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299 रुपये में मिलेगा ये शानदार फोन, जियो को दे सकता है कड़ी टक्कर

रिलायंस ने अपनी 40वीं सालाना जनरल मीटिंग में जिस जिओ फोन को पेश किया था, मार्केट मे आने से पहले ही उस का क्रेज लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. हालांकि इसकी बुकिंग 24 अगस्त से शुरू होगी और इसकी डिलीवरी सितंबर से की जाएगी.

लेकिन इस बीच जियो फोन को टक्कर देने की होड़ मच चुकी है. इसी कड़ी में किफायती फोन बनाने वाली भारतीय कंपनी Detel ने अपना एक फीचर फोन लांच किया है. इस मौडल का नाम है डी-1. कंपनी ने इसकी कीमत 299 रुपए रखी है, वो भी होम डिलीवरी के साथ.

इस फोन को कंपनी की वेबसाइट ‘http://detel-india.com’ पर बुक किया जा सकता है. अगर हम बात करें इसके फीचर्स की, तो यह सिंगल सिम फोन है. इसमें 1.44 इंच का ब्लैक एंड व्हाइट डिस्प्ले दिया गया है. इसमें 650mAh की बैटरी दी गयी है, जिसके बारे में कंपनी का दावा है कि एक बार फुल चार्ज होने के बाद यह 15 दिन तक स्टैंडबाय सपोर्ट देगी. इसमें एक टौर्च और एफएम भी दिया गया है. इसके अलावा, फोन में वाइब्रेशन मोड और लाउड स्पीकर की भी सुविधा है.

वीआईपी 2 (ललकार) : निरर्थक और ढीली ढाली पटकथा

कुछ वर्ष पहले प्रदर्शित तमिल व तेलगू फिल्म ‘‘वीआईपी’’ का सिक्वअल है फिल्म ‘‘वीआईपी 2’’ जिसे इस बार हिंदी में ‘वीआईपी 2(ललकार)’ के नाम से दर्शकों के सामने पेश किया गया है. इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के साथ ही इसका लेखन भी अभिनेता धनुष ने ही किया है. जबकि निर्देशक सौंदर्य रजनीकांत हैं. लेकिन यह फिल्म पिछली फिल्म ‘वीआईपी’ से कई गुना कमजोर है. निरर्थक फिल्म ‘वीआईपी 2(ललकार)’ को देखना एक कष्टदायी यात्रा है.

दो इंसानों की अहम की लड़ाई वाली फिल्म ‘‘वीआईपी 2 (ललकार)’’ में धनुष और काजोल आमने सामने हैं. फिल्म की कहानी के केंद्र में वसुंधरा कंस्ट्रक्शन की मालिक वसुंधरा परमेश्वरन (काजोल) और रघुवरन (धनुष) के अहम के टकराव की कहानी है. वसुंधरा ने 12 साल की उम्र से काम करते हुए भवन निर्माण के क्षेत्र में बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है. हर साल भवन निर्माण व इंजीनियरिंग के सारे पुरस्कार उन्हें, उनकी कंपनी व उनकी कंपनी से जुड़े इंजीनियरों को ही मिलते रहे हैं. हर इंजीनियर उन्हीं की तारीफ करता रहता है. इस साल के सारे अवार्ड भी उनकी कंपनी से जुड़े इंजीनियरों को मिलते हैं. मगर सबसे बड़ा रघुवरन को मिल जाता है, जबकि वसुंधरा इस पुरस्कार को लेने की तैयारी के साथ आयी थी. अब वसुंधरा, रघुवरन के बारे में जानकारी इकट्ठा कर उसे मिलने के लिए बुलाती है.

उधर रघुवरन अपनी प्रेमिका शालिनी से शादी करने के साथ ही एक नई कंपनी में नौकरी करते हुए खुश है. वह अपनी कंपनी में राम के यकीन को धोखा नहीं देना चाहता. मगर राम के ही कहने पर रघुवरन जब वसुंधरा से मिलने पहुंचता है, तो वसुंधरा उसकी तरफ बिना देखे कहती है कि वह अपना अप्वाइंटमेंट लेटर ले ले और कल से नौकरी पर आकर अपनी जिम्मेदारी को बाखूबी निभाए. पर रघुवरन उनकी नौकरी ठुकरा देता है.

इससे वसुंधरा के अहम को चोट पहुंचती है और वह रघुवरन तथा जिस कंपनी में नौकरी कर रहा है, उसे बर्बाद करने के लिए हर चाल चलती है. मंत्री से भी मदद लेती है. अंततः एक दिन रघुवरन कंपनी की नौकरी छोड़कर खुद ही अपने हजार इंजीनियर दोस्तों के साथ मिलकर ‘वीआईपी कंस्ट्रक्शन’ कंपनी की शुरुआत करता है. पर अब भी वसुंधरा उसके पीछे पड़ी हुई है. पर एक वक्त ऐसा आता है, जब न्याय पर चलने वाला रघुवरन पर्यावरण के मुद्दे पर लड़ाई छेड़ता है, तो मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ता है. फिर एक मुकाम पर वसुंधरा व रघुवरन के बीच सुलह हो जाती है.

धनुष बेहतरीन अभिनेता माने जाते हैं. अब तक वह तमिल व तेलगू में कई तरह के किरदार निभाकर अपनी गिनती सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में कराते आए हैं. हिंदी फिल्म ‘‘रांझणा’’ में भी दर्शकों ने उन्हे काफी पसंद किया था. लेकिन इस फिल्म में धनुष ने काफी निराश किया है. कम से कम धनुष जैसे कलाकार से इस तरह के अभिनय व फिल्म की उम्मीद तो नहीं थी. फिल्म देखकर लगता है कि धनुष ने अपने आपको अपनी निजी जिंदगी के ससुर व अभिनेता रजनीकांत का वारिस घोषित करने के मकसद से एक्शन, नाचगाना, हास्य वगैरह सब कुछ करते हुए नजर आने के लिए ही इस फिल्म की पटकथा लिखी, मगर वह एक्शन हो या नाच गाना कहीं भी नहीं जमे. इसकी मूल वजह कमजोर व अस्वाभाविक पटकथा व घटनाक्रम हैं. पर्यावरण का मुद्दा भी सही ढंग से उभर नहीं पाया. काजोल भी निराश करती हैं.

फिल्म का गीत संगीत अति साधारण है. फिल्म में गाने जबरन ठूंसे गए लगते हैं. कहीं भी कभी भी गाना शुरू हो जाता है. एक महिला निर्देशक की फिल्म में जिस तरह से महिला किरदारों को पेश किया गया है, वह भी गले नहीं उतरता. महिलाओं का मजाक उड़ाना आज के जमाने में न शोभा देता है और न ही यह बात हजम होती है.

अति घटिया पटकथा व कमजोर पटकथा के चलते फिल्म का क्लाइमेक्स अचानक फिल्म को खराब कर देता है. अचानक पटकथा काफी ढीली हो जाती है और दोनों किरदार एकदम ढीले पड़ जाते हैं और एक दूसरे के साथ न सिर्फ बात करने लगते हैं, बल्कि एक साथ काम करने लगते हैं. यह सब बड़ा ही अस्वाभाविक घटनाक्रम है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘वीआईपी 2(ललकार)’’ के लेखक धनुष, निर्देशक सौंदर्या रजनीकांत, कलाकार हैं – काजोल, धनुष, आमला पाल व अन्य.

आखिर कौन हैं विशाल सिक्का, जानिए उनसे जुड़ी कुछ बातें

देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में से एक इंफोसिस के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर विशाल सिक्का ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इंफोसिस के निदेशक मंडल ने विशाल सिक्का के इस्तीफे को मंजूर कर लिया है.

आईये जानते हैं विशाल सिक्का से जुड़ी कुछ बातें.

  • विशाल का जन्म 1 जून 1967 को मध्यप्रदेश के शाजापुर में हुआ था. विशाल की परवरिश गुजरात के बडोदरा में हुई. जब वह 6 साल के थे तभी उनका परिवार को गुजरात के वडोदरा आ गया था. सिक्का ने अपनी शुरुआती पढ़ाई बड़ौदा और राजकोट से की.

  • विशाल सिक्का ने 1 अगस्त 2014 को इंफोसिस के नए सीईओ और एमडी का पद संभाला. ऐसा पहली बार हुआ था जब इंफोसिस में कंपनी के बाहर से आए किसी ने सीईओ की कुर्सी संभाली थी. विशाल सिक्का क्लाइंट से मिलने के लिए प्राइवेट प्लेन का इस्तेमाल करते थे. जिसकी आलोचना इंफोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति भी कर चुके हैं.
  • फरवरी 2016 में इंफोसिस ने विशाल सिक्का का कार्यकाल दो साल के लिए बढ़ाकर मार्च 2021 तक कर दिया था. कंपनी का कहना था कि सिक्का की पहल से इंफोसिस उद्योग में अपनी अग्रणी स्थिति को फिर से हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
  • सिक्का इंफोसिस ज्वाइन करने से पहले जर्मनी की कंपनी SAP (सिस्टम, एप्लीकेशन, प्रोडक्ट) के चीफ टेक्निकल ऑफिसर के पद पर काम कर चुके हैं. इसके साथ ही वह इस कम्पनी में कई बड़े और अहम पदों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. सिक्का ने SAP के HANA प्लेटफौर्म को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी. वह 12 साल तक इस कंपनी के साथ रहे थे.
  • विशाल सिक्का ने 1997 में iBrain नाम का एक सौफ्टवेयर तैयार किया

गुलजार के जन्मदिन पर जाने वो खास बातें, जो आप नहीं जानते

‘हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है, जमीं से पेड़ों के टांके उधेड़ देती है…

कल्‍पनाओं की ऐसी विचित्रता और शब्दों की ऐसी जादूगरी सिर्फ गुलजार ही कर सकते हैं और आज शब्‍दों के इसी जादूगर का जन्‍मदिन है. 18 अगस्‍त 1936 में जन्‍मे गुलजार साहब आज 82 साल के हो चुके हैं. गुलजार साहब की गजलें और उनके लफ्जों की खूबसूरती को भला कौन भूल सकता है. जो एक बार कानों पर पड़ते ही महसूस हो जाती है. उनकी कविता और गीतों की हरारत का एक सिरा उन अफसानों से होकर गुजरता है, जो विभाजन की त्रासदी से निकली हैं. उनकी कहानियों में ‘लकीरें’ दरअसल उसी दर्द का फलसफा बयां करती हैं, जिस तकलीफ को लिए हुए  गुलजार साहब रातों रात अपनी जमीन छोड़कर पाकिस्तान से भारत चले आये थे. ‘माचिस’ का वो गीत याद कीजिये..’छोड़ आये हम वो गलियां’.. ऐसे ही जज्बातों से गुलजार ने एक बिसरा दिए गए शहर से पीछे छूट गये  बचपन के दर्द को बयां किया.

उनकी महत्वपूर्ण कहानियों में ‘ रावी पार’, ‘खौफ’,’ फसल’, ‘बंटवारा’ और ‘दीना’ है, जिसने हर जगह समय और समाज से तालमेल बनाने की कोशिश की. अपनी कहानियों से वो समाज की सबसे दुखती नस पर अपने कलम की धार रख देते हैं, जो आम जीवन से भी कई बार नजरंदाज रहता है. गुलजार लिखते हैं.

हमने देखी है उन आखों की महकती खुशबू

हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो

सिर्फ एहसास है इसे छू के महसूस करो

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो…’

गुलजार साहब ने अपनी काबिलियत के बल पर बौलीवुड में अपनी जगह बनाई है. गुलजार हमेशा उर्दू में ही लिखते हैं. शांत और सौम्य दिखने वाले गुलजार अपनी गीतों और कविताओं से अपनी जिंदादिली को कह जाते हैं. बौलीवुड की शान और करोड़ो दिलों पर राज करने वाले गुलज़ार साहब की कलम ये कहने का हौसला भी रखती है..

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं, दांत से रेशमी डोर कटती नहीं..

उम्र कब की बरस के सुफैद हो गयी, कारी बदरी जवानी की छटती नहीं…

वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है, चेहरे की रंगत उड़ने लगी है

डर लगता है तन्हा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी…

आइए आज हम आपको उनके सफर से जुड़े कुछ खास बाते बतातें हैं जो शायद ही आपको पता हो.

भारतीय सिनेमा की महत्वपूर्ण शख्शियतों में से एक गुलजार का वास्तविक नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा है.

अपने अचूक टैलेंट के लिए जानें जाने वाले गुलजार किसी जमाने में गैराज बतौर मैकेनिक का काम किया करते थे. खाली समय में वो कविताएं और शयरी लिखते थे. गुलजार के पिता और भाई को उनका लिखना पसंद नहीं था. वो बार-बार गुलजार से  उनके इस शौक को छोड़ने के लिए कहते थे.

उन्होंने बिमल राय के साथ असिस्टेंट का काम किया. एस.डी. बर्मन की ‘बंदिनी’ से बतौर गीतकार शुरुआत की. उनका पहला गाना था, ‘मोरा गोरा अंग…’

छोटे पर्दे के लिए भी गुलजार साहब ने काफी कुछ लिखा है जिसमें दूरदर्शन का शो ‘जंगल बुक’ भी शामिल है.

1971 में फिल्‍म गुड्डी के लिए दो गीत लिखे. इन दो गीतों में से एक गीत ‘हमको मन की शक्‍ति देना’ आज भी स्‍कूलों में प्रार्थना गीत के तौर पर गाया जाता है.

साल 1973 में इन्‍होंने ‘कोशिश’ नाम की एक फिल्‍म बनाई थी. उन्‍होंने  इस फिल्म में एक गूंगे और बहरे कपल की स्‍टोरी बयां की थी. इस फिल्‍म के लिए उन्‍होंने साइन लैंग्‍वेंज सिखी थी ताकि वो इमोशन को बेहतर तरीके से र्निदेशित कर सकें. तब से लेकर आज तक वो गूगें एवं बहरे बच्‍चों के लिए काम करते आ रहें हैं.

वे 20 फिल्मफेयर तो पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुके हैं. उन्हें 2004 में भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण प्रदान किया गया था. 2010 में उन्हें स्लमडाग मिलेनियर के गाने ‘जय हो’ के लिए ग्रैमी अवार्ड से नवाजा गया. उन्हें 2013 के दादा साहेब फालके सम्मान मिला.

बतौर डायरेक्टर गुलजार की पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ (1971) थी, जो बंगाली फिल्म ‘अपनाजन’ की रीमेक थी.

गुलजार की अधिकतर फिल्मों में फ्लैशबैक देखने को मिलता, उनका मानना है कि अतीत को दिखाए बिना फिल्म पूरी नहीं हो सकती. इसकी झलक, ‘किताब’, ‘आंधी’ और ‘इजाजत’ जैसी फिल्मों में देखने को मिल जाती है. फिल्मों के कथानकों की तरह जीवन में चले आये हुए रिश्तों के गहरे धागे आज कहीं छुट से गए हैं. गुलजार साहब ने एक शायर के भीतर की तड़प को इस प्रकार बयां की है.

‘राख को भी कुरेद कर देखो,

अब भी जलता हो कोई पल शायद,

कितना अरसा हुआ कोई उम्मीद जलाए,

कितना अरसा हुआ किसी कंदील पर जलती रोशनी रखे…’

स्टेडियम में सबके सामने उतर चुकी है इन क्रिकेटर्स की पैंट

क्रिकेट में एक रन की भी क्या कीमत होती है यह तो वह टीम बेहतर बता सकती है, जो एक रन से मैच हारी हो. खिलाड़ी चौके-छक्के बचाने के लिए पूरा दम लगा देते हैं. लेकिन बाउंड्री बचाने के चक्कर कई बार खिलाड़ियों को शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ जाता है और दर्शकों से भरे स्टेडियम में वह हंसी के पात्र बन जाते हैं. यू-ट्यूब पर ऐसे वीडियोज भरे पड़े हैं, जिसमें रन या बाउंड्री बचाने के चक्कर में खिलाड़ियों की पैंट उतर गई. आइए आपको बताते हैं ऐसे खिलाड़ियों के बारे में जिन्हें ऐसी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है.

यासिर शाह : पाकिस्तानी टीम साउथ अफ्रीका के खिलाफ खेल रही थी. पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी कायले अबौट को गेंदबाजी कर रहे थे और यासिर शाह फाइन लेग पोजिशन पर थे. अबौट ने गेंद को बाउंड्री की दिशा में मारा. शाह ने बौल को पकड़ने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे, साथ ही पैंट भी उतर गई.

माइकल वौन : वेस्टइंडीज के खिलाफ एक मैच में इंग्लैंड के पूर्व कप्तान मिड औफ पर खड़े थे. शिवनारायण चंद्रपाल ने गेंद को उसी दिशा में खेला. वौन ने गेंद पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उसे रोक तो नहीं पाए. लेकिन उनकी पैंट वहीं उतर गई. कौमेंटेटर्स भी अपनी हंसी इस घटना पर रोक नहीं पाए थे.

लूय विनसेंट: न्यू जीलैंड के इस पूर्व खिलाड़ी को बेहद शानदार फील्डर माना जाता था. साल 2006 में वह वेस्टइंडीज के खिलाफ मैच खेल रहे थे. उन्होने बाउंड्री तो बचा ली लेकिन पैंट नही.

नील मिकैंजी: यह मैच औस्ट्रेलिया और द.अफ्रीका के बीच था. मिकैंजी मिड विकेट पर खड़े थे तभी माइकल बेवन ने एक शाट खेला. मिकैंजी ने ड्राइव मारकर गेंद पकड़ने की कोशिश की, लेकिन इसी चक्कर में उनकी पैंट भी उतर गई और शौन पोलाक हंसते रह गए.

स्टुअर्ट ब्रौड: इंग्लैंड के इस खिलाड़ी की पैंट भी मैदान पर उतरी, लेकिन मैच के दौरान नहीं। दरअसल प्रैक्टिस सेशन के दौरान जो रूट ने ब्रौ के साथ प्रैंक किया और उनकी पैंट उतार दी. इसके बाद ब्रौड रूट के पीछे भागने लगे. वह उन्हें पकड़ नहीं पाए और साथी खिलाड़ियों ने ब्रौड का मजाक बना दिया.

विराट कोहली: यह नाम आपको जरूर चौंका देगा. भारतीय कप्तान एक शानदार फील्डर हैं. लेकिन श्रीलंका के खिलाफ मैच में जब भारतीय टीम हार की कगार पर थी तो विराट कोहली ने ड्राइव मारकर बाउंड्री रोकने की कोशिश की लेकिन इसके चक्कर में उनकी पैंट घुटनों तक खिसक गई.

बरेली की बर्फी : कृति सैनन के बेहतरीन अभिनय से सजी फिल्म

‘‘निल बटे सन्नाटा’’ फेम निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की त्रिकोणीय प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ बहुत ज्यदा उम्मीद नहीं बंधाती है. इस तहर के विषय पर हजारों फिल्में बन चुकी हैं. मगर फिल्मकार अश्विनी अय्यर तिवारी ने इसमें नयापन लाने के लिए बरेली नामक छोटे शहर या यूं कहें कि कस्बे की लड़की बिट्टी को सिगरेट पीने वाली, रात में घर से बाहर मोटर सायकल पर घूमने से लेकर कई बुराईयों से युक्त बताकर यह दिखाने का प्रयास किया है कि आज का नवयुवक ऐसी लड़की से शादी करना चाहता है, उसे लड़की की इन आदतों में बुराई नजर नहीं आती. काश! आज के समय में भारत के गांवों, कस्बों व छोटे शहरों  में निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी और लेखक नितीश तिवारी की सोच वाले लोग मौजूद हों.

फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ की कहानी बरेली के एक मिठाई विक्रेता मिश्रा (पंकज त्रिपाठी) की बेटी बिट्टी (कृति सैनन) के इर्द गिर्द घूमती है. बिट्टी में बरेली के लोगों को कई बुराइयां नजर आती हैं. वह मोटर सायकल पर चलती है. बिट्टी सिगरेट पीती है. बिट्टी रात रात भर घूमती रहती है. बिट्टी की मां (सीमा पाहवा) तो उसे रात रात भर घर से बाहर घूमने वाली चुड़ैल कहती हैं. मगर मिश्रा को अपनी बेटी बिट्टी में कोई बुराई नजर नहीं आती है. जब उनकी सिगरेट खत्म हो जाती है, तो उन्हें बिट्टी से मांगकर सिगरेट पीने में बुराई नजर नहीं आती. मगर बिट्टी की मां उससे परेशान रहती है. मां के ताने सुनते सुनते थक चुकी बिट्टी एक रात अपनी मां के दो हजार रूपए चुरा अपना सामान बांधकर बरेली से बाहर जाने के रेलवे स्टेशन पहुंच जाती है. रेलवे स्टेशन की बुकस्टाल से वह प्रीतम विद्रोही लिखित उपन्यास ‘बरेली की बर्फी’ खरीदती हैं. जिसे पढ़कर बिट्टी को अहसास होता है कि लेखक ने तो उसकी कहानी लिख डाली. अब वह घर वापस आ जाती है और उस लेखक की तलाश शुरू करती है.

उपन्यास ‘बरेली की बर्फी’ के लेखक चिराग (आयुष्मान खुराना) हैं, जो कि एक प्रिटिंग प्रेस के मालिक है.उन्हें अपने प्यार में धोखा मिलता है, तब वह उस प्यार की याद में ही ‘बरेली की बर्फी’ उपन्यास लिखते हैं. मगर उनकी हिम्मत नहीं है कि वह अपने नाम से उसे छापे. इसलिए वह अपने मित्र प्रीतम विद्रोही पर दबाव डालते हैं. इसलिए उपन्यास लेखक के रूप में प्रीतम विद्रोही का नाम व फोटो किताब पर है.

बिट्टी प्रिटिंग प्रेस में पहुंचकर चिराग से प्रीतम विद्रोही के बारे में पूछताछ करती है. चिराग कह देता है कि प्रीतम बरेली छोड़कर जा चुके हैं. पर बिट्टी का पत्र उन तक पहुंचाने और जवाब आने पर बिट्टी तक पहुंचाने की बात करते हैं. इसी क्रम में बिट्टी व चिराग की कई मुलाकातें होती हैं. बिट्टी से चिराग को प्यार हो जाता है. मगर बिट्टी को तो प्रीतम विद्रोही से प्यार है. इसलिए चिराग लखनऊ जाकर प्रीतम विद्रोही को बरेली लेकर आते हैं कि वह बिट्टी के सामने खुद को बहुत बड़ा गुंडा साबित करें, जिससे बिट्टी उनसे नफरत करने लगे, तब वह हमदर्दी जताकर अपने प्यार का इजहार कर बिट्टी से शादी कर लेंगे.

मजबूरन प्रीतम को अपने दोस्त चिराग की बात माननी पड़ती है. पहली मुलाकात में प्रीतम वही करता है, जैसा चिराग ने कहा है. प्रीतम के इस रूप को देखकर बिट्टी उससे नफरत करने लगती है. मगर दो दिन बाद रात में एक जलेबी की दुकान पर प्रीतम का एक अलग व प्यारा रूप देखकर बिट्टी चौंक जाती है. तब प्रीतम, बिट्टी को सारा सच बता देता है. फिर बिट्टी व प्रीतम नाटक करते हैं कि बिट्टी को प्रीतम से ही प्यार है और वह हर हाल में प्रीतम से शादी करेगी. अब इस शादी को रोकने के लिए चिराग चालें चलता है. जबकि बिट्टी, चिराग के असली प्यार की परीक्षा लेती रहती है. अंत में सगाई वाले दिन सच सामने आता है. चिराग व बिट्टी की सगाई हो जाती है.

कमजोर पटकथा व खराब एडीटिंग के साथ फिल्म की गति काफी धीमी है. फिल्म में रोमांस भी ठीक से उभर नहीं पाया. निर्देशक ने कस्बाई प्यार व रोमांस को परदे पर पेश करने की कोशिश की है, पर वह इसमें पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए. फिल्म के सभी पात्र बनावटी व पूर्णरूपेण फिल्मी लगते हैं. फिल्म का क्लायमेक्स तो बहुत ही ज्यादा गड़बड़ है. इंटरवल के बाद फिल्म काफी गड़बड़ा जाती है. फिल्म में कसावट की जरुरत है. फिल्म की एडीटिंग भी गड़बड़ है. इंटरवल के बाद तो फिल्म बोर ही करती है. फिल्म का गीत संगीत साधारण है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बिट्टी के किरदार में कृति सैनन अच्छी लगती हैं. उन्होंने अपने अभिनय को काफी  निखारा है. हकीकत में यह फिल्म सिर्फ कृति सैनन की अभिनय प्रतिभा के लिए ही देखी जा सकती है. आयुष्मान खुराना ठीक ठाक हैं. प्रीतम विद्रोही के किरदार में राजकुमार राव जमे नहीं हैं. उनके करियर का यह सर्वाधिक कमजोर किरदार रहा. मिश्रा के किरदार में पंकज त्रिपाठी काफी निराश करते हैं.

दो घंटे दो मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बरेली की बर्फी’’ का निर्माण ‘बी आर स्टूडियो’ और ‘जंगली पिक्चर्स’ ने मिलकर किया है. निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी, लेखक नितीश तिवारी व श्रेयष जैन, सूत्रधार जावेद अख्तर तथा कलाकार हैं – आयुष्मान खुराना, राज कुमार राव, कृति सैनन, पंकज त्रिपाठी, सीमा पाहवा व अन्य.

सावधान : आपके मोबाइल से इस तरह हो रही है जानकारियां चोरी

सरकार ने 21 मोबाइल निर्माता कंपनियों को नोटिस जारी किया था. ऐसा इसलिए किया गया था कि क्योंकि कुछ मुख्य कंपनियों के स्तर पर यूजर्स की निजी जानकारी (मैसेज, लोकेशन और कौन्टैक्ट लिस्ट आदि) चोरी होने की आशंका जताई जा रही थी. साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इन जानकारियों को दूसरी कंपनियों को बेचा भी जा सकता है. सरकार ने जिन कंपनियों को नोटिस भेजा है कि उनमें चीन की मोबाइल निर्माता कंपनी वीवो, ओप्पो, शाओमी और जियोनी शामिल हैं. आपको बता दें कि यूजर्स की जानकारी चार तरीकों से चोरी की जा रही है. इस पोस्ट में हम आपको इन्हीं तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं.

इन चार तरीकों से चोरी हो रही जानकारी:

मैसेज: यूजर्स की काफी जानकारी व्हाट्सएप से इक्ट्ठा की जाती है. इन जानकारियों का इस्तेमाल हैकर्स गलत तरीके से भी कर सकते हैं. इससे यूजर्स की प्राइवेसी को खतरा हो सकता है.

लोकेशन: कई यूजर्स के फोन में लोकेशन हमेशा औन रहती है. ऐसे में हैकर्स के हाथ अगर आपकी लोकेशन की जानकारी लग जाए तो किडनैपिंग जैसे हालात भी बन सकते हैं.

कौन्टेक्ट लिस्ट: फोन की कौन्टैक्ट लिस्ट के डाटा को टेलीकौलर्स या विज्ञापन कंपनियों को बेचा जाता है. इससे यूजर्स को ब्लैकमेलिंग का सामना भी कर पड़ सकता है.

फोटो: यूजर्स के फोन में कई निजी फोटोज भी सेव रहती हैं. ऐसे में अगर यह फोटोज हैकर्स के लग जाती हैं तो उनका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है. यह ब्लैकमेलिंग का बड़ा जरिया बन सकता है.

इन कंपनियों को जारी किया नोटिस :

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से जिन 21 मोबाइल निर्माता कंपनियों को नोटिस भेजा गया है उनमें चाइनीज कंपनियों के अलावा एप्पल, सैमसंग और माइक्रोमैक्स जैसी कंपनियां भी शामिल हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत के दौरान यह जानकारी दी कि कंपनियों को सभी सुरक्षा संबंधी शर्तों का अनुपालन करने के लिए 28 अगस्त तक का समय दिया गया है. इसके बाद सुरक्षा संबंधी नियमों का अनुपालन हुआ या नहीं यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार की ओर से औडिट किया जा सकता है. अधिकारी ने यह भी जानकारी दी कि अगर इस औडिट में कंपनियां नियमों का उल्लघंन करती पायी गई तो उन पर पेनल्टी लगाई जाएगी.

सुरक्षा के लिए यह 3 कदम उठाने जरुरी:

सेंट्रल रजिस्ट्री एजेंसी बनाई जानी आवश्यक है जिसके तहत अगर किसी का फोन चोरी हो गया है या खो गया है तो उसका डाटा पुलिस से लिया जा सके.

यूजर्स का डाटा क्लाउड पर भी सेव रहता है. ऐसे में इसकी सुरक्षा के लिए भी कानून बनाए जाने आवश्यक हैं. इसकी सिफारिश ट्राई ने की है.

टेलिकौम पौलिसी में डाटा सिक्योरिटी पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है.

सरकार ने की 6 महीने तक जांच:

मोबाइल कंपनियों को नोटिस भेजने से पहले सरकार ने करीब 6 महीने तक जांच की है. खबरों की मानें तो चीन के अलावा डाटा चुराने का शक अमेरिकी कंपनियों पर भी है. इस मामले पर भारत ने जांच शुरु कर दी है. साथ ही स्मार्टफोन के डाटा को सुरक्षित रखने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं. देखा जाए तो सभी मोबाइल कंपनियों के सर्वर देश के बाहर हैं. ऐसे में भारत के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि वहां डाटा सिक्योरिटी के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं. हालांकि, भारत वहां की व्यवस्था का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जिससे डाटा सिक्योरिटी को लेकर सतर्कता बरती जा सके.

सरकार यह कार्रवाई केवल स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों पर कर रही है. क्योंकि औपरेटर या सर्विस प्रोवाइडर का डाटा लीक से सीधा लिंक नहीं है ऐसा इसलिए क्योंकि ऑपरेटर केवल कॉलिंग और मैसेज करता है. और सारा डाटा स्मार्टफोन में ही सेव होता है. ऐसे में डाटा लीक होने की जिम्मेदारी मोबाइल कंपनियों की ही होगी. मोबाइल कंपनी अपने एग्रीमेंट के तहत ही यह चीजें देती हैं.

आप के पास रुपयों से बड़ी चीज है, जानिए आखिर वो क्या है

हमारे पास ऐसी कीमती चीजें हैं जिन के बारे में हम को ज्ञान नहीं है. हमारे पास चीजें हैं– हमारा शरीर, हमारा चिंतन, हमारा वक्त, हमारा श्रम, हमारा पसीना, हमारा आत्मविश्वास, हमारा स्वास्थ्य, हमारा साहस, हमारा ज्ञानविज्ञान, हमारा हृदय, हमारा मस्तिष्क, हमारा अनुभव, हमारी भावनाएंसंवेदनाएं आदि.

ये इतनी बड़ी चीजें हैं कि इन का रुपए से कोईर् संबंध नहीं है. रुपया तो इन के सामने धूल के बराबर है, मिट्टी के बराबर है. रुपया किसी काम का नहीं है इन के आगे. इन अनमोल चीजों को महान उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करें.

सृष्टि के पीछे छिपी भावना हरेक जीव के कल्याण की है. इस ब्रह्मांड में पृथ्वी सहित सभी ग्रह तारे, सूर्य, चंद्रमा का आपस में आदानप्रदान के सहारे ही अस्तित्व बना हुआ है. ब्रह्मांड की अब तक की खोज में मनुष्य सब से बुद्घिमान प्राणी है. मनुष्य के पास इन अनमोल चीजों के बलबूते अर्जित की गई विभिन्न क्षेत्रों की कुछ ऐतिहासिक उपलब्धियों के बारे में आप भी जानिए.

‘‘खुश रहना जीवन का मूलमंत्र है. जब तक आत्मसंतुष्टि नहीं होगी, तब तक सबकुछ गलत और विपरीत लगेगा. अच्छे कर्म से खुशी मिलेगी और खुशी से आनंद आएगा. इसी आनंद से संतुष्टि मिलगी.’’ ये विचार कोयंबटूर के ईशा फाउंडेशन के संस्थापक वासुदेव के हैं.

जब मनुष्य जन्म लेता है तो बड़ा होतेहोते उस पर 5 प्रकार के ऋण आ जाते हैं. उन में से एक ऋण राजा का होता है. आज के जमाने में राज्य का स्वरूप बदल गया है और अब राजा नहीं होता, उस की जगह हमारी चुनी हुई सरकार ने ले ली है. राजा का यह ऋण अब हम सरकार को ही टैक्स दे कर चुकाते हैं. इस के बदले में सरकार हमें विभिन्न प्रकार के साधन मुहैया करवाती है, ताकि हम अपना जीवन सुचारु रूप से चला सकें. हमें जीवनोपयोगी साधनों का उपयोग अपनी आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए. ईमानदारी से नौकरी या व्यवसाय करना ही अपने विकास का सब से सरल व एकमात्र उपाय है.

ऐसे कई महापुरुषों के उदाहरण हमारे सामने हैं जो लोक कल्याण की भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास कर के युगोंयुगों तक अपनी पहचान बना ली.

भारतीय मैनेजमैंट शिक्षा प्रणाली अब हुनर व कुशलता आधारित शिक्षा पर ज्यादा जोर दे रही है, क्योंकि तेजी से बदलते इस आधुनिक युग में कौर्पोरेट्स को भी ऐसे ही कुशाग्र बुद्घि वाले हुनरमंद उम्मीदवारों की आवश्यकता है. हौलीवुड की मूवी ‘आयरनमैन’ में दिखाया गया है कि जारविस नाम का सुपर कंप्यूटर एक इशारे पर हीरो की हर बात समझ कर उसे पूरा कर देता है. इस से प्रेरणा ले कर फेसबुक के फाउंडर मार्क जुकरबर्ग ने भी अपने घर के लिए जारविस को डिजाइन कर लिया है.

जुकरबर्ग ने यह सिस्टम अपने बिजी शेड्यूल से समय निकाल कर खुद डिजाइन किया है. वे जारविस को इतना स्मार्ट बनाना चाहते हैं कि वह उन के लिए खाना भी बना सके. इतना ही नहीं, जुकरबर्ग इस सौफ्टवेयर को दुनियाभर के लोगों के लिए फ्री में उपलब्ध कराने के बारे में भी सोच रहे हैं.

लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे कहते हैं, ‘‘आप दूसरों पर विश्वास कर सकते हैं, यह जानने का एक ही तरीका है कि उन पर विश्वास करें.’’ स्टीव जौब्स ने कहा है, ‘‘काम जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा है. संतुष्ट होने का एक ही तरीका है कि वह करें, जिसे अच्छा मानते हैं. अच्छा तभी होगा कि जो कर रहे हैं, उस से प्यार करें. अगर अभी अपनी पसंद का काम नहीं मिला है तो उसे ढूंढ़ते रहें, समझौता न करें.’’

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बौब डिलन कहते हैं, ‘‘वही सफल है जो सुबह उठता है और रात को बिस्तर पर जाता है और इस बीच वही करता है, जो वह करना चाहता है.’’

प्रोत्साहन दें

एक बार इंगलैंड की रौयल अकादमी के हौल को उत्कृष्ट चित्रों से सजाने की योजना बनाई गई. इस के लिए देशविदेश के बेहतरीन चित्रकारों से श्रेष्ठतम चित्र भेजने को कहा गया. कुछ ही दिनों में रौयल अकादमी के पास चित्रों का ढेर लग गया. अकादमी की विशेषज्ञ समिति सुंदर चित्रों को चुनने लगी. चुनने के बाद उन्हें हौल में सजाया गया तो सारा हौल चित्रों से भर गया. लेकिन अभी भी चुने गए चित्रों में से एक चित्र बच गया.

वह चित्र बेहद खूबसूरत था और उसे एक युवा चित्रकार ने बनाया था. यह देख कर समति के एक सदस्य ने कहा, ‘‘चित्र तो वाकई बहुत सुंदर है, मगर दुख है कि हौल पूरा भर गया है और इसे कहीं भी नहीं लगाया जा सकता. इसलिए, इसे ससम्मान चित्रकार के पास वापस भेज दिया जाना चाहिए.’’ यह सुन कर विशेषज्ञ समिति के सभी सदस्यों ने सहमति में सिर हिलाया.

इंगलैंड के सुप्रसिद्घ चित्रकार टर्नर भी उस विशेषज्ञ समिति के सदस्य थे. उन्होंने कहा, ‘‘इतने खूबसूरत चित्र को वापस भेजना उचित नहीं है.’’ इस पर दूसरा सदस्य बोला, ‘‘किंतु अब इसे लगाने के लिए कहीं, कोई भी स्थान नहीं बचा है.’’ टर्नर बोले, ‘‘अभी भी एक स्थान ऐसा बचा हुआ है जहां पर यह चित्र लगाया जा सकता है.’’ टर्नर उठे और उन्होंने अपना चित्र उतार कर उस की जगह उस युवा चित्रकार का चित्र लगा दिया और बोले, ‘‘युवा चित्रकार को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, क्योंकि इस से दुनिया को एक महान कलाकार मिलने की राह खुलती है.’’ युवा चित्रकार को जब इस बात का पता चला तो वह महान चित्रकार टर्नर के प्रति हृदय से नतमस्तक हो गया.

आज की जरूरत

अपने मस्तिष्क की कीमत समझने वाले प्रसिद्घ भौतिकशास्त्री स्टीफन हाकिंस ने कहा, ‘‘हमारी धरती के लिए यह बहुत खतरनाक समय है. हमारे पास धरती को नष्ट करने की तकनीक तो मौजूद है, पर हम वह नहीं तलाश पाए, जो इसे बचा सके. संभव है, कुछ सौ वर्षों में हम नक्षत्रों के आसपास भी अपनी कालोनी बना और बसा ले जाएं, मगर फिलहाल हमारे पास एक ग्रह पृथ्वी है और सब से बड़ी जरूरत इसे बचाने के लिए मिल कर काम करने की है. ऐसा करने के लिए हमें तमाम देशों के अंदर और बाहर की सभी बाधाएं तोड़नी पड़ेंगी.

‘‘ऐसे समय में, जब सिर्फ नौकरी ही नहीं, उद्योगों की संभावनाएं भी क्षीण हो रही हों, हमारी जिम्मेदारी है कि लोगों को एक नए विश्व के लिए तैयार करें. लेकिन जरूरी होगा कि विश्व के सभी विद्वान अतीत से सबक लें. हम मानवता के विकास के सब से बुरे दौर में हैं. हर हाथ में फोन तो है, भले पानी न हो. इसी चमक को देख हमारे ग्रामीण व गरीब बड़ीबड़ी उम्मीदें ले कर झुंड के झुंड शहरों और कसबों की ओर पलायन कर रहे हैं और हर दिन एक नए मायाजाल में उलझते चले जा रहे हैं.’’

महान वैज्ञानिक के भविष्य के गर्भ में झांक कर निकाले गए इन संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए. हमें जागरूक हो कर मानव जाति के सुरक्षित भविष्य के लिए कार्य करना चाहिए. अपने मस्तिष्क की कीमत समझने वाले इसरो के महान भारतीय वैज्ञानिकों ने नवीनतम रिमोट सैंसिग सैटेलाइट रिसोर्ससैट-2ए को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया. यह आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी36 की मदद से लौंच किया गया था. यह रिसोर्ससैट-1 और 2 की कड़ी का उपग्रह है. कुल 12.35 किलोग्राम वजनी यह उपग्रह भारत की वन संपदा और जल संसाधनों के बारे में जानकारी देगा. इस से यह जानने में मदद मिलेगी कि देश के किन इलाकों में कौन से मिनरल हैं.

प्रकृति में इंसान की आवश्यकता के लिए भरपूर तत्त्व हैं. कुदरत की इस देन पर पृथ्वी में पलने वाले प्रत्येक जीव का अधिकार है. मानव जाति की उपरोक्त विभिन्न क्षेत्रों की ऐतिहासिक उपलब्धियों को पढ़ कर यह विश्वास होता है कि मनुष्य यदि संकल्प कर ले तो जीवन में क्या नहीं अर्जित कर सकता. विचार के नियमों को गहराई से समझ कर मनुष्य 100 प्रतिशत अपनी प्रतिभा का सर्वोच्च कार्य समाज को दे कर उसे लाभान्वित कर सकता है.

व्यावहारिकता की खुशबू बिखेरते ये रिश्ते हम सबके लिए मिसाल हैं

नीता अपने मातापिता की इकलौती संतान है. नीता के पापा इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए अब उस की मां उसी के पास रहती हैं. नीता एक कामकाजी महिला है. उस का पति विकास भी नीता की मां की जिम्मेदारियां बखूबी निभाता है. वह यह जानता है कि अगर नीता की मां खुश रहेंगी तो बदले में उस के मातापिता को नीता से उचित सम्मान मिलेगा.

बदलते परिवेश में बदलते रिश्तों का यह स्वरूप वाकई तारीफ के काबिल है. अब जब संयुक्त परिवारों का तेजी से विघटन हो रहा है और एकल परिवार तेजी से अपने पांव जमा रहे हैं, तब ऐसे में लोगों की परिपक्व होती सोच हमारे समाज के लिए एक अच्छा संकेत है.

आज हम सभी इस बात को गहराई से महसूस कर रहे हैं कि जब तक हमारा जीवन है तब तक रिश्तों की अहमियत भी है. माना कि अब हमारे रिश्तों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है पर बचे हुए रिश्तों को बचाने की पुरजोर कोशिश करना एक सुखद पहल है.

आयशा, जो एक मल्टीनैशनल कंपनी में उच्चपद पर कार्यरत है, किसी से खास मतलब नहीं रखती थी. पर जब वह बीमार पड़ी तब उसे महंगी चिकित्सा के साथसाथ प्यार के दो मीठे बोल सुनने की आवश्यकता भी महसूस हुई. बस, फिर तो ठीक होते ही उस ने अपने बिगड़े रिश्तों को जिस तरह संभाला, वह सभी के लिए अनुकरणीय बन गया.

रिश्तों को संजोना : 

रिश्तों में अहं की भावना की जगह अब जिम्मेदारी ने ले ली है. हर कोई अपनी परिपक्व सोच का परिचय देता हुआ रिश्तों की सारसंभाल में लगा है.

अब जब सभी ही कामकाजी हैं और सभी के पास समय की कमी है, तब ऐसे में एकदूसरे के प्रति पनपती केयरिंग की भावना ने रिश्तों को एक नए कलेवर में ढाला है. इसलिए ही तो आज की सास अपनी कामकाजी बहू की परेशानियां भलीभांति समझने लगी है और शायद इसी के चलते वह अपनी सुबह की पूजा के आडंबरों को छोड़, किचन की अन्य जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाने लगी है. और इसलिए ही सुबह की सैर से लौटते ससुरजी भी सब्जी व फलों की खरीदारी से गुरेज नहीं करते. इस तरह घर के कामों में हाथ बंटा कर दोनों ही मुख्यधारा से जुड़ने को प्रयासरत हैं.

अगर सासससुर बेहिचक घर की सारी जिम्मेदारियों में भागीदार बनते हैं तो बदले में उन के बेटेबहू भी उन्हें किसी चीज की कमी का एहसास नहीं होने देते. इसलिए ही तो इस बार जब नीरा को शिमला में कंपनी का गैस्टहाउस रहने को मिला तो वह अपने सासससुर को भी साथ ले गई. दिल्ली की उमसभरी गरमी से नजात पा कर उस के सासससुर को बहुत अच्छा लगा और साथ ही, नीरा की बदलती सोच के कारण उन लोगों की आपसी नजदीकियों में भी इजाफा हुआ. आपस में पनप रही छोटीमोटी गलतफहमियां भी दूर हो गईं.

बदलता नजरिया :

रीमा ने इस बार राखी का गैटटुगैदर अपने यहां करने का मन बनाया था क्योंकि उस की भाभी भी वर्किंग हैं और कोई प्रोजैक्ट वर्क चलने के कारण वे इस बार राखी पर व्यस्त थीं.

रीमा की इस पहल से उस के भाईभाभी खुश थे. पर, रीमा की सास उस के यहां रहने आई हुई थीं, इसलिए वह थोड़ी हिचक रही थी. पर जब रीमा की सास को यह सब पता चला तो न सिर्फ उन्होंने रीमा को प्यारभरी झिड़की दी बल्कि खुद आगे बढ़ कर सारे कामों में उस की मदद भी की. गैटटुगैदर के बाद जब सभी ने रीमा की सास की पाककला सराही तब रीमा का भी मन भर आया.

आज जब सभी पुरानी विचारधारा को छोड़ कर खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालने की भावना से आगे बढ़ रहे हैं, तब ऐसे में सीमित होते रिश्तों को सहेजना ज्यादा आसान होता जा रहा है. शायद अब सभी इस बात को महसूस करने लगे हैं कि अच्छे लोगों का हमारी जिंदगी में आना अच्छा होता है. पर उन्हें संभाल कर रखना हमारा हुनर होता है.

पीछे छूटती परंपरागत सोच :

आज इस तरह की पुरानी सोच कि, बेटी के घर का पानी पीना भी हराम है या भाईबहन के घर खाना अच्छा नहीं लगता, पर विराम लगा है. अब लोग अपनी सुविधा के अनुसार अपनी बेटी या बहन के घर जाने लगे हैं. आज अगर 1-2 बच्चों के साथ भी तथाकथित पुरानी सोच चलती रही तो हम डिप्रैशन का शिकार अवश्य ही हो जाएंगे क्योंकि सपनों का साथ व अपनों का प्यार हमें पगपग पर चाहिए और अब जब संयुक्त परिवार समाज के हाशिए पर सिमट कर रह गए हैं, तब ऐसे में ऐसी दकियानूसी सोच हमारे दिमाग का दिवालियापन ही घोषित करेगी.

काव्या की लवमैरिज है. अब चूंकि उस का मायका उस की ससुराल के पास ही है तब ऐसे में उस की मां अकसर ही उस की ससुराल आती रहती हैं क्योंकि काव्या अपने मातापिता की इकलौती संतान जो है. काव्या की शादी के बाद उस की मां अकेलेपन के कारण डिप्रैशन की शिकार हो गई थीं, इसलिए काव्या की सास खुद ही उन से मिलने चली जाती हैं या उन्हें अपने यहां बुला लेती हैं. कभीकभी तो दोनों साथसाथ लंच पर भी बाहर चली जाती हैं. 2 समधिनों को यों सहेलियों की तरह घूमते देख न सिर्फ सभी को अच्छा लगता है, बल्कि सभी की परंपरागत सोच में भी बदलाव लाता है.

आत्मकेंद्रित सोच पर लगता विराम:

रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट यह बात मानते हैं कि अब रिश्तों में निरंतर बढ़ रही आत्मकेंद्रित सोच पर विराम लगा है और शायद इसी वजह से रिश्तों का यह बदला हुआ स्वरूप उभरा है. अब हर कोईर् अपने ईगो को एकतरफ रख कर सामने वाले के बारे में सोच कर उस की सहायता करने लगा है, जो कि आज के बदलते परिवेश के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है.

मालिनी और नेहा सगी बहनें हैं. उन का कोई भाई नहीं है. पिता की मृत्यु के बाद उन दोनों ने अपने घरों के पास अपनी मां को एक छोटा सा फ्लैट दिलवा दिया ताकि जरूरत पड़ने पर उन की मदद करने में उन्हें आसानी हो.

वैसे तो बड़ी होने के कारण मालिनी ही अपनी मां की ज्यादा सहायता करती थी पर इस बार जब उस की मां अचानक बीमार पड़ीं तब उस की छोटी बहन नेहा ने अपनी बीमार मां को संभाला. इस बार मालिनी मार्च माह की क्लोजिंग की वजह से अपने बैंक के कामों में बेहद बिजी थी. नेहा का खुद आगे बढ़ कर मां की सारी सारसंभाल देख मालिनी का दिल भर आया और जानेअनजाने ही उन दोनों की नजदीकियां भी बढ़ गईं.

रमेश इस बार सैलरी समय पर न मिलने पर अपने नए फ्लैट की ईएमआई नहीं भर पाया तो उस की छोटी बहन पारुल ने चुपचाप औनलाइन ईएमआई भर दी. जब रमेश को यह सब पता चला तो वह पारुल के प्रति कृतज्ञ हो उठा.

बाद में जब रमेश ने पारुल को पैसे लौटाने चाहे तब पारुल गुस्सा हो गई और अपने से 8 साल बड़े भाई रमेश से लगभग झिड़कती हुई बोली, ‘‘क्या भाई, क्या आप का घर मेरा घर नहीं है? और फिर, क्या घर की सारी जिम्मेदारियां निभाने का ठेका आप ने ही ले रखा है?’’ पारुल की इस प्यारभरी झिड़की से न सिर्फ रमेश को अच्छा लगा बल्कि उन के रिश्तों में भी एक नई ऊर्जा का संचार हुआ.

आज के बदलते परिवेश में रिश्तों का यह बदला स्वरूप वाकई ही हमारे प्रगतिशील समाज की सही व सटीक तसवीर प्रस्तुत करता है. अब सभी का एकदूसरे की परेशानियों को समझते हुए आपस में सहायक बनना क्या रिश्तों में गर्मजोशी नहीं बढ़ाएगा?

समय चाहे कैसा हो, पर रिश्तों की मिठास ताउम्र बनी रहनी चाहिए क्योंकि रिश्तों के बिना हम अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते. इसलिए रिश्तों को बचाने के लिए कुछ समझौते भी करने पड़ें तो पीछे न हटें. हमेशा समझौता करना सीखिए क्योंकि थोड़ा सा झुक जाना किसी रिश्ते को हमेशा के लिए छोड़ देने से बहुत बेहतर है.

किसी ने क्या खूब कहा है :

जिंदगी में किसी का साथ काफी है,
कंधे पर किसी का हाथ काफी है,

दूर हो या पास फर्क नहीं पड़ता,
रिश्तों का बस एहसास काफी है.

जहरीले प्रदूषण और बैक्टीरिया के बीच कैसे बचेंगी गंगा यमुना

एक भारतीय के लिए यह कल्पना भी सिहरा देने वाली है कि एक दिन गंगायमुना जैसी नदियां नहीं रहेंगी. गंगा की विदाई की बात तो आम आदमी सोच नहीं पाता, लेकिन धीरेधीरे यह आशंका गहरा रही है. गंगायमुना दुनिया की उन नदियों में से हैं जिन के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. साल 2014 में पर्यावरण संरक्षण से संबद्घ संस्था डब्लूडब्लूएफ ने इस खतरनाक तथ्य का खुलासा किया था. उस के मुताबिक गंगायमुना के अलावा सिंधु, नील और यांग्त्सी भी संकटग्रस्त हैं. डब्लूडब्लूएफ का कहना है कि निरंतर बढ़ते प्रदूषण, पानी के अत्यधिक दोहन, सहायक नदियों के सूखने, बड़े बांधों के निर्माण और वातावरण में परिवर्तन से इन बड़ी नदियों के लुप्त होने का संकट पैदा हो गया है.

भारत में आज सब से अहम चर्चा गंगा को ले कर है. नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा को पुनर्जीवन देने का ऐलान अपने घोषणापत्र में किया था और अपने वादे के मुताबिक, उमा भारती को गंगा सफाई का एक पृथक मंत्रालय दे कर इस बारे में अपनी सदिच्छा भी दर्शा दी थी. पर अब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार निवासी एक मुसलिम व्यक्ति मोहम्मद सलीम की जनहित याचिका पर अभूतपूर्व फैसला सुनाते हुए इन दोनों नदियों को जीवित इंसान जैसे अधिकार देने की बात कही है.

अदालत के इस फैसले से गंगायमुना को देश के संवैधानिक नागरिक जैसे अधिकार हासिल हो गए हैं, जिन के तहत इन के खिलाफ और इन की ओर से मुकदमे सिविल कोर्ट तथा अन्य अदालतों में दाखिल किए जा सकेंगे. इन नदियों में कूड़ा फेंकने, पानी कम होने, अतिक्रमण की स्थिति में मुकदमा हो सकता है और गंगायमुना की ओर से मुख्य सचिव, महाधिवक्ता, महानिदेशक आदि मुकदमा दायर कर सकेंगे.

यही नहीं, यदि इन नदियों में बाढ़ आदि के कारण किसी व्यक्ति के खेतमकान बह जाते हैं, तो वह व्यक्ति इन के खिलाफ भी अदालत में मुकदमा दायर कर हर्जाना की मांग कर सकता है, जिस की भरपाई संबंधित राज्य सरकार को करनी पड़ सकती है.

इस ताजा फैसले के पीछे न्यूजीलैंड में बांगक्यू नामक नदी को जीवित व्यक्ति की तरह हाल में अधिकार  देने का उदाहरण है. बहरहाल, इस फैसले से यह उम्मीद जगी है कि अब सरकार और जनता गंगायमुना व अन्य नदियों की साफसफाई व संरक्षण के प्रति सजग होगी और इस के उपाय करेगी कि इन के जीवन पर कोई संकट न आए.

जहरीला प्रदूषण

मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होते ही देश में गंगायमुना समेत देश की धर्म की दुकान में शामिल प्रमुख नदियों की साफसफाई की योजना पर सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में कामकाज शुरू हो गया था. जैसे, एक योजना जहाजरानी मंत्रालय ने बनाई थी जिस में गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी और महानदी को जोड़ कर जल परिवहन ग्रिड तैयार किया जा रहा है. करीब 25 हजार करोड़ रुपए की इस प्रस्तावित परियोजना में इन प्रमुख नदियों में जलप्रवाह सुनिश्चित करने के साथसाथ इन का उपयोग ऐसे जलमार्ग के रूप में किया जाना है जिस से सस्ती दरों पर माल ढुलाई की जाए.

एक अन्य योजना पर्यटन मंत्रालय की है जिस की पहल पर देश की कुछ शीर्ष कंपनियां, खासतौर पर बनारस के गंगा घाटों का विकास और रखरखाव करने के लिए, सामने आई हैं. खुद पर्यटन मंत्रालय 18 करोड़ रुपए के खर्च से इन घाटों का विकास कर रहा है. पर नदियों की सब से अहम समस्याएं उन के दोहन, खनन और उन में डाले जा रहे जहरीले प्रदूषण की हैं.

सब से पहले बात गंगा की है. गंगा हमारे लिए सिर्फ एक नदी नहीं है, वह धर्म की कमाई का बड़ा साधन भी है. प्रवाह समाप्त होने और प्रदूषण बढ़ने पर उस के खत्म होने का अर्थ होगा एक दुकानदारी का लोप हो जाना. असल में अपना जीवन संवारते हुए हम ने नदियों की जिंदगी छीन ली है. गंगा और इस की सहायक नदियों से पानी के अंधाधुंध दोहन ने हालत बिगाड़ दी है. देश में गंगा की सभी सहायक नदियों का पानी बांधों द्वारा नियंत्रित है, जो 60 फीसदी प्रवाह को सिंचाई के लिए मोड़ देते हैं.

औद्योगिक विकास के जोर पकड़ने के साथ ही गंगा मैली होती जा रही है. यह सिलसिला प्रदूषण रोकने की तमाम सरकारी कवायदों के बावजूद रुकने का नाम नहीं ले रहा. बीते अरसे में सुप्रीम कोर्ट गंगा ऐक्शन प्लान की राशि के दुरुपयोग पर गहरी नाराजगी जता चुका है. एक मौके पर अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि प्रदूषण दूर करने के नाम पर करीब 900 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद गंगा में औद्योगिक प्रदूषण क्यों बदस्तूर जारी है? सरकार बगलें झांकने के अलावा और कुछ नहीं कर सकी.

सच तो यह कि इतना कुछ होने के बाद भी सिवा घाट बनाने के गंगा को स्वच्छ बनाने का अभियान सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं आया. आश्चर्य तो यह होता है कि नदियों को पूजने वाले इस देश के अंधभक्त भी नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए सामने नहीं आते, कोई आवाज नहीं उठाते. दुनिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब सरकार और समाज ने मिल कर नदियों को पुनर्जीवन दिया, जबकि वहां नदियों का कोई धार्मिक महत्व नहीं है.

बहरहाल, अब एक उम्मीद अदालत के फैसलों और उन पर सरकारों के रुख से जगी है. सरकारें अपने स्तर पर नदियों की साफसफाई के लिए जो कुछ करेंगी, उन की सार्थकता इस से तय होगी कि उन्होंने नदियों की किन दिक्कतों का नोटिस लिया है. नदियों को नया जीवन देने के लिए पहले उन की समस्याओं को जानना जरूरी है. मिसाल के तौर पर गंगोत्री से निकल कर बंगाल की खाड़ी में समाने से पहले 2,525 किलोमीटर का लंबा सफर तय करने वाली गंगा कई तरह के प्रदूषण झेल रही है और खनन की गतिविधियों से उस का स्वरूप बिगड़ रहा है.

पिछली सरकारों के कार्यकाल में गंगा का अस्तित्व बचाने के लिए गंगा ऐक्शन प्लान के तहत 200 अरब रुपए तक खर्च हो गए, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह सारा खर्च जैसे गटर में समा गया क्योंकि गंगा की हालत जस की तस रही.

बैक्टीरिया का हमला

गंगा का जल आचमन लायक क्यों नहीं है और इस में प्रदूषण की स्थिति क्या है, इस का अंदाजा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी सीपीसीबी के आंकड़ों से हो जाता है. सीपीसीबी के मुताबिक, हरिद्वार से ले कर कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक इस में कौलीफौर्म बैक्टीरिया की मात्रा काफी ज्यादा है जो इंसानों को विभिन्न रोगों की गिरफ्त में ला सकता है. आमतौर पर गंगा जैसी नदी के प्रति सौ मिलीलिटर जल में कौलीफौर्म बैक्टीरिया की तादाद 5,000 से नीचे होनी चाहिए. पर हरिद्वार में यह मात्रा प्रति सौ मिलीलिटर जल में 50,917, कानपुर में 1,51,333 और बनारस में 58,000 है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, बनारस में कौलीफौर्म बैक्टीरिया की संख्या सुरक्षित मात्रा से 11.6 गुना ज्यादा है. गंगा में बैक्टीरिया की इतनी अधिक मौजूदगी की वजह है उस में मिलने वाला बिना उपचारित किए गए सीवेज का गंदा पानी, जो इस के तट पर मौजूद शहरों से निकलता है.

तत्कालीन पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोइली ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना 2.7 अरब लिटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है. हालांकि इन सभी शहरों में सीवेज के पानी को साफ करने के लिए ट्रीटमैंट प्लांट लगे हुए हैं, पर उन की क्षमता काफी कम है. हकीकत यह है कि इन शहरों में मौजूद ट्रीटमैंट प्लांट सिर्फ 1.2 अरब लिटर यानी 55 फीसदी सीवेज की सफाई कर पाते हैं. इस का साफ मतलब यह है कि शेष 45 प्रतिशत सीवेज गंगा में यों ही मिलने दिया जाता है.

यह तो गंगा का हाल है. देश की दूसरी नदियां भी, सीवेज का गंदा पानी बिना ट्रीटमैंट के मिलने के कारण भयानक प्रदूषण झेल रही हैं. उल्लेखनीय है कि देश के विभिन्न शहरोंकसबों से रोजाना 38.2 अरब लिटर सीवेज गंदा पानी निकलता है जिस में से केवल 31 प्रतिशत यानी 11.8 अरब लिटर सीवेज की साफसफाई का प्रबंध है. चूंकि सीवेज की सफाई का पूरा इंतजाम नहीं है, इसलिए ज्यादातर सीवेज बिना ट्रीटमैंट के ही नदियों में मिला दिया जाता है.

कई तरह के प्रदूषण

नदियों में पैदा होने वाले प्रदूषण की एकमात्र वजह सीवेज का गंदा पानी नहीं है. नदियों को 3 तरह के मुख्य प्रदूषणों का सामना करना पड़ रहा है. निसंदेह इन में पहला प्रदूषण नालों के नदियों में मिलने वाले सीवेज और गंदे पानी के कारण पैदा होता है. लेकिन इस से ज्यादा बड़ा खतरा नदी किनारे मौजूद कारखानों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे व विषैले रसायनों का है. साथ में, नदियों के समीप स्थित खेतों में इस्तेमाल होने वाली रासायनिक खाद और कीटनाशकों ने भी एक बड़ा खतरा पैदा किया है, जिन के अवशेष रिस कर नदियों में मिल जाते हैं और उस के पानी को जहरीला बना देते हैं.

इन प्रदूषणों की स्थिति क्या है, इस का एक आकलन गंगा के किनारे स्थित शहरों से मिलने वाले प्रदूषण के जरिए हो सकता है. गंगोत्री से निकलने के बाद हरिद्वार आतेआते गंगा में उत्तराखंड राज्य की 12 नगरपालिकाओं के अंतर्गत पड़ने वाले 89 नाले अपना सारा सीवेज इस नदी में उड़ेल देते हैं.

हरिद्वार में सीवेज से पैदा प्रदूषण से निबटने के लिए 3 ट्रीटमैंट प्लांट हैं, लेकिन वे इस बढ़ते शहर के बढ़ते सीवेज को संभालने में नाकाम साबित हो रहे हैं. हरिद्वार के बाद कानपुर में गंगा की स्थिति सब से ज्यादा दयनीय हो जाती है, क्योंकि वहां बेशुमार औद्योगिक कचरा इस में प्रवाहित किया जाता है. कानपुर में तमाम फैक्टरियां हैं और इस के जाजमऊ नामक इलाके में 450 चमड़ा शोधन इकाइयां हैं. इन से निकलने वाला औद्योगिक कचरा गंगाजल को जहरीला बनाने के लिए पर्याप्त है.

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण विशेषज्ञों और विश्व बैंक की एक टीम ने कानपुर में पैदा होने वाले प्रदूषण से गंगा को बचाने का एकमात्र उपाय यह पाया है कि यहां के सारे नालों को गंगा से दूर ले जाया जाए और उन का गंदा पानी किसी भी सूरत में इस में न मिलने पाए.

कानपुर के बाद इलाहाबाद में वैसे तो औद्योगिक कचरे का कोई बड़ा खतरा नहीं है, लेकिन इस शहर के आधा दर्जन बड़े नालों का पानी सीधे गंगा में गिरता है. इसी तरह बनारस में भी जो सीवेज रोजाना पैदा होता है, उस में से एकतिहाई से ज्यादा गंगा में बिना ट्रीटमैंट के मिल रहा है. इस शहर के 33 नालों का गंदा पानी गंगा में न मिले, इसे रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है.

साफसफाई की मुश्किलें

गंगायमुना के सामने दिक्कतें लंबे अरसे से मौजूद रही हैं. इन में हाल तक कोई तबदीली भी नहीं आई है, सिवा इस के कि केंद्र सरकार ने गंगा को साफ करने की ठानी है. लेकिन यहां कुछ चीजों को और ध्यान में रखना होगा. जैसे खासतौर पर

गंगा नदी की लंबाई ढाई हजार किलोमीटर लंबी गंगा के किनारे बसे शहरोंकसबों में 5 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं. उन की रोजीरोजगार के जो प्रबंध खेतों और कलकारखानों के रूप में वहां मौजूद हैं, उन्हीं से सारा प्रदूषण गंगा में मिलता है. इस के अलावा तमाम तरह के अंधविश्वासों के चलते गंगा में लाशों से ले कर पूजाहवन सामग्री, तसवीरेंमूर्तियां आदि भी भारी मात्रा में प्रवाहित की जाती हैं. इन में से भी बहुत सी ठोस सामग्री ऐसी होती है जो गल नहीं पाती है और वह प्रदूषण में इजाफा ही करती है. पंडे इस प्रदूषण की बात भी नहीं करते. अगर वे प्रदूषण की बात करें तो जजमान स्नान करना ही बंद कर देंगे. इस से उन की कमाई कम हो जाएगी.

अगर विदेशी नदियों की साफसफाई के उदाहरण इस संदर्भ में लिए जाएं तो गंगा या यमुना को प्रदूषणमुक्त करने के अभियानों पर होने वाले खर्च का अंदाजा लग सकता है. जैसे लंदन की 346 किलोमीटर लंबी टेम्स नदी की साफसफाई इसलिए हो पाई क्योंकि उस के किनारे सिर्फ 14 लाख लोग रहते हैं. टेम्स की सफाई पर सिर्फ 5 अरब रुपए के बराबर खर्च आया, जबकि गंगा पर अभी तक 200 अरब रुपए खर्च हो चुके हैं.

इसी तरह यूरोप की 2,860 किलोमीटर लंबी नदी दान्युब 125 अरब रुपए के खर्च से 15 सालों में इसलिए साफ की जा सकी क्योंकि उस के किनारे सिर्फ 86 लाख लोग रहते हैं. जरमनी की 1,233 किलोमीटर लंबी राइन नदी पर पिछले 50 सालों में सफाई पर जरूर 1,940 अरब रुपए खर्च हुए हैं पर इस नदी के किनारे गंगा के मुकाबले दहाई 50 (लाख) लोग रहते हैं.

यूरोपीय देशों में लोग अपनी आजीविका के लिए नदियों पर इतने ज्यादा निर्भर नहीं हैं कि उन्हें गंगायमुना जैसा दोहन करना पड़े. यहां तो गंगा में उस के स्रोत गोमुख से ही प्रदूषण शुरू हो जाता है. वहां पर हजारों धार्मिक पर्यटकों की आवाजाही के कारण पौलिथीन के थैले और दूसरे तरह का कचरा खूब फेंका जाता है. इसी तरह नदी में वह मलमूत्र भी बहाया जाता है जो यहां के होटलों व तीर्थयात्रियों तथा पर्यटकों की आवाजाही के कारण होता है.

सब निभाएं जिम्मेदारी

साफ है कि अब यदि भाजपा सरकार गंगा और दूसरी नदियों की सफाई का जिम्मा अपने ऊपर लेती है, तो और भी ज्यादा रकम खर्च हो सकती है. यह भारीभरकम रकम कहां से आएगी, इस का कुछ हिसाबकिताब सरकार को जरूर बिठाना पड़ेगा. इतना तो तय है कि गंगा की स्वच्छता का कोईर् भी अभियान इस के किनारे रहने वाले लोगों को उस से जोड़े बिना मुमकिन नहीं है.

यह काम न तो प्रचार अभियान और शिक्षण से होगा और न ही बड़े संगठनों को भारीभरकम बजट मुहैया कराने से. यह तभी मुमकिन है जब लोग गंगा की महत्ता को समझते हुए इसे स्वच्छ रखने वाले दैनिक अनुशासन से जुड़ें और इस की साफसफाई की जिम्मेदारी में अपना हिस्सा भी तय करें.

अब यह समझ लेना होगा कि जिन नदियों को हम देवी का दरजा देते रहे हैं और नदियों की उत्पत्ति को भगवान से जोड़ कर देखते रहे हैं, उन नदियों का प्रदूषण हमारे लिए भी किसी प्रकोप से कम नहीं है. जिस रोज आम जनता समझ जाएगी कि उस का वजूद नदियों की वजह से ही है, नदियों की सारसंभाल के काम में आसानी होने लगेगी और उन के संरक्षण के सरकारी व गैरसरकारी आयोजन सार्थक साबित होने लगेंगे.

नदियों को पूजने वाले इस देश के अंधभक्त भी नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए सामने नहीं आते, कोई आवाज नहीं उठाते. दुनिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब सरकार और समाज ने मिल कर नदियों को पुनर्जीवन दिया, जबकि वहां नदियों का कोई धार्मिक महत्त्व नहीं है.

यमुना की दुर्दशा

पिछली सरकारों ने यमुना को साफ रखने के अपने वादे को निभाने में कोताही की और महज कोरे आश्वासन दिए. यही वजह है कि अतीत में सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार को इस के लिए फटकार लगा चुका है. जापान से 2 बार अनुदान लेने वाली और देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी यमुना की सफाई के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपए गटर में बहा

देने वाली सरकार का रवैया तो चिंताजनक है ही, साथ में, सवाल यह भी है कि सीएसई जैसे गैरसरकारी पर्यावरणवादी संगठन की सक्रियता के बावजूद हमारे समाज में इस की स्वच्छता को ले कर कोई चेतना नहीं जगी. अन्यथा यमुना का यह हाल न होता कि दिल्ली में वह सिर्फ बदबू से भभकता हुआ गंदा नाला ही लगती.

यमुना देश की राजधानी दिल्ली में ही सब से ज्यादा क्यों प्रदूषित है और इस का प्रदूषण क्यों नहीं खत्म हो पा रहा है, इस प्रसंग में कुछ मूलभूत बातें जाननी जरूरी हैं. दिल्ली में पल्ला नामक स्थान से प्रवेश करने और ओखला से बाहर निकलने वाली इस नदी के 22 किलोमीटर का हिस्सा ही सर्वाधिक प्रदूषित है.

प्रदूषण इतना ज्यादा है कि इस का जल आचमन लायक तो दूर, सिंचाई और टौयलेट फ्लश करने लायक तक नहीं है. पर इस के बावजूद, इस नदी के किनारों पर धड़ल्ले से सब्जियां उगाई और दिल्ली के बाशिंदों को तमाम चेतावनियों के बाद भी खिलाईर् जा रही हैं.

धर्मभीरू समाज इस के किनारे पर छठ पूजता है, गणेश व दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करता है. नदी का जल गुणवत्ता के लिहाज से 3 पैमानों पर मापा जाता है. पहला, बायोकैमिकल औक्सीजन डिमांड यानी बीओडी, दूसरा कैमिकल औक्सीजन डिमांड यानी सीओडी और तीसरा, पानी के एक यूनिट में मौजूद धूलकणों की मात्रा.

बीओडी का ज्यादा होना और सीओडी का अत्यधिक कम होना पानी की बेहतर गुणवत्ता का प्रतीक है, पर यमुना के मामले में ये मापदंड ठीक उलट साबित होते हैं. यानी औक्सीजन इस में नाममात्र को नहीं, जिस से इस में जलीय जीवजंतु जीवित रहते. खतरनाक रसायन इस में हद से कहीं ज्यादा हैं, इसलिए जीवजंतु और पादप प्रजातियां तो क्या, इस की चपेट में इंसान के आने पर मौत का खतरा है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 1999 में दिल्ली में यमुना के जो सैंपल लिए थे, उन के परीक्षण के नतीजों के मुताबिक, इस के जल के एक मिलीलिटर पानी में 66 बीओडी कण और 239 सीओडी कण पाए गए. ये दोनों आंकड़े उच्चतम प्रदूषण के नमूने थे. यह स्थिति 15 वर्षों बाद अभी भी बदली नहीं हैं, बल्कि यमुना ऐक्शन प्लान पर कार्यवाही होने के बाद तो और बदतर हुई है.

नदियों के खिलाफ है धर्मभीरू समाज

कहने को तो अमेरिकी और यूरोपीय देश दुनिया के सब से प्रदूषक देश हैं, लेकिन वे देश अपनी नदियों और जल संसाधनों की न सिर्फ रक्षा करते हैं, बल्कि उन्हें हर कीमत पर स्वच्छ रखने का जतन भी करते हैं. अमेरिका की हडसन, ब्रिटेन की टेम्स या जरमनी की राइन में वैसा विषैला प्रदूषण बिलकुल नहीं मिलेगा, जैसा प्रदूषण ये देश अपने वायुमंडल में घोलते हैं. पर यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आस्थाओं और नदीपूजकों के हमारे भारत देश में गंगायमुना से ले कर हर वह नदी इस कदर प्रदूषित है कि उस के जल के आचमन लायक भी नहीं रह जाने की खबर हर चौथे दिन अखबारों में देखने को मिलती है.

जिस देश में नदी में प्लास्टिक थैलियां और कचरा फेंकने की आम आदत के चलते सरकार को पुलों पर कचरा रोकने वाली लोहे की जालियां लगानी पड़ें, क्या हम उस देश की सभ्यता को नदीमूलक और प्रकृतिप्रेमी मान सकते हैं?

कहने को तो हमारा देश अंधविश्वासों और पाखंडों का देश है. साल में हर दिन कोई त्योहार इन पाखंडों के प्रदर्शन का मौका देता है और उत्सवप्रेमी लोग भांतिभांति के तौरतरीकों से अपनी आस्थाएं जताते हैं. इधर कुछ सालों से नदियों में मूर्तियों के विसर्जन का सिलसिला खूब बढ़ा है. बंगाल की दुर्गापूजा और महाराष्ट्र का गणेश उत्सव अब किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली से ले कर देहरादून और पोरबंदर से ले कर अगरतला तक ऐसे त्योहार धर्मभीरू समाज की उत्सवी अनिवार्यता के अंग हैं

जिस तरह से आस्तिक समाज ने उत्सवों को और ज्यादा धूमधाम से मनाने के नाम पर भरपूर कुरीतियों को अपनाया है, उस से पर्यावरण प्रदूषण का संकट और गहराया है. आंकड़ों के हिसाब से हर साल अकेले दिल्ली में ही 500 से 700 मूर्तियों का यमुना में विसर्जन किया जाता है. संख्या और आकार में हर साल पहले से बड़ी होती ये मूर्तियां प्लास्टर औफ पेरिस, चूने और सीमेंट के अलावा अनेक जहरीले तत्त्वों से बनती हैं और इन की निर्माणसामग्री की कोई वैज्ञानिक जांच नहीं होती.

मूर्तियों की चमक और रंगत बढ़ाने के लिए पोते जाने वाले रंग पारा, शीशा और कैडमियम आदि घातक रसायनों के मिश्रण से तैयार होते हैं, जो नदीजल को मानव व जलजीवों के लिए अत्यंत विषैला बना देते हैं.

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