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12 लाख के पैकेज वाले बाल चोर

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

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19 जून, 2017 को मनोज चौधरी की बेटी की शादी थी. वह रीयल एस्टेट के एक बड़े कारोबारी हैं. गुड़गांव में उन का औफिस है. उन्होंने बेटी की शादी एक संभ्रांत परिवार में तय की थी. अपनी और वरपक्ष की हैसियत को देखते हुए उन्होंने शादी के लिए दक्षिणपश्चिम दिल्ली के बिजवासन स्थित आलीशान फार्महाउस ‘काम्या पैलेस’ बुक कराया था.

बेटी की शादी के 3 दिनों बाद ही उन के बेटे की भी शादी थी. बेटे की लगन का दिन भी 19 जून को ही था, इसलिए उस का कार्यक्रम भी उन्होंने वहीं रखा था.

मनोज चौधरी की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों से अच्छी जानपहचान थी, इसलिए बेटे की लगन और बेटी की शादी में सैकड़ों लोग शामिल हुए थे. मेहमानों के लिए उन्होंने बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी थी. वह आने वाले मेहमानों का बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत कर रहे थे.

बारात के काम्या पैलेस में पहुंचने से पहले ही उन्होंने बेटे की लगन का कार्यक्रम निपटा दिया था. इस के बाद जैसे ही बारात पहुंची, मनोज चौधरी और उन के घर वालों ने धूमधाम से उस का स्वागत किया. रीतिरिवाज के अनुसार शादी की सभी रस्में पूरी होती रहीं. रात करीब पौने 12 बजे फेरे की रस्में चल रही थीं. उस समय तक बारात में आए ज्यादातर लोग सो चुके थे. ज्यादातर मेहमान खाना खा कर जा चुके थे. फेरों के समय केवल कन्या और वरपक्ष के खासखास लोग ही मंडप में बैठे थे. मंडप के नीचे बैठा पंडित मंत्रोच्चारण करते हुए अपना काम कर रहा था. जितने लोग मंडप में बैठे थे, पंडित ने सभी की कलाइयों में कलावा बांधना शुरू किया. वहां बैठे मनोज चौधरी ने भी अपना दाहिना हाथ पंडित की ओर बढ़ा दिया. कलावा बंधवाने के बाद उन्होंने पंडित को दक्षिणा दी. तभी उन का ध्यान बगल में रखे सूटकेस की तरफ गया. सूटकेस गायब था.

सूटकेस गायब होने के बारे में जान कर मनोज चौधरी हडबड़ा गए. वह इधरउधर सूटकेस को तलाशने लगे, क्योंकि उस सूटकेस में 19 लाख रुपए नकद और ढेर सारे गहने थे.

कलावा बंधवाने में उन्हें मात्र 4 मिनट लगे थे और उतनी ही देर में किसी ने उन का सूटकेस उड़ा दिया था. परेशान मनोज चौधरी मंडप से बाहर आ कर सूटकेस तलाशने लगे. इस काम में उन के घर वाले भी उन का साथ दे रहे थे. सभी हैरान थे कि जब मंडप में दरजनों महिलाएं और पुरुष बैठे थे तो ऐसा कौन आदमी आ गया, जो सब की आंखों में धूल झोंक कर सूटकेस उड़ा ले गया.

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बहरहाल, वहां अफरातफरी जैसा माहौल बन गया. जब उन का सूटकेस नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देने के साथ लैपटौप से औनलाइन रिपोर्ट दर्ज करा दी. कुछ ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुुंच गई. पुलिस कंट्रोल रूम से मिली सूचना के बाद थाना कापसहेड़ा से भी पुलिस काम्या पैलेस पहुंच गई. मनोज चौधरी ने पूरी बात पुलिस को बता दी.

चूंकि मामला एक अमीर परिवार का था, इसलिए पुलिस अगले दिन से गंभीर हो गई. दक्षिणपश्चिम जिले के डीसीपी सुरेंद्र कुमार ने थाना कापसहेड़ा पुलिस के साथ एंटी रौबरी सेल को भी लगा दिया. उन्होंने औपरेशन सेल के एसीपी राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर सतीश कुमार, सुबीर ओजस्वी, एसआई अरविंद कुमार, प्रदीप, एएसआई राजेश, महेंद्र यादव, राजेंद्र, हैडकांस्टेबल बृजलाल, उमेश कुमार, विक्रम, कांस्टेबल सुधीर, राजेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सब से पहले फार्महाउस काम्या पैलेस में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इन में एक फुटेज में एक छोटा बच्चा मनोज चौधरी के पास से सूटकेस उठा कर बाहर गेट की ओर ले जाता दिखाई दिया. इस के कुछ सैकेंड बाद दूसरा बच्चा भी उस के पीछेपीछे जा रहा था. उस के बाद काले रंग की टीशर्ट पहने एक अन्य लड़का सीट से उठ कर उन दोनों के पीछे जाता दिखाई दिया. सभी फुरती से बाहरी गेट की तरफ जाते दिखाई दिए थे.

पुलिस ने उन तीनों बच्चों के बारे में मनोज चौधरी और उन के घर वालों से पूछा. सभी ने बताया कि ये तीनों लड़के उन के परिवार के नहीं थे. ये शाम 8 बजे के करीब काम्या पैलेस में आए थे. कार्यक्रम में ये बहुत ही बढ़चढ़ कर भाग ले रहे थे. डीजे पर भी ये ऐसे नाच रहे थे, जैसे शादी इन के परिवार में हो रही है. जब ये परिवार की लड़कियों और महिलाओं के डीजे पर जाने के बावजूद भी वहां से नहीं हटे तो परिवार के एक आदमी ने इन से डीजे से उतरने के लिए कहा था.

मनोज ने पुलिस को बताया कि छोटा वाला बच्चा महिलाओं के कमरे के पास भी देखा गया था. वह समझ रहे थे कि ये बच्चे शायद किसी मेहमान के साथ आए होंगे. बहरहाल, उन्होंने उन की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया था और उसी बच्चे ने उन का सूटकेस साफ कर दिया था. उन के कार्यक्रम में जो फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर थे, उन के द्वारा खींचे गए फोटो में भी वे बच्चे दिखाई दिए थे.

पुलिस टीम ने उन्हीं फोटो की मदद से सूटकेस चोरों का पता लगाना शुरू किया. पुलिस ने वे फोटो अलगअलग लोगों को दिखाए. उन फोटो को पहचान तो कोई नहीं सका, पर कुछ लोगों ने यह जरूर बता दिया कि ये बच्चे मध्य प्रदेश के हो सकते हैं.

इस के अलावा पुलिस की सर्विलांस टीम 19-20 जून की रात के डंप डाटा की जांच में जुट गई. पुलिस ने सब से पहले यह पता लगाया कि काम्या पैलेस का इलाका किनकिन मोबाइल टावरों के संपर्क में आता है. इस के बाद यह जानकारी हासिल की गई कि उस टावर के संपर्क में उस रात कितने फोन थे. पता चला कि उस रात कई हजार फोन वहां के फोन टावरों के संपर्क में थे. इसी को डंप डाटा कहा जाता है.

पुलिस को पता लग चुका था कि चोरी करने वाले लड़के मध्य प्रदेश के हो सकते हैं, इसलिए उस डंप डाटा से उन मोबाइल नंबरों को चिह्नित किया गया, जो उस रात मध्य प्रदेश के नंबरों के संपर्क में थे. ऐसे 300 फोन नंबर सामने आए. सर्विलांस टीम ने उन फोन नंबरों की जांच की. अब तक पुलिस को एक  नई जानकारी यह मिल गई थी कि मध्य प्रदेश के जिला राजगढ़ के थाना पचौड और बोड़ा के गुलखेड़ी और कडि़या ऐसे गांव हैं, जहां के गैंग बच्चों के सहयोग से शादी समारोह आदि के मौकों पर चोरियां करते हैं.

यह जानकारी मिलते ही एसीपी (औपरेशन) राजेंद्र सिंह ने 26 जून, 2017 को एक टीम मध्य प्रदेश के लिए भेज दी. टीम में इंसपेक्टर सतीश कुमार, एसआई अरविंद कुमार, एएसआई महेंद्र यादव आदि को शामिल किया गया था. टीम ने सब से पहले राजगढ़ जिले में रहने वाले मुखबिर को चोरों के फोटो दिखाए. उस मुखबिर ने 2-3 घंटे में ही पता लगा कर बता दिया कि ये लड़के गुलखेड़ी और कडि़या गांव के हैं और ये दोनों गांव थाना बोड़ा के अंतर्गत आते हैं.

यह जानकारी टीम के लिए अहम थी. इस जानकारी से उन्होंने एसीपी राजेंद्र सिंह को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर टीम थाना बोड़ा पहुंची. वहां के थानाप्रभारी को टीम ने दिल्ली में हुई घटना के बारे में बताते हुए अभियुक्तों को गिरफ्तार करने में मदद मांगी. थानाप्रभारी ने बताया कि यहां पर कभी मुंबई की तो कभी पंजाब की तो कभी उत्तराखंड तो कभी यूपी की पुलिस आती रहती है. पर चाह कर भी वह इन गांवों में दबिश डालने नहीं जा सकते.

इस की वजह यह है कि इन गांवों में सांसी रहते हैं. जब पुलिस इन के यहां पहुंचती है तो गांव के आदमी और औरतें यहां तक कि बच्चे भी इकट्ठा हो कर पुलिस पर हमला कर देते हैं. महिलाएं पुलिस से भिड़ जाती हैं. कभीकभी ये लोग आपस में ही किसी के पैर पर देसी तमंचे से गोली चला देते हैं. इसलिए इन गांवों में पुलिस नहीं जाती.

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थानाप्रभारी ने बताया कि कुछ दिनों पहले पंजाब पुलिस भी आई थी. पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला के परिवार की शादी में किसी ने नकदी और ज्वैलरी का बैग उड़ा दिया था. पंजाब पुलिस भी ऐसे ही वापस लौट गई थी.

स्थानीय पुलिस की मदद के बिना किसी भी राज्य की पुलिस सीधे दबिश नहीं दे सकती. दिल्ली पुलिस की टीम असमंजस में पड़ गई कि ऐसी हालत में क्या किया जाए? सीधे दबिश दे कर दिल्ली पुलिस कोई लफड़ा नहीं करना चाहती थी. पुलिस टीम को यह तो पता चल ही गया था कि सूटकेस चुराने वाले बच्चे किस गांव के हैं. अब पुलिस टीम ने उसी मुखबिर की सहायता से उन चोरों के बारे में अन्य जानकारी निकलवाई.

मुखबिर ने बताया कि इन गांवों में चोरों के अनेक गैंग हैं. चूंकि बच्चों पर कोई शक नहीं करता, इसलिए ये लोग अपने रिश्तेदारों या गांव के दूसरे लोगों के बच्चों को साल भर या 6 महीने के कौंट्रैक्ट पर ले लेते हैं. यह कौंट्रैक्ट लाखों रुपए का होता है. उन बच्चों को ट्रेनिंग देने के बाद उन के सहयोग से ही विवाह पार्टियों में चोरियां करते हैं. दिल्ली में जिन बच्चों ने सूटकेस चुराया था, वे बच्चे राका और नीरज के गैंग में काम करते हैं और राका इस समय अपने घर पर नहीं है. वह दिल्ली के पौचनपुर में कहीं किराए पर रहता है.

यह जानकारी ले कर पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. पौचनपुर गांव दक्षिणपश्चिम जिले के द्वारका सेक्टर-23 के पास है. अपने स्तर से पुलिस राका को खोजने लगी. कई दिनों की मशक्कत के बाद पहली जुलाई, 2017 को पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला.

राका को हिरासत में ले कर पुलिस ने उस से काम्या पैलेस में हुई चोरी के बारे में सख्ती से पूछताछ की. पुलिस की सख्ती के आगे राका ने अपना मुंह खोल दिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि काम्या पैलेस की शादी में उसी की गैंग के बच्चों ने सूटकेस चुराया था. बच्चों के अलावा नीरज भी गैंग में शामिल था. इस के बाद उस ने चोरी की जो कहानी बताई, वह दिलचस्प कहानी इस प्रकार थी—

मध्य प्रदेश के जिला राजगढ़ के थाना बोड़ा के अंतर्गत स्थित हैं कडि़या और गुलखेड़ी गांव. दोनों ही गांव की आबादी करीब 5-5 हजार है. राका गुलखेड़ी गांव का रहने वाला था, जबकि नीरज गांव कडि़या में रहता था. इन दोनों गांवों की विशेषता यह है कि यहां पर सांसी जाति के लोग रहते हैं. बताया जाता है कि यहां के ज्यादातर लोग चोरी करते हैं. इन के निशाने पर अकसर शादी समारोह होते हैं. एक खास बात यह होती है कि इन के गैंग में छोटे बच्चे या महिलाएं भी होती हैं.

चूंकि समारोह आदि में बच्चे आसानी से हर जगह पहुंच जाते हैं, जो आराम से बैग या सूटकेस चोरी कर गेट के बाहर पहुंचा देते हैं. ये बच्चे कोई ऐसेवैसे नहीं होते, उन्हें बाकायदा चोरी करने की ट्रेनिंग दी जाती है. जिन बच्चों को गैंग में रखा जाता है, उन के चुनाव का तरीका भी अलग है.

गैंग का मुखिया सब से पहले अपनी रिश्तेदारी या फिर जानने वाले के बच्चे को तलाशने की कोशिश करता है. वहां न मिलने पर गांव के ही किसी बच्चे का चुनाव करता है. गांव के लोग बचपन से ही अपने बच्चे को छोटीमोटी चोरी करने की प्रैक्टिस कराते हैं. चोरी की प्राथमिक पढ़ाई घर वालों से पढ़ने के बाद हाथ आजमाने के लिए घर वाले इन्हें गैंग के लोगों को 6 महीने या साल भर के लिए सौंप देते हैं.

इन बच्चों के हुनर के अनुसार, उन का पैकेज 6 लाख से 12 लाख रुपए तक होता है. बच्चों के घर वालों को 25 प्रतिशत धनराशि एडवांस में नकद दे दी जाती है, बाकी की हर महीने की किस्तों में. इस तरह यहां के बच्चे बड़े पैकेज पर काम करते हैं.

राका ने पुलिस को बताया कि काम की शुरुआत करने से पहले उन्हें 3 महीने की ट्रेनिंग दी जाती है. ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया जाता है कि लड़की या लड़के की शादी में ज्वैलरी या कैश का बैग किस तरह उड़ाना है.

राका और नीरज, दोनों साझे में काम करते थे. नीरज ने गैंग में अपने बेटे को भी शामिल कर रखा था. इन्होंने गांव के ही बच्चे चीमा (परिवर्तित नाम) को 10 लाख रुपए साल के पैकेज पर अपने गैंग में शामिल किया था. इस के बाद इन्होंने चीमा को बातचीत करने, खानेपीने, कपड़े पहनने, डांस करने की ट्रेनिंग दी. उस की मदद के लिए इन्होंने गांव के ही कुलजीत को अपने गैंग में शामिल कर लिया था.

ये दिल्ली के अलगअलग इलाकों में किराए का कमरा ले कर रहते थे. ये अकसर मोटा हाथ मारने की फिराक में रहते थे. इन्हें पता था कि पैसे वाले लोग अपने बच्चों की शादियां कहां करते हैं. बच्चों को महंगे कपड़े पहना कर ये शाम होते ही औटोरिक्शा से छतरपुर, कापसहेड़ा, महरौली स्थित फार्महाउसों की तरफ घूम कर तलाश करते थे कि शादी कहां हो रही है. फार्महाउसों में ज्यादातर रईसों के बच्चों की ही शादियां होती हैं.

जिस फार्महाउस में शादी हो रही होती, उस के बाहर ही एक साइड में ये औटोरिक्शा खड़ा कर देते और तीनों बच्चे शादी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अंदर चले जाते, जबकि राका और नीरज औटो में ही बैठे रहते. औटो वाले को ये मुंहमांगा पैसा देते थे, इसलिए वह भी कुछ नहीं कहता था.

19 जून को भी इन्होंने ऐसा ही किया. राका और नीरज काम्या पैलेस के बाहर औटो में बैठे रहे और कुलजीत, चीमा तथा नीरज का बेटा मनोज चौधरी की बेटी की शादी समारोह में शामिल होने अंदर चले गए. वे उन के बेटे की लगन के कार्यक्रम में शामिल हुए.

लगन चढ़ने के बाद तीनों को 100-100 रुपए शगुन के तौर पर भी मिले थे. बेटी की शादी की वजह से मनोज चौधरी सूटकेस में अपने घर से कैश और ज्वैलरी ले आए थे. उस समय उन के सूटकेस में ज्वैलरी के अलावा 19 लाख रुपए नकद थे, इसलिए वह उस सूटकेस को अपने हाथ में ही लिए हुए थे.

तीनों बच्चों की टोली ने ताड़ लिया था कि माल इसी सूटकेस में है, इसलिए वे उस सूटकेस पर हाथ साफ करने के लिए उन के इर्दगिर्द ही मंडराते रहे.

शादी में आए मेहमानों की तरह उन्होंने खाना खाया और डीजे पर डांस भी किया. उन की गतिविधियां देख कर कोई शक भी नहीं कर सकता था कि बिन बुलाए मेहमान के रूप में ये चोर हैं.

जब कुलजीत डीजे पर डांस कर रही लड़कियों के साथ डांस कर रहा था, तब कन्यापक्ष के लोगों ने जरूर उस से डीजे से उतर जाने को कहा था. वह मनोज चौधरी का सूटकेस उड़ाने का मौका तलाशते रहे, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी.

रात साढ़े 11 बजे के बाद जब फेरों का कार्यक्रम शुरू हुआ तो उस समय भी वे उन के मेहमानों के बीच बैठ गए तो चीमा मंडप के इर्दगिर्द घूमता रहा. उसी दौरान जैसे ही मनोज ने हाथ में कलावा बंधवाने के लिए हाथ पंडित के आगे किया, तभी चीमा उन के सूटकेस को ले कर फुरती से निकल गया. उस के पीछे कुलजीत और फिर नीरज का बेटा भी निकल गया.

काम्या पैलेस से निकल कर वे सीधे औटो के पास पहुंचे, जहां राका और नीरज इंतजार कर रहे थे. इस के बाद वे औटो से द्वारका स्थित अपने कमरे पर गए और अगले दिन मध्य प्रदेश स्थित अपने घर चले गए. उन्होंने चुराए पैसे आपस में बांट लिए. राका के हिस्से में 4 लाख रुपए आए थे. कुछ दिन गांव में रह कर राका पैसे ले कर दिल्ली में अपने कमरे पर लौट आया.

वारदात करने के बाद ये किसी दूसरे इलाके में कमरा ले लेते थे. पूछताछ में राका ने बताया कि उस ने मुंबई के एक कार्यक्रम में शिल्पा शेट्टी का बैग चुराया था. उस ने बताया कि उस के गांव के लोग देश के तमाम बड़े शहरों में यही काम करते हैं. किसी गैंग में छोटे बच्चों के साथ महिला को भी रखा जाता है. लेकिन सारा कमाल ये बच्चे ही करते हैं.

राका से विस्तार से पूछताछ के बाद एंटी रौबरी सेल ने उस की निशानदेही पर 4 लाख रुपए कैश और कुछ ज्वैलरी बरामद कर ली. इस के बाद उसे कापसहेड़ा थाना पुलिस के हवाले कर दिया गया, क्योंकि इस मामले की रिपोर्ट उसी थाने में दर्ज थी.

इस मामले की जांच एसआई प्रदीप को सौंपी गई थी. एसआई प्रदीप ने राका से पूछताछ की तो उस ने गुड़गांव की एक घटना का खुलासा किया है. कथा संकलन तक पुलिस उस से पूछताछ कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धड़कता है दिल

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प्यार तो हो गया यों ही अनजाने में

पर वक्त लगेगा उन्हें आजमाने में

जब तक बात छिपी कोई डर न था

अब धड़कता है दिल करीब जाने में

आतिशेदिल जब और फैलेगी

उम्र कम पड़ जाएगी बुझाने में

हफ्तों लगे थे जिन को लिखने में

कुछ पल लगे वे खत पढ़वाने में

तर्जेजफा से बरबाद न करो दिल

बरसों लग जाते हैं इसे बसाने में

इन गुलों में नहीं रगे-बू, तो क्या

काम आ जाते हैं घर सजाने में.

– कुसुम अग्रवाल

व्यापारियों की दशा और विदेशी पूंजी निवेश किए जाने की अनुमति

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केंद्र सरकार ने कुछ क्षेत्रों में 49 प्रतिशत तक विदेशी पूंजीनिवेश किए जाने की अनुमति दी है. यह उस अनुमति से अलग है जिस में विदेशी कंपनियां विदेशी पूंजी के साथ भारत में पूरी तरह व्यापार व उत्पादन कर सकती हैं.

सिद्धांत के अनुसार किसी देश को अपनी भौगोलिक सीमाएं आर्थिक लेनदेन के लिए बंद नहीं करनी चाहिए. जब तक विश्व व्यापार है, तैयार सामान आए, पूंजी आए, निवेश आए, फैक्टरियां आएं, दुकानें आएं, सब एकसमान हैं. एक जगह का सामान सदियों से बहुत दूर तक बिकता रहा है. मोहनजोदड़ो की मुहरें अरब व यूरोप के देशों तक में मिली हैं. विश्व व्यापार भाईचारा, दोस्ती तो बढ़ाता ही है, यह तकनीक के अदलबदल का रास्ता भी खोलता है. इस पर किसी तरह का बंधन गलत है.

कठिनाई यह है कि जब लंबे समय तक आप व्यापार के एक ढर्रे के आदी हो चुके हों और बाहर के पैसे वाले व्यापारियों को देश में व्यापार करने के लिए खुली छूट दे दी जाए जो लंबे समय तक इंतजार करने को और हानि उठाने को तैयार हैं, तो देशी व्यापारी बेमौत मर जाएगा. भारतीय व्यापारी बहुत थोड़ी सी पूंजी पर काम करता है. 90 प्रतिशत व्यापारी कम पढ़ेलिखे हैं. वे बहीखाता तक नहीं बना सकते. उन्हें पत्र लिखना भी नहीं आता. इन्हें उन लोगों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जिन के पास तकनीक है, हुनर है.

चूहे बड़ेबड़े दरवाजे काट देते हैं पर एक बिल्ली के आते ही वे मारे जाते हैं. भारतीय व्यापारी भी ऐसे ही हैं जो अपने ग्राहकों व उत्पादकों की अज्ञानता का लाभ उठा कर सस्ता व घटिया सामान बेचते हैं जबकि पैसे पूरे वसूल करते हैं. वे विदेशी कंपनियों के आगे टिक ही नहीं पाएंगे. विदेशी गाडि़यां आने से बिड़ला की ऐंबैसेडर गाड़ी गायब हो गई जबकि बिड़ला समूह विशाल है, पैसे वाला है.

आज कितने ही देशों से कल तक के जानेमाने देशी उत्पाद गायब हो गए हैं. विदेशी कंपनियां खुदरा व्यापार आदि में आएंगी तो देश का व्यापारी, जो पहले ही जीएसटी व नोटबंदी की मार से कराह रहा है, और ज्यादा रोने लगेगा. उस का विनाश हो जाएगा. व्यापार का यह एक तरह से ब्राह्मणीकरण है जिस में पंडों ने विदेशी व्यापारी को प्रमुखता दी है क्योंकि वह मोटा चढ़ावा चढ़ा रहा है. भारत सरकार के अफसर और नेता सोचते हैं कि उन के बेटेबेटी विदेशी कंपनियों में काम करेंगे तो उन्हें ज्यादा पैसे मिलेंगे, देशी व्यापारियों के यहां काम करेंगे तो दुत्कारे जाएंगे.

आज व्यापारिक फैसले देश का व्यापारी वर्ग नहीं ले रहा, वे नेता और अफसर ले रहे हैं जो व्यापारियों को वर्णव्यवस्था के अनुसार निचले स्तर पर रखते हैं.

पंड्या को बल्लेबाजी सुधारने और खुलकर खेलने की जरूरत : कपिल देव

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पूर्व भारतीय कप्तान कपिल देव चाहते हैं कि हार्दिक पंड्या अपनी बल्लेबाजी पर अधिक मेहनत करे क्योंकि एक औलराउंडर के रूप में यह उनका मुख्य कौशल है. पंड्या ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन टेस्ट में 93 रन बनाए लेकिन इसके बाद किसी भी फौर्मेट में वह अर्धशतक तक नहीं बना पाए.

किसी भी प्रतिभाशाली औलराउंडर की तुलना कपिल से करना एक चलन बन गया है तथा विश्वकप विजेता कप्तान ने कहा कि पंड्या बिना किसी दबाव के खेले. कपिल ने कहा, “उसने (पंड्या) ने अपने खेल की झलक दिखा दी है. उसके पास प्रतिभा और योग्यता है. किसी के साथ भी तुलना करने से उस पर दबाव बनेगा. मैं चाहता हूं कि वह खुलकर खेले और अपने खेल का पूरा लुत्फ उठाए.”

कपिल के अनुसार प्रत्येक औलराउंडर दो में से एक कौशल में मजबूत होता है और पंड्या मुख्य रूप से बल्लेबाजी औलराउंडर है. उन्होंने कहा, “मैं उसे उसके एक कौशल के दम पर टीम में देखना चाहूंगा, चाहे वह गेंदबाजी हो या बल्लेबाजी. उसे अपनी बल्लेबाजी पर थोड़ी अधिक मेहनत करनी होगी क्योंकि वह बल्लेबाजी औलराउंडर है. अगर वह बल्लेबाजी में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करता है तो उसके लिए गेंदबाजी आसान हो जाएगी और ऐसा औलराउंडरों के साथ होता है.”

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कपिल ने कहा कि पंड्या अभी काफी युवा है और सभी उससे कुछ ज्यादा उम्मीद लगा रहे हैं. उन्होंने कहा, “हमने बहुत जल्दी उससे काफी उम्मीद लगा दी है लेकिन मुझे लगता है कि उसके पास एक बेहतरीन खिलाड़ी बनने की योग्यता है. हालांकि एक औलराउंडर के रूप में सफलता अर्जित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी.”

अगले साल के विश्वकप के बारे में कपिल ने कहा कि भारत को खिताब जीतने के लिए वर्तमान कप्तान विराट कोहली की आक्रामकता और उनके पूर्ववर्ती महेंद्र सिंह धोनी की शांतचितता की जरूरत पड़ेगी. कपिल ने कहा, “अगर आपके पास ऐसा संयोजन बन सकता है तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि आपको कोई ऐसा चाहिए जो शांतचित हो और खेल को भी समझे और कोई बहुत आक्रामक हो.”

उन्होंने कहा, “लेकिन अगर हर कोई आक्रामकता अपनाता है तो फिर यह मुश्किल होगा. इसी तरह से अगर सभी शांतचित हो जाते हैं तो यह भी मुश्किल है. इसलिए अगर आपके पास आक्रामकता और शांतचितता का संयोजन हो तो मुझे लगता है कि इससे टीम को मदद मिलेगी.”

विंटर फैशन का नया ट्रैंड साड़ी जैकेट

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साड़ी पार्टीवियर में आज भी सब से अधिक प्रयोग की जाती है. मगर विंटर में यह जाड़े की सर्द हवाओं को रोक नहीं पाती है. ऐसे में कई बार साड़ी पहन कर विंटर पार्टी में जाने वाली लेडीज सर्दी का शिकार हो जाती हैं. फैशन डिजाइनरों ने इस परेशानी को दूर करने के लिए फैशनेबल जैकेट्स तैयार की हैं, जिन्हें साड़ी के ऊपर पहना जा सकता है. यह जैकेट साड़ी और डिजाइनर ब्लाउज को छिपाती नहीं, बल्कि उस की खूबसूरती को और अधिक निखार देती है. यह जैकेट लौंग कोट जैसी घुटनों के नीचे तक होती है. साड़ी के साथ मैच करती यह फैशन का नया ट्रैंड है.

स्पैशल डिजाइनर जैकेट

फैशन डिजाइनर काशनी कबीर कहती हैं, ‘‘साड़ी के साथ ओवर कोट या कोट पहले भी पहना जाता रहा है. स्वैटर भी साड़ी पर पहना जाता था. कोट और स्वैटर में साड़ी की खूबसूरती छिप जाती है और यह पार्टी ड्रैस नहीं लगती यही वजह है कि महिलाएं इसे पार्टी में पहनने से बचती हैं. फिर विंटर की पार्टी में केवल साड़ीब्लाउज में जाना मौसम के अनुकूल भी नहीं होता. ऐसे में साड़ी के साथ यह स्पैशल डिजाइनर जैकेट का नया ट्रैंड है.’’

साड़ी के साथ जैकेट सही से कैरी हो सके, इस के लिए जैकेट में सुंदर बैल्ट भी लगाई जा सकती है, जिस से साड़ी और जैकेट पहनने के बाद भी फिगर सही दिखती है. यह जैकेट इस तरह तैयार की जाती है कि इसे पहनने पर साड़ी की डिजाइन और ब्लाउज का कट छिपे नहीं. जैकेट को तैयार करने में फैब्रिक और सिलाई इस तरह की जाती है कि वह फैशनेबल तो दिखे ही, विंटर में सर्द हवाओं को भी रोके.

विंटर सीजन में नो टैंशन

साड़ी के साथ पहनी जाने वाली यह जैकेट फैशनेबल लुक देती है. इस की सब से खास बात यह है कि इसे डिजाइनर सलवारकुरता और लहंगे के साथ भी पहना जा सकता है. जैकेट का कलर और फैब्रिक ऐसा होता है कि इसे कई अलगअलग रंगों की साडि़यों व सलवार सूट्स के साथ पहना जा सके.

साड़ी की ही तरह लहंगाजैकेट भी चलन में है. ऐसे में लहंगा कई तरह से काम आ सकता है. इस जैकेट को अनारकली लहंगा के साथ पहना जा सकता है. चोली के पास इस की खास फिटिंग होती है, जिस से पहनने वाली ग्लैमरस लगती है. इंडोवैस्टर्न लहंगों के साथ भी यह पहनी जा सकती है. यानी अब इस विंटर सीजन में महिलाओं को साड़ी को ले कर परेशान होने की जरूरत नहीं है.

15 फायदे ब्रैस्ट फीडिंग के, आप भी जरूर जानिए

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आजकल की अधिकतर मांओं को बच्चे को फीड कराना मुश्किल काम लगता है जबकि बच्चे के जन्म के बाद मां का दूध बच्चे के लिए सब से अधिक फायदेमंद होता है. मां के दूध से बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. यह दूध बच्चे के लिए अमृत समान होता है.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए ‘वर्ल्ड फीडिंग वीक’ के अवसर पर मुंबई के ‘वर्ल्ड औफ वूमन’ की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञा डा. बंदिता सिन्हा कहती हैं कि ब्रैस्ट फीडिंग को ले कर आज भी शहरी महिलाओं में जागरूकता कम है, जबकि ब्रैस्ट फीडिंग कराने से ब्रैस्ट कैंसर की संभावना भी कम हो जाती है. जिन महिलाओं ने कभी ब्रैस्ट फीडिंग नहीं कराई होती है, उन में ब्रैस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है.

एक अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं को ब्रैस्ट कैंसर मेनोपौज के बाद हुआ है, उन्होंने कभी ब्रैस्ट फीडिंग नहीं कराई थी. जबकि जिन महिलाओं ने 30 से पहले की उम्र में स्तनपान करवाया है वे 30 की उम्र पार कर स्तनपान करवा चुकी महिलाओं से ब्रैस्ट कैंसर से अधिक सुरक्षित हैं. इसलिए मां बन चुकी हर महिला को स्तनपान कराना जरूरी है और उसे यह समझ लेना चाहिए कि इस से बच्चा तंदुरुस्त होता है और साथ ही मां का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है. स्तनपान के 15 निम्न फायदे हैं:

•  यह सब से गुणकारी दूध होता है. इस में पाया जाने वाला प्रोटीन और एमिनो ऐसिड बच्चे की ग्रोथ के लिए अच्छा होता है. यह बच्चे को कुपोषण के शिकार होने से बचाता है.

•  ब्रैस्ट मिल्क बैक्टीरिया मुक्त और फ्रैश होने की वजह से बच्चे के लिए सुरक्षित होता है. जबजब मां बच्चे को दूध पिलाती है, बच्चे को ऐंटीबायोटिक दूध के जरीए मिलता है, जिस से बच्चा किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचता है.

•  फीडिंग से मां और बच्चे के बीच प्यार भरा रिश्ता बनता जाता है, जिस से बच्चा मां की निकटता का एहसास करता है.

•  बच्चे के जन्म के बाद मां के स्तनों से निकलने वाला पहला दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है, जिस में ऐंटीबायोटिक की मात्रा सब से अधिक होती है, जो बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है. इस के अलावा यह दूध बच्चे की अंतडि़यों और श्वसन प्रक्रिया को भी मजबूत बनाता है.

•  ब्रैस्ट मिल्क हड्डियों को अच्छी तरह ग्रो करने और मजबूत बनाने में सहायक होता है.

•  यह दूध ‘सडन इन्फैंट डैथ सिंड्रोम’ को कम करने में भी मदद करता है.

•  जन्म के बाद बच्चे की प्रारंभिक अवस्था काफी नाजुक होती है. ऐसे में मां का दूध आसानी से पच जाता है, जिस से उसे कब्ज की शिकायत नहीं होती.

•  मां के लिए भी इस के फायदे कम नहीं. ब्रैस्ट फीडिंग कराने से प्रैगनैंसी के दौरान बढ़ा मां का वजन धीरेधीरे कम होता जाता है.

•  इतना ही नहीं ब्रैस्ट फीडिंग से महिला में यूटरस का संकुचन शुरू हो जाता है. डिलिवरी के बाद ब्लीडिंग अच्छी तरह हो जाती है, जिस से महिला को ब्रैस्ट और ओवेरियन कैंसर का खतरा कम हो जाता है.

•  पोस्टपार्टम डिप्रैशन का खतरा मां के लिए कम हो जाता है.

•  ब्रैस्ट फीडिंग से ब्रैस्ट की सुंदरता में कोई फर्क नहीं पड़ता, यह मात्र एक भ्रम है.

•  अधिक उम्र में बच्चा होने पर भी अगर महिला सही तरह से स्तनपान कराती है तो कैंसर के अलावा मधुमेह, मोटापा और अस्थमा जैसी बीमारियों से भी अपनेआप को बचा सकती है.

•  स्तनपान 1 साल से अधिक समय तक कराने से मां और बच्चा दोनों ही स्वस्थ रह सकते हैं.

•  जो बच्चे 6 महीने तक लगातार ब्रैस्ट फीड पर निर्भर होते हैं उन की इम्युनिटी अधिक होती है.

•  मां का दूध नवजात के लिए सर्वोत्तम है.

कला की आजादी खत्म हुई है : राजीव निगम

VIDEO : सिर्फ 1 मिनट में इस तरह से करें चेहरे का मेकअप

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स्टैंडअप कौमेडियन के रूप में मशहूर हुए हास्य कलाकार राजीव निगम ने कई शो लिखे और किए हैं. कानपुर के राजीव निगम को लोगों को हंसाना बहुत पसंद है,लेकिन उनके पिता चाहते थें कि वे डौक्टर बने और इसके लिए वे अपनी संपत्ति बेच भी सकते थें, ऐसे में राजीव ने सोचा कि एक डौक्टर और हास्य कलाकार में कोई फर्क नहीं होता, दोनों ही अच्छी सेहत के लिए काम करते हैं.

इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा और उनकी पहली कामयाबी ‘मुवर्स एंड शेकर्स’ थी, जिसके लिए उन्होंने शेखर सुमन के साथ लिखने का काम किया है. उनके परिवार में उनकी पत्नी अनुराधा निगम और उनके दो बच्चे यशराज (11 वर्ष) और देवराज (7 वर्ष) हैं, जो उन्हें हमेशा सहयोग देते हैं. उनसे भी वे बहुत सारी चीजें सीखते हैं. अभी वे स्टार प्लस की एक कौमेडी शो ‘’हर शाख पे उल्लू बैठा है” में चैतू लाल की मुख्य भूमिका निभा रहे है. उनसे बातें करना मजेदार था.

प्र. इस शो से जुड़ने की वजह क्या है?

कौमेडी मैं सालों से कर रहा हूं, लेकिन ह्यूमर वाली कोई शो नहीं है, जबकि ह्यूमर हर व्यक्ति के लिए अच्छा होता है. इस शो में देश की समस्या को दिखाने की कोशिश की जा रही है, जिसे हम व्यक्त नहीं कर पाते और दिल में होती है.

प्र.कौमेडी का सफ़र कैसे शुरू हुआ?

कौमेडी मुझे बचपन से पसंद था. मुझे याद आता है कि कौलेज के दौरान इलेक्शन कैम्पेन में काम करने के दौरान कुछ पैसे मिल जाते थे, जिसमें मुझे माइक से उस पार्टी के लिए प्रचार करना पड़ता था. इस काम के साथ-साथ मैं अपनी क्रिएटिविटी भी निखारता रहता था. मुझे हर चुनाव में काम मिल जाता था, इससे मुझे उन नेताओं को नजदीक से समझना भी आसान था.

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आज जो मैं यह शो कर रहा हूं, उसमें मेरे सारे वही अनुभव काम आ रहे हैं. इसी तरह सफर शुरू हुआ और धीरे-धीरे यहां तक पहुंच गया. मैंने अपना करियर एक लेखक के रूप में शुरू किया था, पोलिटिकल सेटायर मैं लिखता रहा. ‘मुवर्स एंड शेकर्स’ मेरा पहला काम था, इसके बाद ‘लाफ्टर चैलेन्ज’ में काम करते हुए भी मैंने पोलिटिकल सेटायर को हमेशा कायम रखा.

प्र. आपकी प्रेरणा कौन है?

जब मैं घर से निकला था, तो कुछ भी नहीं था, पर आज यहां हूं. कौमेडियन होने के लिए एक अच्छा ह्यूमन बीइंग होना चाहिए. ऐसा मैं कौमेडियन जौनी लीवर में पाता हूं और वही मेरे प्रेरणास्रोत है.

प्र.कानपुर से मुंबई कैसे आना हुआ? कितना संघर्ष था?

21 वर्ष की उम्र में साल 1994 मैं कानपुर से मुंबई काम की तलाश में आया था. उस समय बहुत मुश्किल दौर था. इतने सारे चैनल और मोबाइल नहीं थे, इतना काम नहीं होता था, लेकिन विचार बहुत आते थे.

कम्युनिकेशन अच्छी होने की वजह से आज संघर्ष कम हो गया है, काम मिलने की संभावनाएं अधिक हो चुकी है, लेकिन तब ये सब मुश्किल था. काम होने के बावजूद भी किसी व्यक्ति से जुड़ने में समय लग जाता था. रहने, खाने, पीने सब में समस्या थी. मैंने पास रहने वाले पान वाले से अनुरोध किया था कि मेरे कौल आने पर मुझे बता दे. कई बार वह बता देता था, कभी भूल भी जाता था, पर मैंने उस दौरान लिखना जारी रखा, जो भी मन में आता था, उसे लिख लेता था. वही लिखावट को मैंने शो में प्रयोग किया. शो हिट होने से एक के बाद एक काम मिलता गया.

संघर्ष के इस दौर में मेरे एक मित्र जो किंग्स सर्किल में सैलून चलाते थे, उन्होंने काफी हेल्प किया. साल डेढ़ साल संघर्ष में ही बीत गया. कभी काम मिला कभी नहीं, परिवार से सहयोग तब नहीं था, पर मेरे अंदर एक जूनून था. कुछ समय संघर्ष के बाद मैं कानपुर वापस चला गया. कानपुर के बिठुर में, मैं एक कवि सम्मेलन देखने गया था, वहां कवि नहीं आया था, ऐसे में मुझे उस सम्मेलन को सम्हालने के लिए कहा गया, मैंने वहां जो कुछ भी किया, दस हज़ार लोग खुश हो गए, इससे मुझमें प्रेरणा जगी और मैं इस क्षेत्र में आ गया.

प्र. टीवी इंडस्ट्री में स्टैंड अप कौमेडियन का काम कर आप कितने संतुष्ट है?

मैं अपने काम से बहुत अधिक संतुष्ट नहीं हूं, स्टैंड अप कौमेडियन की भी कई कैटेगरी होती है. कुछ तो इंटरनेट से लेकर उसे ही तोड़-मरोड़ कर लोगों के सामने पेश कर देते है. जबकि असल में एक स्टैंड अप कौमेडियन समाज के रियल चीजो को देखकर उन्हें एक मजेदार रूप में पहुंचाता है, पर टीवी में खुलकर काम करने का मौका नहीं मिलता. ये खुलकर काम करने की विधा है. यहां पाबन्दी होती है, आप जो चाहे उसे कह नहीं सकते, अगर कह भी दिया, तो आगे जाकर उसे काट दिया जाता है. इस तरह जो मजा मैंने उसे बनाते वक़्त लिया है, वह पूरी तरह से दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती.

प्र. आजकल हर चीज पर विरोध होने लगा है, इससे हास्य कला कितनी प्रभावित होती है?

केवल कौमेडी ही नहीं, हर बात पर आजकल विरोध हो रहा है. आज समाज असहिष्णु हो चुका है और इसे करने वाले काफी लोग है. हर एक पार्टी आती है और अपनी पीठ थपथपाती है और अलग-अलग बातें करती है. लोग भी बहुत दुविधा में पड़ जाते है कि वे जाएं तो जाएं कहां और किसके संग? ये समस्या है.

मैंने एक संवाद लिखा और मैंने नरेन्द्र मोदी की आवाज में एक व्यक्ति से बुलवाया, लेकिन उन्हें लोग इतना मानते है कि लोगों को उनकी आवाज को लेने से आपत्ति हुई और अंत में उसे हटाना पड़ा. हमने तो सिर्फ उनकी आवाज को प्रयोग किया था, बाकी तो सामान्य बातें कर रहा था. इसके बावजूद समस्या आई.

कला की आज़ादी इससे ख़त्म हुई है, लेकिन कैसे हुआ, ये समझना मुश्किल है. पहले ऐसा नहीं था, कई शो में तो मैंने डायरेक्टली अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सोनिया गांधी, लालू यादव आदि के स्वर का प्रयोग किया और तब कुछ भी नहीं हुआ. इससे ऐसा लगता है कि ह्यूमर, सेटायर, कौमेडी में जहां हमें आगे बढ़ने की जरुरत थी, 20 साल बाद भी हम नीचे आ गएं और ये हम सबका दुर्भाग्य है.

प्र. कौमेडी में दो अर्थ वाले शब्दों के प्रयोग को कितना सही मानते है?

ये हर लोग की सोच पर निर्भर करती है. कुछ इसे पसंद करते है कुछ नहीं. हर चीज का बाज़ार है. मै ‘बिलो द बेल्ट’ कौमेडी नहीं करता. मेरे पास अच्छी और हंसाने वाली कौमेडी है तो मुझे ये सब करने की कोई जरुरत नहीं.

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प्र. नये लोगों को इस क्षेत्र में आने के लिए क्या सलाह देते है?

ये क्षेत्र अब काफी कठिन हो गया है, पहले जैसे कुछ चुटकुले सुना दिए और आप हास्य कलाकार बन गए, अब ऐसा नहीं है. अभी आपको पूरी शोध के साथ औब्जरवेशन करना पड़ेगा, जागरूक रहना पड़ेगा, बहुत सारे लोगों से सीखना पड़ेगा और पूरी तैयारी से आना पड़ेगा. कच्ची पक्की तैयारी से नहीं.

प्र. ‘भारत विकास के पथ पर है’, इस बात को चैतू लाल के शब्दों में कैसे कहेंगे?

भारत का विकास हो रहा है, अगर मुझे समय मिलेगा, तो विकास को दिखाऊंगा. विकास हमारे घर के पीछे रहता है और दो गाड़िया ले चुका है और उसका व्यवसाय भी बढ़ रहा है, ऐसे में कहा जा सकता है कि विकास कहीं हो रहा है.

परी : धन व समय की बर्बादी से बचें

फिल्म की टैग लाइन बताती है कि यह परी लोक की कथा नहीं है. मगर फिल्म की टैग लाइन यह नहीं कहती कि इस फिल्म को देखने के लिए समय व पैसा बर्बाद न करें. सुपरनेच्युरल पौवर वाली हौरर फिल्म में शुरू से अंत तक जंगल, रात का अंधेरा, खून, शैतान, गंदगी, जंजीरो में बंधी औरतों के अलावा कुछ नहीं है. कहानी के नाम पर पूरी फिल्म शून्य हैं. फिल्मकार ने जबरन डरावनी आवाजें डालने की कोशिश की है,मगर दर्शक डरने की बजाय हंसता है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है कोलकाता से, जहां अरनब (परमब्रता चटर्जी) शादी के लिए पियाली को  देखने जाता है. पियाली (रिताभरी चक्रवर्ती) डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर इंटर्नशिप कर रही है. वापसी में वह अपने माता पिता से कह देता है कि उसे लड़की पसंद है. तभी कार के सामने एक बूढ़ी औरत आ जाती है और उसकी मौत हो जाती है. पता चलता है कि वह रुखसाना (अनुष्का शर्मा) की मां है, जिसे उसकी मां जंगलों के बीच में एक झोपड़े के अंदर लोहे की जंजीर से बांधकर रखती है. रुखसाना की मां की अंतिम क्रिया में रुखसाना की अरनब मदद करता है. उसके बाद वह रुखसाना को उसके घर पर छोड़ देता है. पता चलता है कि अस्पताल का एक कर्मचारी उस बुढ़िया के शरीर पर निशान देखकर प्रोफेसर (रजत कपूर)को खबर करता है. फिर प्रोफेसर अपने कुछ आदमियों के साथ रुखसाना को मारने पहुंचता है, पररुखसाना वहां से भागकर अरनब के घर पहुंच जाती है.

अरनब उसे अपने घर में कुछ समय रहने के लिए कह देता है. अरनब, रुखसाना के व्यवहार से अचंभित है. पर धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. प्रोफेसर, अरनब को समझाता है कि रुखसना औलाद चक्र की अंतिम शैतान है. वह इफीरात /बुरी आत्मा की बेटी है, जो कि अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना चाहती है. यह उससे प्यार करेगी, एक माह के अंदर ही बच्चे को जन्म देगी और अरनब को खत्म कर देगी. यहशैतान है, मगर इंसान की तरह रहते हैं. इनके अंदर जहर होता है. यह गुस्से में अपना जहर दूसरे इंसान को काटकर उगलते हैं. यदि ऐसा न करें, तो यह खुद अपने जहर से मर जाएं.

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पहले अरनब को यकीन नहीं होता. पर रुखसाना की बनायी एक तस्वीर को वह गूगल पर खोजता है, अब अरनब, प्रोफेसर के हाथों रुखसाना को सौंपता है. पर प्रोफेसर मारा जाता है. रुखसाना एक बच्चे को जन्म देती है, उसके बाद सारा सच अरनब को बताकर अपने जहर से खुद मर जाती है. मरने से पहले रुखसाना बता देती है कि उसका बच्चा पवित्र है, उसमें शैतानी अंश नहीं है.

निर्देशक व पटकथा लेखक के तौर पर प्रोसित राय फिल्म व कहानी के साथ न्याय करने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. इंटरवल से पहले तो दर्शक समझ ही नहीं पाता कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पूरी कहानी मूर्खतापूर्ण ही है. लेखक व निर्देशक ने फिल्म की कहानी का संदर्भ बांगलादेश के जन्म के समय की घटना को उठाकर उसमें शैतानी पक्ष जोड़ कर हौरर फिल्म बनाने का असफल प्रयास किया है. क्योंकिफिल्मकार अपनी कहानी के साथ दर्शक को ठोस सच का यकीन नहीं दिला पाता. बल्कि एक अच्छी प्रेम कहानी का भी दुःखद अंत दिखाकर डरावनी नहीं, बल्कि एक उदास फिल्म बना डाली.

हम अपने पाठकों को बांगलादेश के जन्म के समय की उस घटना के बारे में याद दिला देते हैं. 1971 से पहले पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था. 1971 के युद्ध में जब पूर्वी पाकिस्तान, बांगलादेश बना, उस वक्त पाकिस्तानी सैनिकों ने बांगलादेश की औरतों सेशारीरिक संबंध बनाते हुए वहां पर पाकिस्तानी नस्ल को बढ़ाने का अभियान चलाया था. इसका  पता चलते ही बांगलादेश के एक संगठन ने ऐसी औरतों की तलाश कर उनके गर्भ को गिराना शुरू किया था.

फिल्म ‘‘परी’’ के निर्देशक प्रोसित राय और निर्माता व अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की सोच पर हंसी आती है. इनके लिए 21वीं सदी में भी बिजली की गड़गड़ाहट, दरवाजों के चरमराने की आवाज, अति गंदे चेहरे व खोपड़ी में काला बुरखा पहने औरतें, खून आदि का होना यानी कि हौरर फिल्म हो गयी.

फिल्म में अरनब और पियाली के बीच एक संवाद है कि ‘हर इंसान के अंदर राक्षस का अंश होता है?’ यदि फिल्मकार ने इस बात को भी ठीक से फिल्म में पिरोया होता, तो शायद परी अच्छी फिल्म बन जाती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अनुष्का शर्मा ने खून की प्यासी रुखसाना के किरदार को अपनी तरफ से निभाने का प्रयास जरूर किया है,मगर फिल्म की कहानी, पटकथा व उनके किरदार को इतना घटिया लिखा गया है, कि उनकी मेहनत रंग नहीं ला पाती. फिल्म में अनुष्का शर्मा चमगादड़ की की तरह उछलते, कूदते, उड़ते, खिड़की पर उलटा लटके, कुत्ते को काटते हुए दिखायी देती हैं, मगर उस वक्त भी दर्शक के शरीर में  सिहरन/ कंपकपी पैदा नहीं होती. फिर भी अनुष्का शर्मा इस बात के लिए बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने कुछ नया करने का प्रयास किया है.

परमब्रता चक्रवर्ती के अरनब के किरदार को लेखक ने कोई तवज्जो नहीं दी, तो फिर वह बेचारे क्या करते? कुछ दृश्यों में अनुष्का शर्मा व परमब्रता चटर्जी के बीच की केमिस्ट्री खूबसूरत लगती है. रजत कपूर ने बुरी आत्मा की तलाश में जुटे बांगलादेशी प्राफेसर के किरदार को सही ढंग से निभाया है. कैमरामैन बधाई के पात्र हैं. गीत संगीत बेकार है.

दो घंटे 14 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘परी’’ का निर्माण अनुष्का शर्मा ने किया है. फिल्म के निर्देशक प्रोसित राय, लेखक प्रोसित राय व अभिषेक बनर्जी, संगीतकार अनुपम राय तथा कलाकार हैं-अनुष्का शर्मा, परमब्रता चटर्जी, रजत कपूर, रिताभरी चक्रवर्ती, मानसी मुलतानी व अन्य.

जान लेने वाली पत्नियां : प्राणों की प्यारी अब प्राणों की प्यासी हो चली हैं

VIDEO : बिजी वूमन के लिए हैं ये ईजी मेकअप टिप्स

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प्राणों की प्यारी अब प्राणों की प्यासी हो चली हैं. शादी के बाद बहुत सी लड़कियां घरेलू हिंसा डीवी ऐक्ट 2005 के ब्रह्मास्त्र से लैस होकर अपनी ससुराल पहुंचने लगी हैं. 498 की धारा का गुणगान आज तकरीबन हर लड़की वाला करता है और लड़के वाले चुप रहते हैं, उदास भी.

जहां वर पक्ष सीधा सरल होता है, लड़के वाले शरीफ होते हैं, वहां लड़के के सीधेपन को तेज लड़की कई तरह से अस्त्र बनाकर हालात को अपने हक में मोड़ लेती है. कुछ लड़कियां जिन के मायके में अफेयर होते हैं, वे ससुराल में एक पल भी नहीं रहना चाहती हैं और बिना वजह ससुराल वालों को घरेलू हिंसा व दहेज को लेकर सताने का इलजाम लगा कर अपने मायके की राह पकड़ लेती हैं.

कुछ लड़कियों को मां के बिना रहना नहीं भाता. मां के संग सोने वाली लड़कियां हर चौथे दिन मायके चली जाती हैं. वे हनीमून मना कर मायके लौटे जाती हैं. उनका शादी के प्रति इतना ही शौक होता है जो 1-2 बार ससुराल आकर पूरा हो जाता है.

बहुत सी लड़कियां अपने मायके के पड़ोस से इतनी रमी होती हैं कि ससुराल का माहौल उन्हें अकेलापन ही देता है. वे किसी भी हालात में मायके की ओर दौड़ लगाती हैं. उन्हें ससुराल या पति से कभी कोई मोह नहीं होता.

कुसुम शादी ही नहीं करना चाहती थी. वजह, उसे अपने भाई के बेटे रिंकू से लगाव था. शादी में देरी हो चुकी थी और कुसुम पूरी तरह से भतीजे की मां बन गई थी. भाई ने कुसुम के इसी सम्मोहन का फायदा उठा कर उसे उस के पति के खिलाफ करके हमेशा के लिए उस की गृहस्थी तोड़ दी.

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महज 7 महीने के छोटे से वैवाहिक जीवन में कुसुम ने 14-15 बार मायके की ओर दौड़ लगाई थी. जब वह ससुराल में होती थी तो उस की मां रातदिन अपने नाती रिंकू के रोने की बात फोन पर बताकर उस को ससुराल में नहीं रहने देती थी. कुसुम को उस की मां हमेशा अपनी तबीयत का दुखड़ा बताकर बुलाती थी. कुसुम की गोद में रिंकू को डालकर वह उस का भावनात्मक शोषण करती थी.

इस तरह से मां ने एक पल भी कुसुम को ससुराल में चैन से अपने पति विनीत के साथ नहीं रहने दिया. इस से विनीत डिप्रैशन में चले गया तो मां ने नई चाल चली. वह कुसुम को सिखाने लगी कि तेरा आदमी नामर्द है, उसे छोड़ दे.

इसी बीच विनीत की मां ने कुसुम की मां को उसका घर मरम्मत कराने के लिए कुछ पैसा दे दिया. रिश्तों के बीच पैसा आते ही नए रिश्ते में खटास आ गई.

कुसुम का भाई विमल जुआ खेलता था. वह हर महीने विनीत के सीधेपन का फायदा उठाकर उसकी मां से पैसे की मांग करता था. वैसे तो लड़के वाले मांग करते हैं, पर यहां विनीत की मां से कुसुम का भाई पैसे की डिमांड करने लगा था.

आखिर में हारकर विनीत की मां ने पैसे की डिमांड बाबत विमल के खिलाफ शिकायत कर दी तो विमल ने कुसुम को मायके बुला लिया और विनीत व उस के मांबाप पर फर्जी डीवी ऐक्ट लगा कर उनका जीना दूभर कर दिया.

खुद ही पैसा दे कर अपने ऊपर लगाए गए इस झूठे इलजाम का तोड़ विनीत की मां इसलिए नहीं ढूंढ़ पा रही थीं कि बिना लिखापढ़ी किए उन्होंने बहू के मायके वालों को रुपए दे दिए थे. अब वे घरेलू हिंसा के फर्जी मामले में फंसी हैं. कोर्ट हमेशा लड़की की बात सुनती है. लड़के वालों को कुसूरवार समझा जाता है. इन्हीं बातों व कानून का फायदा उठाकर कुसुम का जुआरी भाई अब ठहाके लगा रहा है.

इस तरह की बातों से आज कितने ही परिवार बस नहीं पा रहे हैं. लड़की के लालची भाइयों

की नजर अब बहन की ससुराल की जायदाद पर टिकी होती है. जो सीधेसादे ससुराल वाले होते हैं उनको लड़की के भाई ब्लैकमेल कर लेते हैं.

इसी तरह ग्वालियर का एक परिवार भी तब सांसत में आ गया था जब बहू ने अपने पति से कहा कि वह सास ससुर से अलग रहेगी. बेचारा मनीष मां बाप पर ही निर्भर था और उन का लाड़ला भी था.

नई बीवी ने मनीष पर जब ज्यादा दबाव बनाया तो वह कुछ भी नहीं कर सका. बीवी मायके जाकर रहने लगी और पति व सास ससुर पर दहेज के नाम पर सताने का मामला दायर कर दिया.

बेचारे मांबाप की जान सांसत में देख कर मनीष ने एक सुसाइड नोट लिखा और अपनी जान दे दी. वह खुदकुशी कर के अपनी छोटी सी वैवाहिक जिंदगी का अंत कर गया. उसे लगा कि उस की पत्नी को उस में या उस के माता पिता में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे लोग कब तक उसकी पत्नी को मनाएंगे.

एक तरफ तो मातापिता का प्यार, दूसरी तरफ नई बीवी का हठ, तीसरी तरफ 498 की हिटलरशाही धारा, जिससे निकलने की राह सीधेसादे मनीष को नहीं सूझी और उस ने अपनी जिंदगी खत्म करके ऐसी शादी व कानूनी आतंक को विराम दे दिया जिस में फंसने के बाद बाहर निकलने की राह उस मासूम लड़के के पास नहीं थी.

आसान नहीं सामाजिक बराबरी, जातियों में बैलैंस बनाए रखना मुश्किल

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जाति के आधार पर नेताओं के लिए जनता के वोट लेना भले ही आसान काम हो, पर सरकार बनाने के बाद जातियों में बैलैंस बनाए रखना मुश्किल काम होता है. यही वजह है कि बहुमत से सरकार बनाने वाले दलों को 5 साल में ही हार का सामना करना पड़ता है. अब जातीयता राजनीतिक दलों को भी लंबे समय तक टिक कर राज नहीं करने देती है.

वोट लेते समय राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक बराबरी बनाए रखना भले ही आसान काम हो, पर सरकार चलाते समय इस को बनाए रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग से लेकर योगी आदित्यनाथ की सामाजिक बराबरी तक यह बारबार साबित होता दिख रहा है.

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की तिलोई विधानसभा सीट से विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और योगी सरकार में आवास राज्यमंत्री सुरेश पासी के बीच छिड़ी लड़ाई इस का ताजा उदाहरण है. सुरेश पासी जगदीशपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं और वे उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं. तिलोई और जगदीशपुर विधानसभा इलाके आसपास हैं.

अपनी राजनीति को मजबूत बनाए रखने के लिए विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह और मंत्री सुरेश पासी एकदूसरे के इलाकों में दखलअंदाजी भी करते रहते हैं. अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए कई बार आमने सामने भी आ जाते हैं. सबसे अहम बात यह है कि दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं.

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मंत्री होने के चलते सुरेश पासी के पास ज्यादा हक हैं. सरकारी नौकर भी विधायक से ज्यादा मंत्री की बात को अहमियत देते हैं.

सुरेश पासी भले ही जगदीशपुर से चुनाव लड़ते हों, पर उनका अपना निजी घर तिलोई विधानसभा इलाके में पड़ता है. लगातार 3 बार से गांव की प्रधानी सुरेश पासी के परिवार के पास ही रही है. ऐसे में सुरेश पासी को तिलोई इलाके में भी पैरवी करनी पड़ती है. इस के चलते तिलोई के विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह के साथ उनकी होड़ सी बन जाती है.

एक ही पार्टी में होने के बाद दोनों नेताओं के बीच किसी किस्म का तालमेल नहीं है. दोनों के बीच झगड़ा इस कदर बढ़ गया था कि विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा तक देने का मन बना लिया. इसके बाद वे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले.

विधायक मयंकेश्वर शरण सिंह की नाराजगी के चलते अमेठी की पुलिस सुपरिटैंडैंट पूनम का वहां से तबादला कर दिया गया. वे विधायक और मंत्री के बीच तालमेल बनाने में नाकाम रही थीं. भाजपा के सामने यह पहला मामला है जो खुल कर सामने आ गया है.

वैसे, पूरे प्रदेश में ऐसे तमाम मामले हैं जहां नेताओं की जमीनी लैवल पर अलग अलग खेमेबंदी है.

भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय अलग अलग दलों और जातीय नेताओं को अपने साथ जोड़ा था, अब इनको साथ लेकर चलना मुश्किल हो रहा है. इन नेताओं की आपसी खेमेबंदी का नुकसान पार्टी को चुकाना पड़ सकता है.

बहुत से विधायक और मंत्री अपने चहेते लोगों को पार्टी में अहम पदों पर बिठाना चाहते हैं. जातीय आधार पर देखें तो पता चलता है कि भाजपा हमेशा से ही अगड़ी जातियों की पार्टी रही है. ऐसे में अगड़ी जाति के नेता अपनी अलग अहमियत चाहते हैं.

भाजपा ने वोट के लिए दलित और पिछड़े तबके के नेताओं को पार्टी से जोड़ा था. चुनाव के बाद अब जमीनी लैवल पर इनके बीच तालमेल बनाए रखना मुश्किल काम हो गया है. जातीय आधार पर सब से ज्यादा परेशानी दलित तबके को हो रही है. उसके नेता से लेकर कार्यकर्ता तक को ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही है. भाजपा में हिंदू धर्म को मानने वालों की तादाद ज्यादा है. वे लोग दलितों के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे हैं और भाजपा बारबार इस मुद्दे को दबाने में लगी रहती है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संगठन मंत्री सुनील बंसल पार्टी कार्यकर्ताओं को परिवारवाद से दूर रहने और आपसी तालमेल बनाए रखने की बात समझाते हैं. इसके बाद भी नेता किसी न किसी मुद्दे को लेकर सामने आ ही जाते हैं. ऐसा केवल भाजपा के ही साथ नहीं हुआ है. इस के पहले बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को भी इसी बात का शिकार होना पड़ा था.

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साल 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मणदलित गठजोड़ के साथ सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति तैयार की थी, जिस में दलितों के साथ साथ कई अगड़ी जातियों ने भी बसपा का साथ दिया था. इसके बल पर मायावती को पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला था.

सरकार बनाने के बाद बसपा इस बैलैंस को बनाए रखने में नाकाम रही, जिस से सरकार के मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

जो दलित तबका कभी बसपा का मजबूत खंभा होता था, वह खुद पार्टी से दूर जाने लगा. इसके चलते बसपा को विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में ही करारी हार मिली थी. बसपा की ही तरह समाजवादी पार्टी के साथ भी यही हुआ था. पिछड़ों के बेस वोट के बाद मुसलिमों और अगड़ों को साथ लेकर सपा ने साल 2012 में बहुमत की सरकार बना ली थी.

अखिलेश यादव की युवा इमेज और मुलायम सिंह यादव की संगठन कूवत भी सरकार के समय जातीय बैलैंस साधने में नाकाम रही थी. इस से अलग अलग जातियों के नेता सपा से नाराज हो गए. सबसे ज्यादा परेशानी में अतिपिछड़े और दलित नेता थे. उनको लग रहा था कि अखिलेश सरकार में उनकी सुनी नहीं जा रही है. ऐसे में जब 2014 के लोकसभा चुनाव आए तो यह तबका भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया और सपा को करारी हार देखनी पड़ी.

2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने भी अपने कैडर वोट के अलावा दलित और पिछड़ों को पार्टी के साथ जोड़ने में कामयाबी तो हासिल करली, पर अब इनको एकसाथ लेकर चलना भारी पड़ रहा है. भाजपा का मुख्य अगड़ा वोट बैंक पार्टी से खुश नहीं है खासकर बनिया और ब्राह्मण तबका.

भाजपा ने बाहरी नेताओं को भी पार्टी में शामिल किया है. ये नेता भाजपा के पुराने नेताओं के साथ सहज भाव से एक नहीं हो पा रहे हैं. इस का खमियाजा पार्टी को आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.

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