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ये लाइफ सेविंग टिप्स बड़े काम की हैं, आप भी आजमाइये

किसी व्यक्ति के कपड़ों में आग लगने पर आप ने यह तो सुना होगा कि जल्दी से जमीन पर लेट जाएं, आग बुझ जाएगी. फिल्म ‘एनएच-10’ में मीरा के चरित्र से आप ने यह तो जाना होगा कि किसी बदमाश की आंख में टौर्च की रोशनी डालने से आप को भागने के कुछ पल मिल सकते हैं, ऐसे ही किन्हीं खतरों या किन्हीं विपरीत परिस्थितियों में पड़ने पर इन बातों को ध्यान में रखा जा सकता है :

  • घरों में आग लगने पर धुएं के कारण सब से ज्यादा मौतें होती हैं. ऐसी स्थिति में जमीन पर बैठने और ज्यादा सांसें लेने से बचें.
  • आप किसी सार्वजनिक स्थान पर हैं और आप को चोट लग गई है तो किसी व्यक्ति से कहें. यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि यदि आप भीड़ में हैं और घायल हैं तो हर व्यक्ति यह सोचता है कि कोई भी आप की मदद कर देगा. सीधे किसी एक व्यक्ति से मदद मांगें, फिर काफी लोग अपनेआप आ जाते हैं.
  • कुकिंग औयल आग पकड़ ले तो बर्नर को तुरंत बंद करें और बरतन को ढक दें. जरूरत हो तो फायर ब्रिगेड को बुलाएं. कुछ भी करें, पानी का प्रयोग न करें.
  • ब्लेड या चाकू से हमला किए जाने पर इसे हटाने की कोशिश न करें. इस के बजाय घाव को ढकें, खून बंद करने की कोशिश करें और फौरन मैडिकल प्रोफैशनल ढूंढ़ें.
  • ड्राइविंग करते वक्त आप की कार के विंगमिरर सही स्थिति में हों, इस से आप अपने साथसाथ सड़क पर चलने वाले दूसरे लोगों का भी ध्यान रख सकते हैं.
  • फोन पर मैसेज करते हुए चलें नहीं. आप का मस्तिष्क इसे हैंडल नहीं कर सकता. जहां जा रहे हैं, उस ओर देखें. चलते हुए फोन का प्रयोग बहुत हानिकारक हो सकता है, आप को ‘इनअटैंशन ब्लाइंडनैस’ हो सकती है. आप चारों तरफ देख तो रहे होते हैं पर वास्तव में महसूस नहीं कर पाते कि आप को किसी गाड़ी से चोट लगने वाली है.
  • लोग घाटियों में, नदियों के किनारे घर बना लेते हैं, इसलिए यदि आप पहाड़ों पर ट्रैकिंग करते हुए अपना रास्ता भूल जाएं, अकेले हो जाएं तो नीचे चलना शुरू कर दें. इस तरह दूसरे लोगों से मिलने की संभावना बढ़ जाती है. नदियां या झरने हमेशा नीचे की तरफ बहते हैं, इन का अनुसरण करें. इस तरह किसी सड़क पर, अपने साथियों तक पहुंचने में सुविधा हो जाती है.
  • आप ने किसी एडवैंचर फिल्म में देखा होगा पर हाइड्रेशन के लिए बर्फ आखिरी विकल्प होना चाहिए. यह पानी की जगह नहीं ले सकती. इसे खा कर आप शरीर की गरमी कम कर रहे होते हैं जो आप के लिए ज्यादा हानिकारक हो सकती है.बहरहाल, कुछ भी करने से पहले होने वाली हानि व खतरों को ध्यान में रखना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है.
  • किसी हमलावर से अपनी सुरक्षा के लिए एक टौर्च बहुत काम आ सकती है. विशेषरूप से रात में उस की आंखों में टौर्च की रोशनी डालना बहुत काम आ सकता है. ऐसा करने से जल्दी ही किसी का ध्यान आप की परेशानी की तरफ आकर्षित हो सकता है.
  • अगर किसी को गंभीर चोट लगी है, जैसे सिर या स्पाइन में, उसे कभी भी हिलाएं नहीं, उसे किसी प्रोफैशनल पर छोड़ दें. फिर भी यदि आप ऐसी स्थिति में हैं कि आप को किसी घायल को सुरक्षित जगह पर ले जाना हो और वह व्यक्ति आप से भारी हो तो स्वयं को भी नुकसान पहुंचाए बिना ऐसा करने की कोशिश करें. व्यक्ति के चेहरे की तरफ अपना चेहरा कर उस की बांह अपने कंधे पर खींचें, झुक जाएं, आप का कंधा उस व्यक्ति के मध्य भाग तक होगा. फिर धीरे से संभाल कर उस व्यक्ति को अपने कंधे पर लाएं और अपने पैरों की ताकत पर खड़ा होने की कोशिश करें (आगे झुकने की कोशिश न करें इस से आप की कमर को नुकसान हो सकता है).

नवाज ‘शरीफ’ नहीं : पाकिस्तान पर पनामा पेपर्स का हमला

पनामा पेपर्स लीक को ले कर एक और देश के मुखिया को सत्ता से बेदखल होना पड़ा है. पनामा पेपर्स में सामने आए विश्वभर के भ्रष्ट नेताओं में शुमार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने पद से हटा दिया है. कोर्ट ने शरीफ को पद से हटने का आदेश तो दिया ही, भविष्य के लिए उन्हें अयोग्य भी करार दिया है. कोर्ट के फैसले से शरीफ के परिवार का सियासी भविष्य अधर में लटक गया है.

पनामा पेपर लीक मामले पर कोर्ट का फैसला पाकिस्तान की राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना है. देश के प्रमुख पद पर बैठे नवाज शरीफ ऐसे शख्स हैं जिन्हें खोजी पत्रकारिता का शिकार होना पड़ा है.

अदालत द्वारा अयोग्य ठहराने का यह पहला मामला नहीं है. इस से पहले पाकिस्तान में अगस्त 1990 में बेनजीर भुट्टो को 18वें संशोधन के तहत हटा दिया गया. जून 2012 में यूसुफ रजा गिलानी को भी सुप्रीम कोर्ट अयोग्य ठहरा चुका है.

इस से पहले आइसलैंड के प्रधानमंत्री सिग्मुंदुर डेविड को पद छोड़ना पड़ा था. पनामा पेपर्स लीक को ले कर विदेशों में कालाधन जमा करने की जांच कर रहे संयुक्त जांच दल यानी जेआईटी की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने नवाज शरीफ सरकार के वित्त मंत्री इशाक डार और नैशनल असैंबली के सदस्य कैप्टन मुहम्मद सफदर को भी उन के पदों से अयोग्य ठहराया है.

कोर्ट के 5 जजों की बैंच ने साफ निर्देश दिए कि नवाज शरीफ, उन की बेटी मरियम, बेटे हुसैन और हसन के खिलाफ 6 हफ्तों में मुकदमा दर्ज किया जाए. साथ ही, पाकिस्तान की शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधी संस्था राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो को 6 माह में जांच पूरी करने को कहा गया है.

नवाज शरीफ को संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के तहत अयोग्य ठहराया गया है. इन अनुच्छेदों के अनुसार, संसद सदस्य को ईमानदार और इंसाफपसंद होना चाहिए. न्यायमूर्ति एजाज अफजल खान ने कहा कि नवाज शरीफ अब पाकिस्तानी संसद के प्रति ईमानदार और समर्पित सदस्य होने के योग्य नहीं हैं. उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना होगा. इस के बाद पाकिस्तान चुनाव आयोग ने तुरंत नवाज की योग्यता को खारिज करने का आदेश दे दिया.

बेनामी संपत्ति ले डूबी

नवाज पर प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान लंदन में बेमानी संपत्ति बनाने के आरोप हैं. लंदन में शरीफ परिवार द्वारा खरीदे गए फ्लैट के लिए पैसे कहां से आए, इस पर नवाज और उन की टीम द्वारा दिए गए जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं था. न्यायाधीशों ने कहा था कि अगर शरीफ परिवार ने लंदन में फ्लैट्स की खरीद के समय सभी जरूरी कागजात जमा किए होते तो विवाद खड़ा ही नहीं होता.

जेआईटी ने अपनी रिपोर्ट में नवाज और उन के परिवार पर धोखाधड़ी, फर्जी कागजात बनाने, अपनी संपत्ति के स्रोतों को छिपाने और आय से कहीं ज्यादा आलीशान जीवन जीने जैसे कई संगीन आरोप लगाए थे. इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ यह मामला कोर्ट में ले गई थी और शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था.

नवाज शरीफ वर्ष 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे और अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके. उन्हें पहली बार राष्ट्रपति, दूसरी बार सेना और तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने हटाया.

15 महीने पहले नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार का यह मामला सामने आया था. नवंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ से जुड़े मामले को देखने का फैसला किया. बाद में कोर्ट ने अप्रैल 2017 में जौइंट इंवैस्टिगेशन टीम के गठन का आदेश दिया. 6 सदस्यीय टीम ने जांच शुरू की और 7 हफ्ते की जांच के बाद 10 जुलाई को रिपोर्ट जमा की. इस दौरान शरीफ परिवार के 8 सदस्यों से पूछताछ की गई.

नवाज शरीफ के तीनों कार्यकाल भ्रष्टाचार व घोटालों से घिरे रहे. 6 नवंबर, 1990 को वे पाकिस्तान के 12वें प्रधामंत्री बने. उन्होंने उस समय आर्थिक सुधारों के साथसाथ परमाणु कार्यक्रम को रफ्तार देने को प्राथमिकता पर रखा. 1992 में दिवालिया चिटफंड कंपनियों के उन के स्वामित्व वाले इत्तफाक ग्रुप को कर्ज देने के खुलासे से उन की किरकिरी हुई और उन की लोकप्रियता कम हुई थी. दिसंबर 2016 में लंदन, सऊदी अरब, यूएई में मनी लौंड्रिंग से संपत्ति खरीदने के आरोपों का खुलासा हुआ.

नवाज शरीफ 1985 में सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक की मदद से राजनीति में आए थे. अदालत ने जिस अनुच्छेद के तहत अयोग्य ठहराया है, उसे जियाउल हक 18वें संशोधन के जरिए समाप्त करना चाहते थे पर तब शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन ने ही संशोधन का विरोध किया था.

जांच टीम के अनुसार, नवाज 7 अगस्त, 2006 से 20 अप्रैल, 2014 तक दुबई स्थित एक कंपनी के चेयरमैन थे. उन्हें 10 हजार दिरहम वेतन मिलता था. पर 2013 के चुनाव में उन्होंने यह जानकारी नहीं दी. वे इसे झुठलाते रहे पर यूएई वर्क वीजा रोड़ा बन गया. यूएई में सभी को वैज प्रोटैक्शन सिस्टम के तहत बैंक से वेतन मिलता है. सुबूत जांच टीम के पास था. इसी आधार पर नवाज बेईमान साबित हुए.

पनामा पेपर्स में शरीफ परिवार की लंदन में 4 महंगे फ्लैट्स सहित कई संपत्तियों का खुलासा हुआ था. 1990 के दशक में फर्जी कंपनी बना कर इन संपत्तियों को खरीदा गया था. ये संपत्तियां नवाज शरीफ की बेटी और बेटों के नाम हैं.

नवाज शरीफ को इस से पहले 18 जुलाई, 1993 को भी भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री पद से बरखास्त किया गया था. दूसरी बार अक्तूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन की सरकार का तख्तापलट किया था.

68 वर्षीय शरीफ पहले ऐसे नेता हैं जो तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे. 1999 में कारगिल युद्ध के चलते शरीफ ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख पद से हटाने का फैसला किया पर मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया. बाद में पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधी अदालत ने शरीफ को भ्रष्टाचार मामले में दोषी करार दिया. सऊदी अरब की हुकूमत की मध्यस्थता के चलते वे जेल जाने से बच गए पर उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. तब उन्होंने सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में शरण ली.

अगस्त 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ को पाकिस्तान वापस आने की इजाजत दी. सितंबर 2007 में वे 7 वर्षों के निर्वासन के बाद इसलामाबाद लौटे पर हवाईअड्डे से ही तुरंत उन्हें वापस भेज दिया गया. सऊदी अरब के हस्तक्षेप के चलते नवंबर 2007 में नवाज शरीफ फिर से पाकिस्तान वापस आ गए. तत्कालीन सेना प्रमुख अब पनामा पेपर्स मामले ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पूरी सत्ता को उजाड़ दिया है.

भ्रष्ट नेताओं में जो भय का माहौल व्याप्त है, इस का श्रेय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को दिया जाना चाहिए जिस ने पनामा पेपर्स की रिपोर्ट जारी कर के पूरी दुनिया के अवैध कारोबारियों की कलई खोल दी थी. 100 से ज्यादा देशों के पत्रकारों की संस्था इंटरनैशनल कंसोर्टियम औफ इंवैस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स ने पनामा पेपर्स के नाम से दुनिया की बड़ी हस्तियों का कालाधन उजागर किया था. इस के 1.15 करोड़ दस्तावेज हैं. यह सूचना पनामा की फर्म मोसेक फोंसेका को हैक कर निकाली गई थी. पनामा दक्षिणी अमेरिका का एक छोटा देश है जिस के बीच से एक नहर निकाली गई है जो प्रशांत महासागर व एटलांटिक महासागर को जोड़ती है.

पनामा पेपर्स में 500 भारतीयों के नाम भी सामने आए थे. इन में अभिनेता अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्र्या राय, अजय देवगन, डीएलएफ के चेयरमैन के पी सिंह, गौतम अडाणी के भाई विनोद अडाणी के नाम भी हैं. इन पर फर्जी कंपनियों के जरिए पैसा बाहर भेजने के आरोप हैं. मामले की जांच एसआईटी कर रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और फुटबौलर मैसी जैसी हस्तियों के नाम भी शामिल हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाली भारत सरकार इस मामले में कोई कार्यवाही करती नहीं दिख रही है.

भारत में भी ऐसे मामले हुए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था. 1971 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई थी. उन के प्रतिद्वंद्वी राजनारायण चुनाव हार गए थे पर राजनारायण ने इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी.

न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को कदाचार का दोषी पाया और अपने ऐतिहासिक फैसले में गांधी की जीत को अवैध करार दे दिया. कोर्ट ने इंदिरा गांधी पर 6 साल के लिए चुने हुए पद पर आसीन होने से रोक लगा दी थी. हालांकि इस निर्णय से देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया. इंदिरा गांधी ने इमरजैंसी का ऐलान कर दिया.

पनामा पेपर्स है क्या

पनामा की मोसेक फोंसेका कंपनी द्वारा 1.15 करोड़ गुप्त फाइलों का भंडार इकट्ठा किया गया था. इन में कुल 2,14,000 कंपनियों से संबंधित जानकारी है. इस से अब तक 40 देशों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जा चुकी है. जानकारी के मुताबिक, भ्रष्ट लोगों में सरकारों में बैठे नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, फिल्म इंडस्ट्री व खेल जगत के लोग और ड्रग स्मगलर शामिल हैं.

पनामा पेपर्स के नाम से लीक हुए इन दस्तावेजों को सामने लाने में मुख्य भूमिका अमेरिका स्थित एक एनजीओ और खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन आईसीआईजे की है. जांच में जो डाटा सामने आया वह 1977 से ले कर 2015 तक का यानी 40 वर्षों का है. इस मामले में पनामा स्थित ला फर्म मोसेका फोंसेका  के संस्थापक की गिरफ्तारी हो चुकी है.

पनामा की यह लौ कंपनी पैसे के प्रबंधन का काम करती है. कालेधन को सुरक्षित ठिकाने लगाने का काम यह कंपनी सालों से करती आई है. यह फर्जी कंपनी खोल कर कागजों का हिसाब रखती है. पनामा की अर्थव्यवस्था ऐसी ही कंपनियों पर निर्भर है.

आईसीआईजे ने 10 मई, 2016 को कर चोरी के सुरक्षा ठिकाने माने जाने वाले देशों में कंपनियां रखने से जुड़ी पनामा पेपर्स की विस्तृत जानकारी प्रकाशित की थी. इन में हजारों दस्तावेज ऐसे हैं जो भारत के लगभग 2 हजार लोगों, कंपनियों और पतों से जुड़े हैं. इन दस्तावेजों में 147 राजनीतिबाजों के बारे में जिक्र किया गया है. उन के परिवार व नजदीकी लोग इस से जुड़े हैं.

बीते 1 साल में 80 देशों के 100 से अधिक  मीडिया संगठनों के 400 पत्रकारों ने इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया है. अध्ययन करने वाले पत्रकारों में कानून, आयकर, अर्थशास्त्र, मैडिकल जैसे तमाम विषयों के विशेषज्ञ शामिल हैं.

42 देशों में सक्रिय इस कंपनी का करीब 600 लोगों का स्टाफ है. कई देशों में इस कंपनी ने अपनी फ्रैंचाइजी भी दे रखी है. टैक्स हैवन कहे जाने वाले देशों स्विट्जरलैंड, साइप्रस, ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड, जर्सी  जैसे 35 से अधिक देशों में इस के औफिस हैं. खुलासे के बाद कंपनी को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. कंपनी के खिलाफ जांच की मांग की गई कि  उस की सूचनाएं कैसे लीक हुईं.

बदहाल राजनीतिक दौर

धर्म के नाम पर बना पाकिस्तान अपनी आजादी के 70 वर्षों बाद भी नेताओं के भ्रष्टाचार और मजहबी कट्टरपंथियों से मुक्त नहीं हो पाया है. पाकिस्तान में उस के जन्म के समय से ही लोकतंत्र पर ग्रहण लगा हुआ है. यही वजह है कि पिछले 70 वर्षों में पाकिस्तान का कोईर् भी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सका.

14 अगस्त, 1947 को जब से पाकिस्तान का विश्व के नक्शे पर नए देश के रूप में उदय हुआ था तभी से यह देश भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता, सैनिक तानाशाही से जूझ रहा है. सत्ता की छीनाझपटी, तख्तापलट इस राष्ट्र की जैसी स्थायी नियति बन गई है.

1951 में इस देश के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या कर दी गई. इस के बाद प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद ने पद से हटा दिया था. ज्योंही 1956 में पाकिस्तान को इसलामिक राष्ट्र घोषित किया गया, सत्ता वहां फुटबौल बन गई. बारबार कभी सेना ने सत्ता हथियाई तो कभी अदालत ने भ्रष्टाचारी नेताओं पर कोड़ा फटकारा.

1958 में सेना प्रमुख रहे अयूब खान ने लोकतंत्र का गला घोंटते हुए सत्ता कब्जाने की शुरुआत की. देश में मार्शल ला लगा दिया गया. इस के बाद 1960 में वे राष्ट्रपति बन गए. अयूब खान के इस्तीफे के बाद 1969 में जनरल याहया खान ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के खिलाफ बगावत की और उन्हें पद से हटा कर सैन्य शासन लागू कर दिया. बाद में भुट्टो को 1979 में फांसी पर लटका दिया  गया.

1986 में भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का नेतृत्व किया. 1990 में बेनजीर को भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोपों में बरखास्त कर दिया गया और नवाज शरीफ देश के प्रधानमंत्री बने.

1993 में राष्ट्रपति इशाक खान और नवाज शरीफ दोनों को ही सेना के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा. आम चुनाव हुए तो बेनजीर एक बार फिर सत्ता में लौटीं. फारुख लेघारी राष्ट्रपति बने जिन्होंने 1996 में बेनजीर सरकार को बरखास्त कर दिया. 1999 में बेनजीर भुट्टो और उन के पति आसिफ अली जरदारी को जेल की सजा सुनाई गई. हालांकि वे देश के बाहर ही रहे.

वर्ष 2000 में पीपीपी और शरीफ की मुसलिम लीग ने गठबंधन कर चुनाव जीता  और इस गठबंधन की तरफ से पीपीपी के यूसुफ रजा गिलानी देश के प्रधानमंत्री बने. गठबंधन सरकार के साल 1998 में देश में मार्शल ला लगाने की जांच शुरू करने की सहमति बनी तो परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. नवाज शरीफ ने सरकार से अलग होने का फैसला किया और जरदारी देश के राष्ट्रपति बने.

2007 में बेनजीर भुट्टो निर्वासन से लौट आईं. परवेज मुशर्रफ एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जीत गए पर सुप्रीम कोर्ट ने उन के निर्वाचन को चुनौती दी. इस से तिलमिलाए मुशर्रफ ने देश में आपातकाल लगा दिया और मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बरखास्त कर के नया जज नियुक्त कर दिया. नए जज ने मुशर्रफ की जीत पर मुहर लगा दी.

इस बीच, नवाज शरीफ निर्वासन से वापस आ गए और बेनजीर की एक रैली में हत्या कर दी गई. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अयोग्य ठहरा दिया जिस से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. दरअसल, उन की सरकार ने जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खोले जाने से इनकार कर दिया था.  इस के बाद रजा परवेज अशरफ देश में प्रधानमंत्री बने.

2013 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में रजा गिलानी की गिरफ्तारी का आदेश दिया था. गिरफ्तारी का यह आदेश उस समय के भ्रष्टाचार से जुड़ा था जो उन्होंने 2010 में जल एवं बिजली मंत्री रहते हुए किए थे.

यह सही है कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकारों ने सही भूमिका नहीं निभाई. उस के नेता भ्रष्टाचार में लिप्त रहे. बाद में उन पर भ्रष्टाचार, बेईमानी के मुकदमे चले, उन्हें निर्वासित होना पड़ा. नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो, परवेज मुशर्रफ को निर्वासन झेलना पड़ा. मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है.

सरकार और फौज दोनों भ्रष्ट

असल में पाकिस्तान धार्मिक कट्टरपंथियों, भ्रष्ट नेताओं और सेना के दखल के बीच हमेशा डांवांडोल हालात में रहा. तीनों अपनेअपने वर्चस्व के लिए एकदूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं, इसलिए वहां लोकतंत्र बहुत मजबूत नहीं हो पाया. वहां आतंकवाद पनपता गया. आतंकी टे्रनिंग कैंप खुल गए. आएदिन अपने ही धर्म के लोगों पर हमले होते हैं.

पाकिस्तान ऐसा देश है जहां चुनी हुई सरकार और फौज दोनों ही समानरूप से भ्रष्ट हैं. पर कानून की तलवार ही कभीकभी कारगर साबित होती रही है. फिर भी, पाकिस्तान की न्यायपालिका को भी निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता. वहां भी सेना की दखलंदाजी रहती है. ऐसे में देश में सदैव अराजकता के हालात बने रहते हैं. आम जनता परेशान होती है. उस का गरीबी, भुखमरी, बेकारी से नजात पाना मुश्किल है. यही कारण है कि पाकिस्तान कभी अमेरिका तो कभी चीन के टुकड़ों का मुहताज बने रहने को विवश है.

45 दिनों के प्रधानमंत्री – शाहिद खाकान अब्बासी

पाकिस्तान में राजनीतिक उथलपुथल के बीच शाहिद खाकान अब्बासी को पाकिस्तान के 18वें प्रधानमंत्री के तौर पर चुना गया है. 221 वोटों से चुनाव जीत कर शाहिद अब्बासी पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए हैं. प्रधानमंत्री पद के लिए पीएमएल-एन के अब्बासी समेत कुल 6 उम्मीदवार मैदान में थे.

गौरतलब है कि पाकिस्तान मुसलिम लीग-नवाज ने शाहिद खाकान अब्बासी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की ओर से खुर्शीद शाह और नावेद कमर के नाम पीएम उम्मीदवार के लिए घोषित किए गए थे. वहीं, पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ ने शेख राशिद को अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद का कैंडीडेट बनाया था. नावेद कमर को 47 वोट, शेख राशिद को 33 वोट और जमाते इसलामी के साहिबजादा तारिक उल्ला को महज 4 वोट मिले.

पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक किसी पार्टी के उम्मीदवार को बहुमत के लिए 172 वोटों की जरूरत होती है. नवाज शरीफ के बेहद करीबी माने जाने वाले अब्बासी उन के मंत्रिमंडल में पैट्रोलियम एवं प्राकृतिक संसाधन मंत्री रहे हैं. अब्बासी 45 दिनों तक इस पद पर रहेंगे.

पाकिस्तान का सैन्य लोकतंत्र

बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान वजूद में आया था तब वहां पूंजीवादी तो दूर की बात है, कोई दूसरी तरह की भी अर्थव्यवस्था नहीं थी. नए आजाद हुए देश के लिहाज से यह बात कतई हैरत की नहीं थी पर पाकिस्तान में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पनपना और फिर स्थायी हो जाना अर्थशास्त्रियों को भी अचंभित कर देने वाली बात थी.

आजाद पाकिस्तान में सिर्फ प्राकृतिक संसाधन थे, उन में भी उल्लेखनीय जमीनें थीं जो आज भी हैं. दोटूक कहा जाए तो वहां जमींदारी व्यवस्था थी जिस में 99 फीसदी आम लोग थे और 1 फीसदी जमींदार या नवाब.

ब्रिटिशकाल में सैन्य अधिकारियों को जमीनें देने का रिवाज पाकिस्तान में साल 1958 तक कायम रहा. मुट्ठीभर अंगरेजों ने, दरअसल, संपन्न किसानों को ही सैन्य अधिकारी बनाना शुरू कर दिया था. पद के हिसाब से सैन्य अधिकारियों को जमीनें दे दी जाती थीं. इस से अंगरेजों का फायदा यह था कि सेना उन की वफादार बनी रहती थी. इन सैनिकों या सैन्य अधिकारियों के हाथ में हल नहीं, बंदूक होती थी जिस के दम पर ये गरीब मजदूरों से खेतीकिसानी करवाते थे.

पाकिस्तानी सेना का ढांचा जैसा अंगरेज छोड़ गए थे वैसा ही बना रहा, और आज भी तकरीबन वैसा ही है. नतीजतन, आधी से ज्यादा जमीनों के मालिक वे सैन्य अधिकारी हैं जो खेती की एबीसीडी भी नहीं जानते लेकिन बंदूक और धर्म के दम पर अपने गोदाम भरते रहे. चूंकि पाकिस्तान बना ही धर्म के आधार पर था इसलिए मालिकों के लिए खेतों में पसीना बहाते शोषित वर्ग का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया कि ये जमीनें किस बिना पर आजादी के बाद भी बांटी जा रही हैं.

विभाजन के बाद एक दशक तो स्थापना और स्थायित्व की अफरातफरी में ही गुजर गया और जब लोग आश्वस्त हो उठे कि अब अंगरेज लौट कर नहीं आएंगे और  न ही भारत हमला करेगा, तो जमींदारी और शोषण को ले कर सुगबुगाहट शुरू हुई. पर कट्टरवाद को ले कर किसी ने चूंचपड़ नहीं की. 1960 के बाद इस पूंजीवाद का दिखना शुरू हो गया था और एक अर्थव्यवस्था भी आकार लेने लगी थी.

एक मशहूर और विवादित पाकिस्तानी लेखक मुबारक हैदर के अनुसार, बंटवारे के वक्त वहां जो जागीरें मौजूद थीं वे आज भी कायम हैं. सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान में तो कई ऐसे बड़े जमींदार हैं जिन के पास हजारों एकड़ जमीनें हैं. चूंकि जमींदार ही सत्ता में हैं, इसलिए भूमि सुधार की बात कोई नहीं करता. पाकिस्तान के गांवों की बदहाली आजादी के 67 वर्षों बाद भी ज्यों की त्यों है और जमींदारों के जुल्म ढाते तानाशाही रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है.

जब उद्योगों की स्थापना होने लगी और छोटेमोटे ही सही, कारखाने भी वजूद में आने लगे तब एक और हैरतभरी बात 1958 में पाकिस्तानी सेना के पहले कमांडर इन चीफ अयूब खान, जिन्होंने पाकिस्तान में सेना द्वारा तख्ता पलटने का रिवाज शुरू किया था, ने यह की कि सैन्य अधिकारियों को वित्त, उद्योग और अर्थव्यवस्था में अहम पद परोसे जाने लगे. बहुत जल्द ही इन सैन्य अधिकारियों ने अर्थव्यवस्था को भी अपने कब्जे में ले लिया. अब पाकिस्तान के उद्योगों व सार्वजनिक उपक्रमों और प्रतिष्ठानों के मुखिया पद पर भी सैन्य अधिकारी विराजने लगे. दोटूक कहा जाए तो अर्थव्यवस्था, जिसे किसी भी आजाद देश की रीढ़ माना जाता है, भी सेना के हाथ में आ गई.

कल तक सेना के जो अधिकारी गांवदेहातों में ब्याज पर पैसा चलाते साहूकारी कर रहे थे वे धीरेधीरे शेयर और स्टौक की खरीदफरोख्त भी करने लगे. तमाम अहम आर्थिक प्रतिष्ठानों पर रिटायर्ड सैन्य अधिकारी नजर आने लगे.

सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के हाथ में पैसा आया तो राजनीति और धर्म को इन्होंने बंदी बना लिया. इसलाम में और कुरान में यह लिखा है, यह हिदायत है, और यह बंदिश है जैसी बातें भी ये थोपने लगे जिस से लोग कूपमंडूक बने रहें और ऐसा हुआ भी. तय है पाकिस्तान पहला देश है जहां पूंजीपति वही है जो कभी सैन्य अधिकारी रहा हो. सैन्य पूंजीपति आधारित इस अर्थव्यवस्था ने वहां लोकतंत्र को पनपने ही नहीं दिया.

पनामा पेपर कांड इस का अपवाद नहीं है. जब आम लोगों का गला सिर्फ दो वक्त की रोटी निगलने लायक भर छोड़ा गया तो इन्हीं सैन्य अधिकारियों ने दूसरे कालेधंधे भी करने शुरू कर दिए जिस के लिए पाकिस्तानी सेना दुनियाभर में कुख्यात है. ये धंधे थे हथियारों की तस्करी और आतंकवाद को शह देने के. जिस के चलते पाकिस्तान में मध्यवर्ग कभी मजबूत नहीं हो पाया. लोकतंत्र उच्चवर्ग के लोग कभी चाहते नहीं और निम्नवर्ग में इतनी क्षमता, बुद्धि या चालाकी, कुछ भी कह लें, होती नहीं कि वह सत्ता से लड़ सके.

सरकारें बदलीं, शासक आए, गए. पर पाकिस्तान की सत्ता उन जमींदारों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हाथों में ही रही जो कल तक कुछ नहीं थे. इन सैन्य अधिकारियों को चूंकि देशहितों से कोई लेनादेना नहीं था, इसलिए ये हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी और धंधा भी करने लगे. इन लोगों ने इस बात का ध्यान हर वक्त रखा कि आवाम कभी इसलाम के खिलाफ न जाए, इसलिए लोगों को काबू में रखने के लिए ये लोग मजहब का मनमाना इस्तेमाल करते रहे.

मिसाल कट्टरवाद की

पाकिस्तान में पसरी धार्मिक कट्टरता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही जिस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मात्र 3 शब्द हैं जिन पर अमल करने की सख्त मनाही है. खुले विचारों और हवा के लिए पाकिस्तान में कभी कोई जगह नहीं रही. ऊपर वाले के डर और नीचे वालों के कहर ने किस तरह लोगों को दिमागी तौर पर गुलाम बना रखा है, इस की एक मिसाल साल 2011 में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के रूप में देखने में आई थी.

पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या दिनदहाड़े उन के ही सुरक्षा गार्ड ने कर दी थी. इसलामाबाद की कड़ी सुरक्षा तब एक तरफ रखी रह गई थी क्योंकि सलमान तसीर के हत्यारे मुमताज कादरी को यह बात पसंद नहीं आई थी कि  वे ईशनिंदा कानून पर सार्वजनिक रूप से कुछ बोलें. तसीर की गिनती पाकिस्तान के नामी कारोबारियों में होती थी लेकिन वे कट्टरवाद की घुटन से एक हद तक आजाद थे. उन का कुसूर इतना भर था कि वे एक ऐसी औरत की सजा माफ कर देने की बात कर रहे थे जिस ने ईशनिंदा की थी.

पाकिस्तान में ईशनिंदा यानी हजरत मुहम्मद पैगंबर की आलोचना एक संगीन गुनाह है जिस की सजा सिर्फ मौत होती है.

एक हत्यारे को हीरो की तरह पेश करने और पूजने का काम पाकिस्तान में हुआ तो सहज ही दुनिया को समझ आ गया कि पाकिस्तान में लोकतंत्र एक परिकल्पना भर है. धर्म और कट्टरवाद के खिलाफ बोलने वालों को अदालतों के पहले, आम लोग ही सजा दे देते हैं. एक कातिल को मिले समर्थन पर तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी भी कुछ नहीं बोल पाए थे जो सलमान तसीर के बेहद नजदीकी दोस्त थे.

नवाज शरीफ बहुत ज्यादा कट्टर नहीं थे. उन्होंने ही पाकिस्तानियों को टीवी चैनल्स और इंटरनैट इस्तेमाल करने की सहूलियतें दीं. वे कट्टरवादियों की नापसंद बनते जा रहे थे. उन्होंने वही प्रचलित पाकिस्तानी बेईमानी की थी जो उन के पहले के शासक करते आए थे कि मनमाफिक दाम मिले तो देशहित बेचने में हिचकिचाओ मत. लेकिन पनामा कांड में तो दुनियाभर के नेता और दूसरे रसूखदार लोग भी शामिल हैं.

मुमकिन यह भी है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट पर सेना का दबाव इस बाबत रहा हो. वजह, जिस देश में कपड़े धर्म के मुताबिक पहने जाते हों, जहां की दिनचर्या धार्मिक निर्देशों से चलती हो, जहां के नेता पूरी तरह धार्मिक गुलामी ढोते हों, वहां की सब से बड़ी अदालत निष्पक्ष न्याय करेगी, इस में शक है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बारीकी से नजर डालें तो उस ने नवाज शरीफ को यूएई के वर्क वीजा के बाबत झूठ बोलने पर हटाया है, न कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाने पर. हुक्म यह भी था कि उन्हें अपील करने का भी हक न दिया जाए.

इमरान के निशाने पर नवाज की शाही जिंदगी

पनामा पेपर्स लीक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पद से हटाए जाने से पहले ही नवाज शरीफ की खरबों की जायदाद उन के राजनीतिक विरोधियों खासतौर से इमरान खान के निशाने पर रही है. लाहौर में उन का आलीशान मकान रायविंड पैलेस है जिस में 3 भव्य ड्राइंगरूम और स्वीमिंग पूल भी हैं. नवाज शरीफ के परिजनों के दाखिले के लिए अलग से एक दरवाजा खासतौर से बना हुआ है. रायविंड पैलेस के लगभग सभी दरवाजों पर शेर बने हुए हैं.

नवाज शरीफ की देशविदेश में फैली जायदाद का सही अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए पर उजागर तौर पर उन की जायदाद की कीमत 9,000 करोड़ रुपए के लगभग आंकी जाती है. शरीफ 6 शुगर फैक्टरियों और एक स्टील मिल के भी मालिक हैं. पनामा मुद्दे पर नवाज को घेरने वाले इमरान खान का दावा है कि नवाज के पास लंदन के एक पौश इलाके में भी जायदाद है और उन्होंने यूरोप में लाखों डौलर का निवेश कर रखा है. बकौल इमरान, चूंकि पाकिस्तानी संसद में बैठा विपक्ष भी भ्रष्ट है, इसलिए कोई इस बाबत सवाल नहीं करता, सभी के पास बेहिसाब नाजायज दौलत है.

नवाज शरीफ के मालिकाना हक की जमीनों की कीमत ही 150 करोड़ रुपए है. उन के बेटे हुसैन शरीफ के पास 80 करोड़ डौलर की जायदाद लंदन में है. उन की पत्नी कुलसूम नवाज के नाम 10 करोड़ रुपए कीमत की जमीनें और मकान हैं.

फौंट से फंसी सरकार

पनामा लीक्स मामले में तकनीक की बड़ी भूमिका सामने आई है. पनामा पेपर स्कैंडल में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बेटी मरियम नवाज शरीफ की एक फौंट ने रातों की नींद उड़ा दी. असल में इस मामले में नवाज शरीफ की बेटी मरियम द्वारा पेश दस्तावेजों के केवल फौंट स्टाइल पकड़ में आने से झूठ की जटिल श्रृंखला का परदाफाश हुआ. इस के केंद्र में कैलिब्री फौंट रहा है. मरियम ने संपत्ति के जो कागजात अदालत में दाखिल किए थे, उन की तारीख और फौंट मेल नहीं खा रहे थे. उन के द्वारा पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेज, जो कि 2006 में तैयार किए गए थे, कैलिब्री फौंट में तैयार किए गए थे. जबकि कैलिब्री फौंट को माइक्रोसौफ्ट कंपनी ने मार्केट में 30 जनवरी, 2007 में विंडोज विस्ता और माइक्रोसौफ्ट औफिस में लौंच किया था. फौंट के मार्केट में आने से पहले कोई दस्तावेज उस फौंट में कैसे तैयार किया जा सकता है? इसी बात को ले कर मरियम के ऊपर फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने का आरोप लग गया.

मरियम ने दस्तावेजों की फोटो ट्वीट करते हुए दावा किया था कि वह संपत्ति की केवल ट्रस्टी है, स्वामी नहीं. बाद में ये दस्तावेज अदालत में पेश किए गए. डीड दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की गई तारीख फरवरी 2006 की थी और वह माइक्रोसोफ्ट कैलिब्री फौंट में प्रिंटेड थे. यहीं पर मरियम द्वारा दाखिल कागजों की पोल खुल गई. इस सिलसिले में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने फौंट के डिजायनर लुकास डी ग्रूट से और फौंट को मार्केट में लाने वाली माइक्रोसौफ्ट से भी पूछताछ की.

— भारत भूषण श्रीवास्तव के साथ राजीव खरे

‘पलटीमार’ नीतीश कुमार और बिहार की राजनीति के अनोखे रंग

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ पिछले वर्ष सभी विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की मुहिम शुरू कर नैशनल हीरो के रूप में उभरे नीतीश कुमार एक बार फिर से संघ की गोद में जा बैठे हैं. साल 2013 में भाजपा का साथ छोड़ कर लालू प्रसाद यादव के कंधे पर चढ़ कर सत्ता हासिल करने वाले नीतीश ने 26 जुलाई को लालू, महागठबंधन और जनादेश का दामन झटक कर भाजपा के कमल में रंग भर दिया. भाजपा के साथ मिल कर उन्होंने बिहार में सरकार बना ली है. ऐसा कर उन्होंने अपने संघमुक्त भारत के नारे को अपने ही हाथों मिट्टी में मिला दिया.

नीतीश कुमार न संघवाद और भाजपा के खिलाफ देशव्यापी मुहिम छेड़ने के लिए तमाम समाजवादियों और सियासी दलों को एक झंडे तले आने की गुहार लगाई थी. इस के पीछे उन की निगाहें साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर टिकी हुई थीं. उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत के बाद उन्हें महसूस होने लगा कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को फिलहाल मात देना मुमकिन नहीं है. सो, वे लालू से नाता तोड़ने और भाजपा से हाथ मिलाने के मौके ढूंढ़ने लगे या कहिए कि माहौल बनाने लगे. तेजस्वी यादव और मीसा भारती के घर पर सीबीआई, इनकम टैक्स और ईडी के छापे पड़ने के बाद उन्हें वह मौका मिल गया, जिस का वे कई महीनों से इंतजार कर रहे थे. यह प्रायोजित था या नहीं, कभी मालूम न होगा.

कहां गई एकजुटता

नीतीश कई मौकों पर यह कहते रहे थे कि भाजपा और संघ की आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं रही है, इस के बाद भी वे राष्ट्रभक्ति का ढोल पीटते रहते हैं. भगवा झंडा फहराने वालों को कभी भी तिरंगे से कोई वास्ता नहीं रहा. वे लोग तिरंगे पर लैक्चर झाड़ते हैं. साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने कई वादे और दावे किए थे पर सारे हवा हो गए. न कालाधन देश में आया और न ही लोगों के खाते में 15-15 लाख रुपए आए. किसानों को समर्थन मूल्य भी नहीं मिला. बेरोजगारी खत्म करने के नाम पर केंद्र की सरकार को वोट मिला था, पर क्या हुआ?

नीतीश के दांव ने भाजपा और संघ को बौखला दिया था. भाजपा नेता और नीतीश के ताजा कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री बने सुशील कुमार मोदी ने तब नीतीश पर हमला बोलते हुए कहा था कि केंद्र और बिहार में भाजपा के साथ मिल कर 17 वर्षों तक की सत्ता की मलाई जीमने वाले नीतीश कुमार के मुंह से भाजपा और संघ का विरोध उसी तरह है जैसे कहा जाता है कि सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली.

दूसरों को अकसर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले नीतीश खुद ही नैतिकता की धज्जियां उड़ाते रहे हैं. कभी वे नैतिकता की दुहाई दे कर भाजपा से कन्नी काट लेते हैं तो कभी नैतिकता का ढोल पीट कर लालू से हाथ मिला लेते हैं. अब नैतिकता और अंतरात्मा की आवाज की बात कह कर वे फिर से भाजपा के साथ आ गए हैं. लालू कहते ही हैं कि नीतीश अपने फायदे के हिसाब से नैतिकता के माने बदलते रहते हैं.

गौरतलब है कि 10 अप्रैल, 2016 को जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से जदयू का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था. राजनीति में हर बार विरोधी दलों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले नीतीश ने अपने मामले में चुप्पी साधे रखी. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का उन का नारा पता नहीं कहां गुम हो गया.

महीनों से पक रही थी खिचड़ी

नीतीश और मोदी के बीच पिछले कई महीनों से खिचड़ी पक रही थी. पिछले साल 12 मार्च को प्रधानमंत्री हाजीपुर में दीघा-सोनपुर और मुंगेर रेल सह सड़क पुल का शिलान्यास करने और पटना हाईकोर्ट के शताब्दी समारोह में शिरकत करने बिहार पहुंचे थे. दोनों समारोहों में मोदी और नीतीश कुमार साथसाथ मौजूद थे. दोनों समारोहों में मोदी ने नीतीश की जम कर तारीफ की. मोदी ने खुल कर कहा कि गांवों में बिजली पहुंचाने की योजना को तेज रफ्तार देने के लिए नीतीश ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है.

मोदी के सुर में सुर मिलाते हुए नीतीश ने कहा था कि प्रधानमंत्री के बिहार आने से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं. वे बिहार की तरक्की के लिए बारबार बिहार आते रहें. केंद्र और राज्य मिल कर काम करेंगे तो बिहार की विकास की गाड़ी तेजी से दौड़ने लगेगी.

मोदी से गुपचुप नजदीकी बढ़ाने के साथसाथ ही नीतीश खुले मंच से उन्हें टक्कर देने की हुंकार भी भरते रहे और महागठबंधन के साथियों को मुगालते में रखने में कामयाब होते रहे. उन के साथी दम भरते थे कि बिहार विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पटखनी देने के बाद अब नीतीश कुमार दिल्ली पहुंच कर मोदी को चुनौती देने की तैयारियों में लगे हुए हैं. उन को नरेंद्र मोदी के कद के बराबर खड़ा करने की तैयारी उन की पार्टी जदयू भी कर रही है.

243 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा को 53 सीटों पर समेट कर जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन ने मोदी को धूल चटाई थी. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह कहा करते थे कि नीतीश कुमार की अगुआई में राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मंच बनाने की मुहिम शुरू की गई है. बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन को मिली कामयाबी के बाद दूसरे राज्यों में भी महागठबंधन बनाने की कोशिशें की जा रही हैं.

मोदी को मात देने की मुहिम में लगे नीतीश पिछले साल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही लगातार आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, असम के तरुण गोगई, शिवसेना के रामदास कदम, राकांपा के शरद पवार, तृणमूल कांगे्रस की ममता बनर्जी, वामपंथी सीताराम येचुरी, जनता दल (एस) के एच डी देवगौड़ा, इनेलो के अभय चौटाला, झारखंड विकास मोरचा के बाबूलाल मरांडी, झामुमो के हेमंत सोरेन, असम गण परिषद के प्रफुल्ल कुमार महंत, अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल जैसे नेताओं से लगातार संपर्क में रहे. साल 2015 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में वे एक मंच पर 9 राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित 15 दलों के नेताओं को खड़ा करने में कामयाब रहे थे.

लालू से परेशान थे नीतीश

पिछले कुछ समय से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और महागठबंधन में उन के साथी व ‘बड़े भाई’ लालू प्रसाद यादव के बीच सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा था. जदयू के कई नेता दबी जबान में कहते रहे थे कि लालू के बढ़ते सियासी दबाव व ऊलजलूल डिमांड से नीतीश खासे परेशान हैं. भाजपा से दोबारा हाथ मिलाने की धौंस दिखा कर नीतीश अपने सियासी साथी लालू यादव को काबू में रखने का दांव चल सकते हैं.

पिछले दिनों राबड़ी देवी ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर महागठबंधन के अंदर भी खलबली मचा दी थी. राजद का खेमा पिछले कुछ महीनों से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाने में लगा हुआ था. राबड़ी देवी ने अपनी बात को बल देने के लिए कह डाला कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है. लालू यादव राबड़ी के उस बयान पर चुप्पी साधे रह गए, जबकि जदयू उन से स्थिति को साफ करने की उम्मीद लगाए रह गया. लालू ने राबड़ी के बयान पर किसी तरह की सफाई देने की जरूरत नहीं समझी.

महागठबंधन की सरकार बनने के बाद से भाजपा नेता सुशील मोदी ने कई बार कहा था कि नीतीश कुमार पलटी मारने में माहिर हैं. जब भाजपा से

17 साल पुराना रिश्ता वे एक झटके में तोड़ सकते हैं तो लालू से उन की सियासी दोस्ती लंबी नहीं चलने वाली है. राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी भाजपा ने बिहार में नीतीश को बड़े भाई की भूमिका सौंप रखी थी, उस के बाद भी नीतीश ने उस रिश्ते की लाज नहीं रखी थी. अब लालू के साथ मिलने से नीतीश छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैं और लालू के बढ़ते सियासी दबाव को वे ज्यादा समय तक नहीं झेल पाएंगे. जदयू के भी कई नेताओं का मानना था कि लालू की महत्त्वाकांक्षाओं और परिवारवाद का बोझ नीतीश ज्यादा समय तक नहीं ढो सकते. अब यह सही साबित भी हो गया.

पटना के गांधी मैदान में आयोजित प्रकाश पर्व समारोह में प्रधानमंत्री समेत कई केंद्रीय मंत्री, राज्य के मंत्री और कई सीनियर नेता मौजूद थे. नीतीश और उन के अफसरों ने राजद सुप्रीमो लालू यादव को मंच के सामने जमीन पर बैठने को मजबूर किया. लालू को स्टेज पर बैठने की जगह नहीं दी गई, जबकि वे राज्य के सीनियर लीडर ही नहीं, महागठबंधन की सरकार के सब से बड़े सहयोगी भी थे. इस के बाद भी नीतीश कुमार ने उन की अनदेखी की. मोदी के साथसाथ नीतीश ने भी अपने भाषण में लालू का जिक्र तक नहीं किया.

नीतीश महागठबंधन की लाइन से अलग जा कर कई मौकों पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की तारीफ में कसीदे गढ़ चुके हैं. 3 तलाक के मसले पर नीतीश ने मोदी को कठघरे में खड़ा किया था, लेकिन जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और बेमानी संपत्ति के मामले में नीतीश ने खुल कर मोदी के सुर में सुर मिलाया. इन मामलों में नीतीश बिना लागलपेट के मोदी का साथ दे चुके हैं.

वहीं, जब राजद सुप्रीमो लालू यादव ने नोटबंदी के खिलाफ मुहिम शुरू की तो उस में भी नीतीश ने उन का साथ नहीं दिया था. नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने पर राजद ने पिछले साल 28 दिसंबर को महाधरना का आयोजन किया तो उस से नीतीश ने कन्नी काट ली थी.

लालू की गलतफहमी

लालू प्रसाद यादव दरअसल, नीतीश की चालों को समझ नहीं सके. वे इस मुगालते में रह गए कि उन की पार्टी राजद 80 सीटों के साथ विधानसभा में सब से बड़ी पार्टी है और उन के बगैर नीतीश क्या कोई भी दल सरकार नहीं बना सकता.

भाजपा का दामन थामने पर नीतीश यह दलील देते हैं कि उन्होंने बिहार के हित में फैसला लिया है. न्याय के साथ विकास उन की प्राथमिकता है. राहुल गांधी द्वारा अपने फायदे के लिए महागठबंधन को धोखा देने के आरोप के जवाब में वे कहते हैं कि उन्हें समय आने पर अच्छी तरह से जवाब दिया जाएगा. मेरी जवाबदेही बिहार की जनता के प्रति है और मैं आगे भी उस की सेवा करता रहूंगा.

नीतीश के बचाव में सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि राज्य में सियासी बदलाव अचानक नहीं था, दरअसल जदयू और राजद का गठबंधन स्वाभाविक था ही नहीं. महागठबंधन की सरकार बनने से ले कर 27 जुलाई तक कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था. राज्य और जनता का कोई काम ही नहीं हो रहा था. यही वजह है कि अप्राकृतिक गठबंधन की प्राकृतिक मौत हो गई. लालू यादव जैसे नेता के साथ नीतीश कुमार जैसे नेता का काम करना काफी कठिन है.

सुशील मोदी कहते हैं कि लालू की संपत्ति की भूख ने उन के बच्चों के भविष्य को दांव पर लगा दिया. उन्होंने अपने परिवार के हर सदस्य के नाम पर संपत्ति का विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया. उन की बेनामी संपत्ति का खुलासा होने के बाद पूरे परिवार का परेशानी में फंसना तय था. वहीं जदयू के सांसद

आर सी पी सिंह कहते हैं कि लालू चाहते थे कि बेनामी संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामलों में जदयू उन का बचाव करे. महागठबंधन को वे अपने बचाव के लिए इस्तेमाल करना चाह रहे थे. तरक्की से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है.

लालू कहते थे, ‘कितनी मेहनत से महागठबंधन के पेड़ को खड़ा किया है, क्या उसे खुद ही कालिदास बन कर काट देंगे? आरएसएस बिहार को तोड़ने की साजिश में लगा हुआ है क्योंकि बिहार उस का डैंजर जोन है.’ वहीं नीतीश भी लालू के सुर में सुर मिलाते हुए कहते थे कि महागठबंधन को ले कर भ्रम और अफवाह फैलाने वालों की दाल बिहार में नहीं गलेगी. कुछ लोगों को बिहार और महागठबंधन को बदनाम करने की आदत पड़ चुकी है.

संघ और भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाने के लिए नीतीश और लालू ने पिछली 3 अप्रैल को लंबी बातचीत की थी. पिछले दिनों 5 राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद पहली बार दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी. मुलाकात के बाद लालू यादव ने बताया कि देश को बचाने के लिए गैर भाजपा दलों की गोलबंदी जरूर हो गई है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो धर्मनिरपेक्ष ताकतों का बोरियाबिस्तर गोल हो जाएगा. नीतीश ने कांग्रेस को इस के लिए पहल करने को कहा था, क्योंकि वह बड़ी और सब से पुरानी पार्टी है. लालू ने कहा कि नीतीश के साथ वे भी सभी दलों के नेताओं से बात करेंगे और राष्ट्रीय महागठबंधन के लिए जमीन तैयार करेंगे.

पिछले कुछ दिनों से लालू ने केंद्र की भाजपा सरकार पर जम कर निशाना साधना शुरू कर दिया था. वे बारबार जोर दे कर अपने वोटरों से कह रहे थे कि केंद्र सरकार ने अडानी का 2,000 करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दिया. रिलायंस को फायदा पहुंचाया जा रहा है. मोदी सरकार को अमीरों की सरकार करार देते हुए लालू कहते कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत है, वरना गरीबों का जीना मुहाल हो जाएगा.

खलनायक कौन

अब सवाल यह उठता है कि महागठबंधन का खलनायक कौन है? इस का बिहार की राजनीति पर आगे क्या असर पड़ेगा? साल 2019 के आम चुनाव में मोदी को मात देने की मुहिम को तगड़ा झटका लगा है. इतना ही नहीं, क्षेत्रीय दलों के गठबंधन पर भी सवालिया निशान लग गया है. अब इस तरह के गठबंधन बनाने की हिम्मत किसी की नहीं होगी और न ही ऐसे गठबंधनों पर जनता भरोसा करेगी. बिहार में राजद, जदयू और कांग्रेस का मिल कर बना महागठबंधन 20 महीने में टूट गया. महागठबंधन बनाने में नीतीश और लालू ने भी अहम भूमिका अदा की थी. नीतीश महागठबंधन का चेहरा थे और लालू हमेशा की तरह किंगमेकर की भूमिका में पीछे से मोरचा संभाले हुए थे.

नीतीश के ताजा राजनीतिक कदम से यह बात फिर सही साबित हो गई कि राजनीति में कुछ भी संभव है. नीतीश राजनीति के चतुर, अवसरवादी और माहिर खिलाड़ी हैं.

एक ओर जहां वे लालू यादव और कांग्रेस की मदद से बिहार में सरकार चला रहे थे, वहीं दूसरी ओर कई मौकों पर भाजपा और प्रधानमंत्री की तारीफ कर के भाजपा से हाथ मिलाने का रास्ता भी बना कर चल रहे थे. वहीं, लालू यादव रट लगाते रह गए कि वे नीतीश के साथ मिल कर दिल्ली से भाजपा को खदेड़ कर ही दम लेंगे. नीतीश कुमार ने पलक झपकते ही लालू के इस सपने को चकनाचूर करते हुए भाजपा का भगवा झंडा उठा लिया. संघमुक्त भारत का राग आलाप कर नीतीश कुमार, दरअसल, लालू यादव को संतुष्ट रखने का दांव चला करते थे जबकि उन को खुद को संघ की गोद में ही पूरी संतुष्टि का एहसास होता है.

…जेने देखे दहीचूड़ा, उधर मारे हुल्की

लालू ने नीतीश पर हमला करते हुए कहा कि नीतीश ने भाजपा के साथ मिल कर उन के ऊपर केस दर्ज कराया. सुशील मोदी को लालू की इमेज खराब करने की जिम्मेदारी दी गई थी. कहा गया कि मेरे 22 ठिकानों पर छापा मारा गया, पर आज तक यह नहीं बताया गया कि कौनकौन से ठिकानों पर छापा मारा गया और कहां से क्या बरामद हुआ. सब साजिश के तहत हुआ. नीतीश चेरीछिपे अमित शाह और नरेंद्र मेदी से मिलते रहते थे. जब इस के बारे में उन से पूछा जाता तो वे कहते कि अखबार वाले गलत छापते हैं.

लालू ने राजद विधायक दल की बैठक में कहा कि राजद के बड़े नेता से ले कर हर कार्यकर्ता को ढोंगी मुख्यमंत्री की पोल खोलना है. राजद और कांग्रेस विधानसभा में सरकार का विरोध करेंगे. तेजस्वी के बहाने नीतीश भाजपा की गोद में जाने का बहाना ढूंढ़ रहे थे. नीतीश पर तंज कसते हुए लालू एक देहाती कहावत कहते हैं- ‘ऐगो छौरी बुलकी, जेने देखे दहीचूड़ा, उधरे मारे हुल्की’ (बुलकी नाम की लड़की है, वह जिधर फायदा देखती है, उधर ही झांकना शुरू कर देती है).

समाजवाद में संघी सेंध

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तकरीबन 5 महीने पहले पटना पुस्तक मेले के उद्घाटन में पद्मश्री चित्रकार बऊआ देवी द्वारा बनाए कमल के फूल में रंग भरा था. उसी समय से कयास लगाए जाने लगे थे कि नीतीश कुमार भाजपा की ओर बढ़ रहे हैं. लालू-नीतीश गठबंधन का टूटना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. ऐसा होना शुरू से ही दिख रहा था. 20 महीने पहले दोनों नेता जब बिहार में भाजपा को पटखनी दे कर सरकार बना रहे थे तभी कहा जाने लगा था कि यह बेमेल गठजोड़ है, ज्यादा नहीं चलेगा.

जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया के सामजवादी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान 80 के दशक में मंडल के आतेआते दलितों, पिछड़ों के नेता के रूप में चर्चित हो चुके थे. यह सही है कि इन नेताओं ने उस दौर में दलितों, पिछड़ों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का काम किया.

शुरू में जनता दल बना तो इस से नेताओं ने देश में सामाजिक बराबरी की मुहिम की खुल कर अगुआई की. वी पी सिंह और एच डी देवगौड़ा की सरकारों ने पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक व सामाजिक जागृति पैदा की. पिछड़ों को आरक्षण मिलने लगा. दलितों, पिछड़ों के कल्याण की हुंकार भरी गई. इसी का नतीजा है कि पिछले करीब ढाईतीन दशकों के दौरान दलितों व पिछड़ों की सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक हैसियत में बदलाव दिखाई देने लगा. उन का उत्थान हुआ. इन वर्गों में पैसा तो आया पर सामाजिक भेदभाव की खाई कम नहीं हुई.

1989 के बाद भाजपा लगातार आगे बढ़ने लगी. अयोध्या में राममंदिर निर्माण आंदोलन ने भाजपा की लोकप्रियता को आसमान तक पहुंचा दिया. इस आंदोलन में  बड़ी तादाद में पिछड़े भी जुड़ गए. इस से पहले तक भाजपा ब्राह्मण, बनियों की पार्टी मानी जाती थी, लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिंदू एकता के नाम पर मंडल के बदले कमंडल की राजनीति चली जिस से पिछड़े भी भाजपा की छतरी के नीचे आ गए. कल्याण सिंह, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान, साहिब सिंह वर्मा, विनय कटियार जैसे पिछड़े नेता भाजपा की दूसरी पंक्ति में गिने जाने लगे.

नीतीश-लालू गठबंधन टूटने से सामाजिक बराबरी के आंदोलन पर असर पड़ेगा. रामविलास पासवान पहले ही भाजपा के सहयोगी बन चुके हैं. नीतीश गठबंधन बदलते रहे हैं. 2014 में उन्होंने भाजपा के साथ 17 वर्षों पुराना गठबंधन सांप्रदायिकता के मुद्दे पर तोड़ा था. अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने लालू से संबंध तोड़ा है.

नीतीश भाजपा से हाथ मिला कर उस सोच की सहायता कर रहे हैं जो सामाजिक एकता, आपसी भाईचारा, प्रेम और सौहार्द की भावना के बदले नफरत, हिंसा, भेदभाव को बढ़ावा दे रही है.

भाजपा अपने मकसद में कामयाब हो रही है. पिछड़ों को साथ रखने के लिए नीतीश जैसे सूबेदारों की जरूरत है. यह बात अलग है कि 2019 के चुनाव में मंदिर निर्माण, आरक्षण का खात्मा, दलित, अल्पसंख्यकों पर हमले और हिंदुत्व के प्रचारप्रसार जैसे भाजपा के प्रमुख मुद्दों पर नीतीश कुमार भाजपा के साथ टिके रहेंगे या नहीं.

  • जगदीश

धर्म परिवर्तन को समझने के लिए इसे पढ़ना जरूरी है

धर्म की घुट्टी इतनी मजबूत होती है कि हत्या की धमकी भी भक्तों को डराती नहीं है. पिछले साल केरल में एक हिंदू युवक ने इसलाम धर्म अपना लिया था जिस पर नाराज हो कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थानीय नेताओं ने उस युवक के बहनोई के साथ उस की हत्या कर दी थी. इस से धर्म परिवर्तन करने वाले परिवार में खौफ तो पैदा हुआ पर मुसलमानों ने उस परिवार को संरक्षण दिया और अब उस परिवार के कई सदस्य मुसलिम बन चुके हैं.

धर्म परिवर्तन सदियों से इसी तरह चला आ रहा है. हिंदुओं में धर्म परिवर्तन नहीं होता पर फिर भी उन की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि भारत में जन्मदर अधिक रही है. जाति के कहर के बावजूद नीची जातियों के हिंदू अपने कट्टरपन के कारण हिंदू बने रहे पर जो बहुत ही नाराज हो गए या जिन्हें नीची जातियों से भी किसी कारणवश बाहर कर दिया गया वे मुसलिम या ईसाई बनते चले गए. आमतौर पर सदियों से उन लोगों के धर्म परिवर्तन से हिंदुओं को फर्क नहीं पड़ा क्योंकि तब वोटतंत्र नहीं था.

अब चूंकि सत्ता वोटों के आधार पर मिलती है और वोट धर्म व जाति के आधार पर डलते हैं, धर्म परिवर्तन का अर्थ सत्ता में दखल देना हो गया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुरातन वर्णव्यवस्था में विश्वास रखता है जिस में कुछ जातियां येनकेन सत्ता में बनी रहती थीं. आज यही हो रहा है और इसीलिए धर्म परिवर्तन करने वालों को हिंसा का डर दिखाया जा रहा है. ऐसा केरल में ही नहीं, सारे देश में हो रहा है.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हिंसा के बावजूद जिन्हें धर्म परिवर्तन करना होता है वे डरते नहीं हैं. ऐसा सदियों से हो रहा है. सुन्नी मुसलिम बहुमत में होने के बावजूद सभी शिया मुसलिमों को सुन्नी बनने पर मजबूर नहीं कर सके और जहां शियाओं का राज है वहां सुन्नियों ने अपना संप्रदाय नहीं बदला.

इसी तरह इसराईल से पूरे यूरोप तक में फैले यहूदियों ने सदियों ईसाई राजाओं के जुल्म तो सहे पर धर्म परिवर्तन यदाकदा ही किया.

हिंदुओं में आपसी जातियों में जाति परिवर्तन भी न के बराबर हुआ. अछूतों ने पैसा बना लिया और इज्जत भी पा ली लेकिन उन्होंने अपनी जाति की पहचान बनाए रखी है.

यही केरल में हुआ होगा. जब किसी बात पर नाराज हो कर कुछ हिंदू धर्म परिवर्तन कर मुसलिम बन गए तो वे अब न लौटने को तैयार हैं और न हिंसा के डर से अपने नजदीकियों का धर्म परिवर्तन कराने से हिचक रहे हैं.

यह दुख की बात है कि जब प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक विकास और सही सुखी जीवन का होना चाहिए, पूरा देश धार्मिक विवादों में डूबा हुआ है और धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा, कानूनों, नियमों के जरिए इन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है.

बीएसई और निफ्टी पहुंचे रिकौर्ड पर

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जब देश के प्रथम नागरिक के तौर पर शपथ ले रहे थे, संसद का सैंट्रल हौल उन की ताजपोशी को ले कर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था और उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जा रही थी, ठीक उसी समय 50 शेयरों वाला नैशनल स्टौक एक्सचेंज का निफ्टी नया रिकौर्ड बना कर पहली बार 10 हजार अंक के पार पहुंचा था. दिग्गज कंपनियों में जबरदस्त लिवाली के कारण निफ्टी नए शीर्ष पर था.

बाजार का यह रुख मानसून के बेहतर रहने व विदेशी निवेशकों के अच्छे निवेश के कारण रहा. निफ्टी 13 मई, 2017 को 9 हजार अंक तक पहुंचा और 10 हजार तक पहुंचने में बाजार को करीब सवा साल लग गए जबकि 8 हजार अंक तक पहुंचने में महज 5 माह और 7 हजार अंक का स्तर छूने में 7 साल लगे थे. 1 नवंबर, 2007 को निफ्टी 6 हजार अंक पर आया था जबकि उसी साल सितंबर में महज 5 हजार अंक पर था.

वर्ष 1995 में 3 नवंबर को निफ्टी पहली बार एक हजार अंक के स्तर पर पहुंचा था. बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई ने जुलाई के आखिर में नई छलांग लगाते हुए पहली बार 32 हजार अंक के स्तर को पार किया है और उस का यह रुख लगातार बना हुआ है. अमेरिका का डी जोंस भी ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है.

रिलायंस समूह के मालिक मुकेश अंबानी द्वारा जियो मोबाइल को 1,500 रुपए में देने व 3 वर्षों बाद उपभोक्ता की इस राशि को लौटाने और प्रतिस्पर्धी भारती एयरटेल की 4जी पर नई सुविधा देने की घोषणाओं से बाजार में उत्साह का माहौल है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये उछालें किसी बबूले की तरह हैं जो कभी भी फट सकता है.

गुलजार के बारे में क्या आप जानते हैं ये 10 बातें

तन्हाई की दीवारो पे घुटन का पर्दा झूल रहा है, बेबसी की छत के नीचे कोई किसी को भूल रहा है.

कल्‍पनाओं की धागों को शब्‍दों के माध्यम से जोड़ने की ऐसी जादूगरी सिर्फ गुलजार ही कर सकते हैं और आज शब्‍दों के इसी जादूगर का जन्‍मदिन है. जानेमाने शायर, निर्देशक, संगीतकार, लेखक, गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है.

उनका जन्म 18 अगस्त, 1934 को झेलम जिले के दीना गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्‍तान में है. गुलजार फिल्मों में आने से पहले एक गैराज मैकेनिक का काम किया करते थे. गुलजार को बचपन से ही लिखने का शौक था, इसलिए वो कम उम्र से ही लिखने लग गए थे. लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था,  इन सबके बाद भी गुलजार ने लिखना जारी रखा और एक दिन अपनी मेहनत के दम पर बौलीवुड का एक माना जाना चेहरा बन गए.

वे 20 बार फिल्मफेयर तो पांच राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुके हैं. 2010 में उन्हें स्लमडौग मिलेनेयर के गाने ‘जय हो’ के लिए ग्रैमी अवार्ड से नवाजा गया था. उन्हें 2013 के दादा साहेब फालके सम्मान से भी नवाजा जा चुका है.

आज हम आपको को उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ बाते बताते हैं.

1. गुलजार अपने कौलेज के दिनों से ही सफेद कपड़े पहन रहे हैं.

2. उन्होंने बिमल राय के साथ असिस्टेंट का काम किया. एस.डी. बर्मन की ‘बंदिनी’ से बतौर गीतकार शुरुआत की. उनका पहला गाना था, ‘मोरा गोरा अंग…’

3. बतौर डायरेक्टर गुलजार की पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ (1971) थी, जो बंगाली फिल्म ‘अपनाजन’ की रीमेक थी.

4. गुलजार की अधिकतर फिल्मों में फ्लैशबैक देखने को मिलता, उनका मानना है कि अतीत को दिखाए बिना फिल्म पूरी नहीं हो सकती. इसकी झलक, ‘किताब’, ‘आंधी’ और ‘इजाजत’ जैसी फिल्मों में देखने को मिल जाती है.

5. गुलजार उर्दू में लिखना पसंद करते हैं.

6. गुलजार ने 1973 की फिल्म ‘कोशिश’ के लिए साइन लैंग्वेज सीखी थी क्योंकि ये फिल्म मूक-बधिर विषय पर थी. जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी थे.

7. 1971 में उन्होंने ‘गुड्डी’ फिल्म के लिए ‘हमको मन की शक्ति’ देना गाना क्या लिखा ये गाना स्कूलों मे प्रार्थना में सुनाई देने लगा.

8. उन्होंने ‘हू तू तू’ के फ्लौप होने के बाद फिल्में बनानी बंद कर दीं, इस झटके से उबरने के लिए उन्होंने अपना ध्यान शायरी और कहानियों की ओर किया.

9. उन्हें टेनिस खेलन बेहद पसंद है, और वे सुबह टेनिस जरूर खेलते हैं.

10. उनकी लोकप्रिय फिल्मों में ‘अचानक’, ‘कोशिश’ (1972),  ‘आंधी’ (1975), ‘मीरा’, ‘लेकिन’, ‘किताब’ (1977) और ‘इजाज

वित्त वर्ष का समय बदलने पर संसदीय समिति सहमत

सरकार वित्त वर्ष का समय 1 अप्रैल से बदल कर 1 जनवरी से करने पर गंभीरता से विचार कर रही है. वित्त मंत्री अरुण जेटली संसद के मानसून सत्र में कह चुके हैं कि नया वित्त वर्ष 1 जनवरी से लागू करने के विविध पहलुओं पर विचार किया जा रहा है. अब तक वित्त वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है. यह व्यवस्था करीब डेढ़ सौ साल पुरानी है.

ब्रिटेन के साथ तालमेल रखने के लिए वित्त वर्ष की यह अवधि तय की गई थी. उस से पहले वित्त वर्ष 1 मई से 30 अप्रैल का होता था. सरकार इस व्यवस्था में बदलाव चाहती है. संसद की कई समितियां वित्त वर्ष की अवधि में बदलाव के पक्ष में रिपोर्ट दे चुकी हैं लेकिन किसी सरकार ने इन रिपोर्टों को क्रियान्वित कभी नहीं किया.

इधर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने भी वित्त वर्ष के समय में परिवर्तन पर सुझाव दिया है. समिति का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था दुनिया के कई देशों में है. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह अवधि अनुकूल है. उन की सलाह है कि सरकार को इस पर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और राज्यों से भी सलाह लेनी चाहिए. यदि जल्दबाजी में यह निर्णय लिया जाता है तो इस से अर्थव्यवस्था पर गहरा व प्रतिकूल असर पड़ सकता है. सरकार यदि कलैंडर वर्ष के अनुसार वित्त वर्ष लागू करती है तो फिर बजट फरवरी के बजाय नवंबर में पेश किया जाएगा. सरकार 1 जनवरी से बजट आवंटन शुरू कर देगी.

इस बार आवंटन एक अप्रैल से शुरू हो गया है जबकि आवंटन वित्त वर्ष शुरू होने की पहली तिमाही पूरी होने से पहले नहीं हो पाता था. उस से विकास परियोजनाएं बाधित होती थीं. इसलिए मौजूदा सरकार का वित्त वर्ष के आरंभ में आवंटन शुरू करने का फैसला अच्छा है.

बैंक से जुड़े साइबर अपराध की हर हफ्ते 270 घटनाएं

साइबर अपराध सरकार पर बड़ा संकट बन रहा है. एटीएम तथा बैंकों से हर सप्ताह साइबर अपराध की 270 घटनाएं हो रही हैं और आम लोगों की गाढ़ी कमाई साइबर अपराधी एक ही क्लिक में लूट रहे हैं. संसद में भी आएदिन मामले उठ रहे हैं लेकिन इस दिशा में सरकार ठोस कदम नहीं उठा पा रही है. असंख्य साइबर अपराधों की प्राथमिकी दर्ज नहीं होती है. यदि सभी घटनाएं पुलिस में दर्ज हों तो साइबर अपराध का आंकड़ा कल्पना से बहुत बड़ा होगा.

सामान्य आदमी लुटता है और पुलिस को सूचना देने से भी डरता है क्योंकि पुलिस का रवैया लोगों को गुमराह करने वाला होता है. इस के बावजूद सरकार कहती है कि पिछले 3 वर्षों में देशभर में 43 हजार से ज्यादा साइबर अपराध की घटनाएं हुई हैं जिन में लोगों के 250 करोड़ रुपए से ज्यादा लूटे गए हैं.

साइबर लूट का यह आंकड़ा वास्तविकता का 50 फीसदी से कम है. फिर भी वित्त वर्ष 2014-15 में अपराध की करीब 13,100 घटनाएं हुई हैं जबकि 2015-16 में करीब 17 हजार और 2016-17 में 16,500 हजार घटनाएं हुईं. सभी अपराध डैबिट कार्ड, कै्रडिट कार्ड और इंटरनैट बैंकिंग के माध्यम से हुए हैं.

सर्वाधिक 11 से अधिक मामले निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक में हुए हैं जबकि दूसरे स्थान पर एचडीएफसी बैंक और तीसरे स्थान पर स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक हैं.

सरकार ने जिन 9 बैंकों की सूची जारी की है उन में सरकारी क्षेत्र का बैंक औफ बड़ौदा है जिस में 31 मामले हुए हैं. ऐक्सिस बैंक 660 मामलों के साथ सब से निचले पायदान पर है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 5,000 से ज्यादा मामले सामने आए हैं. इन में सब से ज्यादा अपराध क्रैडिट कार्ड के हुए हैं.

निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ सुलझाएंगे आर्थिक सुधारों की गुत्थी

नीति आयोग का मानना है कि देश की जटिल हो रही अर्थव्यवस्था को संभालने में आर्थिक नीति निर्धारण के लिए अब सिर्फ भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस से काम नहीं चलेगा. नीति निर्धारण संस्थाओं में बाहर से विशेषज्ञ बुला कर आईएएस की मदद की जानी चाहिए और आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञों को संयुक्त सचिव के स्तर पर संविदा के तहत नियुक्ति दी जानी चाहिए.

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है और दिनप्रतिदिन उस में जो जटिलताएं आ रही हैं उन्हें सामान्य आईएएस अधिकारी के जरिए नहीं, विशेषज्ञ की नियुक्ति कर के ही सुलझाया जा सकता है. इन नियुक्तियों से आईएएस अधिकारियों में भी प्रतिस्पर्धा आएगी और वे अपनी प्रतिभा को विशेष क्षेत्र के विशेषज्ञ के रूप में धार देंगे.

हाल ही में सरकार ने आयुर्वेद के एक डाक्टर को आयुष मंत्रालय में विशेष सचिव नियुक्त किया है. शीर्ष पदों पर विशेषज्ञों की नियुक्ति की शुरुआत हो गई है. इन पदों पर अब तक आईएएस ही जमे रहते थे. विशेष क्षेत्रों के लिए जल्द ही 50 विशेषज्ञों की नियुक्ति हो सकती है. उन के चयन के लिए प्रक्रिया चल रही है.

इसी तरह से बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिए निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को लाने की नीति बन रही है. यह ठीक भी है. जब सरकारी क्षेत्र के विशेषज्ञों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्त कर निजी दूरसंचार कंपनियां जबरदस्त लाभ अर्जित कर सकती हैं तो सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र के महारथियों को लेने से परहेज क्यों है. इस पहल से आईएएस लौबी में खलबली जरूर है लेकिन सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने उन की नहीं चलेगी.

सफर अनजाना

लखनऊ में मई की एक दोपहर में मम्मी मेरे भाई को गोद में लिए बस में चढ़ीं. एक भी सीट खाली न होने से वे एक सीट के सहारे खड़ी हो गईं. तभी एक सज्जन ने यह कह कर अपनी सीट पर उन्हें बिठा दिया, ‘‘बहनजी, आप की गोद में बच्चा है, आप को खड़े होने में परेशानी हो रही होगी.’’ मां के मना करने के बावजूद वे सज्जन नहीं माने.

मां ने उन की सीट पर बैठ कर सचमुच राहत की सांस ली. भाई को पानी पिलाया. फिर वे उन भले सज्जन को ढूंढ़ने लगीं, जिन्होंने उन्हें अपनी सीट दे कर एहसान किया था.

कुछ आगे ही एक सीट से सट कर वे सज्जन खड़े हो गए थे. अचानक मां का ध्यान उन के हाथ में होती हरकत पर चला गया. ध्यान से देखने पर पता चला कि उस सीट पर 14-15 साल की एक मासूम लड़की बैठी थी और वे सज्जन बारबार अपना हाथ उस की बगल में लगा रहे थे, जिस से वह लड़की बारबार कसमसा कर रह जाती थी.

उस लड़की की बेबसी और उन सज्जन की नापाक हरकत मां की अनुभवी निगाहों ने तुरंत ताड़ लीं. तुरंत ही भाई को संभालती हुई वे उठ खड़ी हुईं और तपाक से उन सज्जन के पास पहुंच कर एक जोरदार तमाचा उन के गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘वाह भाईसाहब, अच्छी भलमनसाहत दिखाई आप ने. बहनजी बोल कर अपनी सीट इसलिए मेरे हवाले की थी कि अपनी बेटी की उम्र की इस बच्ची से छेड़छाड़ कर सकें. छि:, धिक्कार है आप की सज्जनता पर,’’ कह कर मां ने उन्हें बहुत डांटा.

अचानक पड़े इस थप्पड़ से अवाक रह गए उन सज्जन के मुंह से कोई बोल न फूटा. भीड़ की तीखी नजरों से बचतेबचाते अगला स्टौप आते ही बस से उतर गए. इधर मां ने उस मासूम के सिर पर प्यार से हाथ फेरा, जो नम आंखों से मौन की भाषा में उन्हें धन्यवाद कह रही थी.

पूनम पाठक

*

हम लोग रेलगाड़ी द्वारा छपरा से झांसी जा रहे थे. ट्रेन लखनऊ पहुंचने वाली थी, तभी खिड़की से तेजी से आया पत्थर मेरे भाई की आंख को लहूलुहान कर गया और हम लोग घबरा गए. तभी हमारे एक सहयात्री हमारी सहायतार्थ आगे बढ़े. लखनऊ उतर कर इलाज की पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं लेते हुए उन्होंने मुझे व मेरी मां को अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया.

संगीता गुप्ता

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