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समय के साथ बदल रहा है कट्टरवादी सऊदी अरब

सऊदी अरब का नाम सुनते ही एक ऐसे देश की छवि उभरती है जहां पिछड़ापन, हिंसा और भेदभाव का बोलबाला है. लेकिन अब यहां सुधार हो रहे हैं और इन सुधारों की वजह है सऊदी अरब के युवराज प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. अब तक की उत्तराधिकार की परंपरा के तहत पूर्व शासक के पुत्रों में से ही एक के बाद एक सुलतान की गद्दी पर आसीन होते थे. नतीजतन, राजगद्दी संभालते समय उन की उम्र 80 वर्ष से ऊपर हो जाती थी जिस उम्र में कुछ नया करने का जज्बा नहीं होता.

पहली बार वर्तमान शासक ने अपने भाइयों की जगह अपने युवापुत्र को युवराज घोषित किया. उसी का परिणाम है कि नई सोच की सुधारवादी बयार, परंपरावादी व दकियानूसी सऊदी अरब जैसे समर्थ राष्ट्र का चेहरा बदलने की तैयारी में है.

देश में एक दशक के दौरान भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है. भ्रष्टाचारियों में शाही परिवार के लोग, मंत्री और उद्यमी शामिल हैं. हो सकता है कि युवराज मोहम्मद बिन सलमान भ्रष्टाचार को बहाना बना कर तमाम विरोधियों का सफाया कर रहे हों. टीकाकारों का मानना है कि आले सऊद में सत्ता को ले कर लड़ाई शुरू हो चुकी है. बिन सलमान हर उस व्यक्ति को रास्ते से हटा देना चाहते हैं जो उन की सत्ता के मार्ग में थोड़ा सा भी रोड़ा अटका सकता है.

पिछले दिनों सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने समाज सुधार की ओर पहल करते हुए भ्रष्टाचार के आरोप को कुछ को बर्खास्त कर दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया. शहजादे यानी युवराज सत्ता में आंतरिक असंतुष्टों की पहचान कर उन्हें बाहर कर रहे हैं.

विरोधाभास भी

अपनी सुधारवादी छवि के साथ शहजादे अपने राजनीतिक विरोधियों से लड़ रहे हैं. वहीं आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अन्य देशों के साथ मिल कर काम करने की बात करते हैं. जो सऊदी अरब को जानते हैं उन्हें यह बात सुन कर हंसी आई होगी, क्योंकि यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. सऊदी अरब तो दुनियाभर में फैले इसलामी आतंकवाद का स्रोत है.

अलकायदा के ओसामा बिन लादेन, तालिबान के मुखिया मुल्ला उमर, बोको हरम के नेता शेकाऊ, आईएसआईएस सरगना अबू बक अल बगदादी आदि हैं. दुनिया के सिरमौर आतंकवादियों में एक बात समान यह है कि यह सभी और इन के संगठन वहाबी हैं. इसलिए वहाबी इसलाम आज की दुनिया में इसलामी आतंकवाद का प्रतिनिधि चेहरा है. पैट्रो डौलर ही दुनियाभर में बहाबी विचारधारा को फैलाने का काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों में फैले वहाबी आतंकवाद के पीछे सऊदी राजवंश की ताकत है. बता दें कि सऊदी राजशाही वहाबी विचारधारा की रही है.

धीरेधीरे अमेरिकी मीडिया में भी अब सऊदी अरब की तीखी आलोचना होने लगी है. दिग्गज अमेरिकी पत्रकार फरीद जकरिया ने एक लेख में लिखा, ‘‘सऊदियों ने इसलाम की दुनिया में राक्षस पैदा कर दिए हैं.’’ अब राजनीतिक नेता भी सऊदी को खलनायक मानने लगे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के नजरिए में पूरबपश्चिम जैसा अंतर था, लेकिन एक बात पर दोनों सहमत थे और वह बात थी सऊदी अरब की.

हिलेरी क्ंिलटन का आरोप था कि सऊदी अरब ने दुनियाभर में कई युवाओं को कट्टरपंथ की तरफ धकेलने के इरादे से कट्टरपंथी स्कूल और मसजिदें बनाने में मदद की. वहीं डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब को आतंकवाद की वित्तीय मदद करने वाला सब से बड़ा देश करार दे चुके हैं. यह बात अलग है कि राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने सब से पहली विदेश यात्रा सऊदी अरब की ही की, क्योंकि अमेरिका ही सऊदी अरब का सब से बड़ा संरक्षक है.

राजनीतिक संकट

अब सऊदी अरब विशेषज्ञों का मानना है कि असल में सऊदी अरब का अंदरूनी राजनीतिक संकट गहरा रहा है जिस से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए आतंकवाद से लड़ने की बातें की जा रही हैं. सऊदी अरब का राजनीतिक ही नहीं, आर्थिक संकट भी गहरा रहा है. सऊदी अरब के पास दुनिया का 22 प्रतिशत कच्चा तेल है और अभी तक उस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल के निर्यात पर निर्भर थी. इस देश के पास आय का दूसरा स्रोत नहीं है. अब चूंकि कच्चे तेल के भावों में निरंतर गिरावट और विश्व में उस के उपयोग में हो रही गिरावट ने सऊदी अर्थव्यवस्था को चुनौती दे डाली है. ऐसे में सऊदी अरब को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए आय के अन्य स्रोतों पर काम करना जरूरी था. युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने यही किया.

सऊदी युवराज ने देश को बाहरी निवेशकों के लिए खोला है जो कुछ अरसे पहले तक सोचना भी संभव नहीं था. मगर विदेशी निवेश तभी हो पाएगा जब सऊदी अरब की कट्टरतावादी छवि सुधरे. इसलिए शहजादा मजबूरी में सुधार करने में लगे हैं.

विश्व में सऊदी अरब के समाज को एक अति रूढि़वादी समाज के रूप में देखा जाता है जहां पर मानवाधिकारों का हनन एक सामान्य सी बात है. अपनी धूमिल होती छवि को ठीक करने के लिए सऊदी अरब ने नया हथकंडा अपनाया है जिसे महिलाओं की स्वतंत्रता की आड़ में प्रचारित किया जा रहा है.

दुनियाभर में सऊदी ऐसे देशों में शामिल है जहां महिलाओं पर सब से ज्यादा प्रतिबंध हैं. यहां खेल के मैदानों में महिलाओं को लंबे समय से दूर रखा गया है. लेकिन नए सऊदी प्रिंस महिला अधिकारों को ले कर अब काफी उदारता दिखा रहे हैं. नए आदेश के मुताबिक, महिलाएं भी आने वाले समय में खेलों के मैदान में जा सकेंगी. यह घोषणा शक्तिशाली क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन सलमान के महत्त्वपूर्ण महत्त्वाकांक्षी सुधारों में से एक है. कुछ समय पहले प्रिंस ने महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगे प्रतिबंध को भी हटा दिया. जून 2018 से महिलाएं भी सऊदी अब में ड्राइविंग कर सकेंगी.

महिलाओं के अधिकार

बता दें कि कुछ महीने पहले सैकड़ों महिलाओं को रियाद में एक स्पोर्ट्स स्टेडियम में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी कि ज्यादातर फुटबौल मैच के लिए थी, यह सऊदी अरब के राष्ट्रीय दिवस का मौका था. सऊदी की संरक्षकता प्रणाली के अंतर्गत परिवार का पुरुष सदस्य, जो आमतौर पर पिता, पति या भाई होता है, महिला को पढ़ने, यात्रा करने और अन्य गतिविधियों के लिए अनुमति देता है. लेकिन आर्थिक और सामाजिक सुधारों के मद्देनजर अपने ‘विजन 2030’ को पूरा करने के लिए अब महिलाओं को कुछ अधिकार दिए जा रहे हैं, जिन का उद्देश्य महिला रोजगार को बढ़ावा देना है.

महिलाओं के अधिकार बहुत ही सीमित हैं और उन की स्वतंत्रता कड़े परदे में है. 2015 में उन्हें पहली बार स्थानीय निकायों के चुनावों में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ. वर्तमान युवराज युवा हैं और नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. मगर यह सुधार भी दिखावे के ज्यादा हैं.

एक नारी अधिकार कार्यकर्त्ता के मुताबिक, अब महिलाएं गाड़ी चलाएंगी, लेकिन नारीविरोधी सभी कानून बदस्तूर जारी रहेंगे. दुष्कर्म की शिकार होने पर भी महिलाओं को ही सजा भुगतनी होती है, क्योंकि दुष्कर्म के 4 गवाह पेश करने पड़ते हैं. दुष्कर्म नामक कोई शब्द सऊदी अरब के संविधान में नहीं है. है तो व्यभिचार नामक शब्द. व्यभिचार में पकड़े जाने पर महिला व पुरुष दोनों को ही सजा मिलती है. दुष्कर्मी को तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन दुष्कर्म पीडि़ता को सजा क्यों?

परपुरुष के साथ यदि किसी महिला को देख लिया गया तो उस का अर्थ यह होता है कि महिला ने व्यभिचार किया है. लड़की को अगवा कर उस के साथ यदि दुष्कर्म किया गया है तो उसे 4 गवाह लाने होते हैं. यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुष्कर्मी के साथ उसे भी सजा दी जाती है.

पीडि़ता को गवाह कहां मिलेंगे? सऊदी की महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं. इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है. पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कालेज में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है.

वहां लड़कियों के लिए अभिभावक पिता, पति, भाई, चाचा या फिर पुत्र होता है. किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ लड़कियों की बातचीत और किसी तरह का मिलनाजुलना प्रतिबंधित है. वर्ष 2013 में सड़क हादसे में जख्मी एक महिला का औपरेशन कर हाथ काटना था लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि उक्त महिला का कोई अभिभावक नहीं था जो अनुमति दे सके. क्योंकि उसी हादसे में उस के पति की मौत हो गई थी.

आर्थिक सांस्कृतिक मोरचे पर

युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने देश में उदार इसलाम के पालन का संकल्प जताया है. 24 अक्तूबर, 2017 को रियाद में एक बड़ा आर्थिक सम्मेलन आयोजित किया गया जिस का मूल उद्देश्य तेल से होने वाली आय पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना था. सलमान ने विजन 2030 पेश करते हुए कहा, ‘‘हम उस तरफ लौट रहे हैं जो हम पहले थे अर्थात उदार इसलाम वाला देश जोकि सभी धर्मों और दुनिया के लिए खुला हो. हम अपनी जिंदगी के आगामी 30 वर्ष विनाशकारी विचारों के साथ नहीं गुजारना चाहते. हम जल्द अतिवाद को खत्म करेंगे.’’

सऊदी अरब ने सिनेमा पर कई दशकों से जारी पाबंदी हटाने की घोषणा की है. सऊदी अरब ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामाजिक सुधारों के तहत यह कदम उठाया है. संस्कृति और सूचना मंत्रालय ने कहा, ‘35 वर्षों से ज्यादा समय बाद 2018 की शुरुआत में देश में व्यावसायिक सिनेमा के संचालन को मंजूरी दी जाएगी.’

एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब, परंपरावादियों के विरोध के बावजूद विजन 2030 के तहत मनोरंजन को समाज में व्यापक बदलाव के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.

इस के अलावा 17 अक्तूबर, 2017 को शाही परिवार ने इसलामी विद्वानों के एक अंतर्राष्ट्रीय निकाय का गठन किया जो हदीसों (पैगंबर मोहम्मद द्वारा स्थापित) की समीक्षा कर उन की कट्टरवादी और फर्जी बातों को हटाएगा. इसे भी उदार इसलाम की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

समय बदल रहा है. सऊदी अरब को ले कर पश्चिम पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुका है. इलैक्ट्रिक गाडि़यों और सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल के चलते तेल की मांग भी भविष्य में कम होगी. सऊदी अरब की समृद्धि का सूरज धीरेधीरे डूबने की राह पर है. राजशाही बाहर और भीतरी दबाव झेल रही है, लेकिन क्या वह वैचारिक सुधार का रास्ता अपनाने की हिम्मत कर सकेगी, यह सवाल अभी शेष है जिस का जवाब नए शहजादे की हुकूमत के भावी कदम देंगे.

हम करें तो गुस्ताखी

आतेजाते मेरी राहों पर

आप का वो नजरें बिछाना

पकड़े जाने पर वो आप का

बेगानी सी अदा दिखाना

आप करें तो प्रेममुहब्बत

जो हम करें तो गुस्ताखी

काजल, बिंदी, गजरा, झुमके

लकदक शृंगार करना

मन चाहे कोई देखे मुड़ कर

देखे तो तेवर दिखलाना

आप सजे तो हक आप का

जो हम देखें तो गुस्ताखी

भीनी खुशबू, भीनी बातें

भीनीभीनी सी हलकी हंसी

जो खिलखिलाहटें गूंजी आप की

मएखाने छलके वहीं

हंसे आप तो महफिल रौनक

हम बहके तो गुस्ताखी

प्रेम वृहत है, प्रेम अटल है

प्रेम का पाठ दिलों ने पढ़ा

प्रेम धरा है, प्रेम गगन है

प्रेम से सृष्टि का जाल बुना

इजहार आप का, करम फिजा का

हम कहें तो गुस्ताखी.

– जयश्री वर्मा

मुसलिम महिलाओं की बेहतरी के लिए कानून

भारतीय जनता पार्टी ने अपने वोटबल पर मुसलिम महिलाओं को आतंकित करने वाले तिहरे तलाक की प्रथा को जबरन बंद करवा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस तरह के कानून को बनाने का आदेश दिया था. यह सामाजिक सुधार आवश्यक है, इस में दोराय नहीं है. हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में कई दशकों से बदलाव किए जा रहे हैं और हिंदू समाज उन्हें सहजता से मानता रहा है. हिंदू कट्टरपंथियों ने भी 1950-56 के बाद सुधारों पर नाकभौं नहीं चढ़ाई है.

कठिनाई यह है कि कुछ ऐक्टिविस्ट औरतों के कहने पर लाया गया यह सुधार पूरे कट्टर मुसलिम समाज को बदलेगा, इस में संदेह है. जैसे हिंदुओं का दहेज कानून, बाल विवाह कानून, संपत्ति का बेटियों में समान वितरण कानून केवल कागजों पर मुंह चिढ़ा रहे हैं वैसे ही यह कानून केवल सरकारी किताबों में रह जाएगा और इक्कादुक्का मामले ही अदालतों तक आएंगे.

इस कानून का एक लाभ यह होगा कि तिहरे तलाक की तरह अब कुछ और हिंदू विवाह मामलों में परिवर्तन किए जाने की मांग उठ सकती है. जाति में विवाह करने की परंपरा को समाप्त करने के लिए किसी भी विवाह के लिए दिए गए विज्ञापन में जाति के उल्लेख को अपराध घोषित किया जाना चाहिए. हर पंडित को, चाहे वह हाथ से कुंडली बनाए या कंप्यूटर से, अपराधी माना जाए.

उन सभी खाप पंचायतों के सरपंचों व पंचों को अपराधी माना जाए जो जाति के बाहर विवाह पर मरनेमारने की बात करते हैं. बाल विवाहों के मामलों में पंडितों को ही सजा दी जाए, मातापिता को नहीं क्योंकि मातापिता पंडितों के बिना तो बच्चों का विवाह कर ही नहीं सकते.

पतिपत्नी में बराबरी लाने के लिए मंगलसूत्र, करवाचौथ, टीका जैसी परंपराओं को अपराध की श्रेणी में रखना भी आज के युग में जरूरी है. ये सब कट्टरपंथी धर्म की निशानियां हैं और हिजाब, बुरके की तरह हिंदू औरतों पर अन्याय है, सामाजिक दबाव में कट्टर समाज के चलते औरतें चाहे इन्हें अपनाती ही क्यों न हों और दूसरी औरतों को भी मजबूर क्यों न करती हों.

इसी तरह विधवाओं के लिए केवल सफेद साड़ी पहनना कानूनन वर्जित होना चाहिए या विधुरों के लिए भी इसी तरह का कानून होना चाहिए. वृंदावन व काशी जैसे शहरों में बने विधवा आश्रमों को चलाना अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए और संचालकों व विधवा के घर वालों पर आपराधिक मामले दर्ज करने का हक समाज को मिलना चाहिए.

कानूनों से सामाजिक परिवर्तन कम आते हैं, पर फिर भी कानून समाज को बदलने में सहायक होते हैं. मुसलिम विवाह कानूनों में सुधार बहुत पहले ही होने चाहिए थे. हिंदू कानूनों में अभी भी बहुत सुधार किए जाने की जरूरत है. अगर कुछ कामों को अपराध की श्रेणी में रख कर सुधार किया जा सकता है तो हिंदूमुसलिम भेदभाव समाप्त करने का इस से अच्छा कोई तरीका नहीं है.

34 हजार अंक के नए शिखर पर सूचकांक

गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद बौंबे स्टौक ऐक्सचेंज यानी बीएसई को जैसे पंख लग गए. गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम वाले दिन 18 दिसंबर को सूचकांक सुबह 1,200 अंक की गिरावट के बाद संभला और मजबूती पर बंद हुआ. राज्य में विजय रूपाणी ने जब

26 दिसंबर को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो सूचकांक नए शिखर पर पहुंच गया. मतगणना वाले दिन सुबह पहले रुझान कांग्रेस के पक्ष में थे तो बाजार ढह गया लेकिन बाद में भाजपा की बढ़त के बाद बाजार में तेजी देखी गई.

इस से साफ है कि बाजार का उत्साह भाजपा की नीति पर निर्भर रहा है, दिसंबर के आखिरी सप्ताह से पहले के 5 सत्रों में 3 दिन सूचकांक तेजी पर रहा और साल के आखिरी सप्ताह 34,010 अंक के रिकौर्ड स्तर पर पहुंच गया. 2 माह में सूचकांक ने

1 हजार अंक की बढ़त दर्ज की. पिछले साल 1 फरवरी को बाजार ने 28,000 अंक को पार किया था और फिर 6 मार्च को 29,000 तथा 26 अप्रैल को 30,000 का आंकड़ा पार किया. उस के बाद 26 मई को 31,000, 13 जुलाई को 32,000, 25 अक्तूबर को 33,000 और 26 दिसंबर को 34,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया. इस तरह पिछले साल सूचकांक करीब 7,500 अंक चढ़ा. नैशनल स्टौक ऐक्सचेंज यानी निफ्टी में भी यही तेजी रही और निफ्टी का सूचकांक 26 नवंबर को 10,500 के रिकौर्ड तक पहुंचा.

बैंकों को ले कर आई खबरों को सरकार ने बताया अफवाह

बैंकों को ले कर तरहतरह की अफवाह का बाजार इन दिनों गरम है. सोशल मीडिया पर यह खबर सब को परेशान कर रही थी, लेकिन इसी बीच कुछ टीवी चैनलों के सूत्रों का हवाला दे कर खबर देते हुए इस हवा को और गंभीर बना दिया. खबरों में कहा गया है कि सरकार की योजना कुछ सरकारी बैंकों को बंद करने की है और बैंकों में जमा राशि पर सरकार की निगाह है.

सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है उस की योजना किसी बैंक को बंद करने की नहीं है और बैंक खातों में जमा लोगों का पैसा सुरक्षित है. देश में सरकारी क्षेत्र के 21 बैंक हैं और इन में बैंकों में जमा कुल धन का 70 प्रतिशत हिस्सा है. उन में 61 प्रतिशत धन जन सामान्य का है. इन बैंकों में जनता का 1.1 लाख करोड़ रुपए जमा है. अफवाह थी कि सरकार की योजना ऐसे बैंकों को बंद करने की है.

यह अफवाह सरकारी क्षेत्र के बैंक औफ इंडिया को सर्वाधिक कर्ज बांटने के बाद अब कर्ज नहीं बांटने की रिजर्व बैंक की हिदायत के बाद फैली, इस के साथ ही केंद्रीय बैंक ने आईडीबीआई, यूको बैंक तथा इंडियन ओवरसीज बैंक के खिलाफ निगरानी बढ़ा दी थी. सरकार के इस कदम से बैंकों को ले कर सोशल मीडिया पर तरहतरह की अफवाहों को बल मिला और कई लोगों के लिए ये अफवाहें सिरदर्द बन गईं.

दिक्कत तब बढ़ी जब कुछ चैनलों ने इस को ले कर खबर फैलाई. आम आदमी अब भी खबरों पर विश्वास करता है, लेकिन इस तरह की बेसिरपैर वाली खबरों से उस के विश्वास को धक्का लगता है इसलिए न्यूज चैनलों पर भी नकेल कसने की जरूरत है.

स्वच्छ ऊर्जा देश की प्रमुख कंपनी का सपना

स्वच्छ ऊर्जा भारत सरकार की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. पूरी दुनिया स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में काम कर रही है, भले ही कुछ विकसित देश उत्सर्जन को ले कर अपनी नीति में बदलाव नहीं कर रहे हैं. भारत दुनिया को इस दिशा में आगे बढ़ाने के अभियान में प्रमुख भूमिका में है, यद्यपि हमारे कई प्रमुख शहर दुनिया के सब से प्रदूषित शहरों में शामिल हैं.

देश की प्रमुख कंपनी रिलायंस ने स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए पहल की है और उम्मीद की जा रही है कि रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों के सामने आने से इस दिशा में ज्यादा प्रगति होगी. रिलायंस कंपनी के प्रमुख मुकेश अंबानी ने कंपनी के 40 साल का सफर पूरा होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के मोदी सरकार के सपने को साकार करने में अपनी भागीदारी का संकल्प किया है. उन्होंने इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने, अपनी कंपनी को दुनिया की 20 शीर्ष कंपनियों में शामिल करने का भी संकल्प लिया.

रिलायंस में ढाई लाख कर्मचारी हैं और उस का कारोबार 6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का है. कंपनी की शाखाएं 28 हजार शहरों और 4 लाख कसबों तथा गांवों में फैली हैं. अभिप्राय यह है कि देश की शीर्ष कंपनियां यदि स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के अभियान को हाथ में लेती हैं तो उन के व्यापक संशोधनों और सरकारी स्तर पर की जा रही कोशिश से यह पहल दूर तक जा सकती है और देश ही नहीं, दुनिया को प्रदूषण के कहर से बचाया जा सकता है.

पिछले एक महीने से इस तरह जनता को बेवकूफ बना रहे हैं मोदी

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्हें लोगों ने साल 2014 में विकास पुरुष का नाम देकर चुनाव जितवाया, चुनाव जीतने से पहले उनका और उनकी पार्टी के लोगों के कुछ रटे रटाए नारे थे जिनमें एक नारा था ‘बहुत हुई देश में महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’.

लेकिन चुनाव जीतने के बाद ऐसा कुछ देखने को ही नहीं मिला की मोदी और उनकी टीम ने महंगाई को लेकर कोई ठोस कदम उठाया हो.

इन दिनों देश में पेट्रोल के दामों को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें उफान पर नहीं है लेकिन इसके बावजूद पेट्रोल महंगा होता जा रहा है. बीते कुछ वक्त से पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के चलते मोदी सरकार को आलोचना का सामना भी करना पड़ रहा है.

अधूरा सच बोल रही है बीजेपी सरकार?

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर सफाई देने की कोशिश भी की थी लेकिन विरोधी दलों के हमले और जनता की निराशा नहीं थमी.

कच्चे तेल के दाम काबू में

आम जनता और विरोधी दलों का आरोप है कि वैश्विक स्तर पर क्रूड यानी कच्चे तेल के दाम काबू में हैं, ऐसे में सरकार टैक्स लगाकर पेट्रोल को महंगा बनाए हुए है.

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कुछ महीने पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में इंडियन बास्केट से जुड़े कच्चे तेल के दाम 54.58 डौलर प्रति बैरल थे. फिलहाल इस संख्या में बढ़ोतरी हुई है.

अब सवाल उठता है कि कच्चा तेल अगर सामान्य स्तर पर है तो फिर पेट्रोल इतना महंगा क्यों हो रहा है. इस सवाल का जवाब उलझा हुआ नहीं बल्कि बड़ा आसान है.

आपको जानकर ये हैरानी होगी कि जब पेट्रोल भारत पहुंचता है तो इतना महंगा नहीं होता. इस कौस्ट के मायने उस कीमत से हैं जिस पर उत्पाद आयात किया जाता है और इसमें अंतरराष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट लागत और टैरिफ शामिल हैं.

इस दाम में अगर आप मार्केटिंग कौस्ट, मार्जिन, फ्रेट और दूसरे शुल्क जोड़ दें तो पेट्रोल की वो कीमत आ जाएगी, जिस पर डीलरों को ये मिलता है.

अब आपके मन में यह ख्याल आ सकता है कि अगर डीलर को इतनी सस्ती दर पर पेट्रोल उपलब्ध है तो आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते यह इतना महंगा कैसे हो जाता है.

लेकिन असली खेल इसी के बाद शुरू होता है. 30.48 रुपए वाला दाम ग्राहक तक आते-आते 70 रुपए तक कैसे बन जाता है, इसके पीछे टैक्स का खेल है.

एक्साइज और वैट का कमाल

असल में डीलरों को मिलने वाली दर और ग्राहक को बेची जाने वाली कीमत में गजब का फासला एक्साइज ड्यूटी और वैट बनाते हैं. दिल्ली में आम आदमी को 15 जनवरी को पेट्रोल 74.20 रुपए प्रति लीटर पर मिला.

30.48 रुपए में आप प्रति लीटर 21.48 रुपए एक्साइज ड्यूटी जोड़ लीजिए. फिर इसमें जोड़िए 3.57 रुपए प्रति लीटर का डीलर कमीशन और अंत में 14.99 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से वैट, जो दिल्ली में 27 फीसदी है.

इस गणित से सरकार का ख़जाना तो भर रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल वाजिब दरों पर होने के बावजूद आम लोगों को पेट्रोल काफी महंगा मिल रहा है.

डीजल का भी यही हाल

कुछ ऐसी ही कहानी डीजल के साथ है. डीजल की ट्रेड पैरिटी लैंड कौस्ट 27.98 रुपए प्रति लीटर है, जिसमें 2.35 रुपए के शुल्क जुड़ने के बाद डीलरों को मिलने वाला दाम 30.33 रुपए पर पहुंच जाता है. लेकिन ग्राहकों को डीजल 61.74 रुपए प्रति लीटर की दर से मिल रहा है.

क्या आपको पता है मोदी सरकार के ये जालसाजी आंकड़ें

महंगाई और ऐसे ही कई बड़े मुद्दों को लेकर चुनाव जीतने वाली मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है तब से महंगाई दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है.

क्या आपको पता है पेट्रोल का दाम हर रोज सरकार द्वारा बढ़ाया जा रहा है और इसका आभास आम आदमी को बिल्कुल भी नही है. क्योंकि दाम इतना कम होता है कि किसी का ध्यान इस ओर नही जाता लेकिन अगर यही आंकडें आप एक महीने तक का देखें तो आपको यह बात खलने लगती है.

अब हम आपके सामने एक महीने तक लगातार हर दिन बढ़ने वाले पेट्रोल के दामों की कुछ जानकारी आपके समक्ष देने जा रहे हैं.

साल 2017

  • 01 दिसंबर : 67.71 रुपये प्रति लीटर
  • 02 दिसंबर : 67.78 रुपये प्रति लीटर
  • 03 दिसंबर : 68.02 रुपये प्रति लीटर
  • 04 दिसंबर : 68.34 रुपये प्रति लीटर
  • 05 दिसंबर : 68.64 रुपये प्रति लीटर
  • 06 दिसंबर : 68.88 रुपये प्रति लीटर
  • 07 दिसंबर : 69.03 रुपये प्रति लीटर
  • 08 दिसंबर : 69.13 रुपये प्रति लीटर
  • 09 दिसंबर : 69.20 रुपये प्रति लीटर
  • 10 दिसंबर : 69.35 रुपये प्रति लीटर
  • 11 दिसंबर : 69.68 रुपये प्रति लीटर
  • 12 दिसंबर : 69.92 रुपये प्रति लीटर
  • 13 दिसंबर : 70.19 रुपये प्रति लीटर
  • 14 दिसंबर : 70.40 रुपये प्रति लीटर
  • 15 दिसंबर : 70.53 रुपये प्रति लीटर
  • 16 दिसंबर : 70.59 रुपये प्रति लीटर
  • 17 दिसंबर : 70.70 रुपये प्रति लीटर
  • 18 दिसंबर : 70.76 रुपये प्रति लीटर
  • 19 दिसंबर : 70.83 रुपये प्रति लीटर
  • 20 दिसंबर : 70.85 रुपये प्रति लीटर
  • 21 दिसंबर : 71.01 रुपये प्रति लीटर
  • 22 दिसंबर : 71.15 रुपये प्रति लीटर
  • 23 दिसंबर : 71.22 रुपये प्रति लीटर
  • 24 दिसंबर : 71.37 रुपये प्रति लीटर
  • 25 दिसंबर : 71.51 रुपये प्रति लीटर
  • 26 दिसंबर : 71.52 रुपये प्रति लीटर
  • 27 दिसंबर : 71.56 रुपये प्रति लीटर
  • 28 दिसंबर : 71.60 रुपये प्रति लीटर
  • 29 दिसंबर : 71.62 रुपये प्रति लीटर
  • 30 दिसंबर : 71.62 रुपये प्रति लीटर
  • 31 दिसंबर : 71.66 रुपये प्रति लीटर

साल 2018

  • 01 जनवरी : 71.78 रुपये प्रति लीटर
  • 02 जनवरी : 71.95 रुपये प्रति लीटर
  • 03 जनवरी : 72.20 रुपये प्रति लीटर
  • 04 जनवरी : 72.34 रुपये प्रति लीटर
  • 05 जनवरी : 72.44 रुपये प्रति लीटर
  • 06 जनवरी : 72.58 रुपये प्रति लीटर
  • 07 जनवरी : 72.73 रुपये प्रति लीटर
  • 08 जनवरी : 73.01 रुपये प्रति लीटर
  • 09 जनवरी : 73.34 रुपये प्रति लीटर
  • 10 जनवरी : 73.44 रुपये प्रति लीटर
  • 11 जनवरी : 73.48 रुपये प्रति लीटर
  • 12 जनवरी : 73.54 रुपये प्रति लीटर
  • 13 जनवरी : 73.74 रुपये प्रति लीटर
  • 14 जनवरी : 73.88 रुपये प्रति लीटर
  • 15 जनवरी : 74.20 रुपये प्रति लीटर

आप इन आंकडों को अब देख और समझ चुके हैं और ये आंकड़ें तो सिर्फ दिसंबर 2017 और जनवरी 2018 तक के ही बढ़ते दामों को दर्शा रहे हैं.

आप जरा एक बार ये सोचिए की मोदी सरकार ने कितनी चालाकी से इस योजना पर काम किया है जिसमें की आपकी ही जेब से हर दिन पेट्रोल के लिये थोड़ा थोड़ा पैसा जाता रहा और जब आंकडें का अंक बदलता है तो आप यही सोचते हैं कि अरे अभी तो सिर्फ 50 पैसे ही दाम बढ़े हैं लेकिन हमारे महीने भर के आंकड़ें कुछ और ही कह रहे हैं.

वोदका डायरीज : मनोरंजन की बजाय सिर दर्द है ये फिल्म

एक पुरानी कहावत है कि किसी किताब के मृख्य पृष्ठ को देखकर उसकी अच्छी या बुरी होने का निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए. यही बात विज्ञापन फिल्म बनाते बनाते फिल्म निर्देशक बने कुशल श्रीवास्तव की मनोवैज्ञानिक रोमांचक फिल्म ‘‘वोदका डायरीज’’ को लेकर कहा जाना चाहिए. इस फिल्म में शराब वाली न वोदका है और न ही कोई रहस्य व रोमांच.

फिल्म की कहानी एसीपी अश्विनी दीक्षित (के के मेनन) से शुरू होती है, जो कि अपनी पत्नी व कवि शिखा दीक्षित (मंदिरा बेदी) के साथ कुछ दिन की छुट्टियां मनाकर वापस मनाली लौट रहे हैं. उन्हे लेने गया उनका सहायक अंकित (शरीब हाशमी) भी उनके साथ ही है. रास्ते में अंकित बताता है कि एसीपी अश्विनी का सच साबित हुआ और अपनी नई किताब के विमोचन के वक्त मारे गए लेखक का मसला सुलझ गया है. के के दीक्षित अपनी ड्यूटी करते हुए भी अपनी पत्नी शिखा की अनदेखी नहीं करते हैं. घर पहुंचते ही अंकित का फोन आता है कि एक लेखिका की हत्या हो गयी है. अश्विनी दीक्षित तुरंत घटनास्थल पर पहुंचते हैं, वहां पर उन्हे सुराग के तौर पर मनाली के एक क्लब वोदका डायरीज का एक वीआईपी पास मिलता है.

अश्विनी दीक्षित वहां पहुंचते हैं, तो वहां  एक के बाद एक कई हत्याएं होती जाती हैं. हत्यारा अश्विनी की पकड़ से कोसों दूर होता है. अंकित बीच बीच में जोक्स सुनाकर माहौल को संजीदा नहीं होने देता. इधर रोशनी (राइमा सेन), अश्विनी दीक्षित के आस पास घूमती रहती है, वहीं उनकी पत्नी शिखा भी गायब हो चुकी हैं. अब वोदका डायरीज में हुई हत्याओं के हत्यारे की तलाश करने की बजाय अश्विनी दीक्षित अपनी पत्नी शिखा की तलाश में लग जाते हैं. कहानी में कई नए किरदार भी आ जाते हैं. पर कातिल का पता ही नहीं चलता. फिल्म का क्लायमेक्स भी बहुत कनफ्यूज करता है.

जब एक ही फिल्म में कई कहानी और कई किरदार हों, तो उन्हें किसी सटीक अंजाम तक पहुंचाना हर फिल्मकार के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है. ऐसे में पहली बार फिल्म निर्देशक बने कुशल श्रीवास्तव के लिए तो सफल होना असंभव ही रहा. फिल्म देखते समय दर्शक भी दुविधाग्रस्त होता रहता है. उसकी समझ में ही नहीं आता कि वास्तव में कहानी क्या है और हो क्या रहा है. फिल्म कभी वर्तमान में तो कभी अतीत में ऐसे हिचकोले लेकर चलती है कि हर कोई कहने लगता है-‘‘हे भगवान कहां फंसा दिया.’’

Vodka Diaries movie review  फिल्म ‘‘वोदका डायरीज’’ की एक वाक्य की कहानी यह है कि एसीपी अश्विनी दीक्षित अपनी पत्नी की मौत का गम भुला नहीं पाए हैं और उन्हे लगता है कि वह कहीं गायब हो गई हैं. तो उनके साथी एक कहानी रचते हैं, जिससे अश्विनी को सच का अहसास कराया जाए, इसलिए अश्विनी को जो हत्याएं हुई लगती हैं, वह हकीकत में हुई ही नहीं हैं. मगर इस सीधी सादी कहानी को कहानीकार व पटकथा लेखक वैभव बाजपेयी तथा निर्देशक कुशल श्रीवास्तव ने इतना घुमा दिया है कि खुद भी इसका सही क्लायमेक्स पेश नहीं कर पाए और फिल्म पूरी तरह से उबाउ व नीरस हो गयी है. फिल्म में ऐसा कुछ नही है जो कि दर्शकों को बांधकर रख सके. यदि अच्छा लेखक इस कहानी को लिखता तो बहुत बेहतरीन फिल्म बन सकती थी. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो के के मेनन ने एक जटिल किरदार को बड़ी सहजता से निभाया है. इस तरह के किरदार  निभाना हर कलाकार के बस की बात नहीं होती. शरीब हाशमी व राइमा सेन ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है. मंदिरा बेदी महज खूबूसरत गुड़िया ही नजर आती हैं.

Vodka Diaries movie review

फिल्म को अति खूबसूरत लेाकेशनों पर फिल्माया गया है. कैमरामैन मनीष चंद्र भट्ट ने कमाल की कला दिखायी है. फिल्म अपनी लागत वसूल कर पाएगी, इसमें भी संदेह है.

एक घंटे 57 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘वोदका डायरीज’’ का निर्माण विशाल कुकेरजा, कुशल श्रीवास्तव व अतुल पुनेजा सहित छह लोगों ने मिलकर किया है. फिल्म के लेखक वैभव बाजपेयी, निर्देशक कुशल श्रीवास्तव, कैमरामैन मनीष चंद्र भट्ट तथा कलाकार हैं – के के मेनन, मंदिरा बेदी, राइमा सेन, शरीब हाशमी व अन्य.

अगर रेलवे बोर्ड ने मानी सिफारिशें तो ट्रेन का किराया हो जाएगा कम

यदि किराया समीक्षा समिति की सिफारिशों को रेलवे बोर्ड मान लेता है तो हवाई यात्रा की तरह रेलवे यात्रा की योजना पहले से बनाने पर किराये में छूट मिल सकती है. सूत्रों ने कहना है कि इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट सौंपने वाली समिति ने किसी ट्रेन में रिक्त सीटों की संख्या के आधार पर किराए में छूट तय करने का सुझाव दिया. अधिकारियों ने कहा कि एयरलाइनों की किराया व्यवस्था की तरह, अगर आप ट्रेन की टिकट महीनों पहले बुक कराते हैं तो आप भारी छूट प्राप्त कर सकते हैं. 20 से 50 प्रतिशत तक की प्रस्तावित छूट बुकिंग के समय उपलब्ध रिक्त सीटों की संख्या पर निर्भर करेगी.

नीचे की सीटों के लिए ज्यादा दाम

समिति ने यह भी सुझाव दिया कि जिस तरह से हवाई यात्रियों को आगे की सीटों के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ते हैं, यात्रियों को नीचे की सीटों के लिए ज्यादा दाम चुकाने होंगे. हालांकि अधिकारियों ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों, विकलांगों और गर्भवती महिलाओं को इन सीटों का आवंटन मुफ्त में किया जाएगा. अधिकारियों ने कहा कि समिति ने यह भी सुझाव दिया कि उन ट्रेनों का किराया बढ़ाया जाए जो गंतव्य तक सुबह जैसे सुविधाजनक समय पर पहुंचती है. सूत्रों ने कहा कि रेलवे बोर्ड इन सिफारिशों को मंजूरी देने से पहले इनमें कुछ बदलाव कर सकता है.

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फ्लैट किराया सिस्टम खत्म होगा!

समिति की तरफ से की गई सिफारिश में यह भी कहा गया है कि रेलवे को फ्लैट किराए का सिस्टम खत्म करते हुए त्योहारों के वक्त किराया बढ़ा देना चाहिए और खाली दिनों में किराया कम करना चाहिए. समिति ने यात्रियों को किराए में छूट देने की भी सिफारिश की है. सुझाव दिया गया है कि जो ट्रेनें अजीब समय पर गंतव्य स्थान पर पहुंचती हैं उनके यात्रियों को डिस्काउंट दिया जाना चाहिए. जैसे अगर कोई ट्रेन रात 12 से सुबह 4 के बीच और दोपहर 1 से 5 के बीच गंतव्य स्थान पर पहुंचती है तो उसके यात्रियों को किराए में छूट मिलनी चाहिए.

540 करोड़ से ज्यादा की इनकम

समिति ने रातभर में यात्रा पूरी करने वाली और पैंट्री कार सुविधा वाली रेलगाड़ियों में प्रीमियम शुल्क वसूलने का भी सुझाव दिया है. आपको बता दें कि रेलवे ने एक साल से भी कम समय में फ्लैक्सी फेयर सिस्टम से 540 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की इनकम की है.

खिलाड़ियों को राजनीतिक साजिश का शिकार होना पड़ता है : मुजाहिद खान

बौलीवुड में गैर फिल्मी परिवारों से आने वाली प्रतिभाओं को काफी संघर्ष करना पड़ता है. पर कुछ प्रतिभाएं इस संघर्ष में विजेता बनकर उभरती हैं, ऐसी ही एक प्रतिभा हैं- मुजाहिद खान. बदायूं से मुंबई आकर काफी संघर्ष करते हुए वह बौलीवुड में अपनी एक अलग जगह बनाने में कामयाब रहें. इन दिनों वह स्पोर्ट्स फिल्म ‘‘मेडल’’ को लेकर चर्चा में हैं, जो कि 19 जनवरी को सिनेमाघरों में पहुंचेगी.

बौलीवुड में अपने संघर्ष को लेकर क्या कहेंगें?

मैं उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का रहने वाला हूं. मुझे बचपन से ही फिल्में देखने का शौक रहा है. मेरे घर में सभी लोग डाक्टर हैं. इसलिए मेरे पिता जी सहित घर का हर सदस्य मानकर चल रहा था कि मैं भी बड़ा होकर डाक्टर ही बनूंगा. पर बचपन में ही मैंने अभिनेता बनने के सपने देखने शुरू कर दिए थे. वास्तव में सातवीं कक्षा में मैंने एक फिल्म ‘‘दीवाने’’ देखी थी. इस फिल्म को देखकर मैंने निर्णय लिया कि मुझे अभिनय करना है. उस वक्त घर वालों को लगा कि यह मेरा बचपना है. बीच में मैंने वहां पर मुस्लिम धर्म से संबंधित कुछ संगीत एलबम भी बनाए थे. कालेज की पढ़ाई पूरी करते ही मैंने अपने पापा से कहा था कि आप मेरी बचपन वाली बात को गंभीरता से लें, मुझे अभिनेता ही बनना है. पर मेरे पिता जी ने मुझे समझाया कि हम मध्यम वर्गीय परिवार वालों के लिए मुंबई जैसे शहर में जाकर रहना, खर्चा उठाना व संघर्ष करना आसान नहीं है. मेरे पापा ने समझाया कि बौलीवुड में सब कुछ अनिश्चित होता है. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं मुंबई जाने से पहले ऐसा कुछ कर लूं कि वहां से असफल होकर वापस आने पर भी कुछ काम कर सकूं. तब नैनीताल से मैंने हौटेल मैनेजमेंट का कोर्स किया. उसके बाद मैं मुंबई आ गया. मुंबई में पीवीआर सिनेमा घर में मुझे नौकरी मिली. मैंने नाइट शिफ्ट में नौकरी शुरू की, जिससे दिन में फिल्मों के लिए संघर्ष कर सकूं. दिन में मेरा संघर्ष चलता, मैं लोगों से मिलता व औडीशन देता था. 2-3 औडीशन देने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं जो कर रहा हूं, वह तो मिमिक्री है. पर अभिनय में सही ढंग से करियर बनाने के लिए मुझे अभिनय सीखना पड़ेगा. तो मैं सबसे पहले अनुपम खेर के एक्टिंग स्कूल ‘एक्टर्स प्रिपेयर्स’ गया. उनकी फीस सुनकर मैं उल्टे पैर लौट आया. फिर दो दिन मुफ्त में रोशन तनेजा के यहां और दो दिन मुफ्त में बैरी जौन के यहां वर्कशाप किया. तो मुझे समझ में आया कि यदि मैं अपने अंदर कुछ चीजों को विकसित कर लूं, तो एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने की जरूरत नहीं है.

इस बीच कुछ फिल्मों में मैंने छोटे छोटे किरदार निभाए. रात की नौकरी और दिन में अभिनेता के रूप में काम पाने का संघर्ष इतना था कि एक दिन मैं थक गया. मैने महसूस किया कि मैं दो नांवों की सवारी करते हुए कुछ भी सही नही कर पा रहा हूं. नौकरी में जान बूझकर प्रमोशन नही ले रहा था कि मुझे मुंबई के बाहर जाना पडे़गा. अंततः एक दिन नौकरी छोड़ दी. उसके बाद मुझे फिल्म ‘रंग दे इश्क’ में हीरो बनने का मौका मिल गया. 2016 में यह फिल्म रिलीज हुई, ठीक ठाक चली. इसके बाद मैने ‘इश्क के परिंदे’ की, इसे अच्छी सफलता मिली. इससे मेरा हौसला बढ़ा. मगर आर्थिक तंगी दूर करने यानी कि महज धन के लिए ‘मुंबई मीरर’ सहित कुछ फिल्मों में तीन चार सीन के किरदार किए. सीरियल ‘बालिका वधू’ में दस दिन का काम किया. मैंने एक फिल्म ‘लासा फोट’ की है. यह माइंड ब्लोइंग फिल्म है. पर प्रदर्शित नहीं हुई. यदि यह फिल्म प्रदर्शित हो जाती, तो मुझे बहुत बड़ा फायदा मिलता. फिर मैंने फिल्म ‘रंग रेज’ की. एजाज अहमद की कौमेडी फिल्म की. अब बौक्सिंग के खेल पर फिल्म ‘मेडल’ 19 जनवरी को प्रदर्शित होने वाली है.

फिल्म ‘मेडल’ क्या सोच कर स्वीकार की?

मैंने महसूस किया कि सिनेमा बदल रहा है. अब कुछ अलग तरह की फिल्में दर्शक पसंद कर रहे हैं. कुछ स्पोर्ट्स की फिल्में सफल हो चुकी थी. तो मुझे लगा कि यदि ‘मेडल’ करूंगा, तो मुझे भी बाक्सिंग की ट्रेनिंग करने का मौका मिलेगा. दूसरी बात इस फिल्म के साथ कई बड़े तकनीशियन जुड़े हुए हैं, इससे यह यकीन हुआ कि फिल्म अच्छी बनेगी और सिनेमा घरों में पहुंचेगी.

फिल्म ‘मेडल’ क्या है?

यह फिल्म एक खिलाड़ी की यात्रा पर आधारित है. एक खिलाड़ी जो कई पदक जीतता है, उसकी निजी जिंदगी में क्या होता है, उसका रेखांकन इस फिल्म में है. आम तौर पर स्पोर्ट्स फिल्मों में सफल खिलाड़ी के जीवन के उस हिस्से को दिखाया जाता है, जहां वह रिंग में लगातार सफलता अर्जित कर रहा होता है. लेकिन एक खिलाड़ी के तौर पर उसे अपनी पारिवारिक जिंदगी में किन मुसीबतों से जूझना पड़ता है, उसे फिल्मों में नहीं दिखाया जाता, पर इस फिल्म में वह सब दिखाया गया है. बाक्सिंग/मुक्केबाजी से जुड़े हर खिलाड़ी को आर्थिक संकट से जूझना पड़ता है. इनके परिवार वालों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. एक खिलाड़ी अपने देश के लिए गोल्ड मैडल जीतकर लाता है. जबकि हकीकत में वह गोल्ड मैडल गोल्ड यानी कि सोने का नहीं होता है. हमारे यहां आम लोग इस बात से कम वाकिफ हैं. खेलों में जो राजनीति है, उसकी चर्चा भी इस फिल्म में है. इसके अलावा एक सफल खिलाड़ी बनने, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए खुद को उसी योग्य बनाने के लिए भी खिलाड़ी को पैसे की जरूरत पड़ती है. क्योंकि मुक्केबाजी के खेल के लिए उसे अपने शरीर को मजबूत व कठोर बनाना होता है, इसके लिए पौष्टिक भोजन भी जरुरी होता है. तो वहीं उसके ऊपर अपने परिवार की भी जिम्मेदारी होती है, इन सबके बीच वह कैसे सामंजस्य बैठाने का प्रयास करता है, वह सब हमारी फिल्म ‘मेडल’ में नजर आएगा.

तो क्या यह फिल्म किसी रीयल लाइफ की कहानी है?

पहले तो मुझे यही बताया गया था  कि यह फिल्म किसी रीयल लाइफ से प्रेरित है. लेकिन जिस तरह से मैंने शूटिंग की है या जिस तरह के संवाद हैं, उससे नहीं लगता कि यह किसी रीयल स्टोरी से प्रेरित है.

फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

फिल्म में मेरा किरदार जितेंद्र नामक बाक्सर/मुक्केबाज का है. यह फिल्म जीतेंद्र की पूरी जिंदगी के संघर्ष की गाथा है. शुरुआत में उसे अपने दोस्तों की मदद मिलती है, पर वह एक तरफ छोटे मोटे बाक्सिंग के मैच खेलता रहता है, तो दूसरी तरफ शादी कर लेता है. पिता बन जाता है. तब उसके घर में एक नया संघर्ष शुरू होता है. जबकि वह गोल्ड मैडल जीतने का सपना देख रहा है. इस सपने को लेकर वह पूरी तरह से पैशिनेट है. जिसके चलते वह अपने घर पर कम और अपने खेल पर ज्यादा ध्यान देता है. एक दिन वह गोल्ड मैडल जीतकर घर आता है, तो पता चलता है कि परिवार बिखर चुका है. पत्नी घर छोड़कर जा चुकी है. बच्चे घर में बीमार पड़े हैं. इलाज के लिए पैसे नहीं है. इस फिल्म में दिखाया गया है कि खिलाड़ी के चैंम्पियन बनने के बाद भी उसका संघर्ष जारी रहता है. सरकार पर भी कटाक्ष किया गया है.

क्रिकेटरों के पास अनापशनाप पैसा होता है, पर एक बाक्सर के पास पैसा क्यों नहीं होता?

इसकी वजह तो मुझे नहीं पता, पर हमने फिल्म में दिखाया है कि एक खिलाड़ी के चैम्पियन बनने मात्र से तब तक कुछ नहीं होगा, जब तक सरकार उसकी मदद नहीं करेगी. यदि एक खिलाड़ी ने अपने देश के लिए दस 15 साल दिए हैं, तो सरकार की भी जिम्मेदारी होती है कि वह उस खिलाड़ी के मान सम्मान को बचाए रखने के साथ साथ उसकी पारवारिक जिंदगी सुचारू रूप से चल सके, इसके लिए कुछ कदम उठाए. मतलब की एक खिलाड़ी को सपोर्ट करने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए. दूसरा मुद्दा यह है कि एक क्रिकेटर जैसे ही सफल होता है, शोहरत के साथ साथ उसे दुनिया भर के विज्ञापन मिलते हैं. दुनियाभर की कंपनियां उसे अपना ब्रांड अम्बेसडर बनाते हुए क्रिकेटर को करोड़ों रूपए देती है. ऐसे में सरकार क्रिकेट में पैसा लगाने की बनिस्बत बाक्सिंग जैसे खेल को बढ़ावा देने के लिए क्यों कदम नही उठाती?

इस किरदार को निभाने के लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?

मुझे छह माह तक प्रकाश से बहुत कठिन ट्रेनिंग लेनी पड़ी. ट्रेनिंग के दौरान मुझे अहसास हुआ कि यह आसान खेल नही है. ट्रेनिंग के दौरान काफी चोट भी लगी. ट्रेनिंग में हमें योगा व मार्शल आर्ट भी सिखाया गया. डाइटिंग के सख्त नियम थे. तेल वाली चीजों के खाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. बाक्सिंग में 30 सेकंड का राउंड भी बहुत कठिन होता है, उस वक्त स्टेमिना की ज्यादा जरूरत होती है. क्रिकेट खेलने के लिए हम एक बल्ला व गेंद खरीद कर मैदान पर जा सकते हैं, पर बाक्सिंग के साथ ऐसा नहीं है. बाक्सिंग में चोट लगने का डर रहता है. बाक्सिंग में शुरू से ही एक सही ट्रेनर की जरूरत रहती है. बाक्सिंग के लिए जो पंचिग बैग आते हैं, वह भी काफी महंगे होते हैं.

फिल्म मेडल के रिलीज होने के बाद क्या बाक्सरों की जिंदगी पर कुछ असर पड़ेगा?

फिल्म का क्या असर होगा? यह तो नहीं जानता. मगर जब लोग इस फिल्म को देखेंगे, तो उन्हें समझ आएगा कि हमारे देश में बाक्सिंग भी एक खेल है, जो बहुत ज्यादा चर्चित नहीं है. खिलाड़ियों की दशा को लेकर लोगों में जागरूकता आएगी. शायद सरकार इस पर कुछ कदम उठाना चाहे. हमारे देश में बाक्सिंग को बहुत ज्यादा नजर अंदाज किया गया है.

आपकी फिल्म से पहले अनुराग कश्यप की फिल्म ‘मुक्काबाज’ प्रदर्शित हो चुकी है. तो क्या अब इसका खामियाजा आपकी फिल्म को मिलेगा?

मुझे नहीं लगता. देखिए, ‘मुक्काबाज’ में बाक्सिंग के खेल की बजाय स्थानीय राजनीति और प्रेम कहानी को महत्व दिया गया है. हीरो एक बाक्सर है, पर यह फिल्म किसी खिलाड़ी की यात्रा नहीं है. जबकि हमारी फिल्म ‘मेडल’ पूरी तरह से एक खिलाड़ी की यात्रा है. हमारी फिल्म में बाक्सिंग के खेल और बाक्सर की यात्रा को महत्व दिया गया है. मैं अनुराग कश्यप का बहुत बड़ा फैन हूं. कुल मिलाकर ‘मुक्काबाज’ हमारी फिल्म से अलग है. ‘मुक्काबाज’ पूर्णरूपेण व्यावसायिक फिल्म है, जबकि हमारी फिल्म व्यावसायिक की बजाय यथार्थ परक फिल्म है.

इसके अलावा कौन सी फिल्म कर रहे हैं?

एक हौरर फिल्म कर रहा हूं. दो बड़े बजट की फिल्म है, जिनके बारे में बताना ठीक नहीं होगा.

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