निदास ट्रौफी में भारत का सामना बांग्लादेश से रविवार को होना है. टूर्नामेंट में पहला मुकाबला श्रीलंका से हारने के बाद भारतीय टीम ने लगातर तीन मैचों में जीतकर फाइनल में जगह बनाने में कामयाब रही. वहीं शुक्रवार को खेले गए बेहद रोमांचक मुकाबले में बांग्लादेश ने श्रीलंका को दो विकेट से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया.
रोहित शर्मा की कप्तानी में भारतीय टीम का रिकौर्ड टी-20 मैचों के अंदर शानदार रहा है. दक्षिण अफ्रीका दौरे पर बेअसर रहे रोहित निदास ट्रौफी के शुरुआती मुकाबलों में भी विफल नजर आए. हालांकि, फाइनल मैच से पहले बांग्लादेश के खिलाफ रोहित 61 गेंदों में 89 रनों की पारी खेलने में कामयाब रहे हैं.
फाइनल में भी रोहित कुछ इसी तरह के प्रदर्शन को जारी रखना चाहेंगे, श्रीलंका में मौजूद भारतीय कप्तान रोहित शर्मा वहां की भाषा सीखने की कोशिश करते देखे गए. दरअसल, बीसीसीआई ने अपने औफिशियल ट्विटर हैंडल पर एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में रोहित दो श्रीलंकन फैन्स के साथ बैठकर श्रीलंका की भाषा को सीखने का प्रयास कर रहे हैं. रोहित शर्मा कहते हैं, यह भाषा बेहद कठिन है, इसे आसानी से नहीं सीखा जा सकता.
हालांकि, रोहित शर्मा ने श्रीलंका की लोकल लैंग्वेज सिंहली में कुछ शब्द बोलने का प्रयास किया. इस दौरान दोनों फैन्स ने रोहित के साथ खूब मस्ती भी की और रोहित भी उनके साथ बेहद खुश नजर आए. रोहित शर्मा के फैन्स भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के हर कौने में मौजूद हैं. रोहित अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी की वजह से दुनिया के खतरनाक ओपनरों में से एक माने जाते हैं. रोहित पिछले कुछ समय से भले ही आउट औफ फौर्म चल रहे हों, लेकिन उनकी एक बड़ी पारी उन्हें लय में वापस लाने का काम कर सकती है.
इस टूर्नामेंट का पहला मैच भारत और श्रीलंका के बीच खेला गया था, जिसमें भारतीय टीम को 5 विकेट से हार का सामना करना पड़ा था. वहीं दूसरे मुकाबले को भारत बांग्लादेश से जीतने में कामयाब रहा. इसके बाद बाकी के दो मैचों में भी भारत ने जीत हासिल की. रोहित शर्मा फाइनल मैच से पहले टीम में शायद ही कोई बदलाव करना चाहेंगे. मोहम्मद सिराज की जगह एक बार फिर जयदेव उनादकट को टीम में शामिल किया जा सकता है.
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डिजिटल वौलेट पेटीएम ने अपने ग्राहकों के लिए दो नई सर्विस शुरू की है. अगर आप इसका इस्तेमाल करते हैं तो अब घर बैठे इसका फायदा उठा सकेंगे. इन सर्विस का इस्तेमाल करने के लिए आपको किसी तरह का कोई ट्रांजैक्शन चार्ज भी नहीं देना होगा. आपको बता दें, हाल ही में कंपनी ने सर्विस पेटीएम फास्टैग शुरू की. पेटीएम फास्टैग वाहनों को टोल प्लाजा से बिना रुके गुजरने की सुविधा देगा और भारत में प्रत्येक टोल में कैशलेस भुगतान के फायदे लाएगा. अब कंपनी दो और नई सर्विस शुरू की है.
ये दो नई सर्विस शुरू की
नई सर्विस के तहत अब ग्राहक किसी को गोल्ड गिफ्ट में दे सकते हैं. दूसरे में आप आपने लिए गोल्ड खरीद सकते हैं. यह दोनों सर्विस Paytm गोल्ड नाम से मिलेंगी. आप बाद में चाहें तो इस गोल्ड को या तो कैश करा सकते हैं या गोल्ड की फिजिकल डिलिवरी भी ले सकते हैं.
24 कैरेट गोल्ड मिलेगा
कंपनी का दावा है कि आप अपने नजदीकी लोगों को 24 कैरेट 999.9 प्योरिटी वाला गोल्ड जितनी बार चाहें भेज सकते हैं. पेटीएम का कहना है कि उसके प्लेटफार्म से 60 फीसदी गोल्ड की खरीदारी टायर टू और टायर थ्री शहरों से हो रही है. कंपनी का कहना है कि उनके प्लेटफार्म से 500 रुपए के गोल्ड की खरीदारी लोग सबसे ज्यादा करते हैं. ज्यादातर बार तो यह रिपीट खरीदारी ही होती है.
गोल्ड सेविंग प्लान
Paytm के मुताबिक, उसकी गोल्ड सेविंग स्कीम का उद्देश्य ग्राहकों को उनकी सेविंग के अनुसार खरीदारी के मौके देना है. इस माध्यम से ग्राहक आसानी से अपनी जरूरत के हिसाब से गोल्ड में निवेश कर सकता है. इसमें ग्राहक अपने बजट और वजन जैसा भी चाहे उसके अनुसार गोल्ड की खरीदारी कर सकता है.
कभी भी ले सकते हैं गोल्ड
Paytm के मुताबिक, अगर लोग चाहें तो इस गोल्ड को कभी भी प्राप्त कर सकते हैं. उनका यह गोल्ड MMTC PAMP’s के लौकर में पूरी तरह सुरक्षित रहता है. इस गोल्ड का बीमा भी होता है, जिससे किसी भी तरह के नुकसान की आशंका न रहे. इस गोल्ड की खरीदारी में किसी भी तरह की फीस भी नहीं लगती है, जैसे चार्ज लोगों को फिजिकल खरीदारी में देने होते हैं. इनमें मेकिंग चार्ज और लौकर चार्ज जैसी लागत शामिल होती है.
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क्या आपको पता है कि अब आपको वोटर आईडी कार्ड बनवाने के लिये पहले की तरह भागदौड़ करने की जरूरत नहीं होगी, वोटर आईडी कार्ड के लिए आप औनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. अगर आपको नया वोटर आईडी कार्ड बनवाना है या फिर आपका वोटर आईडी कार्ड खो गया है और उसकी नई कौपी निकलवानी है तो आसानी से औनलाइन निकलवा सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले निर्वाचन आयोग की वेबसाइट https://www.nvsp.in/ पर जाना होगा. इसके बाद Apply online for registration of new voter/due to shifting from AC पर क्लिक करना होगा. यहां क्लिक करते ही आपके सामने एक फौर्म खुल जाएगा. यह फौर्म औनलाइन वोटर आईडी कार्ड बनवाने के लिए फार्म 6 है. यहां आप अपनी भाषा का चयन कर लें.
इस फार्म में आपको अपना नाम, आयु, जन्म तिथि, जन्म का स्थान, पता, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी जैसी जानकारी भरनी होती है. साथ ही आपको यहीं पर सहायक दस्तावेज स्कैन कौपी के रूप में सब्मिट करने होते हैं. इनमें आपका फोटो आईडी प्रूफ और एड्रेस प्रूफ स्केन करके अपलोड करना होता है. साथ ही अन्य छोटी जानकारी देनी होती है. पूरा फार्म भरने के बाद इसे एक बार पूरी तरह से जांच लें कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई है. इसके बाद इसे सब्मिट कर दें. सब्मिट करने के बाद आपके द्वारा दी गई ईमेल आईडी पर एक लिंक आएगा. इस लिंक पर क्लिक करके आप अपना कार्ड ट्रैक कर सकते हैं. फौर्म भरने के बाद वोटर आईडी कार्ड जारी होने में करीब 30 दिन तक का समय लगता है.
आयु प्रमाण पत्र के लिए इनमें से देना होगा कोई एक डौक्यूमेंट
जन्म प्रमाण पत्र
स्कूल से मिला जन्म प्रमाण पत्र
अगर आप दसवीं पास हैं तो इसकी मार्कशीट या सर्टिफिकेट जिसमें जन्म तिथि दी गई हो, आयु प्रमाण पत्र के रूप में पेश किया जा सकता है.
कक्षा 8 की मार्कशीट जिसमें जन्म तिथि दी हो
कक्षा 5 की मार्कशीट जिसमें जन्म तिथि दी हो
भारतीय पासपोर्ट
पैन कार्ड
ड्राइविंग लाइसेंस
आधार कार्ड
एड्रेस प्रूफ के इनमें से कोई एक डौक्यूमेंट दे सकते हैं
बैंक/किसान/पोस्ट औफिस की पासबुक
राशन कार्ड
पासपोर्ट
ड्राइविंग लाइसेंस.
इनकम टैक्स एसेसमेंट आर्डर
वर्तमान रेंट एग्रीमेंट
लेटेस्ट पानी/बिजली/गैस कनेक्शन का बिल जिसमें स्वयं आवेदक या उसके परिवार का नाम दिया हो.
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4 वर्ष पहले 15 अगस्त, 2014 को दिल्ली के लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी उद्घोषणा से लोगों को एकबारगी चौंका दिया था. सब के चहरे पर मुसकान थी, नारा था ‘मेरा खाता भाग्य विधाता.’ लोगों में आशा की किरण हिलोरें लेने लगी थी, 15 नहीं, तो 5 लाख रुपए तो मिल ही जाएंगे. जितने मुंह उतनी बातें होती थीं.
केंद्र सरकार ने 28 अगस्त, 2014 को आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री जनधन योजना के नाम से इस योजना का शुभारंभ कर दिया. देखते ही देखते 5 सप्ताह के अंदर ही 5 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके थे. इस बीच, खाते खोलने में जो अड़चनें आईं उन को दूर करने के लिए नियमों में ढिलाई दी गई, दस्तावेजों से समझौता किया गया.
परिणामस्वरूप, अक्तूबर 2017 में वित्तीय सेवा विभाग के जारी आंकड़ों के अनुसार, 30.60 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत अपने खाते खुलवाए हैं और इन खातों में कुल 67,687.72 करोड़ रुपए जमा किए जा चुके हैं.
वास्तव में गरीबों के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, इस में दोराय नहीं. उन के नाम एक खाता तो हो गया वरना वे महीनों बैंकों के चक्कर लगाते रहते थे खाता खुलवाने के लिए, फिर भी कागजी कार्यवाही पूरी नहीं कर पाते थे और फिर थकहार कर घर बैठ जाते थे.
अब सही बात यह है कि खाता खुल गया तो बैंकों ने उन की गाढ़ी कमाई पर कैंची चलाना चालू कर दिया है. मैसेज, आहरण, बचत खाते में निर्धारित जमा से कम की राशि आदि और न जाने कितने नियमों का हवाला बैंक वाले आएदिन इन खाताधारकों को देते रहते हैं और उन के खातों में जमा रुपयों पर कैंची चलाते रहते हैं.
बैंकों की मनमानी
आज गरीब व्यक्ति साहूकारों व सूदखोरों से कहीं ज्यादा, अपने बैंकों से पीडि़त है. ब्याज तो कम है लेकिन बैंकों का मासिक चार्ज बहुत ज्यादा है. अब मजदूरगरीब जाए तो कहां जाए. सूदखोरों से मुक्ति के लिए तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा लेता था किंतु बैंकों की मनमानी लूट ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. सरकार का शासकीय आदेश जीरो बैलेंस, निशुल्क रुपे कार्ड के नारे आदि धरे के धरे रह गए, जैसे भजनों से मिलने वाला सुख, शांति व समृद्धि.
जनधन खाते के कुछ खातेदार ऐसे हैं जो 1,000-500 तो दूर, 100-200 रुपए भी जमा नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में बैंक नितनए नियमों का हवाला देते हुए सैकड़ों का चूना खाताधारकों को हर महीने लगाएं, यह उचित नहीं है. एक ओर जहां सरकार कैशलैस भुगतान की योजना चला रही है, वहीं दूसरी तरफ विभिन्न प्राइवेट और सरकारी बैंकों ने खाताधारकों के खाते से 1 अप्रैल, 2017 से भारीभरकम कटौती करने लगे हैं.
बचत खाते में महानगरों में रहने वालों को 3 हजार, शहरी व कसबाई इलाकों में रहने को 2 हजार और ग्रामीण इलाकों में 1 हजार रुपए खाते में औसतन रखना जरूरी होगा. ऐसा न करने पर बैंक 50 से 100 रुपए तक सर्विस चार्ज की वसूली ग्राहक के खाते से करता है. यदि एटीएम कार्ड आप के बताए पते से वापस चला जाता है तो इस के एवज में कूरियर चार्ज के रूप में 100 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किया जाता है.
डैबिट कार्ड के सालाना चार्ज में भी बढ़ोतरी की गई है. क्लासिक डैबिट कार्ड पर 125 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. सिल्वर, ग्लोबल, युवा व गोल्ड डैबिट कार्ड पर 175 रुपए व सर्विस टैक्स खाते से कटते हैं. प्लैटिनम डैबिट कार्ड वालों के खाते से 250 रुपए व सर्विस टैक्स तो प्राइड व प्रीमियम बिजनैस डैबिट कार्ड वालों से 350 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल किए जाते हैं.
अगर एटीएम कार्ड रिप्लेस करना है तो बैंक इस के एवज में खाते से 300 रुपए वसूल करता है. एटीएम पिन भूल जाते हैं और फिर डुप्लीकेट या रीजनरेट कराते हैं तो बैंक आप के खाते से 50 रुपए व सर्विस टैक्स वसूल करता है.
इंटरनैशनल ट्रांजैक्शन खास कर बैलेंस इन्क्वायरी पर 25 रुपए व सर्विस टैक्स, कैश विथड्राअल ट्रांजैक्शन पर 100 रुपए मिनिमम कटौती किए जाने का नियम है. वह भी साढ़े 3 प्रतिशत सर्विस चार्ज के साथ. 5 बार ही टैक्सफ्री ट्रांजैक्शन की सुविधा मिलती है. 5 से ज्यादा ट्रांजैक्शन करने पर प्रति ट्रांजैक्शन ग्राहक को 10 से 15 रुपए देने होते हैं.
गाढ़ी कमाई से कटौती
न्यूनतम जमाराशि के नाम पर खाताधारक के खाते में निर्धारित राशि का होना अनिवार्य है. जिन के खाते में इस से कम राशि है और वे अपने खाते में बेगारी के चलते रुपए जमा नहीं कर पा रहे हैं तो वे अपनी गाढ़ी कमाई, जो आड़े वक्त के लिए बचा कर रखी थी, उस से भी हाथ धोने को मजबूर हैं.
कमलेश कुमार, निवासी कसबा हरगांव, जिला सीतापुर, पेशे से राजगीर हैं. वे अपनी आपबीती सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं, कहते हैं कि उन के खाते में 1,173 रुपए थे जो अब कटपिट कर मात्र 630 रुपए रह गए हैं, जिस में उन का प्रधानमंत्री बीमा योजना का चार्ज 312 रुपए भी शामिल है. वे कहते हैं कि एक गरीब आदमी, जिस के सिर पर 5 जनों का बोझ हो और रोज की मजदूरी ही जीने का एकमात्र सहारा हो, वह बैंक में 2 हजार रुपए की न्यूनतम जमाराशि हमेशा कैसे रख सकता है. वे पारिवारिक खर्च के चलते बच्चे के स्कूल की मासिक फीस जमा नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में बैंक में पैसा कहां से जमा करें.
रहीस के खाते में 600 रुपए की जमाराशि पर 150 रुपए की कटौती की गई है. उन से बैंक में 2,000 रुपए की जमा के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि यदि घर में 4 लोगों का खाता हो और सारे खातों में मिला कर 8,000 रुपए जमा कर दिए जाएं तो वह रुपया गरीब आदमी के किस काम का जिस का वह ऐनवक्त पर इस्तेमाल न कर सके.
राकेश कुमार लखीमपुरखीरी में अध्ययनरत एक छात्र हैं. उन की शहरी क्षेत्र के एक राष्ट्रीयकृत बैंक खाते में 2,120 रुपए की जमाराशि थी, लेकिन अब मात्र, 1,675 रुपए ही शेष हैं और वह भी बैंक की भेंट चढ़ता जा रहा है. वे दुखी हैं, बेरोजगारी में खाते को कैसे मेंटेन करें.
विधवा गुड्डी देवी अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि वे अपने खाते में पैंशन के शेष 1,500 रुपए में से 1,000 रुपए लेने आई थीं दवा खरीदने के लिए, पर यहां पता चला कि खाते से 185 रुपए कट गए हैं. बैंककर्मी ने खाते में और रुपए डालने की बात कह कर उन्हें चलता कर दिया.
कांति सिंह लखनऊ में रह कर परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, उन का स्टूडैंट खाता है. उन के खाते में 2,560 रुपए थे जो एकदिवसीय परीक्षाओं की फीस आदि के लिए रखे हुए थे. वे तब दंग रह गईं जब डैबिट कार्ड से फीस जमा कर रही थीं. पता चला खाते से 540 रुपए कम हो गए हैं. बैंक से पता करने पर मालूम हुआ कि खाते से 540 रुपए की राशि डैबिट कार्ड, एसएमएस चार्ज व मासिक खाता मेंटिनैंस आदि के काट लिए गए हैं.
किस काम का खाता
आमजन खाते को चालू रखने के लिए रुपए जमा कर तो दें किंतु बैंककर्मी निर्धारित से कम की राशि होने पर चलता कर देते हैं. ऐसे में लोग अपने खाते को संचालित करने के स्थान पर अपना बैंक खाता बंद करवाना ही उचित समझते हैं. यह नमूना तो मात्र मेरे अपने आसपास के लोगों का है, देश में न जाने ऐसे कितने लाखोंकरोड़ों लोग होंगे जो बैंकों की इस अप्रत्याशित लूट का शिकार होते रहते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का नारा ‘अपना खाता भाग्य विधाता’ एक मजाक बन कर रह गया है.
बेचारा जनधन का मारा खाताधारक अब अपने घर की दालरोटी चलाने की जुगत करे या अपने खाते को मेंटेन करे. परिवार चलाने के लिए महंगाई की मार वह अलग से झेल रहा है. कामधंधा के नाम पर केंद्र सरकार ने कोई नया काम अभी तक नहीं किया. 4 वर्षों से सरकार अपने प्रचार में ही लगी हुई है. अब बेचारा खाताधारक अपने खाते को मेंटेन करने के लिए चोरीडकैती करे या फिर जेब काटे, वरना बैंक से अपनी जेब कटवाए.
असुरक्षित खाताधारक
गरीब मजदूर खाताधारक जहां बैंक में जमा कटौती से परेशान हैं वहीं बड़े खाताधारक असुरक्षा से परेशान हैं. देश के सभी सरकारी, अर्धसरकारी, शहरी, ग्रामीण बैंक खाते से आधार जोड़ने का अभियान चला रहे हैं. क्या यह पूरी तरह सुरक्षित है? इस का उत्तर न सरकार के पास है न बैंकों के पास, खुद आधार जारी करने वाली संस्था यूआईडीएआई ने भी इसे सुरक्षित नहीं माना है.
यूआईडीएआई ने बताया है कि अब तक 210 बार आधार से जुड़े लोगों की गोपनीय जानकारी जन्मतिथि, पता आदि को लीक किया जा चुका है. इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि ऐसा कबकब घटित हुआ है. साइबर हमले का भ्रम लोगों के बीच बना हुआ है. इस प्रकार की घटनाएं वहां तक घटित हो रही हैं जो राष्ट्र तकनीकी मामलों में भारत से कहीं ज्यादा विकसित हैं.
आएदिन बैंक साइबर हमले के शिकार हो जाते हैं और अपने साथसाथ लोगों को आर्थिक पंगु बना देते हैं. ऐसे में हम खुद को साइबर हमलों से कितना सुरक्षित पाएंगे जबकि साइबर अपराधी को आधार कार्डों का एक मजबूत मंच मिल जाएगा. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, साइबर अपराध का मामला देश में सालदरसाल बढ़ता ही जा रहा है. 2014 में यह आंकड़ा 3,622 था, जो 2015 में बढ़ कर 11,592 और 2016 में 12,317 के स्तर को पार कर गया है.
आईटी विशेषज्ञ रामानुज पांडे कहते हैं कि साइबर अपराधों को रोकने के लिए बड़े स्तर पर कोई खास तकनीकी अभी तक ईजाद नहीं की गई है. इस के बचाव हेतु आमजन के मध्य में डिजिटल जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए. तभी हम सब को साइबर अपराधियों से सुरक्षित रख सकते हैं.
हैकरों का सब से पसंदीदा निशाना बैंक, इनवैस्टमैंट एजेंसियां और बीमा कंपनियां हैं. साइबर सिक्योरिटी फर्म सिमैनटेक के मुताबिक, 2015 में हैकरों ने 35 फीसदी हमले इन्हीं क्षेत्रों पर किए. हैकरों ने न्यूयौर्क फैडरल रिजर्व में सेंध लगा कर बंगलादेश के बैंकों से 8.1 करोड़ डौलर उड़ा दिए थे. 12 मई, 2017 को वैश्विक रैनसमवेयर हमला हुआ. हैकर्स ने अमेरिका की नैशनल सिक्योरिटी एजेंसी जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर साइबर अटैक किया. रैनसम अंगरेजी शब्द है, जिस का अर्थ है, फिरौती.
इस साइबर हमले के बाद संक्रमित कंप्यूटरों ने काम करना बंद कर दिया. उन्हें फिर से खोलने के लिए बिटकौइन के रूप में 300 से 600 डौलर तक की फिरौती की मांग की गई. ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस, स्पेन, इटली, वियतनाम समेत लगभग 74 देशों में रैनसमवेयर साइबर हमले हुए थे. साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के मुताबिक, बिटकौइन मांगने के 36 हजार मामलों का पता चला. परिणामतया, 2,30,000 से ज्यादा कंप्यूटर प्रभावित हो गए थे.
बंगलादेश में 2015 के साइबर हमले ने बैंक तो बैंक, लोगों को भी दिवालिया बना दिया था. फिर भी हम नहीं चेत रहे हैं और बिना किसी पुख्ता सुरक्षा के आधार कार्ड को बैंक से जोड़ रहे हैं. लोगों की खूनपसीने की कमाई को लूटने का एक खुला मंच तैयार कर रहे हैं.
भविष्य में अगर इस प्रकार की घटनाएं देश में कहीं घट जाती हैं तो उन का जिम्मेदार कौन होगा? यह देश के सामने बहुत बड़ा प्रश्न है. सरकार को इस तरफ गंभीरता से सोचना होगा. और जब पूरा विश्वास हो जाए कि अब हम सुरक्षित हैं तभी लोगों के बैंक खातों को आधार कार्ड से जोड़ने के कार्य को अमल में लाया जाना चाहिए.
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विश्वभर में नारी के अधिकारों व उन के विकास की चर्चा है. उन के सम्मान में विश्व में 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है. नारी सम्मान की चर्चा के बीच हैरानी यह है कि कई देशों में नारी खतना जैसी क्रूर प्रथा जारी है. यह प्रथा नारी विकास को अंगूठा दिखाती साबित हो रही है. यह प्रथा आज भी इंडोनेशिया व कई अफ्रीकी देशों के पिछड़े इलाकों और कबीलाई क्षेत्रों में चलन में है.
संकीर्ण मानसिकता
इस में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि यह प्रथा नारी को शारीरिक व मानसिक क्षति पहुंचाती है. इस की असहनीय पीड़ा नारी को जीवनपर्यंत झेलनी पड़ती है. पति के प्रति वफादार बने रहने की पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता ने इस प्रथा को जन्म दिया है.
इस प्रथा के समर्थकों का इस विषय पर कहना है कि उन के जीवन में उन की अपनी संस्कृति का बहुत महत्त्व है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो पश्चिमी संस्कृति के गुलाम बन जाएंगे. भले ही इस कारण लाखों नारियों को असहनीय पीड़ा झेलनी पड़े. धिक्कार है ऐसी पुरुषवादी सोच पर जो हर समस्या की जड़ नारी को ही मानती है.
क्या है नारी खतना
नारी खतना को अंगरेजी में फीमेल जैनिटल म्यूटिलेशन यानी एफजीएम कहते हैं. इस के अंर्तगत नारी के जननांगों के क्लिटोरिस (जिसे भगनासा भी कहते हैं) का तकरीबन सारा भाग काट दिया जाता है, केवल मूत्रत्याग और मासिकधर्म के लिए छोटा सा द्वार छोड़ दिया जाता है.
इसलाम में खतना प्रथा
खतना एक स्वीकार्य प्रथा है जो केवल पुरुष खतना के नाम से जानी जाती है. इसे इसलाम में सही भी कहा जाता है. यह एक प्रकार की शल्यक्रिया होती है, जिसे अच्छे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से किया जाता है. यइ इसलाम से पहले भी अफ्रीका में होती रही है. सर्वप्रथम इस प्रथा का विवरण हमें रोमन साम्राज्य और मिस्र की प्राचीन सभ्यता में देखने को मिलता है.
इसलाम धर्म में जिस पुरुष का खतना नहीं होता वह मुसलमान नहीं कहलाता है. यही कारण है कि लगभग हर देश में मुसलमानों द्वारा अपनाई जाने वाली यह एक साधारण प्रक्रिया है.
अक्षत योनि की लालसा
इस में कोई संदेह नहीं है कि इस प्रथा की उत्पत्ति पुरुषवादी मानसिकता के कारण हुई है. पुरुष नारी को केवल भोग्या और संतानोत्पत्ति का माध्यम समझता है.
नारी की विवाह से पूर्व तक, अक्षत योनि बने रहे और वह विवाह से पूर्व किसी अन्य पुरुष से शारीरिक संबंध स्थापित न कर पाए, विवाह के बाद वह केवल अपने पति को यौनसंतुष्टि प्रदान करे. यही विशेष कारण रहा कि कुछ खुदपरस्त बाहुबली कठमुल्लाओं ने इसलाम धर्म की आड़ में इस प्रथा को विस्तार दिया.
इस प्रथा को मानने वाले देशों के पिछड़े इलाकों से संबंध रखने वाले अशिक्षित व बहुत गरीब हैं. उन की गरीबी व अज्ञानता का अवसरवादी लोग नाजायज फायदा उठाते हैं.
क्या है वास्तविकता
हमेशा से विवादास्पद नारी खतना की प्रथा को धर्म से जोड़ कर देखा जाता रहा है जबकि वास्तविकता में इस का धर्म से कोई लेनादेना नहीं है.
बड़े अफसोस के साथ इस बात को स्वीकारना होगा कि इस अमानवीय कुप्रथा को बढ़ावा देने में खुद नारीवर्ग अहम भूमिका निभाता है.
एक नारी की दूसरी नारी के प्रति द्वेष की भावना का ही परिणाम है कि इस प्रथा को नारी आधार प्रदान कर रही है. मां के न चाहने पर भी घर की बड़ीबुजुर्ग औरतें, जो दादी, नानी, चाची, ताई आदि होती हैं, बेटियों का जबरन खतना करवा देती हैं. इस प्रकार वे अपने साथ हुए शोषण का बदला लेती हैं. वे अपनी पोती, नातिन, भतीजी को जीवनभर असहनीय पीड़ा झेलने को विवश कर देती हैं.
जागरूकता की जरूरत
वर्तमान में नारी खतना की प्रथा के खिलाफ पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने ब्रिटेन में महिला जननांग विकृति के विरुद्ध छेड़े गए अभियान का समर्थन किया है.
वास्तव में यह नारी के प्रति होने वाली आपराधिक घटनाओं में से एक जघन्य अपराध है. वहीं, यह मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन भी है. इस समस्या के समाधान के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है. इस नृशंस प्रथा का अंत होना बहुत जरूरी है.
अब वक्त आ गया है कि नारी को नारी खतना जैसी वीभत्स प्रथा से मुक्ति मिले और धर्म के नाम पर नारी का शोषण पूरी तरह खत्म किया जाए.
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आज से 32 साल बाद यानी 2050 में विभिन्न धार्मिक समुदायों के हिसाब से कैसा होगा दुनिया का नक्शा, अमेरिका की जानीमानी सर्वेक्षण संस्था ‘पीयू’ द्वारा दुनिया के प्रमुख धर्मों की आबादी के ट्रैंड्स के बारे में कुछ समय पहले जारी की गई रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है. रिपोर्ट ने कई देशों की नींद उड़ा दी है. यदि ये ट्रैंड्स सही साबित हुए तो दुनिया के कई देशों का भूगोल बदल जाएगा. आज विश्व का हर देश इस बदलाव से अपने देश पर होने वाले असर के बारे में सोच रहा है. ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि आज के लोकतांत्रिक युग में जनसंख्या धर्मों की ताकत नापने का प्रमुख पैमाना है. जनसंख्या के अनुपात में धर्मों की राजनीतिक शक्ति बढ़ती या घटती है.
पीयू की रिपोर्ट में वर्ष 2010 को आधार मान कर वर्ष 2050 तक 8 प्रमुख धार्मिक समुदायों की जनसंख्या का आकलन और विश्लेषण किया गया है. विश्व तथा भारत के संदर्भ में इस के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं. इन 40 सालों में विश्व की जनसंख्या में 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिस में प्रमुख समुदायों में मुसलमानों की जनसंख्या सर्वाधिक यानी 73 प्रतिशत, ईसाई समाज की 35 प्रतिशत तथा हिंदुओं की जनसंख्या 34 प्रतिशत बढ़ेगी, इस हिसाब से आबादी के मामले में ईसाई पहले, मुसलमान दूसरे तथा हिंदू तीसरे नंबर पर होंगे.
भारत के हिंदुओं के लिए बुरी खबर यह है कि साल 2050 में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी में 2.8 फीसदी तक कमी आने की संभावना है. वर्ष 2050 में देश की कुल आबादी 1.7 अरब होगी. इस में 76.7 फीसदी हिंदू होंगे, जबकि साल 2010 में यह आंकड़ा 79.5 फीसदी था. 2010 में देश में हिंदुओं की कुल आबादी 97.37 करोड़ थी, जबकि साल 2050 में संभावित तौर पर यह 129.79 करोड़ होगी, इस प्रकार इस दौरान कुल हिंदू आबादी में मात्र 32.42 करोड़ की वृद्धि होगी. एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि 2050 तक हिंदू 50 फीसदी से कम होंगे.
जबकि साल 2050 में कुल आबादी में मुसलमानों की साझेदारी साल 2010 के 14.4 फीसदी से बढ़ कर 18.4 फीसदी हो जाएगी. इस दौरान उन की कुल आबादी 17.62 करोड़ से बढ़ कर संभावित तौर पर 31.06 करोड़ हो जाएगी. इस प्रकार इन 40 वर्षों के दौरान, उन की आबादी में 13.44 करोड़ की वृद्धि होगी. यह रपट बौद्ध धर्म के लिए भी चिंताजनक है कि उस की आबादी कम होगी या उतनी ही रहेगी.
भारत के संदर्भ में बताया गया है कि 2050 में भारत में विश्व के सब से ज्यादा हिंदू और सब से ज्यादा मुसलमान होंगे. इस के बाद पाकिस्तान तथा इंडोनेशिया में. दूसरी तरफ ज्यादातर हिंदू भारत, नेपाल और मौरीशस में रहते हैं.
इस प्रोजैक्शन मौडल को 2050 से आगे ले जाने पर नतीजा निकलता है कि 2070 में दुनिया में मुसलिमों और ईसाइयों की जनसंख्या लगभग बराबर होगी यानी दोनों विश्व की आबादी के 32-32 प्रतिशत होंगे. इस के बाद दोनों धर्मों की आबादी बढ़ेगी मगर वर्ष 2100 में मुसलिमों की आबादी 1 प्रतिशत ज्यादा
हो जाएगी. मुसलिम 35 प्रतिशत होंगे तो ईसाई 34 प्रतिशत. यह वृद्धि मुख्यरूप से अफ्रीका के कारण होगी जो उच्च प्रजनन दर वाला महाद्वीप है. इस के कारण दोनों धर्म विश्व जनसंख्या में अपना प्रतिशत बढ़ाएंगे.
बदलता धार्मिक चरित्र
धर्मों की आबादी में आने वाले इस बदलाव से कई देशों का धार्मिक चरित्र बदल जाएगा. वर्ष 2050 में आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, बेनिन, फ्रांस, रिपब्लिक औफ मैसिडोनिया, बोस्नियाहर्जेगोविना, नीदरलैंड्स ईसाई बहुसंख्य नहीं रह जाएंगे. अमेरिका में भी ईसाइयों की संख्या में कमी आएगी. 2010 में वे आबादी के तीनचौथाई से ज्यादा थे. 2050 में दोतिहाई रह जाएंगे. वहां दूसरी सब से ज्यादा आबादी यहूदियों की नहीं, मुसलमानों की होगी.
ईसाइयों की संख्या भले ही अमेरिका और ब्रिटेन में घट रही हो मगर रूस, चीन और दक्षिण कोरिया में ईसाई धर्म तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है. वर्ष 1900 से दक्षिण कोरिया में 1 प्रतिशत लोग ही ईसाई थे लेकिन ईसाइयत वहां तेजी से बढ़ी और आज 30 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई ईसाई हैं. रूस में कम्युनिज्म की समाप्ति के बाद ईसाइयत को अपनाने वालों की तादाद बढ़ी है. 1991 से 2008 के बीच रूसी वयस्कों में ईसाइयों की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़ कर 72 प्रतिशत हो गई है. चीन के धर्मों के विशेषज्ञ परजू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री फेंगांग यांग के मुताबिक, 1950 से 2010 के बीच ईसाइयत 7 प्रतिशत की दर से बढ़ी.
इस समय इसलाम दुनिया में सब से तेजी से बढ़ने वाला धर्म है और इस की वजह यह है कि वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की प्रजनन दर सब से ज्यादा यानी 3.1 प्रति महिला है, जबकि 2.7 प्रतिशत प्रजनन दर से ईसाई दूसरे नंबर पर हैं और 2.4 की प्रजनन दर के साथ हिंदू तीसरे नंबर पर. दूसरा निर्धारक तत्त्व है हर धर्म का वर्तमान आयु विभाजन यानी उस धर्म के अनुयायी कितने युवा हैं और उन के सामने कितने प्रजनन के वर्ष बाकी हैं. 2050 में 27 प्रतिशत आबादी 15 वर्ष से कम उम्र की होगी. इन में मुसलिम 34 प्रतिशत, हिंदू 30 प्रतिशत और ईसाई 27 प्रतिशत हैं. यह युवा आबादी मुसलिम आबादी के तेजी से बढ़ने की सब से बड़ी वजह बनेगी.
इस सर्वेक्षण में जो मुद्दे सामने आए, उन के अनुसार साल 2050 में यानी 21वीं सदी के मध्यबिंदु पर विश्व में अलगअलग मतावलंबियों के आंकड़े इस प्रकार होंगे : आज विश्व में मुसलिम 160 करोड़ हैं, वे 120 करोड़ से बढ़ कर 280 करोड़ होंगे. यह बताना कठिन है कि 40 वर्षों में 40 प्रतिशत की यह वृद्धि व्यावहारिक है या अतिरंजित है. उन का ईसाइयों के लिए जो आंकड़ा है वह बताता है कि अगले 35 वर्षों में उन का 70 करोड़ से बढ़ कर 290 करोड़ होना संभव है.
इस में मजे की बात यह है कि इस दौरान यूरोप, अमेरिका आदि देशों में ईसाइयों की संख्या 30 करोड़ से कम होगी. इसलिए रिपोर्ट में जो 70 करोड़ की वृद्धि दिखाई गई है वह वास्तव में 100 करोड़ की है, लेकिन यूरोप के लोगों में ईसाई धर्म त्यागने की संभावना के कारण वास्तव में यह जोड़ केवल 70 करोड़ का होगा. इसी दौरान हिंदुओं की संख्या 105 करोड़ से 130 करोड़ हो जाएगी, लेकिन भारत में मुसलिम जनसंख्या का अनुपात काफी बढ़ा हुआ होगा.
अमेरिका में बढ़ती हिंदू आबादी
पीयू ने 10 वर्ष पूर्व निष्कर्ष निकाला था कि अमेरिका और यूरोप में हिंदुओं का प्रभाव बढ़ेगा. 10 वर्ष पूर्व विश्व की ख्यातिप्राप्त साप्ताहिक ‘न्यूजवीक’ ने तो एक विशेषांक भी प्रकाशित किया था. उस में संपादिका लिशा मिलर ने तो उस समय यह संकेत दिया था कि पूरा अमेरिका धीरेधीरे भारतीय जीवनपद्धति को स्वीकारने की दिशा में बढ़ रहा है. लेकिन यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि यह निष्कर्ष हिंदुओं को खुश करने के लिए था या अतिशयोक्ति के सहारे ईसाइयों को सचेत करने वाला था.
पीयू रिसर्च सैंटर की नई रपट ‘रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी’ के मुताबिक अमेरिका की हिंदू आबादी बढ़ कर 22.3 लाख हो गई है और आबादी के लिहाज से हिंदू धर्म मानने वाले लोग यहां चौथे पायदान पर पहुंच गए हैं. साल 2007 से ले कर अब तक इस में 85.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अमेरिकी जनसंख्या में हिंदुओं की आबादी साल 2007 में 0.4 फीसदी से बढ़ कर पिछले साल 0.7 फीसदी हो गई. अध्ययन कुल आबादी में हिंदुओं की प्रतिशतता को दर्शाता है, लेकिन संख्या नहीं बताता.
इस रिपोर्ट को देखने से एक बात तो साफ होती है कि अगले 30-35 वर्षों में विश्व में मुसलिम जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी. इंडोनेशिया में आज 20 करोड़ 50 लाख और भारत में 17 करोड़ 70 लाख मुसलिम हैं. भारत में 35 वर्षों बाद मुसलमानों का आंकड़ा 20 करोड़ 50 लाख से अधिक होगा. वर्ष 2050 में विश्व में 31 प्रतिशत ईसाई होंगे और 30 प्रतिशत मुसलिम होंगे, लेकिन बाद के 20 वर्षों में दोनों में उसी अनुपात में वृद्धि हो कर विश्व में 31 प्रतिशत मुसलिम तथा 30 प्रतिशत ईसाई होने की संभावना उन्होंने व्यक्त की है.
इस रिपोर्ट में यूरोप स्थित मुसलिमों की संख्या को ले कर वृद्धि के काफी विवरण दिए गए हैं. उन के मत में 2010 में यूरोप में 5.9 प्रतिशत मुसलिम थे, जो 2050 में 10 प्रतिशत होंगे. इस से भी अधिक उन की ही एक गंभीर चेतावनी है, वह यह कि यूरोप में सभी अन्य धर्मावलंबी तथा सैकुलर आदि लोगों की तुलना में ईसाई 45 प्रतिशत यानी अल्पसंख्यक होंगे. ब्रिटेन में भी यही स्थिति होगी. यूरोप में मुसलिमों की जो वृद्धि होगी वह मुख्यतया फ्रांस, जरमनी और बेल्जियम में होगी.
रिपोर्ट में दिए हुए आंकड़े जनसंख्या की वृद्धि, प्रजनन संख्या से जुड़े अनुमान पर आधारित हैं. इस में फिलहाल विश्वभर में चल रहे धर्मांतरण अभियानों से बढ़ने वाली संभावित संख्या का अनुमान नहीं है, जबकि भारत, अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान इलाका और लैटिन अमेरिका में धर्मांतरण जोरों पर है. कई जगह तो ईसाइयत और इसलाम के बीच धर्मांतरण की होड़ मची है. अब तो चीन में भी धर्मांतरण के चलते ईसाई मिशनरी और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बीच आमनेसामने की लड़ाई चल रही है.
रपट का यह मानना है कि धर्मांतरण भी किसी धार्मिक समुदाय की संख्या वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. लेकिन धर्मांतरण काफी जटिल प्रक्रिया है. कुछ देशों में वयस्कों के लिए एक धर्म छोड़ कर दूसरा धर्म अपनाना सामान्य बात है लेकिन कई देशों में धर्म बदलना बहुत मुश्किल और कानूनी वजहों से पेचीदा है. कई देशों में तो इसे गैरकानूनी माना गया है. ज्यादातर मुसलिम देशों और हमारे पड़ोसी नेपाल में इसे गैरकानूनी माना जाता है. सर्वे कहता है बहुत से लोग, जिन का किसी धर्म से वास्ता नहीं था, ईसाई बन जाते हैं तो बहुत लोग जिन की परवरिश ईसाई के तौर पर हुई वे नास्तिक या अधर्मी बन जाते हैं. भारत के बारे में सर्वे कहता है कि धर्मांतरण के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
रपट की प्रामाणिकता कितनी आव्रजन भी देशों के धार्मिक चरित्र को बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. आबादी बढ़ने के अन्य कारणों के साथ आव्रजन को भी जोड़ने के बाद यूरोप में मुसलिम आबादी 2010 के 5.9 प्रतिशत से बढ़ कर 2050 में 10.2 प्रतिशत हो जाएगी, जबकि आव्रजन को न जोड़ने पर यह आंकड़ा 8.4 प्रतिशत ही रह जाता है. अमेरिका में 2010 में हिंदू आबादी 0.7 प्रतिशत थी जो आव्रजन को जोड़ने पर 2050 में 1.3 प्रतिशत हो जाएगी पर आव्रजन को न जोड़ने पर लगभग 0.8 प्रतिशत रहेगी.
उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर पीयू रिसर्च सैंटर की रपट चौंकाने वाली अवश्य है. वस्तुत: जनगणना एक बड़ी पेचीदा प्रक्रिया है जो किसी भी देश के सामाजिक तथा आर्थिक कारणों, भौगोलिक तथा प्रकृति विज्ञान का परिणाम होती है. मानव व्यवहार के बारे में ऐसे निष्कर्ष पूरी तरह से सही नहीं होते हैं तथा वक्त की कसौटी पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरते. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रपट पश्चिम समर्थक और ईसाई समर्थक नजरिए से लिखी गई है. वह विश्व में बढ़ रहे इसलामी वर्चस्व को उठाती है जबकि सारी दुनिया में चल रहे ईसाई धर्मांतरण पर चुप्पी साध लेती है.
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रामायण में शूर्पणखा की नाक कटने वाला प्रसंग पसंदीदा प्रसंगों में से एक है. गांवदेहातों में आज भी जिस किसी महिला को बेइज्जत करना होता है उसे नकटी कह दिया जाता है. यह कोई नहीं सोचता कि अप्रितम सौंदर्य की स्वामिनी शूर्पणखा की गलती आखिर क्या थी. उस ने तो जंगल में 2 सुकुमारों को देख कर उन्हें प्रपोज भर किया था. यह बात हर साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के मौके पर सोशल मीडिया पर वायरल जरूर होती है.
लेकिन इस दफा वैलेंटाइन डे के 10 दिन पहले ही, दूसरे तरीके से शूर्पणखा वाला प्रसंग संसद से वायरल हुआ जब राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से यह गुजारिश करते नजर आए थे कि आप रेणुकाजी को कुछ मत कहिए क्योंकि ‘रामायण’ सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का सौभाग्य आज मिल रहा है.
नरेंद्र मोदी की मंशा चंद घंटों में देशभर में फैलाने में भाजपा आईटी सैल के मुखिया अमित मालवीय ने गजब की फुरती दिखाई और ट्वीट कर लोगों से पूछा कि आप को किस किरदार की याद आई. कुछ देर बाद खुद अमित मालवीय ने ही रामायण में शूर्पणखा की नाक कटने वाला फोटो साझा कर डाला जिस से एक कांग्रेसी नेत्री की नाक कटने जैसी सुखद अनुभूति सभी को हो.
रहीसही कसर केंद्रीय राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने पूरी कर डाली. उन्होंने बाकायदा रामायण सीरियल का वह दृश्य फेसबुक कर शेयर किया जिस में राम के आदेश पर लक्ष्मण अट्टहास लगाती शूर्पणखा की नाक तलवार से काट रहा है.
देखते ही देखते रेणुका चौधरी और शूर्पणखा की यह तुलना वक्त काटने का जरिया बन गई. राज्यसभा का संदर्भ प्रसंग भूलभाल कर लोग शूर्पणखा की हंसी और कटी नाक पर चर्चा करने लगे और यही नरेंद्र मोदी चाहते थे कि लोग संसद की कार्यवाही को गंभीरता से न लें, बल्कि शूर्पणखा जैसे ढेरों पौराणिक पात्रों व मनोरंजक प्रसंगों में उलझे रहें.
किसी महिला को सरेआम शूर्पणखा करार देने में पुरुषों को किस तरह का सुख मिलता है, यह बात जब मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर रेणुका चौधरी को समझ आई तो उन्होंने विरोध की सियासी रस्म निभाई और फिर चुप हो गईं. यह जरूर उन्हें समझ आ गया होगा कि संसद में जानबूझ कर लोकतंत्र को किनारे करते हुए पौराणिकवाद लाया गया था यह कोई पहला मौका नहीं था. जब नरेंद्र मोदी ने किसी पौराणिक पात्र को यों बीच में घसीटा हो.
इस से पहले पिछले साल 4 अक्तूबर को दिल्ली में कंपनी सैके्रटरीज के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद असहज दिख रहे थे. इस दिन विकास के आंकड़े दिखाते उन्होंने दावा किया था कि देश की अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर बढ़ रही है पर कुछ लोग शल्य की तरह निराशा फैला रहे हैं.
शल्य का नाम लेना भर था कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर बेहोश से पड़े देश में गजब की फुरती आ गई. न्यूज चैनल्स ने तो गजब ढा दिया. उन्होंने शल्य की ऐसी शल्यचिकित्सा कर डाली कि लोगों को बीआर चोपड़ा कृत टीवी सीरियल महाभारत याद हो आया.
अर्थव्यवस्था, जीडीपी, नोटबंदी और जीएसटी से ताल्लुक रखती दूसरी कई अहम बातों और तथ्यों को किनारे करते मीडिया शल्य का महिमामंडन और चित्रण करने लगा कि वह महाभारत का एक पात्र था और कर्ण का सारथी था. यह फलां का मामा और ढिकानी का भाई था.
कई चैनल्स ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री के भाषण के बीचबीच में बीआर चोपड़ा के महाभारत सीरियल की क्लिपिंग्स जोड़तोड़ कर दिखाई. देखते ही देखते देश वर्तमान से निकल कर द्वापर युग में पहुंच गया. छोटे परदे पर घोड़े हिनहिनाने लगे. तीर, तलवार, भाले और त्रिशूल चलने लगे. ढालें दिखने लगीं और कुरुक्षेत्र में लड़ रहे कौरवपांडवों के बीच के सैनिकों का बहता खून नजर आने लगा.
नरेंद्र मोदी की इस मंशा को भारी शोरशराबे के बीच चैनल्स ने विस्तार दिया था कि दरअसल में वे क्यों पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा की तुलना शल्य से कर रहे हैं. शल्य योद्धाओं में निराशा फैलाने के लिए कुख्यात था. कर्ण जैसे बहादुर और प्रतिभावान योद्धा को वह हतोत्साहित करता रहता था, जिस के चलते कर्ण अपनी युद्धकला भूल गया था और कौरवों को हार का सामना करना पड़ा था.
शल्य की शल्यचिकित्सा
थोड़ा झिझकते कुछ न्यूज चैनल्स और दूसरे दिन अखबारों के विश्लेषकों ने संकेतों में यह बात कहने की कोशिश की कि क्यों प्रधानमंत्री को खुद की तुलना कर्ण से करनी पड़ी और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में शल्य के उल्लेख के माने क्या हैं. कर्ण क्षत्रिय होते हुए भी जिंदगीभर सूत पुत्र कहलाते रहे. उन्हें सवर्णों द्वारा तिरस्कृत किया जाता रहा और शल्य का झुकाव पांडवों की तरफ होते हुए भी उस की पूछपरख बनी रही.
इसी दौरान एक और बात प्रमुखता से की गई कि शल्य जो भी था और जैसा भी था वह जानतासमझता था कि कौरव छल कर रहे हैं. अधर्म कर रहे हैं. बेईमानी कर रहे हैं इसलिए हारेंगे.
लिहाजा, वह कौरवों से धर्म की राह पर चलने के लिए कहता रहता था यानी वह गलत कुछ नहीं करता था. धर्म की बात कहने और बताने वाला कोई भी हो वह भला गलत कैसे हो सकता है?
यशवंत सिन्हा ने दरअसल एक अंगरेजी अखबार में लिखे अपने लेख में कहा था कि वित्तीय कुप्रबंधन, नोटबंदी और जीएसटी के लचर क्रियान्वयन ने भारतीय अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर दिया है और (वास्तविक) आर्थिक वृद्धि दर निचले स्तर पर पहुंच गई है. वित्तमंत्री अरुण जेटली पर निशाना साधते यशवंत सिन्हा ने कहा था कि वे 24 घंटे लगातार काम करने के बावजूद अपने कार्य के प्रति न्याय करने में विफल रहे हैं.
अपनी मंशा का खुलासा करते उन्होंने न केवल नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली बल्कि अपनी ही पार्टी भाजपा पर भी गंभीर आरोप लगाते कहा था कि वास्तव में 2014 के चुनाव के पहले ही अरुण जेटली को वित्तमंत्री बनाना तय हो गया था. इन्हीं जेटली ने अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया.
केंद्र सरकार की अर्थनीति पर ताबड़तोड़ प्रहार भी यशवंत सिन्हा ने तकनीकी तौर पर किए थे. बकौल यशवंत सिन्हा अरुण जेटली, खुशनसीब वित्तमंत्री हैं कि उन के कार्यकाल में कच्चे तेल के दाम गिरे. इस का फायदा उठाते वे गैरनिष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) को नियंत्रित कर सकते थे पर हालत यह है कि सरकार के आंकड़ों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की मौजूदा वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत दिख रही है लेकिन वास्तव में वह 3.7 प्रतिशत है.
नोटबंदी के फैसले को उन्होंने आर्थिक आपदा बताते लिखा था कि निजी निवेश घट रहा है, कृषि की स्थिति बहुत खराब है, विनिर्माण उद्योग में मंदी है, लोगों की नौकरियां खत्म हो गई हैं और जीएसटी के लचर क्रियान्वयन से उद्योग और व्यापार जगत में उथलपुथल मच गई है. अस्तित्व के संकट से जूझते लघु उद्योग क्षेत्र को तत्काल राहत पैकेज की जरूरत है. सरकार बड़े वित्तीय संकट के कगार पर है.
ऐसे गुम हुई मुद्दे की बात
यशवंत सिन्हा के गंभीर आरोपों में दम था, आंकड़े थे, तर्क और तथ्य भी थे. नरेंद्र मोदी की दूसरी दिक्कत यह थी कि यह आरोप उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्तमंत्री ने लगाए थे जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता था, क्योंकि इस पर त्राहित्राहि कर रहे आम लोग भी गंभीर हो चले थे और इस बाबत उत्सुक होते सरकार से जवाब की उम्मीद कर रहे थे.
चालाकी कह लें या खूबसूरती से नरेंद्र मोदी ने शल्य का जिक्र करते पूरी बाजी ही उलट दी जिस से मीडिया और जनता का ध्यान शल्य और भीष्म पर केंद्रित हो गया.
नरेंद्र मोदी की यह मजबूरी हो गई थी कि वे यशवंत सिन्हा के आरोपों को जैसे भी हो किनारे करें नहीं तो लेने के देने पड़ जाते. ठीक यही हालत गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में बड़ी संख्या में हुई बच्चों की मौतों के बाबत देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की थी.
मासूमों की मौत पर योगी आदित्यनाथ ने बेहद गोलमाल लहजे में कहा था कि औक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई. सिर्फ सनसनी फैलाई गई. इस से सरकारी अस्पताल में गरीबों को मिल रही सेवा से भरोसा टूटा. गरीब प्राइवेट अस्पतालों में जाने को मजबूर हो रहा है. यह जघन्य पाप है.
अगर योगी आदित्यनाथ साफसाफ भी कहते कि बच्चे औक्सीजन की कमी से नहीं, बल्कि पूर्वजन्म के पापों के चलते बेवक्त मरे तो यकीन मानें किसी को हैरत नहीं होती. वजह, उन की छवि मुख्यमंत्री की कम संन्यासी और महंत की ज्यादा है जो भगवा कपड़े पहने धर्म की भाषा बोलते रहते हैं.
योगी अकसर यह बताने में कोई झिझक या शर्म नहीं करते बल्कि गर्व महसूस करते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में वे वही काम कर रहे हैं जो एक संन्यासी के रूप में करना चाहते हैं. फिर क्यों मठ से निकल कर वे सीएम हाउस आ गए. इस बात का जवाब वे शायद ही दे पाएं. उन की निगाह में उन का काम लोककल्याण का है.
धन्य हैं योगी आदित्यनाथ जो एक गंभीर लापरवाही को भी पापपुण्य के तराजू पर तोलते हुए अपनी कमजोरी और लचर प्रशासनिक क्षमता को ढकते रहे. क्या वे बच्चे पूर्वजन्म के पापी थे जो उन्होंने इस तरह औक्सीजन की कमी के चलते मौत की सजा भुगती. योगी की नजर में तो ऐसा ही हुआ है.
एक कर्मठ प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कर्म में विश्वास करता है. वह मानता है कि कर्म करना उस के हाथ में है उस का फल देना भगवान का काम है. अब अगर लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के चलते लोग कंगाल हो चले हैं तो विलाशक वे अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं. 100-50 बच्चे अस्पताल के पलंग पर दम तोड़ दें तो यह भी उन के पूर्वजन्म के पापों की सजा है. इस में किसी सत्तारूढ़ मंत्री या नेता की क्या गलती, क्योंकि यह सब तो ईश्वर द्वारा पूर्व नियोजित है.
और भी हैं उदाहरण
अकेले नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित राज्यों के अधिकांश मंत्री और नेता इस भाषा और व्यवस्था का उल्लेख कर पल्ला झाड़ने से नहीं चूकते.
ऐसा ही एक ऊटपटांग बयान अगस्त 2017 में मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री शरद जैन ने दिया था. पूरे देश सहित मध्य प्रदेश में भी स्वाइन फ्लू नाम की बीमारी से मौतें हो रही हैं और सरकार अपने अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने में नाकाम साबित हो रही है. पर वे भगवा मंत्री भी क्या जो अपनी या सरकार की गलती स्वीकारने की हिम्मत दिखाए. उलटे, इन्हें ढंकने के लिए इन मंत्रीजी ने बड़ा सटीक और लाजवाब बयान यह दे डाला कि मौत और जिंदगी किसी इंसान के नहीं, बल्कि भगवान के हाथों में है. हम तो आखिरी सांस तक मरीज की सेवा के लिए तैयार हैं. शरद जैन का यह सनातनी और पौराणिक कथन तरहतरह से मजाक में दोहराया भी गया था.
असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्व सरमा तो शरद जैन से चार कदम आगे निकल कर नवंबर 2017 में सार्वजनिक रूप से यह कह बैठे थे कि कुछ लोग कैंसर जैसी घातक बीमारियों से इसलिए ग्रस्त हैं क्योंकि उन्होंने अतीत में पाप किए हैं और यह ईश्वर का न्याय है.
इस मूर्खतापूर्ण और बेहूदे बयान की निंदा विरोधियों ने तो की ही, कैंसर से जूझ रहे कई मरीजों ने भी इस पर अपना एतराज दर्ज कराया. इस मंत्री के बयान से कैंसर के मरीजों पर क्या गुजरी होगी, इस का अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता कि कैसे लोकतंत्र में उस का ही कोई पैरोकार उन्हें इलाज व हिम्मत बंधाने के बजाय पापी कह रहा है.
अब भला कोई क्या बहस या तर्क करेगा. कौन मंत्री या सरकार से पूछेगा कि आप की सेवाएं इतनी चरमराई हुई हैं औरआप हैं कि अपनी कमजोरी और लापरवाही को हरि इच्छा की आड़ में ढंकने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं.
धरमकरम व टोनेटोटके
बदहाल अर्थव्यवस्था, औक्सीजन की कमी से बच्चोें की मौतें और स्वाइन फ्लू से मरते लोग तो अपने कर्मों की सजा भुगत ही रहे हैं लेकिन कर्ज में डूबे और लगातार घाटा उठाते किसान अगर खुदकुशी कर रहे हैं तो क्या यह भी भगवान की मरजी है?
किसानों से ज्यादा तरस तो उन नेताओं पर आता है जो कुदरती कहर से बचने के लिए पंडेपुजारियों की तरह टोनेटोटके करने और धरमकरम करने की सलाह देने लगते हैं. फरवरी के पहले हफ्ते में जब मध्य प्रदेश में हुई ओलावृष्टि से फसलें बरबाद हुईं तो सीहोर के पूर्व भाजपा विधायक रमेश सक्सेना ने किसानों को रोजाना हनुमान चालीसा पढ़ने की नसीहत दे डाली. उन्होंने वजह यह बताई कि हनुमान चालीसा का पाठ करने से प्राकृतिक आपदाएं नहीं आतीं.
अब तक लोग यही समझते थे कि हनुमान चालीसा से भूतप्रेत ही भागते हैं पर नई बात यह कि इस से ओले नहीं गिरते. अंधविश्वास फैलाते इन मूढ़ नेताओं को कभी अक्ल आएगी, ऐसा लगता नहीं. पर इस विधायक के बयान की खिल्ली उड़ी तो उसे भाजपा के ही कुछ नेताओं ने मुंह बंद रखने का पैगाम भिजवाया दिया.
साल 2016 में पंजाब के तत्कालीन कृषि मंत्री सुरजीत सिंह ने बजाय परेशान किसानों के जख्मों पर मलहम लगाने के बेरहमी से उन के जख्मों पर नमक छिड़कते कहा था कि किसान अगर आत्महत्या कर रहे हैं तो यह भगवान की मरजी है. यह और बात है कि अब पंजाब में भाजपा गठबंधन सत्ता में नहीं है लेकिन केंद्र सरकार चाहे तो इस मंत्री के उक्त वक्तव्य को राष्ट्रीय दर्शन घोषित कर किसान खुदकुशी के कलंक से छुटकारा पा सकती है.
सुरजीत सिंह कितने भाग्यवादी और आशावादी हैं, इस का अंदाजा उन के एक और बयान से लगाया जा सकता है कि पंजाब में ही एक चलती बस में 17 साल की एक लड़की छेड़छाड़ का शिकार हुई थी तब भी उन्होंने इसे भगवान की मरजी करार दिया था.
जाहिर है किसान इन मंत्रीजी की नजर में पापी हैं इसलिए खुदकुशी करने के लिए मजबूर होते हैं. यह उन के पूर्वजन्म के पापों की सजा है और छेड़छाड़ की शिकार किशोरी ने भी अपने पापों की सजा भुगती. जरूर ऊपर उस ने पूर्वजन्म में ऐसा उलटासीधा कुछ किया होगा जो धर्म के लिहाज से स्त्री को नहीं करना चाहिए.
इस लिहाज से तो जम्मूकश्मीर की हिंसा भी भगवान की मरजी मानी जानी चाहिए. आतंकवादी तो निमित्त मात्र हैं. उन के हाथों जो लोग मारे गए या मारे जा रहे हैं वे दरअसल में अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं. फिर आतंकवाद पर हायहाय क्यों? इस थ्योरी के लिहाज से इंडियन पीनल कोड की तो कोई जरूरत ही नहीं क्योंकि हर अपराध भगवान की मरजी से होता है और उस के अपने कारण होते हैं जिन का संबंध पूर्व या वर्तमान जन्म के कर्मों और पापों से होता है.
इसीलिए बैकफुट पर भाजपा
ढीले पड़ते भाजपाई तेवरों की एक बड़ी वजह यही पौराणिकवादी राजनीति और नेताओं की धार्मिक छवि है. इन में से कुछ आक्रामक हैं तो कुछ थोड़े नरम और नम्र हैं पर उन की कार्यशैली भिन्न नहीं है. ये सभी देशभर के नामी मंदिरों में जा कर देवीदेवताओं के आगे माथा टेकते हैं और चुनाव के वक्त जनता को भगवान बताने लगते हैं तो उन का दोहरापन छुपाए नहीं छिपता.
देश अगर पिछड़ा है, भाग्यवादी और जड़ हो रहा है तो इस में धर्मगुरुओं के अलावा इन पापपुण्य वाले नेताओं का भी कम योगदान नहीं जो पौराणिक पात्रों का सहारा ले कर अपना बचाव करते हैं और जरूरत पड़ने पर कर्म और भाग्य के सिद्धांत का पहाड़ा दोहराते अपनी कमजोरियों पर धर्म का परदा डालते रहते हैं. पर अब यह खेल भी जनता समझने लगी है तो इन का आत्मविश्वास भी डगमगाता दिख रहा है.
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जो हमें किसी भी तरह की शिक्षा देता है, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है उसे गुरु कहा जाता है. खेलों से जुड़े कोच भी इसी श्रेणी में आते हैं, लेकिन कुछ लोग गुरु की गरिमा पर काली स्याही पोत देते हैं.
इंगलैंड के एक पूर्व फुटबौल कोच बैरी बेनल उन्हीं में से एक हैं. उन पर बच्चों के 50 से ज्यादा बार यौनशोषण करने के आरोप लगे और उन्हें 30 साल की सजा सुनाई गई.
लिवरपूल की स्थानीय अदालत के जज ने इस मामले पर बैरी बेनल के लिए सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, ‘‘वे बच्चे जिन के लिए तुम सबकुछ थे उन के लिए तुम नरपिशाच निकले. तुम ने उन का बचपन छीन लिया.’’
64 वर्षीय बैरी बेनल कभी मैनचेस्टर सिटी और कू्र एलेक्सजेंडर के लिए नई प्रतिभाएं तलाशा करते थे. उन्होंने वर्ष 1979 से 1990 के बीच 8 से 15 साल की उम्र के 11 बच्चों का यौनशोषण किया था. इस मामले से जुड़े एक पीडि़त का कहना था, ‘‘मैं आज भी उस घटना को याद कर के सिहर जाता हूं. मैं एक छोटा बच्चा था. मेरे सपने टूट गए. मैं अकसर सोचता हूं कि अगर वह सब नहीं होता तो मैं क्या बन सकता था.’’
बैरी बेनल ने केवल उस बच्चे के ही सपनों को नहीं रौंदा बल्कि भविष्य के उन खिलाडि़यों के मन में भी डर पैदा कर दिया जो खेलों में नाम कमाना चाहते हैं.
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सुप्रीम कोर्ट चाहे लाख कह ले कि हर वयस्क को प्रेम व विवाह का मौलिक अधिकार है और किसी बजरंगी, किसी खाप, किसी सामाजिक या धार्मिक गुंडे को हक नहीं कि इस अधिकार को छीने, मगर असल में धार्मिक संस्थाएं विवाह के बीच बिचौलिए का हक कभी नहीं छोड़ेंगी. विवाह धर्म की लूट का वह नटबोल्ट है जिस पर धर्म का प्रपंच और पाखंड टिका है और इस में किसी तरह का कंप्रोमाइज कोई भी धर्म नहीं सहेगा, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे.
जो भी धर्म के आदेश के खिलाफ जा कर शादी करेगा, सजा सिर्फ उसे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तेदारों को भी मिलेगी. सब को कह दिया जाएगा कि इस परिवार से कोई संबंध न रखो. कोई पंडित, मुल्ला, पादरी शादीब्याह न कराएगा. श्मशान में जगह नहीं मिलेगी, लोग किराए पर मकान नहीं देंगे, नौकरी नहीं मिलेगी.
धर्म का जगव्यापी असर है. जब लोग 7 समंदर पार रहते हुए भी कुंडली मिलान के बाद विवाह करते हों, गोरों व कालों की कुंडली भी बनवा लेते हों ताकि सिद्ध किया जा सके कि धर्म, रंग और नागरिकता अलग होने के बावजूद विवाह विधिविधान से हुआ है, तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की फुसफुसाहट हिंदुत्व के नगाड़ों के बीच खो जाएगी.
पारंपरिक शादियां चलती हैं, तो इसलिए कि शादी चलाना पतिपत्नी के लिए जरूरी होता है, उन का कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड, धर्म से कोई मतलब नहीं होता. शादी दिलों का व्यावहारिक समझौता है. एकदूसरे पर निर्भरता तो प्राकृतिक जरूरत है ही, सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इस के लिए किसी धर्मगुरु के आदेश की जरूरत नहीं. यदि प्यार हो, इसरार हो, इकरार हो, इज्जत हो तो कोई भी शादी सफल हो जाती है. बच्चे मातापिता पर अपनी निर्भरता जता कर किसी भी बंधन को, शादी को ऐसे गोंद से जोड़ देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, कानून या कुंडली की जरूरत नहीं.
कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड के प्रपंच पंडितों ने जोड़े हैं, ये धर्म की देन हैं, प्राकृतिक या वैज्ञानिक नहीं. शादी ऐसा व्यक्तिगत कृत्य है जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है और धर्म इस अवसर पर मास्टर औफ सेरिमनीज नहीं मास्टर परमिट गिवर बन कर पतिपत्नी को जीवन भर का गुलाम बना लेता है.
शादी में धर्म शामिल है, तो बच्चे होने पर उसे बुलाया जाएगा और तभी उसे धर्म में जोड़ लिया जाएगा ताकि वह मरने तक धर्म के दुकानदारों के सामने इजाजतों के लिए खड़ा रहे.
विधर्मी से विवाह पर धर्म का रोष यही होता है कि एक ग्राहक कम हो गया है. चूंकि दूसरे धर्म का ग्राहक भी कम होता है, दोनों धर्मों के लोग एकत्र हो कर इस तरह के विवाह का विरोध करते हैं. आमतौर पर शांति व सुरक्षा तभी मिलती है जब पति या पत्नी में से एक धर्म परिवर्तन को तैयार हो.
अगर उसी धर्म में गोत्र या सपिंड का अंतर भुला कर शादी हो रही हो तो धर्म के दुकानदारों के लिए दोनों को मार डालने के अलावा कोई चारा नहीं होता. शहरों में तो यह संभव नहीं होता पर गांवों में इसे चलाना आसान है, संभव है और लागू करा जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना कह ले, जब तक देश में धर्म के दुकानदारों का राज है और आज तो राज ही वे कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आ चुके हैं, जैसा है.
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