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वनडे में इन 5 खिलाड़ियों के नाम है सबसे तेज शतक लगाने का रिकौर्ड

पाकिस्तान में ‘बूम-बूम’ के नाम से मशहूर पाकिस्तानी धुरंधर बल्लेबाज शाहिद अफरीदी ने 1996 में श्रीलंका के खिलाफ 37 गेंदों में सबसे तेज शतक लगाया था. शाहिद के बनाएं उस रिकौर्ड को टूटने में पूरे 18 साल लग गए थे.

इस दौरान शाहिद अफरीदी अपनी बैटिंग के दम पर क्रिकेट फैंस के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ चुके थे. लेकिन आज 21 साल बाद ये रिकौर्ड किसी और के नाम है. तो आइए, हम आपको वनडे में सबसे तेज शतक लगाने वाले 5 बल्लेबाजों के बारे में बताते हैं.

एबी डिविलियर्स (31 गेंद)

साउथ अफ्रीका के विस्फोटक बल्लेबाज एबी डिविलियर्स ने 2015 में वेस्टइंडीज के खिलाफ अब तक का सबसे तेज शतक जड़ने का रिकौर्ड अपने नाम किया था. डिविलियर्स ने इस दौरान 149 रन की पारी खेली थी, जोहानिसबर्ग में खेले गए इस मैच में उन्होंने 16 छ्क्के और 9 चौके लगाए थे.

कोरे एंडरसन (36 गेंदें)

न्यूजीलैंड के इस बल्लेबाज ने 1 जनवरी 2014 को क्वींसटाउन में वेस्टइंडीज के खिलाफ 36 गेंदों में अपना शतक लगाया था. एंडरसन ने नाबाद 131 रन की पारी में 14 छक्के और 6 चौके जड़े थे.

एंडरसन एकदिवसीय में सर्वाधिक छक्का लगाने के रोहित शर्मा के कीर्तिमान को ध्वस्त करने से दो कदम दूर रह गए.

एक वेबसाइट ने एंडरसन के हवाले से कहा, “वास्तव में शाहिद अफरीदी के इस किर्तीमान के बारे मुझे कुछ भी पता नहीं था. ऐसा नहीं है कि मेरी नजर इस कीर्तिमान पर थी और मैं उसे तोड़ने के बारे में सोचकर खेल रहा था. लेकिन ऐसा करके मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है.”

शाहिद अफरीदी (37 गेंदें)

शाहिद अफीरीदी ने ये रिकौर्ड 1996 में श्रीलंका के खिलाफ नैरोबी में बनाया था. मैदान पर उतरते ही इस युवा बल्लेबाज ने चौके छक्कों की ऐसी बारिश की, जिसे देख हर कोई हैरान रह गया था. इस मैच में उन्होंने केवल 37 गेंदों में शतक जड़कर वर्ल्ड रिकौर्ड बना दिया था. उन्होंने दुनिया को दिखाया था कि विश्व क्रिकेट में एक नया सुपरस्टार उभर रहा है. इस पारी में उन्होंने 11 छक्के और 6 चौके लगाए थे.

जिसके बाद से शाहिद को बूम बूम शाहिद कहा जाने लगा.

मार्क बाउचर (44 गेंदें)

साउथ अफ्रीका के विकेटकीपर ने जिंबाब्वे के विरुद्ध खेलते हुए 44 गेंदों में अपना शतक पूरा किया था. इस दौरान उन्होंने 10 छक्कों और 8 चौकों की मदद से नाबाद 147 रन की पारी खेली. इस पारी से उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि वो भी किसी से कम नहीं हैं.

ब्रायन लारा (45 गेंदें)

वनडे इतिहास का पांचवां सबसे तेज शतक लगाने का कारनामा शाहिद अफरीदी और ब्रायन लारा के बीच संयुक्त रूप से है. ब्रायन लारा ने बांग्लादेश के खिलाफ 1999 तो शाहिद अफरीदी ने भारत के लिए 2005 में ये कारनामा किया था.

वेस्‍टइंडीज की टीम के लिए खेलने वाले ट्रिनिडाड के क्रिकेट खिलाड़ी ब्रायन चार्ल्‍स लारा के नाम से कोई भी क्रिकेट प्रेमी अनजान नहीं है. अपने बेहतरीन करियर में वेस्‍ट इंडीज के लिए कप्‍तानी भी करने वाले ब्रायन लारा ने कई शानदार रिकौर्ड बनाये हैं.

इनमें से एक रिकौर्ड तो ऐसा है जिसे पिछले 12 सालों से कोई तोड़ना तो दूर उसके आसपास भी नहीं आ पाया है. ऐसा लगता है कि कोई खिलाड़ी शायद ही उसकी बराबरी कर सके, यानि ये रिकौर्ड अब तक अटूट है. लारा ने 12 साल पहले 12 अप्रैल, 2004 को एंटीगुआ में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच खेलते हुए ये रिकौर्ड बनाया था. ये क्रिकेट की सबसे बड़ी पारी कही जा सकती है जिसमें उन्‍होंने नाबाद 400 रन बनाये थे.

प्रेम नगरी में भी नहीं हो सकी समाजवादी पार्टी में सुलह

समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव कहते हैं कि आगरा पार्टी के लिये शुभ होता है. आम जनमानस में भी आगरा की छवि ‘प्रेम नगरी’ की है. सपा ने आगरा में राष्ट्रीय सम्मेलन के बहाने पार्टी में एकता को दिखाने का प्रयास किया था. अखिलेश यादव को उम्मीद थी कि पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव इसमें हिस्सा ले लेंगे तो ‘सपा में सुलह’ दिखाई दे जायेगी.

राष्ट्रीय सम्मेलन के आखिरी वक्त तक अखिलेश यादव के समर्थक यह मैसेज फैलाते रहे कि मुलायम सिंह यादव सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. मुलायम सिंह यादव भी लखनऊ एयरपोर्ट तक जाने के बाद भी राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने आगरा तक नहीं जा पाये. चाचा शिवपाल यादव ने सोशल मीडिया पर अखिलेश को बधाई देकर अपने कर्तव्य की ‘इतिश्री‘ कर दी.

आगरा की उपलब्धि के नाम पर राष्ट्रीय सम्मेलन में समाजवादियों ने अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया. ‘सपा में सुलह’ के हालात पहले जैसे ही बने हैं. मुलायम भाई शिवपाल यादव को छोड़कर बेटे अखिलेश के साथ ‘एकला’ चलने को तैयार नहीं है. अखिलेश यादव के आसपास वही लोग हैं जो लखनऊ में उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के समय थे. मुलायम के कुछ करीबी लोग अपने बेटे बेटियों को पार्टी में स्थापित करने के लोभ में अखिलेश के साथ हैं और वह अपने को हाशिये पर अनुभव कर रहे हैं. राष्ट्रीय सम्मेलन में आजम खां का छलका दर्द इसका गवाह है. मुलायम चाहते थे कि भाई शिवपाल राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने आगरा चलें. शिवपाल ही नहीं मुलायम की बहू अपर्णा यादव भी इस सम्मेलन से दूर रहीं.

परिवार को एकजुट कर ‘सपा में कलह’ खत्म करने के मोर्चे पर फेल रहे अखिलेश यादव राजनीतिक रूप से भी कोई बड़ा संदेश प्रदेश को देने से चूक गये. पत्नी डिपंल यादव के राजनीतिक कैरियर को लेकर सवाल खड़ा करने वाले अखिलेश यादव राष्ट्रीय सम्मेलन में पत्नी डिपंल यादव के साथ दिखे. अधूरे मन से ही सही पर डिंपल को वह राजनीतिक पटल से दूर रखने का साहस नहीं दिखा सके. प्रदेश और केंद्र सरकार के खिलाफ सपा की कोई कड़ी मोर्चे बंदी की घोषणा करने में अखिलेश यादव विफल रहे.

पिता मुलायम की तरह वह जनता को यह संदेश देने का प्रयास करते रहे कि ‘सीबीआई’ और ‘ईडी’ के जरीये केन्द्र डराने का काम करता है. वह डरने वाले नहीं हैं. अखिलेश के अलावा दूसरे किसी नेता के भाषण से भी यह नहीं पता चला कि राष्ट्रीय सम्मेलन में कोई प्रभावी रणनीति बनी है. ज्यादातर नेताओं के भाषण वैसे ही थे जैसे सपा की प्रेस कांफ्रेस में पार्टी कार्यालय में रहते हैं.

अखिलेश यादव की पत्नी और सांसद डिपंल यादव ने कहा कि प्रदेश में लाठी खिलाने वालों की सरकार है. डिपंल महिला नेता होने के नाते योगी सरकार में महिलाओं की हालत का बयान नहीं कर सकी. कहने के लिये तो यह सपा का राष्ट्रीय सम्मेलन था पर कार्यकर्ताओं और नेताओं की भागीदारी के आधार पर देखे तो केवल उत्तर प्रदेश का ही बोलबाला था. सपा किस तरह से देश के अपना जनाधार बढ़ायेगी ऐसा कोई तरीका बताने में अखिलेश यादव असफल रहे. सपा संघर्ष के अपनी रणनीति पर ठोस जानकारी नहीं दे सकी.

पार्टी में अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. पार्टी इसको सबसे बड़ी घटना मान रही है. सपा में अखिलेश का रुतबा पहले जैसा ही है. इस सम्मेलन के पहले या बाद इसमें कोई बदलाव होता नहीं दिख रहा है. पार्टी के हर फोरम पर अखिलेश की चमक दिखाई जा रही है. यह ठीक उसी तरह है जैसी विधानसभा चुनाव से पहले दिखाई जा रही थी.

अब यह फैसला अखिलेश यादव को करना है कि वह इस चमक की सच्चाई को देखना चाहते हैं या धरातल की हकीकत को समझ कर आगे बढ़ना चाहते हैं. अखिलेश के सामने चुनौतियां बहुत हैं. मुकाबला भाजपा जैसी पार्टी से है. जिसका प्रबंधन दूसरों से बेहतर है. ऐसे में अखिलेश को जमीनी सच्चाई का स्वीकार कर आगे बढ़ना होगा. केवल ‘भौतिक चमक’ से भला होने वाला नही है.

चुटकियों में ट्रांसलेशन करता है ये वायरलेस ईयरफोन

गूगल ने अपने सालाना मेड बाइ गूगल इवेंट में एक खास तरीके का ईयरफोन लान्च किया है. गूगल ने इस वायरलेस ईयरफोन का नाम Google Pixel Buds रखा है. इसकी कई खासियतें हैं जिनमें से एक ये है कि यह रियल टाइम ट्रांसलेशन भी करता है.

आपको बता दें पिछले साल ऐपल ने भी पहली बार एयर पौड लान्च किया था. हालांकि यह ऐपल के वायरलेस ईयरफोन से अलग है, क्योंकि इसमें दोनों बड को जोड़ने के लिए वायर का यूज किया गया है. हालांकि स्मार्टफोन या किसी दूसरे डिवाइस में कनेक्ट करने के लिए इसमें वायर जोड़ने की जरूरत नहीं होती है.

ईयरबड के दाएं ईयरपीस में इसका बिल्ट इन कंट्रोल दिया गया है जिसके जरिए आप इसे कमांड दे सकते हैं. गूगल ऐसिस्टेंट को शुरू करने के लिए दाईं तरफ के ईयर बड को टैप कर सकते हैं. ऐसिस्टेंट मोबाइल में आए हुए मैसेज पढ़ कर बताएगा. इसके अलावा ऐसिस्टेंट दूसरे काम भी कर सकता है जैसे स्मार्टफोन में काम करता है.

अब इसकी सबसे बड़ी खासियत के बारे में बात करते हैं. पिक्स्ल बड में इंटीग्रेटेड गूगल ट्रांसलेट फीचर दिया गया है. इवेंट के दौरान गूगल ने पिक्सल बड का डेमोंस्ट्रेशन भी किया है. इसे लगाकर दूसरी भाषाओं में किसी से बातचीत की जा सकती है. इस दौरान अंग्रेजी बोलने वाले और स्वीडिश में बात करे वाले लोगों को बातचीत करने को कहा गया और दोनों ने अपनी बात आराम से रखी. गूगल ट्रांस्लेट ने दोनों के लिए बेहतरीन काम किया. डेमोंस्ट्रेशन के दौरान कोई भी रूकावट देखने को नहीं मिली.

यह ईयर बड्स तीन कलर औप्शन्स में उपलब्ध होंगे. इसे एक बार फुल चार्ज करके पांच घंटे तक लगातार गाना सुना जा सकता है. इसके साथ एक चार्जिंग केस भी दिया जाएगा और इस केस को चार्ज करक इसके जरिए इस ईयर बड को चार्ज किया जा सकता है. हर बार पावर केबल लगाने की जरूरत भी नहीं होगी. अमेरिका में इसकी कीमत 159 डौलर है.

बता दें कि गूगल ने हाल ही अपने दो बेहतरीन फोन पिक्सल 2 और पिक्सल XL2 लान्च किए हैं. पिक्सल 2 की डिस्पले की बात करें तो इसकी डिस्पले 5.2 इंच है इसमें 12 मेगा पिक्सल का कैमरा दिया गया है. वहीं पिक्सल 2 में प्रोट्रेड मोड दिया गया है. इससे ली गई तस्वीरें और वीडियो काफी बेहतरीन है. इसकी स्क्रीन 6 इंच है और 12.3 मेगापिक्सल का रियर कैमरा दिया गया है.

विनोद खन्ना कैसे बन गए बौलीवुड के ‘दयावान’

हिंदी सिनेमा के दिग्गज कलाकार विनोद खन्ना का आज जन्मदिन है. पेशावर में 6 अक्टूबर 1946 को जन्मे विनोद खन्ना का परिवार अगले ही साल 1947 भारत विभाजन के बाद मुंबई आ गया था. उनके माता पिता का नाम कमला और किशनचंद खन्ना था. विनोद खन्ना एक अभिनेता होने के साथ साथ राजनीतिज्ञ भी थे. विनोद की स्कूलिंग नासिक के एक बोर्डिंग स्कूल में हुई, वहीं उन्होंने सिद्धेहम कौलेज से कौमर्स में ग्रेजुएशन किया.

उनके फिल्मी सफर की शुरुआत साल 1968 में हुई. इस साल उनकी पहली फिल्म ‘मन का मीत’ आई. इस फिल्म में उन्होंने हीरो नहीं बल्कि विलेन की भूमिका निभाई थी. इस दौरान उन्होंने बतौर खलनायक कई फिल्मों में काम किया. इन रोल्स में विनोद खन्ना दर्शकों द्वारा काफी पसंद भी किए गए. इसके बाद साल 1971 में उनकी पहली सोलो फिल्म आई. इस फिल्म में वह हीरो बने हुए नजर आए थे. फिल्म का नाम था, ‘हम तुम’ और ‘वो’. कुछ सालों के बाद विनोद का मन शांति और धर्म की तरफ जाने लगा.

अगर बौलीवुड के हैंडसम हंक यानी विनोद खन्ना की बात करें तो वह एक ऐसे सितारे थे, जिन्‍हें कभी सुपरस्टार नहीं पुकारा गया, लेकिन उनके फिल्मों में आने के बाद कोई भी सुपरस्टार ऐसा नहीं रहा, जिसकी कामयाबी में विनोद खन्ना का योगदान न रहा हो. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ को अमिताभ बच्चन की फिल्म के रूप में सभी याद करते हैं, लेकिन क्या आप ‘वकील साहब’ और उनकी दोस्ती के बिना ‘सिकंदर’ के दर्शकों के मन की गहराइयों में उतर जाने की कल्पना कर सकते हैं. ऐसा ही अंदाज सुपरहिट फिल्‍म ‘अमर अकबर एंथनी’ के अमर भी थे.

इस दौरान उन्होंने फिल्मों से सन्यास भी लिया. विनोद इस बीच आचार्य रजनीश यानी ओशो के अनुयायी बने. इसके बाद एक बार फिर से उन्होंने फिल्मों में कमबैक किया. उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 1997 में हुई. साल 1997 और 1999 में वह दो बार पंजाब के गुरदासपुर से भाजपा सांसद चुने गए. साल 2002 में वह संस्कृति और पर्यटन के केंद्रीय मंत्री भी रह चुके थे. इस दौरान मात्र 6 महीनों में ही उन्हे विशेष भार सौंपा गया. विनोद खन्ना को अब विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया. साल 2017 में 70 साल की आयु में लंबे वक्त से बीमार रहने के चलते विनोद खन्ना का निधन हो गया.

विनोद खन्ना की मौत गौल ब्लेडर नामक बीमारी होने की वजह से हो गई. बौलीवुड़ में विनोद खन्ना ने कई फिल्में की हैं, जिसमें से दयावान फिल्म बहुत ही लोकप्रिय रही है. दयावान फिल्म में विनोद खन्ना एक विलेन या हीरो कह सकते हैं दोनों की भूमिका में थे. किसी के लिये वो दयावान थे तो वहीं पुलिस विभाग उन्हें मुजरिम कहा करता था. इस फिल्म के बाद से विनोद खन्ना को दयावान के नाम से जाना जाने लगा.

फिल्‍मों में एक विलेन के रूप में करियर शुरू करने वाले विनोद खन्ना ने अपने करियर में लगभग 150 से ज्‍यादा फिल्‍में की. 1968 में फिल्‍म ‘मन का मीत’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले विनोद खन्ना जब करियर में सुपरहिट हो चुके थे, तभी इस सितारे ने अचानक अध्‍यात्‍म का रुख कर लिया.

साल 2002 में दिये अपने एक इंटरव्यू में विनोद खन्ना ने बताया कि नाम और पैसा कमाने के बावजूद उन्हें जिंदगी में कुछ खालीपन सा लग रहा था. इसे पूरा करने के लिए वह सन्यासी बने और पूरे चार साल तक अमेरिका में आध्यात्मिक गुरु ओशो के आश्रम में बिताए.

आश्रम में विनोद खन्ना हर वो काम करते थे जो शायद एक सेलिब्रिटी रहते उन्होंने कभी करने की सोची भी न होगी. वो सुपरस्टार जो शायद फिल्मों में पहने अपने कपड़े को दोबारा शरीर से लगाता भी न होगा, वह आश्रम जाते ही किसी के लिए मैनेक्वीन तक बन गया था. इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि ओशो से उनकी कद काठी इतनी मिलती जुलती थी कि गुरु से पहले उन्हें उनके कपड़े पहनाए जाते थे.

एक सुपरस्टार के लिए वाकई बड़ी बात थी. कुछ दिन पहले जो शख्स महंगी कार, कीमती कपड़़े और आलीशान घर में रहता था, कुछ ही दिनों में वह टौयलेट साफ कर रहा था, माली का काम कर रहा था. यहां तक कि बर्तन भी साफ करता था.

विनोद खन्ना करियर के शीर्ष पर पहुंचकर रिटायरमेंट लेने वाले पहले बौलीवुड एक्टर थे. पहले डाकू के रोल से लोगों को डराया, फिर पुलिसवाला बनकर उनका दिल जीता भी. लव मेकिंग सीन दिया तो इंडस्ट्री में नया ट्रेंड सेट हो गया पर जब सब सन्यासी बनने का फैसला लिया तो किसी को यकीन नहीं हुआ.

1980 में विनोद खन्ना का मन फिर बदला. वह अपने परिवार के पास वापस लौटना चाहते थे. हालांकि ओशो की ओर से उन्हें औफर भी दिया गया कि वह चाहें तो पुणे के आश्रम की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं, लेकिन विनोद खन्ना ने इंकार कर दिया.

विनोद खन्ना कि एक तस्वीर इंटरनेट पर बहुत वायरल हुई थी जिसमे विनोद काफी कमजोर दिखाई दे रहें थे. उनके साथ उनका बेटा व पत्नी भी थे, आखिरी के दिनों में विनोद खन्ना कुछ ऐसे हो गए थे.

मुझे है सेक्स की जरूरत

“जी हां मैं एक कुंवारा हूं और जब बात औरतों की होती है तो मेरा रवैया किसी संत की तरह नहीं होता है. मुझे भी सेक्स की जरुरत होती है बाकी लोगो की तरह. औरतों के बिना हमारा वजूद नहीं है. सेक्स के बिना हम यहां नहीं रहते तो लोगों को इस बात पर आपत्ति क्यों होती है जब मैं औरतों के साथ होता हूं?” यह बात विनोद खन्ना ने 1992 में एक इंटरव्यू में कही थी. यह उस वक़्त की बात थी जब विनोद खन्ना भगवान रजनीश के आगोश से बाहर निकल चुके थे और अपना खोया हुआ स्टारडम पाने की कोशिश कर रहे थे.

बौलीवुड में खड़ा किया कौम्पिटीशन

विनोद खन्ना पूरी तरह से सुपरस्टार मैटेरियल थे और उन्होंने अपने समकालीन अभिनेताओं की रातों की नींद हराम कर दी थी. अमिताभ बच्चन के स्टारडम को सबसे ज्यादा किसी से नुकसान हुआ था तो वो विनोद खन्ना ही थे. लेकिन विनोद ने अपने करियर के शिखर पर पहुंच कर इन सभी का त्याग कर दिया था. उन्होंने यह सब कुछ अपने करियर के एक शानदार फेज में पहुंच कर क्यों ठुकरा दिया था इसकी वजह की जानकारी कम है लेकिन अगर आप उस ज़माने के पीरीओडिकल और फिल्म मैगज़ीन को पढ़ें तो इसके बारे में कुछ चीज़ें निकल कर सामने आती है.

ये भी आश्चर्य की बात है कि अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा से लेकर ऋषि कपूर के बारे में आपको किताबें मिल जाएंगी लेकिन अगर आपको विनोद खन्ना के बारे में कुछ जानना है तो शायद आपके सामने एक दीवार खड़ी मिलेगी. जो इंटरव्यू उन्होंने निजी चैनल को दिया था. उसको देखने के बाद उनके जीवन के कई पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है. ये इंटरव्यू तब लिया गया था जब उन्होंने कविता दफ्तरी से दूसरी शादी रचाई थी.

दरियादिल इंसान थे विनोद खन्ना

एफटीआईआईटी से पढ़ी निर्देशिका अरुणा राजे का विनोद खन्ना से पुराना सम्बन्ध था और उनके निर्देशन में विनोद खन्ना ने दो फिल्में की थीं. अरुणा राजे ने अपनी किताब फ़्रीडम में विनोद के कुछ पहलुओं पर रोशनी डाली है जिसकी जानकारी कम लोगों को है. अपनी किताब में उन्होंने एक क़िस्से का बखान किया है जो फिल्म रिहाई की शूटिंग के दौरान हुआ था. फिल्म ख़त्म होते होते फिल्म का बजट भी लगभग ख़त्म हो चुका था. अरुणा ने अपनी फिल्म के लिए ओवरसीज के कुछ डिस्ट्रीब्यूटर्स से उधार लेने के अलावा एनएफडीसी से दस लाख रूपये भी लिए थे. नौबत यहां तक आ पहुंची कि फिल्म के पहले प्रिंट को निकलने के लिए पैसे बिल्कुल भी नहीं थे

फिल्म की डबिंग के दौरान जब विनोद को यह पता चला की माजरा क्या है तो बिना कुछ कहे वो अपनी गाड़ी के अंदर गए और कुछ समय के बाद अरुणा के हाथों में तीस हज़ार रुपये रख दिए और कहा कि जब उनके पास पैसे आ जाएं तब दे देना. उसी फिल्म की शूटिंग के दौरान अरुणा ने एक और किस्सा अपनी किताब में साझा किया है. जब रिहाई की शूटिंग अहमदाबाद के पास वडनगर में चल रही थी तब बजट के अभाव में फिल्म की पूरी यूनिट को काफी तंगी में काम करना पड़ता था. विनोद को जब यह बात समझ में आ गई तब उन्होंने पूरी टीम के साथ शूटिंग शेड्यूल उन्हीं के होटल में गुजारी जो बेहद ही सस्ता होटल था.

वायरलेस या यूएसबी स्पीकर, कौन सा है आपके लिये सही

ज्यादातर कंप्यूटर में मौजूद स्पीकर की क्वालिटी आपके मनमुताबिक नहीं होती है. इसका मुख्य कारण ये है कि कंप्यूटर के साथ दिए गए स्पीकर कम बजट के होते हैं. जिसके कारण इनकी साउंड क्वालिटी अच्छी नहीं होती है.

ऐसे में यूजर्स सस्ते स्पीकर्स के बदले अच्छी साउंड क्वालिटी वाले स्पीकर को अलग से खरीदना पसंद करते हैं. बाजार में कई अलग अलग पीसी स्पीकर उपलब्ध हैं. इनमें कुछ यूएसबी स्पीकर्स है और वायरलेस स्पीकर्स. आज हम आपको यूएसबी स्पीकर्स और वायरलेस स्पीकर्स के बीच के अंतर को बताने जा रहे हैं. तो दरा ध्यान दे यहां.

यूएसबी डेस्कटौप साउंड

आज के समय में यूजर्स यूएसबी साउंड को ज्यादा पसंद करते हैं. यही कारण है कि बाजार में यूएसबी स्पीकर्स की बिक्री सबसे ज्यादा होती है. यूएसबी केबल के माध्यम से इसे पावर देता है और यह 5 वोल्ट पर काम करता है.

ये यूएसबी डेस्कटौप स्पीकर्स कई अलग अलग फीचर्स के साथ आते हैं. जिनमें से ये कुछ खास हैं.

इन स्पीकर्स में पावर और साउंड का इस्तेमाल आप तब भी कर सकते है जब ये किसी दूसरे काम के लिए औडियो आउटपुट से कनेक्ट हो

  • इन स्पीकर्स को सीडी प्लेयर से कनेक्ट किया जा सकता है साथ ही, इसका इस्तेमाल आप लैपटौप पर भी कर सकते हैं.
  • इन स्पीकर्स का प्रयोग MP3 प्लेयर्स और डेस्कटौप स्पीकर्स के लिए भी किया जा सकता

यूएसबी स्पीकर्स की खूबियां

  • इन स्पीकर्स को बड़े एसी एडौप्टर या आउटलेट की जरुरत नहीं होती है.
  • ये स्पीकर्स डिवाइस से कनेक्ट करने पर खुद ब खुद ही औन हो जाते हैं.
  • इन्हें आसानी से इंस्टौल किया जा सकता है.
  • इन स्पीकर्स का फ्रिक्वेंसी रिस्पौन्स टाइम काफी तेज होता है.

यूएसबी स्पीकर्स की खामियां

  • USB स्पीकर्स ज्यादा रिसोर्स का उपयोग करते हैं.

वायरलेस स्पीकर्स

वायरलेस डेस्कटौप स्पीकर्स एक बेहतरीन आविष्कार हैं क्योंकि इसका इस्तेमाल आप बिना तारों के कर सकते हैं. यह लैपटौप और कंप्यूटर पर काम करता है तथा यह मोबाईल से भी कनेक्ट हो जाता है. यह यूएसबी स्पीकर्स की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय है.

वायरलेस स्पीकर्स की खूबियां

  • आप वायरलेस औडियो को सीधे नेट से स्ट्रीम कर सकते हैं.
  • इसमें मल्टीमीडिया एंटरटेनमेंट का आनंद ले सकते हैं.
  • आप अपने कंप्यूटर पर अपनी पसंद के गाने प्ले कर सकते हैं और अपने घर में किसी भी कोने में स्पीकर को रख सकते हैं.
  • आप इन वायरलेस स्पीकर्स को अपने पहले के स्टीरियो सिस्टम में जोड़ सकते हैं.
  • इन स्पीकर्स में आपको राउटर की आवश्यकता नहीं होगी. साथ ही, इसमें आपको कोई हाईफाई वायरलेस डेस्कटौप स्पीकर्स खरीदने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी.
  • इन वायरलेस डेस्कटौप स्पीकर्स के साथ आप अपने MP3, midi’s, आईट्यून्स डाउनलोड कर सकते हैं. इसे अपने घर के किसी भी कोने में रख कर सुन सकते हैं. इसके लिए आपको सिर्फ कंप्यूटर की जरुरत पड़ेगी.

आप चाहे यूएसबी स्पीकर खरीदें या वायरलेस स्पीकर्स, यह आपकी जरुरत के मुताबिक है. USB स्पीकर और वायरलेस स्पीकर दोनों ही आपके लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.

मौनसून में ऐसे हों परिधान तो परेशानियां रहेंगी आपसे बहुत दूर

मौनसून की बारिश यकीनन गरमी से राहत दिलाती है, मगर इस सीजन में परेशानियां भी कम नहीं होती हैं, जैसे जलभराव के कारण जाम में फंस जाना, बारिश में भीग जाना, कपड़ों पर दागधब्बे लग जाना आदि.

माना कि मौनसून की इन परेशानियों से बचा नहीं जा सकता, लेकिन इस सीजन के अनुकूल परिधान पहन कर परेशानियों को कम जरूर कर सकती हैं. पेश हैं, इस मौसम के कुछ ड्रैसिंग टिप्स:

जींस और कौरडरौय को करें अवाइड

भले ही ये आप को कितने ही पसंद क्यों न हों, लेकिन इन्हें पहन कर आप बारिश में भीग गईं तो ये आप को खासी परेशानी दे सकते हैं. ये काफी मात्रा में पानी सोख लेते हैं और फिर जल्दी सूखते भी नहीं हैं. सूखने में कम से कम 1 दिन लग ही जाता है. फिर इतने ज्यादा भीगे कपड़े पहनने से न केवल आप असहज महसूस करेंगी, बल्कि ये आप के शरीर को नम भी कर सकते हैं. इतना ही नहीं फंगल एवं बैक्टीरियल संक्रमण से भी ग्रस्त कर सकते हैं.

चुनें शौर्ट एवं कैप्री

कैप्रीज, शौर्ट, स्कर्ट इस मौसम के लिए बैस्ट हैं. ये न केवल आप को कूल और आरामदायक रखेंगे, बल्कि बारिश में फंस जाएं तो असुविधा भी कम होगी. हां,यह सुनिश्चित कर लें कि कैप्री शरीर से चिपकने वाली यानी बहुत टाइट न हो. पर्याप्त ढीली हो, ताकि जल्दी सूख सके. शौर्ट भी ऐसा हो जिस पर रोड पर चलते समय छींटों के दाग न पड़ें.

चुनें गहरे और चमकीले रंगों की ट्यूनिक

मौनसून गहरे और चमकीले रंग पहनने का मौसम होता है. ट्यूनिक को पैरों में फ्लैट फ्लिप फ्लौप के साथ, लाइट लैगिंग या कैप्री के साथ स्टाइल किया जा सकता है. ऐसी ड्रैसिंग बेहद आरामदायक अनुभव देती है.

कुछ डार्क कलर जैसे नेवी ब्लू या डार्क ग्रीन को अपने वार्डरोब में शामिल कर के अपने आसपास के सुस्त, ग्रे क्लाउडी वातावरण में चमक ला सकते हैं.

ढीला और हलका टौप चुनें

रोजाना पहनने के लिए शौर्ट कुरती, रूमी टौप और अलकी टीशर्ट आम हैं. फैब्रिक भी हलका चुनें जैसे लायक्रा या पौलिएस्टर जो कि रिंकल फ्री भी होता है और कौटन के मुकाबले सूखता भी जल्दी है.

लाइट चैकर्ड फौर्मल लुक को कहें हां

इस सीजन में आरामदायक और हलकी हाफ स्लीव फौर्मल शर्ट चलन में होती है, जो औफिस लुक के लिए एकदम परफैक्ट है, जो औफिस में टीशर्ट नहीं पहन सकतीं, उन के लिए हाफ स्लीव फौर्मल शर्ट बेहतर विकल्प हो सकती है.

ट्रांसपैरेंट कपड़ों को कहें न

यदि आप ट्रांसपैरेंट टौप या कुरता पहनती हैं तो बारिश आप को शर्मिंदा कर सकती है. इसलिए ध्यान रखें, बारिश में हमेशा सौलिड और डार्क कलर के टौप का ही चुनाव करें. ऐसे कपड़े पहन कर आप बेफिक्र मौसम का लुत्फ भी उठा सकती हैं. सौलिड ड्रैस मैटीरियल पहनने का एक और प्लस प्वौइंट यह है कि अगर आप बारिश में भीग जाएं तो आप के कपड़े जल्दी सूख जाते हैं. फिर अंडरशर्ट पहनने की भी जरूरत नहीं रहती.

वार्डरोब में रखें कुछ हलकी विंडचीटर्स

आप को अपने बैग में हमेशा एक अल्ट्रा लाइट विंडचीटर ले जाने की सलाह दी जाती है. बारिश होने के दौरान आप इसे जल्दी से पहन सकती हैं और यह आप के कपड़ों को बूंदाबांदी के साथसाथ सड़क पर वाहनों के जरीए उड़ने वाले कीचड़ से भी बचाएगी. यदि आप को अचानक ठंड महसूस हो, तो यह आप को गरम भी रखेगी.

पहने आरामदायक और मजबूत फुटवियर

सड़क पर फिसलने या सड़क पर कीचड़ से बचने के लिए आरामदायक जूते पहनना बहुत जरूरी है. वाटरपू्रफ लैदर स्लिप ओन्स, फ्लोटर्स या स्नीकर्स इस सीजन के लिए बैस्ट हैं, क्योंकि ये आप को बारिश से सुरक्षित रखेंगे और जल्दी खराब भी नहीं होंगे, तो कुछ समय के लिए अपने फौर्मल शूज को कह दें बायबाय.

– मोनिका ओसवाल, ऐग्जीक्यूटिव डाइरैक्टर, मोंटे कार्लो

मैं तो भूल चली बाबुल का देश, पिया का घर प्यारा लगे…

युवतियों को मायके में बातबात पर उलाहने दिए जाते हैं कि ससुराल जा कर ये शौक पूरे करना, यहां हम तो बरदाश्त कर रहे हैं, जब अपनी ससुराल जाओगी तब पता चलेगा, वहां सास के नखरे उठाने पड़ेंगे तब दिमाग दुरुस्त होगा. ऐसे में युवतियों के मन में ससुराल को ले कर नकारात्मक छवि बन जाती है और वे मायके से विदा होते समय ढेरों शंकाओं की गठरी लिए ससुराल में कदम रखती हैं.

किंतु जब उन की सोच के विपरीत आधुनिक विचारधारा की ससुराल और सुलझे मनमस्तिष्क की सासें उन का खुले दिल से स्वागत करती हैं तो उन की दबी इच्छाएं फिर से जाग्रत हो उठती हैं.

वे अपनी नौकरी, व्यवसाय या शौक को पूरा करने में अपनी सास का सहयोग पा भावविभोर हो उठती हैं और सासबहू का रिश्ता सासबहू के पारंपरिक रूप से आगे बढ़ मित्रवत रूप ले लेता है, जहां हर समस्या का समाधान मिलजुल कर निकाल लिया जाता है और घर के अन्य सदस्यों को भनक भी नहीं लग पाती.

सासबहुओं की बेजोड़ जोडि़यां

आइए ऐसी कुछ सासबहुओं की जोडि़यों से मिलवाते हैं, जो एकदूसरे के संगसाथ में ऐसे घुलमिल गई हैं जैसे दूध में पानी मिल जाता है.

मीनाक्षी पाठक सौफ्टवेयर इंजीनियर है और मीडिया अपार्टमैंट गाजियाबाद में रहती है. उस का इस रिश्ते के विषय में कहना है, ‘‘मुझे अपनी सास से नौकरी करने में पूर्ण सहयोग मिलता है. जहां मेरी अन्य सहेलियां लंच टाइम में अपनीअपनी सास को ले कर टीकाटिप्पणी में व्यस्त रहती हैं वहीं मैं सास के संरक्षण में रह रहे अपने बच्चों की तरफ से पूरी तरह निश्ंिचत रहती हूं कि वे स्कूल से घर आ कर लंच कर सो गए होंगे. इतना ही नहीं मेरी सास मेरे पहनावे को ले कर भी कोई टीकाटिप्पणी नहीं करती हैं और न ही किसी तरह का दिखावा. दूसरों की देखादेखी करने को कहती हैं. मैं अपनी पसंद की वेशभूषा धारण करने की आजादी का जश्न मनाती हूं.’’

मीनाक्षी का कहना है, ‘‘मेरी अपनी बेटियां विदा हो दूसरे शहरों में हैं, किंतु मेरी यह बेटी मेरे साथ है, जो मेरे खानपान, दवा, फल, हर दुखतकलीफ का पूरा खयाल करती है. घर में आने वाली मेरी सहेलियों का भी पूरापूरा स्वागतसत्कार करती है. ऐसे में मुझे अपनी बेटी से शिकायत की गुंजाइश ही कहां रहती है.’’

उदाहरण और भी

वैशाली, गाजियाबाद में रहने वाली एमबीए स्वेता नागोई का कहना है, ‘‘मैं अपना बिजनैस करना चाहती थी, जिस की इजाजत मुझे मेरे मायके में नहीं मिली. किंतु ससुराल में मेरी सास के सहयोगात्मक रवैए के कारण आज मैं खुद का आर्टिफिशियल ज्वैलरी का व्यवसाय घर बैठे कर पा रही हूं. मेरे छोटे बेटे की देखभाल उन की बदौलत ही संभव हो पाई है.

‘‘लोग कहते हैं कि सास कभी मां नहीं बन सकती, मगर ऐसा बिलकुल नहीं है. अगर आप रिश्तों को मान दें तो हर सासबहू मांबेटी बन सकती हैं.’’

स्वेता की सास का कहना है, ‘‘मैं अपनी बहू के पहनावे या कार्य को ले कर कभी हस्तक्षेप नहीं करती. मेरा मानना है अपने बड़ों की दिल से इज्जत करो, दिखावे के लिए नहीं. मेरी बहू ऐसा ही करती है. मैं भी अपनी बहू का व उस की आत्मनिर्भरता का पूरा सम्मान करती हूं.’’

फरीदाबाद में रहने वाली तनु खुराना सरकारी संस्थान में सौफ्टवेयर इंजीनियर है. वह इस रिश्ते को ले कर बेहद भावुक हो उठती है. उस का कहना है, ‘‘मैं ब्राह्मण परिवार से हूं और प्रेम विवाह कर पंजाबी परिवार में आई हूं. जहां का खानपान व आधुनिक रहनसहन मेरे पारंपरिक परिवार से एकदम जुदा है.

‘‘मगर अपनी सासूमां के सहयोग से मैं पूरी तरह अपनी ससुराल के रंग में रंग गई हूं, क्योंकि यहां मुझे अपनी नौकरी को ले कर कोई तनाव नहीं रहता है. अगर मुझे कभी औफिस के लिए देर हो रही हो तो मेरी सास नाश्ता भी तैयार कर मुझे दे देती है. हम पतिपत्नी वीकैंड में लेटनाइट पार्टी करें तो भी उन्हें कोई एतराजनहीं होता.’’

वहीं तनु की सास किरन खुराना का कहना है, ‘‘मेरे 3 बेटे हैं. मन में बेटी का बड़ा अरमान था जो बड़ी बहू तनु के रूप में पूरा हुआ. तनु का सजनेसंवरने का शौक मुझे आनंद देता है. हम सासबहू साथ ब्यूटी पार्लर जाती हैं, शौपिंग करती हैं.’’

भोपाल कोलार रोड की नीतू गौतम अपनी व्यायाम की क्लासेज लेती है. उस का मानना है, ‘‘मेरी क्लासेज का समय सुबह और शाम का है जो घर का सब से व्यस्त समय होता है, मगर अपनी सास के सहयोग से मैं अपने घर को मैनेज कर लेती हूं. मुझे अपने पति और बेटे के सुबह के नाश्ते की चिंता नहीं करनी पड़ती. सासूमां की वजह से व्यायाम क्लासेज का अपना सपना पूरा कर पा रही हूं.’’

रिश्ता समझदारी का

नीतू की सास चंदा गौतम का कहना है, ‘‘जहां घर में बड़ी होने के कारण परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखना मेरा कर्तव्य है वहीं परिवार को जोड़े रखने के लिए सभी का सहयोग भी जरूरी होता है. नीतू मेरा सम्मान भी करती है और कुछ भी करने से पहले मुझ से सलाह जरूरी ले लेती है.’’

गृहिणी चहक मोर्दिया का कहना है, ‘‘मैं एकल परिवार ग्वालियर से हूं और विवाह के बाद संयुक्त परिवार सतना में जब दूसरे नंबर की बहू बन कर आई तो मन में एक भय था कि सभी को खुश कर पाना संभव नहीं हो पाएगा. मगर सासूमां ने घर गृहस्थी के कामकाज को इतने प्रेम व धैर्यपूर्वक समझाया कि आज मैं एक कुशल गृहिणी बन गई हूं व मेरे परिवार में सभी मुझे बहुत प्यार देते हैं, हम सब साथ में पिकनिक मनाने भी जाते हैं. मेरी सासूमां बेकार की टोकाटाकी नहीं करतीं. मुझे उन की यह आदत बहुत पसंद है.’’

वहीं चहक की सास मोर्दिया का कहना है, ‘‘बहू में सीखने की ललक देख कर मेरा मन भी उसे नईनई जानकारी देने का करता था. बहुत जल्द ही उस ने यहां के तौरतरीके  सीख लिए. बेटे अपनी गृहस्थी में खुश रहें, हर मां यही तो चाहती है. बच्चे इस उम्र में मौजमस्ती नहीं करेंगे तो कब करेंगे?’’

इन जोडि़यों से मिल कर यही निष्कर्ष निकलता है कि ससुराल में जब बहू का सामना सास से होता है तो मन में बचपन से बैठाया सास नामक भय हावी हो जाता है.

मगर जब यही सास प्यार से बहू का हाथ थाम कर धैर्यपूर्वक घर गृहस्थी का पाठ सिखाती है, बहू को उस की मनमरजी के मुताबिक अपना व्यवसाय, नौकरी या फिर शौक को पूरा करने में सहयोग प्रदान करती है तो बहू का मनमयूर नाच उठता है और वह कह उठती है मैं तो भूल चली बाबुल का देश, पिया का घर प्यारा लगे…’’

बेटी के गुनाहगार बन गए मां बाप, कर दी अपने दामाद की हत्या

इसी साल 17 मई की सुबह के करीब साढ़े 7, पौने 8 बजे का समय रहा होगा, जब जयपुर की जगदंबा विहार कालोनी में सिविल इंजीनियर अमित नायर के घर के बाहर एक होंडा अमेज कार आ कर रुकी. कार से 4 लोग उतरे, जिन में एक महिला भी थी. उन में से एक आदमी कार के पास खड़ा हो गया तो बाकी महिला समेत 3 लोग घर के सामने जा कर खड़े हो गए.

उन में से अधेड़ उम्र के एक आदमी ने आगे बढ़ कर घर की डोरबेल बजाई. डोरबेल की आवाज सुन कर अमित नायर की पत्नी ममता ने गेट खोला. गेट के बाहर पापामम्मी को देख कर वह खुशी से फूली नहीं समाई. वह शिकायत भरे लहजे में पापा से लिपट कर बोली, ‘‘पापा, बेटीदामाद की याद नहीं आई क्या, जो इतने दिनों बाद आज आए हो?’’

ममता जिस आदमी से लिपटी थी, वह उस के पिता थे. उन का नाम जीवनराम था. उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी. आखिर हम तेरे मांबाप हैं. तूने भले ही अपनी मनमरजी कर ली है, लेकिन हम तुझे कैसे भूल सकते हैं.’’

‘‘पापा, आप लोग बाहर ही खड़े रहेंगे या घर के अंदर भी आएंगे?’’ ममता ने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘‘मम्मी, आप क्यों चुपचाप खड़ी हैं?’’

‘‘बेटी, आज हम सब तुम से ही मिलने आए हैं.’’ मां भगवानी देवी ने कहा.

‘‘पापा, ये आप के साथ कौन लोग हैं, मैं इन्हें नहीं जानती?’’ ममता ने शंका भरे लहजे में पूछा.

जीवनराम ने ममता को भरोसा दिलाया, ‘‘बेटी, ये हमारे जानकार हैं. हम साथसाथ कहीं जा रहे थे. सोचा, बेटी का घर रास्ते में है तो उस से मिलते चलें. इसी बहाने आपसी गिलेशिकवे भी दूर हो जाएंगे.’’

‘‘आओ, अंदर आ जाओ.’’ ममता ने मम्मीपापा व उन के साथ आए लोगों से कहा, ‘‘आप सब चायनाश्ता कर के जाना.’’

ममता के कहने पर जीवनराम, उन की पत्नी भगवानी देवी और उन के साथ आया वह आदमी ममता के साथ घर के अंदर जा कर ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर बैठ गए.

हालांकि सुबह का समय था, लेकिन सूरज की तपन से गरमी बढ़ने लगी थी. इसलिए ममता ने ड्राइंगरूम का एसी औन कर दिया. इस के बाद फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और 3 गिलासों में पानी डाला. तीनों गिलास एक ट्रे में रख कर वह ड्राइंगरूम में पहुंची और मम्मीपापा व उन के साथ आए व्यक्ति को एकएक गिलास दे दिया. तीनों ने पानी पिया.crime story

पानी पीने के बाद जीवनराम ने पूछा, ‘‘बेटी, दामादजी नजर नहीं आ रहे, वह कहां हैं?’’

‘‘पापा, वह अभी सो रहे हैं. वह थोड़ा देर से उठते हैं, लेकिन आप आए हैं तो मैं उन्हें उठाए देती हूं.’’ ममता ने हंसते हुए कहा.

‘‘ठीक है बेटी, दामादजी को जगा दो, उन से भी गिलेशिकवे दूर कर लें.’’ जीवनराम ने लंबी सांस ले कर कहा.

पापा के कहने पर ममता बैडरूम में गई और पति अमित को जगा कर बोली, ‘‘मम्मीपापा आए हैं, आपसी गिलेशिकवे दूर करना चाहते हैं.’’

ममता के पापामम्मी के आने की बात सुन कर अमित हैरान रह गया. वह जल्दी से उठा और वाशबेसिन पर जा कर मुंह धोया. तौलिए से मुंह पोंछते हुए वह ड्राइंगरूम में पहुंचा और ममता के मम्मीपापा को हाथ जोड़ कर नमस्कार कर के बोला, ‘‘पापाजी, आज आप को हमारी याद कैसे आ गई?’’

‘‘बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ जीवनराम ने कहा, ‘‘तुम से शादी करने के बाद ममता तो हमें भूल ही गई. उसे हमारे साथ भेज दो तो कुछ दिन हमारे साथ रह लेगी. वैसे भी वह प्रैग्नेंट है, इसलिए उसे आराम की जरूरत है.’’

अमित के जवाब देने से पहले ही ममता ने पिता की बात काट कर कहा, ‘‘पापा, मैं कहीं नहीं जाऊंगी. मुझे यहां किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं है.’’

अमित ने ममता की बात का समर्थन किया, ‘‘पापाजी, ममता आप के साथ नहीं जाना चाहती, इस का कहीं जाने का मन नहीं है.’’

ममता और अमित की बातें सुन कर जीवनराम गुस्से से उबल पड़े, लेकिन उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया. उन्होंने अपने साथ आए युवक को इशारा किया. इशारा मिलते ही उस ने पिस्तौल निकाली और अमित पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाने लगा. कई गोलियां लगने से अमित ड्राइंगरूम में ही फर्श पर गिर पड़ा. उस के सीने, गरदन और पैर में 4 गोलियां लगीं.

अमित के गिरते ही ममता चीखने लगी. जीवनराम और उस की पत्नी ममता के बाल पकड़ कर घसीटते हुए जबरन अपने साथ ले जाने लगे, लेकिन तब तक गोलियों की आवाज और ममता की चीखें सुन कर अंदर से अमित की मां रमा देवी आ गई थीं. कुछ पड़ोसी भी आ गए थे. कार के पास खड़े व्यक्ति ने गोलियों की आवाज सुन कर कार स्टार्ट कर दी थी. जीवनराम, भगवानी देवी और उन के साथ आया युवक बाहर खड़ी कार में बैठ कर फरार हो गए.

दिनदहाड़े घर में घुस कर अमित नायर की हत्या किए जाने से कालोनी में हड़कंप मच गया. आसपास के लोग अमित के मकान पर एकत्र हो गए. पुलिस को सूचना दी गई तो पुलिस ने वायरलैस पर सूचना दे कर नाकेबंदी करा दी. पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल पर पूछताछ में जो बातें सामने आईं, उस से साफ हो गया कि यह औनर किलिंग का मामला था.

अमित की हत्या उस के सासससुर ने अपने साथ लाए भाड़े के शूटर से कराई थी. मातापिता ने ही अपनी बेटी की मांग उजाड़ दी थी.crime story

आमतौर पर औनर किलिंग के ज्यादातर मामले हरियाणा के जाट समुदाय में सामने आए हैं. राजस्थान में हरियाणा से सटे इलाकों में ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं, लेकिन राजधानी जयपुर में औनर किलिंग की संभवत: इस पहली घटना ने पुलिस अधिकारियों को झकझोर दिया था.

रमा देवी ने उसी दिन थाना करणी विहार में अपने बेटे अमित के सासससुर व 2 अन्य लोगों के खिलाफ घर पर आ कर अमित की गोली मार कर हत्या करने व बहू ममता को जबरन ले जाने का प्रयास करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने यह मामला भारतीय दंड विधान की धारा 453, 302 व 120बी के अंतर्गत दर्ज किया.

पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार, पुलिस उपायुक्त जयपुर (पश्चिम) अशोक कुमार गुप्ता, पुलिस उपायुक्त (अपराध) विकास पाठक के निर्देशन में कई पुलिस टीमों का गठन किया. इन टीमों में अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त जयपुर (पश्चिम) रतन सिंह, सहायक पुलिस आयुक्त वैशालीनगर रामअवतार सोनी, करणी विहार थानाप्रभारी महावीर सिंह, चौमूं थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह सोलंकी, हरमाड़ा थानाप्रभारी लखन सिंह खटाना, भांकरोटा थानाप्रभारी हेमेंद्र कुमार शर्मा, सेज थानाप्रभारी गयासुद्दीन, झोटवाड़ा थानाप्रभारी गुर भूपेंद्र सिंह, वैशालीनगर थानाप्रभारी भोपाल सिंह भाटी और यातायात पुलिस इंसपेक्टर निहाल सिंह को शामिल किया गया.

इन के अलावा एफएसएल, एमओबी शाखा व साइबर सेल की सहायता से अमित नायर हत्याकांड की जांच शुरू कर के अभियुक्तों की तलाश शुरू कर दी गई. दूसरे दिन पुलिस ने शूटर का स्कैच बनवा कर जारी कर दिया.

पुलिस को अमित के सासससुर और रिश्तेदारों के नामपते पता चल गए थे. अमित के ससुर जीवनराम जाट मूलरूप से सीकर जिले के थाना लोसल के गांव मोरडूंगा के रहने वाले थे. फिलहाल वह जयपुर के वैशालीनगर में झारखंड मोड़ स्थित गणेश कालोनी में रह रहे थे.

पुलिस को शूटरों का पता जीवनराम से ही मिल सकता था, साथ ही अमित की हत्या का कारण भी उन के पकड़ में आने के बाद ही पता चल सकता था. इसलिए पुलिस ने जीवनराम को गिरफ्तार करने के लिए जयपुर, सीकर, लोसल, नागौर जिले में डीडवाना, कुचामन, लाडनूं, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, दिल्ली व हरियाणा में स्थित उस के घर वालों तथा रिश्तेदारों के यहां कई जगहों पर दबिश दी.

 

जांच के दौरान पुलिस को नागौर जिले के डीडवाना कस्बे में वह कार मिल गई, जिस में अमित की हत्या के आरोपी उस के घर आए थे. पुलिस को पता चला कि जीवनराम का बेटा मुकेश डीडवाना में ही रहता है. वह रेलवे में जेईएन है. जांच में पता चला कि अमित की हत्या से पहले और बाद में मुकेश लगातार मातापिता के संपर्क में था.

पुलिस ने अमित की हत्या की साजिश के आरोप में 19 मई को मुकेश को गिरफ्तार कर लिया. मुकेश ने पूछताछ में बताया कि अमित की हत्या के बाद मां भगवानी देवी व पिता जीवनराम जयपुर से सीधे डीडवाना आए थे. वे दोनों करीब 10 मिनट उस के पास रुके थे. इस दौरान जीवनराम ने मुकेश को बताया था कि अमित का काम तमाम कर दिया गया है. इस के बाद वे चले गए थे. पुलिस को मुकेश से पूछताछ में इस मामले में कुछ अहम जानकारियां मिलीं. इन जानकारियों के आधार पर पुलिस लगातार अभियुक्तों की तलाश में जुटी रही.

लगातार प्रयास के बाद पुलिस ने आखिर 24 मई को 4 आरोपियों जीवनराम, उस की पत्नी भगवानी देवी के अलावा उन के ही गांव मोरडूंगा के रहने वाले भगवानाराम जाट तथा नागौर जिले के मौलासर थाना के गांव कीचक निवासी रवि उर्फ रविंद्र शेखावत को गिरफ्तार कर लिया.

इन में मोरडूंगा निवासी भगवानाराम जाट पंचायत समिति का पूर्व सदस्य था. रवि उर्फ रविंद्र शेखावत शूटर था. उस ने इस घटना से करीब 6 महीने पहले 3 लाख रुपए में अमित की हत्या की सुपारी ली थी. पुलिस ने जीवनराम को हरियाणा के कैथल, भगवानी देवी और पूर्व पंचायत समिति सदस्य भगवानाराम जाट को सीकर तथा रवि उर्फ रविंद्र शेखावत को जयपुर से पकड़ा था.

crime storyआरोपियों से पूछताछ में पुलिस को अमित की हत्या करने वाले शूटरों का पता चल गया था. पूछताछ में जीवनराम ने पुलिस को बताया था कि भाड़े के 2 शूटरों विनोद गोरा तथा रामदेवलाल ने गोलियां चला कर अमित को मौत की नींद सुलाया था. ये दोनों शूटर भी जीवनराम के साथ ही कार से फरार हो गए थे.

बाद में दोनों शूटर जीवनराम से अलग हो कर गुजरात के शहर सूरत चले गए थे. यह सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस की 2 टीमें शूटरों की तलाश में सूरत गईं, लेकिन तब तक वे दोनों सूरत से मुंबई चले गए थे. जयपुर पुलिस मुंबई पहुंची तो पता चला कि दोनों शूटर गोवा चले गए हैं.

जयपुर पुलिस की टीमें शूटरों का लगातार पीछा कर रही थीं. जयपुर पुलिस के गोवा पहुंचने से पहले ही वे वहां से भी चले गए थे. दोनों शूटरों का पीछा करते हुए जयपुर पुलिस राजस्थान के नागौर आ गई. नागौर जिले के कुचामन सिटी की कृष्णा कालोनी के एक मकान में दोनों शूटरों के होने की सूचना पर पुलिस ने 5 जून को देर रात दबिश दी.

दबिश में विनोद गोरा पकड़ा गया, जबकि रामदेवलाल नहीं मिला. पता चला कि वह कुचामन से उसी दिन विनोद गोरा से अलग हो गया था. लाडनूं निवासी गिरफ्तार शूटर विनोद गोरा ने पुलिस को बताया कि जीवनराम ने अमित को मारने के लिए उसे व रामदेवलाल को 2 लाख रुपए की सुपारी दी थी. वारदात के दौरान विनोद गोरा अमित के घर के बाहर हथियार ले कर खड़ा था, जबकि रामदेवलाल घर के अंदर गया था.

दोनों शूटरों ने तय किया था कि घर के अंदर अगर रामदेवलाल किसी कारण से अमित की हत्या में सफल नहीं हो पाता तो विनोद उस की मदद करेगा. अमित की हत्या के बाद जीवनराम ने दोनों शूटरों को 50 हजार रुपए दिए थे.

गिरफ्तार आरोपियों व अमित की पत्नी ममता से पूछताछ के बाद औनर किलिंग के नाम पर अमित की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह जीवनराम जाट और उस के परिवार की झूठी आनबानशान और इज्जत का दिखावा मात्र थी.

सीकर जिले के थाना लोसल के गांव मोरडूंगा का रहने वाला जीवनराम जाट सेना में नौकरी करता था. वह सेना की 221 मीडियम आर्टिलरी से सन 2000 में रिटायर हुआ था. इस के बाद वह परिवार के साथ जयपुर में रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी भगवानी देवी के अलावा बेटा मुकेश और बेटी ममता थी. सेना से रिटायर होने के बाद वह नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में ड्राइवर हो गया था.

दूसरी ओर अमित नायर के पिता राघवन सोमन मूलरूप से केरल के रहने वाले थे. वह जयपुर में ए श्रेणी के ठेकेदार थे. अमित की मां रमादेवी जयपुर से नर्स के पद से रिटायर हुई थीं. राघवन का करीब ढाई-3 साल पहले निधन हो गया था.

उस समय ममता और अमित के परिवार जयपुर के वैशालीनगर में आसपास रहते थे. दोनों परिवारों में अच्छा परिचय था. जीवनराम का बेटा मुकेश और अमित नायर जयपुर के केंद्रीय विद्यालय संख्या-4 में साथसाथ पढ़ते थे. वहीं दोनों की आपस में दोस्ती हो गई थी. जीवनराम की बेटी ममता जयपुर के ही केंद्रीय विद्यालय संख्या-2 में पढ़ती थी.

बाद में अमित ने जयपुर के ज्योतिराव फुले कालेज से बीटेक की पढ़ाई पूरी की. ममता ने मोदी इंस्टीट्यूट लक्ष्मणगढ़ से एलएलबी की पढ़ाई की और मुकेश ने पूर्णिमा कालेज से बीटेक किया.

आसपास रहने और केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई करने के दौरान ही अमित का अपने सहपाठी मुकेश की बहन ममता से परिचय हुआ. कालेज स्तर की पढ़ाई के दौरान उन का यह परिचय प्यार में बदल गया. हालांकि दोनों अलगअलग कालेजों में पढ़ते थे, लेकिन प्यार की पींगें बढ़ाने के लिए वे समय निकाल ही लेते थे.crime story

ममता ने अपने प्यार की भनक घर वालों को नहीं लगने दी. जब ममता और अमित का प्यार परवान चढ़ने लगा तो दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. लेकिन इस में परेशानी यह थी कि दोनों अलगअलग जाति से थे. ममता जहां जाट परिवार की बेटी थी, वहीं अमित दक्षिण भारतीय था.

ममता को अच्छी तरह पता था कि उस के घर वाले अमित और उस की शादी को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. जातिसमाज के बंधनों को देखते हुए अमित और ममता ने सन 2011 में आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली, लेकिन इस शादी का अपने परिवार वालों को पता नहीं लगने दिया. भले ही उन दोनों ने शादी कर ली थी, लेकिन वे अपनेअपने घरों पर अलगअलग ही रहते थे.

सन 2015 में जब ममता की एलएलबी की पढ़ाई पूरी हो गई तो अमित व ममता ने अपनी शादी परिवार और समाज में जाहिर करने का फैसला कर लिया. एक दिन ममता ने अमित से अपनी शादी की बात अपने मातापिता को बता दी और उन की इच्छा के खिलाफ उसी दिन घर छोड़ कर अमित के साथ रहने चली गई. तब तक अमित का परिवार करणी विहार में जा कर रहने लगा था.

बेटी का इस तरह दूसरी जाति के युवक से शादी करना जीवनराम, उस की पत्नी और बेटे मुकेश को अच्छा नहीं लगा. उन्हें इस बात पर ज्यादा गुस्सा था कि ममता ने बिना बताए शादी कर ली थी. मुकेश इस बात से ज्यादा खफा था कि उस के साथ पढ़ने और पड़ोस में रहने वाले दोस्त अमित ने उस की बहन से ही शादी कर के दोस्ती में दगा किया था.

ममता अपने पति अमित के साथ हंसीखुशी वैवाहिक जीवन गुजारने लगी. अमित प्रौपर्टी व कंस्ट्रक्शन का काम करता था. इस बीच ममता के मातापिता व भाई लगातार उस पर दबाव डालते रहे कि वह अमित से संबंध तोड़ ले. उन्होंने कई बार ममता को अपने साथ ले जाने की कोशिश की, लेकिन वे इस में सफल नहीं हुए. अमित की शिकायत पर पुलिस ने वारदात से करीब 8 महीने पहले ममता के मातापिता व भाई पर पाबंदी भी लगा दी थी कि वे अमित के घर न जाएं.

ममता इसी साल जनवरी में गर्भवती हो गई थी. इसी वजह से कुछ महीनों से उस की अपनी मां से बातचीत होती रहती थी. करीब 3 महीने से बीचबीच में ममता के मातापिता उस से मिलने आते रहते थे. इस से अमित व ममता को लगने लगा था कि अब सब ठीक हो गया है. ममता अपने मांबाप के मंसूबों का अंदाजा नहीं लगा पाई थी.

दूसरी तरफ जीवनराम और उस का परिवार अमित नायर को अपना सब से बड़ा दुश्मन मान रहा था. वे उसे रास्ते से हटाने की योजना में लगे हुए थे. जीवनराम ने अपने गांव मोरडूंगा के रहने वाले पुराने दोस्त पूर्व पंचायत समिति सदस्य भगवानाराम जाट को अपनी परेशानी बताई. भगवानाराम ने अमित को ममता के रास्ते से हटाने के लिए जीवनराम को रवि उर्फ रविंद्र शेखावत से मिलवाया.

रवि ने 3 लाख रुपए में अमित की हत्या करने की सुपारी ले ली. योजना के तहत जीवनराम और भगवानाराम ने रवि के साथ मिल अमित की रेकी कर उस की हत्या का मौका तलाशने लगे. इसी बीच जीवनराम और उस के घर वालों ने भगवानाराम के साथ मिल कर भाड़े के 2 अन्य शूटरों रामदेवलाल और विनोद गोरा को 2 लाख रुपए में अमित की हत्या करने के लिए तैयार कर लिया.

योजनाबद्ध तरीके से जीवनराम, उस की पत्नी भगवानी देवी और किराए के दोनों शूटर रामदेवलाल व विनोद गोरा होंडा अमेज कार आरजे14सीएक्स 0313 से 17 मई की सुबह साढ़े 7 से पौने 8 बजे के बीच जगदंबा विहार में मकान नंबर सी-493 पर बेटीदामाद के घर पहुंचे. वहां एक शूटर विनोद गोरा कार के पास बाहर खड़ा रहा, जबकि जीवनराम, भगवानी देवी और रामदेवलाल घर के अंदर चले गए.

घर के अंदर जीवनराम ने अमित को बुलवाया और ममता को साथ ले जाने की बात कही. लेकिन ममता के इनकार कर देने पर जीवनराम को गुस्सा आ गया. उन्होंने शूटर से अमित पर गोलियां चलवा कर उस की हत्या करा दी. इस के बाद उन्होंने ममता को जबरन ले जाने का प्रयास किया, लेकिन अमित की मां व पड़ोसियों के आ जाने से वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके और कार में बैठ कर भाग गए.

पूछताछ में पता चला कि जीवनराम, उस की पत्नी भगवानी देवी और दोनों शूटर वारदात के बाद जयपुर से निकले तो बगरू के पास दोनों शूटरों को उतार दिया. इस के बाद जीवनराम व उस की पत्नी भगवानी देवी सीधे डीडवाना पहुंचे, जहां वे रेलवे में नौकरी करने वाले अपने बेटे मुकेश से मिले. उन्होंने उसे अमित का काम तमाम करने के बारे में बताया और अपनी कार वहीं छोड़ कर आगे बढ़ गए.

दोनों डीडवाना से नागौर, फलौदी, रामदेवरा हो कर सूरतगढ़ पहुंचे. सूरतगढ़ से जीवनराम ने पत्नी भगवानी देवी को बस में बैठा कर सीकर भेज दिया. इस के बाद जीवनराम बीकानेर, हिसार हो कर कैथल पहुंच गया.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि व्यापक जांच के बाद अमित हत्याकांड में 7 लोगों की संलिप्तता सामने आई है. इन में से 6 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया है. वारदात में इस्तेमाल कार भी बरामद कर ली गई है. कथा लिखे जाने तक पुलिस शूटर रामदेवलाल की तलाश कर रही थी.

इस मामले में गिरफ्तार जीवनराम ने पुलिस को बताया कि अमित ने ममता को पहले धर्मबहन बनाया. वह रक्षाबंधन पर उस से राखी भी बंधवाता रहा. इस के बाद अपने प्यार में फांस कर उस से शादी कर ली. उस की शादी का पता चलते ही हम ने अमित को ठिकाने लगाने की ठान ली थी.

वारदात के कुछ दिनों बाद तक ममता के परिवार की सुरक्षा के लिए उस के घर के बाहर पुलिस तैनात रही. ममता की याचिका पर हाईकोर्ट ने भी पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया है कि ममता और उस के घर वालों के अलावा गवाह पड़ोसियों को सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

बहरहाल, अमित की हत्या करवा कर जीवनराम और परिवार ने सीने में सुलग रही आग भले ही ठंडी कर ली हो, लेकिन जातिबिरादरी में शर्मिंदगी की आड़ ले कर ऐसा कृत्य करने वालों को कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं करता. जीवनराम ने बेटी का सुहाग उजाड़ कर भगवानी देवी की ममता का भी गला घोंट दिया. ममता का गर्भस्थ शिशु संभवत: सितंबर में जन्म लेगा तो उस मासूम को पिता का प्यार नहीं मिल पाएगा.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कर्नल के शिकारी बेटे के घर से जो मिला उसने सबके होश उड़ा दिए

उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के वीआईपी व पौश एरिया सिविललाइंस में पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों के औफिस, आवास, सर्किट हाउस, पुलिस मुख्यालय, कलेक्ट्रेट, कचहरी और पुलिस लाइन हैं. इसी इलाके में कई समृद्ध लोगों के अपने आवास भी हैं. उन्हीं में से एक आलीशान कोठी नंबर 36/4 थी, जो रिटायर्ड कर्नल देवेंद्र विश्नोई की थी. वह कोई मामूली आदमी नहीं थे. कई साल सेना में नौकरी कर के उन्होंने देश की सेवा की थी.

सन 1971 में हुई भारतपाकिस्तान की जंग में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. बाद में वह पंजाब में हुए औपरेशन ब्लूस्टार का भी हिस्सा रहे. उन के साहस की निशानियां फोटो और मैडल के रूप में उन के ड्राइंगरूम की दीवारों पर सजे थे. कई सम्मान भी उन्हें मिले थे. कुल मिलाकर उन की पृष्ठभूमि शौर्य, साहस और सम्मान की अनोखी मिसाल थी, उन्हें जानने वाले इन बातों को बखूबी जानते थे.

बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी, कर्नल साहब का एकलौता बेटा प्रशांत विश्नोई भी देश का जानामाना शूटर था. मजबूत कदकाठी और रौबदार चेहरे वाले प्रशांत की पत्नी और 2 बेटियां थीं. सभी एक साथ इसी कोठी में रहते थे. कर्नल परिवार के ईंट के भट्ठे और जमीनों के अलावा सिक्योरिटी एजेंसी का बड़ा काम था. विश्नोई परिवार करोड़ों की दौलत का मालिक तो था ही, आसपास उस की शोहरत भी थी.

कर्नल परिवार की लाइफस्टाइल हाईप्रोफाइल थी. आसपास की कोठियों में और भी लोग रहते थे, लेकिन कर्नल परिवार किसी से कोई वास्ता नहीं रखता था. वैसे भी शहरों में लोग इस तरह की जिंदगी जीने के आदी हो गए हैं. पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं होती.

हर कोई अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीना चाहता है. किस के यहां क्या हो रहा है, कोई दूसरा नहीं जानता. कर्नल की कोठी की पहचान का एक हिस्सा उन की आधा दरजन से ज्यादा महंगी कारें भी थीं. प्रशांत को कारों का शौक था. इन में लग्जरी कारों के अलावा घने जंगलों व रेगिस्तान में चलने वाली थार नामक जीप भी थी. गाडि़यां बदलती रहती थीं. खास बात यह थी कि इन सभी गाडि़यों के वीआईपी नंबर 0044 ही होते थे.

वक्त कब किस की पहचान किस रूप में सामने ला दे, इस बात को कोई नहीं जानता. 30 अप्रैल, 2017 का सवेरा हुआ तो न सिर्फ तारीख बदली थी, बल्कि कर्नल की कोठी की पहचान भी सनसनीखेज तरीके से बदल गई थी. लोग न केवल हैरान नजरों से कोठी को देख रहे थे बल्कि तरहतरह की बातें भी कर रहे थे. कर्नल साहब की कोठी अचानक ही चर्चाओं का हिस्सा बन गई थी.

दरअसल, 29 अप्रैल की दोपहर देश के गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली डायरेक्टोरेट औफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की दिल्ली से आई कई टीमें छापा मारने के लिए कर्नल साहब की कोठी पर पहुंच गई थीं. बाकी लोग गाडि़यों में ही बैठे रहे, सिर्फ 4 लोग कोठी के दरवाजे पर गए, डोरबैल बजाई तो नौकर बाहर आया. उस ने पूछा, ‘‘कहिए?’’

चारों में से एक अफसर ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘हमें कर्नल साहब या प्रशांतजी से मिलना है.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ नौकर ने अगला सवाल किया.

‘‘दिल्ली से. उन से कहिएगा कि हमारा मिलना जरूरी है.’’

‘‘आप ठहरिए, मैं पूछ कर आता हूं.’’ नौकर ने कहा.

टीम ने नजरें दौड़ाईं, दरवाजों पर हाई क्वालिटी वाले कैमरे लगे थे, जिन का फोकस दोनों रास्तों की ओर था. कुछ ही देर में नौकर ने आ कर उन के लिए दरवाजा खोल दिया. इशारा पा कर टीम के अन्य सदस्य भी दनदनाते हुए अंदर दाखिल हो गए. इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर ड्राइंगरूम में बैठे कर्नल देवेंद्र भड़क उठे, ‘‘यह क्या बदतमीजी है, कौन हैं आप लोग?’’

अधिकारियों ने अपना परिचय देने के साथ ही पूछा, ‘‘पहले आप यह बताइए कि प्रशांत कहां हैं?’’

‘‘वह तो घर पर नहीं है.’’

‘‘ठीक है, हमें घर की तलाशी लेनी है.’’ अफसरों ने कहा.

उन लोगों का इतना कहना था कि देवेंद्र गुस्से में आ गए. उन की उम्र काफी हो चुकी थी और आंख का औपरेशन हुआ था. लेकिन आवाज युवाओं जैसी कड़कदार थी. उन्होंने धमकाते हुए कहा, ‘‘खबरदार, अगर ऐसा किया तो ठीक नहीं होगा.’’

‘‘माफ करें, हमें इस बात का पूरा अधिकार है. बेहतर होगा कि आप शांत रहें.’’ अफसरों ने कहा.

टीम को विरोध का सामना करना पड़ सकता था, इसलिए उन्होंने पुलिस अधिकारियों को फोन कर के सूचना दी तो तुरंत पुलिस बल आ गया. देवेंद्र ने पुलिस को भी आड़े हाथों लिया और इधरउधर फोन करने लगे. पुलिस ने उन का मोबाइल और फोन अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस और टीम का सख्त रुख देख कर उन्हें शांत हो जाना पड़ा. वैसे भी उन की तबीयत ठीक नहीं थी.crime story

डीआरआई और पुलिस की टीम ने 3 मंजिला कोठी की तलाशी लेनी शुरू की तो वहां जो कुछ मिलना शुरू हुआ, उसे देख उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पहली मंजिल पर बने प्रशांत के कमरों से देशीविदेशी हथियारों और कारतूसों का जखीरा मिलता चला गया. हालांकि प्रशांत शूटर थे, लेकिन किसी को भी इतने हथियार रखने की इजाजत नहीं हो सकती. जांच टीम के होश उड़ गए, क्योंकि यह जखीरा इतना ज्यादा था कि पूरे जिले की पुलिस के पास भी शायद इतनी गोलियां नहीं हो सकती थीं.

इतना ही नहीं, कोठी के एक विशेष कमरे में वन्यजीवों के सिर, हड्डियां, खालें व अन्य वस्तुएं मिलीं. खुद टीम को भी उम्मीद नहीं थी कि छापे में इतना कुछ निकलेगा. मामला हथियारों की तस्करी से होता हुआ वन्यजीवों की तस्करी तक पहुंच गया था.

इस के बाद सूचना पा कर पश्चिम क्षेत्र के वन संरक्षक मुकेश कुमार भी अपनी टीम के साथ कर्नल की कोठी पर पहुंच गए. उन के साथ टीम में वन अधिकारी संजीव कुमार, वन्यजीव प्रतिपालक राज सिंह, क्षेत्रीय वन अधिकारी हरीश मोहन, वन दरोगा रामगोपाल व वनरक्षक  मोहन सिंह भी थे.

प्रशांत कहां था, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस का मोबाइल भी स्विच औफ आने लगा था. संभवत: उसे छापेमारी की खबर लग गई थी. जांच काफी बारीकी से चल रही थी. कोठी के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. खबर पा कर मीडिया वाले भी आ गए थे. कोठी के अंदर प्रतिबंधित सामानों का जखीरा मिलता जा रहा था. टीम सब चीजों को सील करती जा रही थी.

टीम ने जो कुछ भी बरामद किया था, उस की किसी को उम्मीद नहीं थी. कोठी से सौ से भी ज्यादा हथियार, जिन में पिस्टल, रिवौल्वर और बड़े हथियार मिले. 2 लाख कारतूस, करीब एक करोड़ रुपए नकद, कैमरे, दूरबीन के अलावा तेंदुए, काले हिरन की खालें, सांभर और काले हिरन के सींग सहित एकएक खोपड़ी, एक हिरन की खोपड़ी, गरदन सींग सहित, सांभर, हिरन के बच्चों की सींगें, चिंकारा हिरन की सींग सहित 4 खोपडि़यां, कुछ बिना सींग वाली हिरन की खोपडि़यां, अन्य कई प्रजातियों के हिरन की खोपडि़यां, वन्य जीवों के 7 दांत, हाथी दांत की मूठ वाला एक चाकू तथा 47 पैकेटों में रखा गया एक क्विंटल से अधिक 117.50 किलोग्राम वन्य जीवों का मांस बरामद किया गया. मांस के ये पैकेट बाकायदा बड़े फ्रीजर में रखे थे.

खास बात यह थी कि बरामद हथियार विदेशों के नामचीन ब्रांड बेरेटा (इटली), बेनेली (इटली), आर्सेनल (इटली), ग्लौक (आस्ट्रिया) और ब्लेजर (जर्मनी) के थे. इंटरनेशनल ब्रांड के बरामद हथियारों की कीमत 25 करोड़ रुपए के आसपास आंकी गई. कर्नल देवेंद्र और उन की पत्नी प्रशांत की करतूतों का हिस्सा थे या नहीं, यह जांच का विषय था. लेकिन वे दोनों बुजुर्ग और बीमार थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया.

छापे की यह काररवाई सुबह करीब 5 बजे तक चली. इस के बाद दिन निकलते ही कर्नल साहब की कोठी सुर्खियों में आ गई. कोठी के राज को जान कर पूरा शहर दंग रह गया. डीआरआई के अलावा वन विभाग ने भी मेरठ के थाना सिविल लाइन में प्रशांत के खिलाफ धारा 9, 50, 51, 44, 49(ए), व 49(बी)  वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मामले की जांच के साथ प्रशांत की तलाश तेज कर दी.

वह विदेश भाग सकता था, इसलिए कोठी से उस का पासपोर्ट पहले ही कब्जे में ले लिया गया था. उस के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर के देश के हवाईअड्डों को सतर्क कर दिया गया था. डीआरआई के अलावा क्राइम ब्रांच, एसटीएफ, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल को भी प्रशांत की तलाश में लगा दिया गया था. इस बीच डीआरआई के एडीशनल डायरेक्टर राजकुमार दिग्विजय ने बरामदगी के बारे में विधिवत प्रैस को जानकारी दी. डीएफओ अदिति शर्मा के निर्देशन में कोठी से बरामद मांस के सैंपल जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिए गए.crime story

प्रशांत की पोल शायद कभी खुल न पाती, अगर दिल्ली में हथियारों के साथ कुछ लोग न पकडे़ गए होते. दरअसल, अप्रैल के अंतिम सप्ताह में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से शूटर अमित गोयल और अनिल के साथ 2 विदेशी नागरिकों को 25 विदेशी हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था.

ये लोग टर्किश एयरलाइंस से स्लोवेनिया की राजधानी लिजबुलजना से इस्तांबुल होते हुए दिल्ली पहुंचे थे. इन में एक बोरिस सोबोटिक मिकोलिक मध्य यूरोप के स्लोवेनिया का रहने वाला था और हथियारों का बड़ा तस्कर था.

हालांकि इन लोगों ने खुद को इंटरनेशनल शूटर बताया था. पता चला ये शूटरों को दी जाने वाली आयात पौलिसी का लाभ उठा रहे थे, लेकिन इस बार ये हवाईअड्डे की सुरक्षा जांच एजेंसियों को झांसा देने में नाकाम रहे. बरामद हथियारों की कीमत साढ़े 4 करोड़ रुपए थी. इन से पूछताछ हुई तो शूटर प्रशांत के तार इन से जुड़े मिले. मामला गंभीर था, लिहाजा शिकंजा कसने की तैयारी कर ली गई. कई दिनों की रेकी के बाद डीआरआई टीम छापा मारने प्रशांत के घर पहुंच गई.

जांच करने वालों ने कर्नल देवेंद्र से पूछताछ की लेकिन उन्होंने बरामद सामान के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया. हालांकि उन की साफगोई किसी के गले नहीं उतर रही थी. सब से बड़ा सवाल यह था कि एक सैन्य अधिकारी का बेटा इतने बड़े पैमाने पर तस्करी में कैसे लिप्त हो गया था? इस की गहराई से जांच और प्रशांत की गिरफ्तारी जरूरी थी. जबकि प्रशांत अपने मोबाइल फोन का स्विच औफ कर चुका था.

प्रशांत के नंबर की काल डिटेल्स के आधार पर उस के नेटवर्क की तह में जाने की कोशिश की गई. उस की गिरफ्तारी के लिए डीआरआई टीम के अलावा यूपी एसटीएफ, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीमें लगी थीं. सभी को उस की सरगर्मी से तलाश थी. लेकिन वह सभी को गच्चा देने में कामयाब रहा.

पुलिस सूचनाओं के आधार पर छापे मारती रही और वह चकमा देने में कामयाब होता रहा. देखतेदेखते एक महीना बीत गया. जांच एजेंसियों के लिए वह चुनौती बना हुआ था. आखिर 1 जून को डीआरआई टीम ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जो कुछ प्रकाश में आया, वह बेहद चौंकाने वाला था. दरअसल, कर्नल देवेंद्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे. वह मेरठ जिले के ही कस्बा फलावदा के रहने वाले थे. वहां उन की जमीनें थीं. रिटायरमेंट के बाद वह कुछ साल बरेली के समाज कल्याण विभाग में तैनात रहे. इस के बाद करीब 16 साल पहले उन्होंने फलावदा और परीक्षितगढ़ में ब्रिक फील्ड नाम से ईंट के भट्ठे लगाए.crime story

इन भट्ठों में उन्हें घाटा हो गया था, जिस से आर्थिक हालात बिगड़ गए. बाद में पितापुत्र ने बरेली में एक सिक्योरिटी एजेंसी खोली. इस एजेंसी का काम सरकारी टेंडरों के जरिए गार्ड मुहैया कराना था. धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क कई राज्यों में फैल गया. यह काम चल निकला और देखतेदेखते कर्नल के न सिर्फ आर्थिक हालात बदल गए, बल्कि प्रशांत का लाइफस्टाइल भी बदल गया. महंगी कारें उस का शौक बन गईं. प्रशांत शूटिंग के क्षेत्र में भी काफी नाम कमा चुका था.

प्रशांत ने बचपन से ही ऊंचे ख्वाब देखे थे. पिता कर्नल थे, लिहाजा जिंदगी ऐशोआराम में बीती. स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही वह शूटिंग प्रतियोगिताओं में हाथ आजमाने लगा था. सन 2002 में उस का विवाह निधि के साथ हुआ. समय के साथ वह 2 बेटियों का पिता बना. वह बिलियर्ड्स प्लेयर तो था ही, साथ ही राष्ट्रीय स्तर का स्कीट शूटर भी था. इस के तहत 12 बोर से शूटिंग की जाती है.

बिग बोर व .22 कैटेगरी में वह देश के लिए खेल चुका है. पहले वह दिल्ली में रह कर शूटिंग करता था. तब उस ने कई मैडल जीते थे. एक साल पहले उस ने जयपुर में 60वीं नेशनल चैंपियनशिप खेली थी, जिस में उस की 65वीं रैंक आई थी. नेशनल रायफल एसोसिएशन औफ इंडिया ने उसे रिनाउंड शूटर की मान्यता दी हुई थी.

रिनाउंड शूटर को 2 वेपन का लाइसैंस मिल सकता था. अंतरराष्ट्रीय शूटर होने के नाते प्रशांत के नामचीन लोगों से ताल्लुक थे. कई राजनेताओं से भी उस के सीधे रिश्ते थे. इन में स्थानीय नेताओं से ले कर मुख्यमंत्री तक थे. कई बड़े कारोबारी भी उस के संपर्क में रहते थे.

समय के साथ प्रशांत हथियारों और वन्यजीवों की तस्करी करने लगा. यह तस्करी देश से होते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई. शूटिंग की आड़ में वन्यजीवों का शिकार और तस्करी का धंधा प्रशांत और उस की टीम ने पूरे देश में फैला दिया. वह कितना बड़ा शिकारी और तस्कर बन गया है, इस की खबर आसपास के लोगों को नहीं थी.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जंगलों के अलावा बिहार के जंगल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड के जिम कार्बेट पार्क समेत कई जगहों पर भी प्रशांत व उस के साथियों ने वन्यजीवों का शिकार किया. उस की कोठी तस्करी का अड्डा बन गई.

हथियारों के आयात पर रोक के बावजूद देश में बड़ी आसानी से हथियार आते रहे. इन हथियारों को प्रशांत एजेंटों के माध्यम से मुंहमांगी कीमतों पर बेचता था. जिस हथियार की कीमत विदेश में एक लाख रुपए होती थी, उसे वह 15 से 20 लाख रुपए में बेचता था.

हथियार चूंकि विख्यात कंपनियों के होते थे, इसलिए उन की बड़ी कीमत मिल जाती थी. कई बार हथियारों के पार्ट्स ला कर भी उन्हें जोड़ लिया जाता था.

दरअसल, इस खेल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शूटरों को सीमित मात्रा में विदेशी हथियार लाने की सरकारी छूट का प्रशांत और उस के साथी लाभ उठा रहे थे. कस्टम अधिकारियों को गुमराह कर के ये कम हथियारों की जानकारी दे कर अधिक हथियार भारत लाते थे.

वन्यजीवों का शिकार प्रशांत सिर्फ अपने शौक के लिए ही नहीं करता था, बल्कि उन के मांस की सप्लाई कई नामी होटलों में की जाती थी. हिरनों की लुप्त हो रही प्रजातियों को सहज निशाना बनाया जाता था. वन्यजीवों के मांस और उन के अंगों को कारों के जरिए ही लाया जाता था. प्रशांत ने एक कार में फ्रिजर रखने की व्यवस्था करा रखी थी. कार पर चूंकि आर्मी लिखा होता था, इसलिए चैकिंग में वह कभी नहीं पकड़ा गया.

प्रशांत कई राज्यों में नीलगायों का शिकार करने जा चुका था. उत्तर प्रदेश सहित आसपास के राज्यों में वह किसानों के आमंत्रण पर जाता रहता था. सन 2016 में बिहार सरकार ने भी 5 सौ नीलगायों को मारने के लिए शूटरों की टीम को बुलाया था. उस में प्रशांत भी शामिल था. आरोप है कि इस की आड़ में वह वन्यजीवों का शिकार और उन के अंगों एवं मांस की तस्करी करता था.crime story

सुरक्षा एजेंसियों या स्थानीय पुलिस को कभी उस के गोरखधंधे का पता नहीं चला. लेकिन जब दिल्ली के एयरपोर्ट पर तस्करों की गिरफ्तारी हुई तो उन्होंने प्रशांत का नाम उगल दिया.

पूछताछ के बाद प्रशांत को अगले दिन पटियाला हाउस कोर्ट में मुख्य महानगर न्यायाधीश सुमित दास की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

7 जून को उसे मेरठ की अदालत में पेश किया गया. वन विभाग ने उस के रिमांड की अर्जी लगाई, लेकिन रिमांड नहीं मिल सका. उसे पुन: तिहाड़ जेल भेज दिया गया. प्रशांत ने किनकिन लोगों को हथियार बेचे, मांस की तस्करी कहांकहां की और किन लोगों से उस के तार जुड़े थे, इस सब की गहराई से जांच के लिए उसे रिमांड पर लेने की कोशिश की जा रही थी.

प्रशांत का जो चेहरा समाज के सामने आया है, वह लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर कर रहा है कि किस तरह संभ्रांत लोग चौंकाने वाले धंधों में लिप्त होते हैं. वह जो कुछ भी कर रहा था, उस की खबर पड़ोसियों को भी नहीं थी. स्थानीय पुलिस और खुफिया एजेंसी भी जिस तरह से उस के धंधे से अनजान थीं, उस से पता चलता है कि वह कितने शातिराना अंदाज में अपने कारनामों को अंजाम दे रहा था.

दूसरी ओर कर्नल देवेंद्र ने बेटे के गोरखधंधे से खुद को अलग बता कर पल्ला झाड़ लिया है. उन का कहना था कि उन्हें पता नहीं था कि उन का बेटा यह सब कर रहा था. वह शर्मिंदा हैं. मेरठ कचहरी में पेशी के दौरान प्रशांत ने खुद को फंसाए जाने का आरोप लगाया. कथा लिखे जाने तक प्रशांत की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जिगरी दोस्त ने कुछ इस तरह से रची ‘दृश्यम’ की कहानी

उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी का रहने वाला मुनव्वर हसन काफी दबंग आदमी था. वह अपने दोस्त शाहिद उर्फ बंटी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. इसी धंधे से उस ने करोड़ों की संपत्ति जुटा रखी थी. चूंकि उस के पास अच्छाखासा पैसा था और इलाके में अच्छी जानपहचान थी, इसलिए वह राजनीति में कूद गया.

देखा जाए तो राजनीति में दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग सफल हैं. यही सोच कर मुनव्वर हसन ने सन 2014 में दिल्ली के बादली विधानसभा क्षेत्र से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. चुनाव तो वह नहीं जीत सका, पर उस की तमाम नेताओं से अच्छी जानपहचान हो गई, जिस का फायदा वह अपने कारोबार में उठाने लगा.

मुनव्वर का कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था, पर सन 2017 उस के और उस के परिवार के लिए परेशानी ही परेशानी ले कर आया. 19 जनवरी, 2017 को रेप के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा. उस की पत्नी सोनिया उर्फ इशरत ने सोचा भी नहीं था कि उसे यह दिन भी देखना पड़ेगा. वैसे मुनव्वर हसन ने हिंदू लड़की से लवमैरिज की थी. सोनिया उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर की रहने वाली थी. शादी के बाद सोनिया ने अपना नाम इशरत रख लिया.

सोनिया उर्फ इशरत की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी. सोनिया मुनव्वर की 2 बेटियों आरजू और अर्शिता उर्फ अर्शी तथा 2 बेटों आकिब व शाकिब की मां थी. चूंकि मुनव्वर के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए सभी बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे.

मुनव्वर हसन के जेल जाने के बाद सोनिया उर्फ इशरत और उस के बच्चे परेशान हो गए. लेकिन उन की परेशानी की इस घड़ी में मुनव्वर के दोस्त साहिब खान उर्फ बंटी ने भरपूर साथ दिया. वह हर तरह से उन के परिवार की देखरेख कर रहा था. इतना ही नहीं, वह मुनव्वर के केस की पैरवी भी कर रहा था. वह उस से जेल में मिलने खुद तो जाता ही था, साथ ही उस की बीवीबच्चों को भी मिलवाने के लिए ले जाता था.

बंटी का संतनगर के कमल विहार में प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस था. वह अपने औफिस पर रोजाना बैठता था. 24 अप्रैल को बंटी मुनव्वर के घर पहुंचा तो उस की बीवी और बच्चे गायब मिले. उस ने उस की बीवी इशरत को फोन किया तो वह भी बंद मिला. उस ने पड़ोसियों से पूछा कि दीदी दरवाजा खोल कर कहां चली गई. वह इशरत को दीदी कहता था. पड़ोसियों ने भी अनभिज्ञता जताई तो बंटी ने उस के दरवाजे पर ताला लगाया और अपने औफिस आ गया.crime story in hindi

बंटी शाम को फिर इशरत के घर पहुंचा तो दरवाजे पर उसे वही ताला लटका मिला, जो वह लगा गया था. वह 3-4 दिनों तक लगातार मुनव्वर के घर गया, हर रोज उसे वही ताला लगा मिला. बंटी ने इशरत और उस के बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की जानकारी जेल में बंद मुनव्वर हसन को दी. मुनव्वर ने शंका व्यक्त की कि इशरत बच्चों को ले कर कहीं अपने मायके तो नहीं चली गई?

उस का मायका सहारनपुर में था. लेकिन यहां यह सवाल भी था कि यदि वह मायके जाती, घर को इस तरह खुला छोड़ कर क्यों जाती? बीवी और चारों बच्चों के गायब होने की बात सुन कर मुनव्वर परेशान हो उठा. पर उस समय वह जेल में था. बाहर होता तो अपने स्तर से उन की तलाश भी करता.

मुनव्वर का मन कर रहा था कि वह उसी समय जेल की चारदीवारी फांद कर बाहर निकल जाए और बीवीबच्चों को तलाशे. उस ने अपने दोस्त बंटी से कह दिया कि वह किसी भी तरह उसे अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर निकलवाने की कोशिश करे. बंटी उस का जिगरी दोस्त था. वह वकील से मिल कर मुनव्वर को अंतरिम जमानत पर जेल से निकलवाने की कोशिश में लग गया.

बंटी की मेहनत रंग लाई और पत्नी तथा बच्चों को ढूंढने के लिए माननीय न्यायालय ने मुनव्वर को अंतरिम जमानत दे दी.

17 मई को मुनव्वर अपने दोस्त बंटी और दीपक के साथ घर पहुंचा तो उस समय रात के 11 बज रहे थे. अपना सूना घर देख कर उस की आंखों से आंसू टपक पड़े. बंटी और दीपक ने समझा कर भरोसा दिलाया कि वह दीदी और बच्चों को हर जगह ढूंढने की कोशिश करेंगे.

उस रात मुनव्वर को अपने ही घर में नींद नहीं आई. बीवीबच्चों को ले कर तरहतरह के खयाल उस के दिमाग में रात भर आते रहे. सुबह होने पर उस ने उस इलाके में रहने वाले अपने सभी जानने वालों से बीवीबच्चों के बारे में पूछा, पर कोई कुछ नहीं बता सका.

अचानक सभी के एक साथ गायब होने से मोहल्ले वाले भी हैरान थे. जब बीवीबच्चों की कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो मुनव्वर हसन अपने दोस्त बंटी को ले कर 18 मई को थाना बुराड़ी पहुंचा और थानाप्रभारी को अपने पूरे परिवार के अचानक गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी ने उस की पत्नी और बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करा कर उन की तलाश कराने का भरोसा दिया.crime story in hindi

थाने से लौट कर मुनव्वर अपने औफिस गया. वह अपने खास जानपहचान वालों से भी मिला. उस की पत्नी हिंदू थी. पत्नी के घर वाले उस से शादी करने को तैयार नहीं थे. मुनव्वर को इस बात की भी आशंका हो रही थी कि कहीं पत्नी के मायके वालों ने ही तो नहीं सब को गायब करा दिया?

उस की पत्नी सोनिया उर्फ इशरत का मायका सहारनपुर में था. मुनव्वर ने अपने विश्वासपात्र लोगों से इस बात का पता कराया तो जानकारी मिली कि मायके वालों को तो इशरत और बच्चों के गायब होने की जानकारी ही नहीं है.19 मई को पूरे दिन बंटी के साथ रह कर वह बीवीबच्चों की खोजता रहा.

अगले दिन यानी 21 मई की शाम को बंटी अपने औफिस में बैठा था. उस समय मुनव्वर उस के साथ नहीं था. उस ने मुनव्वर को फोन किया. फोन पर घंटी तो बज रही थी, पर मुनव्वर फोन उठा नहीं रहा था. बंटी ने थोड़ी देर बाद फिर उसे फोन किया. इस बार भी घंटी तो बजी, पर उस ने फोन नहीं उठाया. कई बार फोन करने के बाद भी जब उस ने फोन रिसीव नहीं किया तो वह उस के घर पहुंच गया. वह उस के कमरे में पहुंचा तो चीखता हुआ तुरंत बाहर आ गया.

मुनव्वर की किसी ने हत्या कर दी थी. वह लहूलुहान कमरे में पड़ा था. बंटी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस के लोग आ गए. मुनव्वर की हत्या पर सभी हैरान थे कि इतने दबंग आदमी की हत्या किस ने कर दी? बंटी ने इस की खबर पुलिस कंट्रोल रूम को दी. कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की वैन आ पहुंची. सूचना पा कर थाना बुराड़ी के अतिरिक्त थानाप्रभारी नरेश कुमार भी पुलिस बल के साथ आ पहुंचे.

पुलिस ने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया था. टीम ने मौके से सबूत जुटा लिए. पुलिस ने काररवाई शुरू की. मुनव्वर को 3 गोलियां मारी गई थीं. उस के घर का सारा सामान यथावत था, इसलिए लूट की आशंका का कोई सवाल ही नहीं था. जिस तरह से उस पर गोलियां चलाई गई थीं, उस से यही लग रहा था कि हत्यारों का मकसद सिर्फ उस की हत्या करना था. उस की हत्या कर के वे वहां से चले गए थे.

उस बिल्डिंग में रहने वाले अन्य लोगों से बात की गई तो किसी ने भी गोली चलने की आवाज सुनने से इनकार कर दिया था. सूचना पा कर उत्तरी जिले के डीसीपी जतिन नरवाल भी आ गए थे. मौकामुआयना करने के बाद उन्होंने भी लोगों से मुनव्वर के बारे में जानकारी हासिल की.crime story in hindi

मुनव्वर के बीवीबच्चे पहले से ही गायब थे. अब उसे भी ठिकाने लगा दिया गया था. कहीं यह परिवार किसी की साजिश का शिकार तो नहीं हो गया, पुलिस अधिकारी आपस में इस बात पर चर्चा करने लगे. पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. डीसीपी जतिन नरवाल ने इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी सिविल लाइंस इंद्रावती के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. यह टीम अलगअलग दृष्टिकोण से केस की जांच करने में जुट गई.

चूंकि मुनव्वर दबंग प्रवृत्ति का आदमी था और ज्यादातर वह विवादित संपत्ति का सौदा करता था. इतना ही नहीं, वह अपनी दबंगई के बूते विवादित संपत्ति पर कब्जा भी कर लेता था.

उस पर जमीन पर कब्जा करने, अपहरण, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, आर्म्स एक्ट आदि के दरजन भर से ज्यादा मुकदमे चल रहे थे. अपनी दबंगई के बूते उस ने बुराड़ी, करावल नगर, स्वरूपनगर आदि में करीब 2 करोड़ की संपत्ति अर्जित कर रखी थी. पुलिस इस बात को ले कर भी चल रही थी कि कहीं दूसरे धर्म की लड़की से शादी करना तो उसे नहीं ले डूबा. इन के अलावा पुलिस पैसे के लेनदेन के ऐंगल को भी ध्यान में रख कर जांच कर रही थी.

हत्यारे ने मुनव्वर को उस के घर में ही मार दिया. उस की पत्नी और बच्चे महीने भर से गायब थे. यह दिमाग में आने लगा था कि कहीं उन्हें भी तो ठिकाने नहीं लगा दिया गया? मुनव्वर का सब से ज्यादा विश्वसनीय और करीबी दोस्त बंटी उर्फ साहिब खान ही था. वह उस का कारोबारी पार्टनर ही नहीं था, बल्कि उस के सुखदुख का साथी भी था. इस के अलावा उस का एक और दोस्त था दीपक.

पुलिस ने इन दोनों से यह जानने की कोशिश की कि मुनव्वर का किसी से कोई झगड़ा या रंजिश तो नहीं थी. बंटी ने बताया कि कई प्रौपर्टियों को ले कर झगड़े तो हुए, लेकिन उन में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं कि वे मुनव्वर से ऊंची आवाज में भी बात कर सकें. उस ने बताया कि फूल सिंह के जिस मकान में वह रह रहा था, वह हिस्सा भी कब्जाया हुआ था.

पुलिस ने संतनगर की भगत सिंह कालोनी की गली नंबर-4 में रहने वाले मकान मालिक फूल सिंह से पूछताछ की. फूल सिंह ने बताया कि उस ने अपने दोस्त जगदीश के साथ मिल कर यह मकान बनाया था. मकान के फ्लोर उस ने अलगअलग बेच दिए थे. 5 लाख रुपए न देने पर जगदीश ने सैकेंड फ्लोर पर कब्जा कर लिया था. छत को ले कर दोनों के बीच विवाद चल रहा था.

बाद में जगदीश ने अपना हिस्सा एक वकील को बेच दिया था. वह वकील मुनव्वर का मामा था. मुनव्वर झगड़ालू और दबंग था. वकील मुनव्वर और बंटी से उसे धमकी दिलवा कर पूरे मकान पर कब्जा करने की कोशिश करने लगा. बाद में मुनव्वर ने ही अपने मामा के खरीदे मकान पर कब्जा कर लिया था.

फूल सिंह ने पुलिस को यह भी बताया कि मुनव्वर के पैरोल पर आने के बाद बंटी का उस के यहां बारबार आनाजाना लगा रहा. गेट खोलने को ले कर उस का बंटी से विवाद भी हुआ था. तब बंटी ने उसे जान से मारने की धमकी दी थी. उस ने बताया कि 20 मई, 2017 की सुबह करीब पौने 7 बजे 3 लोग आए. उन्होंने दरवाजा खटखटाया.

तब मुनव्वर ने आ कर गेट खोला. वे तीनों मुनव्वर के साथ ही ऊपर चले गए थे. बंटी उन तीनों से पहले मुनव्वर के पास आ चुका था. उसी समय वह तैयार हो कर तीसहजारी कोर्ट के लिए निकल गया था. शाम को जब वह घर लौटा तो घर के सामने पुलिस की गाडि़यां देख कर हैरान रह गया.

पुलिस को फूल सिंह निर्दोष लगा तो उसे घर भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने बंटी और दीपक से अलगअलग पूछताछ की. बंटी ने इस बात से मना कर दिया कि वह 20 मई को सुबह मुनव्वर से मिलने उस के घर गया था. बंटी और दीपक के बयानों में काफी विरोधाभास था.

चूंकि बंटी ही मुनव्वर के बीवीबच्चों को ढूंढने की ज्यादा पैरवी कर रहा था और उस के बयान भी विरोधाभासी थे, इसलिए पुलिस को उसी पर शक होने लगा. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस के फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन किया तो पता चला कि अप्रैल, 2017 में बंटी का सहारनपुर और मेरठ जाना हुआ था. इस के अलावा उस की मेरठ के कुछ नंबरों पर खूब बातें हुई थीं.

जिन नंबरों पर उस की बातें हुई थीं, पुलिस ने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो वे फोन नंबर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के पाए गए. इस के बाद पुलिस को बंटी पर ही संदेह हुआ. काल डिटेल्स के आधार पर बंटी से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने ऐसा राज उगला, जिस के लिए पुलिस परेशान हो रही थी.crime story in hindi

बंटी ने स्वीकार कर लिया कि उस ने न केवल मुनव्वर की हत्या कराई है, बल्कि उस की पत्नी और बच्चों को भी जमींदोज कर दिया है. यानी मुनव्वर और उस के पूरे परिवार की हत्या कराने वाला कोई और नहीं, साहिब खान उर्फ बंटी ही निकला.

सच्चाई जान कर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए. क्योंकि बंटी मुनव्वर का दोस्त ही नहीं, बल्कि बिजनैस पार्टनर भी था. डीसीपी जतिन नरवाल को जब पता चला कि बुराड़ी का मुनव्वर वाला मामला खुल गया है तो वह थाने आ पहुंचे. एसीपी इंद्रावती उन से पहले ही वहां पहुंच चुकी थीं.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में साहिब खान उर्फ बंटी से पूछताछ की गई तो मुनव्वर के परिवार के 6 लोगों की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

मुनव्वर हसन मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर का रहने वाला था. वह पिछले 15 सालों से उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रह रहा था. उस का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा अच्छाखासा चल रहा था. अकसर वह विवादित और झगड़े वाली प्रौपर्टी ही खरीदता था. इस तरह की प्रौपर्टी में उसे अच्छा मुनाफा होता था. साहिब खान उर्फ बंटी से उस की लगभग 8 साल पहले मुलाकात हुई थी. उस ने 8 साल पहले मुनव्वर की मार्फत बुराड़ी में एक प्लौट खरीदा था. इस के बाद बंटी का मुनव्वर के साथ उठनाबैठना हो गया था.

बंटी मूलरूप से मेरठ का रहने वाला था और वह थोड़ा धाकड़ किस्म का आदमी था. चूंकि दोनों एक ही इलाके के रहने वाले थे, इसलिए जल्द ही दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. मुनव्वर को लगा कि अगर बंटी को अपना पार्टनर बना ले तो धंधा अच्छा चल सकता है. इस संबंध में मुनव्वर ने बंटी के पिता से बात की तो उन्होंने बंटी को उस के साथ पार्टनरशिप में प्रौपर्टी का काम करने की इजाजत दे दी. इस के बाद मुनव्वर और बंटी पार्टनरशिप में धंधा करने लगे. कुछ ही दिनों में बंटी मुनव्वर का विश्वासपात्र बन गया.

बुराड़ी के कई प्लौटों, अपार्टमेंट और मकानों पर अवैध कब्जा करने में बंटी ने मुनव्वर का साथ दिया. इस काम के लिए वह कई बार अपने इलाके के बदमाशों को भी लाया. दबंग भूमाफिया छवि के कारण मुनव्वर का पूरे इलाके में खौफ था. लोग उस से डरते थे. कोई भी भला आदमी उस से पंगा नहीं लेना चाहता था. मुनव्वर ने अपनी इसी दबंगई के चलते करोड़ों रुपए की संपत्ति अर्जित कर ली थी.

अपनी दबंगई को भुनाने के लिए उस ने सन 2009 में दिल्ली के बादली विधानसभा क्षेत्र से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ा. वह चुनाव तो नहीं जीत सका, पर उस की राजनैतिक गलियारे में पैठ बन गई.  अब उस का रुतबा और ज्यादा बढ़ गया. बंटी उस का ऐसा दोस्त था, जो साए की तरह उस के साथ रहता था. इलाके में दोनों की जोड़ी मशहूर थी.

कभीकभी आदमी को उन्हीं लोगों से मात मिल जाती है, जिन पर वे आंख मूंद कर विश्वास करते हैं. उसी तरह बंटी भी आस्तीन का सांप निकला. लेकिन इस की शुरुआत मुनव्वर ने ही की थी. दरअसल एक बार मुनव्वर ने बंटी से 20 लाख रुपए लिए. बारबार मांगने के बावजूद मुनव्वर उस के पैसे नहीं लौटा रहा था. इस के अलावा मुनव्वर ने बंटी के एक प्लौट पर भी कब्जा कर लिया था.

बंटी जब भी उस से अपने पैसे मांगता, वह उसे अंजाम भुगतने की धमकी दे कर चुप करा देता था. मुनव्वर के इस व्यवहार से बंटी परेशान हो चुका था. 20 लाख रुपए कोई छोटी रकम नहीं होती, जो वह छोड़ देता. वह अकसर यही सोचता कि मुनव्वर से अपने पैसे कैसे वसूल करे? मुनव्वर की इन्हीं हरकतों से बंटी के मन में उस के लिए नफरत पैदा हो गई, पर वह दिखावे के तौर पर उस का और उस के परिवार का वफादार बना रहा.

उसी बीच 19 जनवरी, 2017 को मुनव्वर दुष्कर्म के आरोप में जेल चला गया. इस के बाद बंटी ही उस के परिवार की देखरेख करता रहा. वह भी पत्नी और एक बच्चे के साथ बुराड़ी में ही रहता था. वह अपने परिवार के साथसाथ मुनव्वर की बीवी और 4 बच्चों का हर तरह से खयाल रख रहा था. यही नहीं, वह मुनव्वर के केस की पैरवी भी कर रहा था.

एक दिन बंटी अपने औफिस में अकेला बैठा था, तभी उस के दिमाग में आया कि उस ने तो मुनव्वर को बड़ा भाई मानते हुए पूरी ईमानदारी से उस का साथ दिया, पर मुनव्वर ने उस की वफा का ऐसा सिला दिया, जिसे वह भुला नहीं पा रहा है.

उसे पता ही था कि मुनव्वर के पास दो, ढाई करोड़ रुपए की संपत्ति है. उसी समय उस के मन में लालच आ गया कि अगर मुनव्वर और उस के बीवीबच्चों को ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की सारी संपत्ति पर उस का कब्जा हो सकता है. उस ने तय कर लिया कि वह उस धोखेबाज के साथ ऐसा ही करेगा.

मुनव्वर जेल में था. उस के बाहर आने से पहले ही वह उस की पत्नी और बच्चों को इस तरह ठिकाने लगाना चाहता था कि किसी को भी उस पर शक न हो. बंटी ने मल्टीप्लेक्स में फिल्म ‘दृश्यम’ देखी थी. अचानक उस फिल्म की कहानी याद आ गई. इसी फिल्म की कहानी के आधार पर उस ने मुनव्वर के परिवार की हत्या कर शवों को ठिकाने लगाने का विचार किया.

इस के बाद बंटी ने यह फिल्म कई बार देखी. औफिस में जब भी वह अकेला होता, यही फिल्म देखता. वह एक खौफनाक साजिश रचने लगा. आखिर उस ने एक फूलप्रूफ योजना बना डाली. योजना में उस ने अपने दोस्त दीपक और 5 पेशेवर हत्यारों फिरोज, जुल्फिकार, जावेद, उस के भाई वाहिद और जसवंत को शामिल किया. ये सारे बदमाश मेरठ के रहने वाले थे.

बंटी के पिता की मेरठ में लोहा और स्टील के गेट वगैरह बनाने का कारखाना है. मेरठ के समोली गांव का जुल्फिकार उस के पिता के यहां वेल्डिंग का काम करता था. वह पेशेवर शूटर था. उस के काम छोड़ने पर उसी के गांव का रहने वाला फिरोज वहां वेल्डिंग का काम करने लगा था. वह भी बदमाश था. इन्हीं दोनों के जरिए बंटी की अन्य बदमाशों से जानपहचान हुई थी. बंटी कई बार इन्हें प्रौपर्टी पर कब्जा करने के लिए दिल्ली भी लाया था. 3 लाख रुपए में बंटी ने उन से डील फाइनल कर दी.

योजना को कैसे अंजाम देना है, यह बात बंटी ने पहले ही उन्हें बता दी थी. 20 अप्रैल, 2017 को मुनव्वर के बच्चों की परीक्षाएं समाप्त हुईं. सोनिया ने जब से मुनव्वर से लवमैरिज की थी, तब से उस के घर वाले उस से खफा थे. कभीकभार वह अपनी बहन और मां से फोन पर बातें कर लेती थी.

21 अप्रैल को बंटी अपनी एसएक्स-4 कार से सोनिया उर्फ इशरत को उस की बहन से मिलाने सहारनपुर ले गया. इशरत अपनी जवान बेटियों अर्शिता उर्फ अर्शी और आरजू को घर पर नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए दोनों बेटियों को भी साथ ले गई थी.

बहन से मिलने के बाद इशरत 22 अप्रैल को दिल्ली लौट रही थी, तभी रास्ते में बंटी को दीपक मिला. बंटी ने उसे भी कार में बैठा लिया. रात साढ़े 11 बजे के करीब सभी दौराला के समोली गांव पहुंचे. वहीं से वह कार को अख्तियारपुर के जंगल में 3 किलोमीटर अंदर ले गया.

वैसे तो इशरत और उस के बच्चे बंटी पर विश्वास करते थे. इस के बावजूद इशरत ने जब कार को जंगल में ले जाने की वजह पूछी तो बंटी ने कहा कि इस समय हाईवे पर बहुत जाम मिलता है, इसलिए शौर्टकट से चल रहा है. इस पर इशरत चुप हो गई.

काली नदी के किनारे बंटी ने कार रोक दी. कार के रुकते ही जुल्फिकार, फिरोज, जावेद और वाहिद वहां आ गए. फिरोज ने कार का दरवाजा खोल कर इशरत की बेटी अर्शी को बाहर निकाला. अर्शी अपनी मां और बहन के साथ पिछली सीट पर बैठी थी. इशरत ने पूछा कि वे बेटी को कहां ले जा रहे हैं तो बदमाशों ने हथियार दिखा कर उसे चुप करा दिया.

इशरत बंटी के आगे गिड़गिड़ाने लगी कि बेटी को छुड़वा दे, लेकिन बंटी चुपचाप खड़ा रहा. कुछ दूर ले जा कर फिरोज ने अर्शी के सिर में गोली मार दी. गोली की आवाज सुन कर इशरत ने भागने की कोशिश की तो जुल्फिकार ने उस के सिर में गोली मार दी. इस के बाद उन्होंने आरजू की भी गोली मार कर हत्या कर दी.

नदी के किनारे बदमाशों ने 10 फुट गहरा गड्ढा पहले से ही खोद रखा था. तीनों के गहने उतार कर उन्हें उसी गड्ढे में दफना दिया गया. जहां पर तीनों लाशें दफनाई गई थीं, उस के ऊपर उन्होंने घास डाल दी थी. मांबेटियों को ठिकाने लगा कर सभी दिल्ली आ गए.

घर पर मौजूद मुनव्वर के दोनों बेटे आकिब और शाकिब अपनी अम्मी और बहनों के लौटने का इंतजार कर रहे थे. वह मां को बारबार फोन कर रहे थे, पर फोन नहीं लग रहा था. 23 अप्रैल को छोटा बेटा शाकिब मां के बारे में पता करने कमल विहार स्थित बंटी के औफिस पहुंचा.

वहां पर दीपक, फिरोज, जुल्फिकार आदि बैठे थे. उन्होंने शाकिब के मुंह में कपड़ा ठूंस कर उस के हाथपैर बांध कर औफिस में ही डाल दिया.

इस के बाद बंटी ने मुनव्वर के दूसरे बेटे आकिब को फोन कर के अपने औफिस बुला लिया. वह पहुंचा तो उस के भी मुंह में कपड़ा ठूंस कर उस के हाथपैर बांध कर शाकिब के पास डाल दिया. कई घंटे बंधे रहने के कारण दम घुटने से दोनों भाइयों की मौत हो गई. दोनों लाशों को ठिकाने लगाने के लिए बंटी ने अपने औफिस का फर्श खुदवा कर 3-4 फुट गहरा गड्ढा खोद कर दोनों भाइयों को भी दफना दिया.

लाशें जल्द गल जाएं, इस के लिए दोनों लाशों के ऊपर काफी मात्रा में नमक डाल दिया. बदबू न आए इस के लिए परफ्यूम भी डाला गया. इस के बाद दोनों लाशों के ऊपर आरसीसी लिंटर डलवा दिया.

चूंकि बंटी ही मुनव्वर के परिवार का नजदीकी और वफादार था, इसलिए वह इशरत और उस के बच्चों को खोजने का नाटक करता रहा. उन के रहस्यमय ढंग से गायब होने की खबर उस ने तिहाड़ जेल में बंद मुनव्वर को भी दे दी थी. बीवीबच्चों के गायब होने की खबर सुन कर मुनव्वर परेशान हो उठा. बंटी ही मुनव्वर को जेल से पैरोल पर बाहर निकलवाने की कोशिश में लग गया. पत्नी और बच्चों को ढूंढने के लिए कोर्ट ने 17 मई, 2017 को मुनव्वर की अंतरिम जमानत स्वीकार कर ली.

तिहाड़ जेल से पैरोल पर रिहा होने के बाद मुनव्वर अपने खासमखास दोस्त बंटी और दीपक के साथ घर पहुंचा. अगले दिन वह बंटी के साथ उसी औफिस में बैठ कर पत्नी और बच्चों को ढूंढने की योजना बनाता रहा, जहां उस के दोनों बेटे दफन थे. 18 मई को वह बंटी को ले कर बुराड़ी थाने पहुंचा. बंटी उस के साथ इस तरह से लगा था कि जैसे उस से ज्यादा उस का हमदर्द कोई और नहीं है.

19 मई को भी वह मुनव्वर के साथ इधरउधर घूमता रहा. पेशेवर बदमाश बुराड़ी में ही ठहरे थे. बंटी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि काम को कब अंजाम देना है. योजना के अनुसार, 20 मई, 2017 को बंटी मुनव्वर के घर सुबह ही पहुंच गया. थोड़ी देर बाद फिरोज, जुल्फिकार और जावेद भी पहुंच गए.

इन के लिए गेट मुनव्वर ने ही खोला था, क्योंकि वह पहले से इन सब को जानता था. मौका मिलते ही उन्होंने उस की गोली मार कर हत्या कर दी. वह जीवित न बच जाए, इस के लिए उसे 3 गोलियां मारी गई थीं. अपना काम कर के सभी चले गए. मुनव्वर और उस के बीवीबच्चों का नामोनिशान मिटा कर बंटी उस की प्रौपर्टी के कागजात अपने नाम कराने की कोशिश में जुट गया.

बंटी ने जानबूझ कर शाम के समय मुनव्वर के मोबाइल पर कई बार काल की थीं. शाम को वह उस के घर पहुंचा और उस की हत्या का शोर मचा दिया. बंटी ने योजना तो ऐसी फूलप्रूफ बनाई थी कि किसी को भी उस पर शक न हो, पर अपराध कभी किसी का छिपा है जो उस का छिपता. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

बंटी और दीपक से पूछताछ के बाद पुलिस ने 22 मई को ही कमल विहार स्थित बंटी के औफिस के फर्श की खुदाई शुरू करा दी. चूंकि उस ने फर्श पर लिंटर डलवा दिया था, इसलिए उस लिंटर को तोड़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. करीब 4 घंटे की खुदाई के बाद पुलिस ने आकिब और शाकिब की गली हुई लाशें गड्ढे से निकालीं.

मोहल्ले वालों को पता चला कि मुनव्वर के जिगरी दोस्त बंटी ने ही उस के पूरे परिवार को मार दिया है तो लोगों में आक्रोश भर गया. सैकड़ों की संख्या में लोग वहां जमा हो गए. इस से पहले कि लोग गुस्से में कोई कदम उठाते, डीसीपी ने जिले के अन्य थानों की पुलिस बुला ली. जरूरी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने दोनों भाइयों की लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं.

अब पुलिस को इशरत और उस की दोनों बेटियों की लाशें बरामद करनी थीं, जो अख्तियारपुर में काली नदी के किनारे दफन थीं. थाना दौराला पुलिस को सूचित करने के बाद दिल्ली पुलिस 23 मई, 2017 को सुबह 10 बजे काली नदी के किनारे पहुंची. उस समय फोरैंसिक टीम और सरधना तहसील के नायब तहसीलदार, दौराला के सीओ भी वहां मौजूद थे.

करीब 3 घंटे की खुदाई के बाद पुलिस ने 10 फुट गहरे गड्ढे से इशरत और उस की दोनों बेटियों आरजू एवं अर्शिता उर्फ अर्शी की लाशें बरामद कीं. खुदाई के दौरान आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग वहां जमा हो गए थे. तीनों लाशें देख कर वे आक्रोशित हो गए. बंटी और दीपक पुलिस कस्टडी में थे. गांव वाले नारेबाजी करते हुए मांग करने लगे कि क्रूर हत्यारों को पब्लिक के हवाले किया जाए. पब्लिक उन्हें खुद सजा देगी.

पुलिस अधिकारियों ने बड़ी मुश्किल से गांव वालों को समझाबुझा कर शांत किया. पुलिस ने इन तीनों लाशों को भी पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम किया तो आरजू की खोपड़ी में गोली फंसी हुई मिली. जबकि अर्शिता के सीने पर गोली चलाई गई थी, जो आरपार निकल गई थी. इशरत के सिर में गोली मारी गई थी.

सभी लाशें बरामद होने के बाद पुलिस ने हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए दौराला थाने के समौली गांव में छापा मार कर फिरोज और जुल्फिकार को हिरासत में ले लिया. इस के बाद जावेद भी गिरफ्तार हो गया पर उस का भाई वाहिद दीवार फांद कर भाग गया. लेकिन 28 मई को उस ने थाना बुराड़ी में आत्मसमर्पण कर दिया. कथा लिखे जाने तक एक अभियुक्त जसवंत गिरफ्तार नहीं हो सका था. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

बंटी ने अपने खास दोस्त मुनव्वर की करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए उस के पूरे परिवार को दफन कर दिया. ऐसा कर के उस ने ‘दोस्ती’ नाम के शब्द को कलंकित किया है. अब उसे वह प्रौपर्टी मिलेगी या नहीं, यह तो समय बताएगा. पर उसे अपने अपराध की सजा जरूर मिलेगी.

एक ही परिवार के 6 लोगों की हत्या के इस केस की जांच के लिए डीसीपी जतिन नरवाल ने एक विशेष जांच टीम गठित कर दी है, जिस में एसीपी सिविल लाइंस इंद्रावती, प्रशिक्षु आईपीएस विक्रम सिंह, थाना बाड़ा हिंदूराव के इंसपेक्टर रविकांत, थाना बुराड़ी के अतिरिक्त थानाप्रभारी नरेश कुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) नरेंद्र कुमार, स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर वी.एन. झा, थाना मौरिस नगर के अतिरिक्त थानाप्रभारी वेदप्रकाश, थाना रूपनगर के अतिरिक्त थानाप्रभारी पी.सी. यादव, चौकीइंचार्ज अमित कुमार, मजनूं का टीला के चौकीप्रभारी भारत, चर्च मिशन के चौकीप्रभारी पंकज तोमर को शामिल किया गया था. यह संयुक्त टीम गंभीरता से पूरे केस की जांच में जुट चुकी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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