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भारत-आस्ट्रेलिया टी-20 : आस्ट्रेलिया की हो सकती है लगातार सातवीं हार

आस्ट्रेलिया को एक दिवसीय क्रिकेट श्रृंखला में 4-1 से धूल चटाने के बाद भारतीय टीम तीन मैचों की टी-20 श्रृंखला का आगाज रांची के जेएससीए स्टेडियम में करेगी. एक दिवसीय श्रृंखला के बाद विराट सेना की नजरें टी-20 सीरीज जीतने पर भी होगी.

टी-20 फार्मेट में आस्ट्रेलिया के खिलाफ टीम इंडिया का रिकार्ड बहुत शानदार है. आस्ट्रेलिया और भारत के बीच अब तक कुल 13 टी-20 मैच खेले गए हैं, जिनमें से 9 मैचों में भारतीय टीम ने बाजी मारी है, वहीं आस्ट्रेलिया ने सिर्फ 4 मैच ही जीते हैं. आखिरी बार दोनों टीमें वर्ल्ड टी-20 2016 में आमने-सामने हुई थी.

टी-20 श्रृंखला में आस्ट्रेलियाई टीम वनडे में खोयी हुई प्रतिष्ठा हासिल करने की पूरी कोशिश करेगी. वहीं भारतीय टीम ये साबित करना चाहेगी कि वो खेल के हर प्रारूप में मेहमानों पर भारी है. दोनों देशों के बीच टी-20 की भिड़ंत शुरू हो इससे पहले देखते हैं कि अब तक दोनों टीमों का आपसी रिकार्ड क्या रहा है.

भारत और आस्ट्रेलिया अब तक 13 अंतरराष्ट्रीय टी-20 मैच खेल चुके हैं. इनमें से नौ मैच भारत ने जीते और चार आस्ट्रेलिया ने. अगर बात दोनों देशों के बीच भारत में हुए टी-20 मैचों की बात करें तो रिकार्ड पूरी तरह भारत के पक्ष में है. भारत ने अपने घरेलू मैदान पर आस्ट्रेलिया से तीन टी-20 खेले हैं और तीनों ही जीते हैं.

वहीं दोनों देशों के बीच आस्ट्रेलिया में हुए टी-20 की बात करें तो भी पलड़ा भारत का ही भारी है. आस्ट्रेलिया में दोनों देशों के बीच कुल छह टी-20 मैच हुए हैं जिनमें से चार मैच भारत जीता और दो मैच आस्ट्रेलिया ने. अगर बात दोनों देशों के बीच न भारत, न ही आस्ट्रेलिया में हुए टी-20 मैचों की करें तो दोनों टीमों का पलड़ा बराबर है. दोनों देशों के बीच तटस्थ मैदानों पर (यानी भारत या आस्ट्रेलिया को छोड़कर किसी और देश में) हुए चार टी-20 मैचों में दोनों देशों को दो-दो मैचों में जीत मिली है.

टी-20 विश्व कप में दोनों देश अब तक पांच बार आमने सामने हुए हैं. टी-20 विश्व कप में भारत ने आस्ट्रेलिया को तीन बार हराया है. वहीं दो बार उसे आस्ट्रेलिया से मात खानी पड़ी है. दोनों देशों के बीच आखिरी टी-20 मार्च 2016 में हुआ था जिसमें भारत को जीत मिली थी.

आपको बता दें कि भारत ने दोनों देशों के बीच हुए पिछले छह टी-20 मैचों में आस्ट्रेलिया को हराया है. यानी रांची में जब आस्ट्रेलियाई टीम मौजूदा सीरीज का पहला टी-20 खेलने उतरेगी तो उस पर हार का ये सिलसिला तोड़ने का अतिरिक्त दबाव होगा.

आस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत की लगातार जीत का सिलसिला

  1. 10 अक्टूबर 2013, राजकोट, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 6 विकेट से जीता
  2. 30 मार्च 2014, ढाका, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 73 रनों से जीता
  3. 26 जनवरी 2016, एडिलेड, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 37 रनों से जीता
  4. 29 जनवरी 2016, मेलबर्न, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 27 रनों से जीता
  5. 31 जनवरी 2016, सिडनी, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 7 विकेट से जीता
  6. 27 मार्च 2016, मोहाली, बनाम आस्ट्रेलिया, भारत 6 विकेट से जीता

शेफ : पिता पुत्र के रिश्ते को रेखांकित करती बेहतरीन फिल्म

काम, प्यार और रिश्तों को रेखांकित करने वाली फिल्म ‘‘शेफ’’ मूलतः 2014 की सफलतम अमरीकन फिल्म ‘‘शेफ’’ का भारतीयकरण है. फिल्मकार ने इस फिल्म में पिता व पुत्र के रिश्ते को बेहतर तरीके से उकेरा है. इसी के साथ यह फिल्म इंसान के अंदरुनी अंतद्वंद का बेहतर चित्रण करती है.

फिल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले युवक रोशन कालरा (सैफ अली) की है, जिसे बचपन से ही खाना बनाने का शौक रहा है. उसके अपने कुछ सपने हैं. वह मषहूर शेफ बनना चाहता है, पर यह बात रोशन कालरा के पिता (रामगोपाल बजाज) को पसंद नहीं है. इसी के चलते एक दिन वह घर से भागकर चांदनी चौक में छोले भठूरे बनाने वाले राम लाल के पास जाता है, पर वह उसे समझकर घर जाने के लिए कहते हैं.

वह रामलाल चाचा को मना नहीं कर पाता, पर भागकर अमृतसर चला जाता है. वहां एक ढाबे में रहकर खाना बनाना सीखता है और फिर एक दिन वह अमरीका के गली किचन का मशहूर शेफ बन जाता हैं. इस बीच उसने एक मशहूर नृत्यांगना राधा मेनन (पद्मप्रिया जानकी रमन) से पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी की. जिससे उसका एक बेटा अरमान (मास्टर स्वर कांबले) है. पर बहुत जल्द तलाक हो जाता है. अब राधा कोचीन में रहती है.

फिल्म शुरू होती है अमरीका के न्यूयार्क शहर के गली किचन से. जहां एक ग्राहक रोशन कालरा को बुलाकर कहता है कि वह कैसा शेफ है, उसे उनका खाना पसंद नहीं आया. इसी बात पर बहस हो जाती है. गुस्से में रोशन कालरा उस ग्राहक की नाक तोड़ देते हैं. रोशन को पुलिस पकड़कर ले जाती है. गली किचन के मालिक उसे छुड़ाकर लाते हैं. पर उसे नौकरी से निकाल देते हैं.

उसी वक्त राधा, रोशन को फोन करके कहती है कि वह बेटे अरमान से बात कर ले. अरमान अपने पिता से अपने स्कूल में अपने पहले नृत्य के कार्यक्रम को देखने के लिए बुलाता है, पर व्यस्तता का बहाना कर रोशन उसे मना कर देता है. मगर गली किचन में उसकी सहायक रही विन्नी (शोभिता धुलीपाला) के समझाने पर वह प्लेन पकड़कर न्यूयार्क से कोचीन पहुंचता है. बेटा अरमान खुश हो जाता है. एक दिन अरमान के साथ वह बीजू (मिलिंद सोमण) की बोट पर पूरे दिन का आनंद लेता है और उसे अहसास होता है कि उसकी पूर्व पत्नी राधा अब बीजू से शादी करने वाली है.

उधर कुछ दिन के लिए राधा को नृत्य के शो के लिए यूरोप जाना है, तो वह चाहती है कि अरमान के साथ रोशन रहे. उस वक्त रोषन, अरमान के साथ दिल्ली और अमृतसर जाता है तथा उसे अपने बचपन की कहानी सुनाता है. यूरोप से वापस आने के बाद एक दिन बीजू, रोशन को अपने घर बुलाकर उसके सामने अपनी दो मंजिला बस में चलता फिरता होटल खोलने का प्रस्ताव रखता है, जिसे रोशन ठुकरा देता है. इस बात पर राधा से उसकी कहा सुनी होती है.

अंत में रोशन, बीजू के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है. रोशन उस बस को रंग कर होटल के अनुरूप ढालता है. इसी बीच गली किचन में उसे गुरू मानने वाला उसका दोस्त भी वापस आ जाता है. रोशन इस बस को लेकर कोचीन से गोवा होते हुए दिल्ली पहुंचते है. रोशन के साथ उनका दोस्त व बेटा अरमान भी है. दिल्ली में रामलाल चाचा के साथ रोशन के पिता भी आते हैं और रोशन को माफ कर देते हैं. दिल्ली पहुंचते ही एक तरफ अरमान को वापस कोचीन जाना है, क्योंकि उसका स्कूल खुलने वाला है, इसलिए उसे लेने राधा आती है, तो वहीं रोशन को एक अमरीकन होटल में शेफ की नौकरी का आफर आता है. पर बेटे अरमान के प्यार और अरमान के साथ सदैव रहने के लिए रोशन अमरीका की नौकरी का आफर ठुकरा देता है. फिर रोशन बेटे अरमान व पूर्व पत्नी राधा के साथ रहते हुए अपने रास्ता होटल को जारी रखते हैं.

साधारण कहानी में पिता पुत्र के रिश्ते व वैवाहिक संबंधों के बिखरने पर अच्छा संदेश भी है. रोजमर्रा की जिंदगी में काम और निजी जिंदगी को लेकर यह फिल्म सोचने पर मजबूर करती है. मगर पटकथा के स्तर पर काफी गड़बड़ियां है. फिल्म का क्लायमेक्स भी अच्छे ढंग से नहीं लिखा गया. फिल्म में आम मसाला प्रेम कहानी नहीं है. कोचीन में राधा के घर पर मजदूर यूनियन का पूरा सीन जबरन ठूंसा हुआ और बेमानी है. एडीटिंग टेबल पर फिल्म को कसने की काफी जरुरत थी.

राधा मलयाली है, इसलिए फिल्म में मलयाली संवाद भी रखे गए हैं. यदि ऐसा न होता, तो भी फिल्म की गुणवत्ता पर फर्क नहीं पड़ता. फिल्म में रोशन कालरा को महान शेफ बताया गया है, मगर इस तरह के सीन चित्रित नही हो पाए. रोशन कालरा को बार बार पास्ता या पिजा बनाते हुए ही दिखाया गया है. वैसे फिल्म में रंग, स्वाद, खाना पकाने के आनंद की संवेदनशीलता का चित्रण है. कुछ कमियों के बावजूद यह दिल को छू लेने वाली और देखने लायक फिल्म है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक 40 साल के तलाकशुदा शेफ, जो अहसास करता है कि वह अच्छा पिता नहीं बन पाया और फिर एक अच्छा पिता बनने के प्रयास वाले रोशन कालरा के किरदार में सैफ अली खान ने काफी अच्छी परफार्मेंस दी है. रोशन कालरा के बेटे के किरदार में स्वर कांबले ने भी जबरदस्त अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया है. पद्मप्रिया जानकी रमण की मुस्कान तो दर्शकों को अपना बना लेती है. वह फिल्म में काफी सुंदर और आर्गेनिक लगी हैं. छोटे से किरदार में मिलिंद सोमण और चंदन राय सान्याल भी जमे हैं.

फिल्म में केरल की खूबसूरती को भी बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया गया है. तो वहीं अमृतसर व दिल्ली की लोकेशन भी अच्छी है.

दो घंटे 12 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘शेफ’’ का निर्माण भूषण कुमार, किशन कुमार, राजा कृष्ण मेनन, विक्रम मल्होत्रा व जननी रवि चंद्रन ने किया है. फिल्म के निर्देशक राजा कृष्ण मेनन, लेखक रितेश शाह, सुरेश नायर व राजा कृष्ण मेनन, संगीतकार रघु दीक्षित व अमाल मलिक, कैमरामैन प्रिया सेठ व कलाकार हैं-सैफ अली, राम गोपाल बजाज, शोभिता धुली पाला, मास्टर स्वर कांबले, पद्मप्रिया जानकी रमन, चंदन राय सान्याल, दिनेश प्रभाकर, नेहा सक्सेना, पवन चोपड़ा व अन्य.

विक्टोरिया एंड अब्दुल : सत्य घटनाक्रमों का बेहतरीन सिनेमायीकरण

इतिहास के पन्नों को सिनेमा के परदे पर उतारना आसान नहीं होता है. मगर ब्रिटिश फिल्मकार स्टीफन फ्रेअर्स की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इतिहास के एक अध्याय को बहुत बेहतर तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा है. कहानी 1887 से 1909 के बीच की है, जब ब्रिटिशों का भारत में शासन था.

फिल्म की कहानी भारत में आगरा से शुरू होती है. आगरा में रहने वाला एक मुस्लिम युवक अब्दुल करीम (अली फजल) ब्रिटिश शासन में आगरा की जेल में कैदियों का रजिस्टर में नाम लिखने का काम करता है. उसके काम से प्रभावित होकर लंदन में ब्रिटिश रानी विक्टोरिया (जूडी डेंच) को मोहर देने के काम के लिए भेजा जाता है. वहां अब्दुल मोहर देने के बाद रानी से कहता है, ‘‘जिंदगी कारपेट की तरह है. हम भारत में इसे बुनकर एक नया पैटर्न देते हैं.’’ इससे रानी, अब्दुल से प्रभावित होकर अपना निजी सहायक बना लेती है, फिर उसे अपना मुंशी बनाकर उससे उर्दू सीखने लगती है. इससे पूरा बैकिंघम पैलेस नाराज हो जाता है. सभी लोग अब्दुल के खिलाफ साजिश रचना शुरू करते हैं. जबकि रानी, अब्दुल की बात से प्रभावित होकर बैकिंघम पैलेस के ही अंदर एक भारतीय दरबार हाल बनवाती है. अब्दुल करीम को भारत भेजकर उसके परिवार को वहां रहने के लिए बुलाती है.

कहानी में कुछ उतार चढ़ाव भी आते हैं. एक बार रानी, अब्दुल से लंदन छोड़ने के लिए कह देती है, पैलेस के लोग खुश होते हैं, पर फिर रानी, अब्दुल को रोक लेती है. अपने बीमार होने और जीवन के अंतिम पलों में यहां तक की अब्दुल को बगल में खड़ा कर ही विक्टोरिया इस संसार से विदा लेती है. 1904 मे विक्टोरिया की मौत के साथ ही अब्दुल को लंदन से आगरा, भारत वापस आना पड़ता है ओर 1909 में अब्दुल की आगरा में मौत होती है.

फिल्म में इस बात का बेहतर तरीके से रेखांकन किया गया है कि उस वक्त विक्टोरिया रंगभेद से दूर थी. पटकथा लेखक ली हाल्स ने सत्य कथा को अच्छे ढंग से ड्रामा के रूप में पेश किया है. फिल्म में नाटकीय घटनाक्रमों के बीच कुछ हास्य के दृष्य भी पिरोए गए हैं. पर सत्य घटनाक्रमों को कहानी में ज्यादा महत्व दिया गया है, जो कि दर्शक को काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता है. 1887 से 1904 के माहौल का फिल्म में सही ढंग से चित्रण है पर निर्देशक के तौर पर कुछ जगह स्टीफन फ्रेअर्स मात खा गए हैं. जहां तक गीत संगीत का मसला है, तो कुछ भी नया नहीं है.

अभिनेत्री जुडी डेंच महान अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है. इस फिल्म में विक्टोरिया के किरदार को निभाते हुए उन्होंने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. जिस तरह से भावनात्मक अभिनय किया है, उसे देखकर दर्शक बार बार उन्हें देखने की प्यास लिए ही सिनेमा घर से बाहर निकलते हैं. अब्दुल के किरदार में बड़ा भावुक अभिनय अली फजल ने किया है. फिल्म के कई दृश्यों में सिर्फ जूडी डेंच और अली फजल होते हैं और हर दृश्य में कमाल का अभिनय अली फजल ने किया है. वह एक भी दृश्य में जूडी डेंच के सामने कमजोर नहीं पड़ते हैं. अदील अख्तर ने भी अपनी उपस्थिति अच्छे ढंग से दर्ज करायी है.

एक घंटे 52 मिनट की फिल्म ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ का निर्माण बीबीसी, ‘वर्किंग टाइटल फिल्मस’ और युनिवर्सल कंपनी ने किया है. फिल्म के निर्माता हैं बीबन क्रिडन, एरिक फेलनर, टिम बिवान और टै्सी सीर्वाड. फिल्म की कहानी श्राबनी बसु के उपन्यास ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ पर आधारित है. पटकथा लेखक ली हाल, संगीतकार थौमस न्यूमन, कैमरामैन डैनी कोहेन हैं तथा कलाकार हैं- जूडी डेंच, अली फजल, अदील अख्तर, एड्डी इजार्ड, टिम पिगौट स्मिथ, सिमौन कौलौ, मिचैल गैम्बोन, जुलियन वधम, जोनाथन हार्डेन और अन्य.

यौन संबंध पर लड़कियों को है बोल्डनैस की जरूरत

गुरमीतराम रहीम सिंह को एक लड़की से लगातार बलात्कार करने पर 20 साल की सजा सुनाई गई है. इस लड़की ने 2002 में एक पत्र लिख कर अधिकारियों, प्रधानमंत्री आदि से गुमनाम शिकायत की थी. उच्च न्यायालय के आदेश पर केंद्रीय जांच ब्यूरो ने उस लड़की को भी खोज लिया और दूसरी अन्य लड़कियों को भी खोज लिया जिन्हें राम रहीम ने बलात्कार का शिकार बनाया था.

लड़कियों का बलात्कार जबरन रात को उठा ले जा कर नहीं किया गया था बल्कि बाबा से माफी मांगने के लिए इन के मातापिता खुद रातरात भर के लिए उन्हें यहां छोड़ जाते थे. ये लड़कियां यौन संबंधों से उस समय खुश होती थीं या नहीं, यह नहीं कह सकते पर बलपूर्वक संबंध बनाए गए, इस के सुबूत नहीं हैं. बहलाफुसला कर, धोखा दे कर, गलत बात कह कर भी यौन संबंध बनाना बलात्कार ही है. हां, जब ऐसा व्यक्ति बलात्कार करने लगे जो लड़की की निगाह में आदर्श है, तो मामला गंभीर हो जाता है.

लड़कियां इतनी आसानी से यौन संबंध बनाने को तैयार क्यों हो जाती हैं, यह एक पहेली ही रहेगी. गुरमीत सिंह ही नहीं, सभी धर्मों के स्वामियों के इर्दगिर्द लड़कियां मंडराती रहती हैं. वे क्या सुख चाहती हैं और कौन सी तुष्टि उन्हें मिलती है?

यौन संबंध बनाना कोई सीखता नहीं है. यह तो प्रकृति की देन है. इस से बच तो कोई नहीं सकता. अफसोस यह है कि सभ्यता के आने के बाद अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज ने लड़कियों पर डाल दी है. अगर वे एक पुरुष का संरक्षण चाहती हैं तो वे खुद एक पुरुष के खूंटे में बंध कर रहें और वह पुरुष, चाहे जितनी कुंआरियों या विवाहिताओं, विधवाओं के साथ संबंध बनाता रहे.

बलात्कार के बारे में लड़कियों को यही शिक्षा दी जाती है कि एक बार कुछ हो गया तो मुंह दिखाने मत आना. इसीलिए यौन संबंध चाहे प्रेम, भक्ति, आत्मसमर्पण, यौनसुख के लिए स्थापित हुए हों या जबरन, लड़कियां इस बारे में घर में चर्चा नहीं करतीं. वे इस बात को छिपाती हैं, क्योंकि समाज के नियमों से बंधे मातापिता सह नहीं पाएंगे.

यह सीख बलात्कार या विवाहपूर्व यौन संबंध को बढ़ावा ही देती है जिस में नुकसान लड़कियों का ही होता है. 21वीं सदी में औरतें आज उसी तरह वर्जिनिटी से सच्चरित्र मानी जाती हैं जैसी 2,500 वर्ष पूर्व. बलात्कार हुआ, इस बात को लड़की अगर अगली सुबह या जब मरजी चाहे खुल कर कह सके तो पुरुषों में इतना बल नहीं रहेगा कि वे लड़कियों को जबरन या फुसला कर बिस्तर तक ले जाएं.

राम रहीम नाम रख कर कोई दूध का धुला नहीं हो जाता, इस बलात्कार के मामले ने यह एक बार और साबित कर दिया है. यह लड़कियों पर है कि वे हिम्मत रखें और यौन संबंध सहर्ष स्वीकारें चाहे वह इच्छा से स्थापित हुए हों या अनिच्छा से.

पाकिस्तानी ने भारतीय युवती से किया जबरन निकाह

दिल्ली की रहने वाली 20 वर्षीया उजमा घूमने के लिए मलेशिया गई थी. वहीं पर उस की मुलाकात ताहिर से हुई. ताहिर मूलरूप से पाकिस्तान का रहने वाला था और वह भी टूरिस्ट वीजा पर वहां घूमने गया था. दोनों एक ही मजहब के थे. साथसाथ घूमने से दोनों के बीच दोस्ती हो गई. इसी दौरान दोनों ने एकदूसरे को जाना, समझा. बाद में दोनों अपनेअपने वतन लौट गए. उजमा और ताहिर अपनेअपने घर लौट जरूर गए थे लेकिन उन के दिल एकदूसरे के लिए धड़कने लगे थे. लिहाजा दोनों फोन पर एकदूसरे से अपने दिल की बातें करने लगे.

शारीरिक रूप से दोनों भले ही दूरदूर रह रहे थे, लेकिन उन के बीच होने वाली बातें उन्हें मानसिक रूप से नजदीक ला रही थीं. उन के बीच का आकर्षण उन्हें साथसाथ रहने के लिए उकसा रहा था. उन का मन चाहता था कि वे सरहद को लांघ कर जिस्मानी रूप से भी नजदीक पहुंच जाएं. दोनों जवां दिलों के अंदर आत्मीयता के बीज से जो पौधा उपजा, वह प्यार के रूप में सामने आया.

उजमा और ताहिर के प्यार का पौधा दिनोंदिन बढ़ कर और मजबूत हो रहा था. दूरी नाकाबिलेबरदाश्त लगने लगी थी. फलस्वरूप दोनों ने निकाह करने का फैसला ले लिया. ताहिर ने उजमा को भरोसा दिया कि वह हिंदुस्तान से किसी बहाने पाकिस्तान आ जाए तो वह उस से निकाह कर लेगा और हमेशा अपने साथ रखेगा. उजमा हर हालत में ताहिर के नजदीक पहुंचना चाहती थी, इसलिए वह उस की बात पर राजी हो गई.

इस के बाद उजमा पाकिस्तान जाने की योजना बनाने लगी. चूंकि उसे वहां जाने के लिए वीजा की जरूरत थी, इसलिए उस ने पाकिस्तान में रह रहे अपने रिश्तेदारों से मिलने की बात कह कर वीजा ले लिया. जब वह वाघा बौर्डर के रास्ते पाकिस्तान पहुंची तो ताहिर उसे लेने पहुंच गया. ताहिर ने उस का बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत किया. कुछ देर के लिए दोनों इस तरह से गले मिल कर चिपके रहे जैसे बरसों से बिछुड़े हुए हों. मिल कर दोनों के दिलों को बड़ी तसल्ली मिली. इस के बाद 3 मई को उन्होंने निकाह कर लिया.

निकाह के बाद ताहिर जब उजमा को साथ ले कर अपने घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख कर उजमा के होश उड़ गए क्योंकि जिस ताहिर से उस ने शादी की थी, घर पर उस की पत्नी और बच्चे मौजूद थे. यानी ताहिर शादीशुदा ही नहीं बल्कि 4 बच्चों का पिता निकला. जबकि उस ने खुद को अविवाहित बताया था.

उजमा को लगा कि उस के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है. उस ने ताहिर से शिकायत की तो वह उस से झगड़ने लगा. उजमा का कहना है कि ताहिर ने ही नहीं बल्कि उस के घर वालों ने भी उस के साथ गालीगलौज और मारपीट की. इतना ही नहीं, उन लोगों ने उस का पासपोर्ट व अन्य दस्तावेज भी अपने पास रख लिए.

उजमा किसी तरह पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग पहुंची और अपनी आपबीती बताई. उजमा जब ताहिर के घर से चली गई तो ताहिर ने कोर्ट की शरण ली. कोर्ट ने भारतीय राजनयिक को कोर्ट में बुलाया. उजमा भी कोर्ट में पहुंची.

कोर्ट के सामने उस ने कहा कि ताहिर ने बंदूक की नोक पर उस से जबरन निकाह किया. उस ने खुद को कोर्ट की पेशी से छूट और यात्रा दस्तावेजों की प्रति मुहैया कराने की भी मांग की. जबकि ताहिर ने कोर्ट में अर्जी लगा कर बतौर पत्नी उजमा को भारत जाने से रोकने की मांग की थी. सुनवाई के दौरान कोर्ट में भारतीय राजनयिक पीयूष सिंह ने वकील के माध्यम से उजमा का पक्ष रखा. इस के बाद जब 24 मई को इस मामले की सुनवाई हुई तो पाकिस्तानी अदालत ने उजमा को भारत भेजने का आदेश दिया.

कोर्ट के आदेश के बाद पाकिस्तान के अधिकारियों ने उजमा को वाघा बौर्डर पर भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया. उजमा अपने घर तो आ गई, लेकिन अपने इस अनुभव को शायद ही कभी भूल पाए.

इस लड़की के एक आइडिया ने बदल दी तस्वीर

अब कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं की भागीदारी न हो. अनेक महिलाओं ने तो कई क्षेत्रों में अपनी मेहनत के बूते पर इतनी बड़ी सफलता पा ली है कि वह औरों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई हैं. उन्हीं में से एक हैं सुचि मुखर्जी. मुखर्जी एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने खुद की काबिलियत के दम पर एक ऐसी कंपनी खड़ी कर दी, जिस का सालाना टर्नओवर अरबों रुपए है.

लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से मैथ्स और इकोनोमिक्स में बीए करने के बाद सुचि ने लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से फाइनैंस में मास्टर डिग्री ली. पढ़ाई पूरी करने के बाद सुचि ने लेहमन ब्रदर्स कंपनी से अपने कैरियर की शुरुआत की. सीनियर एसोसिएट के पद पर उन की पहली नौकरी लगी. यहां इन्होंने टेलीकाम मीडिया टैक्नोलौजी और फाइनेंस इंस्टीट्यूशन पर अपना फोकस किया.

लेहमन ब्रदर्स कंपनी में 5 साल से अधिक नौकरी करने के बाद उन्होंने बर्जिन मीडिया कंपनी जौइन की. सुचि नौकरी कर जरूर रही थीं, लेकिन उन की उड़ान का क्षेत्र कोई दूसरा ही था. वह नौकरी के बजाए अपना ही कोई बिजनैस करना चाहती थीं.

जब वह फुरसत में होती थीं तो यही सोचती थीं कि कौन सा बिजनैस शुरू किया जाए. बहरहल इस कंपनी में 2 साल नौकरी करने के बाद उन्होंने औनलाइन वीडियो काल्स एप्लीकेशन स्काइप और ई-कौमर्स कंपनी ईबे में भी अपनी सेवाएं दीं.

सुचि के अंदर बेहतरीन कार्यक्षमता थी. अपनी लीडरशिप स्किल के बलबूते ही उन्होंने विज्ञापन पोर्टल गुमटूर को सूबे का सब से सफल पोर्टल बना दिया था.

एक दिन सुचि लंदन में एक मैगजीन पढ़ रही थीं. उस मैगजीन में उन्होंने एक ज्वैलरी की फोटो देखी. वह ज्वैलरी उन्हें पसंद आ गई. वह उसे खरीदना चाहती थीं. लेकिन इस में समस्या यह थी कि वह ज्वैलरी मुंबई (भारत) की छोटी दुकानों पर उपलब्ध थी. वह उस समय मुंबई से काफी दूर थीं, वहां से उस ज्वैलरी को खरीदना उन के लिए असंभव था. इस वाकए ने सुचि के अंदर एक विचार पैदा किया.

उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा प्लेटफार्म बनाया जाए, जहां पर महिलाओं की लाइफस्टाइल से संबंधित सभी प्रोडक्ट्स हों और वह प्रोडक्ट किसी महिला की डिमांड पर उस के घर पहुंचाए जा सकें. उन की योजना भारत के मंझले और छोटे कारोबारियों को एक डिजिटल मंच पर लाने की थी. इसी विचार के लिए वह भारत लौट आईं.

भारत आते ही उन्होंने सब से पहले रिलाइंस हाइपरलिंक में सप्लाई चेन के हैड अंकुर मेहरा से मुलाकात की. उन से उन्होंने बिजनैस में आने वाली संभावित प्रौब्लम्स के बारे में समझा. स्टार्टअप के संबंध में फेसबुक और माइक्रोसौफ्ट में काम कर चुके प्रशांत मलिक से बात की. इस के बाद पूरी प्लानिंग के साथ उन्होंने ‘लाइमरोड डौट काम शौपिंग पोर्टल’ की शुरुआत कर दी.

2 बच्चों की मां सुचि मुखर्जी इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि देश दुनिया में महिलाओं को किस तरह के प्रोडक्ट पसंद हैं. इस तरह उन्होंने अपने पोर्टल पर महिलाओं की लाइफस्टाइल से जुड़े तमाम प्रोडक्ट डाल दिए. कुछ ही दिनों में यह पोर्टल महिलाओं द्वारा बहुत ज्यादा पसंद किया जाने लगा. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब लाइमरोड एप की पहुंच 400 मिलियन से अधिक स्मार्टफोनों तक हो चुकी है, जिस में 30-35 प्रतिशत तक महिलाएं हैं.

अंकुर मेहरा और प्रशांत मलिक इन दिनों लाइमरोड डौट काम के सहसंचालक हैं. इन की कंपनी की प्रसिद्धि इतनी तेजी से बढ़ी है कि कंपनी का सालाना का टर्नओवर अरबों रुपए हो गया है. लाइमरोड डौट काम की सफलता को देखते हुए टाइगर ग्लोबल, लाइटस्पीड वेंचर पार्टनर, मैट्रिक्स पार्टनर इंडिया आदि कंपनियां उसे 50 मिलियन डौलर (330 करोड़ रुपए से अधिक) की फंडिंग कर चुकी हैं.

वास्तव में सुचि मुखर्जी ने अपने हौसले के जरिए इतना बड़ा जो कारोबार स्थापित किया है, वह सराहनीय है. सुचि मुखर्जी आज अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.

नशे की खातिर बेटे ने कर दी बाप की हत्या

केवल सिंह खेत की मेड़ पर बैठे सुस्ता रहे थे, तभी उन के नजदीक आ कर एक लंबी सी कार रुकी. कार से 3 लोग उतरे. उन में एक उन का बेटा जगदीप भी था. उस के साथ आए लोगों ने केवल सिंह के नजदीक आ कर नमस्कार किया तो नमस्कार कर के केवल सिंह ने उन लोगों को सवालिया नजरों से देखा.

दोनों कुछ कहते, उस के पहले ही उन दोनों का परिचय कराते हुए जगदीप सिंह ने कहा, ‘‘बापूजी, यह सिद्धू साहब हैं. इन्हें हमारी जमीन बहुत पसंद है. यह हमें बाजार भाव से कई गुना ज्यादा दाम दे कर हमारी जमीन खरीदना चाहते हैं.’’

जगदीप सिंह की बातें सुन कर केवल सिंह की त्यौरियां चढ़ गईं. उन्होंने बेटे को एक भद्दी सी गाली देते हुए कहा, ‘‘तुझ से किस ने कहा कि मेरी यह जमीन बिक रही है. जब देखो तब तू किसी न किसी को परेशान करने के लिए पकड़ लाता है. जब एक बार कह दिया कि यह हमारे पुरखों की जमीन है, मैं इसे जीतेजी नहीं बेच सकता तो तू क्यों लोगों को परेशान करने के लिए लाता है. अगर आज के बाद फिर कभी किसी को ले कर आया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस के बाद बापबेटे में बहस होने लगी. बापबेटे को झगड़ा करते देख जमीन का सौदा करने आए लोग चुपचाप वहां से खिसक गए. बापबेटे में जमीन को ले कर हुआ यह झगड़ा कोई नया नहीं था.

पंजाब के जिला बरनाला के थाना भदौड़ के गांव मुजूक के रहने वाले पाल सिंह के 3 बेटे थे, केवल सिंह, सुखमिंदर सिंह और मंजीत सिंह. पाल सिंह ने तीनों बेटों की शादियां कर के जीतेजी जमीन को उन में बांट दिया था. तीनों भाई गांव में अलगअलग मकान बना कर अपनेअपने परिवारों के साथ रह रहे थे. तीनों भाई रहते भले अलग थे, लेकिन उन में और उन के परिवारों में काफी मेलजोल था.crime story in hindi

केवल सिंह का एक ही बेटा था जगदीप सिंह. उसे बचपन से ही पहलवानी का शौक था. उन्होंने भी उसे कभी मना नहीं किया. जगदीप के 2 ही काम थे, पढ़ना और पहलवानी करना. युवा होतेहोते वह अच्छाखासा पहलवान बन गया. जिला स्तर पर कुश्तियां जीतने के बाद उस ने राज्य स्तर के पहलवानों को पछाड़ कर अपने नाम का डंका बजाया.

जगदीप शादी लायक हुआ तो केवल सिंह ने अपने एक दोस्त की सुंदर बेटी परमजीत कौर से उस की शादी कर दी. उसी बीच पंजाब में नशे की ऐसी लहर चली कि घरघर नशीली चीजों का उपयोग होने लगा. जगदीप भी इस का शिकार हो गया. फिर तो वह पहलवानी ही नहीं, घरपरिवार को भी भूल कर नशे का गुलाम बन गया.

जगदीप ऐसा नशा करता था, जिस में एक ही बार में 4-5 हजार रुपए खर्च हो जाते थे. जबकि उस के पास इतने रुपए नहीं होते थे. लेकिन नशा तो नशा है, उसे कैसे भी करना था. कुछ दिनों तक तो वह यारदोस्तों और रिश्तेदारों से झूठ बोल कर रुपए उधार ले कर अपना काम चलाता रहा. लेकिन इस तरह कब तक चलता. लोग अपनेअपने पैसे मांगने लगे तो वह मुसीबत में फंस गया.

केवल सिंह ने जब अपने बेटे में बदलाव देखा तो उन्हें चिंता हुई. हर समय खुश रह कर हंसनेहंसाने वाला जगदीप उदास मुंह लटकाए बैठा रहता था. उन्होंने उस की उदासी का कारण पूछते हुए कहा, ‘‘क्या बात है बेटा, आजकल पहलवानी भी बंद है और हर समय चेहरे पर मुर्दानगी छाई रहती है?’’

पिता के इस सवाल पर नशे को ले कर परेशान जगदीप के दिमाग में तुरंत उपाय आ गया. पिता को बेवकूफ बनाते हुए उस ने रोआंसा हो कर कहा, ‘‘बापूजी, बात ही ऐसी है. उदास न होऊं तो क्या खुशियां मनाऊं.’’

‘‘क्यों, क्या बात है?’’

‘‘बापूजी, नैशनल लेवल पर कुश्ती लड़ने के लिए मैट चाहिए, वह मेरे पास नहीं है.’’

‘‘तो उस के लिए क्या करना होगा?’’

‘‘करना क्या होगा, खरीदना पड़ेगा, जिस के लिए 8-10 लाख रुपए की जरूरत पड़ेगी.’’

‘‘तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’ केवल सिंह ने बेटे की बात बीच में ही काट कर कहा, ‘‘तू तैयारी शुरू कर, पैसे की व्यवस्था मैं करता हूं.’’

जगदीप का तीर सही निशाने पर लगा. भावुकता में केवल सिंह ने वादा तो कर लिया, पर इतने रुपयों की व्यवस्था करना उन के लिए आसान नहीं था. फिर भी उन्होंने कुछ घर से, कुछ रिश्तेदारों से तो कुछ जमीन गिरवी रख कर रुपयों का इंतजाम कर दिया.

10 लाख रुपए हाथ में आते ही जगदीप की तो मानो लौटरी लग गई. उस ने पिता से मिले रुपए नशे पर उड़ाने शुरू कर दिए. कुछ ही दिनों में सारे रुपए नशे पर फूंक कर उस ने तमाशा देख लिया. केवल सिंह जब भी मैट के लिए पूछते, वह कहता कि और्डर दे दिया है, जल्दी ही आ जाएगा.crime story in hindi

यह बहाना कब तक चलता. केवल सिंह अनपढ़ जरूर थे, लेकिन नासमझ नहीं थे. जल्दी ही उन्हें असलियत का पता चल गया. बेटे को नशे में डूबा देख कर वह समझ गए कि जगदीप झूठ बोल रहा है. मैट के बहाने उस ने जो रुपए लिए हैं, नशे में उड़ा दिए हैं. फिर तो घर वालों को ही नहीं, लगभग सभी को पता चल गया कि जगदीप पहलवान नशे का आदी हो गया है. अब लोग उस से दूरियां बनाने लगे.

जगदीप के लिए अब रुपए का इंतजाम करना मुश्किल हो गया था. फिर तो नशा न मिलने की वजह से वह गंभीर रूप से बीमार हो गया. केवल सिंह ने लगभग 2 लाख रुपए खर्च कर के उस का इलाज कराया. ठीक होने के बाद एक बार फिर उस ने कारोबार के नाम पर पिता से 8-10 लाख रुपए झटक लिए. इन रुपयों को भी उस ने नशे पर उड़ा दिए.

इस के बाद वह पिता की जमीन बिकवाने के चक्कर में पड़ गया कि वह यहां रह कर नशा नहीं छोड़ सकता, इसलिए उसे विदेश भेजा जाए, ताकि वहां जा कर वह नशा छोड़ कर कोई कामधंधा कर सके. लेकिन 2 बार धोखा खा चुके केवल सिंह को अब जगदीप की बातों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं रह गया था.

जगदीप ही नहीं, उस की पत्नी परमजीत कौर भी केवल सिंह पर दबाव डाल रही थी कि कुछ जमीन बेच कर उसे विदेश भिजवा दें. जबकि केवल सिंह अब उस की कोई भी बात मानने को बिलकुल तैयार नहीं थे. इसी बात को ले कर बापबेटे में आए दिन झगड़ा होता रहता था. इसी रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर केवल सिंह की पत्नी कुलवंत कौर शांति से रहने के लिए गांव में रह रहे अपने देवर सुखमिंदर सिंह के घर चली गई थीं.

3 फरवरी, 2017 को इसी बात को ले कर केवल सिंह और जगदीप के बीच जम कर झगड़ा हुआ. परमजीत कौर ने भी ससुर पर दबाव डालते हुए कहा, ‘‘बापूजी, यह जमीन क्या अपनी छाती पर रख कर ले जाओगे? बेटे की जिंदगी का सवाल है, बेच क्यों नहीं देते थोड़ी जमीन?’’

‘‘तू जमीन की बात कर रही है. मैं मर जाऊंगा, लेकिन इस झूठे धोखेबाज नशेड़ी को एक फूटी कौड़ी नहीं दूंगा.’’ केवल सिंह ने गुस्से में कहा और घर से निकल गए.

उस समय केवल सिंह घर से गए तो फिर लौट कर नहीं आए. इस ओर न जगदीप ने ध्यान दिया, न उस की पत्नी परमजीत कौर ने. क्योंकि ऐसा अकसर होता था. केवल सिंह जब भी नाराज होते थे, घर छोड़ कर अपने दोनों भाइयों में से किसी एक के यहां चले जाते थे. लेकिन इस बार वह न भाइयों के घर गए थे, न खेतों पर.

जब अगले दिन भी केवल सिंह का कुछ पता नहीं चला तो जगदीप उन की तलाश में निकला. इधरउधर तलाश करता हुआ वह शाम को चाचा सुखमिंदर सिंह के घर पहुंचा. उस ने उन से पिता के लापता होने की बात बता कर मां को घर भेजने को कहा. क्योंकि बापबेटों के झगड़ों से तंग आ कर उन दिनों कुलवंत कौर सुखमिंदर सिंह के घर पर ही थीं.

जगदीप की बात सुन कर सुखमिंदर सिंह ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘तू चिंता मत कर पुत्तर, सब ठीक हो जाएगा. तू घर चल, मैं तेरी मां को ले कर आता हूं.’’

सुखमिंदर सिंह उसी समय कुलवंत कौर को उन के घर छोड़ गए. इस के बाद वह जगदीप को साथ ले कर केवल सिंह की तलाश में निकल पड़े. काफी भागदौड़ के बाद भी जब केवल सिंह का कुछ पता नहीं चला तो सुखमिंदर सिंह ने 5 फरवरी को उन की गुमशुदगी थाना भदौड़ में दर्ज करा दी.

केवल सिंह की गिनती गांव के संपन्न किसानों में होती थी. वह सज्जन व्यक्ति थे, इसलिए गांव के सरपंच गोरा सिंह ने गांव वालों के साथ मिल कर केवल सिंह को जल्द से जल्द ढूंढने का पुलिस पर दबाव बनाया.

इस के बाद अधिकारियों के आदेश पर थाना भदौड़ के थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह ने सबइंसपेक्टर बलविंदर सिंह, एएसआई परमजीत सिंह की निगरानी में हैडकांस्टेबल सरबजीत सिंह, पवन कुमार, कांस्टेबल सुखराज सिंह आदि की एक टीम बना कर केवल सिंह की तलाश में लगा दी. पुलिस ने उन की तलाश तेजी से शुरू कर दी.

6 फरवरी, 2017 की सुबह सुखमिंदर सिंह को गांव वालों से पता चला कि जगदीप भूसा ले जाने के लिए ट्रौली खोज रहा है, क्योंकि उस की ट्रौली खराब है. तीनों भाइयों के मकान भले ही अलग थे, पर सभी की जमीन की फसलों का भूसा केवल सिंह के घर से लगे एक बड़े कमरे में रखा जाता था. गांव वालों की बात सुन कर सुखमिंदर को लगा कि जगदीप नशे के जुगाड़ में भूसा बेच रहा होगा. उन्होंने सोचा कि भूसा नहीं रहेगा तो जानवरों को क्या खिलाया जाएगा.

जगदीप भूसा बेचे, उस के पहले ही वह जानवरों के लिए कुछ दिनों का भूसा लेने के लिए जगदीप के घर जा पहुंचे. वह भूसा वाले हालनुमा कमरे से भूसा भरने लगे. अभी वह 3-4 गट्ठर भूसा ही निकाल पाए थे कि अचानक भूसे के ढेर से हाथ में एक इंसानी पैर आ गया.

उन्होंने बेटे और नौकर की मदद से वहां का भूसा हटा कर देखा तो उन्हें वहां एक लाश दबी नजर आई, जिस का एक पैर बाहर निकला था. लाश देख कर उन की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. उन्होंने तुरंत ऊंची आवाज में अपने भतीजे जगदीप को बुलाया. जगदीप आया तो उन्होंने पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

जगदीप भी वहां का दृश्य देख कर हैरान था. उस ने असमंजस की स्थिति में कहा, ‘‘चाचाजी, यह तो किसी की लाश है. आप रुकें, मैं फावड़ा ले कर आता हूं.’’crime story in hindi

यह कह कर जगदीप भूसे वाले कमरे से बाहर चला गया. सुखमिंदर उस लाश को देख कर बारबार यही सोच रहे थे कि पता नहीं यह किस की लाश है, किस ने इसे यहां दबाया है? किसी अनहोनी की आशंका से उन का दिल घबरा रहा था. काफी देर हो गई, जगदीप फावड़ा ले कर नहीं लौटा तो वह बाहर आए. घर के दरवाजे खुले थे. न वहां पर जगदीप था न उस की पत्नी परमजीत कौर.

भाभी कुलवंत कौर एक कमरे में बैठी पाठ कर रही थीं. पलभर में ही सुखमिंदर सिंह को अपने भाई केवल सिंह की गुमशुदगी का रहस्य समझ में आ गया. समझदारी दिखाते हुए उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी मोटरसाइकिल उठाई और सीधे थाना भदौड़ के थानाप्रभारी के पास पहुंचे. उन्हें पूरी बात बताई तो मामले को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने केवल इतना पूछा, ‘‘जगदीप को गए कितना समय हुआ होगा?’’

‘‘लगभग आधा घंटा.’’

सुरेंद्र सिंह ने एएसआई परमजीत सिंह और 2 हवलदारों को लाश की हिफाजत के लिए सुखमिंदर सिंह के साथ भेज कर खुद एक टीम ले कर भदौड़ बसअड्डे की ओर निकल गए.

उन का अनुमान ठीक निकला. जगदीप और परमजीत कौर भागने के लिए एक बस में सवार हो चुके थे. सुरेंद्र सिंह ने उन्हें बस से उतारा और थाने ले आए. इस के बाद वह गांव मुजूक केवल सिंह के घर पहुंचे और अपने सामने उस जगह की खुदाई करवाई.

बरामद लाश देख कर सभी हैरान थे. लाश केवल सिंह की थी, जिसे बड़ी बेरहमी से मार कर भूसे वाले कमरे में दफना दिया गया था. सुरेंद्र सिंह ने लाश का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया और थाने लौट कर दर्ज गुमशुदगी के स्थान पर हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. इसी के साथ ही जगदीप और परमजीत से पूछताछ शुरू कर दी.

जगदीप और परमजीत कौर ने केवल सिंह की हत्या का अपराध तो स्वीकार कर लिया, पर उन्होंने हत्या क्यों की, इस के पीछे बड़ी विचित्र कहानी बताई.

दरअसल, नशा एक ऐसी घातक बीमारी और कलंक है, जिस के सेवन से आदमी की बुद्धि ही नहीं, जमीर भी भ्रष्ट हो जाता है. आदमी इतना खुदगर्ज हो जाता है कि अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए या बचाव के लिए कुछ भी कर सकता है.

जगदीप और परमजीत कौर ने केवल सिंह की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उन्होंने यह हत्या इसलिए की थी, क्योंकि केवल सिंह अपनी बहू परमजीत कौर पर बुरी नजर रखते थे. उस ने अकेले में कई बार परमजीत से छेड़छाड़ की थी.

जगदीप ने आगे बताया कि घटना वाले दिन यानी 3 फरवरी को वह घर पर नहीं था. शाम को जब वह घर आया तो उस ने देखा कि उस के पिता केवल सिंह उस की पत्नी को दबोचे बैड पर लेटे हैं और परमजीत बचाव के लिए चिल्ला रही है.

यह देख कर उसे गुस्सा आ गया और उस ने गंडासे से पिता की हत्या कर दी. लेकिन उस की इस कहानी पर किसी को विश्वास नहीं हुआ.

जब पतिपत्नी पर सख्ती की गई तो उन्होंने सच्चाई उगल दी. जगदीप ने इस बार बताया कि नशे की पूर्ति के लिए वह जमीन बेचना चाहता था. जबकि पिता इस के लिए तैयार नहीं थे. इसीलिए उस ने पिता की हत्या कर दी. हत्या कर लाश उस ने भूसे वाले कमरे में इसलिए दबा दी थी कि मौका मिलने पर वह उसे भूसे के बीच छिपा कर कहीं दूर ले जा कर ठिकाने लगा देगा. लेकिन वह अपने इरादे में कामयाब होता, उस के पहले ही भूसे के चक्कर में उस की पोल खुल गई.

7 फरवरी, 2017 को पुलिस ने पिता के हत्यारे जगदीप सिंह और उस की पत्नी को सक्षम अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर हत्या करने वाला हथियार गंडासा व कस्सी बरामद कर ली. रिमांड अवधि समाप्त होने पर दोनों को पुन: अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया गया.

– पुलिस सूत्रों पर आधारित

सस्ता होम लोन चाहिए तो अपनाएं ये उपाय

देश के ज्यादातर शहरों में प्रौपर्टी की ऊंची कीमतों को देखते हुए घर खरीदना बेहद मुश्किल है. आप में से कई लोगों ने ऐसी स्थिति का सामना किया होगा जब किसी बैंक से पास हुआ होम लोन कम पड़ गई हो. ऐसे में एक सह आवेदक के साथ संयुक्त रूप से लोन के लिए आवेदन करें.

बैंक एक ही घर को खरीदने, कंस्‍ट्रक्‍शन और री-कंस्‍ट्रक्‍शन के लिए परिवार में कमाने वाले दो इंडिविजुअल को एक साथ ज्वाइंट होम लोन देते हैं. ज्वाइंट होम लोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि लोन देते वक्‍त बैंक दोनों की इनकम को ध्‍यान मे रखकर लोन अमाउंट तय करते हैं. इससे आपको इंडिविजुअल के मुकाबले अधिक लोन मिल सकता है. वहीं आपका ईएमआई बोझ दोनों के बीच बंट जाता है. इसके अलावा यह टैक्‍स सेविंग के लिए भी आपके लिए काफी मददगार साबित होता है.

किन रिश्तों में मिलता है ज्वाइंट होमलोन

अगर एक परिवार में दो लोग कमाने वाले हैं तो बैंक दोनों के दस्तावेजों के आधार पर ज्वाइंट होम लोन देता है. इसके तहत पति-पत्नी, पिता पुत्र, पिता-पुत्री, मां-बेटा और मां-बेटी जैसे रिश्तों को ज्वाइंट होमलोन दिया जाता है. लेकिन अधिकांश मामलों में सामाजिक संरचना के मद्देनजर बैंक भाई-बहन को एक साथ लोन नहीं देता.

ज्वाइंट होम लोन के जरिए बचाएं टैक्स

शहर में अधिकतर परिवारों में पति-पत्नी दोनों नौकरीपेशा होते हें. ऐसे में टैक्स सेविंग भी दोनों अलग अलग करते हैं. लेकिन अगर दोनों ज्वाइंट होम लोन के लिए एप्लाई करें तो टैक्स सेविंग का फायदा मिल सकता है. इनकम टैक्स एक्ट 24(बी) के तहत होम लोन के ब्याज पर दो लाख तक छूट क्लेम किया जा सकता है, जबकि इनकम टैक्स एक्ट 80सी के तहत प्रिंसिपल अमाउंट पर 1.5 लाख तक का क्लेम किया जा सकता है.

किन बातों का रखें ख्याल

बैंक लोन देने से पहले आवेदक का सिबिल स्कोर जांचता है. ज्वाइंट होम लोन के लिए आवेदन करने से पहले बैंक दोनों आवेदकों का सिबिल स्कोर देखता है. सिबिल स्कोर अच्छा न होने की स्थिति में लोन मिलने में परेशानी हो सकती है. साथ ही टैक्स छूट पाने के लिए जरूरी है कि दोनों आवेदक ईएमआई का एक साथ भुगतान करें. आपको बता दें कि यदि एक व्यक्ति ईएमआई का भुगतान करता है तो दूसरा आयकर में छूट का दावा नहीं कर सकता है.

ज्वाइंट होम लोन के नुकसान

हर बात की तरह ही ज्वाइंट होम लोन के भी अच्‍छे और बुरे पहलू हैं. अगर आपने किसी के साथ मिलकर होम लोन लिया है और आपका पार्टनर होम लोन का भुगतान नहीं करता या किस्त डिफौल्ट कर देता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी आप पर होगी और आपको आगे होम लोन लेने में परेशानी आ सकती है. इस केस में आप ज्वाइंट होम लोन को सिंगल होम लोन में तब्दील करवा सकते हैं, लेकिन यह करना पूरी तरह से बैंक पर निर्भर करेगा.

जिंदगी पूजापाठ से नहीं चलती, इसलिए समस्याओं के समाधान हवन और पूजा में न ढूंढें

नवरात्रों के अवसर पर निधि के घर में बड़ा धार्मिक माहौल रहता है. वह 9 दिनों तक व्रत रखती है. रोज मंदिर जाती है और नवमी के दिन महाकन्या भोज कराती है. जब मैं ने उस से पूछा कि इतना सब कैसे कर लेती है, तो वह बड़े विश्वास से मुसकराते हुए बोली, ‘‘सब देवीजी की शक्ति से मुमकिन हो पाता है और ये सब मैं अपने घर की सुखशांति के लिए करती हूं.’’

जबकि सच यह है कि उस के घर में हर समय पतिपत्नी में झगड़ा होता रहता है. कई बार झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि पड़ोसियों या फिर परिचितों को हस्तक्षेप करना पड़ता है.

पेशे से शिक्षिका निधि के दोनों बेटे अपने घर आने से कतराते हैं. वे कहते हैं कि जब भी घर आओ मम्मीपापा दोनों हर छोटीछोटी बात को भी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना कर लड़ते रहते हैं. इन का झगड़ा देखने से तो अच्छा है घर में कम से कम रहा जाए.

नीता के पति की जब मृत्यु हुई, तो बेटा विशाल 8वीं कक्षा का छात्र था. पापा से बहुत घुलामिला होने के कारण उन की मृत्यु के बाद वह एकदम अकेला पड़ा गया. नीता बैंक में सर्विस करती थी. वह सुबह बैंक जाने से पहले

2 घंटे पूजा करती और फिर औफिस से आ कर शाम को भी 1 घंटा. जब तक उसे फुरसत मिलती बेटा सो चुका होता. अत: बच्चे से उस की सिर्फ औपचारिक बातचीत ही हो पाती थी. अपने मन की बात किसी से शेयर न कर पाने के अभाव में बेटा धीरेधीरे अकेलेपन का शिकार हो कर अवसाद में चला गया. अब परेशान हो कर नीता उसे डाक्टरों के पास ले कर घूम रही है.

अंधविश्वास की पराकाष्ठा

गरिमा की आदत है कि नहा कर जब तक पूजा नहीं कर लेती तब तक पानी भी नहीं पीती. फिर चाहे घर का काम समाप्त करतेकरते उसे दोपहर ही क्यों न हो जाए. पति विनय ने उसे कईर् बार समझाया, ‘‘गरिमा, बिना नाश्ता किए यो दोपहर तक भूखे रहना ठीक नहीं. किसी दिन मुसीबत में आ जाओगी.’’

पर गरिमा ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. एक दिन अचानक चक्कर खा कर बेहोश हो गई. डाक्टर ने कहा लंबे समय तक भूखे रहने की वजह से इन का बीपी लो हो गया है. इतना सब कुछ होने के बाद भी गरिमा अपनी इस आदत को छोड़ नहीं पाई, जिस से रोज उस के घर में कलह होती.

पूजा के पति को लिवर सिरोसिस हुआ था. 1 माह तक हौस्पिटल में रहने के बाद एक दिन डाक्टरों ने उन्हें जवाब दे दिया. उसी दौरान पूजा के कथित गुरुजी आ गए. जब पूजा ने उन्हें अपने पति की हालत के बारे में बताया तो वे बोले, ‘‘यदि महामृत्युंजय का जाप करवाया जाए तो इन की जान बच सकती है.’’

उम्मीद की किरण देख कर बिना अपने विवेक का प्रयोग किए पूजा ने आननफानन में पंडितजी को जाप के लिए क्व25 हजार दे दिए. अगले ही दिन उस के पति की मृत्यु हो गई.

रीता की सौफ्टवेयर इंजीनियर बेटी को अपने ही सहकर्मी से प्यार हो गया. उस ने सर्वप्रथम यह बात अपनी मां को बताई. मातापिता को भी कोई ऐतराज नहीं था. एक ही जाति का होने के कारण दोनों ही पक्ष राजी थे, परंतु जब दोनों पक्षों ने अपनेअपने पंडितजी को कुंडली दिखाईर् तो बोले, ‘‘लड़की घोर मंगली है. यह विवाह तो हो ही नहीं सकता. यदि होगा तो लड़का या लड़की में से एक अपनी जान से हाथ धो बैठेगा.’’

फिर क्या था दोनों परिवारों ने इस शादी के लिए मना कर दिया. लड़कालड़की दोनों ने ही अपनेअपने मातापिता को समझाने की बहुत कोशिश की, पर उन के न पिघलने पर उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली. दोनों के ही मातापिता शादी में शामिल नहीं हुए और अपने बच्चों से हाथ धो बैठे. जबकि लड़कालड़की आज 15 साल बाद भी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

आत्मघाती कदम

अस्मिता एक भजन मंडली की सदस्या है. हर दूसरेतीसरे दिन वह अपनी मंडली के सदस्यों के साथ भजन करने चली जाती है. हाल ही में उस के 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे ने गणित का पेपर खराब हो जाने पर आत्महत्या कर ली. यदि अस्मिता अपना कुछ समय दे कर बेटे की भावना या उस के मन की उथलपुथल को भांपती तो बेटे को इस आत्मघाती कदम उठाने से रोक सकती थी.

इस प्रकार की कई घटनाएं रोज सब को अपने आसपास देखने को मिल जाती हैं. पूजापाठ, धार्मिक कर्मकांड कई घरों में इस कदर अपने पैर पसार लेते हैं कि वे आंतरिक कलह और बरबादी का कारण बन जाते हैं. भारतीय जनमानस में प्रत्येक समस्या का समाधान ईश्वर से मांगा जाता है जबकि उस का समाधान उन की स्वयं की समझदारी, विवेक और बुद्घि में छिपा होता है.

किसी कीमती वस्तु के गुम हो जाने पर, किसी सदस्य के बीमार हो जाने पर, घर में कलह और क्लेश होने पर, बच्चे के बेरोजगार होने पर तुरंत ईश्वर को इस प्रकार याद किया जाता है कि प्रभु, अमुक समस्या को हल कर दो, क्व1100 चढ़ाऊंगा या चढ़ाऊंगी.

जबकि वास्तव में जीवन एक ऐसी नाव है, जिस में बैठ कर आप को हर पल, हर क्षण अपनी बुद्घि और विवेकरूपी पतवार से दुनियादारी के समुद्र में अपनी नाव को बढ़ाना है. जहां आप ने अपनी अज्ञानता या नासमझी दिखाई वहीं आप की नाव गोते खाने लगेगी.

ऐसे में आप भी चाहते हैं कि आप के समक्ष भी ऐसी स्थिति न आए तो इन सुझावों पर गौर फरमाएं:

परिवार को दें प्राथमिकता: पतिपत्नी के आपसी झगड़ों को सुलझाने के लिए आपसी समझ और धैर्य की जरूरत होती है. देवीजी के व्रत, उपासना, उपवास, कन्याभोज, घंटों पूजापाठ या और कोई कर्मकांड करने के बजाय एकदूसरे को समझा जाए, कुछ उन के अनुसार ढला जाए और कुछ उन्हें अपने अनुसार ढाला जाए तब बड़ी से बड़ी समस्या को भी सुलझाया जा सकता है.

गृहस्थ जीवन का तो आधारस्तंभ ही प्यार, विनम्रता, सहनशीलता, त्याग, सहयोग और समर्पण की भावना है. पतिपत्नी के रिश्ते को खूबसूरती से निभाने के लिए सब से जरूरी है अहंकार का त्याग. घरपरिवार की छोटीमोटी समस्याओं को कभी मुद्दा न बनाएं. किसी भी प्रकार के मतभेद या नाराजगी को अहं के कारण लंबा न खींच कर उसी समय हल करें. यदि आप की पूजा घर में कलह का कारण है, तो तार्किक बुद्धि से सोचें कि ऐसे पूजापाठ से क्या लाभ, जिस से आप के घर की ही शांति भंग हो. घरपरिवार की शांति की कीमत पर कुछ भी न करें.

बच्चों को दें भरपूर समय: आजकल के खुलेपन के माहौल में किशोर होते बच्चों को अधिकाधिक समय देने की जरूरत होती है. अत: उन्हें भरपूर समय दें, उन के साथ मित्रवत व्यवहार करें, उन से जीवन के प्रत्येक विषय पर बातचीत करें ताकि वे अपने मन की हर बात को आप के साथ साझा कर सकें. यदि वे कभी परेशानी में हैं, तो उन के मन को भांप कर उन्हें सही दिशा दिखाएं. जब बच्चों को घर में समुचित प्यार और माहौल नहीं मिलता है तो वे अपने दोस्तों की ओर रुख करते हैं, जिस से कई बार वे भटक भी जाते हैं.

ध्यान रखें आप के पूजापाठ के कारण आप के बच्चे उपेक्षित न हों, साथ ही बच्चों को भी गैरजरूरी पूजापाठ, व्रतउपवास के फेर में न उलझाएं. ‘उन की पढ़ाई ही उन की पूजा है’ यह सीख दें ताकि वे मन लगा कर पढ़ाई कर सकें.

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें: कुछ लोगों का नियम होता है कि वे पूजापाठ किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करते. पुरुष और कामकाजी महिलाएं चूंकि औफिस जाते हैं, इसलिए वे तो समय पर खा लेते हैं, परंतु जो महिलाएं घर में रहती हैं वे काम समाप्त करने के चक्कर में नाश्ता न कर के सीधे भोजन ही ग्रहण करती हैं और ऐसा कर के कई बीमारियों को न्योता देती हैं.

डाक्टरों के अनुसार, रात और दोपहर के भोजन में अधिक अंतराल हो जाने के कारण शरीर के लिए नाश्ता करना बेहद जरूरी हो जाता है, क्योंकि अधिक अंतराल हो जाने पर शरीर से कई विषैले हारमोन निकलने लगते हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से तो बेहद हानिकारक होते ही हैं, साथ ही मोटापा भी बढ़ाते हैं.

न बनें अंधविश्वासी: कई घरों में किसी बीमार के होने पर या किसी समस्या के समाधान हेतु तंत्रमंत्र, झाड़फूंक, जादूटोने का सहारा लिया जाता है, जो गलत है. इस की अपेक्षा डाक्टर के पास जाएं ताकि उस बीमारी की दवा ली जा सके और बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सके.

रीमा की 3 वर्षीय बेटी बेहद नटखट और शरारती है. एक दिन उसे अचानक बुखार आ गया. रीमा 1 सप्ताह तक उसे यहांवहां ले जा कर नजर झड़वाती रही, जबकि उसे टायफाइड हुआ था. बाद में डाक्टर के लंबे इलाज के बाद वह ठीक हो सकी.

अत: आडंबर, अंधविश्वास और कर्मकांड के चक्कर में न पड़ें. धर्म के नाम पर पैसा कमाने वालों से बचें. अपने पैसे का सदुपयोग करें न कि दुरुपयोग.

बच्चों की खुशी को दें प्राथमिकता: शादीब्याह समझदारी, त्याग, सहयोग से निभाए जाते हैं न कि जन्मपत्री में निहित गुणों के मिलान से. यदि ऐसा होता तो सभी जन्मपत्री मिलाए गए जोड़े सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे होते. बच्चे की पसंद में जाति, जन्मपत्री जैसी अंधविश्वासी बातों की जगह योग्यता और अच्छे घरपरिवार को मानदंड बनाएं और बच्चे की खुशी में शामिल हों. उस की खुशी में ही अपनी खुशी देखें.

व्यर्थ के कर्मकांडों के चक्कर में पड़ कर अपने बच्चे की खुशी का त्याग न करें, क्योंकि हर बच्चा मातापिता की छत्रछाया में ही अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करना चाहता है. जब मातापिता अपनी जिद पर अड़ जाते हैं, तो उन की गैरमौजूदगी में विवाह करना उन की मजबूरी होती है खुशी नहीं.

तार्किक बनें

जीवन एक संघर्ष है. इस में समयसमय पर सुख और दुख तो आतेजाते रहते हैं. यहां आने वाली अनगिनत समस्याओं का समाधान विवेक और बुद्घि का प्रयोग कर के निकाला जा सकता है, पूजापाठ से नहीं. वर्तमान समय में धर्म की आड़ में भगवान के दूत बन कर पूजापाठ करवाने वालों की भरमार है, जो स्वयं तो पूजा करवाते ही हैं, आप को भी पूजा के विभिन्न उपाय बताते हैं. न केवल महिलाएं, बल्कि पुरुष भी जीवन की विभिन्न समस्याओं के हल के लिए पूजापाठ, धार्मिक अनुष्ठान का सहारा लेते हैं, जबकि उन्हें जरूरत होती है अपनी तार्किक बुद्घि का प्रयोग करने की कि जिन समस्याओं का संबंध आप के जीवन और आप के अपने लोगों से है उन का समाधान भी आप के हाथ में ही है. कोई अन्य उन्हें कैसे सुलझा सकता है?

समझना यह चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत? क्या लाभकारी है और क्या हानिकारक? पूर्वाग्रहों, अंधविश्वासों और वहम जैसी भावनाओं से परे हट कर जब तक समझ और तार्किक बुद्घि का प्रयोग कर के जीवन नहीं चलाया जाएगा, जीवन अकसर दुरूह होता जाएगा. अत: पूजापाठ के स्थान पर जीवन में अपनी प्राथमिकताएं तय कर के समझदारी से काम लिया जाए.

जब लेना ही पड़े तलाक तो जिंदगी में कुछ इस तरह आगे बढ़ें

गणेशस्पीक्स डौटकौम नाम के वैब पोर्टल द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि  65% महिलाएं तलाक या जीवनसाथी द्वारा धोखा दिए जाने के मसलों को ले कर काफी परेशान रहती हैं जबकि 35% पुरुषों में ही यह तनाव पाया गया.

यह आकलन पोर्टल द्वारा फोन पर उपलब्ध कराई जाने वाली परामर्श काल सेवा से मिले डाटा के आधार पर तैयार किया गया है. 2016 में महिलाओं द्वारा रिलेशनशिप से संबंधित मुद्दों के लिए की गईं काल्स में पिछले वर्ष की तुलना में 45% का इजाफा हुआ. जाहिर है आज की महिलाएं अपने विवाह को जन्मजन्मांतर का बंधन मान कर हर ज्यादती चुपचाप सहने को तैयार नहीं हैं. उन्हें अपने जीवनसाथी का पूरा भरोसा एवं बीवी होने का पूरा हक चाहिए. पति या ससुराल वालों के अत्याचार सहने के बजाय वे तलाक ले कर अलग हो जाने को बेहतर मानती हैं.

दरअसल, अब लड़कियां पढ़लिख कर आत्मनिर्भर बन रही हैं. शादी के बाद वे अपने कैरियर को पूरा महत्त्व देती हैं और पति से भी बराबरी का हक चाहती हैं. ऐसे में जब दोनों के अहं टकराते हैं, तो आत्मसम्मान खोने के बजाय वे अलग दुनिया बसाना पसंद करती हैं. यही नहीं आज लोगों के मन में कम समय में अधिक से अधिक हासिल करने की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ती जा रही है. पतिपत्नी

दोनों ही परिवार को कम वक्त दे पाते हैं, जिस से घर में तनाव रहता है. पतिपत्नी के बीच तालमेल का अभाव और शक की दीवारें भी दूरियां बढ़ाती हैं.

तलाक का फैसला लेना आसान है पर आज भी तलाक के बाद जिंदगी खासतौर पर एक महिला की उतनी आसान नहीं रह जाती. इस संदर्भ में अपनी किताब ‘द गुड इनफ’ में डाक्टर ब्रैड साक्स का कथन सही है कि पतिपत्नी सोचते हैं तलाक के बाद उन की जिंदगी में सुकून आ जाएगा. रोजरोज के झगड़ों का अंत हो जाएगा. पर यह उसी तरह संभव नहीं जैसे एक ऐसी शादीशुदा जिंदगी की कल्पना जिस में केवल खुशियां ही खुशियां हों. इसलिए प्रयास यही होना चाहिए कि जितना हो सके तलाक को टाला जाए.

कब जरूरी है तलाक

जब पतिपत्नी के बीच ‘तीसरा’ मौजूद हो: पति हो या पत्नी, किसी के लिए भी बेवफाई का गम सहना आसान नहीं होता. पतिपत्नी के बीच इस मसले पर झगड़े बढ़ते हैं और बात मरनेमारने तक पहुंच जाती है. समझदारी इसी में है कि ऐसे हालात में दोनों आपसी सहमति से अलग हो जाएं.

बेमेल जोड़े: कई दफा परिस्थितिवश बेमेल जोड़े बन जाते हैं. पतिपत्नी की आदतें, विचार, जीवन के प्रति नजरिया, स्टेटस, शिक्षा वगैरह सब अलगअलग होते हैं. उन के मन भी नहीं मिलते. ऐसे में उम्र भर खुद को या परिस्थितियों को कोसते रहने से बेहतर है तलाक ले कर मनपसंद साथी के साथ नया जीवन शुरू करना.

तनाव और घुटन: कभीकभी रिश्तों में इतनी कड़वाहट भर जाती है कि पतिपत्नी के लिए एक ही छत के नीचे रहना कठिन हो जाता है. रोजरोज के लड़ाईझगड़ों से उन का दम घुटने लगता है. इस का बुरा असर काम और बच्चों पर भी पड़ता है. ऐसे में जीवन को बिखरने से बचाने के लिए बुरी यादों को अलविदा कहना जरूरी है.

जाहिर है कि जब वैवाहिक जिंदगी बोझ बन जाए तो उस बोझ को उतार देना ही बेहतर है. तलाक के बाद परेशानियां आएंगी पर मन में विश्वास रखिए कि लंबी काली सुरंग का दूसरा सिरा रोशनी में खुलता है. यदि आप धैर्य और समझदारी से काम लेंगे तो कोई वजह नहीं कि परेशानियां खुद हार मान लें. तलाक यदि दलदल है तो गंद तो लगेगा ही पर प्रयास किया जाए तो इस दलदल से उबरना नामुमकिन नहीं.

लंदन की किंग्सटन यूनिवर्सिटी द्वारा 16 से 60 साल की उम्र के 10 हजार लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि तलाक के करीब5 साल बाद नकारात्मक वित्तीय अवस्था के बावजूद महिलाएं ज्यादा खुश और संतुष्ट पाई गईं और इस की वजह काफी हद तक उन की आजादी थी.

तलाक के बाद आने वाली परेशानियों को समझदारी से दूर किया जा सकता है. आइए, जानते हैं कि कैसे:

आर्थिक परेशानियां

तलाक के बाद रहनसहन का स्तर प्रभावित होता है. आमदनी के स्रोत तो घट जाते हैं पर जिम्मेदारियां और खर्च दोगुने हो जाते हैं. घर अलग होता है, तो स्वाभाविक है कि उसे चलाने का खर्च भी बढ़ेगा.

सामान्य कंफर्ट की चीजों के अलावा खानेपीने, घूमनेफिरने, रहने का सारा खर्च

अकेले वहन करना पड़ता है. मनोरंजन हो या नई ड्रैसेज पर किया जाने वाला खर्च, आप को कम से कम रुपयों में बेहतर पाने का प्रयास करना सीखना पड़ेगा.

भविष्य में संभावित आर्थिक परेशानियों से बचने के लिए तलाक की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही फाइनैंशियल मसलों पर सतर्क रहना बहुत जरूरी है. तलाक के बाद संपत्ति में से मिलने वाला हिस्सा और ऐलीमनी आप के भविष्य को आसान या कठिन बना सकती है.

यदि आप जौब नहीं कर रहीं तब तो फाइनैंशियल सिक्योरिटी और भी अहम हो जाती है. अकसर शादी के दौरान महिलाएं फाइनैंशियल मामलों को पूरी तरह पति पर छोड़ देती हैं. यह उचित नहीं. अपने पति की इनकम, टैक्स पेमैंट्स, लोन इंस्टालमैंट्स, एफडीज, क्रैडिट बैलेंस और डिसपोजिशन, बैंक अकाउंट्स, मंथली बिल्स आदि के बारे में पूरी जानकारी रखें. इस के अलावा मैरिटल प्रौपर्टीज, ज्वैलरीज, व्हीकल्स और इंश्योरैंस पौलिसीज

जैसी चीजों को नजरअंदाज करने की गंभीर गलती न करें.

ये सब ऐलीमनी तय करने के काम आते हैं. यही नहीं, शेयर्स और म्यूचुअल फंड्स में भी अपने पति के निवेश का ट्रैक रखें. तलाक से पहले ये फाइनैंशियल डिसीजन लेने में देर न करें:

  • क्रैडिट कार्ड्स ब्लौक कर दें.
  • जौइंट अकाउंट्स क्लोज करें.
  • अपने पीएफ अकाउंट, डिमैट अकाउंट, सेविंग अकाउंट्स वगैरह में नौमिनी बदल दें.
  • इंश्योरैंस नौमिनी भी बदल दें.
  • वसीयत में बदलाव लाएं.
  • ईसीएस टर्मिनेट करें. किसी भी जौइंट लोन के लिए अपने बैंक को सूचित कर दें.

यह भी ध्यान रखें कि स्त्रीधन आप का अपना है, उसे पति के साथ तलाक के समय बांटने की जरूरत नहीं है. कोई भी फैसला लेते समय अपने बच्चों के भविष्य को फाइनैंशियल रूप से मजबूत करने के बारे में जरूर सोचें.

बच्चों पर असर

कहीं न कहीं तलाक का गहरा असर बच्चों के मन पर पड़ता है. तलाक यानी बच्चों की दुनिया का बंट जाना. 2 शख्स जिन्हें वह दुनिया में सब से ज्यादा प्यार करता था, उन का आपस में एकदूसरे से प्यार नहीं करने का एहसास बच्चों को भयभीत, चिड़चिड़ा और विद्रोही बना देता है. स्कूलकालेज में उन की परफौर्मैंस खराब रहने लगती है. कई दफा वे खुद को तलाक का दोषी मानने लगते हैं.

इन बातों का मतलब यह नहीं कि बच्चों की खातिर आप टूटे हुए रिश्ते को ढोने का प्रयास करती रहें, क्योंकि घर के तनाव एवं लड़ाईझगड़ों का असर वैसे भी बच्चों के दिमाग को कुंद कर देता है.

बेहतर होगा कि आप प्यार से बच्चों को समझाएं कि इस सब के पीछे उन का कोई दोष नहीं. ईमानदारी के साथ उन के हर सवाल का जवाब दें. अपने जीवन की हकीकत बताएं और हौसला बढ़ाएं कि सब ठीक हो जाएगा. अलग होने के बावजूद मांबाप दोनों बच्चों को क्वालिटी टाइम दें, तो धीरेधीरे वे सामान्य जीवन जीने लगेंगे.

सामाजिक बहिष्कार

तलाक के बाद अकसर महिलाएं सामाजिक रूप से अलगथलग पड़ जाती हैं. कई दफा वे लोग भी उन्हें नजरअंदाज करने लगते हैं जिन्हें वे खुद के करीब मानती थीं.

संभव है कि तलाक के बाद कौमन फ्रैंड्स आप के ऐक्स को तो इनवाइट करें पर आप की काल्स को भी नजरअंदाज कर दें. आप की मां आप के ऐक्स की साइड ले कर बात कर आप के दोष गिनाएं.

इन बुरे दिनों में आप को हर जगह कपल्स नजर आएंगे. आप वीकैंड भी ऐंजौय नहीं कर सकेंगी, क्योंकि यह फैमिली टाइम होता है, जबकि फैमिली आप के पास है ही नहीं. बच्चों से मिलने के लिए भी अपनी बारी का इंतजार करना बहुत कष्टकारी होगा.

सिनेमा हाल, मौल, मार्केट, रैस्टोरैंट वगैरह कहीं भी जाने से आप बचना चाहेंगी. आप को महसूस होगा जैसे लोग आप को ही घूर रहे हैं या दया की नजरों से देख रहे हैं. आप के दोस्त/रिश्तेदार अपने पति, बच्चों या दोस्तों के साथ व्यस्त मिलेंगे.

ऐसे हालात में टूटने या सिमट जाने से बेहतर है कि रिश्तों की असलियत स्वीकारते हुए नए दोस्त बनाएं, अपने जैसी स्थिति वालों से मिलें. आप को जीने का नया नजरिया, नया अंदाज मिलेगा. मुमकिन है कि आप को नया जीवनसाथी भी मिल जाए, जो आप की कद्र करे, आप को समझे.

लोलुप नजरों का सामना

प्राय: तलाक के बाद औफिस और आसपास के कुछ पुरुष स्त्रियों को लोलुप नजरों से देखने लगते हैं. यदि आप सिंगल हैं और सिंगल होने को तैयार नहीं तो भी पुरुष आप के आगेपीछे घूमने से बाज नहीं आते. ऐसे लोग चांस मारने का कोई मौका नहीं छोड़ते. जाहिर है, आप बहुत असहज महसूस करेंगी.

ध्यान रखें, आप नहीं वरन आप की स्थितियों की वजह से लोग इस नजर से देख रहे हैं. परेशान होने के बजाय इन बातों को हैंडल करना सीखें. बिंदास बनें. जमाने की परवाह करने से जमाना और भी पीछे पड़ जाता है. अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीएं.

असर आप पर

तलाक के दौरान आप के आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ती हैं. लोगों के ताने सुनने पड़ते हैं कि आप अपने रिश्ते को बना कर नहीं रख पाईं. आपसी सहमति से तलाक नहीं मिला तो कोर्ट में लंबे समय तक मामला खिंचता है. इस दौरान आप के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने और कीचड़ उछालने वालों की कमी नहीं रहती.

तलाक के बाद प्राय: आप का खुद से और रिश्तों से भी विश्वास उठ जाता है. आप यह बात फिर स्वीकार नहीं कर पातीं कि कोई आप से सच्चा प्यार भी कर सकता है. कहीं दोबारा शादी करने पर फिर ऐसा ही हुआ तो? यह सवाल आप के जेहन में उठता रहता है.

यही नहीं, एक तरफ आप अपने पूर्व साथी से अभी भी प्यार करती होंगी, क्योंकि बीते वक्त में आप एक मन और 2 शरीर थे. वहीं दूसरी तरफ आप को उस पर गुस्सा भी आता होगा. आप खुद को उलझन में, अपमानित और बेसहारा महसूस करती होंगी. साथ बिताए हसीन पल आप को रहरह कर याद आएंगे.

इन सब से आप को खुद उबरना होगा. सामाजिक बनें, नई नौकरी जौइन करें, साथ ही पुरानी बातें भूल कर जिंदगी को नए सिरे से देखें, नया कल आप को बांहों में थाम लेगा.

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