Download App

मां मुझे भी जीना है : अपने ही घर में हिंसा की शिकार बेटियां

घरेलू हिंसा यानी घरों में परिवार के सदस्यों के द्वारा की जाने वाली हिंसा. आमतौर पर घरेलू हिंसा को पति के द्वारा पत्नी से की जाने वाली मारपीट के संदर्भ में ही देखा जाता है. भारतीय परिवारों में हिंसा की शिकार पत्नियां तो होती ही हैं, बेटियों के प्रति भी बहुत हिंसा होती है.

भारतीय परिवारों में बेटे और बेटी में फर्क किया जाता है. बेटे को जहां वंश की बेल बढ़ाने वाला, वृद्घावस्था का सहारा माना जाता है, वहीं बेटियों को बोझ मान कर उन से अनचाहे कार्य करवाना, कार्य न करने पर मारपीट करना या पढ़ने व आगे बढ़ने के अवसर न देना, इच्छा न होने पर भी विवाह के खूंटे से बांध देना एक प्रकार से हिंसा के ही रूप हैं. आमतौर पर प्रत्येक भारतीय परिवारों में पाई जाने वाली यह ऐसी हिंसा है जिस पर कभी गौर ही नहीं किया जाता.

प्रसिद कवि बिहारीजी के दोहे ‘देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर’ को सही मानों में चरितार्थ करती इस हिंसा के निशान शरीर पर प्रत्यक्ष भले ही न दिखते हों, परंतु आंतरिक मनमस्तिष्क में इतना गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं कि प्रभावित लड़की उन से ताउम्र जूझती रहती है.

कैसे कैसी हिंसाएं

यौन हिंसा: घर की बेटियों से सगेसंबंधी, चाचा, मामा, ताऊ, चचेरे भाइयों द्वारा छेड़छाड़ करना, उन से जबरदस्ती यौन संबंध बनाने की कोशिश करना एक ऐसी हिंसा है, जिस की शिकार आमतौर पर प्रत्येक भारतीय लड़की होती है. इस हिंसा के घाव कई बार इतने गहरे होते हैं कि लड़की पूरी जिंदगी उन से उबर नहीं पाती और कभीकभी तो उन का वैवाहिक जीवन भी खतरे में पड़ जाता है.

8 वर्षीय गरिमा से उस के चचेरे भाई ने उस समय संबंध बनाने की कोशिश की जब वह सो रही थी. संकोचवश वह कभी अपने मातापिता को नहीं बता पाई, परंतु विवाह के बाद जब भी पति उस के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता घबराहट से उस का पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो जाता और वह लाख कोशिश करने के बाद भी पति को सहयोग नहीं दे पाती थी.

समझदार पति ने जब गरिमा की काउंसलिंग करवाई तो पता चला कि बचपन में हुई यौन हिंसा का असर उस के मनमस्तिष्क पर इतना गहरा बैठा है कि वह सैक्स शब्द सुन कर ही घबरा जाती है. इसी कारण पति के साथ संबंध बनाते समय वह असहज हो जाती है. लंबी काउंसलिंग के बाद वह अपनेआप को संभाल पाई.

गर्भ में ही हिंसा: बेटियों के साथ तो उन के जन्म से पूर्व ही हिंसा का व्यवहार शुरू हो जाता है. कुछ समय पूर्व तक मातापिता अजन्मी बेटियों को गर्भ में ही मार देते थे. अल्ट्रासाउंड तकनीक से पता लगा कर यदि गर्भ में बेटी है, तो गर्भपात करवा दिया जाता था. इस का प्रत्यक्ष प्रमाण

2011 जनगणना के आंकड़े देखने से पता चलता है, जिस के अनुसार भारत में 1000 पुरुषों के अनुपात में महिलाओं की संख्या 933 है. समाज में बटियों को गर्भ में ही मार दिए जाने की प्र्रथा को रोकने के लिए सरकार द्वारा कानून बना कर गर्भस्थ शिशु का लिंग जानने पर रोक लगा देने के बाद खुलेआम तो चैकिंग बंद हो गई पर आज भी पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में चोरीछिपे दाइयों और कंपाउंडरों द्वारा गर्भ में बेटी होने पर गर्भ को गिरा दिया जाता है.

राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में तो जन्म हो जाने के बाद भी बेटियों को जमीन में गाढ़ देने या गला घोंट कर मार देने की घटनाएं प्रकाश में आए दिन आती रहती हैं. कई बार जुड़वां बच्चों में से एक के बेटी होने पर मां के द्वारा बेटी को भूखा रखा जाता है. यह भी हिंसा नहीं तो और क्या है?

मानसिक हिंसा: यह वह हिंसा है, जिस में अभिभावकों द्वारा जानेअनजाने में बेटियों को मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाया जाता है. रीमा का बेटा पढ़ने में औसत और बेटी बहुत मेधावी थी, परंतु जब उच्च शिक्षा के लिए बेटी को बाहर भेजने की बारी आई तो मातापिता ने असमर्थता जता दी और उसे अपने शहर के ही कालेज से स्नातकोत्तर करने को कहा. इस का मलाल उस की बेटी को आज 50 वर्ष की हो जाने पर भी है.

यद्यपि शहरी क्षेत्रों में इस दिशा में काफी सुधार हुआ है, परंतु ग्रामीण और औसत मध्यवर्गीय परिवारों में बेटियों के प्रति आज भी दोहरा व्यवहार किया जाता है. उन्हें पढ़ाई के समान अवसर नहीं दिए जाते. शिक्षा के साथसाथ उन से घर के सारे काम करने की भी अपेक्षा की जाती है. ग्रामीण परिवेश में बेटियां जहां घर का सारा काम करती हैं, कई किलोमीटर दूर से पानी ले कर आती हैं, वहीं बेटों को आवारा घूमने दिया जाता है.

शारीरिक हिंसा: एक अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार एक मां ने अपनी बेटी के सिर पर दरांता महज इसलिए फेंक मारा कि उस ने अपने भाई के लिए खाना नहीं बनाया था. आरुषि हत्याकांड बेटियों के प्रति की जाने वाली शारीरिक हिंसा का साक्षात उदाहरण है. अकसर उन से उम्र में छोटे भाई भी उन पर हाथ उठाने से नहीं हिचकते. मातापिता, दादी, चाचा और ताऊ के द्वारा भी जम कर पिटाई की जाती है. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में लड़की के द्वारा अपने मनपसंद साथी से विवाह कर लेने पर खाप पंचायतों द्वारा सरेआम लड़की को मारने के उदाहरण देखने को मिलते हैं. ग्रामीण इलाकों में आज भी मातापिता को यदि लड़की के प्रेम संबंधों के बारे में पता चलता है, तो उस के साथ हिंसक व्यवहार किया जाता है.

भावनात्मक हिंसा: यह वह हिंसा है जिस की शिकार आमतौर पर कमाऊ बेटियां होती हैं. जिन परिवारों में मातापिता की देखभाल करने वाला कोईर् नहीं होता अथवा परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होती है, उन परिवारों में बेटी को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जाता है. मातापिता और परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाने के कारण वह कभी अपने बारे में सोच ही नहीं पाती. ऐसे परिवारों में परिवार बेटी के प्रति भावनात्मक हिंसा करता है, जिस के कारण लड़की ताउम्र पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाती है. ऐसे मामलों में अकसर लड़कियां मातापिता की सेवा करतेकरते स्वयं अविवाहित रह जाती हैं.

भारतीय परिवारों में अपनी बेटियों के प्रति मातापिता जानेअनजाने ऐसी हिंसा करते हैं, जिस का असर उन की बेटियों को अंदर ही अंदर कचोटता रहता है, परंतु पारिवारिक संस्कार, मातापिता का सम्मान और संकोच के कारण वे कभी आवाज नहीं उठा पातीं और यही बेटियां जब किसी परिवार की बहू, किसी की पत्नी बनती हैं, तो वहां पर भी उन का यह संकोच, संस्कार और सम्मान की भावना उन्हें अपने प्रति होने वाली हिंसा के विरुद्घ आवाज न उठाने देती है. वे पूरा जीवन हिंसा का शिकार होती रहती हैं.

70 साल में महिलाओं को धर्म से नहीं मिली आजादी

15 अगस्त को देश की स्वतंत्रता के 70 साल पूरे हो गए हैं. इन 7 दशकों में औरतों के हालात कितने बदले? वे कितनी स्वतंत्र हो पाई हैं? धार्मिक, सामाजिक जंजीरों की जकड़न में वे आज भी बंधी हैं. उन पर पैर की जूती, बदचलन, चरित्रहीन, डायन जैसे विशेषण चस्पा होने बंद नहीं हो रहे. उन की इच्छाओं का कोई मोल नहीं है. कभी कद्र नहीं की गई. आज भेदभाव के विरुद्ध औरतें खड़ी जरूर हैं और वे समाज को चुनौतियां भी दे रही हैं.

7 दशक का समय कोई अधिक नहीं होता. सदियों की बेडि़यां उतार फेंकने में 7 दशक का समय कम ही है. फिर भी इस दौरान स्त्रियां अपनी आजादी के लिए बगावती तेवरों में देखी गईं. सामाजिक रूढिवादी जंजीरों को उतार फेंकने को उद्यत दिखाई दीं और संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए उन का संघर्ष अब भी जारी है. संपूर्ण स्त्री स्वराज के लिए औरतों के अपने घर, परिवार, समाज के विरुद्ध बगावती तेवर रोज देखने को मिल रहे हैं.

एक तरफ औरत की शिक्षा, स्वतंत्रता, समानता एवं अधिकारों के बुनियादी सवाल हैं, तो दूसरी ओर स्त्री को दूसरे दर्जे की वस्तु मानने वाले धार्मिक, सामाजिक विधिविधान, प्रथापरंपराएं, रीतिरिवाज और अंधविश्वास जोरशोर से थोपे जा रहे हैं और एक नहीं अनेक प्रवचनों में ये बातें दोहराई जा रही हैं.

स्त्री नर्क का द्वार

धर्मशास्त्रों में स्त्री को नर्क का द्वार, पाप की गठरी कहा गया है. मनु ने स्त्री जाति को पढ़ने और सुनने से वर्जित कर दिया था. उसे पिता, पति, पुत्र और परिवार पर आश्रित रखा. यह विधान हर धर्म द्वारा रचा गया. घर की चारदीवारी के भीतर परिवार की देखभाल और संतान पैदा करना ही उस का धर्म बताया गया. औरतों को क्या करना है, क्या नहीं स्मृतियों में इस का जिक्र है. सती प्रथा से ले कर मंदिरों में देवदासियों तक की अनगिनत गाथाएं हैं. यह सोच आज भी गहराई तक जड़ें जमाए है. इस के खिलाफ बोलने वालों को देशद्रोही कहा जाना धर्म है. स्त्री स्वतंत्रता आज खतरे में है.

औरत हमेशा से धर्म के कारण परतंत्र रही है. उसे सदियों से अपने बारे में फैसले खुद करने का हक नहीं था. धर्म ने औरत को बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटों के अधीन रहने का आदेश दिया. शिक्षा, नौकरी, प्रेम, विवाह, सैक्स करना पिता, परिवार, समाज और धर्म के पास यह अधिकार रहा है और 7 दशक बाद यह किस तरह बदला यह दिखता ही नहीं है. कानूनों और अदालती आदेशों में यह हर रोज दिखता है.

अब औरतें अपने फैसले खुद करने के लिए आगे बढ़ रही हैं. कहींकहीं वे परिवार, समाज से विद्रोह पर उतारू दिखती हैं.

आजादी के बाद औरत को कितनी स्वतंत्रता मिली, उसे मापने का कोई पैमाना नहीं है. लेकिन समाजशास्त्रियों से बातचीत के अनुसार देश में लोग अभी भी घर की औरतों को दहलीज से केवल शिक्षा या नौकरी के अलावा बाहर नहीं निकलने देते. लिबरल, पढे़लिखे परिवार हैं, जिन्हें जबरन लड़कियों के प्रेमविवाह, लिव इन रिलेशन को स्वीकार करना पड़ रहा है. लोग बेटी और बहू को नौकरी, व्यवसाय करने देने पर इसलिए सहमत हैं, क्योंकि उन का पैसा पूरा परिवार को मिलता है. फिर भी इन लोगों को समाज के ताने झेलने पड़ते हैं. देश में घूंघट प्रथा, परदा प्रथा का लगभग अंत हो रहा है पर शरीर को ढक कर रखो के उपदेश चारों ओर सुनने को मिल रहे हैं.

आज औरतें शिक्षा, राजनीति, न्याय, सुरक्षा, तकनीक, खेल, फिल्म, व्यवसाय हर क्षेत्र में सफलता का परचम लहरा रही हैं. यह बराबरी संविधान ने दी है. वे आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो रही हैं. उन में आत्मविश्वास आ रहा है, पर पुरुषों के मुकाबले अभी वे बहुत पीछे हैं.

इन 70 सालों में औरत को बहुत जद्दोजहद के बाद आधीअधूरी आजादी मिली है. इस की भी उसे कीमत चुकानी पड़ रही है. आजादी के लिए वह जान गंवा रही है. आए दिन बलात्कार, हत्या, आत्महत्या, घर त्यागना आम हो गया है. महिलाओं के प्रति ज्यादातर अपराधों में दकियानूसी सोच होती है.

लगभग स्वतंत्रता के समय दिल्ली के जामा मसजिद, चांदनी चौक  इलाके में अमीर मुसलिम घरों की औरतों को बाहर जाना होता था, तो 4 लोग उन के चारों तरफ परदा कर के चलते थे. अब जाकिर हुसैन कालेज, जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में युवतियां बुरके के बजाय जींसटौप में देखी जा सकती हैं. पर ठीक उसी के पास कम्युनिटी सैंटर में खुले रेस्तराओं में हिजाब और बुरके में लिपटी भी दिखेंगी.

बराबरी का हक

जीन और जींस की आजादी यानी पहननेओढ़ने की आजादी, पढ़नेलिखने की आजादी, घूमनेफिरने की आजादी, सैक्स करने की आजादी जैसे नारे आज हर कहीं सुनाई पड़ रहे हैं पर बराबरी का प्राकृतिक हक स्त्री को भारत में अब तक नहीं मिल पाया है.

दुनिया भर में लड़कियों को शिक्षित होने के हरसंभव प्रयास हुए. अफगानिस्तान में हाल  तक बड़ी संख्या में लड़कियों के स्कूलों को मोर्टरों से उड़ा दिया गया. मलाला यूसुफ जई ने कट्टरपंथियों के खिलाफ जब मोरचा खोला, तो उस पर जानलेवा हमला किया गया. कट्टर समाज आज भी स्त्री की स्वतंत्रता पर शोर मचाने लगता है.

दरअसल, औरत को राजनीति या पुरुषों ने नहीं रोका. आजादी के बाद सरकारों ने उन्हें बराबरी का हक दिलाने के लिए कई योजनाएं लागू कीं. पुरुषों ने ही नए कानून बनाए, कानूनों में संशोधन किए. स्वतंत्रता के बाद कानून में स्त्री को हक मिले हैं. उसे शिक्षा, रोजगार, संपत्ति का अधिकार, प्रेमविवाह जैसे मामलों में समानता का कागजों पर हक है. सती प्रथा उन्मूलन, विधवा विवाह, पंचायती राज के 73वें संविधान संशोधन में औरतों को एकतिहाई आरक्षण, पिता की संपत्ति में बराबरी का हक, अंतर्जातीय, अंतधार्मिक विवाह का अधिकार जैसे कई कानूनों के जरीए स्त्री को बराबरी के अधिकार दिए गए. बदलते कानूनों से महिलाओं का सशक्तीकरण हुआ है.

स्वतंत्रता पर अंकुश

औरतों पर बंदिशें धर्म ने थोपीं. समाज के ठेकेदारों की सहायता से उन की स्वतंत्रता पर तरहतरह के अंकुश लगाए. उन के लिए नियमकायदे गढे़. उन की स्वतंत्रता का विरोध किया. उन पर आचारसंहिता लागू की, फतवे जारी किए. अग्निपरीक्षाएं ली गईं.

कहीं लव जेहाद, खाप पंचायतों के फैसले, वैलेंटाइन डे का विरोध, प्रेमविवाह का विरोध, डायन बता कर हमले समाज की देन हैं. औरतें समाज को चुनौती दे रही हैं. सरकारें इन सब बातों से औरतों को बचाने की कोशिश करती हैं.

पर औरत को अपनी अभिव्यक्ति की, अपनी स्वतंत्रता की कीमत चुकानी पड़ रही है. मनमरजी के कपड़े पहनना, रात को घूमना, सैक्स की चाहत रखना, प्रेम करना ये बातें समाज को चुनौती देने वाली हैं इसलिए इन पर हमले किए जाते हैं.

आज स्त्री के लिए अपनी देह की आजादी का सवाल सब से ऊपर है. उस की देह पर पुरुष का अवैध कब्जा है. वह अपने ही शरीर का, अंगों का खुद की मरजी से इस्तेमाल नहीं कर पा रही है. उस पर अधिकार पुरुष का ही है. पुरुष 2-2, 3-3 औरतों के साथ संबंध रख सकता है पर औरत को परपुरुष से दोस्ती रखने की मनाही है. यहां पवित्रता की बात आ जाती है, चरित्र का सवाल उठ जाता है, इज्जत चली जाने, नाक कटने की नौबत उठ खड़ी होती है. आज ज्यादातर अपराधों की जड़ में स्त्री की आजादी का संघर्ष निहित है. भंवरी कांड, निर्भया मामला औरत का स्वतंत्रता की ओर बढ़ते कदम को रोकने का प्रयास था. औरतें आज घर से बाहर निकल रही हैं, तो इस तरह के अपराध उन्हें रोकने के लिए सामने आ रहे हैं. स्त्रियों की स्वतंत्रता से समाज के ठेकेदारों को अपनी सत्ता हिलती दिख रही है.

आजकल अखबारों में रोज 5-7 विज्ञापन युवा लड़कियों के गायब होने, अपहरण होने के छप रहे हैं. ये वे युवतियां होती हैं, जिन्हें परिवार, समाज से अपने निर्णय खुद करने की स्वतंत्रता हासिल नहीं हो पाती, इसलिए इन्हें प्रेम, शादी, शिक्षा, रोजगार जैसी आजादी पाने के लिए घर से बगावत करनी पड़ रही है.

स्वतंत्रता का असर इतना है कि अब औरत की सिसकियां ही नहीं, दहाड़ें भी सुनाई पड़ती हैं. पिछले 30 सालों में औरतें घर से निकलना शुरू हुई हैं. आज दफ्तरों में औरतों की तादाद पुरुषों के लगभग बराबर नजर आने लगी है. शाम को औफिसों की छुट्टी के बाद सड़कों पर, बसों, टे्रेनों, मैट्रो, कारों में चारों ओर औरतें बड़ी संख्या में दिखाई दे रही हैं.

उन के लिए आज अलग स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय बन गए हैं. उन्हें पुरुषों के साथ भी पढ़नेलिखने की आजादी मिल रही है.

औरतों ने जो स्वतंत्रता पाई है वह संघर्ष से, जिद्द से, बिना किसी की परवाह किए. नौकरीपेशा औरतें औफिसों में पुरुष साथी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं. घर आ कर भी फोन पर कलीग से, बौस से लंबी बातें कर रही हैं. वे अपने पुरुष मित्र के साथ हाथ में हाथ लिए सड़कों, पार्कों, होटलों, रेस्तराओं, पबों, बारों, मौलों, सिनेमाहालों में जा रही हैं. निश्चित तौर पर वे सैक्स भी कर रही हैं.

कई औरतें खुल कर समाज से बगावत पर उतर आई हैं. वे बराबरी का झंडा बुलंद कर रही हैं. समाज को खतरा इन्हीं औरतों से लगता है, इसलिए समाज के ठेकेदार कभी ड्रैस कोड के नियम थोपने की बात करते हैं, तो कभी मंदिरों में प्रवेश से इनकार करते हैं. हालांकि मंदिरों में जाने से औरतों की दशा नहीं सुधर जाएगी. इस से फायदा उलटा धर्म के धंधेबाजों को होगा.

अब औरत प्रेम निवेदन करने की पहल कर रही है, सैक्स रिक्वैस्ट करने में भी उसे कोई हिचक नहीं है. समाज ऐसी औरतों से डरता है, जो उस पर थोपे गए नियमकायदों से हट कर स्वेच्छाचारी बन रही हैं.

पर औरत के पैरों में अभी भी धार्मिक, सामाजिक बेडि़यां पड़ी हैं. इन बेडि़यों को तोड़ने का औरत प्रयास करती दिख रही है. केरल में सबरीमाला, महाराष्ट्र में शनि शिगणापुर और मुंबई में हाजी अली दरगाह में महिलाएं प्रवेश की जद्दोजहद कर रही हैं.

यहां भी औरतों को समाज रोक रहा है, संविधान नहीं. संविधान तो उसे बराबरी का अधिकार देने की वकालत कर रहा है. इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने रोक को गलत बताया है. उन्हें बराबरी का हक है.

लेकिन औरत को जो बराबरी मिल रही है वह प्राकृतिक नहीं है. उसे कोई बड़ा पद दिया जाता है, तो एहसान जताया जाता है. जबप्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाया तो खूब गीत गाए कि देखो हम ने एक महिला को इस बड़े पद पर बैठाया है. महिला को राज्यपाल, राजदूत, जज, पायलट बनाया तो हम ने बहुत एहसान जता कर दुनिया को बताया. इस में बताने की जरूरत क्यों पड़ती है? स्त्री क्या कुछ नहीं बन सकती?

लड़की जब पैदा होती है, तो कुदरती लक्षणों को अपने अंदर ले कर आती है. उसे स्वतंत्रता का प्राकृतिक हक मिला होता है. सांस लेने, हंसने, रोने, चारों तरफ देखने, दूध पीने जैसे प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होते हैं. धीरेधीरे वह बड़ी होती जाती है, तो उस से प्राकृतिक अधिकार छीन लिए जाते हैं. उस के प्रकृतिप्रदत्त अधिकारों पर परिवार, समाज का गैरकानूनी अधिग्रहण शुरू हो जाता है. उस पर धार्मिक, सामाजिक बंदिशों की बेडि़यां डाल दी जाती हैं. उसे कृत्रिम आवरण ओढ़ा दिया जाता है.  ऊपरी आडंबर थोप दिए जाते हैं. ऐसे आचारविधान बनाए गए जिन से स्त्री पर पुरुष का एकाधिकार बना रहे और स्वेच्छा से उस की पराधीनता स्वीकार कर लें.

हिंदू धर्म ने स्त्री और दलित को समाज में एक ही श्रेणी में रखा है. दोनों के साथ सदियों से भेदभाव किया गया. दलित रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया गया तो खूब प्रचारित किया गया कि घासफूस की झोपड़ी में रहने वाले दलित को हम ने 360 आलीशान कमरों वाले राष्ट्रपति भवन में पहुंचा दिया, लेकिन आप ने इन्हें क्यों सदियों तक दबा कर रखा? ऊपर नहीं उठने दिया उस की सफाई कोई नही दे रहा.

आज औरत को जो आजादी मिल रही है वह संविधान की वजह से मिल रही है पर धर्म की सड़ीगली मान्यताओं, पीछे की ओर ले जाने वाली परंपराओं और प्रगति में बाधक रीतिरिवाजों को जिंदा रखने वाला समाज औरत की स्वतंत्रता को रोक रहा है. दुख इस बात का है कि औरतें धर्म, संस्कृति की दुहाई दे कर अपनी आजादी को खुद बाधित करने में आगे हैं. अपनी दशा को वे भाग्य, नियति, पूर्व जन्म का दोष मान कर परतंत्रता की कोठरी में कैद रही हैं. आजादी के लिए उन्हें धर्म की बेडि़यों को उतार फेंकना होगा.

भाजपा और कांग्रेस की घर में घेराबंदी की रणनीति के क्या हैं मायने

भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने मंगलवार को एक दूसरे को उनके घर में ही घेरा. एक तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, स्मृति ईरानी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक साथ कांग्रेस के गढ़ अमेठी में विकास कार्यों को लेकर राहुल गांधी पर हमला बोला. वहीं, गुजरात दौरे के दूसरे दिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए.

केंद्र ने अर्थव्यवस्था चौपट की: राहुल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को गुजरात दौरे के दूसरे दिन केंद्र सरकार के फैसलों पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि जीएसटी और नोटबंदी जैसे निर्णयों ने अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है. बेरोजगारी की स्थिति गंभीर हो गई है, लेकिन सरकार किसी की सुन नहीं रही है. राहुल ने कहा कि अगर जीडीपी की वृद्धि दर पुरानी प्रणाली के अनुसार गिना जाए तो यह गिर कर 4.2 प्रतिशत पर आ गई है.

उन्होंने कहा कि भारत की व्यवस्था जटिल है और ऐसे में यहां छोटे से छोटे निर्णय जनता की राय के आधार पर लिये जाने चाहिए पर सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी को बिना राय मशविरे के थोप दिया. जब कांग्रेस की सरकार आएगी तो हम जनता के मन की बात सुनेंगे. उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के दौरान मनरेगा योजना के लिए 35 हजार करोड़ के खर्च को लेकर हायतौबा मचायी जा रही थी. अब सरकार किसानों का कर्ज माफनहीं करती है.कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि सरकार बेटी बचाओ से आगे बढ़ते हुए बेटा बचाओ में बदल गई है.

राहुल की यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब भाजपा अध्यक्ष के पुत्र जय अमित शाह के समर्थन में अनेक केंद्रीय मंत्री सामने आ गए हैं. उन्होंने पीयूष गोयल ने जय शाह के कारोबारी लेनदेन का बचाव किया शीर्षक से रिपोर्ट को भी अपने ट्वीट के साथ जोड़ा.

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम महंगाई की जड़

राहुल गांधी ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को महंगाई की जड़ करार दिया. उन्होंने इन पेट्रोलियम पदार्थो को जीएसटी के दायरे में लाने की मांग की. व्यापारियों के साथ संवाद में उन्होंने जीएसटी की मौजूदा पांच कर दर वाली व्यवस्था को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए एकसमान 18 प्रतिशत दर से जीएसटी लागू करने का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि यह प्रणाली एक देश एक कर की अवधारणा पर आधारित है ही नहीं.

सरकारी शिक्षण संस्थानों की मजबूती जरूरी

उन्होंने कहा कि आईआईटी एक सरकारी संस्थान होने के बावजूद देश का सबसे बेहतर शैक्षणिक संस्थान है. इसलिए सरकारी शिक्षण संस्थानों को पोषित किया जाना चाहिए. वह निजी शिक्षा के खिलाफ नहीं है पर इसकी कीमत को नियंत्रित रखने के लिए सरकारी प्रणाली को मजबूत रखना जरूरी है जबकि गुजरात सरकार ने पूरी तरह निजीकरण के लिए इसे नष्ट कर दिया है.

राहुल अमेठी की जनता को हिसाब दें : शाह

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उनके ही गढ़ अमेठी में घेरा. राहुल गांधी के मोदी सरकार से तीन साल का हिसाब मांगने पर शाह ने कहा कि अमेठी की जनता उनसे उनकी तीन पीढ़ियों का हिसाब मांग रही है.

एक बार मोदी पर भरोसा कीजिए पछताना नहीं पड़ेगा

शाह ने अमेठी के कौहार में विकास कार्यक्रमों के लोकार्पण और शिलान्यास के जरिये अमेठी से लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया. उन्होंने कहा कि 2019 में जब वोट मांगने आएंगे तो आपसे काम का वादा नहीं करेंगे बल्कि हमने आपके लिए क्या किया, यह पूरा हिसाब लेकर आएंगे. उन्होंने अमेठी की जनता से अपील की कि 55 साल तक गांधी परिवार पर भरोसा किया तो एक बार मोदी व भाजपा पर भी विश्वास कीजिए, आप को पछताना नहीं पड़ेगा. उन्होंने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि सांसद होन के बावजूद वह अमेठी में बहुत कम आते हैं.

सपा-बसपा खाते ज्यादा थे

प्रदेश की पूर्ववर्ती सपा-बसपा सरकारों पर निशाना साधते हुए शाह ने कहा कि सपा-बसपा खाते ज्यादा थे और केंद्र से मिलता भी कम था. केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद प्रदेश को मिल भी ज्यादा रहा है और योगी आदित्यनाथ जनता तक पहुंचा भी ज्यादा रहे हैं. हर गरीब को छत, शौचालय और बिजली की रोशनी देना सरकार का लक्ष्य है.

गर्मियों में ननिहाल चले जाते हैं राहुल

शाह ने कहा कि राहुल को जनता की समस्याओं से कोई मतलब नहीं है,गर्मी के दिनों में वह ननिहाल चले जाते हैं. जबकि भाजपा सरकार ने आम जनता के हित में योजनाएं शुरू की हैं, देश की सीमाओं को सुरक्षित किया है. पार्टी कार्यालय का शिलान्यास करने सीतापुर पहुंचे शाह ने आरोप लगाया कि अमेठी की जनता के लिए भी कांग्रेस ने कुछ नहीं किया, कलेक्ट्रेट तक नहीं बनी. आज हम कलेक्ट्रेट भवन का शुभारंभ करके आए हैं. शाह ने कहा कि मोदी सरकार ने तो गेहूं खरीद मूल्य दो माह में ही भुगतान किया है. पिछली सरकारों में सालों गन्ना मूल्य का भुगतान नहीं होता था, किसान परेशान रहता था. हमारी सरकार ने 22 हजार करोड़ रुपये गन्ना किसानों का भुगतान छह माह में कराया है.

अपने डेब्यू मैच से ही इन 5 गेंदबाजों ने बटोरी सुर्खियां

इस बात से इनकार नहीं किया जासकता कि क्रिकेट दुनिया के लोकप्रिय खेलों में से एक है. दुनियाभर में क्रिकेट का क्रेज सिर चढ़ कर बोलता है. कुछ साल पहले तक क्रिकेट को बल्लेबाजों का खेल कहा जाता था, लेकिन आज मैच में हार या जीत के लिए गेंदबाज भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं.

बल्लेबाज हो या गेंदबाज जब खिलाड़ी मैदान में उतरता है तो उसका एक ही उद्देश्य होता है, अच्छा परफार्मेंस कर विरोधी टीम को धूल चटाना और अपने नाम रिकार्ड हासिल करना. साथ ही बात जब डेब्यू मैच की हो तो खिलाड़ी उसे यादगार बनाने के लिए पूरी कोशिश करता है. लेकिन कुछ ही खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो अपने डेब्यू मैच में शानदार प्रदर्शन कर वाहवाही लूटते हैं और उसे यादगार बनाते हैं. चलिए आज हम आपको 5 ऐसे गेंदबाजों के बारे में बताते हैं जिन्होंने अपने डेब्यू मैच को यादगार बनाया और विरोधी टीम के बल्लेबाजों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं.

कागीसो रबाडा (साउथ अफ्रीका)

क्रिकेट के इतिहास में कागीसो रबाडा का अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट टीम में डेब्यू सबसे शानदार माना जाता है. रबाडा ने 10 जुलाई साल 2015 में बांग्लादेश के खिलाफ पहला वनडे मैच खेला. इस मैच में रबाडा ने 8 ओवर में 16 रन देकर 6 विकेट हासिल किए थे. इसके साथ उन्होंने मैच के चैाथे ओवर की आखिरी तीन गेंदों पर महमुदुल्लाह, लिटन दास और तामिम इकबाल को आउट कर करियर की पहली हैट्रिक ली. उनकी गेंदबाजी की बदौलत बांग्लादेश 160 रनों पर ढेर हो गया और साउथ अफ्रीका ने यह मैच 8 विकेट से जीत लिया.

मुस्तफिजूर रहमान (बांग्लादेश)

बाएं हाथ से तेज गेंदबाजी करने वाले मुस्ताफिजूर रहमान ने साल 2015 में 18 जनवरी को वनडे में डेब्यू किया था. रहमान ने अपने डेब्यू मैच में ना केवल भारतीय बल्लेबाजी की गिल्लियां बिखेंरी बल्कि बांग्लादेश को बड़ी जीत भी दिलाई. बांग्लादेश ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 307 रन बनाए. जवाब में जब भारतीय टीम उतरी जो सबको उम्मीदें थी कि भारत मैच जीत लेगा. लेकिन रहमान ने खतरनाक गेंदबाजी की जिसकी बदौलत भारत 79 रनों से हार गया. रहमान ने 9.2 ओवर में 50 रन देकर 5 विकेट झटके थे.

फिडेल एडवर्ड्स (वेस्टइंडीज)

दाएं हाथ के गेंदबाज फिडेल एडवर्ड्स ने वनडे में अपना डेब्यू मैच 29 नबंवर 2003 को जिंम्बाब्वे के खिलाफ खेला था. एडवर्ड्स दुनिया के दूसरे ऐसे गेंदबाज हैं जिनका डेब्यू सबसे शानदार रहा. उनकी खतरनाक बाउंसर के आगे बल्लेबाज कांप उठते थे. उन्होंने पहले ही मैच में शानदार प्रदर्शन करते हुए 7 ओवर में 22 रन देकर 6 विकेट झटके थे. उनकी गेंदबाजी के आगे जिंम्बाब्वे के बल्लेबाज पूरी तरह से पस्त नजर आए थे. वेस्टइंडीज ने निर्धारित 45 ओवर में 256 रन बनाए थे. बारिश आने के कारण जिंम्बाब्वे को 32 ओवर में 223 रनों का टागरेट रहा. लेकिन एडवर्ड्स के खतरनाक स्पेल की बदौलत जिंम्बाब्वे 7 विकेट खोकर 150 रन ही बना सकी और वेस्टइंडीज ने यह मुकाबला डकवर्थ लुईस नियम के तहत 72 रन से जीता.

तास्किन अहमद (बांग्लादेश)

दाएं हाथ के तेज गेंदबाज तास्किन अहमद ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय वनडे मैच साल 2014 में 17 जनवरी को भारत के खिलाफ खेला. इस मैच के दौरान तास्किन ने अपने खतरनाक गेंदबाजी के जौहर दिखाकर भारतीय खेमे को हिलाकर रख दिया था. उन्होंने 8 ओवर में 28 रन देकर 5 विकेट झटके थे जिसके कारण टीम भारतीय टीम 105 रनों पर औलआउट हो गई. हालांकि बांग्लादेश यह मैच नहीं जीत सका था. भारत ने बांग्लादेश को 58 रनों पर ही ढेर कर डकवर्थ लुईस नियम के तहत 47 रन से मैच जीत लिया था.

जेक बौल (न्यूजीलैंड)

यह वो गेंदबाज हैं जिन्होंने अपने डेब्यू मैच में बांग्लादेश की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. न्यूजीलैंड-बांग्लादेश के बीच 7 अक्तूबर 2016 को ढाका में वनडे मैच खेला गया. बांग्लादेश के सामने न्यूजीलैंड ने 310 रनों का लक्ष्य रखा. लेकिन वनडे टीम में पहली बार शामिल हुए तेज गेंदबाज जेक बौल ने अपनी गेदबाजी से बांग्लादेशी बल्लेबाजों की एक नहीं चलनी दी और विरोधियों को 288 रनों पर रोक दिया. न्यूजीलैंड ने यह मैच 21 रन से जीता. जेक बौल ने 9.5 ओवर में 51 रन देकर मैच जिताउ 5 विकेट झटके थे.

‘प्रथम महिला’ को लेकर ट्रंप की पत्नियों के बीच छिड़ी जुबानी जंग

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वर्तमान पत्नी मेलानिया और पहली पत्नी इवाना में जुबानी जंग छिड़ गई है. उनका झगड़ा ‘प्रथम महिला’ की पदवी को लेकर है, जिस पर दोनों दावा जता रही हैं. इस मसले को लेकर वे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं. हालांकि ट्रंप की दूसरी पत्नी मार्ला मैपल्स इस विवाद से फिलहाल दूर हैं.

इवाना और मेलानिया के बीच इस मसले पर सोमवार को सरेआम वाक्युद्ध हुआ. इवाना ‘गुड मॉर्निग अमेरिका’ नामक टेलिविजन शो में अपनी नई किताब ‘रेजिंग ट्रंप’ के प्रचार के लिए पहुंची थीं. यह किताब ट्रंप के तीन बड़े बच्चों के पालन-पोषण के बारे में है. शो में दिए गए साक्षात्कार में इवाना ने ट्रंप से अपने संबंधों का हवाला देते हुए कुछ टिप्पणियां कीं, जिस पर राष्ट्रपति की वर्तमान पत्नी मेलानिया भड़क उठीं.

मेलानिया को वाशिंगटन डी.सी. पसंद

बयान में कहा गया, श्रीमती ट्रंप ने व्हाइट हाउस को बेरन और राष्ट्रपति के लिए बनाया है. बेरन, ट्रंप के सबसे छोटे बेटे हैं. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि मेलानिया को वास्तव में अपने वाशिंगटन डी.सी. के जीवन से नफरत नहीं है. उन्हें वाशिंगटन डीसी में रहना पसंद है और अमेरिका की प्रथम महिला होने के नाते वह सम्मानित महसूस करती हैं. वह इस सम्मान का उपयोग बच्चों की मदद करने के लिए करेंगी, न कि किताबें बेचने के लिए.

नहीं चाहती मेलानिया को जलन हो : इवाना

इवाना ने कहा, देखा जाए तो मैं डोनाल्ड ट्रंप की पहली पत्नी हूं. ठीक है? उन्होंने कहा, मैं प्रथम महिला हूं. मेरे पास व्हाइट हाउस का सीधा नंबर है. लेकिन मैं उन्हें कॉल नहीं करना चाहती क्योंकि वहां मेलानिया हैं और मैं वाकई नहीं चाहती कि उन्हें जलन जैसा कुछ हो. इवांका ट्रंप की मां इवाना ने बताया कि वह अपने पूर्व पति से हर 14 दिन में एक बार बात करती हैं.

ध्यान खींचने की जुगत : मेलानिया

इवाना के दावों से भड़की मेलानिया ने बयान जारी कर कहा कि डोनाल्ड ट्रंप की पूर्व पत्नी की बातों में कोई दम नहीं है. मेलानिया की प्रवक्ता स्टेफनी ग्रिशम की ओर से जारी बयान में कहा गया, इवाना की बातें सिर्फ लोगों का ध्यान खींचने के मकसद से कही गई हैं. ये बातें ऐसे एक व्यक्ति की ओर से आई हैं जो सिर्फ अपनी किताबें बेचना चाहती है.

1977 में हुई थी इवाना-डोनाल्ड ट्रंप की शादी

68 साल की इवाना ट्रंप पेशे से मॉडल और व्यवसायी हैं. उनकी और ट्रंप की साल 1977 में शादी हुई थी, जो 1992 में खत्म हो गई. डोनाल्ड ट्रंप ने इसके बाद मैपल नाम की महिला से विवाह किया, लेकिन यह रिश्ता भी महज छह वर्ष चला और दोनों का तलाक हो गया. मेलानिया, ट्रंप की तीसरी पत्नी हैं. मेलानिया और ट्रंप का विवाह 2005 में हुआ था.

पानी में गिर जाने पर ऐसे बचाये अपने स्मार्टफोन को

बड़ी मेहनत-जतन से चुनकर आप एक महंगा स्मार्टफोन खरीदते हैं और वह पानी में गिर जाए तो? कई बार परिस्थितियां ऐसी आती है कि काफी कोशिशों के बाद भी हम पानी में गिरते हुए फोन को बचाने में नाकाम रहते हैं. कई बार बचा भी लेते हैं. सोचा है कभी आपने कि अगर आपका स्मार्टफोन पानी में गिर जाए तो आप क्या करेंगे. घबराइये नहीं! पहले तो आपको फोन के पानी में गिरने पर तनाव में आने की जरूरत नहीं है क्योंकि अगर आपको फोन के पानी में गिरने के बाद उसका क्या करना है इस बात की जानकारी है, तो आपका फोन खराब होने से बच सकता है. आइये हम आपको बताते हैं कि कैसे आप फोन को पानी में गिरने के बाद बचा सकते हैं.

फोन के पानी में गिरने की स्थिति में जितना जल्दी हो सके उसे पानी से बाहर निकालें. कुछ स्मार्टफोन्स पर वाटरप्रूफ कोटिंग होती है, जो पानी में कुछ सेकंड्स तक फोन को डैमेज होने से बचाती है. अगर आपका भी फोन ऐसा हो और आप उसे पलक झपकते ही पानी से निकाल लें, तो हो सकता है कि आप नुकसान से बच जाएं.

फोन स्विच आफ करें

अगर स्मार्टफोन के पानी में गिरने पर उसका पावर आन है तो ऐसी स्थिति में उसे पानी से निकालते ही स्विच आफ कर दें. ऐसा करने से शार्ट सर्किट होने का खतरा नहीं होगा. फोन आफ हो या आन करने के लिए उसके किसी भी बटन को उपयोग न करें.

अगर आपके फोन में नान-रिमूवेबल बैटरी है तो बैटरी निकाल कर आफ करने का विकल्प खत्म हो जाएगा. ऐसे में पावर बटन से फोन को बंद करना ज्यादा जरूरी है. नान रिमूवेबल बैटरी के कारण शार्ट सर्किट हो सकता है.

हर चीज रिमूव करें

फोन को स्विच आफ करने के बाद फोन से जहां तक संभव हो यानी बैटरी, सिम कार्ड्स, मेमरी कार्ड्स के साथ ही अक्सेसरी (स्टाइलस, केस, कवर, स्किन)  हर चीज निकाल लें और इन्हें सूखे कपड़े से पोंछ कर सुखाएं.

हिलाकर पानी निकालें

हेडफोन जैक, चार्जिंग पोर्ट में या फिजिकल बटन्स के नीचे से पानी की बूंदे निकालने के लिए फोन को सावधानी के साथ झकझोरें. इसके बाद फोन को सूखे कपड़े, टायलट पेपर या पेपर नैपकिन से अच्छी तरह पोछें.

चावल में दबा दें

एयरटाइट कंटेनर या जिपलाक बैग लें. उसे कच्चे चावल से भर दें. अपने फोन को चावल के बीच में रखें. जिपलाक बैग कंटेनर को टाइट बंद कर दें और सूखी जगह पर रख दें. इसे कम से कम 24 से 48 घंटों के लिए छोड़ दें. यह देखने के लिए भी फोन को बाहर न निकालें कि यह ठीक हो गया या नहीं. आप चावल की जगह ओटमील या सिलिका जेल पैक्स भी प्रयोग कर सकते हैं. अगर पानी से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ होगा तो आपका फोन इस पीरियड के बाद काम करने लगेगा.

इस पूरी कवायद से फोन चालू होने की संभावना 50% ही है. यदि फोन आन हो जाता है तो उसमें सभी फीचर्स को उपयोग करें और देखें कि फोन का डिसप्ले सही कार्य कर रहा है या नहीं. यदि फोन आन नहीं हुआ है तो उसे चार्जिंग पर लगाए. किंतु चार्ज भी नहीं हो रहा तो, हो सकता है फोन की बैटरी डैमेज हो गई है. उसे आथराइज्ड सर्विस सेंटर पर ले जाएं.

आखिर गजल के बीच में चुटकुले क्यों सुनाते थे जगजीत सिंह

‘वो कागज की कश्ती’, ‘झुकी झुकी सी नजर’, ‘होंठों से छू लो तुम’ ये शब्द सुनकर यकीकन आपके जहन में इसके गायक का चेहरा ताजा हो गया होगा. इन गजलों के गायक जगजीत सिंह को बौलीवुड में एक ऐसे शख्सियत के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने अपनी गजल गायकी से लगभग चार दशक तक श्रोताओं के दिल पर अमिट छाप छोड़ी. सैकड़ों गजल गाने वाले गजल सम्राट जगजीत सिंह की आज छठी पुण्यतिथि है. जगजीत सिंह की भारी और दर्द से भरी आवाज की वजह से गजल गायकी में दूसरा कोई उनका सानी नहीं है.

08 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्में जगजीत सिंह के बचपन का नाम जगमोहन था. 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने अपनी पत्नी चित्रा सिंह के साथ एक से एक बेहतरीन गजलें गाईं और देश-विदेश में अपनी आवाज का डंका बजाया.

जगजीत सिंह दूसरे गायकों से बिल्कुल अलग थे. वो जब लाइव शोज करते थे, तो बीच बीच में जोक सुनाते थे. एक बार उन्होंने खुद बताया कि वो ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि श्रोता उनसे जुड़े रहें. अक्सर देखा जाता है कि श्रोता संजीदा गजल सुनकर रूआंसे हो जाते है, इसलिए श्रोताओं को लगातार जगाए और जोड़े रखने के लिए वो बीच-बीच में चुटकुले सुनाते रहते थे, जो उनकी गायन शैली को दूसरों से अलग करता था.

1990 में एक ट्रेजडी ने जगजीत सिंह और उनकी पत्नि चित्रा को एकदम खामोश कर दिया. जगजीत और चित्रा के बेटे विवेक का कार हादसे में निधन हो गया. इस वजह से जगजीत सिंह छह महीने तक एकदम खामोश हो गए जबकि चित्रा सिंह इस हादसे से कभी उबर नहीं पाईं और उन्होंने गायकी छोड़ दी. वहीं 6 महीने बाद अपने आपको फिर से संभालते हुए उन्होंने फिर गजल गानी शुरू की. उनकी गजलों में बेटे को खो देने का दुख साफ झलकता था. चिट्ठी न कोई संदेश उन्होंने अपने बेटे के जाने के बाद गाई थी, जो उनकी शानदार गजलों में से एक मानी जाती हैं.

भले ही जगजीत सिंह आज हमारे साथ नहीं है, लेकिन उनकी रूहानी आवाज आज भी ये एहसास कराती है कि वो हमारे बीच ही मौजूद हैं. सुनिए जगजीत सिंह की ऐसी ही कुछ गजलें जो आपके दिल के बेहद करीब रही हैं.

अगर आपको तुरंत चाहिए लोन तो अपनाएं ये आसान तरीके

अगर आपको किसी काम के लिए लोन की जरूरत है और लोन कैसे लिया जाए यह आपको समझ नहीं आ रहा है तो आपको अब बिल्कुल भी परेशान होने या घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे तरीके जिनको अपनाकर आप आसानी से लोन पा सकते हैं.

कंपनी या संस्था से

कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को एडवांस सैलरी या फेस्टिवल अडवांस लोन के नाम पर लोन देतीं हैं. यह लोन आपको तीन दिन के भीतर मिल सकता है. जिसे आप 3 से लेकर 24 महीने के अंदर चुका सकते हैं. इस राशि पर आपको 5-8 प्रतिशत की दर से ब्याज चुकाना पड़ सकता है.

गोल्ड या गोल्ड जूलरी के बदले

गोल्ड या गोल्ड जूलरी को गिरवी रखकर भी आप 10,000 से लेकर 25 लाख तक का लोन ले सकते हैं. हालांकि इसमें लोन चुकाने की समयसीमा काफी कम होती है. इसके लिए ब्याज दर 10 से लेकर 26 फीसदी तक होती है. यह लोन आपको बैंक के अलावा कई निजी फाइनैंस कंपनिया भी देतीं हैं. गोल्ड लोन आपको 1 दिन के अंदर आसानी से मिल सकता है.

टाप अप लें

अगर आपने होम लोन लिया है तो आप टाप-अप के रूप में लोन ले सकतें हैं. इस उपाय से आपको अधिकतम 50 लाख रुपये तक के लोन मिल सकते हैं. यह भी आपको 3 दिन अंदर मिल सकता है. हालांकि इसे लेने के लिए कई नियम और शर्तें हैं. इसपर ब्याज 9 से 13 फीसदी की दर से चुकाना होता है.

पर्सनल लोन भी है एक आप्शन

पर्सनल लोन पूरी तरह से कस्टमर और बैंक के रिश्ते पर निर्भर करता है. यह आपको 30 मिनट से 3 दिन के अंदर मिल सकता है. पर्सनल लोन में ब्याज दर काफी ज्यादा होती है. आपको 13 से 24 फीसदी तक की दर से ब्याज देना होता है.

शेयर और म्यूचुअल फंड के बदले

अगर आपने शेयर, म्यूचुअल फंड और इंश्योरेंस आदि में इन्वेस्ट किया हुआ है तो बैंक आपको इसके बदले भी लोन दे सकती हैं. जिसमें 9 से 15 फीसदी तक की दर से आपको ब्याज चुकाना होता है.

प्रापर्टी के नाम पर

अगर आपके नाम से कोई प्रापर्टी है तो आप उसे गिरवी रख कर 5 लाख से 10 करोड़ तक की राशि का लोन ले सकते हैं. यह लोन आपको 3 से लेकर 20 दिन तक में मिल सकता है. इसमें ब्याज दर 9.5 फीसदी से लेकर 13 फीसदी तक होती है. लोन चुकाने की सीमा 2 साल से लेकर 15 साल तक होती है.

भेदभावों के भेद का क्या भारत विरोध कर सकता है

रेस, रिलीजन, कास्ट, रंग के भेदभाव को चुनावी जंग में भुनाना निर्दोषों के लिए महंगा ही पड़ता है. अपने देश में अगर मुसलिम, दलित इस के शिकार बन रहे हैं तो पढ़ेलिखे, उदार, तार्किक अमेरिका में. वहां ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ के नारे को ले कर लोग रोज जुलूस निकालते हैं क्योंकि देशभर में कालों के खिलाफ उन्माद सा फैलाया गया है. हर काले को नशेड़ी, अपराधी माना जा रहा है और जब चाहे गोरे पुलिस वाले उन्हें रोक कर उन की तलाशी लेनी शुरू कर देते हैं और जरा सा भी चूंचप्पड़ करने पर उन्हें गोली मार दी जाती है. अदालतें छोड़ ही देती हैं गोरे पुलिस वालों को.

यह कहर अब लेटिनो यानी दक्षिण अमेरिका से आए लोगों, चीनियों, वियतनामियों और सब से ज्यादा भारतीयों पर टूट रहा है. अमेरिका के एक शहर इडाहो में भारतीय मूल के टैक्सी ड्राइवर गगनदीप सिंह की 19 वर्षीय गोरे लड़के ने इसलिए हत्या कर डाली कि उसे एक भारतीय के कारण एक विश्वविद्यालय में सीट नहीं मिली. जैसे गोधरा कांड के बाद 2 हजार से ज्यादा मुसलमान आदमियों, औरतों, बच्चों को मारा गया था वैसे ही अमेरिका में भारतीयों को मारा जा रहा है, क्योंकि वे अपनी मेहनत से ऊंची जगह पा रहे हैं. कुछ समय पहले तो डौटबस्टर कह कर बिंदी लगाए काली युवतियों के साथ जम कर बदसुलूकी का दौर चला था.

ताजा मामले में जैकब कोलमैन का गुस्सा इतना था कि उस ने गगनदीप से रास्ते में टैक्सी रुकवाई, फिर एक दुकान से चाकू खरीदा और उस से उस की हत्या कर डाली. कोई रंजिश नहीं, कोई विवाद नहीं, केवल रेशियल भेदभाव.

भारत क्या इस का विरोध कर सकता है? किस मुंह से करेगा? यहां तो हर रोज गौमांस खाने के नाम मुसलिमों को मारा जा रहा है और निचला काम बेगार में न करने पर दलितों को. हम कैसे कहेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका भेदभाव दूर करे जबकि वे चुनाव जीते ही इस भेदभाव को भुना कर हैं. उन्होंने कहा था कि वे श्वेतों का राज फिर कायम करना चाहते हैं. वे चीन की दीवार सी लंबी दीवार मैक्सिको और अमेरिका के बीच खड़ी करना चाहते हैं ताकि आधेकाले आधेगोरे उस के देश में आ ही न सकें. इसीलिए अमेरिकियों ने एक खब्ती को राष्ट्रपति चुन लिया.

बेवकूफ नेता देश का बड़ा नुकसान कर जाता है. हिटलर, मुसोलिनी ऐसे ही खब्ती, जिद्दी थे. उन्होंने रेस, जाति, धर्म का जम कर इस्तेमाल किया और अपने देश में ही कई फाड़ कर दिए. अमेरिका गोरों, कालों, भूरों, पीलों हिंदुओं, मुसलिमों के नाम पर बंट रहा है. इस का नुकसान होगा ही. इंटरनैट ने जोड़ा था अब यही ट्रंप के तोड़क संदेश को हर सिरफिरे तक पहुंचा रहा है.

आपके बुढ़ापे का सहारा बनेगा ये ऐप

आजकल बुजुर्गों के साथ अपराध बहुत बढ़ते जा रहे हैं. घर में अकेले रहने वाले बुजुर्ग असुरक्षित महसूस करते हैं, जिसको देखते हुए बिधाननगर पुलिस ने लोगों की सहायता के लिए एक ऐप बनाई है. ‘बिपद साथी’ नाम की इस ऐप की मदद से बुजुर्ग लोगों को जरूरत पड़ने पर जल्द से जल्द मदद पहुंचाई जा सकेगी.

इस ऐप की मदद से बुजुर्गों के साथ बढ़ते अपराध कम किया जा सकेगा. आपको बता दें कि यह ऐप एंड्रायड और आईओएस प्लैटफार्म दोनों पर ही चलेगी. यह ऐप एक मैप के साथ खुलेगा और इसमें 3 औप्शन सामने आते हैं जैसे नियरबाई हेल्प, ट्रैक मी लाइव और रिपोर्ट अ क्राइम.

पुलिस अधिकारी के अनुसार, एक निजी कंपनी ने यह ऐप बनाने में मदद की है. इसके ‘नियरबाई हेल्प’ सेक्शन के नीचे एक SOS बटन भी है. वौल्यूम बटन को तीन बार दबाने से भी ये फीचर काम करेगा.

अधिकारी के अनुसार, इस ऐप को बिधाननगर क्षेत्र के बुजुर्गों को खासतौर पर ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. खास बात यह है कि इस ऐप में 5 इस तरह के नंबर सेव किए जा सकते हैं, जिनसे आपातकाल स्थिती में संपर्क किया जा सके.

आपको बता दें कि SOS बटन दबाने से इन नंबरों पर टेक्स्ट मेसेज भी चला जाएगा. और साथ ही साथ बिधाननगर पुलिस कमीशन के अंतर्गत आने वाले 10 स्थानीय पुलिस स्टेशनों को भी संदेश भेजा जाएगा. इस दौरान परेशानी में फंसे लोगों तक इन स्टेशनों में से किसी से GPS से लैस गाड़ी को भेजा जाएगा.

अधिकारी ने इस ऐप के अन्य फीचर्स को बताते हुए कहा कि ‘ट्रैक मी लाइव’ औप्शन को एक्टिवेट करने पर पुलिस GPS की सहायता से इंसान तक पहुंचेगी. जरूरत पड़ने पर पुलिस पांच-दस मिनट के अंदर पहुंचेगी.

इस ऐप के ‘रिपोर्ट अ क्राइम’ की मदद से अपराध को रिकार्ड कर अपलोड किया जाएगा. उसे देखकर पुलिस जरूरी कार्रवाई करेगी. सबसे खास बात ये है कि इसकी मदद से फायर स्टेशन्स से सहायता भी ली जा सकती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें