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जियो का ये प्लान है सबसे सस्ता, क्या आपने लिया

रिलायंस जियो ने ‘हैप्पी न्यू ईयर 2018’ औफर के तहत दो प्रीपेड रिचार्ज प्लान लौन्च किए हैं. इनमें एक प्लान 199 रुपए और दूसरा प्लान 299 रुपए का है. लेकिन, जियो के ये औफर्स आपके लिए कितने फायदेमंद है? 199 रुपए में क्या कोई दूसरी कंपनी इतने फायदे देती है. क्या किसी प्लान में आपको इतना सबकुछ फ्री में मिलता है? इसलिए जियो का ये प्लान बाजार का सबसे सस्ता प्लान कहा जा रहा है.

199 रुपए में कितना कुछ?

जियो के 199 रुपए वाले प्लान में 1.2GB डाटा प्रतिदिन मिल रहा है. प्लान की वैलिडिटी 28 दिनों की है. इसमें अनलिमिटेड एसटीडी, लोकल वौइस कौलिंग है. साथ ही एसएमएस बेनिफिट भी जियो ग्राहकों को दिए जा रहे हैं.

299 रुपए में क्या मिलेगा?

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299 रुपए के प्लान में जियो 56GB डाटा दे रहा है. यह प्लान 28 दिनों की वैलिडिटी के साथ आता है. इस औफर में यूजर्स हर रोज 2GB डाटा यूज कर सकते हैं. अनलिमिटेड लोकल और एसटीडी कौलिंग की सुविधा इस प्लान में भी है.

पूरे महीने 33.6 जीबी डाटा

जियो के 199 रुपए के प्लान में हर दिन ग्राहकों को 1.2 जीबी डाटा मिल रहा है. इसकी वैलेडिटी 28 दिन की होगी. इसका मतलब ग्राहकों को पूरे महीने में 33.6 जीबी डाटा मिलेगा. फ्री वौयस कौल के अलावा जियो के अन्य फायदे भी इस रिचार्ज पैक पर मिलेंगे.

2018 में जियो के ये प्लान भी

दो नए प्लान के अलावा जियो के पुराने प्लान में अब भी ग्राहकों के लिए उपलब्ध हैं. कंपनी के 149 रुपए के प्लान में 28 दिन वैधता के अलावा 4 जीबी डाटा मिलता है. यह प्लान उन लोगों के लिए जो डाटा कम खर्च करते हैं. इसके अलावा 399, 459, 499 रुपए के प्लान भी जारी रहेंगे. इन सभी प्लान में रोजाना 1 जीबी डाटा मिलता है.

नए उद्यमियों का आर्थिक भार वहन करेगी सरकार

केंद्रीय सरकार देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने और स्टार्टअप कार्यक्रम को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए उद्यमियों, विशेषकर नए उद्यमियों, को प्रोत्साहित करने के लिए नईनई योजनाओं को लागू कर रही है. देशभर में औद्योगिकीकरण को तेजी से विकसित किया जा सके, इस के लिए प्रधानमंत्री रोजगार योजना प्रोत्साहन के तहत उद्यमियों के अंश में से कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ का दोतिहाई हिस्सा वहन करने का जिम्मा केंद्र सरकार ने खुद ले लिया है.

श्रम एवं रोजगार राज्यमंत्री संतोष गंगवार का कहना है कि इस से नए उद्यमियों पर आर्थिक भार कम होगा. गारमैंट टैक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में उद्यमिता को इस योजना के तहत ज्यादा प्रोत्साहित किया जा सके, इस के लिए उद्यमियों का ईपीएफ का पूरा अंश सरकार ही भरेगी. मंत्री का कहना है कि देश में औद्योगिकीकरण का माहौल बनाने और निवेशकों की मदद एवं प्रोत्साहन के लिए प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना लागू है. इस के तहत नया उद्योग लगाने पर केंद्र सरकार पहले 3 वर्षों तक नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले 12 प्रतिशत अंश के ईपीएफ में से 8.33 प्रतिशत सरकार वहन करेगी, उद्यमी सिर्फ 3.67 प्रतिशत ही अंशदान करेगा.

सरकार के इस कदम से लघु तथा मझोले उद्योग क्षेत्र में प्रवेश करने वाले नए कारोबारियों को मदद मिलेगी और देश में कारोबार करने का माहौल निश्चितरूप से उत्साहजनक होगा. सरकार को इस पहल के साथ ही उन कंपनियों पर भी ध्यान देना चाहिए जिन के नियोक्ता अपने कर्मचारियों का पीएफ जमा नहीं कर पा रहे हैं और इस का खमियाजा बड़ी संख्या में कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है. कर्मचारियों को पैंशन नहीं मिल पा रही है और समय पर उन्हें पीएफ का भुगतान भी नहीं किया जा रहा है.

मजबूत आर्थिक आंकड़ों से बाजार में रही रौनक

गुजरात में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी, राजनीतिक स्तर पर कई तरह के बदलाव तथा अर्थव्यवस्था के अच्छे संकेतों के बीच बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई में उतारचढ़ाव के साथ सूचकांक 8 दिसंबर को 417.30 अंक यानी 1.27 प्रतिशत की साप्ताहिक बढ़त पर रहा जबकि नैशनल स्टौक एक्सचेंज में भी अच्छा माहौल होने से निफ्टी 1.42 प्रतिशत की तेजी यानी 143.85 अंक की साप्ताहिक तेजी पर रहा.  उस से पहले के सप्ताह में बाजार में गिरावट रही लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की समीक्षा में अर्थव्यवस्था के लिए सख्त रुख, निजी सर्वेक्षण आंकड़ों में देश के विनिर्माण क्षेत्र के 13 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंचने, सकल घरेलू उत्पाद के दूसरी तिमाही में मजबूत रहने जैसे आंकड़ों के कारण बाजार में कई दिनों की सुस्ती के बाद रौनक लौटी और बाजार तेजी पर बंद हुआ.

इस से पहले के सप्ताह के दौरान बिकवाली रहने और वैश्विक स्तर पर कमजोर संकेतों के कारण बाजार पर नकारात्मक असर रहा. अमेरिकी राष्ट्रपति के इसराईल की राजधानी के रूप में येरूशलम को मान्यता देने की घोषणा तथा अरब राष्ट्र, जरमनी, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई प्रमुख देशों द्वारा इस घोषणा से तनाव बढ़ने की आशंका जता कर नाराजगी व्यक्त करने का भी बाजार पर नकारात्मक प्रभाव रहा. इस से निवेशकों का उत्साह घटा और सूचकांक 33 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से बहुत नीचे चला गया लेकिन दिसंबर के पहले सप्ताह में अच्छे संकेतों ने बाजार को उत्साहित किया.

बोहेमियन मिजाज के नूर शशि कपूर

अभिनेता शशि कपूर को समझना है तो सिर्फ उन की हिंदी फिल्में या कपूर खानदान के कनैक्शन को समझना काफी नहीं है. उन का काम, कैरियर और व्यक्तित्व कई मानो में इन सब से परे और अलहदा रहा है. उन्हें समझने के लिए आप को अभिनय के हर कैनवास से गुजरना होगा, फिर चाहे वह थिएटर जगत की गलियां हों या फिर हौलीवुड से हो कर ब्रिटिश फिल्मों की ओर जाने वाले इंडिपैंडैंट सिनेमा का चौराहा हो. सिनेमाई सफर के हर एक मील के पत्थरों से शशि कपूर कभी न कभी जरूर गुजरे हैं.

हिंदी दर्शकों के बीच शशि कपूर ‘वक्त’, ‘आ गले लग जा’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘फकीरा’, ‘जबजब फूल खिले’, ‘कन्यादान’, ‘शर्मीली’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’, ‘कभीकभी’ और ‘नमक हलाल’ जैसी फिल्मों में रंग जमाते दिखते हैं तो वहीं सामानांतर सिनेमा के शौकीनों को वे ‘जुनून’, ‘विजेता’, ‘36 चौरंगी लेन’, ‘उत्सव’, ‘न्यू डेल्ही टाइम्स’ जैसे सार्थक व सामाजिक सरोकारी सिनेमा में नजर आते हैं.

इन से इतर पृथ्वी थिएटर के साथ उन का संबंध और योगदान तो एक अलग ही अध्याय है. और इंटरनैशनल या वर्ल्ड सिनेमा में उन की मौजूदगी तो आज भी भारत में पूरी तरह से अंडररेटेड है. उन्होंने 70 -80 के दशक में हौलीवुड से ले कर ब्रिटेन की कई फिल्मों में न सिर्फ लीड रोल किए हैं बल्कि बतौर निर्माता भी जुड़े रहे हैं. बावजूद इस के, आज लोग उन की ‘हाउसहोल्डर’, ‘शेक्सपियर वाला’, ‘बौम्बे टाकीज’, ‘हीट ऐंड डस्ट’, ‘सिद्धार्थ’, ‘जिन्ना’ और ‘इन कस्टडी’ जैसी अंगरेजी फिल्मों से वाकिफ नहीं हैं.

सच तो यह है कि उन को अपने हिस्से की वह सफलता, प्रसिद्धि कभी मिली ही नहीं जिस के वे हकदार थे. हिंदी फिल्मों में उन की सफलता का सारा श्रेय अभिताभ बच्चन के स्टारडम तले दब गया तो वहीं इंटरनैशनल सिनेमा में अपनी मौजूदगी को ले कर उन्होंने कभी हल्ला नहीं मचाया जैसा कि आजकल के अभिनेता किसी अंगरेजी फिल्म में अपने 5 मिनट के रोल को सुर्खियों में लाने के लिए अपना हौलीवुड डैब्यू कह कर प्रचारित करते नहीं थकते हैं.

जेनिफर और थिएटर से जुगलबंदी

पृथ्वी थिएटर को ले कर वे इतने गंभीर थे कि जब पृथ्वीराज कपूर अपना अधूरा सपना छोड़ कर दुनिया से रुखसत हुए तो शशि ने ही अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए थिएटर की स्थापना की, जिस ने रंगमंच की दुनिया के नियम ही बदल डाले. शशि कपूर ने पृथ्वी थिएटर को स्थायी बनाते हुए उसे एक नया आयाम दिया. वैसे, यह उन के पिता का सपना था.

1942 में 150 कलाकारों के घूमंत दल के रूप में पृथ्वी थिएटर शुरू करने वाले पृथ्वीराज कपूर चाहते थे कि इस का एक स्थायी ठिकाना हो. इस के लिए उन्होंने मुंबई में एक प्लौट भी ले लिया था. लेकिन 1972 में उन की मौत हो गई. 1978 में उसी जमीन पर शशि कपूर ने पृथ्वी थिएटर शुरू किया. हिंदुस्तानी रंगमंच को इस संस्था ने और समृद्ध बनाया. यह सब उन्होंने अपनी उसी कमाई से किया जो उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मिलती थी.

थिएटर में उन की जिंदगी की स्क्रिप्ट का एक खास हिस्सा लिखा जाना था, शायद इसीलिए जो काम राज कपूर या शम्मी कपूर को करना चाहिए था वह काम शशि कपूर ने अपने कैरियर के पीक दौर में किया और सफलता भी हासिल की.

दरअसल, थिएटर ग्रुप में शामिल हो कर वे दुनियाभर में घूमे. इसी दौरान उन्हें ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर कैंडल से प्रेम हुआ. 1958 में सिर्फ 20 साल की उम्र में शशि कपूर ने खुद से 3 साल बड़ी जेनिफर से शादी कर ली. कैंडल परिवार इस बेमेल शादी के खिलाफ था. लेकिन शम्मी कपूर की पत्नी गीता बाली ने अपने देवर की शादी के लिए बात आगे बढ़ाई और इस तरह दोनों की शादी हो गई.

हालांकि, उन की इस स्क्रिप्ट में ट्रेजिडी ही लिखी थी, सो, मात्र 26 साल की उम्र में जेनिफर ने उन का साथ छोड़ दुनिया को अलविदा कह दिया. वैसे शशि और जेनिफर की इस पहल से कई प्रतिभाशाली कलाकार निकले. फिलहाल, इस की कमान उन के बेटे कुणाल कपूर के हाथ में है.

अवसाद से सार्थक सिनेमा की ओर

सही माने में उन का अभिनय की दुनिया से मन तभी से उठ गया था जब से जेनिफर ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. उस के बाद वे सदमे में रहे और एकाकी जीवन अपना लिया. इस दौरान उन की सेहत भी बिगड़ी और मोटापे के चलते उन्हें वे फिल्में भी नहीं मिलीं जो उन से ज्यादा उम्र के अभिनेताओं को मिल रही थीं. उन्होंने अपने बेटों के साथ कुछ अच्छी और सार्थक फिल्मों का निर्माण किया और आर्ट फिल्मों के मैदान में बतौर अभिनेता व निर्माता सक्रियता दिखाई और नुकसान के बावजूद अच्छे कंटैंट के सिनेमा को प्रोत्साहित किया. व्यावसायिक सिनेमा के बड़े स्टार शशि कपूर का मन समानांतर सिनेमा में लगा तो वे फिल्म निर्माता की भूमिका में आ गए. अपने प्रोडक्शन हाउस फिल्मवाला के तहत उन्होंने श्याम बेनेगल के साथ ‘जुनून’ बनाई, गोविंद निहलानी के साथ ‘विजेता’, अपर्णा सेन के साथ ‘36 चौरंगी लेन’ और फिर गिरीश कर्नाड के साथ ‘उत्सव’. 1979 में ‘जुनून’ के लिए उन्हें बतौर निर्माता राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. 1986 में आई ‘न्यू डेल्ही टाइम्स’ में अपने अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 2011 में शशि कपूर पद्मभूषण से नवाजे गए.

कपूर पदार्पण

कपूर खानदान में यह अलिखित, अघोषित संवैधानिक नियम सा बन गया था कि परिवार का हरेक सदस्य फिल्मों में पदार्पण जरूर करेगा. फिर भले ही असफलता मिलने पर बाद में वह किसी और क्षेत्र में चला जाए. कोशिश यही रहती थी कि कपूर परिवार कला के विभिन्न आयामों से किसी न किसी तरह जुड़ा रहे. शायद इसीलिए अंगरेजीदां शशि अलग मिजाज के होने के बावजूद फिल्मों में पदार्पित हुए और जब उन के बेटों कुणाल और करन कपूर को अपने विदेशी लुक्स के चलते फिल्मों में अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली तो उन्होंने एड वर्ल्ड और थिएटर की दुनिया में कामयाबी हासिल की.

उन के कैरियर के पदार्पण की बात करें तो 18 मार्च, 1938 को कोलकाता में जन्मे शशि कपूर ने बड़े भाई राजकपूर की फिल्मों ‘आग’ और ‘आवारा’ से अभिनय के मैदान में अपने पांव रख दिए थे. ‘आवारा’ में उन्होंने राजकपूर के बचपन की भूमिका निभाई थी. चूंकि यह भूमिका बाल कलाकार के तौर पर अभिनीत की गई थी, इसलिए उन का डैब्यू एक मुख्य अभिनेता के तौर पर 1961 में फिल्म ‘धर्मपुत्र’ से माना जाता है. यह  यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी दूसरी फिल्म थी. अपने समय से काफी आगे के विषय वाली इस फिल्म में हिंदूमुसलिम दंगे और सियासत जैसे संवेदनशील विषय पर दिलचस्प कहानी बुनी गई थी.

बहरहाल, इस के बाद उन्होंने कई यादगार फिल्में कीं. ‘जबजब फूल खिले’, ‘कन्यादान’, ‘फकीरा’, ‘शर्मीली’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘दीवार’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘त्रिशूल’, ‘कभीकभी’ और ‘नमक हलाल’ में उन की भूमिकाएं हमेशा के लिए दर्शकों के जेहन में बस गईं.

करीब 116 से भी ज्यादा फिल्मों में अभिनय के दौरान उन्होंने इतना ज्यादा काम किया कि उस समय के सब से व्यस्ततम  ऐक्टर बन गए थे और घर पर दिखने के बजाय हमेशा फिल्मों के सैट पर ही दिखते तो परेशान हो कर भाई राजकपूर ने उन का नाम टैक्सी रख दिया जो हमेशा बुकिंग के लिए रेडी रहती थी.

अमिताभ के साथ उन की जोड़ी सुपरहिट रही. इन दोनों कलाकारों ने एकसाथ 12 फिल्मों में काम किया है. इन में ‘दीवार’, ‘सुहाग’, ‘त्रिशूल’ और ‘नमक हलाल’ सुपरहिट रहीं. उन का मशहूर ‘मेरे पास मां है…’ वाला डायलौग ‘दीवार’ फिल्म का ही था.

एक रास्ता है जिंदगी…

अपनी जिंदगी के तमाम उतारचढ़ाव, सुखदुख के बीच शशि कपूर ने शो मस्ट गो औन वाले फलसफे को चरितार्थ करते हुए काम करना जारी रखा. खुद पर ही फिल्माए गए एक गीत ‘एक रास्ता है जिंदगी, जो थम गए तो कुछ नहीं…’ की तर्ज पर वे 79 साल की उम्र में 4 दिसंबर, 2017 को इस दुनिया से कूच कर गए. मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में उन के निधन के साथ फिल्म इंडस्ट्री के एक युग का भी अंत हो गया है.

खास यादें

शशि कपूर का असली नाम बलबीरराज कपूर रखा गया था.

शशि कपूर फिल्म सिद्धार्थ (1972) में सिमी ग्रेवाल के साथ न्यूड सीन को ले कर विवादों में रहे.

शशि कपूर को 3 बार नैशनल अवार्ड मिले हैं. 1979 में फिल्म ‘जुनून’ को बैस्ट फीचर फिल्म के लिए, 1986 में फिल्म ‘न्यू डेल्ही टाइम्स’ के लिए बैस्ट ऐक्टर का नैशनल अवार्ड और 1994 में फिल्म ‘मुहाफिज’ के लिए स्पैशल ज्यूरी अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया.

2014 में उन्हें दादासाहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया.

शशि कपूर को 2011 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया.

शशि कपूर अपने बड़े भाई राजकपूर और सत्यजीत रे के बड़े प्रशंसक थे.

शशि कपूर व अमिताभ बच्चन ने करीब 12 फिल्मों में काम किया. दोनों ने पहली बार ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में साथ काम किया था.

1991 में शशि कपूर ने पहली बार निर्देशन में हाथ आजमाया. उन के निर्देशन में बनी ‘अजूबा’ फिल्म में  अमिताभ बच्चन ने मुख्य किरदार निभाया था.

हिंदी सिनेमा के पहले इंटरनैशनल स्टार

शशि कपूर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले भारत के शुरुआती अभिनेताओं में से एक थे. उन्होंने कई ब्रिटिश और अमेरिकन फिल्मों में काम किया. इन में ‘हाउसहोल्डर’ (1963), ‘शेक्सपियर वाला’ (1965), ‘बौंबे टाकीज’ (1970), तथा ‘हीट ऐंड डस्ट’ (1982) शामिल हैं. ‘सिद्धार्थ’ (1972) व ‘मुहाफिज’ (1994) में भी उन की भूमिकाएं सराही गईं. 90 के दशक में गिरती सेहत की वजह से शशि कपूर ने फिल्मों में काम करना लगभग बंद कर दिया था. 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिन्ना’ उन के सिने कैरियर की अंतिम फिल्म थी. ब्रिटेन और पाकिस्तान में प्रदर्शित इस फिल्म में उन्होंने सूत्रधार की भूमिका निभाई थी.

शबाना के क्रश थे शशि

संगीत के शौकीन शशि कपूर को म्यूजिक इंसट्रूमैंट बजाना बहुत पसंद था. खाली समय में संगीत सुनते थे और फिल्म देखते थे. उन की पसंदीदा, उन के साथ कई फिल्मों में काम कर चुकी अभिनेत्री और समाजसेवी शबाना आजमी ने एक इंटरव्यू के दौरान माना था कि उन्हें शशि कपूर पर क्रश था. इतना ही नहीं, उन के चलते एक बार शशि कपूर की शादी में भी दरार आने लगी थी. वैसे दोनों की जोड़ी परदे की सुपरहिट जोडि़यों में से एक थी. संयोगवश उन की आखिरी फिल्म ‘इन कस्टडी’ में उन के साथ शबाना आजमी ही थीं. दोनों ने ‘फकीरा’ फिल्म में पहली बार साथ काम किया था. यह भी इत्तफाक है कि 2015 में जब उन्हें दादासाहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया, तब भी उन के साथ कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन,  श्याम बेनेगल, रमेश सिप्पी, हेमा मालिनी के साथ उन के सब से करीब शबाना आजमी ही खड़ी थीं.

बौलीवुड ही मेरा घर है : अली फजल

अपनी मौजूदा कामयाबी की शुरुआत के पहले की कहानी बताते हुए अली फजल कहते हैं, ‘‘बचपन से ही मुझे अभिनय का शौक रहा है. स्कूल की पढ़ाई के साथ ही मैं थिएटर करने लगा था. मैं ने कालेज पहुंचते ही विज्ञापन फिल्में करनी शुरू कर दी थीं. जब मैं कालेज में पढ़ाई कर रहा था, तब मैं ने पहली बार फिल्म में अभिनय किया था. जब राज कुमार हिरानी फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ का निर्देशन करने जा रहे थे, तभी उन्होंने मेरा एक नाटक देखा और फिर उन्होंने मुझे फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ में लोबो का किरदार निभाने का मौका दिया. फिल्म ‘थ्री इडिएट्स’ में छोटी सी भूमिका करने के बाद धीरेधीरे अच्छे किरदार मिले, फिर हीरो बन गया. फिर हौलीवुड फिल्म ‘फास्ट ऐंड फ्यूरियस 7’ और ‘विक्टोरिया ऐंड अब्दुल’ से कैरियर सही दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. कुछ फिल्मों में लीड रोल कर रहा हूं.’’ हालांकि हौलीवुड फिल्मों में सक्रिय अली बौलीवुड को ही अपना घर व कर्मभूमि मानते हैं.

अपने अगले प्रोजैक्ट को ले कर अली बताते हैं, ‘‘करण अंशुमान के निर्देशन में एक वैब सीरीज ‘मिर्जापुर’ कर रहा हूं, जिस में मेरे साथ रसिका दुग्गल व विक्रांत मैसे हैं. इस वैब सीरीज का निर्माण फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी कर रहे हैं. फिल्म की कहानी उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके की पृष्ठभूमि पर है. इस में मैं उत्तर भारत के गैंगस्टर का किरदार निभा रहा हूं. इस की ज्यादातर शूटिंग मिर्जापुर में हुई है. कुछ हिस्सा मुंबई में फिल्माया जा रहा है. जल्दी ही यह फिल्म पूरी हो जाएगी. इस के अलावा आनंद एल राय की 2016 में आई फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी’ की सीक्वल ‘हैप्पी भाग जाएगी रिटर्न’ कर रहा हूं.’’

वैब सीरीज के बढ़ते चलन को ले कर वे कहते हैं, ‘‘वैब सीरीज को नजरअंदाज नहीं कर सकते. यह तूफान है, जो तेजी से आगे बढ़ रहा है. हर वैब सीरीज में सैक्स ही परोसा जा रहा है. पर वैब सीरीज में मिश्रित कंटैंट ही दिखेंगे. मैं ने पहले भी यशराज फिल्मस की एक वैब सीरीज ‘बैंड बाजा बरात’ समेत कई शौर्ट फिल्में की हैं.’’

अपनी व्यक्तिगत जिंदगी को ले कर अली बताते हैं, ‘‘निजी जिंदगी को ले कर चर्चा करना पसंद नहीं करता. पर मैं अपने किसी रिश्ते को छिपाने में भी यकीन नहीं करता. रिचा चड्ढा से हमारी दोस्ती है, जो समय के साथ पक्की होती चली गई. लोगों के लिए इसे प्यार का नाम देना बड़ा आसान है. प्यार का अर्थ होता है एकदूसरे में खो जाना. हम उम्मीद कर रहे हैं कि हम कहीं न कहीं उस के करीब पहुंच रहे हैं. हमारे बीच जो भी रिश्ता है, उस को ले कर हम काफी खुश हैं.’’

अपनी फिटनैस को ले कर उन का मानना है, ‘‘मैं नियमितरूप से ‘किक बौक्ंसग’ करता हूं. किक बौक्ंसग मुझे शारीरिक और मानसिकरूप से चुस्तदुरुस्त रखती है. इस के अलावा मेरी सुबह उठने की आदत है. सुबह 6 बजे उठ कर बौक्ंिसग की कोचिंग लेता हूं. मेरी राय में सुबहसुबह जो वर्कआउट किया जाता है, वही शरीर व सेहत के लिए सही होता है.’’

बराबरी की होड़ : अमेरिका की जगह लेने की तैयारी में है चीन

चीन अब अमेरिका की जगह लेने की तैयारी में है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका फर्स्ट के नाम पर अपना दखल दूसरे देशों में कम कर रहे हैं, जबकि चीन बढ़ा रहा है. इस का असर भारत पर भी पड़ेगा. अमेरिका ने एच1बी1 वीजा को सख्त बना कर करीब 40,000 भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका में जा कर नौकरी पाने के मौके खत्म कर दिए हैं.

अमेरिका ने अपनी आईटी कंपनियों से कह दिया है कि  जहां भी दूसरे देशों से आए लोग काम कर रहे हैं उन्हें निकाल कर केवल अमेरिकियों को रखा जाए चाहे वे महंगे हों, आलसी हों या उतने योग्य न हों. यह ठीक वैसे ही है जैसे मुंबई में शिवसेना बीचबीच में फरमान जारी कर देती है कि महाराष्ट्र में टैक्सियां, आटो सिर्फ मराठी चलाएंगे, बिहारी या पंजाबी नहीं. शिवसेना का जन्म दक्षिण भारतीयों के खिलाफ बाल ठाकरे के गुस्से से हुआ था पर आज 40 साल बाद भी हाल वही है.

अमेरिका ने अपने पुराने दोस्त पाकिस्तान से हाथ खींचने की तैयारी कर ली है. भारत को इस पर खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि चीन उस की जगह लेने को तैयार है. भारत जल्दी ही नेपाल, भूटान, म्यांमार और पाकिस्तान में चीन की भारी मौजूदगी पाएगा. अगर चीन को कभी भारत को डराना हो तो उस के लिए यह बाएं हाथ का काम होगा और भारत अब 1962 की तरह अमेरिका के आगे बचाओबचाओ की गुहार भी न लगा सकेगा.

भारत की सरकार फिलहाल खुश है कि मुसलिम देशों के अमेरिका जाने वालों पर डोनाल्ड ट्रंप रोकटोक लगा रहे हैं पर, वह यह भूल रही है कि अमेरिका तो अपना बचाव चीन, रूस, मुसलिम देशों से कर सकता है क्योंकि वह अमीर है, बेहद अमीर.

चीन फिलहाल पाकिस्तान से गुजरता रेल व सड़क रास्ते बना रहा है ताकि चीनी माल खाड़ी के देशों में जल्दी पहुंच जाए. वहीं, इस रास्ते से चीनी टैंक भी पाकिस्तान के रास्ते पंजाब व राजस्थान पहुंच सकते हैं. चीन माउंट एवरैस्ट में छेद कर तिब्बत से नेपाल तक सुरंग का रास्ता बना रहा है ताकि इन देशों से लेनदेन बढ़ सके. वहीं, इस सुरंग से चीनी सैनिक भी आ सकते हैं.

ऐसे में भारत की हालत अजीब होगी. हम से तो अपना देश ही नहीं संभलता. देशरक्षा के नाम पर हम झंडा लहराते हैं, हल्ला मचाते हैं या सच दिखाने वाले

को देशद्रोही कह कर चुप करा देते हैं. अमेरिका की नई नीति, चीन का उस की जगह लेना, चीन को अपना दुश्मन बनाना हमें महंगा पड़ेगा. मंगोल मुगलों ने अरसे तक भारत पर राज किया है. क्या यह दोहराया जाएगा?

अंधविश्वास, पूजापाठ और धर्म की राजनीति से मुक्ति दिला पाएंगे राहुल गांधी

राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष पद दे दिया गया है और सोनिया गांधी ने रिटायरमैंट सी ले ली है. कांग्रेस काफी समय से असमंजस में थी. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद जब तक नेहरू परिवार की सोनिया गांधी मैदान में न कूदी थीं, कांग्रेस  बिना इंजन के जहाज की तरह राजनीतिक लहरों पर तैर रही थी. 1998 में सोनिया गांधी के आने से उसे नई जान मिली थी.

2014 में भारतीय जनता पार्टी की जीत के पीछे सोनिया गांधी का बीमार होना और राहुल गांधी का उदासीन रहना रहा है. कांग्रेस इन के स्थान पर किसी नेता को उभार नहीं पाई. 2017 के आखिर में आखिरकार राहुल गांधी ने कांग्रेस को संभालने का जिम्मा ले ही लिया. राहुल के अध्यक्ष पद संभालने पर कांग्रेसियों ने उत्साह दिखाया तो इसीलिए कि उन्हें एक नेता तो मिला. कांग्रेस में राहुल गांधी के अलावा जो नेता हैं, वे वक्ता ज्यादा हैं, मेहनती कम. उन में से ही मणिशंकर अय्यर हैं जिन्होंने अपनी जबान से फिसले 4 शब्दों के चलते कांग्रेस को 2 बार बेहद नुकसान पहुंचाया.

कांग्रेस वंशवाद की शिकार है, यह अफसोस की बात है पर यही सवाल देश की अन्य पार्टियों से किया जा सकता है. देश में इक्कादुक्का पार्टी ही सफल हैं

जो वंशवाद की शिकार नहीं हैं. भाजपा चाहे हजार बार कह ले कि वह वंशवाद को नहीं मानती पर असल में उस के अधिकांश छोटे नेता दूसरीतीसरी पीढ़ी के पारिवारिक व पेशेवर नेता ही हैं. जब तक नरेंद्र मोदी जैसे कर्मठ नेता नहीं उभरे, भाजपा दूसरे दरजे की पार्टी ही रही, कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह.

राहुल गांधी ने गुजरात को जिस तरह हिला कर रखा उस से कांग्रेसियों में उन पर व अपने पर भरोसा बढ़ा है और वे हर जगह जम कर अब अपनी पहचान बनाएंगे. कांग्रेस को समाप्त मानने वालों के लिए यह चाहे अशुभ हो पर कांग्रेसियों के लिए राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना एक मरती पार्टी में नई जान फूंकेगा, यह पक्का है.

राहुल गांधी ने गुजरात के चुनावों के दौरान बड़े उद्योगपतियों पर जम कर प्रहार किया है और छोटे व्यापारियों, किसानों, मजदूरों का पक्ष लिया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि विपक्षी नेता के रूप में वे क्रोनी कैपिटलिज्म के खिलाफ खड़े रहेंगे.

अंधविश्वासों, पूजापाठ और धर्म की राजनीति से राहुल गांधी मुक्ति दिला पाएंगे, इस की उम्मीद तो कम है पर वे धर्म की आग में देश को पकाएंगे, यह डर तो नहीं है.

रहने दो इन सवालों को : भाग 1

‘भाइयो और बहनो, मैं अदना सा गगन त्रिपाठी, महान बांदा जिले के लोगों का अभिवादन करता हूं. यहां राजापुर गांव में गोस्वामी तुलसीदास ने जन्म ले कर देश के इस हिस्से की धरती को तर दिया था. वहीं, यह जिला मशहूर शायर मिर्जा गालिब का कितनी ही बार पनाहगार रहा है. उसी बांदा जिले के बाश्ंिदों को अच्छेबुरे की मैं क्या तालीम दूं? वे खुद ही जानते हैं कि इस जिले का समुचित विकास कौन कर सकेगा, हिंदूमुसलिम एकता को बरकरार रख दोनों की तहजीबों को कौन सही इज्जत देगा, यमुना को प्रदूषण से कौन बचाएगा, केन नदी की धार को कौन फसलों की उपज के बढ़ाने के काम में लाएगा. कहिए भाइयोबहनो, कौन करेगा ये सब?’

गगन चीरने वाले नारों के बीच गगन त्रिपाठी का चेहरा दर्प से दमकने लगा. सभी ऊंची आवाजों में दोहरा रहे थे, गगन त्रिपाठी जिंदाबाद, लोकहित पार्टी जिंदाबाद.

भीड़ में पहली लाइन की कुरसी पर बैठा 13 साल का मृगांक पिता के ऊंचे आदर्शों और महापुरुषों से संबंधित बातों को अपने जज्बातों में शिद्दत से पिरो रहा था. वह पिता गगन त्रिपाठी के संबोधनों और भाषणों से खूब प्रेरित होता है. अकसर उन के भाषणों में गांधी, ज्योतिबा फूले और मदर टेरेसा का जिक्र होता, वे इन के कामों की प्रशंसा करते, लोगों से उन सब की जीवनधारा को अपनाने की अपील करते.

बांदा जिले के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से है मृगांक. उस के दादाजी पुलिस विभाग में अफसर थे. मृगांक के पिता गगन त्रिपाठी को नौकरी में रुचि नहीं थी.

गगन त्रिपाठी के होने वाले ससुरजी की राजनीतिक पैठ के चलते मृगांक के दादा के पास उन का आनाजाना लगा रहता, सरकारी अफसरशाही से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश.

इधर, पिता के अफसरी अनुशासन की वजह से गगन त्रिपाठी अपने पिता से कुछ खिंचे से रहते. घर आतेजाते भावी ससुरजी को गगन में उन का पसंदीदा राजनीतिज्ञ नजर आया. उन्होंने देर किए बिना, गनन त्रिपाठी के पिता को मना कर अपनी बेटी की घंटी गगन के गले में बांध दी और उस के फुलटाइम ट्रेनर हो गए. समय के साथ राजनीति में माहिर होते गगन त्रिपाठी विधायक बन गए. साल गुजरे. बेटी हुई, 18 साल की उस के होते ही दौलतमंद व्यवसायी के साथ उस की शादी कर दी. पारिवारिक मर्यादा अक्षुण्ण रखने के लिए उसे 10वीं से ज्यादा नहीं पढ़ाया गया.

अभी बड़ा बेटा 27 वर्ष का था, पिता की राजनीति में विश्वस्त मददगार और भविष्य का राजनीतिविद, पिता की नजरों में कुशल और उन के दिशानिर्देशों के मर्म को समझने वाला. बड़े बेटे की पढ़ाई कालेज की यूनियन और राजनीतिक चुनावों के गलियारों में ही संपन्न हो गई.

मृगांक अभी 23 वर्ष का था, पढ़ाई, खेलकूद में अव्वल, विरोधी किस्म के सवाल खड़े करने वाला, कम शब्दों में गहरी बातें कहने वाला, मां का लाड़ला, पिता की दुविधा बढ़ाने वाला.

मृगांक के स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गगन त्रिपाठी की ओर से उस पर कलैक्टर बनने का जोर आ पड़ा. घरभर में इस बात की चर्चा दिनोंदिन जोर पकड़ रही थी. एक दिन पिताजी की ओर से मृगांक के लिए बुलावा आया. बुलावे

का अर्थ मृगांक भलीभांति समझ रहा था. 2 मंजिले पुश्तैनी मकान के बीचोंबीच संगमरमरी चबूतरा, आंगन में कई सारे पौधे लगे थे. गगन त्रिपाठी नाश्ते से निवृत हो आंगन में रखी आरामकुरसी पर बैठे थे. सुबह 9 बजे का वक्त था. 55 वर्ष की उम्र, गोरा रंग धूप में ताम्रवर्ण, कदकाठी ऊंची और बलिष्ठ, खालिस सफेद कुरता, चूड़ीदार पजामे पर भूरे रंग का जैकेट. वे तैयार बैठे थे, कहीं निकलना था, शायद.

मृगांक सामने आ खड़ा हुआ. पिता के प्रति सम्मान और अबोला डर था लेकिन हृदय में पिता की सात्विकता और आदर्श को ले कर बड़ा गहरा विश्वास था. इस के पहले पिता से जब भी उस की बातें होतीं, वे अकसर उस की पढ़ाई व सेहत की बेहतरी के साथ बड़ा आदमी बनने की नसीहत देते. आज उस के भविष्य के स्वप्नों की जिरह थी. पिता की सुननी थी, अपनी कहनी भी थी. उस ने पिता की नजरों में देखा.

पिता के आसन से गगन त्रिपाठी बोले, ‘‘तो आप कलैक्टर बनने की तैयारी को ले कर क्या फैसला ले रहे हैं? आप पढ़ने में अच्छे हैं. हम उम्मीद लगाए हैं कि आप कलैक्टर बन कर हमारी पार्टी और परिवार का भला करेंगे. पुरानी पार्टी हम ने छोड़ दी है. अब हमारी अपनी पार्टी को सरकारी बल चाहिए. आप का इस बारे में न कहना हम पसंद नहीं करेंगे.’’

मंच के भाषण और पत्रकारों के जवाबों से अलग यह सुर मृगांक को अवाक कर गया. क्या अलग परिस्थितियों में राजनेता की सोच अलगअलग होती है? वास्तव में कौन है-पिता या गगन त्रिपाठी? या कि पिता का वास्तविक रूप यही है जो अभीअभी वह देख रहा है. सफल होना और सार्थक होना दोनों अलग बातें हैं, क्यों नहीं लोग सार्थक होने की भी पहल करें. मृगांक के दिल में आंदोलन के तूफान उठने शुरू हुए. वह स्थिर और भावहीन खड़ा रहा फिर भी.

पिता ने आगे कहा, ‘‘बेटा ऐसा हो जो पिता का सहारा बने. जैसा कि आप के अंदाज से लग रहा है, आप अपने मन की करना चाहते हैं. ऐसा है, तो आप को मुझ से सचेत रहना चाहिए.’’

टे के रूप में जिस गगन त्रिपाठी ने खुद के पिता की इच्छाओं को किनारे कर दिया, अब मृगांक के लिए उन की बातें कुछ और ही थीं. विशुद्ध राजनीतिज्ञ की तरह एक पिता कहता गया, ‘‘मेरे लोग कई बार आप के बारे में खबर दे चुके हैं कि बिना सोचेसमझे आप लोगों के बीच संत बने फिरते हैं. दूसरे वार्डों, तहसीलों में उन लोगों की मदद कर आते हैं जिन्होंने दूसरी पार्टी के लोगों को जिताया. समझ रहे हैं मेरी बात आप?’’

यह पहला अवसर था जब वह पिता को भलीभांति समझने का प्रयास कर रहा था. इस के पहले वह जो देखतासुनता आया था, गहरे विश्वास की लकीर पर चल कर फकीर बना बैठा था. मृगांक कितना भी कोमल हृदय क्यों न हो, था तो खानदानी पूत ही. वह सख्त हुआ. यह बात और थी कि इस अड़े हुए घोड़े को वह कौन सी दिशा दे.

विनम्रता में भी उस ने ठसक नहीं छोड़ी, कहा, ‘‘पिताजी, मैं जो भी सोचता हूं कुछ सोचसमझ कर ही. आप की सलाह मैं ने सुन ली है. अगर मैं कलैक्टर बन भी जाता हूं तो सिवा न्याय और सचाई के, किसी को नाजायज लाभ न दे पाऊंगा. कानों में मेरे न्याय के लिए चीखते लोगों की गूंज होगी तो मैं उन्हें अनसुना कर के न खुद ऐयाशी कर सकता हूं, न दूसरे को ऐयाशी करने में मदद कर सकता हूं.’’

अचानक क्रोध से फट पड़े गगन त्रिपाठी. उन्होंने कहा, ‘‘अरे मूर्ख सम्राट, जो आदर्श का पाठ मैं पढ़ाता रहा हूं, वह राजनीति की बिसात थी. शिकार के लिए फैलाए दानों को तो तू ने भूख का इलाज ही बना लिया. दूर हो जा मेरे सामने से. जिस दिन दिमाग ठिकाने आए, मेरे सामने आना.’’

आराम से सभ्य शब्दों में बातें करने वाले, लोगों को पिघला कर मक्खन बनाने वाले गगन त्रिपाठी बेटे की बातों से इतने उतावले हो चुके थे कि उन की लोकलुभावन बाहरी परत निकल गई थी. वे असली चेहरे के साथ अब बाहर थे. क्यों न हो, यह तो आस्तीन में ही सांप पालने वाली बात हो गई थी न.

राजनीति की इतनी सीढि़यां चढ़ने में उन के दिमाग के पुरजेपुरजे ढीले हो गए थे. और फिर सशक्त खेमे वाले विरोधियों को पछाड़ कर ऊंचाई पर बने रहने की कूवत भी कम माने नहीं रखती.

इधर एक भी ईंट भरभरी हुई, तो पूरी मीनार के ढहने का अंदेशा हो जाता है. बेटे तो नींव की ईंटें हैं, चूलें हिल जाएंगी. यह अनाड़ी तो बिना भविष्य बांचे दरदर लोगों की भलाई किए फिरता है. दिमाग ही नहीं लगाता कि जहां भलाई कर रहा है वहां फायदा है भी या नहीं. न जाति देखता, न धर्म, न विरोधी पार्टी, न विरोधी लोग. कोई भेदविचार नहीं. सत्यवादी हरिश्चंद्र सा आएदिन सत्य उगल देता है जो अपनी ही पार्टी के लिए खतरे का सिग्नल बन जाता है. सो, क्यों न इस लड़के को यहां से निकाल कर इलाहाबाद भेज दिया जाए. कम से कम इस से उस का भला हो न हो, पार्टी को नुकसान तो कम होगा. ऐसे भी इस लड़के के आसार सुख देने वाले तो लगते नहीं.

काफीकुछ भलेबुरे का सोच गगन त्रिपाठी बेटे मृगांक को आईएएस की तैयारी करने के लिए इलाहाबाद छोड़ आए. जिस के पंख निकले ही थे दूसरों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए, वह क्या दूसरों के पंख कुतरेगा खुद की भलाई के लिए?

मृगांक इलाहाबाद में भी अपने ही तौरतरीकों में रम गया. इतिहास में पीएचडी करते हुए विश्वविद्यालय में ही प्रोफैसर हो गया. आईएएस की कोचिंग से निसंदेह उस में ज्ञान के प्रति ललक बढ़ी थी और मानव जीवन के प्रति जिज्ञासा भी. लिहाजा, सामाजिक कार्यों की उस की फेहरिस्त बड़ी लंबी थी. 29 वर्ष की अवस्था में वह 700 मुकदमे लड़ रहा था जो उपभोक्ता संरक्षण से ले कर सड़क परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा की अनदेखी, शिक्षा के गिरते स्तरों में प्राइवेट स्कूलों की उदासीनता और सरकारी स्कूलों में लापरवाही तथा देहव्यापार में लिप्त लोगों को कानूनी दायरे में ला कर सजा दिलवाने व इस व्यापार में लगी मासूम बच्चियों के संरक्षण वगैरा के मामले थे.

संजय दत्त पर आधारित बायोपिक फिल्म 30 मार्च को नहीं होगी रिलीज

फिल्म निर्देशक राज कुमार हिरानी लंबे समय से संजय दत्त की बायोपिक फिल्म के निर्माण से जुडे़ हुए हैं. इस फिल्म का निर्माण बड़ी मुश्किलों से शुरू हुआ. जिसमें संजय दत्त का किरदार रणबीर कपूर निभा रहे हैं. इसके अलावा इस फिल्म में अदिति सियाल,अनुष्का शर्मा, करिश्मा तन्ना, मनिषा कोईराला, जिम सर्भ, परेश रावल व विक्की कौशल भी अभिनय कर रहे हैं.

सूत्रों का दावा है कि परफैक्शन के लिए मशहूर राज कुमार हिरानी इस फिल्म को एकदम यथार्थ के करीब बना रहे हैं. अब तक राज कुमार हिरानी की तरफ से इस फिल्म को 30 मार्च को सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की योजना थी.

लेकिन इस फिल्म से जुड़े सूत्रों पर यकीन किया जाए तो यह फिल्म किसी भी सूरत में अगस्त माह से पहले प्रदर्शित नहीं हो पाएगी. इसकी मूल वजह यह है कि अभी तक इसकी शूटिंग पूरी नहीं हुई है. इस बीच रणबीर कपूर अपने दोस्त अयान मुखर्जी की फिल्म ‘‘ब्रम्हास्त्र’’ की शूटिंग करने के लिए इजराइल पहुंच गए हैं. सूत्र दावा कर रहे हैं कि अब रणबीर कपूर मार्च माह में ही वापस आएंगे.

फिलहाल इस मामले में कोई कुछ भी आधिकारिक रूप से बोलने को तैयार नहीं है.

जल्दी करे अपने सिंम को आधार से लिंक, इन कंपनियों ने शुरू की सेवा

आपके मोबाइल नंबर को आधार कार्ड से लिंक करना अब और भी आसान हो गया है. अब आप घर बैठे अपने मोबाइल नंबर को आधार नंबर से लिंक कर सकते हैं. केन्द्र सरकार के एक आदेश के मुताबिक ऐसा करना जरूरी है. आपके मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करने की आखिरी तिथि 31 मार्च 2018 है.

आधार को मोबाइल से लिंक करने के लिए सबसे पहले आपको 14546 पर फोन करना होगा. ऐसा करने से पहले आप अपने आधार नबंर और मोबाइल को तैयार रखें. सरकार ने इस लिंकिंग प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए इंटरएक्टिव वायस रिस्पौन्स (IVR) सर्विस शुरू किया है, ताकि लोग घर बैठे ही यह काम कर सकें.

इससे पहले सभी मोबाइल कस्टमर को लिंकिंग प्रक्रिया पूरी करने के लिए टेलिकौम औपरेटर के सर्विस सेंटर में जाना पड़ता था. एयरटेल, आइडिया, वोडाफोन ने इस प्रक्रिया की शुरुआत कर दी है. रिलायंस जिओ और बीएसएनएल भी इस प्रक्रिया की शुरुआत जल्द करने वाले हैं.

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घर बैठे आधार को मोबाइल नंबर से कैसे लिंक करें?

  • सबसे पहले अपने फोन नंबर से 14546 पर फोन करें.
  • आपसे पूछा जाएगा आप भारतीय हैं अथवा NRI, सही औप्शन का चयन करें.
  • इसके बाद आधार और मोबाइल को लिंक करने के लिए आपकी अनुमति ली जाएगी.
  • आप अपने मोबाइल पर 1 दबाकर अपनी सहमति दे सकते हैं.
  • इसके बाद आपको 12 अंकों का आधार नंबर मोबाइल पर दर्ज करना होगा.
  • एक बार फिर से 1 दबाकर इसे कंफर्म करें.
  • इसके बाद एक वन टाइम पासवर्ड OTP आपको भेजा जाएगा.
  • इसके बाद IVR प्रक्रिया के तहत आपको अपने मोबाइल औपरेटर को आपके डाटा को इस्तेमाल करने की अनुमित देनी होगी.
  • इसके तहत आपका नाम, फोटो, जन्मदिन जैसे रिकौर्ड का इस्तेमाल किया जाएगा.
  • अगली कड़ी में IVR आपके मोबाइल नंबर को कंफर्म करेगा.
  • इसे कंफर्म करने के बाद आपसे OTP डालने के लिए कहा जाएगा.
  • OTP डालने के बाद आपको 1 दबाना होगा.
  • खुशखबरी, आपका आधार आधारित मोबाइल नंबर वेरीफिकेशन की प्रक्रिया पूरी हो गई है.

प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपको एक बार फिर मैसेज आता है कि वेरीफिकेशन पूरा हो गया है, इस पूरी प्रक्रिया में 48 घंटे का समय लग सकता है. आपको बता दें कि IVR सर्विस हिन्दी, अंग्रेजी समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है.

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