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राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान : युवा नेता पर 100 साल पुरानी नीतियां

47 वर्षीय राहुल गांधी निर्विरोध रूप से कांग्रेस के नए अध्यक्ष चुन लिए गए. वह अब 132 साल पुरानी कांग्रेस का नेतृत्व करेंगे. राहुल गांधी को यह पद संघर्ष से नहीं मिला. अब तक के उन के पार्टी उपाध्यक्ष और सांसद के तौर पर किए गए कार्यों को उल्लेखनीय नहीं माना गया. उन की अंग्रजीदां अभिजात्य छवि बनी रही है. राहुल गांधी भी पार्टी की हिंदूवादी छवि पेश करते दिखाई दिए हैं.

गुजरात चुनावों में वह मंदिरों की परिक्रमा करते दिखाई दिए. स्वयं को जनेऊधारी हिंदू प्रचारित करते रहे. ऐसा कर के वह समूचे देश  के नेता के तौर पर नहीं, खुद को महज हिंदुओं का नेता साबित कर रहे थे. उधर भाजपा ‘हिंदुत्व’ को अपनी मिल्कियत समझती रही है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कह चुके हैं कि कांग्रेस के पास तो हिदुत्व का क्लोन है. यानी असली माल उन के पास है. भाजपा एक तरह से कह रही है कि हिंदुत्व पर उन का कौपीराइट है. कांग्रेस तो नक्काल है. इस से लगता है कि कांग्रेस आज भी हिंदुत्व की पिछलग्गू दिखाई देती है. इस तरह तो कांग्रेस हिंदुत्व की बी नहीं, ए टीम दिखाई दी है.

यह सच है कि कांग्रेस आजादी के समय हिंदूवादी पार्टी थी. मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहते थे. तब के बड़े नेता तनमन से हिंदूवादी थे. कुछ तो वर्णव्यवस्था को ईश्वरीय देन मानने वाले थे. नेहरू थोड़े उदारवादी थे पर वह पार्टी के तिलक, जनेऊधारियों की सलाह के खिलाफ जाने का साहस नहीं दिखा पाते थे. न ही जगजीवन राम जैसे दलित और सरदार पटेल जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं की सलाह हिंदुत्व के विपरीत मानने की हिम्मत करते थे.

राहुल गांधी पिछले समय से काफी सक्रिय दिखाई दिए हैं. उन्होंने गुजरात चुनावों में जो तेवर दिखाए, 22 साल से एकछत्र शासन कर रही भाजपा को हिला दिया. वह तो ठीक है. उन्होंने जीएसटी पर व्यापारी वर्ग का समर्थन पाने के लिए सभाओं में मोदी सरकार को कोसा. ऐसा उन्होंने व्यापारियों को लुभाने के लिए किया. मंदिरों की परिक्रमा कर के ब्राह्मणों का समर्थन पा सकते हैं पर उन के पास देश की बड़ी युवा जनसंख्या के लिए कोई एजेंडा दिखाई नहीं दिया. न पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और औरतों के लिए उन के पास किसी तरह का नया दृष्टिकोण है.

हालांकि वह कुछ समय तक दलितों के घरों में जाते रहे. रात को उन के घर में रुकते और उन के घर में खाना खाते. इस से दलितों में किसी तरह का कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया. केवल इतना ही हुआ कि दलित कांग्रेस को अपनी हितैषी पार्टी मानती रही है. दलितों में कांग्रेस के प्रति वह धारणा पहले से है.

राहुल गांधी के पूर्वजों की बात करें तो नेहरू समाजवाद लाने की बात करते रहे. इंदिरा गांधी गरीबी हटाने का नारा ले कर आईं. राजीव गांधी गरीबों, गांवों तक एक रुपए में से 15 पैसे पहुंचने की बात कर के उन्हें लुभाते रहे, पर हकीकत में इस देश के गरीबों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के लिए सिवाय वादों के कुछ नहीं हुआ. 10 साल तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की छत्रछाया में कारपोरेट और भ्रष्ट नेताओं के कल्याण में खड़े नजर आए.

राहुल गांधी जल्दी ही अपनी नई टीम बनाएंगे और तय है वह अपनी टीम में युवा नेताओं को भी रखेंगे पर कांग्रेस पार्टी में अभी जो युवा नेता हैं उन में से ज्यादातर पिता या परिवार की राजनीतिक विरासत से आए हुए हैं. उन की सोच जानीपहचानी है. जमीन से जुड़ाव वाले नेताओं की कांग्रेस में कमी हो रही है. जो हैं वे लकीर के फकीर दिखाई पड़ते हैं.

कांग्रेस को हिंदूवादी छवि से मुक्त कर के सही मायने में लोकतांत्रिक समाजवादी नीतियां स्थापित करनी होगी. सामाजिक क्षेत्र के लिए उन के पास कोई दृष्टिकोण नहीं दिखता. कांग्रेस में किसी भी युवा या पुराने नेता में आज के भारत को नई दिशा देने के लिए वह नजरिया नहीं है, जो तरक्की के लिए आवश्यक है.

मंदिरों, तीर्थों और विपक्ष की खामियां उजागर करने मात्र से देश किसी नेता का मुरीद नहीं बन सकता. राहुल गांधी को सामाजिक, राजनीतिक बदलाव का कोई नया कारगर क्रांतिकारी एजेंडा पेश करना होगा पर लगता नहीं वह देश में सुधार का कोई नया नजरिया पेश कर पाएंगे. आज देश कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में कोई नेता तो युवा हो पर नीतियां 100 साल पुरानी हो, तब कैसे कोई देश तरक्की कर सकता है.

संपत्ति का बंटवारा : कानून पर संस्कार भारी

मोबाइल की घंटी बजी तो दीपा स्क्रीन पर अपनी बड़ी बहन का फोटो देख कर समझ गई कि अवश्य कोई महत्त्वपूर्ण बात होगी, क्योंकि वे निरर्थक बातों के लिए कभी फोन नहीं करतीं.

उन्होंने कहा, ‘‘तुझे पता है, बिहार की सारी पैतृक जमीन दोनों भाइयों ने मिल कर, तेरे और मेरे साइन अपनेआप कर के कौडि़यों के भाव बेच दी है. मुझे किसी शुभचिंतक ने फोन से सूचना दी है.’’

सुन कर दीपा सकते में आ गई कि पिता की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई कि उन्होंने ऐसा कदम उठा लिया जैसेकि वे उन के जाने का ही इंतजार कर रहे थे. पिताजी यदि स्वयं बेचते तो सब को बराबर हिस्सा देते, लेकिन अचानक दुर्घटना में उन की मृत्यु हो गई. उन्होंने कई बार दीपा से कहा था कि परिवार में केवल वही आर्थिक अभाव से जूझ रही है, इसलिए जमीन के पैसे से उसे काफी मदद मिलेगी. लेकिन यह घटना अपवाद नहीं है, बल्कि घरघर की कहानी है.

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार

पहले जमाने में संयुक्त परिवार होते थे. अधिकतर परिवारों के सभी पुरुष पैतृक व्यवसाय में लगे होते थे, इसलिए बहनों के विवाह में दहेज के रूप में पैतृक संपत्ति का हिस्सा उन्हें दे देते थे. विवाह के बाद भी उन के हर दुखसुख में भागीदार होते थे और यथासंभव आर्थिक मदद भी करते थे. दूरियां भी कम होती थीं. यहां तक कि यदि कोई स्त्री ससुराल द्वारा परित्यक्ता होती थी या विधवा हो जाती थी, तो उस के भाई या पिता उसे हर तरह का संरक्षण देना अपना नैतिक कर्तव्य समझते थे.

वे मातापिता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाते थे. बेटियां विवाह के बाद पूरी तरह से अपनी ससुराल को समर्पित हो जाती थीं. लेकिन समयानुसार जमाने और लोगों की सोच में अत्यधिक परिवर्तन आया है. अब पैतृक व्यवसाय को छोड़ कर युवक दूसरे शहरों में नौकरी करने लगे हैं. संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों में परिवर्तित होने के परिणामस्वरूप सब अलगअलग रहने लगे हैं. इस से उन के निजी खर्चे बहुत बढ़ गए हैं.

महिलाओं के भी आत्मनिर्भर होने से पुरुषों का उन के प्रति उदासीन दृष्टिकोण हो गया है. बेटियां भी अब भाई के कंधे से कंधा मिला कर अपने मातापिता के प्रति जिम्मेदारी से विमुख नहीं हैं. पहले की अपेक्षा दहेज प्रथा को भी कानूनन नकारा गया है. महिलाएं भी आत्मनिर्भर होने के कारण स्वाभिमान के तहत पिता से दहेज लेने के विपक्ष में हो गई हैं. ये सब देखते हुए महिलाओं का भी पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार होना आवश्यक हो गया है.

बराबर का हक

विवाहित स्त्रियों को पुश्तैनी संपत्ति में पुरुष के बराबर का हक 1956 के ऐक्ट ‘हिंदू उत्तराधिकार के संशोधन’ के आगमन के बाद बनाया गया, लेकिन मूलतया यह प्रभावी नहीं हुआ. 9 सितंबर, 2005 से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिला और पुरुष दोनों का बराबर हक है.

अब प्रश्न यह उठता है कि कानून तो बन गया, लेकिन क्या व्यवहारिकता में भी इसे परिवारों ने अपनाया है? नहीं. यदि बहन या बेटी अपनी जबान पर भी संपत्ति के बंटवारे में हिस्सा लेने की इच्छा ले आए तो पुरुषों को बहुत नागवार गुजरता है. वे उस के अधिकारों का हनन कर के उसे हमेशा जरूरत के समय हाथ पसारे ही देखना चाहते हैं और उस की मदद कर के समाज में प्रशंसा का पात्र बनना चाहते हैं.

वे उसे अपने बराबर संपत्ति के अधिकार का भागी न मान कर उस दया का पात्र मानने में ही अपना बड़प्पन सुरक्षित रखना चाहते हैं. जैसे वह तो उस घर में पैदा ही नहीं हुई. डोली उठने के साथ ही उस के उस घर पर अपने सारे अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं और परिवार वाले उसे अपनेआप को पराया समझने पर मजबूर कर देते हैं. यह उस के हिस्से की विडंबना ही तो है.

बिखरते रिश्ते

‘स्त्रीपुरुष में पुश्तैनी संपत्ति का बराबर का बंटवारा’ कानून के तहत परिवारों के रिश्तों में बहुत कड़वाहट आ गई है. इस में कोई संदेह नहीं है, जो कार्य पुरुष अपना नैतिक कर्तव्य समझ कर करते थे, उन्हें अब कानून के डर से भी नहीं करना चाहते, क्योंकि पुरुषप्रधान देश में पुरुषों की सदियों से चली आ रही मानसिकता में बदलाव कछुए की चाल से हो रहा है. अभी भी नैतिक कर्तव्य समझने वाले पुरुष ही कानून का पालन कर रहे हैं.

रिश्तों में खटास आने का मुख्य कारण ‘जर, जोरू और जमीन’ ही होते हैं. यह सर्वविदित है. आधुनिक समय में कानून बनने के बाद पहले की अपेक्षा स्त्रियों को संपत्ति में बराबर का हकदार बनाने के स्थान पर उन की जिम्मेदारी तो अपने मातापिता के प्रति बढ़ गई, लेकिन उन की आर्थिक सुरक्षा गौण हो गई है.

अभी भी पुरुष चाहे अपने मातापिता के लिए आर्थिक या शारीरिक रूप से कुछ भी न करें, लेकिन पैतृक संपत्ति पर अपना पूरा अधिकार समझते हैं. जीवन भर बेटी उन के लिए अपनी नैतिकता के तहत कुछ भी करे, लेकिन संपत्ति में हिस्सा मांगे या मातापिता उसे देना चाहें तो वे उस के खून के प्यासे तक हो जाते हैं. उस के द्वारा अपने अधिकारों के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना तो बहुत दूर की बात है. ऐसा प्रतिदिन सुनने में आता है.

बहनों को हिस्सा मिले यह तो अपवाद है, भाई भाई को ही हिस्सा देने में कतराता है. जहां मौका देखा संयुक्त संपत्ति पर मालिकाना हक जताने में संकोच नहीं करता. चाहे जिंदगी भर के लिए एकदूसरे से रिश्ता टूट जाए.

मानसिकता में बदलाव

इस में बहनों की सदियों से चली आई मानसिकता भी दोषी है. कई बहनें विवाह के बाद अपनी ससुराल के समारोहों में अपने भाइयों से परंपरानुसार मोटी रकम वसूलना चाहती हैं और संपत्ति में से भी हिस्सा मांगती हैं, जबकि वे अपने भाई से आर्थिक दृष्टि से अधिक संपन्न हैं.

सारी वस्तुस्थिति का अवलोकन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कानून बनने से अधिक आवश्यक है, मातापिता अपने जीतेजी संपत्ति के बंटवारे की वसीयत लिख दें ताकि उन की मृत्यु के बाद कोई भी परिवार का सदस्य संपत्ति पर अवैध मालिकाना कब्जा न कर सके.

समयानुसार स्त्री और पुरुष की मानसिकता में बदलाव आए, पैसे से अधिक रिश्तों को महत्त्व दे कर नैतिकता के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति का बंटवारा हो और इस में भी मातापिता द्वारा अपने बच्चों में एकदूसरे के प्रति सौहार्द की भावना और रिश्तों को पैसे से अधिक महत्त्व देने वाले डाले गए संस्कार ही सब से अधिक परिवार के विघटन को रोकने में और समस्या के समाधान को फलीभूत करने में सक्षम हैं.

शर्मनाक : जवानों ने की आदिवासी लड़कियों से छेड़छाड़

यह शर्मनाक हादसा छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के पालनार कसबे के आदिवासी गर्ल्स होस्टल का है. बीती 31 जुलाई को पालनार होस्टल की आदिवासी लड़कियां चहक रही थीं. एक नाचगाने के जलसे की तैयारियां कर रही वे लड़कियां बारिश का लुत्फ उठाते हुए घर न जा पाने का अफसोस भी कर  रही थीं कि राखी के दिन अपने भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांध पाएंगी.

होस्टल में खासी चहलपहल थी. जलसे की तैयारियां कर रही लड़कियां उस वक्त और खुश हो उठीं, जब उन्हें यह पता चला कि नजदीक के कैंप से कई जवान उन से राखी बंधवाने आ रहे हैं.

गौरतलब है कि नक्सली इलाके छत्तीसगढ़ में जगहजगह सीआरपीएफ के कैंप लगे हुए हैं, जिन में सेना के जवान डेरा डाले हुए हैं. जिस वक्त वरदी पहने कई जवान होस्टल आए, तब कुछ लड़कियां बाथरूम गई हुई थीं.

उन में से जब कुछ लड़कियां अपने कमरों की तरफ लौट रही थीं, तब उन्हें देख कर राखी बंधवाने की मंशा लिए आए जवानों ने एक बार फिर अपना असली रंग दिखा दिया. उन्होंने बाथरूम से आती लड़कियों को रास्ते में रोक कर उन की तलाशी की बात कही, तो वे लड़कियां घबरा उठीं.

सीआरपीएफ के जवानों की इस इलाके में पुलिस वालों और नक्सलियों से भी ज्यादा दहशत रहती है, इसलिए लड़कियां डर के मारे तलाशी से इनकार नहीं कर पाईं.

तलाशी के नाम पर जवानों ने जो घटिया हरकत की, उस ने सेना के जवानों की बदनीयती की पोल खोल दी.

तलाशी के बहाने उन्होंने लड़कियों के अंगों से छेड़छाड़ शुरू की तो वे और घबरा उठीं, पर हट्टेकट्टे और वरदी के नशे में चूर जवानों का विरोध नहीं

कर पाईं. तलाशी के नाम पर उन्होंने भोलीभाली लड़कियों की कैसी तलाशी ली होगी, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है.

जब तलाशी के बहाने छेड़छाड़ पर पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा, तो लड़कियों की हिम्मत वापस आई और उन्होंने शोर मचाते हुए विरोध शुरू कर दिया. इस पर और भी लड़कियां इकट्ठा होने लगीं, तो जवान भाग खड़े हुए, पर तब तक तकरीबन 14 लड़कियों के नाजुक अंगों से खिलवाड़ कर अपनी हवस और बुरी मंशा को अंजाम दे चुके थे.

बात जब होस्टल की वार्डन द्रौपदी सिन्हा तक पहुंची, तो इस शर्मनाक हादसे पर वे गुस्सा हो उठीं और सीधे  नजदीकी थाने कोंडाकोआ जा कर अज्ञात जवानों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

कुछ ही देर में पूरे राज्य में जवानों की इस बेजा हरकत पर खासा हल्ला मच गया और आदिवासी गुस्से से भर उठे कि हमारी लड़कियों को तो सीआरपीएफ के जवानों ने भेड़बकरी समझ रखा है, जो कभी भी कहीं भी नक्सली होने के शक में पकड़ कर तलाशी के नाम पर छेड़छाड़ शुरू कर देते हैं और मौका मिले तो बलात्कार तक कर डालते हैं.

माहौल गरमाते देख पुलिस और प्रशासन भी हरकत में आ गए और मामले की जांच के लिए तुरंत एक कमेटी बना डाली. इस कमेटी ने

13 छात्राओं के बयान दर्ज किए, तो एक हैरतअंगेज बात यह भी सामने आई कि उन जवानों के नाम और पहचान किसी को नहीं मालूम थे.

आदिवासी लड़कियों के बयानों से यह जाहिर हुआ कि एक जवान बारीबारी से उन्हें टटोलता रहा और दूसरा होस्टल की निगरानी करता रहा.

दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और पुलिस के आला अफसर भी पालनार गर्ल्स होस्टल पहुंचे, पर तब तक वे जवान फरार हो चुके थे.

बहरहाल, छात्राओं द्वारा बताए गए हुलिए के आधार पर उन की पहचान शुरू हुई और पुलिस ने अज्ञात वरदीधारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 और 354 (क) के तहत मामला दर्ज कर उन जवानों की खोजबीन शुरू कर दी.

जवान या शैतान

मामले ने तूल पकड़ा, तो आदिवासी संगठनों के लोगों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया. 8 अगस्त को पीडि़त छात्राओं को 231वीं बटालियन के 254 जवानों के फोटो और वीडियो दिखाए गए, तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया.

पहला जवान 9 अगस्त को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जिस का नाम शमीम अहमद है और वह जम्मूकश्मीर का रहने वाला है.

दूसरा जवान नीरज खंडेलवाल घटना के दूसरे दिन ही छुट्टी ले कर अपने घर देहरादून भाग गया था, जिसे 12 दिन बाद गिरफ्तार कर लिया गया.

शमीम और नीरज तो इसलिए जल्दी पकड़े गए, क्योंकि उन्होंने आदिवासी गर्ल्स होस्टल में घुस कर इन लड़कियों पर बुरी निगाह डाली थी और उन के साथ बेहूदा हरकतें भी की थीं.

कहने को तो इन जवानों की ड्यूटी नक्सलियों से निबटने और आदिवासियों की हिफाजत करने की है, पर होता उलटा है. ये जवान खुद आदिवासी लड़कियों और औरतों पर मौका पाते ही भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़ते हैं और देखते ही देखते उन की इज्जत तारतार कर देते हैं.

दरअसल, 31 जुलाई को पालनार में हुआ यह था कि जवानों की इमेज चमकाने के लिए प्रशासन ने खुद रक्षाबंधन का जलसा रखा था, जिसे नाम दिया गया था ‘सुरक्षा बलों के साथ बस्तर की औरतों का अनोखा रिश्ता’. दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और एसपी कमललोचन कश्यप की इजाजत से ही इसे किया गया था.

देर से ही सही, पर सच जब उजागर हुआ, तो कई सवाल भी साथ लाया कि अगर आदिवासी छात्राओं से जवानों को राखी बंधवानी ही थी, तो इस के लिए रक्षाबंधन वाले दिन के बजाय प्रोग्राम हफ्ताभर पहले क्यों रखा गया और खुले में रखने के बजाय बंद में क्यों रखा गया.

इस होस्टल में तकरीबन 5 सौ आदिवासी लड़कियां रहती हैं, जिन्हें कहा गया था कि वे नाचगाने की प्रैक्टिस करें.

कई और सवाल भी हैं. मसलन, क्या रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों के सामने नाचतीगाती हैं? जवाब साफ है कि नहीं. इस दिन भाई भले ही वे फिर धर्म के क्यों न हों, अपनी बहनों को तोहफे देते हैं और उन की हिफाजत की जिम्मेदारी लेते हैं.

पर यहां तो उलटी गंगा बह रही थी. जवानों ने आते ही लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया, जिस से लड़कियां अपने बचाव के लिए टायलेट की तरफ भागीं, पर वहां भी हैवान बने जवानों ने उन को बख्शा नहीं और मामले पर लीपापोती करते हुए यह जताने की कोशिश की गई कि केवल 2 जवान ही गए थे, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है.

एक महीने तक तो सच को छिपा कर रखा गया, लेकिन पर जब यह पूरी तरह उजागर हुआ तो साफ यह हुआ कि बस्तर में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज है ही नहीं. आएदिन सीआरपीएफ के जवान आदिवासी औरतों की इज्जत से खिलवाड़ किया करते हैं.

अब से तकरीबन 6 महीने पहले भी आधा दर्जन आदिवासी लड़कियों के नक्सली होने के शक में उन के स्तन तक निचोड़ कर देखे गए थे.

इन से अच्छे हैं नक्सली

सेना के जवानों के सामने आदिवासी लड़कियों को नाचने पर क्यों मजबूर किया गया, इस की जांच हो तो कई चौंका देने वाली बातें उजागर होंगी. पर अफसोस, इन भोलेभाले आदिवासियों से किसी को कोई सरोकार नहीं है. सभ्य समाज की नजर में ये गंवार हैं और मीडिया तभी यहां पहुंचता है, जब नक्सली कोई जोरदार धमाका कर जवानों को उड़ा देते हैं.

हर कोई जानता है कि नक्सली आदिवासियों के हिमायती हैं. उन का मानना है कि पहले पूंजीपति और जमींदार आदिवासियों का शोषण करते थे, अब वही काम बस्तर में तैनात सेना के जवानों के जरीए कराया जा रहा है और इस की जिम्मेदार सरकार है, जो नहीं चाहती कि आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन का उन का बुनियादी हक मिले.

नक्सली चूंकि सेना के जवानों से आदिवासियों की हिफाजत करते हैं, इसलिए उन्हें देशद्रोही करार देते हुए बदनाम कर दिया जाता है. पूरे देश में हवा ऐसी बनाई जाती है, जैसे नक्सली कोई आतंकी या समाज के दुश्मन हों. सेना के जवानों से परेशान इन आदिवासियों की हिफाजत नक्सली करते हैं, तो इस की एवज में आदिवासी भी उन का साथ और माली इमदाद देते हैं.

अरबों रुपए सरकार इन जवानों की तैनाती और खानेपीने पर खर्च कर रही है, पर वे आदिवासियों को तंग करते हैं, तो नक्सलियों की इस दलील को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता कि सरकार की मंशा सेना के जवानों से आदिवासियों को इतना परेशान करा देने की है कि वे खुद जंगल छोड़ कर भागने लगें और कुदरती तोहफों से भरपूर बस्तर उद्योगपतियों को दिया जा सके.

मुमकिन है कि यह पूरा सच न हो, पर पालनार की घटना से यह तो उजागर होता है कि जवानों की मंशा और इरादे ठीक नहीं थे, जो घर और बीवी छोड़ कर सालों से बस्तर के कैंपों में रह रहे हैं और अपनी सैक्स की भूख मिटाने के लिए आदिवासी औरतों को निशाना बनाते हैं. ऐसे में कोई उन्हें बचाने नहीं आता. आते हैं तो नक्सली और वे भी सीधे बारूदी सुरंगें लगा कर जवानों को थोक में मारते हैं.

इन दोनों के बीच पिस रहा है तो बेचारा आदिवासी समाज, जिसे यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों हजारों जवानों को सरकार ने इस दुर्गम इलाके में रख छोड़ा है, जो करने के नाम पर आदिवासियों को आएदिन परेशान करते हैं और अब तो होस्टलों में घुस कर लड़कियों को भी नहीं बख्श रहे हैं.

आदिवासियों को जवानों से भले और हमदर्द नक्सली लगते हैं, तो इस में हैरत की बात क्या?

दूसरी कई मांगों और पालनार गर्ल्स होस्टल मामले के विरोध में कई आदिवासी संगठनों ने 5 सितंबर, 2017 को बस्तर बंद का ऐलान किया था, जो कामयाब रहा था.

पहली दफा कुछ गैरआदिवासियों ने भी उन का साथ दिया था. शायद ये लोग भी सेना के जवानों से आजिज आने लगे हैं. पर सरकार जवानों को यहां से हटाएगी, ऐसा लग नहीं रहा.

अंधभक्ति का चक्रव्यूह : बाबाओं के इस जाल में फंस न जाना

कुछ समय पहले की बात है. टैलीविजन के खबरिया चैनल और अखबार चीखचीख कर कह रहे थे कि डेरा सच्चा सौदा के गुरु राम रहीम को दिए जज के फैसले के चलते उन के अनुयायियों ने पंचकुला को धूंधूं कर जला डाला. हर तरफ आग ही आग, हिंसा पसरी हुई थी.

सवाल उठा कि ये बाबा के कैसे अनुयायी हैं, जो हिंसक हो उठे? क्या यह भारत की ऐसी पहली घटना थी? क्या इस से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था?

एक जानेमाने अखबार से मालूम हुआ कि अदालतों में चल रहे ऐसे मुकदमों की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

पिछले साल उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के एक बाबा परमानंद को गिरफ्तार किया गया था. औरतों के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए उन के वीडियो सोशल मीडिया पर आए थे. अगर दक्षिण भारत की बात करें, तो स्वामी नित्यानंद की सैक्स सीडी साल 2010 में सामने आई थी.

इस तरह की घटनाएं बारबार होती हैं और हर बार अंधभक्ति की चपेट में आई जनता छली जाती रही है. कैसी धर्मांधता है यह? क्या हमारी सोचनेसमझने की ताकत खत्म हो चुकी है?

जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, जवान होती लड़कियां आनी वाली जिंदगी के सपने बुनती हैं, उस उम्र में उन को धार्मिक जगहों पर सेवा के काम में भेज कर क्या सच में पुण्य कमाया जा सकता है?

सड़क पर घायल पड़े किसी इनसान को देख लोग मुंह मोड़ कर चल देते हैं, मुसीबत में पड़े शख्स से किनारा कर लेते हैं, पर किसी बाबा पर आंच आ जाए, तो बवाल कर देते हैं. क्या यही धर्म है?

क्या वजह है इस धर्मांधता की? इस बारे में कई संस्थानों से जुड़े लोगों से बात की गई, तो मालूम हुआ कि कहीं न कहीं लोग शांति की तलाश में इन आश्रमों का रुख करते हैं.

भेदभाव भरा बरताव

आज समाज में फैले जातिगत भेदभाव, ऊंचनीच व अमीरीगरीबी का फर्क क्या लोगों को मजबूर नहीं करता इन बाबाओं की शरण में जाने को? अमीर दिनोंदिन अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है. ऐसे में इन आश्रमों से अगर किसी गरीब को मुट्ठीभर अनाज और तन ढकने को कपड़ा मिल जाए, तो ये लोग उसे अपना मंदिर समझने लगते हैं और समाज से कटे हुए दलित, बाबा से मिली इज्जत के बदले व समाज से बदला लेने के लिए हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं.

अमीर अपने काले धन से किसी को दो गज जमीन नहीं देगा, पर इन मठों के नाम पर धर्मशालाएं बनवाएगा व जमीनें दान कर देगा, ताकि उस का काला धन भी ठिकाने लग जाए और समाज में रुतबा भी बढ़ जाए.

इस तरह यहां गरीब व अमीर सभी तरह के अंधभक्तों का स्वागत होता है. पर भेदभाव भी होता है. अमीर झाड़ू ले कर सेवा के नाम पर सिर्फ तसवीरें खिंचवाते हैं और गरीब को तसवीरें दिखा कर वही झाड़ू हमेशा के लिए थमा दी जाती है.

घरेलू हिंसा जिम्मेदार

क्या आएदिन घरपरिवारों में होने वाली हिंसा औरतों व बच्चों को इस अंधभक्ति की तरफ नहीं खींचती है? क्यों कोई अपने बच्चे इन बाबाओं व आश्रमों के सुपुर्द कर देता है? क्यों कोई औरत अपने परिवार को हाशिए पर रख कर इन बाबाओं के मायाजाल में फंसती चली जाती है?

अगर गंभीरता से सोचा जाए, तो शायद वह अपने वजूद की तलाश में यह रफ्तार पकड़ लेती है. जहां परिवारों में औरतों को इज्जत नहीं मिलती, उन्हें यहां प्यार के दो बोल भले महसूस होते हैं और वे सत्संग व प्रवचनों के बहाने इन की ओर खिंची चली जाती हैं और वहां पर हाजिरी देना अपना धर्म समझने लगती हैं.

टूटते परिवार व समाज

कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो इन आश्रमों में जाने वाले ऊंचे तबके के भक्तों की देखादेखी ऐसा करने लगते हैं और इन से जुड़ते चले जाते हैं. अमीर लोग भी इन के कार्यक्रमों व सत्संगों में जाना पसंद करते हैं.

यह सही है कि यह सामाजिक होने का एक जरीया भर है और इनसान सजधज कर कर रहना व संगीत सुनना पसंद करता है, इसलिए इन सत्संगों में उसे क्षणिक खुशी मिलती है.

पर सोचने की बात यह भी है कि यही खुशी वह इन के अनुयायी न बन कर अपने परिवार, दोस्तों व रिश्तेदारों में भी तो ढूंढ़ सकता है? क्या टूटते परिवार, बदलता सामाजिक माहौल इन बाबाओं को राह दिखाने के लिए जिम्मेदार नहीं है?

पीढ़ी दर पीढ़ी अंधभक्ति

कई घरों में इन बाबाओं के लिए खास दर्जा होता है. घर में कुछ अशुभ हुआ, तो बाबा से सलाहमशवरा किया जाता है और अगर कुछ शुभ हुआ, तो भी बाबा को चढ़ावा चढ़ाया जाता है. घर के बड़ेबुजुर्ग यह सब करते हैं व अपनी अगली पीढ़ी को भी मजबूर करते हैं कि वह इस का पालन करे.

ऐसा अकसर अपना कारोबार करने वाले परिवारों में होता है, जहां अगली पीढ़ी पहली पीढ़ी पर निर्भर होती है, इसलिए अगली पीढ़ी न चाहते हुए भी इस अंधभक्ति के चक्रव्यूह में फंस जाती है और इन बाबाओं के आश्रम फलतेफूलते रहते हैं.

कम मेहनत में शौहरत

आजकल इन आश्रमों में दान व चंदे के नाम पर खूब पैसा जमा होता है. इन्हें भी लोगों की जरूरत पड़ती है, ताकि इन का प्रचारप्रसार किया जा सके, इन के नाम के डंके बजाए जा सकें. ऐसे में पढ़ीलिखी बेरोजगार नौजवान पीढ़ी या वे औरतें, जो किसी वजह से नौकरी नहीं कर रही हैं, भी इन संगठनों से खूब जुड़ रही हैं.

जिन औरतों ने कभी सोचा भी न था कि शादी के बाद वे महज घरेलू औरत बन सिर्फ बच्चे ही पालती रह जाएंगी, उन्हें कुछ अलग करने की चाह इन आश्रमों से जुड़ने को मजबूर करती है.

ऐसी औरतें बड़ेबड़े स्टेजों पर खड़ी हो कर भीड़ को संबोधित कर अपनेआप को ऊंचा समझने की गलतफहमी में इन से जुड़ी रहती हैं और इस अंधभक्ति के चक्रव्यूह में फंसती चली जाती हैं.

ऐसी औरतें अपने आसपड़ोस की औरतों के लिए मिसाल बन जाती हैं और देखादेखी दूसरी औरतें भी इन आश्रमों से जुड़ने लगती हैं, जबकि इन के खुद के बच्चे दाइयों के भरोसे पलते हैं. वे भूल जाती हैं कि अपने बच्चे पालने का काम कोई छोटा काम नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.

हिम्मत हारना

कई बार अपने काम में बारबार नाकाम होने पर भी लोग मठोंमंदिरों का रुख करने लगते हैं. जो काम लगन व मेहनत से होना चाहिए, उस के लिए वे इन बाबाओं से आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं. वहां आशीर्वाद के साथ मन को बहलाने वाली बातें सुन कर कभीकभार उन के काम बन भी जाते हैं और ऐसे लोग ही इस कामयाबी को बाबा का आशीर्वाद समझ कर उन के अनुयायी हो जाते हैं, जबकि यह हिम्मत, हौसला अगर उन के अपने परिवार से मिला होता, तो वह परिवार एकता के सूत्र में जुड़ जाता और वह सदस्य बाबा से न जुड़ता.

शांति की तलाश में

जब कभी परिवार के किसी सदस्य को कोई लंबी व बड़ी बीमारी का सामना करना पड़ता है, तो पूरा परिवार निराश हो जाता है. ऐसे में जब सभी दरवाजे

बंद हों, तो वे इन बाबाओं का दरवाजा खटखटाते हैं और परिवार का सदस्य ठीक हुआ या नहीं, वह तो दूसरी बात है, पर वे अपना समय व दौलत इन आश्रमों में जरूर लुटाते हैं.

हो सकता है कि इस से उन्हें शांति मिलती हो, पर यह शांति उन्हें किसी दूसरे नेक काम को कर के भी मिल सकती है.

कुलमिला कर एक इनसान दूसरे इनसान के लिए मददगार साबित हो, तो शायद इन बाबाओं, मठाधीशों का साम्राज्य खत्म हो जाए.

धर्म के नाम पर हो रहे इस पाखंड का खात्मा होना चाहिए, तभी सही माने में इनसान अपने इनसानियत के धर्म को समझ सकेगा.

मुहब्बत का रंग

खोदो मुझ को और मुझे गहरा होने दो

मैं दरिया हूं, मुझे समंदर होने दो

बहुत हो चुकी हवाओं की सरगोशियां

प्यासी है धरती, बादलों को बरसने दो

शिकवा न हो सकेगी कभी जिंदगी से

मुझे खुद से मुहब्बत करने की इजाजत दो

नहीं समाना अब निगाहों में किसी के

मुझे अपने घर का पता दे दो

न उतरे मुझ पर से मुहब्बत का रंग

निगाहों से अपने मुझे सुहागन बना दो

मुहब्बत में मुझे और कुछ न बनाओ

मैं इंसान हूं मुझे इंसान ही रहने दो.

– रिंकी वर्मा

मैं फाइटर हूं : उषा जाधव

बचपन से अभिनय की इच्छा रखने वाली अभिनेत्री उषा जाधव महाराष्ट्र के कोल्हापुर की हैं. उन्होंने अभिनय की शुरुआत मराठी थिएटर से की थी. थिएटर में काम करने के दौरान उन्हें कई टीवी विज्ञापनों में भी काम मिला. हिंदी फिल्म में उन्हें पहला ब्रेक मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ से मिला.

दलित और लोअर मिडिल क्लास की होने की वजह से उषा को अभिनय के क्षेत्र में आने में काफी मुश्किलें आईं. संघर्ष के बारे में पूछे जाने पर वे बताती हैं, ‘‘कोल्हापुर एक छोटा शहर है, वहां मैं ने 12वीं तक की पढ़ाई की. मेरे घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी. इसलिए पुणे आ कर एक ट्रैवल एजेंसी में काम किया. उस समय 3,000 रुपए की सैलरी मेरे लिए काफी थी. काम करतेकरते 3 साल निकल गए. जब घर की जिम्मेदारी थोड़ी कम हुई, तो मुंबई आ कर फिल्मों के लिए औडिशन दिया और मुझे कास्ंिटग डायरैक्टर की मदद से मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ मिली, क्योंकि इस फिल्म में उन्हें ‘डस्की स्किन’ की लड़की चाहिए थी. पहले उस में केवल एक सीन ही था. जब मैं ने उस सीन को अच्छी तरह से किया तो मधुर ने खुश हो कर 3 सीन और करने के लिए दिए.

‘‘इस के बाद दीप्ति नवल की फिल्म ‘दो पैसे की धूप चार आने की बारिश’, ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ आदि में भी छोटे रोल किए. फिल्मों में मुझे 2 या 3 सीन्स मिल रहे थे, कोई बड़ा प्रोजैक्ट नहीं मिल रहा था. मैं ने ऐसा काम करना बंद कर दिया. ऐसे में मुंबई में रहना मुश्किल हो रहा था. मैं अपनी जौब भी छोड़ चुकी थी. मैं ने एड फिल्मों की ओर रुख किया. जहां भी कुछ औफर मिलता, मैं तुरंत औडिशन देने लगी. करीब 20 से 25 एड फिल्मों में मैं ने काम किया और मैं थोड़ी सैटल हो गई.’’

उषा जाधव स्वभाव से मिलनसार और स्पष्टभाषी हैं. उन्हें जो बात अच्छी नहीं लगती, उसे तुरंत कह देती हैं. मराठी फिल्म में मुख्य भूमिका का मिलना उन के लिए खुशी की बात थी.

वे कहती हैं, मैं महाराष्ट्रियन हूं और मराठी मेरी मातृभाषा है. मुझे फिल्म ‘धग’ के निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल, जिन्होंने मुझे एक विज्ञापन फिल्म में देखा था, ने जब कहानी सुनाई, तो मैं दंग रह गई और तुरंत हां कह दी. कहानी इतनी अच्छी थी कि मैं फिल्म करने के लिए उत्साहित हो गई. लेकिन यह पता नहीं था कि यह फिल्म मुझे नैशनल अवार्ड दिलवाएगी. इस फिल्म को मैं अपने कैरियर का टर्निंग पौइंट मानती हूं. इस फिल्म में मैं ने एक युवा बालक की मां की भूमिका अदा की थी. जो निम्न मध्यम वर्ग की होने के बावजूद चाहती है कि उस का बच्चा सब से अधिक शिक्षित हो.

बैस्ट ऐक्ट्रैस के पुरस्कार का मिलना उषा के जीवन में सब से अहम था. इस से उन्हें स्फूर्ति मिलती है और आगे भी वे ऐसी ही चुनौतीपूर्ण भूमिका करना चाहती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘यह भूमिका मेरे लिए बहुत चैलेंजिंग थी, क्योंकि एक दलित डोम जाति की महिला कैसे अपने बच्चे को आगे लाने की बात सोच सकती है और उसे किनकिन हालात से गुजरना पड़ता है, यह सब इस फिल्म में दिखाया गया है. इस तरह के हालात अभी भी हमारे देश में गांव और छोटेछोटे कसबों में पाए जाते हैं जहां दलित को कुछ भी करने का हक नहीं है.’’

क्या असल जिंदगी में आप का दलित होना, आप के कैरियर को बाधित करता है, यह पूछे जाने पर उषा बताती हैं, ‘‘दलित होने से भी अधिक मेरा रंग सब से अधिक आड़े आता है. ऐक्ट्रैस होने का अर्थ है गोरीचिट्टी और खूबसूरत होना, जबकि मैं सांवली हूं. बहुत अधिक रिजैक्शन का सामना इंडस्ट्री में करना पड़ा. अधिकतर निर्मातानिर्देशक कहते थे कि वे कैसे मान लें कि मुझे ऐक्ंिटग आती है? मेरी तरफ देखने का नजरिया ही बहुत अलग था. कोई सम्मान मुझे नहीं मिला, लेकिन मैं ने सोच लिया था कि मैं हार नहीं मानूंगी और एक दिन जरूर साबित करूंगी कि मैं एक अभिनेत्री हूं. मराठी फिल्म ‘धग’ की सफलता के बाद मेरी पहचान बदल गई.’’

उषा आगे हंसती हुई कहती हैं, ‘‘दलित होने का एहसास सब ने मेरे साथ बहुत जताया. अगर मेरा किसी में चुनाव होता था, तो मैं ने कई बार लोगों को कहते हुए सुना है कि मुझे इस से अधिक क्या मिल सकता था. मैं ने सोचा, मैं अपना काम करूंगी, क्योंकि हाथी जब रास्ते पर चलता है तो कुत्तों के भूंकने से कुछ नहीं होता. इस के अलावा मेरे पिता को दलित होने का बहुत मलाल था क्योंकि दलित होने की वजह से उन का परिवार पिछड़ा था.

‘‘मेरे पिता कृष्णा जाधव ने खुद पढ़ाई पूरी की और इस दलदल से निकले और हमें अच्छी तालीम दी. 5 बहन और एक भाई के परिवार में मेरे मातापिता बहुत समझदार थे. मेरे पिता खुद अपनी पढ़ाई के लिए रोज 4 किलोमीटर चल कर जातेआते थे. मैं इस बात से गर्वित हूं कि मेरे मातापिता ने मुझे हर तरह की आजादी दी.’’

आजकल वोटबैंक को कायम रखने के लिए आरक्षण को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है. इस बारे में उषा जाधव की राय है, ‘‘मेरे हिसाब से कई ऐसे परिवार हैं जो आर्थिक रूप से बहुत गरीब हैं और बच्चों की पढ़ाई की फीस तक दे नहीं पाते. आरक्षण उन के लिए जरूरी है. आर्थिकरूप से कमजोर परिवार को ही आरक्षण देना चाहिए, वह भी कुछ खास क्षेत्र में, सभी में नहीं.’’

उषा की हिंदी अच्छी है, इसलिए उन्हें हिंदी बोलना सीखना नहीं पड़ा. उन्हें हिंदी फिल्में देखना बचपन से अच्छा लगता है. वे धैर्यवान हैं और किसी भी परिस्थिति में अपनेआप को संभाल सकती हैं. उन की इच्छा है कि वे हमेशा अलगअलग किरदार निभाएं. मां की भूमिका अब वे नहीं करना चाहतीं.

वे कहती हैं, ‘‘मैं एक फाइटर हूं और अच्छी भूमिका के लिए अंत तक लड़ती रहूंगी. अभी मैं एक स्पैनिश फिल्म में काम कर रही हूं, जिस के लिए मैं स्पैनिश सीख रही हूं. मैं एक स्टूडैंट हूं और आगे भी सीखती रहूंगी. इस के अलावा मैं पिता की बायोपिक में अपनी मां की भूमिका निभाना चाहती हूं.’’

इंडस्ट्री में अपने अनुभवों के बारे में उषा का कहना है, ‘‘यहां भाईभतीजावाद से अधिक गु्रपिज्म हावी रहता है. स्टार के बच्चों का प्रैशर मेरे ऊपर नहीं है, क्योंकि आजकल हर तरह की फिल्में बनती हैं और सब को काम मिल सकता है.’’

उषा के परिवार का सहयोग उन के इस काम में नहीं था. वे नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करे. उन का कहना है, ‘‘मेरे शहर में मिडिल क्लास परिवार में लड़की के काम करने को अच्छा नहीं माना जाता है. ऐसे में जब मैं ने काम करना शुरू किया, तो वे मेरे मातापिता से कहते थे कि तुम्हारी लड़की मुंबई में कोई गलत काम तो नहीं कर रही? वह कहीं दिखती तो नहीं है? ऐसी बातें उन्हें दुखी करती थीं, लेकिन जब ‘धग’ फिल्म आई और मुझे पुरस्कार मिला तो आसपड़ोस के सब के मुंह बंद हो गए और मातापिता भी काफी खुश हुए.’’

खेलों में नस्लभेद : कई शर्मनाक उदाहरणों से भरा हुआ है इतिहास

पूरी दुनिया रंगभेद और नस्लभेद की समस्या से जूझ रही है. विज्ञान और तकनीक ने दुनिया को कहां से कहां पहुंचा दिया है पर नस्लभेद के मामले में हम वहीं खड़े हैं. क्रिकेट या अन्य खेलों की बात करें तो इस का लंबा इतिहास रहा है. रूसी दर्शकों का काली चमड़ी वाले खिलाडि़यों के प्रति बुरा रवैया रहा है. ऐसे में रूस में अगले साल होने वाली विश्वकप फुटबौल प्रतियोगिता क्या नस्लभेदी टिप्पणियों से ऊपर उठ पाएगी, यह बड़ा सवाल है.

इन दिनों भारत में इंडियन सुपर लीग यानी आईएसएल की खुमारी है. चेन्नई में नौर्थईस्ट युनाइटेड और चेन्नई एफसी के बीच मैच खेला जा रहा था. इसी दौरान नौर्थईस्ट युनाइटेड टीम को सपोर्ट कर रही लड़कियों के साथ कुछ लड़कों ने अभद्र व नस्लभेदी कमैंट किए. खिलाडि़यों के साथसाथ प्रशंसक भी इस में पीछे नहीं रहते.

खिलाडि़यों को अपनी प्रतिभा के बल पर ख्याति मिल रही है, न कि अपने रंग, जाति के आधार पर. लेकिन यत्रतत्र नस्लभेद की कोई न कोई घटना घट ही जाती है.

नस्लभेद का सब से शर्मनाक उदाहरण 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में 4 स्वर्ण पदक जीतने वाले जेसी ओवेंस के साथ अमेरिकी व्यवहार के रूप में सामने आया था. हिटलर ने जेसी ओवेंस के साथ हाथ तक नहीं मिलाया था. अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रुजवेल्ट ने भी जेसी से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी.

यहां तक कि जेसी जब एक बार अपनी पत्नी के साथ रेस्टोरैंट गए थे तब उन्हें मुख्यद्वार के बजाय पीछे के दरवाजे से प्रवेश दिया गया था. यह व्यवहार उस देश में हुआ जो समानता और मानवाधिकार का सब से बड़ा पोषक होने का दंभ भरता है. क्रिकेट की दुनिया में भी ऐसे कई उदाहरण हैं जो खेल के लिए शर्मनाक है. इंगलैंड के फास्ट बौलर जेम्स एंडरसन

3 वर्षों पहले आरोपों के घेरे में आए थे. क्रिकेट ग्राउंड से बाहर जाते हुए उन्होंने भारतीय क्रिकेटर रविंद्र जडेजा को गाली दी और धक्का दिया था व नस्लीय टिप्पणी की थी. इस मसले पर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई और ईसीबी यानी इंग्लैंड ऐंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड में खासी ठनी थी. एंडरसन-जडेजा मामले में अंपायरों का तटस्थ रवैया भी कई प्रश्न उठाता है.

टीम इंडिया के अभिनव मुकुंद भी नस्लभेद के शिकार रहे हैं. मुकुंद ने अपने ट्वीटर अकाउंट में लिखा था कि उन्हें रंग के कारण काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. गुस्सा जाहिर करते हुए उन्होंने कहा था कि सिर्फ गोरे दिखने वाले ही प्यारे या खूबसूरत नहीं होते.

‘‘मैं आज किसी की सहानुभूति और ध्यान खींचने के लिए ऐसा नहीं लिख रहा हूं बल्कि इस उम्मीद से लिख रहा हूं कि नस्लवाद के मुद्दे पर लोगों की सोच बदल पाऊं. जिस के बारे में मैं सब से ज्यादा सोचता हूं.’’

इस संदर्भ में ईमानदारी के साथ सोचा जाए और इस समस्या व इस से उत्पन्न अन्य समस्याओं का समाधान गंभीरतापूर्वक किया जाए.

दुष्कर्म की खिलाड़ी मानसिकता और लड़कियों को खिलौना समझ लेना

फुटबौल के देश ब्राजील के खिलाड़ी आमतौर पर कैरियर में चमकने के बाद जो गलती करते हैं वह आखिरकार 33 वर्षीय रोबिंहो ने भी दोहरा ही दी. ब्राजील की टीम के इस तेजतर्रार और प्रतिभाशाली फौरवर्ड खिलाड़ी ने इटली के नामी क्लब एसी मिलान के लिए भी 5 साल अच्छेखासे भुगतान पर फुटबौल खेला है.

इसी दौरान साल 2013 की जनवरी में, रोबिंहो एक नाइट क्लब की पार्टी में शराब पी कर इतना बहका कि उस ने अपने 5 साथियों के साथ मिल कर एक 22 वर्षीय अल्बानियाई युवती का बलात्कार कर डाला.

युवती को इन लोगों ने इतनी शराब पिलाई थी कि वह बेहोश हो गई थी. दुष्कर्म का यह मामला इटली की अदालत में चला. रोबिंहो अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया. यहां तक कि अपने बचाव के लिए वह खुद कभी अदालत नहीं गया. हालांकि सोशल मीडिया पर खुद को वह निर्दोष कहता रहा लेकिन अदालत ने उसे पीडि़ता को 71 हजार डौलर (लगभग 46 लाख रुपए) देने का आदेश दिया है.

पेशेवर खेलों के कम ही खिलाड़ी खुद को नशे, व्यभिचार और दूसरी खुराफातों से बचा पाते हैं. रोबिंहो अपवाद साबित नहीं हुआ जिस के लिए 46 लाख रुपए की राशि कोई खास नहीं. लेकिन चिंता की बात इन खिलाडि़यों का लड़कियों को खिलौना समझ लेना है जिस का एक मनोवैज्ञानिक संबंध खेलों की दुनिया से भी है.

शादीशुदा रोबिंहो जैसे स्टार प्लेयर वर्जनाओं में नहीं रहना चाहते तो न रहें, पर लड़कियों से बल और छलपूर्वक बलात्कार वे करेंगे तो बदनाम खेल की दुनिया भी होती है. इस बाबत अंतर्राष्ट्रीय खेल संघों को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए.

तलाक और कानूनी जाल : क्या विवाह भी एक समझौता मात्र है

सुखेंदु दास और रीता मुखर्जी पतिपत्नी तो थे ही, दोनों न्यायाधीश भी थे. उन का काम दूसरों के मामले सुलझाने का था. पर अफसोस, उन्होंने अपना विवाद सुलटाने में 17 साल लगा दिए और वह भी तब सुलटा जब सुप्रीम कोर्ट ने रीता मुखर्जी की गैरहाजिरी में 24 साल की बेटी के पिता के मां से तलाक होने पर मुहर लगा दी जो 17 वर्षों से अलग रह रही थीं.

उन दोनों का विवाह प्रेमविवाह ही था क्योंकि दोनों ने स्पैशल मैरिज एक्ट में विवाह किया था जिस में या तो भागे हुए प्रेमीप्रेमिका विवाह करते हैं या अलग धर्मों के. 1993 के विवाह से एक बेटी पैदा हुई पर 2000 आने तक दोनों के संबंध में खटास पैदा हो गई और पत्नी घर छोड़ कर चली गईं. सुखेंदु दास ने जज पत्नी के खिलाफ दूसरी अदालत में गुहार लगाई. पर 2009 के फैसले में अदालत ने तलाक नहीं होने दिया.

उच्च न्यायालय ने भी अर्जी खारिज कर दी पर उस अदालत में रीता मुखर्जी न हाजिर हुईं, न उन का वकील आया. तब तक दोनों की नियुक्तियां अलगअलग शहरों में हो रही थीं. 2012 के फैसले में भी उच्च न्यायालय ने तलाक मंजूर नहीं किया जबकि दोनों ही 2000 से अलग रह रहे थे.

सुखेंदु दास को हार कर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा. वहां 2017 में उन्हें न्याय मिला और सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को घर छोड़ना यानी डैजर्शन मान लिया कि पत्नी अदालतों में भी खुद या वकील के माध्यम से पेश नहीं हुई.

तलाक के मामलों में एक पक्ष के जिद पर उतर आने पर मामला, महीनों नहीं, वर्षों तक अदालतों की धूल चाटता रहता है. यह हमारे विवाह कानून की सब से बड़ी ट्रैजिडी है. शायद हमारी अदालतों को लगता है कि तलाक आसानी से दे देंगे तो हिंदू संस्कारों का जनाजा निकल जाएगा जहां विवाह को देवताओं की उपस्थिति में सात जन्मों का बंधक माना जाता है. असल में विवाह भी एक समझौता मात्र है और यदि एक पक्ष न माने तो दूसरा कुछ ज्यादा नहीं कर सकता.

जैसे कुछ घंटों के मंत्रों आदि से विवाह हो सकता है वैसे ही अगर विवाहविच्छेद हो तो कोई हर्ज नहीं. पर सभी अदालतों के दिमाग में शायद रामसीता का उदाहरण रहता है जिस में राम ने अकारण सीता को छोड़ दिया पर दूसरा विधिवत विवाह नहीं किया. अदालतें नरेंद्र मोदी और जसोदाबेन की तरह 2 जनों को उन के विवाह करने की गलती का पछतावा भोगने को मजबूर करती हैं ताकि हिंदू संस्कृति कायम रहे.

जहां झगड़ालू पतिपत्नी समझदार जज हों वहां भी अगर समय पर सही न्याय न मिले तो देश की स्थिति क्या है, यह स्वत: समझा जा सकता है.

धर्मों के स्वार्थी ठेकेदार और लव जिहाद के नाम पर शादियों में अड़चन

लव जिहाद का नाम ले कर शादियों में अड़चनें डालने वाले यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आज से नहीं, सदियों से दूसरी संस्कृतियों, भाषाओं, सीमाओं और धर्मों में विवाह किया जाना असल में समाज को एक नई दिशा देता है. जब अलग संस्कृतियों और देशों के बीच विवाह होते हैं तो बहुत से पुल बन जाते हैं.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के चचेरे भाई इसाओ आबे की पत्नी कल्पना दक्षिण भारतीय हैं जो पहले वाशिंगटन में थीं और अब जापान की पेंट कंपनी कानसाई पेंट में वाइस प्रैसिडैंट हैं. वे अब दोनों देशों के बीच पुल बन रही हैं. श्ंिजो आबे उन की राय भारतीय मामलों तक में लेते हैं.

हमारे कट्टरपंथियों के आदर्श सुभाष चंद्र बोस की आस्ट्रियन पत्नी एमिली शेंकल थीं जिन से सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में विवाह किया था. उन की पुत्री अनीता बोस ने भी एक विदेशी मार्टिन पफ से विवाह किया था.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का बाल विवाह हुआ था पर उन्होंने फिर मंगोल मूल की रूसी एलेना नार्वे नारवेरतोवना कोजेरोवसकाया से शादी की थी. बाद में राहुल ने नेपाली लड़की से भी विवाह किया.

धर्म के दुकानदार यह भी नहीं चाहते कि विधर्मी से विवाह कर के विवाह, बच्चे होने या विवाहित युगल के बच्चों की शादियों के समय मिलने वाली मोटी दक्षिणा उन के हाथ से निकले.

संस्कृति का नाम ले कर जो हल्ला मचाया जा रहा है वह कोरी दुकानदारी है. वैसे तो हिंदू धर्म के सभी ठेकेदार समयसमय पर विदेशों में जा कर विदेशी संस्कृति से दूषित हो गए क्योंकि वे वहां विदेशी नागरिकता प्राप्त भारतीयों को बुला कर हिंदुत्व पर घंटों भाषण देने से कतराते नहीं. बस, उन्हें रहने की सुविधा, आनेजाने का टिकट और मोटी दक्षिणा मिलती रहे. हिंदू संस्कृति के अनुसार तो समुद्र पार करना भी निषेध है.

पहले इस तरह के मामले केवल धर्म की दुकानदारी के नाम पर होते थे पर अब, इसलामी देशों की देखादेखी, धर्म और राजनीति में मिक्सर चल गया है और यह कंक्रीट देश पर थोपी जा रही है. यह कंक्रीट मजबूत तो हो सकती है पर इस पर कुछ उगता नहीं है, न उत्पादन, न सोचविचार.

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