के साथ हो जाता है तब तो वह दिनभर हमारे मुसकराने और दिन को खुशनुमा बनाने के लिए पर्याप्त होता है किंतु यदि चैटिंग में किसी बात पर बहस या वादविवाद शुरू हो जाए तो वह फिर न केवल दिन खराब करने के लिए काफी हो जाता है, बल्कि बैठेबैठे ही रिश्तों में दरार भी डाल जाता है. अगर हम आमनेसामने होते हैं तो बात बुरी लगने पर हमें चेहरे के हावभाव से पता भी लग जाता है और हमें बात को संभालने का मौका मिल जाता है पर व्हाट्सऐप पर लिखी हुई बात तीर से निकले कमान की तरह हो जाती है जिसे रोक पाने का कोई माध्यम नहीं होता. बात चूंकि कई लोगों के बीच हुई होती है, इसलिए वह सरलता से शांत भी नहीं होती. और कई बार तो ऐसा होता है कि उस बहस पर व्यक्तिगत चैटिंग द्वारा एक नई बहस शुरू हो जाती है.

कई बार तो ऐसा भी होता है कि ग्रुप में विवाद या बहस होने के बाद उस ग्रुप के 4-6 सदस्यों का अलग एक ग्रुप बन जाता है जहां वे खुल कर अपने विरोधी पक्ष के बारे में अपनी भड़ास निकालने लगते हैं. यानी व्हाट्सऐप एक ऐसा कीड़ा है जो दूरदूर से ही लोगों के मन में द्वेष उत्पन्न कर दरार व मनमुटाव का जहर फैला देता है.

कमतरी का एहसास

यों तो सभी अपनेअपने जीवन में सुखी, संपन्न और खुश है किंतु जिस तरह किसी बड़ी लाइन के बगल में उस से बड़ी लाइन खींच दी जाती है तो वह बड़ी लाइन छोटी लगने लग जाती है, ठीक उसी तरह शांत और सुखी जीवन में असंतोष तब व्याप्त हो जाता है जब आसपास बड़ी कोई लकीर दिख जाती है और इस तरह का असंतोष फैलाने में व्हाट्सऐप अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है. किसी ने शिमला की वादियों में घूमते हुए अपनी फोटो खींच कर व्हाट्सऐप पर डाल दी तो खुशीखुशी घरगृहस्थी में रमी गृहिणी के मन में असंतोष का बीज पनप उठा, ‘मेरी जिंदगी में तो चूल्हाचौका के अलावा कुछ और लिखा ही नहीं है.’

किसी ने अपने बेटे के 93 प्रतिशत अंक पाने की खुशी सुनाई तो अपने बेटे के 85 प्रतिशत अंक पर पानी फिर जाता है. किसी ने रैस्टोरैंट में खाना खाते हुए अपनी फोटो शेयर कर दी तो घर में पूरे परिवार के साथ हंसतेखिलखिलाते माहौल में खाना खाते सदस्यों के मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है. इसी तरह ग्रुप चैटिंग में किस ने हमारे पोस्ट पर कमैंट किया, किस ने नहीं किया, कौन किस के पोस्ट पर ज्यादा कमैंट्स दे रहा है और कौन नहीं, जैसी बचकानी बातें भी कुछ व्हाट्सऐप यूजर्स को तनाव दे रही हैं और रिश्तों में मनमुटाव उत्पन्न कर रही हैं.

समय की बरबादी

सच तो यह है कि जहां एक तरफ व्हाट्सऐप का आवश्यकता से अधिक उपयोग करना हमारे समय और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है वहीं दूसरी तरफ व्हाट्सऐप ने हमारे जीवन को इतना सरल, रोचक और साधनसंपन्न बना दिया है कि अब उस के बिना जीवन की कल्पना रसहीन लगती है. व्हाट्सऐप के माध्यम से अपनों के बीच एकएक पल की खुशियां, एकएक पल की जानकारी शेयर कर के जो खुशी मिलती है उस का कोई जवाब नहीं है. पलभर में हजारों किलोमीटर दूर बैठे अपनों की तसवीर देख पाना, समयाभाव वश किसी कार्यक्रम में न पहुंच पाने के बावजूद हर एक पल की जानकारी फोटो समेत तुरंत पा जाना, लिखित दस्तावेज एक सैकंड में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देना जैसी सुविधाएं व्हाट्सऐप के माध्यम से ही संभव हैं.

समझदारी से सदुपयोग करें

आवश्यकता इस बात की है कि हम व्हाट्सऐप के इस्तेमाल को अपनी आदत न बनाएं बल्कि उस का सदुपयोग समझदारीपूर्वक करें.

–       व्हाट्सऐप पर मनोरंजन के नाम पर जितना ही अधिक समय गुजारेंगे वह उतना ही अधिक हानिकारक होगा किंतु सोचसमझ कर और आवश्यकतानुसार उस का उपयोग करना हमारे लिए बेहद फलदायी हो सकता है.

–       आवश्यकता इस बात की भी है कि यदि व्हाट्सऐप को पूरी तरह अपने जीवन में रचाबसा लिया है और हर

5 मिनट पर उसे चैक किए बिना रहा नहीं जाता तो कुछ बातों को ध्यान में रख कर अपने तनाव पर नियंत्रण करे

–       कोशिश इस बात की करनी चाहिए कि यदि आवश्यकता से अधिक व्हाट्सऐप यूज करने की आदत पड़ गई हो तो सब से पहले, धीरेधीरे कर के ही सही, व्हाट्सऐप में अपनी तल्लीनता में कमी लाएं.

–       मैसेज भेजने के बाद वह पढ़ा गया या नहीं, और उस का जवाब आया कि नहीं, उस पर किसी ने कमैंट किया या नहीं, यह देखने के लिए और जवाब के इंतजार में बारबार व्हाट्सऐप चैक न करें.

–       यदि अपेक्षित समय में जवाब नहीं आता है तो मन में नकारात्मक विचार न उत्पन्न होने दें, क्योंकि हो सकता है कि जब मैसेज डिलीवर हुआ हो और पढ़ा गया हो, उस समय प्राप्तकर्ता इस परिस्थिति में न हो कि वह तुरंत मैसेज का रिप्लाई कर सके क्योंकि मैसेज पढ़ा तो कभी भी, कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में  जा सकता है किंतु रिप्लाई करने के लिए मनोस्थिति का शांत और परिस्थिति का अनुकूल होना जरूरी है.

–       अगर कोई अस्पताल में अपने या अपने प्रियजन के इलाज के लिए गया हुआ है या किसी इंटरव्यू के लिए औफिस के बाहर बैठा हुआ है तो ऐसी दशा में अपना समय व्यतीत करने या दिमाग से तनाव को झटकने के लिए व्हाट्सऐप के मैसेजेज पढ़े तो जाते हैं किंतु जवाब एक का भी नहीं लिखा जाता क्योंकि उस समय उस की मनोस्थिति अस्थिर होती है.

–       ट्रेन, बस, आटो, कार से कहीं भी सफर करतेकरते भी मैसेज पढ़ना तो आम बात है पर जवाब उस समय भी नहीं लिखा जा सकता. और अकसर ऐसा भी हो जाता है कि मैसेज पढ़ कर के तुरंत अगर उस का जवाब नहीं दे दिया गया हो, तो बाद में वह दिमाग से उतर भी जाता है.

–       व्हाट्सऐप का प्रयोग अगर अपने व्यवसाय, आवश्यक सूचनाओं के आदानप्रदान, अध्ययन, तथा आवश्यक दस्तावेजों के आदानप्रदान के लिए करें तो यह हमारे जीवन को सुगम व सरल बनाता प्रतीत होता है और अत्यंत सुविधाजनक होता है किंतु जब इस का प्रयोग मनोरंजन और टाइमपास के लिए किया जाता है तो जरा सी असावधानी से कई बार यह तनाव का कारण बन जाता है.

–       आवश्यक है कि व्हाट्सऐप का प्रयोग तो करें पर उसे अपने जीवन के लिए जहर न बनाएं. जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ, दुखबीमारी आदि अवसरों पर व्हाट्सऐप के बजाय मिल कर या फोन कर के रिश्तों को मजबूत व सुखद बनाने का प्रयत्न करें.         

बोलने की क्षमता का हृस

व्हाट्सऐप से यूजर्स को एक अहम नुकसान यह भी हो रहा है कि उन का बातचीत करने का कौशल घट रहा है. फोन की सुविधा ने मिलनेजुलने की परंपरा कम कर दी थी. इंसान मिलने के बजाय फोन के माध्यम से ही लेनेदेने का कार्य करने लगा था. उस में गनीमत इतनी थी कि इंसान आवाज के माध्यम से एकदूसरे से जुड़ता था पर अब व्हाट्सऐप द्वारा तो मूकबधिरों की तरह सूचनाओं और हालचाल का आदानप्रदान होने लगा है. ऐसा लगता है कि अभी तो सुबहसुबह पार्क में लोग इकट्ठे होते हैं हंसने के लिए, कुछ सालों बाद बोलने के लिए भी इकट्ठे होने लगेंगे.

रोहिंग्या शरणार्थी : पहचान की छटपटाहट

म्यांमार की सरकार की तरह कई देशों व राज्यों के संगठन रोहिंग्या शरणार्थियों को अपने क्षेत्र में पनाह देने के खिलाफ खड़े होते रहे हैं. दुनिया में फैली तमाम समस्याओं में से एक है गृहयुद्ध के बाद हुए पलायन से सामने आई शरणार्थियों की समस्या. इराक, सीरिया सहित कई अफ्रीकी देशों में शरणार्थी समस्या विकाराल रूप ले चुकी है. दया और मानवता की चिरपरिचित नारेबाजी के बाद भी किसी भी देश में घुसने से मनाही कितनी कष्टपूर्ण और क्रूर हो सकती है, इस को अगर समझना है तो रोहिंग्या मुसलमानों को एक नजर देखना होगा. ये वे लोग हैं जो बरसों से उस देश में गैरों का जीवन जीने को मजबूर हैं जहां कभी ये मजदूरी करने के लिए बसाए गए थे.

भारत जैसा देश भी इन को अपने यहां से निकालने की तैयारी कर चुका है. इस अपमान और छटपटाहट में तमाम रोहिंग्या मुसलमान या तो उग्रवाद की ओर मुड़ गए हैं या उन्होंने मुसलिम उग्रवादियों से हाथ मिला लिया है. इस से उन की समस्या कम होने के बजाय कई गुना ज्यादा बढ़ गई. अब दूसरे समुदाय के वे लोग भी इन्हें शक की निगाह से देखने लगे जो इन की मदद या तो कर रहे हैं या फिर करना चाहते हैं.

रोहिंग्या हैं कौन

लोगों के जेहन में यह बात उठना लाजिमी है कि आखिर ये रोहिंग्या हैं कौन, जिन की मदद करने से अब भारत भी मुंह फेर रहा है. शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित म्यांमार, जो बर्मा के नाम से जाना जाता था, की आंग सांग सू की भी रोहिंग्या की बात करना नहीं चाहतीं. एक विदेशी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में रोहिंग्या का सवाल आते ही वे इंटरव्यू छोड़ कर चली गईं. यानी, अगर सू भी सत्ता में हों, तो भी रोहिंग्या मुसलमानों का कुछ भी भला होने वाला नहीं है.

म्यांमार की सरकार का कहना है (और यह सच भी है) कि रोहिंग्या म्यांमार के मूल निवासी न हो कर बंगलादेश (तब का बंगाल) से आए शरणार्थी भर हैं. आज ये लोग ज्यादातर म्यांमार के रेखाइन (जिसे अराकान भी कहा जाता है) प्रांत में रहते हैं. वहां इन की भिड़ंत लगातार उन बौद्ध लोगों से होती रहती है जो वहां के मूल निवासी हैं.

अराकान वह जगह है जहां पर सदियों से मुसलमान बसते रहे हैं. इस इलाके पर अंगरेजों का कब्जा होने से पहले यहां पर मुसलमान काफी कम थे. 1869 के करीब जब यहां पर अंगरेज काबिज हुए तो चावल की खेती के लिए बंगाल के मुसलमान मजदूरों को यहां पर लाया गया.

इसी के बाद इस प्रांत में रोहिंग्याओं की आबादी बढ़ने लगी. साथ ही, बढ़ा स्थानीय बौद्ध लोगों से इन का टकराव. कई बार जब टकराव ने दंगे का रूप लिया तो पुलिस प्रशासन ने मूल निवासियों का ही साथ दिया. वैसे, एक समय अराकान का राजा बंगाल के नवाब के अधीन था. नवाब से आजादी मिलने के बाद भी यहां के बौद्ध राजा ने मुसलमानों को उच्च पदों पर नियुक्त करना जारी रखा. 17वीं शताब्दी में यहां पर मुसलिम आबादी तेजी से बढ़ी, जो बंगाल से ला कर यहां बसाए गए थे.

मुसलिमों का आनाजाना

1785 में अराकान में सत्ता परिवर्तन हुआ और कोनवाऊंग वंश ने यहां पर कब्जा कर लिया, तो 35,000 से ज्यादा मुसलमान चित्तगांग इलाके में चले गए जो उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था. इस के बाद अराकान में मुसलिम आबादी काफी कम हो गई.

मामला जब कुछ शांत हुआ तो चित्तगांग से मुसलिम फिर अराकान आ कर बसे. इसी के साथ सांप्रदायिक उन्माद को फिर से हवा मिलने लगी. ब्रिटिश सरकार ने बंगाल प्रैसिडैंसी में अराकान को भी समाहित कर लिया. इस के बाद बंगाल से मजदूर यहां खेतों में काम करने के लिए आने लगे. 1911 तक यहां की मुसलिम आबादी 2 लाख तक पहुंच गई. तत्कालीन बर्मा चूंकि ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए मूल निवासी चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान की सेना यहां पर आ गई और ब्रिटिश सेना को हटना पड़ा. ब्रिटिश राज की सरपरस्ती में जी रहे रोहिंग्या लोग अनाथ सा महसूस करने लगे. यही वह दौर था जब रोहिंग्या पर अत्याचार का नया दौर शुरू हुआ, जो आज तक जारी है.

हमले पर हमले

ब्रिटिश सरकार ने जो हथियार रोहिंग्या को जापानियों से लड़ने के लिए दिए थे उन्हीं के बल पर रोहिंग्या लोगों ने मूल निवासियों पर हमले किए. तभी से दोनों के बीच दुश्मनी और बढ़ गई. दंगों से बचने के लिए तमाम आंग्ल बर्मी, भारतीय बर्मी और ब्रिटिश भारत भाग आए. इन के बर्मा से भाग आने पर वहां पर सस्ते मजदूरों की कमी हो गई. इसलिए रोहिंग्या को फिर से वहां पर लाया गया. ये आने को राजी नहीं थे, इसलिए रोहिंग्या और ब्रिटिश का एक संगठन बना ताकि ये जापानियों से लड़ सकें. इस संगठन का नाम था ‘वी फोर्स’. पर यह फोर्स बौद्धों से ही भिड़ गई. बौद्धों के मठ उजाड़े और इन्हीं रोहिंग्याओं ने बौद्धों पर इतने अत्याचार किए कि पहले से ही दोनों के बीच की रही खाई और चौड़ी हो गई.

1940 में पाकिस्तान मूवमैंट के दौरान नफरत का दूसरा दौर सामने आया. इन रोहिंग्या लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी जताई और चाहा कि बर्मा के इलाकों, जहां पर रोहिंग्या की अबादी ज्यादा है, को पाकिस्तान में मिला लिया जाए. जल्द ही इन लोगों ने यहां पर अलगाववादी आंदोलन शुरू कर दिया और चाहा कि अराकान में ही अलग मुसलिम देश बन जाए. यह बात बर्मा की सरकार को कतई पसंद नहीं आई. पर रोहिंग्या आग में घी डालने का काम करते ही रहे.

रोहिंग्याओं का दमन

 

1962 में बर्मा के सैनिक शासन ने रोहिंग्या का जम कर दमन शुरू कर दिया. इसी दमन के चलते हजारों रोहिंग्या यहां से निकल भागे और दिल्ली से ले कर थाईलैंड, मलयेशिया व यूरोप तक में बस गए.

 

1971 में जब बंगलादेश मुक्ति आंदोलन चला तो लाखों की संख्या में बंगलादेशी भारत और अन्य पड़ोसी मुल्कों में निकल भागे. लाखों की संख्या में बंगलादेशी बर्मा भी गए. बर्मा की सरकार ने इन का जम कर दमन शुरू कर दिया. इस से घबरा कर लाखों बंगलादेशी फिर से बंगलादेश आ गए. बंगलादेश के विरोध और संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव की वजह से बर्मा ने, न चाहते हुए भी, इन को अराकान में बसा दिया. यह जरूर था कि सभी को विदेशी घोषित कर दिया गया.

 

वोट का अधिकार

 

आज म्यांमार यानी बर्मा में रोहिंग्या लोगों की आबादी करीब 14 लाख है. इन पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, जैसे जबरदस्ती गर्भपात करवाना, 2 बच्चों की सीमा निर्धारित करना, आनेजाने पर तमाम प्रतिबंध आदि. पुलिस के अत्याचार और आएदिन होने वाले समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कार यहां आम बात है.

 

सैनिक शासन ने सख्ती में कुछ ढिलाई बरतते हुए इन को ‘सफेद कार्ड’ भी दिए जो इन को वोट देने का अधिकार भी देता था पर स्थानीय बौद्ध लोगों के जबरदस्त विरोध के बाद सरकार ने ‘सफेद कार्ड’ समाप्त कर दिए. आज ये वोट नहीं दे सकते.

 

भारत इस समस्या पर काफी सावधानी से नजर रखे हुए है. भारत म्यांमार के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है. चीन पर कुछ अंकुश रखने के लिए भी यह दोस्ती जरूरी है. भारत ने इसीलिए म्यांमार के सैनिक शासन का कभी जम कर विरोध नहीं किया. इस के बदले म्यांमार की सरकार ने भी भारत की मदद की है, जैसे 2015 में नगा विद्रोहियों द्वारा भारतीय सुरक्षाबलों पर हमले के बाद इन विद्रोहियों पर म्यांमार की सीमा में घुस कर कार्यवाही की गई पर म्यांमार सरकार चुप्पी साधे रही. भारत म्यांमार के इस विश्वास को रोहिंग्या का साथ दे कर खोना नहीं चाहता.

 

आतंक की ओर कदम

 

रोहिंग्या बंगलादेश की सीमा पार कर दिल्ली से ले कर कश्मीर तक में  आ गए हैं. अकेले कश्मीर में ही करीब 10 हजार रोहिंग्या हैं. भारत सरकार इन को यहां से हटाने का मन बना चुकी है. इस के पीछे भी म्यांमारभारत संबंध ही है.

 

उधर, रोहिंग्या में से कुछ का आतंकवाद की ओर मुड़ना भी रोहिंग्या समुदाय पर नई मुसीबत ले कर आया है. सालभर पहले भारत में बौद्धों के स्थल बोधगया में हुई बम विस्फोट की घटना भी रोहिंग्या आतंकवाद से जोड़ कर देखी जाती रही है. हर मुसलिम आतंकी संगठन रोहिंग्या के प्रति हमदर्दी रखता है. रोहिंग्या शरणार्थियों का हाल ही में बना संगठन ‘हराकाह अल याकीन’ ने रोहिंग्या पर शक की निगाहें और कड़ी कर दी हैं. सऊदी अरब में याकीन का मुख्यालय है. इस संगठन से जुड़े रोहिंग्या को आधुनिकतम हथियारों और गुरिल्ला तकनीक से लैस किया जाता है. ये लोग भारत ही नहीं, म्यांमार में भी आतंकवाद फैलाने को पूरी तरह से तैयार हैं.

 

म्यांमार की सरकार ने इन की तरफ से अपना मुंह फेर कर इन को गुस्से से भर दिया है. यह जरूर है कि रोहिंग्या के इस कदम से वह अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाएं भी इन से दूर चली जाएंगी जिन की मदद पर रोहिंग्या आज म्यांमार में दो रोटी पा रहे हैं. इस के बाद भी रोहिंग्या में से कई युवा, आतंकी संगठन अल याकीन को ही बेहतर विकल्प मानने लगे हैं. कई रोहिंग्या तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की आतंकी ट्रेनिंग तक ले रहे हैं. ट्रेनिंग दे रहे संगठनों की सांठगांठ पाकिस्तान के आतंकी संगठनों तक से है, इसलिए भारत की रोहिंग्या के प्रति जो हमदर्दी थी, वह भी समाप्ति के कगार पर है.

 

उधर, बंगलादेश (जहां के कभी रोहिंग्या मूल निवासी थे) की रुचि भी म्यांमार में है, न कि रोहिंग्या में. जब कुछ माह पहले म्यांमार के विदेश मंत्री अबुल हसन महमूद अली बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से मिले तो दोनों ने आपसी संबंधों और व्यापार बढ़ाने पर जम कर बातचीत की. दोनों सेनाओं के बीच वार्त्ता जारी रखने के साथ सीमा से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने पर भी बात हुई. इस मौके पर शेख हसीना ने म्यांमार के विदेश मंत्री को आश्वस्त किया कि वे अपनी भूमि पर आतंकियों को पनपने नहीं देंगी. इस से साफ है कि रोहिंग्या आतंकी बंगलादेश की भूमि से म्यांमार पर हमला नहीं कर सकेंगे.

 

रोहिंग्या को खतरा आशीन वीराथू जैसे आतंकी भिक्षुओं से भी है जो अपने को बर्मा का ओसामा बिन लादेन कहता है. बौद्ध भिक्षु होने के बावजूद विराथू पूरी तरह से आतंकी चोला ओढ़े है. वीराथू श्रीलंका तक में भाषण कर रोहिंग्या के खिलाफ जहर उगल कर आया है. उस ने यहां तक कह दिया है कि रोहिंग्या बौद्धों को मुसलमान बनाने पर आमादा हैं. रोहिंग्या द्वारा फैलाए जा रहे आतंक को भी उस ने खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश किया है. इस से रोहिंग्या समस्या कहीं ज्यादा बढ़ गई है.

 

अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भले ही रोहिंग्या को सब से ज्यादा सताए गए शरणार्थी कहा हो, पर इन के दुख को कम करने की कोई सूरत कहीं नजर नहीं आती. हां, आतंक से जुड़ कर रोहिंग्या अपनी स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं.  

शिवराज : अकेले पड़े, अकेले लड़े

जून के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र से शुरू हुए किसान आंदोलन का जो जोरदार विस्फोट मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में हुआ, उस के पीछे के सच अब धीरेधीरे लोगों को समझ आ रहे हैं. किसानों का गुस्सा दरअसल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर था, जिन्होंने साल 2014 के लोकसभा चुनाव की सभाओं में किसानों से बढ़चढ़ कर वादे करते उन्हें तरहतरह के सब्जबाग दिखाए थे.

ये वादे कैसे और किस तरह के थे, इस के पहले यह जान लेना जरूरी है कि मंदसौर की पुलिस फायरिंग में 6 जून को हुई 6 किसानों की मौतों से सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इमेज अब हमेशा के लिए बिगड़ गई है.

आंदोलन कर रहे किसान कर्जमाफी और अपनी उपज का वाजिब दाम मिलने की मांग कर रहे थे. ये बातें दरअसल  किसानों के जेहन में डालीं तो नरेंद्र मोदी ने ही थीं, जो प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें भूल गए. लेकिन किसान नहीं भूला कि उस ने किन वादों और बातों के एवज में नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने के लिए भाजपा को वोट दिया था.

वादे और हकीकत

2014 की अपनी चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने दहाड़ते हुए वादा किया था कि इस बात की गारंटी वे लेते हैं कि किसानों को अपनी फसल की लागत के ऊपर 50 फीसदी कीमत मिलेगी. अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया तो किसानों के लागत मूल्य पर 50 फीसदी का मुनाफा जोड़ कर उन्हें कीमत अदा की जाएगी.

नरेंद्र मोदी ने लागत और मुनाफे का गणित किसानों को समझाते हुए यह भी कहा था कि खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी मिला कर किसान को फसल पैदा करने में जो लागत आती है उस पर 50 फीसदी मुनाफा जोड़ कर समर्थन मूल्य तय किया जाएगा. किसानों को यूपीए के राज में कभी 200 तो कभी 250 रुपए और कभी 300 रुपए के हिसाब से समर्थन मूल्य मिलता है जिस से उन की पैदावार बरबाद होती है, एनडीए सरकार इस खामी को दूर करेगी.

ये लुभावने वादे चुनाव के साथ खत्म भी हो गए. किसी फसल का बढ़ा समर्थन मूल्य किसान को नहीं मिला. उलटे, पैदावार की कीमतें लगातार गिरती रहीं.

इसी दौरान मंडी गए किसानों को यह एहसास भी हुआ कि 8 नवंबर की नोटबंदी की मार सीधे उन पर पड़ रही है. खरीदार और व्यापारी नकदी न होने का रोना रोते उन्हें कम दाम में फसल बेचने को मजबूर कर रहे हैं तो उन का गुस्सा और भड़क उठा कि भाजपा या नरेंद्र मोदी को वोट देने से हम किसानों को क्या फायदा हुआ, उलटे नुकसान और झेलना पड़ रहा है. इस से किसान परेशान हो कर भड़क उठे और सड़कों पर आ गए.

शिवराज पर गिरी गाज

महाराष्ट्र के अहमदनगर और नासिक से शुरू हुआ किसान आंदोलन सड़क के रास्ते मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ इलाकों में आया तो इस पर सरकार और प्रशासन ने कोई तवज्जुह नहीं दी जो एक बड़ी भूल साबित हुई.

4 जून को जब रतलाम, नीमच और मंदसौर जिलों में किसान सड़क पर आए तब भी आला अफसरों ने आंदोलन से कोई सरोकार नहीं रखा. शिवराज सिंह सहित उन के मंत्रिमंडल के सदस्य लगातार उग्र होते आंदोलन की तरफ से आंखें मूंदे भोपाल में सोते रहे.

फिर एकाएक ही 6 जून को मंदसौर में हिंसक होते किसानों की भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं तो 6 किसानों की मौत

हो गई. इन मौतों पर हड़कंप मचना स्वाभाविक बात थी.

अब मुद्दा आंदोलन या मांगों से ज्यादा किसानों की फायरिंग में मौत का हो गया था जिस के बाबत सरकार के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था. झूमाझटकी के दौरान किसानों ने मंदसौर के कलैक्टर और एसपी से भी बदसुलूकी की तो किसी मंत्री या नेता की हिम्मत मंदसौर जाने की नहीं पड़ी. किसानों के गुस्से का आलम यह था कि अगर कोई मंत्री या नेता उस वक्त उन के सामने पड़ जाता तो तय है वे अफसरों से ज्यादा उस की दुर्गति करते.

खुद शिवराज सिंह चौहान भी तुरंत मंदसौर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. उन्होंने भोपाल में बैठेबैठे ही एक बेतुका बयान, जिस पर उन का काफी मजाक भी बना, यह दे डाला कि मंदसौर की हिंसा के पीछे कांग्रेस और असामाजिक तत्त्वों का हाथ है.

किसानों की पीड़ा और मांगें तो दरकिनार हो गईं, पूछा यह जाने लगा कि आखिर किसानों पर गोलियां किस के आदेश से चलीं. सूबे के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने इस बाबत बारबार अपने बयान बदले, तो साफ लगा कि कहीं कोई बड़ा गड़बड़झाला है.

फायरिंग के तुरंत बाद 6 जून की दोपहर में भूपेंद्र सिंह ने बयान दिया कि गोलियां पुलिस ने नहीं चलाईं बल्कि मौजूदा भीड़ में से ही किसी ने चलाईं. शाम होतेहोते उन्होंने अपने दोपहर के बयान से पलटते कहा कि गोलियां किस ने चलाईं, यह जांच के बाद साफ होगा. हैरानी उस वक्त और बढ़ गई जब इन्हीं भूपेंद्र सिंह ने 8 जून को एक और बयान में यह माना कि गोलियां पुलिस ने ही चलाईं थीं जिस से किसानों की मौतें हुईं.

सूबे के गृहमंत्री के गैर जिम्मेदाराना बयानों और रवैये का असर यह हुआ कि लोग सीधे शिवराज सिंह चौहान को कोसने लगे जिस की वजह भी मुकम्मल थी कि वे मुख्यमंत्री होते हुए भी पुलिस फायरिंग पर बोलने से कतरा रहे थे. दूसरी तरफ जैसे ही प्रधानमंत्री के दफ्तर ने गोलीकांड पर रिपोर्ट मांगी, सियासी गलियारों में यह चर्चा गरमा उठी कि किसानों की मौतों को सीएम की कमजोरी मान कर उन्हें चलता किया जा सकता है.

अपनों और गैरों से घिरे

किसानों की मौत पर काफी होहल्ला मचा तो कांग्रेस भी मौका ताड़ते हमलावर हो आई. दिग्गज कांग्रेसी नेताओं कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 6 जून को काला दिन करार देते सीएम के इस्तीफे की मांग कर डाली. मुद्दत से सूबे की सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही कांग्रेस को सुनहरा मौका शिवराज सिंह को घेरने को मिल गया.

मत चूको चौहान की तर्ज पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी ड्रामाई अंदाज में भागेभागे मंदसौर आए जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. राहुल गांधी ने समझदारी दिखाते शिवराज सिंह चौहान के साथसाथ नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा कि ये लोग तो किसानों को गोलियां भर देते हैं जबकि उद्योगपतियों का अरबों रुपए का कर्ज माफ कर देते हैं.

6 किसानों की मौतों का बवंडर देशभर में मचा और मध्य प्रदेश के बाहर के नेताओं ने नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साधा. एनडीए से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में लगे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी नरेंद्र मोदी को कोसा और आम आदमी पार्टी ने भी मोदी को ही इस का जिम्मेदार यह कहते ठहराया कि वे 2014 में किसानों से किए वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं, इसलिए किसान आंदोलन पर उतारू हो आए हैं.

सब से दिलचस्प बयान मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने दिया कि किसानों की हिंसा के पीछे कांग्रेस का कोई हाथ नहीं है. सरकार से किसानों की नाराजगी की वजह से आंदोलन हिंसक हुआ.

अकेले पड़े तो उपवास

मंदसौर हादसे के तीसरे दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई जिस में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और कृषि मंत्री राधामोहन सिंह खासतौर से शामिल हुए थे.

इस अहम मीटिंग में मंदसौर में मारे गए किसानों पर चर्चा हुई और भाजपा ने इसे साजिश बताया. यह किस की और कैसी साजिश थी, इस का ब्योरा पेश नहीं किया गया.

इधर, 72 घंटे तक दिल्ली की तरफ मुंह कर के सोए रहे शिवराज सिंह को अपनी पार्टी के आलाकमान और प्रधानमंत्री से अपने हक की कोई बात नहीं सुनाई दी तो वे मायूस हो उठे. यह चर्चा भी हुई कि शिवराज सिंह चूंकि लालकृष्ण आडवानी के खेमे के हैं और नरेंद्र मोदी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं इसलिए भी जानबूझ कर उन की नजरअंदाजी की जा रही है.

दिल्ली की मीटिंग में जाहिर है इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि किसान बौखलाया हुआ क्यों है, जिन उम्मीदों से उस ने 2014 में भाजपा को वोट दिया था वे कितनी पूरी हुई हैं और अब इतना बड़ा हादसा हो जाने के बाद किसानों के हक में क्या किया जाए कि उन्हें राहत मिले.

अलगथलग पड़ गए शिवराज सिंह चौहान को समझ आ गया कि केंद्र सरकार उन की कोई खास मदद नहीं कर रही है जिस के अपने सियासी माने ये हैं कि उन की हालत पार्टी में दोयम दरजे की कर दी गई है. अगर सख्ती दिखाते उन्हें हटाया नहीं जा रहा है तो बनाए रखने के लिए भी कोई जतन नहीं किया जा रहा है.

हिम्मत न हारते शिवराज सिंह चौहान 11 जून को उपवास करने भोपाल के बीएचईल के दशहरा मैदान पर बैठ गए और 24 घंटे बाद किसानों के हक में ताबड़तोड़ घोषणाएं कर दीं जिन का थोड़ाबहुत असर किसानों पर पड़ा लेकिन तब तक उन की साख पर बट्टा तो लग ही चुका था.

केंद्र सरकार की बेरुखी तो अपनी जगह थी पर आम लोग, खासतौर से शिवराज सिंह समर्थक भाजपाई, उस वक्त भी निराश हो उठे जब नरेंद्र मोदी के मुंह से किसानों के हक में हमदर्दी के दो बोल भी न फूटे. शिवराज सिंह के समर्थक एक भाजपा कार्यकर्ता का कहना है कि अंत कुछ भी हो पर अब हम सूबे में किसानों से वोट मांगने लायक नहीं रह गए हैं. 2014 मेें नरेंद्र मोदी के वादों पर किसानों ने भाजपा के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की थी पर मंदसौर हादसे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी से पार्टी को करारा झटका लगा है और इमेज मुख्यमंत्री की बिगड़ी है.

बात सच भी है क्योंकि केंद्र सरकार और भाजपा आलाकमान की मंदसौर के किसानों की मौतों पर चुप्पी का ही यह नतीजा था कि सूबे का कोई मंत्री मंदसौर नहीं गया. कांग्रेस किसानों के मुद्दे पर लगातार भारी पड़ रही है. ऐसे में 2018 का विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के लिए उतना आसान नहीं रह गया है जितना किसान आंदोलन के पहले दिखाई पड़ रहा था.

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