रेस, रिलीजन, कास्ट, रंग के भेदभाव को चुनावी जंग में भुनाना निर्दोषों के लिए महंगा ही पड़ता है. अपने देश में अगर मुसलिम, दलित इस के शिकार बन रहे हैं तो पढ़ेलिखे, उदार, तार्किक अमेरिका में. वहां ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ के नारे को ले कर लोग रोज जुलूस निकालते हैं क्योंकि देशभर में कालों के खिलाफ उन्माद सा फैलाया गया है. हर काले को नशेड़ी, अपराधी माना जा रहा है और जब चाहे गोरे पुलिस वाले उन्हें रोक कर उन की तलाशी लेनी शुरू कर देते हैं और जरा सा भी चूंचप्पड़ करने पर उन्हें गोली मार दी जाती है. अदालतें छोड़ ही देती हैं गोरे पुलिस वालों को.

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