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सांकल : प्रथा के नाम पर नारी शोषण के ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म

परंपरा किस तरह इंसान के जीवन में भीषण बदलाव लाती है, इस बात को रेखांकित करने वाली फिल्म है ‘सांकल’. लेखक व निर्देशक देदिप्या जोशी ने अपनी फिल्म ‘‘सांकल’’ में एक ग्यारह वर्षीय बालक की 26 वर्षीय युवती के संग विवाह कराने के बाद किस तरह उस बालक की अगले बीस वर्ष की जिंदगी बर्बाद होती है, उसका सजीव चित्रण करते हुए एक विचारोत्तेजक फिल्म बनाई है.

फिल्म की कहानी राजस्थान में पाकिस्तानी सीमा से सटे जैसलमेर व बाड़मेर सहित थार जिले के एक गांव यानि की खेतू की धानी की है. जहां मेहर मुस्लिम समुदाय के दस बार परिवार आसपास रहते हैं, उसे गांव की बजाय धानी कहा जाता है. धानी में पंचायत व सरपंच का निर्णय ही सर्वोपरी है. इस गांव में पुलिस भी बिना सरपंच के बुलावे के नहीं जाती. इस गांव में कई दशकों से कुछ परंपराएं चली आ रही हैं, जिन्हे तोड़ने का साहस कोई नहीं कर पाया.

खेतू की धानी में प्रथा के अनुरूप ग्यारह वर्षीय केसर (समर्थ शांडिल्य) की शादी युवा 26 वर्षीय लड़की अबीरा (तनिमा भट्टाचार्य) से हो जाती है. समाज की नजर में केसर और अबीरा पति पत्नी हैं, जबकि घर के अंदर केसर का पिता उस्मान उसे बाहर भेजकर अबीरा के साथ जबरन कुकर्म करता था, जिसे अपराध नहीं माना जाता था. बेचारे केसर व अबीरा इस जुल्म को सहते थे. इस बीच केसर व अबीरा एक बेटी गुड़िया के माता पिता भी बन गए. वक्त बीतता है.

अब केसर (चेतन शर्मा) सोलह साल का हो चुका है और उसके पिता ने उसकी पढ़ाई छुड़वाकर ईंट भट्टे पर काम पर लगवा दिया है. इसी बीच उसके पिता उस्मान व्यापार के सिलसिले में पाकिस्तान गए, तो केसर व अबीरा के बीच कुछ ज्यादा ही प्यार पनपा. अब उन्हे यह बर्दाश्त नहीं था कि उनके बीच कोई वापस आए. जब केसर के पिता वापस आए और केसर को काम करने के लिए भेजकर अबीरा के साथ शारीरिक संबंध बनाने चाहे, तो केसर ने आकर इसका विरोध किया. इस पर उसके पिता ने उसे समझाने का प्रयास किया. मगर गुस्से में केसर अपने पिता के सिर पर शराब की बोजल मारता है और उनकी मौत हो जाती है.

सरपंच के बुलाने पर गांव में पुलिस आ जाती है. पर केसर पुलिस के चंगुल से भागकर बीकानेर में मशहूर फोटोग्राफर अपूर्वा सिंह भाटी उर्फ कुंअर (मिलिंद गुणाजी) के पास पहुंचता है और उनके साथ काम करना शुरू करता है. पर वह कुंअर से सच बयान नहीं करता. इधर गांव में सरपंच के दबाव में अबीरा को एक पांच साल के बालक गुलाब खान से शादी करनी पड़ती है और हर दिन उसे अपनी बेटी गुड़िया की सलामती के लिए गुलाब के पिता व दो चाचाओं की हवस का शिकार होना पड़ता. यानी कि वह हर दिन तिल तिलकर मरती है.

गुलाब की मां व चाची अपने पतियों का साथ देती थी. दो साल बाद कुंअर को अपनी दोस्त की एक किताब के लिए फोटोग्राफी करने के लिए उसी गांव में आना पड़ता है. साथ में केसर भी है और वह गुलाब खान के घर पहुंचते हैं. वहां पर केसर अपनी पत्नी अबीरा को देखता है. फिर वह कुंअर से सच बयां कर देता है. कुंअर कहता है कि उसे उस वक्त भागने की बजाय पुलिस में समर्पण करना चाहिए था. वह नाबालिग था, इसलिए दो साल बाल सुधार गृह में रहकर अब अबीरा के साथ अपनी जिंदगी गुजार रहा होता.

खैर, कुंअर के प्रयास से रात में अबीरा व कुंअर मिलते हैं. अबीरा बताती है कि वह कैसे तिल तिलकर मर रही है. कुंअर प्रयास शुरू करता है. पर ग्राम प्रधान कह देता है कि अबीरा, गुलाब खान की ही पत्नी रहेगी. अंततः अबीरा, केसर से गुड़िया को पढ़ाकर इस नर्क से निकालने का वचन लेकर आत्महत्या कर लेती है. समय बीतता है. 32 वर्षीय केसर (जगत सिंह) अपनी 18 साल की गुड़िया का ब्याह 22 साल के लड़के से करवाता है. शादी में आशीवार्द देने कुंअर भी आते हैं.

लेखक निर्देशक देदिप्या जोशी ने नारी की आजादी से जुड़े एक ज्वलंत मुद्दे के साथ ही आजादी के 70 साल बाद भी देश के अंदर चली आ रही एक कुप्रथा पर फिल्म बनाने का साहस दिखाया है. अति सशक्त विषय पर एक कमजोर फिल्म होते हुए भी यह फिल्म दर्शकों को न सिर्फ सोचने पर बल्कि काफी कुछ सीखने पर मजबूर करती है. फिल्मकार देदिप्या जोशी ने अपनी तरफ से इस कुप्रथा और इसके प्रभावों का काफी बेहतर व सजीव चित्रण किया है. मगर नवोदित कलाकारों के अभिनय की कुछ कमजोरियों व कुछ तकनीकी कमियों के चलते यह बेहतर फिल्म नहीं बन पायी.

फिल्मकार ने इस फिल्म को यथार्थ के धरातल पर बनाने की बजाय मेनस्ट्रीम सिनेमा की तरह बनाते हुए ग्लैमर को ज्यादा महत्व दे दिया, जिसके चलते फिल्म कमजोर हो गयी. अबीरा जैसे जैसे बड़ी होती है, वैसे वैसे वह बालक व पति केसर से प्यार करने लगती है. पर उसका यह पति उसे यौन शोषण, यातना व अन्य कष्टों से छुटकारा नहीं दिला पाता, इस बात को और बेहतर ढंग से फिल्म में चित्रित करने की आवश्यकता नजर आती है. इसकी जो बेबसी व दर्द अबीरा के चेहरे पर होना चाहिए था, यह अंत तक नजर नहीं आता. यह निर्देशक और अभिनेत्री तनिमा दोनों की कमजोरी का परिणाम है.

विषय वस्तु के अनुरूप उन्होंने फिल्म के लिए लोकेशन का सही चयन किया. कलाकारों का चयन भी सही रहा. पर पटकथा में कुछ कसावट की जरुरत नजर आती है. यदि फिल्म में बडे़ कलाकार होते, तो शायद फिल्मकार के लिए अपनी इस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाना ज्यादा आसान हो जाता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अबीरा के किरदार में तनिमा भट्टाचार्य कहीं से भी राजस्थानी मुस्लिम लड़की या औरत नजर नहीं आती. इतना ही नहीं अबीरा जैसे जैसे बड़ी होती है, वैसे वैसे वह बालक व पति केसर से प्यार करने लगती है. पर उसका यह पति उसे यौन शोषण, यातना व अन्य कष्टों से छुटकारा नहीं दिला पाता, यह बेबसी व दर्द अबीरा के चेहरे पर ठीक से नहीं उभर पाती. इसे अभिनेत्री के तौर पर तनिमा व निर्देशक दोनों की कमजोरी कहा जाएगा.

अबीरा एक ऐसी नारी है, जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र आकांक्षा नहीं है. उसके लिए तो सामाजिक मांग की ‘दया’ ही परिचय है. और उसे इसे ही आगे बढ़ाना है. उसे पता है कि जब उसका पति ग्यारह साल से बड़ी उम्र का हो जाएगा, तब उसे भी पति की तरह का प्यार देना है, तब तक उसे ससुर द्वारा यौन शोषित होते रहना है.

अबीरा आंतरिक व बाहरी यातना की मूक गवाह है, इसीलिए वह अपने पैर के नाखूनेसे उस यातना व अपनी भावना को दबाते हुए नजर आती है. हकीकत में उसके लिए केसर का प्यार ही अहम है. मगर प्रथा के नाम पर ससुर द्वारा यौन शोषण की पीड़ा, अपनी आंखों के सामने पति की पिटाई के दर्द को आंखों से बयां करने, पति वियोग, पति के जीवित रहते हुए आठ वर्ष के बालक से दूसरी मजबूरन शादी और तीन अधेड़ उम्र के पुरुषों द्वारा यौन शोषण सहने वाली अबीरा के किरदार में जिस प्रतिभाशाली अदाकारा की दरकार थी, उसे तनिमा भट्टाचार्य पूरी तरह से पूरी नहीं कर पाती.

ग्यारह साल के केसर की भूमिका में समर्थ शांडिल्य ने काफी अच्छा काम किया है. ग्यारह वर्षीय केसर विवाह और विवाह की जिम्मेदारी से अनभिज्ञ है. उसके लिए तो खेलकूद और अच्छी शिक्षा ही मायने रखती है. इसलिए शादी के बाद भी उसकी पत्नी अबीरा के साथ उसके पिता क्या करते हैं, इससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता. पर उसे एक बच्चे से आदमी बनना परेशान जरूर करता है. समर्थ शांडिल्य ने किशोर केसर के संस्करण में शानदार अभिनय किया है.

फिर सोलह साल के युवा केसर की भूमिका में चेतन शर्मा हैं. फिल्म में युवा केसर की भूमिका में चेतन शर्मा ने बेहतरीन अभिनय किया है. उनके करियर की यह पहली फिल्म है, मगर उन्होंने मंजे हुए कलाकार की तरह अपने किरदार को निभाया है. अपनी आंखो के सामने अपनी पत्नी का अपने ही पिता द्वारा यौन शोषण होते देखना और कुछ न कर पाने की बेबसी, पिता का विरोध करने पर पिता द्वारा अपनी पिटाई का दर्द झेलना, पत्नी के प्रति प्रेम, फिर अपने प्यार को बचाने व पत्नी का शोषण न होने देने का क्रोध, पिता पर हमला इन सभी भावों को चेतन शर्मा ने अच्छे ढंग से अपने चेहरे पर उकेरा है.

एक घंटे उन्तालीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘सांकल’’ का निर्माण आनंद राठौड़ और देदिप्या जोशी द्वारा ‘पिससियान पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित किया गया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक देदिप्या जोशी, संवाद लेखक शिप्रा महर्षि, संगीतकार  निशांत कमल व्यास और शिवांग उपाध्याय, गीतकार अंश व्यास, कुसुम जोशी व कैलाश देथा, कैमरामेन राउत जयवंत मुरलीधर तथा कलाकार हैं-चेतन शर्मा, तनिमा भट्टाचार्य, हरीश कुमार, जगत सिंह, मा. समर्थ शांडिल्य, मिलिंद गुणाजी व अन्य.

यह फिल्म 28 नवंबर को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी.

क्रेडिट कार्ड लेते वक्त ध्यान में रखें ये बातें

बात अगर फाइनेंशियल लेन-देन की की जाए तो इन दिनों क्रेडिट कार्ड ज्‍यादातर लोगों के लिए लाइफलाइन है. चाहे रिटेल आउटलेट से खरीदारी करनी हो, औनलाइन शौपिंग करनी हो, टेलीफोन या इलेक्ट्रिसिटी बिल जमा करना हो या एयर टिकट और होटल बुक करना हो. देश भर में क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है.

हालांकि क्रेडिट कार्ड का इस्‍तेमाल सोच समझ के करना चाहिए. क्रेडिट कार्ड का यूज आपकी क्रेडिट हिस्‍ट्री और क्रेडिट स्‍कोर को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है.

आपके क्रेडिट स्‍कोर को बेहतर बना सकता है क्रेडिट कार्ड

अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्‍तेमाल सोच समझ कर और जिम्‍मेदारी से करें तो क्रेडिट कार्ड आपके क्रेडिट स्‍कोर को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है. आप कुछ आसान तरीको को अपना कर क्रेडिट कार्ड का जिम्मेदारी से इस्‍तेमाल कर सकते हैं इससे अपनी सिबिल रिपोर्ट और सिबिल ट्रांसयूनियन स्‍कोर को मजबूत कर सकते हैं.

इंटरेस्‍ट रेट कर सकते हैं निगोशिएट

जब आप क्रेडिट कार्ड हासिल करते हैं तो आप इसके फाइन प्रिंट को अच्‍छी तरह से पढें. इस पर लगने वाले इंटरेस्‍ट रेट, ग्रेस पीरिएड की अवधि और ली जाने वाली फीस के बारे में पूरी डिटेल पता करें. बहुत से लोगों को यह भी नहीं पता होता है कि इंटरेस्‍ट रेट निगोशिएट किया जा सकता है. ऐसे में आप क्रेडिट कार्ड के लिए अप्‍लाई करते समय पूरी रिसर्च करें.

क्रेडिट कार्ड बैलेंश का समय पर करें पेमेंट

आप अपने क्रेडिट कार्ड बैलेंश का समय पर पेमेंट करें. आप हर माह क्रेडिट कार्ड पेमेंट का भुगतान कर क्रेडि कार्ड डेट से बच सकते हैं. इसके अलावा आप कई बारे क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन न करें. अगर आपने कई क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई किया है तो यह आपकी क्रेडिट रिपोर्ट के एन्‍क्‍वायरी सेक्‍शन में दिखेगा. इसके अलावा कई सारे क्रेडिट कार्ड को मैनेज करना मुश्किल होता है. ज्‍यादा संभावना है कि आप किसी क्रेडिट कार्ड के पेमेंट को मिस कर दें. इससे अनजाने ही आप डेट ट्रैप की ओर बढ़ सकते हैं.

क्रेडिट कार्ड लिमिट के अधिकतम इस्तेमाल से बचें

अगर आप क्रेडिट कार्ड से ज्‍यादा खर्च करते हैं तो जरूरी नहीं है कि यह आपके क्रेडिट स्‍कोर को नकारात्‍मक तौर पर प्रभावित करे लेकिन आपके क्रेडिट कार्ड का बैलेंश बढ़ना आप पर रिपेमेंट बोझ बढ़ने की ओर संकेत करता है और यह आपके स्‍कोर को प्रभावित कर सकता है.

अपने सिबिल स्‍कोर पर रखें नजर

अगर आप अपनी क्रेडिट रिपोर्ट पर नजर रखते हैं तो आप अपने फाइनेंस का प्रबंधन बेहतर तरीके से कर पाएंगे. इसके अलावा आप संभावित आइडेंटिटी थेफ्ट और क्रेडिट रिपोर्ट में गलत सूचना को लेकर भी अलर्ट रहेंगे.

फोन में हो रहे हैं ये बदलाव तो फट सकता है आपका फोन

हाल के कुछ दिनों में स्मार्टफोन में ब्लास्ट होने की कई घटनाएं सामने आई हैं. अबतक मिलीं रिपोर्ट के अनुसार सैमसंग, आईफोन और शाओमी के बाद जियो फोन में आग लग चुकी है. ऐसे में बड़ा सवाल यह कि आखिर कैसे पता किया जाए कि फोन फटने वाला है या उसमें आग लगने वाली है. आइए जानते हैं 5 कारण.

फोन का ज्यादा गर्म होना

अगर आपका फोन बार-बार गर्म हो रहा है तो फौरन उसे सर्विस सेंटर में लेकर जाएं. कई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि फटने से पहले स्मार्टफोन गर्म होते हैं या फिर गर्म होने वाले स्मार्टफोन के फटने की संभावना ज्यादा होती है.

बैटरी का फूलना

अगर आपको लगता है कि आपके फोन की बैटरी फूल गई है या फिर फोन के बैक पैनल पर कोई ऊभार नजर आ रहा है तो सावधान हो जाएं. ऐसी स्थिति में बैटरी के फटने की संभावना बहुत ज्यादा होती है.

लोकल चार्जर का इस्तेमाल

अगर आप अपने स्मार्टफोन को किसी भी लोकल चार्जर या फिर अन्य चार्जर से चार्ज करते हैं, तो यह आपके फोन और बैटरी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

फोन को बार-बार गिरने से बचाएं

फोन के बार-बार गिरने से भी बैटरी डैमेज होती है और उसके बाद उसमें आग लग सकती है. ऐसे में अपने फोन का ख्याल रखें और उसे गिरने से बचाएं.

पानी में गिरने पर मैकेनिक को दिखाएं

कई बार किसी कारण से फोन पानी में गिर जाता है तो हम खुद ही मैकेनिक बन जाते हैं और उसे रिपेयर करने लगते हैं जो कि गलत है. पानी में गिरने के बाद फोन में कई सारी दिक्कतें आ सकती हैं. यहां तक की बैटरी में शौर्ट सर्किट भी हो सकता है. घर पर ही फोन रिपेयर करने से बचें.

गर्म जगह पर फोन चार्ज ना करें

फोन को हमेशा कम तापमान में ही चार्ज करें, क्योंकि चार्जिंग से दौरान फोन ऐसे ही थोड़ा गर्म होता है. फ्रीज के ऊपर फोन को रखकर कभी चार्ज ना करें. इसलिए फोन को चार्जिंग के समय कमरे के तापमान पर ही रखें.

एल्युमिनियम का बल्ला ले मैदान में उतरा ये आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी

क्रिकेट में लकड़ी के बल्ले का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब आस्ट्रेलियाई क्रिकेटर डेनिस लिली मैदान में बल्लेबाजी के दौरान एल्युमिनियनम धातु से बना बल्ला लेकर उतरे थे. लिली के इस कदम ने क्रिकेट फील्ड में हंगामा मचा दिया था.

डेनिस एक बेहतरीन गेंदबाज थे लेकिन सवाल यह उठता है कि उन्होंने एल्यूमिनियम के बल्ले का इस्तेमाल क्यों किया? उसके पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है. तो आइए जानते हैं एल्युमिनियम बल्ला के इस किस्से से.

आपको बता दें कि डेनिस लिली अपने क्रिकेट करियर के दौरान आस्ट्रेलियाई टीम के सबसे ज्यादा विवादों से घिरने वाले खिलाड़ियों में से एक रहे. ऐसे ही एक विवाद को उन्होंने 1979 में इंग्लैंड के खिलाफ खेले जा रहे एक टेस्ट मैच के दौरान हवा दी. इस मैच में जब लिली मैदान पर बल्लेबाजी करने उतरे तो उनके हाथ में साधारण लकड़ी से बना बल्ला नहीं, बल्कि एल्युमिनियम धातु से बना बल्ला था.

एल्युमिनियम का यह बल्ला लिली के दोस्त ग्रेम मोनेगन की कंपनी ने बनाया था. यह बल्ला परंपरागत क्रिकेट बल्ला के रिप्लेसमेंट के लिए बनाया गया था जो स्कूलों और विकासशील देशों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. मोनेगन ने एल्युमिनियम के इस बल्ला का निर्माण बेसबौल के बल्ला को ध्यान में रखकर किया था जहां लकड़ी के बल्ला को एल्युमिनियम से रिप्लेस किया गया था. लिली अपने दोस्त मोनेगन की कंपनी में हिस्सेदार थे इसलिए उन्होंने एक मार्केटिंग स्टंट का पूरा करने के लिए उस बल्ला के साथ अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच में खेलने का निर्णय लिया.

उस समय तक क्रिकेट में इस तरह के बल्ले को इस्तेमाल करने को लेकर कोई रोक-टोक नहीं थी, इसलिए लिली के लिए इस बल्ले के साथ मैदान पर जाना और भी आसान हो गया. हालांकि यह पहली बार नहीं था जब लिली ने एल्युमिनियम के बल्ले का इस्तेमाल किया था, बल्कि इस घटना के ठीक 12 दिन पहले उन्होंने इसी बल्ला का इस्तेमाल वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट मैच में भी किया था. लेकिन उस टेस्ट मैच में उनके बल्ला के खिलाफ किसी ने विरोध व्यक्त नहीं किया था.

लिली के बल्ला को लेकर विरोध तब शुरू हुआ जब लिलि ने इयान बौथम की गेंद पर स्ट्रेट ड्राइव खेला, जिस पर लिली ने तीन रन लिए. लेकिन आस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल के मुताबिक गेंद को चार रन के लिए जाना चाहिए था. इसीलिए चैपल ने 12वें खिलाड़ी रोडनी हॉग को लिली को परंपरागत लकड़ी के बल्ला को देने के लिए कहा.

जब ये सब चल ही रहा था कि इंगलैंड टीम के कप्तान माइक बियर्ली ने अंपायर से शिकायत की. बियर्ली ने कहा कि धातु का बल्ला लेदर की गेंद को खराब कर रहा है. इसके बाद अंपायरों ने लिली को बल्ला बदलने को कहा.

अज्जी : नाबालिग बच्ची से बलात्कार जैसे मुद्दे पर विचारोत्तेजक फिल्म

नारी शोषण व बलात्कार और बलात्कारी से बदला लेने की कहानी को केंद्र में रखकर ‘काबिल’, ‘मौम’, ‘मातृ’, ‘भूमि’ के बाद फिल्मकार देवाशीष मखीजा की फिल्म ‘‘अज्जी’’ पांचवी फिल्म है. कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में शोहरत बटोर चुकी फिल्म ‘अज्जी’ एक अति डार्क और महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी विचारोत्तेजक फिल्म होते हुए भी नीरस फिल्म नही है. वैसे यह फिल्म दिल तोड़ने वाली कहानी के साथ आपेक्षित क्रूरता का निरुपण भी करती है. पूरी फिल्म एक अति वृद्ध महिला द्वारा अपनी पोती के बलात्कारी से बदला लेने की नाटकीय कहानी है.

फिल्म की कहानी झोपड़पट्टियों में रहने वाले एक गरीब नाबालिग लड़की मंदा कदम (बेबी सहरवानी सूर्यवंशी) और उसकी दादी, जिन्हें सभी अज्जी (सुषमा देशपांडे) कहते हैं, के इर्द गिर्द घूमती है. मंदा की अज्जी लोगों के कपड़े सिलकर कुछ पैसे कमाती है. मंदा की मां विभा (स्मिता तांबे) घर में उपमा व इडली आदि बनाकर साइकल पर लेकर बेचती है. पिता मिलिंद (श्रेयस पंडित) एक फैक्टरी में दस घंटे की नौकरी करती है. एक सेक्स वर्कर लीला (सादिया सिद्दिकी) का भी अज्जी के घर आना जाना है, क्योंकि उसे कभी कभी अपने कपड़े सिलवाने होते हैं.

फिल्म की कहानी शुरू होती है रात के अंधेरे में अज्जी द्वारा अपनी पोती मंदा को ढूंढ़ने से. अज्जी की मदद के लिए लीला भी आ जाती है. कुछ समय बाद पानी के पाइप के पास पत्थरों के बीच गंदगी में मंदा कराहते हुए मिलती है. पता चलता है कि उसका बलात्कार हो चुका है. अज्जी किसी तरह लीला की मदद से मंदा को घर पर लेकर आती है. दूसरे दिन पुलिस इंस्पेक्टर (विकास कुमार) को बुलाती है, एफआरआई लिखवाने के लिए. वह पुलिस इंस्पेक्टर घर पर आकर पूछताछ करता है. मंदा से पता चलता है कि एक स्थानीय नेता के बेटे ढवले (अभिषेक बनर्जी) ने उसके साथ यह कुकर्म किया है और वह उसे पहचान सकती है.

ढवले का नाम सुनते ही पुलिस इंस्पेक्टर खुद को अहसास महसूस कर अपना रवैया लेता है. फिर वह पूरे परिवार को धमकाता है कि सभी लोग गैर कानूनी काम कर रहे हैं, इसलिए सभी के खिलाफ मामला बनता है. वह सलाह देता है कि इस बात का जिक्र किसी से न करे, वह दूसरे दिन डाक्टर को लेकर आने की बात करता है. विभा, पुलिस इंस्पेक्टर की बात मान लेती है. उसके लिए बेटी की इज्जत से भी बढ़कर पूरे परिवार की जिंदगी है. दूसरे दिन डाक्टर आकर मंदा के घाव पर टांके लगाकर दवा दे देता है.

इधर अज्जी अपनी पोती के साथ कुकर्म करने वाले को सजा देने का मन बनाकर बस्ती में ही मांस बेचने वाले शराफत (सुधीर पांडे) से मिलती है और बकरे के मांस को कैसे काटते हैं, यह सीखती है. और पोती मंदा को जड़ी बूटी की दवा भी लाकर देती है.

जबकि पुलिस इंस्पेक्टर, ढवले से सौदेबाजी करता है, पर बात नहीं बनती, तब वह ढवले के पिता व स्थानीय नेता से बात करता है और दस हजार रूपए में मामला रफा दफा करने की बात तय करता है.

अब अज्जी हर दिन एक औजार लेकर रात के अंधेरे में ढवले का पीछा करना शुरू करती है. अंततः वह एक दिन ढवले को ऐसी सजा देती है, जिसे देखकर हर किसी का दिल कांप जाए. लोग कुकर्म करने से दस बार सोचेंगे. अज्जी को लगता है कि वह अपनी पोती मंदा को न्याय दिलाने में कामयाब रही.

लेखक व निर्देशक देवाशीष मखीजा ने अति डार्क फिल्म बनायी है, जिसमें मनोरंजन के पल बिलकुल नहीं हैं, जिसके चलते यह फिल्म आम दर्शकों तक कितनी पहुंचेगी, कहना संभव नहीं. फिल्म बुद्धि जीवियों के बीच चर्चा का केंद्र बनकर रह जाएगी या अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में तालियां बटोर सकेगी. जबकि नाबालिग बच्ची यानी कि नारी के साथ बलात्कार जैसे मुद्दे पर बनी इस तरह की फिल्में जब तक आम लोगों तक नहीं पहुंचेगी, तब तक ऐसी फिल्में निरर्थक हैं. निर्देशक देवाशाष मखीजा ने फिल्म को बहुत ही यथार्थ के धरातल पर बनाया है. निर्देशक ने मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वालो की जिंदगी, घोर गरीबी, कुत्तों के साथ और कूड़े के सड़ने की परतों के आस पास रहने की भयावह सच्चाई का भी बहुत यथार्थ चित्रण अपनी इस फिल्म में किया है. मगर फिल्म इतनी धीमी गति से आगे बढ़ती है कि दर्शक बोर होता है. फिर भी वह इंतजार करता है कि कब बलात्कारी को सजा मिलेगी और जो सजा मिलती है, उसे देखने के बाद दर्शक तय कर लेगा कि वह दुबारा ऐसी कहानी नहीं सुनना चाहेगा.

इतना ही नहीं फिल्मकार खुद इस मुद्दे को लेकर दुविधा में नजर आता है. एक तरफ वह फिल्म में ढवले जैसे अमीर व रौबदाब वाले इंसान का औरतों यानी लड़कियों के प्रति स्वामित्व वाले नजरिए का चित्रण करते हैं, तो वहीं वह मंदा के साथ बलात्कार करने वाले ढवले को एक नारी के पुतले के साथ सेक्स करने के लंबे दृश्य को दिखाकर फिल्म को मुद्दे से भटकाने वाला कर्म ही किया है. क्या वह इस तरह के दृश्य के माध्यम से यह कहना चाहते हैं कि बलात्कारी दिमागी रूप से बीमार होता है? इससे यह बात भी उभरती है कि फिल्मकार ने अपनी फिल्म में जिस मुद्दे को उठाया है, उसके प्रति वह खुद भी संवेदनशील नहीं है.

कैमरामैन जिश्नू भट्टाचार्य जी ने मुंबई की झोपड़पट्टियों व तंग गलियों को बड़ी बारीकी से अपने कैमरे में कैद किया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो उम्र के अंतिम पड़ाव को जी रही, घुटनों के दर्द से कराहती पर अपनी पोती मंदा को न्याय दिलाने के लिए, उसके साथ कुकर्म करने वाले को सजा देने वाली अज्जी के किरदार को सुषमा देशपांडे ने बड़ी खूबसूरती से निभाया है. अपने अभिनय के बल पर वह अकेले ही पूरी फिल्म को लेकर चलती हैं. उनके चेहरे पर हताशा, क्रोध, बेबसी व अनिश्चितता के भाव बड़ी आसानी से पढ़े जा सकते हैं. तो वहीं उनके चेहरे पर मंदा को न्यय दिलाने का दृढ़ संकल्प दर्शकों के मन में सहानुभूति भी पैदा करता है. बलात्कार पीड़िता बच्ची मंदा के किरदार को निभाते हुए बेबी सहरवानी सूयवंशी के चेहरे पर दर्द, बेबसी, पीड़ा के साथ साथ यह भाव भी आता है कि अब वह बड़ी हो गयी है. क्योंकि उसकी दादी कहती थी कि जब लड़की के शरीर से खून आना शुरू होता है, तब वह बड़ी हो जाती है. फिल्म के अन्य कलाकार भी अपने अपने किरदारों में ठीक बैठे हैं.

एक घंटे और 45 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘अज्जी’’ का निर्माण विक्रम मेहता और सिद्धार्थ आनंद द्वारा ‘‘यूडली फिल्मस’’ के बैनर तले किया गया है. फिल्म ‘‘अज्जी’’ के लेखक व निर्देशक हैं देवाशीष मखीजा, कार्यकारी निर्माता गुनीत मोंगा, गौरव शर्मा, साहिल शर्मा, कैमरामैन जिश्नू भट्टाचार्यजी, संगीतकार मंगेश ढाकड़े तथा फिल्म के कलाकार हैं- सुषमा देशपांडे, बेबी सहरवानी सूर्यवंशी, सादिया सिद्दिकी, स्मिता तांबे, विकास कुमार, अभिषेक बनर्जी, सुधीर पांडे व अन्य.

‘पद्मावती’ विवाद : राजपूती शान के नाम पर हल्ला मचाना निरर्थक

‘पद्मावती’ को लेकर खड़ा किया विवाद अब थम जाएगा, क्योंकि एक तो ‘पद्मावती’ को रिलीज करने की तारीख बदल दी गई है और दूसरे भारतीय जनता पार्टी गुजरात चुनावों में व्यस्त हो गई है. ‘पद्मावती’ को भाजपाई भगवाई कट्टरों ने गुजरात में कट्टरपंथियों को एक करने के लिए उकसाया था, जैसे 1991 में राममंदिर के नाम पर देश भर को उकसाया गया था. पहले जहां मुसलमान निशाने पर होते थे, इस बार भंसाली, दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह निशाने पर हैं.

राजपूती शान का नाम ले कर जो हल्ला मचाया गया वह निरर्थक व निरुद्देश्य था. फिल्म, चाहे कोई भी, कैसा भी विषय हो, इस पर विवाद खड़ा करना निरर्थक ही होता है. फिल्म बनाने पर कोई आपत्ति खड़ी करने का हक किसी को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि बनने के बाद अगर फिल्म से सहमत न हों तो उसे न देखने का हक हर किसी के पास है. फिल्मों के निर्माण पर इतना पैसा और इतनी मेहनत लगती है कि उस के न चलने का जोखिम हर कोई नहीं लेना चाहेगा.

फिल्मों को निशाना बनाना असल में नई सोच वालों को अंकुश में रखना होता है. सरकार और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहते कि फिल्मों या किताबों के जरिए कोई सच सामने आए या किसी सच की पोल खोली जाए. वे उसे देखने का हक ही छीनने की कोशिश करते हैं. फिल्म केवल निर्माता निर्देशक का अपनी बात कहने का जरिया होती है. इस पर अंकुश लगाना वैसा ही है जैसा किसी हिंदू युवा का किसी मुसलिम युवती से विवाह करने की पेशकश करना.

नए पन से घबराने की कोशिश हर पुरानी सोच वाला करता है क्योंकि इसी में उस की शक्ति होती है. प्रौढ़ और वृद्घ कुछ भी कहीं भी नया नहीं चाहते क्योंकि उन्हें लगता है इस से उन का एकछत्र राज हिल न जाए. राजपूती गौरव की हांकने वालों को यह लग रहा था कि ‘पद्मावती’ में कुछ ऐसे राज न खुल जाएं जो राजपूती शौर्य और वीरता की पोल खोलते हैं. इतिहास को खंगाले तो यह बात साफ हो जाती है कि राजपूती आनबान शान के कसीदे फालतू में गाए गए हैं वरना वे आम लोगों की तरह, आम भारतीयों की तरह के लोग ही हैं जिन के समाज, रीति-रिवाजों, सोच, साहित्य, परंपराओं में गलत ज्यादा है, सही कम पर उन्होंने हल्ला कुछ ज्यादा मचा रखा है.

राजपूत राजसी इज्जत पाने के लिए अपने बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते और किसी भी आवाज को, चाहे वह उन का समर्थन क्यों न करती हो, से घबराते हैं.  ‘पद्मावती’ की कहानी में कितना ही हल्ला मचा हो, यह तो स्पष्ट ही है कि राजपूत आक्रमणकारी मुसलिम राजा से हारे थे. यह बात परदे पर आएगी, ज्यादा लोग जानेंगे तो इस समय जब हर जाति अपने अहंकार को श्रेष्ठता की चाशनी में डुबा रही है पर कुछ असलियत दिख ही जाएगी.

राजपूती युवाओं को इस फिल्म का स्वागत करना चाहिए था और यदि यह वास्तव में राजपूती शान का व्यर्थ का बखान करती है तो आलोचना भी करनी चाहिए. उन्हें अपना भविष्य बनाना है, भूत को छाती से चिपका कर अपनी श्रेष्ठता दिखाने से कुछ न मिलेगा. आज का युग आगे चलने का है जब देश, धर्म, जाति, रंग, लिंग के भेद समाप्त होने चाहिए. ऐसे समय करणी सेना के नाम पर उत्पात मचाने वाले पूरे राजपूतों को कौर्नर में सिमट जाने को मजबूर कर रहे हैं.

अभी नहीं तो कभी नहीं : जब बौलीवुड अदाकाराओं ने दिखाया अपना सामर्थ्य

पद्मावती विवाद दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है. करणी सेना के महिपाल मकराना के बयान के बाद इस विवाद ने और तूल पकड़ ली है. इस बयान में मकराना ने कहा था कि ‘राजपूत कभी महिलाओं पर हाथ नहीं उठाते, लेकिन जरूरत पड़ी तो हम दीपिका पादुकोण का वही हाल करेंगे, जो लक्ष्मण ने सूर्पणखा का किया था.’ जिसके बाद लोगों ने पहले दीपिका की नाक काटने के लिए 5 करोड़ और बाद में उनका सिर काटने के लिए 1 करोड़ का इनाम देने की घोषणा कर दी.

अदाकाराओं को नागवार गुजरी ये बात

लेकिन ये बात फ़िल्मी जगत की अदाकाराओं को नागवार गुजरी है. आखिरकार उनके सब्र का बांध टूट ही गया और उन्होंने अपने सामर्थ्य का परिचय दे दिया है. हाल ही में खबर मिली है कि  फिल्म जगत की सभी अदाकाराएं एक पिटीशन साइन कर रही हैं, जो वे जल्द से जल्द भारत के प्रधानमंत्री को भिजवाना चाहती हैं.

ये लिखा है पिटीशन में

ये पिटीशन शबाना आज़मी ने बनाया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘फिल्म इंडस्ट्री के कलाकार इंसान ही हैं, न कि कोई पपेट, जिन्हे अपने पौलिटिकल फायदे के अनुसार कुछ भी बोल दिया जाए. अब राजनेता अपने फायदे के अनुसार दीपिका की नाक और उनका सिर काटने की खुलेआम धमकियां दे रहे हैं. इसलिए सजा की हकदार सिर्फ करणी सेना ही नहीं, ये राजनेता भी हैं. राज्य सरकार इस तरह के लोगों को गिरफ्तार करना तो दूर, बल्कि इन्हे संभाल नहीं पा रही है. ऐसे में बौलीवुड की अदाकाराओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा.’

पिटीशन साइन करने एकजुट हुईं अदाकाराएं

उन्होंने ये भी कहा कि दीपिका को हानि पहुंचाने के लिए 3 और 5 करोड़ देनेवाले ये लोग किसी मुजरिम से कम नहीं हैं. खबर मिली है कि ये पिटीशन साइन करने के लिए बौलीवुड की सभी अभिनेत्रियां एकजुट होकर सामने आईं हैं और अब ये पिटीशन जल्द से जल्द प्रधानमंत्री मोदी को दे दी जाएगी.

क्या आपने देखा ये आईफोन, 26 लाख है इसकी कीमत

आईफोन X की बिक्री 3 नवंबर से शुरू हुई है. भारी भरकम कीमत के बावजूद लोगों के बीच इस आईफोन की भारी डिमांड है. इस बीच मार्केट में कैवियर नाम की कंपनी ने आईफोन X का एक स्पेशल एडिशन लौन्च किया है. इसका नाम आईफोन X इंपीरियल क्राउन रखा है. इसकी लागत करीब 26,28,400 रुपये है.

आईफोन X इंपीरियल क्राउन के रियर पैनल में 300 से ज्यादा कीमती पत्थरों के साथ गोल्डन कोट दिया गया है. इसमें अलग-अलग साइज के 344 से ज्यादा हीरे जड़े गए हैं. इसके अलावा इसमें 14 बड़े रूबी और एक सोने का दो सिर वाला बाज़ लगाया है. इन खूबियों के इतर बाकी पूरे फोन के फीचर्स बेस मौडल की तरह ही रहेंगे.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कैवियर स्मार्टफोन कस्टमाइज़ कर बेचने वाली कंपनी है. आईफोन X के अलावा कंपनी ने आईफोन 8 और आईफोन 8 Plus को भी कस्टमाइज़ किया है. याद हो कि नोकिया 3310 का पुतिन-ट्रंप समिट एडिशन भी कंपनी के द्वारा साल की शुरुआत में लौन्च किया गया था.

आईफोन X की खासियतों की बात करें तो इसमें एज टू एज डिस्प्ले दी गई है यानी काफी कम बेजल दिए गए हैं. इसके अलावा इसमें होम बटन नहीं दिया गया है. ऐपल ने इसमें फेशियल रिकौग्निशन के लिए फेस आईडी दिया है. यानी आपको पहचान कर यह अनलौक होगा. डिजाइन की बात करें तो आईफोन X के फ्रंट और बैक में ग्लास डिजाइन दिया गया है. इसके साथ ही इसके किनारे सर्जिकल ग्रेड स्टेनलेस स्टील के बने हैं.

आईफोन X वौटर रेजिस्टेंट है और यह दो कलर वैरिएंट स्पेस ग्रे और सिल्वर में उपलब्ध होगा. इसमे पिक्सल डेंसिटी पिछले किसी भी आईफोन से ज्यादा है. कंपनी ने पहली बार इसमें ओलेड डिस्प्ले लगाया है जैसी उम्मीद भी की जा रही थी. इसकी स्क्रीन 5.8 इंच की है और इसका रिजोलुशन 2436X1125 है.

होम बटन का खात्मा हो चुका है. अब इस फोन को ऊपर की तरफ स्वाइप करके होम बटन के तौर पर यूज कर सकते हैं . पहले होम बटन पर टच आईडी दी जाती थी, लेकिन अब ना होम बटन है और न ही टच आईडी है. बल्कि टच आईडी को फेस आईडी से रिप्लेस कर दिया गया है. चेहरा देखकर यह अनलौक हो जाएगा.

कैमरे में खास तरीके का IR सिस्टम दिया गया है जो चेहरे पर एक बीम के जरिए अंधेरे में भी आपको पहचान कर अनलौक हो जाता है. कंपनी ने इसके लिए डुअल कोर कस्टम चिपसेट लगाया है जो चेहरे को पहचानने का काम करता है. इस स्मार्टफोन को बेहतर रिव्यू मिल रहे हैं और लोगों यह पौपुलर भी हो रहा है.

शास्त्री और कोहली की इशारे में बातचीत का बीसीसीआई ने मांगा जवाब

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने ट्विटर पर भारतीय कप्तान विराट और कोच रवि शास्त्री का एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में विराट और कोच रवि शास्त्री के बीच इशारों-इशारों में पारी डिक्लेयर करने को लेकर बात हो रही है. अब बीसीसीआई ने लोगों से विराट और शास्त्री के बीच होने वाली इन इशारों का मतलब पूछा है.

बता दें कि भारत-श्रीलंका के बीच पहला टेस्ट मैच ड्रौ रहा. भारत इस मुकाबले में जीत से सिर्फ 3 ही विकेट दूर था. हालांकि दिन के काफी ओवर शेष बचे थे मगर समय निकलने और खराब रोशन के कारण मैच को समाप्त घोषित कर दिया.

चौथी पारी के दौरान श्रीलंकाई बल्लेबाजों ने भी वक्त खराब करने की पूरी कोशिश की. इसके चलते अंपायर्स ने उन्हें चेताया भी मगर अंगुली बाद में भारतीय कप्तान विराट कोहली पर भी उठी. क्रिकेट पंडितों ने दलील दी कि अगर विराट कोहली अपने शतक का लोभ ना करते हुए पारी जल्द घोषित कर देते तो भारतीय टीम मैच जीत सकती थी.

इस वीडियो के साथ बीसीआईआई ने एक कैप्शन भी लिखा है जिसमें उन्होंने खेल प्रेमियों से दोनों के बीच ‘साइन इन लैंग्वेज’ में होने वाली चर्चा को लेकर सवाल किया है. दरअसल, ड्रिंक्स ब्रेक के दौरान जब विराट कोहली बल्लेबाजी कर रहे थे तो कोहली ने रवि शास्त्री से इशारों में कुछ कहा. इस पर अभी तक क्रिकेट पंडितों ने तरह-तरह के दलीलें दीं हैं. कुछ का कहना है कि कोच रवि शास्त्री ड्रेसिंग रूम से विराट कोहली को जल्द पारी घोषित करने की सलाह दे रहे थे? तो वहीं कुछ ने माना कि वो कोहली को शतक पूरा कर पारी घोषित करने के लिए कह रहे थे.

बता दें कि उस समय कोहली 86 रन पर बल्लेबाजी कर रहे थे और अपने अर्धशतक से केवल 14 रन दूर थे. क्रिकेट पंडितों की माने तो अगर कोहली अपने शतक के बारे में नहीं सोचते और टीम को जल्द ही घोषित कर देते तो शायद भारत ये मैच आसानी से जीत सकता था. क्योंकि चौथी पारी में श्रीलंका के बल्लेबाजों के लिए 200 रन बनाना आसान नहीं था. खैर कोहली और रवि शास्त्री के बीच हुए इशारेबाजी को लेकर फैंस अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की है.

क्रेडिट और डेबिट कार्ड धारकों के लिये खुशखबरी, अब मिलेगी जीएसटी में छूट

यदि आपके पास डेबिट व क्रेडिट कार्ड है और आप उसके माध्यम से ही अपने बिल आदि का भुगतान करते हैं तो यह खबर आपके लिए है. यदि आप डेबिट, क्रेडिट कार्ड से भुगतान नहीं भी करते हैं तब भी यह खबर आपके लिए फायदे वाली साबित होगी. नोटबंदी के बाद से सरकार लगातार डिजीटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा दे रही है. ऐसे में यदि आप भी डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या पेमेंट एप के जरिए बिल पेमेंट करते हैं तो आपको फायदा होने वाला है. यदि आप डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या पेमेंट एप से भुगतान नहीं भी करते हैं तो आप इनसे पेमेंट करना शुरू कर दें.

दरअसल सरकार नई योजना के तहत डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहकों को वस्‍तु एवं सेवा कर (जीसएसटी- GST) में 2 फीसदी छूट देने की योजना बना रही है. इस प्रस्ताव पर जनवरी में होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में चर्चा हो सकती है. प्रस्ताव के मुताबिक यह छूट केवल बिजनेस टू कंज्यूमर लेनदेन पर ही प्रभावी होगी. यह छूट उन उत्पादों या सेवाओं पर प्रभावी होगी जिनके लिए जीएसटी रेट 3 प्रतिशत या फिर इससे अधिक है.

सरकार की मंशा इस तरह की छूट देकर डिजीटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना है. दो प्रतिशत छूट में एक प्रतिशत केंद्रीय जीएसटी और एक फीसदी राज्य जीएसटी होगी. जानकारों के मुताबिक यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने में मदद मिलेगी. इसके बाद ग्राहक दुकानदारों से डिजिटल भुगतान के विकल्प की मांग करेंगे.

ऐसा होने से कर चोरी की संभावना कम हो जाएगी. आपको बता दें कि जीएसटी काउंसिल की 10 नवंबर को गुवाहाटी में हुई बैठक में भी यह प्रस्ताव शामिल था लेकिन इस पर चर्चा नहीं हो पाई. यदि काउंसिल की तरफ से इस प्रस्ताव पर मुहर लगी तो डिजिटल पेमेंट करने वालों के लिए जीएसटी की दर 18 फीसदी से घटकर 16 फीसदी रह जाएगी. सरकार की तरफ से छूट की सीमा तय की जाएगी.

छूट की सीमा प्रति लेनदेन अधिकतम 100 रुपए तक हो सकती है. यानी आप यदि 5000 रुपए या इससे ज्यादा का भुगतान एकमुश्त करते हैं तो आपको इस पर 100 रुपए का सीधा-सीधा फायदा होगा. इस योजना में ग्राहकों के लिए दो कीमतों की पेशकश की जाएगी. इनमें से एक में नकद भुगतान के साथ खरीदारी करने पर सामान्य जीएसटी दर लगेगी और डिजिटल भुगतान पर जीएसटी में 2 प्रतिशत की छूट मिलेगी.

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