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देश में विमानन सेवा कारोबार को पंख लग रहे हैं. इस की वजह है घरेलू विमानन सेवा में बढ़ी प्रतिस्पर्धा. इसी से विमान किराए में भारी कमी आई है. देश में विमान यात्रियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. बीते वर्ष 11 करोड़ 71 लाख यात्रियों ने हवाई यात्रा की जो 2016 से 17.31 प्रतिशत अधिक है. विमान सेवा में साल 2014 से लगातार वृद्धि हो रही है और लगातार 39 महीने से यात्री विमानों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. भारत में 2016 में यात्री वृद्धि दर 23.5 दर्ज की गई जबकि चीन में यह दर 10.7 प्रतिशत और अमेरिका में 3.3 प्रतिशत है. इस के साथ ही भारत दुनिया का तीसरा सब से बड़ा विमान बाजार बन गया है.
देश में उड़ान क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने दूरदराज के क्षेत्रों के लिए उड़ान सेवा शुरू की है. भारत टिकटों की बिक्री के आधार पर दुनिया का तीसरा सब से बड़ा बाजार बन गया है. इस बात का आर्थिक सर्वेक्षण में भी उल्लेख किया गया है.
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 29 जनवरी को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया था जो देश की अर्थव्यवस्था का असली दर्पण होता है. देश में बदलते परिवेश से यह स्वाभाविक है, क्योंकि लोगों की क्रयशक्ति में जबरदस्त इजाफा हो रहा है और विमानन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है जिस से यात्री टिकट की लागत कम हो रही है और इस का सीधा लाभ आम उपभोक्ता को मिल रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हवाई यात्रियों की बढ़ती तादाद को देखते हुए सरकार विमानन क्षेत्र की जरूरतों पर खास ध्यान देगी.
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देश के शहरों में ऊंचे मकानों के बारे में सरकार अब एक सकल योजना पर विचार कर रही है. सरकार का विचार है कि बजाय शहरों को चारों ओर फैलाने के, उन्हें ऊंचा करना ठीक होगा ताकि कम जमीन पर ज्यादा लोगों को बसाया जा सके. आजकल ज्यादातर शहरों में एक या दोमंजिले मकान ही हैं और हाल ही में 4 मंजिलों की इजाजत दी गई है.
यूरोप के देशों में सदियों से 4-5 मंजिले मकान बनाने का रिवाज रहा है और वहां ही लिफ्ट ईजाद की गई थी. लकड़ी के बहुमंजिले मकान चीन व जापान में बहुत बनते थे पर हमें, वास्तु का पंडिताई ज्ञान चाहे हो, वास्तुकला का व्यावहारिक ज्ञान नहीं था और ऊंचे मकान बनाना खतरे से खाली न था.
देश की अव्यवस्था का आलम यह है कि मकान की जमीन मालिक की है पर पुलिस, कौर्पोरेशन, बैंक और अब पर्यावरण सुरक्षा, पुरातत्त्व सुरक्षा वाले भी उस पर जमने लगे हैं. नतीजा यह है कि मकान गांवों में बनते हैं जहां वे बेतरतीब होते हैं और कुछ सालों में स्लम सा बन जाते हैं और जहां सड़कें न के बराबर होने की वजह से जाने के लिए घंटों लगते हैं.
ऊंचे मकान हों तो लोग 5-6 मंजिल उतर कर पैदल ही दफ्तरों तक पहुंच सकते हैं. पटरी बनाने की लागत सड़क, बस, ट्रेन और मैट्रो बनाने की अपेक्षा बहुत कम होती है. नागरिकों को साफ हवापानी मिले, इस के लिए बनाए गए ज्यादातर नियम गले की हड्डियां बने हुए हैं. नागरिकों को अपने फैसले खुद लेने ही नहीं दिए जा रहे.
जहां बहुमंजिली इमारतें बनी हैं, जैसे मुंबई, वहां वर्षों तक रिहायशी मकानों की कमी नहीं थी और सड़कों पर भीड़ भी नहीं थी. 1947 तक मुंबई की सड़कें 4-5 मंजिलों वाले मैरीन ड्राइव, बैलार्ड एस्टेट, कोलाबा, फोर्ट एरिया में साफ, बिना एन्क्रोचमैंट वाली थीं. जब देशी शासक आए तो उन्हें हर लहर को गिनने के बहाने ऊपरी कमाई के अवसर ढूंढ़ने थे और इसीलिए बहुमंजिले मकानों पर रोक लगी.
शहरों, छोटीबड़ी बस्तियों में ऊंचे मकानों की इजाजत हमेशा होती तो सड़कों पर आज की तरह की भीड़ न होती. लोग गाडि़यां खरीदते ही नहीं. एक मकान में 100 घर होते तो भाईचारा ज्यादा रहता. बच्चों को दोस्त मिलते, बुढ़ापे में अकेलापन न महसूस होता.
ऊंची बिल्डिंगों की लागत शुरू में चाहे ज्यादा हो, आखिरकार वे फायदेमंद ही होंगी. सरकार को खुलेमन से इन नियमों में ढील देनी चाहिए. सिवा सीवर के प्रबंध करने के सरकार को कहीं कोई बंदिश नहीं लगानी चाहिए. धूप व हवा की जरूरत से ज्यादा उस से बचने के लिए छत जरूरी है. यह तभी संभव है जब सरकार सारे नियम वापस ले और जनता को अपने ऊपर छोड़ दे.
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बांझपन सिर्फ औरतों की ही समस्या नहीं रह गई है, बल्कि तकरीबन 50 फीसदी शादीशुदा जोड़ों में से मर्दों में भी नामर्दी के मामले देखे गए हैं. ऐसा पाया गया है कि हर 3 में से एक मर्द कमोबेश नामर्दी की समस्या से पीडि़त रहता है.
बेऔलाद जोड़ों की तादाद में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है क्योंकि नामर्दी के चलते मर्द अपनी पत्नी को पेट से करने में नाकाम होते हैं. वैसे, अगर गर्भनिरोधक उपाय आजमाए बगैर एक साल तक हमबिस्तरी करने पर भी जब बच्चा नहीं ठहरता है तो इसे शुक्राणुओं की समस्या के चलते नामर्दी मान लिया जाता है.
आमतौर पर इस तरह की समस्या कमजोर शुक्राणु के चलते होती है जबकि बच्चा ठहरने के लिए शुक्राणु
की ही जरूरत पड़ती है. ऐसे मामलों में औरतों की फैलोपियन ट्यूब तक शुक्राणु पहुंच ही नहीं पाते हैं और कई कोशिशों के बावजूद औरत पेट से होने में नाकाम रहती है.
इस समस्या के लिए कई बातें जिम्मेदार होती हैं. खास वजह धूम्रपान और ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन करना है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि गठीला बदन बनाने के लिए लड़के कम उम्र से ही स्टेरौयड और दूसरी दवाओं का सेवन करने लग जाते हैं. इस वजह से बाद की उम्र में उन्हें इस समस्या का सामना करना पड़ जाता है. बहुत ज्यादा कसरत और डायटिंग के लिए भूखे रहने जैसी आदतें भी इस की खास वजहें हैं.
नौजवानों में तेजी से बढ़ते तनाव और डिप्रैशन के साथसाथ प्रदूषण और गलत लाइफस्टाइल के चलते एनीमिया की समस्या भी मर्दों में नामर्दी की वजह बनती है. इनफर्टिलिटी से जुड़े सब से बुरे हालात तब पैदा होते हैं जब मर्द के वीर्य में शुक्राणु नहीं बन पाते हैं. इस को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. तकरीबन एक फीसदी मर्द आबादी भारत में इसी समस्या से पीडि़त है.
हमारे शरीर को रोज थोड़ी मात्रा में कसरत की जरूरत होती है, भले ही वह किसी भी रूप में क्यों न हो. इस से हमारे शारीरिक विकास को बढ़ावा मिलता है.
हालांकि कसरत के कई अच्छे पहलू भी हैं. मगर इस के कुछ बुरे पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है जिन की तरफ कम ही लोगों का ध्यान जाता है. मसलन, औरतों का ज्यादा कसरत करना बांझपन की वजह भी बन सकता है. वैसे, कसरत करने के कुछ फायदे इस तरह से हैं:
दिल बने मजबूत : हमारे दिल की हालत सीधेतौर पर इस बात से जुड़ी होती है कि हम शारीरिक रूप से कितना काम करते हैं. जो लोग रोजाना शारीरिक रूप से ज्यादा ऐक्टिव नहीं रहते हैं, दिल से जुड़ी सब से ज्यादा बीमारियां भी उन्हीं लोगों को होती हैं खासतौर से उन लोगों के मुकाबले जो रोजाना कसरत करते हैं.
अच्छी नींद आना : यह साबित हो चुका है कि जो लोग रोजाना कसरत करते हैं, उन्हें रात को नींद भी अच्छी आती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कसरत करने की वजह से हमारे शरीर की सरकेडियन रिदम मजबूत होती है जो दिन में आप को ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करती है और जिस की वजह से रात में आप को अच्छी नींद आती है.
शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी : हम में से कई लोगों के मन में कसरत को ले कर कई तरह की गलतफहमियां होती हैं, जैसे कसरत हमारे शरीर की सारी ताकत को सोख लेती है और फिर आप पूरे दिन कुछ नहीं कर पाते हैं. मगर असल में होता इस का बिलकुल उलटा है. इस की वजह से आप दिनभर ऐक्टिव रहते हैं, क्योंकि कसरत करने के दौरान हमारे शरीर से कुछ खास तरह के हार्मोंस रिलीज होते हैं, जो हमें दिनभर ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करते हैं.
आत्मविश्वास को मिले बढ़ावा : नियमित रूप से कसरत कर के अपने शरीर को उस परफैक्ट शेप में ला सकते हैं जो आप हमेशा से चाहते हैं. इस से आप के आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होती है.
रोजाना कसरत करने के कई सारे फायदे हैं इसलिए फिजिकल ऐक्टिविटी को नजरअंदाज करने का तो मतलब ही नहीं बनता, लेकिन बहुत ज्यादा कसरत करने का हमारे शरीर पर बुरा असर भी पड़ सकता है खासतौर से आप की फर्टिलिटी कम होती है, फिर चाहे वह कोई औरत हो या मर्द.
ऐसा कहा जाता है कि बहुत ज्यादा अच्छाई भी बुरी साबित हो सकती है. अकसर औरतों में एक खास तरह के हालात पैदा हो जाते हैं जिन्हें एमेनोरिया कहते हैं. ऐसी हालत तब पैदा होती है, जब एक सामान्य औरत को लगातार 3 महीने से ज्यादा वक्त तक सही तरीके से माहवारी नहीं हो पाती है.
कई औरतों में ऐसी हालत इस वजह से पैदा होती है क्योंकि वे शरीर को नियमित रूप से ताकत देने के लिए जरूरी कैलोरी देने वाली चीजों का सेवन किए बिना ही जिम में नियमित रूप से किसी खास तरह की कसरत के 3 से 4 सैशन करती हैं.
शरीर में कैलोरी की कमी का सीधा असर न केवल फर्टिलिटी पर पड़ता है, बल्कि औरतों की सैक्स इच्छा पर भी बुरा असर पड़ता है. साथ ही मोटापा भी इस में एक अहम रोल निभाता है क्योंकि ज्यादातर मोटी औरतें वजन घटाने के लिए कई बार काफी मुश्किल कसरतें भी करती हैं. इस वजह से भी उन की फर्टिलिटी पर बुरा असर पड़ता है.
इनफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे जोड़े शारीरिक और मानसिक तनाव की हालत में पहुंच जाते हैं. अकसर देखा गया है कि ऐसे मामलों में या तो शुक्राणु की मात्रा कम होती है या स्पर्म की ऐक्टिविटी बहुत कम रहती है. लिहाजा ऐसे शुक्राणु औरत के अंडाणु को गर्भाधान करने में नाकाम रहते हैं.
वैसे अब इनफर्टिलिटी से नजात पाने के लिए कई उपयोगी इलाज मुहैया हैं. ओलिगोस्पर्मिया में स्पर्म की तादाद बहुत कम पाई जाती है और एजूस्पर्मिया में तो वीर्य के नमूने में स्पर्म होता ही नहीं है. एजूस्पर्मिया में मर्द के स्खलित वीर्य से स्पर्म नहीं निकलता है जिसे जीरो स्पर्म काउंट कहा जाता है. इस का पता वीर्य की जांच के बाद ही लग पाता है.
कुछ मामलों में जांच के दौरान तो स्पर्म नजर आता है लेकिन कुछ रुकावट होने के चलते वीर्य के जरीए यह स्खलित नहीं हो पाता है. स्पर्म न पनपने की एक और वजह है वैरिकोसिल. इस का इलाज सर्जरी से ही मुमकिन है.
कुछ समय पहले तक पिता बनने के लिए या तो दाता के स्पर्म का इस्तेमाल करना पड़ता था या किसी बच्चे को गोद लेना पड़ता था, लेकिन अब चिकित्सा विज्ञान में स्टेम सैल्स टैक्नोलौजी की तरक्की ने लैबोरेटरी में स्पर्म बनाना मुमकिन कर दिया है.
लैबोरेटरी में मरीज के स्टेम सैल्स का इस्तेमाल करते हुए स्पर्म को बनाया जाता है, फिर इसे विट्रो फर्टिलाइजेशन तरीके से औरत पार्टनर के अंडाशय में डाल कर अंडाणु में फर्टिलाइज किया जाता है. इस तरीके से वह औरत पेट से हो सकती है.
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तारीफ पाना सभी को अच्छा लगता है. हर कोई चाहता है कि लोगों की नजरों में उस की छवि हमेशा अच्छी बनी रहे. अच्छी छवि से न सिर्फ समाज में नाम होगा, बल्कि खुद को ले कर आत्मविश्वासी भी बने रहेंगे. आज के समयानुसार आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है. इसलिए आप को जरूरत है परफैक्ट पर्सनल ग्रूमिंग की. इस में आप को न सिर्फ बाहरी तौर पर, बल्कि आंतरिक रूप से भी खुद को संवारने की जरूरत पड़ती है. जानिए क्यों जरूरी है ग्रूमिंग:
ग्रूमिंग का महत्त्व
नित्यांजलि इंस्टिट्यूट के फैकल्टी और ट्रस्टी, गिरीश दालवी के अनुसार ग्रूमिंग खुद के लिए जरूरी है. यदि आप कुछ अच्छा चाहते हैं, तो आप का अच्छा दिखना जरूरी है. ग्रूमिंग आप को सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बदलती है. जब आप खुद को ले कर अच्छा महसूस करेंगे तब आप ज्यादा आत्मविश्वासी होंगे.
परसोना पावर की हैड, माया दासवानी के अनुसार पहले लोग आप के बाहरी रूप से आकर्षित होते हैं. आप अपने स्टाइल, हाइजीन और पर्सनैलिटी को ले कर कितने सजग हैं, यह देखा जाता है. आप की पहली छवि ही लोगों को आप की याद दिलाती है.
क्या है ग्रूमिंग
गिरीश बताते हैं कि पर्सनल ग्रूमिंग में सेहत और ओरल हाइजीन का भी समावेश होता है. इस तरह ग्रूमिंग आप की सोच में सहजता लाती है. आप में खुद को और दूसरों को ले कर अच्छा सोचने की क्षमता बनाती है.
बाहरी सुंदरता ही नहीं, बल्कि आप से जुड़ी छोटीछोटी बातों का भी ध्यान रखना ग्रूमिंग है. एडाप्ट की सीनियर डाइरैक्टर रेखा विजयकर का मानना है कि ग्रूमिंग का मतलब है आप के लिए परफैक्ट व्यक्तित्व का निर्माण करना. पर्सनल से ले कर प्रोफैशनल और सोशल गू्रमिंग के जरीए आप के व्यक्तित्व में चार चांद लगाना ही इस का मकसद है.
प्रोफैशनल और पर्सनल ग्रूमिंग की शुरुआत
सब से पहले आप को खुद को जानने की और खुद को ले कर स्वीकार्यता बढ़ाने की जरूरत होती है. इस के बाद बारी आती है हैल्थ और हाइजीन की. आप कैसे दिखाई देते हैं और आप अपनी हैल्थ के बारे में कितना जानते हैं, इस विषय पर सोचा जाता है. इस के बाद आप की प्रोफैशनल लाइफ को ले कर सोचा जाता है. आप लोगों से कैसे बात करते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं और कितने आत्मविश्वासी हैं, इन सभी बातों का समावेश किया जाता है.
पर्सनल ग्रूमिंग में आप की गरदन, नाखूनों, त्वचा और ओरल हाइजीन का ध्यान रखा
जाता है, जिस में यह देखा जाता है कि आप सिर से ले कर पैरों तक एकदम परफैक्ट हों. प्रोफैशनल ग्रूमिंग में बारी आती है आप के व्यक्तित्व को निखारने की. इस के अनुसार आप के बात करने की टोन, बात करते हुए अपने हाथों का उपयोग और एक मुसकराहट से लोगों का दिल जीत लेने की क्षमता पर काम किया जाता है.
प्रोफैशनल ग्रूमिंग के दौरान ध्यान रखा जाता है कि आप किस प्रकार की जौब करती हैं. यदि आप टीचर हैं, तो आप को माइल्ड मेकअप के साथ परफैक्ट साड़ी ड्रैपिंग सीखनी पड़ेगी. लेकिन वहीं अगर आप कंपनी के मैनेजमैंट से संबंध रखती हैं तो आप को स्कर्ट्स और ट्राउजर जैसे कपड़ों को अपनाना होगा. लेकिन इस बाहरी रूप के अलावा आप अपने कलीग्स से कैसे बरताव करती हैं और क्लाइंट्स के सामने कैसे पेश आती हैं, यह भी प्रोफैशनल ग्रूमिंग के अंतर्गत सिखाया जाता है.
फिजिकल ऐक्टिविटी की जरूरत
इस ऐक्टिविटी में आप को पहले अपने चेहरे को आईने में देखने के लिए कहा जाता है. उस के बाद पूरे शरीर पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है. इस प्रक्रिया से आप में शरीर को ले कर स्वीकार्यता बढ़ती है. इस के बाद आप को कपड़े पहन कर अपटूडेट हो कर आईने में देखने के लिए कहा जाता है, जिस से आप ड्रैसिंग सैंस और प्रेजैंटेबल रहने के गुर सीख सकें. इस तरह आप सिर से ले कर पैरों तक अपने स्टाइल का निरीक्षण कर सकती हैं.
पर्सनल ग्रूमिंग के लिए सही उम्र
यदि मातापिता अपने बच्चों को शुरू से ही ग्रूमिंग के गुर सिखाना चाहते हैं, तो 6 साल की उम्र के बाद वे उन्हें ग्रूम करना शुरू कर सकते हैं. तब तक बच्चों की स्कूल जाने की शुरुआत हो जाती है और वे अपने आसपास के वातावरण से सीखना शुरू कर देते हैं. ऐसे में यदि आप उन्हें ग्रूम करना शुरू करेंगे, तो वे आसानी से आप की बातों को समझेंगे और उन का अनुसरण भी करेंगे.
जब बच्चा समझने लगे, तभी पर्सनल हाइजीन के बारे में बताना चाहिए. दांतों को दिन में 2 बार ब्रश करने से ले कर स्कूल यूनिफार्म को सही तरह से पहनने तक आप को उसे शारीरिक स्वच्छता का महत्त्व समझाना चाहिए. जब बच्चे 6-7 साल के होते हैं, तब से ही उन्हें ग्रूमिंग सिखाने की जरूरत पड़ती है, खासतौर पर लड़कियों को. जब वे मासिकधर्म की प्रक्रिया से पहली बार गुजरती हैं, तो उन्हें हाइजीन के साथसाथ पर्सनल ग्रूमिंग की भी शिक्षा दी जानी चाहिए.
कैरियर के लिए बेहद फायदेमंद
कैरियर के मद्देनजर गू्रमिंग में सब से पहले देखा जाता है कि आप के बातचीत का तरीका कैसा है. इस दौरान ध्यान रखा जाता है कि आप 2 भाषाओं में बात न करें. इस के अलावा आप के ड्रैसिंग स्टाइल को भी देखा जाता है, जिस में सही रंग के कपड़ों के साथसाथ सही रंग के जूते और ऐक्सैसरीज पहनने के गुर भी सिखाए जाते हैं. आप ने अकसर लोगों को कहते सुना होगा कि फर्स्ट इंप्रैशन इज लास्ट इंप्रैशन. यह बात सभी पर लागू होती है. आप की पहली छवि ही लोगों के मन में हमेशा के लिए बनी रहेगी. इसलिए आप के लिए जरूरी है कि हमेशा अपटूडेट बने रहें, प्रेजैंटेबल रहें. इस से आप अपने काम के दौरान मिलने वाले लोगों को आकर्षित कर पाएंगे.
मनी मैनेजमैंट ग्रूमिंग का एक भाग
हर व्यक्ति के लिए मनी मैनेजमैंट बेहद जरूरी है, खासतौर पर महिलाओं के लिए. मनी मैनेजमैंट पर बात करते हुए ग्रूम इंडिया की हैड, रुपेक्षा जैन बताती हैं कि आप भले ही कामकाजी महिला हों या हाउसवाइफ, आप को स्वयं पर ध्यान देने की जरूरत पड़ती है. यदि आप ऐसा नहीं करती हैं, तो खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं और यही आप के क्रोध की असली वजह होती है.
रूपेक्षा के अनुसार सब से पहले आप को अपने घरेलू खर्चों को लिख कर योजना बनानी चाहिए. इस के बाद अपनी इनकम से आप को 12 से 15% भाग खुद की ग्रूमिंग के लिए अलग निकालना चाहिए. ताकि आप खुद को संतुष्ट कर सकें .अपनी इनकम से 20 से 30% की बचत करनी चाहिए. चाहें तो आप इस भाग को म्यूचुअल फंड, एसआईपी (सिस्टेमैटिक इनवैस्टमैंट प्लान) इत्यादि में जमा कर सकती हैं. इस के बाद अपनी इनकम को आप जैसे चाहें वैसे खर्च कर सकती हैं.
गृहिणियां जो अपने लिए कभी बचा कर नहीं रखती, उन्हें ग्रूमिंग की खास जरूरत होती है. उन्हें जो पैसे मिलते हैं उन में से एक भाग निकाल कर खुद के लिए रखना चाहिए और उस में वे फिटनैस के लिए जिम या खुद की देखभाल करने के लिए ब्यूटी ट्रीटमैंट ले सकती हैं.
हाउसवाइफ के लिए भी बेहद जरूरी
जैसा कि सभी जानते हैं बच्चे अपनी मां को देख कर ही जीने का सलीका सीखते हैं, इसलिए एक मां या कहें हाउसवाइफ के लिए ग्रूमिंग जरूरी हो जाती है. वह गू्रमिंग के बाद न सिर्फ अपने घरपरिवार का, बल्कि खुद का भी बेहतर ध्यान रख पाएगी. यदि गृहिणी खुद को अच्छी तरह संवारेगी, तो लोग उस के व्यक्तित्व की तारीफ करेंगे.
ध्यान रखें आप का पहनावा, उठनेबैठने का सलीका और बोलचाल का तरीका ही समाज में आप को दूसरों से अलग दिखाता है.
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हमारे समाज में सुखी वैवाहिक जीवन का एकमात्र नुसखा कुंडली मिलान को माना जाता है. शादी के पूर्व लड़के और लड़की की जन्मकुंडली मिलाई जाती है. पंडितों और ज्योतिषियों ने हमारी विवाह परंपरा को कुंडली मिलान से ऐसा जोड़ा और जकड़ा है कि हिंदू विवाह इस के बिना संभव नहीं लगता. उन्होंने इस का खौफ पैदा कर रखा है. कुछ भविष्यवक्ता यहां तक कहते हैं कि वर और कन्या की कुंडली में यदि नाड़ी दोष है तो उस में से एक की मृत्यु अवश्यंभावी है. मंगल दोष कुंडली में हो तो यह भी बहुत हानि पहुंचाता है. ऐसे में हमारा धर्मभीरु समाज बिना कुंडली मिलान के शादी नहीं करता.
कुंडली मिलाने के बाद भी जीवन अभिशप्त
सवाल यह है कि जब पंडितों या ज्योतिषियों के द्वारा कुंडली मिलान करवा कर ही हमारे समाज में शादी होती है तो फिर क्या वजह है कि हम रोजरोज दहेज हत्या और प्रताड़ना की खबरें सुनते हैं? लड़कियों को क्यों मारापीटा जाता है? उन का पगपग पर अपमान क्यों होता है? वे ताउम्र घुटघुट कर जीने को मजबूर क्यों होती हैं?
कभी कोई मातापिता यह क्यों नहीं सोचते कि जब उन्होंने अपनी लाडली का विवाह कुंडली मिला कर किया था तब पति ने धक्के मार कर क्यों घर से निकाल दिया? जब कुंडली में नाड़ी और मंगल दोष नहीं था फिर क्यों बिटिया को मिट्टी का तेल डाल कर असमय मौत की नींद सुला दिया गया? सवाल यह भी है कि नाड़ी दोष या मंगल दोष निवारण के बाद क्यों कोई विवाहिता विधवा होती है और विधवा होने के बाद सारी उम्र अभिशप्त जीवन जीती है?
क्या कुंडली मिलाना जरूरी है
ज्योतिष और पंडित कहते हैं कि कुंडली में 36 गुण होते हैं. लड़का और लड़की दोनों के जितने ज्यादा गुण मिलेंगे उन का वैवाहिक जीवन उतना ही सुखी होगा. आमतौर पर वे मानते हैं कि यदि दोनों के 32 गुण मिल जाएं तो यह सर्वोत्तम होता है. लड़की को वह सब कुछ मिलेगा जिस की चाहत उसे होती है. 27 से अधिक गुण मिलना बेहद शुभ माना जाता है. 18 गुणों से ऊपर मिलने पर विवाह शुभ की श्रेणी में आता है.
यदि वर और कन्या की राशि एक हो तब भी विवाह को बेहद अच्छा और सफल बनने की भविष्यवाणी की जाती है. ऐसी मान्यता है कि एक राशि के लोगों का स्वभाव, विचारधारा, मानसिक स्तर सभी एक होते हैं. इसलिए उन के बीच किसी तरह का मनभेद, मतभेद नहीं होता.
लेकिन हकीकत यह है कि कुंडली मिला कर शादी करने के बाद भी जीवन में परेशानियां आती रहती हैं, जिन को लड़की को झेलना पड़ता है. इसलिए खुद से यह सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या कुंडली मिलाना जरूरी है?
राशि एक फिर क्यों मतभेद
रेखा और विजय दोनों की राशि कन्या है. शादी के वक्त पंडित ने कहा कि दोनों की जोड़ी खूब सुखी रहेगी. दोनों के मातापिता गदगद थे. शादी खूब धूमधाम से हुई. शादी के मात्र ढाई महीने बीते होंगे कि रेखा ने एक रात फोन किया कि विजय ने उस पर हाथ उठाया. मातापिता दौड़ेदौड़े गए. वहां जा कर पता चला कि शादी के सप्ताह भर बाद से ही विजय रेखा के हर काम में मीनमेख निकालने लगा. उस के घर वाले भी उसी की सपोर्ट करते.
रेखा के मातापिता ने विजय को समझाना चाहा तो उस ने दोटूक कहा, ‘‘अपनी बेटी को समझाइए कि मेरी हर बात माने वरना ले जाएं यहां से.’’
अंतत: वही हुआ जो हमेशा होता है. बेटी को समझाया गया कि अपमान का कड़वा घूंट पी कर जिंदगी काटो. शादी के बाद मायके वालों का बेटी पर कोई अधिकार नहीं रहता. उस समय किसी के मन में यह खयाल नहीं आया कि कुंडली मिला कर शादी करने का क्या फायदा हुआ? एक राशि होने पर स्वभाव में इतना अंतर क्यों है? काश, कुंडली मिलाने की जगह वे लोग लड़के के स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेते तो यह नौबत नहीं आती.
मंगल निवारण के बाद अमंगल क्यों
ज्योतिषियों के अनुसार राधिका की जन्मकुंडली में मंगलदोष था. कुंडली मिलान करते समय नाड़ी दोष भी निकल आया. उस की कुंडली के दोष का निवारण किया गया. उस के बाद भी बहुत खोजबीन करने के बाद एक लड़के से उस की कुंडली मिली. शादी के 2 साल तक सब ठीकठाक चला. तीसरे साल एक दुर्घटना में लड़के की मौत हो गई. राधिका पर क्या बीती, यह किसी ने नहीं सोचा. ससुराल वालों ने यह लांछन लगा कर उसे और उस की दुधमुंही बच्ची को घर से निकाल दिया कि वह मनहूस है. उसी की वजह से उन के बेटे के साथ हादसा हुआ.
लड़की का ही दोष क्यों
कारण कोई भी हो लड़की को दोषी ठहरा दिया जाता है. उस समय लड़के वाले यह क्यों नहीं सोचते कि अब उन की बहू का क्या होगा? बजाय इस के कि ससुराल के लोग लड़की की हिम्मत बढ़ाएं, उस का सारा हौसला पस्त कर दिया जाता है.
शादी के पहले कुंडली मिलाने की बात होती है. माना जाता है कि इस से वैवाहिक जीवन हंसीखुशी गुजरेगा, लेकिन शादी के बाद चुनचुन कर दोष लड़की में निकाला जाता है. आपस में खटपट हो तो लड़की का स्वभाव खराब है, कोई हादसा हो जाए तो लड़की अपशकुनी है. वह पाखंड दूर करने की बात करे तो नास्तिक है. सोचविचार कर काम करे तो घमंडी है, अपने आगे किसी की नहीं सुनती.
अंतिम फैसला यह सुनाया जाता है कि उस की कुंडली में ही दोष है. शादी के खूबसूरत रिश्ते का कुंडली के नाम पर मखौल बना दिया जाता है. लड़की की भावनाओं का, हर पल झेलते उस के दर्द का, तिलतिल जलते अरमानों की फिक्र किसी को नहीं होती.
तर्क से नकारें कुंडली मिलान को
हिंदू धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में कुंडली मिलान की चर्चा नहीं है. चीन, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि तमाम देशों के लोग बिना कुंडली मिलान के शादी करते हैं. क्या उन के यहां शादियां सफल नहीं होतीं? क्या उन का वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता? यह हमें समझना होगा कि शादी 2 दिलों का रिश्ता होता है. यह पतिपत्नी की आपसी समझदारी, प्रेम और विश्वास पर टिका होता है. दोनों एकदूसरे की भावनाओं को समझें, एकदूसरे का सम्मान करें, तभी वैवाहिक जीवन की मधुरता और सफलता बनी रहेगी.
कुंडली मिलान पंडितों का काला धंधा है. समाज पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने और उस के नाम पर पैसे ऐंठने की भावना उन में प्रबल होती है. यही कारण है कि वे कुंडली मिलान को सुखी.
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तीन तलाक नाम की कुप्रथा को खत्म करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वह वाहवाही और बधाई मिली जिस के वे वाकई हकदार थे, लेकिन उम्मीद से कम वक्त में उन्होंने यह ऐलान कर अपने ही किए पर पानी फेर लिया कि 45 की उम्र पार कर चुकी मुसलिम महिलाएं अब बगैर महरम के हज पर जा सकती हैं. मन की बात 2017 के आखिरी ऐपिसोड में की गई यह घोषणा कैसे एक कुरीति को बढ़ावा देती है, उस से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि यह महरम आखिर है क्या और क्यों नरेंद्र मोदी के मन में इस तरह खटका कि वे इसे खत्म करने पर उतारू हो आए.
यह कैसा भेदभाव
इसलाम में निर्देश है कि महिलाएं बिना किसी पुरुष अभिभावक या संरक्षक के हज यात्रा नहीं कर सकतीं यानी हज करने के लिए महरम जरूरी है. इसलाम के ही मुताबिक महरम वह पुरुष होता है, जिस से मुसलिम महिला शादी नहीं कर सकती. मसलन पिता, बेटा, सगा भाई और नाति यानी नवासा. अभी तक मुसलिम महिलाएं इन में से किसी एक के साथ होने पर ही हज यात्रा कर सकती थीं.
अब बकौल नरेंद्र मोदी यह ज्यादती खत्म की जा रही है और 45 पार कर चुकीं 4 या उस से ज्यादा मुसलिम महिलाएं इकट्ठी हो कर हज पर जा सकती हैं. इस बाबत मोदी की पहल पर इन महिलाओं को लौटरी सिस्टम से मुक्त रखा जाएगा.
मोदीजी यह जान कर हैरान थे कि अगर कोई मुसलिम महिला हज करना चाहे तो वह बिना महरम के नहीं जा सकती थी और यह भेदभाव आजादी के 70 साल बाद भी कायम है. लिहाजा, उन्होंने इस रिवाज को ही हटा दिया.
गुलाम बनाए रखने की साजिश
तीन तलाक के नतीजों से उत्साहित नरेंद्र मोदी अब इसलाम में सीधे दखल देने पर उतारू हो आए हैं या फिर उन्हें वाकई मुसलिम बहनों की चिंता है, इस पर भले ही बहस की गुंजाइश मौजूद हो, पर यह बिना किसी लिहाज के दोटूक कहा जा सकता है कि हज उसी तरह किसी मुसलिम के भले की बात नहीं जिस तरह हिंदुओं की तीर्थयात्रा. इन दोनों का ही मकसद अपनेअपने अनुयायियों को दिमागी तौर पर गुलाम बनाए रखने की साजिश है. पाप, पुण्य, मोक्ष, स्वर्गनर्क वगैरह पर सभी धर्मगुरु और धर्मग्रंथ एक हैं, क्योंकि इन्हीं से उन की दुकानदारी चलती है.
बिना महरम हज की आजादी धार्मिक अंधविश्वासों के पैमाने पर देखें तो मुसलिम महिलाओं को मजहब और उस के ठेकेदारों के चंगुल में फंसाए रखने का टोटका है, जिस से मुसलमान औरतों को लगे कि अब उन का नरेंद्र मोदी से बड़ा हमदर्द और रहनुमा कोई नहीं. लेकिन इस फैसले ने एहसास करा दिया है कि मोदी चाहते यह हैं कि मुसलमान खासतौर से औरतें कहीं कठमुल्लाओं की पकड़ से आजाद
न हो जाएं, इसलिए उन्हें अब धर्म के नाम पर बहकाया जाए और औरतों की आजादी को बहाली के नाम पर एक बार फिर वाहवाही लूटी जाए.
औरत जाति का दुश्मन
हज या तीर्थ यात्रा से किस का क्या और कैसे भला होता है, इस की कोई तार्किक व्याख्या मोदी या फिर कोई दूसरा उदारवादी कर पाए तो बात समझ आए, लेकिन मोदी खुद विकट के धर्मभीरु और अंधविश्वासी हैं, जो बिना मंदिर में जाए चुनाव प्रचार भी शुरू नहीं करते और यही काम या बेवकूफी राहुल गांधी करने लगे, तो पूरा भगवा खेमा हायहाय करने लगता है.
हालिया गुजरात विधान सभा चुनाव इस के गवाह हैं कि वहां धर्म के नाम पर कैसेकैसे ड्रामे हुए, जिन में विकास वगैरह की बातें गुम हो कर रह गई थीं.
वाकई मोदी महिलाओं का भला चाहते हैं तो उन्हें हज और तीर्थयात्रा दोनों पर रोक लगाने का ऐलान करने की हिम्मत दिखानी चाहिए थी. वजह है धर्म, जो औरत जाति का सब से बड़ा दुश्मन है, जिस के तहत वे पांव की जूती और भोग्या भर हैं.
बदहाली की वजह
महिलाएं आजादी के 70 साल बाद भी क्यों सशक्त नहीं हो पा रहीं, यह बात प्रधानमंत्री के मन में आए और वे इस पर चिंतनमनन कर पाएं तो फिर उन्हें यह भी सोचने को मजबूर होना पड़ेगा कि कैसेकैसे बाबाओं ने उन के कार्यकाल में भी महिलाओं की इज्जत से आश्रमों में ही खिलवाड़ किया. मथुरा, वृंदावन की तरह खुद उन के लोकसभा क्षेत्र बनारस में भी लाखों विधवाएं पेट भरने के लिए भीख मांगने के अलावा दूसरे ऐसे काम करने को मजबूर हैं, जिन से उन में कोई गैरत नहीं रह जाती.
इस बदहाली की वजह धर्म और उस के स्त्री विरोधी मूलभूत सिद्धांत नहीं तो और क्या है. जिस दिन देश के सवा सौ नहीं तो सवा करोड़ लोग भी इस सवाल के जवाब में सड़कों पर आ खड़े होंगे उस दिन किसी महरम की जरूरत किसी हिंदुस्तानी औरत को नहीं रह जाएगी.
औरत कैसे और किस के साथ काबा, काशी जाए यह कोई मुद्दा नहीं. मुद्दा यह है कि आजाद भारत में कैसे महिलाएं दिल्ली और भोपाल की सड़कों पर आधी रात को तफरीह करने की अपनी ख्वाहिश पूरी कर पाएं, इस बाबत मंत्रालयों को निर्देश दिए जाएं.
शिक्षा से वंचित
धर्म स्थलों पर जाने को प्रोत्साहन और सहूलतें देने से औरतों को कोई भला नहीं होने वाला. उन का असली भला तो स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में जाने से होगा. जाने कब किस प्रधानमंत्री के मन में यह बात आएगी. बात और मंशा चूंकि सियासी है, इसलिए किसी नेता को इस हकीकत पर अफसोस नहीं होता कि आजादी के 70 साल बाद भी एक फीसदी मुसलिम लड़कियां भी कालेज का दरवाजा नहीं देख पातीं.
बहुसंख्यक हिंदु युवतियां भी उच्च शिक्षा से वंचित क्यों हैं, इस पर सभी खामोश रहते हैं. हां, बात हज या तीर्थ की हो तो जो सरकारें खुद पुण्य कराने के लिए पानी की तरह पैसा बहाती हों, उन से क्या खा कर महिलाओं के भले या हितों की उम्मीद की जाए?
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किसान देश की रीढ़ हैं. अन्नदाता और भाग्य विधाता हैं. ऐसे जुमले अकसर किसानों को बहलानेफुसलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. कर्ज माफी, फसल बीमा व किसानों की आमदनी दोगुनी करने के ऐलान इसलिए होते हैं ताकि किसानों का वोट बैंक न खिसके. लेकिन हकीकत में किसान हर कदम पर तरसते हैं और उन की हकीकत व बदहाली जगजाहिर है.
किसानों का शोषण कोई नई बात नहीं है. बरसों पहले हिंदी के जानेमाने लेखक मुंशी प्रेमचंद ने अपने दौर में किसानों की बदतर तसवीर दिखाई थी. अपनी लिखी ज्यादातर कहानियों व उपन्यासों में उन्होंने बताया था कि किसानों को किस तरह दमन की चक्की में पीसा जाता है, सामंतवादी और पंडेपुरोहित पिछड़े व गरीब किसानों को कैसे व कितना लूटते और तंग करते हैं.
जातिवाद की देन
दरअसल, हमारे समाज की बनावट व उस की बुनियाद जातियों पर टिकी है. गंवई इलाकों में तो आज भी बहुत से मसलों की जड़ समाज में फैला हुआ वह जातिवाद है जिस का खात्मा होता नजर नहीं आता. समाज का ढांचा जातिवाद के चंगुल में होने का ही नतीजा है कि अगड़े मौज मारते हैं और दलित व पिछड़े हाड़तोड़ मेहनत कर के भी अपने हकों को पाने के लिए तरसते रहते हैं.
अगड़े, अमीर, सेठसाहूकार, जमींदार, मुखिया वगैरह जमीनों के मालिक हैं लेकिन वे सिर्फ हुक्म चलाते हैं. बोआई से कटाई तक के सारे काम वे किसान और मजदूर करते हैं जिन्हें दबा कर नीचे व पीछे रखा जाता है. धर्म, अंधविश्वास व कर्ज की आड़ में उन का शोषण किया जाता है.
अगड़े व पंडेपुजारी बिना कुछ करेधरे मौज मारने को अपना हक समझते हैं. खूनपसीना बहा कर फसल उगाने का काम किसानों का और सफाई, खिदमत व ताबेदारी को दलितों व पिछड़ों का फर्ज बताया जाता है, ऊपर से हिस्सा, बेगारी, लगान, तकावी, चुंगी, महसूल, मंडी शुल्क, घटतौली, आढ़त व कटौती की आड़ में किसानों को लूटा जाता है.
खेती बनी घाटे का सौदा
सहकारी समितियां व मंडी समितियां किसानों को शोषण से बचाने और सहूलियतें देने की गरज से बनाई गई थीं लेकिन उन में से ज्यादातर पर अगड़ों का कब्जा है और वे भी किसानों को लूटने का अड्डा बन कर रह गई हैं खासकर 80 फीसदी किसान, जो छोटी जोत के, कम पढ़ेलिखे व गरीब हैं, की दिक्कतों का अंत ही नहीं है.
लगातार लागत बढ़ने से किसानों को मुनाफा तो दूर, उपज की वाजिब कीमत भी वक्त पर पूरी नहीं मिलती. ज्यादातर किसानों को खेती से गुजारा करने लायक आमदनी भी नहीं होती. मजबूरन उन्हें खेती व घरखर्च के लिए कर्ज लेना पड़ता है लेकिन माली तंगी के चलते वे उसे वक्त पर अदा नहीं कर पाते. ऊपर से बेहिसाब तकलीफों से तंग आने, कहीं कोई सुनवाई न होने व अपने हकों से बेदखल होने से बहुत से किसान इतने मायूस हो जाते हैं कि आखिर में उन्हें खुदकुशी करने को मजबूर होना पड़ता है.
ऊंट के मुंह में जीरा
किसानों को बाजार की लूट से बचा कर वाजिब कीमत दिलाने के मकसद से सरकार फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है. इस के लिए साल 1965 में कृषि मूल्य आयोग बनाया गया था.
20 साल बाद साल 1985 में उस का नाम बदल कर कृषि मूल्य लागत आयोग कर दिया गया. यह आयोग कुल 25 अहम फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है लेकिन किसान इस मोरचे पर भी भेदभाव के शिकार होते हैं.
कृषि उपज की सरकारी कीमतों में बढ़ोतरी न के बराबर होती है. पिछले 10 सालों में गेहूं की सरकारी कीमत तकरीबन 60 से 70 फीसदी व गन्ने की कीमत तकरीबन 80 फीसदी बढ़ी है जबकि सरकारी मुलाजिमों के वेतन भत्तों में 150 से 200 फीसदी व सांसदों के वेतन भत्तों में 400 फीसदी का भारी इजाफा हुआ है. महंगाई के मारे किसान उपज की वाजिब कीमत मांगते हैं लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं सुनी जाती.
नतीजतन, किसान अपनी माली जरूरतें पूरी करने के लिए भी तरसते रहते हैं. हालात से तंग आ कर वे जहांतहां धरनाप्रदर्शन करते हैं लेकिन फिर भी किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती, किसानों की आवाज अनसुनी कर दी जाती है. साथ ही मंदसौर की तरह किसानों को लाठीडंडे व गोली खा कर जान भी गंवानी पड़ती है.
कोई रहमोकरम नहीं
किसानों व मजदूरों के शोषण का सिलसिला आज भी बरकरार है क्योंकि सरकारों में हमेशा ही किसान विरोधी लोग हावी रहे हैं. उद्योगव्यापार के मुकाबले किसानों को तरजीह नहीं दी जाती. उन्हें सिर्फ लगान देने वाला गुलाम समझा जाता रहा है. जातिवाद की इस देन के चलते किसान परेशान हो कर अपने हकों व हर चीज को तरसते हैं.
मसलन चीनी मिलों को गन्ना बेच कर किसान हर साल उस की वाजिब कीमत नकद व तुरंत पाने तक के लिए तरस जाते हैं. चीनी मिल मालिक हर साल किसानों को टरकाते हैं. वे गन्ने की कीमत व ब्याज के अरबों रुपए जबरन दबा कर बैठ जाते हैं और भुगतान करने के वक्त सुप्रीम कोर्ट तक चले जाते हैं. यह किसानों पर ज्यादती है.
उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर 20 नवंबर, 2017 को किसानों की गन्ना कीमत के तकरीबन 8 अरब, 53 करोड़, 88 लाख रुपए बकाया थे. इस में 23 करोड़, 85 लाख रुपए साल 2015 के, 39 करोड़, 71 लाख रुपए साल 2016 के व सब से ज्यादा 790 करोड़, 32 लाख रुपए साल 2017 के सीजन के बकाया हैं. मतलब, गन्ना किसान अपनी माली जरूरतें पूरी करने के लिए तरस रहे हैं, लगातार एडि़यां घिस रहे हैं लेकिन कोई नहीं सुनता.
देश में गन्ने के कुल रकबे का तकरीबन आधा हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश में है. चीनी मिलें गन्ने की कुल पैदावार का तकरीबन आधा हिस्सा ही खरीद पाती हैं इसलिए वहां लाखों किसान अपनी उपज खुद पावर कोल्हू में पेर कर गुड़ बनाते हैं लेकिन वे बिजली पाने को भी तरसते हैं, क्योंकि शहर जगमगाते हैं और गांवों को रोजाना 18 घंटे भी बिजली नहीं मिलती.
जो खेती करे सो मरे
बोआई से कटाई तक सूखा, बाढ़, कीड़े, बीमारी, आग, जानवर व चोरी जैसे जाखिमों के बाद जब फसल पक कर तैयार होती है तो मंडी में दलाल, बिचौलिए, आढ़ती व भ्रष्ट सरकारी मुलाजिम किसानों को चूना लगाने को तैयार रहते हैं. खरीद चाहे गन्ने की हो या गेहूं और धान की, खरीद के सैंटरों पर तौल, हिसाब व भुगतान में गड़बड़ी होना एक आम बात है.
इस मिलीभगत को दूर करने के कारगर इंतजाम नहीं किए जाते. गंवई इलाकों में सही तरीके से प्रचारप्रसार ही नहीं किया जाता. किसानों के फायदे की बातों को जानबूझ कर छिपाया जाता है इसलिए ज्यादातर किसानों को उन्हें दी जाने वाली छूट, सहूलियतों व माली इमदाद की कानोंकान खबर तक नहीं मिल पाती. छुटभैए नेता व भ्रष्ट मुलाजिम हिस्सा बांट लेते हैं और जरूरतमंद किसान देखते रह जाते हैं.
मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश के सहकारिता, पशुपालन, कृषि, गन्ना व बागबानी के महकमों में अजब हाल हैं. वहां किसी ओहदेदार को यह देखने की फुरसत ही नहीं है कि सरकारी स्कीमों का फायदा बरसों से लगातार व बारबार कुछ खास परिवार ही क्यों हड़प रहे हैं? मिलीभगत से फर्जी बैंक खाते खोल कर भ्रष्ट मुलाजिम गोलमाल कर देते हैं.
पड़ता खराब असर
लूटखसोट व बदइंतजामी की नदी भी ऊपर से नीचे की ओर बहती है इसलिए उस का असर किसानों की सहकारी संस्थाओं पर भी पड़ा है. नतीजतन, अब कारिंदे ही नहीं बल्कि चुने हुए संचालक व सभापति भी इस सब से अछूते नहीं हैं. किसानों की रहनुमाई करने के नाम पर वे भी बहती गंगा में हाथ धोते हैं.
ऐसे नुमाइंदों की भी कमी नहीं है जो भाईभतीजावाद करने, अपना घर भरने व अपना मतलब पूरा करने के लिए नियमकायदों को धता बताते हैं, संस्था
व किसानों को चूना लगाते हैं. इन सब गोरखधंधों से जेब चालबाजों की भरती है व माली नुकसान किसानों का होता है. किसानों पर पड़ रही इस मार का नतीजा है कि वे खेतीबारी करना छोड़ रहे हैं.
ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देशभर में गेहूं का क्षेत्रफल साल 2013-14 में कुल 304.73 लाख हैक्टेयर था जो साल 2015-16 में घट कर 302.27 लाख हैक्टेयर रह गया. इसी तरह धान का क्षेत्रफल 441.36 लाख हैक्टेयर से घट कर 433.88 हैक्टेयर, गन्ने का क्षेत्रफल 49.93 लाख हैक्टेयर से घट कर 49.53 लाख हैक्टेयर व तिलहनी फसलों का क्षेत्रफल 280.50 लाख हैक्टेयर से घट कर 261.34 लाख हैक्टेयर रह गया है.
अहम फसलों की बोआई का क्षेत्रफल कम होने का सीधा असर कुल पैदावार पर पड़ा है. साल 2013-14 में गेहूं का उत्पादन 958 लाख टन था जो साल 2014-15 में घट कर 935 लाख टन रह गया. इसी तरह धान का उत्पादन 1066 लाख टन से 1043 लाख टन व तिलहन का उत्पादन 327 लाख टन से घट कर 253 लाख टन रह गया.
किसानों के लिए चल रही स्कीमों में रुपया बहाने के बावजूद खेती में तरक्की की तसवीर बहुत धुंधली है. खेती के कचरे का बेहतर इस्तेमाल व उपज प्रोसैसिंग की नई तकनीक, नए बीज व नई मशीनें ज्यादातर किसानों की पहुंच से बाहर हैं इसलिए छोटे किसानों की जिंदगी में बदलाव नहीं दिखता है.
उपाय भी हैं
तालीम, एकजुटता, जागरूकता और तकनीकी ट्रेनिंग की कमी से किसानों को खेती, बागबानी, कोआपरेटिव, डेरी, मंडी, तहसील, चकबंदी वगैरह के दफ्तरों में जराजरा से काम के लिए धक्के खाने पड़ते हैं.
छोटेमोटे कर्ज अदा न करने पर भी हवालात, कुर्की व खेत बिकने तक की नौबत आ जाती है, ट्यूबवैल की बिजली कट जाती है इसलिए किसानों की दशा सुधारने के कारगर उपाय करने जरूरी हैं.
दरअसल, पैसे की तंगी से ज्यादातर किसान जीने, रहने, बच्चों की शादी व पढ़ाई तक के लिए हर चीज को तरसते रहते हैं. आज नेताओं व अफसरों को किसानों के मसले सुलझाने की चिंता, जरूरत व फुरसत नहीं है. अगर आगे भी यही सिलसिला जारी रहा तो किसान व उन के बच्चे खेती से मुंह मोड़ लेंगे तब मुश्किलें बेकाबू हो जाएंगी.
सरकारी, सहकारी व निजी सैक्टर में नए कदम उठाए जा सकते हैं. मसलन किसानों को पराली से बिजली, खाद व कागज की लुगदी वगैरह बनाने, डब्बाबंदी कर के उपज की कीमत बढ़ाने, इंटरक्रौपिंग से जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने, खेती की लागत घटाने, प्रति हैक्टेयर उपज बढ़ाने वगैरह की तकनीक सिखाई जाए ताकि खेती का खर्च कम से कम व पैदावार ज्यादा से ज्यादा हो व खेती से किसानों की आमदनी बढ़ सके.
देश की खुशहाली के लिए खेती के सहायक कामधंधों और गांवों में फूड प्रोसैसिंग यूनिटों को बढ़ावा देना लाजिमी है. किसानों को खुद भी अकेले या मिल कर गांवों में छोटेबड़े कारखाने लगाने के लिए आगे आना चाहिए. सरकारों को इस में भरपूर सहूलियतें, छूट, माली इमदाद वगैरह किसानों को देनी चाहिए ताकि किसानों की दिक्कतें कम हो सकें और वे कदमकदम पर हर चीज के लिए तरसने को मजबूर न रहें.
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जीवन एक परीक्षा है और इस के लिए पहले से कोई भी किसी भी तरह की तैयारी नहीं करता. वह उस में पास या फेल होता रहता है. और इस तरह से वह जीवन को आगे ले जाता है. पर नौकरी पाने के लिए कोई भी हाथ पर हाथ धरे नहीं रह सकता. नौकरी पाने के लिए इंटरव्यू देना पड़ता है.
इंटरव्यू के नाम से अच्छेअच्छों के पसीने छूट जाते हैं. यदि हम ने इंटरव्यू को हौवा समझ लिया तो इंटरव्यू तो हम दे देंगे पर उस में सफल होने की गारंटी हम खुद को भी नहीं दे पाएंगे.
आइए, जानें कुछ ऐसी बातें, जो हमारे इंटरव्यू की सफलता की गारंटी बन सकती हैं :
रिज्यूमे को प्रभावशाली बनाएं
इंटरव्यू देने जाने से पहले अपने रिज्यूमे का रिव्यू कर लें और अपनी योग्यता यानी स्किल्स को हाईलाइट करें क्योंकि यही आप को दूसरे एप्लिकैंट से अलग करता है.
इंटरव्यू में जाने से पहले रिज्यूमे में अपने कैरियर, एजुकेशन और रुचि के बारे में जो भी लिखा हो, उस को एक बार अच्छी तरह देख लें, क्योंकि जो भी आप रिज्यूमे में अपने बारे में लिखेंगे उसी के आधार पर इंटरव्यू लेने वाले आप से प्रश्न करेंगे.
आप इंटरव्यू के दौरान केवल अपने अनुभव और स्किल के बारे में ही बताएं. यह भी जताएं कि आप का अनुभव व स्किल कंपनी के कितने काम आ सकता है.
कंपनी की पूरी जानकारी रखें
आप जिस कंपनी में इंटरव्यू देने जा रहे हैं उस के विषय में जितनी अधिक जानकारी रखेंगे, आप के सिलैक्शन के चांसैज उतने ही अधिक होंगे. उस कंपनी के इतिहास, उस का कम्युनिटी में योगदान- चाहे वह स्थानीय या राष्ट्रीय या फिर अंतर्राष्ट्रीय और उस की राइवल कंपनीज के बारे में जितनी भी जानकारी आप जुटा सकते हैं, जुटाएं. उस कंपनी के उद्देश्य तथा उस की वैल्यूज क्या हैं? ये सारी बातें उस कंपनी की वैबसाइट, उस के सोशल पेजेस- लिंक्डइन, फेसबुक और उस के ब्लौग से जुटाई जा सकती हैं.
यह भी जरूर जानने की कोशिश करें कि हाल में इस कंपनी के बारे में लोकल, राष्ट्रीय और ट्रेड न्यूजपेपर में क्या छपा है? ट्रेड पत्रिकाओं में कंपनी के बारे में इनसाइड स्टोरी छपती हैं जिस से पता चल जाता है कि किसी कंपनी का बिजनैस सैक्टर में क्या प्रभाव है. ये सारी जानकारियां आप को दूसरे प्रतियोगियों से अलग करेंगी.
ये सारी बातें इंटरव्यू लेने वालों के सामने यही दर्शाएंगी कि आप इस कंपनी के लिए कितने जरूरी हो सकते हैं. ये सारी जानकारियां जुटाने पर आप का आत्मविश्वास और भी बढ़ेगा और जो जानकारी आप के पास उस कंपनी के विषय में होगी, वह निश्चितरूप से दूसरे प्रतियोगियों के पास नहीं होगी और यही बात आप को दूसरों से अलग करती है.
योग्यता संबंधित प्रश्नों के जवाब
आप से यह प्रश्न जरूर पूछा जाएगा कि आप की योग्यता या स्किल कंपनी के कैसे काम आ सकती है? आप से यह भी कहा जा सकता है कि आप अपनी स्किल्स को उदाहरण के साथ समझाएं कि कुछ सिचुएशन में आप कैसे रिऐक्ट करेंगे? आप की स्किल्स अकसर कुछ क्षेत्रों जैसे लोगों से बातचीत करना और उस से होने वाले प्रभाव और मैनेजमैंट से रिलेट जरूर करेंगे.
अपनी क्षमता को पहचानें
अपनी क्षमता को पहचानना भी जरूरी है क्योंकि ये आप ही हैं जो बता सकते हैं कि आप उस कंपनी के लिए कितने उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, आप की क्षमताएं कंपनी के कैसे काम आ सकती हैं.
इंटरव्यूअर यह जानने की कोशिश करते हैं कि आप कैसे अपनी योग्यताओं का उपयोग कर दूसरों के साथ मिल कर समस्याओं को दूर कर सकते हैं. वे यह भी निश्चित करना चाहते हैं कि आप कैसे अपने काम के प्रति प्राउड फील करते हैं. इस तरह के प्रश्नों के जवाब वे तुरंत चाहेंगे जिस से वे एक जैन्यूइन रिस्पौंस पा सकें.
अगर आप का इंटरव्यू आप की क्षमताओं से हट कर आप की प्राथमिकताओं पर आधारित होने लगे तो घबराएं नहीं. यदि ऐसा होता है तो बेहतर है कि आप इंटरव्यूअर के सवालों को ऐंजौय करें. इस से आप बेहतर ढंग से इंटरव्यू का सामना कर सकेंगे.
प्रश्नों की तैयारी करें
इंटरव्यू के अंत में आप से यह जरूर कहा जा सकता है कि क्या आप कुछ पूछना चाहते हैं? यदि ऐसा है तो इसे एक अवसर मानें. इस से आप अपने इंटरव्यूअर को इंप्रैस भी कर सकते हैं. और साथ ही, उस कंपनी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि आप ऐसे प्रश्न तैयार करें जिस से इंटरव्यूअर को लगे कि आप कुछ तैयारी कर के आए हैं.
ऐसे प्रश्नों को अवौयड करें जो आप के बारे में बहुत अधिक रिवील करते हों. ऐसे सवाल न पूछें जो इंटरव्यू के दौरान पूछे जा चुके हों. कंपनी के विषय में पूछें, जैसे कंपनी का विजन और वैल्यूज. ट्रेनिंग और डैवलपमैंट के अवसर. और जो इंटरव्यू ले रहे हैं उन की बैकग्राउंड और कंपनी के साथ उन के कार्य के बारे में. कंपनी के भविष्य की योजना के बारे में जानना यह दर्शाएगा कि आप इस कंपनी में काम करने को ले कर कितने गंभीर हैं.
फर्स्ट इंप्रैशन बेहतर बनाएं
यह मौका आप को केवल एक ही बार मिलता है. फर्स्ट इंप्रैशन इंटरव्यू के पहले मिनट में ही बन जाता है. आप का अपियरेंस और बौडी लैंग्वेज यह तय कर देते हैं. इस के लिए जौब के हिसाब से ड्रैस चुनें और स्मार्टली ड्रैसअप हो कर जाएं ताकि आप उत्साहित और कौन्फिडैंट नजर आएं.
जब आप से बैठने को कहा जाए तो सीधे बैठें और थोड़ा आगे की ओर झुकें जिस से लगे कि आप बातचीत के लिए तैयार हैं. पूरे इंटरव्यू के दौरान इंटरव्यूअर से सीधे आई कांटैक्ट रखें.
पौजिटिव रहें
आप की सोच पौजिटिव रहनी बेहद जरूरी है. आप अपने इंटरव्यू की तैयारी इस पौजिटिव सोच के साथ करें कि ये उक्त पोस्ट केवल आप के ही लिए बनी है. पर ओवर कौन्फिडैंट न हों. इंटरव्यू के दौरान पौजिटिवली बात करें जिस से कि आप के साथ इंटरव्यूअर को भी लगे कि आप सफल होना चाहते हैं.
इंटरव्यू के दौरान यह भी जानने की कोशिश करें कि इस जौब का वातावरण आप के काम के लिए अनुकूल है या नहीं? और यहां आप की योग्यता के लिए एक बेहतर भविष्य भी है या नहीं? इंटरव्यू देते समय यह कभी न दर्शाएं कि आप इस जौब के लिए डैस्परेट हैं, बल्कि यह जताएं कि आप की योग्यता इस कंपनी के लिए कितनी जरूरी है.
आखिर में याद रखें कि इंटरव्यू के दौरान न तो बहुत ज्यादा खामोश रहना उचित होता है, न जरूरत से ज्यादा बोलना. ओवरस्मार्ट या दब्बू न बनें, जितना पूछा जाए आत्मविश्वास से भर कर जवाब दें. जिस के विषय में जानकारी न हो, उस पर आड़ाटेढ़ा जवाब देने से अच्छा है कि सीधे तौर पर अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर दें. जरूरी नहीं है कि हर सवाल का जवाब आप को पता हो. थके व बुझे चेहरे के साथ इंटरव्यूअर का सामना न करें.
अपनी पर्सनैलिटी की चमक व चेहरे पर मुसकान बरकरार रखें ताकि सामने वाले पर आप का इंप्रैशन सकारात्मक रहे. इस से आप के इंटरव्यू की सफलता के चांसेस बढ़ जाते हैं.
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अगर आप व्हाट्सऐप पर आने वाले गुड मौर्निंग, गुड नाइट के मैसेज से परेशान हैं तो अब आपको जल्द इस तरह के फोरवार्डिड और स्पैम मैसेज से छुटकारा मिल सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि व्हाट्सऐप एक ऐसे फीचर की टेस्टिंग कर रहा है, जिसमें आपको फोरवर्ड किए हुए मैसेज के ऊपर ‘फोरवार्डिड’ लिखकर आएगा. यानी, अगर आप हर दिन गुड मौर्निंग, गुड नाइट जैसे फोरवर्ड किए जाने वाले मैसेज पसंद नहीं करते, तो आपको राहत मिल सकती है. यह फीचर डब्ल्यूएबीटाइनफो की नजर में आया है, जो व्हाट्सऐप का अपडेट ट्रैकर है. दावा किया गया है कि यह फीचर व्हाट्सऐप बीटा में एंड्रायड वी2.18.67 वर्जन के लिए है.
इसके अलावा व्हाट्सऐप एक और नया फीचर लेकर आ रहा है, जिसका नाम स्टीकर है. इस फीचर को बीटा वर्जन पर जारी कर दिया गया है. यह फीचर पहले व्हाट्सऐप के विंडोज औपरेटिंग सिस्टम के लिए आया था. फिलहाल इन दोनों ही फीचर को बाइ डिफौल्ट डिसेबल रखा गया है. वेबसाइट के मुताबिक, व्हाट्सऐप पर अगर यूजर को किसी का फोरवार्डिड मैसेज मिलता है, तो अब उसे इस बात की जानाकरी दी जाएगी.
बता दें कि व्हाट्सऐप ने हाल ही में एंड्रायड और विंडोज फोन के लिए बीटा वर्जन में ग्रुप डिस्क्रिप्शन फीचर दिया था. इस फीचर को किसी कोड के जरिए इनेबल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह यूजर को अपने आप दिखेगा. इस फीचर का मदद से व्हाट्सऐप ग्रुप का कोई भी सदस्य, डिस्क्रिप्शन को संपादित कर पाएगा. इस डिस्क्रिप्शन की शब्द सीमा 500 रखी गई है. इसे पब्लिक ग्रुप को और दिलचस्प और सहज बनाने के लिए जोड़ा गया है.
बता दें कि साल 2016 में व्हाट्सऐप ने इसमें चैट इनवाइट फीचर भी जोड़ा था. इसी महीने की शुरुआत में डब्ल्यूएबीटाइन्फो ने एंड्रायड बीटा में टीओएस भी देखा था. जिसके जरिए व्हाट्सऐप का डेटा फेसबुक पर शेयर किया जा सकता है.