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जीवन की मुसकान

मैं 22 वर्षों से दिल्ली सरकार के स्कूल में प्रधानाचार्या के पद पर कार्य कर रही थी. मुझे अपने कार्य के लिए हमेशा सराहा गया और दिल्ली सरकार की ओर से स्टेट अवार्ड भी मिला.

रिटायर्ड होने से 3 महीने पहले, जब 10वीं व 12वीं के फौर्म भरे जाते हैं तो मेरे विद्यालय के 2 बच्चों को परीक्षा में बैठने की अनुमति सीबीएसई ने यह कह कर नहीं दी कि छात्राओं के पास एक विषय हिंदी का होना आवश्यक है. उन दोनों ही छात्रों ने पंजाबी विषय लिया था और 11वीं में भी उन्होंने पंजाबी ही पढ़ी थी.

यह एक बड़ी भारी समस्या थी क्योंकि उन 3 महीनों में ही छात्राओं को 11वीं व 12वीं की हिंदी का पूरा कोर्स कराना था. मैं ने मन को समझाया कि संसार में असंभव कुछ नहीं होता. मेरा अपना विषय हिंदी है, सो मुझे किसी अध्यापिका से भी कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि वह इन छात्राओं को हिंदी पढ़ा दे.

मैं ने दोनों छात्राओं को अपने औफिस में बुलाया और उन्हें इस स्थिति से पूरी तरह से अवगत करा दिया. साथ ही, उन से कह दिया कि वे यदि मन में ठान लें तो यह कार्य असंभव नहीं होगा. अगले दिन से मैं ने उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया. मैं ने उन्हें यह हौसला दिया कि यदि वे मेरे कथनानुसार कार्य करेंगी तो मैं उन्हें अच्छे अंकों से पास करवा दूंगी.

उन दोनों छात्राओं ने भी लगातार पूरी मेहनत की. और वे 12वीं कक्षा के योग्य हिंदी सीख गईं.

पुष्पा गुलाटी

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हमें अचानक किसी जरूरी काम से हैदराबाद जाना पड़ा. मेरे पति और मैं ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठ गए. हमारे सामने वाली सीट पर 2 नौजवान बैठे थे. जगह के कारण उन में और मेरे पति में तूतूमैंमैं हो गई. मेरे पति कुछ ज्यादा ही बोल रहे थे. मेरे समझाने पर भी समझ नहीं रहे थे. बात कुछ ज्यादा बढ़ गई. हालांकि फिर सब चुप हो गए.

ट्रेन छूटने में कुछ ही मिनट बाकी थे. मैं ने इन से पूछा, ‘‘ट्रेन हैदराबाद कब तक पहुंचेगी?’’ तपाक से वे नौजवान बोले, ‘‘आंटीजी, यह ट्रेन हैदराबाद नहीं जाएगी. हैदराबाद जाने वाली ट्रेन बगल में खड़ी है.’’

मेरे पति बहुत हड़बड़ा गए. मेरी तो हालत बहुत खराब हुई. उन बेचारे नौजवानों ने हमें दिलासा देते हुए हमारा पूरा सामान नीचे उतारने में मदद की. अभी भी मैं ट्रेन में सफर करती हूं तो वे लोग याद आते हैं.

विमल कापउणे

दलित विरोधी हैं सिंधिया

आम तो आम, अब खास लोग भी कोर्टकचहरी के चक्कर से कतराने लगे हैं. लेकिन कांग्रेसी सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को अदालत जाने को मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार पटेल ने मजबूर कर दिया. गुना के अशोकनगर में एक ट्रौमा सैंटर का उद्घाटन इस इलाके के दलित नेता गोपीलाल जाटव ने किया था जिसे कथित रूप से सिंधिया समर्थकों ने गंगाजल से धुलवा कर पवित्र करवा दिया. इस पर भाजपाइयों ने हल्ला मचाया तो सिंधिया घबरा उठे कि यह उलटी गंगा क्यों बहाई जा रही है.

तिलमिलाए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा को आरोप साबित करने की चुनौती दे दी है. अब यह मामला चलता रहेगा और भाजपा कोर्ट से बाहर यह साबित कर देगी कि दलितों का उस से बड़ा शुभचिंतक कोई नहीं. उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अकसर दलितों के घर जा कर खाना खाने लगे हैं. भाजपा ने ही दलित संतों को कुंभ की डुबकी लगवाई थी. और तो और, एक दलित को राष्ट्रपति तक बना दिया. अब बारी सिंधिया की है कि वे गिनाएं कि भाजपा ने कबकब दलितों का इस तरह, कथित ही सही, अपमान किया. वह तो सेवक को स्वामी बनाने पर तुली हुई है.

वेंकैया नायडू मीडिया

भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू की तुलना महाभारत के एक शक्तिशाली पात्र भीम से की जा सकती है जो बातबात में युद्ध करने पर उतारू हो आता था. वाकपटुता के धनी वेंकैया नायडू लोकतांत्रिक ढंग से ही लड़े और हमेशा भगवा विरोधियों की आलोचना में अव्वल रहे. उन का सब से बड़ा अस्त्र उन की जीभ थी, जिस का वक्त पर इस्तेमाल करने में वे कभी चूके नहीं.

जब एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया था तो विरोधी यानी कांग्रेसी और उन में भी दक्षिण भारत के ही जयराम रमेश बेवजह पुराना चिट्ठा खोल बैठे कि वेंकैया नायडू सपरिवार भ्रष्ट हैं, उन पर घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोप हैं.

वेंकैया ने साफ किया कि उन पर लगाए गए आरोप तो लोकल मीडिया की देन हैं. उन का मतलब है कि नैशनल मीडिया को जयराम रमेश पर ध्यान नहीं देना चाहिए था.

हिंदी-चीनी भाईभाई नहीं

चीन के राष्ट्रीय अखबार ग्लोबल टाइम्स ने आखिरकार एक ऐसा राज उजागर किया है जिसे पहले से ही पूरी दुनिया जानती है. बकौल ग्लोबल टाइम्स, नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले हिंदू राष्ट्रवाद का फायदा उठाया क्योंकि राष्ट्रवादी ताकतें चीन के खिलाफ बदला चाहती हैं.

अब साफ हो गया है कि सीमा पर भारत व चीन के बीच तनाव की वजह कुछ और नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी व आरएसएस का अघोषित राष्ट्रवाद है. चीनी अखबार की यह बात बकवास साबित हो जाती अगर आरएसएस के एक पदाधिकारी इंद्रेश कुमार चीन को मंत्रशक्ति के सहारे सबक सिखाने का फतवा जारी न करते.

वाघेला मुक्त कांग्रेस

आमतौर पर अपनी पार्टी से नाराज नेता इस्तीफा देते पार्टी छोड़ने का ऐलान कुछकुछ श्राप देने के अंदाज में करते हैं. यह अलग बात है कि पार्टी कोई भी हो, भस्म नहीं होती. गुजरात के दिग्गज कांग्रेसी शंकर सिंह वाघेला ने अपने 77वें जन्मदिन पर अजीबोगरीब ऐलान, खुद को कांग्रेस से मुक्त करने का, कर डाला.

कल तक गुजरात कांग्रेस का पर्याय रहे वाघेला लंबे वक्त से कांग्रेस छोड़ने को छटपटा रहे थे. आखिर अपने जन्मदिन पर उन्होंने खुद को कांग्रेस से मुक्त होने का तोहफा दे दिया. गुजरात में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं पर कांग्रेस को लगता नहीं कि वह मोदी और शाह के गढ़ में सेंध लगा पाएगी. ऐसे में जब भाजपा ताबड़तोड़ तैयारी कर रही है, तब वाघेला का जाना कांग्रेस को नुकसान तो पहुंचाएगा ही.

 

 

 

कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से सजी ‘पार्टीशन : 1947’

इतिहास के पन्नों को जब भी कुरेदा जाता है, तब तब दर्दनाक कहानियों के साथ ही राजनैतिक षडयंत्रों की नफरत वाली कहानियां सामने आती हैं. 15 अगस्त 1947 के लिए लाखों क्रांतिकारियों ने अपना खून बहाया था. पर इस आजादी में भी अंग्रेज शासकों व इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल के षडयंत्र का समावेश था. उसी षडयंत्र के साथ भारत में वायसराय हाउस में पनप रही एक पंजाबी हिंदू और एक मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी को बेहतर ढंग से परदे पर लेकर आयी हैं फिल्मकार गुरींदर चढ्ढा. गुरींदर चढ्ढा ने अपनी इस फिल्म में आजादी से चंद माह पहले की कहानी को उकेरते हुए न सिर्फ भारत में अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेंटन व उनकी पत्नी लेडी एडवीना के मानवीय पक्ष को पेश किया है, बल्कि उन्हें मानवतावादी और भारत के हितैषी के रूप में पेश किया है, जो कि अपने ही देश के शासकों के षडयंत्र का मोहरा बनकर रह जाते हैं.

देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गए हैं, मगर उस वक्त के इतिहास में दबी तमाम कहानियां अभी तक दर्शकों के समक्ष नहीं पहुंची हैं. उन्हीं में से एक कहानी फिल्म ‘‘पार्टीशनः1947’’ का हिस्सा है. इस कहानी के अनुसार मो.अली जिन्ना की अलग पाकिस्तान देश की मांग का समर्थन करने के पीछे अंग्रेज सल्तनत और वहां के उस वक्त के प्रधानमंत्री चर्चिल की अपने देश का अरब देशों के तेल पर कब्जा बनाए रखने की नीति शामिल थी. उनका मकसद सोवियत संघ व हिंदुस्तान को और करीब न आने देना भी था. इस षडयंत्रकारी सोच के चलते मो.अली जिन्ना ने पं.नेहरू की इस बात का भी विरोध किया था कि मो.जिन्ना बिना बंटवारे वाले आजाद हिंदुस्तान के पहले प्रधान मंत्री बने और मुस्लिम लीग पहली सरकार बनाए.

कहानी शुरू होती है हिंदुस्तान को आजाद करने के लिए हिंदुस्तान के नेताओं के बीच सहमति बनाने के लिए वायसराय की हैसियत से लार्ड माउंटबेटन के भारत आगमन से. उनके भारत आगमन के साथ ही वायसराय हाउस में कार्यरत लोगों के कामकाज में परिवर्तन होता है. लार्ड माउंटबेटन की बेटी के साथ रहने के लिए आलिया नूर (हुमा कुरेशी) तथा लार्ड माउंटबेटन की सेवा में जीत सिंह (मनीष दयाल) की नियुक्ति की जाती है. जीत सिंह कभी पुलिस विभाग में रहते हुए जेल में कार्यरत थे. उस वक्त जेल में बंद आलिया के पिता (ओम पुरी) की मदद करते करते जीत, आलिया से प्यार कर बैठे थे. जबकि आलिया का विवाह आसिफ (अरूणोदय सिंह) के साथ तय हो चुका था. पर वह देश से बाहर था. अब आलिया व जीत सिंह की पुनः मुलाकात होती है और प्यार फिर से उभरता है. प्यार किसी मुकाम पर पहुंचे, उससे पहले ही आसिफ की वापसी मो.अली जिन्ना के ड्रायवर की हैसियत से होती है.

इधर माउंटबेटन मो. अली जिन्ना, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू आदि से मिलना शुरू करते हैं. वह चाहते हैं कि देश को आजादी बिना बंटवारे के मिल जाए. पर एक दिन माउंटबेटन को अहसास होता है कि बिना बंटवारे के मो.अली जिन्ना नहीं मानेंगे. उसी बीच पूरे देश में हिंदू मुस्लिम दंगे भड़क उठते हैं, जिन्हें शांत करने में अंग्रेज फौज असफल रहती है और फिर पूरी फिल्म में यह दिखाया गया है कि किस तरह देश का बंटवारा होता है. लार्ड माउंटबेटन व उनकी पत्नी खुद को अपने ही देश के शासकों द्वारा ठगा हुआ महसूस करते हैं. फिर लार्ड माउंटबेटन अपनी पत्नी व बेटी के संग मिलकर किस तरह दंगा पीड़ितों की मदद के लिए तत्पर नजर आते हैं. इसी दंगे की चपेट में आसिफ के कहने पर पिता के साथ लाहौर जा रही आलिया आती है. अंततः आलिया व जीत सिंह का मिलन होता है.

लार्ड माउंटबेटन को सही ठहराने वाली यह फिल्म इतिहास के जानकारों के  अलावा आम दर्शकों में भी रोमांच पैदा करती है. पर इतिहास की सच्चाई पर इतिहाकारों की अपनी राय हो सकती है. फिल्मकार ने 1947 के माहौल को फिल्म में बहुत सुंदर तरीके से गढ़ा है. फिल्म की पटकथा में बहुत बारीकी से काम किया गया है. पटकथा इस तरह से बुनी गयी है कि फिल्म अंत तक दर्शक को बांधकर रखती है. यह पटकथा लेखन का ही कमाल है कि आलिया व जीत की प्रेम कहानी कहीं भी देश की आजादी व बंटवारे के दर्द के बीच में नहीं आती है. दोनों समानांतर चलती हैं. पर लार्ड माउंटबेटन व उनकी पत्नी के रिश्तों को ठीक से उकेरने की जरुरत थी.

इसी तरह हालात की वजह से उपज रही पीड़ा ठीक से उभर नहीं पाती है. फिल्म के कुछ सीन अस्वाभाविक से लगते हैं. देश को आजाद करने व बंटवारे को लेकर सारे घटनाक्रम ठीक से चलते हैं, पर इसका निर्णय सुनाने व अमल में लाने की इतनी जल्दबाजी की गयी कि फिल्म थोड़ी सी लड़खडा जाती है. यदि फिल्मकार इसे सही ढंग से समेटने का प्रयास करता, तो शायद फिल्म की लंबाई थोड़ी सी बढ़ जाती, पर वह बेहतर होता. फिल्म के संवाद काफी बेहतर बन पड़े हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो आलिया के किरदार में हुमा कुरेशी और जीत सिंह के किरदार में मनीष दयाल उभर कर आते हैं. दोनों ही कलाकार प्रेम, प्रेम से दूर होने, देश के बंटवारे के दर्द को भी अपनी आंखों व चेहरे के भावों से इस तरह पेश किया है कि आम दर्शक के दिलों तक अपनी पीड़ा पहुंचा देते हैं. आसिफ की सलाह पर जीत सिंह से दूर लाहौर अपने पिता के साथ जाते समय जिस तरह से आलिया के आंसू निकलते हैं, वह अपने आप प्यार के टूटने व देश के बंटवारे के दर्द को लेकर बहुत कुछ कह जाता है. बालीवुड के फिल्मकार इसे इतना मैलोड्रामैटिक बना देते कि वह दर्द दर्शकों के दिलों को न छू पाता. लार्ड माउंटबेटन के किरदार में हुग बेन्नेविले भी जमे हैं. ओम पुरी, डेंजिल स्मिथ, नीरज कावी ने भी अच्छा काम किया है.

एक घंटा 46 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘पार्टीशनः 1947’ की लेखक व निर्देशक गुरींदर चढ्ढा, कैमरामैन बेन स्मिथहार्ड व कलाकार हैं-स्व.ओम पुरी, हुमा कुरेशी, मनीष दयाल, हुग बेनेवले, गिलियान एंडरसन, नीरज कावी व अन्य.

ये है वो जगह जहां हुई गेम औफ थ्रोन्स सीजन 7 की शूटिंग

दुनियाभर में मशहूर टीवी सीरीज गेम औफ थ्रोन्स का जब भी नई कोई नया एपिसोड आता है तो उसके लिए लोगों का क्रेज देखते ही बनता है. अभी कुछ दिन पहले इसका सातवां सीजन सामने आया है. लोग इस सीजन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. इसकी कहानी के बारे में काफी कुछ कयास लगाये जा रहे थे, लेकिन गेम औफ थ्रोन्स का हर एपिसोड काफी मजेदार, रहस्यमयी और रोमांचक रहा है.

जब हम इसके एपिसोड देखते हैं तो उनमें हमें कई अच्छे और आकर्षक लोकेशन नजर आते हैं. हर बार की तरह इस बार भी 7वें सीजन के लिए ऐसी ही कुछ जगहों पर शूटिंग की गई. इस बार बिल्कुल नई लोकेशन को इसके लिए चुना गया था. इस सीजन के कुछ सीन की शूटिंग स्पेन के कुछ हिस्से मे की गई.

इस बार इस शो के 7वें सीजन का प्रौडक्शन उन जगहों पर किया गया जहां इस सीरीज का पहला सीजन शूट किया गया था. पिछले साल अगस्त में इस शो के नए सीजन की शूटिंग शुरू हुई थी, जो फरवरी 2017 में जाकर खत्म हुई. बेलफ़ास्ट में शो का स्टूडियो लगाया गया था, लेकिन इसके अलावा स्पेन में भी कुछ लोकेशन पर भी शो को शूट किया गया.

शो की शूटिंग इट्जर्न बीच पर भी हुई है, जो स्पेन के एक समुद्री कस्बे में स्थित है. स्पेन के आइलैंड सेन जुआन डि गेटलगेक्स को भी आप इस सीजन में देख सकते हैं. इस साल की शुरुआत में किट हेरिंगटन को ब्लैक सैंड बीच पर कुछ सीन फिल्माते हुए देखा गया था. यह आइसलैंड के साउथर्न विलेज में स्थित है.

भले ही रुईंस औफ इटैलिका दिखने में एक पुराना खंडहर लगे, लेकिन हर साल यहां हजारों लोग घूमने आते हैं. शो के कुछ सीन्स यहां भी फिल्माए गए, हालांकि उस दौरान इसे लोगों के लिए बंद करवा दिया गया था. काकेरेस (किंग्स लैंडिंग) जहां गेम औफ थ्रोन्स के किंग्स लैंडिंग सीन्स को फिल्माया गया है. इस नए सीजन के लिए भी प्लाजा डि सेंटा मारिया के काकेरेस में कुछ सीन की शूटिंग की गई.

इस टीवी अदाकारा ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से लगाई गुहार

टीवी के चर्चित शो ‘ये हैं मोहब्बतें’ की एक्ट्रेस दिव्यांका त्रिपाठी इन दिनों काफी डरी हुई हैं. दिव्यांका त्रिपाठी ने पिछले साल ही विवेक दहिया से शादी की है. अपने ट्वीट के माध्यम से दिव्यांका देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगा रही हैं. वो कह रही हैं कि स्वच्छता अभियान के तहत इस बलात्कार वाले कचरे को भी खत्म किया जाए.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जिस दिन पूरा मुल्क स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मना रहा था, उस दिन चंडीगढ़ की एक नाबालिग लड़की के साथ जो हुआ, उसे जान कर आपकी रूह कांप जाएगी. चंडीगढ़ में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम से लौट रही 8वीं की मासूम को गन प्वाइंट पर हवस का शिकार बनाया गया था. बच्ची अपने स्कूल से घर लौट रही थी, तभी चंडीगढ़ के सेक्टर 23 के चिल्ड्रेन ट्रैफिक पार्क में बच्ची के साथ रेप किया गया.

इस घटना से दुखी होकर ही दिव्यांका त्रिपाठी ने ये ट्वीट किए. चंडीगढ़ से आई इस खबर को सुनकर दिव्यांका त्रिपाठी बेहद परेशान हो उठीं. दिव्यांका त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश में महिला सुरक्षा पर ध्यान देने की अपील की है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘क्या बेटी बचाओ? अब बेटी को बचाओ?. बेटे की चाहत नहीं,पर अब डरती हूं बेटी पैदा करने से. क्या कहूंगी, क्यूं उसे स्वर्ग से नर्क की दहशत में धकेला

अपने दूसरे ट्वीट पर उन्होंने लिखा, इन महिलाभक्षियों के लिए ऐसी सज़ा गढ़िये कि औरतों को बुरी नज़र से देखने पर भी इनकी रूह कांपे. मुझे आप पर भरोसा है, कुछ कीजिए. हम इन भेड़ियों के डर के साथ नहीं जी सकते हैं.

साउथ अफ्रीका का साथ छोड़ सकते हैं अमला, साइन कर सकते हैं कोलपैक

साउथ अफ्रीकी क्रिकेट को टीम को बड़ा झटका लग सकता है. खबर हैं कि साउथ अफ्रीकी स्टार बल्लेबाज हाशिम अमला जल्द ही कोलपैक डील साईन करने वाले हैं. इससे पहले भी कुछ साउथ अफ्रीकी खिलाड़ी यह डील साइन कर चुके हैं.

साउथ अफ्रीकी समाचार संस्थान के अनुसार 33 वर्षीय अमला को कई इंग्लिश काउंटी ने अप्रोच किया है. लंदन का एक क्लब भी अमला को अपनी टीम का हिस्सा बनाना चाहता है.

हाल ही में रिपोर्ट आई थी कि मोर्ने मॉर्कल भी कोलपैक डील साइन करना चाहते हैं. हालांकी इस बारे मे अब तक कुछ पता नही चल सका है.

अमला ने इससे पहले 2019 मे होने वाले विश्व कप खेलने की इच्छा जताई थी. लेकिन माना जा रहा है कि बीते इंग्लैंड दौरे पर अपने खराब प्रदर्शन के चलते वे अब अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.

खबरें यह भी हैं कि हाल ही में अपने तीसरे बच्चे के पिता बने अमला पारिवारिक कारणों की वजह से भी इस डील को साइन कर सकते हैं.

क्या है कोलपैक डील
स्लोवाकिया के हैंडबौल प्लेयर मार्कस कोलपैक के नाम पर बनी इस डील में गैर-यूरोपीय देशों के नागरिक जिन्होंने यूरोपीय यूनियन के साथ मुक्त व्यापार की संधि साइन की हुई है वे किसी भी यूरोपीय देश में प्रोफेशनल खेल का हिस्सा बन सकते हैं. यही नहीं इसके लिए उन्हें विदेशी खिलाड़ी भी नहीं माना जाएगा. साउथ अफ्रीका ने यूरोपीय यूनियन के साथ ये डील साइन की हुई है.

इससे पहले साउथ अफ्रकी खिलाड़ी हेंडरसन ने सन 2004 मे सबसे पहले इस डील पर साइन किया था.

खेल कारोबारियों को रास नहीं आ रही हौकी इंडिया लीग

खेल कारोबारियों को हौकी इंडिया लीग रास नहीं आ रही है. 5 सत्रों के बाद ही आयोजकों ने हौकी इंडिया लीग के अगले टूर्नामैंट को वर्ष 2019 तक के लिए स्थगित कर दिया.

वैसे तो कहा यह जा रहा है कि पिछले 5 सत्रों की समीक्षा के लिए अगले वर्ष एचआईएल यानी हौकी इंडिया लीग का आयोजन नहीं करने का फैसला लिया गया है. लेकिन सूत्रों का मानना है कि ऐसी बात नहीं है.

दरअसल, कुछ फ्रैंचाइजी ने इस लीग से हाथ खींच लिए क्योंकि उन्हें कोई खास कमाई नहीं हो पा रही थी. अब हौकी इंडिया लीग का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है.

हालांकि एचआईएल के चेयरमैन और हौकी इंडिया के महासचिव मोहम्मद अश्ताक अहमद ने कहा है कि 5 साल तक हौकी इंडिया लीग के सफल आयोजन के बाद इस लीग की समीक्षा और इस की सफलता के आकलन का समय है. अभी इसे अस्थायी तौर पर रोका गया है और हाकी इंडिया लीग वर्ष 2019 में वापसी करेगी.

पिछले कुछ वर्षों से हौकी में भारत का परफौर्मैंस काफी अच्छा रहा है और धीरेधीरे हौकी इंडिया के दिन अच्छे नजर आ रहे थे. खिलाडि़यों को भी इस बात से उन की संतुष्टि थी कि हौकी इंडिया लीग से आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही थी पर वर्ष 2018 में टूर्नामैंट के रद्द हो जाने से खिलाडि़यों के लिए तो कम से कम अच्छी खबर नहीं है.

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