Download App

धोनी को सजा दिला सकता है आईसीसी का ये नया नियम

पूर्व भारतीय कप्तान व विकेकीपर महेंद्र सिंह धोनी विकेट के पीछे से विरोधी टीम के बल्लेबाजों को गेंद पकड़ने के बाद स्टंप उड़ाने का झूठा नाटक कर डराते थे. लेकिन अब ऐसा करना एमएस धोनी के लिए मुसीबत बन सकता है.

आईसीसी ने 28 सितंबर से क्रिकेट के कई नियमों में बदलाव कर दिया है. ‘फेक फील्डिंग’ से जुड़ा एक नया नियम 41.5 आया है जिस पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. इस नियम की वजह से आस्ट्रेलिया के एक घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट में एक क्रिकेटर पर पेनल्टी लगाई जा चुकी है.

धोनी को भी कई बार ऐसे करते हुए देखा गया है कि वे फील्डिंग के समय गेंद को पकड़कर स्टंप में थ्रो करने का दिखावा करते हैं. अगर आईसीसी का यह नियम पूरी तरह से लागू हो जाता है तो धोनी के लिए यह मुसीबत का कारण बन सकता है.

क्या है फेक फील्डिंग

‘फेक फील्डिंग’ से जुड़ा आईसीसी का नया नियम 41.5 कहता है, “बल्लेबाज द्वारा गेंद खेले जाने के बाद, ‘फील्डर द्वारा जानबूझकर, शाब्दिक या क्रियात्मक रूप से, बल्लेबाज का ध्यान भटकाना या उसके लिए बाधा उत्पन्न करना नियम विरुद्ध माना जाएगा.” यदि मैदानी अंपायर तय करते हैं कि ऐसा अवरोध जानबूझकर किया गया है तो बल्लेबाजी करने वाली टीम को 5 रन दिए जा सकते हैं.

पूर्व भारतीय क्रिकेटर संजय मांजरेकर ने इस नियम पर आईसीसी पर आपत्ति जताई. उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट करके आईसीसी से इस नियम पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया.

संजय मांजरेकर ने ट्वीट के जरिए कहा, ‘फेक फील्डिंग के लिए पांच पेनल्टी रन देना अभी लागू हुए क्रिकेट के नए नियमों में सबसे हास्यास्पद है. आईसीसी से इस पर फिर से विचार करने का आग्रह करता हूं.’

मांजरेकर ने आगे कहा, ‘बल्लेबाजी करने वाले टीम पर भी 5 रन की पेनल्टी लगाना कैसा रहेगा, यदि कोई बल्लेबाज फेक स्टेप आउट करने की कोशिश करता है. क्या ये गेंदबाज को भ्रमित करना नहीं होगा. फेक फील्डिंग ला को हटाना चाहिए.’

हालांकि पत्रकार और आईसीसी के पूर्व मीडिया हेड ब्रायन मुर्गत्रोयोड ने मांजरेकर को जवाब देते हुए लिखा, “ध्यान रखें कि ये एक नियम है, जिसे एमसीसी (मेलबर्न क्रिकेट क्लब) लेकर आया था और फिर आईसीसी ने भी इसे लागू किया. मुझे ये पसंद है, जब प्लेयर मैच में चीटिंग की कोशिश करता है.”

इस पर मांजरेकर ने जवाब देते हुए धोनी का जिक्र किया. उन्होंने कहा, “चीटिंग? नहीं ये ट्रिक होती है. जैसे धोनी गेंद पकड़कर उसे स्टम्प्स पर थ्रो करने का दिखावा करते हैं. ये सराहनीय है, ना कि इस पर पेनल्टी लगनी चाहिए.”

हालांकि मांजरेकर ने स्पष्ट किया ये मेरे निजी विचार हैं. उन्होंने कहा कि इस संबंध में मैंने आईसीसी को भी लिखा है. अब देखना है कि आईसीसी इस मांजरेकर के पत्र का क्या जवाब देती है.

दलितों का कौन सा भला करेगा अंबेडकर गरबा

ऊंची जाति वालों को बेवजह ही कोसा और बदनाम किया जाता है कि वे दलितों को मंदिरों में जाने और पूजा पाठ करने से रोकते हैं और इसके लिए जरूरत पड़े यानि दलित न माने तो उनके साथ मार पीट हिंसा और कभी कभी तो उनकी हत्या तक कर डालते हैं. सच तो यह है कि दलितों से ज्यादा ये सवर्ण चाहते हैं कि दलित भी पूजा पाठ व्रत उपवास सब करें पर शर्त इतनी है कि उनके साथ न करें क्योंकि दलित योनि में पैदा होना पिछले जन्मों के पापों की सजा है और दलित को बराबरी से बैठाना ऊंची जाति वालों के लिए मना है क्योंकि वे अगर दलितों से बराबरी का व्यवहार करेंगे जैसा कि दलित चाहते हैं तो उन्हें यह कैसे समझ आएगा कि वे किन कर्मों और पापों की सजा भुगतने धरती पर पैदा किए गए हैं.

इधर देश भर के खास तौर से गुजरात के दलितों की यह जिद फिर जोर पकड़ रही है कि अगर सवर्ण उन्हें साथ मे पूजा पाठ नहीं करने देंगे तो वे अलग से यह सब और दूसरे कर्म कांड करेंगे जिससे सवर्णों को सबक मिले, बस इसी जिद और बेवकूफी का फायदा सवर्ण सदियों से उठा रहे हैं. दरअसल में ऊंची जाति वाले चाहते यही हैं कि दलित पिछड़े पाप पुण्य, स्वर्ग नर्क, व्रत उपवास, मुक्ति मोक्ष जैसे मकडजाल में उलझे अपनी बदहाली से निजात पाने का रास्ता धर्म में ढूंढते छटपटाते रहें.

यह साजिश बहुत गहरी है जिसका मकसद दलितों को उनके दलितपने का एहसास कराने के साथ साथ उन्हें गरीबी के दलदल में भी धंसाये रखना है. इसी मकसद से दलितों की धार्मिक कमजोरियों का फायदा उठाते उन्हें जानबूझकर पूजा पाठ और मंदिरों से दुत्कार कर भगाया जाता है जिससे वे गुस्से में आकर अपने अलग मंदिर बनाकर अपने पुराने और नए पाप (जो उन्होंने किए ही नहीं) को धोने घंटे घड़ियाल बजाते भगवान से गुहार लगाते रहें कि हे प्रभु हमें भी ऊंची जाति वाला बना दें और इस पूजा पाठ और दान दक्षिणा के एवज में इस नहीं तो अगले जन्म में तो ऊंची जाति में पैदा कर ही देना जिससे हमें यह गरीबी और नर्क जैसी सामाजिक यंत्रणा से मुक्त रहें.

नया शिगूफा – अंबेडकर गरबा

गुजरात का गरबा दुनिया भर में मशहूर है जो नवरात्रि के दिनों में देवी को खुश करने के लिए किया जाता है. अब यह दीगर बात है कि इस गरबे की आड़ में लोग देवी की पूजा कम अपनी माशूकाओं को रिझाने में ज्यादा लगे रहते हैं. कुछ साल पहले तक दलितों को गरबा से दूर रखा जाता था हां पैसे वाले दलितों पर कोई रोकटोक नहीं थी क्योंकि वे महंगा पास खरीद सकते हैं और पंडालों और झांकियों में चंदा और चढ़ावा भी दे सकते हैं. अहमदाबाद में इस साल एक दिलचस्प गरबा हुआ जिसे नाम दिया गया अंबेडकर गरबा.

इस धूमधड़ाके वाले अंबेडकर ब्रांड गरबा की खूबी या खामी कुछ भी कह लें यह थी कि इसमें 100 दलित परिवारों ने ही शिरकत की और अंबेडकर पर बनाई गई संतोषी माता नाम की हिन्दू देवी की आरती कि पेरोडी पर खूब थिरके. जय जय संतोषी माता… की जगह जय जय अंबेडकर साहब… आरती बजाई गई जिसमें दलित समुदाय के लड़के लड़कियों ने जमकर डांडिया लहराते नाच किया.

अंबेडकर गरबा के आयोजक कनू सुमसेरा मंगलभाई की इन दलीलों में तो दम था कि दलित समाज के लोगों को लगता था कि देवी देवता उन्हें बर्बाद कर देंगे उन्हें पूजने से तो बेहतर है कि हम अंबेडकर की पूजा करें. लेकिन इस अलग आयोजन का एक सच या वजह यह भी है कि नवरात्रि के दिनों में ही सवर्णों के एक पांडाल में गरबा देखने गए एक दलित नौजबान को पीट पीट कर मार डाला गया था. इस हादसे के साथ साथ मंगल भाई ने गुजरात में रोज रोज हो रहे दलित अत्याचारों का जिक्र करते तूल पकड़ते मूंछ वाले चर्चित मामले का भी जिक्र किया. इस शर्मनाक मामले में एक दलित नौजबान पर महज इसलिए हमला किया गया था कि वह मूंछ रखे घूम रहा था. इससे गुस्साए रसूखदारों ने उसकी तबियत से ठुकाई कर दी थी.

गांधीनगर इलाके में दलित अत्याचार की यह तीसरी लगातार घटना थी जिसका विरोध सानंद के  दलितों ने अनूठे तरीके से व्हाट्सएप पर करते हुए अपनी अपनी डीपी पर मूंछों की फोटो लगाते हुए ‘मैं दलित’ लिखा था. इस विरोध पर भी सब का ध्यान गया था. ध्यान अंबेडकर गरबा पर भी गया लेकिन अफसोस उस वक्त हुआ जब सभी ने इस जलसे की भी तारीफ की.

हासिल क्या

शायद ही कनू सुमसेरा मंगल भाई या उनकी पीठ थपथपा रहे लोग बता पाएं कि अंबेडकर गरबा से दलितों को क्या हासिल हुआ और कौन सा सबक ऊंची जाति वालों को मिला. क्या सवर्णों ने अपना जुर्म मंजूर कर दलितों से माफी मांग ली या दलितों के पांडाल में आकर उन्हें भईया कहते गले से लगा लिया. क्या ऊंची जाति वालों ने दलितों के पैरों में गिरकर अपनी गलती सुधारने का भरोसा दिलाया.

ऐसा कुछ नहीं हुआ है तो सहज समझा जा सकता है कि किसी ने कोई सबक नहीं सीखा है और न ही हिन्दू धर्म अंबेडकर गरबा से किसी खतरे में पड़ गया है. हुआ सिर्फ इतना है कि सवर्णों ने चैन की सांस ली है कि आइंदा ये अछूत उनके साथ गरबा खेलने या देखने की भूल नहीं करेंगे. दलितों के अलग अंबेडकर ब्रांड गरबा खेलने से साबित यही हुआ है कि उनके साथ भेदभाव जारी रहेगा जब भी वे अपनी मूंछों पर ताव देंगे तब उन्हें मारा जाएगा वे मरी गाय की खाल उतारने का अपना पुश्तैनी काम करेंगे तब उन्हें गौ माता की हत्या के जुर्म में पीट पीट कर मार डाला जाएगा.

एक बड़ी साजिश जिसे भगवावादी जानबुझ कर हवा दे रहे हैं वह यह है कि दलित अंबेडकर के हिन्दू धर्म विरोधी उसूलों और एतराज को भूल जाएं जिनमें खास और अहम यह है कि धार्मिक किताबें जला दो क्योंकि ये ही वर्ण व्यवस्था छुआछूत और जातिगत भेदभाव की वजह हैं. इन और ऐसी कई अहम बातों, तालीम और अंबेडकर की नसीहतों को भूल कर दलित अपने पूजा पाठ यज्ञ हवन अलग करें यही समाज के 15-20 फीसदी लोग चाहते हैं. दलित अंबेडकर के नाम पर करें या फुले, पैरियार या बुद्ध के नाम पर गरबा करें इससे उनकी बदहाली नहीं सुधरने वाली उल्टे नए तरीके के ऐसे धरम करम से और बिगड़ेगी और वे अपनी गैरत इज्जत और सामाजिक बराबरी के लिए हाथ में डांडिया लेकर नशेलों की तरह नाचते ही रह जाएंगे. इससे उनकी झोपड़ियां किसी चमत्कार के चलते पक्के मकानों में तब्दील नहीं हो जाने वाली. बदहाली सिर्फ तालीम से सुधरेगी जिस पर अंबेडकर खासा जोर देते थे.

दरिंदगी की इस उपलब्धि पर भी बोलिये ‘महाराज’

एक तरफ अपनी सरकार के 6 माह पूरे होने पर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार जश्न मना रही है. हर मंत्री अपने अपने विभागों के कायाकल्प का गुणगान करने में मगन है. दूसरी तरफ राजधानी लखनऊ में एक लड़की से गैंगरेप होता है. वह आरोपियों की जानकारी पुलिस को न दे सके इसके लिये गोली मार दी जाती है. मरने से बच गई युवती जब अपना दर्द बयान करती है तो पुलिस मामले को हल्का करने के लिये घटना में निजी दुश्मनी की वजह को ले आती है.

किसी भी सभ्य समाज पर इससे ‘बदनुमा दाग‘ क्या लग सकता है? हो सकता है कि प्रदेश में पहले भी ऐसी घटनाये घटती रही हों. यह कौन बतायेगा कि इस तरह की घटनाओं से समाज को कब मुक्ति मिलेगी? अस्पताल में अपना इलाज करा रही लड़की अपने चेहरे को देख कर अवसाद ग्रस्त हो जाती है. उसे लगता है कि पुलिस में भर्ती होकर समाज की सेवा करने का सपना अब पूरा नहीं होगा. वह परीक्षा देकर पास नहीं हो पायेगी. समाज की उपलब्धि पर कौन जवाब देगा?

मलिहाबाद में रहने वाली 19 साल की इस लड़की के दर्द को अनुभव कीजिये. तब आपको अहसास होगा अपनी नाकामी का. रात 8 बजे अपने घर से मात्र 100 मीटर दूरी से उसको 3 युवक जबरन उठा ले जाते हैं. यह लोग लड़की को झाडियों में ले जाते हैं. उसको बुरी तरह से मारपीट कर पहले पूरी तरह से बेदम कर देते हैं. इसके बाद उसको नशे का इंजेक्शन लगा देते हैं. नशे की हालत में बेहोश लड़की से बारीबारी से 3 युवक रेप करते हैं. नशा टूटने पर यह लड़की उन लोगों के नाम पुलिस को बता देगी इससे बचने के लिये इसे गोली मार दी जाती है. लड़की के चेहरे पर 21 छर्रे लगते हैं. गोली की आवाज सुनकर गांव के लोग आते हैं, लड़की को मेडिकल कालेज लाया जाता है. जब लड़की बेहोशी से बाहर आती है तो वह अपना दर्द बयान करती है.

गांव के लोगों को जहां लड़की मिलती है, उससे 50 मीटर दूर खून के धब्बे, लड़की की चप्पल और उसका दुपट्टा मिलता है. पुलिस ने आरोपियों को पकड़ लिया पर अब वह इस पूरी घटना को निजी दुश्मनी से जोड़ रही है. इससे वह यह साबित करना चाहती है कि अपराध बदले की भावना से किया गया है. बाकी प्रदेश में ऐसी कोई कानून व्यवस्था खराब नहीं है. हर घटना में ऐसा होता है.

वाराणसी में बीएचयू में जब लड़कियों ने छेड़छाड़ की परेशानी पर आवाज उठाई तो उसको राजनीतिक रंग देकर बात को मुख्य परेशानी से अलग कर दिया गया. जिसके कारण वहां हालात जस के तस हैं. निजी दुश्मनी में क्या कोई इतना घंमडी हो सकता है कि उस परिवार की लड़की के साथ ऐसा कदम उठा सके? अगर ऐसा साहस कोई कर सकता है तो केवल इसलिये क्योंकि उसकी आंखों के कानून का डर नहीं रह गया है.

मलिहाबाद में में सांसद और विधायक दोनों ही भाजपा से हैं. इत्तेफाक से दोनों पति पत्नी भी हैं. ऐसे में मलिहाबाद किसी जंगल का हिस्सा नहीं माना जा सकता. अस्पताल के बेड पर पड़ी लड़की अपने पिता से पूछती है ‘पापा मैं ठीक तो हो जांउगी ना’. बेटी का दर्द पिता कैसे सहन कर सकता है. क्या यही वह रास्ता है जिसके जरीये हम ‘औरत के सम्मान’ और ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ की बात करते हैं. सरकार भी जनता के पिता के समान होती है. दरिदंगी की  शिकार बेटी का अभागा पिता तो उसकी बात का जवाब नहीं दे सकता. आज जनता के पिता के रूप में ही अपनी बेटी समझ उसकी बात का जवाब दे दीजिये ‘महाराज’.

शाहरुख खान की कंपनी के कैंटीन पर चला बीएमसी का बुल्डोजर

बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान की कंपनी रेड चिली के कैंटीन पर बीएमसी ने बुल्डोजर चलाया. कहा जा रहा है कि गोरेगांव पश्चिम के डीएलएच मैक्स इमारत में प्रोडक्शन हाउस का औफिस है, जिसके उपरी माले पर अवैध रूप से कैंटीन बनाया गया था. ये कैंटीन 2,000 वर्ग फीट में फैला हुआ था.

बीएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि इस कैंटीन का निर्माण बगैर बीएमसी की अनुमति के किया गया था. स्थानीय वार्ड अधिकारी के पास इस अवैध निर्माण की खबर आई थी, जिसके बाद इसे लेकर तहकीकात की गई. खबर के सच पाए जाने के बाद उप निगमायुक्त की देखरेख में उपरी मंजिल ढहाने का काम किया गया.

वहीं शाहरुख की कंपनी ने बयान जारी करते हुए कहा है कि रेड चिलीज वीएफएक्स इस इमारत में बतौर किरायदार शुरू की गई है, इस पर रेड चिली का मालिकाना अधिकार नहीं है. वहीं चौथी मंजिल पर कैंटीन नहीं बनाया गया था, उस जगह का इस्तेमाल कर्मचारी अपने घर से लाया हुआ खाना खाने के लिए किया करते थे.

हेमा मालिनी के घर हुई चोरी, इतने रुपयों का हुआ नुकसान

बौलीवुड की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी को लेकर एक बड़ी खबर आ रही है. खबर है कि हेमा मालिनी के गोदाम में चोरी हो गई है, जिसमें उनका बहुत सारा कीमती सामान चला गया है. हेमा मालिनी इस गोदाम का इस्तेमाल अपने कौस्ट्यूम, प्रौप्स, आर्टिफिशयल ज्वैलरी, शूट और डांस में काम आनेवाली चीजें रखने के लिए किया करती थीं.

कहा जा रहा है कि इस सामान की कीमत करीब 90 हजार थी. हेमा मालिनी के मैनेजर के अनुसार उन्होंने सुबह वहां काम करनेवाले नौकर को फोन किया था. जब नौकर ने फोन नहीं उठाया तो वे खुद गोदाम पहुंचे. वहां जाकर उन्हें पता चला कि गोदाम से कई मूर्तियां, गहने और अन्य सामान इत्यादि गायब है. इसके बाद उन्होंने जुहू पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है.

पुलिस ने मामला दर्ज करते हुए तहकीकात शुरू कर दी है. इस चोरी का शक गोदाम में साफ-सफाई करनेवाले कर्मचारी पर है. इससे पहले भी हेमा मालिनी के गुडगांव स्थित घर से 50 लाख रुपयों की चोरी हो चुकी है.

मेरी उम्र 22 वर्ष है. सर्दियों में मेरी पूरी त्वचा रूखी हो जाती है. त्वचा पर कोई ग्लो नहीं रहता. मुझे क्या करना चाहिए.

सवाल
मेरी उम्र 22 वर्ष है. मेरी समस्या यह है कि सर्दियों में मेरी पूरी त्वचा रूखी व बेजान हो जाती है. त्वचा पर कोई ग्लो नहीं रहता. मुझे क्या करना चाहिए ताकि त्वचा की नमी बरकरार रहे?

जवाब
त्वचा की ड्राईनैस को खत्म करने के लिए खूब पानी पीएं, क्योंकि पानी की कमी से भी त्वचा रूखीसूखी व बेजान सी हो जाती है. इस के अतिरिक्त त्वचा पर नहाने के बाद और रात को सोने से पहले मौइश्चराइजर लगाएं. त्वचा को ठंडी हवाओं से बचाएं. बाहर निकलने से पहले स्कार्फ से चेहरे को ढक लें. अगर त्वचा अधिक रूखी है, तो गुलाबजल में ग्लिसरीन मिला कर त्वचा पर लगाएं. इस से चेहरे को नमी मिलने के साथसाथ चेहरे की टोनिंग भी होगी.

करेंगे ये काम तो इस दीवाली नहीं होगी पैसों की कमी

त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है और ऐसे में शौपिंग करना तो बनता है, इस सीजन में यदि आपके पास पैसों की कुछ कमी है और आप लोन लेना चाहते हैं तो स्टेट बैंक औफ इंडिया (एसबीआई) आपके लिए एक औफर लेकर आया है. एसबीआई फेस्टिवल लोन प्रोग्राम नाम से एक औफर पेश कर रहा है जो त्योहार से जुड़े आपके किसी भी खर्चे के लिए लोन देगा. बैंक के मुताबिक वह त्योहार से जुड़े आपके सभी खर्चों के लिए लोन देगा. आगे जानिए कि कैसे आप यह फेस्ट‍िव लोन ले सकते हैं.

5000 से 50000 तक का लोन

एसबीआई फेस्टिव लोन के तहत आपको 5 हजार रुपये से लेकर 50 हजार रुपये तक लोन मिलेगा. इस लोन को आपको 12 महीनों की ईएमआई के जरिये लौटाना होगा.

पैसे चुकाने में नहीं लगेगा कोई चार्ज

सबसे अच्छी बात यह है कि अगर आप लोन की पूरी रकम समय से पहले चुकाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको किसी भी तरह का चार्ज नहीं भरना होगा. इस लोन पर बैंक प्रीपेमेंट चार्ज नहीं वसूलेगा.

आपकी सैलरी तय करेगी आपके लोन की अमाउंट

आपको कितना लोन मिलेगा. बैंक इसे आपकी सैलरी के आधार पर तय करेगा. आपको आपकी कुल मासिक आय का 4 गुना ज्यादा लोन के तौर पर मिल सकेगा.

जरूरी दस्तावेज

इस लोन के लिए अगर आप एप्लाई करते हैं, तो आपको सिर्फ जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने होंगे. लोन की प्रोसेसिंग के लिए आपको सिर्फ 100 रुपये की फीस देनी होगी. इसके अलावा आप से किसी भी तरह की एडमिनिस्ट्रेटिव फीस नहीं ली जाएगी.

अगर आप नौकरीपेशा करते हैं, तो आपको लोने लेने के लिए एक पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ, सैलरी स्लिप और फार्म 16 जमा करना होगा.

अगर आप स्वरोजगार करते हैं, तो आपको इस्टैब्ल‍िशमेंट सर्टिफिकेट या लीज डीड और टेलिफोन बिल समेत आईटी रिटर्न की जानकारी भी देनी होगी.

यहां मिलेगी अधिक जानकारी

एसबीआई फे‍स्ट‍िव लोन लेने के लिए आप एसबीआई की वेबसाइट पर जा सकते हैं. इसके बारे में अधिक जानकारी भी आपको यहां मिल जाएगी.

मैं 23 साल की हूं. अपने प्रेमी के साथ हमबिस्तरी कर चुकी हूं. क्या मेरे होने वाले पति को इस का पता चल जाएगा.

सवाल
मैं 23 साल की हूं. मैं अपने प्रेमी के साथ हमबिस्तरी कर चुकी हूं. 6 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. क्या मेरे होने वाले पति को इस बात का पता चल जाएगा?

जवाब
आप बेफिक्र रहें. पति को इस बारे में नहीं बताएंगी, तो उन्हें कभी पता नहीं चलेगा, क्योंकि अंग की नाजुक झिल्ली अकसर शादी से पहले खेलकूद के दौरान या साइकिल चलाते वक्त अपनेआप फट जाती है.

ये भी पढ़ें…

शादी से पहले मंगेतर के साथ सोना मना है क्योंकि..

शादी एक ऐसा समय है जब लड़का-लड़की एक साथ एक बंधन में बंधकर पूरा जीवन साथ में बिताने का वादा करते हैं. शादी को पुरूष आमतौर पर शारीरिक तौर पर अधिक देखते हैं. शादी का मतलब अधिकतर पुरूषों के लिए सेक्स संबध बनाना ही होता है लेकिन वे ये बात भूल जाते हैं कि शारीरिक संबंध से अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक संबंध होता है.

यदि महिला और पुरूष आत्मिक रूप से एक-दूसरे से संतुष्ट‍ है तो फिर शारीरिक संबंधों में भी कोई दिक्कत नहीं होती. शादी से पहले यानी सगाई के बाद लड़के और लड़की को एकसाथ खूब समय बिताने को मिलता है लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि वे शादी से पहले फिजीकल रिलेशन बना ले या फिर प्री मैरिटल सेक्सू करें. शादी से पहले संयम बरतना जरूरी है. आइए जानें शादी और संयम के बारे में कुछ और दिलचस्प बातों को.

सगाई और शादी के बीच में संयम के बारे में कुछ और दिलचस्प बातें 

– सगाई के बाद लड़के और लड़की को आपस में एक-दूसरे से मिलना चाहिए और एक-दूसरे को जानना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन्हें संयम बरतना भी जरूरी है.

– यदि शादी से पहले फिजीकल रिलेशन बनाने के लिए लड़का-लड़की में से कोई भी पहल करता है तो दूसरे को मना करना चाहिए नहीं तो इससे इंप्रेशन अच्छा नहीं पड़ता.

– दोनों को समझना चाहिए कि प्री मैरिटल सेक्स से पहले उन्हें आपस में एक-दूसरे को जानने-सूझने का मौका मिला है जिससे वे पहले एक-दूसरे की पसंद-नापसंद इत्यादि के बारे में जान पाएं.

– ये जरूरी है कि मिलने वाले समय को लड़के व लड़की को समझदारी से बिताना चाहिए न कि फिजूल की चीजों में खर्च करना चाहिए.

– शादी से पहले संयम बरतने से न सिर्फ दोनों के रिश्तों में मजबूती आती है बल्कि दोनों का एक-दूसरे पर विश्वास भी बना रहता है. इसके साथ ही संबंधों में अंतरंगता का महत्व भी बरकरार रहता है.

– प्रीमैरिटल सेक्स में हालांकि कोई बुराई नहीं लेकिन दोनों के रिश्ते पर शादी के बाद मनमुटाव का ये कारण बन सकता है.

– रिश्तों में खुलापन जरूरी है. चाहे तो शादी से पहले आप चीजों को डिस्कस कर सकते हैं. एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत कर सकते हैं. एक-दूसरे के साथ घूम-फिर सकते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि फिजीकल रिलेशन ही बनाया जाए.

– शादी से पहले फिजीकल रिलेशन से रिश्तों में अवसाद पैदा होने की संभावना बनी रहती है क्योंकि इसके बाद हर समय मन में एक डर और बैचेनी रहने लगती है. इसीलिए इन सबसे बचना जरूरी है.

– सेक्ससुअल रिलेशंस आपके रिश्ते में करीबी ला भी सकते हैं और दूरी बढ़ा भी सकते हैं इसीलिए कोई भी कदम उठाने से पहले सोच-समझ कर विचार करना आवश्यक है.

शादी से पहले संयम बरतने में कोई नुकसान नहीं है बल्कि रिश्तों की मजबूती के लिए यह अच्छा है.

कम होने वाले हैं घरों के दाम, इन शहरों में ले सकते हैं सस्ते मकान

देश के आठ प्रमुख शहरों में जुलाई सितंबर तिमाही में घरों की बिक्री में 35 प्रतिशत गिरावट आई है. एक अनुसंधान कंपनी की रिपोर्ट में कहा गया है कि संपत्ति बाजार में मांग सुस्त बनी हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 की तीसरी तिमाही में आठ शहरों में 22,699 आवासीय इकाइयां बिकीं. इससे पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 34,809 इकाई रहा था. इन आठ शहरों में गुड़गांव, नोएडा, मुंबई, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई शामिल हैं. माना जा रहा है कि इससे दाम भी गिरे हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘प्रमुख शहरों में आवासीय इकाइयों की मांग 35 प्रतिशत घटकर 22,699 इकाई रह गई, जो पिछली तिमाही में 34,809 इकाई रही थी. नई परियोजनाओं में कमी की वजह से यह स्थिति बनी.’’ इसमें कहा गया है कि मौजूदा तिमाही से मांग के रफ्तार पकड़ने की उम्मीद है.

सिर्फ दिल्ली-एनसीआर में 2017 की पहली छमाही में घरों की बिक्री 26 फीसदी गिरी है. नाइट फ्रैंक इंडिया के रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी के बाद भी घरों की डिमांड सुस्त बनी हुई है. पिछले 18 महीनों में कीमतों में 20 फीसदी करेक्शन हुआ है, लेकिन घरों की डिमांड इसके बावजूद नहीं बढ़ी है. दिल्ली-एनसीआर के प्रौपर्टी मार्केट में अनसोल्ड घरों का स्टौक 1.8 लाख यूनिट्स पर बना हुआ है. यह देश में सबसे ज्यादा है. इसे बेचने में डिवेलपर्स को साढ़े चार साल तक का वक्त लग सकता है.

नाइट फ्रैंक इंडिया ने कहा है कि 2017 की पहली छमाही में 17,188 यूनिट्स की बिक्री हुई, जबकि एक साल पहले की इसी अवधि में 23,092 यूनिट्स की बिक्री हुई थी. इस तरह से इसमें 26 फीसदी की गिरावट दिखाई देती है. इससे पहले के छह महीनों के मुकाबले घरों की बिक्री में 2 फीसदी की मामूली बढ़त दिखाई दी है. नोटबंदी के बाद सबसे कम छमाही सेल्स का सामना इंडस्ट्री को करना पड़ा.

नाइट फ्रैंक इंडिया के एग्जिक्युटिव डायरेक्टर गुलाम जिया ने बताया, ‘एनसीआर मार्केट लगातार गिरावट का शिकार हो रहा है. एनसीआर हाउसिंग मार्केट एक बुरे दौर से गुजर रहा है.’

हिजाब हो बेहिजाब : आजादी की हत्या की है ये निशानी

यूरोपव पश्चिमी देशों में इसलामी बुरके को बैन करने की मांग जोर पकड़ रही है. यह सही है. धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि धर्म अपने अंधभक्तों को अलग किस्म की पोशाकें पहनने को मजबूर करे.

हमारे देश में बुरके पर प्रतिबंध की मांग नहीं उठ रही, क्योंकि इसलाम की तरह हिंदू धर्म भी परदे में गहरा विश्वास रखता है. कट्टर हिंदुओं को तो यह भी बुरा लगता है कि आजकल लड़कियों ने चुन्नी भी छोड़ दी और जींस व टौप में खुलेआम घूम रही हैं.

बदन दिखाना जरूरी नहीं है. बदन की सुरक्षा करना हरेक का फर्ज है. आदमी भी केवल लंगोट पहने नहीं घूमते. वे फैशन या धर्म के लिए नहीं, व्यावहारिकता के लिए कमीजपैंट पहनते हैं. लड़कियां भी, चाहे फैशन की दीवानी हों, न शरीर दिखाना चाहती हैं न बोल्ड अदाएं दिखाना चाहती हैं. वे तो बंधन नहीं चाहतीं जो धर्म उन पर थोपता है, जिन की जरूरत नहीं.

मुसलिम औरतें अकसर धर्म के आदेश को अपनी निजी पसंद कहने लगती हैं. यह गलत है. यह छलावा है. यह खुद को धोखा देना है और दूसरों को बहकाना है. यह अंधविश्वास के कीचड़ में डूब जाने का कदम है कि कीचड़ की ठंडक से उन्हें असीम सुख मिल रहा है.

बहुत गरीब ही सादगी का गुणगान करते हैं. वे जबरन अपने को बहलाते हैं. हिजाब या बुरका कोई लड़की मन से नहीं पहनती. जैसे हर सफल युवा अपनी सफलता दिखाना चाहता है, वैसे ही हर लड़की अपना सौंदर्य व व्यक्तित्व लोगों को दिखाना चाहती है. 17-18 साल की लड़की पर बुरके या परदे को लादना उस की आजादी में खलल है.

बुरका व परदा धार्मिक अत्याचार का नतीजा है. यह पुरुषों की साजिश है कि कहीं उन की औरतों को देख कर कोई उन्हें उठा न ले जाए. पर यह समस्या औरतों की नहीं, आदमियों की है. अच्छी चीज को ढक दिया जाएगा तो वह सड़ जाएगी, उस पर जाले लग जाएंगे. यही लड़कियों के साथ होता है जो अपने बदन का पूरा उपयोग अपनी बदन ढकने वाली पोशाकों के कारण नहीं कर पातीं. उन्हें इन बंधनों से आजादी मिलनी ही चाहिए.

फैशन के नाम पर अगर बदन दिखाया जाता है तो कपड़े भी तो दिखाए जाते हैं. फिल्मी फैस्टिवलों में ऐक्ट्रैस मीटरों लंबे गाउन पहनती हैं जिन्हें संभालने के लिए 2-2, 3-3 सहायिकाएं चाहिए होती हैं. यह न मूर्खता है न बंदिश. यह आजादी है. बुरका या हिजाब पहनना इस आजादी की हत्या की निशानी है. धर्म और धार्मिक समाज इस तरह हावी हो जाता है कि लड़कियां न केवल इसे पहनती हैं बल्कि इन की हमउम्र न पहनें तो ये हल्ला मचाती भी हैं. उन्हें रोकने के लिए सरकारी कानून का होना जरूरी है

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें